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Jan 20 2026

गुइलेन–बारे सिंड्रोम
(Gullian-Barré Syndrome)

हाल ही में मध्य प्रदेश के नीमच जिले में गुइलेन–बारे सिंड्रोम (Gullian-Barré Syndrome-GBS) के कारण दो बच्चों की मृत्यु हुई।

गुइलेन–बारे सिंड्रोम (GBS) क्या है?

  • प्रकृति: GBS एक दुर्लभ ऑटोइम्यून तंत्रिका संबंधी विकार है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली परिधीय तंत्रिकाओं पर हमला करती है, जिससे मांसपेशियों में कमजोरी और संभावित पक्षाघात हो सकता है।
  • महामारी विज्ञान
    • यह किसी भी आयु के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है।
    • वयस्कों और पुरुषों में अधिक सामान्य।
    • इसकी घटना दर लगभग प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर 1–2 मामले है।
  • कारण
    • संक्रमण के बाद उत्पन्न होने वाला कारक: अधिकांश मामलों में, GBS किसी वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण के बाद होता है।
    • बैक्टीरियल संबंध: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, कैंपिलोबैक्टर जेजूनी’ (Campylobacter jejuni) संक्रमण, जो गैस्ट्रोएंटेराइटिस का कारण बनता है, GBS के सबसे सामान्य जोखिम कारकों में से एक है।
    • वायरल संक्रमण: GBS को इन्फ्लुएंजा, साइटोमेगालोवायरस, एपस्टीन–बार वायरस और जीका वायरस संक्रमण से भी जोड़ा गया है।
    • टीकाकरण: कुछ टीकों को GBS से जोड़ा गया है, हालाँकि जोखिम अत्यंत कम होता है।
  • सामान्य लक्षण
    • प्रारंभिक लक्षण: लक्षण आमतौर पर पैरों में झनझनाहट और कमजोरी से शुरू होते हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के ऊपरी हिस्से, हाथों तथा चेहरे तक फैलते हैं।
    • सामान्य अभिव्यक्तियाँ: इनमें सुई चुभने जैसा दर्द, पीठ दर्द, पैर दर्द, चलने या सीढ़ियाँ चढ़ने में कठिनाई, चेहरे की कमजोरी शामिल हैं।
    • गंभीर प्रगति: कुछ मामलों में हाथ, पैर या चेहरे की मांसपेशियों का पक्षाघात हो सकता है।
    • जटिलताएँ: यदि GBS स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, जो हृदय गति और रक्तचाप जैसे गतिविधियों को नियंत्रित करता है, तो यह जीवन के लिए घातक बन सकता है।

उपचार

  • कोई निश्चित उपचार नहीं: गुइलेन–बारे सिंड्रोम का कोई ज्ञात निश्चित उपचार नहीं है।
  • प्रमुख उपचार
    • प्लाज्मा एक्सचेंज (प्लास्माफेरेसिस): तंत्रिकाओं पर हमला करने वाली हानिकारक एंटीबॉडी को समाप्त करताहै।
    • इंट्रावीनस इम्युनोग्लोबुलिन (IVIG) थेरेपी: प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा होने वाले नुकसान को कम करने में सहायता करती है।
  • सहायक देखभाल: रोगियों को रिकवरी के दौरान वेंटिलेटर सपोर्ट के साथ-साथ शारीरिक और व्यावसायिक थेरेपी की आवश्यकता हो सकती है।

सम्मक्का–सरलम्मा जतारा

तेलंगाना, 28 जनवरी, 2026 से आयोजित होने वाले द्विवार्षिक सम्मक्का–सरलम्मा जतारा की तैयारी कर रहा है, साथ ही मेदाराम में पवित्र क्षेत्र का बड़े पैमाने पर पुनर्विकास भी किया जा रहा है।

सम्मक्का–सरलम्मा जतारा के बारे में

  • सम्मक्का–सरलम्मा जतारा एक द्विवार्षिक जनजातीय आध्यात्मिक उत्सव है, जो कोया आदिवासी समुदाय की पूर्वज देवियों सम्मक्का और उनकी पुत्री सरलम्मा के सम्मान में आयोजित किया जाता है।
  • स्थान: यह उत्सव तेलंगाना के मुलुगु जिले के मेदाराम गाँव में, एटूरनागरम वन्यजीव अभयारण्य के भीतर, दंडकारण्य वन क्षेत्र के हिस्से के रूप में, हिंदू माह माघ की पूर्णिमा के दौरान आयोजित होता है।
  • ऐतिहासिक उत्पत्ति: यह जतारा कोया जनजातीय कथाओं में निहित है, जिनमें सम्मक्का और सरलम्मा ने काकतीय शासकों द्वारा आरोपित कर का प्रतिरोध किया था, जो जनजातीय प्रतिरोध, बलिदान का प्रतीक है।
    • कोया आदिवासी समुदाय तेलंगाना का सबसे बड़ा जनजातीय समूह है, जो मुख्य रूप से भद्राद्री कोठागुडेम और ओडिशा के मल्कानगिरी जिलों में निवास करता है, द्रविड़-आधारित कोया भाषा (कोया बाशा) बोलता है और अपने पारंपरिकबाइसन-हॉर्न’ नृत्य के लिए प्रसिद्ध है।
  • जतारा में धार्मिक प्रथाएँ: यह सर्वात्मवादी और कुटुंब-आधारित परंपराओं का पालन करती है, जहाँ कोई स्थायी मंदिर या मूर्तियाँ नहीं होतीं।
    • देवियों को प्रतीकात्मक रूप से वन से लाकर तीन दिनों के लिए लोगों के बीच लाया जाता है।
  • मुख्य विशेषताएँ: भक्त धन के स्थान पर गुड़ (बंगारम्) अर्पित करते हैं, जो कृषि-आधारित समानता को दर्शाता है। अनुष्ठान कोया जनजातीय पुजारियों द्वारा पवित्र वृक्षों, बाँस के टोटेम, कबीलाई ध्वज (दल्गुड्डा) और मौखिक कथाओं के माध्यम से संपन्न किए जाते हैं।
  • स्थिति: इसे एशिया का सबसे बड़ा जनजातीय उत्सव माना जाता है, जिसमें एक करोड़ से अधिक श्रद्धालु आते हैं, और यह भारत में कुंभ मेले के बाद दूसरा सबसे बड़ा आयोजन है।

भारत के अन्य महत्त्वपूर्ण जनजातीय उत्सव

  • नागोबा जतारा (तेलंगाना): गोंड जनजाति का एक प्रमुख उत्सव, जो केस्लापुर में मनाया जाता है और गुसादी नृत्य तथा पूर्वज सर्प पूजा से जुड़ा है।
  • मुर्मा जात्रा (झारखंड): ओराँव जनजाति का एक सांस्कृतिक उत्सव, जो जनजातीय एकता, विरासत और मुंडा समुदाय के साथ भाईचारे का उत्सव है।
  • बनेश्वर मेला (राजस्थान): “जनजातीय कुंभ” के रूप में प्रसिद्ध, यह डूंगरपुर में सोम–माही नदी संगम पर आयोजित होने वाला भील जनजाति का प्रमुख आयोजन है।
  • हिल जात्रा (उत्तराखंड): ‘सोर घाटी’ में मनाया जाने वाला एक कृषि उत्सव, जिसमें कृषि चक्र और लोक देवताओं का प्रतीकात्मक मुखौटा नृत्य होता है।
  • बस्तर दशहरा (छत्तीसगढ़): स्थानीय देवताओं के सम्मान में मनाया जाने वाला एक विशिष्ट जनजातीय उत्सव है।

कोकोनट रूट विल्ट’ डिजीज

दक्षिण भारत मेंकोकोनट रूट विल्ट’ डिजीज, जो अनुपचारित एक फाइटोप्लाज्मा जनित खतरा है, तेजी से नारियल के बागानों को नष्ट कर रही है।

कोकोनट रूट विल्ट’ डिजीज के बारे में

  • रोग की प्रकृति: नारियल के पेड़ों को प्रभावित करने वाला एक दीर्घकालिक, असाध्य फाइटोप्लाज्मा संबंधी रोग, जिससे उत्पादकता में धीरे-धीरे गिरावट आती है।
  • इतिहास: पहली बार 150 से अधिक वर्ष पूर्व केरल में पहचाना गया था, लेकिन अब तक इसका कोई ज्ञात उपचार नहीं है।
  • कारक जीव: फाइटोप्लाज्मा (कोशिका भित्ति रहित बैक्टीरिया)।
  • मुख्य प्रभावित क्षेत्र: मुख्यतः केरल; तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ हिस्सों को प्रभावित करता है।
  • प्रसार: कीट वाहकों (विशेषकर व्हाइटफ्लाई) और वायु के माध्यम से प्रसारित होता है।
    • जलवायु परिवर्तन (अनियमित तापमान) और नए कीट समूहों के कारण तेजी से विस्तार हो रहा है।
  • प्रमुख लक्षण
    • पत्तियों में शिथिलता (लटकना)
    • पत्तियों का पीला पड़ना और सँकरा होना
    • जड़ प्रणाली का कमजोर होना और फलोत्पादन कम होना।
  • उपज पर प्रभाव: समय के साथ नारियल उत्पादन में 30–80% तक गिरावट आ सकती है; पेड़ लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं लेकिन आर्थिक रूप से अनुपयोगी हो जाते हैं।
  • प्रबंधन रणनीति: कोई उपचार नहीं; एकीकृत रोग प्रबंधन (IDM) पर ध्यान:
    • वाहक नियंत्रण (Systemic insecticides)
    • संतुलित पोषण (विशेष रूप से N, K, Mg)
    • अंतरवर्तीय फसल, मृदा स्वास्थ्य में सुधार
    • गंभीर रूप से प्रभावित पेड़ों को हटाना

काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना

हाल ही में प्रधानमंत्री ने वन्यजीव सुरक्षा और कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए ₹6,957 करोड़ की काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना का शिलान्यास किया।

काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना

  • काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना एक प्रमुख वन्यजीव–अनुकूल अवसंरचना पहल है, जिसका उद्देश्य काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिजर्व के भीतर सुरक्षित पशु आवागमन सुनिश्चित करना तथा क्षेत्रीय कनेक्टिविटी में सुधार करना है।
  • उद्देश्य: विशेष रूप से मानसून के दौरान वन्यजीव–वाहन दुर्घटना को कम करना।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • राष्ट्रीय राजमार्ग–715 के कालीआबोर–नुमालीगढ़ खंड के चार लेन में उन्नयन का हिस्सा।
    • इसमें लगभग 34.45 किमी. के एलिवेटेड कॉरिडोर तथा जाखलाबँधा और बोकाखाट में बाइपास मार्ग का निर्माण शामिल हैं।
    • सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की सिफारिशों के अनुरूप डिजाइन किया गया।
  • महत्त्व: यह परियोजना संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करती है, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा करती है, सड़क दुर्घटनाओं को कम करती है, इको-टूरिज्म को बढ़ावा देती है और स्थानीय रोजगार सृजन करती है।

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं टाइगर रिजर्व

  • काजीरंगा अपनी असाधारण जैव विविधता के लिए वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है और भारत का एक प्रमुख संरक्षण परिदृश्य है।
  • स्थान: यह असम में स्थित है और ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ मैदानों के साथ गोलाघाट, नागाँव, सोनितपुर, बिश्वनाथ और कार्बी आंगलोंग जिलों में विस्तृत है।
  • मान्यता: इसे वर्ष 1974 में असम का पहला राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
    • वर्ष 2007 मेंप्रोजेक्ट टाइगर’ के तहत इसे टाइगर रिजर्व घोषित किया गया; यह पूर्वी हिमालयी जैव विविधता हॉटस्पॉट में स्थित है और वर्ष 1985 से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
  • नदी: यह ब्रह्मपुत्र नदी से घिरा है, जबकि डिफ्लू, मोरा डिफ्लू और मोरा धनसिरी इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।
  • वनस्पति: उद्यान में जलोढ़ घासभूमियाँ, आर्द्रभूमियाँ और उष्णकटिबंधीय वन शामिल हैं।
  • पशु: काजीरंगा में एक-सींग वाले गैंडों’ की विश्व की सबसे बड़ी आबादी पाई जाती है, साथ ही बाघ, हाथी, ‘वाटर बफेलो’ और ‘स्वैम्प डियर’ भी पाए जाते हैं।

जैव-सुरक्षा स्तर–4 (BSL-4) प्रयोगशाला

हाल ही में गुजरात के गांधीनगर में अपनी पहली राज्य-वित्तपोषित जैव-सुरक्षा स्तर–4 (BSL-4) प्रयोगशाला की आधारशिला रखी गई।

जैव-सुरक्षा स्तर–4 (BSL-4) प्रयोगशाला

  • BSL-4 प्रयोगशाला जैविक नियंत्रण अवसंरचना का सर्वोच्च स्तर दर्शाती है, जिसे विश्व के सबसे खतरनाक और संक्रामक रोगजनकों के प्रबंधन हेतु डिजाइन किया गया है।
    • BSL जैविक नियंत्रण मानक हैं (BSL-1 से BSL-4) जो BSL-1 (न्यूनतम जोखिम, मानक प्रक्रियाएँ) से लेकर BSL-4 (उच्च-जोखिम, इबोला जैसे विदेशी एजेंट, जिनके लिए अधिकतम नियंत्रण और पृथक सुविधाएँ आवश्यक होती हैं) तक प्रगति को निर्धारित करते हैं।
  • गांधीनगर, गुजरात में स्थित BSL-4 प्रयोगशाला भारत की पहली पूर्णतः राज्य-वित्तपोषित और राज्य-नियंत्रित BSL-4 नागरिक सुविधा है।
  • उद्देश्य: उन्नत अनुसंधान, त्वरित प्रकोप प्रतिक्रिया तथा उच्च-जोखिम रोगजनकों के लिए निदान, टीके और उपचार विकसित करने में सक्षम बनाकर घातक संक्रामक रोगों के प्रति भारत की तैयारी को सुदृढ़ करना।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • उच्च-नियंत्रण अवसंरचना: इसमें BSL-4, BSL-3, BSL-2, पशु जैव-सुरक्षा स्तर–4 (ABSL-4) और ABSL-3 मॉड्यूल उन्नत सुरक्षा उपयोगिताओं के साथ शामिल हैं।
    • संस्थागत ढाँचा: यह गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर के अंतर्गत संचालित होती है, जिसने COVID-19 महामारी के दौरान जीनोम अनुक्रमण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
    • वैश्विक मानक: इसे सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन, नेशनल इंस्टिट्यूट्स ऑफ हेल्थ, जैव प्रौद्योगिकी विभाग और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा जारी अंतरराष्ट्रीय जैव-सुरक्षा दिशा-निर्देशों के अनुरूप विकसित किया गया है।
    • जूनोटिक अनुसंधान क्षमता: ABSL-4 सुविधा भारत में पशु रोग अनुसंधान और टीका विकास को सक्षम बनाती है।
  • महत्त्व: यह प्रयोगशाला विदेशी सुविधाओं पर निर्भरता कम करके, अनुसंधान बाधाओं को दूर करके, वास्तविक समय में प्रकोप नियंत्रण को सुदृढ़ करके तथा भारत की जैव प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देकर एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य ढाल के रूप में कार्य करेगी।

भारत का जैव-सुरक्षा प्रयोगशाला नेटवर्क

  • भारत ने महामारी तैयारी और जैव-चिकित्सीय अनुसंधान क्षमता में सुधार के लिए अपनी जैव-सुरक्षा अवसंरचना का लगातार विस्तार किया है।
  • प्रमुख प्रयोगशालाएँ और उद्देश्य
    • नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे: घातक मानव रोगजनकों के लिए भारत की एकमात्र कार्यात्मक नागरिक BSL-4 प्रयोगशाला।
    • रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन, ग्वालियर: रणनीतिक जैव-सुरक्षा अनुसंधान के लिए रक्षा-क्षेत्र की BSL-4 सुविधा।
    • ICAR–नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीजेज, भोपाल: जूनोटिक रोगों के लिए ABSL-3+ प्रयोगशाला, जिसे ABSL-4 में उन्नत करने का प्रस्ताव है।
    • वायरस अनुसंधान और निदान प्रयोगशाला (VRDL) नेटवर्क: महामारी निगरानी और प्रतिक्रिया के लिए पूरे भारत में 154 BSL-2 और 11 BSL-3 प्रयोगशालाएँ स्थित हैं।

संदर्भ

पूरे भारत में गर्भावस्था के दौरान गंभीर एनीमिया के बढ़ने के साथ, कई राज्य एकल-खुराक अंतःशिरा (IV) आयरन थेरेपी अपना रहे हैं, क्योंकि एनीमिया का ‘समय-पूर्व प्रसव’ और कम जन्म-भार वाले शिशुओं से गहरा संबंध है।

एनीमिया के बारे में

एनीमिया एक चिकित्सीय स्थिति है, जिसमें रक्त में लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) की संख्या या हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम हो जाता है, जिससे शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति अल्प हो जाती है।

एनीमिया के प्रकार

  • आयरन-डिफिशिएंसी एनीमिया: हीमोग्लोबिन निर्माण के लिए आवश्यक आयरन की कमी के कारण।
  • विटामिन-डिफिशिएंसी एनीमिया: विटामिन B12 या फोलेट की कमी के कारण, जो RBC उत्पादन के लिए आवश्यक हैं।
  • सिकल सेल एनीमिया: एक आनुवंशिक स्थिति, जिसमें RBC असामान्य आकार की होती हैं, जिससे अवरोध और ऑक्सीजन प्रवाह में कमी आती है।
  • थैलेसीमिया: एक आनुवंशिक विकार, जो असामान्य हीमोग्लोबिन उत्पादन का कारण बनता है।

गर्भावस्था में एनीमिया का प्रभाव

  • प्रकृति: यदि गर्भावस्था के दौरान उपचार न किया जाए, तो एनीमिया समय पूर्व प्रसव, कम जन्म-भार वाले शिशुओं और मातृ जोखिम में वृद्धि का कारण बन सकता है।
  • बढ़ती व्यापकता: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के आँकड़े नीतिगत प्रयासों के बावजूद विकृत परिदृश्य को दर्शाते हैं।
    • बच्चों (6–59 माह) में एनीमिया की व्यापकता बढ़कर 67.1% हो गई,
    • महिलाओं (15–49 वर्ष) में 57%, और
    • गर्भवती महिलाओं में 52.2%,  जो NFHS-4 (2015–16) की तुलना में अधिक है।
  • गर्भावस्था एनीमिया को क्यों बढ़ाती है?
    • भ्रूण वृद्धि और मातृ रक्त आयतन के विस्तार के कारण आयरन की बढ़ी हुई आवश्यकता।
    • खराब आहार सेवन और संक्रमण आयरन की कमी को और बढ़ा देते हैं।

आयरन इन्फ्यूजन के बारे में

  • आयरन इन्फ्यूजन’ एक चिकित्सीय प्रक्रिया है, जिसमें आयरन को सीधे एकछोटी कैथेटर’ के माध्यम से अंतःशिरा रूप से दिया जाता है।
  • आयरन इन्फ्यूजन की आवश्यकता क्यों होती है?
    • आयरन हीमोग्लोबिन बनाने के लिए आवश्यक है, जो रक्त में ऑक्सीजन ले जाने वाला प्रोटीन है।
    • जब आयरन का स्तर बहुत कम होता है, तो शरीर पर्याप्त हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता, जिससे आयरन-डिफिशिएंसी एनीमिया’ की स्थिति बनती है, जो एनीमिया का सबसे सामान्य रूप है।
  • प्रकार
    • ओरल आयरन: प्रथम-पंक्ति उपचार; सस्ता और प्रभावी, यदि कम से कम तीन महीने तक लिया जाए।
    • इंट्रावीनस आयरन: तब उपयोग किया जाता है, जब ओरल आयरन का अवशोषण खराब होता है।

इंट्रावीनस इन्फ्यूजन (IV इन्फ्यूजन) एक चिकित्सीय प्रक्रिया है, जिसमें तरल पदार्थ, दवाएँ और पोषक तत्त्व सीधे व्यक्ति की शिरा के माध्यम से दिए जाते हैं।

ओरल आयरन सप्लीमेंटेशन’ की सीमाएँ

  • कम अनुपालन: प्रतिदिन ओरल आयरन और फोलिक एसिड की गोलियों के लेने से मतली, पेट में असहजता और दस्त जैसे जठराँत्रीय दुष्प्रभावों के कारण अनुपालन कम रहता है।
  • क्लिनिकल चुनौती: मध्यम से गंभीर एनीमिया वाली महिलाओं, विशेषकर गर्भावस्था के अंतिम चरण में, के लिए ओरल सप्लीमेंटेशन प्रायः अप्रभावी होता है।
  • व्यावहारिक कारक: कई महिलाएँ, विशेषकर गर्भावस्था के दौरान, अपने स्वयं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देतीं, जिससे गोलियों का अनियमित सेवन होता है।

फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज (FCM) 

  • एकल-खुराक लाभ: नया फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज (FCM) फॉर्मुलेशन केवल एक IV इन्फ्यूजन की आवश्यकता वाला है, जिससे अनुपालन और परिणामों में उल्लेखनीय सुधार होता है।
  • क्लिनिकल लाभ: प्रसूति विशेषज्ञों के अनुसार, एकल-खुराक IV FCM से हीमोग्लोबिन स्तर का तेजी से सुधार होता है, जिससे माँ और शिशु दोनों को लाभ होता है।
  • उत्तर गर्भावस्था उपयोगिता: यह गर्भावस्था के उन्नत चरणों में महिलाओं के लिए विशेष रूप से प्रभावी है, जहाँ ओरल गोलियों के प्रभाव की प्रतीक्षा करना संभव नहीं होता।

राज्य-स्तरीय अनुपालन

  • राजस्थान: दिसंबर 2024 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन-राजस्थान के तहत एक पायलट शुरू किया गया।
    • राजस्थान ने जिला-स्तरीय अध्ययन के बाद IV FCM शुरू किया, जिसमें यह गर्भवती महिलाओं में एनीमिया के मामलों में कमी आई है।
  • कर्नाटक: कर्नाटक ने मध्यम से गंभीर एनीमिया वाली गर्भवती महिलाओं के लिए 31 जिलों में IV FCM लागू करना शुरू कर दिया है।
    • कर्नाटक ने हीमोग्लोबिन स्तर और शरीर के वजन के आधार पर सही IV FCM खुराक की गणना के लिए डिजिटल गर्भा सूत्र ऐप लॉन्च किया।

एनीमिया से निपटने के लिए सरकारी पहलें

  • एनीमिया मुक्त भारत (AMB) रणनीति (2018): 6x6x6 रणनीति के माध्यम से छह आयु समूहों में एनीमिया की व्यापकता को कम करना, जिसमें छह हस्तक्षेप, छह लाभार्थी समूह और छह संस्थागत तंत्र शामिल हैं।
  • राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन (2023): वर्ष 2047 तक सिकल सेल रोग को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करना, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों में स्क्रीनिंग, निदान और प्रबंधन पर ध्यान दिया गया है।
  • राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल (NIPI): बच्चों, किशोरों और प्रजनन आयु की महिलाओं को आयु-विशिष्ट आयरन और फोलिक एसिड अनुपूरण प्रदान करती है।

संदर्भ

हाल ही में के. पी. किरण कुमार बनाम राज्य मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कड़े दिशा-निर्देश जारी किए, यह मानते हुए कि तस्करी संविधान के तहत बच्चों के जीवन के मौलिक अधिकार का घोर उल्लंघन है।

समस्या की गंभीरता

  • रेस्क्यू’ संबंधी डेटा: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2022 में 18 वर्ष से कम आयु के लगभग 3,098 बच्चों को बचाया गया।
  • हालिया रुझान: अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच, पूरे भारत में बाल श्रम, तस्करी और अपहरण से 53,000 से अधिक बच्चों को बचाया गया।
  • कम दोषसिद्धि दर: गृह मंत्रालय (MHA) के अनुसार, वर्ष 2018 से 2022 के बीच भारत में मानव तस्करी के लगभग 10,659 मामले दर्ज किए गए।
    • इसके बावजूद, दोषसिद्धि दर केवल 4.8% रही, जो कमजोर निवारण को दर्शाती है।

बाल तस्करी की परिभाषा

  • अंतरराष्ट्रीय परिभाषा (पालेर्मो प्रोटोकॉल, 2000): बाल तस्करी को शोषण के उद्देश्य से किसी बच्चे की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण, आश्रय या प्राप्ति के रूप में परिभाषित करता है।
  • भारतीय कानून (भारतीय न्याय संहिता, BNS की धारा 143), 2023: यह बल, दबाव, धोखाधड़ी, छल, शक्ति के दुरुपयोग या प्रलोभन के माध्यम से शोषण के लिए की गई तस्करी को अपराध घोषित करता है।
  • शोषण का दायरा: शोषण में शारीरिक और यौन शोषण, दासता, बंधुआगिरी, बलात् श्रम और अंगों की जबरन तस्करी शामिल है।

बाल तस्करी के आयाम

  • यौन शोषण: वेश्यालय, ऑनलाइन/डिजिटल तस्करी नेटवर्क।
  • घरेलू दासता: शहरी घर; अलगाव, दुर्व्यवहार, शिक्षा से वंचित करना।
  • भिक्षावृत्ति रैकेट: कमाई बढ़ाने के लिए बच्चों को नशीला पदार्थ देना, घायल करना या अपंग बनाना।
  • बलात् श्रम: कारखाने, कृषि, निर्माण, खनन → असुरक्षित परिस्थितियाँ।
  • आपराधिक गतिविधियाँ: चोरी, मादक पदार्थों की तस्करी।
  • बाल विवाह एवं अवैध दत्तक ग्रहण: बच्चों की बिक्री, धोखाधड़ीपूर्ण दत्तक ग्रहण।

बच्चों के संरक्षण हेतु संवैधानिक प्रावधान

  • मौलिक अधिकार
    • अनुच्छेद-23: तस्करी और बलात् श्रम का निषेध करता है।
    • अनुच्छेद-24: खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम का निषेध करता है।
  • नीति निदेशक तत्त्व
    • अनुच्छेद-39(e): बच्चों को शोषण से संरक्षण।
    • अनुच्छेद-39(f): गरिमा और स्वतंत्रता में बाल विकास सुनिश्चित करना।

तस्करी के विरुद्ध कानूनी ढाँचा

  • भारतीय न्याय संहिता: धाराएँ 98 और 99 नाबालिगों की बिक्री और खरीद से संबंधित हैं।
  • अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956: यौन शोषण के लिए तस्करी पर केंद्रित है।
  • किशोर न्याय अधिनियम, 2015: तस्करी किए गए बच्चों की देखभाल, संरक्षण और पुनर्वास का प्रावधान करता है।
  • आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013: सहमति की परवाह किए बिना यौन शोषण, दासता, बंधुआगिरी, बलात् श्रम को शामिल करते हुए तस्करी की परिभाषा का विस्तार किया।
  • यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012
    • यौन उत्पीड़न, उत्पीड़न और बाल अश्लील सामग्री से संबंधित अपराधों को परिभाषित करता है।
    • कठोर दंड: गंभीर मामलों में आजीवन कारावास और मृत्युदंड सहित दंड का प्रावधान।
    • लैंगिक-तटस्थ कानून: लैंगिक परवाह किए बिना सभी बच्चों पर समान रूप से लागू।
    • त्वरित न्याय: POCSO मामलों के लिए लगभग 400 फास्ट ट्रैक न्यायालयों, विशेष रूप से कार्यरत हैं, जिनमें से प्रत्येक का लक्ष्य प्रति वर्ष लगभग 165 मामलों का निपटारा करना है।

बाल तस्करी पर न्यायिक दृष्टिकोण

  • विशाल जीत बनाम भारत संघ (1990): तस्करी और बाल वेश्यावृत्ति को गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ माना, जिनके लिए निवारक और मानवीय दृष्टिकोण आवश्यक है।
  • एम. सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1996): खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए।
  • बचपन बचाओ आंदोलन’ बनाम भारत संघ (2011): बच्चों की व्यापक तस्करी और शोषण से निपटने के लिए निर्देश जारी किए।
  • के. पी. किरण कुमार बनाम राज्य: तस्करी को जीवन के अधिकार का उल्लंघन पुनः पुष्टि की और कठोर निवारक दिशा-निर्देश निर्धारित किए।

संदर्भ

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया।

आर्मिस्टिस लाइन (Armistice Line)

  • आर्मिस्टिस लाइन उन सीमांकन रेखाओं को संदर्भित करती है, जो वर्ष 1949 के आर्मिस्टिस समझौतों के तहत इजरायल और उसके पड़ोसी अरब राज्यों के बीच प्रथम अरब–इजरायल युद्ध के बाद स्थापित की गई थीं।
  • इसे सामान्यतः ग्रीन लाइन कहा जाता है, जिसने इजरायल और जॉर्डन, मिस्र, सीरिया तथा लेबनान के बीच युद्धविराम सीमाओं को चिह्नित किया।
  • इस रेखा को स्पष्ट रूप से एक सैन्य युद्धविराम रेखा के रूप में वर्णित किया गया था, न कि एक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में, और इसने इजरायल को वेस्ट बैंक (तत्कालीन जॉर्डन के नियंत्रण में) और गाजा पट्टी (मिस्र द्वारा प्रशासित) से अलग किया।
  • आर्मिस्टिस लाइन शांति वार्ताओं और टू स्टेट समाधान पर चर्चाओं में एक प्रमुख संदर्भ बनी हुई है।

बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा के बारे में

  • यह अमेरिका-नेतृत्व, केवल आमंत्रण-आधारित तंत्र है, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप की गाजा शांति योजना के तहत गाजा में संघर्षोत्तर शासन, स्थिरीकरण और पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए प्रस्तावित किया गया है।
    • यह पारंपरिक संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित ढाँचों से बाहर तदर्थ संघर्ष-प्रबंधन व्यवस्थाओं की ओर एक परिवर्तन को दर्शाता है।
  • उद्गम: इसे पहली बार अक्टूबर 2025 में प्रस्तावित किया गया था।
  • संयुक्त राष्ट्र का समर्थन: UNSC प्रस्ताव 2803, जिसने वर्ष 2027 तक गाजा के संक्रमण की निगरानी को अधिकृत किया।
  • उद्देश्य
    • गाजा के संक्रमणकालीन शासन की निगरानी एक तकनीकी, गैर-राजनीतिक फिलिस्तीनी प्रशासन के माध्यम से करना।
    • स्थिरीकरण और पुनर्निर्माण सुनिश्चित करना, जिसमें अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण का प्रबंधन शामिल है।
    • फिलिस्तीनी प्राधिकरण द्वारा संस्थागत सुधार पूर्ण होने तक व्यवस्थाओं की निगरानी करना।
    • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता के बीच संघर्ष समाधान के लिए एक संभावित वैश्विक मॉडल के रूप में कार्य करना।
  • बोर्ड के सदस्य
    • अध्यक्ष: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप।
    • संरचना: चयनित आमंत्रित देश और वैश्विक नेता, जिनमें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर जैसी हस्तियाँ शामिल हैं।
    • स्वरूप: गैर-सार्वभौमिक, आमंत्रण-आधारित सदस्यता वाली संस्था।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • बहुपक्षवाद को कमजोर करना: संयुक्त राष्ट्र चार्टर और सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया को दरकिनार करने का जोखिम।
  • शक्ति का केंद्रीकरण: अमेरिका-नेतृत्वित कार्यकारी संरचना में अधिकार के केंद्रीकरण के रूप में देखा जाना।
  • उदाहरण स्थापित होने का जोखिम: संयुक्त राष्ट्र प्रणाली से वैधता, वित्तपोषण और ध्यान हटने की संभावना।

भारत का दृष्टिकोण

  • सिद्धांतगत स्थिति: भारत लगातार इजरायल और फिलिस्तीन के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के साथटू-स्टेट’ समाधान का समर्थन करता रहा है।
  • चयनात्मक सहभागिता: भारत ने ट्रंप की योजना के मानवीय पहलूओं का स्वागत किया है, लेकिन यूएन के बिना किसी अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल में सैनिक भागीदारी से इनकार किया है।
  • रणनीतिक सावधानी: भारत ने औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, अमेरिका के साथ संबंधों को संतुलित करते हुए यूएन-केंद्रित बहुपक्षवाद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की रक्षा कर रहा है।

PWOnlyIAS विशेष

गाजा’ के बारे में

  • गाजा, जिसे सामान्यतः गाजा पट्टी कहा जाता है, एक संकीर्ण, सघन आबादी वाला तटीय क्षेत्र है, जो इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष के केंद्र में बना हुआ है।
  • स्थान: गाजा भूमध्य सागर के पूर्वी तट पर स्थित है, जिसके पूर्व और उत्तर में इजरायल, दक्षिण-पश्चिम में मिस्र और पश्चिम में भूमध्य सागर है।

  • भूगोल: यह क्षेत्र लगभग 365 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है और मुख्यतः समतल, रेतीले मैदानों से बना है, जहाँ प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और जनसंख्या घनत्व अत्यधिक है।
  • राजनीतिक सीमांकन: राजनीतिक रूप से, गाजा वेस्ट बैंक से अलग है और वर्ष 2007 से, फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ विभाजन के बाद, यह हमास के वास्तविक नियंत्रण में है।

निष्कर्ष

बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ में भारत को आमंत्रण उसे एक कूटनीतिक बिंदु पर खड़ा करता है। जहाँ सहभागिता प्रभाव और लचीलापन प्रदान कर सकती है, वहीं बिना आलोचनात्मक दृष्टि के भागीदारी यूएन-आधारित व्यवस्था को कमजोर कर सकती है; इसलिए बहुपक्षीय सिद्धांतों की रक्षा करते हुए कूटनीतिक रूप से संलग्न होने से संबंधित एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के तहत जाँच समिति गठित करने के निर्णय को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

  • प्रारंभ: मार्च 2025 में, कथित रूप से दिल्ली में न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास से आधे जले हुए नोटों से भरे बोरे पाए गए। उस समय वे दिल्ली उच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायाधीश थे।
  • घटनाक्रम: बाद में न्यायमूर्ति वर्मा का स्थानांतरण इलाहाबाद उच्च न्यायालय कर दिया गया।
  • ‘इन-हाउस’ जाँच: तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा शुरू की गई ‘इन-हाउस’ जाँच में उनके हटाने की सिफारिश की गई और यह सिफारिश संसद को भेजी गई।
  • संसदीय कार्रवाई: न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में प्रस्ताव पेश किए गए।
  • जाँच समिति: अगस्त 2025 में, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के प्रस्ताव को स्वीकार किया और तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन किया।

न्यायाधीशों को हटाने से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-124(4) एवं 217(1)(b): सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाना।
  • संसद की भूमिका: राष्ट्रपति हटाने का आदेश तभी जारी कर सकते हैं, जब संसद के दोनों सदन एक ही संसदीय सत्र में हटाने का अभिभाषण पारित करना चाहिए।
    • यह अभिभाषण विशेष बहुमत से समर्थित होना चाहिए।
  • संसद की विनियामक शक्ति: अनुच्छेद-124(5) संसद को यह अधिकार देता है कि वह न्यायाधीशों के विरुद्ध हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत करने की प्रक्रिया तथा आरोपों की जाँच तथा प्रमाण से संबंधित कानून बनाए।

न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के अंतर्गत प्रक्रिया

  • हटाने का प्रस्ताव: किसी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव निम्नलिखित द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए:
    • लोकसभा के कम-से -कम 100 सदस्य, या
    • राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य।
  • प्रस्ताव की स्वीकृति: लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति, जैसा भी मामला हो, उचित परामर्श के बाद प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
  • जाँच समिति: प्रस्ताव की स्वीकृति के पश्चात् तीन सदस्यीय जाँच समिति गठित की जाती है, जिसमें शामिल होते हैं:
    • सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश,
    • किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, और
    • एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता, जैसा कि अध्यक्ष या सभापति द्वारा उपयुक्त समझा जाए।
  • पदच्युत करना
    • यदि जाँच समिति न्यायाधीश को कदाचार या अक्षमता का दोषी पाती है, तो संसद के दोनों सदनों को एक ही सत्र में आवश्यक विशेष बहुमत के साथ हटाने का प्रस्ताव पारित करना होता है।
    • इसके बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं।

अब तक, उच्चतर न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय) के किसी भी न्यायाधीश को सफलतापूर्वक महाभियोग द्वारा हटाया नहीं गया है।

संदर्भ

राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जैव विविधता (BBNJ) विधेयक 60 देशों द्वारा अनुमोदित किए जाने के बाद 17 जनवरी, 2026 को लागू हुआ (मोरक्को सितंबर 2025 में 60वाँ देश बना)।

राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे जैव विविधता (BBNJ) समझौते के बारे में

  • आधिकारिक नाम: इसे आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे क्षेत्रों में समुद्री जैव विविधता के संरक्षण और सतत् उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) के अंतर्गत समझौता कहा जाता है।
    • इस समझौते को आमतौर पर बीबीएनजे समझौता या हाई सी ट्रीटी के रूप में जाना जाता है।

  • कानूनी स्थिति: यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में समुद्री जैव विविधता की रक्षा के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक ढाँचा है।
  • दायरा: यह संधि राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे क्षेत्रों, सभी देशों के अनन्य आर्थिक क्षेत्रों (EEZs) से परे जलक्षेत्र और समुद्र तल पर लागू होती है।
  • स्वीकृति और लागू होना: जून 2023 में संयुक्त राष्ट्र अंतर-सरकारी सम्मेलन में सर्वसम्मति से अपनाया गया।
    • सितंबर 2025 में आवश्यक 60 अनुसमर्थन प्राप्त हुए (मोरक्को 60वाँ देश बना), जिसके 120 दिन बाद 17 जनवरी, 2026 को यह लागू हो गया।
  • वैश्विक संरक्षण लक्ष्य
    • यह संधि वैश्विक “30X30” जैव विविधता लक्ष्य का एक प्रमुख प्रवर्तक है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक महासागरों के 30% हिस्से को संरक्षित करना है, विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (MPA) के माध्यम से।
  • यह संधि सतत् विकास लक्ष्य 14 को प्राप्त करने में सहायक होगी: जल के नीचे जीवन > “सतत् विकास के लिए महासागरों, समुद्रों और समुद्री संसाधनों का संरक्षण और सतत् उपयोग”।

खुले समुद्र (हाई सी) क्या होते हैं?

  • खुले समुद्र (अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र) से तात्पर्य उन समुद्री क्षेत्रों से है, जो किसी भी देश के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। ये विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) से परे स्थित हैं। खुले समुद्र विश्व के लगभग दो-तिहाई महासागरों को कवर करते हैं।
  • इन जलक्षेत्रों को मानव जाति की साझा विरासत माना जाता है, और सभी देशों को इन क्षेत्रों में नौकायन, मत्स्यन, वैज्ञानिक अनुसंधान करने और अन्य वैध गतिविधियों में संलग्न होने की स्वतंत्रता है।

BBNJ समझौते के प्रमुख उद्देश्य

  1. संरक्षण एवं सतत् उपयोग: राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे क्षेत्रों में समुद्री जैविक विविधता का संरक्षण एवं सतत् उपयोग करना।
  2. समुद्री शासन में कानूनी कमियों को दूर करना: यह संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) द्वारा छोड़ी गई महत्त्वपूर्ण नियामक कमियों को दूर करता है, विशेष रूप से प्रादेशिक जलक्षेत्र से परे जैव विविधता संरक्षण के लिए।

संधि के चार मुख्य स्तंभ

  1. समुद्री आनुवंशिक संसाधन (MGRs): खुले समुद्र और गहरे समुद्र तल से प्राप्त आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच और उनसे मिलने वाले लाभों के उचित और समान बँटवारे के लिए ढाँचा।
  2. क्षेत्र-आधारित प्रबंधन उपकरण (ABMTs): पारिस्थितिकी रूप से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPA) और अन्य स्थानिक उपकरण बनाने की प्रक्रिया।
  3. पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA): राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से परे जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों का पर्यावरणीय आकलन आवश्यक है।
  4. क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: विकासशील देशों को पूर्ण भागीदारी के लिए सहायता, जिसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और वैज्ञानिक सहयोग शामिल है।

अनुसमर्थन करने वाले राज्यों के दायित्व

  • समुद्री विज्ञान, डेटा साझाकरण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर सहयोग करना।
  • ईआईए और रणनीतिक पर्यावरणीय आकलन करना।
  • समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (MPA) के पदनाम और प्रबंधन की दिशा में कार्य करना।
  • समुद्री आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त लाभों के समान वितरण में भाग लेना।

संस्थागत ढाँचा

  • पक्षकारों का सम्मेलन (COP): निर्णय लेने वाली संस्था
  • कार्यान्वयन हेतु स्थायी सचिवालय एवं सहायक संस्थाएँ
  • क्लियरिंग-हाउस तंत्र: डेटा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी साझा करने हेतु।

चुनौतियाँ और सीमाएँ

  • यह संधि समुद्र तल खनन को विनियमित नहीं करती है, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण के अंतर्गत आता है।
  • कुछ प्रमुख समुद्री शक्तियों (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य) ने संधि पर हस्ताक्षर तो कर दिए हैं, लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है, जिससे वैश्विक समन्वय और प्रवर्तन की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) के बारे में

  • संयुक्त राष्ट्र समुद्री सीमा समझौते (UNCLOS) को वर्ष 1982 में अपनाया गया और वर्ष 1994 में लागू हुआ; इसे अक्सर “महासागरों का संविधान” कहा जाता है।
  • यह महासागरों और समुद्री संसाधनों के उपयोग, संरक्षण और प्रबंधन को नियंत्रित करने वाला एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
  • सदस्य: UNCLOS के 171 सदस्य देश, जिनमें संप्रभु राज्य और यूरोपीय संघ शामिल हैं।
  • भारत और UNCLOS: भारत UNCLOS का पूर्ण सदस्य देश है।
    • इसने वर्ष 1995 में सम्मेलन की पुष्टि की, और महासागर शासन, संसाधन अधिकार, नौवहन और पर्यावरण संरक्षण के लिए इसके ढाँचे के प्रति प्रतिबद्धता जताई।
  • UNCLOS समुद्री क्षेत्रों को परिभाषित करता है:
    • प्रादेशिक सागर (12 समुद्री मील तक)
    • संलग्न क्षेत्र (24 समुद्री मील तक)
    • विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) (200 समुद्री मील तक)
    • महाद्वीपीय शेल्फ।
  • तटीय राज्यों को अपने समतापीय क्षेत्र (EEZ) के भीतर संसाधनों (जीवित और निर्जीव) पर संप्रभु अधिकार प्राप्त हैं, जबकि अन्य राज्यों को नौवहन और हवाई उड़ान की स्वतंत्रता प्राप्त है।
  • यह अंतरराष्ट्रीय कानून के अधीन, नौवहन, मत्स्यपालन, वैज्ञानिक अनुसंधान और पनडुब्बी केबल बिछाने सहित खुले समुद्रों की स्वतंत्रता के सिद्धांत को स्थापित करता है।
  • UNCLOS के अंतर्गत संस्थाएँ: इसके प्रावधानों को लागू करने के लिए, UNCLOS ने तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना की:
    • अंतरराष्ट्रीय समुद्री विधि न्यायाधिकरण (ITLOS): यह सम्मेलन की व्याख्या और अनुप्रयोग से संबंधित विवादों का निपटारा करता है।
    • अंतरराष्ट्रीय समुद्री तल प्राधिकरण (ISA): यह राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे अंतरराष्ट्रीय समुद्री तल क्षेत्र में खनिज संबंधी गतिविधियों को विनियमित करता है।
    • महाद्वीपीय शेल्फ सीमा आयोग (CLCS): यह तटीय राज्यों द्वारा अपने महाद्वीपीय शेल्फ की बाहरी सीमाओं के संबंध में किए गए दावों की जाँच करता है और उन पर सिफारिशें प्रदान करता है।

संदर्भ

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक संशोधित एकीकृत लोकपाल योजना जारी की है, जो 1 जुलाई, 2026 से लागू होगी।

लोकपाल क्या होता है?

लोकपाल एक स्वतंत्र अधिकारी होता है, जो निष्पक्ष, कानूनी और उचित व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए संगठनों (सरकारी एजेंसियों, कंपनियों आदि) के विरुद्ध जनता की शिकायतों की जाँच और समाधान करता है तथा मध्यस्थता एवं निवारण के लिए एक तटस्थ तीसरे पक्ष के रूप में कार्य करता है।

एकीकृत लोकपाल योजना की आवश्यकता क्यों है?

  • वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार: भारत की वित्तीय प्रणाली का तेजी से विस्तार हुआ है, जिसमें बैंक, गैर-राष्ट्रीय वित्तीय कंपनियाँ (NBFC), फिनटेक कंपनियाँ, डिजिटल भुगतान प्रणाली और अन्य विनियमित संस्थाएँ शामिल हैं।
  • विखंडित शिकायत निवारण प्रणाली: कई लोकपाल ढाँचों के कारण क्षेत्राधिकार में अस्पष्टता, शिकायत निवारण के अस्पष्ट तरीके और ग्राहकों के लिए समाधान की समय सीमा में असंगतता उत्पन्न हुई है।
  • एकीकरण की आवश्यकता: RB-IOS, 2026 एक एकीकृत और सुव्यवस्थित शिकायत निवारण संरचना बनाकर इन कमियों को दूर करने का प्रयास करता है।

रिजर्व बैंक – एकीकृत लोकपाल योजना, 2021

  • भारतीय रिजर्व बैंक – एकीकृत लोकपाल योजना (RB-IOS), 2021 नवंबर 2021 में शुरू की गई थी।
  • यह योजना RBI की तीन पूर्व लोकपाल व्यवस्थाओं को समेकित और प्रतिस्थापित करती है:
    • बैंकिंग लोकपाल योजना, 2006
    • गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए लोकपाल योजना, 2018
    • डिजिटल लेन-देन के लिए लोकपाल योजना, 2019
  • कानूनी आधार: यह योजना RBI द्वारा निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग करते हुए तैयार की गई थी:
    • बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A
    • RBI अधिनियम, 1934 की धारा 45L
    • भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 18
  • उद्देश्य: RBI द्वारा विनियमित संस्थाओं के ग्राहकों को सेवा में कमी से संबंधित शिकायतों के 30 दिनों के भीतर हल न होने पर निःशुल्क, कुशल और एकसमान शिकायत निवारण तंत्र प्रदान करना।
  • कवरेज के दायरे का विस्तार: पूर्ववर्ती योजनाओं को एकीकृत करने के अतिरिक्त, RB-IOS, वर्ष 2021 ने ₹50 करोड़ या उससे अधिक जमा वाले गैर-अनुसूचित प्राथमिक सहकारी बैंकों को भी शामिल करने के लिए कवरेज के दायरे को बढ़ाया है।
  • एक राष्ट्र, एक लोकपाल दृष्टिकोण: यह योजना क्षेत्राधिकार-निरपेक्ष है, जो क्षेत्रीय सीमाओं को हटाकर पूरे देश में शिकायत निवारण की एकसमान पहुँच सुनिश्चित करती है।

मुख्य विशेषताएँ

  • शिकायत के आधार
    • कुछ निर्धारित अपवादों को छोड़कर, शिकायत दर्ज करने का एकमात्र आधार “सेवा में कमी” है।
    • शिकायतकर्ताओं को अब यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि उनकी शिकायत किस लोकपाल योजना के अंतर्गत आती है।
    • व्यक्तिगत लोकपाल कार्यालयों के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र को समाप्त कर दिया गया है।
  • केंद्रीयकृत शिकायत प्रसंस्करण
    • RBI, चंडीगढ़ में एक केंद्रीकृत प्राप्ति एवं प्रसंस्करण केंद्र (CRPC) स्थापित किया गया है, जो किसी भी भाषा में व्यक्तिगत रूप से या ईमेल के माध्यम से प्रस्तुत शिकायतों को प्राप्त करने और उन पर कार्रवाई करने के लिए है।
  • प्रधान नोडल अधिकारी की भूमिका: प्रत्येक विनियमित संस्था को शिकायत की कार्यवाही के दौरान अपना प्रतिनिधित्व करने और जानकारी प्रदान करने के लिए एक प्रधान नोडल अधिकारी (कम-से-कम महाप्रबंधक रैंक या समकक्ष) नियुक्त करना होगा।
  • अपील संबंधी प्रावधान
    • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के उपभोक्ता शिक्षा एवं संरक्षण विभाग के कार्यकारी निदेशक इस योजना के अंतर्गत अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य करते हैं।
    • नियमित संस्थाएँ समय पर या संतोषजनक जानकारी प्रदान करने में विफल रहने के कारण पारित किसी निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं कर सकती हैं।
  • शिकायत दर्ज करने का तरीका: शिकायतें RBI शिकायत प्रबंधन प्रणाली (CMS) पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन, निर्दिष्ट ईमेल पते पर या CRPC को व्यक्तिगत रूप से जमा की जा सकती हैं।

संशोधित एकीकृत लोकपाल योजना (RB-IOS, 2026) की प्रमुख विशेषताएं

  • लोकपाल की नियुक्ति
    • RBI इस योजना के अंतर्गत कार्यों के निर्वहन के लिए अपने अधिकारियों में से एक या अधिक RBI लोकपाल और RBI उप-लोकपाल की नियुक्ति करेगा।
    • ये नियुक्तियाँ आम तौर पर तीन वर्ष की निश्चित अवधि के लिए की जाती हैं।
  • योजना के अंतर्गत शामिल संस्थाएँ
    • वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, राज्य एवं केंद्रीय सहकारी बैंक और शहरी सहकारी बैंक जिनके पास ₹50 करोड़ या उससे अधिक की जमा राशि है।
    • गैर-वित्तीय वित्तीय संस्थान (NBFC) जो जमा स्वीकार करते हैं या जिनके पास ₹100 करोड़ से अधिक की संपत्ति है और जो ग्राहकों के साथ लेन-देन करते हैं।
    • प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट (PPI) जारीकर्ता, जैसे कि डिजिटल वॉलेट।
    • क्रेडिट सूचना कंपनियां, जो क्रेडिट स्कोर और रिपोर्ट संभालती हैं।
  • बहिष्कृत संस्थाएँ: यह योजना आवास वित्त कंपनियों और मुख्य निवेश कंपनियों पर लागू नहीं होती है।
  • केंद्रीकृत प्राप्ति एवं प्रसंस्करण तंत्र
    • केंद्रीकृत प्राप्ति एवं प्रसंस्करण केंद्र (CRPC): RBI इस योजना के अंतर्गत दर्ज सभी शिकायतों को प्राप्त करने और उन पर कार्रवाई करने के लिए एक या अधिक केंद्रीकृत प्राप्ति एवं प्रसंस्करण केंद्र स्थापित करेगा।
    • शिकायतें करने के अनेक तरीके: ईमेल, डाक या व्यक्तिगत रूप से प्रदान की गई शिकायतों सहित सभी प्रकार की शिकायतें प्रसंस्करण हेतु सीआरपीसी को भेजी जाएँगी।
    • ऑनलाइन पोर्टल: शिकायतें आरबीआई के शिकायत प्रबंधन प्रणाली (CMS) पोर्टल https://cms.rbi.org.in के माध्यम से ऑनलाइन दर्ज की जा सकती हैं।
  • कौन शिकायत दर्ज करा सकता है?
    • पात्र शिकायतकर्ता: किसी विनियमित संस्था के किसी कार्य या चूक के परिणामस्वरूप सेवा में कमी से पीड़ित कोई भी ग्राहक शिकायत दर्ज कर सकता है।
    • शिकायत दर्ज करने का तरीका: शिकायतें व्यक्तिगत रूप से या किसी अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से दर्ज की जा सकती हैं।
  • पूर्व शर्त
    • ग्राहक को सर्वप्रथम संबंधित विनियमित संस्था से संपर्क करना होगा।
    • यदि 30 दिनों के भीतर कोई उत्तर प्राप्त न हो या ग्राहक उत्तर से संतुष्ट न हो, तो ही लोकपाल से संपर्क किया जा सकता है।
  • क्षतिपूर्ति
    • परिणामी हानि: RBI लोकपाल शिकायतकर्ता को हुई किसी भी परिणामी हानि के लिए ₹30 लाख तक का मुआवजा दे सकता है।
    • गैर-आर्थिक हानि: शिकायतकर्ता द्वारा समय की हानि, किए गए खर्च, उत्पीड़न या मानसिक पीड़ा के लिए ₹3 लाख तक का अतिरिक्त मुआवजा दिया जा सकता है।
    • समझौता एवं पुरस्कार: लोकपाल आवश्यकतानुसार समझौते की सुविधा प्रदान कर सकता है या पुरस्कार पारित कर सकता है।
  • अपील की प्रक्रिया: शिकायतकर्ता और विनियमित संस्था दोनों लोकपाल के निर्णय के 30 दिनों के भीतर अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील कर सकते हैं।
  • नोडल अधिकारी की आवश्यकता: प्रत्येक विनियमित संस्था को अपने प्रधान कार्यालय में एक प्रधान नोडल अधिकारी नियुक्त करना अनिवार्य होगा, जो आरबीआई के साथ समन्वय स्थापित करे और शिकायतों से संबंधित जानकारी प्रदान करे।
  • पारदर्शिता एवं जवाबदेही
    • वार्षिक रिपोर्ट: जनहित में, RBI एकीकृत लोकपाल योजना के अंतर्गत किए गए कार्यों और गतिविधियों पर एक वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करेगा।

क्षतिपूर्ति सीमाएँ

क्षतिपूर्ति का प्रकार वर्ष 2021 वर्ष 2026
परिणामी हानि 20 लाख रुपये तक ₹30 लाख तक
मानसिक पीड़ा/उत्पीड़न ₹1 लाख तक ₹3 लाख तक
विवाद राशि पर सीमा कोई सीमा नहीं कोई सीमा नहीं।

संदर्भ

शोधकर्ताओं ने लक्षद्वीप के कवरती लैगून से एक सूक्ष्म क्रस्टेशियन की खोज की है, जिसे अब औपचारिक रूप से एक नए वंश और एक नई प्रजाति के रूप में स्थापित किया गया है।

क्रस्टेशियन के बारे में

  • क्रस्टेशियन आर्थ्रोपोड्स (कठोर बाहरी आवरण और पैर संधियों द्वारा जुड़े हुए) का एक बड़ा समूह है, जो अधिकतर जल में, विशेषकर समुद्र में रहते हैं, लेकिन कई मीठे पानी में भी पाए जाते हैं, और कुछ भूमि पर भी रहते हैं।
  • उदाहरण: केकड़े, झींगे, लॉबस्टर, क्रेफिश, और छोटे जीव जैसे कोपेपोड्स और क्रिल।

क्रस्टेशियन के बारे में

  • नई प्रजाति और वंश: इस क्रस्टेशियन का नाम इंडियाफोंटे बिजॉयी (Indiaphonte Bijoyi) रखा गया है, जो एक नए वंश और नई प्रजाति दोनों का प्रतिनिधित्व करता है।
    • व्युत्पत्ति
      • नामकरण: वंश का नाम इंडियाफोंटे (Indiaphonte) भारत के सम्मान में रखा गया है, जबकि प्रजाति का नाम बिजोयी (bijoyi) कोचीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (CUSAT) के समुद्री विज्ञान संकाय के डीन डॉ. एस. बिजय नंदन के सम्मान में रखा गया है।
  • वैज्ञानिक वर्गीकरण: यह लाओफोंटिडी (Laophontidae) कुल, कोपेपोडा (Copepoda) वर्ग और हार्पेक्टिकोइडा (Harpacticoida) गण से संबंधित है।
    • कोपेपोड छोटे क्रस्टेशियन (आमतौर पर 1-2 मिमी. लंबे) होते हैं, जो समुद्री और मीठे जल के पारितंत्र में पाए जाते हैं।
  • सूक्ष्म प्रकृति: यह जीव अत्यंत छोटा होता है और इसका अध्ययन केवल सूक्ष्मदर्शी से ही किया जा सकता है।
  • आकृतिक विशेषताएँ
    • शारीरिक संरचना: इस प्रजाति का के जीवों की शारीरिक संरचना अर्द्ध-बेलनाकार और चपटा होती है, मध्य में चौड़ी और पश्च भाग पतला होता जाता है।
    • उपांग: इसके अग्रभाग में एंटीना जैसे उपांग होते हैं।
    • आकार सीमा
      • मादाओं की लंबाई 518 से 772 माइक्रोमीटर तक होती है।
      • नरों की लंबाई 508 से 756 माइक्रोमीटर तक होती है।
    • लैंगिक द्विरूपता: मादाएँ, नर से थोड़ी बड़ी होती हैं।

  • पारिस्थितिकी वर्गीकरण
    • मीयोफौना: इंडियाफोंटे बिजॉयी (Indiaphonte Bijoyi), मीयोफौना का हिस्सा है, जो 1 मिलीमीटर से भी छोटे आकार के जलीय तलछट में रहने वाले सूक्ष्म अकशेरुकी जीवों का एक समूह है।
    • कुल विविधता: लाओफोंटिडी कुल में 77 वंशों में लगभग 350 प्रजातियाँ शामिल हैं, जो इसे हार्पेक्टिकोइडा के सबसे विविध कुलों में से एक बनाती है।

पारिस्थितिकी और आर्थिक महत्त्व

  • पारिस्थितिकी तंत्र का स्वास्थ्य: अपने छोटे आकार के बावजूद, हार्पेक्टिकॉइड कोपेपोड्स समुद्री और मीठे जल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • पोषण चक्र में भूमिका: हार्पेक्टिकॉइड कोपेपोड्स ओमेगा-3 फैटी एसिड, जिनमें इकोसैपेंटेनोइक एसिड (EPA) और डोकोसाहेक्सानोइक एसिड (DHA) शामिल हैं, का उत्पादन और रूपांतरण कर सकते हैं, जो मछली और शेलफिश (शंख) के विकास के लिए आवश्यक हैं।
  • खाद्य शृंखला में भूमिका: मछलियों के लार्वा के लिए जीवित आहार के रूप में जलीय कृषि और मत्स्यपालन में इनका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, जिससे खाद्य सुरक्षा में योगदान मिलता है।
  • जैविक संकेतक: प्रदूषण, तेल रिसाव, भारी धातुओं और जलवायु परिवर्तन के प्रति उनकी उच्च संवेदनशीलता के कारण, वे पर्यावरणीय परिवर्तन के विश्वसनीय संकेतक के रूप में कार्य करते हैं।

नए वंश का वैज्ञानिक महत्त्व

  • विशिष्ट आकारिकी: इंडियाफोंटे वंश को नवीन वंश माना जाता है क्योंकि इसमें आकारिकी लक्षणों का एक अनूठा संयोजन पाया जाता है, जो लाओफोंटिडी कुल में सर्वप्रथम दर्ज किसी भी वंश से मेल नहीं खाता है।

संदर्भ

भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्वच्छ ऊर्जा की ओर परिवर्तन अत्यंत आवश्यक है, जो बड़े पैमाने पर महत्त्वपूर्ण खनिजों (CM) और दुर्लभ मृदा तत्त्वों (REE) की उपलब्धता तथा उपयोग पर निर्भर करता है।

महत्त्वपूर्ण खनिजों के बारे में

  • परिभाषा: ये वे खनिज हैं, जो आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं, लेकिन इनकी सीमित उपलब्धता और भौगोलिक संकेंद्रण के कारण आपूर्ति शृंखला में अस्थिरता तथा व्यवधान की स्थिति उत्पन्न होती है, जो इनके रणनीतिक महत्त्व को रेखांकित करता है।
  • प्रमुख महत्त्वपूर्ण खनिज: खनन मंत्रालय द्वारा गठित महत्त्वपूर्ण खनिजों की पहचान समिति की रिपोर्ट में 30 महत्त्वपूर्ण खनिजों की पहचान की गई है:-
    • एंटीमनी, बेरिलियम, बिस्मथ, कोबाल्ट, कॉपर, गैलियम, जर्मेनियम, ग्रेफाइट, हैफनियम, इंडियम, लीथियम, मॉलिब्डेनम, निओबियम, निकेल, PGE, फास्फोरस, पोटाश, REE, रेनियम, सिलिकॉन, स्ट्रोंटियम, टैंटलम, टेल्यूरियम, टिन, टाइटेनियम, टंगस्टन, वैनेडियम, जिरकोनियम, सेलेनियम और कैडमियम।
  • प्रमुख उत्पादक: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रमुख उत्पादक निम्नलिखित हैं:
    • चीन (दुर्लभ खनिज, ग्रेफाइट और शोधन)
    • कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (कोबाल्ट)
    • चिली (ताँबा और लीथियम)
    • इंडोनेशिया (निकल)
    • दक्षिण अफ्रीका (प्लैटिनम और मैंगनीज)
    • ऑस्ट्रेलिया (लीथियम)
  • उपयोग
    • उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स: सेमीकंडक्टर और उच्च स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण के लिए ये खनिज अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
    • स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी: ये खनिज टरबाइन, सौर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसी कई स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों का एक आवश्यक घटक हैं।
    • परिवहन और संचार: इनका उपयोग लड़ाकू विमानों, ड्रोन, रेडियो सेट और विमानों के निर्माण में भी किया जाता है और मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर परिवर्तन में इनका योगदान है।
    • विविध क्षेत्र: मोबाइल फोन, टैबलेट, फाइबर ऑप्टिक केबल और रक्षा एवं चिकित्सा अनुप्रयोगों जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उन्नत प्रौद्योगिकियों के निर्माण के लिए इनका उपयोग किया जाता है।
    • बैटरी और भंडारण प्रौद्योगिकी: लीथियम-आयन जैसी बैटरी प्रौद्योगिकी में प्रगति के संदर्भ में भंडारण प्रौद्योगिकी के विकास के लिए ये खनिज अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  • मूल्य शृंखला के घटक
    • भूविज्ञान और अन्वेषण
    • अपस्ट्रीम: खनन और निष्कर्षण
    • मिडस्ट्रीम: प्रसंस्करण, शोधन और धातु विज्ञान
    • डाउनस्ट्रीम: घटक निर्माण और स्वच्छ डिजिटल उन्नत प्रौद्योगिकी उत्पादन
      • उदाहरण: शून्य उत्सर्जन वाहन (Zero-Emission Vehicles-ZEV) निर्माण, सेमीकंडक्टर, चिप्स आदि।
    • सामग्री पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण।

दुर्लभ मृदा तत्त्वों के बारे में

  • परिभाषा: दुर्लभ मृदा तत्त्व 17 तत्त्वों का एक समूह है, जिसमें 15 लैंथेनाइड्स के साथ-साथ स्कैंडियम और यट्रियम शामिल हैं। ये तत्त्व अपने अद्वितीय चुंबकीय उत्प्रेरक और प्रकाशीय गुणों के कारण आधुनिक औद्योगिक तथा रणनीतिक प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक हैं।
  • दुर्लभता का स्वरूप: दुर्लभ मृदा तत्त्व वास्तव में पृथ्वी की परत में दुर्लभ नहीं हैं, बल्कि इन्हें दुर्लभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये सांद्रित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य भंडारों में कम ही पाए जाते हैं और इनके पृथक्करण और शोधन की प्रक्रियाएँ जटिल और प्रौद्योगिकी-गहन होती हैं।
  • महत्त्व: दुर्लभ मृदा तत्त्वों को उनके उच्च आर्थिक और रणनीतिक महत्त्व के साथ-साथ खनन तथा प्रसंस्करण की सीमित भौगोलिक सांद्रता के कारण महत्त्वपूर्ण खनिजों की श्रेणी में रखा गया है, जिससे आपूर्ति शृंखला में भारी असुरक्षा और व्यवधान का खतरा उत्पन्न होता है।
  • प्रमुख अनुप्रयोग: दुर्लभ मृदा तत्त्वों का व्यापक रूप से उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों और रक्षा उपकरणों के लिए स्थायी चुंबकों में, प्रकाश उत्सर्जक डायोड और डिस्प्ले पैनलों के लिए फॉस्फोरस में और पेट्रोलियम शोधन और उत्सर्जन नियंत्रण के लिए उत्प्रेरकों में किया जाता है।
  • उपलब्धता: दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व मोनाजाइट, बैस्टनेसाइट और जेनोटाइम जैसे खनिजों में पाए जाते हैं और ये समुद्र तट की रेत, कठोर चट्टान संरचनाओं और कार्बोनेटाइट परिसरों में मिलते हैं।
  • भारत का परिप्रेक्ष्य: भारत में दुर्लभ पृथ्वी तत्त्वों के संभावित संसाधन मौजूद हैं, विशेष रूप से मोनाजाइट युक्त समुद्री रेत में, लेकिन सीमित प्रसंस्करण और शोधन क्षमता, पर्यावरणीय चिंताओं तथा एक संपूर्ण घरेलू मूल्य शृंखला के विकास से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भारत के खनिज पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति

  • आयात पर अत्यधिक निर्भरता: खनन मंत्रालय के अनुसार, भारत लीथियम, कोबाल्ट, निकेल सल्फेट और दुर्लभ मृदा चुंबकीय पदार्थों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है, जो बैटरी और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक हैं।
  • वैश्विक स्तर पर असंतुलित स्थिति: भारत लौह अयस्क और एल्युमीनियम के शीर्ष वैश्विक उत्पादकों में से एक है, फिर भी महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों के मामले में इसकी स्थिति सीमित है, जो संरचनात्मक असंतुलन को उजागर करता है।
  • अन्वेषण विस्तार: भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने महत्त्वपूर्ण खनिज अन्वेषण का अत्यधिक विस्तार किया है, जम्मू और कश्मीर में लीथियम संसाधनों की पहचान की है और वर्ष 2021 से सैकड़ों लक्षित अन्वेषण ब्लॉकों का शुभारंभ किया है।
  • प्रसंस्करण की कमी: नीति आयोग और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्टों में कहा गया है कि भारत की प्रमुख कमजोरी सीमित शोधन और पृथक्करण क्षमता में निहित है, विशेष रूप से बैटरी-ग्रेड और दुर्लभ मृदा पदार्थों के लिए।
  • सार्वजनिक निवेश प्रोत्साहन: वर्ष 2025 में स्वीकृत राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन, अन्वेषण, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए दीर्घकालिक सार्वजनिक वित्तपोषण प्रदान करता है।

भारत में महत्त्वपूर्ण और दुर्लभ खनिजों के प्रमुख भंडार

खनिज/श्रेणी अनुमानित भंडारण  भारत के प्रमुख स्थान
दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व (REE)
  • लगभग 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट रेत (जिसमें थोरियम और दुर्लभ मृदा ऑक्साइड खनिज शामिल हैं) में लगभग 7.23 मिलियन टन दुर्लभ मृदा ऑक्साइड (REO) अंतर्निहित हैं।
  • भारत के पास वैश्विक स्तर पर दुर्लभ ऑक्साइड का लगभग पाँचवाँ सबसे बड़ा भंडार है।
आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, गुजरात, झारखंड और महाराष्ट्र के तटीय रेतीले क्षेत्र; गुजरात और राजस्थान में पाई जाने वाली कठोर चट्टानें।
लीथियम (अनुमानित) लीथियम के भंडार को अनुमानित श्रेणी में रखा गया है; सटीक राष्ट्रीय भंडार के आँकड़ों का अभी भी मूल्यांकन किया जा रहा है। रियासी जिला, जम्मू और कश्मीर (सालार-हैमाना क्षेत्र)।
ग्रेफाइट ग्रेफाइट सहित महत्त्वपूर्ण खनिज भंडारों की नीलामी की गई, हालाँकि सटीक मात्रा का संकलन नहीं किया गया है।

  • नीलामी के भंडार कई राज्यों में फैले हुए हैं।
बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़।
कोबाल्ट और निकेल कोबाल्ट के कुछ भंडार पाए गए हैं, लेकिन अभी तक लीथियम/कोबाल्ट के बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से प्रमाणित खनन उत्पादन प्रारंभ नहीं हुआ है।

  • व्यावसायिक निष्कर्षण नहीं हो रहा है; अन्वेषण जारी है।
भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GIS) द्वारा विभिन्न भू-भागों में सर्वेक्षण जारी है; सटीक भंडार अनुमान अभी लंबित हैं।
टाइटेनियम युक्त खनिज (जैसे- रूटाइल, इल्मेनाइट, जिरकॉन)
  • प्लेसर रेत में पर्याप्त भंडार मौजूद हैं।
  • भारत समुद्र तट की रेत में पाए जाने वाले टाइटेनियम खनिजों का एक प्रमुख वैश्विक स्रोत है।
दक्षिण और पूर्वी तटीय क्षेत्र (तमिलनाडु, केरल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, गुजरात)।
अन्य महत्त्वपूर्ण खनिज (प्लैटिनम समूह तत्त्व, वैनेडियम आदि)
  • प्लैटिनम समूह धातुओं (PGM), वैनेडियम, निकेल, क्रोमियम, फॉस्फोराइट आदि के ब्लॉकों की नीलामी और अन्वेषण किया जा चुका है, जो इनकी उपस्थिति का संकेत देते हैं।
  • व्यापक राष्ट्रीय आँकड़ों के आने तक सटीक केंद्रीय भंडार उपलब्ध नहीं हैं।
यह बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और अन्य राज्यों में विस्तृत है।

महत्त्वपूर्ण खनिजों पर भारत की आयात निर्भरता

खनिज निर्भरता प्राथमिक स्रोत और संदर्भ
लीथियम 100%
  • मुख्यतः चिली, रूस और चीन।
  • हाल ही में भारत ने पाँच लीथियम ब्लॉक प्राप्त करने के लिए अर्जेंटीना के साथ 200 करोड़ रुपये का समझौता किया है।
कोबाल्ट 100%
  • चीन, बेल्जियम, नीदरलैंड और डी. आर. कांगो से प्राप्त। NCM (निकल-कोबाल्ट-मैंगनीज) प्रकार की इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों में कैथोड के लिए महत्त्वपूर्ण।
निकेल 100%
  • मुख्यतः इंडोनेशिया, स्वीडन और चीन से।
  • भारत में ओडिशा में अयस्क के कुछ भंडार हैं, लेकिन शोधन क्षमता सीमित है।
वैनेडियम 100%
  • कुवैत, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका से प्राप्त होता है।
  • स्टील मिश्र धातुओं और नई पीढ़ी की वैनेडियम रेडॉक्स फ्लो बैटरियों के लिए आवश्यक है।
जर्मेनियम 100%
  • पूरी तरह से चीन, दक्षिण अफ्रीका और फ्राँस पर निर्भर।
  • फाइबर ऑप्टिक्स और नाइट-विजन उपकरणों का एक महत्त्वपूर्ण घटक।
रेनियम 100%
  • रूस, ब्रिटेन और चीन से प्राप्त।
  • जेट इंजनों के लिए उच्च तापमान वाले सुपरअलॉय में उपयोग किया जाता है।
बेरिलियम और टैंटलम 100%
  • पूरी तरह से आयातित; घरेलू खनन की कोई रिपोर्ट नहीं है।
  • टैंटलम स्मार्टफोन और एयरोस्पेस में उपयोग होने वाले कैपेसिटर के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
सिलिकॉन उच्च
  • भारत कुछ मात्रा में कच्चा सिलिकॉन उत्पादित करता है, लेकिन उच्च शुद्धता वाले पॉलीसिलिकॉन (सौर फोटोवोल्टिक ग्रेड) के लिए चीन, मलेशिया और नॉर्वे पर अत्यधिक निर्भर है।

खनिज कूटनीति से तात्पर्य महत्त्वपूर्ण खनिजों (जैसे लीथियम, कोबाल्ट, निकेल, दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व) तक विश्वसनीय पहुँच सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, गठबंधन और बहुपक्षीय खनिज संघों के रणनीतिक उपयोग से है।

यह संपूर्ण मूल्य शृंखला को कवर करता है:

  • अपस्ट्रीम: खनन और अन्वेषण।
  • मिडस्ट्रीम: प्रसंस्करण और शोधन।
  • डाउनस्ट्रीम: विनिर्माण (बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स)।

भारत को खनिज कूटनीति की आवश्यकता क्यों है?

  • ऊर्जा संक्रमण की आवश्यकताएँ: भारत का वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का लक्ष्य लीथियम, दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व, ताँबा और निकेल की माँग में भारी वृद्धि करेगा।
    • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि स्वच्छ ऊर्जा खनिजों की माँग वर्ष 2030 तक तीन गुना हो जाएगी।
  • आपूर्ति शृंखला एकाग्रता का जोखिम: कई महत्त्वपूर्ण खनिजों का वैश्विक प्रसंस्करण कुछ ही देशों में केंद्रित है, जिससे भारत, निर्यात नियंत्रण और भू-राजनीतिक दबाव के प्रति संवेदनशील हो जाता है, जैसा कि हाल ही में खनिज व्यापार पर वैश्विक प्रतिबंधों में देखा गया है।
  • तकनीकी क्षमता में अंतर: उन्नत शोधन, बैटरी पुनर्चक्रण और दुर्लभ मृदा तत्व पृथक्करण प्रौद्योगिकियाँ पूँजी-गहन हैं और कुछ ही देशों के प्रभुत्व में हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक हो जाता है।
  • आर्थिक स्थिरता: दीर्घकालिक खनिज साझेदारियाँ मूल्य अस्थिरता और आपूर्ति में अचानक आने वाली समस्याओं को कम करने में मदद करती हैं, जिससे इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा विनिर्माण जैसे घरेलू उद्योगों की रक्षा होती है।
  • सामरिक स्वायत्तता: खनिज कूटनीति भारत के आत्मनिर्भर लक्ष्यों और सामरिक स्वायत्तता का समर्थन करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि भविष्य की प्रौद्योगिकियाँ बाहरी आपूर्ति बाधाओं से प्रभावित न हों।
    • 21वीं सदी के नए तेल’ कहे जाने वाले ये खनिज हरित प्रौद्योगिकियों, अर्द्धचालकों और रक्षा अंतरिक्ष के आधारभूत घटक हैं।
  • वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व: भारत खनिज-समृद्ध विकासशील देशों के लिए एक संयोजक और भागीदार के रूप में उभर रहा है, जो केवल दोहन के बजाय साझा मूल्य सृजन को बढ़ावा दे रहा है।
    • हाल ही में, नामीबिया के साथ हुए लीथियम समझौते में स्थानीय प्रसंस्करण, कौशल हस्तांतरण और औद्योगिक विकास पर जोर दिया गया है, जो शोषणकारी संसाधन मॉडलों के लिए विकास-केंद्रित विकल्प प्रदान करता है।

महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा पर भारत की प्रमुख पहलें

  • संस्थागत शासन और रणनीतिक वित्तपोषण
    • राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM): जनवरी 2025 में ₹34,300 करोड़ के कुल परिव्यय के साथ शुरू किया गया एक प्रमुख मिशन।
      • यह पूरे भारत में अन्वेषण, खनन और पुनर्चक्रण के समन्वय के लिए “मुख्य केंद्र” के रूप में कार्य करता है।
    • रणनीतिक भंडार संचय: यह मिशन लीथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा धातुओं जैसे आवश्यक खनिजों के लिए वैश्विक आपूर्ति शृंखला में संभावित बाधाओं से निपटने के उद्देश्य से रणनीतिक खनिज भंडार बनाने का निर्देश देता है।
    • वित्तीय प्रोत्साहन: घरेलू उत्पादन की लागत कम करने के लिए, सरकार ने 25 महत्त्वपूर्ण खनिजों पर सीमा शुल्क हटा दिया है और नई प्रसंस्करण इकाइयों के लिए 20% पूँजीगत व्यय सब्सिडी प्रदान करती है।
  • घरेलू अन्वेषण और विधायी सुधार
    • खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम में संशोधन: हालिया सुधारों के तहत केंद्र सरकार को 24 रणनीतिक खनिजों की नीलामी का विशेष अधिकार प्राप्त हुआ है।
      • इस अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण एवं विकास ट्रस्ट (NMEDT) की स्थापना की गई है, जिससे अपतटीय और विदेशी अन्वेषण को भी इसमें शामिल किया गया है।
    • अन्वेषण लाइसेंस (EL): यह एक नई व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य उन गहरे खनिजों (जैसे- निकेल और ताँबा) के लिए निजी निवेश आकर्षित करना है, जिनका खनन तकनीकी रूप से कठिन है, लेकिन उच्च तकनीक क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
    • त्वरित GSI रोडमैप: भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) वित्त वर्ष 2025-26 में 227 परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है, जिसके तहत प्रारंभिक सर्वेक्षणों से आगे बढ़कर जम्मू-कश्मीर, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में प्रामाणिक भंडार स्थापित किए जा रहे हैं।
  • विदेशी खनिज कूटनीति और साझेदारी
    • काबिल (KABIL) की वैश्विक संपत्तियाँ: भारत के संयुक्त उद्यम, खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड ने अर्जेंटीना में पाँच लीथियम ब्लॉकों (15,703 हेक्टेयर) के लिए एकाधिकार अधिकार प्राप्त कर लिए हैं और ऑस्ट्रेलिया में लीथियम तथा कोबाल्ट परियोजनाओं के लिए उचित जाँच प्रक्रिया को अंतिम रूप दे रहा है।

काबिल (KABIL) के बारे में

  • KABIL का पूरा नाम खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड है, जो भारत को महत्त्वपूर्ण खनिजों की विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गठित एक संयुक्त उद्यम कंपनी है।
  • KABIL को वर्ष 2019 में कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत निगमित किया गया था।
  • यह तीन सरकारी उद्यमों का संयुक्त उद्यम है:
    • नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (NALCO), हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) और मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड (MECL)।

    • खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP): भारत इस अमेरिकी नेतृत्व वाले विशिष्ट समूह में शामिल एकमात्र विकासशील देश है, जो इसे पर्यावरण, पारिस्थितिकी और कल्याण (ESG) के अनुरूप आपूर्ति शृंखलाओं पर सहयोग करने और 13 अन्य भागीदार देशों से उन्नत निष्कर्षण प्रौद्योगिकियों तक पहुँच प्राप्त करने की अनुमति देता है।
    • TRUST पहल: खनिज प्रसंस्करण के सह-वित्तपोषण और भौगोलिक रूप से केंद्रित आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता को कम करने के लिए अमेरिका तथा जापान के साथ एक रणनीतिक ढाँचा विकसित करना।

खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) के बारे में

  • यह महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करने की एक वैश्विक पहल है, जिसे महत्त्वपूर्ण खनिज गठबंधन के नाम से भी जाना जाता है।
  • स्थापना: खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) की आधिकारिक घोषणा जून 2022 में टोरंटो, कनाडा में आयोजित प्रॉस्पेक्टर्स एंड डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ कनाडा (PDAC) के वार्षिक सम्मेलन में की गई थी।
    • यह विश्व का सबसे बड़ा खनन कार्यक्रम है।
  • संस्थापक सदस्य: संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फिनलैंड, फ्राँस, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया, स्वीडन, यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय आयोग।
    • भारत जून 2023 में इस पहल में शामिल हुआ।
  • उद्देश्य: मूल्य शृंखला के साथ रणनीतिक परियोजनाओं के लिए लक्षित वित्तीय और राजनयिक सहायता प्रदान करने हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से टिकाऊ महत्त्वपूर्ण ऊर्जा खनिज आपूर्ति शृंखलाओं के विकास में तेजी लाना।

भारत की खनिज कूटनीति का क्षेत्रीय फोकस

  • ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका: अपस्ट्रीम निष्कर्षण के लिए प्रमुख भागीदार के रूप में कार्य करते हैं, जो खनिज प्रचुरता और दीर्घकालिक अनुबंधों की संभावना प्रदान करते हैं।
  • जापान और पश्चिम एशिया: तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय क्षमता के समर्थन से, ये मध्य-चरण प्रसंस्करण, शोधन और भंडारण के लिए संभावित केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं।
  • यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका: उन्नत बैटरी प्रौद्योगिकियों, पुनर्चक्रण प्रणालियों और स्वच्छ प्रसंस्करण विधियों सहित डाउनस्ट्रीम नवाचार के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
  • लैटिन अमेरिका: लीथियम, ताँबा और निकेल तक पहुँच के लिए भविष्य के स्तंभ के रूप में पहचाना गया है, हालाँकि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा उच्च बनी हुई है।
  • रूस: प्रतिबंधों और रसद संबंधी अनिश्चितताओं से बाधित होने के बावजूद, विविधीकरण विकल्प के रूप में कार्य करता है।

भारत की खनिज कूटनीति में चुनौतियाँ

  • परिष्करण अंतराल
    • बुनियादी ढाँचे का अभाव: भारत अयस्क की खोज में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त कर चुका है। लेकिन कच्चे खनिजों को “बैटरी-ग्रेड” सामग्री में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक उच्च-शुद्धता शोधन और पृथक्करण सुविधाओं का अभाव है।
    • शोधन का जाल: उदाहरण के लिए, हालाँकि KABIL ने अर्जेंटीना में लीथियम ब्लॉक प्राप्त कर लिए हैं, लेकिन राष्ट्रीय जल-धातु प्रौद्योगिकी क्षमता के अभाव के कारण खारे पानी के प्रसंस्करण के लिए अभी भी विदेशी तकनीकों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे भारत, विदेशी मूल्य शृंखलाओं पर निर्भर बना हुआ है।
  • असममित भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा
    • शोषणकारी अर्थव्यवस्था: भारत को मुख्य रूप से चीन से एकाधिकारवादी वर्चस्व का सामना करना पड़ता है, जो वैश्विक दुर्लभ-मृदा तत्व शोधन के 90% से अधिक हिस्से पर नियंत्रण रखता है।
    • वित्तपोषण संबंधी बाधाएँ: भारतीय कंपनियाँ राज्य समर्थित वैश्विक दिग्गजों के सामने संघर्ष कर रही हैं, जो “खनिजों के बदले अवसंरचना” के सौदे पेश करते हैं। जांबिया जैसे क्षेत्रों में, प्रतिद्वंद्वी शक्तियों द्वारा अपनाई गई अधिक आक्रामक, समन्वित वित्तीय रणनीति के कारण भारतीय बोलियों को अक्सर अस्वीकार कर दिया जाता है।
  • संसाधन राष्ट्रवाद और व्यापार विखंडन
    • नीतिगत संरक्षणवाद: साझेदार राष्ट्र तेजी से संसाधन राष्ट्रवाद को अपना रहे हैं, जिसमें घरेलू आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
    • मित्र देशों के साथ साझेदारी की चुनौतियाँ: अमेरिकी मुद्रास्फीति निवारण अधिनियम (IRA) जैसे रणनीतिक प्रोत्साहन अक्सर ‘एकाधिकारवादी समूह’ को जन्म देते हैं, जिससे उत्तरी अमेरिकी उत्पादन को बढ़ावा मिलता है तथा अनजाने में वैश्विक हरित प्रौद्योगिकी बाजार में भारतीय निर्यात हाशिए पर चला जाता है।
  • भौगोलिक एवं पर्यावरणीय बाधाएँ
    • कम अन्वेषण तीव्रता: भारत की स्पष्ट भू-वैज्ञानिक क्षमता (OGP) का केवल 10% ही अन्वेषित किया गया है। त्रिविमीय भू-भौतिकीय डेटा की ऐतिहासिक कमी और उच्च जोखिम वाली पूँजी के कारण गहरे भंडार में मौजूद खनिज अभी तक अन्वेषित नहीं हुए हैं।
    • ईएसजी दृष्टिकोण: घरेलू खनन को सख्त वैश्विक ESG (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) मानकों के अनुरूप ढालना कठिन है।
      • नायक्करपट्टी टंगस्टन साइट जैसी परियोजनाएँ विलंब का सामना कर रही हैं क्योंकि भारत आदिवासी अधिकारों (PESA अधिनियम) और जैव विविधता संबंधी चिंताओं को औद्योगिक तात्कालिकता के साथ संतुलित करने का प्रयास कर रहा है।

खनिज सुरक्षा के लिए जापान का आदर्श: चीन से आपूर्ति में आए संकटों का सामना करने के बाद विकसित की गई महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा के लिए व्यवस्थित, दीर्घकालिक और संस्थागत रणनीतियों का जापान एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

आगे की राह

  • एकीकृत, मूल्य-शृंखला उन्मुख साझेदारी विकसित करना: कच्चे अयस्क को सुरक्षित करना अब अंतिम लक्ष्य नहीं है; वास्तविक रणनीतिक लाभ मध्य-प्रक्रिया पर नियंत्रण रखने में निहित है।
    • अपस्ट्रीम (निष्कर्षण): दीर्घकालिक अयस्क निष्कर्षण और इक्विटी हिस्सेदारी के लिए अफ्रीका (जांबिया में ताँबा/कोबाल्ट, नामीबिया में लीथियम), ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और लैटिन अमेरिका (लीथियम ट्रायंगल) पर ध्यान केंद्रित करना।
    • मिडस्ट्रीम (शोधन और पृथक्करण): उन्नत खनिज प्रसंस्करण के लिए जापान और पश्चिम एशिया (विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब) के साथ साझेदारी करना।
      • ये क्षेत्र कच्चे अयस्क को उच्च शुद्धता वाले पदार्थों में परिष्कृत करने के लिए पूँजी और औद्योगिक अवसंरचना प्रदान करते हैं।
    • डाउनस्ट्रीम (प्रौद्योगिकी और नवाचार): अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी निर्माण के लिए यूरोपीय संघ और अमेरिका (ट्रस्ट पहल के माध्यम से) के साथ सहयोग करें, जिसमें अगली पीढ़ी की बैटरी रसायन और उच्च दक्षता वाले स्थायी चुंबक शामिल हैं।
    • AI और सिलिकॉन का भविष्य: हालाँकि भारत अमेरिका के नेतृत्व वाली पैक्स सिलिका पहल (दिसंबर 2025 में शुरू हुई) का संस्थापक सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिकी राजदूत द्वारा जनवरी 2026 में दिया गया निमंत्रण एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है।
      • इस गठबंधन में शामिल होने से भारत वैश्विक सिलिकॉन-टू-एआई आपूर्ति शृंखला में एकीकृत हो जाएगा, जिससे खनिज सीधे सेमीकंडक्टर निर्माण से जुड़ जाएँगे।
    • रणनीतिक विविधीकरण: रूस को एक महत्त्वपूर्ण बैक-अप भागीदार के रूप में बनाए रखें, उसके विशाल भंडार और दीर्घकालिक वैज्ञानिक संबंधों का उपयोग करके केंद्रित वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं से हटकर विविधीकरण पर ध्यान केंद्रित करना।
  • सरकारी सहायता और निजी क्षेत्र के लिए जोखिम कम करना: सरकार अब 34,300 करोड़ रुपये के राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM) का उपयोग दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए “स्थिर पूँजी” उपलब्ध कराने के लिए कर रही है।
    • जोखिम साझाकरण: सरकारी गारंटी प्रदान करके, भारत का उद्देश्य अस्थिर विदेशी बाजारों में निजी क्षेत्र के प्रवेश के जोखिम को कम करना है।
    • बाजार स्थिरता: मूल्य-सीमा तंत्र और सुनिश्चित घरेलू खरीद समझौतों को लागू करने से भारतीय रिफाइनर वैश्विक एकाधिकारों द्वारा “अत्यधिक अनुचित मूल्य निर्धारण” से सुरक्षित रहते हैं।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था के ‘तीसरे स्तंभ’ का विस्तार
    • शहरी खनन क्रांति: 1,500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना के साथ, भारत का लक्ष्य 2030 तक प्रतिवर्ष 40,000 टन से अधिक खनिज पुनर्प्राप्त करना है।
    • द्वितीयक आपूर्ति आधार: ई-अपशिष्ट और बैटरी पुनर्चक्रण को औपचारिक रूप देकर, भारत एक मजबूत द्वितीयक खनिज आपूर्ति आधार तैयार कर सकता है, जिससे प्राथमिक खनन की पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक लागत कम हो जाएगी।
  • कूटनीतिक विस्तार और संस्थागत सक्रियता
    • खनिज परिचारक: भारत को विदेश मंत्रालय के अंतर्गत एक समर्पित खनिज कूटनीति प्रभाग स्थापित करना चाहिए और सैंटियागो और पर्थ जैसी खनन राजधानियों में विशेष खनिज परिचारकों को तैनात करना चाहिए, ताकि वे वास्तविक समय में बाजार की अस्थिरता पर नजर रख सकें।
    • रणनीतिक भंडार संचय: रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों की तरह, भारत को घरेलू उद्योगों को अनुचित मूल्य निर्धारण और निर्यात प्रतिबंधों से बचाने के लिए लीथियम और कोबाल्ट के संप्रभु खनिज बफर भंडार बनाने चाहिए।
  • अनुसंधान एवं विकास तथा सामग्री प्रतिस्थापन
    • नवाचार में अभूतपूर्व प्रगति: सोडियम-आयन या जिंक-वायु आधारित रसायन विज्ञान में निवेश से लीथियम पर पूर्ण निर्भरता कम हो सकती है।
    • भविष्य के पेटेंट: उत्कृष्टता केंद्रों को उद्योग से जोड़कर वर्ष 2030 तक 1,000 से अधिक पेटेंट प्राप्त करने से यह सुनिश्चित होगा कि इससे भारत अगली पीढ़ी के खनिज प्रसंस्करण के लिए आवश्यक बौद्धिक संपदा (IP) का स्वामी बनेगा।

निष्कर्ष

भारत की खनिज कूटनीति अब आकस्मिक आयात से हटकर रणनीतिक संसाधन नियोजन की ओर अग्रसर है, जिसके लिए दोहरी रणनीति (घरेलू क्षमताओं का निर्माण करना और साथ ही तत्काल अंतरराष्ट्रीय पहुँच सुनिश्चित करना) अपनाई जा रही है। सफलता केवल हस्ताक्षरित समझौतों पर निर्भर नहीं होगी, बल्कि परिचालनशील खदानों, प्रसंस्करण क्षमता और सुदृढ़ मूल्य शृंखलाओं पर भी निर्भर करेगी।

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