संदर्भ:
हाल ही में नीति आयोग की एक रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की है कि पिछले एक दशक में तकरीबन 94,000 सरकारी विद्यालय बंद हो चुके हैं (औसतन प्रतिदिन लगभग 25 विद्यालय)। इसके परिणामस्वरूप सरकारी विद्यालयों में नामांकन (Enrolment) दर में 2.26 करोड़ विद्यार्थियों की कमी दर्ज की गई है। इस स्थिति ने शिक्षा तक समान एवं न्यायसंगत पहुँच, शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के प्रभावी क्रियान्वयन तथा शैक्षिक समावेशन को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न कर दी हैं।
मुख्य बिंदु
- विद्यालयों के बंद होने की सीमा : सरकारी विद्यालयों की संख्या वर्ष 2014–15 के दौरान 11.07 लाख से घटकर 2023–24 में 10.17 लाख रह गई। वहीं, सरकारी विद्यालयों में नामांकन की हिस्सेदारी 2005 में 71% से घटकर 2024–25 में 49.24% रह गई।
- विद्यालय युक्तिकरण : राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 की परिकल्पना के अनुरूप संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से अनेक राज्यों ने विद्यालय युक्तिकरण की नीति के तहत विद्यालयों का विलय (Merger) या बंद किया है, जबकि पड़ोस के विद्यालय (Neighbourhood Schools) की अवधारणा को बनाए रखा गया है।
- सबसे अधिक प्रभावित राज्य: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर में सरकारी विद्यालयों के बंद होने की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई है।
- निजी क्षेत्र की बढ़ती उपस्थिति: इसी अवधि में निजी विद्यालयों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था से निजी शिक्षा की ओर बढ़ते रुझान को दर्शाती है।
सरकारी विद्यालयों के बंद होने के मुख्य कारण
- विद्यालय युक्तिकरण नीति: राज्यों ने बुनियादी ढाँचे, शिक्षकों और वित्तीय संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए कम नामांकन वाले विद्यालयों का विलय या उन्हें बंद किया है।
- घटता नामांकन: प्रवास, जनसांख्यिकीय परिवर्तन तथा निजी विद्यालयों के प्रति बढ़ती प्राथमिकता के कारण कई सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या में कमी आई है।
- प्रशासनिक निर्णय: बड़े पैमाने पर विद्यालयों के बंद होने का प्रमुख कारण केवल जनसांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि मुख्य रूप से नीतिगत एवं प्रशासनिक निर्णय रहे हैं।
सरकारी विद्यालयों के बंद होने के प्रभाव
- शिक्षा तक पहुँच में कमी: पड़ोस के विद्यालयों के बंद होने से विशेषकर ग्रामीण एवं दूरदराज़ के क्षेत्र के बच्चों को अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनकी नियमित उपस्थिति प्रभावित होती है।
- स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) दर में वृद्धि : अधिक दूरी तय करने की आवश्यकता, प्रवास तथा कमजोर पहुँच व्यवस्था के कारण, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों में विद्यालय छोड़ने का जोखिम बढ़ गया है।
- कमज़ोर एवं वंचित वर्गों पर असमान प्रभाव: अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अल्पसंख्यक तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे मुख्यतः सरकारी विद्यालयों पर निर्भर रहते हैं।
- बालिका शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव: विद्यालय दूर होने पर सुरक्षा तथा सामाजिक कारणों की वजह से लड़कियों को अपनी शिक्षा बीच में छोड़ने की संभावना अधिक बढ़ जाती है।
- शिक्षकों की कमी एवं बहु-स्तरीय शिक्षण: विलय किए गए विद्यालयों में अक्सर शिक्षकों की कमी होती है, जिसके कारण एक ही शिक्षक को एक साथ अनेक कक्षाओं को पढ़ाना पड़ता है। इससे शिक्षण की गुणवत्ता एवं अधिगम परिणाम (Learning Outcomes) प्रभावित होते हैं।
मुख्य चुनौतियाँ
- पड़ोस के विद्यालय का सिद्धांत : बड़े पैमाने पर विद्यालयों का बंद होना शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 की उस अवधारणा को कमजोर कर सकता है, जिसके तहत प्रत्येक बच्चे के लिए सुलभ पड़ोस के विद्यालय उपलब्ध कराने की परिकल्पना की गई है।
- शैक्षिक समानता : सरकारी विद्यालयों के बंद होने से शैक्षिक असमानता बढ़ती है, क्योंकि इसका सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव वंचित एवं कमजोर समुदायों पर पड़ता है।
- सामुदायिक भागीदारी की कमजोरी: विद्यालय प्रबंधन समितियाँ (School Management Committees–SMCs), जिन्हें RTE अधिनियम के तहत सामुदायिक निगरानी को सुदृढ़ करने के लिए बनाया गया था, अनेक क्षेत्रों में प्रभावी रूप से कार्य नहीं कर पा रही हैं।
- क्रियान्वयन में कमी : नामांकन एवं विद्यालय में बनाए रखने (Retention) से संबंधित अनेक कार्यक्रम विद्यालय से बाहर बच्चों (Out-of-School Children) की प्रभावी पहचान और उन्हें पुनः शिक्षा प्रणाली से जोड़ने में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सके हैं।
संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान
- अनुच्छेद 21A: 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- अनुच्छेद 45: राज्य को 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद 46: राज्य को अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) तथा समाज के कमजोर वर्गों के शैक्षिक हितों को बढ़ावा देने का दायित्व सौंपता है।
- बच्चों का निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009: यह अधिनियम निःशुल्क एवं अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा, पड़ोस के विद्यालय, निर्धारित छात्र–शिक्षक अनुपात तथा विद्यालय प्रबंधन समितियों (School Management Committees–SMCs) की व्यवस्था प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020: यह विद्यालय युक्तिकरण का समर्थन करती है, साथ ही समान एवं न्यायसंगत शिक्षा तक पहुँच तथा पड़ोस के विद्यालयों की अवधारणा पर भी विशेष बल देती है।
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आगे की राह
- पड़ोस के विद्यालयों का संरक्षण: विद्यालय युक्तिकरण के कारण भौतिक पहुँच प्रभावित नहीं होनी चाहिए, विशेषकर ग्रामीण, जनजातीय एवं भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम क्षेत्रों में।
- सरकारी विद्यालयों को सुदृढ़ बनाना: शिक्षकों की उपलब्धता, आधारभूत संरचना, डिजिटल सुविधाओं तथा अधिगम परिणामों में सुधार कर सरकारी विद्यालयों के प्रति जनविश्वास को पुनर्स्थापित किया जाए।
- ड्रॉपआउट दर में कमी लाना: नामांकन अभियान को मजबूत किया जाए, विद्यालय से बाहर बच्चों की नियमित पहचान एवं निगरानी की जाए तथा कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों के लिए परिवहन, छात्रावास और छात्रवृत्ति जैसी सहायता उपलब्ध कराई जाए।
- विद्यालय प्रबंधन समितियों (SMCs) को सशक्त बनाना: विद्यालय प्रशासन में सामुदायिक भागीदारी तथा स्थानीय स्तर पर जवाबदेही को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
- केंद्र–राज्य समन्वय: केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर यह सुनिश्चित करें कि विद्यालय युक्तिकरण की प्रक्रिया शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के उद्देश्यों तथा शैक्षिक समानता के अनुरूप ही लागू हो।
निष्कर्ष
सरकारी विद्यालयों का युक्तिकरण शैक्षिक दक्षता में सुधार लाने का माध्यम होना चाहिए, न कि समान एवं सुलभ शिक्षा के संवैधानिक वादे को कमजोर करने का। पड़ोस के विद्यालयों को सुदृढ़ बनाना, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना तथा कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चों के हितों की रक्षा करना समावेशी शिक्षा और मानव पूँजी विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए।