संदर्भ
समुद्र के बढ़ते स्तर और वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण राज्यत्व (Statehood), संप्रभुता (Sovereignty) और मानवाधिकारों की पारंपरिक परिभाषाएँ चुनौती के सामने हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचों को अद्यतन करने की तत्काल आवश्यकता है।
प्राकृतिक संसाधनों पर स्थायी संप्रभुता (Permanent Sovereignty over Natural Resources – PSNR)
- परिभाषा और उत्पत्ति: वर्ष 1962 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाई गई PSNR की अवधारणा के अनुसार किसी राष्ट्र को अपनी भूमि के ऊपर और नीचे मौजूद संसाधनों (जैसे कोयला, तेल और गैस) पर पूर्ण अधिकार होता है।
- यह विशेष रूप से उपनिवेशवाद से मुक्त हुए विकासशील देशों के लिए आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने में महत्वपूर्ण था।
- जलवायु लक्ष्यों से टकराव: विशेषज्ञ कोयला, तेल और गैस के निष्कर्षण को सीमित करके वैश्विक तापमान को 1.5°C तक सीमित करने के लिए एक जीवाश्म ईंधन गैर-प्रसार संधि का प्रस्ताव देते हैं।
- विकासशील देशों पर प्रभाव: भारत और कई अफ्रीकी देश तर्क देते हैं कि विकसित देशों ने दो शताब्दियों से अधिक समय तक जीवाश्म ईंधन का उपयोग करके समृद्धि हासिल की। अब यदि विकासशील देशों को इनका उपयोग सीमित करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उनके विकास और गरीबी उन्मूलन के प्रयासों को बाधित कर सकता है।
- प्रस्तावित समाधान: विकासशील देश अपनी प्राकृतिक संसाधनों पर स्थायी संप्रभुता (PSNR) को तभी सीमित करने पर विचार कर सकते हैं जब विकसित राष्ट्र मुख्य दायित्वों को पूरा करें, अर्थात पर्याप्त जलवायु वित्त प्रदान करें और हरित प्रौद्योगिकियों का नि:शुल्क या सुलभ हस्तांतरण सुनिश्चित करें।
राज्यत्व का संकट और 1933 का मोंटेवीडियो (Montevideo) अभिसमय
- राज्यत्व के मानदंड: वर्ष 1933 के मोंटेवीडियो अभिसमय के अनुसार, एक राज्य के लिए चार तत्व आवश्यक होते हैं:
- निश्चित क्षेत्र (Fixed Territory)
- स्थायी जनसंख्या (Permanent Population)
- सरकार (Government)
- अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थापित करने की क्षमता (Capacity for International Relations)
- अस्तित्व का खतरा: मालदीव और तुवालु जैसे द्वीपीय देश समुद्र स्तर बढ़ने के कारण डूबने के खतरे का सामना कर रहे हैं। यदि उनका निश्चित क्षेत्र समाप्त हो जाता है, तो कानूनी रूप से उनका राज्य का दर्जा समाप्त हो सकता है।
- अस्तित्व से जुड़े कानूनी दृष्टिकोण
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- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने एक सलाहकारी राय में कहा है कि एक बार राज्य स्थापित हो जाने के बाद, किसी एक तत्व (जैसे क्षेत्र) के खोने से उसका राज्यत्व स्वतः समाप्त नहीं होता।
- विशेषज्ञ जेम्स क्रॉफर्ड के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कानून क्षेत्र की न्यूनतम सीमा तय नहीं करता, इसलिए यदि भूमि का केवल छोटा सा हिस्सा भी जल के ऊपर बचा रहे तो राज्य का अस्तित्व तकनीकी रूप से जारी रह सकता है।
समुद्री कानून और आर्थिक क्षेत्र का सिकुड़ना
- EEZ संबंधी समस्या: वर्त्तमान समुद्री कानून के अनुसार किसी देश का विशेष आर्थिक क्षेत्र ( EEZ) उसके तट से 200 समुद्री मील तक विस्तृत होता है।
- संसाधनों की हानि: जब समुद्र स्तर बढ़ता है और तटरेखा पीछे हटती है, तो 200 मील की सीमा की शुरुआती रेखा भी पीछे चली जाती है।
- इससे द्वीपीय राष्ट्र विशाल समुद्री क्षेत्रों और उनमें स्थित संसाधनों, जैसे मछलियों, तक अपनी पहुँच खो देते हैं।
जलवायु शरणार्थियों की स्थिति
- कानूनी अभाव: वर्ष 1951 का शरणार्थी सम्मेलन वर्त्तमान में जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित लोगों को शरणार्थी के रूप में मान्यता नहीं देता।
- सुरक्षा की आवश्यकता: औपचारिक कानूनी दर्जा न होने के कारण, जो लोग अस्थायी रूप से अवास योग्य न रहने वाले क्षेत्रों को छोड़ने के लिए मजबूर हैं, उन्हें अन्य प्रकार के शरणार्थियों को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और राहत उपलब्ध नहीं होती।
आगे की राह
- राज्यत्व की पुनर्परिभाषा: अंतरराष्ट्रीय कानून को यह स्वीकार करना चाहिए कि समुद्र स्तर बढ़ने के कारण भौतिक क्षेत्र खोने के बावजूद राष्ट्रों की कानूनी पहचान बनी रह सकती है।
- समुद्री कानून का आधुनिकीकरण: संयुक्त राष्ट्र समुद्र कानून सम्मेलन (UNCLOS) को उन राष्ट्रों के समुद्री अधिकारों और सीमाओं की सुरक्षा के लिए अद्यतन करने की आवश्यकता है जो तटीय जलमग्न का सामना कर रहे हैं।
- शरणार्थी कानूनों में सुधार: वैश्विक कानूनी ढाँचों को सुरक्षा तंत्रों का विस्तार करना चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित लोगों को मान्यता दी जा सके और उनका समर्थन किया जा सके।
निष्कर्ष
जलवायु संकट अंतरराष्ट्रीय कानून में बदलाव की मांग करता है ताकि राज्य की संप्रभुता और वैश्विक पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
- कानूनी ढाँचों को मजबूत करना कमजोर राष्ट्रों की सुरक्षा के लिए और न्यायसंगत जलवायु शासन सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय चुनौती ही नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए कानूनी और शासन संबंधी चुनौती भी है। जीवाश्म ईंधन अधिकार, जलवायु प्रवासन और समुद्री सीमाओं के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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