संदर्भ
- अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन कर उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख में विभाजित कर दिया गया।
- यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2023 में इस पुनर्गठन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह जम्मू-कश्मीर को यथाशीघ्र राज्य का दर्जा बहाल करे।
- केंद्र सरकार द्वारा बार-बार आश्वासन दिए जाने तथा निर्वाचित सरकार के गठन के बावजूद अब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया गया है।
संवैधानिक पृष्ठभूमि
जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन
- अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया।
- इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के माध्यम से तत्कालीन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर (विधानमंडल सहित) तथा लद्दाख (बिना विधानमंडल)—में विभाजित कर दिया गया।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (2023)
- सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
- साथ ही न्यायालय ने लोकतांत्रिक शासन के महत्त्व पर बल देते हुए केंद्र सरकार को उचित समय के भीतर जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्देश दिया।
राज्य का दर्जा बहाल करना क्यों आवश्यक ?
लोकतांत्रिक शासन को सुदृढ़ करना
- राज्य का दर्जा बहाल होने से निर्वाचित सरकार की शक्तियों में वृद्धि होगी, जिससे प्रतिनिधिक लोकतंत्र और सहकारी संघवाद को मजबूती मिलेगी।
- इससे शासन उन जनप्रतिनिधियों द्वारा संचालित होगा जो सीधे जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
राजनीतिक जवाबदेही को बढ़ावा
- निर्वाचित मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद तथा विधानमंडल अंततः जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
- अधिक राजनीतिक जवाबदेही से शासन में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ता है।
प्रशासनिक दक्षता में सुधार
- पूर्ण अधिकारों से युक्त राज्य सरकार; विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा स्थानीय प्रशासन से जुड़े विषयों पर शीघ्र निर्णय ले सकती है।
- स्थानीय नेतृत्व क्षेत्रीय आवश्यकताओं और समस्याओं को बेहतर ढंग से समझकर उनका समाधान कर सकता है।
जनविश्वास को सुदृढ़ करना
- राज्य का दर्जा बहाल होने से नागरिकों का संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास बढ़ेगा तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी आस्था मजबूत होगी।
- इससे राज्य का दर्जा बहाल करने संबंधी केंद्र सरकार के बार-बार दिए गए आश्वासनों की भी पूर्ति होगी।
वर्तमान व्यवस्था से जुड़ी चिंताएँ
निर्वाचित सरकार की सीमित शक्तियाँ
- यद्यपि जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार है, फिर भी लोक व्यवस्था, पुलिस तथा प्रशासनिक तंत्र जैसे प्रमुख विषय काफी हद तक उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में हैं।
- इससे निर्वाचित सरकार की दैनिक प्रशासनिक स्वायत्तता सीमित हो जाती है।
निर्वाचित प्रतिनिधियों पर नियुक्त प्राधिकारी का वर्चस्व
- उपराज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा केंद्र सरकार की सलाह पर की जाती है, जबकि मुख्यमंत्री जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से वैधता प्राप्त करते हैं।
- नियुक्त प्राधिकारी का निर्वाचित सरकार पर अधिक प्रभाव लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े प्रश्न उत्पन्न करता है।
समय-सीमा को लेकर अनिश्चितता
- केंद्र सरकार द्वारा राज्य का दर्जा बहाल करने के अनेक आश्वासन दिए गए हैं, किंतु इसके लिए कोई निश्चित समय-सीमा घोषित नहीं की गई है।
- यह निरंतर अनिश्चितता राजनीतिक तथा संवैधानिक चिंताओं को जन्म दे रही है।
राज्य का दर्जा बहाल करने के पक्ष में तर्क
स्थानीय नेतृत्व स्थानीय चुनौतियों को बेहतर समझता है
- निर्वाचित जनप्रतिनिधि क्षेत्रीय आकांक्षाओं, रोजगार संबंधी समस्याओं तथा जमीनी स्तर की प्रशासनिक चुनौतियों को अधिक अच्छी तरह समझते हैं।
- स्थानीय संस्थाओं को सशक्त बनाने से नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
राजनीतिक भागीदारी अलगाव की भावना को कम करती है
- व्यापक राजनीतिक भागीदारी लोकतांत्रिक वैधता को मजबूत करती है तथा शिकायतों के शांतिपूर्ण समाधान का अवसर प्रदान करती है।
- समावेशी शासन व्यवस्था अलगाव की भावना को कम कर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ कर सकती है।
सुरक्षा और राज्य का दर्जा अलग-अलग विषय हैं
- सीमा पार आतंकवाद जैसी चुनौतियाँ मुख्यतः राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हैं और इनके आधार पर लोकतांत्रिक शासन को अनिश्चितकाल तक स्थगित नहीं किया जाना चाहिए।
- अन्य सीमावर्ती राज्यों में भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के बावजूद पूर्ण राज्य व्यवस्था प्रभावी रूप से संचालित हो रही है।
भारत की सुरक्षा क्षमता मजबूत हुई है
- बाह्य खतरों से निपटने के लिए भारत के पास सुदृढ़ सैन्य एवं सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध है।
- इसलिए राज्य का दर्जा बहाल करने से राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता आवश्यक नहीं है।
तत्काल राज्य का दर्जा बहाल करने में चुनौतियाँ
सुरक्षा संबंधी चिंताएँ
- केंद्र सरकार का मत है कि जम्मू-कश्मीर की वर्तमान सुरक्षा परिस्थितियों में प्रशासन पर निकट निगरानी बनाए रखना आवश्यक है।
- आतंकवाद और सीमा पार घुसपैठ संबंधी चुनौतियाँ सरकार की प्रमुख चिंताओं में शामिल हैं।
स्थिर शासन की आवश्यकता
- केंद्र सरकार का तर्क है कि राज्य का दर्जा तभी बहाल किया जाना चाहिए जब दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता तथा प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित हो जाए।
- शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए चरणबद्ध दृष्टिकोण आवश्यक माना जाता है।
आगे की राह
- यथाशीघ्र राज्य का दर्जा बहाल किया जाए: केंद्र सरकार को संवैधानिक मूल्यों तथा सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों के अनुरूप जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने हेतु स्पष्ट एवं समयबद्ध कार्ययोजना घोषित करनी चाहिए।
- सहकारी संघवाद को मजबूत बनाया जाए: केंद्र सरकार और निर्वाचित राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक जवाबदेही दोनों को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाया जाए: निर्वाचित सरकार को उसके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से संबंधित विषयों पर पर्याप्त प्रशासनिक अधिकार प्रदान किए जाएँ, जबकि आवश्यक सुरक्षा व्यवस्थाएँ भी बनी रहें।
- समावेशी विकास को बढ़ावा दिया जाए: रोजगार सृजन, आधारभूत संरचना, शिक्षा, पर्यटन और निवेश को प्राथमिकता देकर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का समाधान किया जाए तथा जनता का विश्वास मजबूत किया जाए।
- स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ किया जाए: पंचायती राज संस्थाओं, शहरी स्थानीय निकायों तथा सहभागी शासन व्यवस्था को मजबूत बनाकर लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक गहरा किया जाए और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार किया जाए।
निष्कर्ष
अर्थात जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संघवाद और संवैधानिक शासन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। यद्यपि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है, फिर भी दीर्घकालिक शांति और स्थिरता सशक्त लोकतांत्रिक संस्थाओं, समावेशी विकास तथा व्यापक राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से ही सुनिश्चित की जा सकती है।