संदर्भ
एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि गाज़ा संघर्ष शुरू होने के बाद से भारत ने इज़राइल को 2,500 से अधिक सैन्य उपकरणों और उनके कल-पुर्ज़ों की खेप निर्यात की है। इसने रणनीतिक हितों, नैतिक उत्तरदायित्वों तथा कूटनीतिक प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाए रखने पर बहस को पुनः जीवित कर दिया है।
पृष्ठभूमि – भारत–इज़राइल रक्षा संबंध
- रणनीतिक साझेदारी: भारत ने 1992 में इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए। तब से रक्षा सहयोग दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है।
- कारगिल युद्ध (1999): कारगिल संघर्ष के दौरान इज़राइल ने गोला-बारूद, मानव रहित हवाई वाहन (UAVs) तथा सटीक-निर्देशित हथियार (Precision-Guided Weapons) सहित महत्त्वपूर्ण सैन्य आपूर्ति प्रदान की, जिससे दोनों देशों के मध्य आपसी विश्वास और अधिक सुदृढ़ हुआ है ।
- प्रमुख रक्षा सहयोग: इज़राइल ड्रोन, मिसाइल प्रणालियाँ, रडार, निगरानी उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियाँ तथा सटीक-निर्देशित आयुध की आपूर्ति करता है, जिससे वह भारत के प्रमुख रक्षा साझेदारों में से एक बन गया है।
- ‘मेक इन इंडिया’ के अंतर्गत सहयोग: भारत–इज़राइल रक्षा संबंध क्रेता–विक्रेता संबंध से आगे बढ़कर संयुक्त विनिर्माण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा सह-विकास तक विकसित हो चुके हैं, जो भारतीय और इज़राइली रक्षा कंपनियों के बीच साझेदारी के माध्यम से आगे बढ़ रहे हैं।
भारत–इज़राइल रक्षा संबंध क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
- रक्षा आधुनिकीकरण: इज़राइली प्रौद्योगिकियाँ सीमा निगरानी, वायु रक्षा, खुफिया क्षमता तथा सुनिश्चित युद्ध वाले क्षेत्रों में भारत की सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ता प्रदान करती हैं।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: इज़राइल अनेक देशों की तुलना में उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण तथा स्वदेशी विनिर्माण को समर्थन देने के प्रति अधिक तत्पर रहा है।
- रणनीतिक विविधीकरण: इज़राइल भारत को रक्षा आयात के स्रोतों में विविधता लाने तथा किसी एक आपूर्तिकर्ता पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में सहायता करता है।
- रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: संयुक्त उपक्रम (Joint Ventures) ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देते हैं, घरेलू विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ करते हैं तथा रक्षा निर्यात को प्रोत्साहित करते हैं।
निरंतर रक्षा सहयोग के क्षेत्र में मुख्य चुनौतियाँ
- नैतिकता संबंधी चिंताएँ: गाज़ा संघर्ष के दौरान निरंतर सैन्य सहयोग ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून तथा मानवाधिकारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर प्रश्न खड़े किए हैं।
- कूटनीतिक संतुलन: इज़राइल को रक्षा निर्यात, फ़िलिस्तीनी मुद्दे के प्रति भारत के दीर्घकालिक समर्थन तथा पश्चिम एशियाई देशों के साथ उसके संबंधों के मध्य संतुलन को भी जटिल बना सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय छवि: केवल रक्षा आयातक के बजाय रक्षा विनिर्माण साझेदार के रूप में उभरने के साथ भारत को वैश्विक स्तर पर अधिक गहन जाँच (Scrutiny) और उत्तरदायित्व का सामना करना पड़ सकता है।
- रणनीतिक जोखिम: संघर्ष से जुड़े रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में भारत को भूराजनीतिक अथवा प्रतिबंध (Sanctions) संबंधी जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती है।
निरंतर रक्षा सहयोग के पक्ष में तर्क
- राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि: रक्षा खरीद का मार्गदर्शन मुख्यतः भारत के रणनीतिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के आधार पर की जानी चाहिए।
- विश्वसनीय रक्षा साझेदार: इज़राइल ने उन परिस्थितियों में भी भारत को प्रमुख रक्षा उपकरणों की आपूर्ति की है, जब अन्य देशों ने प्रतिबंध लगाए या आपूर्ति सीमित कर दी थी।
- दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी: रक्षा सहयोग केवल हथियारों की खरीद तक ही सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार, अनुसंधान, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा संयुक्त उत्पादन जैसे क्षेत्रों तक यह विस्तृत है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत की विदेश नीति स्वतंत्र निर्णय-निर्माण के सिद्धांत पर आधारित है, जिससे वह किसी भी गुट के साथ औपचारिक रूप से जुड़े बिना अनेक देशों के साथ समानांतर सहयोग बनाए रख सकता है।
पश्चिम एशिया के प्रति भारत का संतुलित दृष्टिकोण
- द्वी-राष्ट्र समाधान का समर्थन: भारत, इज़राइल–फ़िलिस्तीन संघर्ष के समाधान के लिए वार्ता-आधारित द्वी-राष्ट्र समाधान का निरंतर समर्थन करता है।
- संतुलित कूटनीतिक दृष्टिकोण : भारत, इज़राइल के साथ अपने मजबूत कूटनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), क़तर तथा अन्य खाड़ी देशों के साथ भी अपनी साझेदारी को निरंतर सुदृढ़ कर रहा है।
- मानवीय सहायता: भारत ने समय-समय पर मानवीय राहत प्रयासों का समर्थन किया है तथा संवाद, युद्धविराम (Ceasefire) और नागरिकों की सुरक्षा का लगातार आह्वान किया है।
आगे की राह
- रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना: रक्षा सहयोग का मार्गदर्शन भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप होनी चाहिए, साथ ही स्वतंत्र विदेश नीति को भी बनाए रखा जाना चाहिए।
- रक्षा निर्यात की निगरानी सुदृढ़ करना: रक्षा निर्यात अंतरराष्ट्रीय कानून, निर्यात नियंत्रण तंत्र तथा अंतिम उपयोग (End-Use) निगरानी के अनुरूप सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- रक्षा साझेदारियों में विविधता : आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) में सुगमता बढ़ाने के लिए भारत को अनेक देशों के साथ रक्षा सहयोग का विस्तार जारी रखना चाहिए।
- स्वदेशी क्षमता को बढ़ावा देना: अनुसंधान, नवाचार तथा घरेलू रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में अधिक निवेश कर बाहरी निर्भरता को कम किया जाना चाहिए।
- संतुलित कूटनीति दृष्टिकोण को बनाए रखना: भारत को इज़राइल और फ़िलिस्तीन जैसे देशों के साथ रचनात्मक संवाद जारी रखते हुए शांति, मानवीय सहायता तथा क्षेत्रीय स्थिरता का निरंतर समर्थन करते रहना चाहिए।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः भारत–इज़राइल रक्षा साझेदारी भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र के आधुनिकीकरण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनी हुई है। इसके अलावा भारत को अपने रणनीतिक हितों, मानवीय चिंताओं तथा रणनीतिक स्वायत्तता के मध्य स्पष्ट संतुलन स्थापित करते हुए, एक उत्तरदायी वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को और अधिक सुदृढ़ बनाना चाहिए।