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Jan 16 2026

तमिलनाडु में गिद्ध संरक्षण क्षेत्र (Vulture Safe Zones)

तमिलनाडु वन विभाग ने मद्रास उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि वह राज्य भर में गिद्ध संरक्षण क्षेत्र (Vulture Safe Zones-VSZs) स्थापित करेगा।

गिद्धों की संख्या में गिरावट का मुख्य कारण

  • भारत में गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट और लगभग विलुप्ति का प्रमुख कारण नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इन्फ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs), जैसे- डाइक्लोफेनाक रहे हैं।
  • ये विषैली औषधि, जो पशुओं के उपचार में उपयोग की जाती हैं, इस औषधि का असर शवों में काफी लंबे समय तक रहता है यही शव गिद्धों द्वारा खाद्य के रूप में ग्रहण किए जाते हैं, जिससे गुर्दा विफल होने की समस्या उत्पन्न होती है।

प्रथम गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र: मोयर नदी घाटी

  • पहला VSZ, नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व में मोयर नदी घाटी के आस-पास स्थापित किया जाएगा।
  • यह क्षेत्र गिद्धों के लिए एक प्रमुख प्रजनन और आवास स्थल है।

भारत में पाई जाने वाली गिद्धों की प्रजातियाँ (IUCN स्थिति):

  • व्हाइट-रम्प्ड वल्चर (Gyps bengalensis): गंभीर रूप से संकटग्रस्त।
  • इंडियन वल्चर / लॉन्ग-बिल्ड वल्चर (Gyps indicus): गंभीर रूप से संकटग्रस्त।
  • स्लेंडर-बिल्ड वल्चर (Gyps tenuirostris): गंभीर रूप से संकटग्रस्त।
  • रेड-हेडेड वल्चर (Sarcogyps calvus): गंभीर रूप से संकटग्रस्त।
  • इजिप्शियन वल्चर (Neophron percnopterus): संकटग्रस्त।
  • बियर्डेड वल्चर (Gypaetus barbatus): निकट संकटग्रस्त।
  • हिमालयन ग्रिफॉन (Gyps himalayensis): निकट संकटग्रस्त।
  • सिनेरियस वल्चर (Aegypius monachus): निकट संकटग्रस्त।
  • यूरेशियन ग्रिफॉन (Gyps fulvus): कम चिंताग्रस्त।

हेनले पासपोर्ट इंडेक्स, 2026

हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत ने अपनी वैश्विक गतिशीलता स्थिति में सुधार किया है और पाँच स्थानों की छलांग लगाईं है, जबकि एशियाई देशों का शीर्ष रैंकिंग पर वर्चस्व बना रहा।

हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 की प्रमुख विशेषताएँ

  • शीर्ष देश
    • पहला: सिंगापुर (192)
      • लगातार तीसरे वर्ष विश्व का सबसे शक्तिशाली पासपोर्ट।
    • दूसरा: जापान और दक्षिण कोरिया (188) (संयुक्त)
    • तीसरा: डेनमार्क, लक्जमबर्ग, स्पेन, स्वीडन, स्विट्जरलैंड (186) (संयुक्त)
    • चौथा: ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, फिनलैंड, फ्राँस, जर्मनी, ग्रीस, आयरलैंड, नीदरलैंड्स, नॉर्वे (185) (संयुक्त)।
  • भारत की स्थिति: पिछले वर्ष की तुलना में पाँच स्थानों का सुधार, जो भारत की वैश्विक यात्रा पहुँच में क्रमिक वृद्धि को दर्शाता है।
    • वर्ष 2026 में स्थान : इस वर्ष भारत ने 80वाँ स्थान प्राप्त किया साथ ही, 55 वीजा-मुक्त गंतव्यों तक पहुँच सुनिश्चित की।
    • वर्ष 2025 में स्थान: 85वाँ, लगभग 54 गंतव्यों के साथ।

हेनले पासपोर्ट इंडेक्स के बारे में

  • हेनले पासपोर्ट इंडेक्स पासपोर्ट की वार्षिक वैश्विक रैंकिंग है, जो इस आधार पर तैयार की जाती है कि धारक कितने गंतव्यों तक बिना पूर्व वीजा के पहुँच सकते हैं।
  • प्रयुक्त मानदंड: अंतरराष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (IATA) के विशिष्ट आँकड़ों पर आधारित
    • 199 पासपोर्टों का आकलन करता है।
    • 227 वैश्विक गंतव्यों में पहुँच की तुलना करता है।
    • वीजा-मुक्त, वीजा-ऑन-अराइवल तथा इलेक्ट्रॉनिक यात्रा प्राधिकरणों को वीजा-मुक्त पहुँच के रूप में गिना जाता है।

अल्ट्राकोल्ड परमाणु (Ultracold Atoms)

अल्ट्राकोल्ड परमाणु सटीक घड़ियों, क्वांटम सिमुलेशन तथा भविष्य के क्वांटम कंप्यूटरों में अभूतपूर्व प्रगति को गति दे रहे हैं और इस क्षेत्र में भारत एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक अनुसंधान केंद्र के रूप में उभर रहा है।

अल्ट्राकोल्ड परमाणुओं के बारे में

  • अल्ट्राकोल्ड परमाणु वे परमाणु होते हैं, जिन्हें परम शून्य (−273.15 डिग्री सेल्सियस) से केवल कुछ अरबवाँ अंश डिग्री ऊपर के तापमान तक शीतल किया जाता है, जहाँ उनका क्वांटम यांत्रिक स्वभाव पारंपरिक व्यवहार पर प्रभावी हो जाता है।
  • अल्ट्राकोल्ड परमाणुओं की उपस्थिति: अल्ट्राकोल्ड परमाणु प्राकृतिक रूप से ऐसी चरम परिस्थितियों में नहीं पाए जाते हैं तथा इन्हें उन्नत शीतलन एवं ट्रैपिंग तकनीकों का उपयोग करके अत्यधिक नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण में कृत्रिम रूप से निर्मित किया जाता है।
  • अल्ट्राकोल्ड परमाणुओं का उत्पादन
    • लेजर शीतलन: सावधानीपूर्वक समायोजित लेजर किरणों के माध्यम से संवेग स्थानांतरण द्वारा ब्रेक की भाँति कार्य करते हुए परमाणुओं की गति को धीमा किया जाता है।
    • चुंबकीय एवं प्रकाशीय ट्रैपिंग: धीमे किए गए परमाणुओं को निर्वात कक्षों में सीमाबद्ध किया जाता है।
    • वाष्पीकरणीय शीतलन: सर्वाधिक ऊर्जावान परमाणुओं को बाहर निकलने दिया जाता है, जिससे शेष परमाणु समूह और अधिक ठंडा होता है तथा बोस–आइंस्टीन संघनन का निर्माण संभव होता है।
    • अल्ट्राकोल्ड परमाणुओं की विशेषताएँ
      • परमाणु स्वतंत्र कणों के स्थान पर परस्पर आच्छादित द्रव्य तरंगों की भाँति व्यवहार करते हैं।
      • एकाधिक परमाणु एक ही क्वांटम अवस्था में स्थित हो सकते हैं, जिससे बोस–आइंस्टीन संघनन का निर्माण होता है।
      • इनमें हस्तक्षेप तथा घर्षणरहित प्रवाह जैसी स्थूल क्वांटम घटनाएँ परिलक्षित होती हैं।

अल्ट्राकोल्ड परमाणुओं के संभावित अनुप्रयोग

  • सटीक समय-निर्धारण: ये विश्व की सर्वाधिक सटीक परमाणु घड़ियों का आधार बनते हैं, जो जीपीएस, इंटरनेट समकालिकरण तथा मौलिक भौतिकी परीक्षणों के लिए अनिवार्य हैं।
  • क्वांटम प्रौद्योगिकियाँ: शास्त्रीय गणना से परे समस्याओं के समाधान हेतु क्वांटम सिमुलेटर तथा प्रारूप क्वांटम कंप्यूटरों को सक्षम बनाते हैं।
  • संवेदनशील मापन: गुरुत्व संवेदकों, भूमिगत मानचित्रण तथा आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत के परीक्षणों में इनका उपयोग किया जाता है ।

भारत में अल्ट्राकोल्ड परमाणु अनुसंधान की स्थिति

  • भारत में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान, मुंबई; भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलूरू; भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, पुणे; रमन अनुसंधान संस्थान; तथा राजा रामन्ना उन्नत प्रौद्योगिकी केंद्र, इंदौर में अग्रणी अनुसंधान समूह कार्यरत हैं।
  • टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान ने भारत का पहला बोस–आइंस्टीन संघनन निर्मित किया, जिससे देश को वैश्विक अल्ट्राकोल्ड परमाणु एवं क्वांटम प्रौद्योगिकी अनुसंधान में सुदृढ़ स्थान प्राप्त हुआ।
    • बोस–आइंस्टीन संघनन (BEC) द्रव्य की वह अवस्था है, जिसमें परम शून्यताप के निकट शीतलित बोसॉन स्वतंत्र पहचान खोकर एक ही क्वांटम अवस्था में संघनित हो जाते हैं और एक विशाल सुपरपरमाणु” की भाँति व्यवहार करते हैं, जिसमें सामूहिक तरंग-सदृश गुण तथा स्थूल क्वांटम प्रभाव प्रकट होते हैं।

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स

हाल ही में वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन ने देशों का मूल्य-आधारित एवं दायित्व-केंद्रित वैश्विक ढाँचे के माध्यम से आकलन करने हेतु रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स का शुभारंभ किया।

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स (RNI) के बारे में

  • यह एक वैश्विक रैंकिंग ढाँचा है, जिसका उद्देश्य यह मूल्यांकन करना है कि देश किस प्रकार उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से समाजों पर शासन करते हैं, पर्यावरण की रक्षा करते हैं और वैश्विक स्थिरता में योगदान देते हैं।
  • प्रकाशक: वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन (WIF), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), भारतीय प्रबंधन संस्थान मुंबई तथा डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र के सहयोग से।
  • उद्देश्य: यह सूचकांक वैश्विक बेंचमार्किंग को संकीर्ण आर्थिक या शक्ति-आधारित मानकों से हटाकर मानव गरिमा, स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दायित्व पर आधारित मूल्यांकन की ओर ले जाने का प्रयास करता है।
  • कवरेज: पारदर्शी एवं वैश्विक स्रोतों से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर विश्व के 154 देश।
  • मापदंड: तीन मुख्य आयामों के आस-पास संरचित है—
    • आंतरिक दायित्व: गरिमा, न्याय और नागरिकों का कल्याण
    • पर्यावरणीय दायित्व: जलवायु कार्रवाई और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
    • बाह्य दायित्व: शांति, सहयोग और वैश्विक स्थिरता।
  • महत्त्व: RNI, सकल घरेलू उत्पाद से परे राष्ट्रीय प्रदर्शन के मूल्यांकन हेतु एक नैतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो सतत् विकास लक्ष्यों, जलवायु प्रतिबद्धताओं और मानवाधिकार मानकों जैसे वैश्विक लक्ष्यों के अनुरूप है।

वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन (WIF) के बारे में

  • यह एक वैश्विक, गैर-पक्षपाती थिंक टैंक है, जिसकी स्थापना वर्ष 2021 में की गई थी, और जिसका उद्देश्य सामाजिक कल्याण हेतु अनुसंधान-आधारित समाधान को प्रोत्साहित करना है।
  • मुख्यालय: नई दिल्ली, भारत।
  • भूमिका: यह नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों और नागरिक समाज के साथ मिलकर मानव क्षमता, आपदा प्रभाव, शासन की लागत तथा सामुदायिक स्वास्थ्य पहलों पर शोध प्रकाशित करता है, जिससे सूचित एवं उत्तरदायी नीति-निर्माण में योगदान मिलता है।

संदर्भ

नीति आयोग ने निर्यात तत्परता सूचकांक (EPI) का चौथा संस्करण जारी किया है।

निर्यात तत्परता सूचकांक (EPI) 2024 के बारे में

  • यह भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की निर्यात तत्परता को मापने हेतु एक समग्र आकलन उपकरण है।
  • उद्देश्य: वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के वस्तु निर्यात के लक्ष्य तथा व्यापक विकसित भारत @2047 विजन को समर्थन प्रदान करना।
  • ढाँचा: सूचकांक चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित है, जिन्हें 13 उप-स्तंभों और 70 संकेतकों में विभाजित किया गया है:
    • निर्यात अवसंरचना (20 प्रतिशत भारांक): लॉजिस्टिक्स, उपयोगिताएँ और औद्योगिक अवसंरचना को सम्मिलित करता है।
    • व्यवसाय पारिस्थितिकी तंत्र (40 प्रतिशत भारांक): सर्वाधिक भारांक वाला स्तंभ, जो व्यापक अर्थव्यवस्था, लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता, मानव पूँजी, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र तथा वित्त तक पहुँच का आकलन करता है।
    • नीति एवं शासन (20 प्रतिशत भारांक): राज्य निर्यात नीतियों, संस्थागत क्षमता और व्यापार सुविधा का मूल्यांकन करता है।
    • निर्यात प्रदर्शन (20 प्रतिशत भारांक): निर्यात परिणामों, विविधीकरण और वैश्विक एकीकरण को मापता है।
  • वर्गीकरण: तुलनात्मक विश्लेषण हेतु राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
    • बड़े राज्य, छोटे राज्य, उत्तर-पूर्वी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश।
    • प्रत्येक श्रेणी के भीतर उन्हें निम्न रूप में वर्गीकृत किया गया है: लीडर्स (उच्च तैयारी), चैलेंजर्स (मध्यम, सुधार की संभावना सहित) और एस्पायरर्स (प्रारंभिक अवस्था का विकास)।
  • EPI, 2024 में किए गए परिवर्तन
    • व्यापक आर्थिक स्थिरता, लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता, मानव पूँजी और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र जैसे नए आयाम जोड़े गए हैं।
    • इसके अतिरिक्त, निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को आगे बढ़ाने के लिए जिलों को प्रमुख इकाइयों के रूप में अधिक महत्त्व दिया गया है।

EPI, 2024 के प्रमुख निष्कर्ष

श्रेणीवार शीर्ष प्रदर्शनकर्ता

श्रेणियाँ बड़े राज्य छोटे राज्य, उत्तर-पूर्वी राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश
लीडर्स (उच्च तैयारी): 1.       महाराष्ट्र

2.       तमिलनाडु

3.       गुजरात

4.       उत्तर प्रदेश

5.       आंध्र प्रदेश

1.       उत्तराखंड

2.       जम्मू और कश्मीर

3.       नागालैंड

4.       दादरा और नागर हवेली एवं दमन और दीव

5.       गोवा

चैलेंजर्स (मध्यम, सुधार की संभावना सहित) 1.       मध्य प्रदेश

2.       हरियाणा

3.       केरल

1.       मेघालय

2.       लद्दाख

3.       दिल्ली

एस्पायरर्स (प्रारंभिक अवस्था का विकास) 1.       ओडिशा

2.       छत्तीसगढ़

3.       राजस्थान

1.       अरुणाचल प्रदेश

2.       अंडमान और निकोबार

3.       मिजोरम।

संदर्भ

हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नई दिल्ली में औपचारिक रूप से ब्रिक्स 2026 अध्यक्षता का लोगो, थीम और आधिकारिक वेबसाइट का शुभारंभ किया।

संबंधित तथ्य

  • भारत ने 1 जनवरी, 2026 को ब्राजील से औपचारिक रूप से ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण की, जो इस भूमिका में उसका चौथा कार्यकाल है। इससे पूर्व भारत वर्ष 2012, 2016 और 2021 में भी ब्रिक्स की अध्यक्षता कर चुका है।

पिछली पाँच अध्यक्षताएँ और उनकी थीम

  • वर्ष 2025 – ब्राजील की अध्यक्षता: “अधिक समावेशी और सतत् शासन के लिए वैश्विक दक्षिण सहयोग को सुदृढ़ बनाना।”
  • वर्ष 2024 – रूस की अध्यक्षता: “न्यायसंगत वैश्विक विकास और सुरक्षा के लिए बहुपक्षवाद को सुदृढ़ बनाना।”
  • वर्ष 2023 – दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता: “ब्रिक्स और अफ्रीका: पारस्परिक रूप से तीव्र विकास, सतत् विकास और समावेशी बहुपक्षवाद के लिए साझेदारी।”
  • वर्ष 2022 – चीन की अध्यक्षता: “उच्च-गुणवत्ता वाली ब्रिक्स साझेदारी को प्रोत्साहित करना, वैश्विक विकास के नए युग की शुरुआत।”
  • वर्ष 2021 – भारत की अध्यक्षता: “ब्रिक्स @ 15: निरंतरता, समेकन और सहमति के लिए अंतः-ब्रिक्स सहयोग।”

ब्रिक्स 2026 के लिए भारत की प्रमुख प्राथमिकताएँ

  • लचीलापन: भारत कृषि, स्वास्थ्य, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, ऊर्जा और आपूर्ति शृंखलाओं जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ करने की योजना बना रहा है।
  • नवाचार: भारत विकास संबंधी चुनौतियों के समाधान में स्टार्ट-अप्स, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों और उभरती प्रौद्योगिकियों की भूमिका के उपयोग पर ध्यान केंद्रित करेगा।
  • सहयोग और सततता: भारत जलवायु कार्रवाई, स्वच्छ ऊर्जा और सतत् विकास पर बल देगा, साथ ही यह सुनिश्चित करेगा कि ये प्रयास न्यायसंगत हों और राष्ट्रीय परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील रहें।

ब्रिक्स भारत 2026 का लोगो, थीम और वेबसाइट

  • लोगो
    • ब्रिक्स 2026 का लोगो भारत के राष्ट्रीय प्रतीक कमल के पुष्प से प्रेरित है, जिसके केंद्रीय भाग में ‘नमस्ते’ मुद्रा को दर्शाया गया है, जो सम्मान और एकता का प्रतीक है।
    • लोगो ब्रिक्स सदस्य देशों की एकता को प्रतिबिंबित करता है, जिसमें पंखुड़ियाँ पाँच संस्थापक सदस्यों—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का प्रतीक हैं।

  • थीम: भारत की अध्यक्षता की थीम ब्रिक्स देशों में क्षमताओं के सुदृढ़ीकरण, नवाचार को प्रोत्साहन और सतत् विकास सुनिश्चित करने पर बल देती है।
    • भारत की अध्यक्षता की आधिकारिक थीम है: “बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी।”
  • डिजिटल मंच:  नई प्रारंभ की गई ब्रिक्स भारत 2026 वेबसाइट एक साझा डिजिटल मंच के रूप में कार्य करेगी, जो पारदर्शिता प्रदान करेगी तथा भारत की अध्यक्षता के दौरान बैठकों, पहलों और परिणामों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराकर हितधारकों को संलग्न करेगी।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का महत्त्व

  • सुधार एजेंडे के साथ निरंतरता: भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन, जलवायु वित्त, स्वास्थ्य सहयोग और सतत् विकास जैसे प्रमुख मुद्दों को प्राथमिकता देकर अपने सुधार एजेंडे को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखता है।
  •  ‘ग्लोबल साउथ’  की अभिव्यक्ति: भारत का नेतृत्व ब्रिक्स को एक ऐसे मंच के रूप में सुदृढ़ करता है, जो समावेशी विकास, न्यायसंगत वैश्विक शासन और विकास-केंद्रित बहुपक्षवाद का समर्थन करता है।
    • यह भारत को ‘ग्लोबल साउथ’ की एक सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित करता है, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की चिंताओं और प्राथमिकताओं को वैश्विक मंच पर संबोधित किया जा सके।
  • रणनीतिक संतुलनकारी भूमिका: भारत ब्रिक्स के भीतर एक रणनीतिक संतुलनकारी भूमिका निभाने की विशिष्ट स्थिति में है, जो इसके सदस्यों के विविध और प्रायः परस्पर विरोधी हितों के बीच सेतु का कार्य कर सकता है।
    • यह भूमिका वैश्विक भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण के समय विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जहाँ भारत भिन्न राजनीतिक और आर्थिक हितों के बावजूद मध्यस्थता और सहयोग को प्रोत्साहित कर सकता है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का प्रोत्साहन: भारत ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए एक मापनीय विकास मॉडल के रूप में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (जैसे- एकीकृत भुगतान इंटरफेस) को बढ़ावा देने की योजना बना रहा है।
    • यह पहल उभरती अर्थव्यवस्थाओं में विकास को प्रोत्साहित करने हेतु प्रौद्योगिकी के उपयोग पर केंद्रित है।

ब्रिक्स के बारे में

  • उत्पत्ति: ब्रिक शब्द का प्रयोग वर्ष 2001 में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जिम ओ’नील द्वारा ब्राजील, रूस, भारत और चीन की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रतिनिधित्व हेतु किया गया था।
  • विकासक्रम
    • वर्ष 2006: ब्रिक्स की पहली बैठक विदेश मंत्रियों के स्तर पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर न्यूयॉर्क में आयोजित हुई।
    • वर्ष 2009: राष्ट्राध्यक्षों का पहला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित हुआ।
    • वर्ष 2010: दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने से समूह का विस्तार हुआ और ब्रिक से ब्रिक्स बना।
    • वर्ष 2023: जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के परिणामस्वरूप ब्रिक्स का दूसरा विस्तार हुआ, जिसमें छह नए सदस्यों को सम्मिलित किया गया।
  • उद्देश्य: ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य वैश्विक शासन में सुधार करना तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी पश्चिम-प्रधान संस्थाओं के विकल्प प्रस्तुत करना है।
  • ब्रिक्स एक अनौपचारिक समन्वय तंत्र बना हुआ है, जिसकी अध्यक्षता उसके सदस्यों के बीच वार्षिक रूप से चक्रीय आधार पर होती है।
  • सहयोग के स्तंभ: संदर्भ शर्तों के अनुसार, ब्रिक्स साझेदारी तीन सहयोग स्तंभों पर आधारित है:
    • राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग
    • आर्थिक और वित्तीय सहयोग
    •  ‘जन-से-जन’ या नागरिक समाज सहयोग।
  • सदस्य
    • प्रारंभिक सदस्य (ब्रिक्स): ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका।
    • नए सदस्य (ब्रिक्स प्लस): मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात।
    • ब्रिक्स साझेदार देश
      • वर्ष 2024 में कजान शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स ने “ब्रिक्स साझेदार देश” नामक एक नई श्रेणी की शुरुआत की।
      • बेलारूस, बोलीविया, कजाख़स्तान, नाइजीरिया, मलेशिया, थाईलैंड, क्यूबा, वियतनाम, युगांडा और उज्बेकिस्तान
    • ब्रिक्स की सदस्यता और साझेदारी में रुचि: वर्ष 2024 के दौरान, 30 से अधिक देशों ने सदस्य या साझेदार के रूप में ब्रिक्स से जुड़ने में रुचि व्यक्त की।
  • अन्य सहभागिता माध्यम
    • ब्रिक्स “आउटरीच”: वर्ष 2013 में दक्षिण अफ्रीका द्वारा प्रारंभ किया गया, जिसके अंतर्गत वर्तमान अध्यक्षता रखने वाले देश के भौगोलिक क्षेत्र के देशों के साथ ब्रिक्स सदस्यों की बैठकें आयोजित होती हैं।
    • ब्रिक्स “प्लस”: वर्ष 2017 में चीन द्वारा प्रारंभ, जिसके अंतर्गत ब्रिक्स सदस्यों और आमंत्रित गैर-क्षेत्रीय देशों के प्रतिनिधियों के मध्य बैठकें आयोजित होती हैं।

ब्रिक्स से संबंधित आँकड़े

  • वैश्विक आर्थिक हिस्सेदारी: वर्ष 2024 में छह नए सदस्यों के सम्मिलन के बाद, वर्ष 2023 में क्रय शक्ति समता के आधार पर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में ब्रिक्स की हिस्सेदारी लगभग 39 प्रतिशत हो गई है।
  • आर्थिक वृद्धि अनुमान: वर्ष 2024 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने सभी ब्रिक्स देशों के लिए सकारात्मक आर्थिक वृद्धि का अनुमान लगाया, जिसकी दरें 1.1 प्रतिशत से 6.1 प्रतिशत के बीच रहीं।
  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार: ब्रिक्स देश वैश्विक व्यापार का 24 प्रतिशत भाग वहन करते हैं।
  • जनसांख्यिकी: ब्रिक्स विश्व की 48.5 प्रतिशत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
  • भौगोलिक विस्तार: विश्व के कुल स्थलीय क्षेत्र का लगभग 36 प्रतिशत।
  • संसाधन नियंत्रण
    • दुर्लभ मृदा खनिजों के वैश्विक भंडार का 72 प्रतिशत।
    • वैश्विक तेल उत्पादन का 43.6 प्रतिशत।
    • विश्व के प्राकृतिक गैस उत्पादन का 36 प्रतिशत।
    • वैश्विक खनिज कोयला उत्पादन का 78.2 प्रतिशत।

ब्रिक्स की प्रमुख पहलें

  • न्यू डवलपमेंट बैंक (NDB): ‘न्यू डवलपमेंट बैंक’ की स्थापना वर्ष 2014 में ब्राजील के फोर्टालेजा में आयोजित छठे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में की गई।
    • इसका मुख्य उद्देश्य विकासशील देशों में अवसंरचना और सतत् विकास परियोजनाओं के लिए संसाधनों का वित्तपोषण करना है।
  • पूँजी और वित्तपोषण: न्यू डवलपमेंट बैंक की अधिकृत पूँजी 100 अरब अमेरिकी डॉलर है, जिसमें से 52.7 अरब अमेरिकी डॉलर चुकता पूँजी के रूप में है।
  • न्यू डवलपमेंट बैंक का शासन
    • इसका मुख्यालय शंघाई में है तथा साओ पाउलो और भारत के गुजरात में इसके कार्यालय हैं।
    • इसका संचालन बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा किया जाता है, जिसमें प्रत्येक सदस्य देश के वित्त मंत्रालय शामिल होते हैं।
  • चक्रीय अध्यक्षता
    • न्यू डवलपमेंट बैंक में चक्रीय अध्यक्षता की व्यवस्था है, जिसमें कोई एक देश ब्रिक्स का प्रतिनिधित्व करता है।
    • प्रत्येक देश चार उपाध्यक्षों को नामित करने के लिए भी उत्तरदायी होता है।
  • न्यू डवलपमेंट बैंक की सदस्यता
    • प्रारंभ में बैंक की स्थापना ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका द्वारा की गई थी।
    • वर्ष 2021 से 2023 के बीच बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र को सदस्य के रूप में शामिल किया गया।
    • उरुग्वे और अल्जीरिया वर्तमान में न्यू डवलपमेंट बैंक में शामिल होने की प्रक्रिया में हैं।
    • ब्रिक्स में शामिल होना स्वचालित रूप से न्यू डवलपमेंट बैंक की सदस्यता की गारंटी नहीं देता।
  • आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था: इसकी स्थापना भी वर्ष 2014 में फोर्टालेजा में आयोजित छठे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में की गई।
    • यह 100 अरब अमेरिकी डॉलर का आपातकालीन आरक्षित कोष है, जिसका उद्देश्य भुगतान संतुलन संकट का सामना कर रहे ब्रिक्स सदस्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
    • यह व्यवस्था पूर्णतः क्रियाशील है और किसी भी सदस्य की पहल पर किसी भी समय उपलब्ध है।
  • ब्रिक्स पे: यह एक प्रस्तावित प्रणाली है, जिसका उद्देश्य स्थानीय मुद्राओं के माध्यम से ब्रिक्स देशों के बीच भुगतान को सुगम बनाना है, जिससे पारंपरिक वैश्विक भुगतान प्रणालियों पर निर्भरता को समाप्त किया जा सके।

संदर्भ

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नए शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के लिए लाइसेंसिंग विंडो को पुनः खोलने का प्रस्ताव रखा है।

संबंधित तथ्य

  • RBI ने लगभग वर्ष 2004 के बाद नए UCB लाइसेंस जारी करना बंद कर दिया था, क्योंकि यह पाया गया था कि हाल ही में लाइसेंस प्राप्त कई UCB अल्प अवधि में ही वित्तीय रूप से अस्थिर हो गए थे।

पूँजी से जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात (CRAR) किसी बैंक की पूँजी पर्याप्तता को उसकी पूँजी निधि को जोखिम-भारित परिसंपत्तियों के प्रतिशत के रूप में व्यक्त करके मापता है।

RBI के विवरण पत्र (Discussion Paper) के प्रमुख प्रस्ताव

  • UCB लाइसेंसिंग: RBI का प्रस्ताव केवल बड़े सहकारी ऋण समितियों के लिए है, जिनका न्यूनतम 10 वर्षों का सक्रिय संचालन हो तथा कम-से-कम 5 वर्षों का सुदृढ़ वित्तीय ट्रैक रिकॉर्ड हो।
  • पात्रता मानदंड
    • पूँजी पर्याप्तता: पूँजी से जोखिम-भारित परिसंपत्ति अनुपात (CRAR) कम-से-कम 12% होना चाहिए।
    • NPA अनुपात: लाइसेंस के लिए आवेदन के समय शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NNPA) अनुपात 3% से अधिक नहीं होना चाहिए।

सहकारी ऋण समितियाँ

  • सहकारी ऋण समितियाँ सदस्य-स्वामित्व वाली वित्तीय सहकारी संस्थाएँ हैं, जिनका गठन अपने सदस्यों को वहनीय ब्याज दरों पर अल्पकालिक और मध्यम अवधि का ऋण प्रदान करने के लिए किया जाता है।
  • आधारभूत सिद्धांत: ये समितियाँ पारस्परिक सहायता, लोकतांत्रिक नियंत्रण और लाभ से पहले सेवा के सिद्धांतों पर कार्य करती हैं।
  • कानूनी एवं संस्थागत ढाँचा
    • इनका विनियमन सहकारी समितियों के पंजीयक द्वारा किया जाता है, न कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा, और ये पूर्ण बैंकिंग सेवाओं के बिना केवल सदस्यों के साथ ही लेन-देन कर सकती हैं।
  • उद्देश्य
    • ऋण तक पहुँच: मुख्य उद्देश्य उन सदस्यों को समय पर और किफायती ऋण उपलब्ध कराना है, जिनकी औपचारिक बैंकिंग तक पहुँच नहीं है।
    • शोषण की रोकथाम: सहकारी ऋण समितियों का उद्देश्य साहूकारों पर निर्भरता कम करना और शोषणकारी ब्याज दरों पर अंकुश लगाना है।
    • बचत को बढ़ावा देना: ये सदस्यों में मितव्ययिता और बचत की आदत को प्रोत्साहित करती हैं।
    • सामाजिक-आर्थिक विकास: ये समितियाँ विशेष रूप से ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थानीय आर्थिक विकास और वित्तीय समावेशन को समर्थन देती हैं।

UCB लाइसेंस प्रदान करने में चुनौतियाँ

  • शासन संबंधी जोखिम: भारतीय रिजर्व बैंक ने पूँजी जुटाने में कठिनाइयों और UCBs शेयरों की विशेषताओं के कारण पूँजी संरचना में अस्थिरता जैसी चिंताओं को रेखांकित किया है, जो हानि अवशोषक के रूप में इसकी क्षमता को कमजोर बनाती हैं।

  • निवेश प्रोत्साहन का अभाव: “एक सदस्य, एक वोट” के सिद्धांत के कारण विकास हेतु पूँजी आकर्षित करना कठिन हो जाता है, जिससे कमजोर बैंकों के समाधान में बाधा आती है।
  • छोटे UCB में कमजोर शासन: छोटे UCBs को प्रायः प्रबंधन संबंधी धोखाधड़ी, कमजोर प्रशासन और निदेशक मंडल तथा वरिष्ठ प्रबंधन में क्षेत्रीय ज्ञान की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
  • नियामक और कानूनी बाधाएँ: बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में संशोधनों के बावजूद, कानूनी चुनौतियों और न्यायालयी हस्तक्षेपों ने UCBs में शासन करने की प्रक्रिया को धीमा कर दिया है।

शहरी सहकारी बैंक (UCBs) के बारे में 

  • UCBs सहकारी समितियाँ हैं, जो या तो राज्य सहकारी समितियाँ अधिनियम या बहु-राज्य सहकारी समितियाँ अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत होती हैं।
  • इन्हें बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत बैंकिंग लाइसेंस प्रदान किया जाता है और ये प्राथमिक सहकारी बैंकों के रूप में कार्य करती हैं।
  • भारत में UCBs की वर्तमान स्थिति
    • 31 मार्च 2025 तक, भारत में 1,457 शहरी सहकारी बैंक हैं।
    • परिसंपत्ति गुणवत्ता
      • सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात: 6.2%
      • शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात: 0.7%
      • प्रावधान कवरेज अनुपात: 90.1%।
    • परिसंपत्ति और जमा वृद्धि
      • UCBs की कुल परिसंपत्तियाँ 7.38 लाख करोड़ रुपये रहीं।
      • कुल जमा 5.84 लाख करोड़ रुपये रही, जो वर्ष 2015 की तुलना में एक महत्त्वपूर्ण वृद्धि है।
  • नियामक ढाँचा और द्वैध नियंत्रण
    • भारतीय रिजर्व बैंक: वर्ष 1966 से भारतीय रिजर्व बैंक UCBs का विनियमन कर रहा है, जिसमें लाइसेंसिंग, पूँजी पर्याप्तता, ऋण नीतियाँ, सावधानीपूर्ण मानदंड और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना शामिल है।
    • सहकारी समितियों के पंजीयक: UCBs के प्रशासनिक और प्रबंधन संबंधी पहलुओं का विनियमन सहकारी समितियों के पंजीयक द्वारा किया जाता है, जो राज्य या केंद्र सरकार के अधीन कार्य करता है।

स्तरीकृत नियामक संरचना

  • भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा UCBs को उनकी जमा राशि के आकार के आधार पर चार स्तरों में वर्गीकृत किया गया है, ताकि आनुपातिक विनियमन और पर्यवेक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
    • टियर 1 UCBs: 100 करोड़ रुपये तक।
    • टियर 2 UCBs: 100 करोड़ रुपये से अधिक और 1,000 करोड़ रुपये तक।
    • टियर 3 UCBs: 1,000 करोड़ रुपये से अधिक और 10,000 करोड़ रुपये तक।
    • टियर 4 UCBs: 10,000 करोड़ रुपये से अधिक।

UCBs और वाणिज्यिक बैंकों के बीच अंतर

पहलू शहरी सहकारी बैंक (UCBs) वाणिज्यिक बैंक
स्वामित्व शहरी सहकारी बैंक अपने सदस्यों के स्वामित्व में होते हैं, जो सहकारी सिद्धांत के अंतर्गत जमाकर्ता और उधारकर्ता दोनों होते हैं। वाणिज्यिक बैंक शेयरधारकों के स्वामित्व में होते हैं, जिनमें सरकार, संस्थान या निजी निवेशक शामिल हो सकते हैं।
विनियमन इन पर द्वैध विनियमन लागू होता है, जिसमें बैंकिंग परिचालन का विनियमन भारतीय रिजर्व बैंक करता है, जबकि प्रबंधन और पंजीकरण का विनियमन राज्य सरकार या केंद्र सरकार करती है। इनका विनियमन केवल भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत किया जाता है।
ऋण देने का फोकस ये मुख्यतः छोटे व्यापारियों, वेतनभोगी व्यक्तियों, स्वरोजगार में संलग्न शहरी एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को ऋण प्रदान करते हैं। इनका ऋण पोर्टफोलियो विविध होता है, जिसमें बड़े उद्योग, अवसंरचना, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम, कृषि, खुदरा और सेवा क्षेत्र शामिल हैं।
मतदान का अधिकार “एक सदस्य, एक वोट” के सिद्धांत का पालन किया जाता है, चाहे कितने ही शेयर क्यों न हों। “एक शेयर, एक वोट” के सिद्धांत का पालन किया जाता है, जिसमें मतदान अधिकार शेयरधारण के अनुपात में होते हैं।

संदर्भ

हाल ही में मिजोरम के चकमा स्वायत्त जिला परिषद (CADC) में जारी राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक चुनौतियों के कारण राज्यपाल शासन को छह माह के लिए और बढ़ा दिया गया है।

CADC के बारे में

  • संवैधानिक आधार: वर्ष 1972 में भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत गठित।
  • उद्देश्य: मिजोरम में चकमा लोगों के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक हितों की रक्षा करना।

चकमा लोग

  • जनसांख्यिकी: मिजोरम में मिजो के बाद दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जनजाति।
  • भाषा: चकमा (चंगमा भजचारे) भाषा बोलते हैं।
  • धर्म: मुख्यतः बौद्ध समुदाय।
  • जीविका: परंपरागत रूप से झूम (स्थानांतरण) कृषि पर आधरित।
  • निवास क्षेत्र
    • चटगाँव हिल ट्रैक्ट्स (बांग्लादेश)।
    • उत्तर-पूर्वी भारत: मुख्यतः मिजोरम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश।

राज्यपाल शासन की पृष्ठभूमि

  • राज्यपाल शासन का आरोपण: क्षेत्र में राजनीतिक अस्थिरता के कारण 7 जुलाई, 2025 को राज्यपाल ने CADC के कार्यों एवं शक्तियों को प्रारंभिक छह माह की अवधि के लिए अपने अधीन ले लिया था।
  • विस्तार का कारण: विशेष रूप से मुख्य कार्यकारी सदस्य (CEM) को हटाए जाने के बाद परिषद में निरंतर राजनीतिक अनिश्चितता।

राज्यपाल शासन का संवैधानिक आधार 

  • अनुच्छेद-244: असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों के संबंध में छठी अनुसूची को लागू करता है।
  • पैरा 12A (छठी अनुसूची): प्रशासन में विफलता या अनुसूची के अनुसार कार्य न होने की स्थिति में राज्यपाल को जिला या क्षेत्रीय परिषद के सभी या किसी भी कार्य/शक्तियों को अपने अधीन लेने का अधिकार प्रदान करता है।

स्वायत्त जिला परिषद के बारे में

  • स्वायत्त जिला परिषदें (ADCs) भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत स्थापित स्वशासी जनजातीय प्रशासनिक निकाय हैं।
    • छठी अनुसूची अनुच्छेद-244 के अनुसार, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के उत्तर-पूर्वी राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है।
  • यह जनजातीय क्षेत्रों के लिए एक विशेष स्वायत्त शासन ढाँचा प्रदान करती है ताकि उनके अधिकारों की रक्षा हो सके और स्व-प्रशासन को सक्षम बनाया जा सके।

छठी अनुसूची के प्रमुख प्रावधान

  • स्वायत्तता एवं प्रशासन: राज्यपाल को स्वायत्त जिलों की सीमाओं में परिवर्तन करने तथा उनके नाम बदलने की शक्ति प्राप्त है।
  • विधि का प्रवर्तन
    • संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियम स्वायत्त जिलों और क्षेत्रों में स्वतः लागू नहीं होते।
    • जनजातीय हितों की रक्षा सुनिश्चित करने हेतु वे निर्दिष्ट संशोधनों और अपवादों के साथ लागू किए जा सकते हैं।

संरचना एवं सदस्यता

  • संरचना: ADCs में अधिकतम 30 सदस्य होते हैं, जिनमें 26 वयस्क मताधिकार के माध्यम से निर्वाचित तथा चार राज्यपाल द्वारा नामित होते हैं।
  • कार्यकाल: पाँच वर्ष का कार्यकाल।

ADCs की शक्तियाँ

  • विधायी शक्तियाँ: ADCs को भूमि, वन (आरक्षित वनों को छोड़कर), जल संसाधन, कृषि, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा सामाजिक रीति-रिवाजों पर विधि निर्माण का अधिकार है।
  • कार्यकारी शक्तियाँ: ADCs ग्राम परिषदों, पारंपरिक मुखियाओं तथा स्थानीय विधि के प्रवर्तन के प्रशासन के लिए उत्तरदायी होते हैं।
    • वे जनजातीय क्षेत्रों के भीतर उत्तराधिकार कानून, स्थानीय शासन और संसाधन प्रबंधन से जुड़े मामलों का निपटान करते हैं।
    • ADCs अपने जिले के भीतर प्राथमिक विद्यालयों, औषधालयों, बाजारों, फेरी सेवाओं, मत्स्यपालन और सड़कों जैसी सार्वजनिक सुविधाओं की स्थापना, रखरखाव या प्रबंधन कर सकते हैं।
  • न्यायिक शक्तियाँ: अनुसूचित जनजातियों के मध्य विवादों के लिए जनजातीय न्यायालयों की स्थापना करना; ऐसे मामलों में अधिकार क्षेत्र प्राप्त है, जहाँ दोनों पक्ष अनुसूचित जनजाति से संबंधित हों और सजा पाँच वर्ष से कम हो।

स्वायत्त जिला परिषदों की सूची

असम

  • बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल
  • कार्बी आंगलॉन्ग स्वायत्त परिषद
  • दीमा हसाओ स्वायत्त जिला परिषद

मेघालय

  • गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद
  • जयंतिया हिल्स स्वायत्त जिला परिषद
  • खासी हिल्स स्वायत्त जिला परिषद

त्रिपुरा

  • त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद

मिजोरम

  • चकमा स्वायत्त जिला परिषद
  • लाई स्वायत्त जिला परिषद
  • मारा स्वायत्त जिला परिषद।

संदर्भ 

विभिन्न क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को तेजी से अपनाने से पर्यावरण को काफी नुकसान होता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बारे में

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंप्यूटर विज्ञान की एक शाखा है, जिसका उद्देश्य तर्क (नियमों का उपयोग करके निष्कर्ष निकालना), अधिगम (सूचना और उसके उपयोग के लिए नियम प्राप्त करना) और स्वतः सुधार करने में सक्षम प्रणालियाँ विकसित करना है।
  • उद्देश्य
    • आर्थिक विकास, उत्पादकता वृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देना।
    • AI नेतृत्व भू-राजनीतिक शक्ति, आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा और रणनीतिक स्वायत्तता का निर्धारक है।
  • अनुप्रयोग के प्रमुख क्षेत्र: शासन, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, रक्षा, विनिर्माण, शिक्षा, वित्त, जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्रवाई और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना।

AI बाजार आयाम

  • वैश्विक AI बाजार: वैश्विक AI अर्थव्यवस्था का अनुमान लगभग 400-450 अरब अमेरिकी डॉलर (2026) है और 2030 के दशक की शुरुआत तक इसके 2-2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर को पार करने का अनुमान है।
    • वृद्धि दर: AI बाजार लगातार उच्च दोहरे अंकों की वृद्धि (लगभग 26-30% CAGR) दर्ज कर रहा है।
    • बुनियादी ढाँचे पर व्यय: AI क्षेत्र में उच्च पूँजीगत व्यय (डेटा सेंटर, एडवांस चिप्स, क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर) वर्ष 2026 के अंत में कुल मिलाकर 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है।
  • भारतीय AI बाजार: भारत का AI बाजार वर्ष 2027 तक लगभग 15-20 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
    • वृद्धि दर: भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ते AI बाजारों में से एक है, जिसकी अनुमानित CAGR 25-35% है।
    • प्रतिभा का लाभ: भारत का योगदान वैश्विक AI प्रतिभा भंडार में लगभग 16% हिस्सा है, जो इसे विश्व स्तर पर दूसरा स्थान देता है।
      • वर्ष 2026 के अंत तक AI कार्यबल की माँग 10 लाख पेशेवरों तक पहुँचने की उम्मीद है।

पर्यावरण में AI की भूमिका

  • प्रदूषण एवं पर्यावरण शासन: AI प्लेटफॉर्म पर्यावरण संबंधी डेटा की निगरानी, ​​अनुपालन और जनता की पहुँच में सुधार करते हैं।
    • उदाहरण: महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का ग्रीनमाइंड AI नियामकों और नागरिकों को पर्यावरण अनुपालन में सहायता करता है।
  • सतत् कृषि: AI सटीक खेती, फसलों में रोगों की शीघ्र पहचान और संसाधनों के अनुकूलित उपयोग को सक्षम बनाता है, जिससे रासायनिक इनपुट और जल खपत कम होती है।
    • उदाहरण: IIIT इलाहाबाद की AI प्रणाली वास्तविक समय में फसल में रोगों का पता लगाती है, जिससे शीघ्र हस्तक्षेप में मदद मिलती है और अनावश्यक रासायनिक इनपुट कम होते हैं।
  • स्मार्ट शहरी एवं संसाधन प्रबंधन: AI यातायात प्रवाह और वायु गुणवत्ता निगरानी को अनुकूलित करता है, जिससे शहरी पर्यावरण पर दबाव कम होता है।
    • उदाहरण: प्रोजेक्ट ग्रीन लाइट, गूगल की एक पहल है, जो शहरी चौराहों पर यातायात प्रवाह को बेहतर बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करती है, जिससे वाहनों के निष्क्रिय रहने का समय, ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन कम होता है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन: पुनर्चक्रण सुविधाओं में AI-संचालित छवि पहचान तकनीक सामग्रियों को पृथक-पृथक करने में सुधार करती है, अपशिष्ट को नए उत्पादों या ऊर्जा में परिवर्तित करने की क्षमता को बढ़ाती है।
  • जैव विविधता संरक्षण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एल्गोरिदम जैव विविधता को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों, जैसे कि वनों की कटाई और वन्यजीवों की घटती आबादी, की वास्तविक समय में निगरानी करने में सक्षम बनाते हैं।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मॉडल अवैध गतिविधियों, जैसे कि शिकार और वनों की कटाई, का पता लगा सकते हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाने में मदद कर सकते हैं।
    • केरल वन विभाग द्वारा भारत की पहली AI-सक्षम वन्यजीव निगरानी प्रणाली स्थापित की गई है।
  • ऊर्जा दक्षता एवं जलवायु परिवर्तन संबंधी उपाय: AI स्मार्ट ग्रिड, भवन ऊर्जा अनुकूलन और इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग में सुधार करके ऊर्जा खपत तथा उत्सर्जन को कम करता है।
  • जलवायु मॉडलिंग एवं आपदा प्रबंधन: AI मौसम पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और जलवायु जोखिम पूर्वानुमान को बेहतर बनाकर आपदा की तैयारी में सहायक होता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता की पर्यावरणीय लागत

  • ऊर्जा की खपत
    • उच्च ऊर्जा माँग: OECD के एक कार्यपत्र के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एल्गोरिदम का विकास ऊर्जा-गहन है और इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण पर भारी लागत आती है।
      • उदाहरण के लिए, GPT-3 जैसे बड़े AI मॉडल को प्रशिक्षित करने में 2,56,000 किलोवाट-घंटे बिजली की खपत होती है, जो किसी घर को 20 वर्षों से अधिक समय तक विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है।
  • कार्बन फुटप्रिंट
    • वैश्विक सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) उद्योग, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) के लगभग 1.8%-3.9%  उत्सर्जन  के लिए जिम्मेदार है।
  • संसाधनों की कमी
    • AI सर्वर एंड कूलिंग: UNEP की एक रिपोर्ट के अनुसार, AI डेटा सेंटर वर्ष 2027 तक शीतलन प्रणालियों के लिए 4.2 से 6.6 अरब घन मीटर जल का उपयोग कर सकते हैं।
    • कच्चा माल: AI हार्डवेयर के लिए दुर्लभ मृदा धातुएँ, लीथियम, कोबाल्ट, ताँबा और स्वर्ण आवश्यक हैं।
      • इन सामग्रियों के खनन से पर्यावास का विनाश, जल प्रदूषण और अत्यधिक ऊर्जा खपत होती है।
  • ई-अपशिष्ट उत्पादन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के नवाचार की तीव्र गति के कारण हार्डवेयर अप्रचलित हो रहे हैं और ई-अपशिष्ट उत्पन्न हो रहा है।
    • अनुसंधान के अनुसार, वर्ष 2030 तक ई-अपशिष्ट की कुल मात्रा 12 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 50 लाख मीट्रिक टन तक पहुँच सकती है, जो वर्ष 2023 में उत्पादित ई-कचरे से लगभग 1000 गुना अधिक है।
  • जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव
    • अप्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन: हालाँकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग ऊर्जा दक्षता को अनुकूलित करने के लिए किया जा सकता है (उदाहरण के लिए, स्मार्ट ग्रिड या स्वचालित इमारतों में), लेकिन इसका समग्र कार्बन फुटप्रिंट चिंताजनक है।
      • बड़े AI मॉडल, जैसे कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM), को प्रशिक्षित करने और संचालित करने से जीवाश्म ईंधन से संचालित होने पर कार्बन उत्सर्जन में महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है।
        • उदाहरण के लिए, एक एकल LLM को प्रशिक्षित करने से लगभग 3,00,000 किलोग्राम CO2 उत्सर्जित होती है, जो पाँच कारों द्वारा अपने पूरे जीवनकाल में उत्पादित उत्सर्जन के बराबर है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए वैश्विक पहल

  • यूनेस्को की अनुशंसा (2021): ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता पर सिफारिश’ को लगभग 190 देशों ने अपनाया है।
    • यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े पर्यावरणीय जोखिमों को पहचानने और कम करने की आवश्यकता पर बल देती है।
  • ‘पेरिस एक्शन समिट’ की विरासत (2025): पिछले शिखर सम्मेलनों के आधार पर, पेरिस शिखर सम्मेलन ने आधिकारिक तौर पर सुरक्षा के साथ-साथ AI स्थिरता को तीसरे स्तंभ के रूप में शामिल किया।
  • G7 AI हब फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (2025): G7 देशों और UNDP द्वारा समर्थित यह पहल, वैश्विक दक्षिण में नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना को AI डेटा केंद्रों के साथ एकीकृत करती है।
  • अमेरिका: कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर्यावरणीय प्रभाव अधिनियम (2024)
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कार्बन फुटप्रिंट पर रिपोर्टिंग और पारदर्शिता को अनिवार्य बनाता है।
    • AI के विकास और तैनाती के लिए स्थिरता मानकों को प्रोत्साहित करता है।
  • यूरोपीय संघ (EU): समरूप कृत्रिम बुद्धिमत्ता नियमों पर संकल्प
    • AI विनियमन में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को एकीकृत करता है।
    • सदस्य देशों में हरित AI प्रथाओं को बढ़ावा देता है।
    • ऊर्जा, जल और उत्सर्जन के लिए मानकीकृत मापदंडों पर ध्यान केंद्रित करता है।

सतत AI के लिए भारत की पहलें

  • प्लैनेट सूत्रा फ्रेमवर्क (IndiaAI इंपैक्ट समिट, 2026): भारत ने IndiaAI इंपैक्ट समिट की मेजबानी करते हुए प्लैनेट सूत्रा पेश किया, जिससे वह ग्लोबल साउथ में एक नेतृत्वकारी राष्ट्र के रूप में अपनी स्थिति स्थापित करता है।
    • यह अनिवार्य पारदर्शिता, सार्वभौमिक ग्रीन कंप्यूट और राष्ट्रीय AI रोडमैप में पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को एकीकृत करने पर जोर देता है।
  • ग्रीन कंप्यूट स्तंभ (IndiaAI मिशन): ₹10,372 करोड़ में से एक बड़ा हिस्सा ग्रीन डेटा सेंटरों को आवंटित किया गया है, जिन्हें नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (RECs) का उपयोग करना और पॉवर यूसेज इफेक्टिवनेस (PUE) 1.2 से कम बनाए रखना अनिवार्य है। इससे AI अवसंरचना में ऊर्जा का कुशल उपयोग सुनिश्चित होता है।
  • भारतजेन मॉडल (2025): भारत का यह आधारभूत AI मॉडल मितव्ययी प्रशिक्षण का उपयोग करता है, जिससे यह भारतीय भाषाओं के लिए उच्च प्रदर्शन प्राप्त करता है, जबकि वैश्विक समकक्ष मॉडलों की तुलना में लगभग 40% कम कंप्यूट शक्ति का उपयोग करता है।
    • यह दर्शाता है कि AI की दक्षता और पर्यावरणीय सततता एक साथ सह-अस्तित्व में रह सकती हैं।

एजेंटिक AI कृत्रिम बुद्धिमत्ता की एक नई पीढ़ी है, जो स्वायत्तता और उद्देश्यपूर्ण कार्यक्षमता के साथ कार्य करती है। यह केवल निर्देशों पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लक्ष्य निर्धारित करने, योजना बनाने तथा न्यूनतम मानव हस्तक्षेप के साथ कार्यों को निष्पादित करने में सक्षम होती है।

AI के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में चुनौतियाँ

  • जटिल मापन मानक: AI के कार्बन लेखांकन के लिए कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत ढाँचा उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण आकलन असंगत रहते हैं और विभिन्न संगठनों के बीच तुलनात्मकता कमजोर हो जाती है।
  • एजेंटिक AI का उभार: लगातार पृष्ठभूमि में कार्य करने वाले एजेंटिक AI के बढ़ते उपयोग से केवल दो वर्षों में इंफरेंस ऊर्जा खपत में लगभग 300% की वृद्धि हुई है। इससे डेटा केंद्रों और ऊर्जा अवसंरचना पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है।
  • रिबाउंड प्रभाव (जेवन्स विरोधाभास): AI की दक्षता में हुई वृद्धि प्रायः कुल उपभोग में बढोतरी का कारण बनती है, क्योंकि परिचालन लागत घटने से इसके उपयोग में तेजी आती है। परिणामस्वरूप, शुद्ध ऊर्जा माँग बढ़ जाती है, जिसे जेवन्स विरोधाभास के रूप में समझा जाता है।
  • डेटा प्रामाणिकता और विमर्शगत पक्षपात: AI के कार्बन फुटप्रिंट से संबंधित रिपोर्टें अक्सर अधूरी या भ्रामक होती हैं। वर्तमान विमर्श में AI को जलवायु समाधान के रूप में अत्यधिक प्रस्तुत किया जाता है, जबकि बड़े पैमाने के AI मॉडलों के प्रशिक्षण से होने वाली पर्यावरणीय लागतों की उपेक्षा की जाती है।
  • नियामक एवं नीतिगत अंतराल: MeitY की AI गवर्नेंस दिशा-निर्देश (2025) सुरक्षा, लचीलापन और सततता पर बल देते हैं, किंतु इनमें जीवन-चक्र ऊर्जा रिपोर्टिंग, दक्षता लक्ष्य अथवा बड़े पैमाने के AI के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) जैसे बाध्यकारी पर्यावरणीय प्रावधानों का अभाव है। परिणामस्वरूप एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत शून्य उत्पन्न होता है, जिसकी पूर्ति के लिए कानून निर्माण या मिशन-स्तरीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
  • सामाजिक एवं समानता से जुड़े प्रभाव: AI अवसंरचना से उत्पन्न पर्यावरणीय बोझ असमान रूप से ग्लोबल साउथ और संवेदनशील समुदायों पर पड़ता है। प्रमुख डेटा केंद्रों के आस-पास के जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में इसका प्रभाव स्थानीय जनसंख्या और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल रूप से दिखाई देता है।

आगे की राह 

  • ग्रीन डेटा सेंटर नेतृत्व: भारत द्वारा IndiaAI मिशन के अंतर्गत डेटा केंद्रों के लिए पावर यूसेज इफेक्टिवनेस (PUE) 1.2 से कम तथा 100% नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाण-पत्र (RECs) को अनिवार्य किया जाना, विकासशील देशों के लिए एक वैश्विक मानक स्थापित करता है। यह दर्शाता है कि उच्च-प्रदर्शन AI अवसंरचना आक्रामक डी-कार्बनाइजेशन लक्ष्यों के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती है।
  • मितव्ययी एवं लघु भाषा मॉडल: भारत युक्‍ति और वार्ता जैसे SLMs को प्राथमिकता दे रहा है, जिन्हें मोबाइल उपकरणों या एज सर्वरों पर संचालित किया जा सकता है। इससे डेटा केंद्रों पर भार, नेटवर्क ट्रैफिक तथा ऊर्जा खपत में उल्लेखनीय कमी आती है।
    • युक्‍ति और वार्ता भारत के IndiaAI मिशन के अंतर्गत विकसित किए गए नए लघु भाषा मॉडल  (SLM) हैं।
  • परिपत्र हार्डवेयर अर्थव्यवस्था: ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियमों को सुदृढ़ कर तथा हार्डवेयर पासपोर्टिंग को अनिवार्य बनाकर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रत्येक GPU और AI हार्डवेयर के लिए पुनर्चक्रण तथा पुनर्नवीनीकरण की स्पष्ट व्यवस्था हो। इससे कोबाल्ट और लीथियम जैसे दुर्लभ खनिजों की पुनर्प्राप्ति संभव होगी।
  • सतत् AI प्रथाएँ: पूर्व-प्रशिक्षित मॉडलों को अपनाना, नवीकरणीय ऊर्जा आधारित डेटा केंद्रों की स्थापना तथा ऊर्जा-कुशल प्रशिक्षण तकनीकों का उपयोग यह सुनिश्चित करता है कि AI विकास की कार्बन फुटप्रिंट न्यूनतम रहे।
  • ग्रीन-फिकेशन के लिए AI: राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, स्मार्ट ग्रिड तथा जलवायु निगरानी जैसी पहलों में AI का उपयोग, AI के स्वयं के पर्यावरणीय प्रभाव की क्षतिपूर्ति करने में सहायक होता है, जिससे AI समाधान का माध्यम भी बनता है और जिम्मेदार संसाधन उपभोक्ता भी।
  • मानकीकरण और मापन: ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, ऊर्जा, जल तथा प्राकृतिक संसाधन उपभोग से संबंधित सततता मापदंडों को लागू करना नीति-निर्माण, विनियमन तथा कॉरपोरेट उत्तरदायित्व को दिशा प्रदान कर सकता है।
  • अन्य 
    • बड़े AI मॉडलों के लिए अनिवार्य पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA): EIA अधिसूचना, 2006 का विस्तार कर उच्च-कंप्यूट AI परियोजनाओं को इसके दायरे में लाया जाना चाहिए। इसके अंतर्गत चिप निर्माण, मॉडल प्रशिक्षण, परिनियोजन तथा ई-अपशिष्ट निपटान तक पूरे जीवन-चक्र का पर्यावरणीय आकलन अनिवार्य किया जाए।
    • ग्रीन कंप्यूट टैक्सोनॉमी: ऊर्जा दक्षता, कार्बन तीव्रता तथा जल उपयोग के आधार पर AI प्रणालियों के वर्गीकरण हेतु राष्ट्रीय ग्रीन कंप्यूट टैक्सोनॉमी विकसित की जाए, जिसमें कम-कार्बन AI मॉडलों को कर एवं वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किए जाएँ।
    • जिला-स्तरीय डेटा सेंटर जोनिंग: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में डेटा सेंटर की स्थापना को सीमित करने हेतु जिला-स्तरीय जोनिंग लागू की जाए तथा नवीकरणीय ऊर्जा-समृद्ध और कम-जोखिम वाले तटीय क्षेत्रों में AI अवसंरचना को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष

भारत का संधारणीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के प्रति दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद-48A और 51A(g) में निहित प्रावधानों के अनुरूप है। यह दृष्टिकोण इस बात को सुदृढ़ करता है कि राज्य का दायित्व है कि वह तकनीकी प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखे।

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PCA) की धारा 17A की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर विभाजित निर्णय सुनाया।

  • विचारों में मतभेद के कारण, इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष एक बड़ी न्यायिक पीठ गठित करने के लिए भेजा गया है।

मुख्य विशेषताएं

  • न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना (“एंटी-शील्ड” दृष्टिकोण): उन्होंने तर्क दिया कि इस कानून को रद्द कर दिया जाना चाहिए क्योंकि:-
    • कानून के समक्ष समानता: अनुच्छेद-14 के तहत सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। यह कानून अधिकारियों का एक ‘विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग’ बनाता है, जिन्हें कानून से संरक्षण प्राप्त है, जबकि सामान्य नागरिकों को नहीं।
    • पूर्व उदाहरण: सर्वोच्च न्यायालय ने पहले भी इसी तरह के कानूनों को रद्द किया है (जैसे सुब्रमण्यम स्वामी मामला, वर्ष 2014 में)।
      • सीबीआई जाँच मामला (डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, सीबीआई), जिसने वरिष्ठ सिविल सेवकों के विरुद्ध सीबीआई जाँच के लिए सरकार की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता वाले ‘एकल निर्देश’ को रद्द कर दिया, जिससे उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में पूर्वव्यापी प्रभाव की अनुमति मिल गई।
    • न्याय में अवरोध: यदि सरकार को यह तय करने का अधिकार मिल जाए कि किसकी जाँच की जाएगी, तो वे अपने “पसंदीदा” लोगों को बचा सकते हैं, जिससे संस्थागत भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है।
  • न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (‘दक्षता-समर्थक’ दृष्टिकोण): उन्होंने तर्क दिया कि कानून को बरकरार रखा जाना चाहिए, लेकिन उसमें संशोधन किया जाना चाहिए क्योंकि:-
    • नीतिगत गतिरोध: प्रक्रियात्मक सुरक्षा के अभाव में, ईमानदार लोक सेवक साहसिक या नवोन्मेषी निर्णय लेने से हिचक सकते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि उनकी वास्तविक प्रशासनिक कार्रवाइयों पर बाद में निराधार या दुर्भावनापूर्ण शिकायतें आ सकती हैं, जिससे लंबी जाँच और उत्पीड़न हो सकता है।
    • प्रतिष्ठा संरक्षण: एक ईमानदार अधिकारी के लिए, फर्जी FIR ‘किसी नागरिक की मृत्यु’ के समान है। उनका मानना ​​था कि वास्तविक मामलों को दुर्भावनापूर्ण मामलों से अलग करने के लिए एक छँटाई तंत्र होना चाहिए।
    • सिफारिश: उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार द्वारा अनुमति देने के बजाय, लोकपाल या लोकायुक्त जैसे स्वतंत्र निकाय को निर्णय लेना चाहिए। इससे “हितों का टकराव” दूर हो जाता है।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PCA) की धारा 17A के तहत न्यायिक मामले

वाद का नाम मुद्दे बिंदु
महाराष्ट्र राज्य बनाम डॉ. भिवंडीवाला (2018) लोक सेवकों की जाँच करने के लिए पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 17A के तहत लोक सेवकों की जाँच करने की स्थिति में पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।
लोकायुक्त बनाम कर्नाटक राज्य (2019) बिना पूर्व अनुमति के जाँच। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने में विफलता धारा 17A का उल्लंघन है और जाँच में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
अशोक कुमार बनाम भारत संघ (2020) बिना पूर्व अनुमति के जाँच शुरू की गई। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस बात की पुनः पुष्टि की कि धारा 17A के तहत पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है और इसके बिना जाँच आगे नहीं बढ़ सकती।
एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु राज्य (2020) लोक सेवक द्वारा पूर्व अनुमति के बिना कथित भ्रष्टाचार। मद्रास उच्च न्यायालय ने धारा 17A का अनुपालन न करने के कारण जाँच को रद्द कर दिया।
राम सिंह बनाम सीबीआई (2020) सीबीआई द्वारा बिना अनुमति के जाँच। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 17A लोक सेवकों के विरुद्ध जाँच के लिए सीबीआई सहित सभी जाँच एजेंसियों पर लागू होती है।
एम. एन. गोविंदन बनाम भारत संघ (2021) बिना पूर्व अनुमति के जाँच। केरल उच्च न्यायालय ने निर्णय सुनाया कि धारा 17A के तहत पूर्व स्वीकृति वैध जाँच के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PCA) की धारा 17A के बारे में

  • वर्ष 2018 के संशोधन के माध्यम से लागू की गई, PCA की धारा 17A के अनुसार, कोई भी पुलिस अधिकारी, उचित प्राधिकारी से पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना, किसी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक पद पर रहते हुए किए गए कार्यों की जाँच, पूछताछ या छानबीन नहीं कर सकता है।
  • उद्देश्य: धारा 17A को विधानमंडल द्वारा ‘नीतिगत गतिरोध’ को रोकने के लिए लागू किया गया था।
    • इसका उद्देश्य नौकरशाहों को इस भय से साहसिक निर्णय लेने में संकोच करने से रोकना है कि एक वास्तविक त्रुटि को बाद में भ्रष्टाचार के रूप में देखा जा सकता है, जिससे जाँच एजेंसियों द्वारा उत्पीड़न हो सकता है।
  • मंजूरी देने वाला अधिकारी
    • केंद्र: संघ सरकार
    • राज्य: राज्य सरकार
    • अन्य: सक्षम प्राधिकारी, जो लोक सेवक को पद से हटा सकता है।
  • अपवाद: यदि लोक सेवक रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा जाए (अर्थात्, मौके पर ही गिरफ्तार किया जाए) तो अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है।
  • समय सीमा: प्राधिकरण को 3 महीने के भीतर निर्णय देना होगा।
    • समय सीमा को 1 महीने तक बढ़ाया जा सकता है।

लोक सेवकों की सुरक्षा के लिए भारत संविधान में निहित कानूनी और संवैधानिक प्रावधान

  • संवैधानिक संरक्षण
    • अनुच्छेद-310
      • लोक सेवकों की सेवा राष्ट्रपति/राज्यपाल की इच्छा पर निर्भर होती है।
      • यह निरपेक्ष नहीं है; अनुच्छेद-311 के अंतर्गत सुरक्षा उपायों के अधीन है।
    • अनुच्छेद-311 – लोक सेवकों की बर्खास्तगी, पदच्युति 
      • उचित जाँच के बिना बर्खास्तगी, पद से हटाना या पदोन्नति में कमी नहीं की जा सकती।
      • सुनवाई का अनिवार्य और उचित अवसर।
      • मनमानी कार्यकारी कार्रवाई से सुरक्षा।
  • आपराधिक दायित्व से सुरक्षा: सरकारी कर्मचारियों को उनके आधिकारिक पद पर रहते हुए किए गए आपराधिक कृत्यों के संबंध में कुछ विशेष सुरक्षा प्राप्त होती है:
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 218 (दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की पूर्व धारा 197)
      • यह केवल तभी लागू होता है, जब कार्य का आधिकारिक कर्तव्य से उचित संबंध हो।
    • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) की धारा 19
      • लोक सेवकों पर भ्रष्टाचार के अभियोग चलाने से पहले पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।
      • उद्देश्य: उत्पीड़नकारी और प्रेरित अभियोगों को रोकना।
  • ईमानदार निर्णयों के मामले में संरक्षण
    • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) की धारा 17A
      • आधिकारिक निर्णयों की पूछताछ/जाँच से पहले पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
      • इसमें नीतिगत और प्रशासनिक निर्णय शामिल हैं।
      • इसका उद्देश्य निष्पक्ष निर्णय लेने की प्रक्रिया को जाँच के अनुचित हस्तक्षेप से बचाना है।
    • मुखबिरों की सुरक्षा
      • भ्रष्टाचार की सूचना देने वाले व्यक्तियों (व्हिसलब्लोअर्स) को व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 2014 के तहत सुरक्षा प्रदान की जाती है।
      • भ्रष्टाचार की सूचना देने वाले लोक सेवकों को तबादले, पदावनति या उत्पीड़न सहित प्रतिशोध से सुरक्षा प्रदान की जाती है।
  • अनुशासनात्मक संरक्षण
    • सिविल सेवा (अनुशासन और अपील) नियम
      • निष्पक्ष, पारदर्शी और नियम-आधारित अनुशासनात्मक कार्यवाही सुनिश्चित करना।
      • सूचना, बचाव और अपील के अधिकार।
    • केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम (CCS CCA)
      • ये नियम केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रियाओं को निर्दिष्ट करते हैं, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करते हुए मनमानी कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • न्यायिक निगरानी और उपाय: सरकारी कर्मचारियों को अवैध या मनमानी कार्रवाइयों से सुरक्षा के लिए न्यायालयों जाने का अधिकार है। न्यायपालिका एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती है, जो यह सुनिश्चित करती है कि अधिकारों के किसी भी उल्लंघन या अन्यायपूर्ण व्यवहार का समाधान किया जाए।
    • न्यायिक समीक्षा
      • न्यायालय लोक सेवकों के विरुद्ध अवैध या मनमानी कार्रवाई को रद्द कर सकते हैं।
      • यह कार्यपालिका की मनमानी पर अंकुश का कार्य करता है।
    • सेवा न्यायाधिकरण: प्रशासनिक न्यायाधिकरण [जैसे- केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT)] की स्थापना प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, 1985 के तहत लोक सेवकों की भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित विवादों के समाधान के लिए की जाती है।
      • त्वरित और विशेष निवारण प्रदान करना।
  • उत्पीड़न के खिलाफ निवारक उपाय
    • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) की धारा 4: दंडात्मक प्रावधानों के साथ-साथ वास्तविक आधिकारिक कार्यों के लिए सुरक्षा उपाय भी शामिल हैं।
    • निजता का अधिकार: संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत लोक सेवकों को निजता का अधिकार प्राप्त है।
  • निहित सिद्धांत
    • कार्यात्मक प्रतिरक्षा का सिद्धांत: यह वास्तविक आधिकारिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को संरक्षण प्रदान करता है, साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि भ्रष्टाचार के व्यक्तिगत कृत्यों पर मुकदमा चलाया जा सके।
    • प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का सिद्धांत (‘डबल फिल्टर’ तंत्र): भारत का भ्रष्टाचार-विरोधी ढाँचा दोहरी जाँच प्रक्रिया लागू करता है- जाँच चरण में धारा 17A और अभियोजन चरण में धारा 19, ताकि तुच्छ या प्रेरित मामलों को रोका जा सके; हालाँकि, ये दो चरणीय प्रक्रिया प्रभावी भ्रष्टाचार-विरोधी प्रवर्तन में देरी या उसे कमजोर भी कर सकते हैं।
    • संकल्पित व्याख्या का सिद्धांत (रचनात्मक व्याख्या): न्यायालय किसी कानून की संवैधानिकता को बनाए रखने के लिए उसकी संकीर्ण व्याख्या कर सकती हैं, न कि उसे निरस्त करने के लिए; इस मामले में, स्वतंत्र लोकपाल जाँच को शामिल करते हुए, प्रशासनिक दक्षता और संवैधानिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाते हुए, धारा 17A को बरकरार रखा गया।

भारत में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए अन्य प्रावधान

प्रावधान विवरण
लोक सेवक (जाँच) अधिनियम, 1850 इसमें भ्रष्टाचार में लिप्त लोक सेवकों की जाँच और सजा का प्रावधान है, जिससे नौकरशाही के भीतर एक पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित होती है।
दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (CBI अधिनियम) केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) की स्थापना की गई, जो उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारियों और लोक सेवकों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करती है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PCA) भ्रष्टाचार विरोधी प्रमुख कानून लोक कर्मचारियों द्वारा रिश्वतखोरी और पद के दुरुपयोग को अपराध घोषित करता है, तथा रिश्वत के लेन-देन के लिए दंड का प्रावधान करता है।
बेनामी लेन-देन (निषेध) अधिनियम, 1988 यह कानून अवैध रूप से अर्जित धन को छिपाने के लिए बेनामी लेन-देन (किसी और के नाम पर संपत्ति लेन-देन) पर रोक लगाता है तथा व्यक्तिगत लाभ के लिए सार्वजनिक पद के दुरुपयोग को रोकता है।
धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 इसका उद्देश्य आपराधिक गतिविधियों से प्राप्त धन को लक्षित करना और भ्रष्टाचार से संबंधित गतिविधियों से प्राप्त संपत्तियों की जाँच, अभियोजन और जब्ती के लिए एक ढाँचा स्थापित करना है।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI) यह नागरिकों को सरकारी जानकारी तक पहुँच प्रदान करता है, पारदर्शिता को बढ़ावा देता है और भ्रष्टाचार के अवसरों को कम करता है।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 यह विदेशी अंशदान के उपयोग को विनियमित करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सार्वजनिक धन का दुरुपयोग न हो और विदेशी दान भ्रष्टाचार को बढ़ावा न दें।
लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 यह विधेयक लोक सेवकों और राजनेताओं के बीच भ्रष्टाचार की जाँच के लिए केंद्र स्तर पर एक स्वतंत्र लोकपाल और राज्य स्तर पर लोकायुक्तों की स्थापना करता है।
कंपनी अधिनियम, 2013 (धारा 447) यह विधेयक वित्तीय विवरणों में बदलाव और रिश्वतखोरी सहित कॉरपोरेट धोखाधड़ी को अपराध घोषित करता है और भ्रष्टाचार के लिए कॉरपोरेट अधिकारियों को जवाबदेह ठहराता है।
व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 2014 यह कानून उन व्यक्तियों को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है, जो सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र के भीतर भ्रष्टाचार या अनैतिक प्रथाओं को उजागर करते हैं।
सार्वजनिक खरीद (भारत में निर्माण को प्राथमिकता) आदेश, 2017 सरकारी खरीद में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देता है, जिससे सरकारी ठेके देने में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद कम होता है।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) की धारा 17A यह प्रावधान इसलिए लागू किया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लोक सेवकों द्वारा अपनी आधिकारिक क्षमता में लिए गए निर्णयों की जाँच करने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक हो।

धारा 17ए का महत्त्व

  • नीतिगत गतिरोध का निवारण: सद्भावनापूर्ण त्रुटियों को अपराधीकरण से रोककर, धारा 17ए सिविल सेवकों को कानूनी प्रतिशोध के निरंतर भय के बिना साहसिक और नवीन निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित करती है।
  • दुर्भावनापूर्ण अभियोजन से सुरक्षा: यह ईमानदार अधिकारियों को तुच्छ या राजनीतिक रूप से प्रेरित शिकायतों से बचाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रियात्मक चयन के रूप में कार्य करता है, जिससे कानूनी प्रणाली का दुरुपयोग उत्पीड़न के हथियार के रूप में होने से रोका जा सके।
  • सिविल प्रतिष्ठा का संरक्षण: यह सुनिश्चित करता है कि किसी अधिकारी की पेशेवर प्रतिष्ठा को अनुचित रूप से धूमिल न किया जाए। 
  • प्रशासनिक स्थिरता को बढ़ावा देना: यह प्रावधान नौकरशाही को मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान करता है। यह “सुरक्षित रहने की प्रवृत्ति” को रोकता है, जहाँ अधिकारी संभावित जाँच से बचने के लिए जिम्मेदारी लेने या आवश्यक निर्णय लेने से बचते हैं।
  • प्रक्रियात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित करना: पूर्व स्वीकृति अनिवार्य करके, यह कानून सुनिश्चित करता है कि जाँच मनमाने ढंग से शुरू न हो, जिससे राज्य की जवाबदेही और पेशेवर सुरक्षा के बीच महत्त्वपूर्ण संतुलन बना रहे।

चुनौतियाँ और कार्यान्वयन में आने वाली बाधाएँ

  • संस्थागत हितों का संघर्ष: अनुमोदन की शक्ति कार्यपालिका के पास है- वही संस्था जिसकी सेवा लोक सेवक करता है।
    • यह नेमो जुडेक्स इन कॉसा सुआ (कोई भी व्यक्ति अपने मामले में न्यायाधीश नहीं होना चाहिए) के कानूनी सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
    • इससे अक्सर संरक्षणात्मक पक्षपात’ होता है, जहाँ राजनीतिक रूप से संबद्ध नौकरशाहों को संरक्षण दिया जाता है, जबकि अन्य को चयनात्मक जाँच का सामना करना पड़ता है।
  • सुबूतों के समाप्त होने’ का खतरा: अनुमोदन प्राप्त करने के लिए आवश्यक 3 से 4 महीने की अनिवार्य देरी अक्सर सफेदपोश या वित्तीय अपराधों से संबंधित जाँचों के लिए घातक सिद्ध होती है।
    • यह समय डिजिटल साक्ष्यों को नष्ट करने, दस्तावेजों को फाड़ने या गवाहों को प्रभावित करने की अनुमति देता है, जिससे अक्सर जाँच शुरू होने से पूर्व ही अप्रचलित हो जाती है।
  • जाँच ​​स्वायत्तता का हनन: यह आवश्यकता कार्यपालिका को CBI और भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो जैसे स्वतंत्र निकायों पर वस्तुतः वीटो का अधिकार प्रदान करती है।
    • इससे एक भयभीत करने वाला माहौल’ बनता है, जहाँ जाँच एजेंसियाँ ​​इस भय से साक्ष्य जुटाने से कतरा सकती हैं कि सरकार प्रवेश स्तर पर ही इस प्रक्रिया को रोक देगी।
  • संवैधानिक “दोहरा मापदंड”: आलोचकों का तर्क है कि धारा 17A नागरिकों का एक “विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग” बनाती है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन कर सकता है।
    • आम नागरिकों के लिए मौजूद न होने वाली प्रक्रियात्मक बाधाओं को लोक सेवकों के लिए बनाकर, यह कानून आपराधिक न्याय के असमान अनुप्रयोग के रूप में देखे जाने का जोखिम उत्पन्न करता है।
  • नैतिक जोखिम और दण्डमुक्ति: ईमानदारों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ के रूप में अभिप्रेत यह प्रावधान भ्रष्टाचारियों के लिए ‘आवरण’ बन सकता है।
    • यह अधिकारियों के मध्य दंडमुक्ति की भावना उत्पन्न कर सकता है, जिससे भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टालरेंस’ की नीतियाँ कमजोर हो सकती हैं और शासन में पारदर्शिता की कमी हो सकती है।
  • नेक्सस’ परीक्षण में मनमानी: प्रारंभिक जाँच के बिना यह निर्धारित करना एक मूलभूत कठिनाई है कि कोई कार्य वैध प्रशासनिक निर्णय था या भ्रष्ट दुराचार।
    • प्रारंभिक तथ्यों तक पहुँच के बिना, अनुमोदन प्राधिकारी जाँच की अनुमति देने या अस्वीकार करने के संबंध में मनमाने निर्णय ले सकता है।

आगे की राह

  • संस्थागत पृथक्करण (“विश्वनाथन मॉडल”): जाँचों के लिए स्वीकृति देने का अधिकार राजनीतिक कार्यपालिका से एक स्वतंत्र वैधानिक निकाय को हस्तांतरित किया जाना चाहिए।
    • केंद्र में: लोकपाल को स्वीकृति देने के लिए स्क्रीनिंग प्राधिकरण के रूप में कार्य करना चाहिए।
    • राज्य स्तर पर: लोकायुक्त को गेटकीपर के रूप में कार्य करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि स्वीकृति प्रक्रिया निष्पक्ष, तटस्थ और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहे।
  • मानित स्वीकृति’ का परिचय: सरकारी निष्क्रियता के कारण होने वाली देरी से बचने के लिए, कानून में “मानित स्वीकृति” का प्रावधान शामिल किया जाना चाहिए।
    • इसका अर्थ है कि यदि स्वीकृति देने वाला प्राधिकरण निर्धारित 120 दिनों की समय सीमा के भीतर निर्णय नहीं लेता है, तो स्वीकृति स्वतः ही स्वीकृत मान ली जानी चाहिए।
    • यह सरकार को जांचों में बाधा डालने के लिए चुप्पी साधने से रोकता है।
  • आधिकारिक कर्तव्य” की वैधानिक परिभाषा: स्पष्ट विधायी दिशा-निर्देशों में यह परिभाषित होना चाहिए कि आधिकारिक कर्तव्य क्या है और रिश्वत लेना, धन शोधन या यौन उत्पीड़न जैसे कृत्यों को आधिकारिक कर्तव्य के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।
    • इससे एजेंसियों को “स्पष्ट अवैधताओं” के मामलों में धारा 17A को दरकिनार करने की अनुमति मिलेगी, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि वास्तविक गलतियों के लिए बनाए गए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों से आपराधिक कृत्यों को संरक्षण न मिल सके।
  • प्रारंभिक जाँच (PE) का मानकीकरण: प्रारंभिक जाँच (PE) को पूरी तरह से रोकने के बजाय, कानून पूर्ण जाँच की मंजूरी माँगने से पूर्व प्रथम दृष्टया साक्ष्य जुटाने के लिए एक “समयबद्ध सीमित जाँच” (जैसे, 15 दिन) की अनुमति दे सकता है।
    • इससे सरकारी मंजूरी के सुरक्षा कवच का सम्मान करते हुए प्रारंभिक जाँच कार्य आगे बढ़ सकेगा।
  • द्वितीय ARC की सिफारिशों का कार्यान्वयन: द्वितीय ARC ने सिफारिश की थी कि धारा 17A के तहत संरक्षण को उच्च-स्तरीय नीतिगत निर्णयों तक सीमित रखा जाए, जहाँ विवेकाधिकार व्यापक होता है, न कि नियमित प्रशासनिक कार्यों तक, जहाँ नियम निश्चित होते हैं।
    • इस सिफारिश को लागू करने से नियमित प्रशासनिक निर्णयों को उसी संरक्षण के अंतर्गत आने से रोका जा सकेगा, जिससे निचले स्तर के अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित होगी।

निष्कर्ष

धारा 17A पर बहस प्रशासनिक संरक्षण और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को दर्शाती है। सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ का निर्णय भारत की भ्रष्टाचार-विरोधी व्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण होगा। सुरक्षा उपायों को कार्यपालिका नियंत्रण से हटाकर स्वतंत्र निगरानी की ओर ले जाना होगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि ईमानदार अधिकारियों को मिलने वाला संरक्षण भ्रष्टों के लिए प्रतिरक्षा न बन जाए।

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