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Jan 13 2026

ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक

संयुक्त राज्य अमेरिका ने ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक के तहत सीरिया में व्यापक हवाई हमले किए हैं, जिनका उद्देश्य इस्लामिक स्टेट (ISIS) के कई ठिकानों को लक्ष्य बनाना था।

ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक

  • पृष्ठभूमि: ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक अमेरिका के नेतृत्व में एक सैन्य अभियान है, जिसे सीरिया के पाल्माइरा में ISIS से जुड़े हमले के बाद शुरू किया गया था, जिसमें दो अमेरिकी सैनिकों की मृत्यु हो गई थी।
  • नाम: इस ऑपरेशन का नाम शहीद सैनिकों को सम्मान देने के लिए, अमेरिका के आयोवा राज्य के निकनेम, हॉकआई स्टेट” के नाम पर रखा गया है।

हाल के अमेरिकी सैन्य अभियान

  • ऑपरेशन सदर्न स्पीयर
    • अवस्थिति : लाल सागर-अदन की खाड़ी क्षेत्र।
    • पक्ष: संयुक्त राज्य अमेरिका, यू.के., सहयोगी नौसैनिक बल बनाम हूती विद्रोही (यमन)।
    • उद्देश्य: सटीक हवाई और नौसैनिक हमले करके हूती हमलों को रोकना, वाणिज्यिक नौवहन की सुरक्षा सुनिश्चित करना और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता बनाए रखना।
  • ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व
    • स्थान: सीरिया और इराक सीमा क्षेत्र
    • पक्ष: संयुक्त राज्य अमेरिका और संयुक्त सेना बनाम ISIS।
    • उद्देश्य: ISIS के नेतृत्व, लॉजिस्टिक्स (आपूर्ति तंत्र) और स्लीपर सेल्स को ध्वस्त करने के लिए लक्षित हवाई हमले तथा विशेष बलों द्वारा कार्रवाइयाँ करना।
  • ऑपरेशन मिडनाइट हैमर/हंटर 
    • अवस्थिति : सीरिया
    • पक्ष: संयुक्त राज्य अमेरिका के विशेष अभियान आधारित बल बनाम ISIS नेतृत्व
    • उद्देश्य: रात्रिकालीन सटीक छापेमारी के माध्यम से ISIS के सक्रिय आतंकियों को समाप्त करना और उनके कमांड ढाँचे को बाधित करना।
  • ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्जियन
    • स्थान : लाल सागर 
    • पक्ष : संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाला बहुराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन।
    • उद्देश्य: मिसाइल और ड्रोन खतरों से अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा करना।

वाइमर त्रिकोण

भारत ने पहली बार वाइमर त्रिकोण फॉर्मेट में भाग लिया, जो यूरोप के साथ इसके संबंधों को मजबूत करने की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण निर्णय हो सकता है।

संबंधित तथ्य

  • विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पेरिस में फ्राँस, जर्मनी और पोलैंड के विदेश मंत्रियों के साथ एक विस्तारित बैठक में भाग लिया।

वाइमर त्रिकोण के बारे में

  • वाइमर त्रिकोण एक त्रिपक्षीय राजनीतिक और कूटनीतिक क्षेत्रीय गठबंधन है, जो जर्मनी, फ्राँस और पोलैंड के बीच समन्वय और सहयोग के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है।
  • स्थापना: इसे 28 अगस्त, 1991 को जर्मनी के वाइमर में तीनों देशों द्वारा एक संयुक्त घोषणा के माध्यम से स्थापित किया गया था।
  • प्राथमिक लक्ष्य: इसे साम्यवाद के पतन के बाद पोलैंड (और बाद में अन्य मध्य यूरोपीय देशों) को NATO और यूरोपीय संघ (EU) में एकीकरण में समर्थन देने के लिए स्थापित किया गया।
  • इसका उद्देश्य ऐतिहासिक विभाजनों को दूर करना था।
  • हालिया पुनरुद्धार और महत्त्व (वर्ष 2022 के बाद): 2010 के दशक में यह काफी हद तक निष्क्रिय था (खासकर पोलैंड की पिछली सरकार के तहत), लेकिन वर्ष 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमले के बाद इसे पुनः शुरू किया गया।
    • यह यूक्रेन को समर्थन देने, रूस पर प्रतिबंध लगाने, यूरोपीय रक्षा को सशक्त बनाने, और NATO के पूर्वी भाग पर निवारक उपाय सुनिश्चित करने के लिए एक प्रमुख समन्वय मंच बन गया है।

कैटास्ट्रॉफ बॉण्ड्स

केरल ने केंद्र सरकार से प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान के खिलाफ वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के एक उपाय  के रूप में कैटास्ट्रॉफ बॉण्ड्स (CAT Bonds) जारी करने का आग्रह किया है।

संबंधित तथ्य 

  • हाल के वर्षों में केरल को बार-बार और गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा है, खासकर मानसून के दौरान, जिसमें भयानक बाढ़ और भूस्खलन शामिल हैं।

कैटास्ट्रॉफ बॉण्ड्स क्या है (CAT Bonds)?

  • कैट बॉण्ड्स ऐसी बीमा-संबद्ध प्रतिभूतियाँ हैं, जो आपदा से जुड़े वित्तीय जोखिम को जारीकर्ता (जैसे- सरकार या बीमा कंपनी) से पूँजी बाजार में निवेशकों तक स्थानांतरित करती हैं।
  • कैट बॉण्ड्स की विशेषताएँ 
    • निवेशक बॉण्ड्स खरीदते हैं और धन (मूलधन) प्रदान करते हैं।
    • यदि बॉण्ड की अवधि के दौरान कोई बड़ी आपदा घटित नहीं होती, तो निवेशकों को उच्च ब्याज सहित उनका मूलधन वापस कर दिया जाता है।
    • यदि बॉण्ड की अवधि में कोई आपदा घटती है, जो पूर्वनिर्धारित मानदंडों (जैसे- हानि सीमा) पर आधारित होती है, तो मूलधन का कुछ या पूरा हिस्सा राहत कार्यों के लिए उपयोग किया जाता है और निवेशकों को हानि वहन करनी होती हैं।
  • महत्व: यह नवोन्मेषी वित्तीय संरचना तेज और संपार्श्विक  (Collateralized) वित्त उपलब्ध कराती है, जिससे सरकार के बजट पर पूर्णता निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होती।
    • वैश्विक उदाहरण: मैक्सिको और फिलीपींस जैसे देश पहले ही भूकंप, तूफान और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए CAT बॉण्ड्स का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं।

कैटास्ट्रॉफ बॉण्ड्स के मुख्य लाभ

  • बिना तत्काल बजटीय दबाव के, आपदा के बाद धन तक तुरंत पहुँच संभव बनाता है।
  • जोखिम को वैश्विक पूँजी बाजार में स्थानांतरित करता है, जिससे राज्य/केंद्र सरकार पर दबाव कम होता है।
  • पारंपरिक बीमा की तरह महँगा या सीमित नहीं है तथा कई वर्षों तक संरक्षण प्रदान करता है।

पूँजी बाजार में प्रचलित अन्य प्रकार के बॉण्ड्स 

  • ग्रीन  बॉण्ड्स: ऐसे ऋण साधन हैं, जो नवीनीकृत ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और प्रदूषण नियंत्रण जैसी जलवायु-अनुकूल परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
    • भारत में, SBI, IREDA जैसी संस्थाओं द्वारा जारी किए जाते हैं; भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं (NDCs) के अनुरूप होते हैं।
  • ब्लू बॉण्ड्स: ऐसे बॉण्ड्स जो मत्स्यपालन, समुद्री संरक्षण और अपशिष्ट जल प्रबंधन जैसी सतत् महासागर और जल-संबंधित परियोजनाओं के समर्थन के लिए जारी किए जाते हैं।
    • ब्लू इकोनॉमी तथा तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को बढ़ावा देना।
  • मसाला बॉण्ड्स: भारतीय संस्थाओं द्वारा विदेशों में जारी किए गए रुपये-निर्धारित बॉण्ड्स, जिनका उद्देश्य विदेशी पूँजी जुटाना है।
    • भारतीय जारीकर्ताओं के लिए मुद्रा विनिमय जोखिम को कम करना; पहली बार वर्ष 2014 में जारी किए गए।
  • एग्री बॉण्ड्स: कृषि अवसंरचना, सिंचाई, भंडारण और ग्रामीण विकास को वित्तपोषित करने के लिए जारी किए जाते हैं।
    • कृषि क्षेत्र में कृषि ऋण प्रवाह और दीर्घकालिक निवेश को समर्थन देना।
  • म्यूनिसिपल बॉण्ड्स: जल आपूर्ति और परिवहन जैसी शहरी अवसंरचना को वित्तपोषित करने के लिए शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) द्वारा जारी किए जाते हैं।
  • सस्टेनेबिलिटी/सततता बॉण्ड्स: ग्रीन और सोशल बॉण्ड्स के उद्देश्यों को संयोजित करते हैं (पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक कल्याण)।
    • स्वच्छ ऊर्जा और किफायती आवास जैसी परियोजनाओं के लिए उपयोग किया जाता है।
  • सोशल बॉण्ड्स: स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और रोजगार सृजन जैसी सामाजिक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए जारी किए जाते हैं।
    • COVID-19 महामारी से उबरने के लिए वित्तपोषण के दौरान इसका महत्त्व बढ़ गया।
  • अवसंरचना बॉण्ड्स: दीर्घ अवधि के लिए जारी बॉण्ड्स, जो सड़कों, रेलवे, बिजली और बंदरगाहों को वित्तपोषित करने के लिए होते हैं।
    • स्थिर रिटर्न प्रदान करते हैं और भारत की राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) का समर्थन करते हैं।

परम शक्ति सुपरकंप्यूटिंग सुविधा

भारत ने IIT मद्रास में अपना पहला पूर्णता स्वदेशी रूप से विकसित सुपरकंप्यूटिंग सिस्टम, जिसका नाम परम शक्ति’ है, का उद्घाटन किया।

परम शक्ति के बारे में

  • परम शक्ति एक 3.1-पेटाफ्लॉप सुपरकंप्यूटर है, अर्थात् यह प्रति सेकंड 3.1 क्वाड्रिलियन से अधिक गणनाएँ करने में सक्षम है।
  • विकसितकर्ता: सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) द्वारा विकसित।
  • मुख्य घटक: इसे C-DAC की स्वदेशी रूप से विकसित रूद्र सर्वर शृंखला का उपयोग करके बनाया गया है तथा यह ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर स्टैक (जिसमें AlmaLinux शामिल है) पर चलता है।
  • वित्तपोषण: यह राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM) का हिस्सा है।
  • उद्देश्य: इस सुपरकंप्यूटर को भारत के शोध समुदाय को सशक्त बनाने के लिए डिजाइन किया गया है, ताकि वे जटिल और बड़े पैमाने के सिमुलेशन तथा गणनाएँ कर सकें।
  • मुख्य शोध क्षेत्र: एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, सामग्री विज्ञान, जलवायु मॉडलिंग, दवा खोज और उन्नत विनिर्माण।

राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM)

  • भारत सरकार की एक प्रमुख पहल, जिसे देश की उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग (HPC) क्षमताओं को मजबूत करने के लिए शुरू किया गया।
  • उद्देश्य: एक मजबूत सुपरकंप्यूटिंग इकोसिस्टम बनाने, शोध, नवाचार और उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग (HPC) प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए।
  • प्रारंभ: वर्ष 2015 में लॉन्च किया गया।
  • प्रमुख मंत्रालय: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा संयुक्त रूप से।
  • कार्यान्वयनकर्ता: उन्नत संगणना विकास केंद्र (C-DAC), पुणे और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बंगलूरू।

NSM के तहत विकसित स्वदेशी प्रौद्योगिकियाँ और प्रमुख प्रणाली

  • परम शृंखला के सुपरकंप्यूटर (जैसे, परम शिवाय – पहला देशी रूप से संयोजित, भारतीय विज्ञान संस्थान परम प्रवेग, परम रुद्र शृंखला)।
    • परम 8000 (PARAM 8000) भारत में विकसित पहला सुपरकंप्यूटर था, जिसे उन्नत संगणना विकास केंद्र (C-DAC) द्वारा निर्मित और वर्ष 1991 में जारी किया।
    • PARAM का अर्थ पैरलेल मशीन’ (PARAllel Machine) है और संस्कृत में इसका अर्थ सर्वोच्च’ भी होता है।
  • रुद्र सर्वर: देश में डिजाइन किए गए उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग (HPC) सर्वर, जो वैश्विक मानकों के अनुरूप निर्मित किए गए हैं।
  • त्रिनेत्र: स्वदेशी हाई-स्पीड इंटरकनेक्ट नेटवर्क (जिसे 100–200 Gbps तक चरणबद्ध रूप से तैनात किया गया है)।
  • परम शावक: शैक्षणिक संस्थानों के लिए सुपरकंप्यूटिंग-इन-ए-बॉक्स समाधान।
  • फ्लैगशिप प्रणालियाँ, जैसे- AIRAWAT (कृत्रिम बुद्धिमत्ता-केंद्रित, वैश्विक स्तर पर रैंक प्राप्त)।

संदर्भ

प्रधानमंत्री ने स्वामी विवेकानंद की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

राष्ट्रीय युवा दिवस (12 जनवरी) के बारे में

  • राष्ट्रीय युवा दिवस प्रतिवर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
  • पहली बार वर्ष 1985 में मनाया गया।

  • उद्देश्य: युवाओं को प्रेरित करना, शिक्षा को बढ़ावा देना, चरित्र निर्माण और सामुदायिक सेवा को प्रोत्साहित करना।
  • नोडल मंत्रालय: युवा कार्य और खेल मंत्रालय।
  • दृष्टिकोण: युवाओं को विकास के निष्क्रिय लाभार्थी नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार के रूप में स्थापित करने हेतु अंतर-मंत्रालयी सहयोग।
  • यह अवसर भारत की युवा-केंद्रित नीतियों को रेखांकित करता है, यह मानते हुए कि भारत की 65 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है, जो युवाओं को विकसित भारत@2047 के आधार के रूप में स्थापित करता है।

स्वामी विवेकानंद (1863–1902) के बारे में

  • जन्म एवं प्रारंभिक जीवन: स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में एक बंगाली कायस्थ परिवार में नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में हुआ।
  • गुरु: श्री रामकृष्ण परमहंस।
  • ग्रहण किया गया नाम: वर्ष 1893 में खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह के अनुरोध पर ‘विवेकानंद’ नाम अपनाया।
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस: उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा।
  • निधन: स्वामी विवेकानंद का निधन 4 जुलाई, 1902 को 39 वर्ष की आयु में बेलूर मठ, पश्चिम बंगाल में हुआ।

धर्म और आध्यात्म की दृष्टि

  • विचारों का समन्वय: श्री रामकृष्ण की आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि को अद्वैत वेदांत के साथ संयोजित किया।
  • चेतना का विज्ञान के रूप में धर्म: धर्म को सत्य की सार्वभौमिक, अनुभवजन्य अनुभूति के रूप में देखा।
  • सार्वभौमिक धर्म: अंधविश्वास, मतांधता, असहिष्णुता और पुरोहितवाद से मुक्त।
  • जीवन का लक्ष्य: परम स्वतंत्रता, ज्ञान और आनंद की प्राप्ति।
  • आत्म-साक्षात्कार का मार्ग: आत्मा की दिव्यता को साकार करने हेतु निष्काम कर्म, भक्ति और मानसिक अनुशासन पर बल।

नैतिक और सामाजिक दर्शन

  • नैतिक सिद्धांत: स्वामी विवेकानंद ने आत्मा की अंतर्निहित पवित्रता और एकता पर आधारित नैतिकता का प्रस्ताव रखा।
  • नैतिक आधार: उनका विश्वास था कि नैतिकता इस बोध से उत्पन्न होती है कि सभी प्राणी ब्रह्म स्वरुप में एक हैं।
  • सेवा-भाव: प्रेम, करुणा और मानव-सेवा उनके नैतिक दृष्टिकोण के केंद्र में थे।
  • शिक्षा: उन्होंने आर्थिक उन्नति के लिए लौकिक शिक्षा और नैतिक शक्ति हेतु आध्यात्मिक शिक्षा के महत्त्व पर बल दिया।
  • अंत्योदय: उनका प्रतिपादन था कि वास्तविक विकास तभी संभव है, जब अंतिम और सबसे गरीब व्यक्ति का उत्थान हो।

प्रमुख योगदान और संस्थाएँ

  • शिकागो भाषण (1893): विश्व धर्म संसद में उनके भाषण ने सार्वभौमिक भाईचारा और सहिष्णुता पर जोर दिया।
  • रामकृष्ण मिशन: उन्होंने वर्ष 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिकता को सामाजिक सेवा के साथ जोड़ना था।
  • वेदांत सोसायटी: उन्होंने वर्ष 1894 में न्यूयॉर्क में वेदांत सोसायटी की स्थापना की, ताकि भारतीय दर्शन को विदेशों में प्रसारित किया जा सके।

संदर्भ 

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार से ‘लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम’ (POCSO) में “रोमियो–जूलियट क्लॉज” (Romeo–Juliet Clause) को शामिल करने पर विचार करने का आग्रह किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

  • यह निर्णय उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर अपील से उत्पन्न हुआ, जिसमें अंतरिम जमानत दी गई थी।
  • उच्च न्यायालय ने पीड़िता की आयु को लेकर स्कूल के रिकॉर्ड और उसकी स्वयं की आयु एवं घनिष्ठता/अंतरंगता (Intimacy) से संबंधित उसके बयानों में व्यापक असंगतियों पर विश्वास किया था।

POCSO के दुरुपयोग पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • विधिक उपाय के रूप में प्रयोग करना:  न्यायालय ने चेतावनी दी कि “कल्याणकारी उद्देश्य” से बनाया गया कानून अब बदला लेने के लिए उपयोग किया जा रहा है।
  • न्यायिक चेतावनी: न्यायालयों ने POCSO के दुरुपयोग और गलत अनुप्रयोग को लेकर बार-बार चिंता जताई है।
  • पारिवारिक विरोध: इस कानून का उपयोग प्राय: दुर्व्यवहार से बचाने के लिए नहीं अपितु ऐसे परिवारों द्वारा किया जाता है, जो उन रिश्तों को समाप्त करना चाहते हैं, जिनका वे विरोध करते हैं।
  • दो परस्पर विरोधी वास्तविकताएँ
    • घृणित यौन अपराधों से पीड़ित बालक भयभीत रहते हैं और गरीबी तथा सामाजिक अलगाव की स्थिति का सामना करते हैं।
    • साक्षरता, सामाजिक और आर्थिक पूँजी विशेषाधिकार प्राप्त परिवार कानून का दुरुपयोग करने में सक्षम होते हैं।

‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ क्या है?

  • उद्भव: सर्वप्रथम संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के कुछ हिस्सों में विकसित हुआ।
  • उद्देश्य: यह प्रावधान सहमति से होने वाली लैंगिक गतिविधियों को अपराध नहीं मानता है, बशर्ते सहमति की आयु कम न की जाए और दोनों किशोरों की आयु लगभग समान हो।
  • मुख्य उद्देश्य
    • बाल-संरक्षण कानून की सशक्तता को बनाए रखना, साथ ही उसे अत्यधिक अपराधीकरण के एक उपाय के रूप में विकृत होने से रोकना।
    • सहमति-आधारित और आयु संबंधी मामलों में दुष्कर्म के तहत आपराधिक अभियोजन को रोकना।

नोट: ‘रोमियो–जूलियट क्लॉज’ न तो सहमति की आयु को कम करता है और न ही सामान्यतः नाबालिगों के विरुद्ध यौन अपराधों को अपराधमुक्त करता है। यह केवल ‘क्लोज-इन-एज’ (Close-in-age) अपवाद प्रदान करता है।

सहमति की आयु

  • सहमति की आयु वह कानूनी रूप से निर्धारित आयु है, जिस पर कोई व्यक्ति यौन गतिविधियों के लिए वैध सहमति प्रदान कर सकता है।
  • भारत में यह आयु 18 वर्ष है, जैसा कि POCSO अधिनियम, 2012, भारतीय दंड संहिता (IPC) और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में निर्धारित है।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ और आँकड़े

  • प्रारंभिक यौन अनुभव: NFHS-4 के अनुसार, लगभग 39% भारतीय किशोरियों ने 18 वर्ष से पहले अपना पहला यौन अनुभव होने की सूचना दी, जो सामाजिक वास्तविकताओं और कानूनी सीमाओं के बीच अंतर को दर्शाता है।
  • POCSO मामलों की प्रकृति: एनफोल्ड (Enfold) और प्रोजेक्ट-39A (2016–2020) के अध्ययनों में पाया गया कि लगभग 25% POCSO मामले सहमति-आधारित किशोर संबंधों से जुड़े थे, न कि यौन शोषण या दोहन से।
  • मामलों के बदलते पैटर्न: POCSO के बढ़ते मामलों में अभिभावकों द्वारा किशोर रोमांटिक संबंधों के विरोध को प्रतिबिंबित किया गया है, जो अपराधों से निपटने के स्थान पर किशोर व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए आपराधिक कानून के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है।

वर्तमान कानूनी ढाँचा

  • POCSO अधिनियम, IPC की धारा 375, और BNS की धारा 63 के तहत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के साथ कोई भी प्रवेशात्मक यौन कृत्य कठोर दंड को आकर्षित करता है।
  • POCSO की धारा 6, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 9, तथा IPC/BNS के प्रावधान सहमति-आधारित मामलों में भी कठोर दंड का प्रावधान करते हैं।

बच्चों का यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 के बारे में

  • उद्देश्य: बच्चों को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और अश्लीलता से संरक्षण।
  • बच्चे की परिभाषा: 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति।
  • सहमति: 18 वर्ष से कम आयु के सभी व्यक्तियों को वैध सहमति देने में अक्षम माना गया है।
  • अपराधों की प्रकृति: कठोर देयता अपराध; नाबालिग की सहमति कानूनी रूप से अप्रासंगिक।
  • बाल-अनुकूल प्रक्रिया: विशेष न्यायालय, ‘इन-कैमरा’ सुनवाई, वीडियो-रिकॉर्डेड गवाही और समयबद्ध प्रक्रियाएँ।
  • प्रमाण का भार: अभियुक्त के विरुद्ध दोष का अनुमान, जब तक कि विपरीत स्थिति सिद्ध न हो।
  • लैंगिक तटस्थता: सभी बच्चों पर लागू, पुरुष और ट्रांसजेंडर बाल पीड़ितों सहित।

विधि आयोग का दृष्टिकोण (2023)

  • सहमति की आयु कम करने के विरुद्ध।
  • अनुशंसित दृष्टिकोण: 16–18 वर्ष के बच्चों के बीच स्वैच्छिक, सहमति-आधारित संबंधों वाले मामलों में सजा के निर्धारण के दौरान “मार्गदर्शित न्यायिक विवेक” को अपनाना।

न्यायिक अनुशंसाएँ

  • मद्रास उच्च न्यायालय (2021): विजयलक्ष्मी बनाम राज्य प्रतिनिधि: 
    • सहमति-आधारित किशोर संबंधों में आयु-अंतर पाँच वर्ष से अधिक न हो — ऐसा सुझाव।
    • कानूनी साक्षरता: किशोरों को यौन अपराध कानूनों और उनके परिणामों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।

PW OnlyIAS विशेष

वैचारिक विश्लेषण: स्वभावतः गलत कृत्य बनाम विधि द्वारा निषिद्ध कृत्य (Mala in Se vs Mala Prohibita)

  • स्वभावतः गलत कृत्य: ऐसे कृत्य जो प्रकृति में गलत हैं, जैसे- हिंसा और शोषण, जिन पर आपराधिक दंड उचित है।
  • विधि द्वारा निषिद्ध कृत्य: ऐसे कृत्य, जो केवल कानून द्वारा निषिद्ध होने के कारण अपराध माने जाते हैं।
  • किशोरों के बीच सहमति-आधारित निकट संबंध: सामान्यतः विधि द्वारा निषिद्ध कृत्यों की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि इन्हें आयु के कारण अपराध माना गया है, न कि अंतर्निहित हानि के कारण।

संदर्भ

वित्त मंत्रालय के अंतर्गत वित्तीय आसूचना इकाई–भारत (FIU-IND) ने भारत में संचालित क्रिप्टोकरेंसी और वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) संस्थाओं पर नियामक निगरानी को सुदृढ़ करने हेतु अद्यतन दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

संबंधित तथ्य

  • इन निर्देशों के अंतर्गत एक्सचेंजों द्वारा स्टॉक मार्केट के IPO के समकक्ष ‘इनिशियल कॉइन ऑफरिंग’ (ICO) और ‘इनिशियल टोकन ऑफरिंग’ (ITO) को भी हतोत्साहित किया गया है।

दिशा-निर्देशों की प्रमुख विशेषताएँ

  • अनिवार्य पंजीकरण
    • सभी क्रिप्टो एक्सचेंजों को रिपोर्टिंग एंटिटी (REs) के रूप में FIU के साथ पंजीकरण करना अनिवार्य होगा।
    • अवैध वित्तीय गतिविधियों की पहचान के लिए एक्सचेंजों को संदिग्ध लेन-देन रिपोर्ट (STRs) प्रस्तुत करनी होंगी और ग्राहकों तथा  लेन-देन का विस्तृत रिकॉर्ड बनाए रखना होगा।
  • प्रिंसिपल ऑफिसर (PO): प्रत्येक VDA रिपोर्टिंग एंटिटी के लिए प्रिंसिपल ऑफिसर (PO) की नियुक्ति अनिवार्य है।
    • भूमिका और उत्तरदायित्व: एंटी-मनी लॉण्ड्रिंग (AML), आतंकवादी वित्तपोषण की रोकथाम (CFT) तथा ‘काउंटर-प्रोलिफरेशन फाइनेंसिंग’ (CPF) अनुपालन की समग्र जिम्मेदारी।
  • साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण मानदंड: VDA सेवा प्रदाताओं को CERT-In द्वारा सूचीबद्ध ऑडिटर से साइबर सुरक्षा ऑडिट प्रमाण-पत्र प्राप्त करना होगा।
    • प्रमाण-पत्र में CERT-In के निर्देशों और लागू साइबर सुरक्षा ढाँचों के अनुपालन की पुष्टि होनी चाहिए।
  • अनहोस्टेड वॉलेट और पीयर-टू-पीयर लेन-देन: रिपोर्टिंग एंटिटीज कोअनहोस्टेड वॉलेट ट्रांसफर’ से संबंधित जानकारी एकत्र करनी होगी।
  • उन्नत KYC आवश्यकताएँ
    • एक्सचेंजों को स्थायी खाता संख्या (PAN), भौतिक उपस्थिति के सत्यापन हेतु लाइवनेस डिटेक्शन के साथ सेल्फी तथा जियो-टैगिंग अनिवार्य रूप से एकत्र करनी होगी।
    • खाता सत्यापन: ग्राहकों के बैंक खातों का सत्यापनपेनी-ड्रॉप’ तंत्र के माध्यम से किया जाएगा।
      • पेनी-ड्रॉप’ बैंक खाता सत्यापन: खाते के स्वामित्व और परिचालन स्थिति की पुष्टि हेतु ₹1 का वापसी योग्य लेन-देन किया जाता है।

नियामक प्राधिकरण और कानूनी आधार

  • कानूनी ढाँचा: दिशा-निर्देश धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के अंतर्गत जारी किए गए हैं।
  • क्रिप्टो की स्थिति: भारत में क्रिप्टोकरेंसी वैध मुद्रा नहीं है, किंतु आयकर अधिनियम के अंतर्गत कराधान के अधीन है।
    • VDA को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(47A) के अंतर्गत परिभाषित किया गया है।

वर्चुअल डिजिटल एसेट  (VDAs)

वर्चुअल डिजिटल एसेट को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(47A) के अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया गया है-

  • डिजिटल मूल्य प्रतिनिधित्व: ऐसी कोई भी सूचना, कोड, संख्या या टोकन– भारतीय अथवा विदेशी मुद्रा को छोड़कर, जो क्रिप्टोग्राफिक या समान माध्यमों से उत्पन्न हो, और जो:
    • प्रतिफल के साथ या बिना डिजिटल मूल्य का प्रतिनिधित्व करता हो,
    • अंतर्निहित मूल्य हो या मूल्य के भंडार अथवा लेखा इकाई के रूप में कार्य करता हो तथा
    • इलेक्ट्रॉनिक रूप से स्थानांतरित, संगृहीत या व्यापार योग्य हो, जिसमें वित्तीय लेन-देन या निवेश में उपयोग शामिल है।
      • उदाहरण: बिटकॉइन, ईथर, टेथर, एल्गोरैंड और स्टेलर।
  • नॉन-फंजिबल टोकन (NFTs): नाम चाहे जो भी हो, NFTs या अन्य समान डिजिटल टोकन।
    • उदाहरण: ‘बोर्ड एप यॉट’ क्लब, क्रिप्टोपंक्स, NBA टॉप शॉट।
  • सरकार द्वारा अधिसूचित परिसंपत्तियाँ: कोई अन्य डिजिटल परिसंपत्ति, जिसे केंद्र सरकार राजपत्र में अधिसूचित कर सकती है।

नोट: VDA सेवा प्रदाताओं को वर्ष 2023 में PMLA, 2002 के दायरे में लाया गया था।

  • इनिशियल कॉइन ऑफरिंग (ICO): एक धन एकत्रित करने की विधि, जिसमें कोई ब्लॉकचेन परियोजना लॉन्च से पूर्व या दौरान निवेशकों को (आमतौर पर BTC/ETH/फिएट के बदले) नए जारी किए गए क्रिप्टो कॉइन बेचती है।
  • इनिशियल टोकन ऑफरिंग (ITO): एक धन एकत्रित करने की विधि, जिसमें कोई परियोजना डिजिटल टोकन (यूटिलिटी/गवर्नेंस/एसेट-लिंक्ड) बेचती है, जो उसके इकोसिस्टम के भीतर पहुँच/अधिकार प्रदान करते हैं और सामान्यतः किसी मौजूदा ब्लॉकचेन पर जारी किए जाते हैं।

क्रिप्टो दिशा-निर्देशों को अद्यतन करने की आवश्यकता

  • मनी लॉण्ड्रिंग और आतंक वित्तपोषण का बढ़ता जोखिम: गोपनीयता, सीमा-पार लेन-देन के लिए क्रिप्टोकरेंसी के बढ़ते उपयोग से मनी लॉण्ड्रिंग, आतंकी वित्तपोषण और प्रसार को लेकर चिंताएँ बढ़ीं हैं ।
  • तेजी से विकसित होते क्षेत्र में नियामक अंतराल: ‘पीयर-टू-पीयर’ लेन-देन, अनहोस्टेड वॉलेट और ऑफशोर एक्सचेंज जैसी VDA गतिविधियों के विस्तार से मौजूदा ढाँचे में निगरानी तथा प्रवर्तन के अंतराल उत्पन्न हुए।
  • FATF सिफारिशों के साथ संरेखण: FATF के AML/CFT मानकों, उन्नत KYC मानदंडों, रिपोर्टिंग दायित्वों और ‘ट्रैवल रूल’ के अनुरूप भारत के क्रिप्टो नियामक तंत्र को संरेखित करने हेतु यह अद्यतन आवश्यक था।
  • PMLA में शामिल होने के बाद प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करना: वर्ष 2023 में VDA सेवा प्रदाताओं को PMLA के अंतर्गत रिपोर्टिंग एंटिटी घोषित किए जाने के बाद, एकरूप अनुपालन और प्रभावी पर्यवेक्षण सुनिश्चित करने हेतु विस्तृत परिचालन दिशा-निर्देश आवश्यक थे।

वित्तीय आसूचना इकाई-भारत (FIU-IND) के बारे में

  • स्वरूप: FIU-IND संदिग्ध लेन-देन से संबंधित वित्तीय खुफिया जानकारी का प्रबंधन करने वाली केंद्रीय राष्ट्रीय एजेंसी है।
    • FIU भारत में क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंजों के लिए एकल-बिंदु नियामक के रूप में कार्य करता है।
    • यह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनी लॉण्ड्रिंग और आतंक वित्तपोषण से निपटने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • स्थापना: नवंबर 2004 में भारत सरकार के एक आदेश द्वारा इसकी स्थापना की गई थी (वैधानिक निकाय नहीं)।
  • शासन व्यवस्था: यह एक स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करता है और सीधे केंद्रीय वित्त मंत्री की अध्यक्षता वाली आर्थिक खुफिया परिषद (EIC) को रिपोर्ट करता है।

संदर्भ

कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण (KBADA) ने यह माँग की है कि केरल के कासरगोड जिले में भाषायी अल्पसंख्यक क्षेत्रों को वर्ष 2025 के मलयालम भाषा विधेयक के प्रावधानों से स्पष्ट रूप से बाहर रखा जाए, जो विद्यालयों में मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा घोषित करने का प्रावधान करता है।

संबंधित तथ्य

  • पूर्व में, कर्नाटक सरकार ने औपचारिक रूप से केरल के राज्यपाल से यह आरोप लगाते हुए इस विधेयक को अस्वीकार करने का आग्रह किया था, कि यह असंवैधानिक है और विशेषकर केरल के कासरगोड जिले में कन्नड़-भाषी अल्पसंख्यकों के भाषायी अधिकारों का उल्लंघन करता है।

मलयालम भाषा विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • आधिकारिक भाषा का दर्जा: यह विधेयक संवैधानिक प्रावधानों के अधीन, सरकार, शिक्षा, न्यायपालिका, सार्वजनिक संचार, वाणिज्य तथा डिजिटल क्षेत्र में उपयोग के लिए मलयालम को केरल की आधिकारिक भाषा के रूप में औपचारिक रूप से घोषित करता है।
  • विद्यालयों में भाषा संबंधी अनिवार्यता: कक्षा 10 तक सभी सरकारी और सहायता-प्राप्त विद्यालयों में मलयालम अनिवार्य प्रथम भाषा होगी।
    • वर्तमान में, राज्य अंग्रेजी और मलयालम दोनों को आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता देता है।
  • न्यायपालिका और विधायिका
    • निर्णयों और न्यायालयी कार्यवाहियों का चरणबद्ध तरीके से मलयालम में अनुवाद किया जाएगा।
    • विधेयक और अध्यादेश मलयालम में प्रस्तुत किए जाएँगे।
    • वर्तमान में अंग्रेजी में प्रकाशित महत्त्वपूर्ण केंद्रीय और राज्य अधिनियमों का मलयालम में अनुवाद किया जाएगा।
  • डिजिटल और IT एकीकरण: सूचना प्रौद्योगिकी विभाग IT क्षेत्र में मलयालम के प्रयोग को सुगम बनाने के लिए ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर और उपकरण विकसित करेगा।
  • संस्थागत ढाँचा
    • कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार (आधिकारिक भाषा) विभाग का नाम बदलकर मलयालम भाषा विकास विभाग किया जाएगा।
    • विभाग के अंतर्गत मलयालम भाषा विकास निदेशालय का गठन किया जाएगा।

अनुच्छेद-345: किसी राज्य की विधायिका, कानून द्वारा उस राज्य में प्रचलित किसी एक या अधिक भाषाओं को अथवा हिंदी को उस राज्य की सभी अथवा किसी आधिकारिक प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा/भाषाएँ अपना सकती है।

विधेयक के विवादित प्रावधान

  • अनिवार्य प्रथम भाषा: विधेयक की धारा 2(6) केरल में कक्षा 10 तक सभी सरकारी और सहायता-प्राप्त विद्यालयों में मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा बनाती है।
  • अनुच्छेद-350 और 350A: कर्नाटक ने तर्क दिया कि भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधा प्रदान करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
    • अल्पसंख्यक अधिकारों का उल्लंघन: याचिका में अनुच्छेद-30, 347, 350, 350A और 350B के उल्लंघन का आरोप लगाया गया, जो सामूहिक रूप से भाषायी अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करते हैं।
  • बलपूर्वक भाषा थोपना: कर्नाटक ने कहा कि विधेयक की स्वीकृति से बाध्यकारी भाषा-अध्ययन होगा, जो संवैधानिक संरक्षणों का अतिक्रमण करेगा।
  • अल्पसंख्यक छात्रों पर प्रभाव: कासरगोड के कन्नड़-भाषी छात्र, जो वर्तमान में कन्नड़ को प्रथम भाषा के रूप में पढ़ते हैं, मलयालम सीखने के लिए बाध्य हो सकते हैं।
  • ऐतिहासिक दृष्टांत: इसी प्रकार का एक विधेयक [मलयालम भाषा (प्रसार और समृद्धि) विधेयक, 2015, जो वर्ष 2017 में पारित हुआ] पहले राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकृत किया गया था, जिससे कर्नाटक के तर्क को बल मिलता है।
    • अनुच्छेद-200 के तहत, राज्यपाल विधेयक को मंजूरी दे सकते हैं या रोक लगा सकते हैं अथवा विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।

भाषायी और अल्पसंख्यक अधिकारों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-29 और 30: अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करते हैं, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना तथा प्रशासन का अधिकार शामिल है।
  • अनुच्छेद-347: किसी राज्य की जनसंख्या के एक वर्ग द्वारा बोली जाने वाली भाषा की आधिकारिक मान्यता का प्रावधान करता है।
  • अनुच्छेद-350A: राज्यों को भाषायी अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व का प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद-350B: संवैधानिक संरक्षणों के क्रियान्वयन की निगरानी और रिपोर्टिंग के लिए भाषायी अल्पसंख्यकों हेतु एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
    • नोट: भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के समक्ष रखते हैं।

कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण की मुख्य माँग

  • स्पष्ट छूट की माँग: KBADA ने कासरगोड में कन्नड़-भाषी भाषायी अल्पसंख्यक क्षेत्रों को मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा की आवश्यकता से स्पष्ट रूप से छूट देने की माँग की।
  • कन्नड़ का संरक्षण: प्राधिकरण ने जोर दिया कि इन अल्पसंख्यक-बहुल क्षेत्रों में कन्नड़ को प्रथम भाषा के रूप में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए।

संदर्भ

रूसी ऊर्जा क्षेत्र पर हाल के अमेरिकी प्रतिबंधों और वेनेजुएला के तेल के फिर से जुड़ने से यह स्पष्ट होता है कि डॉलर पर निर्भरता कम करने (डी-डॉलराइजेशन) को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।। साथ ही, इससे वैश्विक तेल-आर्थिक शक्ति संरचना में पेट्रोडॉलर प्रणाली से दूर होने की प्रवृत्ति और संभावित परिवर्तन भी परिलक्षित होते हैं।

PW OnlyIAS विशेष

  • डी-डॉलराइजेशन (De-dollarisation) वह प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत देश व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और वित्तीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर (USD) पर अपनी निर्भरता कम करते हैं।
  • इसमें वैकल्पिक मुद्राओं का उपयोग, द्विपक्षीय भुगतान व्यवस्थाएँ और क्षेत्रीय वित्तीय तंत्रों को अपनाना शामिल है, ताकि मौद्रिक संप्रभुता को सुदृढ़ किया जा सके तथा अमेरिकी-नेतृत्व आधारित प्रतिबंधों के प्रभाव से बचाव किया जा सके।

पेट्रोडॉलर प्रणाली के बारे में

  • पेट्रोडॉलर प्रणाली (Petrodollar System): पेट्रोडॉलर प्रणाली उस वैश्विक व्यवस्था को दर्शाती है, जिसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार का मूल्य निर्धारण और भुगतान मुख्यतः अमेरिकी डॉलर (USD) में किया जाता है।
    • इस प्रणाली ने ऊर्जा बाजारों को वैश्विक वित्त से जोड़ दिया, जिससे तेल केवल एक वस्तु न रहकर अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक शक्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बन गया।
  • उत्पत्ति: इस प्रणाली का उद्भव वर्ष 1970 के दशक की शुरुआत में ब्रेटन वुड्स प्रणाली के पतन के बाद हुआ।
    • इसके पश्चात् संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए समझौतों के तहत तेल निर्यातक देशों ने कच्चे तेल की कीमतें विशेष रूप से अमेरिकी डॉलर में तय करने पर सहमति व्यक्त की।
    • इसके बदले अमेरिका ने सुरक्षा गारंटी और वित्तीय पहुँच प्रदान की। बाद में यह व्यवस्था तेल निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) के माध्यम से वैश्विक मानक बन गई।
  • वर्तमान उपयोग: वर्तमान में वैश्विक तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर पर आधारित है, जिससे अमेरिकी मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय माँग लगातार बनी रहती है।
    • विश्व स्तर पर लगभग 80% तेल व्यापार डॉलर में होता है, जिसके कारण संयुक्त राज्य अमेरिका को बड़े राजकोषीय और चालू खाता घाटों का वित्तपोषण करने में सहायता मिलती है। साथ ही, यह व्यवस्था अमेरिका को प्रतिबंधों और वित्तीय नियंत्रणों के माध्यम से भू-राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की क्षमता प्रदान करती है।

कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के बारे में 

  • कच्चा तेल एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला, गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन है, जो मुख्यतः हाइड्रोकार्बनों से निर्मित होता है। इसका निर्माण लाखों वर्षों में दबे हुए कार्बनिक पदार्थों से निकलने वाली ऊष्मा और दाब के कारण होता है।
    • तेल विश्व की कुल ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 30% प्रदान करता है।
  • कच्चे तेल का शोधन करके पेट्रोल, डीजल, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF), तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) तथा पेट्रोकेमिकल कच्चा माल (फीडस्टॉक) तैयार किया जाता है। इसी कारण कच्चा तेल आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं का एक आधार स्तंभ माना जाता है।
  • कच्चे तेल के निष्कर्षण की प्रक्रिया: कच्चे तेल का निष्कर्षण मुख्य रूप से स्थल पर या समुद्र तल के नीचे स्थित भूमिगत भंडारों में ड्रिलिंग के माध्यम से किया जाता है।
    • कच्चा तेल प्रायः प्राकृतिक गैस और खारे जल के साथ पाया जाता है।
    • निष्कर्षण के बाद कच्चे तेल को रिफाइनरियों तक पहुँचाया जाता है, जहाँ इसका आसवन तथा अन्य प्रसंस्करण प्रक्रियाएँ की जाती हैं, ताकि इसे उपयोगी पेट्रोलियम उत्पादों में बदला जा सके।

कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के प्रकार

  • लाइट क्रूड ऑयल (Light Crude Oil): लाइट क्रूड ऑयल का घनत्व कम होता है और यह आसानी से प्रवाहित होता है।
    • इससे पेट्रोल, डीजल और विमानन ईंधन जैसे उच्च-मूल्य वाले परिष्कृत उत्पादों की अधिक मात्रा प्राप्त होती है।
    • इसका शोधन अपेक्षाकृत सस्ता होता है और इसलिए अधिकांश आधुनिक रिफाइनरियाँ इसे प्राथमिकता देती हैं।
    • हल्का कच्चा तेल सामान्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका (शेल ऑयल क्षेत्र), नॉर्थ सी (ब्रेंट क्रूड), पश्चिमी अफ्रीका के कुछ भागों (नाइजीरिया) तथा अजरबैजान में पाया जाता है।
  • हैवी क्रूड ऑयल (Heavy Crude Oil): हैवी क्रूड ऑयल का घनत्व और श्यानता अधिक होती है। इससे अवशिष्ट उत्पादों  की मात्रा अधिक उत्सर्जित होती है और इसके शोधन के लिए कोकिंग तथा हाइड्रोक्रैकिंग जैसी जटिल तकनीकों की आवश्यकता होती है, जिससे प्रसंस्करण लागत बढ़ जाती है।
    • भारी कच्चा तेल मुख्यतः वेनेजुएला (ओरिनोको बेल्ट), कनाडा (ऑयल सैंड्स), मैक्सिको, तथा मध्य पूर्व के कुछ भागों में पाया जाता है।
  • स्वीट क्रूड ऑयल (Sweet Crude Oil): स्वीट क्रूड ऑयल में सल्फर की मात्रा कम होती है (आमतौर पर 0.5% से कम)।
    • इससे कम प्रदूषक उत्पन्न होते हैं, रिफाइनरी उपकरणों में कम जंग लगती है, और यह पर्यावरणीय मानकों को पूरा करता है।
    • यह संयुक्त राज्य अमेरिका (WTI क्रूड), नॉर्थ सी (ब्रेंट), लीबिया, नाइजीरिया, तथा इंडोनेशिया के कुछ भागों में उत्पादित होता है।
  • सोर क्रूड ऑयल  (Sour Crude Oil): सोर क्रूड ऑयल में सल्फर की मात्रा अधिक होती है (आमतौर पर 0.5% से अधिक), जिसके कारण यह अधिक प्रदूषणकारी होता है और इसका शोधन तकनीकी रूप से अधिक जटिल होता है।
    • इसके शोधन के लिए ‘डी-सल्फरीकरण’ तथा उन्नत रिफाइनिंग अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
    • सोर क्रूड ऑयल’ (Sour Crude Oil) मुख्यतः मध्य पूर्व (सऊदी अरब, इराक), कनाडा, वेनेजुएला और रूस में पाया जाता है।

तेल व्यापार मानक   

  • ब्रेंट क्रूड: उत्तरी सागर के तेल क्षेत्रों से प्राप्त, सबसे व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला वैश्विक बेंचमार्क, जो अधिकांश जलमार्ग से प्राप्त कच्चे तेल की कीमत निर्धारित करता है और लाइट व स्वीट क्रूड ऑयल के लिए जाना जाता है।
  • वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI): एक प्रमुख अमेरिकी बेंचमार्क, जो लाइट और स्वीट क्रूड ऑयल होता है और उत्तरी अमेरिका में इसका व्यापक रूप से कारोबार होता है।
  • दुबई/ओमान: मध्य पूर्वी तेल, विशेष रूप से एशियाई बाजारों के लिए, की कीमत निर्धारित करने के लिए उपयोग किया जाता है और प्रायः ब्रेंट से संबंधित होता है।
  • ओपेक रेफरेंस बास्केट: ओपेक द्वारा मूल्य निर्धारण निर्णयों के लिए उपयोग किया जाता है।
  • वेस्टर्न कैनेडियन सेलेक्ट (WCS): कनाडाई तेल के लिए एक हैवी, सोर क्रूड ऑयल बेंचमार्क है।
  • बोनी लाइट (नाइजीरिया) और यूराल्स (रूस): क्षेत्रीय बेंचमार्क है।

कच्चे तेल से संबंधित संगठन

  • पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (OPEC): यह एक अंतर-सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना वर्ष 1960 में सदस्य देशों के बीच पेट्रोलियम नीतियों के समन्वय, तेल बाजारों में स्थिरता लाने और उत्पादकों के लिए उचित मूल्य सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी।
    • सदस्य देश (वर्ष 2024 तक 12 देश): सऊदी अरब, ईरान, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, वेनेजुएला, नाइजीरिया, अल्जीरिया, लीबिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी और गैबॉन शामिल हैं।
      • अंगोला (जनवरी 2024 में सदस्यता समाप्त हो गई।)

  • OPEC+: यह वर्ष 2016 में गठित एक व्यापक गठबंधन है, जिसमें ओपेक के 12 सदस्य और रूस, मैक्सिको, कजाकिस्तान और ओमान सहित ओपेक के अलावा 10 अन्य तेल-निर्यात करने वाले देश शामिल हैं, जो वैश्विक बाजार को प्रभावित करने के लिए उत्पादन स्तरों पर समन्वय करते हैं।

वर्तमान में कच्चा तेल उत्पादन संबंधी महत्त्वपूर्ण आँकड़े 

  • शीर्ष उत्पादक:  1. संयुक्त राज्य अमेरिका,  2. सऊदी अरब, 3. रूस, 4. कनाडा, 5. इराक
  • शीर्ष कच्चे तेल भंडार: 1. वेनेजुएला, 2. सऊदी अरब,  3. कनाडा,  4. ईरान, 5. इराक

वैश्विक तेल बाजार का वर्तमान परिदृश्य

वैश्विक तेल बाजार वर्तमान में भू-राजनीति, तकनीक और ऊर्जा संक्रमण से प्रेरित महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तनों से गुजर रहा है।

  • भू-राजनीतिक विखंडन: रूस–यूक्रेन संघर्ष के बाद यह विखंडन और भी तीव्र हो गया है।
    • रूसी तेल पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने पारंपरिक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर दिया, जिससे भारत और चीन जैसे खरीदारों को वैकल्पिक निपटान तंत्र के माध्यम से रियायती कच्चे तेल की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
  • तेल की गुणवत्ता में बदलाव: तेल की गुणवत्ता व्यापार प्रवाह को नया आकार दे रही है।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका मुख्य रूप से हैवी-स्वीट शेल ऑयल उत्पादित करता है, जबकि इसकी कई रिफाइनरियाँ हैवी सोर क्रूड ऑयल के लिए डिजाइन की गई हैं।
    • ऊर्जा की प्रचुरता के बावजूद वेनेजुएला और कनाडा के तेल में अमेरिका की निरंतर बढ़ते हित का यही मूल कारण है।
  • बाजार अस्थिरता: पश्चिम एशिया में संघर्ष, OPEC+ के उत्पादन निर्णय, और जलवायु-संबंधी व्यवधानों के कारण तेल आपूर्ति में अनिश्चितता बढ़ गई है।
    • इन कारकों ने तेल बाजारों को और अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया है।
  • ऊर्जा संक्रमण: हाल ही में गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों  पर ध्यान बढ़ने से दीर्घकालिक तेल की माँग की अपेक्षाओं में बदलाव आ रहा है।
    • विशेषकर चीन में इलेक्ट्रिक वाहन का तीव्र विकास भविष्य में तेल की माँग की वृद्धि को धीरे-धीरे कम कर रहा है, साथ ही औद्योगिक और तकनीकी नेतृत्व को भी नई दिशा दे रहा है।
  • राज्यीय हस्तक्षेप में वृद्धि: सरकारें रणनीतिक भंडार, निर्यात नियंत्रण और प्रतिबंधों का उपयोग करके बाजारों को प्रभावित कर रही हैं, जिससे विशुद्ध रूप से बाजार-संचालित मूल्य निर्धारण की भूमिका कम हो रही है।

तेल अर्थव्यवस्था का डी-डॉलराइजेशन 

कई समन्वित और असंगठित वैश्विक घटनाक्रमों के कारण पेट्रोडॉलर के प्रभुत्व पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

  • प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं द्वारा गैर-डॉलर तेल व्यापार: पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद, रूस ने अपने तेल निर्यात के लिए रूबल और युआन में भुगतान स्वीकार करना शुरू कर दिया है।
    • चीन ने भी युआन-निर्धारित तेल अनुबंधों का विस्तार किया है, विशेषकर रूस और कुछ खाड़ी देशों के आपूर्तिकर्ताओं के साथ।

  • BRICS-नेतृत्व वाली वित्तीय पहलें: BRICS देशों ने वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, स्थानीय मुद्रा में व्यापार और यहाँ तक कि संभावित साझा निपटान तंत्र पर चर्चा की है, ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके।
  • द्विपक्षीय मुद्रा समझौते: भारत ने तेल आयात के निपटान के लिए डॉलर-आधारित व्यापार ढाँचे और तृतीय-मुद्रा निपटान सहित गैर-डॉलर तंत्रों के साथ प्रयोग किया है, विशेष रूप से रियायती रूसी कच्चे तेल के लिए।
    • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने जुलाई 2022 में भारतीय रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार निपटान के लिए एक औपचारिक ढाँचा स्थापित किया था।
    • यह भारतीय रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में भी एक कदम है।
  • प्रतिबंधों के माध्यम से डॉलर का हथियार के रूप में उपयोग: ईरान, रूस और वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिका द्वारा लगाए गए व्यापक वित्तीय प्रतिबंधों ने देशों को चीन की क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम (CIPS) जैसी समानांतर भुगतान प्रणालियाँ विकसित करने के लिए प्रेरित किया है।
  • बहुध्रुवीय ऊर्जा बाजारों का उदय: तेल आपूर्तिकर्ताओं का विविधीकरण, चिंहित बाजारों का विकास और क्षेत्रीय ऊर्जा केंद्र, तेल व्यापार में किसी एक मुद्रा के एकाधिकार को कमजोर कर रहे हैं।

वर्तमान तेल अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति

  • आयात पर अत्यधिक निर्भरता: आयातित कच्चे तेल पर 85% से अधिक निर्भरता भारत को बाहरी आपूर्ति में व्यवधान और वैश्विक मूल्य तनावों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • भू-राजनीतिक जोखिम: होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधान, रूसी संघ पर प्रतिबंध और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा टैरिफ की धमकियों से आपूर्ति पक्ष की अनिश्चितता बढ़ जाती है।
  • मैक्रोइकॉनॉमिक भेद्यता: कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति 25-35 आधार अंक तक बढ़ सकती है और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि 20-30 आधार अंक तक घट सकती है।
  • प्रतिबंध और अनुपालन दबाव: रियायती रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध से भारत के वार्षिक कच्चे तेल आयात बिल में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
  • अपर्याप्त रणनीतिक बफर: रणनीतिक भंडारण क्षमता अंतरराष्ट्रीय मानकों से कम बनी हुई है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के सदस्य देश 90 दिनों का आपातकालीन तेल भंडार बनाए रखते हैं।
    • भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) वर्तमान में लगभग 9-10 दिनों के कच्चे तेल का भंडार प्रदान करते हैं।
    • इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) जैसी तेल विपणन कंपनियों (OMC) के भंडारों को मिलाकर, कुल आपातकालीन भंडार लगभग 70-75 दिनों तक बढ़ जाता है।
    • भारत का लक्ष्य SPR क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करना है, जिसके तहत लगभग 11.83 मिलियन मीट्रिक टन (लगभग 22 दिनों की माँग) तक पहुँचने की योजना है।

तेल संबंधी संकट को कम करने के विकल्प

  • ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG), नवीकरणीय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा पर बढ़ती निर्भरता।
    • भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है और वर्ष 2025 के मध्य तक अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50% से अधिक गैर-जीवाश्म स्रोतों (जल, परमाणु, नवीकरणीय ऊर्जा) से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।
  • स्रोत देशों का विविधीकरण: भारत द्वारा कच्चे तेल की हालिया सोर्सिंग में महत्त्वपूर्ण विविधता दिखाई देती है, जो पारंपरिक पश्चिम एशियाई निर्भरता से हटकर रूसी, अमेरिकी और अफ्रीकी आपूर्ति को अधिक शामिल कर रही है।
  • जैव ईंधन का विस्तार: पेट्रोलियम की माँग को कम करने के लिए एथेनॉल मिश्रण, जैव-संपीडित प्राकृतिक गैस (बायो-CNG) और बायोडीजल को बढ़ावा देना।
  • इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ग्रीन हाइड्रोजन: तेल की खपत को संरचनात्मक रूप से कम करने के लिए दीर्घकालिक संक्रमणकालीन मार्ग है।
    • भारत ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत वर्ष 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) वार्षिक क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • दक्षता में सुधार: रिफाइनरी की दक्षता में वृद्धि और माँग-पक्ष ऊर्जा प्रबंधन।

निष्कर्ष 

भू-राजनीतिक विभाजन, डी-डॉलराइजेशन के प्रयास और ऊर्जा संक्रमण के बीच, पेट्रोडॉलर प्रणाली धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। आज तेल का मूल्य निर्धारण केवल बाजार के मूलभूत तत्त्वों से नहीं, बल्कि मुद्रा तथा राजनीतिक रणनीतियों  से भी प्रभावित होने लगा है।

अभ्यास प्रश्न 

वैश्विक ऊर्जा गठबंधनों में हो रहे बदलावों और डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाली वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों के उद्भव के संदर्भ में वेनेजुएला के तेल क्षेत्र के प्रति अमेरिकी नीति के भू-राजनीतिक और आर्थिक परिणामों का मूल्यांकन कीजिए।

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