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Jan 24 2026

पराक्रम दिवस

हाल ही में प्रधानमंत्री ने पराक्रम दिवस 2026 पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को श्रद्धांजलि अर्पित की, जो उनके 129वें जन्म दिवस के अवसर पर मनाया गया।

  • पराक्रम दिवस हर वर्ष 23 जनवरी को उनके जन्मदिन के अवसर पर मनाया जाता है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में

  • सुभाष चंद्र बोस (वर्ष 1897–1945) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे, जिन्होंने क्रांतिकारी माध्यम से पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की।
  • प्रारंभिक जीवन और शिक्षा: 23 जनवरी, 1897 को कटक (ओडिशा) में जानकीनाथ बोस और प्रभाबती दत्त के घर जन्मे बोस ने रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल और प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता से पढ़ाई की।
    • बाद में वह कैंब्रिज विश्वविद्यालय गए, वर्ष 1920 में इंडियन सिविल सर्विसेज (ICS) की परीक्षा पास की, लेकिन वर्ष 1921 में राष्ट्रीयता की भावना और जलियाँवाला बाग हत्याकांड से प्रेरित होकर इस सेवा से इस्तीफा दे दिया।
  • स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: बोस का मानना था कि स्वतंत्रता केवल संवैधानिक साधनों से प्राप्त नहीं की जा सकती।
    • उनका नारा “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा” उनके क्रांतिकारी उत्साह को दर्शाता है। उन्होंने ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों और सशस्त्र संघर्ष की दिशा में प्रयास किए।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में भूमिका

  • भागीदारी: 1921 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) में शामिल हुए, चित्तरंजन दास के साथ मिलकर कार्य किया, असहयोग आंदोलन में भाग लिया, और एक प्रमुख युवा नेता के रूप में उभरे।
  • अध्यक्षता: उन्हें वर्ष 1938 में हरिपुरा में कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया और वर्ष 1939 में त्रिपुरी में पुनः निर्वाचित किया गया, जहाँ उन्होंने आर्थिक योजना तथा क्रांतिकारी कार्यों की वकालत की।
  • त्रिपुरी संकट: रणनीति और सत्ता के विषय में गांधीवादी नेतृत्व के साथ मतभेदों के कारण बोस ने वर्ष 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
    • डॉ. राजेंद्र प्रसाद को शेष कार्यकाल के लिए अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया।
  • राजनीतिक दल: वर्ष 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की, ताकि तत्काल स्वतंत्रता की माँग करने वाली क्रांतिकारी राष्ट्रवादी शक्तियों को एकजुट किया जा सके।
  • भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) में भूमिका: वर्ष 1943 में उन्होंने INA का नेतृत्व सँभाला और इसे आजाद हिंद फौज के रूप में पुनर्गठित किया।
    • आजाद हिंद फौज (भारतीय राष्ट्रीय सेना – INA) की स्थापना वर्ष 1942 में कैप्टन मोहन सिंह द्वारा मलाया में भारतीय युद्धबंदियों के साथ की गई थी।
  • भारत की मुक्ति: उन्होंने 21 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर में अस्थायी आजाद भारत सरकार (आजाद हिंद सरकार) की स्थापना की, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान निर्वासित सरकार के रूप में कार्यरत थी और इसे जापान तथा अन्य धुरी देशों का समर्थन प्राप्त था।
    • अस्थायी सरकार के प्रमुख के रूप में, बोस ने वर्ष 1943 में ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह को स्वतंत्र भारतीय क्षेत्र के रूप में घोषित किया।
    • उन्होंने भारत की ओर सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया और मॉइरांग तथा पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया।
  • साहित्यिक योगदान
    • द इंडियन स्ट्रगल (1935): भारत के स्वतंत्रता संग्राम (1920–1934) का विश्लेषण।
    • उन्होंने फॉरवर्ड और स्वराज (1921–22) जैसे समाचार-पत्रों का संपादन किया।
  • मृत्यु: कथित रूप से 18 अगस्त, 1945 को बोस का ताइवान में एक हवाई दुर्घटना में निधन हो गया, हालाँकि यह आज भी विवादित हैं।
  • विरासत: नेताजी साहसिक राष्ट्रवाद और अविचलित देशभक्ति के प्रतीक बने हुए हैं, जो कई पीढ़ियों को प्रेरित करते हैं; उनके सम्मान में 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है।

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (NLI) की प्रस्तावना 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में की गई थी। इसका उद्देश्य संसद एवं राज्य विधानसभाओं का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन और तुलना सक्षम बनाना है।

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (NLI) के बारे में

  • NLI भारत में विधायी निकायों के लिए प्रस्तावित प्रदर्शन मूल्यांकन और मानकीकरण ढाँचा है।
  • यह संसद (लोकसभा और राज्यसभा) तथा राज्य विधायी सभाओं/परिषदों के कार्यकलापों को मानकीकृत, डेटा-संचालित मापदंडों के माध्यम से वस्तुनिष्ठ रूप से मापने, तुलना करने और रैंकिंग करने का कार्य करेगा।
  • इसका उद्देश्य विधायी कार्य की उत्पादकता, दक्षता, पारदर्शिता और समग्र गुणवत्ता का आकलन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर का सूचकांक तैयार करना है।

उद्देश्य और लाभ

  • विधायिकाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना, ताकि उनके प्रदर्शन और नवाचार में सुधार हो सके।
  • संवाद, बहस और विधायी उत्पादन की गुणवत्ता को उन्नत बनाना।
  • मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से वर्ष 2047 तक विकसित भारत (Viksit Bharat) के व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य का समर्थन करना।
  • राज्यों और विधायिकाओं के बीच अंतर और सर्वोत्तम प्रथाओं को उजागर करके सहकर्मी अधिगम (peer learning) को प्रोत्साहित करना।

अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC)

  • अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) भारत की विधायी संस्थाओं के पीठासीन अधिकारियों के लिए राष्ट्रीय मंच है।
  • प्रतिभागी: यह सम्मेलन लोकसभा के अध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति या उपसभापति, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष, और विधान परिषदों के अध्यक्षों को एक मंच प्रदान करता है।

निकोबार जनजातीय परिषद

ग्रेट निकोबार द्वीप समूह की मेगा परियोजना को लेकर नए सिरे से विवाद खड़ा हो गया है क्योंकि निकोबार जनजातीय परिषद ने आरोप लगाया है कि जिला प्रशासन की ओर से उन पर पैतृक भूमि के लिए ‘सरेंडर सर्टिफिकेट’ पर हस्ताक्षर करने का दबाव डाला जा रहा है।

निकोबार जनजातीय परिषद के बारे में

  • निकोबार जनजातीय परिषद निकोबार द्वीपसमूह में आदिवासी निकोबारी समुदाय (अनुसूचित जनजाति) के लिए सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है।
  • विधिक दर्जा: इसकी स्थापना अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह (जनजातीय परिषद ) विनियमन, 2009 जैसे कानूनी नियमों के तहत की गई है।
  • यह आदिवासी अधिकार, संस्कृति, भूमि और कल्याण की रक्षा के लिए एक पारंपरिक और निर्वाचित शासन तंत्र के रूप में कार्य करता है।
  • संरचना और संगठन
    • ग्राम-स्तरीय आधार: प्रत्येक निकोबारी गाँव में एक ग्राम परिषद होती है, जिसका नेतृत्व लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कप्तान द्वारा किया जाता है।
    • जनजातीय परिषद स्तर: यह परिषद अपने क्षेत्राधिकार के गाँवों (लिटिल और ग्रेट निकोबार समूह) के कप्तानों से मिलकर बनती है।
      • वे एक मुख्य कप्तान/अध्यक्ष और उप मुख्य कप्तान/उपाध्यक्ष के साथ-साथ अन्य सदस्यों का चुनाव करते हैं।

प्रमुख दायित्व और अधिकार

  • पारंपरिक भूमि, पारंपरिक आजीविका और सांस्कृतिक प्रथाओं का संरक्षण करती है।
  • आदिवासी आरक्षित क्षेत्रों या भूमि को प्रभावित करने वाली परियोजनाओं के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) प्रदान करता है या रद्द कर सकती है।
  • सुरक्षा कानूनों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है: अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन, 1956, वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006, और सुनामी के बाद पुनर्वास संबंधी प्रतिबद्धताएँ।
  • यह अंडमान और निकोबार प्रशासन, केंद्र सरकार (जैसे, केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री, लेफ्टिनेंट गवर्नर) और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग (NCST) जैसे निकायों के साथ बातचीत में समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।
  • विकास परियोजनाओं में स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति का समर्थन करती है।

निवल  प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)

भारत का निवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नवंबर 2025 में लगातार चौथे माह नकारात्मक रहा, जिसमें निकासी प्रवाह $446 मिलियन से अधिक थी।

मुख्य बिंदु

  • निवल/शुद्ध FDI नकारात्मक रहा क्योंकि विदेशी कंपनियों ने उच्च मात्रा में पूँजी वापस भेजी और विनिवेश किया।
  • सकल प्रवाह $6.4 बिलियन पर मजबूत बना रहा (प्रत्येक वर्ष  22.5% की वृद्धि), जिसका नेतृत्व जापान, सिंगापुर और अमेरिका ने किया।
  • शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) भी वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक नकारात्मक रहे हैं, क्योंकि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और रूपए में कमजोरी ने निवेशकों के विश्वास को प्रभावित किया।
  • भारत में FDI के प्रमुख स्रोत: सिंगापुर, मॉरिशस, संयुक्त राज्य अमेरिका, नीदरलैंड्स, आदि।
  • FDI के प्रमुख गंतव्य राज्य: महाराष्ट्र (सबसे बड़ा हिस्सा), कर्नाटक, दिल्ली / NCR, गुजरात, और तमिलनाडु / तेलंगाना।
  • भारत में FDI प्राप्त करने वाले प्रमुख क्षेत्र: सेवाएँ (वित्त, बैंकिंग, बीमा), कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर, व्यापार, दूरसंचार, ऑटोमोबाइल और विनिर्माण।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के बारे में

  • FDI एक गैर-ऋण पूँजी प्रवाह है, जिसमें विदेशी निवेशक भारतीय उद्यमों में स्थायी हित और प्रबंधन नियंत्रण प्राप्त करते हैं, जो दीर्घकालिक आर्थिक विकास का समर्थन करता है।
  • निवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश  = सकल प्रवाह – पूँजी वापसी, विनिवेश, और बहिर्वाह  FDI।
    • विदेशी कंपनियों द्वारा की गई पूँजी की वापसी (Repatriation): विदेशी निवेशकों द्वारा भारत में अपनी गतिविधियों से प्राप्त लाभ, डिविडेंड या पूँजी को अपने मूल देश में वापस स्थानांतरित करना।
    • विनिवेश (Disinvestment): विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय फर्मों में अपने स्वामित्व हिस्सेदारी को आंशिक या पूर्ण रूप से बेचना या कम करना।
    •  बहिर्वाह  FDI (Outward FDI): भारतीय कंपनियों द्वारा भारत के बाहर स्थित व्यवसायों या संपत्तियों में किया गया निवेश।

द्वितीयक प्रदूषक

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के एक मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि द्वितीयक कणीय पदार्थ दिल्ली में शीत ऋतु में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक हैं, जो PM2.5 स्तर का 27% गठित करते हैं।

CAQM रिपोर्ट के मुख्य तथ्य 

  • दिल्ली में शीत ऋतु में होने वाले प्रदूषण में द्वितीयक कणीय पदार्थ प्रमुख हैं (27%), इसके बाद परिवहन (23%), जैविक ईंधन दहन (20%), धूल (15%), और उद्योग (9%) प्रमुख कारक हैं।
  • सर्दियों में PM2.5 का उच्च स्तर केवल सीधे उत्सर्जन के कारण नहीं, बल्कि वायुमंडलीय रासायनिक अभिक्रियाओं से उत्पन्न होता है।

द्वितीयक प्रदूषकों के बारे में

  • ये वायु प्रदूषक स्रोतों से सीधे उत्सर्जित नहीं होते, बल्कि वायुमंडल में प्राथमिक प्रदूषकों के साथ रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से बनते हैं।
  • द्वितीयक प्रदूषकों के उदाहरण: अमोनियम सल्फेट और अमोनियम नाइट्रेट।
    • ये यौगिक दिल्ली में सर्दियों के दौरान PM2.5 का प्रमुख हिस्सा बनाते हैं।
  • गठन
    • SO उत्सर्जन (मुख्यतः कोयला जलाने और ईंट भट्ठों से) एरोसोल सतहों पर ऑक्सीकरण और गैस-चरण प्रतिक्रियाओं के माध्यम से सल्फ्यूरिक एसिड (HSO) का निर्माण करते हैं।
    • इसके अलावा, NOx उत्सर्जन प्रकाश रासायनिकी और रात्रीकालीन ऑक्सीकरण के माध्यम से नाइट्रिक एसिड (HNO) का निर्माण करते हैं।
    • HSO और HNO दोनों अमोनिया (NH) के साथ अभिक्रिया करके अमोनियम सल्फेट और अमोनियम नाइट्रेट एरोसोल का निर्माण करते हैं।
  • अमोनिया की भूमिका: भारत में लगभग 80% अमोनिया उत्सर्जन उर्वरक के उपयोग और पशुपालन उपोत्पाद से उत्पन्न होता है, जिससे कृषि शहरी वायु प्रदूषण में का एक प्रमुख अप्रत्यक्ष कारक बन जाती है।
  • स्वास्थ्य प्रभाव: द्वितीयक PM2.5 कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश करते हैं, जिससे अस्थमा, COPD, फेफड़ों का कैंसर, हृदय और रक्त वाहिकाओं संबंधी रोगों, नेत्र संबंधी रोग और तीव्र श्वसन संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

संदर्भ 

भारत ने वर्ष 2026 के पहले ‘रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स’ (Responsible Nations Index) में वैश्विक स्तर पर 16वाँ स्थान प्राप्त किया है, जिसे पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा लॉन्च किया गया।

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स (RNI) के बारे में

  • यह एक वैश्विक रैंकिंग ढाँचा है, जिसका उद्देश्य यह मूल्यांकन करना है कि देश किस प्रकार उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से समाजों पर शासन करते हैं, पर्यावरण की रक्षा करते हैं और वैश्विक स्थिरता में योगदान देते हैं।
  • विकसितकर्ता: वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन (WIF)
    • शैक्षणिक सहयोग: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU)
    • पद्धतिगत सत्यापन: भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), मुंबई
  • मूल्यांकन ढाँचा: RNI तीन मूल जिम्मेदारियों पर आधारित है और इसे सात आयामों, 15 पहलुओं और 58 संकेतकों के माध्यम से लागू किया गया है::
    • आंतरिक जिम्मेदारी: नैतिक शासन, सामाजिक न्याय, समावेशिता
    • पर्यावरणीय जिम्मेदारी: स्थायित्व, जलवायु कार्रवाई, पारिस्थितिकी संरक्षण
    • बाह्य जिम्मेदारी: वैश्विक सहयोग, शांतिपूर्ण आचरण, मानवीय सहभागिता।

वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन (WIF) 

  • WIF एक ‘थिंक-एंड-डू’ टैंक है, जो विचारों को प्रभाव में बदलने के लिए कार्य करता है और शासन, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, सततता और सामाजिक-आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसे वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांत द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है।
  • उत्पत्ति: WIF का पंजीकरण 22 जनवरी, 2021 को किया गया।
  • मुख्यालय: नई दिल्ली, भारत।
  • उद्देश्य: उत्तरदायी वैश्विक शासन को बढ़ावा देना, अनुसंधान-आधारित नीति कार्यान्वयन का समर्थन करना, सामाजिक समावेशन और मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करना, तथा संवाद-आधारित वैश्विक मंचों के माध्यम से ज्ञान के आदान-प्रदान को सुगम बनाना।

  • रैंकिंग (RNI 2026): शीर्ष 5 देश
    1. सिंगापुर
    2. स्विट्जरलैंड
    3. डेनमार्क
    4. साइप्रस
    5. स्वीडन
  • भारत: 16वाँ स्थान (एशिया में शीर्ष स्थान)।
  • चीन: 68 | अमेरिका: 66 | पाकिस्तान: 90
  • अंतिम स्थान: सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक (154वाँ स्थान)

महत्त्व

  • यह GDP- और शक्ति-केंद्रित सूचकांकों से हटकर नैतिकता और जिम्मेदारी-आधारित मूल्यांकन की दिशा में एक मानक परिवर्तन को दर्शाता है।
  • यह नैतिक शासन, समावेशी विकास और पर्यावरणीय सततता को प्रोत्साहित करता है।
  • यह सतत् विकास लक्ष्य (SDGs), जलवायु उत्तरदायित्व और मानवीय शासन जैसे वैश्विक लक्ष्यों के साथ संरेखित है।
  • यह भारत को केवल शक्ति-साधक राज्य के बजाय एक जिम्मेदार वैश्विक अभिकर्ता के रूप में स्थापित करता है।

संदर्भ

विश्व आर्थिक मंच (WEF) स्विट्जरलैंड के दावोस में 19–23 जनवरी, 2026 के दौरान अपनी 56वीं वार्षिक बैठक आयोजित कर रहा है, जिसमें वैश्विक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक नेतृत्वकर्ता एकत्र होंगे।

विश्व आर्थिक मंच (WEF) के बारे में

  • स्थापना
    • वर्ष 1971 में एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी फाउंडेशन के रूप में स्थापित किया गया, जिसका एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण था कि व्यवसाय को केवल आर्थिक मूल्य सृजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज की सेवा करनी चाहिए और पृथ्वी की रक्षा करनी चाहिए।
    • यह मंच इस विचार को बढ़ावा देता है कि आर्थिक विकास को सामाजिक उत्तरदायित्व और पर्यावरणीय स्थिरता के साथ संरेखित होना चाहिए।
  • मुख्यालय: कोलोनी, स्विट्जरलैंड, तथा न्यूयॉर्क, सैन फ्राँसिस्को, बीजिंग और टोक्यो में अतिरिक्त कार्यालय।
  • संस्थापक
    • इस मंच की स्थापना जर्मन अर्थशास्त्री ‘क्लाउस श्वाब’ द्वारा की गई थी, प्रारंभ में इसे ‘यूरोपीय प्रबंधन मंच’ के रूप में जाना जाता था।
    • उनके अकादमिक योगदानों ने हितधारक पूँजीवाद (Stakeholder Capitalism), चौथी औद्योगिक क्रांति और कॉरपोरेट वैश्विक नागरिकता जैसी प्रभावशाली अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं।
  • अधिदेश का विकास
    • ब्रेटन वुड्स प्रणाली के पतन और वर्ष 1973 के अरब–इजरायल युद्ध ने मंच के फोकस को प्रबंधन संबंधी मुद्दों से आगे बढ़ाकर वैश्विक आर्थिक और सामाजिक शासन तक विस्तारित कर दिया।
    • वर्ष 1975: मंच ने अग्रणी वैश्विक निगमों के लिए सदस्यता प्रणाली शुरू की।
    • वर्ष 1987: इसे औपचारिक रूप से विश्व आर्थिक मंच नाम दिया गया।
    • वर्ष 2015: इसे आधिकारिक रूप से एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में मान्यता दी गई।
  • वित्तपोषण संरचना: WEF का वित्तपोषण मुख्य रूप से साझेदार बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा किया जाता है, जिनकी वार्षिक आय सामान्यतः 5 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होती है।
  • प्रशासनिक संरचना
    • ट्रस्टी बोर्ड: ‘बोर्ड’ का मार्गदर्शन एक ट्रस्टी बोर्ड द्वारा किया जाता है, जिसमें व्यापार, राजनीति, अकादमिक जगत और नागरिक समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होते हैं, जो व्यक्तिगत या व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधित्व किए बिना इसके मिशन और मूल्यों के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं।
    • प्रबंधन बोर्ड: अध्यक्ष की अध्यक्षता में प्रबंधन बोर्ड, मंच की कार्यकारी इकाई के रूप में कार्य करता है, इसके मिशन के साथ संरेखण सुनिश्चित करता है और संगठन का बाह्य प्रतिनिधित्व करता है।
    • प्रबंध निदेशक: प्रबंध निदेशक विशिष्ट विषयगत और रीजनल एरिया का प्रबंधन करते हैं और मंच के केंद्रों तथा पहलों में अपनी विशेषज्ञता का प्रयोग करते हैं।
    • कार्यकारी समिति: WEF की गतिविधियों का प्रबंधन एक कार्यकारी समिति द्वारा किया जाता है, जिसमें 30 से अधिक राष्ट्रों के नेता शामिल हैं, जो इसके वैश्विक चरित्र को दर्शाते हैं।
  • कूटनीति और वैश्विक सहयोग में भूमिका
    • WEF ने विश्वास-आधारित कूटनीति के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य किया है, जिसमें वर्ष 1988 में ग्रीस और तुर्किए के बीच संवाद को सुगम बनाना तथा नेल्सन मंडेला और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति एफ.डब्ल्यू. डी क्लार्क के बीच संवाद के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका के शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संक्रमण का समर्थन करना शामिल है।
  • वैश्विक स्वास्थ्य और विकास में योगदान: WEF ने GAVI वैक्सीन एलायंस की स्थापना के समर्थन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • समावेशी विकास के लिए पहलें
    • कौशल विकास क्रांति: इस पहल के माध्यम से WEF का उद्देश्य तकनीकी परिवर्तन के कारण उत्पन्न कौशल अंतराल को संबोधित करते हुए एक अरब लोगों को भविष्य के कार्य के लिए तैयार करना है।
    • EDISON एलायंस का उद्देश्य वर्ष 2025 तक, विशेष रूप से वंचित क्षेत्रों में, एक अरब लोगों तक डिजिटल समावेशन का विस्तार करना था।
  • बैठकें और सहभागिता मंच
    • WEF दावोस में वार्षिक बैठक और चीन में न्यू चैंपियंस की वार्षिक बैठक जैसी प्रमुख वैश्विक सभाओं का आयोजन करता है, जिनमें विभिन्न क्षेत्रों के नेता दीर्घकालिक वैश्विक चुनौतियों पर विचार-विमर्श करते हैं।
    • यह सतत् विकास प्रभाव बैठकों और उद्योग रणनीति बैठकों सहित विषयगत और क्षेत्रीय बैठकों की भी मेजबानी करता है, ताकि केंद्रित नीति संवाद को बढ़ावा दिया जा सके।
  • प्रमुख रिपोर्टें: ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट, फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट, ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट, ग्लोबल साइबरसिक्योरिटी आउटलुक तथा ग्लोबल को-ऑपरेशन बैरोमीटर आदि।
  • G20 की उत्पत्ति: वर्ष 1998 में, WEF ने वैश्विक आर्थिक शासन में प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे G20 के उद्भव में योगदान हुआ, जो प्रारंभ में वित्त मंत्रियों का एक मंच था और बाद में नेताओं के शिखर सम्मेलन के रूप में विकसित हुआ।
  • वर्ष 2026 की थीम: “अ स्पिरिट ऑफ डायलॉग” (A Spirit of Dialogue)

संदर्भ

कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) ने भारत के कौशल तथा तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण (TVET) पारितंत्र को सुदृढ़ करने के लिए विश्व आर्थिक मंच (WEF) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें कौशल केंद्र, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITIs) और पॉलिटेक्निक शामिल हैं, जो व्यावहारिक, रोजगारोन्मुख कौशल प्रदान करते हैं।

समझौता ज्ञापन (MoU) के बारे में

  • उद्देश्य 
    • बहुपक्षीय सहयोग को गहन करना: यह MoU कौशल विकास, व्यावसायिक शिक्षा और कार्यबल की तैयारी में सहयोग को मजबूत करने का लक्ष्य रखता है, ताकि भारत की कौशल पहलें वैश्विक श्रम बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप हों।
    • भविष्य के लिए तैयार कार्यबल: इसका उद्देश्य भारत को कौशल, प्रतिभा और नवाचार के एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना है, जो समावेशी और लचीली आर्थिक वृद्धि में योगदान देगा।
  • स्किल्स एक्सेलेरेटर की शुरुआत: MSDE और WEF संयुक्त रूप से एकस्किल्स एक्सेलेरेटर’ शुरू करेंगे।

स्किल्स एक्सेलेरेटर’ पहल के बारे में

  • प्लेटफॉर्म का स्वरूप: यह एक बहु-हितधारक मंच है, जिसे नवीन कौशल समाधान और सार्वजनिक–निजी भागीदारी की पहचान करने, उन्हें विस्तार देने और तेजी से आगे बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • फोकस क्षेत्र: यह एक्सेलेरेटर कौशल पहलों, उद्योग की माँग और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच बेहतर सामंजस्य सुनिश्चित करेगा, जिससे TVET पारितंत्र मजबूत होगा।
    • उभरते क्षेत्र: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा, रोबोटिक्स और उन्नत क्षेत्रों पर विशेष बल।
  • शासन और कार्यान्वयन ढाँचा
    • निगरानी तंत्र: कार्यान्वयन को सरकार और निजी क्षेत्र से सह-अध्यक्षों वाले एक शासन ढाँचे द्वारा निर्देशित किया जाएगा, जो WEF के सहयोग से कार्य करेगा।
    • MSDE की भूमिका: MSDE रणनीतिक दिशा निर्धारित करेगा, हितधारक सहभागिता का समन्वय करेगा और एक्सेलेरेटर की निगरानी तथा प्रभाव आकलन का नेतृत्व करेगा।
  • विजन @2047 और NEP 2020: यह पहल विजन @2047 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप है, जो आजीवन सीखने, अपस्किलिंग और रिस्किलिंग को बढ़ावा देती है।
  • हितधारक सहभागिता: MSDE उच्च शिक्षा संस्थानों, व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों और AICTE तथा UGC जैसे नियामकों के साथ निकटता से कार्य करेगा, ताकि एक्सेलेरेटर के प्रति जागरूकता, कार्यान्वयन और विस्तार को समर्थन दिया जा सके।
  • प्राथमिकता क्षेत्र: स्किल्स एक्सेलेरेटरभविष्य के कार्य’ (Future of Work) के क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेगा, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, हरित ऊर्जा, साइबर सुरक्षा और उन्नत विनिर्माण शामिल हैं।
  • नवाचार-आधारित गतिविधियाँ: हैकाथॉन, नवाचार चुनौतियाँ और एक संरचित कार्य योजना जैसी गतिविधियाँ नए कौशल मॉडलों के प्रयोग और अंगीकरण को समर्थन देंगी।
  • अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार के साथ संरेखण: यह पहल विभिन्न ट्रेड और रोजगार भूमिकाओं में उभरती वैश्विक माँग एवं आपूर्ति प्रवृत्तियों की पहचान करेगी, ताकि भारतीय प्रतिभा की अंतरराष्ट्रीय रोजगार-क्षमता बढ़ाई जा सके।
  • नवोन्मेषी वित्तपोषण: यह कौशल विकास के लिए नवोन्मेषी वित्तपोषण तंत्रों का समर्थन करेगी और सरकार, उद्योग तथा वैश्विक भागीदारों के बीच समन्वय में सुधार करेगी।
  • समग्र सरकारी दृष्टिकोण: यह MoU MSDE, विदेश मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय के बीच समन्वय को दर्शाता है, जिससे भारत के वैश्विक कौशल और व्यावसायिक शिक्षा एजेंडे को मजबूती प्राप्त होती है।

कौशल विकास और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • स्किल इंडिया मिशन (SIM) समग्र ढाँचा
    • इस मिशन के अंतर्गत, सरकार का उद्देश्य युवाओं को भविष्य-उन्मुख और उद्योग-प्रासंगिक कौशल से युक्त करना है।
    • यह मिशन कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) द्वारा देश-व्यापी कौशल विकास केंद्रों, संस्थानों और प्रशिक्षण भागीदारों के नेटवर्क के माध्यम से लागू किया जाता है, ताकि समाज के सभी वर्गों को कौशल, पुनः-कौशल और उन्नत-कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके।
  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY)
    • PMKVY अल्पकालिक प्रशिक्षण (STT) और पूर्व शिक्षण की मान्यता (RPL) पर केंद्रित है, ताकि युवाओं के कौशल का प्रमाणन और उन्नयन किया जा सके, जिसमें ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों के युवा भी शामिल हैं।
    • यह योजना रोजगार-क्षमता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए कार्यबल के ‘अपस्किलिंग’ और ‘रिस्किलिंग’ का समर्थन करती है।
  • जन शिक्षण संस्थान (JSS)
    • इस योजना का उद्देश्य 15–45 आयु वर्ग के अशिक्षित, नव-साक्षर, विद्यालय छोड़ने वाले (कक्षा XII तक) और सीमित शिक्षा वाले व्यक्तियों को व्यावसायिक कौशल प्रदान करना है, जिसमें दिव्यांगजन के लिए आयु में छूट दी जाती है।
    • यह योजना महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों और अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता देती है, विशेष रूप से ग्रामीण और शहरी निम्न-आय क्षेत्रों में, जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा मिलता है।
  • राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (NAPS)
    • यह योजना शिक्षुता अधिनियम, 1961 के तहत प्रतिष्ठानों को प्रशिक्षुओं को शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करके अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण को बढ़ावा देने का प्रयास करती है।
    • यह योजना नियोक्ताओं को वित्तीय सहायता प्रदान करती है और बुनियादी प्रशिक्षण को कार्यस्थल पर व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ जोड़ती है, जिससे उद्योग-शिक्षा संबंध मजबूत होते हैं।
  • शिल्पकार प्रशिक्षण योजना (CTS)
    • CTS विविध आर्थिक क्षेत्रों में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) के नेटवर्क के माध्यम से दीर्घकालिक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करती है।
    • इस योजना का उद्देश्य उद्योग के लिए एक कुशल कार्यबल तैयार करना है, साथ ही युवाओं के बीच स्व-रोजगार और उद्यमिता को भी बढ़ावा देना है।

संदर्भ

यूरोपीय संघ ने भारत के लिए सामान्यीकृत वरीयता योजना (GSP) के अंतर्गत दी जा रही शुल्क रियायतों को निलंबित कर दिया है, जिससे भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ेगा।

सामान्यीकृत वरीयता योजना (GSP) क्या है?

  • उद्गम: सामान्यीकृत वरीयता योजना की स्थापना वर्ष 1971 में संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन के तत्त्वावधान में विकासशील देशों के निर्यात को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की गई थी।
  • परिभाषा: सामान्यीकृत वरीयता योजना एक स्वैच्छिक व्यापार व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत विकसित देश, विकासशील देशों से आयातित वस्तुओं को वरीयतापूर्ण अथवा रियायती सीमा शुल्क उपाय प्रदान करते हैं।
  • शुल्क वरीयता: इस योजना के अंतर्गत लाभार्थी विकासशील देशों (BDCs) द्वारा निर्यातित चयनित उत्पादों पर सीमा शुल्क में आंशिक कमी या पूर्ण उन्मूलन की अनुमति दी जाती है।
  • वरीयता प्रदान करने वाले देश 
    • वर्तमान में 14 देश एवं समूह इस योजना के अंतर्गत वरीयता प्रदान करते हैं, जिनमें यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, न्यूजीलैंड, तुर्की, रूस आदि सम्मिलित हैं।
    • प्रत्येक देश अपनी पृथक योजना संचालित करता है, जिसमें उत्पाद की सीमा एवं पात्रता शर्तें भिन्न-भिन्न होती हैं।

मोस्ट फेवर्ड नेशन’ सिद्धांत  (MFN) ‘क्लॉज’ विश्व व्यापार संगठन का एक सिद्धांत है, जिसके अंतर्गत किसी देश द्वारा किसी अन्य देश को दी गई समान व्यापार वरीयताएँ (जैसे कम शुल्क या व्यापार लाभ) किसी तीसरे देश को दी गई वरीयताओं के समान ही देनी होती हैं।

भारतीय निर्यात पर प्रभाव

  • कवरेज: यूरोपीय संघ को भारत का लगभग 87% निर्यात अब पूर्ण मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) शुल्क का सामना करेगा।
  • शेष लाभ: लगभग 13% निर्यात, मुख्यतः चयनित कृषि उत्पाद, चमड़ा उत्पाद और हस्तशिल्प, GSP लाभ बनाए रखते हैं।
  • प्रभावित क्षेत्र: GSP लाभ लगभग सभी प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में वापस ले लिए गए हैं, जिनमें खनिज, रसायन, प्लास्टिक और रबर, वस्त्र और परिधान, पत्थर तथा सिरेमिक, कीमती धातुएँ एवं मशीनरी और इलेक्ट्रिक वस्तुएँ शामिल हैं।
  • परिधान और वस्त्र क्षेत्र: यह एक अत्यधिक मूल्य-संवेदनशील क्षेत्र है; शुल्क लाभ की हानि से प्रतिस्पर्द्धात्मकता कमजोर होने की संभावना है।
    • यूरोपीय संघ के खरीदार बांग्लादेश और वियतनाम की ओर स्थानांतरित हो सकते हैं, जिन्हें अब भी शुल्क-मुक्त या कम-शुल्क तक पहुँच प्राप्त है।

भारत – यूरोपीय संघ व्यापार

  • व्यापार मात्रा: वस्तुओं में द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2024–25 में 136.53 अरब डॉलर रहा।
    • निर्यात: 75.85 अरब डॉलर।
    • आयात: 60.68 अरब डॉलर।
  • यूरोपीय संघ का महत्त्व
    • भारत के कुल निर्यात का लगभग 17% हिस्सा।
    • यूरोपीय संघ का भारत को निर्यात उसके कुल विदेशी प्रेषण का लगभग 9% है।

संदर्भ

दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक, 2026 के इतर, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आगामी AI इंपैक्ट समिट से पूर्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और डीप-टेक नवाचार पर भारत की व्यापक रणनीति को रेखांकित किया।

AI इंपैक्ट समिट के उद्देश्य

  • प्रभाव पर फोकस: AI इंपैक्ट समिट का प्रमुख उद्देश्य यह प्रदर्शित करना है कि AI मॉडल, अनुप्रयोग और इकोसिस्टम किस प्रकार दक्षता बढ़ा सकते हैं, उत्पादकता में सुधार कर सकते हैं और आर्थिक वृद्धि के लिए गुणक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं।
  • ग्लोबल साउथ के लिए सुलभता: दूसरा उद्देश्य विशेष रूप से भारत और ग्लोबल साउथ के लिए सुलभता है। यह भारत की UPI और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) की सफलता से प्रेरणा लेते हुए यह तलाश करता है कि क्या इसी तरह का स्केलेबल और वहनीय AI स्टैक विकसित किया जा सकता है।
  • सुरक्षा और गार्डरेल्स: तीसरा उद्देश्य AI सुरक्षा है, जिसमें गार्डरेल्स, दिशा-निर्देश और सुरक्षा रूपरेखाएँ तैयार करने तथा भारत के भीतर AI नियामक और सुरक्षा स्टैक विकसित करने पर जोर दिया गया है।

भारत का स्टार्ट-अप और डीप-टेक इकोसिस्टम

  • स्टार्ट-अप वृद्धि का पैमाना: भारत में अब लगभग 2,00,000 स्टार्ट-अप हैं, जिससे यह वैश्विक स्तर पर शीर्ष तीन स्टार्ट-अप इकोसिस्टम में शामिल है।
  • चिप डिजाइन स्टार्ट-अप्स: 24 भारतीय स्टार्ट-अप चिप डिजाइन में संलग्न हैं, जो सबसे जटिल क्षेत्रों में से एक है। इनमें से 18 को पहले ही वेंचर कैपिटल फंडिंग प्राप्त हो चुकी है, जो निवेशकों के विश्वास को दर्शाता है।
  • डीप-टेक की ओर परिवर्तन: पिछले एक दशक में डीप-टेक नवाचार की ओर स्पष्ट परिवर्तन देखा गया है।

पाँच-स्तरीय ‘AI इकोसिस्टम’ ढाँचा

भारत की AI रणनीति पाँच परस्पर संबंधित लेयर्स’ पर आधारित है: अनुप्रयोग, मॉडल, सेमीकंडक्टर, अवसंरचना और ऊर्जा।

  • अनुप्रयोग ‘लेयर’: पहली लेयर’ वास्तविक उपयोग मामलों पर केंद्रित है, जिससे यह सुनिश्चित हो कि AI के विभिन्न अनुप्रयोग विभिन्न क्षेत्रों में व्यावहारिक चुनौतियों का समाधान करें।
    • अनुप्रयोग और उपयोग का स्तर सर्वाधिक निवेश प्रतिफल प्रदान करती है, जहाँ भारत अपने IT सेवा क्षेत्र का उपयोग कर एंटरप्राइज वर्कफ्लो’ में AI को तेजी से लागू कर रहा है।
  • मॉडल ‘लेयर’: दूसरी ‘लेयर’ एंटरप्राइज और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप AI मॉडलों के विकास से संबंधित है।
    • वर्तमान में लगभग 95 प्रतिशत AI वर्कलोड छोटे मॉडलों द्वारा प्रबंधित किए जा रहे हैं और अधिकांश एंटरप्राइज आवश्यकताओं के लिए 50-बिलियन-पैरामीटर मॉडल पर्याप्त हैं।
    • भारत लगभग 12 केंद्रित AI मॉडलों का एक समूह विकसित कर रहा है, जो कम लागत पर बड़े पैमाने पर तैनाती के लिए छोटे GPU क्लस्टरों पर संचालित होने में सक्षम हैं।
  • सेमीकंडक्टर ‘लेयर’: तीसरी ‘लेयर’ चिप्स और सेमीकंडक्टर विनिर्माण से संबंधित है, जो AI प्रणालियों के लिए संगणन क्षमता प्रदान करती है।
    • भारत अत्याधुनिक नोड्स की ओर बढ़ने से पहले 28nm से 90nm रेंज सेगमेंट के विनिर्माण को प्राथमिकता दे रहा है।
    • वैश्विक चिप वॉल्यूम का लगभग 75 प्रतिशत इसी रेंज में आता है, जिसका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, ऑटोमोबाइल, रेलवे, रक्षा, दूरसंचार उपकरण और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स में किया जाता है।
  • अवसंरचना ‘लेयर’: चौथी ‘लेयर’ डिजिटल अवसंरचना से संबंधित है, जिसमें डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग सुविधाएँ शामिल हैं।
    • भारत ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से एक साझा कंप्यूट प्लेटफॉर्म स्थापित किया है, जो लगभग 38,000 GPUs तक पहुँच प्रदान करता है।
    • अवसंरचना निवेश: लगभग 70 अरब अमेरिकी डॉलर का AI अवसंरचना निवेश पहले ही स्वीकृत हो चुका है और कार्यान्वयन के चरण में है।
    • उदाहरण के लिए, गूगल क्लाउड भारत के AI इकोसिस्टम के साथ अपनी भागीदारी को और गहरा कर रहा है, जिसमें आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में 15 अरब अमेरिकी डॉलर का AI डेटा सेंटर का निर्माण और भारतीय स्टार्ट-अप्स के साथ साझेदारियाँ शामिल हैं।
  • ऊर्जा ‘लेयर’: पाँचवीं ‘लेयर’ ऊर्जा है, जिसे सतत् AI विकास और उभरती पाँचवीं औद्योगिक क्रांति के लिए निर्णायक कारक माना गया है।
    • AI विकास के लिए ऊर्जा के महत्त्व को स्वीकार करते हुए, भारत ने शक्ति अधिनियम (Shakti Act) के माध्यम से परमाणु ऊर्जा को निजी भागीदारी के लिए उपलब्ध कराया है, जिससे पूरे AI इकोसिस्टम को समर्थन प्राप्त होता है।

इंडिया AI इंपैक्ट समिट के बारे में

  • आयोजक: इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY)
  • स्थान: नई दिल्ली, फरवरी 2026
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य उत्तरदायी, समावेशी और विकास-केंद्रित AI सहयोग को बढ़ावा देना है, जिसमें ग्लोबल साउथ’ पर विशेष बल दिया गया है।
  • यह G20 AI सिद्धांतों, संयुक्त राष्ट्र और GPAI प्रस्तावों, अफ्रीकन डिक्लेरेशन ऑन AI और ‘हैम्बर्ग डिक्लेरेशन ऑन रिस्पॉन्सिबल AI’ जैसे मौजूदा वैश्विक प्रयासों पर आधारित है।
  • थीम: डेमोक्रेटाइजिंग AI, ब्रिजिंग द AI डिवाइड’
  • AI इंपैक्ट समिट शृंखला का यह चौथा आयोजन होगा, इससे पूर्व:
    • ब्लेचली पार्क समिट (यूके, 2023)
    • सियोल समिट (दक्षिण कोरिया, 2024)
    • AI एक्शन समिट (पेरिस, फ्राँस, 2025)।
  • वैचारिक ढाँचा
    • इंडिया AI इंपैक्ट समिट तीन मूल ‘सूत्रों’ पर आधारित है—सूत्र’ एक संस्कृत शब्द है, जो ज्ञान और क्रिया को जोड़ने वाले मार्गदर्शक सिद्धांतों को दर्शाता है।
    • ये स्तंभ यह रेखांकित करते हैं कि बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग साझा वैश्विक लाभ के लिए कैसे किया जा सकता है।
      • पीपुल: मानव-केंद्रित, समावेशी, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और रिस्पॉन्सिबल AI’ को बढ़ावा देता है।
      • प्लैनेट: जलवायु कार्रवाई, स्थिरता और कम ऊर्जा उपयोग के अनुरूप ‘रिस्पॉन्सिबल AI’ की वकालत करता है।
      • प्रोग्रेस: स्वास्थ्य, शिक्षा, शासन, कृषि और सार्वजनिक सेवाओं में AI-आधारित समान विकास पर केंद्रित है।
  • संचालनात्मक ढाँचा: सात चक्र
    • इन सूत्रों को सात चक्रों के माध्यम से क्रियान्वित किया जाता है, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग और ठोस AI परिणामों के लिए प्राथमिकता आधारित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

संदर्भ

हाल ही में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) ने औपचारिक रूप से मिलिट्री क्वांटम मिशन (MQM) नीति ढाँचा जारी किया।

  • यह ढाँचा विभिन्न सरकारी क्षेत्रों के सदस्यों से युक्त समर्पित शासी निकायों के माध्यम से नागरिक-सैन्य एकीकरण पर जोर देता है।

मिलिट्री क्वांटम मिशन (MQM) नीतिगत ढाँचे के बारे में

  • यह आधुनिक युद्ध के तेजी से बदलते परिदृश्य में निर्णायक बढ़त और तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करने के उद्देश्य से भारतीय सशस्त्र बलों में क्वांटम प्रौद्योगिकियों के एकीकरण के लिए एक व्यापक रणनीति और समयबद्ध रोडमैप स्थापित करता है।
  • चार मूलभूत स्तंभ
    • क्वांटम संचार: इसमें क्वांटम कुंजी वितरण (QKD) का उपयोग करके लगभग अभेद्य संचार चैनल बनाए जाते हैं।
      • पारंपरिक एन्क्रिप्शन के विपरीत, क्वांटम सिग्नल को इंटरसेप्ट करने का कोई भी प्रयास इसकी स्थिति को बदल देता है, जिससे उपयोगकर्ताओं को तुरंत अलर्ट मिल जाता है और इस प्रकार सूचना सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
      • क्वांटम कुंजी वितरण (QKD) एक सुरक्षित संचार तकनीक है, जो क्वांटम यांत्रिकी के सिद्धांतों का उपयोग करके दो पक्षों के बीच एन्क्रिप्शन कुंजी उत्पन्न और साझा करती है।
    • क्वांटम कंप्यूटिंग: यह स्तंभ कॉम्प्लेक्स बैटलफील्ड सिमुलेशन उन्नत क्रिप्टो विश्लेषण (विरोधी कोड को तोड़ने) के लिए आवश्यक अपार प्रसंस्करण शक्ति पर केंद्रित है।
      • यह बड़े पैमाने पर सैन्य गतिविधियों के लिए रसद और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन को अनुकूलित करता है।
    • क्वांटम संवेदन और मेट्रोलॉजी: ये प्रौद्योगिकियाँ अति-उच्च परिशुद्धता पहचान प्रदान करती हैं।
      • क्वांटम सेंसर गुरुत्वाकर्षण में सूक्ष्म परिवर्तनों (गुरुत्वाकर्षण मापन) को मापकर पनडुब्बियों का पता लगा सकते हैं या उन वातावरणों में स्थिति निर्धारण, नेविगेशन और समय निर्धारण (PNT) की अनुमति दे सकते हैं, जहाँ GPS सिग्नल जाम या अनुपलब्ध हैं।
    • क्वांटम सामग्री और उपकरण: इसमें सुपरकंडक्टिंग सर्किट और टोपोलॉजिकल इंसुलेटर जैसे विशेष हार्डवेयर का स्वदेशी विकास शामिल हैं।
      • ये अगली पीढ़ी के सेंसर, स्टील्थ-काउंटर सिस्टम और उच्च-क्षमता वाले रक्षा प्लेटफॉर्मों की आधारशिला हैं।

PWOnlyIASविशेष

क्वांटम कंप्यूटिंग के बारे में

  • क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम यांत्रिकी के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए, पारंपरिक कंप्यूटरों की तुलना में मौलिक रूप से भिन्न तरीकों से सूचना को संसाधित करती है।
  • पारंपरिक और क्वांटम कंप्यूटिंग में अंतर: पारंपरिक कंप्यूटर डेटा की सबसे छोटी इकाई के रूप में बिट्स (जो 0 या 1 हो सकते हैं) का उपयोग करते हैं, जबकि क्वांटम कंप्यूटर क्वांटम बिट्स (क्यूबिट्स) का उपयोग करते हैं, जो एक साथ कई अवस्थाओं में मौजूद हो सकते हैं।
  • क्वांटम कंप्यूटिंग के मूल सिद्धांत
    • क्वांटम कंप्यूटिंग क्वांटम यांत्रिकी के तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है:
      • सुपरपोजिशन: क्वांटम कंप्यूटिंग में, एक क्यूबिट एक ही समय में 0 और 1 दोनों के सुपरपोजिशन में मौजूद हो सकता है।
        • इसका अर्थ है कि एक क्यूबिट एक साथ कई अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जिससे क्वांटम कंप्यूटर समानांतर रूप से बड़ी मात्रा में जानकारी संसाधित कर सकते हैं।
      • इनटैंगलमेंट: इनटैंगलमेंट एक ऐसी घटना है, जहाँ दो या दो से अधिक क्यूबिट आपस में इस प्रकार जुड़ जाते हैं कि एक क्यूबिट की अवस्था दूसरे क्यूबिट की अवस्था से सीधे संबंधित होती है, चाहे वे कितनी भी दूर क्यों न हों।
    • क्वांटम व्यतिकरण (Quantum Interference): क्वांटम कंप्यूटर सही समाधानों को बढ़ाने और गलत समाधानों को रद्द करने के लिए व्यतिकरण का उपयोग करते हैं।
    • क्यूबिट्स को सावधानीपूर्वक नियंत्रित करके, क्वांटम एल्गोरिदम सिस्टम को सबसे संभावित सही उत्तर की ओर निर्देशित कर सकते हैं।

राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM)

  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत वर्ष 2023 में ₹6,000 करोड़ के परिव्यय (2023-31) के साथ शुरू की गई इस परियोजना का उद्देश्य 50-1,000 क्यूबिट क्वांटम कंप्यूटर विकसित करना, 2,000 किलोमीटर से अधिक की सुरक्षित क्वांटम संचार व्यवस्था स्थापित करना और राष्ट्रीय क्वांटम नेटवर्क का निर्माण करना है।
    • यह मिशन क्वांटम कंप्यूटिंग, क्रिप्टोग्राफी और संचार के क्षेत्र में भारत के नेतृत्व को मजबूत करता है और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के विजन के अनुरूप है।

मिलिट्री क्वांटम मिशन नीति ढाँचे की आवश्यकता क्यों है?

  • पारंपरिक तकनीकों से क्वांटम तकनीकों की ओर परिवर्तन महज एक तकनीकी उन्नयन नहीं है; यह 21वीं सदी के युद्ध की बदलती प्रकृति से प्रेरित एक रणनीतिक आवश्यकता है:
    • हार्वेस्ट नाऊ, डिक्रिप्ट लेटर’ (HNDL) खतरों का मुकाबला: दुश्मन वर्तमान में एन्क्रिप्टेड सैन्य डेटा को इंटरसेप्ट और स्टोर कर रहे हैं, ताकि फाल्ट-टाॅलरेंट क्वांटम कंप्यूटर उपलब्ध होने पर इसे डिक्रिप्ट किया जा सके।
    • दीर्घकालिक राज्य रहस्यों की सुरक्षा के लिए पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) में तुरंत संक्रमण के लिए एक समर्पित नीति की आवश्यकता है।
    • पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) से तात्पर्य उन क्रिप्टोग्राफिक एल्गोरिदम से है, जो क्वांटम कंप्यूटरों द्वारा हमलों से सुरक्षित रहने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
  • स्टील्थ तकनीकों को निष्क्रिय करना: आधुनिक स्टील्थ विमानों और पनडुब्बियों के विरुद्ध पारंपरिक रडार और सोनार की क्षमता तेजी से सीमित होती जा रही है।
    • क्वांटम रडार और क्वांटम ग्रेविमेट्री में वर्तमान स्टील्थ प्लेटफॉर्मों को दृश्यमान बनाने की क्षमता है, जिससे एक ऐसी नीति की आवश्यकता होती है, जो भारत को इस पहचान की परिधि में आक्रामक पक्ष को बनाए रखने में मजबूत करे।
  • GPS-बाधित वातावरण में नेविगेशन: आधुनिक संघर्ष क्षेत्रों में अक्सर भारी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (EW) और GPS जैमिंग का खतरा रहता है।
    • MQM फ्रेमवर्क ऐसे पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग (PNT) सिस्टम को प्राथमिकता देता है, जो उपग्रहों पर निर्भर नहीं होते, जिससे “ब्लाइंड” क्षेत्रों में परिचालन निरंतरता सुनिश्चित होती है।
  • निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज करना (OODA Loop): उच्च तीव्रता वाले युद्ध में, ऑब्जर्व-ओरिएंट-डिसाइड-एक्ट (OODA) चक्र की गति महत्त्वपूर्ण होती है। क्वांटम कंप्यूटिंग ड्रोन और उपग्रहों से प्राप्त विशाल डेटासेट को वास्तविक समय में संसाधित कर सकती है, जिससे कमांडरों को पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी प्राप्त होती है।
  • क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिवर्तनों का समाधान: चीन जैसे पड़ोसी देशों द्वारा क्वांटम-सुरक्षित उपग्रह संपर्क स्थापित किए जाने के बाद, भारत को “क्वांटम गैप” को रोकने के लिए एक औपचारिक ढाँचे की आवश्यकता है।
    • इससे हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) और इसकी सीमाओं पर रणनीतिक असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।

मिलिट्री क्वांटम प्रौद्योगिकी में वैश्विक पहल

राष्ट्र/ब्लाक प्राथमिक पहल
संयुक्त राज्य अमेरिका पेंटागन की “क्वांटम एंड बैटलफील्ड इन्फॉर्मेशन डोमिनेंस” (2025)
चीन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) का क्वांटम साइबर वारफेयर प्रोग्राम (2026)
यूरोपीय संघ क्वांटम सेंसिंग स्पेस एंड डिफेंस रोडमैप (2026)
नाटो इनॉगरल क्वांटम स्ट्रेटेजी  (2024)
यूनाइटेड किंगडम राष्ट्रीय क्वांटम प्रौद्योगिकी कार्यक्रम (NQTP) और रक्षा मंत्रालय (MoD) का क्वांटम रोडमैप (2023-2033)।

मिलिट्री क्वांटम मिशन (MQM) नीतिगत ढाँचे का महत्त्व

  • तकनीकी संप्रभुता: राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM) के साथ समंजस्य स्थापित कर, MQM यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय सशस्त्र बल महत्त्वपूर्ण सुरक्षा अवसंरचना के लिए विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) पर निर्भर न रहें, जिससे आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिले।
  • एकीकरण को मजबूत करना: यह ढाँचा सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच तालमेल पर जोर देता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि तीनों सेवाएँ मानकीकृत क्वांटम प्रोटोकॉल का उपयोग करें, जो एकीकृत थिएटर कमांड की सफलता के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • नागरिक-सैन्य एकीकरण: यह नीति रक्षा आवश्यकताओं और नागरिक विशेषज्ञता के बीच एक सेतु का निर्माण करती है। यह नवाचार को गति देने के लिए सरकार, शिक्षा जगत और निजी डीप-टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम के सदस्यों से गठित समर्पित शासी निकायों को प्रोत्साहित करती है।
  • सामरिक प्रतिरोध: ऐसे युग में जहाँ शत्रु हार्वेस्ट नाऊ, डिक्रिप्ट लेटर’ (HNDL) जैसी रणनीति अपना सकते हैं, यह नीति आने वाले दशकों तक राज्य के रहस्यों की रक्षा के लिए पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी (PQC) का रोडमैप प्रदान करती है।

कार्यान्वयन में चुनौतियाँ

  • अत्यधिक परिचालन आवश्यकताएँ: वर्तमान में अधिकांश क्वांटम प्रणालियों को क्रायोजेनिक शीतलन (लगभग पूर्ण शून्य तापमान) की आवश्यकता होती है।
    • युद्धक्षेत्र के उच्च कंपन और अत्यधिक तापमान वाले वातावरण के लिए इन प्रणालियों को पर्याप्त रूप से “मजबूत” बनाना एक बहुत बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है।
  • क्वांटम कौशल अंतर’: क्वांटम भौतिकविदों और इंजीनियरों की वैश्विक स्तर पर कमी है।
    • सेना के भीतर एक विशेष “क्वांटम कैडर” का निर्माण करने में काफी समय और विशेष प्रशिक्षण अवसंरचना की आवश्यकता होगी।
  • लंबी विकास अवधि: क्वांटम प्रौद्योगिकी अभी प्रारंभिक अवस्था में है।
    • अनुसंधान और विकास (R&D) की उच्च लागत के कारण तत्काल “बैटलफील्ड रेडी” परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते हैं, जिसके लिए निरंतर राजनीतिक और वित्तीय इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी।

आगे की राह

  • चरणबद्ध शुरुआत: सेना को एक क्रमिक रोडमैप का पालन करना चाहिए, जिसकी शुरुआत स्थानीय सुरक्षित लिंक के लिए अल्प-श्रेणी के QKD से हो और फिर लंबी दूरी के उपग्रह-आधारित क्वांटम नेटवर्क की ओर बढ़ा जाए।
  • स्वदेशी आपूर्ति शृंखला: वास्तविक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए, भारत को क्वांटम हार्डवेयर के लिए आवश्यक घटकों, जैसे कि डाइल्यूशन रेफ्रिजरेटर और उच्च-वैक्यूम लेजर सिस्टम, के घरेलू विनिर्माण में निवेश करना होगा।
  • क्वांटम परीक्षण केंद्रों की स्थापना: रक्षा मंत्रालय को समर्पित परीक्षण रेंज स्थापित करनी चाहिए, जहाँ स्टार्टअप और रक्षा प्रयोगशालाएँ नकली युद्ध स्थितियों में क्वांटम सेंसर और संचार लिंक को सत्यापित कर सकती हैं।

निष्कर्ष

मिलिट्री क्वांटम मिशन नीति ढाँचा एक दूरदर्शी कदम है, जो इस बात को स्वीकार करता है कि युद्ध का भविष्य “क्वांटम क्षेत्र” में तय होगा। तीन सेनाओं के समन्वित दृष्टिकोण के माध्यम से इन चार स्तंभों को एकीकृत करके, भारत न केवल एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में, बल्कि दूसरी क्वांटम क्रांति में एक वैश्विक नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है, जिससे यह सुनिश्चित हो रहा है कि उसके रक्षा बलों के पास 21वीं सदी की प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक “तकनीकी शक्ति” मौजूद है।

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