100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

Jan 19 2026

इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) में वृद्धि

हाल ही में सेबी के अध्यक्ष तुहिन कांत पांडेय ने कहा कि इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) की संख्या के संदर्भ में भारत वैश्विक अग्रणी के रूप में उभरा है।

भारत के IPO बाजार संबंधी प्रमुख तथ्य

  • वित्तीय वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीनों में भारत में 311 IPO जारी किए गए, जिनसे ₹1.7 ट्रिलियन की पूँजी जुटाई गई।
  • संख्या के आधार पर भारत अब विश्व का सबसे बड़ा IPO बाजार है तथा मूल्य के आधार पर तीसरा सबसे बड़ा।
  • भारत का बाजार पूँजीकरण-से-जीडीपी अनुपात वित्तीय वर्ष 2015-16 के 69% से बढ़कर 130% से अधिक हो गया है, जो निवेशकों की गहरी भागीदारी को दर्शाता है।

इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के बारे में

  • इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से कोई निजी कंपनी पहली बार अपनी इक्विटी शेयरों को जनता को प्रस्तावित करती है, जिससे वह एक सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनी बन जाती है।
  • भारत में नियामक: भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड IPO का प्राथमिक नियामक है, जो नियम निर्धारित करता है, प्रॉस्पेक्टस की समीक्षा करता है तथा निवेशक संरक्षण हेतु अनुपालन सुनिश्चित करता है।
  • संबद्ध संस्थान: स्टॉक एक्सचेंज (जैसे- NSE/BSE) सूचीबद्धता और कारोबार का प्रबंधन करते हैं तथा मर्चेंट बैंकर प्रक्रिया का प्रबंधन करते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ

  • नए शेयर जारी कर प्राथमिक बाजार के माध्यम से पूँजी जुटाई जाती है।
  • प्रक्रिया में निवेश बैंकों द्वारा अंडरराइटिंग, नियामकीय प्रकटीकरण, मूल्य निर्धारण तथा स्टॉक एक्सचेंजों पर सार्वजनिक सूचीबद्धता शामिल होती है।
  • बाजार नियामकों द्वारा शासित, जिससे पारदर्शिता और निवेशक संरक्षण सुनिश्चित होता है।

लाभ

  • पूँजी तक पहुँच: विस्तार, नवाचार और ऋण में कमी हेतु कंपनियों को बड़े पैमाने पर पूँजी उपलब्ध कराता है।
  • विश्वसनीयता: दृश्यता तथा सस्ती वित्तीय पहुँच को बढ़ाता है।
  • निर्गमन अवसर: संस्थापकों और प्रारंभिक निवेशकों को लाभ संवर्द्धन हेतु निर्गमन का अवसर प्रदान करता है।

जोखिम और चुनौतियाँ

  • जाँच में वृद्धि: उच्च अनुपालन लागत, निरंतर प्रकटीकरण आवश्यकताएँ और नियामकीय निगरानी शामिल होती है।
    • सार्वजनिक स्वामित्व से प्रबंधकीय लचीलापन कम हो सकता है और अल्पकालिक प्रदर्शन का दबाव बढ़ सकता है।
  • बाजार अस्थिरता: मूल्य में उतार-चढ़ाव हो सकता है, जो निवेशकों और प्रबंधन के निर्णयों को प्रभावित करता है।

स्पेसएक्स क्रू-11 मिशन

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के चार चालक दल सदस्यों ने प्रशांत महासागर में सुरक्षित ‘स्प्लैशडाउन’ किया, जो वर्ष 1998 में ISS के प्रक्षेपण के बाद इसके इतिहास में पहली बार हुई ‘चिकित्सीय निकासी’ (Medical Evacuation) थी।

संबंधित तथ्य

  • यह निकासी एक अंतरिक्ष यात्री को प्रभावित करने वाली गंभीर चिकित्सीय स्थिति के कारण की गई।
  • इसमें नासा के स्पेसएक्स क्रू-11 मिशन के चार अंतरिक्ष यात्री शामिल थे, जिसका प्रक्षेपण अगस्त 2025 में हुआ था।

‘स्पेसएक्स क्रू-11 मिशन’ के बारे में

  • मिशन का प्रकार: नासा के ‘कमर्शियल क्रू प्रोग्राम’ के अंतर्गत 11वीं परिचालन उड़ान, जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष यात्रियों को ISS तक पहुँचाना था।
  • प्रक्षेपण: 1 अगस्त 2025, फाल्कन 9 ब्लॉक-5 रॉकेट के माध्यम से।
  • अंतरिक्ष यान: क्रू ड्रैगन (SpaceX)।
  • चालक दल की संख्या: 4 अंतरिक्ष यात्री।

मिशन का महत्त्व

  • ऐतिहासिक रूप से प्रथम
    • ISS से पहली चिकित्सीय निकासी को चिह्नित करता है, जो दीर्घकालिक अंतरिक्ष मिशनों में आपातकालीन तैयारी के महत्त्व को उजागर करता है।
  • भविष्यगत प्रभाव
    • अंतरिक्ष अन्वेषण में चिकित्सीय प्रोटोकॉल के लिए एक उदाहरण स्थापित करता है।
    • आगामी आर्टेमिस मिशनों और संभावित मंगल अभियानों के लिए महत्त्वपूर्ण, जहाँ चिकित्सीय आपात स्थितियाँ और अधिक जटिल होंगी।

77वाँ गणतंत्र दिवस समारोह

 

यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुईस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे।

77वें गणतंत्र दिवस समारोह के बारे में

  • गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मनाया जाता है, जो वर्ष 1950 में भारत के संविधान को अपनाए जाने की स्मृति में है और भारत के एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य में रूपांतरण का प्रतीक है।
  • गणतंत्र दिवस 2026: 77वाँ गणतंत्र दिवस समारोह कर्तव्य पथ, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा, जो लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक शासन और भारत के वैश्विक दृष्टिकोण का प्रतीक है।
  • वर्ष 2026 की थीम: ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष।
  • मुख्य अतिथि (2026): पहली बार यूरोपीय संघ के दो शीर्ष नेता संयुक्त रूप से मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे, जो भारत के लिए यूरोपीय संघ के सामूहिक महत्त्व को रेखांकित करता है।
    • एंटोनियो लुईस सैंटोस दा कोस्टा, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष
    • उर्सुला वॉन डेर लेयेन, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष।

यात्रा का महत्त्व

  • रणनीतिक महत्त्व: भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय संघ के नेताओं की भागीदारी, बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में यूरोपीय संघ को एक प्रमुख साझेदार के रूप में भारत की रणनीतिक प्राथमिकता को दर्शाती है।
  • आर्थिक और संस्थागत सहयोग: यह यात्रा 16वें भारत–EU शिखर सम्मेलन और भारत–EU बिजनेस फोरम के साथ संरेखित है, जिससे व्यापार, प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा, सुरक्षा और भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते पर चर्चाओं को आगे बढ़ाने में सहयोग सुदृढ़ होता है।
  • साझा वैश्विक मूल्य: यह सहभागी लोकतंत्र, बहुपक्षवाद, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और सतत् विकास के प्रति साझा प्रतिबद्धताओं को सुदृढ़ करती है, जिससे भारत की वैश्विक कूटनीतिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।

अमिट स्याही (Indelible Ink)

वर्ष 2026 के महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों के दौरान अमिट स्याही (Indelible Ink) जाँच के दायरे में आ गई, जब विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि स्याही के निशान आसानी से हटाए जा सकते हैं, जिससे चुनावी निष्पक्षता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुईं।

उठाई गई चिंताएँ

  • विपक्षी नेताओं का दावा है कि वीडियो में स्याही के निशान को सैनिटाइजर या नेल पॉलिश रिमूवर से मिटाते हुए दिखाया गया है, विशेषकर जहाँ मार्कर पेन का उपयोग किया गया था।
  • आरोप है कि इससे दोबारा मतदान संभव हो सकता है, जिसके चलते चुनावी सुरक्षा उपायों के कमजोर होने और चुनाव अधिकारियों पर राजनीतिक पक्षपात के आरोप लगाए गए।

अमिट स्याही के बारे में

  • परिभाषा: अमिट स्याही बैंगनी रंग का निशान है, जो मतदान के बाद मतदाता की उँगली पर लगाया जाता है और कई दिनों तक दिखाई देने के लिए बनाया गया है।
  • उत्पादन और स्रोत
    • स्याही का सूत्र 1950 के दशक में राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला द्वारा विकसित किया गया था।
    • इसे विशेष रूप से ‘मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड’, कर्नाटक सरकार की एक इकाई, द्वारा निर्मित किया जाता है।
  • भारतीय चुनावों में उपयोग
    • भारत में अमिट स्याही का उपयोग वर्ष 1962 के आम चुनावों से किया जा रहा है।
    • इसे बाएँ हाथ की तर्जनी उँगली पर, सामान्यतः नाखून और क्यूटिकल पर, ब्रश, बोतल या मार्कर पेन से लगाया जाता है।
  • रासायनिक आधार
    • इसमें सिल्वर नाइट्रेट होता है, जो त्वचा और प्रकाश के साथ अभिक्रिया कर ‘स्थायी निशान’ बनाता है।
    • यह ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है।
  • आधिकारिक प्रतिक्रिया: चुनाव अधिकारियों का कहना है कि यदि स्याही फीकी पड़ जाए या हटा भी दी जाए, तब भी कई प्रक्रियात्मक जाँचें दोहरे मतदान को रोकती हैं और वर्ष 2011 से मार्कर पेन के उपयोग की अनुमति दी गई है।

ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स

AI-संचालित ऊर्जा माँग में तीव्र वृद्धि के बीच, गूगल के प्रोजेक्ट सनकैचर और इसरो सौर ऊर्जा से पूर्णतः संचालित अंतरिक्ष-आधारित ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स (Orbital Datacentres) की संभावना का अन्वेषण कर रहे हैं।

ऑर्बिटल डेटा सेंटर (Orbital Datacentres) के बारे में

  • ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स की अवधारणा के अंतर्गत ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ (Low-Earth Orbit) में AI कंप्यूटिंग अवसंरचना की स्थापना का प्रस्ताव है, ताकि ऊर्जा-सघन स्थलीय डेटा केंद्रों के विकल्प के रूप में अंतरिक्ष का उपयोग किया जा सके।
  • प्रमुख विशेषताएँ: ये डेटा केंद्र सघन रूप से समूहित उपग्रह नक्षत्रों के रूप में संचालित होंगे।
  • संभावित लाभ: सौर ऊर्जा के निरंतर संपर्क से स्थलीय विद्युत ग्रिड पर निर्भरता समाप्त होती है, जिससे संभावित रूप से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है तथा पृथ्वी पर भूमि, जल और शीतलन (कूलिंग) संबंधी बाधाओं से बचा जा सकता है।

ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स की व्यवहार्यता

  • तकनीकी व्यवहार्यता: गूगल के अनुसंधान के अनुसार, आधुनिक टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट्स (TPUs) अंतरिक्ष विकिरण को सहन कर सकती हैं, जबकि ‘डिस्ट्रीब्यूटेड आर्किटेक्चर AI मॉडलों’ की अत्यधिक आंतरिक बैंडविड्थ संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं।
  • अभियांत्रिकीय चुनौतियाँ: निर्वात में तापीय प्रबंधन, दीर्घकालिक रखरखाव तथा कक्षा में उपग्रहों का प्रतिस्थापन अब भी प्रमुख अनसुलझी चुनौतियाँ बने हुए हैं।
  • आर्थिक पक्ष: प्रक्षेपण लागत में गिरावट और सौर ऊर्जा द्वारा बचत बचत ऑर्बिटल डेटा सेंटर्स को प्रतिस्पर्द्धी बना सकती है, किंतु इन्हें तीव्र गति से उन्नत हो रहे भू-आधारित विकल्पों से बेहतर प्रदर्शन करना होगा।

यद्यपि यह अवधारणा अभी प्रायोगिक अवस्था में है, फिर भी ऑर्बिटल डेटा सेंटर, AI अवसंरचना पर पुनर्विचार के बढ़ते प्रयासों को परिलक्षित करते हैं, क्योंकि ऊर्जा माँग, जलवायु संबंधी चिंताएँ और कंप्यूटिंग तीव्रता निरंतर बढ़ रही हैं।

संदर्भ

प्रधानमंत्री ने भारत द्वारा आयोजित राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन (CSPOC) के दौरान राष्ट्रमंडल देशों के साथ अपनी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) साझा करने की भारत के प्रयासों को रेखांकित किया।

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना क्या है?

  • परिभाषा: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) मूलभूत डिजिटल प्रणालियों का एक समुच्चय है, जो आधुनिक समाज के आधारभूत ढाँचे का निर्माण करता है।
    • यह एक डिजिटल सार्वजनिक वस्तु के रूप में कार्य करती है, क्योंकि इसे व्यापक रूप से सुलभ, डिजाइन के स्तर पर गैर-बहिष्करणकारी तथा विभिन्न क्षेत्रों में अनेक सेवाओं का समर्थन करने में सक्षम बनाया गया है।
  • उद्देश्य: DPI नागरिकों, व्यवसायों और सरकारों के बीच सुरक्षित और निर्बाध अंतःक्रियाओं को सक्षम बनाती है।

DPI के प्रमुख स्तंभ

  • डिजिटल पहचान स्तर: डिजिटल पहचान स्तर व्यक्तियों के सटीक सत्यापन को सक्षम बनाता है, जिससे सेवाएँ और लाभ लक्षित लाभार्थियों तक पहुँच सकें।
  • डिजिटल दस्तावेज अवसंरचना: डिजिटल दस्तावेज स्तर आधिकारिक दस्तावेजों के भंडारण, अभिगम और सत्यापन की सुविधा प्रदान करता है, जिससे भौतिक कागजी कार्य पर निर्भरता कम होती है।
  • डेटा विनिमय और सहमति स्तर: डेटा विनिमय स्तर सुरक्षित और सहमति-आधारित डेटा साझाकरण को सक्षम बनाता है, जिससे उपयोगकर्ता की स्वायत्तता की रक्षा करते हुए सेवा दक्षता में सुधार होता है।
  • डिजिटल भुगतान स्तर: डिजिटल भुगतान स्तर तीव्र, कम-लागत और सुरक्षित वित्तीय लेन-देन को सक्षम बनाता है, जो वित्तीय समावेशन तथा औपचारिकीकरण को समर्थन प्रदान करता है।
  • अंतर-संचालनीय मंच: अंतरसंचालनीयता यह सुनिश्चित करती है कि कई सेवा प्रदाता बिना किसी अलगाव के सामान्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एप्लिकेशन बना सकें।

इंडिया स्टैक

  • इंडिया स्टैक खुले और अंतर-संचालनीय डिजिटल निर्माण खंडों का एक समुच्चय है, जो पहचान सत्यापन, डिजिटल भुगतान और सुरक्षित डेटा साझाकरण को बड़े पैमाने पर सक्षम बनाकर कागज-रहित, नकदी-रहित और मानवीय उपस्थिति-रहित सेवा वितरण को संभव बनाता है।
  • इंडिया स्टैक के तीन परस्पर संबद्ध स्तर
    • पहचान स्तर: सुरक्षित डिजिटल पहचान और प्रामाणीकरण।
      • उदाहरण: आधार, ई-केवाईसी।

    • भुगतान स्तर: तीव्र, कम-लागत और अंतर-संचालनीय डिजिटल लेन-देन को सुगम बनाती है।
      • उदाहरण: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI), आधार पेमेंट ब्रिज।
    • डेटा शासन स्तर: सुरक्षित, सहमति-आधारित डेटा साझाकरण और डिजिटल दस्तावेज प्रबंधन।
      • उदाहरण: डिजिलॉकर और अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क।

इंडिया स्टैक का वैश्विक अंगीकरण

  • डिजिटल भुगतान (UPI): सिंगापुर (पे-नाउ), संयुक्त अरब अमीरात और फ्राँस के साथ संबंध।
  • डिजिटल पहचान मंच: मॉड्यूलर ओपन सोर्स आइडेंटिटी प्लेटफॉर्म (MOSIP) को फिलीपींस, मोरक्को और इथियोपिया जैसे देशों ने अपनाया है।

राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन (CSPOC)

  • परिचय: यह एक मंच है, जो राष्ट्रमंडल के स्वतंत्र संप्रभु राज्यों की राष्ट्रीय संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों को एक साथ लाता है।
  • उत्पत्ति और स्थापना: CSPOC की स्थापना वर्ष 1969 में कनाडा की ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ के तत्कालीन अध्यक्ष लुसिएन लामुरो की एक पहल के रूप में की गई थी।
  • उद्देश्य: संसदीय नेतृत्व और सहयोग को सुदृढ़ करना।
  • सचिवालय
    • स्थापना से ही कनाडा द्वारा आयोजित और समर्थित।
    • CSPOC के कार्य संचालन हेतु प्रशासनिक और संस्थागत सहायता प्रदान करता है।
  • संस्थागत स्थिति
    • एक स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करता है।
    • निम्नलिखित से कोई औपचारिक संबद्धता नहीं है:
      • राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (CPA)
      • राष्ट्रमंडल सचिवालय
      • राष्ट्रमंडल राष्ट्राध्यक्ष सम्मेलन (CHOGM)।
  • सदस्यता मानदंड: केवल संप्रभु राष्ट्रमंडल राज्यों की राष्ट्रीय संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों तक सीमित।
  • कार्य चक्र और बैठकें: दो-वर्षीय चक्र पर संचालित:
    • पूर्ण सम्मेलन: प्रत्येक दो वर्ष में (आमतौर पर जनवरी में)।
    • स्थायी समिति की बैठक: मध्यवर्ती वर्ष में।
  • शासन संरचना
    • स्थायी समिति: CSPOC की गतिविधियों की निगरानी करती है।
      • 15 सदस्यों से युक्त; कोरम = 5
      • अगले मेजबान क्षेत्राधिकार की निचली सदन के अध्यक्ष द्वारा अध्यक्षता।
      • कार्यकाल: एक सम्मेलन की समाप्ति से अगले सम्मेलन की समाप्ति तक।
  • CSPOC के उद्देश्य
    • विभिन्न संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों द्वारा निष्पक्षता और न्यायसंगतता को बनाए रखना, प्रोत्साहित करना तथा संवर्द्धित करना;
    • विभिन्न स्वरूपों में संसदीय लोकतंत्र के ज्ञान और समझ को बढ़ावा देना; तथा
    • संसदीय संस्थाओं का विकास करना।

28वाँ CSPOC सम्मेलन

  • मेजबान: भारत 28वें सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, जो भारत द्वारा CSPOC की मेजबानी का चौथा अवसर है (पूर्व में वर्ष 1971, 1986 और 2010 में)।
  • प्रमुख फोकस क्षेत्र
    • विधायी कार्यप्रणाली में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया का एकीकरण,
    • संसदीय संस्थाओं के साथ सार्वजनिक सहभागिता को सुदृढ़ करना, तथा
    • संसद सदस्यों की सुरक्षा और संरक्षा सुनिश्चित करना।

संदर्भ

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति (SCNBWL) ने वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के भीतर उपस्थित धार्मिक संरचनाओं हेतु के माध्यम से वन्य भूमि के अतिक्रमण को चिह्नित करने के लिए मसौदा दिशा-निर्देश तैयार किए हैं।

पृष्ठभूमि

  • यह मुद्दा गुजरात के बालाराम अंबाजी वन्यजीव अभयारण्य से संबंधित एक प्रस्ताव के बाद सामने आया, जहाँ एक धार्मिक संरचना के लिए वन भूमि के हस्तांतरण की माँग की गई थी।
  • यद्यपि प्रारंभिक स्वीकृति दी गई थी, परंतु बाद में इसे निम्नलिखित कारणों से वापस ले लिया गया-
    • वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अंतर्गत दर्ज वन अधिकारों का अभाव, और
    • संरक्षित क्षेत्रों में समान माँगों के लिए देशव्यापी उदाहरण स्थापित होने का जोखिम।

दिशा-निर्देशों की आवश्यकता

  • खंडित स्वीकृतियों का नियंत्रण: संरक्षण कानूनों को कमजोर करने वाली तदर्थ स्वीकृतियों से बचाव।
  • कानूनी एकरूपता: धार्मिक संस्थानों के प्रस्तावों के मूल्यांकन हेतु स्पष्ट एवं विधिसम्मत ढाँचा प्रदान करना।
  • हितों का संतुलन: पारिस्थितिकी अखंडता की रक्षा करते हुए सांस्कृतिक/धार्मिक भावनाओं का समाधान।
    • उदाहरण पर नियंत्रण: संरक्षित क्षेत्रों में धार्मिक संरचनाओं के प्रसार को रोकना, जो जैव-विविधता से समझौता कर सकती हैं।

मसौदा दिशा-निर्देशों की प्रमुख विशेषताएँ

  • निर्माण पर सामान्य सिद्धांत: वर्ष 1980 (जब वन संरक्षण अधिनियम लागू हुआ) के बाद वन भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण/विस्तार अतिक्रमण माना जाएगा।
  • अपवादस्वरूप नियमितीकरण: असाधारण मामलों में, जहाँ राज्य सरकार नियमितीकरण को उचित ठहराते हुए कारणयुक्त एवं प्रलेखित आदेश जारी करती है, प्रस्ताव को प्रकरण-दर-प्रकरण विचार हेतु मंत्रालय को संदर्भित किया जा सकता है।
  • मौजूदा संरचनाओं का विस्तार: “क्षेत्रफल या मौजूदा संरचनाओं के विस्तार” से संबंधित प्रस्तावों पर सामान्यतः विचार नहीं किया जाएगा।
  • सीमित विस्तार प्रावधान
    • पारिस्थितिकी संघर्ष को कम करने के लिए, या
    • मौजूदा दबावों के प्रबंधन हेतु सार्वजनिक उपयोगिताएँ सृजित करने के लिए।

संरक्षित क्षेत्रों को नियंत्रित करने वाला विधिक ढाँचा

  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों को नियंत्रित करता है; आवास संरक्षण को प्राथमिकता देता है और मानव गतिविधियों को सीमित करता है।
  • वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980: गैर-वन प्रयोजनों हेतु वन भूमि के विचलन को केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना प्रतिबंधित करता है, जिससे विकास पर पारिस्थितिकी प्रधानता सुदृढ़ होती है।
  • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006
    • व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है; भूमि पर किसी भी दावे (जिसमें धार्मिक या सांस्कृतिक संरचनाएँ शामिल हैं) के लिए वन अधिकारों की औपचारिक मान्यता आवश्यक है।

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL)

  • प्रकृति: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में वर्ष 2002 के संशोधन के पश्चात् वर्ष 2003 में गठित एक वैधानिक सर्वोच्च निकाय।
  • भूमिका: भारत में वन्यजीव संरक्षण हेतु सर्वोच्च नीति-निर्माण निकाय के रूप में कार्य करता है।
  • मंत्रालय: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)।
  • विकासक्रम
    • वर्ष 1952: भारतीय वन्यजीव बोर्ड (IBWL) की स्थापना।
    • प्रथम अध्यक्ष: श्री जयचामराजा वाडियार, मैसूर के महाराजा।
    • वर्ष 2003: IBWL का पुनर्गठन कर NBWL बनाया गया।
  • NBWL की संरचना
    • अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री
    • उपाध्यक्ष: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री
    • सदस्य-सचिव: अतिरिक्त महानिदेशक (वन) (वन्यजीव) एवं निदेशक, वन्यजीव संरक्षण
    • अन्य सदस्य
      • 5 गैर-सरकारी संगठन (NGO) प्रतिनिधि
      • 10 प्रतिष्ठित संरक्षणविद्/पारिस्थितिकीविद्/पर्यावरणविद्।
  • NBWL की स्थायी समिति: स्थायी समिति NBWL के अंतर्गत एक विशिष्ट निकाय के रूप में कार्य करती है।
    • अध्यक्ष: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री
    • संरचना: NBWL के सदस्यों में से मंत्री द्वारा नामित, अधिकतम दस सदस्य
    • स्थायी समिति संरक्षित क्षेत्रों में गतिविधियों से संबंधित प्रस्तावों की जाँच में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

संदर्भ

नीति आयोग ने ‘योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से MSME क्षेत्र में दक्षता की प्राप्ति’ (Achieving Efficiencies in MSME Sector through Convergence of Schemes) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए सरकारी समर्थन को सुव्यवस्थित करने हेतु एक रणनीतिक ढाँचा प्रस्तुत किया गया है।

योजना अभिसरण का औचित्य

  • योजनाओं की बहुलता: MSME मंत्रालय ऋण, कौशल विकास, विपणन, नवाचार, प्रौद्योगिकी उन्नयन और अवसंरचना से संबंधित 18 योजनाओं का प्रशासन करता है।
  • चुनौतियाँ: उद्देश्यों में अतिव्यापन, विभिन्न मंत्रालयों में खंडित क्रियान्वयन, प्रयासों की पुनरावृत्ति, अक्षमताएँ तथा लाभार्थियों तक सीमित पहुँच।
  • सुधार की आवश्यकता: समन्वय के अभाव से सार्वजनिक संसाधनों का प्रभाव कमजोर हो जाता है और MSMEs के लिए योजनाओं तक पहुँच जटिल हो जाती है।

द्वि-आयामी अभिसरण रणनीति

इन चुनौतियों से निपटने के लिए रिपोर्ट ने द्वि-आयामी अभिसरण रणनीति की सिफारिश की है।

  • सूचना अभिसरण
    • एकीकृत डेटा प्रणालियाँ: केंद्र और राज्य स्तर पर सरकारी रूप से उत्पन्न डेटा का एकीकरण।
    • शासन में सुधार: सूचित निर्णय-निर्माण, बेहतर समन्वय और सशक्त निगरानी को सक्षम बनाता है।
    • साक्ष्य-आधारित नीति: डेटा-आधारित शासन और लक्षित हस्तक्षेपों को सुगम बनाता है।
  • अभिसरण की प्रक्रिया
    • योजनाओं का संरेखण: समान उद्देश्यों वाली योजनाओं का युक्तिकरण और संरेखण।
    • संचालनात्मक सरलीकरण: योजनाओं के विलय और सामान्य घटकों के संयोजन के माध्यम से पुनरावृत्तियों में कमी।
    • अंतर-मंत्रालयी सहयोग: कुशल सेवा वितरण के लिए मंत्रालयों और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय।

रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें

  • MSMEs के लिए केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल
    • MSMEs योजनाओं, अनुपालन, वित्त और बाजार जानकारी को एकीकृत करने हेतु AI-संचालित केंद्रीकृत मंच का प्रस्ताव।
    • विशेषताएँ: AI चैटबॉट, डैशबोर्ड और वास्तविक समय सहायता हेतु मोबाइल पहुँच।
  • क्लस्टर विकास योजनाओं का अभिसरण
    • रिपोर्ट ‘पारंपरिक उद्योगों के पुनर्जीवन हेतु निधि योजना’ (SFURTI) को एमएसई–क्लस्टर विकास कार्यक्रम (MSE-CDP) के साथ विलय कर अधिक सुव्यवस्थित क्लस्टर विकास ढाँचा निर्माण की अनुशंसा करती है।
    • पारंपरिक उद्योगों के लिए समर्पित उप-योजना का सृजन, MSE-CDP के अंतर्गत एकीकृत शासन तथा समेकित वित्तपोषण।
  • कौशल विकास कार्यक्रमों का अभिसरण
    • कौशल विकास पहलों को तीन-स्तरीय संरचना में पुनर्गठित किया जाना चाहिए, जिसका फोकस होगा:
      • उद्यमिता और व्यावसायिक कौशल
      • MSMEs तकनीकी कौशल
      • ग्रामीण और महिला कारीगरों के लिए प्रशिक्षण।
  • क्रय और विपणन योजना (PMS) का अंतरराष्ट्रीय सहयोग (IC) के साथ अभिसरण (IC):
    • MSMEs की विपणन सहायता तक पहुँच को सरल बनाने और बाजार विस्तार हेतु PMS और IC को एकीकृत विपणन सहायता विंग के अंतर्गत विलय करने की सिफारिश।
    • घरेलू घटक: राष्ट्रीय प्रदर्शनियों, व्यापार मेलों और क्रेता-विक्रेता बैठकों में MSMEs की भागीदारी को सुगम बनाता है।
    • अंतरराष्ट्रीय घटक: विदेशी व्यापार मेलों, B2B कार्यक्रमों और क्रेता-विक्रेता बैठकों के माध्यम से वैश्विक बाजार पहुँच का समर्थन।
  • नवोन्मेषी वित्तपोषण
    • नवाचार वित्तपोषण को सुव्यवस्थित करने के लिए ASPIRE को ‘MSMEs इनोवेटिव स्कीम’ के साथ एक समर्पित कृषि-ग्रामीण उद्यम श्रेणी के अंतर्गत एकीकृत करने की सिफारिश।

MSMEs के बारे में

  • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (MSMED) अधिनियम, 2006 के प्रावधानों के अनुसार, भारत में MSMEs का वर्गीकरण संयंत्र एवं मशीनरी में निवेश और वार्षिक कारोबार के आधार पर किया जाता है।

उद्यम संयंत्र एवं मशीनरी में निवेश कारोबार
सूक्ष्म ₹2.5 करोड़ से अधिक नहीं ₹10 करोड़ से अधिक नहीं
लघु ₹25 करोड़ से अधिक नहीं ₹100 करोड़ से अधिक नहीं
मध्यम ₹125 करोड़ से अधिक नहीं ₹500 करोड़ से अधिक नहीं

भारत में MSMEs की स्थिति

  • भविष्य की विकास संभावनाएँ: MSMEs की कुल संख्या 6.34 करोड़ से बढ़कर लगभग 7.5 करोड़ होने का अनुमान है, जिसकी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 2.5% है।
  • विकास प्रदर्शन: वर्ष 2000 से 2016 के बीच औद्योगिक क्षेत्र की औसत वृद्धि दर 7.6% रही, जबकि MSMEs ने 8.6% की उच्च औसत वृद्धि दर्ज की।
  • जीडीपी में योगदान: वर्ष 2017 से 2023 के बीच MSMEs क्षेत्र का योगदान भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में निरंतर 27% से 30% रहा।
  • रोजगार सृजन: लगभग 62% (करीब 28.13 करोड़) कार्यबल को रोजगार प्रदान करता है, जो कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है।
  • निर्यात में योगदान: भारत के कुल निर्यात का लगभग 45%।
    • निर्यात वृद्धि: वर्ष 2020-21 में ₹3.95 लाख करोड़ से बढ़कर वर्ष 2024-25 में ₹12.39 लाख करोड़ हो गई।
  • क्षेत्रीय संरचना: अक्टूबर 2024 तक, लगभग 25% पंजीकृत MSMEs विनिर्माण क्षेत्र में तथा शेष 75% सेवा गतिविधियों में संलग्न हैं।

MSMEs के लिए सरकारी पहलें

  • पीएम विश्वकर्मा योजना
    • केंद्रीय बजट 2023-24 में घोषित, यह योजना कारीगरों और शिल्पकारों (विश्वकर्माओं) द्वारा प्रदत्त उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता, पैमाने और बाजार एकीकरण को घरेलू एवं वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जोड़कर सुदृढ़ करने का उद्देश्य रखती है।
  • उद्यम पंजीकरण पोर्टल
    • 1 जुलाई, 2020 को प्रारंभ, यह MSMEs के लिए निःशुल्क, कागज-रहित और स्व-घोषणा आधारित पंजीकरण तंत्र प्रदान करता है।
    • यह पोर्टल उद्योग आधार ज्ञापन और उद्यमिता ज्ञापन-II से बिना दस्तावेज अपलोड किए सुगम स्थानांतरण की सुविधा प्रदान करता है, जिससे अनुपालन प्रक्रिया सरल हो जाती है।
    • उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म: अनौपचारिक सूक्ष्म उद्यमों को एकीकृत करने हेतु नवंबर 2023 में प्रारंभ, जिससे प्राथमिकता क्षेत्र ऋण जैसी सुविधाओं तक पहुँच संभव होती है।
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP)
    • यह एक ऋण-संबद्ध सब्सिडी योजना है, जिसका उद्देश्य गैर-कृषि क्षेत्र में सूक्ष्म उद्यमों की स्थापना के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा देना है।
  • पारंपरिक उद्योगों के पुनर्जीवन हेतु निधि योजना (SFURTI)
    • वर्ष 2005-06 में प्रारंभ, इसका उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों को क्लस्टरों में संगठित कर उत्पाद विकास, विविधीकरण, मूल्य संवर्द्धन और सतत् आय वृद्धि को प्रोत्साहित करना है।
  • सूक्ष्म और लघु उद्यमों (MSEs) के लिए सार्वजनिक खरीद नीति
    • वर्ष 2012 में अधिसूचित, यह नीति केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों और CPSEs द्वारा वार्षिक खरीद का 25% MSEs से अनिवार्य रूप से करने का प्रावधान करती है।
  • बजटीय विस्तार: MSMEs क्षेत्र पर सरकारी व्यय वित्त वर्ष 2019-20 में ₹6,717 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2025-26 में ₹23,168 करोड़ हो गया है, जो सशक्त नीति निर्माण तथा वित्तीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956 के अंतर्गत विधवा बहू अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का दावा करने की अधिकार रखती है।

विवाद की पृष्ठभूमि

  • मामले की उत्पत्ति: यह मामला डॉ. महेंद्र प्रसाद की संपत्ति से जुड़े एक पारिवारिक विवाद से उत्पन्न हुआ, जिनका निधन दिसंबर 2021 में हुआ था।
    • उनके पुत्र रंजीत शर्मा का निधन मार्च 2023 में हुआ, जिसके बाद उनकी पत्नी गीता शर्मा ने अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की माँग की।
  • परिवार न्यायालय का निर्णय: न्यायालय ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि गीता शर्मा अपने ससुर की मृत्यु के समय विधवा नहीं थीं और इसलिए अधिनियम के अंतर्गत आश्रित (Dependant) नहीं मानी जा सकती हैं।
  • उच्च न्यायालय का निर्णय: इस निर्णय को पलटते हुए कहा गया कि पुत्र की विधवा HAMA के अंतर्गत आश्रित के रूप में योग्य है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का पक्ष: उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा और संपत्ति-आधारित दायित्व को स्पष्ट किया।

हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम (HAMA), 1956

  • यह अधिनियम हिंदू, बौद्ध, जैन और सिखों के बीच दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण से संबंधित कानून को संहिताबद्ध करता है।
  • इसे वर्ष 1956 में विविध प्रथागत नियमों के स्थान पर एक समान कानूनी ढाँचे के रूप में अधिनियमित किया गया था।
  • HAMA, 1956 भारत में हिंदू कानून के अंतर्गत बच्चों के दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण को नियंत्रित करता है।
    • धारा 21: “आश्रितों” को मृतक के निकट संबंधियों के रूप में परिभाषित करती है, जिनमें माता-पिता, बच्चे, अविवाहित पुत्रियाँ, विधवाएँ और अवयस्क अवैध संतानें शामिल हैं।
    • धारा 22: मृत हिंदू के उत्तराधिकारियों पर यह दायित्व डालती है कि वे अपनी हिस्सेदारी के अनुपात में संपत्ति से आश्रितों का भरण-पोषण करें।

न्यायिक पूर्व दृष्टांत

  • राज किशोर मिश्रा बनाम मीना मिश्रा (1994): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि ससुर का अपनी बहू का भरण-पोषण करने का दायित्व तब लागू नहीं किया जा सकता जब उसके पास सहदायिक संपत्ति से उसका भरण-पोषण करने का कोई साधन न हो, जिसमें से बहू को कोई हिस्सा प्राप्त न हुआ हो।
  • अमर कांता सेन बनाम सोवना सेन (1960): कलकत्ता उच्च न्यायालय ने माना कि पत्नी, भले ही व्यभिचार या असंयमित जीवन जी रही हो, भरण-पोषण की हकदार है, बशर्ते वह स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम न हो। यदि वह स्वयं अपना भरण-पोषण कर सकती है, तो भरण-पोषण आवश्यक नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय का विधिक तर्क

  • आश्रितों की व्याख्या: सर्वोच्च न्यायालय ने अधिनियम की धारा 21(vii) की जाँच की और माना कि “उसके पुत्र की कोई भी विधवा” वाक्यांश स्पष्ट और निरपेक्ष है तथा उसके विधवा होने के समय पर निर्भर नहीं करता है।
  • समय अप्रासंगिक: न्यायालय ने निर्णय दिया कि बहू, ससुर की मृत्यु से पूर्व या पश्चात् विधवा बनी, यह भरण-पोषण के दावे के लिए अप्रासंगिक है।
  • धारा 22 का दायरा: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 22 मृत हिंदू की संपत्ति के उत्तराधिकारी सभी व्यक्तियों को उस संपत्ति से आश्रितों का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य करती है।
  • संपत्ति-केंद्रित दायित्व: भरण-पोषण का दायित्व व्यक्ति-केंद्रित नहीं, बल्कि संपत्ति-केंद्रित माना गया, जो सभी कानूनी उत्तराधिकारियों पर आनुपातिक रूप से लागू होता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का मनुस्मृति का संदर्भ: उद्धृत श्लोक: मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 389 के अनुसार, “न माता, न पिता, न पत्नी और न पुत्र त्यागे जाने योग्य हैं, जो व्यक्ति इन निर्दोष संबंधियों का परित्याग करता है, उसे राजा द्वारा छह सौ बार दंड दिया जाना चाहिए।”
    • न्यायालय की व्याख्या: यह श्लोक परिवार के मुखिया के आश्रितों, विशेष रूप से महिला पारिवारिक सदस्यों, के प्रति सहायता के दायित्व को रेखांकित करता है।

मनुस्मृति एक प्राचीन हिंदू विधिक ग्रंथ है, जिसने प्रारंभिक भारतीय समाज में सामाजिक, नैतिक और कानूनी नियम निर्धारित किए।

संवैधानिक और सामाजिक महत्त्व

  • अनुच्छेद-14 का दृष्टिकोण: न्यायालय ने माना कि केवल पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवाओं के बीच भेद करना मनमाना है और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
  • अनुच्छेद-21 का दृष्टिकोण: तकनीकी आधारों पर भरण-पोषण से इनकार करना गरिमा के साथ जीवन के अधिकार को कमजोर करता है और सामाजिक बहिष्करण का जोखिम उत्पन्न करता है।
  • भरण-पोषण की सशर्त प्रकृति: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण स्वतः नहीं मिलता और यह इस बात पर निर्भर करता है कि विधवा अन्य वैध स्रोतों से स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।

संदर्भ

16 जनवरी, 2026 को स्टार्ट-अप इंडिया पहल की 10वीं वर्षगाँठ (राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस) मनाई जाएगी।

राष्ट्रीय स्टार्ट-अप दिवस के बारे में

  • राष्ट्रीय स्टार्ट-अप दिवस की घोषणा: भारत भर के उद्यमियों और नवोन्मेषकों को राष्ट्रीय मान्यता प्रदान करने के लिए वर्ष 2022 में 16 जनवरी को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय स्टार्ट-अप दिवस के रूप में नामित किया गया था।
  • दसवीं वर्षगाँठ: वर्ष 2026 में इस पहल के एक दशक पूरे होने का समारोह मनाया जाएगा, जो नीतिगत निरंतरता और भारत के स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती परिपक्वता को दर्शाता है।

स्टार्ट-अप्स के बारे में

  • अर्थ: स्टार्ट-अप एक नवस्थापित, नवाचार-आधारित व्यवसाय है, जिसे किसी विशिष्ट समस्या का समाधान करने के लिए एक मापनीय उत्पाद या सेवा के साथ बनाया जाता है, जिसमें तीव्र वृद्धि की क्षमता निहित होती है।
  • भारत में स्टार्ट-अप: भारतीय नियामक संदर्भ में, स्टार्ट-अप एक ऐसी इकाई है, जो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, पार्टनरशिप फर्म या लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (LLP) के रूप में पंजीकृत होती है।
    • उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए, इकाई को निम्नलिखित शर्तें पूर्ण करनी होती हैं:
      • कंपनी की स्थापना की तिथि से दस वर्ष के भीतर होनी चाहिए।
      • किसी भी पूर्व वित्तीय वर्ष में कंपनी का वार्षिक कारोबार ₹100 करोड़ से अधिक नहीं होना चाहिए।
      • कंपनी का ध्यान उत्पादों या सेवाओं के नवाचार, विकास या सुधार पर केंद्रित होना चाहिए अथवा रोजगार सृजन की उच्च क्षमता वाला एक स्केलेबल बिजनेस मॉडल होना चाहिए।
  • स्टार्ट-अप के उदाहरण
    • स्टार्ट-अप: फ्लिपकार्ट, पेटीएम, ओला, जोमैटो (ये सभी भारत में स्टार्ट-अप के रूप में शुरू हुए थे)।
    • वैश्विक यूनिकॉर्न: एयरबीएनबी, उबर, स्पेसएक्स।
    • क्षेत्र: फिनटेक, हेल्थटेक, एग्रीटेक, एडटेक, स्वच्छ ऊर्जा।

  • मुख्य विशेषताएँ
    • नवस्थापित: स्टार्ट-अप आमतौर पर विकास के शुरुआती चरण में होते हैं।
    • नवाचार-उन्मुख: वे समस्याओं को नए तरीकों से हल करने और अनूठे उत्पाद या सेवाएँ प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
    • विस्तार शमता: तेजी से बढ़ने के लिए डिजाइन किए गए, अक्सर बड़े बाजारों को लक्षित करते हैं।
  • वित्तपोषण के स्रोत: स्टार्ट-अप आमतौर पर विभिन्न वित्तपोषण स्रोतों पर निर्भर करते हैं, जैसे:
    • स्वयं द्वारा वित्तपोषित उद्यम (बूटस्ट्रैपिंग)
    • प्रारंभिक चरण के निवेशक (एंजल निवेशक)
    • कंपनियों द्वारा प्रदान की गई पूँजी (वेंचर कैपिटल)
    • बैंक ऋण या क्रेडिट
    • उद्यमिता को समर्थन देने वाली सरकारी योजनाएँ
    • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से क्राउडफंडिंग।

  • स्टार्ट-अप क्यों महत्त्वपूर्ण हैं: स्टार्ट-अप रोजगार सृजन, नवाचार को बढ़ावा देने, प्रतिस्पर्द्धा वृद्धि, नई तकनीकों को अपनाने को प्रोत्साहित करने और देश की समग्र आर्थिक वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    • वे उद्यमिता की संस्कृति को भी बढ़ावा देते हैं और पारंपरिक उद्योगों में नए दृष्टिकोण के समन्वय और स्थापना पर बल देते हैं।

स्टार्ट-अप मूल्यांकन से संबंधित शर्तें

  • यूनिकॉर्न: एक स्टार्ट-अप जिसका मूल्य 1 बिलियन डॉलर से अधिक है। यह शब्द एलीन ली द्वारा वर्ष 2013 में गढ़ा गया था।
  • डेकाकॉर्न: एक स्टार्ट-अप जिसका मूल्य 10 बिलियन डॉलर से अधिक है।
  • हेक्टोकॉर्न: अत्यंत दुर्लभ स्टार्ट-अप, जिनका मूल्य 100 बिलियन डॉलर से अधिक है।
  • मिनकॉर्न: एक स्टार्ट-अप, जिसका मूल्य 1 बिलियन डॉलर से कम है।
  • सूनिकॉर्न: तेजी से बढ़ने वाले स्टार्ट-अप, जिनमें 1 बिलियन डॉलर के मूल्य तक पहुंचने की क्षमता है।

स्टार्ट-अप इंडिया पहल के बारे में

  • स्टार्ट-अप इंडिया वर्ष 2016 में नवाचार और उद्यमिता के लिए एक समावेशी पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई एक प्रमुख पहल है।
  • नोडल मंत्रालय: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) द्वारा संचालित।
  • उद्देश्य: स्टार्ट-अप्स पर नियामक बोझ को कम करना, जिससे वे अपने मुख्य व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित कर सकें और अनुपालन लागत को कम रख सकें।

स्टार्ट-अप इंडिया के तहत स्टार्ट-अप्स को मिलने वाले लाभ

  • स्व-प्रमाणीकरण: स्टार्ट-अप एक सरल ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से 6 श्रम कानूनों और 3 पर्यावरण कानूनों के अनुपालन का स्व-प्रमाणीकरण कर सकते हैं।
  • श्रम कानून
    • निगमन की तिथि से 5 वर्षों तक कोई निरीक्षण नहीं होगा।
    • निरीक्षण केवल तभी होगा, जब कोई विश्वसनीय, लिखित शिकायत प्राप्त हो और वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अनुमोदित हो।
  • पर्यावरण कानून
    • CPCB द्वारा परिभाषित कम प्रदूषण वाले उद्योग’ (जिन्हें श्वेत श्रेणी‘ कहा जाता है) में आने वाले स्टार्ट-अप अनुपालन का स्व-प्रमाणन कर सकते हैं।
    • ऐसे मामलों में केवल आकस्मिक जाँच ही की जा सकती है।
  • कर छूट: आयकर अधिनियम की धारा 80-IAC के तहत पात्र स्टार्ट-अप अपने प्रथम दस वर्षों के भीतर तीन वर्ष की आयकर छूट का दावा कर सकते हैं।

स्टार्ट-अप इंडिया की प्रमुख विशेषताएँ

  • स्टार्ट-अप के सभी चरणों में सहायता: यह स्टार्ट-अप आइडिया जनरेशन, इनक्यूबेशन, बाजार में प्रवेश और स्केल-अप तक संपूर्ण जीवन चक्र में सहायता प्रदान करता है, जिससे प्रारंभिक चरण के जोखिम तथा विकास संबंधी बाधाएँ कम होती हैं।

  • विकेंद्रीकृत और समावेशी उद्यमिता: यह स्टार्ट-अप प्रथम श्रेणी के शहरों से परे द्वितीय, तृतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमिता को बढ़ावा देता है, जिससे समावेशी नवाचार तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित होता है।
  • राज्य रैंकिंग फ्रेमवर्क के माध्यम से प्रतिस्पर्द्धी संघवाद: राज्यों का स्टार्ट-अप रैंकिंग फ्रेमवर्क (SRF) नीतिगत समर्थन, संस्थागत क्षमता और पारिस्थितिकी तंत्र की परिपक्वता के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का मूल्यांकन करता है, जिससे अंतर-राज्यीय प्रतिस्पर्द्धा और नीतिगत नवाचार में बढोतरी होती है।
  • क्षेत्रीय फोकस और पारिस्थितिकी तंत्र क्षमता निर्माण: यह स्टार्टअप इंडिया हब के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी, कृषि प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा और डीप-टेक जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लक्षित सहायता प्रदान करता है, साथ ही मेंटरशिप, प्रशिक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र कनेक्टिविटी भी प्रदान करता है।

स्टार्ट-अप इंडिया के अंतर्गत प्रमुख योजनाएँ

  • स्टार्ट-अप्स के लिए फंड ऑफ फंड्स (FFS): इसका प्रबंधन भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) द्वारा किया जाता है और इसका कोष ₹10,000 करोड़ है।
    • वर्ष 2026 की शुरुआत तक, इसने 140 से अधिक वैकल्पिक निवेश फंडों (AIFs) में पूँजी निवेश किया है, जिन्होंने सामूहिक रूप से 1,370 से अधिक स्टार्ट-अप्स में ₹25,500 करोड़ से अधिक का निवेश किया है।
  • स्टार्ट-अप इंडिया सीड फंड स्कीम (SISFS): ₹945 करोड़ के कोष के साथ, यह योजना प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट (PoC), प्रोटोटाइपिंग और मार्केट एंट्री के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
    • 215 से अधिक इनक्यूबेटरों को इन फंडों को प्रारंभिक चरण के उद्यमों तक पहुँचाने की मंजूरी दी गई है।
  • स्टार्ट-अप्स के लिए क्रेडिट गारंटी योजना (CGSS): बिना गिरवी के ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना के तहत नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (NCGTC) लिमिटेड के माध्यम से 800 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 330 से अधिक ऋणों की गारंटी दी गई है।
  • MAARG पोर्टल: मेंटरशिप, एडवाइजरी, असिस्टेंस, रेजिलिएंस और विकास कार्यक्रम उद्यमियों को अनुभवी सलाहकारों से जोड़ता है, ताकि उन्हें रणनीतिक मार्गदर्शन और मजबूती प्रदान की जा सके।
  • स्टार्टअप इंडिया इन्वेस्टर कनेक्ट पोर्टल: SIDBI के सहयोग से विकसित एक डिजिटल प्लेटफॉर्म, जो उद्यमियों को एक ही आवेदन के माध्यम से कई वेंचर कैपिटल (VC) फंड तक पहुँचने की सुविधा देता है।

स्टार्ट-अप इंडिया के अंतर्गत प्रमुख उपलब्धियाँ (2016-2026)

  • स्टार्ट-अप इकोसिस्टम का तीव्र विस्तार: दिसंबर 2025 तक भारत में 2 लाख से अधिक DPIIT-मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप हो चुके हैं, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े स्टार्ट-अप इकोसिस्टम में सम्मिलित हो गया है।
  • यूनिकॉर्न स्टार्ट-अप्स का उदय: यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स की संख्या वर्ष 2014 में 4 से बढ़कर वर्ष 2026 तक 120 से अधिक हो गई है, जिनका कुल मूल्यांकन 350 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है।
  • उद्यमिता का विकेंद्रीकरण और लोकतांत्रीकरण: DPIIT-मान्यता प्राप्त लगभग 50% स्टार्टअप, टियर-II और टियर-III शहरों से हैं, जो विकेंद्रीकृत, क्षेत्रीय रूप से संतुलित और समावेशी उद्यमिता की ओर एक परिवर्तन का संकेत देता है।
  • सामाजिक समावेशन और लैंगिक समानता: DPIIT-मान्यता प्राप्त 45% से अधिक स्टार्ट-अप्स में न्यूनतम एक महिला निदेशक या भागीदार है, जो महिला-नेतृत्व वाली उद्यमिता, सामाजिक समानता और समावेशी आर्थिक भागीदारी में हुई प्रगति को उजागर करता है।
  • नवाचार और बौद्धिक संपदा (IP) पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाना: राष्ट्रीय नवाचार विकास एवं संवर्द्धन पहल (NIDHI) जैसे नवाचार कार्यक्रमों ने 1,100 से अधिक बौद्धिक संपदा संपत्तियाँ सृजित की हैं।
    • इसने 12,000 से अधिक स्टार्ट-अप्स को सहयोग प्रदान किया है, जिससे भारत के अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) आधार को मजबूती मिली है।

भारत में स्टार्टअप्स को समर्थन देने वाली अन्य सरकारी योजनाएँ

  • अटल इनोवेशन मिशन (AIM) 2.0 – नीति आयोग, AIM 2.0: पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए प्रायोगिक पहलों पर केंद्रित है।
    • अटल टिंकरिंग लैब्स (ATLs): 733 जिलों में 10,000 से अधिक प्रयोगशालाएँ 1.1 करोड़ छात्रों को रोजगार प्रदान कर रही हैं।
    • भाषा समावेशी नवाचार कार्यक्रम (LIPI): 22 अनुसूचित भाषाओं में गैर-अंग्रेजी भाषी लोगों के लिए बाधाओं को कम करने के लिए 30 स्थानीय भाषा नवाचार केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।
  • MeitY स्टार्ट-अप हब (MSH): TIDE 2.0 (उद्यमियों का प्रौद्योगिकी अंतर्ग्रहण और विकास) के माध्यम से सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा ब्लॉकचेन जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करते हुए 6,148 से अधिक स्टार्ट-अप और 517 इनक्यूबेटरों को सहायता प्रदान करता है।
  • NIDHI (राष्ट्रीय नवाचार विकास और संवर्धन पहल): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का एक व्यापक कार्यक्रम, जिसने 1,30,000 से अधिक रोजगार सृजित किए हैं और NIDHI-PRAYAS (युवा एवं महत्त्वाकांक्षी प्रौद्योगिकी उद्यमियों को प्रोत्साहन और त्वरण) के माध्यम से विचार से लेकर प्रोटोटाइप तक की प्रक्रिया में सहायता प्रदान करता है।
  • जमीनी स्तर और ग्रामीण कार्यक्रम
    • SVEP (स्टार्टअप ग्राम उद्यमिता कार्यक्रम): यह दीनदयाल अंत्योदय योजना (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) के अंतर्गत एक उप-योजना है, जिसने 3.74 लाख उद्यमों को सहायता प्रदान की है।
    • ASPIRE (नवाचार, ग्रामीण उद्योग और उद्यमिता प्रोत्साहन योजना): यह आजीविका व्यवसाय इनक्यूबेटर (LBI) के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देती है।
    • PMEGP (प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम): यह खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग (KVIC) के माध्यम से कार्यान्वित एक ऋण-आधारित सब्सिडी योजना है।
  • उद्यमिता पर राष्ट्रीय अभियान (जनवरी 2026 में लॉन्च):  DAY-NRLM (दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) के तहत एक नई पहल जिसका शीर्षक है ‘हर घर उद्यम, हर गाँव समृद्ध।”
    • उद्देश्य: उद्यम प्रोत्साहन पर 50,000 सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (CRP) को प्रशिक्षित करना।
    • प्रभाव: इसका उद्देश्य 50 लाख स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के सदस्यों को उद्यमिता विकास कार्यक्रम (EDP) का प्रशिक्षण प्रदान करना है, ताकि 3 करोड़ “लखपति दीदियों” (1 लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाली महिलाएं) को सक्षम बनाया जा सके।

भारत में स्टार्ट-अप इकोसिस्टम के सामने चुनौतियाँ

  • वित्तपोषण और वित्तीय पहुँच: स्टार्ट-अप्स को पर्याप्त प्रारंभिक चरण का वित्तपोषण और वेंचर कैपिटल प्राप्त करने में लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, खासकर वित्तपोषण में मंदी या वैश्विक बाजार में परिवर्तन के दौरान।
    • उदाहरण: भारत में तकनीकी स्टार्ट-अप इक्विटी फंडिंग 2025 में घटकर 10.5 बिलियन डॉलर रह गई, जो वर्ष 2024 की तुलना में 17% की वार्षिक गिरावट है और वर्ष 2023 में जुटाए गए 11 बिलियन डॉलर से 4% कम है।
  • नियामक जटिलता और अनुपालन: भारत में स्टार्ट-अप्स जटिल नियामक ढाँचों से जूझ रहे हैं, विशेष रूप से बदलते कर कानूनों (जैसे- GST) और श्रम संहिताओं से।
    • उदाहरण: Navi और जुपिटर जैसे फिनटेक स्टार्ट-अप्स को RBI के अनुपालन में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, और टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म अस्पष्ट डेटा सुरक्षा नियमों से जूझ रहे हैं।
  • बुनियादी ढाँचा और प्रतिभा की कमी: हालाँकि प्रमुख शहरों में बेहतर बुनियादी ढाँचा उपलब्ध है, लेकिन टियर-II और टियर-III शहरों में अभी भी कनेक्टिविटी की समस्या है और सह-कार्य स्थलों और कुशल प्रतिभा की कमी है।
    • उदाहरण: ग्रामीण क्षेत्रों में क्रोपिन (CropIn) और देहात (DeHaat) जैसी कृषि-तकनीक स्टार्ट-अप कंपनियों को खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी का सामना करना पड़ता है, और AI/ML स्टार्ट-अप कंपनियाँ प्रतिभा के लिए वैश्विक तकनीकी दिग्गजों से प्रतिस्पर्द्धा करती हैं।
  • बाजार पहुंच और प्रतिस्पर्धा: स्टार्टअप कंपनियों को स्थापित कॉरपोरेट कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, जिनके पास अधिक वित्तीय शक्ति और बाजार में दबदबा होता है।
    • बड़ी कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली मूल्य प्रतिस्पर्धा की रणनीति और रियायती सेवाएं अक्सर स्टार्टअप कंपनियों के लिए बाजार में टिके रहना मुश्किल बना देती हैं।
  • बौद्धिक संपदा और कानूनी बाधाएँ: पेटेंट और ट्रेडमार्क दाखिल करने में लगने वाली उच्च लागत और देरी के कारण स्टार्ट-अप्स को बौद्धिक संपदा संरक्षण प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
    • उदाहरण: स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में बायोटेक स्टार्ट-अप्स को पेटेंट अनुमोदन में देरी का सामना करना पड़ता है, जिससे समय पर उत्पादों का व्यावसायीकरण करने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है।
  • डीप-टेक व्यावसायीकरण: डीप-टेक स्टार्ट-अप्स को उत्पाद विकास के लिए लंबी अवधि का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए दीर्घकालिक स्थिर पूँजी की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: स्काईरूट एयरोस्पेस और अग्निकुल कॉस्मॉस जैसे स्पेस-टेक स्टार्ट-अप्स को लंबी समय सीमा और उच्च प्रारंभिक लागत का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए अधिक प्रभावी निवेशकों की आवश्यकता होती है।
  • अन्य
    • ग्रामीण-शहरी विभाजन: ग्रामीण स्टार्ट-अप डिजिटल साक्षरता की कमी और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे जैसी चुनौतियों का सामना करते हैं।
    • प्रतिभा प्रतिधारण: बड़े संगठनों और अंतरराष्ट्रीय अवसरों से प्रतिेस्पर्द्धा के कारण स्टार्ट-अप प्रतिभा प्रतिधारण के लिए संघर्ष करते हैं।
    • लिंगभेद: वित्तपोषण में लिंगभेद और सांस्कृतिक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति महिलाओं और गैर-महानगरीय क्षेत्रों के व्यक्तियों की भागीदारी को सीमित करती रहती है।
      • सक्रिय स्टार्ट-अप में से केवल लगभग 7.5% का नेतृत्व महिला संस्थापकों द्वारा किया जाता है, और इन उद्यमों के लिए जुटाई गई पूँजी में गिरावट देखी गई है।

आगे की राह

  • वित्तीय सहायता और वित्तीय सहायता प्रणालियों को सुदृढ़ीकरण
    • घरेलू निवेश बढ़ाना: विदेशी पूँजी पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू वेंचर कैपिटल, एंजेल इन्वेस्टमेंट और क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म का विस्तार करना।
    • क्षेत्रीय फोकस: विकास को विकेंद्रीकृत करने के लिए टियर-II/टियर-III और ग्रामीण स्टार्ट-अप्स के लिए राज्य-नेतृत्व वाले फंड और प्रोत्साहन योजनाएँ बनाना।
      • राज्य निजी वेंचर कैपिटल निवेश को बढ़ावा देने और स्थानीय स्टार्ट-अप्स को समर्थन देने के लिए सक्रिय रूप से अपने स्वयं के फंड-ऑफ-फंड्स (जैसे, तमिलनाडु का ₹100 करोड़ का सह-निर्माण फंड) बना रहे हैं – एक ऐसा मॉडल जिसे टियर-II/III इकोसिस्टम के लिए भी अपनाया जा सकता है।
  • व्यापार करने में सुगमता के लिए विनियामक सुधार
    • अनुपालन को सरल बनाना: स्टार्ट-अप्स पर प्रशासनिक बोझ कम करने के लिए कराधान नीतियों, विशेष रूप से GST और श्रम कानूनों को सुव्यवस्थित करना।
    • लचीला बौद्धिक संपदा ढाँचा तैयार करना: पेटेंट सब्सिडी प्रदान करना और बौद्धिक संपदा अधिकार पंजीकरण के लिए आवश्यक समय को कम करना ताकि नवाचारों का तेजी से व्यावसायीकरण हो सके, विशेष रूप से डीप-टेक और बायोटेक स्टार्ट-अप्स के लिए।
  • बुनियादी ढाँचे और डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना
    • को-वर्किंग स्पेस’ विकसित करना: टियर-II और टियर-III के शहरों में इनक्यूबेटर और को-वर्किंग स्पेस में निवेश करना, ताकि छोटे क्षेत्रों में स्टार्ट-अप्स के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे का मजबूत किया जा सके साथ ही परिचालन लागत में भी कमी आएगी।
      • बिहार आइडिया फेस्टिवल पोर्टल जैसी सरकारी और राज्य स्तरीय पहलों के माध्यम से विभिन्न जिलों से 10,000 से अधिक स्टार्ट-अप विचारों को प्रोत्साहित किया जाता है, मूलभूत स्तर पर नवाचार को बढ़ावा दिया जाता है और ग्रामीण क्षेत्रों की कनेक्टिविटी को पारिस्थितिकी तंत्र में विस्तारित किया जाता है।
    • डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना: कृषि-तकनीक और टेलीमेडिसिन जैसे क्षेत्रों में स्टार्ट-अप्स के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण तथा कम विकसित क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी एवं डिजिटल बुनियादी ढाँचे में सुधार करना।
  • प्रतिभा विकास और स्थायित्व प्रोत्साहन
    • उद्योग-शैक्षणिक साझेदारी विकसित करना: AI, ब्लॉकचेन और डेटा साइंस जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में प्रतिभाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच सहयोग को मजबूत करना।
    • कर्मचारियों के स्थायित्व हेतु प्रोत्साहन: स्टार्ट-अप्स में कुशल पेशेवरों को बनाए रखने के लिए कर्मचारी स्टॉक विकल्प (ESO), प्रशिक्षण कार्यक्रम और व्यावसायिक विकास के अवसर प्रदान करना।
  • समावेशी उद्यमिता को बढ़ावा देना
    • महिला उद्यमियों को समर्थन देना: स्टैंड-अप इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया हब जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करना, ताकि महिला नेतृत्व वाले स्टार्ट-अप्स को मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान की जा सके तथा उद्यमिता जगत में लैंगिक असमानता को कम किया जा सके।
  • डीप-टेक नवाचार और व्यावसायीकरण को बढ़ावा देना
    • दीर्घकालिक स्थिर पूँजी संवर्द्धन: दीर्घकालिक निधियों को अंतरिक्ष, रक्षा, जैव प्रौद्योगिकी और स्वच्छ ऊर्जा जैसे गहन प्रौद्योगिकी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करना, जिनका विकास चक्र लंबा होता है।
    • गहन प्रौद्योगिकी रिएक्टर का उपयोग करना: गहन प्रौद्योगिकी रिएक्टर को एक अनुसंधान प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना, ताकि उन नवाचारों के व्यावसायीकरण में सहायता मिल सके, जिनमें महत्त्वपूर्ण निवेश और लंबी विकास अवधि की आवश्यकता होती है।
  • वैश्विक एकीकरण और बाजार पहुँच को मजबूत बनाना
    • निर्यात की तैयारी को बढ़ावा देना: भारतीय स्टार्ट-अप्स को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँच प्रदान करके, उन्हें वैश्विक निवेशकों और ग्राहकों से जोड़कर निर्यात सहायता प्रदान करना।
    • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना: प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सीमा पार सहयोग को प्रोत्साहित करना, जिससे स्टार्ट-अप्स वैश्विक मूल्य शृंखलाओं का लाभ उठा सकें और भारत के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में नवाचार को गति दे सकें।
    • अंतरराष्ट्रीय नवाचार सहयोग: अंतरराष्ट्रीय नवाचार सहयोग कार्यक्रम जैसी पहलों के माध्यम से भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर वैश्विक संबंधों को मजबूत करना, सीमा पार साझेदारी, वैश्विक बाजार एकीकरण और प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष

एक दशक बाद, भारत का स्टार्ट-अप इकोसिस्टम न केवल व्यापक है, बल्कि जनसांख्यिकीय लाभ, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और सुधार एजेंडा पर आधारित संरचनात्मक परिवर्तन को भी दर्शाता है। आज स्टार्ट-अप प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में व्याप्त हैं, जो नवाचार, रोजगार सृजन और वैश्विक बाजार एकीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं।

To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.


Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.