संदर्भ:
हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.) ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में कथित रूप से बाध्यकारी श्रम से जुड़ी वस्तुओं को लेकर चिंता जताते हुए, धारा 301 के तहत भारत तथा कई अन्य देशों से होने वाले आयात पर अतिरिक्त 10% टैरिफ लगाने की बात स्वीकार की है।
नए अमेरिकी टैरिफ के बारे में:
- धारा 301 टैरिफ: अमेरिका ने कई देशों से होने वाले आयात पर अतिरिक्त 10% टैरिफ आरोपित किया है, अतिरिक्त टैरिफ लगाने के संदर्भ में अमेरिका ने यह पक्ष रखा है कि कुछ वस्तुएँ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाध्यकारी श्रम से जुड़ी हो सकती हैं।
- व्यापार समझौते का लाभ: अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTAs) रखने वाले या उन्नत व्यापार वार्ता में शामिल देशों — जिनमें यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और स्विट्ज़रलैंड शामिल हैं — को अपेक्षाकृत अनुकूल टैरिफ व्यवहार प्राप्त हुआ है।
- स्थायी व्यापार साधन: पूर्ववर्ती अस्थायी पारस्परिक टैरिफ (Reciprocal Tariffs) के विपरीत, ये उपाय एक दीर्घकालिक व्यापार नीति साधन के रूप में कार्य करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं।
टैरिफ से उत्पन्न मुद्दे:
- संदिग्ध उद्देश्य: टैरिफ के चयनात्मक प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि यह उपाय बाध्यकारी श्रम को समाप्त करने के बजाय व्यापार समझौतों को प्रोत्साहित करने पर अधिक केंद्रित है।
- तृतीय-देशों का दायित्व: भारत पर बाध्यकारी श्रम के उपयोग का आरोप नहीं लगाया गया है, फिर भी तृतीय देशों से उत्पन्न आयात से जुड़ी चिंताओं के कारण उसे टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है, जिससे निष्पक्षता को लेकर प्रश्न उठते हैं।
- गैर-भेदभाव वाले सिद्धांत से विचलन: व्यापार समझौतों के आधार पर विभेदकारी टैरिफ व्यवहार, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के ढाँचे के अंतर्गत सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (MFN) सिद्धांत को कमजोर कर सकता है।
- नीतिगत अनिश्चितता: अमेरिकी टैरिफ नीति में बार-बार होने वाले परिवर्तन निर्यातकों, निवेशकों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न करते हैं।
- प्रवर्तन संबंधी चुनौतियाँ: तृतीय देशों में श्रम स्थितियों का सत्यापन व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की माँग करता है और इसे प्रभावी ढंग से लागू करना कठिन रहता है।
भारत के लिए इसके निहितार्थ:
- निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता: अतिरिक्त टैरिफ से, विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों, अमेरिकी बाजारों में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।
- आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण: भारतीय उद्योगों को बाध्यकारी श्रम से जुड़े व्यापार प्रतिबंधों के जोखिम को कम करने के लिए पूरी आपूर्ति शृंखला का बेहतर जाँच-पड़ताल करना (Due Diligence) , आपूर्ति श्रृंखला का रिकार्ड रखने में सुधार तथा स्रोतों का विविधीकरण करने की आवश्यकता हो सकती है।
- व्यापार संबंधी मोल-भाव: भविष्य के व्यापार उपायों को लेकर निरंतर अनिश्चितता के बावजूद, इस टैरिफ से भारत पर अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता संपन्न करने का दबाव बढ़ जाता है।
- नियामक अनुपालन: बाध्यकारी श्रम से उत्पादित आयात पर भारत का प्रतिबंध, उत्तरदायी व्यापार व्यवहार और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
आगे की राह:
- रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करना: भारत को अस्थायी टैरिफ दबावों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के आधार पर व्यापार वार्ता को आगे बढ़ाने पर जोर देना चाहिए।
- आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता को सुदृढ़ करना: अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करने हेतु सुदृढ़ आपूर्ति शृंखला संबंधी जाँच प्रणालियाँ, आपूर्ति शृंखला की जाँच-पड़ताल तंत्र और आपूर्ति श्रृंखला लेखा-परीक्षा (Audits) विकसित करने की आवश्यकता है ।
- निर्यात बाज़ारों का विविधीकरण करना: मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के माध्यम से व्यापार साझेदारियों का विस्तार करना और उभरते तथा विकसित दोनों बाज़ारों के साथ जुड़ाव को मज़बूत करना।
- नियम-आधारित व्यापार को बढ़ावा देना: एक पारदर्शी, पूर्वानुमेय तथा WTO-अनुरूप बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का समर्थन करना ।
- घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देना : बेहतर बुनियादी ढाँचे, लॉजिस्टिक्स सुधारों, प्रौद्योगिकी स्वीकारोक्ति तथा व्यापार करने में सुगमता के माध्यम से विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करना चाहिए ।
निष्कर्ष:
भारत की व्यापार नीति को रणनीतिक स्वायत्तता, नियम-आधारित बहुपक्षवाद और दीर्घकालिक आर्थिक हितों पर आधारित रहना चाहिए। बाध्यकारी श्रम से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना आवश्यक है, परंतु व्यापार उपायों को निष्पक्ष, गैर-भेदभावपूर्ण और WTO के अनुरूप नियमों से लागू किया जाना चाहिए, और इसे बिना भारत की वार्ता स्थिति या निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को कमज़ोर किए ही लागू किया जाना चाहिए ।
UPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न : विश्व व्यापार संगठन (WTO) के उद्देश्यों को प्राप्त करने में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? (250 शब्द)
UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: विश्व व्यापार संगठन (WTO) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- WTO के सदस्य देशों द्वारा दी जाने वाली सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (Most Favoured Nation-MFN) की सुविधा सामान्यतः सभी सदस्य देशों पर समान रूप से लागू होती है।
- मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreements-FTAs) WTO के नियमों के अंतर्गत कुछ शर्तों के अधीन MFN सिद्धांत से अपवाद (Exception) हो सकते हैं।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c) |