संदर्भ:
हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.) और सऊदी अरब ने एक असैन्य परमाणु सहयोग समझौते की घोषणा की है, परंतु बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा लगाई गई शर्तों ने इसके क्रियान्वयन को लेकर अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न कर दी है, जिसका क्षेत्रीय सुरक्षा तथा परमाणु अप्रसार पर प्रभाव पड़ता है।
परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के बारे में:
- परिचय: परमाणु अप्रसार संधि (NPT) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना, परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना और परमाणु निरस्त्रीकरण को आगे बढ़ाना है।
- प्रवर्तन में आना: यह 1970 में प्रवर्तन में आई।
- तीन स्तंभ: यह संधि अप्रसार, परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग और परमाणु निरस्त्रीकरण पर आधारित है।
- सऊदी अरब की स्थिति: सऊदी अरब NPT के अंतर्गत एक गैर-परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र (NNWS) है और यह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की सुरक्षा व्यवस्थाओं के तहत शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा विकसित करने का अधिकार रखता है।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बारे में:
- परिचय: अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) संयुक्त राष्ट्र की एक परमाणु निगरानी संस्था है, जो परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ इसके सैन्य उद्देश्यों हेतु दुरुपयोग को रोकने के लिए ज़िम्मेवार है।
- स्थापना: इसकी स्थापना वर्ष 1957 में की गई थी ।
- मुख्यालय: वियना, ऑस्ट्रिया।
- IAEA अतिरिक्त प्रोटोकॉल : यह प्रोटोकॉल निरीक्षकों को अल्प-सूचना निरीक्षण, प्रबलित निगरानी तथा अधिक पारदर्शिता के लिए विस्तृत अधिकार प्रदान करता है। विविध रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित समझौता सऊदी अरब के लिए अतिरिक्त प्रोटोकॉल को अपनाना अनिवार्य नहीं बनाता।
अब्राहम समझौतों के बारे में:
- पृष्ठभूमि: अब्राहम समझौता अमेरिका द्वारा मध्यस्थता किए गए समझौते से हैं, जिसकी शुरुआत वर्ष 2020 में इज़राइल और कई अरब देशों के मध्य राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाने के लिए की गई थी।
- उद्देश्य: इनका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय शांति, आर्थिक सहयोग, व्यापार, निवेश और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देना है।
- हस्ताक्षरकर्ता: संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और सूडान आदि ।
- सऊदी अरब की स्थिति: सऊदी अरब औपचारिक रूप से इन समझौतों में शामिल नहीं हुआ है और वह इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष के द्वि-राष्ट्र समाधान की दिशा में प्रगति के साथ सामान्यीकरण को जोड़ना जारी रखता है।
सऊदी अरब असैन्य परमाणु कार्यक्रम क्यों चाहता है?
- आर्थिक विविधीकरण: विज़न 2030 (Vision 2030) के तहत, सऊदी अरब विनिर्माण, पर्यटन, वित्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों का विस्तार कर तेल पर निर्भरता को कम करना चाहता है।
- बढ़ती ऊर्जा माँग को पूरा करना: परमाणु ऊर्जा उद्योगों, AI डेटा केंद्रों और बढ़ती घरेलू ऊर्जा खपत के लिए स्थिर बिजली उपलब्ध करा सकती है।
- तेल निर्यात को अधिकतम करना: तेल-आधारित विद्युत उत्पादन को परमाणु ऊर्जा से प्रतिस्थापित करने से निर्यात हेतु अधिक मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस मुक्त हो जाएगी।
- दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा: परमाणु ऊर्जा ऊर्जा विविधीकरण का समर्थन करती है, ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाती है और जीवाश्म ईंधन पर अधिक निर्भरता को कम करती है।
समझौते से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ:
- यूरेनियम संवर्धन की संभावना: विविध रिपोर्टों के अनुसार यह समझौता सऊदी अरब के भीतर यूरेनियम संवर्धन की संभावना को निर्मुक्त छोड़ता है, जिससे संभावित परमाणु हथियार क्षमता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- अप्रसार में दोहरे मापदंड: अमेरिका ईरान द्वारा यूरेनियम संवर्धन का विरोध जारी रखते हुए सऊदी अरब के प्रति अधिक लचीला दिखाई देता है, जिससे असंगत अप्रसार नीति के आरोप लगते हैं।
- कमज़ोर सत्यापन तंत्र: अनिवार्य IAEA अतिरिक्त प्रोटोकॉल के अभाव से पारदर्शिता में कमी, अंतरराष्ट्रीय सत्यापन का कमज़ोर होना और वैश्विक विश्वास में गिरावट आ सकती है।
- क्षेत्रीय परमाणु हथियार में होड़: विस्तारित परमाणु क्षमताएँ अन्य पश्चिम एशियाई देशों को भी इसी प्रकार के कार्यक्रम अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं, जिससे क्षेत्रीय प्रसार का जोखिम बढ़ जाता है।
- ईरान पर प्रभाव: ईरान आगामी परमाणु वार्ताओं में अपना रुख कठोर कर सकता है, यह तर्क देते हुए कि समान परमाणु अधिकार सभी पर एकसमान रूप से लागू होने चाहिए।
- नीतिगत अनिश्चितता: घोषणा के बाद इस समझौते को अब्राहम समझौतों से जोड़ने से अमेरिकी विदेश नीति की विश्वसनीयता और पूर्वानुमेयता को लेकर अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हुई है।
भारत के लिए निहितार्थ:
- ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिम एशिया में स्थिरता भारत के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनी हुई है, क्योंकि भारत अपने कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) संबंधी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है।
- भारतीय प्रवासी: क्षेत्रीय अस्थिरता खाड़ी देशों में रहने और काम करने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है।
- रणनीतिक संतुलन: भारत सऊदी अरब, ईरान, इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ घनिष्ठ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखता है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता उसकी विदेश नीति के केंद्र में रहती है।
- समुद्री सुरक्षा: तनाव बढ़ने से होरमुज़ जलडमरूमध्य से होकर होने वाली नौवहन गतिविधि को खतरा हो सकता है, जिससे भारत की ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और माल भाड़ा लागत प्रभावित होगी।
चुनौतियाँ:
- शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा और अप्रसार क्षेत्र में संतुलन: असैन्य परमाणु सहयोग से परमाणु हथियार क्षमता के विकास को सुगम नहीं बनाना चाहिए।
- क्षेत्रीय रणनीतिक स्थिरता को बनाए रखना: पश्चिम एशिया में प्रतिस्पर्धी परमाणु कार्यक्रमों को रोकना क्षेत्रीय शांति के लिए आवश्यक बना रहता है।
- अंतरराष्ट्रीय सत्यापन को सुदृढ़ करना: शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रमों में विश्वास बनाए रखने के लिए प्रभावी IAEA सुरक्षा उपाय, प्रबलित निरीक्षण और अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता है।
- नीतिगत निरंतरता सुनिश्चित करना: वैश्विक परमाणु व्यवस्था की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय अप्रसार मानदंडों का एकसमान अनुप्रयोग आवश्यक है।
आगे की राह:
- IAEA निगरानी को सुदृढ़ करना: असैन्य परमाणु सहयोग के साथ व्यापक IAEA सुरक्षा उपाय, अतिरिक्त प्रोटोकॉल को अपनाना तथा एक सुदृढ़ सत्यापन तंत्र होने चाहिए।
- राजनयिक जुड़ाव को बढ़ावा देना: क्षेत्रीय विवादों का समाधान दबावकारी शर्तों से हटकर संवाद, विश्वास-निर्माण उपायों और बहुपक्षीय कूटनीति के माध्यम से किया जाना चाहिए।
- परमाणु अप्रसार का समर्थन करना: अंतरराष्ट्रीय अप्रसार मानदंडों का सुसंगत उपयोग वैश्विक विश्वसनीयता को मज़बूत करेगा और रणनीतिक अविश्वास को कमजोर करेगा।
- क्षेत्रीय विश्वास-निर्माण को आगे बढ़ाना: अधिक पारदर्शिता, सुरक्षा सहयोग और क्षेत्रीय संवाद परमाणु हथियार की होड़ के जोखिम को न्यूनतम कर सकते हैं।
- नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को सुदृढ़ करना: असैन्य परमाणु सहयोग को अंतरराष्ट्रीय कानून, IAEA सुरक्षा उपायों और NPT के उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए।
निष्कर्ष:
प्रस्तावित अमेरिका-सऊदी असैन्य परमाणु समझौता शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और अप्रसार के मध्य संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को उजागर करता है, जिसमें दीर्घकालिक स्थिरता के लिए विश्वसनीय सुरक्षा उपाय और सुसंगत अंतरराष्ट्रीय मानदंड आवश्यक बने रहते हैं।
UPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न : वैश्विक राजनीति में भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की अवधारणा का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। वर्तमान भू-राजनीतिक परिवर्तनों के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न : निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट (Specialized) एजेंसी है।
- IAEA का मुख्य कार्य परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना तथा यह सुनिश्चित करना है कि परमाणु सामग्री का उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए न हो।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (b) |