संदर्भ:
सीटों के आवंटन पर लगी रोक के समाप्त होने के बाद प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया से लोकसभा की सदस्य संख्या 543 से बढ़कर लगभग 824-850 हो सकती है। इस प्रस्ताव ने प्रतिनिधि लोकतंत्र, विधायी दक्षता और संघीय संतुलन पर बहस को गति दी है।
पृष्ठभूमि- भारत में परिसीमन:
- परिसीमन नवीनतम जनगणना के आधार पर संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है।
- उद्देश्य: निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग समान जनसंख्या बनाए रखकर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
- लोकसभा सीटों के आवंटन पर रोक: राज्यों के मध्य लोकसभा सीटों का आवंटन 1976 से स्थिर है और जनसंख्या स्थिरीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 के माध्यम से इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया था।
विस्तारित लोकसभा से संबंधित चिंताएँ:
- विधायी विचार-विमर्श में कमी: सदन का आकार काफी बड़ा होने से परिणामोन्मुख बहस और विधायी जाँच के अवसर कम हो सकते हैं।
- सीमित भागीदारी: अधिकांश सदस्यों को प्रश्न पूछने, गैर-सरकारी विधेयक पेश करने या बहस में भाग लेने का बहुत कम या न के बराबर भी अवसर नहीं मिल सकता है।
- कार्यपालिका का प्रभुत्व: सीमित बोलने के अवसरों वाली एक बड़ी विधायिका संसदीय निगरानी की कीमत पर कार्यपालिका को सुदृढ़ कर सकती है।
- संसदीय समितियों का कमजोर होना: पार्टी नेतृत्व पर अधिक निर्भरता समिति-आधारित जाँच की प्रभावशीलता को कम कर सकती है।
- परिचालन संबंधी चुनौतियाँ : बहस, प्रश्नकाल, मतदान और विधायी कार्यों का प्रबंधन करना अधिक कठिन हो सकता है।
- उच्च वित्तीय लागत: विस्तार के लिए बुनियादी ढाँचे, वेतन, रसद और प्रशासनिक सहायता पर अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता होगी।
परिसीमन से जुड़ी संघीय चिंताएँ:
- जनसंख्या आधारित पुनर्वितरण: उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं, जबकि जिन राज्यों ने सफलतापूर्वक जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को लागू किया है, उनके राजनीतिक प्रभाव में सापेक्षिक गिरावट आ सकती है।
- उत्तर-दक्षिण असंतुलन: दक्षिणी राज्यों ने बेहतर जनसांख्यिकीय प्रदर्शन के बावजूद अपने प्रतिनिधित्व के संभावित कमजोर होने के संबंध में चिंता व्यक्त की है।
- सहकारी संघवाद पर प्रभाव: संसदीय प्रतिनिधित्व में परिवर्तन राज्यों के मध्य राजनीतिक शक्ति के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
विस्तार के पक्ष में तर्क:
- बेहतर प्रतिनिधित्व: छोटे निर्वाचन क्षेत्र संसद सदस्यों को नागरिकों का अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व करने में सक्षम बना सकते हैं।
- जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का प्रतिबिंब: संसदीय प्रतिनिधित्व भारत की जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप होने चाहिए।
- चुनावी समानता का सुदृढ़ीकरण: परिसीमन “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के लोकतांत्रिक सिद्धांत को जारी रखता है।
विपक्ष में तर्क:
- मात्रा से अधिक गुणवत्ता: प्रभावी प्रतिनिधित्व विधायकों की संख्या बढ़ाने की तुलना में संस्थागत कामकाज पर अधिक निर्भर करता है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रथाएँ: कई परिपक्व लोकतंत्र जनसंख्या वृद्धि के बावजूद निश्चित विधायी संख्या बनाए रखते हैं और इसके साथ ही संस्थागत समर्थन में सुधार भी करते हैं।
- भूमिका की स्पष्टता: संसद सदस्यों को राष्ट्रीय कानून पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जबकि 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के तहत राज्य विधानसभाओं, शहरी स्थानीय निकायों और पंचायतों को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
आगे की राह:
- संसदीय समितियों को सुदृढ़ करना: कानून पारित होने से पूर्व समिति द्वारा उसकी जाँच को बढ़ाना।
- बैठक के दिनों में वृद्धि: विधायी निगरानी में सुधार के लिए वार्षिक संसदीय बैठकों का विस्तार करना।
- स्थानीय सरकारों का सशक्तिकरण: पंचायतों और नगर पालिकाओं को अधिक शक्तियाँ और वित्त सौंपना।
- निष्पक्ष परिसीमन सुनिश्चित करना: सभी राज्यों के हितों की रक्षा के लिए संघीय समानता के साथ जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व को संतुलित करना।
- संसदीय कामकाज का आधुनिकीकरण: संसद सदस्यों के लिए अनुसंधान समर्थन, डिजिटल बुनियादी ढाँचे और संस्थागत क्षमता में सुधार करना।
निष्कर्ष:
निष्कर्षतः परिसीमन को प्रतिनिधि लोकतंत्र और प्रभावी शासन दोनों को मजबूत करना चाहिए। लोकसभा की सदस्य संख्या में किसी भी वृद्धि के साथ ऐसे सुधार होने चाहिए जो विधायी विचार-विमर्श, संसदीय जवाबदेही और संघीय संतुलन को बढ़ाते हों, यह सुनिश्चित करते हुए कि अधिक संख्यात्मक प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक प्रभावशीलता की कीमत पर न आए।
UPSC मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत में प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) और लोकसभा की सदस्य संख्या में संभावित वृद्धि केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह संघीय संतुलन, संसदीय कार्यकुशलता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है।समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।(15 अंक, 250 शब्द)
UPSC सिविल सेवा (प्रारंभिक परीक्षा) अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—
- परिसीमन (Delimitation) का उद्देश्य नवीनतम जनगणना के आधार पर संसदीय एवं विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है।
- 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के आवंटन पर लगी रोक को वर्ष 2026 तक बढ़ा दिया गया ।
- परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) के आदेशों को न्यायालय में सामान्य अपील के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) केवल 1 और 2 |