संदर्भ:
हाल ही में मानव तस्करी के विरुद्ध विश्व दिवस (30 जुलाई); बाल तस्करी के मामलों की बढ़ती संख्या, चुनौतीयाँ और एक व्यापक कानूनी, संस्थागत तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। तस्करी के बढ़ते मामलों और इसकी रोकथाम, अभियोजन तथा पुनर्वास तंत्र की माँग ने इस मुद्दे पर फिर से लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है।
मानव तस्करी की चुनौती की व्यापकता:
- मानव तस्करी एक संगठित अपराध है जिसमें शोषण के उद्देश्य से बल, धोखाधड़ी, जबरदस्ती, या किसी वेकती कमजोर स्थिति का दुरुपयोग उठान इत्यादि के माध्यम से इस आपराधिक कृत्य के लिए लोगों की भर्ती करना, उन्हें परिवहनकी सुविधा उपलब्ध कराना, आश्रय देना या प्राप्त करना जैसी कार्यपद्धतियाँ शामिल हैं।
- संयुक्त राज्य अमेरिका की मानव तस्करी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, वर्ष 2024 में वैश्विक स्तर पर तकरीबन 1,02,027 पीड़ितों की पहचान की गई, लेकिन केवल 7,975 मामलों में दोषसिद्धि की जा सकी।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 2024 ने 2,135 मानव तस्करी के मामलों, 6,018 पीड़ितों और 2,297 बाल पीड़ितों की संख्या दर्ज की है ।
- तस्करी के मामलों की एक बड़ी संख्या लापता बच्चों, बाल श्रम, जबरन विवाह और यौन शोषण के मामलों से संबंधित होती है।
भारत का कानूनी और संस्थागत ढाँचा:
- संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 23: मानव तस्करी और बलात् श्रम का निषेध करता है।
- अनुच्छेद 24: खतरनाक व्यवसायों में बाल श्रम का निषेध करता है।
- प्रमुख कानून:
- भारतीय न्याय संहिता 2023: धारा 140-144 मानव तस्करी से संबंधित हैं।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023:
- धारा 33: तस्करी से संबंधित अपराधों की रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाती है।
- धारा 34: पंचायत सदस्यों और ग्रामीणों को तस्करी से संबंधित अपराधों की रिपोर्ट करना आवश्यक बनाती है।
- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012: यह बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015: यह देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों की देखभाल, सुरक्षा, पुनर्वास और समाज के साथ उनके पुनः जुड़ाव का प्रावधान करता है।
- अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956: यह व्यावसायिक यौन शोषण के लिए तस्करी को शामिल करता है।
महत्त्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम:
- पिंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य:
- तस्करी के मामलों के लिए त्वरित सुनवाई का निर्देश दिया।
- पीड़िता मुआवजे को सुनिश्चित किया।
- बचाए गए बच्चों को स्कूलों में फिर से प्रवेश दिलाने का आदेश पारित किया ।
- प्रज्वला बनाम भारत संघ:
- तस्करी से पीड़ित लोगों के लिए संरक्षण योजना को अनिवार्य किया।
- पुनर्वास और पुन: एकीकरण को न्याय के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी।
- पूर्व के ऐतिहासिक घटनाक्रम:
- सर्वोच्च न्यायालय (2011) ने मानव तस्करी के बारे में भारत की समझ को संयुक्त राष्ट्र पलेर्मो प्रोटोकॉल (United Nations Palermo Protocol) के साथ संरेखित किया, जो बाद में आपराधिक कानून सुधारों में परिलक्षित हुआ।
मुख्य चुनौतियाँ:
- विविध कानूनी ढाँचा : कई कानून मौजूद हैं, लेकिन कोई व्यापक तस्करी-रोधी कानून नहीं है।
- कमजोर संस्थागत समन्वय तंत्र : पुलिस, श्रम विभागों, रेलवे, न्यायपालिका और कल्याणकारी एजेंसियों के मध्य समन्वय अपर्याप्त बना हुआ है।
- न्याय में देरी: जाँच, अभियोजन तथा पीड़ित व्यक्ति के मुआवजे में प्रायः देरी होती है।
- सामाजिक-आर्थिक स्तर पर व्याप्त समस्याएँ : गरीबी, बेरोजगारी, प्रवास और जागरूकता की कमी तस्करी के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाती है।
- कम दोषसिद्धि दर: बड़ी संख्या में पीड़ितों के बावजूद सजा की दर काफी कम बनी हुई है।
- सीमा पार तस्करी: अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क कमजोर सीमा पार समन्वय और कानून प्रवर्तन का लाभ उठाते हैं।
आगे की राह:
- कानूनी ढाँचे को मजबूत करना: रोकथाम, सुरक्षा, अभियोजन, पुनर्वास और समाज के साथ उनके पुनः जुड़ाव को एकीकृत करने वाला एक व्यापक तस्करी-रोधी कानून के बनाए जाने की आवश्यकता है ।
- संपूर्ण सरकार का दृष्टिकोण अपनाना: पुलिस, श्रम विभागों, रेलवे, बाल कल्याण समितियों, जिला प्रशासन और न्यायपालिका के मध्य समन्वय को मजबूत करना।
- समुदाय-आधारित समाधान तंत्र को बढ़ावा देना: स्कूल की निगरानी, सामुदायिक सतर्कता, जागरूकता अभियानों और कल्याणकारी योजनाओं इत्यादि का समय पर वितरण सुनिश्चित करना।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के रिपोर्टिंग दायित्वों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करना।
- पीड़ित-केंद्रित पुनर्वास सुनिश्चित करना: पीड़ितों को चिकित्सा देखभाल, आघात परामर्श, कानूनी सहायता, मुआवजा, शिक्षा, कौशल विकास एवं आजीविका सहायता प्रदान करना।
- वित्तीय और संगठित अपराध जाँच को मजबूत करना: संपत्ति जब्ती, वित्तीय जाँच, माँग-पक्ष प्रवर्तन, और शोषण में शामिल नियोक्ताओं और खरीदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के माध्यम से तस्करी सिंडिकेट को लक्षित करना।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग को बढ़ाना: खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त जाँच प्रक्रिया, प्रत्यर्पण, पारस्परिक कानूनी सहायता संधियों को मजबूत करना और दोषी तस्करों की एक अंतरराष्ट्रीय रजिस्ट्री विकसित करना।
निष्कर्ष:
मानव तस्करी एक संगठित अपराध है और मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। तस्करी के नेटवर्क को खत्म करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि तस्करों के उन तक पहुँचने से पूर्व प्रत्येक बच्चे की रक्षा की जाए, मजबूत कानूनी प्रवर्तन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग द्वारा समर्थित एक पीड़ित-केंद्रित, प्रौद्योगिकी-सक्षम और समन्वित संस्थागत प्रतिक्रिया की आवश्यकता है।
UPSC मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न : महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध बढ़ते अपराध केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत कमजोरियों को भी उजागर करते हैं। इस कथन के आलोक में महिलाओं एवं बच्चों की सुरक्षा हेतु भारत में उपलब्ध कानूनी एवं संस्थागत तंत्र की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न : ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012′ के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को ‘बालक/बालिका (Child)’ के रूप में परिभाषित करता है।
- अधिनियम के अंतर्गत बच्चों से संबंधित यौन अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों (Special Courts) की व्यवस्था की गई है।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c) 1 और 2 दोनों |