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Jan 27 2026

उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS)

भारतीय रिजर्व बैंक की उदारीकृत प्रेषण योजना (Liberalised Remittance Scheme) के तहत भारत से बाहर भेजी गई निधियाँ नवंबर 2025 में दो वर्षों के निम्नतम स्तर पर पहुँच गईं, जिसका मुख्य कारण विदेशी शिक्षा और यात्रा व्यय में कमी है।

बाह्य प्रेषित निधियों में प्रमुख प्रवृत्तियाँ 

  • कुल प्रेषित निधियाँ: $1.94 अरब पर आ गईं, जो नवंबर 2023 के बाद सबसे कम हैं।
  • विदेशी शिक्षा पर व्यय: $120.9 मिलियन तक घट गया, जो अप्रैल 2020 के बाद न्यूनतम है और इसका कारण विदेशों में नामांकन में कमी को दर्शाता है।
  • विदेशी यात्रा पर व्यय: वैश्विक अनिश्चितताओं और सख्त वीजा व नीतिगत नियमों के बीच $1.1 अरब तक कम हो गया है।

उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS)

  • LRS भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा संचालित एक ढाँचा है, जो निवासी व्यक्तियों को अनुमत चालू और पूँजी खाता लेन-देन के लिए विदेश में निधियाँ प्रेषित करने की अनुमति देता है।
  • आरंभ: वर्ष 2004 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा।
  • प्रेषण सीमा: प्रत्येक वित्तीय वर्ष में प्रति व्यक्ति USD 2,50,000 तक।
    • सीमा से अधिक प्रेषण के लिए RBI का पूर्व अनुमोदन आवश्यक है।
  • उद्देश्य
    • शिक्षा, यात्रा, चिकित्सा उपचार और विदेश में परिजनों के निर्वाह को सुविधाजनक बनाना।
    • विदेश में निवेश, संपत्ति अधिग्रहण और वित्तीय विविधीकरण को सक्षम करना।
    • भारत को वैश्विक वित्तीय प्रणालियों के साथ सुव्यवस्थित रूप से एकीकृत करना।
  • पात्रता मानदंड
    • योजना सभी निवासी व्यक्तियों, जिनमें अवयस्क और विद्यार्थी शामिल हैं, के लिए उपलब्ध है।
    • अपवाद: निगम, साझेदारी फर्म, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF), ट्रस्ट और अन्य संस्थाएँ योजना से बाहर हैं।
  • अनुमत प्रयोजन: LRS के अंतर्गत प्रेषित निधियाँ शिक्षा, व्यवसाय यात्रा, रोजगार, चिकित्सा उपचार, उपहार, निवेश और अन्य व्यक्तिगत प्रयोजनों के लिए उपयोग की जा सकती हैं, बशर्ते कि यह FEMA और RBI के दिशा-निर्देशों के अनुसार हो।
  • प्रतिबंधित लेन-देन: लॉटरी टिकटों की खरीद, मार्जिन ट्रेडिंग, सट्टेबाजी या RBI द्वारा अधिसूचित कुछ अचल संपत्ति लेन-देन।
  • LRS के तहत कराधान
    • LRS के तहत प्रेषित निधियों पर स्रोत पर कर संग्रह (TCS) लागू है, जैसा कि आयकर अधिनियम में निर्दिष्ट है।
    • अपवाद: यदि प्रेषक घोषणा प्रस्तुत करता है कि निधियों का उपयोग विनिर्माण, प्रसंस्करण, उत्पादन या विद्युत उत्पादन के लिए हुआ है और पुनर्विक्रय के लिए नहीं किया गया, तो TCS लागू नहीं होता है।

ASC अर्जुन

भारतीय रेलवे ने यात्री सुरक्षा, संरक्षा और सेवा वितरण में सुधार के एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में ‘ASC अर्जुन’ नामक मानवाकृति रोबोट को प्रस्तुत किया।

‘ASC अर्जुन’ के बारे में

  • यह भारतीय रेल नेटवर्क में पहला मानवाकृति रोबोट है।
  • स्थान: विशाखापत्तनम रेलवे स्टेशन में तैनात।
  • उद्देश्य: मुख्यतः यात्री सुरक्षा, संरक्षा और सेवा वितरण को बढ़ाना, साथ ही रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के कर्मियों के साथ समन्वय में कार्य करना।
  • विकास: पूरी तरह से विशाखापत्तनम में, स्वदेशी प्रौद्योगिकी का उपयोग करके डिजाइन और विकसित किया गया।
  • मुख्य विशेषताएँ और क्षमताएँ
    • पहचान: फेस रिकग्निशन सिस्टम (FRS) से सुसज्जित।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी: वास्तविक समय में RPF नियंत्रण कक्षों को अलर्ट।
    • बहुभाषी घोषणाएँ: अंग्रेजी, हिंदी और तेलुगु में स्वचालित मार्गदर्शन।
    • सेमी-ऑटोनोमस नेविगेशन: अवरोध टालने के साथ पूर्व निर्धारित मार्गों पर चलने की क्षमता।
    • 24×7 गश्त: प्लेटफॉर्मों की  सतत् निगरानी।
    • आपातकालीन प्रतिक्रिया: समय पर चेतावनी हेतु आग और धुएँ का पता लगाने वाले तंत्र उपस्थित हैं।

टेरावेव कम्युनिकेशन नेटवर्क 

ब्लू ओरिजिन ने टेरावेव की घोषणा की, जो एक विशाल उपग्रह संचार नेटवर्क है, जिसका उद्देश्य ऑप्टिकल लेजर लिंक के माध्यम से अल्ट्रा-उच्च गति की वैश्विक कनेक्टिविटी प्रदान करना है।

टेरावेव कम्युनिकेशन के विषय में

  • टेरावेव’ ब्लू ओरिजिन द्वारा घोषित अगली पीढ़ी का उपग्रह संचार नेटवर्क है।
  • क्षमता एवं गति: पृथ्वी पर कहीं भी डेटा गति 6 टेराबिट प्रति सेकंड तक देने के लिए डिजाइन किया गया है।
    • यह मौजूदा उपग्रह नेटवर्क जैसे स्टारलिंक से कहीं अधिक तेज है।
  • मुख्य फोकस: सामान्य उपभोक्ता ब्रॉडबैंड की तुलना में यह उद्यम, सरकारी, डेटा सेंटर और मिशन-क्रिटिकल उपयोगकर्ताओं को लक्षित करता है।

टेरावेव की कार्यप्रणाली

  • LEO उपग्रह नेटवर्क: टेरावेव 5,408 LEO और MEO उपग्रहों के सघन नेटवर्क का उपयोग करता है, जो कम विलंबता और सतत् वैश्विक कवरेज सुनिश्चित करता है।
  • ऑप्टिकल इंटर-सैटेलाइट लिंक: उपग्रह ऑप्टिकल लेजर लिंक का उपयोग करके एक दूसरे के साथ संचार करते हैं, जिससे पृथ्वी के माध्यम से सभी डेटा को रूट किए बिना अति-उच्च गति से डेटा ट्रांसफर संभव हो पाता है।
  • अंतरिक्ष से पृथ्वी पर डेटा ट्रांसमिशन: डेटा उपग्रहों से ग्राउंड गेटवे टर्मिनल तक प्रेषित होता है।
  • स्थलीय नेटवर्क के साथ एकीकरण: ग्राउंड गेटवे मौजूदा उच्च क्षमता वाले फाइबर, क्लाउड और डेटा सेंटर अवसंरचना से जुड़े रहते हैं, जिससे अंतरिक्ष और पृथ्वी प्रणालियों के बीच डेटा प्रवाह सहज होता है।

ब्लू ओरिजिन के बारे में:

  • ब्लू ओरिजिन, अमेरिका स्थित एक निजी एयरोस्पेस कंपनी है।
  • स्थापना: वर्ष 2000 में जेफ बेजोस द्वारा स्थापित, जिसका दीर्घकालीन उद्देश्य लाखों लोगों को अंतरिक्ष में जीवन यापन और कार्य करने योग्य बनाना है।
  • पुन: प्रयोज्य रॉकेट पर फोकस: लॉन्च लागत को कम करने हेतु पुन: प्रयोज्य रॉकेटों पर बल।
  • मुख्य लॉन्च वाहन
    • न्यू शेपर्ड: अंतरिक्ष पर्यटन और अनुसंधान हेतु उप-कक्षीय रॉकेट।
    • न्यू ग्लेन: भारी-भारक कक्षीय रॉकेट, टेऱावेव जैसे बड़े उपग्रह नेटवर्क के प्रक्षेपण हेतु आवश्यक।

स्पेसएक्स स्टारलिंक:

  • स्टारलिंक एक मौजूदा LEO उपग्रह इंटरनेट नेटवर्क है, जो विश्वभर में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी प्रदान करता है।
  • इसका विकास और संचालन स्पेसएक्स द्वारा किया गया।
  • पैमाना: लगभग 10,000 उपग्रह पहले ही कक्षा में उपस्थित हैं (वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा नेटवर्क), और अधिक स्थापित करने की योजना है।
  • उपयोगकर्ता: उपभोक्ता, व्यवसाय, सरकार और रक्षा एजेंसियाँ।
  • कवरेज: 140 से अधिक देशों में उपलब्ध, विशेषकर दूरदराज और आपदा-प्रवण क्षेत्रों में उपयोगी।

उन्नत रासायनिक सेल–PLI (ACC-PLI) योजना

उन्नत बैटरी निर्माण के लिए भारत की ACC-PLI योजना को तकनीकी कमियों, स्थानीयकरण की चुनौतियों और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं के कारण भारी देरी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि इसकी क्षमता सीमित रूप से ही चालू की गई है।

उन्नत रासायनिक सेल–PLI (ACC-PLI) योजना के बारे में

  • ACC-PLI योजना अक्टूबर 2021 में भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा घरेलू अगली पीढ़ी की बैटरी सेल निर्माण को प्रोत्साहित करने हेतु शुरू की गई।
  • उद्देश्य
    • वर्ष 2026 तक 50 GWh बैटरी सेल निर्माण क्षमता स्थापित करना।
    • विशेषकर चीन पर आयात निर्भरता कम करना।
    • स्थानीय बैटरी मूल्य शृंखला विकसित करना (कैथोड, एनोड, इलेक्ट्रोलाइट)।
    • प्रतिस्पर्द्धात्मक लागत पर इलेक्ट्रिक वाहन (EV) अपनाने और ऊर्जा भंडारण का समर्थन करना।
  • मुख्य घटक
    • अनुदान: ₹18,100 करोड़।
    • प्रोत्साहन: विक्रय योग्य बैटरी के प्रति kWh ₹2,000 तक।
    • स्थानीय मूल्य संवर्द्धन
      • 2 वर्षों में 25%
      • 5 वर्षों में 60%
    • पात्रता: न्यूनतम निवेश ₹1,100 करोड़।

योजना में प्रमुख अंतराल

  • क्षमता निर्माण में देरी
    • 50 गीगावाट के लक्ष्य के मुकाबले केवल 1.4 गीगावाट ही समय पर चालू हो पाया।
    • 8.6 GWh निर्माणाधीन, लेकिन विलंब।
  • प्रौद्योगिकी एवं कौशल अंतराल
    • घरेलू सेल निर्माण और खनिज शोधन में विशेषज्ञता की कमी।
    • चीनी तकनीकी विशेषज्ञों के वीजा में देरी से उपकरण स्थापना में बाधा।
  • कमजोर प्रोत्साहन के परिणाम
    • अक्टूबर 2025 तक कोई प्रोत्साहन नहीं।
    • रोजगार सृजन अपेक्षाओं से बहुत कम (0.12% लक्ष्य), केवल 1,118 नौकरियाँ, अनुमानित 1.03 मिलियन की तुलना में।

भारत में बैटरी की माँग

  • EV-चालित माँग: EV क्षेत्र लीथियम बैटरी की 70–80% माँग का प्रतिनिधित्व करता है।
  • ऊर्जा संक्रमण आवश्यकताएँ: नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण प्रणालियों की बढ़ती माँग।
  • विकास में मंदी के संकेत: EV बिक्री वृद्धि (वित्तीय वर्ष 2024-25)-15.3%, जबकि वर्ष 2022–2030 के लिए पूर्वानुमानित 49% वृद्धि से कम।

उन्नत रासायनिक सेल (ACC) के बारे में

  • उन्नत रासायनिक सेल (ACCs) अगली पीढ़ी के रिचार्जेबल बैटरी सेल हैं, जो उन्नत रासायनिक संरचनाओं (परंपरागत लेड-एसिड बैटरियों के अतिरिक्त) का उपयोग करती हैं, ताकि उच्च ऊर्जा घनत्व, दीर्घायु, तीव्र चार्जिंग और बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
  • मुख्यतः लीथियम-आयन और उभरती बैटरी रसायन अभिक्रियाओं, आधुनिक ऊर्जा और मोबिलिटी आवश्यकताओं के अनुरूप।
  • प्रमुख उपयोग
    • इलेक्ट्रिक वाहन (EVs): इलेक्ट्रिक कार, दोपहिया वाहन, बस और व्यावसायिक वाहनों को ऊर्जा प्रदान करना।
    • नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण: सौर और पवन ऊर्जा का संग्रहण, ग्रिड स्थिरता और तीव्र माँग प्रबंधन के लिए।
    • उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स: स्मार्टफोन, लैपटॉप, वियरेबल और पॉवर टूल्स में उपयोग।
    • ग्रिड-स्तरीय भंडारण: स्मार्ट ग्रिड, बैकअप पावर और फ्रीक्वेंसी नियमन का समर्थन।
    • रक्षा एवं अंतरिक्ष: मानव रहित प्रणालियाँ, उपग्रह और रणनीतिक उपकरणों के लिए विश्वसनीय ऊर्जा।

पांगोलाखा वन्यजीव अभयारण्य

हाल ही में वनाग्नि के कारण पांगोलाखा वन्यजीव अभयारण्य (Pangolakha Wildlife Sanctuary) के भीतर लगभग 12 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ, जिसे सूखा मौसम, तीव्र पवनों, खड़ी भौगोलिक ढलान और सीमित पहुँच ने और तीव्र बना दिया।

पांगोलाखा वन्यजीव अभयारण्य के बारे में

  • पांगोलाखा वन्यजीव अभयारण्य पूर्वी सिक्किम में स्थित उच्च-तुंगता वाला संरक्षित क्षेत्र है, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता, रणनीतिक स्थिति और महत्त्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) के रूप में भूमिका के लिए जाना जाता है।
  • स्थापना: वर्ष 2002।
  • स्थान: पूर्वी सिक्किम, भारत-चीन सीमा के निकट
    • भूटान के वनों और नेओरा वैली नेशनल पार्क (पश्चिम बंगाल) के साथ पारिस्थितिकी गलियारे का निर्माण करता है।
    • पांगोलाखा रेंज के समानांतर स्थित है, जो चोला रेंज के नीचे तक विस्तृत है और सिक्किम को भूटान से अलग करती है।
  • भूगोल
    • ऊँचाई: लगभग 1,300 मीटर से 4,000 मीटर से अधिक
    • भौगोलिक स्थलाकृति: खड़ी पर्वतीय ढलान, अल्पाइन घास के मैदान, दलदली क्षेत्र और वनाच्छादित घाटियाँ।
    • पर्वतीय दर्रे: नाथूला और जेलेप ला, ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण और पारिस्थितिकी दृष्टि से संवेदनशील।
    • जल स्रोत: उच्च-तुंगता वाली झीलें, जैसे- बेदांग त्सो और समीपवर्ती झीलें जैसे त्सोंगमो, प्रवासी पक्षियों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
    • नदियाँ: रंगपो और जलधका नदियाँ समीपवर्ती स्रोतों से निकलती हैं।
  • वनस्पतियाँ: अल्पाइन–समशीतोष्ण–उपोष्णकटिबंधीय क्रम
    • रोडोडेंड्रॉन, सिल्वर फर, जुनिपर, लाइकेन समृद्ध ओक वन और सघन बाँस के झुरमुट।
  • जीव-जंतु: बाघ, तेंदुआ, लाल पांडा, मस्क डियर, सेरो, एशियाई काला भालू
    • लाल पांडा सिक्किम का राजकीय पशु भी है।

रेड-ईयर्ड स्लाइडर टर्टल (Red-Eared Slider Turtle)

 

हाल ही में तमिलनाडु के कोयंबटूर के आर्द्रभूमि क्षेत्रों में ‘रेड-ईयर्ड स्लाइडर टर्टल’  पाए गए, जिससे मीठे जल के पारिस्थितिकी तंत्र पर आक्रामक प्रजातियों के खतरे को लेकर चिंता बढ़ी है।

  • पालतू जीव, व्यापार से छोड़े जाने के उपरांत, ये वर्तमान में भारतीय शहरी झीलों एवं आर्द्रभूमियों में प्रसारित हो रहे हैं।

रेड-ईयर्ड स्लाइडर टर्टल’  (Trachemys scripta elegans)

  • रेड-ईयर्ड स्लाइडर टर्टल’  विश्व की सर्वाधिक व्यापक रूप से प्रविष्ट मीठे जल की कछुआ प्रजातियों में से एक है, जिसका प्रसार मुख्यतः वैश्विक विदेशी पालतू जीव व्यापार के माध्यम से हुआ है।
  • मूल क्षेत्र: संयुक्त राज्य अमेरिका, विशेषतः मिसिसिपी नदी बेसिन एवं उससे संलग्न क्षेत्र।
  • वितरण: वर्तमान में अंटार्कटिका को छोड़कर सभी महाद्वीपों में स्थापित।
    • भारत में विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों के समीप स्थित झीलों, टैंकों एवं आर्द्रभूमियों में इनकी संख्या में वृद्धि हुई है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • आकृति: प्रत्येक कान के पीछे विशिष्ट लाल रंग की धारियाँ।
    • आवास: मुख्यतः जलीय, किंतु विस्तार की अवस्था में अर्द्ध-स्थलीय प्रवृत्ति प्रदर्शित करता है।
    • अनुकूलनशीलता: अल्प-अनुकूल तापमान एवं विविध आवासीय परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता।
    • व्यवहार: विशेषकर प्रजनन काल में आक्रामक शिकारी स्वभाव।
    • आयु: प्राकृतिक अवस्था में 20–50 वर्ष।
  • IUCN स्थिति: कम चिंताग्रस्त (वैश्विक स्तर पर), किंतु मूल क्षेत्र के बाहर आक्रामक प्रजाति।

भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव

  • प्राकृतिक परभक्षियों की अनुपस्थिति के कारण तीव्र प्रजनन।
  • प्रकाश स्थलों, प्रजनन क्षेत्रों एवं आहार हेतु देशी कछुआ प्रजातियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा।
  • आक्रामक आहार व्यवहार के परिणामस्वरूप मत्स्य आबादी में ह्रास, जिससे मीठे जल की खाद्य शृंखलाएँ बाधित होती हैं।
  • आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी में परिवर्तन, जिसके फलस्वरूप स्थानीय जैव विविधता के लिए खतरा।

इसके आक्रमण से निपटने के उपाय

  • विदेशी पालतू जीव व्यापार एवं आयात का कठोर विनियमन एवं सतत् निगरानी।
  • पालतू कछुओं को प्राकृतिक जल निकायों में छोड़ने से हतोत्साहित करने हेतु जन-जागरूकता अभियानों का संचालन।
  • प्रारंभिक पहचान एवं निष्कासन, जिसमें मछुआरों, नागरिकों एवं स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा सूचना-प्रदान।

शैडो फ्लीट

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ (Shadow Fleet) पर नवीन प्रतिबंध अधिरोपित किए हैं, ताकि कथित रूप से विरोध-दमन एवं क्षेत्रीय अस्थिरता को वित्तपोषित करने वाले तेल निर्यात पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

शैडो फ्लीट क्या है?

  • शैडो फ्लीट से तात्पर्य पुराने, प्रायः गोपनीय स्वामित्व आधारित तेल टैंकरों के ऐसे नेटवर्क से है, जिनका उपयोग अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचाव हेतु किया जाता है, जिसमें कार्गो की उत्पत्ति, स्वामित्व एवं गंतव्य को छिपाया जाता है।
  • शैडो फ्लीट की प्रमुख विशेषताएँ
    • अस्पष्ट स्वामित्व: जहाजों का पंजीकरण विभिन्न अधिकार क्षेत्रों में शेल कंपनियों के माध्यम से।
    • बचाव प्रक्रिया: बार-बार नाम परिवर्तन, ध्वज परिवर्तन, स्वचालित पहचान प्रणाली (AIS) को निष्क्रिय करना तथा समुद्र में जहाज-से-जहाज स्थानांतरण करना।
    • अनौपचारिक लॉजिस्टिक्स: मुख्यधारा की बीमा, वित्तपोषण एवं अनुपालन प्रणालियों से बाहर संचालन।

शैडो फ्लीट का प्रभाव

  • प्रतिबंध-उल्लंघन: ईरान जैसे प्रतिबंधित देशों को प्रतिबंधों के बावजूद तेल एवं पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में सक्षम बनाता है।
  • सुरक्षा जोखिम: प्राप्त राजस्व का उपयोग हथियार, प्रॉक्सी समूहों एवं आंतरिक दमन हेतु किया जा सकता है।
  • समुद्री सुरक्षा एवं पर्यावरण: अपर्याप्त रूप से विनियमित जहाजों के कारण दुर्घटनाओं, तेल रिसाव एवं विधिक विवादों का बढ़ा हुआ जोखिम।

मेटियोसुनामी

हाल ही में अर्जेंटीना के तटीय नगर सांता क्लारा डेल मार में एक दुर्लभ मेटियोसुनामी की घटना घटित हुई।

मेटियोसुनामी क्या है?

  • परिभाषा: मेटियोसुनामी समुद्र-स्तर में सुनामी-सदृश दोलन है, जो भूकंपीय गतिविधियों के स्थान पर त्वरित वायुमंडलीय विक्षोभों के कारण उत्पन्न होता है।
  • भूकंप-जनित सुनामी से भिन्न: पारंपरिक सुनामियों के विपरीत, जो समुद्र के नीचे भूकंप से उत्पन्न होती हैं, मेटियोसुनामी का संघटन मौसम संबंधी कारकों के कारण होता है।
  • उत्प्रेरक तंत्र
    • वायुमंडलीय दाब परिवर्तन: महासागर की सतह के ऊपर वायु दाब में अचानक गिरावट या तीव्र उतार-चढ़ाव।
    • तरंग निर्माण प्रक्रिया: वायुमंडलीय विक्षोभ, महासागर की सतह को ऊर्जा स्थानांतरित करता है, जिससे दीर्घ तरंगों का निर्माण होता है, जो तट की ओर अग्रसर होती हैं और प्रायः उथले महाद्वीपीय शेल्फ, खाड़ियों, जलप्रवेशिकाओं या बंदरगाहों में प्रवर्द्धित हो जाती हैं।
  • व्यवहार एवं विशेषताएँ
    • त्वरित प्रारंभ: यह घटना अचानक घटित होती है, जिसमें बहुत अल्पावधि की या कोई पूर्व चेतावनी प्राप्त नहीं होती है।
    • समुद्री जल का अपसरण: प्रारंभ में जल तटरेखा से पीछे हट सकता है, जिसके पश्चात् तीव्र वेग से पुनः आगे बढ़ता है।
    • तरंग ऊँचाई एवं प्रभाव: मेटियोसुनामी की तरंग ऊँचाई 6 फीट या उससे अधिक हो सकती है, जो तटीय अवसंरचना, नौकाओं तथा मानव सुरक्षा के लिए जोखिम उत्पन्न करती है।
  • भौगोलिक उपस्थिति: इनका अभिलेखन ग्रेट लेक्स, गल्फ ऑफ अमेरिका, अटलांटिक तट, भूमध्य सागर तथा एड्रियाटिक सागर सहित अनेक क्षेत्रों में किया गया है।
  • भूकंपीय सुनामी से अंतर: जहाँ भूकंपीय सुनामियाँ विवर्तनिकी गतिविधियों से उत्पन्न होती हैं, वहीं मेटियोसुनामी मौसम-जनित होती हैं, यद्यपि उनका भौतिक व्यवहार एवं तटीय प्रभाव अत्यंत समान प्रतीत हो सकता है।

संदर्भ

हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से प्रेरित आपदाओं में चिंताजनक वृद्धि का सामना कर रहा है, जिस कारण वर्ष  2025 में 4,000 से अधिक मौतें हुई हैं।

  • चार धाम राजमार्ग जैसी परियोजनाओं का पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में निरंतर विस्तार, अस्थिर विकास के कारण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश की आशंका को बढ़ा रहा है।

इकोसाइड (Ecocide) के बारे में  

  • अर्थ: इकोसाइड (Ecocide) वह स्थिति है, जिसमें जानबूझकर या लापरवाही से की गई मानवीय गतिविधियों के परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी तंत्रों को बड़े पैमाने पर, व्यापक रूप से या लंबे समय तक गंभीर क्षति पहुँचती है।
    • इसमें पर्यावरण को इतना गंभीर नुकसान पहुँचाना शामिल है कि यह मानव और गैर-मानव जीवन के अस्तित्व, स्वास्थ्य को खतरे में डाल देता है।
  • अवधारणा की उत्पत्ति: पारिस्थितिकी विनाश शब्द वर्ष 1970 में जीवविज्ञानी आर्थर गैलस्टन द्वारा वियतनाम युद्ध के दौरान हुए पारिस्थितिकी विनाश के प्रत्युत्तर में गढ़ा गया था।
    • जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि और औद्योगिक पर्यावरणीय आपदाओं के कारण इस अवधारणा को वैश्विक स्तर पर पुनः महत्त्व प्राप्त हुआ।
  • प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कानूनी परिभाषा: वर्ष 2021 में, एक स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के रोम विधान में शामिल करने के लिए पारिस्थितिकी विनाश की एक कानूनी परिभाषा प्रस्तावित की।
    • पर्यावरण विनाश से तात्पर्य ऐसे गैरकानूनी या जानबूझकर किए गए कृत्यों से है, जिनके परिणामस्वरूप पर्यावरण को गंभीर, व्यापक अथवा दीर्घकालिक क्षति पहुँचने की संभावना के बारे में पूर्व जानकारी हो।
    • प्रस्ताव में पर्यावरण विनाश को नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध, युद्ध अपराध और आक्रामकता के अपराध के साथ पाँचवें अंतरराष्ट्रीय अपराध के रूप में मान्यता देने का प्रयास किया गया है।
  • आवश्यक घटक: पर्यावरण विनाश में बड़े भौगोलिक क्षेत्रों और पारिस्थितिकी तंत्रों को प्रभावित करने वाली पर्यावरणीय क्षति शामिल है।
    • इससे होने वाली क्षति दीर्घकालिक या अपरिवर्तनीय प्रकृति की है।
    • इस क्षति के परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों और मानव आजीविका में गंभीर व्यवधान उत्पन्न होता है।
    • यह विनाश प्रत्यक्ष रूप से मानवजनित कार्यों से उत्पन्न होता है, जिनमें राज्य, निगम या व्यक्ति शामिल हैं।
  • पर्यावरण विनाश के उदाहरण
    • बड़े पैमाने पर वनों की कटाई: बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से जैव विविधता की अपरिवर्तनीय हानि और जलवायु अस्थिरता हुई है।
      • अमेजन वर्षावन में वनों की कटाई एक ऐसे मोड़ तक पहुँच गई है, जो वैश्विक जलवायु के लिए गंभीर खतरा है।
    • बड़े पैमाने पर तेल रिसाव: बड़े पैमाने पर तेल रिसाव से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक क्षति और तटीय आजीविका का नुकसान होता है।
      • डीपवाटर होराइजन तेल रिसाव (मैक्सिको की खाड़ी) व्यापक पारिस्थितिकी क्षति का कारण बना, जिसके प्रभाव एक दशक से अधिक समय तक बने रहे।
    • औद्योगिक प्रदूषण: औद्योगिक प्रदूषण नदियों, मृदा और भूजल को दूषित करता है, जिसके सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम होते हैं।
      • भोपाल गैस त्रासदी (1984) औद्योगिक लापरवाही के कारण होने वाली दीर्घकालिक पर्यावरणीय और मानवीय क्षति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
    • खनन-प्रेरित पर्यावरणीय विनाश: बड़े पैमाने पर खनन कार्यों से संपूर्ण भू-दृश्य नष्ट हो जाते हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी और सामाजिक व्यवस्थाएँ बाधित होती हैं।
      • दक्षिण अमेरिका के “लीथियम ट्रायंगल” में लीथियम खनन के कारण भूजल का स्तर घट गया है और पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ गया है।
    • सशस्त्र संघर्ष के दौरान पर्यावरणीय विनाश: सशस्त्र संघर्षों में अक्सर जानबूझकर या अनजाने में पर्यावरणीय विनाश शामिल होता है, जिसके दीर्घकालिक प्रभाव होते हैं।
      • वियतनाम युद्ध के दौरान एजेंट ऑरेंज के प्रयोग से निरंतर मृदा प्रदूषण और पारिस्थितिकी क्षति हुई।
        • एजेंट ऑरेंज एक रासायनिक खरपतवारनाशक और पर्णनाशक था जिसका प्रयोग अमेरिकी सेना ने वियतनाम युद्ध (1961-1971) के दौरान किया था।

मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) के बारे में

  • यह हिमालय की सबसे महत्त्वपूर्ण विवर्तनिक भ्रंश प्रणालियों में से एक है, जिसका निर्माण भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच सतत टकराव के परिणामस्वरूप हुआ है।
  • MCT एक प्रमुख अंतरमहाद्वीपीय थ्रस्ट भ्रंश है, जो दो भागों को अलग करता है:-
    • उत्तर में उच्च हिमालयी क्रिस्टलीय (HHC) चट्टानें
    • दक्षिण में निम्न हिमालयी अनुक्रम (LHS) चट्टानें
  • MCT के अनुदिश, प्राचीन, ​​उच्च श्रेणी की कायांतरित चट्टानें नई, निम्न श्रेणी की चट्टानों के ऊपर आ गई हैं, जो संपीडन विवर्तनिकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • यह भू-वैज्ञानिक रूप से सक्रिय है, और भू-वैज्ञानिक काल में इसके बार-बार सक्रिय होने के प्रमाण मिलते हैं।

हिमालयी संकट के बारे में

  • पर्यावरणीय अस्थिरता (गुणक कारक): हिमालय प्राकृतिक रूप से अस्थिर है, और जलवायु परिवर्तन इस मौजूदा जोखिम को बढ़ाने वाला गुणक कारक है।
    • भू-वैज्ञानिक संवेदनशीलता: नव निर्मित वलित पर्वत होने के कारण, यह क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र IV और V में स्थित है।
      • अस्थिर भू-संरचना और सक्रिय फॉल्ट लाइनें [जैसे- मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT)] इस भू-भाग को भूकंप से प्रेरित भूस्खलन के लिए अत्यधिक संवेदनशील बनाती हैं।
    • ग्लोबल वार्मिंग गैप: ऊँचाई वाले क्षेत्रों में तापमान वैश्विक औसत से लगभग 50% तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOFs) जैसी जल-मौसम संबंधी आपदाएँ उत्पन्न हो रही हैं और वर्ष 2010 के बाद से बादल फटने की घटनाओं में लगभग 200% की वृद्धि हुई है।
    • पारिस्थितिकी तंत्र का क्षय: वनोन्मूलन (देवदार का नुकसान) और खनन के कारण जल निकासी में रुकावट ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी “आधार” को विघटित कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप मृदा अपरदन, ढलान की अस्थिरता और भूस्खलन हो रहे हैं।
  • संरचनात्मक कुप्रथा (‘कारण’ कारक): क्षेत्रीय वहन क्षमता की अनदेखी करने वाले मानवीय हस्तक्षेपों से संकट और भी गंभीर हो जाता है।
    • इंजीनियरिंग विफलताएँ: मानकीकृत सड़क डिजाइन (DL-PS) ऊर्ध्वाधर पहाड़ी कटाई पर निर्भर करती हैं, जो प्राकृतिक विश्राम कोण का उल्लंघन करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रमुख गलियारों के साथ 800 से अधिक सक्रिय भूस्खलन क्षेत्र बन गए हैं।
      • DL-PS मानक आपदाओं के प्रति स्पष्ट रूप से संवेदनशील क्षेत्र में 12 मीटर की पक्की सतह अनिवार्य करता है।
    • अतिक्रमण और सुरंग निर्माण: जलविद्युत, सुरंग निर्माण और बाढ़ के मैदानों तथा नदी तल में शहरी विस्तार ने प्राकृतिक बफरिंग प्रणालियों को नष्ट कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2025 की धारली बाढ़ जैसी आपदाएँ घटित हुईं।
    • MCT उल्लंघन: बुनियादी ढाँचा मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) के उत्तर में विस्तारित हो गया है – एक खंडित, उच्च भूकंपीय जोखिम वाला क्षेत्र जहाँ पारंपरिक रूप से बड़े पैमाने पर निर्माण प्रतिबंधित था।
  • शासन और सामाजिक-आर्थिक दबाव: संस्थागत क्षमता और सामाजिक तैयारी भौतिक विकास की गति से पीछे हैं।
    • पर्यटन का दबाव: चार धाम तीर्थयात्रा पर आधारित व्यापक पर्यटन (चार धाम) वैज्ञानिक वहन क्षमता आकलन के बिना ही आगे बढ़ रहा है, जिससे संवेदनशील ढलानों पर, विशेषकर मानसून के दौरान, मौसमी दबाव बढ़ रहा है।
    • संस्थागत विखंडन: बहुस्तरीय शासन प्रणाली (जिला-राज्य-केंद्र) समन्वय की कमी, कमजोर वास्तविक समय निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी के प्रसार में देरी का कारण बन रही है।
    • सीमांतकरण: दूरदराज के पहाड़ी समुदायों को स्वास्थ्य सेवा और संपर्क की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जबकि अप्रभावी आपदा अभ्यास वास्तविक सामुदायिक लचीलापन विकसित करने में विफल रहे हैं।

भारतीय हिमालय क्षेत्र (IHR) के बारे में

  • भौगोलिक विस्तार: IHR भारत के 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) में फैला हुआ है।
    • जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल।
    • यह 2,500 किलोमीटर से अधिक लंबाई में फैला हुआ है और भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 16% भाग कवर करता है।

  • जनसंख्या और विविधता: लगभग 5 करोड़ लोग।
    • लद्दाखियों, सिक्किम के भूटिया, तिब्बती बौद्ध और हिमाचल प्रदेश के गद्दी जैसी विविध नृजातीय समुदायों द्वारा बसाया हुआ, जिनमें से प्रत्येक की अपनी अनूठी संस्कृति, भाषा और परंपराएँ हैं।
    • यह क्षेत्र अपनी बहुलतावादी जनसांख्यिकीय, आर्थिक, पर्यावरणीय, सामाजिक और राजनीतिक प्रणालियों के लिए जाना जाता है।

भारत के लिए हिमालय का महत्त्व

  • जलवायु नियामक और मौसम नियंत्रक: हिमालय पर्वतमाला एक प्राकृतिक जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करती है, जो भारत के मौसम और ऋतुओं को आकार देती है।
    • यह नमी से भरी दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी पवनों को ऊपर उठने के लिए प्रेरित करती है, जिससे उत्तरी और मध्य भारत में वर्षा होती है।
    • इस अवरोधक के बिना, देश का अधिकांश भाग शुष्क और अर्द्ध-मरुस्थल होता। सर्दियों में, ये पर्वत मध्य एशिया से आने वाली ठंडी पवनों को रोकते हैं, जिससे भारतीय मैदान गर्म, रहने योग्य और कृषि के लिए अनुकूल बने रहते हैं।
  • भारत का “जल भंडार”: हिमालय भारत के मीठे पानी का मुख्य स्रोत है।
    • सिंधु, गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियाँ हिमालयी हिमनदों और हिमक्षेत्रों से निकलती हैं।
    • ये नदियाँ भारत की लगभग आधी आबादी के लिए पेयजल, कृषि, उद्योग और स्वच्छता की आपूर्ति करती हैं।
    • यहाँ की खड़ी ढलानें जलविद्युत उत्पादन की अपार क्षमता प्रदान करती हैं, जिससे यह क्षेत्र नवीकरणीय ऊर्जा के लिए महत्त्वपूर्ण बन जाता है।
  • कृषि एवं आर्थिक आधार: हिमालयी नदियाँ पोषक तत्त्वों से भरपूर जलोढ़ मृदा को मैदानी इलाकों तक ले जाती हैं, जिससे सिंधु-गंगा का उपजाऊ क्षेत्र का निर्माण होता है, जो भारत का प्रमुख खाद्य उत्पादक क्षेत्र है।
    • पहाड़ औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों और लकड़ी सहित वन संसाधन भी प्रदान करते हैं, जो ग्रामीण आजीविका का समर्थन करते हैं।
    • इसके अतिरिक्त, हिमालय पर्यटन और तीर्थयात्रा का एक प्रमुख केंद्र है, जो केदारनाथ, बद्रीनाथ, लेह और मनाली जैसे स्थानों की स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देता है।
  • रक्षा एवं सामरिक महत्त्व: हिमालय भारत की प्राकृतिक उत्तरी ढाल के रूप में कार्य काम करता है।
    • इन क्षेत्रों की दुर्गम भू-भाग और ऊँचे पर्वतीय दर्रों के कारण बड़े पैमाने पर आक्रमण करना कठिन है।
    • लद्दाख और सियाचिन ग्लेशियर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा निगरानी और सैन्य लाभ के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, विशेष रूप से चीन और पाकिस्तान के साथ सीमाओं पर।
  • जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत: हिमालय वैश्विक जैव विविधता का एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ हिम तेंदुआ, लाल पांडा और हिमालयन मोनल जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
    • सांस्कृतिक रूप से, इन्हें “देवभूमि” (देवताओं की भूमि) के रूप में पूजा जाता है और ये हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म की आध्यात्मिक परंपराओं का केंद्र हैं।
    • ये पर्वत पवित्र नदियों, तीर्थयात्रा मार्गों और प्राचीन परंपराओं संगम है, जो भारत की सभ्यता का आधार हैं।

भारत का ‘हिमालयन रेजिलियंस फ्रेमवर्क’

  • अग्रणी वैज्ञानिक प्रयास: भारत ने हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की निगरानी करने और आपदा पूर्वानुमान में सुधार लाने के लिए एक बहु-एजेंसी निगरानी प्रणाली विकसित की है।
    • विशेषीकृत अनुसंधान केंद्र: हिमांश अनुसंधान केंद्र (2016 में स्थापित) और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की में स्थित क्रायोस्फीयर और जलवायु परिवर्तन अध्ययन केंद्र (C4S) ग्लेशियरों और नदियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए जमीनी स्तर के आँकड़े उपलब्ध कराते हैं।
    • एशिया के जल स्तंभ की निगरानी: वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि ग्लेशियर अलग-अलग गति से सिकुड़ रहे हैं- सिंधु बेसिन में लगभग 12.7 मीटर प्रति वर्ष और ब्रह्मपुत्र बेसिन में लगभग 20.2 मीटर प्रति वर्ष।
      • यह जानकारी निचले इलाकों में रहने वाले लगभग 6 करोड़ लोगों की जल सुरक्षा योजना के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • एकीकृत निगरानी: ग्लेशियर निगरानी संबंधी संचालन समिति (2023) जल शक्ति मंत्रालय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के बीच वास्तविक समय में डेटा साझाकरण सुनिश्चित करती है, जिससे कार्य करने की प्रक्रिया में तेजी आती है।
  • राष्ट्रीय जोखिम न्यूनीकरण और नीति एकीकरण: इन पहलों से हिमालयी शासन व्यवस्था आपदा के बाद की प्रतिक्रिया से हटकर आपदा निवारण की ओर अग्रसर होती है।
    • GLOF और भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण: राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण परियोजना (NLRMP) और राष्ट्रीय हिमनद झील विस्फोट बाढ़ जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम (NGRMP, 2025) का उद्देश्य जोखिम मानचित्रण, क्षेत्र निर्धारण और स्थान-विशिष्ट सुरक्षा संरचनाओं पर ध्यान केंद्रित करना है।
    • जलवायु-अनुकूल अवसंरचना: आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) के माध्यम से, भारत सड़कों, पुलों और सुरंगों को तीव्र वर्षा और बादल फटने जैसी दुर्लभ लेकिन चरम मौसम घटनाओं से सुरक्षित रखने के लिए उनका पुनर्निर्माण कर रहा है।
    • नीतिगत फ्रेमवर्क: राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण मिशन (NMSHE) 11 राज्य जलवायु परिवर्तन प्रकोष्ठों को क्षेत्र-विशिष्ट जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को तैयार करने में सहायता प्रदान करता है।
  • समुदाय-केंद्रित और सीमा सुरक्षा: वर्तमान में हिमालयी क्षेत्र में स्थानीय समुदाय की रक्षा करना प्राथमिक आवश्यकता है।
    • स्थानीय प्राथमिक सहायता कर्मी: आपदा मित्र योजना के तहत एक लाख से अधिक स्थानीय स्वयंसेवकों को खोज, बचाव और राहत कार्यों के मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) में प्रशिक्षित किया गया है, जिससे आपदाओं के बाद के महत्त्वपूर्ण “गोल्डन ऑवर” के दौरान जीवन बचाने में मदद मिली है।
    • जीवंत ग्राम कार्यक्रम – चरण II (VVP-II): ₹6,839 करोड़ के परिव्यय के साथ वर्ष  2025 में शुरू की गई यह योजना, सर्व-मौसम सड़कों, डिजिटल कनेक्टिविटी और जलवायु-लचीली आजीविका के माध्यम से सीमावर्ती गाँवों को मजबूत बनाती है, जिससे प्रवासन कम होता है और सीमा सुरक्षा में सुधार होता है।
    • पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण: SECURE हिमालय (भारत सरकार-संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम साझेदारी) और भारत-स्विट्जरलैंड हिमालयी जलवायु अनुकूलन कार्यक्रम (IHCAP) जैसी परियोजनाएँ अल्पाइन घास के मैदानों को बहाल करने, जैव विविधता की रक्षा करने और सूखते पर्वतीय झरनों को पुनर्जीवित करने के लिए पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ती हैं।

संबद्ध वैश्विक पहल

  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेंडाई ढाँचा (2015-2030): जोखिम आकलन, लचीलापन निर्माण और प्रारंभिक चेतावनी का आह्वान करता है।
  • पेरिस समझौता (2015): जलवायु-जनित आपदाओं के प्रति अनुकूलन और लचीलेपन को प्रोत्साहित करता है।
  • आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI, 2019): जलवायु और आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना के लिए भारत के नेतृत्व वाली वैश्विक साझेदारी।
  • आपदा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए अंतरिक्ष-आधारित सूचना हेतु संयुक्त राष्ट्र मंच (UN-SPIDER): आपदा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए अंतरिक्ष-आधारित सूचना प्रदान करता है।

हिमालयी आपदा की तैयारी और उससे उबरने में प्रणालीगत कमियाँ

  • सूचना और कार्रवाई के बीच का अंतर: वैज्ञानिक आँकड़ों और जमीनी स्तर पर लोगों की सुरक्षा के बीच एक स्पष्ट अंतर है।
    • निष्क्रिय निगरानी: राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) और भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) जैसी एजेंसियों के पास मजबूत उपग्रह मानचित्रण प्रणालियाँ हैं, लेकिन ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOFs) और अस्थिर पर्वतीय ढलानों की निगरानी वास्तविक समय में नहीं की जाती है।
      • यह स्थिर डेटा तेजी से बदलती आपदाओं के साथ सामंजस्य नहीं स्थापित कर पाता है।
    • अप्रभावी संचार: वर्ष 2025 के मानसून के दौरान, बड़े पैमाने पर लघु संदेश सेवा (SMS) अलर्ट जारी किए गए, लेकिन कई अलर्ट जीवन बचाने में विफल रहे।
      • अलर्ट में खतरे की चेतावनी तो दी गई, लेकिन यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि कहाँ से निकलना है, किन मार्गों का उपयोग करना है, या किन मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) का पालन करना है।
  • नियामक व्यवस्था में कमजोरी और “अति आत्मविश्वास”: पहाड़ों की प्राकृतिक सीमाओं के साथ काम करने के बजाय, अक्सर उन पर विकास थोपा जाता है।
    • पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) से बचना: बड़े बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को अनिवार्य पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) से बचने के लिए छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया जाता है।
      • इससे हिमालयी क्षेत्र को हो रहे संयुक्त पर्यावरणीय नुकसान को छिपाया जाता है।
    • भू-गर्भिक जानकारी का अभाव: इंजीनियर अक्सर आक्रामक तरीके से सड़क बनाने हेतु पहाड़ी की कटाई के बाद क्षतिग्रस्त ढलानों को स्थिर करने के लिए जाल, बोल्ट और स्प्रे किए गए कंक्रीट (शॉटक्रेट) का उपयोग करते हैं।
      • यह इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि हिमालय युवा और संवेदनशील पर्वत हैं, जहाँ इस तरह के कठोर इंजीनियरिंग समाधान अक्सर विफल हो जाते हैं।
  • वहनीय क्षमता’ संकट: हिमालय क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों ने इसकी प्राकृतिक सीमाओं को पार कर लिया है।
    • अनियंत्रित दबाव: तीर्थयात्रियों या वाहनों की संख्या पर कोई वैज्ञानिक रूप से निर्धारित सीमा नहीं है। व्यस्त मौसमों के दौरान, सड़कें, शहर और आपातकालीन सेवाएँ अपनी क्षमता से कहीं अधिक दबाव में आ जाती हैं।
    • अतिक्रमण: नदी के बाढ़ क्षेत्रों और भूकंप संभावित क्षेत्रों में निरंतर निर्माण से नुकसान बढ़ गया है। यह वर्ष 2024-2025 की बाढ़ के दौरान इमारतों के ढहने की उच्च दर में स्पष्ट रूप से देखा गया था।
  • दूरदर्शिता की कमी वाले पुनर्निर्माण मॉडल: आपदा के बाद की कार्रवाइयाँ अक्सर अगली आपदा के लिए परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।
    • स्थिरता की बजाय गति को प्राथमिकता: बाढ़ या भूस्खलन के बाद, अधिकारी सड़क संपर्क को शीघ्रता से बहाल करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इस प्रक्रिया में, उचित भू-वैज्ञानिक जाँचों को नजरअंदाज कर दिया जाता है और सड़कें उसी अस्थिर मलबे पर पुनर्निर्मित की जाती हैं, जो पहले ढह गया था।
    • सामाजिक-आर्थिक विलंब: मुआवजे, पुनर्वास और आजीविका सहायता में लंबे समय तक विलंब से पुनर्प्राप्ति धीमी हो जाती है, जिससे दूरस्थ हिमालयी समुदाय बार-बार आपदाओं और दीर्घकालिक असुरक्षा के शिकार होते रहते हैं।

आगे की राह

  • नई नीतिगत रूपरेखा की आवश्यकता: वर्तमान स्थिति शासन व्यवस्था में व्यापक विफलता को दर्शाती है, जिसके कारण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSHE) के दिशा-निर्देशों की ओर अग्रसर होना आवश्यक हो जाता है।
    • जोखिम बढ़ाने वाले कारकों को कम करना: जलवायु परिवर्तन अनियमित वर्षा और हिमनदों के पिघलने की तीव्रता को बढ़ाता है; बुनियादी ढाँचे को इस “जल स्तर में वृद्धि” का सामना करने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए।
    • वैज्ञानिक जवाबदेही: सूचनाओं के अभाव में किया गया इंजीनियरिंग कार्य (जैसे नुकसान होने के बाद अस्थिर ढलानों को स्विस बोल्ट से ठीक करना) को पूर्व-भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों से बदलने की तत्काल आवश्यकता है।
    • भागीरथी पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र का संरक्षण: बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और प्राचीन वृक्षों का स्थानांतरण पारिस्थितिकी रूप से दोषपूर्ण है; जल सुरक्षा और बर्फ पिघलने से पोषित धाराओं में ऑक्सीजन के स्तर के लिए बफर क्षेत्रों का संरक्षण आवश्यक है।
  • शासन और नियामक प्रणाली में परिवर्तन
    • एकीकृत हिमालयी शासन: वर्तमान खंडित, राज्य-वार दृष्टिकोण को प्रतिस्थापित करने और समान नीतियों, मानकों तथा समन्वय को सुनिश्चित करने के लिए एक हिमालयी प्राधिकरण का गठन करें – जो सभी हिमालयी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को शामिल करने वाला एक अंतर-राज्यीय संवैधानिक निकाय हो।
    • क्षेत्र-विशिष्ट प्रभाव आकलन: सामान्य पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को पर्वतीय संवेदनशीलता वाले मानकों से प्रतिस्थापित करें, जिसमें सभी प्रमुख परियोजनाओं, विशेष रूप से ₹50 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं के लिए अनिवार्य भूकंपीय जोखिम जाँच और ढलान स्थिरता लेखापरीक्षा शामिल हो।
    • वहनीयता प्रवर्तन: भीड़भाड़, बुनियादी ढाँचे पर दबाव और आपदा जोखिम को रोकने के लिए वैज्ञानिक दिशा-निर्देशों के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और वाहनों की दैनिक सीमा कानूनी रूप से निर्धारित करें।
  • अवसंरचना और इंजीनियरिंग सुधार
    • पहाड़-अनुकूल डिजाइन: आक्रामक सड़क चौड़ीकरण मॉडल को पहाड़-अनुकूल सड़क डिजाइनों से बदलें, जो पहाड़ी कटाई को कम करें और प्राकृतिक ढलानों की रक्षा करें।
    • कम निर्माण, समझदारी से निर्माण” दृष्टिकोण: नए निर्माण के बजाय मौजूदा सड़कों, पुलों और सुरंगों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करें। सभी नए बुनियादी ढाँचे को चरम जलवायु घटनाओं का सामना करने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए।
    • मलबे से मुक्ति नीति: जीपीएस ट्रैकिंग और निगरानी प्रणालियों का उपयोग करके निर्माण अपशिष्ट (मलबे) पर सख्त नियंत्रण लागू करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि इसे नदियों में न डाला जाए, जो वर्तमान में बाढ़ और नदी के उफान की समस्या को और बढ़ा देता है।
    • जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचा: सभी हिमालयी परियोजनाओं में आपदा प्रतिरोध को एक मुख्य नियम बनाएँ, न कि बाद में जोड़ा जाने वाला विचार।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और सामुदायिक सुरक्षा
    • एकीकृत डेटा प्रणाली: जिला अधिकारियों और ग्राम प्रधानों के लिए वास्तविक समय में आपदा संबंधी जानकारी प्रदान करने वाला एक हिमालयी डेटा ग्रिड बनाएँ, जिसमें उपग्रह डेटा, मौसम पूर्वानुमान और जमीनी सेंसरों का संयोजन हो।
    • जन-केंद्रित चेतावनी: SMS चेतावनियों से आगे बढ़कर स्थानीय भाषा में वॉइस कॉल, सायरन और घाटी-विशिष्ट निकासी मार्गदर्शन प्रदान करें, ताकि चेतावनियाँ केवल सूचनात्मक न होकर कार्रवाई योग्य बन सकें।
    • जल सुरक्षा के लिए वसंत ऋतुओं का पुनरुद्धार: सूखे पहाड़ी झरनों को पुनर्जीवित करने के लिए वसंत ऋतु पुनरुद्धार कार्यक्रमों का विस्तार करें, जिससे पेयजल की उपलब्धता, मृदा की नमी और वनाग्नि की रोकथाम सुनिश्चित हो सके।
  • प्रकृति आधारित और पारिस्थितिकी तंत्र समाधान
    • प्राकृतिक ढलान संरक्षण: मिट्टी को प्राकृतिक रूप से बाँधे रखने और ढलानों को स्थिर करने वाले गहरी जड़ों वाले देशी वृक्षों (जैसे ओक और देवदार) को बढ़ावा दें, न कि व्यावसायिक वृक्षारोपण प्रजातियों को, जो पहाड़ियों को कमजोर करती हैं।
    • वन और नदी बफर क्षेत्र: जल प्रवाह, ऑक्सीजन स्तर और जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए, पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों, नदी तटों और वन बफर क्षेत्रों को स्थानांतरित करने के बजाय उनका संरक्षण करें।
    • सतत् पर्यटन मॉडल: अति पर्यटन से हटकर सामान्य पर्यावरण-पर्यटन की ओर बढ़ना, जहाँ पर्यटन से होने वाली आय सीधे वन संरक्षण, वसंत ऋतुओं के पुनरुद्धार और स्थानीय आजीविका में सहायक हो।

निष्कर्ष

हिमालयी विकास की आधारशिला लचीलापन होना चाहिए। जैसा कि सेंडाई फ्रेमवर्क हमें याद दिलाता है, “आपदाएँ प्राकृतिक नहीं होतीं, वे समाज में अंतर्निहित जोखिमों का परिणाम होती हैं।” SDG-11 (सतत् शहर और समुदाय) और SDG-13 (जलवायु कार्रवाई) के अनुरूप, भविष्य के पर्यावरणीय मॉडल को प्रकृति पर नियंत्रण से सह-अस्तित्व की ओर और परियोजना-आधारित विकास से पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित शासन की ओर स्थानांतरित होना चाहिए।

संदर्भ

जनवरी 2026 में, केरल बैसिलस सब्टिलिस (Bacillus Subtilis)  को अपना राजकीय सूक्ष्मजीव घोषित करने वाला भारत का प्रथम राज्य बना।

  • इसी के साथ, केरल राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद (KSCSTE) के अंतर्गत केरल विकास एवं नवाचार रणनीतिक परिषद (K-DISC) के सहयोग से माइक्रोबायोम उत्कृष्टता केंद्र (CoEM) का उद्घाटन किया गया।

संबंधित तथ्य

भारत का राष्ट्रीय सूक्ष्मजीव 

  • वर्ष 2012 में घोषित: ‘लैक्टोबैसिलस डेलब्रुएकी उप-प्रजाति बुल्गेरिकस’ (Lactobacillus delbrueckii subsp. bulgaricus) को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा भारत का राष्ट्रीय सूक्ष्मजीव घोषित किया गया।
  • महत्त्व: दही एवं योगर्ट जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों, पोषण, आँत्र स्वास्थ्य तथा प्रतिरक्षा में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को मान्यता दी गई, जिससे दैनिक जीवन में सूक्ष्मजीवों के महत्त्व को रेखांकित किया गया।

बैसिलस सब्टिलिस’ के बारे में

  • बैसिलस सब्टिलिस’ एक लाभकारी एवं गैर-रोगजनक जीवाणु है, जो मृदा, किण्वित खाद्य पदार्थों तथा मानव आँत्र में पाया जाता है।
  • विशेषताएँ 
    • यह एक ग्राम-पॉजिटिव, छड़ीनुमा (बैसिलस) जीवाणु है, जिसकी लंबाई सामान्यतः 2 से 6 माइक्रोमीटर होती है।
    • यह एक वैकल्पिक वायवीय जीवाणु है तथा पेरिट्राइकोस के माध्यम से संचरण करता है।
    • यह द्विखंडन द्वारा अलैंगिक जनन करता है, जिससे इसकी तीव्र वृद्धि संभव होती है।
    • पर्यावरणीय तनाव अथवा पोषक तत्त्वों की कमी की अवस्था में यह एक जटिल विभेदन प्रक्रिया द्वारा अत्यधिक प्रतिरोधी एवं सुप्त अंतःबीजाणु का निर्माण करता है, जिससे यह कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है।
  • मुख्य भूमिकाएँ
    • यह प्रोबायोटिक के रूप में कार्य करता है, जिससे आँत्र स्वास्थ्य एवं प्रतिरक्षा को बल मिलता है।
    •  यह रोग-दमन एवं मृदा स्वास्थ्य में सुधार के माध्यम से कृषि उत्पादकता को बढ़ाता है।
    • इसका उपयोग जैव-नियंत्रण, जैव-उर्वरकों तथा औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी में किया जाता है, जहाँ इसे अपघटन हेतु अथवा आदर्श जीव के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

माइक्रोबायोम उत्कृष्टता केंद्र (CoEM) के बारे में

  • CoEM केरल राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के अंतर्गत, केरल विकास एवं नवाचार रणनीतिक परिषद के सहयोग से स्थापित एक सरकारी संस्था है, जिसका उद्देश्य माइक्रोबायोम अनुसंधान को प्रोत्साहित करना है।
  • यह देश की प्रथम संस्था है, जो मानव स्वास्थ्य, पोषण, प्रतिरक्षा, कृषि, मत्स्यपालन तथा पर्यावरण संरक्षण सहित अनेक क्षेत्रों में माइक्रोबायोम-आधारित प्रयोगात्मक एवं अनुप्रयोग अनुसंधान को एक ही मंच के अंतर्गत समाहित करती है।
  • आदर्श वाक्य: ‘माइक्रोब्स फॉर लाइफ’
  • उद्देश्य
    • मानव स्वास्थ्य, पोषण, प्रतिरक्षा, कृषि, मत्स्यपालन एवं पर्यावरण में सूक्ष्मजीवों की भूमिका का अध्ययन करना।
    • माइक्रोबायोम अनुसंधान को व्यावसायिक रूप से उपयोगी प्रौद्योगिकियों एवं उत्पादों में रूपांतरित करना।
    • माइक्रोबायोम विज्ञान में अंतःविषय अनुसंधान, नवाचार तथा नवोद्यम पारिस्थितिकी तंत्र को प्रोत्साहित करना।

भारतीय अर्थव्यवस्था में सूक्ष्मजीवों की भूमिका

  • बाजार मूल्य: सूक्ष्मजीवी किण्वन उद्योग का मूल्य लगभग 4.47 अरब अमेरिकी डॉलर है, जिसके वर्ष 2030 तक 8 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होने का अनुमान है।
  • उपयोग: प्रतिजैविक, टीके, एंजाइम, जैविक उत्पादों तथा सक्रिय औषधीय घटकों के उत्पादन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण।
  • विस्तार: प्रोबायोटिक तथा जैव-इनपुट्स का विस्तारित बाजार, जो सतत् कृषि एवं स्वास्थ्य क्षेत्र को समर्थन प्रदान करता है।

केरल द्वारा ‘बैसिलस सब्टिलिस’ को दी गई मान्यता यह दर्शाती है कि सूक्ष्मजीव स्वास्थ्य, सतत् कृषि तथा विज्ञान-आधारित नवाचार के माध्यम से भारत की उभरती जैव-अर्थव्यवस्था के प्रमुख प्रेरक तत्त्व हैं।

संदर्भ

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) नेस्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर’ 2026 (State of Finance for Nature 2026) रिपोर्ट जारी की है।

स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर’ रिपोर्ट के बारे में 

  • अवलोकन: ‘स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर’ (SFN) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के नेतृत्व में, उसके साझेदारों (जैसे- इकोनॉमिक्स ऑफ लैंड डिग्रेडेशन इनिशिएटिव और विविड इकोनॉमिक्स) के सहयोग से तैयार की जाने वाली एक वार्षिक वैश्विक आकलन रिपोर्ट है।
  • पहला प्रकाशन: वर्ष 2021 में,स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर: ट्रिपलिंग इन्वेस्टमेंट्स इन नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस बाय 2030” शीर्षक से।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • प्राकृतिक रूप से नकारात्मक गतिविधियों हेतु वित्तीयन: वर्ष 2023 में, US$7.3 ट्रिलियन प्राकृतिक रूप से नकारात्मक गतिविधियों में प्रयुक्त हुआ, जबकि केवल US$220 बिलियन प्रकृति-आधारित समाधान (NbS) में गया।
    • नकारात्मक बनाम सकारात्मक वित्त का अनुपात: 30:1 से अधिक।
  • ट्रिपल प्लैनेटरी’ संकट: UNEP ने चेतावनी दी कि यह असंतुलन जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता क्षरण और प्रदूषण के ट्रिपल प्लैनेटरी’ संकट (Triple Planetary Crisis) को बढ़ावा दे रहा है।

प्राकृतिक रूप से सकारात्मक’ और ‘प्राकृतिक रूप से नकारात्मक’ वित्त

  • प्राकृतिक रूप से सकारात्मक’ वित्त से तात्पर्य उन निवेशों से है, जो पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, पुनर्स्थापन अथवा सतत् प्रबंधन में सहायक होते हैं, जैसे- प्रकृति-आधारित समाधान (NbS)
  • इसके विपरीत,  ‘प्राकृतिक रूप से नकारात्मक’ वित्त में वे निवेश और सब्सिडियाँ शामिल हैं जो प्राकृतिक पूँजी को क्षति पहुँचाती हैं, जैसे- पर्यावरण-हानिकारक सब्सिडियाँ और संसाधन-गहन औद्योगिक गतिविधियाँ।

  • प्राकृतिक रूप से नकारात्मक’ वित्त के स्रोत
    • निजी पूँजी: लगभग $5 ट्रिलियन प्राकृतिक रूप से नकारात्मक’ वित्त निजी निवेश से प्राप्त हुआ, जो उपयोगिताएँ, औद्योगिक क्षेत्र, ऊर्जा और बुनियादी सामग्री जैसे उच्च-प्रभाव वाले क्षेत्रों में केंद्रित था।
    • हानिकारक सब्सिडियाँ: अतिरिक्त $2.4 ट्रिलियन पर्यावरण के लिए हानिकारक सब्सिडियों के रूप में प्रवाहित हुआ, जो मुख्यतः जीवाश्म ईंधन, कृषि, जल उपयोग तथा परिवहन और निर्माण क्षेत्रों को समर्थन देता है।
    • जीवाश्म ईंधन को सबसे अधिक हिस्सा प्राप्त हुआ, जो कुल सब्सिडियों का 47 प्रतिशत था, इसके बाद कृषि और जल उपयोग का हिस्सा 17-17 प्रतिशत था।

  • निवेश अंतर: UNEP ने रेखांकित किया कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों (रियो कन्वेंशन) और जैव-विविधता प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए NbS में निवेश को न्यूनतम 2.5 गुना बढ़ाकर वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष $571 बिलियन करना आवश्यक है।

  • सकारात्मक प्रगति के क्षेत्र
    • हानिकारक निजी निवेश में कमी: तेल और गैस सहित प्रकृति के लिए सबसे हानिकारक क्षेत्रों में निजी निवेश वर्ष 2020 में $990 बिलियन से घटकर वर्ष 2023 में $519 बिलियन रह गया, अर्थात् 48 प्रतिशत की गिरावट हुई।
    • NbS वित्त में वृद्धि: NbS के लिए सार्वजनिक और निजी वित्त प्रवाह वर्ष 2023 में $220 बिलियन तक पहुँचा, जो वर्ष 2022 की तुलना में 5 प्रतिशत अधिक है।
  • नेचर ट्रांजिशन X-कर्व (Nature Transition X-Curve)
    • यह रिपोर्टनेचर ट्रांजिशन X-कर्व” प्रस्तुत करती है, जो सरकारों और व्यवसायों के लिए एक व्यावहारिक ढाँचा है:
      • प्राकृतिक रूप से नकारात्मक’ वित्त को चरणबद्ध रूप से समाप्त करना।
      • प्राकृतिक रूप से सकारात्मक’ वित्त तथा NbS निवेशों का विस्तार करना।
    • पृथक परियोजनाओं के स्थान पर प्रणालीगत आर्थिक परिवर्तन पर बल।

मुख्य अनुशंसाएँ

  • सब्सिडी सुधार: पर्यावरण-हानिकारक सब्सिडियों का सुधार और पुनःउद्देश्यीकरण, नेचर ट्रांजिशन के वित्तपोषण का सबसे प्रभावी साधन माना गया है।
    • NbS, जलवायु अनुकूलन और जैव-विविधता संरक्षण की ओर बचत का पुनर्निर्देशन।
  • नियामक संरेखण: सरकारों को राजकोषीय नीतियों, विनियमों और प्रोत्साहनों को प्रकृति तथा पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के वास्तविक आर्थिक मूल्य के अनुरूप बनाना चाहिए।
    • NbS को पर्यावरणीय अनुदान नहीं, बल्कि आर्थिक अवसंरचना के रूप में देखा जाना चाहिए।
  • प्रकटीकरण और पारदर्शिता: कंपनियों और वित्तीय संस्थानों को प्रकृति-संबंधी निर्भरताओं, प्रभावों, जोखिमों और अवसरों का प्रकटीकरण करना अनिवार्य किया जाए।
    • निवेश व्यवहार और पूँजी आवंटन में परिवर्तन के लिए यह आवश्यक है।
  • संयुक्त पूँजी और जोखिम न्यूनीकरण: निजी पूँजी को बड़े पैमाने पर आकर्षित करने के लिए संयुक्त पूँजी तंत्रों और जोखिम न्यूनीकरण उपकरणों का विस्तार आवश्यक है।

प्रकृति आधारित समाधान (NbS) के बारे में

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के अनुसार, प्रकृति-आधारित समाधान वे क्रियाएँ हैं, जो प्राकृतिक या संशोधित पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, संरक्षण, पुनर्स्थापन, सतत् उपयोग और प्रबंधन करती हैं, तथा सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय चुनौतियों का प्रभावी व अनुकूलनशील समाधान प्रदान करती हैं, साथ ही मानव कल्याण, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ, लचीलापन और जैव-विविधता लाभ सुनिश्चित करती हैं।
  • प्रकृति आधारित समाधानों का महत्त्व
    • जलवायु और जैव-विविधता लाभ: NbS जलवायु परिवर्तन के शमन, जैव-विविधता क्षरण को रोकने और पारिस्थितिकी तंत्र की सहनशीलता बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, साथ ही मानव कल्याण में सुधार करते हैं।
    • परस्पर सहायक लाभ: कुछ NbS जलवायु, जैव-विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र और आजीविका के लिए एक साथ लाभ प्रदान करते हैं।
      • उदाहरण के लिए, पीटलैंड्स का बेहतर प्रबंधन जलवायु शमन और अनुकूलन में सहायक होता है, साथ ही आवास संरक्षण और मृदा उर्वरता बनाए रखता है।
    • लागत-प्रभावशीलता: प्रकृति आधारित समाधान लागत-प्रभावी निवेश विकल्प हैं, जो विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के माध्यम से दीर्घकालिक पारिस्थितिकी और आर्थिक प्रतिफल प्रदान करते हैं।

प्रकृति आधारित  समाधानों की दिशा में प्रमुख पहलें

  • कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव-विविधता रूपरेखा (GBF) का उद्देश्य वर्ष 2030 तक वैश्विक भूमि और समुद्री क्षेत्रों के 30 प्रतिशत की रक्षा करना है तथा हानिकारक सब्सिडियों में प्रति वर्ष USD 500 बिलियन की कमी का आह्वान करता है।
  • MISHTI योजना (मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटैट्स एंड टैन्जिबल इनकम्स) भारत के तटीय क्षेत्रों और लवणीय क्षेत्रों में मैंग्रोव रोपण पर केंद्रित है, जिससे पारिस्थितिकी अनुकूलन और आजीविका दोनों सुदृढ़ होते हैं।
  • अमृत धरोहर योजना समुदाय की भागीदारी और सतत् आजीविका के एकीकरण के माध्यम से रामसर-नामित आर्द्रभूमियों के संरक्षण का लक्ष्य रखती है।

संदर्भ:

भारत स्पेसटेक-2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के वर्ष 2030 तक विश्व की तीसरी सबसे बड़ी स्पेस-टेक अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान है। इसका शीर्षक भारत की अंतरिक्ष यात्रा” (India’s Space Odyssey) है (और जिसे वेंचर कैपिटल फर्म आर्कम वेंचर्स द्वारा जारी किया गया)।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु 

  • मुख्य अनुमान
    • अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार: भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के वर्ष 2030 तक (13 अरब डॉलर से) बढ़कर 40 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।
    • वैश्विक रैंकिंग: पारिस्थितिकी तंत्र में संरचनात्मक परिवर्तन के कारण वर्ष 2030 तक भारत के वैश्विक स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी स्पेस-टेक अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान है।
    • वृद्धि दर: इस क्षेत्र के वैश्विक औसत वृद्धि दर से दोगुनी गति से बढ़ने का पूर्वानुमान है।
    • निवेश अनुमान: रिपोर्ट के अनुसार, अगले पाँच वर्षों में भारतीय स्पेसटेक स्टार्ट-अप्स में 3 से 3.5 अरब डॉलर का वेंचर कैपिटल और निजी इक्विटी निवेश आने का अनुमान है।
  • अंतरिक्ष तकनीक विकास के प्रमुख चालक
    • लागत-कुशल इंजीनियरिंग: भारत की मितव्ययी अभियांत्रिकी की परंपरा ने अंतरिक्ष अभियानों में कम लागत पर उच्च प्रभाव वाले समाधान संभव किए हैं।
    • मजबूत विनिर्माण क्षमताएँ: सशक्त घरेलू विनिर्माण आधार एंड-टू-एंड स्पेस-टेक विकास को समर्थन प्रदान करता है।
    • स्टार्ट-अप आधारित नवाचार: स्टार्ट-अप्स की नई पीढ़ी वैश्विक ग्राहकों के लिए उन्नत अंतरिक्ष तकनीकों का विकास कर रही है।
  • निवेशकों का बदलता ध्यान
    • लॉन्च हार्डवेयर से आगे बढ़ना: जैसे-जैसे सैटेलाइट डेटा व्यावसायिक रूप से अधिक व्यवहार्य होता जा रहा है, निवेशकों की रुचि पूँजी-गहन लॉन्च प्रणालियों से हटकर डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो रही है।
    • विकास के क्षेत्र: स्पेस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर आधारित डेटा प्लेटफॉर्म, एनालिटिक्स, क्लाइमेट इंटेलिजेंस और एप्लिकेशन-लेयर समाधान पर ध्यान बढ़ रहा है।
    • रणनीतिक परिवर्तन: वित्तपोषण अब केवल लॉन्च वाहनों तक सीमित न रहकर, एप्लिकेशन और इंटेलिजेंस लेयर्स के अधिक निकट जा रहा है।
  • स्टार्ट-अप इकोसिस्टम
    • स्टार्ट-अप्स का पैमाना: विगत पाँच वर्षों में 300 से अधिक स्पेस-टेक स्टार्ट-अप्स उभरकर सामने आए हैं।
    • प्रमुख क्षेत्र: ये स्टार्ट-अप्स सैटेलाइट निर्माण, पृथ्वी अवलोकन, लॉन्च वाहन और इन-स्पेस समाधान जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
    • नीति प्रेरक तत्त्व: भारत की अंतरिक्ष नीति के निर्माण के बाद, भारतीय स्पेस-टेक क्षेत्र में आने वाला दो-तिहाई से अधिक पूँजी प्रवाह विगत पाँच वर्षों में हुआ है।
  • भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता
    • शीर्ष वैश्विक अभिकर्ता : रिपोर्ट के अनुसार, स्पेस-टेक मूल्य शृंखला में विश्व की शीर्ष 10 कंपनियों में पाँच भारतीय कंपनियों के शामिल होने का अनुमान है।
    • नेतृत्व के क्षेत्र: इनमें प्रक्षेपण यान, अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता, पृथ्वी अवलोकन उपग्रह  निर्माण और अंतरिक्ष मलबा प्रबंधन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  • संचालन संबंधी पूर्वानुमान
    • प्रक्षेपण सेवाएँ: भारतीय निजी अभिकर्ता वैश्विक ग्राहकों के लिए वार्षिक रूप से 40–45 प्रक्षेपण करने की संभावना रखते हैं।
    • सैटेलाइट विनिर्माण: भारत विश्व के पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों के एक-तिहाई का निर्माण कर सकता है।
    • निर्यात: भारतीय कंपनियाँ वैमानिकी, वैश्विक नौवहन उपग्रह प्रणाली (GNSS), उपग्रह संचार और ग्राउंड रेडियो फ्रिक्वेंसी सिस्टम्स के प्रमुख निर्यातक के रूप में उभरने की संभावना रखती हैं।

अंतरिक्ष-तकनीक अर्थव्यवस्था

स्पेस-टेक अर्थव्यवस्था उस आर्थिक गतिविधियों, उद्योगों और सेवाओं को संदर्भित करती है, जो अंतरिक्ष तकनीकों और अंतरिक्ष-आधारित संसाधनों जैसे उपग्रह, प्रक्षेपण यान, ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशन से उत्पन्न होती हैं।

  • मुख्य घटक
    • अपस्ट्रीम सेगमेंट
      • उपग्रह  विनिर्माण
      • प्रक्षेपण सेवाएँ (रॉकेट, स्पेसपोर्ट)
      • अंतरिक्ष यान के घटक और प्रणोदन
    • मिडस्ट्रीम सेगमेंट
      • ग्राउंड स्टेशन
      • सैटेलाइट नियंत्रण, डेटा रिले, अंतरिक्ष स्थिति जागरूकता
    • डाउनस्ट्रीम सेगमेंट: सैटेलाइट आधारित सेवाएँ जैसे:
      • संचार (टीवी, इंटरनेट, 5G बैकहॉल)
      • नेविगेशन (GPS, NavIC)
      • पृथ्वी अवलोकन (कृषि, आपदा प्रबंधन, जलवायु निगरानी)
      • रक्षा एवं सुरक्षा अनुप्रयोग।

प्रमुख भारतीय अंतरिक्ष-तकनीक स्टार्ट-अप और नवाचार

  • स्काइरूट एयरोस्पेस: यह पहली निजी भारतीय कंपनी बनी, जिसने वर्ष 2022 में विक्रम-एस रॉकेट लॉन्च किया; वर्तमान में यह विक्रम-आई विकसित कर रही है, जो कार्बन-कंपोजिट चरण और त्वरित निर्माण तकनीक का उपयोग करने वाला एक व्यावसायिक कक्षीय प्रक्षेपक होगा।
  • अग्निकुल कॉस्मॉस: इन्होंने अग्निबाण विकसित किया, जो विश्व के पहले पूरी तरह 3D-प्रिंटेड सिंगल-पीस रॉकेट इंजन द्वारा संचालित है, जिसे चेन्नई में बनाया गया; यह श्रीहरिकोटा में भारत का पहला निजी लॉन्चपैड भी संचालित करती है।
  • पिक्सल (Pixel): यह विश्व की पहली हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट कंसटेलेशन में से एक का निर्माण कर रहा है, जो कृषि, जलवायु मॉडलिंग, ESG निगरानी और प्रदूषण ट्रैकिंग में सहायता करता है; तथा इसने NASA के साथ होस्टेड पेलोड मिशन्स के लिए साझेदारी भी की है।
  • ध्रुव स्पेस (Dhruva Space): यह सैटेलाइट हार्डवेयर, मिशन इंटीग्रेशन, मॉड्यूलर सैटेलाइट बस, डिप्लॉयर और ऑनबोर्ड कंप्यूटर पर केंद्रित है तथा कक्षा में डेमोंस्ट्रेशन मिशन का समर्थन करता है।

भारत में अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदम

  • भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023: यह नीति ISRO, IN-SPACe और निजी अभिकर्ताओं की भूमिकाएँ निर्धारित करती है, वाणिज्यीकरण तथा अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर जोर देती है, जबकि ISRO रणनीतिक मिशनों पर केंद्रित रहेगा।
    • अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का उदारीकरण
      • सैटेलाइट कंपोनेंट्स, उप-प्रणालियाँ (Subsystems), ग्राउंड सेगमेंट और उपयोगकर्ता खंड के निर्माण हेतु स्वचालित मार्ग से 100% FDI अनुमत है।
      • पूर्ण सैटेलाइट के निर्माण और संचालन के लिए स्वचालित मार्ग से 74% तक FDI की अनुमति है; इस सीमा से अधिक निवेश हेतु सरकारी मंजूरी आवश्यक होगी।
  • IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रचार और प्राधिकरण केंद्र): IN-SPACe भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए एकल-खिड़की नियामक और सुविधा प्रदान करने वाला निकाय है, जो नीति स्पष्टता, अनुमतियाँ और मार्गदर्शन सहायता प्रदान करता है।
  • न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL): यह ISRO की वाणिज्यिक शाखा के रूप में कार्य करती है और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों, सैटेलाइट लॉन्च तथा सेवाओं का व्यावसायीकरण करने की जिम्मेदारी निभाती है, जिससे भारत की वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में उपस्थिति का विस्तार होता है।
  • बजट समर्थन: केंद्रीय बजट 2025–26 में, सरकार ने अंतरिक्ष विभाग के लिए लगभग ₹13,416 करोड़ का आवंटन किया, जो अंतरिक्ष अवसंरचना, अनुसंधान और रणनीतिक मिशनों में निरंतर सार्वजनिक निवेश को दर्शाता है।
  • रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) और DSRO: भारत ने वर्ष 2019 में रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) और रक्षा अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (DSRO) की स्थापना की, ताकि अंतरिक्ष संसाधनों के सैन्य उपयोग का समन्वय किया जा सके और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए नागरिक अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों का एकीकरण सुनिश्चित हो।

  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी परिदृश्य
    • स्पेसएक्स प्रभुत्व: स्पेसएक्स ने वर्ष 2024 में 134 और वर्ष 2025 में 165 कक्षीय प्रक्षेपण किए, जिनमें अधिकांश स्टारलिंक कंसटेलेशन को तैनात किए गए।
    • रॉकेट लैब: अमेरिका स्थित रॉकेट लैब ने वर्ष 2025 में 21 कक्षीय प्रक्षेपण किए, जो इसका वार्षिक  उच्चतम रिकॉर्ड है।
  • भारत में स्थिति
    • वर्तमान प्रक्षेपण क्षमता: भारत वर्तमान में प्रति वर्ष केवल 5–6 प्रमुख प्रक्षेपण करता है, जिनका नेतृत्व मुख्यतः ISRO द्वारा किया जाता है।

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