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Jan 17 2026

टायलर पुरस्कार 2026

अमेरिकी विकासवादी जीवविज्ञानी डॉ. टोबी कियर्स को वर्ष 2026 का टायलर पुरस्कार प्रदान किया गया, क्योंकि उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि भूमिगत माइकोराइजल नेटवर्क (Mycorrhizal Networks) किस प्रकार पारितंत्र और जलवायु को नियंत्रित करते हैं।

माइकोराइजल नेटवर्क (Mycorrhizal Networks)

  • माइकोराइजल नेटवर्क पौधों की जड़ों और कवकों के बीच सहजीवी संबंध होते हैं, जो लगभग सभी स्थलीय पारितंत्रों में पाए जाते हैं और पौधों के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • ‘कवकीय हाइफ’ मृदा में दूर तक विस्तृत होते हैं, जिससे पोषक तत्त्वों और जल का अवशोषण बढ़ता है।
    • ये एक “जैविक बाजार” के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ पौधों से प्राप्त कार्बन के बदले पोषक तत्त्वों का आदान-प्रदान होता है।
    • मस्तिष्क के बिना कार्य करते हुए भी ये अनुकूलनशील, माँग–आपूर्ति आधारित व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
      • उदाहरण के लिए, कवक फॉस्फोरस को प्रचुरता वाले क्षेत्रों से कमी वाले क्षेत्रों की ओर सक्रिय रूप से स्थानांतरित करते हैं।
  • प्रमुख प्रकार 
    • आर्बस्कुलर माइकोराइजा (AM): अधिकांश फसलें, घासें, उष्णकटिबंधीय पौधे।
    • एक्टोमाइकोराइजा (EM): वन आधारित जैसे-वृक्ष जैसे चीड़ और ओक।
    • ऑर्किड माइकोराइजा: ऑर्किड के बीजों के अंकुरण के लिए आवश्यक।
    • एरिकॉइड माइकोराइजा: पोषक-तत्त्व की कमी वाली मृदा में उगने वाले ‘हीथलैंड’ पौधे।
  • पारिस्थितिकी भूमिका
    • प्रतिवर्ष लगभग 13 अरब टन CO को अवशोषित करते हैं, जिससे ये प्रमुख कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं।
    • मृदा की उर्वरता, पौधों की उत्पादकता और पारितंत्र की सहनशीलता को बढ़ाते हैं।
    • प्रारंभिक पौधों को स्थल पर आवास स्थापित करने में सक्षम बनाया, जिससे स्थलीय जीवन के विकास को आकार मिला।

पर्यावरणीय उपलब्धि हेतु टायलर पुरस्कार के बारे में

  • टायलर पुरस्कार, जिसे प्रायः “पर्यावरण के लिए नोबेल पुरस्कार” कहा जाता है, पर्यावरण विज्ञान और नीति में असाधारण योगदान को सम्मानित करता है।
  • संस्थापक: यह पुरस्कार जॉन और एलिस टायलर द्वारा स्थापित किया गया था, जो पर्यावरणीय मुद्दों के बढ़ते महत्त्व को मान्यता देता है।
  • उद्घाटन: इसे वर्ष 1973 में कैलिफोर्निया के तत्कालीन गवर्नर रोनाल्ड रीगन द्वारा औपचारिक रूप से प्रारंभ किया गया।
  • चयन प्रक्रिया: टायलर पुरस्कार कार्यकारी समिति द्वारा, प्रमुख वैश्विक शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से।
  • महत्त्व
    • वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए विज्ञान-आधारित समाधानों को मान्यता देता है।
    • इसमें 2,50,000 अमेरिकी डॉलर का पुरस्कार और एक “स्टेट ऑफ द एनवायरनमेंट” संबोधन शामिल है।
    • जैव विविधता, जलवायु और स्थिरता अनुसंधान के बढ़ते महत्त्व को रेखांकित करता है।

‘पफरफिश’

भारत में ताजे जल की पफरफिश द्वारा विषाक्तता होने का पहला मामला सामने आया है, जिसने टेट्रोडोटॉक्सिन कंटामिनेशन से संबंधित एक सार्वजनिक स्वस्थ्य समस्या को प्रदर्शित किया है।

पफरफिश द्वारा विषाक्तता के बारे में

  • पफरफिश द्वारा विषाक्तता, टेट्रोडोटॉक्सिन के कारण होती है, जो एक शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिन है, जो भारतीय नदी प्रणालियों में पाई जाने वाली कुछ ताजे जल और समुद्री पफरफिश प्रजातियों में पाया जाता है।
  • मनुष्यों पर प्रभाव
    • टेट्रोडोटॉक्सिन तंत्रिका कोशिकाओं में सोडियम मार्गों को अवरुद्ध करता है, जिससे निस्तेजना, उल्टी, मांसपेशियों का पक्षाघात, श्वसन विफलता तथा संभावित रूप से मृत्यु हो सकती है।
    • ग्रामीण मछली बाजारों में जागरूकता की कमी और गलत पहचान उपभोक्ताओं की संवेदनशीलता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा देती है।
  • निवारण
    • मछुआरों, विक्रेताओं, उपभोक्ताओं और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जन-जागरूकता अभियान।
    • बाजार निगरानी, मत्स्य विषाक्तता की निगरानी, तथा पफरफिश के उपभोग के विरुद्ध स्पष्ट परामर्श।
  • उपचार: उपचार प्रारंभिक पहचान, श्वसन सहायता और लक्षणात्मक प्रबंधन पर निर्भर करता है।
    • टेट्रोडोटॉक्सिन के लिए कोई विशिष्ट प्रतिविष उपलब्ध नहीं है।

पफरफिश के बारे में

  • पफरफिश, टेट्राओडोन्टिफॉर्मीज (Tetraodontiformes) गण की मछलियाँ हैं और भारत में समुद्री, खारे तथा मीठे जल के पारितंत्रों में पाई जाती हैं।
  • भारत में प्रकार: भारत में लगभग 32 पफरफिश प्रजातियाँ आठ वंशों में पाई जाती हैं, जिनमें मीठे जल की प्रजातियाँ जैसे ‘लियोडॉन कटक्यूटिया’ शामिल हैं, जो गंगा, ब्रह्मपुत्र और महानदी घाटियों में पाई जाती हैं।
  • मानव उपभोग: पफरफिश प्रायः ‘बायकैच’ के माध्यम से खाद्य में प्रवेश कर जाती हैं और कम कीमत वाली मीठे जल की मछलियों के साथ मिश्रित रूप में बेची जाती हैं।
    • जापान के विपरीत, जहाँ लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है, भारत में पफरफिश के उपभोग हेतु कोई नियामक सुरक्षा-व्यवस्था नहीं है।

मत्स्यपालन एवं जलीय कृषि के लिए भारत–इजरायल उत्कृष्टता केंद्र

हाल ही में इजरायल में आयोजित “ब्लू फूड सिक्योरिटी: सी द फ्यूचर 2026” के द्वितीय वैश्विक शिखर सम्मेलन में भारत और इजरायल ने मत्स्यपालन और जलीय कृषि में सहयोग को गहरा करने हेतु एक संयुक्त मंत्रिस्तरीय घोषणा पर हस्ताक्षर किए।

समझौते की प्रमुख विशेषताएँ

  • सततता और क्षमता निर्माण: उत्तरदायी मत्स्यपालन, प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी, गहरे समुद्र में मत्स्यपालन, पोत डिजाइन, मछुआरों का प्रशिक्षण तथा समुद्री संसाधन संरक्षण पर बल।
  • व्यापार और नवाचार सहयोग: मत्स्यपालन और जलीय कृषि व्यापार में स्टार्ट-अप्स को प्रोत्साहन, ट्रेसबिलिटी प्रणालियों का संवर्द्धन तथा शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने हेतु संवाद।

मत्स्यपालन एवं जलीय कृषि के लिए भारत–इजरायल उत्कृष्टता केंद्र

  • इस घोषणा में मत्स्यपालन और जलीय कृषि में भारत–इजरायल उत्कृष्टता केंद्र (CoEs) स्थापित करने का प्रस्ताव है, जो 43 मौजूदा कृषि उत्कृष्टता केंद्र (CoEs) की सफलता पर आधारित होगा।
  • उद्देश्य
    • जलीय कृषि और मत्स्य प्रौद्योगिकियों में इजरायली विशेषज्ञता का हस्तांतरण।
    • मछुआरों और जलीय कृषकों के लिए अनुसंधान, नवाचार और कौशल विकास का समर्थन।
      • रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम्स (RAS), बायोफ्लॉक, केज कल्चर, एक्वापोनिक्स, मैरीकल्चर, समुद्री शैवाल की खेती, आनुवंशिक सुधार, ब्रूडस्टॉक विकास तथा रोग-मुक्त बीज उत्पादन पर संयुक्त अनुसंधान।
    • जलवायु-सहिष्णु और उच्च-उत्पादकता वाले जलीय कृषि मॉडलों का प्रदर्शन।
  • महत्त्व
    • विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक (वैश्विक उत्पादन का 8%) के रूप में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करता है।
    • सतत् आजीविकाओं और खाद्य सुरक्षा के माध्यम से ब्लू इकोनॉमी को सशक्त करता है।
    • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सतत् विकास में भारत–इजरायल रणनीतिक सहयोग को गहरा करता है।

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के अंतर्गत वंचित बच्चों के लिए 25% आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु राज्यों को निर्देश जारी किए हैं।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी प्रमुख निर्देश

  • अनिवार्य नियम-निर्माण: शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE अधिनियम) की धारा 38 के अंतर्गत राज्यों को विधिक रूप से बाध्यकारी प्रवेश नियमों का निर्माण एवं अधिसूचना करना अनिवार्य है। केवल परामर्शात्मक दिशा-निर्देशों या मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।
  • एक ‘राष्ट्रीय मिशन’: न्यायालय ने यह कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) एवं वंचित समूहों (DG) के लिए 25% आरक्षण का क्रियान्वयन राज्य का मूल दायित्व है तथा प्रभावित अभिभावकों को राहत प्रदान करने के लिए न्यायालयों से अतिरिक्त प्रयास करने का आग्रह किया।
  • संस्थागत निगरानी: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) को पूरे भारत में अनुपालन की निगरानी हेतु पक्षकार बनाया गया है तथा उसे 31 मार्च, 2026 तक नियम-निर्माण की स्थिति पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
    • बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अंतर्गत गठित NCPCR एवं राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCRs) RTE अधिनियम, 2009 के अंतर्गत समीक्षा, निगरानी एवं शिकायत निवारण के लिए उत्तरदायी हैं।
  • डिजिटल विभाजन को पाटना: न्यायालय ने यह उल्लेख किया कि केवल ऑनलाइन प्रवेश पोर्टल अनेक गरीब अभिभावकों को बाहर कर देते हैं।
    • राज्यों को भौतिक सहायता-डेस्क स्थापित करनी होंगी तथा सुलभता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सहायता प्रदान करनी होगी।
  • कक्षाओं में सद्भाव: 25% आरक्षण को सामाजिक एकीकरण का एक साधन बताया गया, जिससे अमीर और गरीब परिवारों के बच्चे एक साथ अध्ययन कर सकें तथा जाति एवं वर्ग की बाधाएँ टूट सकें।

पहलू RTE के तहत 25% आरक्षण के क्रियान्वयन का महत्त्व RTE के तहत 25% आरक्षण के क्रियान्वयन की चुनौतियाँ
समावेशी शिक्षा यह सुनिश्चित करता है कि EWS एवं वंचित समूहों के बच्चों को निजी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच मिले, जिससे समान अवसरों को बढ़ावा मिलता है। निजी विद्यालयों द्वारा 25% आरक्षण के क्रियान्वयन का प्रतिरोध, वित्तीय बोझ तथा प्रवेश प्रक्रियाओं में स्वायत्तता के संभावित ह्रास को लेकर चिंताएँ।
सामाजिक न्याय को बढ़ावा उन बच्चों को शिक्षा तक उचित पहुँच प्रदान करता है, जो अन्यथा गुणवत्तापूर्ण निजी विद्यालयों से वंचित रह जाते, जिससे सामाजिक समानता को बल मिलता है। EWS छात्रों की पहचान में संभावित असमानताएँ तथा सभी पात्र बच्चों के लिए निष्पक्ष प्रवेश प्रक्रिया सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ।
पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व वंचित बच्चों के लिए सीटों के स्पष्ट आवंटन को सुनिश्चित कर प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाता है तथा पक्षपात या पक्षधरता को कम करता है। राज्यों द्वारा नियमों एवं दिशा-निर्देशों के निर्माण और प्रवर्तन में प्रशासनिक विलंब, जिससे आरक्षण के पूर्ण क्रियान्वयन में देरी हो सकती है।
वंचित समूहों का सशक्तीकरण हाशिए पर स्थित समुदायों के बच्चों को बेहतर शैक्षिक विकल्प प्रदान कर समान अवसर उपलब्ध कराता है, जिससे वे गरीबी के चक्र को तोड़ सकें। राज्य प्राधिकारियों, निजी विद्यालयों एवं अभिभावकों के बीच जागरूकता एवं समन्वय का अभाव, विशेष रूप से ग्रामीण या वंचित क्षेत्रों में प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बन सकता है।
सार्वजनिक-निजी सहयोग को सुदृढ़ करना शिक्षा में सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करता है, जिससे निजी विद्यालय राष्ट्रीय शैक्षिक लक्ष्यों में योगदान कर सकें तथा EWS छात्रों हेतु सरकारी सहायता से लाभान्वित हों। निजी विद्यालयों पर वित्तीय भार, जिन्हें आरक्षण के क्रियान्वयन में पर्याप्त समर्थन न मिलने की भावना हो सकती है, जिससे प्रतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
शिक्षा की गुणवत्ता निजी विद्यालय विविध पृष्ठभूमि के छात्रों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान कर सकते हैं, जिससे भारत की समग्र शिक्षा प्रणाली सुदृढ़ होती है। यह सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण है कि EWS छात्रों को निजी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं सहायक सेवाएँ प्राप्त हों, विशेषकर तब जब ध्यान केवल प्रवेश पर हो और शैक्षणिक परिणामों पर नहीं।

PWOnlyIAS विशेष

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE) के बारे में

  • संवैधानिक आधार: यह अधिनियम अनुच्छेद-21A को प्रभावी बनाने हेतु अधिनियमित किया गया, जो 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है।
  • धारा 12(1)(c): यह प्रावधान निजी, अनुदान-रहित, गैर-अल्पसंख्यक विद्यालयों को उनके प्रवेश-स्तर (कक्षा 1 या पूर्व-प्राथमिक) की कम-से-कम 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) एवं वंचित समूहों (DG) के बच्चों के लिए आरक्षित करने का दायित्व देता है।
  • प्रतिपूर्ति: सरकार विधिक रूप से इन छात्रों के लिए निजी विद्यालयों को प्रतिपूर्ति करने के लिए बाध्य है, जो या तो सरकार द्वारा प्रति-छात्र किए गए व्यय के आधार पर अथवा वास्तविक विद्यालय शुल्क के आधार पर (जो भी कम हो) की जाती है।
  • उद्देश्य: शिक्षा के अतिरिक्त, यह अधिनियम सामाजिक न्याय एवं बंधुत्व को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है, ताकि एक समान विद्यालय प्रणाली का निर्माण हो सके, जहाँ विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चे एक साथ शिक्षा ग्रहण करें।

शिक्षा के अधिकार से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • मौलिक अधिकार: अनुच्छेद-21A, 6–14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है।
  • मौलिक कर्तव्य: अनुच्छेद-51A(k) माता-पिता पर यह कर्तव्य आरोपित करता है कि वे 6–14 वर्ष आयु के अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान कराएँ।
  • राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व (DPSP): अनुच्छेद-45 राज्य को 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का निर्देश देता है।
    • इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद-46 अनुसूचित जातियों (SCs), अनुसूचित जनजातियों (STs) एवं अन्य पिछड़ा वर्गों (OBCs) सहित वंचित वर्गों की शिक्षा को बढ़ावा देता है।
  • समानता एवं गैर-भेदभाव का अधिकार: अनुच्छेद-14 विधि के समक्ष समानता सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद-15 जाति, धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है, जिससे सभी बच्चों के लिए शिक्षा तक समान पहुँच सुनिश्चित होती है।

निष्कर्ष

RTE के तहत 25% आरक्षण वंचित बच्चों को गुणवत्तापूर्ण निजी विद्यालयों तक पहुँच प्रदान कर समावेशी शिक्षा एवं सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करता है। तथापि, निजी विद्यालयों के प्रतिरोध एवं प्रशासनिक विलंब जैसी चुनौतियों का समाधान किया जाना, इसके सफल क्रियान्वयन हेतु आवश्यक है।

संदर्भ

तिरुवल्लुवर दिवस के अवसर पर भारतीय प्रधानमंत्री ने तमिल कवि एवं दार्शनिक तिरुवल्लुवर को श्रद्धांजलि अर्पित की।

तिरुवल्लुवर का जीवन और पृष्ठभूमि

  • परिचय: प्रख्यात तमिल कवि एवं दार्शनिक, तमिल सभ्यता के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में पूज्य।

  • सामुदायिक संबंध
    • वे सिद्ध, कवि और दार्शनिक थे, जिन्हें सामान्यतः वल्लुवर या तिरुवल्लुवर के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है “वल्लुवा जाति का भक्त।”
    • वल्लुवा परंपरागत रूप से ढोल बजाकर राजकीय घोषणाएँ करते थे और उनका संबंध पारिया समुदाय (वर्तमान में हरिजन) से माना जाता है।
    • परंपरा के अनुसार, तिरुवल्लुवर का जन्म भगवन नामक एक ब्राह्मण और आदि नामक एक पारिया महिला से हुआ।
  • काल एवं जन्मस्थान
    • कुछ परंपराएँ उनके जन्मस्थान को मदुरै बताती हैं।
    • उनकी काल-निर्धारण संबंधी धारणाएँ ईसा-पूर्व चौथी शताब्दी से लेकर ईसा की प्रारंभिक छठी शताब्दी तक विस्तृत हैं।
    • मरैमलै अडिगल ने उनका जन्म 31 ईसा-पूर्व में माना, जबकि कामिल ज्वेलेबिल ने उनका काल 500–600 ईसवी के मध्य बताया।
    • जनवरी 1935 में तमिलनाडु सरकार ने आधिकारिक रूप से 31 ईसा-पूर्व को उनके जन्मवर्ष के रूप में मान्यता प्रदान की।

तिरुक्कुरल के बारे में 

  • तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल की रचना की, जो नैतिकता, राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रेम पर आधारित एक शास्त्रीय तमिल ग्रंथ है।
    • इस ग्रंथ में कुल 1,330 दोहे हैं, जिन्हें 133 अध्यायों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक अध्याय में दस-दस दोहे हैं।
    • तिरुक्कुरल को तीन भागों में विभाजित किया गया है:
      • अरम् (धर्म/सदाचार),
      • पोरुल (राज्य कौशल और समाज), तथा
      • कामम् (प्रेम)।
    • विषयवस्तु का विस्तार: यह ग्रंथ नैतिक आचरण, सामाजिक न्याय, आर्थिक जीवन तथा व्यक्तिगत संबंधों को समाहित करता है और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।
    • साहित्यिक शैली: यह संक्षिप्त, काव्यात्मक एवं सूक्तिपरक शैली में लिखा गया है, जिससे इसके दोहे स्मरणीय एवं व्यापक रूप से उद्धृत किए जाने योग्य बनते हैं।

वल्लुवर एक उप-जाति समूह भी है, जो ब्राह्मणों के आगमन से पूर्व पल्लव राजाओं के पुरोहित हुआ करते थे। किंतु इस बात के कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं कि तिरुवल्लुवर इसी उप-जाति समूह से संबंधित थे।

संदर्भ

केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025–26 के लिए सिक्किम में ग्रामीण स्थानीय निकायों हेतु पंद्रहवें वित्त आयोग (XV-FC) की संयुक्त अनुदान राशि की पहली किस्त जारी की है।

अनुदान के बारे में

  • अनुदान एक निर्दिष्ट सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किसी सरकारी प्राधिकरण द्वारा प्रदान किया गया वित्तीय अंतरण होता है।
  • यह एक गैर-वापसी योग्य अंतरण भुगतान है, जो ऋण या गारंटी से भिन्न होता है तथा इसका उपयोग केवल उसी निर्धारित उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए, जो व्यापक सार्वजनिक हित की सेवा करता हो।
  • अनुदानों के प्रकार
    • वैधानिक अनुदान (अनुच्छेद-275): आवश्यकता वाले राज्यों को प्रदान किया जाता  है और भारत की संचित निधि पर आरोपित होता है। इनमें अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए अनुदान शामिल हैं।
    • विवेकाधीन अनुदान (अनुच्छेद-282): संघ या राज्यों को किसी भी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए, यहाँ तक कि अपनी विधायी क्षमता से परे भी, अनुदान प्रदान करने में सक्षम बनाते हैं। उपयोग के लचीलेपन के आधार पर, अनुदानों को बद्ध (Tied Grants) अनुदान और अबद्ध अनुदान (Untied Grants) में वर्गीकृत किया जाता है।
  • बद्ध अनुदान (Tied Grants) वे अनुदान होते हैं, जो किसी विशिष्ट उद्देश्य या क्षेत्र के लिए निर्धारित होते हैं, और प्राप्तकर्ता प्राधिकरण को धनराशि का उपयोग केवल उसी निर्धारित उद्देश्य के लिए करना होता है।
    • अबद्ध अनुदान वे अनुदान होते हैं, जो किसी विशिष्ट उद्देश्य से जुड़े नहीं होते, जिससे प्राप्तकर्ता सरकारों या स्थानीय निकायों को अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार धन का उपयोग करने की अनुमति मिलती है।

वित्त आयोग

  • वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है, जिसका गठन राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद-280 के अंतर्गत प्रत्येक पाँच वर्ष में या आवश्यकता होने पर उससे पहले किया जाता है।
  • वैधानिक आधार: इसका कार्यकरण वित्त आयोग (विविध उपबंध) अधिनियम, 1951 द्वारा नियंत्रित होता है।
  • इसमें एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। वे पुनर्नियुक्ति के पात्र होते हैं।

राज्य वित्त आयोग (SFC)

  • राज्य वित्त आयोग (SFC) की स्थापना 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों (1992) के अंतर्गत की गई थी।
  • इन संशोधनों का उद्देश्य पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा देकर स्थानीय स्व-शासन को सुदृढ़ करना था।
  • अनुच्छेद-243-I (पंचायतों के लिए) और अनुच्छेद-243-Y (नगरपालिकाओं के लिए) राज्य स्तर पर वित्त आयोग के गठन का प्रावधान करते हैं।

15वाँ वित्त आयोग

  • 15वें वित्त आयोग का गठन नवंबर 2017 में किया गया था, जिसके अध्यक्ष एन. के. सिंह थे।
  • आयोग की अनुशंसा अवधि वर्ष 2021–22 से 2025–26 तक है।
  • XVवें वित्त आयोग की प्रमुख अनुशंसाएँ
    • ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण
      • संघीय करों के विभाज्य पूल का 41% राज्यों को हस्तांतरित करने की अनुशंसा की गई।
    • क्षैतिज हस्तांतरण: क्षैतिज हस्तांतरण के मानदंडों को निम्नलिखित आधारों पर पुनः निर्धारित किया गया-
      • आय विषमता: 45%,
      • जनसंख्या (वर्ष 2011 जनगणना): 15%,
      • क्षेत्रफल: 15%,
      • जनसांख्यिकीय प्रदर्शन: 12.5%,
      • वन एवं पारिस्थितिकी: 10%,
      • कर एवं राजकोषीय प्रयास: 2.5%।
    • ग्रामीण स्थानीय निकायों को बद्ध एवं अबद्ध अनुदान
      • बद्ध अनुदान (60%): राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए निर्धारित, पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता, वर्षा जल संचयन, जल पुनर्चक्रण तथा खुले में शौच मुक्त (ODF) स्थिति के अनुरक्षण हेतु।
      • अबद्ध अनुदान (40%): स्थान-विशिष्ट आवश्यकताओं के लिए निधि, जो पंचायती राज मंत्रालय की अनुशंसा पर जारी की जाती है।
    • अन्य अनुदान: इसने स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, PMGSY के अंतर्गत सड़कें, न्यायपालिका, सांख्यिकी और आकांक्षी जिलों तथा प्रखंडों के लिए प्रदर्शन-आधारित क्षेत्रीय अनुदानों की भी अनुशंसा की, जिससे स्थानीय शासन एवं जवाबदेही को सुदृढ़ किया गया।

संदर्भ

विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने अपने वैश्विक जोखिम धारणा सर्वेक्षण के आधार पर वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 जारी की है।

  • यह रिपोर्ट वर्ष 2026 में भारत के लिए साइबर सुरक्षा को सबसे महत्त्वपूर्ण जोखिम के रूप में चिह्नित करती है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • शीर्ष वैश्विक जोखिम: भू-आर्थिक संघर्ष वर्ष 2026 में सबसे बड़ा वैश्विक जोखिम बनकर उभरा है।
    • इसने राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष और चरम मौसम आधारित घटनाओं को पीछे छोड़ दिया है।
  • प्रवृत्ति में परिवर्तन: पिछले वर्ष की तुलना में भू-आर्थिक संघर्ष दो स्थान की वृद्धि के साथ प्रथम स्थान पर आ गया है।
    • राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष दूसरे स्थान पर आ गया है।
  • प्रौद्योगिकी संबंधी जोखिमों में वृद्धि
    • फेक न्यूज एवं दुष्प्रचार वैश्विक स्तर पर पाँचवें स्थान पर है (7 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा)।
    • ‘एडवर्स आउटकम्स ऑफ AI टेक्नोलॉजी’ में शीर्ष 10 में 8वें स्थान पर आ गए हैं।
    • साइबर असुरक्षा वैश्विक स्तर पर नौवें स्थान पर है, जो बढ़ती डिजिटल संवेदनशीलताओं को दर्शाती है।
  • प्रमुख जोखिम प्रवृत्तियाँ
    • तत्काल से अल्प–मध्यम अवधि (2026–2028): रिपोर्ट में भू-आर्थिक संघर्ष, राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष, अत्यधिक मौसमीय घटनाएँ तथा सामाजिक ध्रुवीकरण में वृद्धि को वैश्विक स्थिरता एवं आर्थिक वृद्धि को प्रभावित करने वाले प्रमुख जोखिमों के रूप में रेखांकित किया गया है।
    • दीर्घकालिक परिदृश्य (2036 तक): फेक न्यूज एवं सूचना विकृति, अत्यधिक मौसम आधारित घटनाएँ, जैव विविधता की हानि तथा पारितंत्र का पतन सबसे गंभीर खतरों के रूप में उभरते हैं, जो जलवायु–प्रकृति संकट को रेखांकित करते हैं।

भू-आर्थिक संघर्ष के बारे में

  • भू-आर्थिक संघर्ष से आशय राज्यों द्वारा सीमा-पार आर्थिक संबंधों को पुनर्संरचित करने हेतु आर्थिक साधनों के रणनीतिक उपयोग से है।
  • मुख्य उपकरणों में आर्थिक प्रतिबंध, शुल्क एवं व्यापार नियंत्रण, निर्यात प्रतिबंध, निवेश की जाँच, सब्सिडी, राज्य सहायता तथा मुद्रा-संबंधी उपाय शामिल हैं।
  • उदाहरणों में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा शुल्क वृद्धि और चीन द्वारा महत्त्वपूर्ण खनिजों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध शामिल हैं।

भारत-विशिष्ट जोखिम संबंधी प्रवृत्ति (2026)

  • साइबर सुरक्षा (शीर्ष जोखिम), जो UPI जैसी डिजिटल अवसंरचना और भुगतान प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता से प्रेरित है।
  • आय एवं संपत्ति असमानता, जो स्थायी संरचनात्मक विषमताओं और असमान आर्थिक लाभों को उजागर करती है।
  • अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाएँ और सामाजिक संरक्षण।
  • बाह्य तनावों, शुल्कों और आपूर्ति-शृंखला व्यवधानों के कारण आर्थिक मंदी।
  • राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष, जिसमें सिंधु नदी बेसिन में जल सुरक्षा जैसे रणनीतिक संसाधन तनाव शामिल हैं।

वैश्विक जोखिम रिपोर्ट के बारे में

  • वैश्विक जोखिम रिपोर्ट एक वार्षिक प्रमुख प्रकाशन है, जो अल्पकाल (2 वर्ष) और दीर्घकाल (10 वर्ष) में विश्व को प्रभावित करने वाले सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वैश्विक जोखिमों की पहचान और विश्लेषण करता है।
    • वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 विश्व आर्थिक मंच द्वारा प्रकाशित 21वाँ वार्षिक आकलन है।
    • यह वैश्विक जोखिम धारणा सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसमें सरकार, व्यापार, शिक्षा-जगत, नागरिक समाज तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के नेताओं से अंतर्दृष्टियाँ संकलित की जाती हैं।
  • यह रिपोर्ट दावोस वार्षिक बैठक से पूर्व, विश्व आर्थिक मंच द्वारा प्रकाशित की जाती है।

संदर्भ

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने रोजगार और सामाजिक रुझान रिपोर्ट, 2026 जारी की है, जिसमें कार्य जगत में हुई प्रगति तथा निरंतर बनी हुई चुनौतियों दोनों पर प्रकाश डाला गया है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

  • वैश्विक बेरोजगारी स्थिरता: वर्ष 2026 में वैश्विक बेरोजगारी दर 4.9% रहने का अनुमान है, जो लगभग 186 मिलियन बेरोजगार लोगों के बराबर है।
  • व्यापक रोजगार अंतर: आधिकारिक बेरोजगारी के आँकड़ों के अतिरिक्त, वैश्विक रोजगार अंतर (अर्थात् वे लोग जो सवैतनिक कार्य करना चाहते हैं किंतु उन्हें कार्य प्राप्त नहीं हो पाता है) के वर्ष 2026 तक बढ़कर 408 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है।
    • यह स्थिति अप्रत्यक्ष अल्प-रोजगार तथा श्रम-माँग की अपर्याप्त पूर्ति की एक गंभीर समस्या की ओर संकेत करती है।
  • रोज़गार की गुणवत्ता में सीमित सुधार: कुछ प्रगति के बावजूद, विश्व स्तर पर 284 मिलियन श्रमिक अभी भी अत्यधिक गरीबी में जी रहे हैं, जिनकी दैनिक आय $3 से कम है।
  • अनौपचारिक रोजगार में वृद्धि: विश्व भर में दो अरब से अधिक श्रमिक अनौपचारिक रोजगार में संलग्न हैं।
  • जनसांख्यिकीय और क्षेत्रीय भिन्नताएँ: श्रम बाजार के रुझान आय वर्ग के अनुसार भिन्न होते हैं:
    • उच्च और उच्च-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाएँ जनसंख्या की वृद्धावस्था और धीमी श्रम शक्ति वृद्धि से लाभान्वित होती हैं, जिससे सीमित रोजगार सृजन के बावजूद बेरोजगारी स्थिर रहती है।
    • निम्न आय वाले देशों में श्रम शक्ति का तेजी से विस्तार हो रहा है, लेकिन वे निम्न गुणवत्ता वाले रोजगारों से जूझ रहे हैं, जहाँ वर्ष 2026 में रोजगार में 3.1% की वृद्धि का अनुमान है।
  • युवा रोजगार संकट: हाल के आँकड़ों के अनुसार, युवा बेरोजगारी दर लगभग 12.4% बनी हुई है।
    • लगभग 26 करोड़ युवा शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण से वंचित हैं, निम्न आय वाले देशों में यह दर 27.9% तक पहुँच जाती है।
  • लैंगिक असमानता: वैश्विक रोजगार में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 2/5वें हिस्से तक है और श्रम बल में उनकी भागीदारी पुरुषों की तुलना में 24% कम है।
    • इसका कारण सामाजिक मानदंड, रूढ़िवादिता और देखभाल संबंधी जिम्मेदारियाँ हैं।
  • उभरते जोखिम: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वचालन और व्यापार नीति की अनिश्चितता रोजगार की गुणवत्ता, वेतन और रोजगार के लिए खतरा उत्पन्न करती है।

रिपोर्ट से प्राप्त प्रमुख अनुशंसाएँ

  • उत्पादकता बढ़ाना: कार्यबल और आर्थिक क्षमता को बढ़ाने के लिए कौशल, शिक्षा और बुनियादी ढाँचे में निवेश करना।
  • लैंगिक और युवा असमानताओं को कम करना: भागीदारी में आने वाली बाधाओं को दूर करना और गुणवत्तापूर्ण अवसर सृजित करने के लिए प्रौद्योगिकी का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करना।
  • व्यापार को मजबूत करना: निष्पक्ष व्यापार और श्रम नीतियों के माध्यम से यह सुनिश्चित करें कि सभी क्षेत्रों को वैश्विक प्रवाह से लाभ मिले।
  • उभरते जोखिमों को कम करना: ऋण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से होने वाले व्यवधान और व्यापार अनिश्चितता से निपटने के लिए समन्वित वैश्विक तथा घरेलू नीतियों का उपयोग करना।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)

  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है।
  • स्थापना: प्रथम विश्व युद्ध के बाद वर्साय की संधि के तहत वर्ष 1919 में स्थापित।
  • त्रिपक्षीय संरचना: ILO संयुक्त राष्ट्र की एकमात्र ऐसी एजेंसी है, जिसकी त्रिपक्षीय संरचना है।
    • ILO के निर्णय लेने वाले निकायों में सरकारें, नियोक्ता और श्रमिक सभी समान रूप से शामिल होते हैं।
  • मुख्यालय: जेनेवा, स्विट्जरलैंड।
  • सदस्यता: संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से चुने गए 187 सदस्य देश।
  • उद्देश्य और मिशन: सम्मानजनक रोजगार, उचित वेतन, श्रमिक संरक्षण और मौलिक श्रम अधिकारों को बढ़ावा देना, इस मूल विचार के साथ कि ‘श्रम कोई वस्तु नहीं है।’
  • कार्यस्थल पर मौलिक सिद्धांत और अधिकार: वर्ष 1998 में, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने कार्यस्थल पर मौलिक सिद्धांतों और अधिकारों की घोषणा को अपनाया।
  • वार्षिक अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन: ILO का सर्वोच्च नीति-निर्धारण निकाय, जो मानकों को निर्धारित करने, श्रम मुद्दों की समीक्षा करने और ILO की नीतियों तथा कार्यक्रमों पर निर्णय लेने के लिए जेनेवा में प्रतिवर्ष आयोजित होता है।

अंतरराष्ट्रीय संपर्क संगठन (ILO) द्वारा जारी रिपोर्ट

  • विश्व रोजगार एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य (WESO)
  • वैश्विक वेतन रिपोर्ट
  • विश्व सामाजिक सुरक्षा रिपोर्ट
  • युवाओं के लिए विश्व रोजगार एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य
  • वर्ल्ड ऑफ वर्क रिपोर्ट।

संदर्भ 

हाल ही में अबू धाबी में आयोजित 16वीं अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) की सभा में वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा परिवर्तन पर प्रकाश डाला गया।

  • IRENA सभा से पहले IRENA और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा संयुक्त रूप से नवीकरणीय ऊर्जा तथा रोजगार वार्षिक समीक्षा 2025 जारी की गई।

IRENA सम्मेलन के प्रमुख परिणाम

  • कार्यसूची और रणनीतिक दिशा: IRENA की मध्यम अवधि रणनीति (2023-2027) का मूल्यांकन और कार्य कार्यक्रम एवं बजट (2026-27) को अपनाना।
  • परिवर्तन की अपरिवर्तनीयता: स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन की अपरिवर्तनीयता और आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा में प्रारंभिक पहल के लाभ पर जोर।
  • संरक्षक की भूमिका: IRENA ने COP28 में अपनाए गए “UAE सर्वसम्मति” लक्ष्यों की निगरानी के लिए आधिकारिक संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका की पुष्टि की, जिसमें वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को तिगुना करना और ऊर्जा दक्षता को दोगुना करना शामिल है।

नवीकरणीय ऊर्जा और रोजगार के प्रमुख पहलू – वार्षिक समीक्षा 2025

  • वैश्विक रोजगार: नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में वर्ष 2024 में 16.6 मिलियन लोगों को रोजगार मिला, जिसमें सौर फोटोवोल्टिक क्षेत्र सबसे अधिक रोजगार सृजन करने वाला क्षेत्र रहा, जिसका नेतृत्व चीन ने किया।
  • भारत का प्रदर्शन
    • 1.3 मिलियन रोजगार (वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा रोजगार का 7.7%)।
    • सौर फोटोवोल्टिक और जलविद्युत रोजगार में वैश्विक स्तर पर दूसरा स्थान।
      • पवन और तरल जैव ईंधन में चौथा स्थान।
  • विनिर्माण क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी वैश्विक पीवी मॉड्यूल विनिर्माण में 4.8% है, जिसमें गुजरात (42%) अग्रणी है, उसके बाद तमिलनाडु (11%) का स्थान आता है।

अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) के बारे में

  • IRENA एकमात्र अंतर-सरकारी संगठन है, जो विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा को समर्पित है और सतत् ऊर्जा परिवर्तन में देशों का समर्थन करता है।
  • स्थापना: वर्ष 2009 में स्थापित।
  • मुख्यालय: मसदर सिटी, अबू धाबी, संयुक्त अरब अमीरात।
  • उद्देश्य
    • सतत् विकास, ऊर्जा उपलब्धता और जलवायु परिवर्तन के लिए नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना।
    • सदस्य देशों को नीतिगत सलाह, क्षमता निर्माण और तकनीकी सहायता प्रदान करना।
  • सदस्यता: 170 से अधिक देश और यूरोपीय संघ
    • भारत एक संस्थापक सदस्य है, जो IRENA के एजेंडा और क्षमता निर्माण प्रयासों को सक्रिय रूप से आकार देता है।
  • मुख्य रिपोर्ट: विश्व ऊर्जा संक्रमण आउटलुक (WETO) प्रतिवर्ष जारी की जाती है।

संदर्भ

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी में गहरे महासागरों और बाह्य अंतरिक्ष जैसे चरम, अल्प अन्वेषित वातावरणों में घटित होने वाली जैविक प्रक्रियाओं और जीवों के संबंध में शोध करना जैसे प्रयास शामिल हैं।

समुद्री जैव प्रौद्योगिकी (Marine Biotechnology)

  • समुद्री जैव प्रौद्योगिकी (जिसे अक्सर “ब्लू बायोटेक्नोलॉजी” कहा जाता है) का मुख्य उद्देश्य सूक्ष्मजीवों, शैवाल और गहरे समुद्र में रहने वाले जीवों का अध्ययन करके नए उत्पादों और प्रक्रियाओं की खोज और विकास करना है।
  • ये जीव कठोर परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए विशिष्ट रूप से अनुकूलित हो चुके हैं:
    • उच्च दाब
    • अत्यधिक खारापन
    • कम प्रकाश
    • पोषक तत्त्वों की कमी।

अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी

  • अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी इस बात का अध्ययन करती है कि सूक्ष्मजीव, पौधे, मानव कोशिकाएँ और जैविक प्रणालियाँ सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण, ब्रह्मांडीय विकिरण तथा अन्य अंतरिक्ष परिस्थितियों पर कैसे प्रतिक्रिया करती हैं।
  • महत्त्व: दीर्घकालिक अंतरिक्ष अभियानों के दौरान मानव को स्वस्थ बनाए रखने और पृथ्वी पर चिकित्सा और प्रौद्योगिकी में महत्त्वपूर्ण प्रगति लाने वाले ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी की आवश्यकता

  • प्राकृतिक लाभ: भारत की तटरेखा लंबी है (11,000 किमी. से अधिक) और इसका विशाल विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (20 लाख वर्ग किमी. से अधिक) समृद्ध समुद्री जैव विविधता प्रदान करता है।
  • वर्तमान उत्पादन: घरेलू उत्पादन कम है (उदाहरण के लिए, प्रति वर्ष लगभग 70,000 टन समुद्री शैवाल का उत्पादन)।
    • भारत अगर (Agar) और कैराजीनन (Carrageenan) जैसे कई समुद्री उत्पादों का आयात करता है।
  • अंतरिक्ष आवश्यकताएँ: दीर्घकालिक अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए महत्त्वपूर्ण → सुरक्षित भोजन, स्वास्थ्य प्रबंधन, जैव-विनिर्माण।
  • रणनीतिक महत्त्व: जैव-अर्थव्यवस्था, स्वायत्तता और वैश्विक नेतृत्व को मजबूत करता है।

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी की स्थिति

  • सीमित समुद्री बायोमास उत्पादन: भारत में प्रतिवर्ष लगभग 70,000 टन समुद्री शैवाल का उत्पादन होता है, जो इसकी क्षमता की तुलना में अपेक्षाकृत कम है।
  • आयात पर निर्भरता: भारत खाद्य, फार्मास्यूटिकल्स, सौंदर्य प्रसाधन और चिकित्सा क्षेत्रों में उपयोग के लिए अगर, कैराजीनन और एल्जिनेट का आयात करता है।
  • सरकारी पहल: ब्लू इकोनॉमी एजेंडा, डीप ओशन मिशन और Bio3 के तहत योजनाएँ खेती से लेकर मूल्यवर्द्धन तक एकीकृत समुद्री जैव-उत्पादन को बढ़ावा देती हैं।
  • उभरते निजी और अनुसंधान क्षेत्र के हितधारक: C6 एनर्जी और क्लाइमाक्रू जैसी कंपनियाँ, ICAR–CMFRI और राज्य की पहलों के साथ मिलकर, समुद्री बायोमास को उच्च-मूल्य वाले जैव-उत्पादों में परिवर्तित कर रही हैं।
  • अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी में प्रगति: ISRO का सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण जीव विज्ञान कार्यक्रम अंतरिक्ष में खाद्य उत्पादन और जीवन-सहायक प्रणालियों के लिए सूक्ष्मजीवों और शैवाल पर प्रयोग करता है।
  • अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर ध्यान: सूक्ष्मजीवों के व्यवहार और अंतरिक्ष यात्रियों के माइक्रोबायोम पर शोध भविष्य के दीर्घकालिक अंतरिक्ष अभियानों में सहायक है।
  • निजी भागीदारी सीमित: प्रौद्योगिकी की प्रारंभिक अवस्था के कारण निजी क्षेत्र की भागीदारी अभी भी कम है।

वैश्विक विकास

  • यूरोपीय संघ: समुद्री जैव-अन्वेषण, शैवाल जैव-सामग्री, जैव-सक्रिय यौगिक; साझा अवसंरचना (EMBRC)।
  • चीन: समुद्री शैवाल मत्स्यपालन का विस्तार, समुद्री जैव-प्रसंस्करण, गहरे समुद्र का अन्वेषण।
  • अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया: समुद्री जैव प्रौद्योगिकी पहलों का समर्थन।
  • अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी
    • अमेरिका/नासा: सूक्ष्मजीव व्यवहार, प्रोटीन क्रिस्टलीकरण, स्टेम कोशिकाएँ, बंद-लूप जीवन समर्थन।
    • ESA, चीन की तियांगोंग, जापान की JAXA: पादप वृद्धि, माइक्रोबायोम, सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में जैव-सामग्री।

निष्कर्ष

समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी अपार संभावनाओं वाले क्षेत्र हैं। प्रारंभिक और लक्षित निवेश से भारत को उभरती वैश्विक जैव अर्थव्यवस्था में स्थायी रणनीतिक, तकनीकी और आर्थिक लाभ प्राप्त हो सकते हैं।

संदर्भ

भारत में आयरन की कमी (एनीमिया) सबसे बड़ी निरंतर बनी रहने वाली पोषण संबंधी चुनौतियों में से एक है, जो कार्य क्षमता, बच्चों के विकास को बाधित करती है और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर बोझ डालती है।

आयरन (Fe) के बारे में 

  • आयरन एक महत्त्वपूर्ण रासायनिक तत्त्व (फेरम) है और पृथ्वी पर द्रव्यमान के अनुसार प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली धातु है, जो औद्योगिक विकास और जैविक अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
  • गुणधर्म: आयरन एक मजबूत, लचीला और चुंबकीय धातु है, जिसकी विद्युत चालकता उच्च होती है और कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ होती हैं, जो इसे रासायनिक अभिक्रियाओं में अत्यधिक उपयोगी बनाती हैं।

उपयोग

  • औद्योगिक उपयोग: आयरन आधुनिक उद्योग की रीढ़ है, जिसका उपयोग निर्माण, परिवहन, मशीनरी और अवसंरचना विकास के लिए इस्पात उत्पादन में किया जाता है।
  • जैविक उपयोग: जीवित जीवों में, आयरन हीमोग्लोबिन और एंजाइम्स का एक प्रमुख घटक है, जो ऑक्सीजन के परिवहन, ऊर्जा चयापचय और कोशिकीय वृद्धि को सक्षम बनाता है।

पोषण के रूप में आयरन का महत्त्व 

  • आयरन ऑक्सीजन के परिवहन, ऊर्जा चयापचय और सामान्य वृद्धि के लिए आवश्यक एक महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्त्व है।
  • यह हीमोग्लोबिन का एक मुख्य घटक है और मानव जीवन के लिए आवश्यक कई कोशिकीय कार्यों में सहायक होता है।
  • एक सामान्य वयस्क पुरुष में 50 मिलीग्राम/किलोग्राम आयरन होता है, जबकि महिलाओं में 40 मिलीग्राम/किलोग्राम।
  • मानव शरीर में आयरन की भूमिका
    • ऑक्सीजन का परिवहन: आयरन हीमोग्लोबिन का एक प्रमुख घटक है, जो लाल रक्त कोशिकाओं को फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन ले जाने में सक्षम बनाता है।
    • ऊर्जा चयापचय: यह कोशिकीय श्वसन और ऊर्जा उत्पादन में शामिल एंजाइमों का समर्थन करता है।
    • वृद्धि और प्रतिरक्षा: कोशिकीय प्रसार, मस्तिष्क विकास और प्रतिरक्षा क्षमता के लिए पर्याप्त आयरन आवश्यक है।

मानव शरीर में अतिरिक्त आयरन और इसका प्रभाव

  • सीमित आयरन उत्सर्जन: शरीर में अतिरिक्त आयरन को बाहर निकालने का कोई सक्रिय तंत्र नहीं होता, जिसके कारण अत्यधिक सेवन या रक्त आधान होने पर यह शरीर में जमा हो जाता है।
  • अंगों में जमाव और क्षति: अतिरिक्त लौह यकृत, हृदय और अंतःस्रावी ग्रंथियों में जमा हो जाता है, जिससे सिरोसिस, कार्डियोमायोपैथी और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
  • आयरन अधिभार के कारण: बार-बार रक्त आधान और आनुवंशिक हीमोक्रोमैटोसिस आयरन अधिभार के प्रमुख कारण हैं।
  • कीलेशन थेरेपी: कीलेशन थेरेपी में ऐसे एजेंटों का उपयोग किया जाता है, जो अतिरिक्त लौह से अभिक्रिया करके स्थिर यौगिक बनाते हैं, जो मुख्य रूप से मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाते हैं, जिससे ऊतकों को अपरिवर्तनीय क्षति से बचाया जा सकता है।

न्यूनतम आवश्यकता (विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार)

  • वयस्क पुरुष: लगभग 8-10 मिलीग्राम/दिन।
  • वयस्क महिलाएँ (गर्भवती नहीं): लगभग 18-20 मिलीग्राम/दिन (मासिक धर्म के दौरान रक्तस्राव के कारण अधिक मात्रा)।
  • गर्भवती महिलाएँ: भ्रूण के विकास और रक्त की मात्रा बढ़ाने के लिए लगभग 27 मिलीग्राम/दिन।

आयरन की कमी के कारण

  • पोषण संबंधी: आहार में आयरन की अपर्याप्त मात्रा (दुर्लभ मामलों में मौखिक रूप से लिए गए आयरन का अवशोषण न होना)।
  • रक्तस्राव: मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव वाली महिलाओं में आयरन की कमी हो सकती है।
    • बुजुर्गों में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रक्तस्राव भी आयरन की कमी का कारण बन सकता है।
      • बुजुर्ग मरीजों की पेट या बृहदान्त्र के कैंसर की जांच अवश्य कराई जानी चाहिए।

आयरन की कमी का प्रभाव

  • एनीमिया और थकान: एनीमिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें रक्त में स्वस्थ हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम होती है।
    • हीमोग्लोबिन की कमी से कमजोरी, साँस फूलना और शारीरिक कार्यक्षमता में कमी आती है।
    • बाल विकास: दीर्घकालिक कमी से विकास में रुकावट, संज्ञानात्मक विकास में बाधा और शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट आती है।
  • आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: जनसंख्या स्तर पर, आयरन की कमी से कार्यबल की दक्षता और आर्थिक उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आती है।

आयरन के स्रोत

  • आहार स्रोत
    • हीम आयरन (बेहतर अवशोषण): मांस, मछली, मुर्गा।
    • नॉन-हीम आयरन: बाजरा, बिना पॉलिश किया चावल, दालें, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, दूध और दही (विटामिन सी के साथ अवशोषण बढ़ता है)।
    • कम अवशोषण: आहार से प्राप्त आयरन का केवल एक छोटा-सा अंश (लगभग 10%) ही अवशोषित होता है, इसलिए पर्याप्त मात्रा में सेवन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • अनुपूरक
    • मौखिक आयरन: प्रारंभिक उपचार; कम-से-कम तीन महीने तक लेने पर सस्ता और प्रभावी उपाय।
    • अंतःशिरा आयरन: इसका उपयोग तब किया जाता है, जब मौखिक रूप से आयरन गृहण न किया जा सके या उसका अवशोषण कम हो।

आयरन की कमी को दूर करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप

  • एनीमिया मुक्त भारत (AMB): इसका उद्देश्य आयरन-फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन, व्यवहार परिवर्तन संचार और परीक्षण-आधारित उपचार के माध्यम से एनीमिया की चुनौती को कम करना है।
    • इसका लक्ष्य बच्चों, किशोरों और प्रजनन आयु (15-49 वर्ष) की महिलाओं में एनीमिया में प्रतिवर्ष 3 प्रतिशत अंकों की कमी लाना है।
  • पोषण अभियान: इसका उद्देश्य समन्वय, निगरानी और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण संबंधी परिणामों में सुधार करना है।
  • राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल (NIPI): यह पहल बच्चों, किशोरों और प्रजनन आयु की महिलाओं को उनकी आयु के अनुसार, आयरन और फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन प्रदान करती है।

निष्कर्ष

आयरन की कमी चिकित्सीय और विकासात्मक दोनों ही दृष्टि से एक चुनौती है। इससे निपटने के लिए आहार में विविधता लाना, प्रभावी पूरक आहार और सार्वजनिक स्वास्थ्य वितरण प्रणालियों को मजबूत करना आवश्यक है।

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