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Jan 28 2026

शांतिकालीन वीरता पुरस्कार

77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला (IAF) को ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया, जो भारत का शांति काल के समय प्राप्त होने वाला  सर्वोच्च सैन्य सम्मान है।

ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला (IAF)

  • वह जून 2025 में स्पेसएक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट में सवार होकर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) का दौरा करने वाले पहले भारतीय बने।
  • वह राकेश शर्मा के बाद अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले दूसरे भारतीय हैं, जिन्हें अशोक चक्र से भी सम्मानित किया गया था।
  • उन्हें विभिन्न लड़ाकू तथा परिवहन विमानों पर 2,000 घंटे से अधिक की  उड़ान अनुभव प्राप्त है।

वर्ष 2026 अन्य पुरस्कार

  • कुल पुरस्कार: वीरता के लिए 70 कर्मियों को सम्मानित किया गया, जिनमें मरणोपरांत कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र पुरस्कार भी शामिल हैं।

वीरता पुरस्कारों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है—युद्धकालीन पुरस्कार तथा शांतिकालीन पुरस्कार।

शांतिकालीन वीरता पुरस्कारों के बारे में

  • शांति काल में दिए जाने वाले वीरता पुरस्कार सक्रिय युद्धक्षेत्र अभियानों से बाहर सशस्त्र बलों और नागरिकों द्वारा दिखाए गए असाधारण साहस, वीरता और आत्म-बलिदान को मान्यता देते हैं।
  • अशोक चक्र: युद्धक्षेत्र से दूर “सर्वाधिक विशिष्ट वीरता” या आत्म-बलिदान के लिए प्रदान किया जाने वाला सर्वोच्च शांतिकालीन सैन्य अलंकरण।
  • कीर्ति चक्र: शत्रु के प्रत्यक्ष समक्ष न होने की स्थिति में प्रदर्शित विशिष्ट वीरता के लिए प्रदान किया जाने वाला द्वितीय सर्वोच्च पुरस्कार।
  • शौर्य चक्र: साहस और पराक्रमपूर्ण कार्रवाई को मान्यता देने वाला तृतीय सर्वोच्च पुरस्कार, जो प्रायः आतंकवाद-रोधी अथवा आंतरिक सुरक्षा अभियानों में प्रदान किया जाता है।
  • प्राधिकरण: शांतिकालीन वीरता पुरस्कारों पर विचार केंद्रीय सम्मान एवं पुरस्कार समिति (CH&AC) द्वारा किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री करते हैं तथा जिसमें तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और गृह सचिव सदस्य होते हैं।
    • सभी पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किए जाते हैं।
  • पात्रता: ये पुरस्कार सैन्य कर्मियों तथा नागरिकों दोनों को प्रदान किए जाते हैं और अनेक मामलों में मरणोपरांत भी दिए जाते हैं।

युद्धकालीन वीरता पुरस्कार (भारत) के बारे में

  • उद्देश्य: युद्धकालीन वीरता पुरस्कार युद्ध या सशस्त्र संघर्ष के दौरान दुश्मन का सामना करते हुए सशस्त्र बलों के कर्मियों द्वारा दिखाई गई असाधारण बहादुरी, नेतृत्व और आत्म-बलिदान को मान्यता देते हैं।
  • सर्वोच्च सम्मान: युद्धकालीन तीन प्रमुख पुरस्कार प्रतिष्ठा के अवरोही क्रम में परम वीर चक्र (PVC), महावीर चक्र (MVC) और वीर चक्र (VrC) हैं।
  • मानदंड: ये पुरस्कार युद्ध अभियानों के दौरान, प्रायः जीवन के अत्यधिक जोखिम की स्थिति में प्रदर्शित विशिष्ट साहस, दुस्साहस अथवा सर्वोच्च पराक्रम के कार्यों के लिए प्रदान किए जाते हैं।
  • विशेषताएँ: ये पुरस्कार मरणोपरांत भी दिए जा सकते हैं, उच्च प्रतीकात्मक महत्त्व रखते हैं (इनसे कोई उपाधि या उपसर्ग/प्रत्यय नहीं जुड़ता) तथा गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर घोषित किए जाते हैं।

पद्म पुरस्कार 2026

गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारत एवं विदेशों में विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देते हुए 131 पद्म पुरस्कारों को स्वीकृति प्रदान की।

पृष्ठभूमि

  • नागरिक सेवा पुरस्कार सर्वाधिक प्रतिष्ठित सम्मानों में शामिल हैं।
  • भारत सरकार ने वर्ष 1954 में दो नागरिक पुरस्कार भारत रत्न और पद्म विभूषण की स्थापना की थी।
  • इन्हें वर्ष 1955 में क्रमशः पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री नाम दिया गया।

पद्म पुरस्कारों के बारे में

  • वर्ष 1954 में स्थापित पद्म पुरस्कार, भारत रत्न के बाद भारत के द्वितीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान हैं, जो सार्वजनिक जीवन में विशिष्ट सेवा और असाधारण योगदान को मान्यता प्रदान करते हैं।
  • पद्म पुरस्कारों के प्रकार
    • पद्म विभूषण: असाधारण एवं विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया जाता है।
    • पद्म भूषण: उच्च कोटि की विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया जाता है।
    • पद्म श्री: किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट सेवा के लिए प्रदान किया जाता है।
  • पात्रता: जाति, व्यवसाय, पद या लैंगिक भेद के बिना सभी व्यक्ति पात्र हैं; वर्ष 2014 से “अज्ञात नायकों (Unsung Heroes)” को मान्यता देने पर विशेष बल दिया गया है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • ये पुरस्कार गणतंत्र दिवस पर घोषित किए जाते हैं और सामान्यतः मार्च–अप्रैल में भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किए जाते हैं।
    • पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं को एक सनद और पदक प्रदान किया जाता है।
      • यह कोई उपाधि नहीं है और इसे उपसर्ग या प्रत्यय के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद-18(1))
    • मरणोपरांत तथा विदेशी/प्रवासी श्रेणियों को छोड़कर, वार्षिक अधिकतम 120 पुरस्कार दिए जा सकते हैं।
    • सिफारिशें प्रधानमंत्री द्वारा प्रतिवर्ष गठित पद्म पुरस्कार समिति द्वारा की जाती हैं, जिसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करते हैं।

पद्म पुरस्कार 2026

  • कुल पुरस्कार: 131 (युग्म सहित)
    • पद्म विभूषण: 5
    • पद्म भूषण: 13
    • पद्म श्री: 113
  • इनमें 19 महिला प्रमुख पुरस्कार प्राप्तकर्ता, 16 मरणोपरांत सम्मान तथा 6 विदेशी/NRI/OCI प्राप्तकर्ता शामिल हैं।
  • प्रमुख पुरस्कार प्राप्तकर्त्ता
    • पद्म विभूषण (मरणोपरांत): वी.एस. अच्युतानंदन (सार्वजनिक कार्य), धर्मेंद्र (कला), शिबू सोरेन (सार्वजनिक कार्य)।
    • अन्य: न्यायमूर्ति के. टी. थॉमस, वायलिन वादक एन. राजम, शिक्षाविद् पी. नारायणन।
  • कला, सार्वजनिक कार्य, खेल, साहित्य एवं सामाजिक सेवा सहित विविध क्षेत्रों का व्यापक प्रतिनिधित्व।

जीवन रक्षा पदक शृंखला पुरस्कार , 2025

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जीवन रक्षा पदक शृंखला पुरस्कार 2025 को स्वीकृति प्रदान की, जिसके अंतर्गत जीवन बचाने में असाधारण साहस के लिए 30 व्यक्तियों को सम्मानित किया गया, जिनमें छह मरणोपरांत पुरस्कार प्राप्तकर्ता भी शामिल हैं।

जीवन रक्षा पदक शृंखला पुरस्कार, 2025

  • जीवन रक्षा पदक किसी अन्य व्यक्ति के जीवन की रक्षा के लिए प्रदर्शित उदाहरणीय साहस और मानवीय भावना के कार्यों को मान्यता प्रदान करता है।
  • श्रेणियाँ: जोखिम की गंभीरता के आधार पर ये पुरस्कार तीन श्रेणियों में प्रदान किए जाते हैं:
    • सर्वोत्तम जीवन रक्षा पदक
    • उत्तम जीवन रक्षा पदक
    • जीवन रक्षा पदक।
  • स्थापना: वर्ष 1961 में, अशोक चक्र शृंखला के वीरता पुरस्कारों की एक उपश्रेणी के रूप में।
  • निर्णय प्रक्रिया: सिफारिशों की जाँच गृह मंत्रालय द्वारा की जाती है, जो प्रस्तावों को प्रक्रिया के पश्चात् स्वीकृति हेतु प्रस्तुत करता है।
  • प्रदानकर्ता: ये पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किए जाते हैं और सामान्यतः गणतंत्र दिवस के अवसर पर घोषित किए जाते हैं।
  • विशेषताएँ: यह पुरस्कार समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों के लिए उपलब्ध है, मरणोपरांत भी प्रदान किया जा सकता है तथा इसके अंतर्गत एक पदक और सनद दी जाती है।
  • पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं को निम्नलिखित एकमुश्त मौद्रिक अनुदान प्रदान किया जाता है:
    • सर्वोत्तम जीवन रक्षा पदक: ₹ 2,00,000/-
    • उत्तम जीवन रक्षा पदक: ₹ 1,50,000/-
    • जीवन रक्षा पदक: ₹ 1,00,000/-
  • जीवन रक्षा पदक पुरस्कार, 2025–26
    • कुल पुरस्कारार्थी: 30 व्यक्तियों को सम्मानित किया गया, जिनमें 6 सर्वोत्तम, 6 उत्तम और 18 जीवन रक्षा पदक प्राप्तकर्ता शामिल हैं।
    • विशेष मुख्य बिंदु: जीवन रक्षक कार्यों में किए गए सर्वोच्च बलिदान को रेखांकित करते हुए छह पुरस्कार मरणोपरांत प्रदान किए गए।

भारतीय कृषि में जलवायु अनुकूलन का एटलस (ACASA – India)

सरकार ने भारतीय कृषि में जलवायु अनुकूलन का एटलस (ACASA – India) का शुभारंभ उस समय किया, जब NICRA ने अपने 15 वर्ष पूर्ण किए, जो जलवायु-सहिष्णु भारतीय कृषि के लिए रणनीतिक दिशा की आवश्यकता वाले एक महत्त्वपूर्ण चरण को चिह्नित करता है।

भारतीय कृषि में जलवायु अनुकूलन के एटलस (ACASA-India) के बारे में

  • ACASA-India एक वेब-सक्षम डिजिटल जलवायु एटलस है, जिसे किसानों के लिए स्थान-विशिष्ट तथा डेटा-आधारित अनुकूलन योजना का समर्थन करने हेतु डिजाइन किया गया है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • जिला एवं स्थान-स्तरीय जलवायु जोखिम तथा अनुकूलन संबंधी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
    • साक्ष्य-आधारित निर्णयों हेतु जलवायु, फसल, मृदा और प्रबंधन डेटा का एकीकरण करता है।
    • किसानों, योजनाकारों और नीति-निर्माताओं को जलवायु दबावों का पूर्वानुमान लगाने में सहायता करता है।
    • ICAR के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं विस्तार प्रणाली (NARES) द्वारा BISA (दक्षिण एशिया के लिए बोरलॉग संस्थान) तथा CIMMYT [अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूँ सुधार केंद्र (International Maize and Wheat Improvement Center), मैक्सिको] के सहयोग से विकसित।
  • महत्त्व: यह मंच विज्ञान-आधारित कृषि योजना को सुदृढ़ करता है, वर्षा-आश्रित क्षेत्रों में सहनशीलता बढ़ाता है तथा राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई और कृषि-खाद्य सुरक्षा का समर्थन करता है।

‘नेशनल इनोवेशन्स इन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर’ (NICRA) के बारे में

  • NICRA भारत सरकार का एक प्रमुख जलवायु-सहिष्णुता कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तनशीलता और परिवर्तन के प्रति भारतीय कृषि की अनुकूलन क्षमता को बढ़ाना है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • 151 जलवायु-संवेदनशील जिलों में 200 से अधिक स्थानों पर 15 वर्षों से क्रियान्वित।
    • जलवायु-सहिष्णु फसलों, प्रौद्योगिकियों और कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देता है।
    • प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, जोखिम न्यूनीकरण और उत्पादकता वृद्धि पर केंद्रित।
    • संस्थागत अभिसरण के माध्यम से संचालित, जिससे नीतियाँ और वैज्ञानिक अनुसंधान सक्षम होते हैं।
  • NICRA, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तथा संबद्ध क्षेत्रीय मिशनों जैसी योजनाओं का पूरक है तथा भारत को विज्ञान-आधारित जलवायु-सहिष्णु कृषि के वैश्विक मॉडल के रूप में स्थापित करता है एवं विकसित भारत@2047 विजन का समर्थन करता है।

संदर्भ

विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने चतुर्थ औद्योगिक क्रांति के लिए पाँच नए केंद्रों (Centres for the Fourth Industrial Revolution-C4IR) की स्थापना की घोषणा की है, जिनमें एक भारत के आंध्र प्रदेश में स्थापित किया जाएगा।

चतुर्थ औद्योगिक क्रांति केंद्र (C4IR) नेटवर्क के बारे में 

  • प्रारंभ एवं नेतृत्व: इस नेटवर्क की शुरुआत वर्ष 2017 में विश्व आर्थिक मंच (WEF) द्वारा उभरती प्रौद्योगिकियों के शासन को दिशा देने हेतु की गई थी।
  • नेटवर्क का स्वरूप: यह एक वैश्विक, बहु-हितधारक मंच है, जो सरकारों, उद्योग, शिक्षा जगत और नागरिक समाज को आपस में जोड़ता है।
  • मुख्य उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि उभरती प्रौद्योगिकियाँ सामाजिक लाभ प्रदान करें, साथ ही नैतिक, सुरक्षा तथा आर्थिक जोखिमों को न्यूनतम किया जा सके।
  • नेटवर्क संरचना: यह विभिन्न महाद्वीपों में स्थित स्वतंत्र राष्ट्रीय एवं विषयगत चतुर्थ औद्योगिक क्रांति केंद्रों से मिलकर बना है।
  • प्रमुख प्रौद्योगिकी क्षेत्र: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा गवर्नेंस, साइबर सुरक्षा, ब्लॉकचेन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), ऊर्जा संक्रमण तथा सीमांत (Frontier) प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित है।

भारत में चतुर्थ औद्योगिक क्रांति केंद्र (C4IR)

  • स्थान: भारत में नया केंद्र आंध्र प्रदेश में स्थित है।
  • नाम: इसेसेंटर फॉर एनर्जी एंड साइबर रेजिलिएंस’  नाम दिया गया है।

  • यह भारत का तीसरा C4IR केंद्र है (मुंबई और तेलंगाना में पहले से स्थापित केंद्रों के बाद)।
  • साझेदारी: यह केंद्र आंध्र प्रदेश सरकार के साथ आधिकारिक साझेदारी में स्थापित किया गया है।
    • यह सहयोग लचीली डिजिटल और ऊर्जा प्रणालियों के निर्माण से संबंधित राज्य की प्राथमिकताओं के अनुरूप है।
  • उद्देश्य: ऊर्जा संक्रमण (जैसे हरित ऊर्जा प्रणालियाँ) में नवाचार को बढ़ावा देना, विभिन्न उद्योगों में साइबर लचीलापन सुदृढ़ करना, साइबर सुरक्षा रणनीतियों का विकास, कार्यबल का कौशल उन्नयन तथा विश्वसनीय डिजिटल प्रणालियों को प्रोत्साहित करना।

औद्योगिक क्रांति के चरण

  • औद्योगिक क्रांति विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और समाज में हुए प्रमुख रूपांतरणों की एक शृंखला को संदर्भित करती है।
  • इतिहासकार पारंपरिक रूप से इसे विशिष्ट चरणों (या “क्रांतियों”) में विभाजित करते हैं और आधुनिक समझ के अनुसार सामान्यतः चार चरणों को मान्यता दी जाती है।

प्रथम औद्योगिक क्रांति (उद्योग 1.0) 

  • समयावधि: लगभग वर्ष 1760–1840 (ब्रिटेन से आरंभ होकर बाद में यूरोप और उत्तरी अमेरिका में प्रसारित)।
  • मुख्य प्रेरक तत्त्व: जल शक्ति और विशेष रूप से भाप शक्ति द्वारा संचालित यंत्रीकरण।
  • प्रमुख विकास: भाप इंजन (जेम्स वाट द्वारा उन्नत), यंत्रीकृत वस्त्र उत्पादन (स्पिनिंग जेनी, वाटर फ्रेम, स्पिनिंग म्यूल, पॉवर लूम), लौह उत्पादन में सुधार, कारखानों का उदय तथा हस्तकला से मशीन-आधारित उत्पादन की ओर संक्रमण तथा प्रारंभिक रेलवे एवं भाप इंजन वाले पोत।
  • प्रभाव: कृषि/हस्तकला आधारित अर्थव्यवस्थाओं से मशीन-आधारित विनिर्माण की ओर संक्रमण; नगरीकरण; उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि।

द्वितीय औद्योगिक क्रांति (उद्योग 2.0)

  • समयावधि: लगभग 1870–1914 (19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से 20वीं सदी के प्रारंभ तक)।
  • मुख्य प्रेरक तत्त्व: विद्युत, इस्पात और आंतरिक दहन इंजन।
  • प्रमुख विकास: प्रकाश व्यवस्था और मशीनों के संचालन हेतु विद्युत का व्यापक उपयोग, असेंवली लाइन और बड़े पैमाने पर उत्पादन (हेनरी फोर्ड द्वारा), इस्पात उत्पादन, रासायनिक उद्योग में प्रगति।
  • प्रभाव: बड़े पैमाने पर उत्पादन; विशाल निगमों का उदय; परिवहन और संचार में तीव्रता; औद्योगीकृत देशों में जीवन स्तर में वृद्धि; व्यापार का वैश्वीकरण।

तृतीय औद्योगिक क्रांति (उद्योग 3.0)

  • समयावधि: लगभग 1969 से 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध/21वीं सदी के प्रारंभ तक (प्रायः 1970 के दशक से आगे मानी जाती है)।
  • मुख्य प्रेरक तत्त्व: इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी (जिसे डिजिटल क्रांति भी कहा जाता है)।
  • प्रमुख विकास: सेमीकंडक्टर, माइक्रोप्रोसेसर और पर्सनल कंप्यूटर, कारखानों में स्वचालन (प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर, औद्योगिक रोबोट), इंटरनेट तथा वैश्विक संपर्क, विनिर्माण एवं आपूर्ति शृंखलाओं में सॉफ्टवेयर व आईटी प्रणालियाँ।
  • प्रभाव: स्वचालित और कंप्यूटरीकृत उत्पादन की ओर संक्रमण; सेवा और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्थाओं का उदय; डिजिटल संचार द्वारा वैश्वीकरण में तीव्रता।

चतुर्थ औद्योगिक क्रांति (4IR) के बारे में

  • परिभाषा: चतुर्थ औद्योगिक क्रांति तीव्र तकनीकी परिवर्तन का वर्तमान युग है, जिसकी विशेषता भौतिक, डिजिटल और जैविक क्षेत्रों का संलयन है।
  • उत्पत्ति: इसे पहली बार वर्ष 2016 में विश्व आर्थिक मंच के संस्थापक क्लॉस श्वाब द्वारा डिजिटल क्रांति (तृतीय औद्योगिक क्रांति) से आगे के एक विशिष्ट नए चरण के रूप में वर्णित किया गया।
  • परिवर्तन की घातांकीय गति: पूर्ववर्ती औद्योगिक क्रांतियों के विपरीत, 4IR घातांकीय गति से आगे बढ़ती है, जिसका कारण कंप्यूटिंग शक्ति, डेटा भंडारण, कनेक्टिविटी और नवाचार की तीव्रता में अभूतपूर्व प्रगति है।
  • चतुर्थ औद्योगिक क्रांति की प्रमुख विशेषताएँ
    • गति: परिवर्तन मानव इतिहास में अभूतपूर्व गति से होता है।
    • विस्तार: यह प्रत्येक उद्योग, प्रत्येक देश और प्रत्येक अनुशासन को प्रभावित करती है।
    • प्रणालीगत रूपांतरण: यह केवल मौजूदा प्रणालियों में सुधार नहीं करती, बल्कि उत्पादन, प्रबंधन और शासन की संपूर्ण प्रणालियों को प्रतिस्थापित या मूल रूप से पुनर्गठित कर देती है।
  • साइबर-भौतिक प्रणालियाँ: इसकी एक परिभाषात्मक विशेषता साइबर-भौतिक प्रणालियों का निर्माण है— स्मार्ट, परस्पर-संबद्ध नेटवर्क, जहाँ मशीनें, सेंसर, सॉफ्टवेयर और मानव वास्तविक समय में परस्पर क्रिया करते हैं।
    • यह स्मार्ट फैक्टरियों, स्वायत्त वाहनों, पूर्वानुमानात्मक रखरखाव और प्रभावी अवसंरचना को संभव बनाता है।

विश्व आर्थिक मंच (WEF) के बारे में

  • विश्व आर्थिक मंच वैश्विक चुनौतियों से निपटने हेतु सार्वजनिक-निजी सहयोग को बढ़ावा देने वाला एक अंतरराष्ट्रीय, गैर-सरकारी संगठन है।
  • स्थापना: वर्ष 1971 में क्लॉस श्वाब द्वारा स्थापित।
  • मुख्यालय: जिनेवा, स्विट्जरलैंड।
  • मुख्य उद्देश्य
    • वैश्विक स्थिति में सुधार हेतु संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करना।
    • वैश्विक, क्षेत्रीय और उद्योग-स्तरीय एजेंडाओं को आकार देना।
    • समावेशी और सतत् विकास को बढ़ावा देना।
  • चतुर्थ औद्योगिक क्रांति (4IR) में भूमिका
    • जिम्मेदार प्रौद्योगिकी शासन हेतु C4IR नेटवर्क का नेतृत्व।
    • AI नैतिकता, डेटा गवर्नेंस और डिजिटल विश्वास पर ध्यान।
  • वार्षिक बैठक: प्रत्येक वर्ष जनवरी में दावोस, स्विट्जरलैंड में आयोजित।
    • यह वैश्विक आर्थिक परिदृश्य, संघर्षों, जलवायु कार्रवाई और प्रौद्योगिकी पर चर्चा का एक प्रमुख मंच है।

संदर्भ

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पर्ल्स एग्रो-टेक कॉरपोरेशन लिमिटेड (PACL) से जुड़े धनशोधन (मनी लॉण्ड्रिंग) मामले की चल रही जाँच के अंतर्गत अचल संपत्ति को कुर्क किया है।

पर्ल्स एग्रो-टेक कॉरपोरेशन लिमिटेड (PACL) / पर्ल्स समूह घोटाले के बारे में

  • PACL घोटाला भारत के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक है, जिसे प्रायः पोंजी-सदृश योजना अथवा अवैध सामूहिक निवेश योजना के रूप में वर्णित किया जाता है।
  • घोटाले की प्रकृति: नियामकीय स्वीकृति के बिना भूमि आवंटन या अत्यधिक प्रतिफल का वादा कर धन एकत्र किया गया।
    • निधियों को शेल कंपनियों और बेनामी परिसंपत्तियों के माध्यम से स्थानांतरित किया गया, जिससे वित्तीय कानूनों का उल्लंघन हुआ।
  • सेबी की कार्रवाई: भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने PACL की योजनाओं को अवैध घोषित किया (वर्ष 2014)।
  • धनशोधन: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने PACL के विरुद्ध धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के अंतर्गत मामला दर्ज किया।
    • आरोपों में निधियों की लेयरिंग, मुखौटा कंपनियों का उपयोग तथा विदेश और देश में संपत्तियों की खरीद शामिल है।

धनशोधन (Money Laundering) के बारे में

  • परिभाषा: धनशोधन वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से अवैध रूप से अर्जित धन को उसकी आपराधिक उत्पत्ति को छिपाकर वैध स्वरूप प्रदान किया जाता है।
    • यह आपराधिक गतिविधियों से अर्जित “अवैध धन” को “वैध धन” में परिवर्तित कर देता है, जिससे उसका खुले तौर पर उपयोग किया जा सके और संदेह उत्पन्न नहीं होता है।
  • धनशोधन के तीन चरण
    • प्लेसमेंट (Placement): इस चरण में अवैध नकदी को बैंक जमा, परिसंपत्तियों की खरीद अथवा सीमा पार मुद्रा की तस्करी जैसे माध्यमों से वित्तीय प्रणाली में प्रविष्ट कराया जाता है।
    • लेयरिंग (Layering): इसमें जटिल वित्तीय लेन-देन की अनेक ‘लेयर’ बनाई जाती हैं ताकि धन के स्रोत का पता न चल सके।
    • इंटीग्रेशन (Integration): इस चरण में शोधन किया गया धन, अर्थव्यवस्था में वैध रूप में पुनः प्रविष्ट कराया जाता है, जैसे-रियल एस्टेट, व्यवसाय या अन्य परिसंपत्तियों में निवेश के माध्यम से
  • संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वैश्विक GDP का लगभग 2–5% (800 अरब डॉलर से 2 ट्रिलियन डॉलर) प्रतिवर्ष धनशोधन के अंतर्गत आता है।

धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के बारे में

  • धनशोधन निवारण अधिनियम, 2002 भारत का प्रमुख धनशोधन-रोधी (AML) कानून है।
  • यह अधिनियम वर्ष 2002 में पारित हुआ तथा 1 जुलाई 2005 से प्रवर्तित हुआ।
  • उद्देश्य: इस अधिनियम का उद्देश्य धनशोधन को रोकना, अपराध से अर्जित आय को जब्त करना तथा धनशोधन अपराधों की पहचान और अभियोजन हेतु तंत्र स्थापित करना है।
  • रिपोर्टिंग दायित्व: बैंकिंग कंपनियों, वित्तीय संस्थानों तथा मध्यस्थों को लेन-देन का अभिलेख बनाए रखना तथा ग्राहकों की पहचान सत्यापित करना अनिवार्य है।
    • उन्हें संदिग्ध लेन-देन की रिपोर्ट वित्तीय खुफिया इकाई–भारत (FIU-IND) को देनी होती है।
  • कुर्की और जब्ती: प्रवर्तन निदेशालय धनशोधन से संबंधित संपत्ति को अधिकतम 180 दिनों के लिए अस्थायी रूप से कुर्क कर सकता है।
  • विशेषताएँ: इस अधिनियम के अंतर्गत यह दायित्व अभियुक्त पर होता है कि वह सिद्ध करे कि उसकी संपत्ति अपराध के माध्यम से अर्जित आय नहीं है।
  • प्रमुख प्रवर्तन एजेंसियाँ
    • प्रवर्तन निदेशालय (ED): मुख्य जाँच एजेंसी; यह धनशोधन की जाँच करती है, अपराध से अर्जित आय का पता लगाती है, संपत्तियों को कुर्क करती है तथा अभियोजन संचालित करती है।
    • वित्तीय खुफिया इकाई–भारत (FIU-IND): एक केंद्रीय एजेंसी, जो रिपोर्टिंग संस्थाओं से वित्तीय सूचनाएँ प्राप्त करती है, उनका विश्लेषण करती है और संबंधित एजेंसियों को प्रेषित करती है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बारे में

  • प्रवर्तन निदेशालय एक विशिष्ट वित्तीय जाँच एजेंसी है, जो आर्थिक कानूनों के प्रवर्तन तथा धनशोधन और विदेशी मुद्रा उल्लंघनों से निपटने के लिए उत्तरदायी है।
  • यह भ्रष्टाचार, मादक पदार्थों की तस्करी, आतंकवाद वित्तपोषण और धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराधों से उत्पन्न अपराध-आय को लक्ष्य बनाता है।
  • स्थापना: वर्ष 1956 में आर्थिक कार्य विभाग के अंतर्गत प्रवर्तन इकाई के रूप में स्थापित।
    • वर्ष 1957 में इसे प्रवर्तन निदेशालय नाम दिया गया।
  • प्रशासनिक नियंत्रण: राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
  • प्रमुख प्रवर्तित विधियाँ
    • धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002: अपराध से अर्जित आय के शोधन से संबंधित अपराधों की जाँच ED द्वारा की जाती है।
    • विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999: सीमा-पार विदेशी मुद्रा लेन-देन को विनियमित करता है; FEMA के अंतर्गत ED मुख्यतः सिविल न्याय निर्णायक भूमिका निभाता है।

संदर्भ

भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने द्विपक्षीय व्यापार को प्रोत्साहित करने तथा आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते के लिए आधिकारिक-स्तर की वार्ताओं को पूर्ण कर लिया है।

भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता

  • भारत–EU मुक्त व्यापार समझौता भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच एक व्यापक व्यापार समझौता है, जिसका उद्देश्य शुल्कों में कमी करना तथा द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना है।
  • इतिहास: वार्ताएँ कई दशक पूर्व प्रारंभ हुई थीं (प्रारंभिक वार्ता 2007 में, वर्ष 2022 में पुनः आरंभ) और दीर्घकाल से लंबित चर्चाओं के पश्चात् 27 जनवरी, 2026 को इन्हें अंतिम रूप दिया गया।
  • इसमें क्या शामिल है: यह भारत और यूरोपीय संघ के बीच वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), सततता तथा मानकों से संबंधित प्रावधानों को सम्मिलित करता है।
  • अगले चरण: यद्यपि वार्ताएँ और राजनीतिक सहमति पूर्ण हो चुकी हैं, तथापि इस समझौते के पूर्ण रूप से प्रभावी होने से पूर्व, भारत की संसद तथा यूरोपीय संसद एवं यूरोपीय परिषद द्वारा औपचारिक अनुसमर्थन आवश्यक है।
  • इस समझौते के साथ ही यूरोपीय संघ भारत का 22वाँ FTA भागीदार बन गया है।

भारत–EU, FTA का महत्त्व 

  • भारत के लिए अभूतपूर्व बाजार पहुँच: व्यापार मूल्य के आधार पर भारत के 99% से अधिक निर्यातों को EU बाजार में अधिमान्य (शून्य या रियायती शुल्क) प्रवेश प्राप्त होगा।
  • रणनीतिक महत्त्व: इस FTA को वैश्विक व्यापार विविधीकरण में इसके महत्त्व को रेखांकित करते हुए नेताओं द्वारा प्रायः मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जाता है।
    • यह समझौता लगभग 2 अरब लोगों के बाजार और वैश्विक GDP के लगभग 25% को आच्छादित करता है, जिससे यह एक प्रमुख वैश्विक व्यापार समझौता बन जाता है।
  • श्रम-प्रधान एवं निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों को प्रोत्साहन: वस्त्र, परिधान, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न एवं आभूषण, हस्तशिल्प तथा इंजीनियरिंग वस्तुओं जैसे क्षेत्रों में समझौते के लागू होते ही शुल्क शून्य हो जाएगा।
  • कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में अवसर: चाय, कॉफी, मसाले, ताजे फल-सब्जियाँ तथा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के लिए बेहतर बाजार पहुँच, जिससे ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ होगी और वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की स्थिति मजबूत होगी।
  • ऑटोमोबाइल क्षेत्र: पारस्परिक, कोटा-आधारित उदारीकरण के तहत EU वाहन निर्माताओं को भारत में उच्च-स्तरीय बाजार पहुँच मिलेगी, जबकि भविष्य मेंमेक इन इंडिया” के अंतर्गत भारत में उत्पादन तथा EU को निर्यात को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
  • सेवाएँ एवं गतिशीलता ढाँचा: सेवाओं में महत्त्वाकांक्षी प्रतिबद्धताएँ (भारत को IT/ITeS, व्यावसायिक सेवाओं, शिक्षा आदि में EU के 144 उप-क्षेत्रों तक पहुँच; EU को भारत के 102 उप-क्षेत्रों तक पहुँच)।
  • व्यापार विविधीकरण: वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं (जिसमें संभावित अमेरिकी शुल्क नीतियाँ भी शामिल हैं) के बीच यह FTA भारत के निर्यात बाजारों में विविधता लाता है, किसी एक साझेदार पर अत्यधिक निर्भरता को कम करता है तथा सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण करता है।
  • विकसित भारत @2047” के लिए समर्थन: समावेशी विकास, नवाचार, रोजगार सृजन तथा विनिर्माण एवं सेवाओं में प्रतिस्पर्द्धात्मकता के माध्यम से वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की परिकल्पना के अनुरूप।

भारत–EU शिखर सम्मेलन के प्रमुख परिणाम

  • 16वाँ भारत–EU शिखर सम्मेलन जनवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित किया गया।
  • इसकी सह-अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन तथा यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने की।
  • भारत–EU मुक्त व्यापार समझौता (FTA): भारत–EU FTA को अंतिम रूप दिया गया।
  • टुवर्ड्स 2030’ को अपनाना: ‘टुवर्ड्स 2030: ए फॉरवर्ड-लुकिंग कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक एजेंडा’ को शिखर सम्मेलन में अनुमोदित किया गया, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक सहयोग को सुदृढ़ करना है।
    • यह चार स्तंभों पर केंद्रित है—समृद्धि और सततता, प्रौद्योगिकी और नवाचार, सुरक्षा तथा रक्षा, संपर्कता एवं वैश्विक मुद्दे—साथ ही जन-से-जन संपर्क जैसे सहायक तत्त्व।
    • यह पूर्ववर्ती 2025 रोडमैप का स्थान लेता है और जटिल भू-राजनीतिक वातावरण में गहन एवं समन्वित कार्रवाई का लक्ष्य रखता है।
  • भारत–EU सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर: यह एक ऐतिहासिक ढाँचा है, जो समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग/प्रौद्योगिकी, साइबर एवं हाइब्रिड खतरों, आतंकवाद-रोधी प्रयासों, अंतरिक्ष, अप्रसार तथा संयुक्त पहल/अभ्यासों में घनिष्ठ सहयोग को सक्षम बनाता है।
  • गतिशीलता पर व्यापक सहयोग ढाँचा: यह EU स्तर पर भारत के साथ हस्ताक्षरित पहला गतिशीलता-संबंधी समझौता है, जिसका उद्देश्य कुशल पेशेवरों की संरचित आवाजाही को सुगम बनाना है।
  • ग्रीन हाइड्रोजन टास्क फोर्स: ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, प्रौद्योगिकी, मानकों तथा आपूर्ति शृंखलाओं में सहयोग को गहन करने हेतु स्थापित।
  • आपदा जोखिम प्रबंधन एवं आपात प्रतिक्रिया: भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और EU के DG-ECHO के बीच प्राकृतिक आपदाओं के लिए बेहतर तैयारी, समन्वय तथा प्रतिक्रिया हेतु व्यवस्था।
  • वित्तीय/नियामक सहयोग: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और यूरोपीय सिक्योरिटीज एंड मार्केट्स अथॉरिटी (ESMA) के बीच क्लियरिंग हाउस की मान्यता तथा निकट सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन।
  • भारत–EU वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय सहयोग समझौते का नवीनीकरण: वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय सहयोग समझौते को वर्ष 2025–2030 की अवधि के लिए नवीनीकृत किया गया।

भारत–यूरोपीय संघ संबंध

  • भारत–EU संबंध लोकतंत्र, विधि के शासन, बहुपक्षवाद तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जैसे साझा मूल्यों पर आधारित एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी है।
  • यह व्यापार, निवेश, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, जलवायु कार्रवाई आदि क्षेत्रों में बहुआयामी सहभागिता में विकसित हो चुका है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत ने वर्ष 1962 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EU का पूर्ववर्ती) के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए, जो प्रारंभिक संबंधों में से एक था।
    • वर्ष 1993: संयुक्त राजनीतिक वक्तव्य पर हस्ताक्षर।
    • वर्ष 2000: लिस्बन में प्रथम भारत–EU शिखर सम्मेलन, जिससे नियमित शिखर-स्तरीय संवाद का शुभारंभ हुआ।
    • वर्ष 2004: हेग शिखर सम्मेलन में रणनीतिक साझेदारी का दर्जा।
    • वर्ष 2004 के बाद जनवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित 16वें ऐतिहासिक भारत–EU शिखर सम्मेलन से पूर्व 15 शिखर सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं।
  • वर्ष 2020 के बाद भू-राजनीतिक परिवर्तनों, आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण तथा इंडो-पैसिफिक फोकस के कारण यह संबंध उल्लेखनीय रूप से गहरे हुए हैं।
  • प्रमुख संस्थागत तंत्र
    • भारत–EU व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (TTC): फरवरी 2023 में प्रारंभ (अप्रैल 2022 में घोषित); व्यापार, विश्वसनीय प्रौद्योगिकी, डिजिटल, हरित प्रौद्योगिकी और सुरक्षा पर समन्वय।
    • कनेक्टिविटी साझेदारी: वर्ष 2021 में प्रारंभ; परिवहन, डिजिटल, ऊर्जा और जन-से-जन संपर्क को समाहित करती है।
    • भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC): सितंबर 2023 में भागीदारों के साथ घोषित।

आर्थिक एवं व्यापारिक संबंध

  • EU भारत के प्रमुख व्यापार भागीदारों में से एक है; वर्ष 2024-25 में EU के साथ वस्तु व्यापार का मूल्य 136.53 अरब अमेरिकी डॉलर था (निर्यात 75.85 अरब डॉलर और आयात 60.68 अरब डॉलर)।
  • EU बाजार भारत के कुल निर्यात का लगभग 17% तथा भारत को EU के कुल विदेशी निर्यात का लगभग 9% हिस्सा है।
  • वृद्धि: पिछले एक दशक में लगभग 90% की वृद्धि।
  • निवेश: EU भारत में प्रमुख विदेशी निवेशक है (FDI स्टॉक वर्ष 2023 में €140.1 अरब, जो वर्ष 2019 में €82.3 अरब था); वर्तमान में 6,000 से अधिक यूरोपीय कंपनियाँ भारत में कार्यरत हैं।

यूरोपीय संघ (EU) के बारे में

  • यूरोपीय संघ 27 यूरोपीय देशों का एक आर्थिक और राजनीतिक संघ है।
  • ये देश शांति, स्थिरता, समृद्धि और साझा मूल्यों को बढ़ावा देने हेतु मिलकर कार्य करते हैं।
  • स्थापना: वर्ष 1951 में यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय के रूप में 6 संस्थापक सदस्यों के साथ प्रारंभ; रोम संधि (1957) और लिस्बन संधि (2009) जैसे समझौतों के माध्यम से आधुनिक EU के रूप में विकसित।
  • सदस्य देश: 27 देश (यूनाइटेड किंगडम वर्ष 2020 में ब्रेक्जिट के माध्यम से बाहर हुआ)।
  • मुद्रा: यूरो (€) यूरोजोन के 21 सदस्य देशों में प्रयुक्त होती है (नवीनतम: बुल्गारिया ने 1 जनवरी, 2026 को यूरो अपनाया)।
  • प्रमुख संस्थाएँ: EU की एक विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय संरचना है, जिसमें साझा निर्णय-निर्माण होता है।
    • यूरोपीय आयोग: कार्यकारी संस्था; कानून प्रस्तावित करता है, EU नियमों को लागू करता है, बजट का प्रबंधन करता है।
    • यूरोपीय संसद: नागरिकों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित; सह-विधायी भूमिका और बजट अनुमोदन।
    • यूरोपीय परिषद: राष्ट्राध्यक्ष/सरकार प्रमुख समग्र राजनीतिक दिशा और प्राथमिकताएँ निर्धारित करते हैं।
    • यूरोपीय संघ का न्यायालय: EU कानून के एकरूप अनुप्रयोग को सुनिश्चित करता है।
    • यूरोपीय केंद्रीय बैंक: यूरो और यूरोजोन की मौद्रिक नीति का प्रबंधन करता है।

निष्कर्ष

समग्र रूप से, भारत–EU साझेदारी एक अग्रदर्शी, व्यापक गठबंधन में विकसित हो चुकी है। 16वाँ भारत–EU शिखर सम्मेलन और FTA का निष्कर्ष एक ऐतिहासिक छलांग का प्रतिनिधित्व करता है, जो भू-राजनीतिक परिवर्तनों के बीच दोनों को एक-दूसरे की वैश्विक रणनीतियों के प्रमुख स्तंभ के रूप में स्थापित करता है।

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