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Jan 22 2026

डॉल्फिन गणना सर्वेक्षण

भारत में नदियों और मुहानों में पाई जाने वाली डॉल्फिन की गणना प्रोजेक्ट डॉल्फिन के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के बिजनौर से शुरू किया गया।

संबंधित तथ्य

  • डॉल्फिन की राष्ट्रीय आबादी के पूर्वानुमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात के गिर में आयोजित राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की बैठक (मार्च 2024) में जारी किए गए थे।

सर्वेक्षण के बारे में

  • नोडल मंत्रालय: केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)।
  • नोडल एजेंसी: सर्वेक्षण का समन्वय भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून द्वारा किया जा रहा है।
  • सहयोगी: इस कार्य का समन्वय WII द्वारा राज्य वन विभागों और संरक्षण साझेदारों, जिनमें WWF इंडिया, भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट शामिल हैं, के सहयोग से किया जा रहा है।
  • भौगोलिक दायरा
    • पहला चरण: बिजनौर से गंगा सागर और सिंधु नदी तक गंगा का मुख्य भाग।
    • दूसरा चरण: ब्रह्मपुत्र नदी, गंगा की प्रमुख सहायक नदियाँ, सुंदरबन, ओडिशा की नदी प्रणालियाँ।
  • शामिल प्रजातियाँ
    • प्रमुख प्रजातियाँ: गंगा नदी डॉल्फिन और सिंधु नदी डॉल्फिन।
    • नई शामिल प्रजाति: पहली बार, इस सर्वेक्षण में सुंदरबन और ओडिशा में पाई जाने वाली इरावदी डॉल्फिन को भी शामिल किया जाएगा।

पिछले सर्वेक्षण (2021-2023) के निष्कर्ष

  • संख्या अनुमान: लगभग 6,327 नदी डॉल्फिन दर्ज की गईं।
  • वितरण
    • गंगा, यमुना, चंबल, गंडक, घाघरा, कोसी, महानंदा और ब्रह्मपुत्र नदियों में गंगा नदी डॉल्फ़िन पाई जाती हैं।
    • ब्यास नदी में सिंधु नदी डॉल्फिन की एक छोटी आबादी पाई जाती है।
  • उच्च संख्या वाले राज्य: उत्तर प्रदेश और बिहार में इनकी संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई, इसके बाद पश्चिम बंगाल और असम का स्थान आता है, जो गंगा बेसिन के महत्त्व को दर्शाता है।

प्रोजेक्ट डॉल्फिन के बारे में

  • प्रोजेक्ट डॉल्फिन भारत सरकार की एक राष्ट्रीय संरक्षण पहल है, जिसका उद्देश्य भारतीय जलक्षेत्र में पाई जाने वाली नदी और महासागरीय डॉल्फिन प्रजातियों की सुरक्षा तथा संरक्षण करना है।
  • उद्घाटन: 15 अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा।
  • अवधि: यह परियोजना 10 वर्षों की दीर्घकालिक पहल के रूप में परिकल्पित है।
  • नोडल मंत्रालय: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)।
  • सामुदायिक भागीदारी: यह परियोजना स्थानीय समुदायों, मछुआरों और अन्य हितधारकों की भागीदारी को प्रोत्साहित करती है, मानव जनित खतरों को कम करने और स्थायी संरक्षण परिणाम सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका को मान्यता देती है।

अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) वित्तपोषण योजना

उद्योग समर्थित परियोजनाओं के लिए अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) कोष के तहत धन का वितरण जनवरी 2026 के अंत तक शुरू होने वाला है।

अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) के लिए मिलने वाली धनराशि के बारे में

  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य उच्च जोखिम वाले, उच्च प्रभाव वाले अनुसंधान को वित्तपोषित करना और प्रयोगशालाओं, स्टार्ट-अप्स तथा उद्योग के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।
  • निधि: RDI योजना की निधि 1 लाख करोड़ रुपये है।
  • प्रारंभ: इस योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जुलाई 2025 में मंजूरी दी और नवंबर 2025 में औपचारिक रूप से प्रारंभ किया गया।
  • नोडल मंत्रालय: इस योजना का कार्यान्वयन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा किया जाता है।
  • वित्तपोषण तंत्र: यह दो स्तरीय तंत्र है:
    • अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) के अंतर्गत विशेष प्रयोज्य कोष (SPF)
    • परियोजनाओं को निधि आवंटित करने वाले द्वितीय स्तरीय निधि प्रबंधक (SLFMs)।
  • प्रथम द्वितीय स्तरीय निधि प्रबंधक: प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (TDB) और जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) को RDI निधि के अंतर्गत प्रथम द्वितीय स्तरीय निधि प्रबंधक के रूप में अनुमोदित किया गया है।
    • प्रत्येक को पहली तिमाही में ₹2,000 करोड़ (कुल ₹4,000 करोड़) का प्रारंभिक आवंटन प्राप्त होगा, जिसके तहत वे स्टार्ट-अप, कंपनियों और उद्योग से प्रस्ताव आमंत्रित करना शुरू करेंगे।
    • TDB: सभी RDI सनराइज और रणनीतिक क्षेत्रों में परियोजनाएँ।
    • BIRAC: जैव प्रौद्योगिकी और संबद्ध क्षेत्रों में परियोजनाएँ।
  • उद्योग समर्थित परियोजनाओं और उच्च प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (TRL) पर ध्यान केंद्रित करना: RDI फंडिंग उन नवाचार-प्रेरित उद्यमों और उद्योग समर्थित परियोजनाओं पर केंद्रित होगी, जिन्होंने प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (TRL) 4 या उससे अधिक को पार कर लिया है।
    • उच्च TRL का अर्थ है, वे परियोजनाएँ, जो प्रारंभिक अवधारणा प्रमाण से आगे बढ़कर विकास और विस्तार के चरण में पहुँच चुकी हैं।
  • प्राथमिकता क्षेत्र एवं उद्देश्य: RDI योजना का उद्देश्य निम्नलिखित है:-
    • अनुसंधान और नवाचार में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
    • परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों और उच्च प्रभाव वाले उपक्रमों को वित्तपोषित करना।
    • ऊर्जा, जलवायु, गहन प्रौद्योगिकियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जैव प्रौद्योगिकी, डिजिटल अर्थव्यवस्था आदि जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को बढ़ावा देना।
    • प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को मजबूत करना।
  • रणनीतिक पर्यवेक्षण: इस योजना का रणनीतिक मार्गदर्शन अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) के शासी बोर्ड (जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं) द्वारा किया जाता है।

इलेक्ट्रिक वाहनों के कारण ताँबे की की माँग में वृद्धि

वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहन (EV) की बिक्री 0.55 मिलियन (2015) से बढ़कर लगभग 20 मिलियन (2025) हो गई, जिससे EV में प्रयुक्त होने वाले ताँबे की माँग में तीव्र बढोतरी हुई है, साथ ही यह माँग 1.28 मिलियन टन से अधिक हो गई है।

  • चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रिड अपग्रेड से वाहनों के अलावा भी ताँबे की खपत में और अधिक वृद्धि होती है।

ताँबे की माँग पर इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रभाव

  • बैटरी, मोटर, वायरिंग और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के कारण इलेक्ट्रिक वाहनों को आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों की तुलना में 4-5 गुना अधिक ताँबे की आवश्यकता होती है।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री के साथ ताँबे की माँग की लोच अधिकतर 1 से ऊपर रही है, जो EV वाहनों को अपनाने की तुलना में माँग में तेजी से वृद्धि दर्शाती है।

ताँबे के बारे में

  • ताँबा (Cu) एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक और रणनीतिक धातु है, जो विद्युतीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों तथा आधुनिक अवसंरचना के लिए अपरिहार्य है।
  • प्रमुख अयस्क: चैल्कोपाइराइट (CuFeS₂), चैल्कोसाइट (Cu₂S), बोर्नाइट, मैलाकाइट।
  • गुणधर्म: उत्कृष्ट विद्युत और ऊष्मीय चालकता।
    • यह अत्यधिक तन्य, लचीला, संक्षारण-प्रतिरोधी और आसानी से पुनर्चक्रण योग्य है।
  • अनुप्रयोग
    • विद्युत वायरिंग, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी और मोटर
    • पॉवर ग्रिड, ट्रांसफार्मर और चार्जिंग स्टेशन
    • इलेक्ट्रॉनिक्स, निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ।
  • वैश्विक उत्पादन
    • प्रमुख उत्पादक देश चिली, पेरू, चीन, डी. आर. कांगो और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं।
    • चिली विश्व का सबसे बड़ा ताँबा उत्पादक देश है (वैश्विक उत्पादन का लगभग 27%)।
      • चिली में विश्व की सबसे बड़ी ताँबा खदानें, एस्कोन्डिडो और कोलाहुआसी अवस्थित हैं।
  • भारत में उत्पादन
    • प्रमुख भंडार: सिंहभूम (झारखंड), बालाघाट (मध्य प्रदेश), झुँझुनू और अलवार (राजस्थान)।
    • अल्प भंडार: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु।
    • सबसे बड़ा उत्पादक: मध्य प्रदेश भारत का सबसे बड़ा ताँबा उत्पादक राज्य है, जो देश के ताँबा संकेंद्रण उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा उत्पादित करता है।

इलेक्ट्रिक वाहनों के नेतृत्व वाले ऊर्जा संक्रमण में ताँबा एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिससे संसाधन सुरक्षा, पुनर्चक्रण और नवाचार भविष्य के कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयासों के लिए केंद्रीय बन गए हैं।

केंद्रीय रेशम बोर्ड

वस्त्र मंत्रालय ने केंद्रीय रेशम बोर्ड (CSB) की वित्तीय स्वीकृति सीमा को 50 लाख रुपये से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये कर दिया है।

केंद्रीय रेशम बोर्ड के बारे में

  • वैधानिक निकाय: संसद के अधिनियम (केंद्रीय रेशम बोर्ड अधिनियम, 1948) द्वारा वर्ष 1948 में स्थापित किया गया।
  • नोडल मंत्रालय: वस्त्र मंत्रालय (भारत सरकार)
  • मुख्यालय: बंगलूरू, कर्नाटक
  • कार्यक्षेत्र
    • रेशम उत्पादन में अनुसंधान एवं विकास
    • प्रौद्योगिकी प्रसार
    • गुणवत्ता सुधार
    • रेशम उत्पादन एवं निर्यात को प्रोत्साहन।

भारत में रेशम क्षेत्र

  • वैश्विक स्थिति: भारत विश्व में रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और साथ ही सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है।
  • आजीविका संबंधी सहायता: यह लगभग 9.76 मिलियन लोगों को रोजगार प्रदान करता है, मुख्य रूप से ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में।
  • उत्पादन रुझान: वित्त वर्ष 2025 में 41,121 मीट्रिक टन।
    • शहतूत रेशम का इसमें सबसे बड़ा हिस्सा है।
  • प्रमुख उत्पादक राज्य: आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, जम्मू और कश्मीर।
    • झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और उत्तर-पूर्वी राज्यों में शहतूत के वृक्ष के अतिरिक्त साधनों से रेशम का उत्पादन होता है।
  • निर्यात प्रदर्शन
    • वित्त वर्ष 2025 में निर्यात: 246 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का रेशम और रेशम उत्पाद की विदेशी आपूर्ति सुनिश्चित की।
    • निर्यात बास्केट: कच्चा रेशम, रेशमी धागा, कपड़े, वस्त्र, रेशम अपशिष्ट और हथकरघा उत्पाद।
    • प्रमुख निर्यात बाजार: संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, यूनाइटेड किंगडम, इटली, फ्राँस, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, हांगकांग और कनाडा

रेशम के प्रकार

  • शहतूत रेशम
    • शहतूत का रेशम उन रेशमकीटों से प्राप्त होता है, जो केवल शहतूत के पत्तों पर ही पलते हैं।
    • यह अपनी कोमलता, चिकनी बनावट और प्राकृतिक चमक के लिए जाना जाता है, जो इसे महँगी साड़ियों और प्रीमियम वस्त्रों के लिए आदर्श बनाता है।
    • भारत के कुल कच्चे रेशम उत्पादन का लगभग 92% शहतूत के वृक्षों से आता है।
  • गैर-शहतूत रेशम
    • गैर-शहतूत रेशम, जिसे वन्य रेशम भी कहा जाता है, जंगली रेशम के कीड़ों से प्राप्त होता है, जो ओक, अरंडी और अर्जुन जैसे वन वृक्षों पर पलते हैं।
    • इसकी बनावट खुरदरी और मिट्टी जैसी होती है, चमक अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन इसकी मजबूती, टिकाऊपन और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इसे महत्त्व दिया जाता है।

सागर मैत्री

हाल ही में सागर मैत्री के पाँचवें संस्करण के लिए कोच्चि से INS सागरध्वनि को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया।

  • INS सागरध्वनि एक विशेष समुद्री ध्वनिक अनुसंधान पोत है, जिसे नौसेना भौतिक और समुद्र विज्ञान प्रयोगशाला (NPOL)-DRDO द्वारा डिजाइन किया गया है, GRSE द्वारा निर्मित किया गया है और वर्ष 1994 में कमीशन किया गया था, जो तीन दशकों से अधिक समय से समुद्री अनुसंधान में सेवा दे रहा है।

सागर मैत्री के बारे में

  • सागर मैत्री, DRDO और भारतीय नौसेना की एक प्रमुख सहयोगात्मक समुद्र विज्ञान पहल है।
  • उद्देश्य: हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के देशों के बीच वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करना।
    • हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में 23 सदस्य देश शामिल हैं।
  • उत्पत्ति: अप्रैल 2019 में भारत के सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) के समुद्री दृष्टिकोण के तहत DRDO द्वारा इसकी शुरुआत की गई।
    • वैज्ञानिक घटक मैत्री (समुद्री और संबद्ध अंतःविषयक प्रशिक्षण और अनुसंधान पहल) को दीर्घकालिक समुद्री अनुसंधान सहयोग को संस्थागत रूप देने के लिए शुरू किया गया था।
    • यह आवधिक मिशन-आधारित पहलों के रूप में संचालित किया जाता है (यह सख्ती से वार्षिक या द्विवार्षिक नहीं है)।

सागर मैत्री–V (SM-5)

  • सागर मैत्री-V, DRDO के समुद्री ध्वनिक अनुसंधान पोत INS सागरध्वनि का उपयोग करके आयोजित की गई इस पहल का पाँचवाँ संस्करण है।
  • उद्देश्य
    • हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) के देशों के बीच संयुक्त समुद्र विज्ञान और ध्वनिक अनुसंधान (Oceanographic and Acoustic Research) को बढ़ावा देना।
    • समुद्री विज्ञान में वैज्ञानिक क्षमता और पेशेवर आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।
    • भारतीय नौसेना के जलमग्न क्षेत्र जागरूकता (UDA) से संबंधित समुद्र विज्ञान और ध्वनिक डेटा एकत्र करना।
  • सहभागी देश (8): आठ हिंद महासागर क्षेत्र के देश: ओमान, मालदीव, श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया और म्याँमार।

महत्त्व

  • समुद्री विज्ञान कूटनीति में भारत के नेतृत्व को मजबूत करता है।
  • नौसेना सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण जलक्षेत्रीय जागरूकता को बढ़ाता है।
  • महासागर (MAHASAGAR) (क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक और समग्र उन्नति) के भारत के विकसित होते समुद्री दृष्टिकोण के अनुरूप है।

प्रतास (डोंगशा) द्वीप समूह

हाल ही में एक चीनी टोही ड्रोन ने ताइवान के नियंत्रण वाले प्रतास (डोंगशा) द्वीपों के हवाई क्षेत्र में संक्षिप्त रूप से प्रवेश किया, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया।

प्रतास द्वीप समूह के बारे में

  • प्रतास द्वीपसमूह, जिसे डोंगशा द्वीपसमूह के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण चीन सागर के उत्तरी भाग में स्थित प्रवाल भित्तियों का एक छोटा समूह है, जो एक एटाॅल का निर्माण करता है।
  • स्थान: यह दक्षिणी ताइवान और हांगकांग के बीच अवस्थित है।
  • भूगोल: इसमें तीन द्वीप शामिल हैं, जो एक वृत्ताकार प्रवाल भित्ति बनाते हैं।
    • डोंगशा द्वीप समुद्र तल से ऊपर स्थित एकमात्र द्वीप है; अन्य दो जलमग्न हैं।
    • यह एटाॅल लगभग 24 किमी. व्यास का है, जिसके भीतर लगभग 16 किमी. चौड़ा एक लैगून है।
    • यह प्रवाल भित्तियों, समुद्री जैव विविधता और प्रवासी पक्षियों के आवासों से समृद्ध है।
  • वर्तमान प्रशासन: ताइवान (चीन गणराज्य) द्वारा नियंत्रित और डोंगशा एटाॅल राष्ट्रीय उद्यान के रूप में प्रशासित है।
    • यहाँ कोई स्थायी आबादी नहीं है; ताइवानी नौसेना इस द्वीप पर तैनात है।
    • इस पर चीन जनवादी गणराज्य का दावा है, जिससे यह विवाद का केंद्र बना हुआ है।
  • सामरिक महत्त्व: यह दक्षिण चीन सागर के उत्तरी छोर पर, प्रशांत और हिंद महासागरों को जोड़ने वाले महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों के निकट स्थित है।
    • मुख्य भूमि ताइवान से इसकी दूरी के कारण इसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, जो इसे जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर की सुरक्षा गतिशीलता में महत्त्वपूर्ण बनाता है।

संदर्भ

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरण (संरक्षण) कोष के उपयोग, प्रशासन और लेखापरीक्षा को कवर करते हुए इसके लिए विस्तृत नियम अधिसूचित किए हैं।

पर्यावरण (संरक्षण) कोष की पृष्ठभूमि

  • प्रकृति: यह भारत सरकार का एक वैधानिक कोष है, जिसे पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन पर लगाए गए मौद्रिक दंडों के उपयोग हेतु बनाया गया है।
  • वैधानिक आधार: इस कोष की परिकल्पना जन विश्वास अधिनियम, 2023 के अंतर्गत की गई थी, जिसने मौद्रिक दंडों को बरकरार रखते हुए प्रदूषण से संबंधित कई छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया।
  • निधि का स्रोत: इसके अंतर्गत लगाए गए दंड
    • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
    • वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981
    • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974
  • जुर्माने की सीमा: जुर्माने की राशि न्यूनतम ₹10,000 से अधिकतम ₹15 लाख तक हो सकती है।

पर्यावरण (संरक्षण) निधि नियम, 2026

  • उद्देश्य: ये नियम निधि के उपयोग के लिए गतिविधियों, प्रक्रियाओं, शासन संरचना और लेखापरीक्षा तंत्र का विस्तृत वर्णन करते हैं।
  • निधि बँटवारे की व्यवस्था
    • वसूले गए जुर्माने का 75% संबंधित राज्य के संचित कोष में जमा किया जाएगा।
    • 25% राशि राष्ट्रीय स्तर की पर्यावरण गतिविधियों के लिए केंद्र द्वारा रखी जाएगी।
  • प्रशासनिक प्राधिकारी: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) या केंद्र द्वारा अधिसूचित निकाय।
  • निर्दिष्ट उपयोग: नियमों में 11 चिह्नित पर्यावरणीय गतिविधियों के लिए निधि के उपयोग की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
  • प्रशासनिक ढाँचा: केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा परियोजनाओं के प्रबंधन और कार्यान्वयन के लिए समर्पित परियोजना प्रबंधन इकाइयाँ (PMU) बनाई जाएँगी।
  • लेखापरीक्षा एवं निगरानी
    • लेखापरीक्षा प्राधिकरण: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) पर्यावरण (संरक्षण) कोष की लेखापरीक्षा करेंगे।
    • डिजिटल निगरानी: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) कोष के कार्यान्वयन और निगरानी के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल विकसित और अनुरक्षित करेगा।
    • पोर्टल का कार्य: पोर्टल शुरू होने के बाद यह पोर्टल अधिकारियों और हितधारकों के बीच एक विशेष डिजिटल इंटरफेस के रूप में कार्य करेगा।

चिह्नित गतिविधियों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • वायु गुणवत्ता मॉनिटर जैसे पर्यावरण निगरानी उपकरणों की स्थापना, संचालन और रखरखाव।
  • पर्यावरण प्रशासन से संबंधित IT-आधारित प्रणालियों का विकास।
  • पर्यावरण प्रयोगशालाओं की स्थापना और उन्हें सुदृढ़ बनाना।
  • प्रदूषण नियंत्रण संस्थानों और संबंधित अधिकारियों की क्षमता निर्माण।
  • मौजूदा दूषित स्थलों सहित पर्यावरण क्षति का निवारण।
  • पर्यावरण संरक्षण और सुधार से संबंधित अनुसंधान।
  • परियोजना प्रबंधन इकाइयों में तैनात संविदा कर्मचारियों और सलाहकारों का वेतन और भत्ते।

महत्त्व

  • प्रदूषण फैलाने वाले से भुगतान लेने के सिद्धांत को सुदृढ़ बनाना: पर्यावरण पुनर्स्थापन में जुर्माने की राशि का पुनर्निवेश करके प्रदूषण फैलाने वाले से भुगतान लेने के सिद्धांत को सुदृढ़ बनाता है।
  • केंद्र-राज्य सहयोग में वृद्धि: राजस्व-साझाकरण तंत्र यह सुनिश्चित करके पर्यावरण शासन में केंद्र-राज्य सहयोग को मजबूत करता है कि दोनों स्तरों की सरकारों की प्रवर्तन तथा पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन में हिस्सेदारी हो।
  • अपराधीकरण का उन्मूलन: आपराधिक प्रवर्तन से अनुपालन-आधारित शासन की ओर बढ़ते हुए जन विश्वास सुधारों को क्रियान्वित करता है।
  • पर्यावरण शासन: पर्यावरण संरक्षण में संस्थागत क्षमता, निगरानी, ​​उपचार और जवाबदेही को बढ़ाता है।

संदर्भ

पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी में तीव्र प्रगति ने वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र को एक तेजी से बढ़ते वाणिज्यिक उद्योग में परिवर्तित कर दिया है, जिसके वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक होने का अनुमान है।

  • इसका मुख्य कारण लागत में कमी और प्रक्षेपण की आवृत्ति में वृद्धि है।

पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण वाहनों (RLVs) के बारे में 

  • पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान ऐसी अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियाँ हैं, जिन्हें रॉकेट के चरणों या अंतरिक्ष यान को पुनः प्राप्त करने और उनका पुन: उपयोग करने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • घटक
    • पुनः प्राप्त किए जा सकने वाले प्रथम चरण के बूस्टर या स्पेसप्लेन।
    • पुनः आरंभ किए जा सकने वाले इंजन।
    • उन्नत मार्गदर्शन और नियंत्रण प्रणाली।
    • वायुमंडलीय पुनः प्रवेश के लिए तापीय सुरक्षा।
    • लैंडिंग तंत्र जैसे कि रेट्रो-प्रोपल्शन, ग्रिड फिन्स और स्वायत्त नेविगेशन सॉफ्टवेयर।
  • कार्यप्रणाली
    • रॉकेट सुपरसोनिक गति से पीछे की ओर धुआँ निकालकर गुरुत्वाकर्षण पर नियंत्रण पाते हैं।
    • चरण प्रक्रिया: निचले प्रणोदन मॉड्यूल (प्रथम चरण) को ऊपरी पेलोड चरण से अलग करना, ताकि प्रथम चरण को पुनः प्राप्त किया जा सके।
    • पुनर्प्राप्ति: उपयोग किए गए चरण प्रणोदक मंदन और एयरोडायनामिक्स ब्रेकिंग का उपयोग करके वापस लौटते हैं, जिससे उनका नवीनीकरण और पुनः उपयोग संभव हो पाता है।

अंतरिक्ष एजेंसियांँ​​वर्तमान में RLVs का उपयोग या विकास कर रही हैं।

अंतरिक्ष एजेंसी   वाहन नाम  वर्तमान स्थिति (2026) पुन: प्रयोज्य प्रकार
नासा (संयुक्त राज्य अमेरिका) स्पेस शटल, स्टारशिप (साझेदार) वाणिज्यिक साझेदारों का उपयोग करते हुए; आर्टेमिस के लिए स्टारशिप का सह-विकास करना। आंशिक / पूर्ण (स्टारशिप)
इसरो (भारत) पुष्पक (RLV-TD),

अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान

(NGLV सूर्या)

वर्ष 2026 में RLV-TD कक्षीय वापसी का परीक्षण;

NGLV का विकास

आंशिक (प्रथम चरण)
CNSA (चीन) लॉन्ग मार्च 8, CZ-10 मानवयुक्त चंद्र कार्यक्रमों के लिए LM-8 का संचालन; CZ-10 का परीक्षण आंशिक
ESA (यूरोप) थेमिस (Themis) थेमिस रियूजेबल डेमोंस्ट्रेटर की पहली परीक्षण उड़ानें वर्ष 2026 की शुरुआत में होंगी। वर्टिकल टेक-ऑफ एंड लैंडिंग (VTVL)
JAXA (जापान) कैलिस्टो (CALLISTO), RV-X पुन: प्रयोज्य प्रणालियों के लिए निरंतर अनुसंधान एवं विकास और सहयोगात्मक परीक्षण VTVL प्रदर्शक
स्पेसएक्स  फाल्कन 9, फाल्कन हेवी, स्टारशिप पूरी तरह से चालू (फाल्कन); स्टारशिप के उड़ान परीक्षण जारी हैं। आंशिक/पूर्ण
ब्लू ओरिजन  न्यू शेफर्ड, न्यू ग्लेन नया शेफर्ड ऑपरेशनल (सबऑर्बिटल); (पूरी तरह से पुन: उपयोग योग्य)

नए ग्लेन VTVL की लैंडिंग का प्रदर्शन किया गया। (आंशिक रूप से पुन: उपयोग योग्य)

पूरी तरह से पुन: प्रयोज्य

पुन: प्रयोज्य अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में भारत की स्थिति

  • इसरो के प्रयास: इसरो कई पुन: प्रयोज्यता मार्गों पर कार्य कर रहा है, जिनमें ‘ऑटोनोमस हाइपरसोनिक री-इंट्री’ और क्षैतिज रनवे लैंडिंग में सक्षम पंखों वाला पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV-TD) शामिल है, जिसे RLV-TD कार्यक्रम के तहत प्रमाणित किया गया है।
    • पुष्पक यान के लिए RLV LEX-03, इसके RLV “पुष्पक” का सफल तीसरा और अंतिम परीक्षण है, जिसमें 4.5 किमी की ऊँचाई से लैंडिंग का प्रदर्शन किया गया।
    • इसरो वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के समान, वायुगतिकीय प्रतिरोध और प्रतिगामी प्रणोदन का उपयोग करके ऊर्ध्वाधर चरण पुनर्प्राप्ति अवधारणाओं को भी विकसित कर रहा है, ताकि PSLV और LVM-3 जैसे व्यय योग्य प्रक्षेपण यानों पर निर्भरता कम की जा सके।
  • निजी भागीदारी: अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार और IN-SPACe सुविधा ने भारतीय निजी स्टार्ट-अप को प्रक्षेपण यान विकास में प्रवेश करने में सक्षम बनाया है, जिससे अंतरिक्ष के व्यावसायीकरण और स्वदेशी नवाचार को मजबूती मिली है।

पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यानों के पीछे का तर्क

  • लागत और मिशन की जटिलता: जीवन-सहायता, सुरक्षा, अतिरिक्त व्यवस्था और मिशन नियोजन की आवश्यकताओं के कारण मानव अंतरिक्ष मिशन उपग्रह, प्रक्षेपणों की तुलना में 3-5 गुना अधिक महँगे होते हैं, जिससे पुन: प्रयोज्यता के माध्यम से लागत में कमी लाना अनिवार्य हो जाता है।
    • उच्च-मूल्य वाले हार्डवेयर को पुनः प्राप्त करके पुन: प्रयोज्यता प्रक्षेपण लागत को 5-20 गुना तक कम कर देती है, जिससे बार-बार मिशन और मानव अंतरिक्ष उड़ान आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो जाती है।
  • रॉकेट का द्रव्यमान और ईंधन की सीमाएँ: त्सिओलकोव्स्की रॉकेट इक्वेशन दर्शाता है कि रॉकेट के द्रव्यमान का 90% से अधिक भाग प्रणोदक होता है, जिससे अक्षमता उत्पन्न होती है जिसे चरण प्रक्रिया और पुन: प्रयोज्य पुनर्प्राप्ति कम करने में सहायक होती है।
  • संधारणीयता: पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान, रॉकेटों को एक बार उपयोग होने वाली प्रणालियों से परिवहन संपत्तियों में बदल देते हैं, जिससे अपशिष्ट कम होता है, प्रक्षेपण लागत कम होती है और अंतरिक्ष में मानव की बार-बार पहुँच संभव हो पाती है।
    • चरण आधारित पुनर्प्राप्ति से समुद्री मलबे और विनिर्माण अपशिष्ट में कमी आती है, जिससे बढ़ती प्रक्षेपण माँग के बीच सतत् अंतरिक्ष पहुँच को बढ़ावा मिलता है।
  • रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता: पुन: उपयोग योग्य प्रणालियाँ प्रक्षेपण की गति बढ़ाती हैं और विकसित हो रहे वैश्विक अंतरिक्ष परिवहन बाजार में पेलोड लचीलेपन को बढ़ाती हैं।

पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान डिस्पोजेबल रॉकेटों से परिवहन प्रणालियों की ओर एक प्रतिमान परिवर्तन का प्रतीक हैं, जो भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए आर्थिक और रणनीतिक अनिवार्यताओं के साथ इंजीनियरिंग नवाचार को जोड़ते हैं।

संदर्भ

हाल ही में भारत ने दक्षिण अफ्रीका के तट के पास आयोजित ‘ब्रिक्स नौसैनिक अभ्यास’ में अपनी गैर-भागीदारी को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह अभ्यास ब्रिक्स की कोई नियमित या संस्थागत गतिविधि नहीं थी।

संबंधित तथ्य

  • भारत ने आगे स्पष्ट किया कि इस संदर्भ में जिस नियमित अभ्यास में भारत भाग ले रहा है, वह IBSAMAR समुद्री अभ्यास है, जिसमें भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की नौसेनाएँ एक साथ भाग लेती हैं।

IBSAMAR समुद्री अभ्यास के बारे में

  • आरंभ: वर्ष 2008
  • सदस्य: भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका।
  • उद्देश्य: तीनों भागीदार नौसेनाओं के बीच अंतर-संचालनीयता बढ़ाना, परिचालन समन्वय में सुधार करना और सामंजस्य को मजबूत करना।
  • मुख्य क्षेत्र
    • समुद्री सुरक्षा
    • अंतरसंचालनीयता
    • समुद्री नौसैनिक युद्ध।
  • विशेषताएँ: बंदरगाह और समुद्री चरण, खेल गतिविधियाँ, क्रॉस-डेक भ्रमण, विशेष बलों का आदान-प्रदान।

‘ब्रिक्स नौसैनिक अभ्यास’ के बारे में

  • ब्रिक्स नौसैनिक अभ्यास एक गैर-संस्थागत समुद्री अभ्यास है, जिसमें चुनिंदा ब्रिक्स सदस्य और आमंत्रित भागीदार देश भाग लेते हैं और यह औपचारिक ब्रिक्स ढाँचे से बाहर आयोजित किया जाता है।
    • यह एक आधिकारिक ब्रिक्स अभ्यास नहीं है और इसे स्थायी संस्थागत दर्जा प्राप्त नहीं है।
  • मेजबान देश: दक्षिण अफ्रीका
  • भागीदार नौसेनाएँ: चीन, रूस, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और दक्षिण अफ्रीका
  • पर्यवेक्षक देश: ब्राजील, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया
  • गैर-भागीदार सदस्य: भारत और ब्राजील
  • स्थान: साइमन्स टाउन, दक्षिण अफ्रीका का मुख्य नौसैनिक अड्डा
  • विषय: ‘प्रमुख शिपिंग लेन और समुद्री आर्थिक गतिविधियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त कार्रवाई’।
  • उद्देश्य:ग्लोबल साउथ’ सहयोग के रूप में, प्रमुख शिपिंग लेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने और समुद्री आर्थिक गतिविधियों की रक्षा करने पर केंद्रित संयुक्त समुद्री अभियान चलाना।
  • महत्त्व
    • भारत की गैर-भागीदारी
      • चीन के नेतृत्व वाली पहलों के साथ रक्षा संबंधी सहयोग में रणनीतिक स्वायत्तता और सावधानी को दर्शाती है।
      • आर्थिक मंचों (ब्रिक्स) को सैन्य गुटों से अलग करने पर बल देती है।
    • आंतरिक विविधता: ब्रिक्स के भीतर मतभेदों को उजागर करती है, जो विकासोन्मुखी मंच के रूप में इसकी एकजुटता को चुनौती देती है।
    • ब्रिक्स प्लस का विस्तार: मुख्य सदस्यों से परे सहयोग का विस्तार विस्तारवादी उद्देश्य का संकेत देता है।

संदर्भ

भारतीय रिजर्व बैंक ने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) के लिए अनुपालन ढाँचे को मजबूत किया है ताकि दुरुपयोग को रोका जा सके और कृषि, एमएसएमई तथा कमजोर वर्गों जैसे प्राथमिकता क्षेत्रों को वास्तविक ऋण प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके।

प्राथमिक क्षेत्र ऋण (PSL) क्या है?

  • प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) आरबीआई द्वारा अनिवार्य एक ऋण नीति है, जो बैंकों को समावेशी और संतुलित आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को ऋण का एक निर्दिष्ट हिस्सा उधार देने का निर्देश देती है।
  • PSL का उद्देश्य
    • वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना।
    • कृषि, लघु एवं मध्यम उद्यमों, शिक्षा, आवास और निर्यात को समर्थन देना।
    • समाज के कमजोर वर्गों तक ऋण प्रवाह सुनिश्चित करना।
    • क्षेत्रीय और सामाजिक असमानताओं को कम करना।
  • PSL के अंतर्गत आने वाले प्रमुख क्षेत्र
    • कृषि
    • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME)
    • निर्यात ऋण
    • शिक्षा ऋण
    • आवास ऋण
    • सामाजिक अवसंरचना एवं नवीकरणीय ऊर्जा
    • कमजोर वर्ग (अनुसूचित/अनुसूचित जनजाति, स्वयं सहायता समूह, लघु एवं सीमांत किसान आदि)
  • मुख्य विशेषता: ऋण का उपयोग केवल अनुमोदित उद्देश्यों के लिए ही किया जाना चाहिए, और बैंकों को PSL  के रूप में योग्य होने के लिए अंतिम उपयोग की निगरानी करनी होगी।

संशोधित PSL मानदंडों के कारण

  • अतिवर्गीकरण: RBI ने हाल ही में कृषि ऋणों को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए गलत तरीके से वर्गीकृत किए जाने का पता लगाया है।
  • दोहरा वर्गीकरण: दोहरा वर्गीकरण होने की आशंकाएँ सामने आईं, जिसमें एक ही ऋण को एक से अधिक बैंकों द्वारा PSL के रूप में दावा किया जा रहा था।

प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) के संशोधित मानदंड

  • लेखा परीक्षक का अनिवार्य प्रमाणन: सभी मध्यस्थ ऋणदाताओं को बाह्य लेखा परीक्षक का प्रमाण-पत्र प्रदान करना होगा।
    • प्रमाण-पत्र में यह पुष्टि होनी चाहिए कि किसी अन्य बैंक द्वारा ऑन-लेंडिंग लाभों का दावा नहीं किया गया है।
  • बैंकों की उत्तरदायित्व सीमा में वृद्धि: सभी बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि PSL ऋणों का उपयोग केवल अनुमोदित उद्देश्यों के लिए ही किया जाए।
  • मध्यस्थ ऑन-लेंडिंग के लिए PSL सीमा: कृषि और MSMEs को ऑन-लेंडिंग के लिए NBFC को दिए गए ऋण:
    • पिछले वित्तीय वर्ष के बैंक के कुल PSL के 5% तक PSL के रूप में पात्र।
    • व्यक्तियों, स्वयं सहायता समूहों और संयुक्त जन समूह समूहों (कृषि, लघु व्यवसाय) को ऋण देने के लिए गैर-राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (NBFC-MFIs) को दिए गए ऋण, पिछले वित्तीय वर्ष के बैंक के कुल PSL के 10% तक PSL के रूप में पात्र हैं।
  • PSL के अंतर्गत नया समावेशन: सहकारी समितियों को (निर्दिष्ट उद्देश्यों के लिए) ऋण देने हेतु राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) को दिया गया बैंक ऋण अब PSL वर्गीकरण के लिए पात्र है।
  • निगरानी तंत्र: PSL अनुपालन की निगरानी त्रैमासिक आधार पर की जाएगी।

PSL के समग्र लक्ष्य

  • सभी PSL लक्ष्य समायोजित शुद्ध बैंक ऋण (ANBC) के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं।
  • घरेलू वाणिज्यिक बैंक और 20 से अधिक शाखाओं वाले विदेशी बैंक: ANBC का 40%
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB): ANBC का 75%
  • लघु वित्त बैंक (SFB): ANBC का 75% (पहले 70%) घटाकर 60% कर दिया गया है।
  • शहरी सहकारी बैंक (UCB): ANBC का 60%।
  • 20 से कम शाखाओं वाले विदेशी बैंक: अलग-अलग (अक्सर घरेलू बैंकों के साथ संरेखित, उप-लक्ष्य फोकस के साथ)।

समायोजित नेट बैंक क्रेडिट (ANBC)

  • ANBC भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित एक ऋण मानदंड है, जिसका उपयोग बैंकों के प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) लक्ष्यों की गणना के लिए किया जाता है।
  • ANBC, RBI के नियमों के अनुसार समायोजित, बैंक के कुल प्रभावी ऋण आधार (ऋण और कुछ अन्य देनदारियों) को दर्शाता है।
  • ANBC = शुद्ध बैंक ऋण + पात्र निवेश (RBI द्वारा निर्दिष्ट) – कुछ कटौतियाँ।

संदर्भ 

हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि ने राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए राज्यपाल के पारंपरिक भाषण को पढ़ने से इनकार कर दिया और विधानसभा से बाहर चले गए।

संबंधित तथ्य

  • राज्यपाल ने आरोप लगाया कि उनके पारंपरिक संबोधन से पहले राष्ट्रगान नहीं बजाया गया, और इसे भारत के संविधान और राष्ट्रगान का अपमान बताया।
  • अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि स्थापित प्रथा के अनुसार, सत्र की शुरुआत में राजकीय गान (तमिल थाई वाझथु) और सत्र के अंत में राष्ट्रगान बजाया जाता है।

राज्यपाल के संबोधन के बारे में

  • संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान अनुच्छेद-87 के तहत राष्ट्रपति और अनुच्छेद-176 के तहत राज्यपाल को विधानमंडल के सत्र को संबोधित करने का अधिकार देता है।
  • संबोधन का स्वरूप 
    • संबोधन एक अनिवार्य संवैधानिक रीति है, न कि राष्ट्रपति या राज्यपाल का विवेकाधीन अधिकार।
    • राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करता है, और संबोधन निर्वाचित सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं को दर्शाता है, न कि राज्यपाल के व्यक्तिगत विचारों को।
  • अवसर- अनुच्छेद-176: प्रत्येक आम चुनाव के बाद पहले सत्र के प्रारंभ में और प्रत्येक विधायी वर्ष के पहले सत्र के प्रारंभ में संबोधन देना अनिवार्य है।
    • विधान परिषद वाले राज्यों में, राज्यपाल दोनों सदनों को एक साथ संबोधित करता है।
  • संबोधन की विषयवस्तु
    • इस संबोधन में आगामी सत्र में सरकार द्वारा अपनाए जाने वाले विधायी प्रस्ताव और नीतिगत पहल शामिल हैं।
    • भाषण में पिछले वर्ष के दौरान सरकार की उपलब्धियों का विवरण भी दिया गया है।
    • अभिभाषण की तैयारी: अभिभाषण की सामग्री निर्वाचित सरकार द्वारा विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से प्राप्त सुझावों का उपयोग करके तैयार की जाती है।
  • राज्यपाल की भूमिका
    • अनुच्छेद-74 और 163 के तहत, राष्ट्रपति और राज्यपाल संवैधानिक रूप से मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं।

धन्यवाद प्रस्ताव

  • भाषण के बाद सदन के किसी सदस्य द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाता है।
  • धन्यवाद प्रस्ताव में संशोधन प्रस्तावित किए जा सकते हैं।
  • भाषण पर चर्चा से सरकारी नीतियों पर व्यापक बहस का अवसर मिलता है।
  • राज्यपाल इस बहस में भाग नहीं लेते हैं।

राष्ट्रपति/राज्यपाल के संबोधन का स्रोत

  • यूनाइटेड किंगडम – सम्राट का भाषण: यूनाइटेड किंगडम में, राजा का भाषण औपचारिक रूप से संसदीय वर्ष का शुभारंभ करता है और सरकार के विधायी कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका – स्टेट ऑफ द यूनियन: संयुक्त राज्य अमेरिका में, राष्ट्रपति ‘स्टेट ऑफ द यूनियन एड्रेस’ देते हैं, जिसमें वे कांग्रेस को नीतिगत प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय परिस्थितियों से अवगत कराते हैं।
  • वेस्टमिंस्टर मॉडल: भारत ने यूनाइटेड किंगडम में प्रचलित संसदीय लोकतंत्र के वेस्टमिंस्टर मॉडल से इस प्रथा को अपनाया।

न्यायिक व्याख्याएँ

  • अब्दुल गफूर हबीबुल्लाह मामला (1966): राज्यपाल भाषण देने से इनकार नहीं कर सकते है और अनुच्छेद-176 के तहत संवैधानिक कर्तव्य का पालन करने से मना नहीं कर सकते है।
  • योगेंद्र सिंह हांडा बनाम राजस्थान राज्य (1967): न्यायालय ने निर्णय दिया कि भाषण का आंशिक पठन संवैधानिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त है।
  • शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): राज्यपाल को सभी कार्यों में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना चाहिए, सिवाय कुछ विवेकाधीन मामलों के।
    • राज्यपाल कोई वैकल्पिक शक्ति केंद्र नहीं बल्कि एक संवैधानिक प्रमुख हैं।

भाषण देने से इनकार करने के संवैधानिक निहितार्थ

  • संवैधानिक संकट का खतरा: यदि राज्यपाल विधानसभा के अभिभाषण को अस्वीकार कर देते हैं या उसमें संशोधन करते हैं, तो इससे विधायिका के कामकाज में बाधा उत्पन्न होकर संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है।
  • अभिभाषण की अस्वीकृति अविश्वास प्रस्ताव के रूप में: राज्यपाल या राष्ट्रपति के अभिभाषण की अस्वीकृति को परंपरागत रूप से सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव माना जाता है।
  • इस्तीफे की स्थिति: ऐसी हार की स्थिति में आमतौर पर मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है, क्योंकि सदन में उनके पास बहुमत होता है।
  • लोकतांत्रिक अन्याय: राज्यपाल द्वारा मनमाने ढंग से शब्दों को जोड़ने या हटाने के कारण निर्वाचित सरकार को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करना अन्यायपूर्ण, अनैतिक तथा अलोकतांत्रिक होगा।
  • संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरा: ऐसे कार्यों से दायित्वपूर्ण शासन व्यवस्था कमजोर होती है और कार्यपालिका, विधायिका तथा राज्यपाल के बीच संवैधानिक संतुलन बिगड़ता है।

संदर्भ

ग्रीनलैंड को लेकर नाटो सहयोगियों पर रणनीतिक, आर्थिक और राजनयिक दबाव डालने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा हाल ही में किए गए प्रयास, गठबंधन-आधारित सुरक्षा और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की बहुपक्षीय व्यवस्था के भीतर गहरे तनाव का संकेत देते हैं।

मुख्य विकासक्रम

  • अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड का अधिग्रहण: यह मुद्दा नाटो सदस्य डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को हासिल करने में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई रुचि पर केंद्रित है।
  • दबाव के रूप में टैरिफ: ग्रीनलैंड के विरोध के चलते, अमेरिका ने हाल ही में 1 फरवरी, 2026 से अपने 8 नाटो सहयोगी देशों पर 10% अमेरिकी टैरिफ लगाए हैं।

  • समझौता या शुल्क: यदि अमेरिका ग्रीनलैंड का अधिग्रहण नहीं करता है, तो जून तक टैरिफ बढ़कर 25% हो जाएँगे।
  • सुरक्षा कवच: अमेरिका रूस-चीन के अतिक्रमण का हवाला देता है और आर्कटिक मिसाइल शील्ड (‘गोल्डन डोम’) का प्रस्ताव रखता है।

अमेरिका को ग्रीनलैंड की आवश्यकता क्यों ?

  • आर्कटिक में रणनीतिक स्थान: उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित ग्रीनलैंड आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए महत्त्वपूर्ण है, विशेष रूप से अटलांटिक महासागर में आवागमन और उभरते आर्कटिक समुद्री मार्गों की निगरानी के लिए।
  • प्राकृतिक संसाधन और महत्त्वपूर्ण खनिज: ग्रीनलैंड में दुर्लभ मृदा तत्त्व (REE) के संभावित भंडार हैं, जैसे- यूरेनियम, लोहा, तेल और गैस।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका के पास वर्तमान में REE के लिए एक विश्वसनीय घरेलू आपूर्ति शृंखला नहीं है। चीन इस क्षेत्र में अग्रणी है, जो वैश्विक REE खनन का लगभग 60% और प्रसंस्करण का 90% से अधिक हिस्सा रखता है।
  • सैन्य और पूर्व चेतावनी महत्त्व: अमेरिका पिटुफिक अंतरिक्ष बेस (पूर्व में थुले एयरबेस) का संचालन करता है, जो मिसाइल पूर्व चेतावनी प्रणालियों, अंतरिक्ष निगरानी और आंतरिक सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है तथा अमेरिकी एवं नाटो रक्षा संरचना का एक प्रमुख हिस्सा है।
  • आर्कटिक भू-राजनीति और जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से नए जहाजरानी मार्ग और रणनीतिक क्षेत्र खुल रहे हैं, जिससे आर्कटिक भू-राजनीति में ग्रीनलैंड का महत्त्व बढ़ रहा है।
  • महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता (अमेरिका-रूस-चीन): अमेरिका, रूस के आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते सैन्यीकरण और चीन की बढ़ती वाणिज्यिक और रणनीतिक उपस्थिति को नाटो के उत्तरी हिस्से के लिए खतरा मानता है, जिससे ग्रीनलैंड शक्ति प्रतिस्पर्द्धा का केंद्र बन गया है।
  • अमेरिका की दीर्घकालिक सैन्य उपस्थिति: वर्ष 1951 के अमेरिका-डेनमार्क रक्षा समझौते के तहत, अमेरिका को ग्रीनलैंड में व्यापक रक्षा अधिकार प्राप्त हैं और उसके पहले से ही 17 सैन्य अड्डे वहाँ उपस्थित हैं, जो ग्रीनलैंड में उसकी गहरी ऐतिहासिक भागीदारी को दर्शाते हैं।
  • अमेरिकी रणनीतिक हितों की निरंतरता: पिछली अमेरिकी सरकारों ने भी ग्रीनलैंड को हासिल करने का प्रयास किया था, जो दर्शाता है कि वर्तमान कदम किसी आकस्मिक नीतिगत परिवर्तन के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड को प्राप्त करने के पिछले प्रयास

  • वर्ष 1867-1868: अलास्का खरीद के पश्चात् 
    • रूस से अलास्का खरीदने के बाद, विदेश मंत्री विलियम एच. सेवर्ड ने ग्रीनलैंड को हासिल करने की संभावनाओं का पता लगाया।
  • वर्ष 1910: भूमि की अदला-बदली का प्रस्ताव
    • राष्ट्रपति विलियम हावर्ड टैफ्ट के कार्यकाल में, अमेरिकी राजनयिकों ने भूमि विनिमय योजना का प्रस्ताव रखा।
    • अन्य क्षेत्रों में रियायतों के बदले ग्रीनलैंड को अमेरिका को हस्तांतरित किया जाना था।
  • वर्ष 1946: ट्रूमैन का 100 मिलियन डॉलर का प्रस्ताव
    • शीतयुद्ध की शुरुआत में, राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के प्रशासन ने औपचारिक रूप से डेनमार्क को ग्रीनलैंड के बदले 100 मिलियन डॉलर का स्वर्ण देने की पेशकश की।

नाटो पर अमेरिकी कदम का प्रभाव

  • गठबंधन के भीतर दबाव: नाटो सहयोगियों के विरुद्ध शुल्क, राजनीतिक दबाव और रणनीतिक धमकियों का उपयोग गठबंधन के मूल सिद्धांत, पारस्परिक विश्वास और स्वैच्छिक सहयोग को चुनौती देता है, जिससे आंतरिक कलह उत्पन्न होती है।
  • सामूहिक रक्षा विरोधाभास (अनुच्छेद-5): नाटो का अनुच्छेद-5 बाहरी शत्रुओं के हमलों से निपटने के लिए बनाया गया था, न कि आंतरिक विवादों के लिए।
    • डेनमार्क ने संकेत दिया है कि यदि ग्रीनलैंड को खतरा होता है तो वह अनुच्छेद-5 का सहारा ले सकता है, जिससे गठबंधन के भीतर कानूनी और राजनीतिक अनिश्चितता उत्पन्न हो जाती है।
    • अनुच्छेद-5 का सहारा लेने से पूर्व, डेनमार्क अनुच्छेद-4 का सहारा ले सकता है, जो किसी सदस्य देश की क्षेत्रीय अखंडता या सुरक्षा को खतरे में होने पर परामर्श अनिवार्य करता है।
  • राजनीतिक और नैतिक अपेक्षाओं का उल्लंघन: डेनमार्क एक विश्वसनीय नाटो सहयोगी रहा है, जिसने सैनिकों और बलिदानों का योगदान दिया है (उदाहरण के लिए, 9/11 के बाद अफगानिस्तान में 43 सैनिक शहीद हुए)।
    • ग्रीनलैंड के विरुद्ध कोई भी अमेरिकी कदम, गठबंधन की एकजुटता की नैतिक और राजनीतिक अपेक्षाओं के विपरीत होगा।
  • नाटो की विश्वसनीयता और प्रतिरोधक क्षमता के लिए खतरा: गठबंधन के मानदंडों को कमजोर करने वाली कार्रवाइयाँ नाटो की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकती हैं, जिससे बाहरी शत्रुओं के लिए इसकी विश्वसनीयता कम हो सकती है।

उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के बारे में

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ से उत्पन्न सुरक्षा खतरे का सामना करने और यूरोप में और अधिक अस्थिरता को रोकने के लिए 4 अप्रैल, 1949 को नाटो की स्थापना की गई थी।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच सामूहिक रक्षा और अंतर-अटलांटिक राजनीतिक-सैन्य सहयोग को संस्थागत रूप देना था।
  • सदस्यता: गठबंधन की शुरुआत 12 संस्थापक सदस्यों के साथ हुई और धीरे-धीरे बढ़कर 32 सदस्य हो गए (मार्च 2024 तक), जो इसकी निरंतर रणनीतिक प्रासंगिकता को दर्शाता है।
    • अल्बानिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, कनाडा, क्रोएशिया, चेकिया, डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्राँस, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, आइसलैंड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, मोंटेनेग्रो, उत्तरी मैसेडोनिया, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, स्वीडन, नीदरलैंड, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका।
  • मुख्यालय: बेल्जियम के ब्रुसेल्स में नाटो का मुख्यालय।
  • नाटो की मुख्य भूमिका और उद्देश्य
    • सामूहिक रक्षा (अनुच्छेद-5): नाटो का आधार अनुच्छेद-5 है, जिसमें कहा गया है कि किसी एक सहयोगी पर हमला सभी सहयोगियों पर हमला माना जाएगा, जो गठबंधन का प्राथमिक निवारक है।
    • सुरक्षा परामर्श (अनुच्छेद-4): अनुच्छेद-4 सदस्यों को साझा सुरक्षा चिंताओं के मामलों पर परामर्श करने में सक्षम बनाता है, जिससे नाटो की भूमिका क्षेत्रीय रक्षा से परे विस्तारित होती है।
    • विस्तारित सुरक्षा अधिदेश: नाटो का मिशन यूरोप से परे आतंकवाद-विरोधी, साइबर सुरक्षा, समुद्री डकैती, शांति स्थापना और संकट प्रबंधन को शामिल करने के लिए विकसित हुआ है।
  • परिचालनात्मक भूमिका और मिशन
    • क्षेत्रीय अभियान: नाटो ने अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (ISAF) का नेतृत्व किया और कोसोवो, बाल्कन और भूमध्य सागर में भी अभियान चलाए हैं।
    • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: गठबंधन संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित करता है, अंतर-संचालनीयता को मजबूत करता है और संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ जैसे सहयोगी संगठनों को सहयोग प्रदान करता है।
  • उत्तर अटलांटिक परिषद (NAC): NAC नाटो का प्रमुख राजनीतिक निर्णय लेने वाला निकाय है, जहाँ सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व होता है और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, जिससे संघर्ष प्रबंधन के लिए एक राजनीतिक मंच के रूप में नाटो की भूमिका मजबूत होती है।
  • वित्तपोषण तंत्र
    • साझा वित्तीय उत्तरदायित्व: सदस्य देश सकल राष्ट्रीय आय (GNI) के आधार पर नाटो के मुख्यालय, कमान संरचनाओं, मिशनों और संयुक्त उपकरणों के वित्तपोषण में योगदान करते हैं।
    • सैन्य योगदान: प्रत्येक देश केवल वित्तीय भुगतानों पर निर्भर रहने के बजाय, सैनिकों, क्षमताओं और रक्षा व्यय में भी योगदान देता है।
    • संयुक्त नवाचार पहल: नाटो अनुसंधान और उभरती रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए बहुराष्ट्रीय निधियों का समर्थन करता है।

नाटो की समकालीन प्रासंगिकता

  • अंतर-अटलांटिक सुरक्षा का स्तंभ: समन्वित रक्षा योजना और संयुक्त तैयारी के माध्यम से यूरो-अटलांटिक स्थिरता सुनिश्चित करता है।
  • सामूहिक रक्षा (अनुच्छेद-5): प्रतिरोध को मजबूत करता है और छोटे राज्यों को आश्वस्त करता है।
  • रूस के विरुद्ध रोकथाम: यूक्रेन युद्ध के बाद, नाटो ने पूर्वी यूरोप में तैनाती और सक्रियता बढ़ा दी है।
  • नए सुरक्षा क्षेत्र: साइबर, अंतरिक्ष और हाइब्रिड खतरों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, आधुनिक संघर्ष के अनुकूल होना।

नाटो के सामने प्रमुख चुनौतियाँ

  • ट्रंप के टैरिफ और ग्रीनलैंड का संबंध
    • सहयोगी देशों पर आर्थिक दबाव: यूरोपीय नाटो सदस्यों पर अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ ने गठबंधन के भीतर सीधे संघर्ष की आशंका उत्पन्न कर दी है।
    • ग्रीनलैंड से संबंध: विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, ये टैरिफ ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के दबाव से जुड़े थे, जबकि यूरोपीय देशों का दावा है कि ग्रीनलैंड पहले से ही नाटो की सामूहिक सुरक्षा ढाँचे के अंतर्गत आता है।
  • शक्तिशाली सदस्यों द्वारा एकतरफा कार्रवाई: प्रमुख सदस्यों द्वारा एकतरफा रूप से की गई कार्रवाइयाँ सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती हैं, जो नाटो के कामकाज और वैधता के लिए केंद्रीय है।
  • आंतरिक राजनीतिक विभाजन और विश्वास की कमी: सदस्यों के बीच खतरे की धारणाओं और घरेलू राजनीति में अंतर ने विश्वास की कमी पैदा कर दी है, जिससे एकता और समन्वित प्रतिक्रियाएँ प्रभावित हो रही हैं।
  • गठबंधन के भीतर विवादों का प्रबंधन: नाटो के पास अपने सदस्यों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए स्पष्ट संस्थागत तंत्रों का अभाव है, जिससे आंतरिक संकटों का प्रबंधन करना कठिन हो जाता है।
  • अमेरिकी नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भरता: सैन्य क्षमताओं और नेतृत्व के लिए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता गठबंधन के अंतर्गत चुनौतियों को साझा करने और रणनीतिक स्वायत्तता के बारे में चिंताएँ बढ़ाती है।
  • आर्कटिक जैसे उभरते रणनीतिक मोर्चे: आर्कटिक क्षेत्र में नाटो की बढ़ती भागीदारी ने एक स्पष्ट शासन और सुरक्षा ढाँचे के विकास को पीछे छोड़ दिया है, जिससे रणनीतिक अस्पष्टता बढ़ गई है।

नाटो के लिए सुधार की प्राथमिकताएँ

  • संप्रभुता और गैर-दबाव नीति की पुष्टि: नाटो को आपसी विश्वास बनाए रखने के लिए सदस्यों के बीच संप्रभुता के सम्मान और गैर-दबावपूर्ण व्यवहार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दोहराना चाहिए।
  • विवाद-समाधान तंत्रों का संस्थागतकरण: विवाद-समाधान के लिए औपचारिक आंतरिक तंत्र विकसित करने से गठबंधन के भीतर संघर्षों को बिना बढ़ाए प्रबंधित करने में मदद मिलेगी।
  • यूरोपीय रक्षा क्षमता को मजबूत करना: नाटो संरचनाओं के भीतर यूरोपीय सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने से गठबंधन की एकता बनाए रखते हुए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सकती है।
  • एक सुसंगत आर्कटिक सुरक्षा सिद्धांत विकसित करना: प्रतिस्पर्द्धा का प्रबंधन करने और क्षेत्रीय स्थिरता की रक्षा के लिए एक स्पष्ट और साझा आर्कटिक रणनीति आवश्यक है।

बहुपक्षवाद का संकट और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था

  • गठबंधन आधारित और बहुपक्षीय व्यवस्था का क्षरण: ग्रीनलैंड संकट युद्धोत्तर गठबंधन और बहुपक्षीय व्यवस्था के कमजोर होने का संकेत देता है।
    • यह नियम-आधारित, संस्था-संचालित सहयोग से एकतरफा और शक्ति-प्रेरित व्यवस्थाओं की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।
  • प्रतिद्वंद्वी शक्तियों को सामरिक लाभ: रूस नाटो में स्पष्ट विभाजन का लाभ उठा रहा है, जो पश्चिमी एकता को कमजोर करने के उसके उद्देश्य के अनुरूप है।
    • चीन आंतरिक दरारों का लाभ उठाकर अपना सामरिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ा रहा है, विशेष रूप से आर्कटिक जैसे विवादित क्षेत्रों में।
  • आर्कटिक में सैन्यीकरण में तेजी: बढ़ते तनाव से आर्कटिक में सैन्य निर्माण में तेजी आ रही है, जिससे पहले कम संघर्ष वाले क्षेत्र में गलत अनुमान, दुर्घटनाओं और संघर्ष बढ़ने का खतरा बढ़ रहा है।
  • परमाणु प्रसार के बढ़ते खतरे: कमजोर नाटो सहयोगियों के बीच सुरक्षा संबंधी चिंताओं को जन्म दे सकता है, जिससे जर्मनी, पोलैंड, कनाडा, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को परमाणु प्रतिरोध पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे एक नई हथियारों की होड़ प्रारंभ हो सकती है।

वैश्विक व्यवस्था के विखंडन में भारत की रणनीतिक दुविधा

  • सहभागिता और बहुपक्षीय वैधता के बीच संतुलन बनाना
    • रणनीतिक चिंताएँ: भारत के सामने प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध स्थापित करने की चुनौती है, साथ ही उसे संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों की विश्वसनीयता भी बनाए रखनी है, जहाँ दीर्घकालिक सुधार और नेतृत्व की आवश्यकता है।
    • बहुपक्षीय रणनीति का पुनर्मूल्यांकन: शक्तिशाली देशों द्वारा वैश्विक संस्थानों की बढ़ती अनदेखी भारत को अपनी कूटनीति को अधिक शक्ति-प्रधान अंतरराष्ट्रीय प्रणाली के अनुरूप ढालने के लिए विवश करती है।
  • क्षेत्रीय और द्विपक्षीय विचारणीय बिंदु
    • पाकिस्तान का प्रभाव: पश्चिम एशिया और आर्कटिक में बदलते भू-राजनीतिक समीकरण क्षेत्रीय प्रभाव संतुलन को बदल सकते हैं, जिससे भारत के रणनीतिक हित बाधित हो सकते हैं।
    • टैरिफ का खतरा: भारत को कुछ क्षेत्रों में अमेरिका द्वारा 50% तक टैरिफ का सामना करना पड़ता है, जिससे व्यापार संबंध उसकी विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण कारक बन जाते हैं।
    • वीटो की होड़: बहुपक्षीय संस्थाओं के कमजोर होने से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए भारत के लंबे समय से चल रहे अभियान पर अप्रत्यक्ष रूप से असर पड़ सकता है।
  • वैश्विक सुरक्षा पर इसके सकारात्मक प्रभाव
    • नाटो का कमजोर होना: वैश्विक सुरक्षा खतरों के परस्पर संबंध को देखते हुए, नाटो और पश्चिमी गठबंधनों के भीतर अस्थिरता, अप्रत्यक्ष रूप से भारत के रणनीतिक वातावरण को प्रभावित करती है।
    • आर्कटिक और संसाधन संबंधी निहितार्थ: आर्कटिक में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा भविष्य के व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण खनिज भू-राजनीति को प्रभावित करती है, जो भारत की बढ़ती रुचि के क्षेत्र हैं।
  • मानक और रणनीतिक स्थिति निर्धारण
    • सामरिक स्वायत्तता: संप्रभुता, बहुपक्षवाद और नियम-आधारित व्यवस्था पर भारत का ज़ोर, दबावपूर्ण गठबंधन की राजनीति के विपरीत है, जो लचीली और मुद्दे-आधारित साझेदारियों के प्रति उसकी प्राथमिकता को सुदृढ़ करता है।
    • सामरिक अवसर: पश्चिमी देशों की अस्थिरता वैश्विक मामलों में भारत की कूटनीतिक लचीलेपन और गठबंधन-रहित, लक्षित साझेदारियों की प्रासंगिकता को उजागर करती है।

आगे की राह

  • नाटो और पश्चिमी गठबंधन के लिए
    • साझा सिद्धांतों पर गठबंधन को पुनः केंद्रित करना: नाटो को संप्रभुता और सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दोहराना चाहिए, जो गठबंधन की नैतिक और राजनीतिक नींव हैं।
    • संस्थागत कूटनीति के माध्यम से तनाव कम करना: आंतरिक मतभेदों को औपचारिक राजनीतिक परामर्श और मध्यस्थता तंत्र के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, एकतरफा दबाव या रणनीतिक धमकी से बचना चाहिए।
    • व्यापार और सुरक्षा उपकरणों का राजनीतीकरण न करना: टैरिफ और प्रतिबंध जैसे आर्थिक उपकरणों का प्रयोग सहयोगियों के विरुद्ध हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे विश्वास कम होता है और गठबंधन की एकता कमजोर होती है।
    • कानूनी और रणनीतिक सीमा रेखा स्पष्ट करना: नाटो को गठबंधन के भीतर आचरण के लिए स्पष्ट मानदंड विकसित करने चाहिए, जिसमें यह भी शामिल है कि आंतरिक संकटों में अनुच्छेद-5 कैसे लागू होता है, ताकि अस्पष्टता और तनाव बढ़ने से रोका जा सके।
    • सहयोगी आर्कटिक सुरक्षा ढाँचा विकसित करना: सैन्यीकरण और पारदर्शिता, विश्वास निर्माण और संयम पर केंद्रित एक साझा आर्कटिक सिद्धांत आवश्यक है।
  • अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए
    • अंतरराष्ट्रीय कानून की सर्वोच्चता को सुदृढ़ करना: राज्यों को क्षेत्रीय संप्रभुता और शांतिपूर्ण विवाद समाधान को बनाए रखना चाहिए, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न हो रही है।
    • बहुपक्षीय संघर्ष-प्रबंधन तंत्रों को मजबूत करना: वैश्विक और क्षेत्रीय संस्थानों को महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का प्रबंधन करने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए, जिससे गठबंधन टूटने का जोखिम कम हो सके।
  • भारत के लिए
    • मुद्दे-आधारित साझेदारियों के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना: भारत को कूटनीतिक स्वतंत्रता और रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए, लचीले और गठबंधन-रहित सहयोग के माध्यम से संबंधों में संतुलन बनाए रखना चाहिए।
    • आर्कटिक में रचनात्मक भागीदारी बढ़ाना: आर्कटिक शासन मंचों में सक्रिय भागीदारी से भारत को व्यापार मार्गों, ऊर्जा और महत्त्वपूर्ण खनिजों में अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।
    • वैश्विक शासन में सुधार का समर्थन करना: भारत अपनी कूटनीतिक क्षमता का उपयोग समावेशी और नियम-आधारित संस्थागत सुधारों का समर्थन करने के लिए कर सकता है, जिससे दबाव कम हो और सामूहिक सुरक्षा बढ़े।

निष्कर्ष

ग्रीनलैंड संकट और प्रस्तावित शांति बोर्ड, शक्ति-चालित वैश्विक राजनीति की ओर एक बदलाव को उजागर करते हैं, जो नाटो की एकजुटता और वर्ष 1945 के बाद की नियम-आधारित व्यवस्था की परीक्षा ले रहे हैं। दीर्घकालिक विश्वसनीयता अब एकता, विश्वास और संप्रभुता के सम्मान पर निर्भर करती है, जो हेडली बुल के इस विचार को रेखांकित करती है कि शक्ति को साझा नियमों और संस्थानों द्वारा संतुलित किया जाना चाहिए।

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