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Jan 10 2026

संपन्न पोर्टल (SAMPANN Portal)

हाल ही में, संचार लेखा नियंत्रक जनरल ने दूरसंचार विभाग के पेंशनभोगियों के लिए संपन्न पोर्टल (SAMPANN Portal) की कवरेज का विस्तार किया और पेंशन दस्तावेजों को डिजीलॉकर के साथ एकीकृत किया।

संपन्न पोर्टल (SAMPANN Portal)

  • संपन्न [पेंशन लेखा और प्रबंधन प्रणाली (System for Accounting and Management of Pension)] दूरसंचार विभाग के पेंशनभोगियों के लिए एक एकीकृत, ऑनलाइन पेंशन प्रसंस्करण और भुगतान प्रणाली है।
  • 29 दिसंबर 2018 को शुरू की गई।
  • संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग के अंतर्गत संचार लेखा नियंत्रक (CGCA) द्वारा कार्यान्वित

मुख्य विशेषताएँ

  • सिंगल-विंडो पेंशन प्रबंधन: पेंशन प्रोसेसिंग, स्वीकृति, प्राधिकरण और भुगतान को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एकीकृत करता है।
  • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण: बिना किसी मध्यस्थ के पेंशनभोगियों के बैंक खातों में समय पर और सीधे पेंशन जमा करना सुनिश्चित करता है।
  • ऑनलाइन शिकायत निवारण: पेंशनभोगियों को डिजिटल रूप से शिकायतें दर्ज करने और निगरानी करने की सुविधा देता है, जिससे कागजी कार्रवाई कम हो जाती है।
  • रीयल-टाइम ट्रैकिंग: पेंशनभोगियों को घर बैठे पेंशन की स्थिति, बकाया और संशोधनों की निगरानी करने की सुविधा देता है।
  • डिजीलॉकर एकीकरण: पेंशन भुगतान आदेश, ग्रेच्युटी आदेश, कम्यूटेशन आदेश और फॉर्म 16 तक डिजिटल पहुँच प्रदान करता है।

महत्त्व

  • बेहतर कार्यक्षमता: पेंशन मामलों के निपटारे में तेजी लाता है और मिलान एवं लेखापरीक्षा प्रक्रियाओं को बेहतर बनाता है।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही: डिजिटल ट्रैकिंग और रिकॉर्ड संबंधी त्रुटियों को कम करते हैं और पेंशन प्रशासन में विश्वास बढ़ाते हैं।
  • पेंशनभोगियों के लिए सुविधा: भौतिक रूप से आने की आवश्यकता समाप्त करता है और कागज रहित पहुँच के माध्यम से दस्तावेज प्रबंधन को सरल बनाता है।
  • डिजिटल शासन: ई-शासन और पेंशन अभिलेखों के सुरक्षित, दीर्घकालिक डिजिटल संरक्षण के लिए सरकार के दृष्टिकोण का समर्थन करता है।

सूडान संकट

जनवरी 2026 में, सूडान की सेना और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज के बीच संघर्ष के कारण दक्षिण कोर्डोफान से हजारों लोग विस्थापित हो गए, जिससे सीमा पार पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

सूडान में संकट के बारे में

  • दक्षिण और पश्चिम कोरडोफान में नए सिरे से झड़पें रैपिड सपोर्ट फोर्सेज द्वारा तेल उत्पादक क्षेत्रों में विस्तार के बाद शुरू हुई हैं, जिसमें सूडान के सबसे बड़े तेल क्षेत्र ‘हेगलिग’ पर अधिकार करना भी शामिल है।
  • अप्रैल 2023 से जारी इस संघर्ष ने बड़े पैमाने पर विस्थापन, खाद्य असुरक्षा और सीमा पार दक्षिण सूडान में शरणार्थियों के पलायन को जन्म दिया है, जिससे पहले से ही गंभीर मानवीय संकट और भी बदतर हो गया है।

सूडान के बारे में

  • सूडान उत्तर-पूर्वी अफ्रीका का एक देश है, जो अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा देश है। इसकी राजधानी खार्तूम नील और श्वेत नील नदियों के संगम पर स्थित है।
  • स्थान: यह उत्तरी अफ्रीका और उप-सहारा अफ्रीका के बीच स्थित है, जिसकी तटरेखा लाल सागर से लगती है और दक्षिण की ओर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक फैली हुई है।
  • सीमाएँ: सूडान की सीमाएँ मिस्र, लीबिया, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिण सूडान, इथियोपिया और इरिट्रिया से लगती हैं।
  • भूगोल
    • पर्वत: सबसे ऊँचा पर्वत ‘जबल मर्राह’ है, जो पश्चिमी दारफुर क्षेत्र में स्थित है।
    • नदियाँ: देश में नील नदी का प्रवाह होता है।
    • भूभाग: सूडान में विशाल मैदान और पठार हैं, जबकि कुछ ही पर्वतीय क्षेत्र हैं।
    • वनस्पति: उत्तरी सूडान मुख्य रूप से रेगिस्तान और अर्द्ध-शुष्क घास के मैदानों द्वारा निर्मित है, जो दक्षिण की ओर बढ़ते हुए सवाना और वन क्षेत्रों में परिवर्तित हो जाता है।
    • जलवायु: मुख्य रूप से गर्म और शुष्क, दक्षिणी क्षेत्रों की ओर वर्षा की मात्रा में वृद्धि होती है।

सूडान की रणनीतिक भौगोलिक अवस्थिति और संसाधन संपन्न क्षेत्र इसकी आर्थिक महत्ता और संघर्ष की गतिशीलता दोनों को लगातार प्रभावित कर रहे हैं।

‘डूम्सडे’ ग्लेशियर

हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन में थ्वाइट्स ग्लेशियर में तेजी से आ रहे दरारों पर प्रकाश डाला गया है, जो भविष्य में अंटार्कटिक की ‘आइसशीट’ के ढहने की संभावना का संकेत देता है।

डूम्सडे ग्लेशियर के संबंध में प्रमुख चिंताएँ

  • बर्फ का तेजी से टूटना: थ्वाइट्स ईस्टर्न आइस शेल्फ में दरारों की वार्षिक लंबाई वर्ष 2002 और वर्ष 2022 के बीच दोगुनी से अधिक हो गई है, जिससे इसकी संरचनात्मक स्थिरता कमजोर हो रही है।
    • यह वर्ष 2002 में 165.2 +/- 6.6 किमी से बढ़कर 2022 में 335.5 +/- 13.4 किमी हो गई है।
  • समुद्र स्तर में वृद्धि: ग्लेशियर के पूरी तरह पिघलने से वैश्विक समुद्र स्तर में लगभग 65 सेंटीमीटर तक वृद्धि हो सकती है, जिससे दुनिया भर के तटीय क्षेत्रों को खतरा हो सकता है।
  • जलवायु परिवर्तन का खतरा: ग्लेशियर के अस्थिर होने से पश्चिम अंटार्कटिक आइस शीट में अपरिवर्तनीय परिवर्तन हो सकते हैं, जिससे जलवायु पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।

डूम्सडे ग्लेशियर (थवेट्स ग्लेशियर) के बारे में

  • थ्वाइट्स ग्लेशियर पृथ्वी पर सबसे तेजी से बदलते हिम-महासागरीय तंत्रों में से एक है और वैश्विक समुद्री जलस्तर को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • थ्वाइट्स ग्लेशियर को “डूम्सडे ग्लेशियर” कहा जाता है क्योंकि इसके संभावित, तीव्र पतन से वैश्विक समुद्री जलस्तर में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, जिससे विश्व भर के तटीय क्षेत्रों के लिए एक विनाशकारी खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • अवस्थिति: पश्चिमी अंटार्कटिका में स्थित, यह पश्चिमी अंटार्कटिक ‘आइसशीट’  से बर्फ को अमुंडसेन सागर में प्रवाहित करता है।
    • इसका पूर्वी विस्तार थ्वाइट्स पूर्वी आइस शेल्फ का निर्माण करता है, जो महासागर की सतह पर तैरता है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • विशाल आकार और प्रभाव: इसके ढहने मात्र से ही पश्चिमी अंटार्कटिक आइस शीट में भारी अस्थिरता आ सकती है।
    • स्थिर बिंदु पर निर्भरता: बर्फ की परत एक समुद्री रिज से जुड़ी होती है जो बर्फ के बहाव को धीमा करती है; इस स्थिर बिंदु के कमजोर होने से बर्फ का बहाव तेज हो जाता है।
    • दो चरणों वाली विखंडन प्रक्रिया: विखंडन पहले बर्फ के बहाव के समानांतर विकसित होते हैं, उसके बाद लंबवत दरारें बनती हैं, जिससे आइस शीट का तेजी से विघटन होता है।

पंखुड़ी पोर्टल (PANKHUDI Portal)

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (भारत सरकार) ने एक एकीकृत कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और साझेदारी सुविधा पोर्टल, पंखुड़ी (PANKHUDI) का शुभारंभ किया है।

पोर्टल की प्रमुख विशेषताएं

  • एकल-डिजिटल प्लेटफॉर्म: पंखुड़ी महिला एवं बाल विकास गतिविधियों में शामिल गैर-सरकारी संगठनों, कॉरपोरेट संस्थाओं, प्रवासी भारतीयों और सरकारी एजेंसियों के लिए एक ही स्थान पर सभी सुविधाएँ प्रदान करता है।
  • योगदान प्रक्रिया को सरल बनाना: यह पोर्टल हितधारकों को स्पष्ट अनुमोदन प्रक्रियाओं के माध्यम से योगदान पंजीकृत करने, पहलों की पहचान करने, प्रस्ताव प्रस्तुत करने और अपने योगदान की प्रगति की निगरानी करने में सक्षम बनाता है।
  • गैर-नकद योगदान: वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, सभी योगदान केवल गैर-नकद माध्यमों से ही स्वीकार किए जाते हैं।
  • प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित: यह पोर्टल पोषण, स्वास्थ्य, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECC), महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में पहलों का समर्थन करता है।
  • प्रमुख मिशनों का समर्थन: पंखुड़ी मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 जैसी प्रमुख पहलों के कार्यान्वयन को मजबूत करता है, जिनका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों के लिए पोषण संबंधी परिणामों में सुधार करना है।
    • यह पोर्टल बाल कल्याण और संरक्षण पर केंद्रित मिशन वात्सल्य और महिला सशक्तिकरण एवं सुरक्षा पर कार्य करने वाले मिशन शक्ति का भी समर्थन करता है।

पोर्टल के लाभ

  • दक्षता और जवाबदेही में वृद्धि: एक साझा डिजिटल इंटरफेस प्रदान करके, पोर्टल समन्वय और निगरानी को बढ़ाता है, जिससे महिला एवं बाल विकास पहलों में शामिल सभी लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
  • बुनियादी ढाँचे में सुधार: पंखुड़ी से 14 लाख से अधिक आंगनवाड़ी केंद्रों, 5,000 बाल देखभाल संस्थानों और 800 वन स्टॉप सेंटरों (OSC) में सेवाओं और बुनियादी ढाँचे में सुधार होने की उम्मीद है, जिससे अंततः लाखों नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार होगा।

संदर्भ

हाल ही में, चेन्नई के समुद्र तटों पर ऑलिव रिडले टर्टल की सैटेलाइट टैगिंग शुरू हुई है।

ऑलिव रिडले टर्टल की सैटेलाइट टैगिंग के बारे में

  • चेन्नई के समुद्र तटों पर पहली बार ऑलिव रिडले टर्टल की निगरानी के लिए रेडियो टेलीमेट्री का उपयोग करते हुए सैटेलाइट टैगिंग का प्रयोग किया जा रहा है।
    • सैटेलाइट टैगिंग वन्यजीव निगरानी की एक तकनीक है, जिसमें एक छोटा इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमीटर किसी जीव से जोड़ा जाता है ताकि उपग्रहों के माध्यम से वास्तविक समय में उसकी गतिविधियों, व्यवहार और आवास के उपयोग पर नजर रखी जा सके।
  • संचालनकर्ता: वन्यजीव संस्थान (WII) और उन्नत वन्यजीव संरक्षण संस्थान (AIWC), वंडलूर द्वारा संयुक्त रूप से कार्यान्वित।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • दो वर्ष के इस अध्ययन (2025-2027) में चेन्नई तट और कावेरी डेल्टा सहित संवेदनशील ‘नेस्टिंग’ स्थलों को शामिल किया गया है, ताकि ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं की निगरानी की जा सके।
    • प्रति वर्ष नवंबर से अप्रैल तक उनकी नेस्टिंग प्रक्रिया के मौसम के दौरान प्रति घंटे उपग्रह टेलीमेट्री का उपयोग करते हुए, 10 कछुओं की सैटेलाइट टैगिंग की जाएगी और 1,000 कछुओं के कवच पर टैग लगाए जाएंगे ताकि उनकी दीर्घकालिक निगरानी की जा सके।
  • टैगिंग का उद्देश्य
    • ‘ऑलिव रिडले टर्टल’ के प्रवासी मार्गों, चारागाहों और ‘नेस्टिंग’ व्यवहार का मानचित्रण करना।
    • कछुओं और मत्स्यन गतिविधियों के बीच अंतर्संबंधों का अध्ययन करना, जिससे आकस्मिक शिकार को कम करने में मदद मिल सके।
    • साक्ष्य आधारित संरक्षण नीतियों का समर्थन करना, ‘नेस्टिंग’ संबंधी समुद्र तटों की सुरक्षा में सुधार करना और भारत के समुद्री जैव विविधता संरक्षण प्रयासों को मजबूत करना।

ओलिव रिडले टर्टल (लेपिडोचेलिस ओलिवेसिया) के बारे में 

  • ऑलिव रिडले टर्टल सबसे छोटी और सबसे अधिक पाई जाने वाली समुद्री कछुआ प्रजाति है, जिसका नाम इसके जैतून-हरे रंग के कवच के नाम के कारण रखा गया है।
  • आवास: यह गर्म उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय समुद्री जल में निवास करता है और ‘नेस्टिंग’ के लिए मुहानों और खाड़ियों के पास तटीय क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है।
  • वितरण: ऑलिव रिडले टर्टल हिंद महासागर, प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में पाए जाते हैं।
    • भारत में, मुख्य रूप से ओडिशा तट, अंडमान द्वीप समूह, तमिलनाडु और कर्नाटक (पश्चिमी तट पर एकमात्र प्रजनन स्थल) में ‘नेस्टिंग’ करते हैं।

  • आहार: ये सर्वाहारी होते हैं और शैवाल, जेलीफ़िश, केकड़े, लॉबस्टर, मोलस्क और ट्यूनिकेट्स खाते हैं।
  • ‘नेस्टिंग’ प्रक्रिया: इसकी एक अनूठी विशेषता अरिबाडा है, जो एक सामूहिक ‘नेस्टिंग’ की घटना है जिसमें हजारों मादाएँ एक ही समुद्र तट पर एक साथ अंडे देती हैं।
    • भारत में, अरिबाडा के प्रमुख स्थलों में गहिरमाथा, देवी नदी का मुहाना और ओडिशा में ऋषिकुल्या शामिल हैं।
    • प्रत्येक मादा लगभग 100-140 अंडे देती है।
  • संरक्षण स्थिति
    • IUCN की रेड लिस्ट: सुभेद्य (Vulnerable)
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची I
    • CITES: परिशिष्ट I
  • खतरे: प्रमुख खतरों में मछली पकड़ने के जालों में आकस्मिक शिकार, तटीय विकास, जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण, अंडों का अवैध संग्रहण और आवारा जानवरों द्वारा शिकार शामिल हैं।

भारत में संरक्षण प्रयास

  • ओडिशा के तटीय इलाकों में ‘नेस्टिंग’ करने वाले कछुओं की सुरक्षा के लिए भारतीय तटरक्षक बल द्वारा ऑपरेशन ओलिविया (Operation Olivia) संचालित किया गया ।
  • मौसमी मत्स्यन पर प्रतिबंध और कछुआ नियंत्रण उपकरणों (TED) का उपयोग करके आकस्मिक शिकार से बचाव।
  • गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य जैसे संरक्षित घोंसला बनाने वाले समुद्र तट।
  • चेन्नई और ओडिशा में हैचरी सहित बाह्य संरक्षण कार्य।
    • स्टूडेंट्स सी टर्टल कंजर्वेशन नेटवर्क (SSTCN) जैसे गैर-सरकारी संगठन वन विभाग के साथ मिलकर हैचरी का प्रबंधन करते हैं।
  • भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा फ्लिपर टैगिंग एंड रेडियो टेलीमेट्री के माध्यम से वैज्ञानिक तरीके से निगरानी की जाती है।

निष्कर्ष 

सैटेलाइट टैगिंग भारत के समुद्री संरक्षण में एक बड़ी प्रगति है, क्योंकि यह ओलिव रिडले टर्टल के विज्ञान-आधारित संरक्षण को सक्षम बनाती है और आकस्मिक शिकार को कम करने और महत्वपूर्ण ‘नेस्टिंग’ आवासों की रक्षा के प्रयासों को मजबूत करती है।

संदर्भ

राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा की गई दो प्रमुख घोषणाओं के कारण भारत को ऊर्जा नीति पर संयुक्त राज्य अमेरिका से बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है:

  • रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने की अनुमति देने वाले द्विदलीय विधेयक को मंजूरी।
  • अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) से अमेरिका की वापसी

रूस प्रतिबंध विधेयक के बारे में

  • “रूस प्रतिबंध अधिनियम 2025” का उद्देश्य उन देशों को दंडित करना है जो रूसी तेल खरीदना जारी रखते हैं।
  • यह विधेयक राष्ट्रपति को भारत, चीन और ब्राजील जैसे लक्षित देशों से आयात पर भारी शुल्क (500% तक) लगाने का अधिकार देता है।
  • यह रूस से तेल खरीदने पर भारत पर पहले से लागू 25% दंडात्मक शुल्क पर आधारित है।
  • भारत पर प्रभाव: भारत के रूसी तेल आयात में पहले ही भारी गिरावट आई है। हालाँकि, इसके पूर्ण कार्यान्वयन से द्विपक्षीय व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) से अमेरिका की वापसी

  • अमेरिका का ISA से हटने का निर्णय जलवायु संबंधी संगठनों सहित 60 से अधिक संयुक्त राष्ट्र और गैर-संयुक्त राष्ट्र निकायों से हटने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
  • इसे नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन पर बहुपक्षीय प्रयासों के लिए एक बड़ा नकारात्मक पहलू माना जा रहा है।
  • ISA की शुरुआत भारत और फ्राँस ने वर्ष 2015 में वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए की थी।
  • अमेरिका के वर्ष 2021 में इसमें शामिल होने से इसे और भी मजबूती मिली।

संदर्भ 

हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की जलवायु व्यवस्था से, जिसमें UNFCCC तथा प्रमुख जलवायु विज्ञान और ऊर्जा संस्थान शामिल हैं, अपने हटने की घोषणा की।

जलवायु परिवर्तन से संबंधित संगठनों से संयुक्त राज्य अमेरिका का हटना

  • निर्णय की प्रकृति: संयुक्त राज्य अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC), अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) तथा 60 से अधिक बहुपक्षीय संगठनों से बाहर निकलने का निर्णय लिया।
    • यह वर्ष 2015 के पेरिस समझौते से उसके पूर्व में किए गए हटने के निर्णय के बाद हुआ, जो जनवरी 2026 से प्रभावी हुआ।
  • हटने के कारण: संयुक्त राज्य अमेरिका ने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए, बाध्यकारी जलवायु दायित्वों के विरोध, वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति के तहत जलवायु परिवर्तन से इनकार, तथा आर्थिक लागत और नियामक प्रतिबंधों को लेकर चिंताओं के कारण यह कदम उठाया।

वे प्रमुख जलवायु संगठन, जिनसे संयुक्त राज्य अमेरिका हट गया है:

संस्था स्थापना वर्ष  उद्देश्य अमेरिकी हटने का प्रभाव
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) 1992 जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक ढाँचा।
  • बहुपक्षीय जलवायु वार्ताओं को कमजोर करता है।
  • प्रमुख उत्सर्जकों की जवाबदेही घटती है।
अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) 1988 नीति निर्माण हेतु जलवायु विज्ञान का आकलन।
  • अमेरिकी वैज्ञानिक समन्वय में कमी।
  • जलवायु आकलनों में संभावित अंतराल।
पेरिस समझौता 2015 वैश्विक तापवृद्धि को 2°C से अत्यधिक नीचे सीमित करना।
  • शमन लक्ष्यों को प्राप्त करना कठिन।
  • जलवायु विश्वास में क्षरण।
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) 2015 वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा की तैनाती को बढ़ावा देना।
  • प्रतीकात्मक झटका।
  • कोई बड़ा वित्तीय नुकसान नहीं, क्योंकि अमेरिका ने कोई फंडिंग नहीं दी।
अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) 2009 पूरे विश्व में नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण को समर्थन।
  • स्वच्छ प्रौद्योगिकियों पर सहयोग में कमी।
  • ज्ञान आदान-प्रदान की गति धीमी।
जैव विविधता और पारितंत्र सेवाओं पर अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच (IPBES) 2012 जैव विविधता के विज्ञान–नीति दृष्टिकोण को सुदृढ़ करना।
  • जलवायु–जैव विविधता शासन के एकीकरण को कमजोर करता है।

वैश्विक जलवायु निकायों से अमेरिकी निष्कासन के भारत पर प्रभाव

  • दबाव में कमी: UNFCCC से अमेरिका के हटने से भारत जैसे विकासशील देशों पर उत्सर्जन शीघ्र घटाने का वैश्विक दबाव अस्थायी रूप से कम हो सकता है।
    • इससे भारत को विकासात्मक आवश्यकताओं और ऊर्जा सुरक्षा के अनुरूप संतुलित ऊर्जा संक्रमण अपनाने का अवसर मिलता है।
  • नेतृत्व में वृद्धि: अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) जैसे मंचों से अमेरिका के हटने से भारत और फ्राँस को विशेष रूप सेग्लोबल साउथ’ के लिए वैश्विक सौर एजेंडा को आकार देने में अधिक नेतृत्व की भूमिका निभाने का अवसर मिलता है।
  • अनुकूलित मार्ग: भारत को गरीबी उन्मूलन, औद्योगिकीकरण और अवसंरचना विकास के साथ जलवायु कार्रवाई को एकीकृत करने में अधिक नीति स्वायत्तता मिलती है, जो सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताओं (CBDR–RC) के सिद्धांत के अनुरूप है।
  • दक्षिण–दक्षिण सहयोग का सुदृढ़ीकरण: भारत अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के साथ जलवायु साझेदारियों को गहरा कर सकता है, प्रौद्योगिकी साझाकरण और विकासशील देशों के अनुकूल जलवायु समाधानों को बढ़ावा दे सकता है।

अमेरिकी निष्कासन से उत्पन्न चुनौतियाँ

  • जलवायु वित्त में अनिश्चितता: अमेरिका का हटना UNFCCC तंत्रों के तहत जलवायु वित्त प्रतिबद्धताओं की विश्वसनीयता को कमजोर करता है, जिससे ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) जैसे कोषों में पूर्वानुमेय वित्त प्रवाह प्रभावित होता है।
  • भारत–अमेरिका स्वच्छ ऊर्जा सहयोग में व्यवधान: स्वच्छ प्रौद्योगिकी, नवाचार और क्षमता निर्माण में मौजूदा सहयोग धीमा हो सकता है, जिससे भारत को अपनी ऊर्जा संक्रमण रणनीतियों का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ेगा।
  • कानूनी और संस्थागत प्रभाव: UNFCCC से हटने का अर्थ स्वचालित रूप से पेरिस समझौते से भी हटना है, क्योंकि यह सम्मेलन के अंतर्गत संचालित होता है।
    • अमेरिका COP वार्ताओं, पारदर्शिता तंत्रों, कार्बन बाजारों और जलवायु वित्त शासन में निर्णय लेने का अधिकार खो देता है।
  • वैज्ञानिक प्रभाव: IPCC से बाहर निकलने से वैश्विक जलवायु विज्ञान आकलनों में अमेरिकी भागीदारी घटती है, जिससे डेटा की विश्वसनीयता और समन्वय प्रभावित होता है।
  • चीनी वर्चस्व में वृद्धि: यह निर्णय विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण और आपूर्ति शृंखलाओं में वैश्विक जलवायु नेतृत्व चीन को सौंपने का जोखिम उत्पन्न करता है।
  • खंडित वैश्विक जलवायु नियम: कमजोर बहुपक्षवाद के कारण जलवायु कार्रवाई व्यापार उपायों, जैसे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM), की ओर स्थानांतरित हो सकती है, जिससे भारत के निर्यात प्रभावित हो सकते हैं।

UNFCCC से अमेरिकी निष्कासन के प्रमुख पर्यावरणीय प्रभाव

  • वैश्विक जलवायु शासन का कमजोर होना: UNFCCC से हटने से संयुक्त राज्य अमेरिका उस मुख्य मंच से बाहर हो जाता है जो वैश्विक जलवायु वार्ताओं और नियम-निर्माण का समन्वय करता है।
  • जलवायु वित्त की विश्वसनीयता में कमी: UNFCCC के जलवायु वित्त तंत्र के तहत विकसित देशों ने वर्ष 2035 तक विकासशील देशों के शमन और अनुकूलन के लिए प्रतिवर्ष कम से कम 300 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने पर सहमति दी थी, तथा सभी स्रोतों से प्रतिवर्ष 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापक लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
    • अमेरिका का हटना इन लक्ष्यों की प्राप्ति में विश्वास और पूर्वानुमेयता को कमजोर करता है।
  • वैश्विक शमन प्रयासों की गति धीमी होना: अन्य देश भी प्रतिबद्धताओं को कमजोर कर सकते हैं, क्योंकि विश्व के सबसे बड़े उत्सर्जकों में से एक से पारस्परिकता का अभाव रहेगा।
    • ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट और अन्य स्रोतों के अनुसार, वर्ष 2024 में अमेरिका का क्षेत्रीय COउत्सर्जन लगभग 4.9 अरब टन था, जो वर्ष 2024 के वैश्विक COउत्सर्जन का लगभग 12.7% है।
  • जलवायु कार्रवाई का विखंडन: द्विपक्षीय समझौतों, व्यापार उपायों और कार्बन सीमा करों पर अधिक निर्भरता से असमान मानक और टकराव उत्पन्न हो सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) के बारे में

  • संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन एक बहुपक्षीय पर्यावरणीय संधि है, जिसे वर्ष 1992 में वैश्विक जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपनाया गया।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को ऐसे स्तर पर स्थिर करना है, जो जलवायु प्रणाली में खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप को रोक सके।
  • सदस्य: UNFCCC की सार्वभौमिक सदस्यता है, जिसमें 198 पक्षकार (197 देश और यूरोपीय संघ) शामिल हैं।
    • जनवरी 2026 तक, संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र ऐसा देश है जिसने इससे हटने का निर्णय लिया, जिससे अमेरिका के बिना कुल 197 सदस्य (पक्ष) रह गए हैं।
  • प्रमुख पहलें और तंत्र
    • कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज’ (COP): वार्षिक वार्ताएँ, जहाँ देश प्रगति की समीक्षा करते हैं और जलवायु प्रतिबद्धताओं को सुदृढ़ करते हैं।
    • पेरिस समझौता (2015): UNFCCC के अंतर्गत वैश्विक तापवृद्धि को 2°C से अत्यधिक नीचे सीमित करने हेतु एक कानूनी रूप से बाध्यकारी ढाँचा।
    • पारदर्शिता और रिपोर्टिंग प्रणाली: राष्ट्रीय उत्सर्जन, शमन कार्रवाइयों और लक्ष्यों की दिशा में प्रगति की निगरानी करती है।
    • जलवायु वित्त संरचना: ‘ग्रीन क्लाइमेट फंड’ और ‘ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी’ जैसे तंत्रों की निगरानी करती है, जो विकासशील देशों को समर्थन प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष

जहाँ अमेरिकी निष्कासन भारत को अल्पकालिक लचीलापन प्रदान करता है, वहीं दीर्घकाल में यह वैश्विक जलवायु सहयोग, वित्तीय पूर्वानुमेयता और न्यायसंगत जलवायु शासन को कमजोर करता है।

संदर्भ

कानूनी रूप से प्रतिबंधित होने के बावजूद, भारत में बाल विवाह अब भी प्रचलित है, जो कम उम्र की लड़कियों के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करता है, जिनमें स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएँ, लैंगिक असमानता और गरीबी के दुष्चक्र की निरंतरता शामिल है।

  • वर्ष 2024 में शुरू की गई बाल विवाह मुक्त भारत (BVMB) पहल का उद्देश्य देशभर में बाल विवाह को समाप्त करना है और एक बाल विवाह-मुक्त भारत को बढ़ावा देना है।

बाल विवाह क्या है?

  • कानूनी परिभाषा: बाल विवाह उस विवाह को कहा जाता है जिसमें लड़की की आयु 18 वर्ष से कम और लड़के की आयु 21 वर्ष से कम हो।
    • इसे भारत में भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत कानूनी रूप से बाल दुष्कर्म’ के रूप में मान्यता दी गई है।
  • स्वास्थ्य और सामाजिक जोखिम: बाल विवाह कम उम्र की लड़कियों को स्वास्थ्य जोखिमों के संपर्क में लाता है, जिनमें कम उम्र में गर्भधारण, घरेलू हिंसा शामिल है, और यह गरीबी व लैंगिक असमानता को बनाए रखता है।
  • वर्तमान आँकड़े: NFHS-5 (2019–21) के अनुसार, 20–24 वर्ष आयु वर्ग की 23% महिलाएँ 18 वर्ष से पहले विवाहित थीं, जिनमें पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे अधिक मामले पाए गए।

बाल विवाह के विरुद्ध भारत का कानूनी ढाँचा

  • ऐतिहासिक प्रयास: भारत में बाल विवाह के विरुद्ध संघर्ष 19वीं सदी से शुरू होता है, जहाँ राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर और ज्योतिराव फुले जैसे सुधारकों ने विधायी परिवर्तनों को आगे बढ़ाया।
  • आयु सहमति अधिनियम, 1891: कम उम्र में विवाह को संबोधित करने का पहला कानूनी प्रयास।
  • बाल विवाह निरोधक अधिनियम (शारदा अधिनियम), 1929: लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष और लड़कों के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई।
    • संशोधन (1948 एवं 1978): आयु बढ़ाकर लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष की गई।
  • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA): PCMA ने वर्ष 1929 के बाल विवाह निरोधक अधिनियम का स्थान लिया और बाल विवाह को अपराध घोषित किया। यह बालक/बालिका द्वारा निरस्त करने योग्य (और बल, तस्करी या छल के मामलों में शून्य) बनाता है तथा अपराधियों के लिए कठोर कारावास और जुर्माने सहित दंड का प्रावधान करता है।
    • बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (CMPOs): राज्य बाल विवाह को रोकने और रिपोर्ट करने के लिए CMPOs की नियुक्ति करते हैं, जिससे कानूनी अनुपालन सुनिश्चित हो सके।
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023: 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध को दुष्कर्म’ माना गया है।
  • POCSO अधिनियम, 2012: बाल विवाह के अंतर्गत होने वाले यौन उत्पीड़न को गंभीर प्रविष्ट का यौन उत्पीड़न के रूप में मानता है।

बाल विवाह मुक्त भारत (BVMB) पहल

  • शुरुआत: 27 नवंबर, 2024 को शुरू की गई BVMB का उद्देश्य बाल विवाह को समाप्त करना है और यह SDG 5.3 के अनुरूप है, जो वर्ष 2030 तक बाल विवाह जैसी हानिकारक प्रथाओं के उन्मूलन का लक्ष्य रखता है।
  • कानूनी आधार: बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 द्वारा समर्थित यह पहल अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अंतर्गत भारत के संवैधानिक अधिकारों पर आधारित है।
  • समग्र ढाँचा: वर्ष 2024 के एक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को समर्पित CMPOs की नियुक्ति, विशेष बाल विवाह प्रतिषेध इकाइयों की स्थापना और बहु-क्षेत्रीय जागरूकता अभियानों के संचालन के माध्यम से प्रवर्तन को सुदृढ़ करने का निर्देश दिया।

100-दिवसीय अभियान: गति निर्माण पहल

  • विशेष अभियान: दिसंबर 2025 में शुरू किया गया 100-दिवसीय अभियान बाल विवाह की रोकथाम और जनसंपर्क पर केंद्रित है, जिसमें प्रत्येक माह को एक विशिष्ट विषयगत फोकस के लिए समर्पित किया गया है।
  • प्रतिष्ठित पुरस्कार
    • बाल विवाह मुक्त ग्राम प्रमाणपत्र: उन गाँवों के लिए, जिन्होंने बाल विवाह को सफलतापूर्वक समाप्त किया।
    • बाल विवाह मुक्त भारत योद्धा पुरस्कार: रोकथाम और रिपोर्टिंग में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले शीर्ष जिलों के लिए।

बाल विवाह मुक्त भारत पोर्टल

  • केंद्रीकृत मंच: BVMB पोर्टल बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों (CMPOs) की सूची वाले केंद्रीकृत डेटाबेस तक पहुँच प्रदान करता है और बाल विवाह मामलों की वास्तविक समय में रिपोर्टिंग को सक्षम बनाता है।
  • निगरानी और जागरूकता: यह जागरूकता अभियानों की प्रभावशीलता और हितधारकों द्वारा की गई कार्रवाइयों की  निगरानी करता है।

प्रगति और उपलब्धियाँ

  • प्रवर्तन और जागरूकता: BVMB मिशन ने बाल विवाह पर नियंत्रण लगाने में उल्लेखनीय प्रगति की है, जहाँ CMPOs द्वारा घर-घर जाकर जागरूकता फैलाने और कई क्षेत्रों में नो-चाइल्ड-मैरिज जोन’ स्थापित किए गए हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय समर्थन: यूनिसेफ ने इस पहल का समर्थन किया है, CMPOs के लिए तकनीकी सहायता प्रदान की है और क्षमता निर्माण कार्यशालाएँ आयोजित की हैं।
  • बाल विवाह मुक्त उपलब्धियाँ
    • छत्तीसगढ़ का बालोद जिला लगातार दो वर्षों तक शून्य मामलों के साथ भारत का पहला बाल विवाह मुक्त जिला बना।
    • सूरजपुर जिले ने 75 ग्राम पंचायतों को ‘बाल विवाह मुक्त’ घोषित किया, जो सामुदायिक जागरूकता में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।

संदर्भ

हाल ही में प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल का निधन हो गया, जिन्हें विशेष रूप से पश्चिमी घाट में पारिस्थितिक संरक्षण के क्षेत्र में उनके गहन योगदान के लिए जाना जाता है।

माधव गाडगिल के बारे में

  • माधव धनंजय गाडगिल एक अग्रणी भारतीय पारिस्थितिकीविद् थे, जिन्हें प्रायः आधुनिक भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र के जनक’ के रूप में जाना जाता है।
  • पर्यावरण विज्ञान, सक्रियता और नीति निर्माण में उनके योगदान ने विशेष रूप से पश्चिमी घाट जैसे जैव-विविधता हॉटस्पॉट में एक अमिट छाप छोड़ी है।

गाडगिल के योगदान

  • पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP): गाडगिल इस पैनल के अध्यक्ष थे, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2011 की गाडगिल रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESAs) के गठन का प्रस्ताव रखा गया और सतत् विकास पर जोर दिया गया।
  • वे वर्ष 2002 के जैव विविधता अधिनियम के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले व्यक्ति थे तथा उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में ‘सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज’ की स्थापना की।
  • शासन दर्शन: गाडगिलबॉटम-अप गवर्नेंस’ के प्रबल समर्थक थे। वे प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी की वकालत करते थे, ताकि संरक्षण प्रयास पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान के अनुरूप हों।

पुरस्कार एवं सम्मान

  • गाडगिल को पद्म भूषण और पर्यावरण उपलब्धि के लिए ‘टायलर पुरस्कार’ सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए।
  • उनकी कृतियाँ, जैसे दिस फिसर्ड लैंड’ (This Fissured Land) और ‘इकोलोजी एंड इक्विटी’ (Ecology and Equity) पारिस्थितिकी के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।

पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) के बारे में 

  • स्थापना: पश्चिमी घाट की पारिस्थितिक संवेदनशीलता, जटिल भौगोलिक संरचना और जलवायु परिवर्तन व अनियंत्रित विकास से बढ़ते खतरों के कारण मार्च 2010 में WGEEP की स्थापना की गई।
  • दायित्व: पैनल को क्षेत्र की पारिस्थितिकी का आकलन करने, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) की सिफारिश करने और सतत् संरक्षण एवं विकास तंत्र के संबंध में अनुशंसा प्रदान करने का कार्य सौंपा गया।
  • गाडगिल पैनल की सिफारिशें
    • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र: पूरे पश्चिमी घाट (1,29,037 वर्ग किमी.) को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की गई, जिससे क्षेत्र की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को स्वीकार किया गया।
    • त्रि-स्तरीय वर्गीकरण: क्षेत्र को पारिस्थितिक संवेदनशीलता के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया:-
      • ESZ 1: सर्वाधिक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र, जहाँ सख्त प्रतिबंध हों।
      • ESZ 2: मध्यम संवेदनशील क्षेत्र, जहाँ नियंत्रित विकास की अनुमति हो।
      • ESZ 3: कम संवेदनशील क्षेत्र, जहाँ अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रित विकास संभव हो।
  • विकास पर प्रतिबंध: सिफारिशों में आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों, खनन, नए हिल स्टेशनों और पश्चिमी घाट में नए आर्थिक क्षेत्रों के निर्माण पर प्रतिबंध शामिल थे।
  • पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण (WGEA): पैनल ने घाटों के संवेदनशील क्षेत्रों के प्रबंधन की देखरेख के लिए एक वैधानिक बहु-राज्य निकाय WGEA की स्थापना का प्रस्ताव रखा।

चुनौतियाँ और विवाद

  • गाडगिल रिपोर्ट को स्थानीय उद्योगों, राजनेताओं और कुछ समुदायों के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा, जिन्होंने कड़े प्रतिबंधों को विकास के लिए हानिकारक माना।
  • कस्तूरीरंगन समिति (2013): गाडगिल रिपोर्ट को अस्वीकार किए जाने के बाद, के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में कस्तूरीरंगन पैनल का गठन किया गया।
  • भिन्न सिफारिशें: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने 56,825 वर्ग किमी के छोटे ESA का प्रस्ताव रखा और कुछ गाँवों को ESAs में शामिल किया, जबकि गाडगिल रिपोर्ट ने पूरे क्षेत्र को शामिल करने की सिफारिश की थी।

जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र वह संरक्षित क्षेत्र होता है जिसे जैव विविधता संरक्षण, सतत् विकास को बढ़ावा देने और अनुसंधान के लिए नामित किया जाता है। ये क्षेत्र यूनेस्को केमैन एंड द बायोस्फियर प्रोग्रामका हिस्सा होते हैं।

नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के बारे में

  • अवस्थिति: यह पश्चिमी घाट की नीलगिरि पर्वतमाला में अवस्थित है और तमिलनाडु, केरल तथा कर्नाटक के कुछ हिस्सों में विस्तृत है।
    • कुल क्षेत्रफल: 5,520 वर्ग किमी. क्षेत्र, जो इसे भारत का सबसे बड़ा संरक्षित वन क्षेत्र बनाता है।
  • संरक्षित क्षेत्र: इसमें प्रसिद्ध अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान शामिल हैं-
    • मुदुमलाई वन्यजीव अभयारण्य
    • वायनाड वन्यजीव अभयारण्य
    • बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान
    • नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान
    • मुकुर्थी राष्ट्रीय उद्यान
    • साइलेंट वैली
  • मुख्य क्षेत्र
    • केरल और तमिलनाडु: मुख्यतः सदाबहार, अर्द्ध-सदाबहार, आर्द्र पर्णपाती, पर्वतीय शोला वन और घास के मैदान।
    • कर्नाटक: मुख्यतः शुष्क पर्णपाती वन, जिनमें कहीं-कहीं आर्द्र पर्णपाती, अर्द्ध-सदाबहार और झाड़ीदार वन पाए जाते हैं।
  • वनस्पति
    • 3500 से अधिक पुष्पीय पौधों की प्रजातियाँ, जिनमें से 1500 पश्चिमी घाट के लिए स्थानिक हैं।
    • प्रमुख स्थानिक पौधे: रोडोडेंड्रोन आर्बोरेटम (Rhododendron Arboretum) नीलगिरिकम, एक्टिनोडाफेन मालाबारिका (Actinodaphne Malabarica), गार्सिनिया मोरेला (Garcinia Morella) , मिशेलिया नीलगिरिका (Michelia Nilgirica), गार्सिनिया गुम्मी-गुट्टा (Garcinia Gummi-gutta) आदि।
  • जीव-जंतु: इस आरक्षित क्षेत्र में 100 से अधिक स्तनधारी प्रजातियाँ, 550 पक्षी प्रजातियाँ, 30 सरीसृप एवं उभयचर प्रजातियाँ और 300 तितली प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
    • प्रमुख संकटग्रस्त प्रजातियाँ: बाघ (Panthera Tigris), हाथी (Elephas Maximus), गौर (Bos Gaurus), लायन-टेल मकाक (Macaca Silenus), नीलगिरि तहर, सांभर, जंगली सूअर और बार्किंग डियर (Muntiacus Muntjak)।
  • सांस्कृतिक विरासत: नीलगिरि’ नाम का अर्थ नीला पर्वत’ है, जो पर्वतों को ढकने वाले नीले रंग के फूलों के कारण पड़ा।
    • यह क्षेत्र टोडा, कोटा, इरुला, कुरुम्बा, पनिया, अडियान, एडनादन चेट्टी, चोलानायकेन, अल्लार, मलायन आदि कई आदिवासी समुदायों का क्षेत्र है, जिनकी विशिष्ट परंपराएँ और प्रकृति संरक्षण से जुड़ी जीवन पद्धतियाँ हैं।
  • महत्त्व: यूनेस्को के मैन एंड द बायोस्फियर प्रोग्राम ‘ के तहत नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र को जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया, जो इसके वैश्विक पारिस्थितिक महत्त्व को दर्शाता है।

नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र में गाडगिल की विरासत

  • माधव गाडगिल का कार्य, विशेष रूप से गाडगिल रिपोर्ट के माध्यम से, नीलगिरि जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के संरक्ष्ण में मुख्य भूमिका निभाता है।
  • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र की उनकी सिफारिशों ने नीलगिरि की जैव विविधता के संरक्षण में मदद की, साथ ही स्थानीय समुदायों को संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सशक्त किया।
  • पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) का दर्जा: पूरे पश्चिमी घाट, जिसमें नीलगिरि भी शामिल हैं, को ESA घोषित करने के गाडगिल के प्रस्ताव ने इस क्षेत्र को बड़े पैमाने पर अनियंत्रित विकास से सुरक्षित रखने में योगदान दिया।

संदर्भ

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने औषधि और प्रसाधन सामग्री (अपराधों का संयोजन) नियम, 2025 के अंतर्गत अपराधों के संयोजन से संबंधित दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs) जारी की हैं।

  • इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य विशेषकर औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अंतर्गत होने वाले छोटे स्तर के उल्लंघनों के संबंध में औषधि कंपनियों के लिए नियामक ढाँचे को सरल बनाना है।

पृष्ठभूमि

  • अभी तक, औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम के अंतर्गत छोटे स्तर के उल्लंघनों पर भी आपराधिक अभियोजन की कार्यवाही की जाती थी।
  • जन विश्वास संशोधन अधिनियम (2023): जन विश्वास अधिनियम का उद्देश्य जीवनयापन और व्यापार करने में सुगमता बढ़ाने के लिए छोटे स्तर के अपराधों का अपराधमुक्तिकरण करना है। इसके तहत 1940 के अधिनियम की धारा 32B के दायरे का विस्तार किया गया, ताकि अपराधों के संयोजन के लिए अधिक अपराधों को शामिल किया जा सके, जैसे-उत्पादन और बिक्री से जुड़े उल्लंघन तथा अभिलेख संधारण से संबंधित मुद्दे।

अपराधों का संयोजन उस प्रक्रिया को संदर्भित करता है जिसमें कानून के अंतर्गत छोटे स्तर के उल्लंघनों को आपराधिक अभियोजन से गुजरने के स्थान पर मौद्रिक दंड का भुगतान करके निपटाया जा सकता है।

औषधि और प्रसाधन सामग्री (अपराधों का संयोजन) नियम, 2025 के प्रमुख प्रावधान

  • अपराधों के संयोजन की शुरुआत: नए नियम हितधारकों को छोटे स्तर के औषधि-संबंधी अपराधों का निपटान न्यायालय में उपस्थित हुए बिना करने की अनुमति देते हैं।
    • न्यायालय में उपस्थिति से छूट: इस परिवर्तन का उद्देश्य न्यायिक प्रणाली और औषधि कंपनियों दोनों पर भार कम करना है, जिससे मुकदमेबाजी कम हो और अनुपालन को बढ़ावा मिले।
    • योग्य उल्लंघनों का दायरा: ये दिशा-निर्देश 1940 के अधिनियम के अंतर्गत अभिलेख संधारण और प्रकटीकरण के उल्लंघनों से संबंधित अपराधों को शामिल करते हैं, ताकि छोटे स्तर के उल्लंघनों के लिए अनावश्यक आपराधिकरण को रोका जा सके।
    • संयोजन की शर्तें: औषधि कंपनियाँ छोटे स्तर के उल्लंघनों के लिए मौद्रिक दंड का भुगतान कर सकती हैं, लेकिन उन्हें अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु स्व-सुधारात्मक कदम भी उठाने होंगे।
  • संयोजन के लिए पात्रता
    • ये नियम औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अंतर्गत छोटे स्तर के उल्लंघनों पर लागू होते हैं।
    • आवेदन प्रक्रिया: हितधारक निर्धारित आवेदन पत्र को भौतिक रूप से तथा ईमेल के माध्यम से संयोजन प्राधिकरण को प्रस्तुत करके संयोजन के लिए आवेदन कर सकते हैं।
    • मौद्रिक दंड: नियमों में न तो दंड की राशि निर्दिष्ट की गई है और न ही उन अपराधों के प्रकार बताए गए हैं जो संयोजन के लिए योग्य होंगे।
  • जन विश्वास अधिनियम से संबंध
    • व्यापार करने में सुगमता: ये परिवर्तन जन विश्वास अधिनियम के अनुरूप हैं, जिसका उद्देश्य न्यायिक प्रणाली पर बोझ कम करने और व्यावसायिक संचालन को सुगम बनाने के लिए छोटे अपराधों का अपराधमुक्तिकरण करना है।
    • व्यावसायिक अनुपालन को बढ़ावा: छोटे स्तर के मुद्दों के त्वरित समाधान को सक्षम बनाकर, नए नियम नियामक प्रक्रियाओं को अधिक व्यवसाय-अनुकूल बनाने में योगदान करते हैं।
  • प्रतिरक्षा और प्रवर्तन से संबंधित शर्तें
    • प्रतिरक्षा को वापस लेना: यदि कोई कंपनी दंड का पालन करने में विफल रहती है या संयोजन प्रक्रिया के दौरान झूठे साक्ष्य अथवा तथ्यों को छिपाने का पता चलता है, तो अभियोजन से प्राप्त प्रतिरक्षा वापस ली जा सकती है।
    • अभियोजन की संभावना: यदि संयोजन प्राधिकरण किसी भी प्रकार के तथ्य-छिपाने की घटना या असत्य को अवलोकित करता है, तो कंपनी पर अभियोजन चलाया जा सकता है, जिससे संयोजन के लाभ समाप्त हो जाते हैं।

चिंताएँ

  • पे एंड पास’ योजना का जोखिम: आलोचकों का तर्क है कि यदि दंड बहुत कम हों या असंगत रूप से लागू किए जाएँ, तो यह व्यवस्था ‘पे एंड पास’ तंत्र का निर्माण कर सकती है, जिससे उल्लंघनों के प्रति निवारक प्रभाव कम हो जाएगा।
  • पारदर्शिता की कमी: CDSCO द्वारा संयोजन से जुड़े निर्णयों और मामलों के विवरण सार्वजनिक न किए जाने से जन-अविश्वास उत्पन्न होने की आशंका है।
    • यह प्रणाली कार्यवाहियों का लेखापरीक्षण योग्य रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराती, जिससे जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।
  • सार्वजनिक भागीदारी का अभाव: इस प्रक्रिया में उपभोक्ता समूहों या व्हिसलब्लोअर को प्रतिरक्षा दिए जाने से पहले अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता, जिससे पारदर्शिता और कम हो जाती है।
  • अपराधों की व्यापक परिभाषा: दिशानिर्देश कागजी त्रुटियों से लेकर अधिक गंभीर अनुपालन विफलताओं तक, व्यापक श्रेणी के अपराधों को शामिल करते हैं, जिससे गंभीर मुद्दों पर भी संयोजन लागू होने की संभावना बढ़ जाती है, जहाँ सख्त दंड की आवश्यकता होती है।

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO)

  • कार्य: CDSCO भारत की राष्ट्रीय नियामक संस्था है, जो प्रसाधन सामग्री, औषधियों और चिकित्सीय उपकरणों के विनियमन की देखरेख के लिए उत्तरदायी है।
  • स्थापना: यह केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के अधीन कार्य करता है।
  • नियामक ढाँचा: CDSCO औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अंतर्गत कार्य करता है।
  • मुख्यालय: नई दिल्ली में स्थित, तथा देशभर में इसके क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय कार्यालय हैं।
  • उद्देश्य: CDSCO भारत में औषधियों और चिकित्सीय उपकरणों की सुरक्षा, प्रभावकारिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करता है, जिससे जनस्वास्थ्य संरक्षण में योगदान मिलता है।
  • मुख्य दायित्व
    • औषधि सुरक्षा: पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ औषधियों और चिकित्सीय उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावकारिता सुनिश्चित करना।
    • औषधि अनुमोदन: नई औषधियों को स्वीकृति देना और भारत में किए जाने वाले नैदानिक परीक्षणों का विनियमन करना।
    • आयातित औषधियाँ: आयातित औषधियों के लिए मानक निर्धारित करना और उनकी गुणवत्ता की निगरानी करना।
    • विशेषज्ञ मार्गदर्शन: औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम के समान और प्रभावी प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्रदान करना।

संदर्भ

भारत-ईरान संबंध, जो 15 मार्च 1950 को एक मैत्री संधि के माध्यम से स्थापित हुए थे, वर्ष 2026 में अपने 75वें वर्ष में प्रवेश करेंगे।

  • जनवरी 2026 में ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के भारत दौरे के साथ वर्षभर चलने वाले वर्षगांठ समारोह की शुरुआत हुई।

भारत-ईरान संबंधों की पृष्ठभूमि

  • सभ्यता का आधार- वर्ष 1947 से पहले का समय: भारत-ईरान संबंध गहन सभ्यतागत संबंधों में निहित हैं, जिनकी पहचान साझा भारत-ईरानी विरासत, लगातार सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच संपर्कों से होती है, जो आधुनिक राष्ट्र-राज्यों से सदियों पहले से उपस्थित हैं।
    • इंडो-ईरानी विरासत: दोनों समाज स्वयं को आर्य सभ्यता से संबंधित मानते हैं। ऋग्वेद (भारत) और अवेस्ता (ईरान) के बीच समानताएँ साझा भाषाई और धार्मिक आधार को दर्शाती हैं।
    • भारत में फारसी सांस्कृतिक प्रभाव: लगभग 800 वर्षों तक, फारसी भारत में प्रशासन, अदालतों और संस्कृति की भाषा थी। इसनेसबक-ए-हिंदी’ जैसे साहित्य को आकार दिया और उर्दू, हिंदी और पंजाबी को प्रभावित किया।
    • वास्तुकला और कलात्मक आदान-प्रदान: मुगल काल के दौरान, फारसी और भारतीय शैलियाँ आपस में संयुक्त हो गईं, जो ताजमहल जैसे स्मारकों में देखी जा सकती हैं, जो सांस्कृतिक एकीकरण का प्रतीक है।
    • पारसी संबंध: पारसी (पारसी धर्म) समुदाय, जो फारस से भारत आया था, दोनों देशों के बीच एक सांस्कृतिक और सामाजिक समेकन का कार्य करता है।
  • औपचारिक राजनयिक चरण- 1950–1979: इस चरण में आधुनिक देशों के बीच संबंधों की शुरुआत हुई, जो शीत युद्ध की राजनीति से प्रभावित थे।
    • मैत्री संधि (1950): भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को एक मैत्री संधि के माध्यम से औपचारिक रूप से राजनयिक संबंध स्थापित किए।
    • शीत युद्ध के दौरान मतभेद: ईरान अमेरिका के नेतृत्व वाले सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO) में शामिल हो गया, जबकि भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई और सोवियत संघ के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे, जिससे राजनयिक अंतराल उत्पन्न हुआ।
      • सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (CENTO): यह एक शीत युद्ध संबंधी सुरक्षा गठबंधन जिसे वर्ष 1955 में (बगदाद समझौते के रूप में) पश्चिम और दक्षिण एशिया में सोवियत विस्तार को रोकने के लिए बनाया गया था।
        • इसमें तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और यू. के शामिल थे, और अमेरिका एक मुख्य समर्थक था। मजबूत सैन्य संरचना न होने के कारण, इराक के बाहर निकलने (1959) के बाद यह कमजोर हो गया और ईरान के अलग होने के बाद वर्ष 1979 में समाप्त हो गया।
    • पाकिस्तान एक कारक के रूप में: इस दौरान पाकिस्तान के साथ ईरान के करीबी रिश्तों की वजह से कभी-कभी भारत के साथ तनाव उत्पन्न हुआ।
    • शुरुआती आर्थिक सहयोग: राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की वर्ष 1974 की ईरान यात्रा से ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग शुरू करने में मदद मिली।
  • क्रांति के बाद का पुनर्स्थापन-:
    • 1979-2000 का दशक: ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति ने द्विपक्षीय संबंधों की प्रकृति को बदल दिया।
    • भारत द्वारा प्रारंभिक मान्यता: भारत उन पहले देशों में से था जिन्होंने नई ईरानी सरकार को मान्यता दी, जिससे संबंधों में निरंतरता बनाए रखने में मदद मिली।
    • अफगानिस्तान पर सहमति: 1990 के दशक में, दोनों देशों ने पाकिस्तान समर्थित तालिबान का विरोध किया और उत्तरी गठबंधन का समर्थन किया, जिससे रणनीतिक सहयोग में और अधिक घनिष्ठता आई।

रणनीतिक समझौते

  • तेहरान घोषणा (2001): प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित इस घोषणापत्र में संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के रूप में वर्णित किया गया था।
  • नई दिल्ली घोषणा (2003): ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी की गणतंत्र दिवस यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित इस घोषणापत्र में ऊर्जा, व्यापार और संपर्क क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार किया गया, जिसमें चाबहार बंदरगाह की प्रारंभिक परिकल्पना भी शामिल थी।

CPEC को संतुलित करने में चाबहार बंदरगाह की भूमिका

  • चाबहार बंदरगाह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का एक कारगर विकल्प है। CPEC भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण परियोजना है, जिसके माध्यम से पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच सुनिश्चित की जा सकती है।
  • इससे पाकिस्तान से होकर गुजरने वाले भूमि मार्गों पर भारत की निर्भरता कम होती है और एक विश्वसनीय एवं सुरक्षित व्यापार मार्ग उपलब्ध होता है।

  • समकालीन चरण – 21वीं सदी में रणनीतिक व्यावहारिकता: हाल के संबंध वैश्विक चुनौतियों के बावजूद व्यावहारिक सहयोग को दर्शाते हैं।
    • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का प्रबंधन: भारत ने तेल आयात, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और राजनयिक संतुलन के माध्यम से अपना जुड़ाव जारी रखा।
    • संपर्क और व्यापार: भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच वर्ष 2016 के त्रिपक्षीय समझौते ने पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए चाबहार बंदरगाह को मध्य एशिया और यूरेशिया के प्रवेश द्वार के रूप में विकसित किया।
    • बहुपक्षीय सहयोग: भारत ने अपनी एक्ट वेस्ट पॉलिसी के अनुरूप, वर्ष 2023-24 के दौरान शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) में ईरान के प्रवेश का समर्थन किया।

भारत–ईरान द्विपक्षीय संबंधों का महत्त्व

  • भूरणीय महत्त्व – भारत का यूरेशिया का प्रवेश द्वार: ईरान की अवस्थिति विशेषकर पाकिस्तान के रास्ते भूमि मार्ग की कमी के कारण भारत की महाद्वीपीय और संपर्क रणनीति के लिए केंद्रीय महत्त्व रखता है।
    • चाबहार बंदरगाह: मई 2024 में हस्ताक्षरित 10 वर्षीय संचालन समझौते के बाद चाबहार बंदरगाह चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के एक प्रभावी और कार्यात्मक विकल्प के रूप में उभर कर सामने आया है।
      • वर्ष 2026 तक यह अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए भारतीय निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है, जिससे क्षेत्र में भारत की उपस्थिति और प्रभाव सुदृढ़ हुए हैं।

    • अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC): ईरान 7,200 किलोमीटर लंबे बहु-माध्यमीय अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का प्रमुख केंद्र है, जो मुंबई (भारत) को मॉस्को (रूस) से जोड़ता है।
      • INSTC के माध्यम से भारत की यूरेशियाई बाजारों में प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता बढ़ती है। यह स्वेज नहर मार्ग की तुलना में माल परिवहन समय को लगभग 40% तक कम करता है तथा यूरोप और रूस के साथ भारत की संपर्क सुविधा को सुदृढ़ करता है।

    • अफगानिस्तान में रणनीतिक गहनता: ईरान के माध्यम से प्राप्त पहुँच भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करने, मानवीय सहायता पहुँचाने तथा उग्रवाद और अस्थिरता का मुकाबला करने के लिए अफगानिस्तान में रणनीतिक जुड़ाव बनाए रखने में सक्षम बनाती है।
  • ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता: संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिबंधों से विशेषकर संबंधों के 75वें वर्ष (2025–26) के दौरान उत्पन्न सीमाओं के बावजूद भारत–ईरान संबंधों ने दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में स्वयं को अनुकूलित किया है।
    • विविधीकृत व्यापार संरचना: भारत ईरान के शीर्ष पाँच व्यापारिक साझेदारों में उभर कर सामने आया है। भारत से ईरान को होने वाले निर्यात में बासमती चावल, चाय, चीनी और औषधियाँ शामिल हैं, जबकि आयात में रसायन, उर्वरक और सूखे मेवे प्रमुख हैं।
    • वैकल्पिक वित्तीय तंत्र: अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए दोनों देशों ने रुपया–रियाल व्यापार को सुदृढ़ किया है और स्थानीय भुगतान प्रणालियों की संभावनाओं का अन्वेषण किया है, जिनमें प्रस्तावित यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (UPI)–शेताब लिंक शामिल है। इससे प्रतिबंध-प्रतिरोधी व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
    • प्राकृतिक गैस की संभावनाएँ: ईरान के पास विश्व का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार है। भारत अपनी स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण रणनीति के तहत ईरान को महत्त्वपूर्ण मानता है, तथा फरजाद-बी गैस क्षेत्र में पुनः रुचि देखी जा रही है।
  • बहुपक्षीय सहयोग और ग्लोबल साउथ में नेतृत्व: भारत–ईरान सहभागिता पश्चिम-नेतृत्व वाली व्यवस्था से परे साझा बहुपक्षीय मंचों के माध्यम से विस्तारित हुई है।
    • ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO): भारत के समर्थन से ईरान ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का पूर्ण सदस्य बना। ये मंच दोनों देशों को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, ग्लोबल साउथ के हितों और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की वकालत करने का अवसर प्रदान करते हैं।
    • आतंकवाद-रोधी सहयोग: SCO की क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी संरचना (RATS) के माध्यम से भारत और ईरान इस्लामिक स्टेट–खुरासान प्रांत (ISIS-K) और अल-कायदा जैसे समूहों से उत्पन्न खतरों के विरुद्ध समन्वय करते हैं।
  • रणनीतिक स्वायत्तता और कूटनीतिक संतुलन: भारत–ईरान संबंधों का शायद सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू भारत की जटिल भू-राजनीति को संतुलित करने की क्षमता में निहित है
    • स्वतंत्र विदेश नीति: ईरान के साथ संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने का उत्सव, संयुक्त राज्य अमेरिका और इजराइल के साथ घनिष्ठ साझेदारियों के बावजूद, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और मुद्दा-आधारित कूटनीति के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
    • क्षेत्रीय स्थिरीकरण की भूमिका: भारत प्रायः ईरान और पश्चिमी शक्तियों के बीच सेतु की भूमिका निभाता है तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा का लगातार समर्थन करता है, जो भारत के ऊर्जा आयात के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामरिक मार्ग (चोकपॉइंट) के रूप में जाना जाता है।
      • साथ ही, भारत ईरान, इजराइल, सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखता है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना रणनीतिक सहयोग सुनिश्चित किया जा सके।

भारत–ईरान द्विपक्षीय संबंधों में चुनौतियाँ

  • भू-आर्थिक बाधाएँ: मुख्य चुनौती अब भी अमेरिका की “अधिकतम दबाव” नीति (2025) का बाह्य-क्षेत्रीय प्रभाव बना हुआ है।
    • अधिकतम दबाव” नीति से तात्पर्य अमेरिका की उस रणनीति से है, जिसे वर्ष 2025 में पुनः लागू किया गया, जिसके अंतर्गत ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने और उसकी नीतियों में बदलाव के लिए कड़े बाह्य-क्षेत्रीय प्रतिबंध लगाए गए।
      • बैंकिंग, ऊर्जा और व्यापार नेटवर्क को लक्षित करके यह नीति तृतीय देशों की भागीदारी को बाधित करती है, जिससे सीमित छूटों के बावजूद भारत–ईरान आर्थिक सहयोग सीमित हो जाता है।
    • ऊर्जा व्यापार में कमी: भारत के तेल आयात में ईरान की हिस्सेदारी वर्ष 2018–19 में 11% से घटकर लगभग शून्य रह गई है। इससे वह आर्थिक पारस्परिकता कमजोर हुई है, जो पहले इस संबंध की आधारशिला थी।
    • बैंकिंग और भुगतान संबंधी अवरोध: मजबूत रुपया–रियाल तंत्र के अभाव में भारतीय निर्यातकों (विशेषकर बासमती चावल और दवाइयों) को 6–8 महीनों तक भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी हतोत्साहित होती है।
    • चाबहार की अनिश्चितता: मई 2024 में हस्ताक्षरित 10 वर्षीय संचालन अनुबंध के बावजूद, चाबहार बंदरगाह अब भी अल्पकालिक प्रतिबंध छूटों (अप्रैल 2026 तक वैध) पर निर्भर है। इससे वैश्विक शिपिंग कंपनियों और बीमा संस्थाओं में प्रतिबंध शिथिलता” (Sanction Fatigue) की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
  • रणनीतिक दुविधा: भारत अपने रणनीतिक साझेदारों के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती में लगातार संलग्न है।
    • इज़राइल–ईरान तनाव (2025–26): बढ़ते तनाव भारत को इजराइल के साथ अपनी रक्षा-प्रौद्योगिकी साझेदारी और ईरान में अपने संपर्क तथा ऊर्जा हितों के बीच संतुलन बनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
    • होर्मुज जलडमरूमध्य की संवेदनशीलता: भारत के लगभग 80% कच्चे तेल का परिवहन इस समुद्री संकीर्ण मार्ग से होता है, इसलिए भारत की ऊर्जा सुरक्षा क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी है।
      • भारत का ऑपरेशन ‘संकल्प’, जो होर्मुज जलडमरूमध्य में तैनात है, महत्त्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा के लिए अहम है।
      • यह नौसैनिक उपस्थिति फारस की खाड़ी में स्थिरता सुनिश्चित करते हुए भारत की क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा नेतृत्व क्षमता को दर्शाती है।
    • नाभिकीय कूटनीति: जहाँ भारत ईरान की शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा को समर्थन देता है, वहीं यह वैश्विक गैर-विस्तारवाद के प्रति भी प्रतिबद्ध है, जो भारत–अमेरिका रणनीतिक साझेदारी बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • चीन कारक’: इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति भारत की विस्तारित पड़ोसी नीति” के लिए चुनौती बनती जा रही है।
    • रणनीतिक असमानता: चीन–ईरान 25 वर्षीय रणनीतिक समझौता (400 अरब डॉलर) ईरान को एक वित्तीय समर्थन प्रदान करता है, जिसे भारत, प्रतिबंधों से सीमित होकर, संतुलित नहीं कर सकता है।
    • ग्वादर बनाम चाबहार: ईरान द्वारा अपने बुनियादी ढांचे को चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जोड़ने की इच्छा, भारत के पाकिस्तान को दरकिनार करने वाले रणनीतिक लाभ को कमजोर कर सकती है।
  • कार्यान्वयन अंतराल: भारत की क्षेत्रीय विश्वसनीयता को प्रायः परियोजनाओं के धीमे क्रियान्वयन से परखा जाता है।
  • रेल परियोजना में अवरोध: ‘प्रतिबंध जोखिम’ के कारण भारत का चाबहार–जाहेदान रेलवे परियोजना से बाहर होना रणनीतिक जोखिम लेने में कमी को दर्शाता है।
    • प्रशासनिक शिथिलता: भारतीय एजेंसियों द्वारा निधियों के धीमे वितरण और उपकरणों की आपूर्ति में देरी के कारण समय-समय पर तनाव उत्पन्न होता रहा है, जिसके चलते ईरान को कभी-कभी चीन जैसे वैकल्पिक साझेदारों की तलाश करनी पड़ती है।
  • घरेलू अस्थिरता: ईरान की आंतरिक स्थिति एक प्रमुख संचालन संबंधी जोखिम के रूप में उभर रही है।
    • आर्थिक संकट: रियाल के पतन और 40% से अधिक मुद्रास्फीति के कारण व्यापक प्रदर्शन ईरान क्षेत्रीय परियोजनाओं के बजाय आंतरिक सुरक्षा की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है।
    • संचालन में व्यवधान: सुरक्षा संबंधी प्रतिबंधों और इंटरनेट बंद होने के कारण शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल पर कार्य भौतिक रूप से धीमा हो गया है, जिससे व्यापारिक व्यवस्था प्रभावित हुई है।

भारत और ईरान के बीच सहयोग के क्षेत्र

  • भारत और ईरान के बीच सहयोग के क्षेत्र
    • कच्चा तेल और गैस: ईरान ऐतिहासिक रूप से भारत के लिए एक प्रमुख कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। भारत दीर्घकालिक ऊर्जा साझेदारी की संभावनाओं का अन्वेषण जारी रखता है, जिसमें फरजाद-बी गैस क्षेत्र (21 ट्रिलियन घन फीट से अधिक भंडार) से जुड़े अवसर शामिल हैं। यह भारत की ऊर्जा विविधीकरण और स्वच्छ ईंधन संक्रमण रणनीति के अनुरूप है।
    • उर्वरक और खनिज: ईरान उर्वरक, पेट्रोकेमिकल्स, रसायन और खनिज प्रदान करता है, जो विशेष रूप से वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के बीच भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
    • पेट्रोकेमिकल्स में संयुक्त उद्यम: यूरिया और पेट्रोकेमिकल संयंत्रों में सहयोग ईरान की प्रचुर प्राकृतिक गैस का लाभ उठाता है, जिससे भारत को किफायती उर्वरक सुनिश्चित करने और आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है।
  • व्यापार और आर्थिक सहयोग
    • द्विपक्षीय व्यापार प्रोफाइल: भारत ईरान के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में बना हुआ है। भारत से ईरान को बासमती चावल, दवाइयाँ, चाय, चीनी और कृषि उत्पाद निर्यात किए जाते हैं, जबकि आवश्यक कच्चे माल का आयात किया जाता है।
    • गैर-तेल व्यापार की ओर प्रवृत्ति: हाल के वर्षों में गैर-तेल और आवश्यक वस्तुओं के व्यापार में वृद्धि देखी गई है, जो हाइड्रोकार्बन पर निर्भरता से धीरे-धीरे विविधीकरण को दर्शाती है।
    • वैकल्पिक भुगतान तंत्र: प्रतिबंध-प्रतिरोधी व्यापार सुनिश्चित करने के लिए दोनों पक्षों ने रुपया–रियाल तंत्र को मजबूत किया है और UPI–Shetab एकीकरण की संभावनाओं का अन्वेषण कर रहे हैं, जिससे डॉलर आधारित प्रणालियों पर निर्भरता कम होती है।
    • निजी क्षेत्र की भागीदारी: भारतीय निजी कंपनियाँ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, बुनियादी ढाँचे का विकास, दवाइयाँ, IT सेवाएँ और उपभोक्ता वस्तुओं में योगदान देती हैं, जिससे बाहरी प्रतिबंधों के बावजूद आर्थिक संबंध बनाए रखे जा रहे हैं।
  • संपर्क और रणनीतिक अवसंरचना
    • चाबहार बंदरगाह: सहयोग की आधारशिला के रूप में चाबहार भारत को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया तक सीधे पहुँच प्रदान करता है, जिससे पाकिस्तान को दरकिनार किया जा सकता है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) में इसके एकीकरण से भारतीय विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स निवेश को आकर्षित करने की संभावना है।
    • अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC): ईरान के माध्यम से पूर्वी मार्ग भारतीय बंदरगाहों को रूस और यूरोप से जोड़ता है, जिससे स्वेज मार्ग की तुलना में परिवहन समय लगभग 40% कम हो जाता है और भारत की महाद्वीपीय संपर्क रणनीति सुदृढ़ होती है।
    • रेल और सड़क संपर्क: चाबहार–जाहेदान रेलवे और संबंधित सड़क नेटवर्क जैसी परियोजनाएँ व्यापार दक्षता, क्षेत्रीय एकीकरण और आंतरिक क्षेत्र की पहुँच को बढ़ाती हैं।
    • त्रिपक्षीय और वैकल्पिक गलियारे: भारत–ईरान–आर्मेनिया गलियारा जैसी पहलें काला सागर के माध्यम से यूरोप तक पहुँच की संभावना तलाशती हैं, जिससे भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को दरकिनार किया जा सके।
  • रणनीतिक और रक्षा सहयोग
    • समुद्री सुरक्षा: होर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी में सहयोग महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों, ऊर्जा प्रवाह और भारतीय प्रवासी समुदाय के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
    • आतंकवाद विरोधी और क्षेत्रीय स्थिरता: दोनों देश आतंकवाद, उग्रवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता, विशेषकर अफगानिस्तान से उत्पन्न खतरों को लेकर समान चिंताओं को साझा करते हैं।
    • अफगानिस्तान समन्वय: भारत और ईरान अफगानिस्तान को स्थिर बनाने, इसे आतंकवाद का सुरक्षित ठिकाना बनने से रोकने और चाबहार–मिलक–जरांज गलियारे के माध्यम से मानवीय सहायता पहुँचाने के लिए मिलकर कार्य करते हैं।
    • रणनीतिक संवाद: नियमित उच्चस्तरीय परामर्श पश्चिम एशियाई सुरक्षा संरचना और क्षेत्रीय संतुलन पर सहमति को मजबूत करता है।
  • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शिक्षा सहयोग
    • क्षमता निर्माण: सहयोग फार्मास्यूटिकल्स, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान तक फैला हुआ है, जो ज्ञान हस्तांतरण और नवाचार को सशक्त बनाता है।
    • प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष सहयोग: सैटेलाइट लॉन्च, IT इन्फ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसी संभावित क्षेत्रों में सहयोग भारत की बढ़ती तकनीकी उपस्थिति के अनुरूप है।
    • शैक्षणिक आदान-प्रदान: छात्रवृत्तियाँ, संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएँ और विश्वविद्यालय साझेदारियाँ संस्थागत और जन-केंद्रित सहयोग को मजबूत करती हैं।
  • सांस्कृतिक और सभ्यात्मक कूटनीति
    • भाषाई और साहित्यिक संबंध: भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) के तहत फारसी को शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता मिलने से नए फारसी अध्ययन केंद्र स्थापित हुए हैं, जिससे ऐतिहासिक बौद्धिक संबंधों का पुनरुद्धार हुआ है।
    • पारसी और ज़ोरोस्त्रियन विरासत: साझा जोरोस्त्रियन मूल पर आधारित सहभागिता सभ्यात्मक कूटनीति को मजबूत करती है और विरासत पर्यटन तथा अनुसंधान को बढ़ावा देती है।
    • नागरिक आदान-प्रदान: परस्पर वीजा सुविधा, सांस्कृतिक उत्सव और शैक्षणिक सहयोग जैसी पहलें सामाजिक संबंधों को गहरा करती हैं।
    • कूटनीतिक संबंधों का 75वाँ वार्षिक समारोह (2026): यह अवसर सॉफ्ट पॉवर कूटनीति, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और ऐतिहासिक निरंतरता पर जोर देता है।
  • मानवीय और शैक्षणिक सहयोग
    • मानवीय सहायता: प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकटों के दौरान भारत ईरान का समर्थन करता है, जिससे विश्वास और सद्भावना मजबूत होती है।
    • शिक्षा समर्थन: भारतीय संस्थानों में ईरानी छात्रों के लिए छात्रवृत्तियाँ और सुविधाएँ प्रदान करना दीर्घकालिक जन-केंद्रित संबंधों को सुदृढ़ करता है।
  • बहुपक्षीय और वैश्विक सहभागिता
    • ब्रिक्स और SCO सहयोग: भारत ने ईरान के ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने का समर्थन किया, जिससे ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं, बहुध्रुवीयता और डॉलर-मुक्तिकरण पर समन्वय बढ़ा।
    • क्षेत्रीय और वैश्विक मंच: दोनों देश ऐसे मंचों पर सक्रिय हैं जो ऊर्जा सुरक्षा, संपर्क, क्षेत्रीय शांति और आर्थिक स्थिरता से संबंधित मुद्दों को संबोधित करते हैं।
    • वैश्विक शासन सुधार: भारत और ईरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की वकालत करते हैं, जो विकासशील देशों के साझा हितों को दर्शाता है।

आगे की राह 

  • प्रतिबंध-प्रतिरोधी व्यापार तंत्र को लागू करना
    • वित्तीय अवसंरचना को सुदृढ़ बनाना: ‘UPI–शेताब’ लिंक जैसी नवोन्मेषी भुगतान व्यवस्थाओं को संस्थागत बनाना और विस्तारित करना तथा आवश्यक गैर-प्रतिबंधित वस्तुओं (जैसे दवाइयाँ, कृषि इनपुट) के लिए एक मजबूत रुपया–रियाल निपटान चैनल विकसित करना, जिससे अमेरिकी डॉलर प्रणाली पर निर्भरता कम हो।
    • अमेरिका से अप्रभावित संस्था: एक समर्पित व्यापार वाहन या वित्तीय इकाई की रूपरेखा तैयार करना, जो अमेरिकी न्याय क्षेत्र से अलग हो, द्विपक्षीय लेन-देन को सुगम बनाए और द्वितीयक प्रतिबंधों के जोखिम को कम करे।
  • रणनीतिक संपर्क को क्रियान्वित करना
    • प्राथमिक गलियारों को पूर्ण करना: चाबहार–जाहेदान रेलवे लिंक को शीघ्र पूरा करना और इसे ईरान की राष्ट्रीय रेलवे ग्रिड तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से पूरी तरह एकीकृत करना, जिससे भारत की मध्य एशिया और उससे आगे की स्थलीय पहुँच सुदृढ़ हो।
    • वैकल्पिक मार्गों का विस्तार: आर्मेनिया और अन्य साझेदारों के साथ सहयोग सहित बहुपक्षीय स्थलीय–समुद्री संपर्क को मजबूत करना, ताकि समुद्री मार्गों के बावजूद यूरोप और मध्य एशिया तक पहुँच के लिए विकल्पीय मार्ग उपलब्ध हों।
  • कूटनीतिक और क्षेत्रीय संतुलन
    • सक्रिय कूटनीति: क्षेत्रीय तनावों के समय उच्च स्तरीय संवाद और सूक्ष्म कूटनीति को बनाए रखना ताकि दीर्घकालिक अवसंरचना प्रतिबद्धताओं की रक्षा की जा सके, साथ ही बदलती सुरक्षा परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील रहना।
    • बहुपक्षीय वकालत: BRICS+ और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत की अभिव्यक्ति का उपयोग करके यह संदेश देना कि संपर्क एक साझा वैश्विक लाभ है, जो एकतरफा आर्थिक दबाव से सुरक्षित है।
  • साझेदारी के दायरे का विस्तार करना
    • व्यापार विविधीकरण: परंपरागत वस्तु व्यापार से आगे बढ़कर फार्मास्यूटिकल अनुसंधान और विकास, बायोटेक्नोलॉजी और उच्च-मूल्य कृषि उत्पाद जैसे उन्नत क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करना, जिससे स्थिर और मजबूत निर्यात धारा उत्पन्न हो।
    • संयुक्त अनुसंधान और नवाचार: सहकारी विज्ञान और प्रौद्योगिकी परियोजनाएँ, ज्ञान आदान-प्रदान मंच और उद्योग–विश्वविद्यालय कार्यक्रम शुरू करना, ताकि दीर्घकालिक आर्थिक परस्पर पूरकता विकसित की जा सके।
  • सांस्कृतिक सेतु और सॉफ्ट पावर
    • सभ्यात्मक सहभागिता: फारसी भाषा की पहलें, विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग और साझा डिजिटल अभिलेखागार परियोजनाओं का विस्तार करके सांस्कृतिक कूटनीति को लागू करना, जिससे दीर्घकालिक सामाजिक संबंध मजबूत हों।
    • जन–जन संबंधों को सुदृढ़ करना: सरल वीजा नियम या परस्पर यात्रा सुविधाओं की व्यवस्था करके दोनों समाजों के बीच शिक्षा, अनुसंधान और पर्यटन में सहभागिता बढ़ाना।
  • भू-राजनीतिक संतुलन और जोखिम प्रबंधन
    • प्रतिबंधों का प्रबंधन: रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अमेरिका और अन्य शक्तियों के साथ मुक्त चैनल बनाए रखना ताकि चाबहार जैसी महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले स्थायी व्यवस्थाओं पर वार्ता की जा सके।
    • चीन और क्षेत्रीय संतुलन: बहुपक्षीय मंचों का उपयोग बाहरी प्रभावों को संतुलित करने के लिए करना, ताकि भारत के संपर्क और ऊर्जा हित भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताओं से प्रभावित न हों।
    • संचालन की निरंतरता की सुरक्षा: ईरान में सामाजिक और राजनीतिक घटनाक्रम की सक्रिय निगरानी करके भारत के हितों, कर्मियों और निवेशों को आंतरिक अस्थिरता के दौरान सुरक्षित रखना।
  • रणनीतिक सहयोग को संस्थागत बनाना
    • रणनीतिक परिषद: एक संयुक्त द्विपक्षीय रणनीतिक परिषद स्थापित करना, जिसका कार्य वार्षिक समीक्षा, प्रदर्शन निगरानी और व्यापार, परिवहन, ऊर्जा और सुरक्षा क्षेत्रों में समन्वित कार्रवाई करना हो।
    • नियमित उच्चस्तरीय सहभागिता: मंत्रिस्तरीय परामर्श और कार्य समूह बैठकें आयोजित करने के लिए तंत्र को संस्थागत बनाना, ताकि संचलन बनाए रखा जा सके और संचालन संबंधी अड़चनों का समाधान किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत–ईरान संबंध, जो सभ्यात्मक संबंधों में निहित हैं और रणनीतिक संपर्क, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय सहभागिता के माध्यम से मजबूत हुए हैं, प्रतिबंधों, क्षेत्रीय तनावों और आंतरिक अस्थिरता के बावजूद महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं। इन संबंधों के लिए व्यावहारिक कूटनीति और दीर्घकालिक रणनीतिक योजना की आवश्यकता है।

PWOnlyIAS विशेष

ईरान के बारे में 

  • स्थान: ईरान एक पश्चिम एशियाई देश है, जो उत्तरी और पूर्वी गोलार्द्ध में स्थित है।
    • यह मध्य एशिया, काकेशस और मध्य पूर्व के संगम पर स्थित है, और इसके दक्षिण में फारस की खाड़ी तथा उत्तर में कैस्पियन सागर के साथ व्यापक तटरेखा है।

  • राजधानी: तेहरान
  • सीमाएँ

सीमाएँ

  • तुर्की – पश्चिम
  • इराक – पश्चिम
  • आर्मेनिया – उत्तर-पश्चिम
  • अजरबैजान – उत्तर-पश्चिम
  • तुर्कमेनिस्तान – उत्तर-पूर्व
  • अफगानिस्तान – पूर्व
  • पाकिस्तान – दक्षिण-पूर्व
  • भौतिक भूगोल
    • जाग्रोस पर्वत श्रृंखला देश के पश्चिमी किनारे पर स्थित एक प्रमुख पर्वत श्रृंखला है।
    • माउंट दमावंद ईरान की सबसे ऊँची चोटी और एशिया का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी है।
    • युफ्रेट्स नदी पश्चिमी क्षेत्रों से होकर बहती है, जबकि कारून नदी ईरान की सबसे लंबी नदी है।
    • ईरान में बड़े रेगिस्तानी क्षेत्र भी हैं, जिनमें दश्त-ए कवीर (ग्रेट साल्ट डेजर्ट) और दश्त-ए लूट (लूट रेगिस्तान) शामिल हैं, जो देश के मध्य और पूर्वी हिस्सों में विस्तृत हुए हैं।
  • महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ
    • ईरान की रणनीतिक स्थिति इसे वैश्विक ऊर्जा व्यापार के केंद्र में रखती है, और यह महत्त्वपूर्ण समुद्री संकीर्ण मार्ग जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण रखता है, जिससे लगभग एक-तिहाई वैश्विक तेल शिपमेंट्स गुजरती हैं।
    • ऐतिहासिक विरासत में समृद्ध ईरान फारसी साम्राज्य में एक केंद्रीय भूमिका निभा चुका है और वर्तमान में भी क्षेत्र पर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से प्रभाव डालता है।
    • ईरान क्षेत्रीय भू-राजनीति में भी एक केंद्रीय भूमिका निभाता है, विशेष रूप से ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य प्रभाव और क्षेत्रीय स्थिरता से संबंधित मुद्दों में।

अभ्यास प्रश्न  वर्ष 1950 की मैत्री संधि के बाद से ईरान के साथ भारत की राजनयिक भागीदारी एक जटिल भू-राजनीतिक वातावरण में रणनीतिक स्वायत्तता की उसकी खोज को दर्शाती है। चर्चा कीजिए।

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