संदर्भ
वर्ष 2022 में भारत में बाघों की संख्या बढ़कर 3,682 हो जाने के बाद, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने बाघ संरक्षण हेतु नया रोडमैप जारी किया है। इसमें संरक्षण का केंद्रबिंदु केवल बाघों की संख्या बढ़ाने के बजाय आवासों के पुनर्स्थापन, शिकार आधार के सुदृढ़ीकरण तथा परिदृश्य के मध्य निर्बाध आवागमन को सुनिश्चित कर दीर्घकालिक संरक्षण पर केंद्रित किया गया है।
नई संरक्षण रणनीति की आवश्यकता क्यों है?
- बाघों का असमान वितरण: यद्यपि भारत में बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, फिर भी लगभग 36% बाघ केवल 10–12 बाघ अभयारण्यों में केंद्रित हैं, जिससे विभिन्न परिदृश्यों (Landscapes) में पारिस्थितिकी असंतुलन उत्पन्न हो रहा है।
- कई बाघ अभयारण्यों में बाघों की घटती उपस्थिति: लगभग 12 बाघ अभयारण्यों में तीन से भी कम बाघ हैं, जबकि कावल (तेलंगाना), कमलांग (अरुणाचल प्रदेश) तथा डंपा (मिजोरम) में उपयुक्त वन आवास होने के बावजूद वर्तमान में कोई बाघ स्थायी रूप से उपस्थित नहीं है।
- केवल संख्या वृद्धि से आगे का संरक्षण: सफल बाघ संरक्षण केवल बाघों की संख्या बढ़ाने पर निर्भर नहीं करता, बल्कि स्वस्थ आवास, पर्याप्त शिकार आधार, आनुवंशिक विविधता तथा परिदृश्य संपर्कता सुनिश्चित करने पर भी समान रूप से निर्भर करता है।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के बारे में
- स्थापना: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना वर्ष 2005 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (वर्ष 2006 के संशोधन के माध्यम से) के अंतर्गत की गई।
- प्रशासनिक मंत्रालय: यह पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अधीन कार्य करता है।
- जनादेश: यह प्रोजेक्ट टाइगर का क्रियान्वयन करता है, बाघ संरक्षण योजनाओं को अनुमोदित करता है, बाघ अभयारण्यों के प्रबंधन के लिए मानक निर्धारित करता है तथा पूरे भारत में बाघ संरक्षण की निगरानी करता है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के बारे में
- स्थापना: भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) एक स्वायत्त संस्थान है, जिसकी स्थापना वर्ष 1982 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अधीन की गई।
- मुख्यालय: देहरादून, उत्तराखंड।
- जनादेश: यह वन्यजीव अनुसंधान, पारिस्थितिकी निगरानी, क्षमता निर्माण एवं प्रशिक्षण का कार्य करता है तथा राष्ट्रीय बाघ आकलन अभ्यास सहित वन्यजीव संरक्षण के लिए वैज्ञानिक सहयोग प्रदान करता है।
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भारत में बाघ संरक्षण के समक्ष चुनौतियाँ
- अत्यधिक घनी स्रोत आबादी: कॉर्बेट, बाँदीपुर एवं काजीरंगा जैसे उच्च घनत्व वाले बाघ अभयारण्य अपनी पारिस्थितिकी वहन क्षमता के निकट पहुँच चुके हैं, जिसके कारण विस्थापित बाघ आस-पास के मानव-प्रधान परिदृश्यों की ओर जाने के लिए विवश हो रहे हैं।
- मानव–वन्यजीव संघर्ष: विस्थापित बाघ प्रायः कृषि क्षेत्रों, बफर क्षेत्रों एवं मानव बस्तियों में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे पशुधन का शिकार, प्रतिशोधात्मक हत्या तथा मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।
- आवास विखंडन: सड़कों, रेलमार्गों, नहरों, खनन एवं अन्य विकासात्मक गतिविधियों के विस्तार से वन्यजीव गलियारों का विखंडन हो रहा है, जिससे बाघों का आवागमन एवं आनुवंशिक आदान-प्रदान बाधित होता है।
- शिकार की कमी: अनेक बाघ अभयारण्यों में उपयुक्त वन होने के बावजूद शिकार प्रजातियों का घनत्व कम है, जिससे वहाँ प्रजनन सक्षम बाघ आबादी को बनाए रखना कठिन हो जाता है।
- ‘ह्रासमान आवास’ (Sink Habitats) : अनेक बाघ अभयारण्य ‘ह्रासमान आवास’ (Sink Habitats) के रूप में कार्य कर रहे हैं, जहाँ खराब आवास गुणवत्ता, शिकार की कमी अथवा निकटवर्ती वनों से कम संपर्कता के कारण बाघों की मृत्यु दर, उनके सफल प्रजनन से अधिक है।
स्रोत एवं ‘ह्रासमान’ आबादियों की अवधारणा
- स्रोत आबादी: ये ऐसे बाघ अभयारण्य होते हैं, जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला आवास, प्रचुर शिकार आधार, स्वस्थ प्रजननशील बाघ आबादी तथा अधिक बाघ उपस्थित होते हैं, जो स्वाभाविक रूप से निकटवर्ती परिदृश्यों में प्रसारित हो जाते हैं।
- ‘ह्रासमान’ आबादी: ये ऐसे क्षेत्र होते हैं जहाँ आवास की गुणवत्ता निम्न, शिकार आधार अपर्याप्त, प्रजनन सीमित अथवा पारिस्थितिकी संपर्कता कमजोर होती है। परिणामस्वरूप, ये क्षेत्र अपनी बाघ आबादी के लिए स्रोत आबादियों से आने वाले बाघों पर निर्भर रहते हैं।
- संतुलित ‘मेटापॉपुलेशन’: दीर्घकालिक बाघ संरक्षण के लिए स्रोत एवं ‘ह्रासमान’ आबादियों के मध्य सुदृढ़ पारिस्थितिकी संपर्क आवश्यक है, जिससे निरंतर आनुवंशिक प्रवाह, प्राकृतिक प्रसार तथा पुनर्स्थापन सुनिश्चित हो सके।
नए बाघ संरक्षण रोडमैप की प्रमुख विशेषताएँ
- 25 बाघ अभयारण्यों के पुनर्स्थापन को प्राथमिकता: केंद्र सरकार ने ऐसे 25 बाघ अभयारण्यों की पहचान की है, जहाँ आवास की गुणवत्ता, शिकार आधार अथवा बाघों की उपस्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है तथा लक्षित संरक्षण उपायों की आवश्यकता है।
- स्रोत आबादियों को सुदृढ़ बनाना: कॉर्बेट, बाँदीपुर एवं काजीरंगा सहित 13 उच्च प्रदर्शन करने वाले बाघ अभयारण्यों में स्वस्थ प्रजननशील बाघ आबादी बनाए रखने के लिए विशेष संरक्षण प्रयास जारी रहेंगे।
- आवास का पुनर्स्थापन: वनों की गुणवत्ता में सुधार, मानवीय हस्तक्षेप को कम करना तथा क्षतिग्रस्त आवासों का पुनर्स्थापन कर संघर्षरत बाघ अभयारण्यों की पारिस्थितिकी वहन क्षमता बढ़ाई जाएगी।
- शिकार आधार का पुनरुद्धार: शाकाहारी वन्यजीवों का वैज्ञानिक प्रबंधन तथा आवास सुधार के माध्यम से बाघों के लिए आवश्यक शिकार आधार को सुदृढ़ किया जाएगा।
- परिदृश्य के मध्य निर्बाध आवागमन में सुधार: वन्यजीव गलियारों, प्रादेशिक वनों, बफर क्षेत्रों तथा मिश्रित उपयोग वाले परिदृश्यों का संरक्षण कर बाघों के सुरक्षित प्राकृतिक प्रसार तथा आनुवंशिक विविधता को बनाए रखा जाएगा।
- वैज्ञानिक आधार पर पुनर्स्थापन: बाघों का स्थानांतरण केवल आवास की उपयुक्तता, शिकार घनत्व, संरक्षण व्यवस्थाओं तथा स्थानीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कठोर वैज्ञानिक मूल्यांकन के बाद ही किया जाएगा।
प्राथमिकता आधारित बाघ अभयारण्यों की पहचान हेतु रूपरेखा
- वैज्ञानिक मूल्यांकन: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने एक वैज्ञानिक रूपरेखा विकसित की है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक बाघ अभयारण्य का मूल्यांकन आवास की गुणवत्ता, शिकार की उपलब्धता तथा बाघों की उपस्थिति के आधार पर किया जाता है।
- साक्ष्य-आधारित संरक्षण: हस्तक्षेपों की अनुशंसा करने से पूर्व यह रूपरेखा वन विखंडन, कम संपर्क, मानवीय दबाव तथा आवास क्षरण जैसी पारिस्थितिकी बाधाओं का भी मूल्यांकन करती है।
- परिदृश्य-स्तरीय योजना: संरक्षण योजना को केवल एकल बाघ अभयारण्य तक सीमित न रखकर संपूर्ण वन परिदृश्य तक विस्तारित किया गया है, जिससे पारिस्थितिकी निकटता तथा प्राकृतिक प्रसार को बढ़ावा मिल सके।
परिदृश्य के मध्य निर्बाध आवागमन का महत्त्व
- बाघों के प्राकृतिक प्रसार को सुगम बनाना: परस्पर संबंधित वन अत्यधिक घनत्व वाले बाघ अभयारण्यों से युवा बाघों को स्वाभाविक रूप से उपयुक्त आवासों तक पहुँचने में सहायता करते हैं।
- आनुवंशिक विविधता बनाए रखना: विभिन्न बाघ आबादियों के मध्य निरंतर आवागमन आनुवंशिक पृथक्करण एवं अंतःप्रजनन को रोकता है तथा उनकी जीवित रहने की दीर्घकालीन क्षमता को सुदृढ़ करता है।
- स्थानीय विलुप्ति के जोखिम को कम करना: परस्पर जुड़े हुए वन परिदृश्य स्थानीय स्तर पर बाघों की संख्या घटने की स्थिति में उनके आवास को पुनः संभव बनाकर उनकी पारिस्थितिक स्थिरता बढ़ाते हैं।
- मानव–वन्यजीव संघर्ष को न्यूनतम करना: सुरक्षित वन्यजीव गलियारे बाघों की आवाजाही को गाँवों एवं कृषि क्षेत्रों से दूर रखते हैं, जिससे मानव–वन्यजीव संघर्ष तथा आकस्मिक मृत्यु की घटनाएँ कम होती हैं।
बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रमों से प्राप्त प्रमुख निष्कर्ष
- सरिस्का की सफलता: सरिस्का बाघ अभयारण्य (राजस्थान) स्थानीय स्तर पर बाघों के पूर्णतः विलुप्त हो जाने के बाद विश्व का पहला सफल वैज्ञानिक बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम बना।
- पन्ना बाघ अभयारण्य की पुनर्बहाली: पन्ना बाघ अभयारण्य (मध्य प्रदेश) में सफल बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम ने सिद्ध किया कि वैज्ञानिक रूप से नियोजित स्थानांतरण के माध्यम से स्थायी बाघ आबादी पुनः स्थापित की जा सकती है।
- सतकोसिया बाघ अभयारण्य से प्राप्त अनुभव: सतकोसिया बाघ अभयारण्य (ओडिशा) में बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम को स्थानीय समुदाय के विरोध, पशुधन के शिकार तथा सामाजिक तैयारी के अभाव के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इससे संरक्षण में स्थानीय समुदाय की भागीदारी के महत्त्व का पता चलता है।
- मुकुंदरा हिल्स की चुनौतियाँ: मुकुंदरा हिल्स बाघ अभयारण्य (राजस्थान) में सीमित प्रजनन सफलता यह दर्शाती है कि पुनर्स्थापन के बाद दीर्घकालिक आवास प्रबंधन तथा निरंतर निगरानी अत्यंत आवश्यक है।
- अंतिम विकल्प के रूप में पुनर्स्थापन: सरकार ने स्पष्ट किया है कि बाघों का स्थानांतरण तभी किया जाना चाहिए, जब उपयुक्त आवास, पर्याप्त शिकार आधार, प्रभावी संरक्षण व्यवस्था तथा स्थानीय समुदाय की स्वीकृति सुनिश्चित हो जाए।
आगे की राह
- आवास की गुणवत्ता में सुधार: आवास सुधार, घासभूमि प्रबंधन, जल उपलब्धता में वृद्धि तथा आक्रामक प्रजातियों के नियंत्रण के माध्यम से पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- शिकार आधार को सुदृढ़ करना: वैज्ञानिक आवास प्रबंधन तथा अवैध शिकार की रोकथाम के माध्यम से शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।
- वन्यजीव गलियारों को सुदृढ़ बनाना: बाघ अभयारण्यों को जोड़ने वाले पारिस्थितिकी गलियारों का संरक्षण एवं पुनर्स्थापन किया जाना चाहिए, ताकि प्राकृतिक प्रसार तथा आनुवंशिक आदान-प्रदान सुनिश्चित हो सके।
- सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना: स्थानीय समुदायों को आजीविका सहायता, मानव–वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण, पारितंत्र विकास कार्यक्रमों तथा लाभ-साझेदारी तंत्र के माध्यम से संरक्षण का सक्रिय भागीदार बनाया जाना चाहिए।
- वैज्ञानिक आधार पर पुनर्स्थापन अपनाना: बाघों का स्थानांतरण केवल व्यापक पारिस्थितिकी, सामाजिक एवं प्रबंधन संबंधी मूल्यांकन के बाद ही किया जाना चाहिए।
- निगरानी को सुदृढ़ करना: कैमरा ट्रैप, रेडियो टेलीमेट्री, आनुवंशिक निगरानी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित वन्यजीव निगरानी प्रणालियों के उपयोग का विस्तार कर अनुकूली संरक्षण प्रबंधन को मजबूत बनाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत में बाघ संरक्षण के अगले चरण का लक्ष्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन की पुनर्स्थापना, परिदृश्य संपर्कता को सुदृढ़ करना, आवास की गुणवत्ता में सुधार तथा समुदाय-समर्थित संरक्षण सुनिश्चित करना होना चाहिए। वैज्ञानिक एवं परिदृश्य-आधारित संरक्षण दृष्टिकोण ही राष्ट्रीय पशु तथा उससे जुड़े पारितंत्रों के दीर्घकालिक संरक्षण की आधारशिला सिद्ध होगा।