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Jan 30 2026

संपूर्णता अभियान 2.0

नीति आयोग ने देशभर के आकांक्षी जिलों और आकांक्षी प्रखंडों में संपूर्णता अभियान 2.0 का शुभारंभ किया है।

  • यह अभियान देश के आकांक्षी जिलों में 5 प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों तथा आकांक्षी प्रखंडों में 6 प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों की पूर्ण संतृप्तता प्राप्त करने हेतु एक सतत् प्रयास के रूप में प्रारंभ किया गया है।

संपूर्णता अभियान 2.0 के बारे में

  • संपूर्णता अभियान 2.0 नीति आयोग द्वारा 28 जनवरी से 14 अप्रैल, 2026 तक प्रारंभ किया गया एक 3-महीने का राष्ट्रीय अभियान है।
  • पृष्ठभूमि: यह संपूर्णता अभियान (2024) की सफलता पर आधारित है, जिसने केंद्रित एवं समयबद्ध हस्तक्षेपों के माध्यम से सशक्त परिणाम प्रदर्शित किए थे।
  • कवरेज: भारत के 112 आकांक्षी जिले और 513 आकांक्षी प्रखंड।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य आकांक्षी जिला एवं आकांक्षी प्रखंड कार्यक्रम के अंतर्गत चयनित प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों (KPIs) की पूर्ण संतृप्ति (100% कवरेज) प्राप्त करना है, तथा यह निम्नलिखित क्षेत्रों पर केंद्रित है:
    • स्वास्थ्य और पोषण
    • स्वच्छता और शिक्षा
    • पशुधन एवं संबद्ध क्षेत्र
  • क्रियान्वयन: नीति आयोग, केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों तथा राज्य और केंद्रशासित प्रदेश सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से क्रियान्वित।

आकांक्षी प्रखंडों के प्रमुख प्रदर्शन संकेतक

  • बाल पोषण: एकीकृत बाल विकास सेवाओं के अंतर्गत 6 माह–6 वर्ष आयु वर्ग के उन बच्चों का प्रतिशत, जिन्हें नियमित रूप से पूरक पोषण प्राप्त हो रहा है।
  • विकास निगरानी: आंगनवाड़ी केंद्रों में नामांकित बच्चों की माप-तौल संबंधी दक्षता
  • स्वच्छता: कार्यात्मक शौचालयों वाले संचालित आंगनवाड़ी केंद्रों का प्रतिशत।
  • पेयजल: सुरक्षित पेयजल सुविधाओं वाले आंगनवाड़ी केंद्रों का प्रतिशत।
  • शैक्षणिक अवसंरचना: पर्याप्त बालिका शौचालय सुविधाओं वाले विद्यालयों का प्रतिशत।
  • पशुधन स्वास्थ्य: खुरपका-मुँहपका रोग के विरुद्ध टीकाकृत गोवंशीय पशुओं का प्रतिशत।

आकांक्षी जिलों के प्रमुख प्रदर्शन संकेतक

  • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य: जन्म के समय तौले गए जीवित शिशुओं का अनुपात।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य: अनुमानित मामलों की तुलना में तपेदिक (टीबी) मामलों की अधिसूचना दर (सार्वजनिक एवं निजी)
  • निवारक स्वास्थ्य सेवा: पिछले एक माह में आंगनवाड़ी केंद्रों या शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों द्वारा कम-से-कम एक ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण दिवस/शहरी स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण दिवस का आयोजन।
  • विद्यालय अवसंरचना: कार्यात्मक बालिका शौचालयों वाले विद्यालयों का प्रतिशत।
  • पशु स्वास्थ्य: समग्र पशु टीकाकरण कवरेज।

क्रियान्वयन रणनीति

  • प्रत्येक जिला एवं प्रखंड द्वारा 3-महीने की कार्य योजना का निर्माण।
  • संतृप्ति की दिशा में प्रगति की मासिक निगरानी।
  • समुदाय स्तर पर जागरूकता एवं व्यवहार-परिवर्तन अभियान।
  • जिला स्तरीय अधिकारियों द्वारा समवर्ती क्षेत्रीय निगरानी भ्रमण।

भारत ऊर्जा सप्ताह 2026

वर्ल्ड ऑयल आउटलुक, 2025 के अनुसार, भारत ऊर्जा सप्ताह 2026 में प्रस्तुत आकलन के अनुसार, वर्ष 2050 तक वैश्विक तेल माँग वृद्धि में भारत के सबसे बड़े योगदानकर्ता बनने का अनुमान है।

भारत ऊर्जा सप्ताह, 2026

  • भारत ऊर्जा सप्ताह 2026 भारत का वार्षिक प्रमुख वैश्विक ऊर्जा सम्मेलन एवं प्रदर्शनी का चौथा संस्करण है।
  • स्थान: गोवा।
  • नोडल मंत्रालय : पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय।
  • प्रमुख क्षेत्र: हाइड्रोजन, जैव ईंधन, द्रवीकृत प्राकृतिक गैस, नवीकरणीय ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता/डिजिटल ऊर्जा, सिटी गैस वितरण, पेट्रो-रसायन, तथा शुद्ध-शून्य समाधान।

वर्ल्ड ऑयल आउटलुक

  • वर्ल्ड ऑयल आउटलुक एक दीर्घकालिक ऊर्जा रिपोर्ट है, जिसे पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है।
  • उद्देश्य: भविष्य की वैश्विक ऊर्जा माँग वृद्धि का आकलन करना तथा ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु तेल एवं गैस क्षेत्र में निवेश आवश्यकताओं को रेखांकित करना।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • वर्ष 2050 तक की अवधि के लिए वैश्विक तेल एवं ऊर्जा बाजारों का दीर्घकालिक आकलन प्रस्तुत करता है।
    • तेल माँग, आपूर्ति, निवेश, प्रौद्योगिकी एवं नीतियों में प्रवृत्तियों का विश्लेषण करता है।
    • विकसित देशों और विकासशील देशों के बीच अंतर पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है।
  • वर्ल्ड ऑयल आउटलुक, 2025 के प्रमुख निष्कर्ष
    • वर्ष 2050 तक तेल माँग वृद्धि का सबसे बड़ा प्रेरक भारत होगा, जो वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक होगा; इसका कारण परिवहन, पेट्रो-रसायन तथा औद्योगिक विस्तार है।
    • वैश्विक तेल माँग: माँग वृद्धि का संकेंद्रण मुख्यतः विकासशील देशों में होगा, जो असमान ऊर्जा संक्रमण को दर्शाता है।
    • तेल एवं गैस: परिदृश्य बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में तेल एवं गैस के निरंतर महत्त्व को रेखांकित करता है।

क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा

भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना विज्ञान संस्थान (BISAG-N) ने क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा समाधानों पर सहयोग हेतु क्यू-एन-यू लैब्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।

क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा के बारे में

  • क्वांटम सुरक्षा संगणनात्मक सुरक्षा से भौतिकी आधारित सुरक्षा की ओर मूल संक्रमण को चिह्नित करती है, जो भविष्य के उच्च-स्तरीय साइबर खतरों से निपटने में सहायक है।
  • क्वांटम यांत्रिकी पर आधारित: यह अध्यारोपण, अंतःसंलग्नता तथा अनिश्चितता जैसे सिद्धांतों का उपयोग करती है, जिनका कोई शास्त्रीय समकक्ष नहीं है।
  • क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन: यह क्वांटम सुरक्षा का सर्वाधिक परिपक्व अनुप्रयोग है, जो क्वांटम अवस्थाओं के माध्यम से सुरक्षित की डिस्ट्रीब्यूशन को सक्षम बनाता है।
  • निर्विकल्प सुरक्षा: पारंपरिक विधियों के विपरीत, क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन संगणनात्मक जटिलता पर नहीं बल्कि भौतिकी के नियमों द्वारा सुनिश्चित सुरक्षा प्रदान करता है।
  • गोपनीय निगरानी का पता लगाना: किसी भी प्रकार का अवरोधन क्वांटम अनिश्चितता के कारण क्वांटम अवस्था को परिवर्तित कर देता है, जिससे वैध उपयोगकर्ताओं को तत्काल सूचना प्राप्त हो जाती है।
  • भविष्य-सुरक्षित डिजिटल अवसंरचना: क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना, रक्षा तथा वित्तीय प्रणालियों को अगली पीढ़ी के हमलों से सुदृढ़ बनाती है।

समझौता ज्ञापन की प्रमुख विशेषताएँ

  • उद्देश्य: सहयोग एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से भारत की क्वांटम-सुदृढ़ साइबर सुरक्षा क्षमताओं को सशक्त करना।
    • सरकारी प्रणालियों, रक्षा नेटवर्क, महत्त्वपूर्ण अवसंरचना तथा सार्वजनिक क्षेत्र के मंचों की सुरक्षा का लक्ष्य।
  • प्रौद्योगिकी एकीकरण: भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना विज्ञान संस्थान के स्वदेशी क्रिप्टोग्राफिक सॉफ्टवेयर “वैदिक कवच” को क्यू-एन-यू लैब्स के क्वांटम हार्डवेयर एवं सुरक्षित अवसंरचना के साथ एकीकृत किया जाएगा।
    • यह हार्डवेयर-आधारित, क्वांटम-सुरक्षित सुरक्षा समाधानों को सक्षम बनाता है।
  • संबद्ध संस्थान
    • भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना विज्ञान संस्थान  (BISAG-N)
      • इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्थान।
      • स्वदेशी क्रिप्टोग्राफिक सॉफ्टवेयर तथा सुरक्षित डिजिटल मंचों के लिए प्रसिद्ध।
    • क्यू-एन-यू लैब्स प्राइवेट लिमिटेड
      • क्वांटम साइबर सुरक्षा हार्डवेयर एवं समाधानों पर केंद्रित एक भारतीय गहन-प्रौद्योगिकी कंपनी।
      • भारत-प्रथम एवं स्वदेशी प्रौद्योगिकी दृष्टिकोण का अनुसरण करती है।

तुलु भाषा 

कर्नाटक अनुच्छेद-345 के अंतर्गत तुलु भाषा को अपनी द्वितीय राजकीय भाषा घोषित करने पर विचार कर रहा है।

तुलु भाषा के बारे में

  • तुलु एक प्राचीन द्रविड़ भाषा है, जो मुख्यतः कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ एवं उडुपी जिलों तथा केरल के कुछ भागों में बोली जाती है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • 3000 वर्षों से अधिक का इतिहास।
    • विशिष्ट लिपि-तिगलारी
    • समृद्ध मौखिक साहित्य, लोककथाएँ तथा आनुष्ठानिक परंपराएँ।
  • उपयोग: तुलु अकादमियों द्वारा समर्थित विश्वविद्यालयों में तुलु भाषा का शिक्षण।
    • यह गूगल अनुवाद में भी सम्मिलित है, जिससे डिजिटल संरक्षण को बल मिलता है।
  • समकालीन प्रासंगिकता: यह तुलुव समुदाय के लिए सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

भारत में राज्यों की राजकीय भाषाएँ

  • भारत में राज्य प्रशासनिक एवं आधिकारिक प्रयोजनों हेतु एक या अधिक राजकीय भाषाएँ अपना सकते हैं, जो भाषायी विविधता एवं संघीय लचीलेपन को प्रतिबिंबित करता है।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद-345 राज्य विधानमंडलों को राज्य में प्रचलित किसी भी भाषा को राजकीय भाषा के रूप में अपनाने का अधिकार प्रदान करता है।
    • आठवीं अनुसूची में सम्मिलित होना आवश्यक नहीं है (तुलु अनुसूचित भाषाओं में सूचीबद्ध नहीं है)।
  • द्वितीय राजकीय भाषा मॉडल: प्राथमिक राजकीय भाषा को विस्थापित किए बिना प्रशासनिक समावेशन प्रदान करता है।
    • आंध्र प्रदेश: उर्दू को द्वितीय राजकीय भाषा घोषित किया गया।
    • पश्चिम बंगाल: अधिसूचित क्षेत्रों में अतिरिक्त भाषाओं का प्रयोग।

तुलु को राजकीय भाषा घोषित करने का महत्त्व

  • भाषायी समावेशन एवं सांस्कृतिक मान्यता को सुदृढ़ करता है।
  • स्थानीय शासन एवं नागरिक सहभागिता को मजबूत करता है।
  • भारत की “विविधता में एकता” की संवैधानिक भावना के अनुरूप है।

4B मूवमेंट  

दक्षिण कोरिया से उत्पन्न 4B मूवमेंट ने जड़ जमाए पितृसत्ता और लैंगिक आधारित हिंसा के विरुद्ध एक उग्र नारीवादी प्रतिक्रिया के रूप में पुनः सार्वजनिक विमर्श उत्पन्न किया है।

4B मूवमेंट क्या है?

4B मूवमेंट दक्षिण कोरिया से उत्पन्न एक नारीवादी राजनीतिक आंदोलन है, जिसमें महिलाएँ उन पारंपरिक विषमलैंगिक संस्थाओं में सामूहिक रूप से भागीदारी से इनकार करती हैं, जिन्हें पितृसत्ता को सुदृढ़ करने वाला माना जाता है।

चार ‘Nos’

  • विवाह नहीं (बिहोन): विवाह को एक ऐसी संस्था के रूप में अस्वीकार करना, जो प्रायः अवैतनिक देखभाल कार्य और असमान शक्ति संबंधों को संस्थागत बनाती है।
  • संतानोत्पत्ति नहीं (बिचुलसान): सामाजिक दबावों के बीच मातृत्व से इनकार, जो महिलाओं को केवल प्रजनन भूमिकाओं तक सीमित कर देता है।
  • डेटिंग नहीं (बियेओनाए): उन डेटिंग संस्कृतियों से दूरी, जो भावनात्मक श्रम और लैंगिक अपेक्षाओं को सामान्य बनाती हैं।
  • यौन संबंध नहीं (बिसेक्सु): दबाव और अधिकार-बोध के विरुद्ध प्रतिरोध के रूप में यौन संबंधों को अस्वीकार करना।

मूवमेंट के पीछे तर्क

  • संरचनात्मक पितृसत्ता: विवाह, परिवार और डेटिंग को अवैतनिक श्रम, घटती स्वायत्तता और प्रणालीगत लैंगिक असमानता की ओर ले जाने वाली प्रक्रियाओं के रूप में देखा जाता है।
  • लैंगिक हिंसा और स्त्री-द्वेष के प्रति प्रतिक्रिया: यह मूवमेंट बढ़ते स्त्री-द्वेष, ऑनलाइन उत्पीड़न, महिला हत्या और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति संस्थागत उदासीनता की पृष्ठभूमि में उभरा।
  • राजनीतिक, व्यक्तिगत नहीं, प्रतिरोध: 4B एक सामूहिक रूप से अस्वीकारण संबंधी मूवमेंट है, जिसका उद्देश्य उन प्रणालियों से सहभागिता वापस लेना है, जिन्हें मूलतः शोषणकारी माना जाता है, न कि इसे जीवनशैली विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना।

4B मूवमेंट संयम और सहभागिता-त्याग को राजनीतिक असहमति के उपकरण के रूप में पुनर्परिभाषित करता है तथा आधुनिक समाजों में गहराई से निहित लैंगिक मानदंडों को चुनौती देता है।

‘रजोनिवृत्ति’ क्लीनिक

महाराष्ट्र ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में महिलाओं के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को एकीकृत करते हुए भारत की पहली सरकार-संचालित समर्पित ‘रजोनिवृत्ति क्लीनिकों’ (Menopause clinics) की शुरुआत की है।

रजोनिवृत्ति (Menopause) के बारे में 

  • रजोनिवृत्ति एक प्राकृतिक जैविक संक्रमण है, जो महिला के प्रजनन चरण के अंत को चिह्नित करता है। यह सामान्यतः 45–55 वर्ष की आयु के बीच घटित होता है और मासिक धर्म के स्थायी रूप से समाप्त होने से पहचाना जाता है।
  • संबद्ध स्वास्थ्य समस्याएँ
    • हार्मोनल और शारीरिक परिवर्तन: नींद में व्यवधान, थकान तथा हार्मोनल असंतुलन, जो दैनिक कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं।
    • अस्थि और हृदय संबंधी जोखिम: एस्ट्रोजन स्तर में गिरावट के कारण ऑस्टियोपोरोसिस और हृदय रोगों के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि।
    • मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य: संक्रमण काल के दौरान चिंता, अवसाद, मनोदशा में उतार-चढ़ाव और मनोवैज्ञानिक तनाव की अधिक घटनाएँ।

 रजोनिवृत्ति क्लीनिक के बारे में

  • महाराष्ट्र ने सरकारी अस्पतालों और शहरी स्वास्थ्य केंद्रों में विशेष रजोनिवृत्ति क्लीनिक स्थापित किए हैं, जिससे वह केंद्रित रजोनिवृत्ति देखभाल को संस्थागत रूप देने वाला पहला राज्य बन गया है।
  • उद्देश्य
    • स्त्री-रोग, मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली मार्गदर्शन को समाहित करते हुए एकीकृत चिकित्सकीय परामर्श प्रदान करना।
    • अस्थि, हृदय और हार्मोनल विकारों की जाँच तथा शीघ्र पहचान सुनिश्चित करना।
    • एक ही सुलभ स्थान पर औषधियाँ, परामर्श और स्वास्थ्य शिक्षा उपलब्ध कराना।
  • पहल की आवश्यकता
    • रजोनिवृत्ति एक उपेक्षित और कम चर्चित चरण बना हुआ है, जहाँ संरचित सार्वजनिक स्वास्थ्य सहायता का अभाव है।
    • उपेक्षा और कम जागरूकता के कारण महिलाएँ प्रायः अनुपचारित शारीरिक असुविधा और मानसिक पीड़ा का सामना करती हैं।
    • समर्पित क्लीनिक गरिमा, निवारक देखभाल और लैंगिक संवेदनशील स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देते हैं, जो महिला-केंद्रित सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों के अनुरूप है।
  • महत्त्व: यह पहल अन्य राज्यों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करती है, निवारक स्वास्थ्य देखभाल को सुदृढ़ करती है और प्रजनन वर्षों से आगे महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को संबोधित करती है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 को केंद्रीय बजट से पूर्व 29 जनवरी, 2026 को संसद में प्रस्तुत किया गया, जिसमें भारत के आर्थिक प्रदर्शन और परिदृश्य का ढाँचा प्रस्तुत किया गया है।

आर्थिक सर्वेक्षण के बारे में

  • आर्थिक सर्वेक्षण भारत सरकार का वार्षिक प्रमुख नीतिगत दस्तावेज है, जो पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान व्यापक आर्थिक प्रवृत्तियों, क्षेत्रीय प्रदर्शन और संरचनात्मक सुधारों की समीक्षा करता है।
  • उत्पत्ति: इसे पहली बार वर्ष 1950–51 में आर्थिक प्रदर्शन का अवलोकन प्रस्तुत करने हेतु केंद्रीय बजट के एक भाग के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
    • वर्ष 1964 में इसे बजट से पृथक कर दिया गया और तब से इसे वार्षिक रूप से, सामान्यतः बजट से एक दिन पूर्व, आर्थिक प्रवृत्तियों को रेखांकित करने हेतु प्रस्तुत किया जाता है।
  • संयोजन: सर्वेक्षण का संकलन वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग द्वारा मुख्य आर्थिक सलाहकार और उनकी टीम के मार्गदर्शन में किया जाता है।
  • प्रस्तुतीकरण: इसे बजट सत्र के दौरान औपचारिक रूप से केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किया जाता है।
  • आर्थिक सर्वेक्षण की विषयवस्तु
    • अर्थव्यवस्था की स्थिति: विकास प्रवृत्तियाँ, मुद्रास्फीति, रोजगार, राजकोषीय स्थिति और बाह्य क्षेत्र का प्रदर्शन।
    • क्षेत्रीय विश्लेषण: कृषि, उद्योग, सेवा, अवसंरचना और वित्तीय क्षेत्र के विकास का आकलन।
    • नीतिगत दृष्टिकोण: मध्यम अवधि की आर्थिक चुनौतियाँ, सुधार प्राथमिकताएँ और विकास के प्रति जोखिम।
    • आँकड़े और साक्ष्य: नीतिगत अनुशंसाओं के समर्थन हेतु आँकड़ों, आलेखों और अनुभवजन्य विश्लेषण का व्यापक उपयोग।

आर्थिक सर्वेक्षण एक निदानात्मक उपकरण और नीतिगत मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है, जो बजट की प्राथमिकताओं को आकार देता है तथा संसद, नीति-निर्माताओं और अभ्यर्थियों को भारत की आर्थिक दिशा के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

संदर्भ

यूनेस्को ने ओडिशा के रत्नागिरी, उदयगिरी और ललितगिरी बौद्ध स्थलों के ‘डायमंड ट्रायंगल’ को भारत की विश्व धरोहर स्थल की अस्थायी सूची में शामिल किया है।

‘डायमंड ट्रायंगल’ के बारे में

  • संघटक स्थल: बौद्ध डायमंड ट्रायंगल ओडिशा में स्थित तीन प्रमुख बौद्ध मठ–स्तूप परिसरों—ललितगिरी, उदयगिरी और रत्नागिरी—के एक क्रमिक सांस्कृतिक समूह को संदर्भित करता है।
  • स्थान: ये तीनों स्थल ओडिशा के जाजपुर और कटक जिलों में स्थित हैं।
  • धार्मिक महत्त्व: ऐसा माना जाता है कि इन स्थलों पर बौद्ध धर्म की तीनों प्रमुख शाखाओं—हीनयान, महायान और वज्रयान—का प्रसार हुआ।
  • नाम की उत्पत्ति: ‘डायमंड ट्रायंगल’ शब्द वज्रयान (तंत्रयान) बौद्ध धर्म से जुड़ा है, जहाँ ‘वज्र’ का अर्थ वज्रपात या हीरा होता है।

डायमंड ट्रायंगल के प्रमुख स्थल

रत्नागिरी

  • अर्थ और स्थान: रत्नागिरी का शाब्दिक अर्थ “रत्नों की पहाड़ी” है। यह भुवनेश्वर से लगभग 100 किमी. उत्तर-पूर्व में, बिरूपा और ब्राह्मणी नदियों के बीच एक पहाड़ी पर स्थित है।
  • पुरातात्त्विक महत्त्व: रत्नागिरी ओडिशा का सबसे प्रसिद्ध और सबसे व्यापक रूप से उत्खनित बौद्ध स्थल है।
  • वज्रयान बौद्ध धर्म का केंद्र: यह 4वीं से 12वीं शताब्दी ईसवी के बीच, विशेष रूप से भौमकर वंश के अधीन, वज्रयान का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा।
  • पुरातात्त्विक समृद्धि
    • उत्खननों में एक विशाल परिसर का उद्घाटन हुआ, जिसमें महास्तूप, चैत्यगृह, मठ, मंदिर तथा विशाल ‘उष्णीष’ (ज्ञान के प्रतीक) शामिल हैं।
    • “श्री रत्नागिरी महाविहारिया” नामांकित मुहरें इसे एक प्रमुख मठीय विश्वविद्यालय के रूप में पुष्टि करती हैं।
  • मठीय पैमाना: अपने उत्कर्ष काल में, इस मठ में लगभग 500 भिक्षुओं के निवास का अनुमान है, जो मुख्यतः तंत्रयान परंपरा का अनुसरण करते थे।
  • विशिष्ट स्थापत्य विशेषता: रत्नागिरी मठ भारत का एकमात्र बौद्ध मठ है, जिसकी छत वक्ररेखीय है।
  • ह्वेनसांग: अध्ययनों से संकेत मिलता है कि 638–639 ईसवी के दौरान ओडिशा की यात्रा करने वाले ह्वेनसांग संभवतः रत्नागिरी आए होंगे।

रत्नागिरी में हाल की पुरातात्त्विक खोजें

  • मुख्य निष्कर्ष: 5वीं–13वीं शताब्दी के बौद्ध परिसर में किए गए उत्खननों से निम्नलिखित प्राप्त हुए हैं::
    • एक विशाल ‘उष्णीष’ (ज्ञान का प्रतीक)
    • एक विशाल हथेली
    • एक प्राचीन दीवार
    • अभिलेखित बौद्ध अवशेष
  • काल-निर्धारण: इन खोजों को 8वीं–9वीं शताब्दी ईसवी का माना जाता है।

ललितगिरी

  • वैकल्पिक नाम: स्थानीय रूप से नल्टिगिरी के नाम से जाना जाता है।
  • प्राचीनता: नंदपहाड़ पहाड़ी पर स्थित ललितगिरी त्रिकोण का सबसे प्राचीन बौद्ध केंद्र है, जो दूसरी–तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 13वीं शताब्दी ईसवी तक निरंतर आवासीय केंद्र रहा, जिससे यह भारत के सबसे दीर्घकालिक बौद्ध स्थलों में से एक बनता है।
  • पुरातात्त्विक खोजें
    • उत्कल विश्वविद्यालय और भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए उत्खननों में एक चैत्यगृह, चार मठ और एक विशाल थेरवाद स्तूप प्राप्त हुआ, जिसमें पत्थर, चाँदी और सोने की परतदार अवशेष पेटिकाएँ थीं।
    • “श्री चंद्रादित्य विहार” का उल्लेख करने वाली अभिलेखित मुहर की खोज ललितगिरी को एक संगठित मठीय संस्था के रूप में पुष्टि करती है।
  • मुख्य पुरातात्त्विक खोज: खोंडालाइट, स्टीएटाइट, चाँदी और सोने से निर्मित चार पात्रों वाली एक अवशेष पेटिका, जिसमें भगवान बुद्ध के अवशेष होने की मान्यता है।
  • सैद्धांतिक विकास: बुद्ध, अवलोकितेश्वर, वज्रपाणि, मंजुश्री, तारा और जंभल की मूर्तियाँ थेरवाद, महायान और वज्रयान के माध्यम से ललितगिरी के विकास को दर्शाती हैं, जो प्रारंभिक सैद्धांतिक समन्वय और कलात्मक प्रयोग का प्रमाण हैं।

उदयगिरी

  • अवस्थिति
    • “सूर्योदय पहाड़ी” के नाम से प्रसिद्ध उदयगिरी त्रिकोण का सबसे बड़ा परिसर है, जो बिरूपा नदी के किनारे अर्द्धचंद्राकार पहाड़ी पर स्थित है।
    • यह 1वीं से 13वीं शताब्दी ईसवी तक बौद्ध शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र रहा।
  • प्रमुख मठीय प्रतिष्ठान: ASI के उत्खननों में माधवपुर महाविहार और सिंहप्रस्थ महाविहार का अनावरण हुआ, जिनमें बड़े ईंट-निर्मित मठ, दो-मंजिला संरचना, प्रदक्षिणापथ, गुंबददार खिड़कियाँ और ऊपरी मंदिर कक्ष शामिल हैं, जो भारतीय बौद्ध स्थापत्य में दुर्लभ विशेषताएँ हैं।
  • कलात्मक और आनुष्ठानिक महत्त्व
    • इस स्थल पर एक विशाल चैत्यगृह है, जो वृत्ताकार और आयताकार रूपों में स्थापत्य विकास को दर्शाता है, जिसमें पंच ध्यान बुद्ध प्रतिष्ठित हैं। तारा, मंजुश्री, अवलोकितेश्वर, मैत्रेय और वज्रयान देवताओं की अनेक मूर्तियाँ महायान और वज्रयान परंपराओं के बीच सेतु के रूप में उदयगिरी की भूमिका को रेखांकित करती हैं।

पुष्पगिरी महाविहार

  • पुरातत्त्वविदों का मानना है कि लंगुड़ी, रत्नागिरी, उदयगिरी और ललितगिरी मिलकर प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय पुष्पगिरी का निर्माण करते थे, जो नालंदा और तक्षशिला के समतुल्य था।
  • इस विश्वविद्यालय का उल्लेख 7वीं शताब्दी ईसवी में चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा किया गया है।

विश्व धरोहर स्थल (WHS)

  • विश्व धरोहर स्थल वे स्थान हैं, जिनका उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य होता है, जिन्हें उनकी सांस्कृतिक, प्राकृतिक या मिश्रित महत्ता के लिए मान्यता दी जाती है और वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों के लाभ हेतु संरक्षित किया जाता है।
  • कानूनी ढाँचा: इन स्थलों को वर्ष 1972 के यूनेस्को विश्व धरोहर अभिसमय के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है, जिसे वैश्विक विरासत संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु अपनाया गया।
  • शासी निकाय: यूनेस्को विश्व धरोहर समिति विश्व धरोहर कार्यक्रम के माध्यम से विश्व धरोहर सूची का संधारण और अद्यतन करती है।
  • भारत और अभिसमय
    • भारत ने वर्ष 1977 में विश्व धरोहर अभिसमय की पुष्टि की, जिसके तहत विरासत स्थलों की पहचान, संरक्षण और संवर्द्धन के प्रति प्रतिबद्धता जताई।
    • सितंबर 2025 तक, भारत में 44 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं, जिनमें भारत के मराठा सैन्य परिदृश्य सबसे नवीन (44वें) रूप में अंकित हैं।

अस्थायी सूची

  • परिभाषा: अस्थायी सूची सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों की एक आधिकारिक सूची है, जिन्हें कोई राज्य पक्षकार, भविष्य में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में नामांकन हेतु विचार करता है।
  • भूमिका: अस्थायी सूची में सम्मिलित होना विश्व धरोहर अभिलेखन की पहली अनिवार्य प्रक्रिया है।
    • केवल वही स्थल औपचारिक रूप से नामांकित किए जा सकते हैं, जो इस सूची में सम्मिलित हों।
  • प्रक्रिया: किसी स्थल को अस्थायी सूची में शामिल किए जाने के बाद, राज्य पक्ष एक विस्तृत नामांकन डोजियर तैयार करता है, जिसकी जाँच और निर्णय यूनेस्को विश्व धरोहर समिति द्वारा किया जाता है।
  • भारत की अस्थायी सूची की स्थिति
    • कुल स्थल: भारत के पास वर्तमान में यूनेस्को की अस्थायी सूची में 70 स्थल हैं।
    • आवृत श्रेणियाँ: ये स्थल सांस्कृतिक, प्राकृतिक और मिश्रित श्रेणियों में आते हैं।
    • ओडिशा के स्थल (अस्थायी सूची में): इसमें भुवनेश्वर का एकाम्र क्षेत्र और गंजाम जिले की चिल्का झील शामिल हैं।
    • हाल ही में जोड़े गए स्थल: चौसठ योगिनी मंदिरों का समूह, जिसमें ओडिशा के स्थल भी शामिल हैं, पिछले वर्ष जोड़ा गया।
      • ओडिशा में दो चौसठ योगिनी मंदिर हैं—एक भुवनेश्वर के निकट और दूसरा बलांगीर में।

ओडिशा – प्रमुख बौद्ध केंद्र

  • वंशीय संरक्षण: ओडिशा में बौद्ध धर्म का उत्कर्ष भौमकर वंश (8वीं–10वीं शताब्दी ईसवी) के अधीन हुआ।
  • शिष्य: भगवान बुद्ध के प्रथम शिष्य तपस्सु और भल्लिक को उत्कल (प्राचीन ओडिशा) का निवासी माना जाता है।
  • अशोक की विरासत: कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) के पश्चात् सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अंगीकार किया और इसके प्रसार में भारत, श्रीलंका, मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया तक योगदान दिया।
  • समुद्री व्यापार संबंध: ओडिशा के दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ सुदृढ़ व्यापारिक संबंध थे, जिनके अंतर्गत काली मिर्च, दालचीनी, रेशम, कपूर, सोना और आभूषणों का व्यापार होता था।
  • सांस्कृतिक स्मृति: वार्षिक बलियात्रा उत्सव कलिंग और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच 2,000 वर्ष पुराने समुद्री संबंधों की स्मृति का प्रतीक है।

संदर्भ

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जो ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 का स्थान लेंगे।

संबंधित तथ्य

  •  ये नियम पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत अधिसूचित किए गए हैं।
  • ये 1 अप्रैल, 2026 से पूर्ण रूप से प्रभावी होंगे।

ठोस अपशिष्ट

  • ठोस अपशिष्ट से आशय उन सभी अवांछित एवं परित्यक्त ठोस अथवा अर्द्ध-ठोस पदार्थों से है, जो घरेलू इकाइयों, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों, संस्थानों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों एवं कृषि से उत्पन्न होते हैं।
  • ठोस अपशिष्ट में रसोई अपशिष्ट, प्लास्टिक, कागज, धातु, काँच, कचरा, निर्माण अपशिष्ट तथा औद्योगिक अवशेष सम्मिलित हैं।
  • ठोस अपशिष्ट में गैसें सम्मिलित नहीं होतीं तथा सामान्यतः द्रव अपशिष्ट को भी इसमें शामिल नहीं किया जाता है।

भारत में ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण की वर्तमान स्थिति

  • अपशिष्ट उत्पादन: 1.85 लाख टन प्रतिदिन
  • संग्रहण: 1.79 लाख टन प्रतिदिन
  • उपचार: 1.14 लाख टन प्रतिदिन
  • लैंडफिल: लगभग 40,000 टन प्रतिदिन अब भी लैंडफिल में जाता है (CPCB 2023–24)।
  • भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 0.45 किलोग्राम नगरपालिका ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जो कठोर पृथक्करण एवं प्रसंस्करण की आवश्यकता को दर्शाता है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के चरण

  • अपशिष्ट उत्पादन एवं न्यूनकरण: अपशिष्ट उत्पादन मानव गतिविधियों का परिणाम है, जबकि न्यूनकरण का उद्देश्य सतत् उपभोग एवं उत्पादन पद्धतियों को प्रोत्साहित कर स्रोत पर ही अपशिष्ट को कम करना है।
  • स्रोत पर पृथक्करण: स्रोत पर पृथक्करण का अर्थ है उत्पत्ति स्थल पर ही अपशिष्ट को जैव-अपघटनीय, पुनर्चक्रणीय एवं खतरनाक श्रेणियों में विभाजित करना, जिससे पुनर्चक्रण की दक्षता बढ़ती है और उपचार लागत कम होती है।
  • संग्रहण एवं भंडारण: ठोस अपशिष्ट का संग्रहण घर-घर जाकर संग्रहण तथा सामुदायिक डिब्बों के माध्यम से किया जाता है, जबकि उचित भंडारण से स्वच्छता बनी रहती है और दुर्गंध व रोगवाहक जीवों का प्रसार बाधित होता है।
  • परिवहन: कूड़ा फैलने एवं रिसाव को रोकने हेतु ढके हुए एवं यंत्रीकृत वाहनों द्वारा किया जाता है।
  • प्रसंस्करण / उपचार
    • गीले अपशिष्ट के लिए कंपोस्टिंग / वर्मी-कंपोस्टिंग
    • जैविक अपशिष्ट के लिए बायोमेथेनेशन (बायोगैस)
    • सूखे अपशिष्ट की छँटाई एवं पुनर्चक्रण हेतु सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधा (MRF)
    • उच्च ऊष्मीय मान वाले सूखे अपशिष्ट के लिए रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (RDF)
    • उपयुक्त गैर-पुनर्चक्रणीय, उच्च ऊष्मीय अपशिष्ट के लिए अपशिष्ट-से-ऊर्जा (दहन), जिसमें सख्त उत्सर्जन नियंत्रण आवश्यक है।
  • अंतिम निपटान: निष्क्रिय एवं अवशिष्ट अपशिष्ट के लिए केवल लैंडफिल का उपयोग, अर्थात् वही अपशिष्ट जिसका किसी भी प्रकार से प्रसंस्करण संभव नहीं है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 की प्रमुख विशेषताएँ

  • चक्रीय अर्थव्यवस्था: नियम संसाधन दक्षता एवं अपशिष्ट न्यूनीकरण को बढ़ावा देने हेतु चक्रीय अर्थव्यवस्था एवं विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के सिद्धांतों को एकीकृत करते हैं।
  • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत: पंजीकरण के बिना संचालन, गलत रिपोर्टिंग, जाली दस्तावेजों एवं अनुचित अपशिष्ट प्रबंधन जैसे गैर-अनुपालन पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई जाएगी।
  • संस्थागत भूमिकाएँ: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) दिशा-निर्देश बनाएगा, जबकि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) एवं प्रदूषण नियंत्रण समितियाँ (PCC) पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति आरोपित करेंगी।
  • स्रोत पर अनिवार्य पृथक्करण: स्रोत पर चार अपशिष्ट स्तरों में अनिवार्य पृथक्करण अधिसूचित किया गया है।
    • गीला अपशिष्ट: रसोई अपशिष्ट एवं जैव-अपघटनीय पदार्थ, जिन्हें कंपोस्टिंग अथवा बायोमेथेनेशन द्वारा संसाधित किया जाएगा।
    • सूखा अपशिष्ट: कागज, प्लास्टिक, धातु एवं काँच, जिन्हें सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधा (MRF) जैसे अधिकृत केंद्रों के माध्यम से पुनर्चक्रित किया जाएगा।
    • स्वच्छता संबंधी अपशिष्ट: सैनिटरी नैपकिन, डायपर आदि, जिन्हें सुरक्षित रूप से लपेटकर पृथक रूप से सँभाला जाएगा।
    • विशेष देखभाल अपशिष्ट: ट्यूबलाइट, बैटरियाँ एवं खतरनाक घरेलू वस्तुएँ, जिनके लिए विशेष प्रबंधन आवश्यक है।

थोक अपशिष्ट उत्पादकों की परिभाषा एवं दायरा

  • पात्रता मानदंड: निम्नलिखित में से किसी एक को पूरा करने पर इकाइयाँ थोक अपशिष्ट उत्पादक मानी जाएँगी।
    • 20,000 वर्ग मीटर या अधिक का क्षेत्रफल
    • 40,000 लीटर प्रतिदिन या अधिक जल उपभोग
    • 100 किलोग्राम प्रतिदिन या अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पादन
  • आवृत इकाइयाँ: इसमें केंद्र एवं राज्य सरकार के विभाग, स्थानीय निकाय, आवासीय समितियाँ, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान, विश्वविद्यालय, छात्रावास एवं संस्थान शामिल हैं।
  • अपशिष्ट में हिस्सेदारी: थोक अपशिष्ट उत्पादक भारत में कुल ठोस अपशिष्ट का लगभग 30 प्रतिशत उत्पन्न करते हैं।
  • विस्तारित थोक अपशिष्ट उत्पादक उत्तरदायित्व (EBWGR)
    • स्रोत-स्तरीय उत्तरदायित्व: थोक अपशिष्ट उत्पादकों को पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित संग्रहण, परिवहन एवं प्रसंस्करण सुनिश्चित करना होगा।
    • स्थल पर अपशिष्ट प्रसंस्करण: जहाँ संभव हो, गीले अपशिष्ट का प्रसंस्करण स्थल पर ही किया जाना अनिवार्य है।
    • प्रमाणन: जहाँ स्थल पर प्रसंस्करण संभव न हो, वहाँ EBWGR प्रमाण-पत्र प्राप्त करना होगा।
  • भूमि आवंटन एवं बफर क्षेत्र
    • त्वरित भूमि आवंटन: नियम अपशिष्ट प्रसंस्करण एवं निपटान सुविधाओं के आसपास श्रेणीबद्ध विकास मानदंड प्रस्तुत करते हैं।
    • बफर क्षेत्र की अनिवार्यता: प्रतिदिन 5 टन से अधिक क्षमता वाली सुविधाओं के लिए आवंटित भूमि के भीतर बफर क्षेत्र बनाए रखना आवश्यक होगा।
    • CPCB दिशा-निर्देश: बफर क्षेत्र का आकार एवं अनुमेय गतिविधियाँ क्षमता एवं प्रदूषण भार के आधार पर CPCB द्वारा निर्धारित की जाएँगी।

केंद्रीकृत ऑनलाइन निगरानी प्रणाली

  • ऑनलाइन पोर्टल: एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल अपशिष्ट उत्पादन, संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण, निपटान तथा विरासत डंपसाइट्स के बायोमाइनिंग एवं बायोरिमेडिएशन को ट्रैक करेगा।
  • डिजिटल पंजीकरण एवं रिपोर्टिंग: अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं का पंजीकरण, प्राधिकरण एवं रिपोर्ट प्रस्तुतिकरण पूर्णतः ऑनलाइन होगा।
  • अनिवार्य ऑडिट: सभी अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं को ऑडिट कराना होगा और रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड करनी होगी।

पर्वतीय एवं द्वीपीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान

  • पर्यटक उपयोग शुल्क: स्थानीय प्राधिकरणों को पर्यटकों से अपशिष्ट प्रबंधन शुल्क वसूलने का अधिकार होगा।
  • आगंतुक विनियमन: स्थानीय अपशिष्ट प्रबंधन क्षमता के आधार पर आगंतुकों की संख्या को नियंत्रित किया जा सकेगा।
  • विकेन्द्रित प्रसंस्करण: होटल एवं रेस्तराँ को SPCB/PCC मानकों के अनुसार स्थल पर गीले अपशिष्ट का प्रसंस्करण करना होगा।

मुख्य सिद्धांत के रूप में अपशिष्ट पदानुक्रम

  • प्राथमिकता-आधारित दृष्टिकोण: नियम अपशिष्ट पदानुक्रम को अपनाते हैं, जिसमें रोकथाम एवं न्यूनीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है, इसके बाद पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण, पुनर्प्राप्ति एवं निपटान आता है।
  • रोकथाम को वरीयता: अपशिष्ट रोकथाम को शीर्ष स्थान दिया गया है, जो वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप है।

लैंडफिल पर प्रतिबंध

  • सीमित उपयोग: लैंडफिल का उपयोग केवल गैर-पुनर्चक्रणीय, गैर-ऊर्जा-उपयोगी अपशिष्ट एवं निष्क्रिय पदार्थों के लिए किया जाएगा।
  • भिन्न लैंडफिल शुल्क: असंवर्गीकृत अपशिष्ट के लिए अधिक लैंडफिल शुल्क लगाया जाएगा।
  • निगरानी एवं पर्यवेक्षण: SPCB द्वारा वार्षिक लैंडफिल ऑडिट किया जाएगा, जिसकी निगरानी जिला कलेक्टर करेंगे।
  • विरासत अपशिष्ट उपचार: डंपसाइट्स का अनिवार्य मानचित्रण, मूल्यांकन तथा समयबद्ध बायोमाइनिंग एवं बायोरिमेडिएशन किया जाएगा, जिसमें त्रैमासिक रिपोर्टिंग आवश्यक होगी।

रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (RDF) का उपयोग

  • परिभाषा: RDF उच्च ऊष्मीय मान वाले गैर-पुनर्चक्रणीय सूखे अपशिष्ट जैसे प्लास्टिक, कागज एवं वस्त्र से निर्मित ईंधन है।
  • अनिवार्य औद्योगिक उपयोग: सीमेंट संयंत्रों एवं अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों को ठोस ईंधन के स्थान पर क्रमिक रूप से RDF का उपयोग करना होगा।
  • ईंधन प्रतिस्थापन लक्ष्य: RDF का उपयोग छह वर्षों में 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत किया जाएगा।

स्थानीय निकायों एवं MRF की जिम्मेदारियाँ

  • स्थानीय निकायों की भूमिका: ठोस अपशिष्ट का संग्रहण, पृथक्करण एवं परिवहन स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी होगी।
  • MRF की भूमिका: सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं को औपचारिक मान्यता दी गई है तथा वे ई-अपशिष्ट, स्वच्छता अपशिष्ट एवं विशेष देखभाल अपशिष्ट के संग्रहण केंद्र के रूप में भी कार्य कर सकती हैं।
  • कार्बन क्रेडिट: बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से स्थानीय निकायों को कार्बन क्रेडिट सृजन के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
  • पेरी-अर्बन फोकस: शहरी-ग्रामीण सीमांत क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने का प्रावधान किया गया है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन हेतु सरकारी पहलें

  • अपशिष्ट का विधिक वर्गीकरण: भारत में ठोस अपशिष्ट को विधिक रूप से छह श्रेणियों—नगरपालिका अपशिष्ट, खतरनाक अपशिष्ट, इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट, जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट, प्लास्टिक अपशिष्ट तथा निर्माण एवं विध्वंस संबंधी अपशिष्ट—में वर्गीकृत किया गया है, जिनके लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पृथक नियम लागू हैं।
  • स्मार्ट सिटी मिशन: 60 से अधिक शहरों ने प्रौद्योगिकी-आधारित अपशिष्ट प्रबंधन समाधान अपनाए हैं, जिससे संग्रहण दक्षता, मार्ग अनुकूलन एवं दैनिक निगरानी में सुधार हुआ है।
  • स्वच्छ भारत मिशन (2014): इस मिशन का उद्देश्य नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन है, जबकि SBM-U 2.0 का लक्ष्य 2026 तक “कचरा मुक्त शहर” बनाना है।
  • अपशिष्ट-से-ऊर्जा कार्यक्रम: यह कार्यक्रम नगरपालिका एवं औद्योगिक ठोस अपशिष्ट को बिजली अथवा ऊष्मा में परिवर्तित करने को प्रोत्साहित करता है, जिससे लैंडफिल पर निर्भरता घटती है और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलता है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
    • स्रोत पर पृथक्करण: नियमों ने स्रोत पर पृथक्करण को अनिवार्य बनाया, जिसमें अपशिष्ट को जैव-अपघटनीय, गैर-जैव-अपघटनीय एवं घरेलू खतरनाक अपशिष्ट में वर्गीकृत किया गया।
    • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): इस ढाँचे के अंतर्गत उत्पादकों एवं ब्रांड स्वामियों को उत्तरदायी बनाया गया।
    • शहरी स्थानीय निकायों की भूमिका: नगरपालिका प्राधिकरणों को 100 प्रतिशत संग्रहण, सुरक्षित परिवहन एवं वैज्ञानिक उपचार सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा गया।
  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
    • इन नियमों में प्लास्टिक अपशिष्ट का स्रोत पर पृथक्करण, प्लास्टिक उपयोग में कमी तथा कचरे की रोकथाम का प्रावधान है।
    • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): उत्पादकों, आयातकों एवं ब्रांड स्वामियों को प्लास्टिक अपशिष्ट के संग्रहण एवं पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित निपटान के लिए उत्तरदायी बनाया गया है।

वैश्विक पहलें

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण प्रौद्योगिकी केंद्र (IETC), जापान, विकासशील देशों को ई-अपशिष्ट, प्लास्टिक एवं कृषि जैव-अपशिष्ट सहित विशेष अपशिष्टों के पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित प्रबंधन में सहयोग प्रदान करता है।

संदर्भ

27 जनवरी, 2026 को भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का संपन्न होना भारत की व्यापारिक रणनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ है।

  • प्रायः इसेमदर ऑफ आल डील्स’ कहा जा रहा है। यह समझौता लगभग 2 अरब लोगों के लिए एकीकृत बाजार का निर्माण करता है तथा बढ़ते अमेरिकी व्यापार संरक्षणवाद के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक प्रतिकार के रूप में उभरता है।

संबंधित तथ्य

  • जनवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन ने भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर वार्ता के सफल समापन के साथ एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। ​​इस समझौते का उद्देश्य द्विपक्षीय रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को और गहरा करना था।
  • इस मुक्त व्यापार समझौते को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्षउर्सुला वॉन डेर लेयेन’ ने अंतिम रूप दिया, जो भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थीं।
  • महत्त्वपूर्ण क्षण
    • यह समझौता लगभग 20 वर्षों की रुक-रुक कर चली वार्ता (वर्ष 2007 में शुरू हुई, 2022 में पुनः शुरू हुई) के बाद संपन्न हुआ है।
    • विविधीकरण: इस समझौते को वैश्विक व्यापार अस्थिरता औरचाइना-प्लस-वन” रणनीति के विरुद्ध एक रणनीतिक बचाव के रूप में देखा जा रहा है।
    • अनुमोदन: यह समझौता अब “विधिक समीक्षा” के अंतर्गत आगे संचालित करेगा, और दोनों पक्षों की संसदीय स्वीकृति के बाद वर्ष 2026 के अंत तक इसके लागू होने की उम्मीद है।

टुवर्ड्स 2030 एजेंडा’ 

  • टुवर्ड्स 2030: संयुक्त भारत-यूरोपीय संघ व्यापक रणनीतिक एजेंडा एक पाँच वर्षीय रोडमैप है, जिसे व्यापार-केंद्रित साझेदारी से गहन रणनीतिक गठबंधन में परिवर्तित करने के लिए तैयार किया गया है।
  • 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में अपनाया गया यह एजेंडा भू-राजनीतिक अनिश्चितता और आर्थिक संरक्षणवाद से प्रेरित विश्व में आगे बढ़ने के लिए एक कार्य योजना प्रदान करता है।
  • पहला स्तंभ – समृद्धि और स्थिरता
    • मुक्त व्यापार समझौता (FTA) का कार्यान्वयन: भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते का पूर्ण संचालन, जिससे 24 ट्रिलियन डॉलर का बाजार उपलब्ध रहेगा।
    • हरित परिवर्तन: वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए भारत-यूरोपीय संघ हरित हाइड्रोजन कार्य बल का गठन और पवन ऊर्जा व्यापार शिखर सम्मेलन, 2026 का आयोजन।
    • कार्बन अनुपालन: भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्द्धात्मकता सुनिश्चित करने के लिए भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) को यूरोपीय संघ की CBAM के साथ समन्वित करना।
  • दूसरा स्तंभ – प्रौद्योगिकी और नवाचार
    • TTC की केंद्रीय भूमिका: व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC) आर्थिक सुरक्षा और अनुसंधान सुरक्षा के लिए मुख्य मंच बन गई है।
    • गहन प्रौद्योगिकी सहयोग: विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं के निर्माण के लिए सेमीकंडक्टर, 6जी और क्वांटम कंप्यूटिंग का संयुक्त विकास।
    • हॉराइजन यूरोप: भारत के होराइजन यूरोप अनुसंधान कोष में सहयोगी सदस्य के रूप में शामिल होने के लिए प्रारंभिक वार्ता।
  • तीसरा स्तंभ – सुरक्षा और रक्षा
    • सुरक्षा समझौता: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री खतरों से निपटने के लिए एक औपचारिक सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी की शुरुआत।
    • औद्योगिक सह-उत्पादन: “खरीददार-विक्रेता” व्यवस्था से हटकर रक्षा उपकरणों (जैसे- ड्रोन और सेंसर) के संयुक्त अनुसंधान एवं विकास और सह-विकास की ओर अग्रसर होना।
    • साइबर एवं अंतरिक्ष: सीबीआई-यूरोपोल समझौते और आईएसआरओ-ईएसए के संयुक्त अंतरिक्ष अन्वेषण मिशन के माध्यम से सहयोग में वृद्धि।
  • चौथा स्तंभ – संपर्क और वैश्विक चुनौतियाँ
    • आईएमईसी कॉरिडोर: अपारदर्शी अवसंरचना परियोजनाओं के रणनीतिक विकल्प के रूप में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर को तेजी से आगे बढ़ाना।
    • ग्लोबल गेटवे: भारत में गुणवत्तापूर्ण अवसंरचना और अफ्रीका में त्रिपक्षीय परियोजनाओं के लिए यूरोपीय संघ के 300 अरब यूरो के ग्लोबल गेटवे फंड का उपयोग करना।
  • पाँचवाँ स्तंभ – सहायक कारक (कौशल और गतिशीलता)
    • यूरोपीय लीगल गेटवे: सूचना, संचार प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों के लिए कानूनी श्रम गतिशीलता को सुगम बनाने हेतु भारत में पहला समर्पित कार्यालय खोला जा रहा है।
    • पारस्परिक मान्यता: वर्ष 2030 तक यह सुनिश्चित करने का लक्ष्य है कि भारतीय पेशेवर योग्यताएँ यूरोपीय संघ के सभी 27 सदस्य देशों में स्वतः मान्य हों।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के बारे में

  • पृष्ठभूमि: वर्ष 2004 में इस संबंध को रणनीतिक साझेदारी में उन्नत किया गया। FTA नए टुवर्ड्स 2030: कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रेटेजिक एजेंडा” की आर्थिक आधारशिला है, जो वर्ष 2025 रोडमैप का स्थान लेता है।
  • ढाँचागत परिवर्तन: यह विशुद्ध रूप से सलाहकारी सहयोग से हटकर एक बाध्यकारी, नियम-आधारित व्यवस्था की ओर अग्रसर है, जिसमें अनिवार्य विवाद निपटान और स्थिरता संबंधी अध्याय शामिल हैं।

PWOnlyIAS विशेष

अमेरिकी कारक”

  • रणनीतिक हेजिंग: मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अमेरिकी व्यापार अस्थिरता के खिलाफ एक भू-राजनीतिक सुरक्षा कवच का काम करता है।
    • वाशिंगटन द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50% “पारस्परिक” टैरिफ लगाने (अगस्त 2025) के बाद, यूरोपीय संघ एक स्थिर, नियम-आधारित विकल्प प्रदान करता है।
  • ट्रंप फैक्टर” उत्प्रेरक: आक्रामक “अमेरिका फर्स्ट” संरक्षणवाद और अमेरिका-यूरोपीय संघ के ग्रीनलैंड विवाद ने 20 वर्षों से संचालित वार्ता गतिरोध को तोड़ने में “अंतिम उपाय” का कार्य किया।
  • बाजार विविधीकरण: भारत 22.5 ट्रिलियन यूरो के यूरोपीय संघ के बाजार की ओर रुख करके अमेरिकी बाजार पर अपनी अत्यधिक निर्भरता (जहाँ उसके पास प्रतिबंधों के खतरे में 45.8 बिलियन डॉलर का अधिशेष है) को कम कर रहा है।
  • नियामक संप्रभुता: यूरोपीय संघ के मानकों के साथ तालमेल बिठाकर, भारत और यूरोप वैश्विक व्यापार में एक “तीसरा ध्रुव” बना रहे हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो रहा है कि उन्हें अमेरिकी लेन-देनवाद और चीनी दबाव के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर न होना पड़े।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के प्रमुख परिणाम

  • ऐतिहासिक शुल्क उन्मूलन और बाजार पहुँच: यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार के 90% से अधिक पर शुल्क हटाता है, जिससे वस्तुओं के लिए लगभग पारदर्शी सीमा बन जाती है।
    • यूरोपीय संघ की प्रतिबद्धताएँ: यूरोपीय संघ भारतीय निर्यात मूल्य के 99.5% पर सीमा शुल्क समाप्त करेगा।
      • इसमें वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, और रत्न और आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए 33 अरब डॉलर का लाभ शामिल है, जो अब 0% शुल्क पर यूरोपीय संघ में प्रवेश करेंगे।
    • भारत की प्रतिबद्धताएँ: भारत यूरोपीय संघ की 90% से अधिक वस्तुओं पर शुल्क चरणबद्ध तरीके से समाप्त करेगा।
      • मशीनरी (44% तक), रसायन (22% तक), और फार्मास्यूटिकल्स (11% तक) पर अत्यधिक शुल्क को काफी हद तक समाप्त कर दिया जाएगा, जिससे यूरोपीय निर्यातकों को सालाना लगभग 4 अरब यूरो की बचत होगी।
  • ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट्स के लिए चरणबद्ध तरीके से शुरुआत: “मेक इन इंडिया” के हितों और यूरोपीय संघ की निर्यात माँगों के बीच संतुलन बनाने के लिए, इन उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में चरणबद्ध तरीके से आयात शुल्क में कमी की जा रही है:
    • लक्जरी वाहन: 15,000 यूरो से अधिक कीमत वाली कारों पर भारत पाँच वर्षों में आयात शुल्क को 110% से घटाकर 10% कर देगा।
      • यह शुल्क प्रति वर्ष 2,50,000 यूनिट के टैरिफ दर कोटा (TRQ) तक सीमित है।
    • वाइन और स्पिरिट्स: प्रीमियम वाइन पर शुल्क 150% से घटकर 20%-30% की सीमा में आ जाएगा।
      • स्पिरिट्स पर शुल्क घटकर 40% हो जाएगा, जिससे भारत में यूरोपीय ब्रांडों की कीमतें काफी कम हो जाएँगी।
  • सेवा क्षेत्र और वैश्विक व्यावसायिक गतिशीलता: यह समझौता “मोड 4” (प्राकृतिक व्यक्तियों की आवाजाही) के लिए भविष्य के लिए तैयार ढाँचा सुनिश्चित करता है:
    • बाध्यकारी पहुँच: भारत को यूरोपीय संघ के 144 उप-क्षेत्रों (IT, अनुसंधान एवं विकास और वित्त सहित) तक पहुँच प्राप्त होती है, जबकि यूरोपीय संघ को भारत के 102 उप-क्षेत्रों तक पहुँच प्राप्त होती है।
    • प्रतिभा गतिशीलता: यह समझौता भारतीय छात्रों के लिए असीमित गतिशीलता और स्वतंत्र पेशेवरों और अंतर-कॉरपोरेट स्थानांतरण (ICT) के लिए सरलीकृत वीजा प्रदान करता है, जिसमें उनके आश्रितों के लिए प्रवेश अधिकार भी शामिल हैं।
    • आयुष मान्यता: एक विशिष्ट उपलब्धि के रूप में, पारंपरिक चिकित्सकों को उन यूरोपीय संघ के राज्यों में अभ्यास करने की कानूनी निश्चितता प्राप्त होती है, जहाँ वर्तमान में कोई नियम मौजूद नहीं हैं।
  • स्थिरता और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) ढाँचा: व्यापार और सतत् विकास (TSD) अध्याय वाणिज्य को पर्यावरण और श्रम मानकों से जोड़ता है:
    • हरित परिवर्तन: यूरोपीय संघ ने भारतीय उद्योगों को कार्बन उत्सर्जन कम करने और पेरिस समझौते के अनुरूप ढलने में मदद करने के लिए 500 मिलियन यूरो की वित्तीय सहायता देने का वादा किया है।
    • CBAM आश्वासन: हालाँकि भारत को कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (कार्बन टैक्स) से पूर्ण छूट नहीं मिली, लेकिन उसे “मोस्ट फेवर्ड नेशन” (MFN) का आश्वासन और निर्यातकों को उनके कार्बन फुटप्रिंट को सत्यापित करने हेतु एक तकनीकी सहयोग समूह प्राप्त हुआ है।

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के बारे में

  • यूरोपीय संघ का जलवायु-संबंधी व्यापार साधन, जो आयात पर उनके अंतर्निहित उत्सर्जन के आधार पर कार्बन लागत लगाता है, जिसका उद्देश्य कार्बन रिसाव को रोकना है।
  • उद्देश्य: यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) के तहत विनियमित यूरोपीय संघ के उत्पादकों और कम कार्बन प्रतिबंधों वाले विदेशी निर्यातकों के बीच समान अवसर प्रदान करना।
  • कवरेज और समय सीमा: लोहा और इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन और बिजली पर लागू।
    • संक्रमण चरण (2023-25) में केवल रिपोर्टिंग होगी; पूर्ण कार्यान्वयन वर्ष 2026 से शुरू होगा।

  • रणनीतिक बहिष्करण और संरक्षण: ग्रामीण आजीविका और घरेलू खाद्य सुरक्षा की रक्षा के लिए संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षित किया गया है:
    • कृषि: दोनों पक्षों के पास कठोर “नकारात्मक सूचियाँ” हैं। भारत ने डेयरी, गेहूँ, चावल और मुर्गीपालन को किसी भी शुल्क कटौती से बाहर रखा है।
      • इसके विपरीत, यूरोपीय संघ ने अपने किसानों की रक्षा के लिए गोमांस, चीनी और चावल को बहिष्कृत रखा है।
    • भौगोलिक संकेतक (GI): एक समानांतर समझौता दार्जिलिंग चाय और शैंपेन जैसे प्रतिष्ठित उत्पादों के लिए बेहतर संरक्षण सुनिश्चित करता है, जिससे दोनों बाजारों में अनधिकृत नकल को रोका जा सके।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते का महत्त्व

  • आर्थिक परिवर्तन और बाजार पर प्रभुत्व: मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भारत के विनिर्माण और कृषि क्षेत्रों को दीर्घकालिक व्यापार बाधाओं को हटाकर व्यापक प्रोत्साहन प्रदान करता है।
    • अभूतपूर्व बाजार पहुँच: यूरोपीय संघ मूल्य के हिसाब से 99.5% भारतीय निर्यातों को तरजीही पहुँच (शून्य या कम शुल्क) प्रदान करेगा।
      • इससे ₹6.4 लाख करोड़ (75 अरब डॉलर) से अधिक के निर्यात में तेजी आने की उम्मीद है।
    • श्रम प्रधान क्षेत्रों का पुनरुद्धार: वस्त्र और परिधान, चमड़ा, जूते और रत्न एवं आभूषण जैसे उद्योग—जिन पर पहले 10-12% शुल्क लगता था—अब यूरोपीय संघ में 0% शुल्क पर प्रवेश कर सकेंगे।
      • इससे वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्द्धियों के मुकाबले समान अवसर मिलेंगे।
    • कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति: चाय, कॉफी, मसाले और समुद्री उत्पादों (झींगा शुल्क 26% से घटाकर शून्य करने के साथ) के लिए तरजीही पहुँच से ग्रामीण आय में प्रत्यक्ष वृद्धि होगी और वैश्विक खाद्य आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की भूमिका मजबूत होगी।
    • औद्योगिक आधुनिकीकरण: यूरोपीय मशीनरी और रसायनों पर शुल्क समाप्त करने से भारतीय निर्माताओं को सस्ते, उच्च-तकनीकी इनपुट प्राप्त होंगे, जिससे घरेलू औद्योगिक उन्नयन को बढ़ावा मिलेगा।
  • रणनीतिक लचीलापन और भू-राजनीतिक संतुलन: यह समझौता तेजी से अस्थिर होते वैश्विक व्यापार परिवेश में एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा कवच का काम करता है।
    • व्यापार विविधीकरण और जोखिम से बचाव: यह मुक्त व्यापार समझौता वैश्विक अनिश्चितताओं और बदलती अमेरिकी टैरिफ नीतियों के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है।
      • यह भारत के निर्यात बास्केट में विविधता लाकर किसी एक व्यापारिक साझेदार पर अत्यधिक निर्भरता को कम करता है।
    • चीन-प्लस-वन” आधार: नियामक मानकों को संरेखित करके, यह समझौता भारत को यूरोपीय आपूर्ति शृंखलाओं, विशेष रूप से सेमीकंडक्टर और हरित प्रौद्योगिकी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में, एक विश्वसनीय, नियम-आधारित विनिर्माण विकल्प के रूप में स्थापित करता है।
    • गुणवत्ता में सुधार”: यूरोपीय संघ के मानकों को अपनाना (“ब्रुसेल्स प्रभाव”) भारतीय वस्तुओं को वैश्विक मानकों को पूरा करने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है, जिससे वे जापान और अमेरिका जैसे अन्य उच्च-मानक बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्द्धी बन जाते हैं।
  • विकासात्मक प्रभाव- विकसित भारत@2047: यह समझौता भारत के विकसित राष्ट्र बनने के दीर्घकालिक दृष्टिकोण का एक प्रमुख आधार है।
    • सेवा एवं प्रतिभा गतिशीलता: भारत को यूरोपीय संघ के 144 सेवा उप-क्षेत्रों (IT, स्वास्थ्य सेवा, अनुसंधान एवं विकास) तक पहुँच प्राप्त हुई।
      • एक ऐतिहासिक गतिशीलता ढाँचा पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रिया को सरल बनाता है और भारतीय छात्रों को यूरोपीय संघ के सभी 27 देशों में 9 महीने के लिए अध्ययन के बाद कार्य करने का अधिकार प्रदान करता है।
    • हरित परिवर्तन के लिए सहायता: कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) को सुचारू रूप से चलाने के लिए, भारत ने 500 मिलियन यूरो का सहायता पैकेज और “फेवर्ड नेशन” का दर्जा प्राप्त किया, जिससे न्यायसंगत हरित परिवर्तन के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता सुनिश्चित हुई।
    • कमजोर वर्गों की सुरक्षा: भारत ने डेयरी और अनाज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए नकारात्मक सूचियों को सफलतापूर्वक बनाए रखा है, जिससे छोटे किसानों को आयात में अचानक वृद्धि से सुरक्षा सुनिश्चित हुई है।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से जुड़ी चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • गैर-टैरिफ बाधाओं के रूप में विनियामक “हरित संरक्षणवाद”: यूरोपीय संघ अपने व्यापार ढाँचे में पर्यावरण और श्रम मानकों को तेजी से शामिल कर रहा है। भारत में कई लोग इन्हें तटस्थ वैश्विक मानदंडों के बजाय यूरोपीय उद्योगों की रक्षा के लिए बनाई गई वास्तविक व्यापार बाधाओं के रूप में देखते हैं।
    • कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM): वर्ष 2026 से शुरू होने वाला यह “कार्बन कर” उच्च उत्सर्जन वाले क्षेत्रों को लक्षित करता है।
      • भारतीय इस्पात, एल्युमीनियम और रसायन उद्योगों को 20-35% के बराबर कर का सामना करना पड़ सकता है, जिससे आयात शुल्क हटाने से प्राप्त सभी वित्तीय लाभ संभावित रूप से समाप्त हो सकते हैं।
    • यूरोपीय संघ वनों की कटाई विनियमन (EUDR): इसके अंतर्गत कॉफी, रबर और लकड़ी जैसे आयातित उत्पादों का मूल वर्ष 2020 के बाद वनों की कटाई वाले क्षेत्रों से नहीं होना चाहिए।
      • भारत के लाखों लघु किसानों के लिए, भूखंडों को जियोटैग करना और संपूर्ण ट्रेसबिलिटी प्रदान करना एक असहनीय अनुपालन बोझ है, जिससे उनके यूरोपीय बाजार से बाहर होने का खतरा है।
    • कॉरपोरेट सस्टेनेबिलिटी ड्यू डिलिजेंस (CSDDD): वर्ष 2027 से प्रभावी, यह निर्देश कंपनियों को पर्यावरणीय और मानवाधिकार जोखिमों के लिए अपनी संपूर्ण मूल्य शृंखला का ऑडिट करने के लिए बाध्य करता है।
      • भारतीय निर्माता संवेदनशील आपूर्तिकर्ता डेटा साझा करने से सावधान हैं, क्योंकि वे इसे एक महत्त्वपूर्ण व्यावसायिक और गोपनीयता जोखिम मानते हैं।
    • औद्योगिक त्वरक अधिनियम (IAA): यह प्रस्तावित कानून यूरोपीय संघ में “स्थानीय सामग्री मानदंड” (न्यूनतम घरेलू मूल्यवर्द्धन) लागू कर सकता है।
      • ऐसे अनिवार्य नियम भारतीय निर्मित घटकों और तैयार माल की माँग को कम कर सकते हैं औरमेड-इन-यूरोप” विकल्पों को बढ़ावा दे सकते हैं।
  • बाजार पहुँच और रियायतों में विषमता: इस समझौते की एक प्रमुख आलोचना यह है कि प्राप्त मामूली लाभों की तुलना में भारत से अत्यधिक उदारीकरण की अपेक्षा की गई है।
    • यूरोपीय संघ के पूर्व-स्थापित कम टैरिफ: मुक्त व्यापार समझौते से पहले, भारत के लगभग 75% निर्यात, यूरोपीय संघ में 1% से भी कम टैरिफ के साथ प्रवेश करते थे।
      • परिणामस्वरूप, समझौते में वर्णित “अभूतपूर्व पहुँच” मौजूदा स्थिति की तुलना में वास्तविक वृद्धि के लिए सीमित संभावना प्रदान करती है।
    • उच्च टैरिफ असमानता: भारत के औसत टैरिफ (10-12%) यूरोपीय संघ (3-4%) की तुलना में काफी अधिक हैं।
      • “शून्य-शुल्क” व्यवस्था प्राप्त करने के लिए, भारत को यूरोपीय विलासिता वस्तुओं, मशीनरी और कृषि उत्पादों पर भारी और कठिन टैरिफ कटौती करनी होगी, जबकि यूरोपीय संघ की पारस्परिक कटौती बहुत कम है।
    • तीसरे देशों से प्रतिस्पर्द्धा: बांग्लादेश, वियतनाम और इथियोपिया जैसे देश अन्य व्यापार योजनाओं के माध्यम से पहले से ही यूरोपीय संघ में शून्य-शुल्क पहुँच का लाभ उठा रहे हैं।
      • FTA के बाद भी, भारतीय निर्यातकों को इन स्थापित शून्य-शुल्क वाले देशों से कड़ी मूल्य प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ेगा।
  • नियामक समानता का अभाव: भारतीय वार्ताकारों ने यूरोपीय संघ के पर्यावरण प्रवर्तन में “दोहरे मापदंड” को लेकर चिंता जताई है।
    • अमेरिका को दी गई छूट: यूरोपीय संघ ने पर्यावरण नियमों के संबंध में अमेरिका को पहले भी कुछ छूट और अपवाद प्रस्तुत किए हैं।
    • समानता का तर्क: भारतीय विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि पश्चिम में “बड़े प्रदूषणकर्त्ता” को नरमी बरती जाती है, तो भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था पर कठोर अनुपालन लागू करने से असमानता पैदा होती है।
      • भारत अन्य प्रमुख शक्तियों को दी गई किसी भी छूट पर MFN (मोस्ट फेवर्ड नेशन) समानता के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
  • यूरोपीय संघ की चिंताएँ – गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCOs): दूसरी ओर, भारत की घरेलू कानूनी व्यवस्था को लेकर यूरोपीय संघ की अपनी कुछ शिकायतें हैं।
    • अनिवार्य मानक: यूरोपीय संघ भारत के गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCOs) को, जिनमें भारतीय अधिकारियों द्वारा अनिवार्य प्रमाणीकरण और भौतिक सुविधा ऑडिट शामिल हैं – बाजार पहुँच में जानबूझकर बाधा डालने वाला मानता है।
    • बाधा पर बहस: ब्रुसेल्स का तर्क है कि ये मानक तकनीकी रूप से प्रतिबंधात्मक हैं और इनमें पारदर्शिता की कमी है, जबकि नई दिल्ली का कहना है कि भारतीय उपभोक्ताओं को बेचे जाने वाले उत्पादों की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए ये आवश्यक हैं।

PWOnly IAS विशेष

भारत–यूरोपीय संघ संबंध

  • भारत–EU संबंध लोकतंत्र, विधि के शासन, बहुपक्षवाद तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जैसे साझा मूल्यों पर आधारित एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी है।
  • यह व्यापार, निवेश, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, जलवायु कार्रवाई आदि क्षेत्रों में बहुआयामी सहभागिता में विकसित हो चुका है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत ने वर्ष 1962 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EU का पूर्ववर्ती) के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए, जो प्रारंभिक संबंधों में से एक था।
    • वर्ष 1993: संयुक्त राजनीतिक वक्तव्य पर हस्ताक्षर।
    • वर्ष 2000: लिस्बन में प्रथम भारत–EU शिखर सम्मेलन, जिससे नियमित शिखर-स्तरीय संवाद का शुभारंभ हुआ।
    • वर्ष 2004: हेग शिखर सम्मेलन में रणनीतिक साझेदारी का दर्जा।
    • वर्ष 2004 के बाद जनवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित 16वें ऐतिहासिक भारत–EU शिखर सम्मेलन से पूर्व 15 शिखर सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं।
  • वर्ष 2020 के बाद भू-राजनीतिक परिवर्तनों, आपूर्ति-शृंखला विविधीकरण तथा इंडो-पैसिफिक फोकस के कारण यह संबंध उल्लेखनीय रूप से गहरे हुए हैं।
  • प्रमुख संस्थागत तंत्र
    • भारत–EU व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (TTC): फरवरी 2023 में प्रारंभ (अप्रैल 2022 में घोषित); व्यापार, विश्वसनीय प्रौद्योगिकी, डिजिटल, हरित प्रौद्योगिकी और सुरक्षा पर समन्वय।
    • कनेक्टिविटी साझेदारी: वर्ष 2021 में प्रारंभ; परिवहन, डिजिटल, ऊर्जा और जन-से-जन संपर्क को समाहित करती है।
    • भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC): सितंबर 2023 में भागीदारों के साथ घोषित।

आर्थिक एवं व्यापारिक संबंध

  • द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा लगभग इतनी तक पहुँच गई है, जिससे यूरोपीय संघ, भारत का सबसे बड़ा वस्तु व्यापारिक भागीदार बन गया है।
  • EU भारत के प्रमुख व्यापार भागीदारों में से एक है; वर्ष 2024-25 में EU के साथ वस्तु व्यापार का मूल्य 136.53 अरब अमेरिकी डॉलर था (निर्यात 75.85 अरब डॉलर और आयात 60.68 अरब डॉलर)।
  • EU बाजार भारत के कुल निर्यात का लगभग 17% तथा भारत को EU के कुल विदेशी निर्यात का लगभग 9% हिस्सा है।
  • वृद्धि: पिछले एक दशक में लगभग 90% की वृद्धि।
  • निवेश: EU भारत में प्रमुख विदेशी निवेशक है (FDI स्टॉक वर्ष 2023 में €140.1 अरब, जो वर्ष 2019 में €82.3 अरब था); वर्तमान में 6,000 से अधिक यूरोपीय कंपनियाँ भारत में कार्यरत हैं।

यूरोपीय संघ (EU) के बारे में

  • यूरोपीय संघ 27 यूरोपीय देशों का एक आर्थिक और राजनीतिक संघ है।
  • ये देश शांति, स्थिरता, समृद्धि और साझा मूल्यों को बढ़ावा देने हेतु मिलकर कार्य करते हैं।
  • स्थापना: वर्ष 1951 में यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय के रूप में 6 संस्थापक सदस्यों के साथ प्रारंभ; रोम संधि (1957) और लिस्बन संधि (2009) जैसे समझौतों के माध्यम से आधुनिक EU के रूप में विकसित।

  • सदस्य देश: 27 देश (यूनाइटेड किंगडम वर्ष 2020 में ब्रेक्जिट के माध्यम से बाहर हुआ)।
  • मुद्रा: यूरो (€) यूरोजोन के 21 सदस्य देशों में प्रयुक्त होती है (नवीनतम: बुल्गारिया ने 1 जनवरी, 2026 को यूरो अपनाया)।
  • प्रमुख संस्थाएँ: EU की एक विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय संरचना है, जिसमें साझा निर्णय-निर्माण होता है।
    • यूरोपीय आयोग: कार्यकारी संस्था; कानून प्रस्तावित करता है, EU नियमों को लागू करता है, बजट का प्रबंधन करता है।
    • यूरोपीय संसद: नागरिकों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित; सह-विधायी भूमिका और बजट अनुमोदन।
    • यूरोपीय परिषद: राष्ट्राध्यक्ष/सरकार प्रमुख समग्र राजनीतिक दिशा और प्राथमिकताएँ निर्धारित करते हैं।
    • यूरोपीय संघ का न्यायालय: EU कानून के एकरूप अनुप्रयोग को सुनिश्चित करता है।
    • यूरोपीय केंद्रीय बैंक: यूरो और यूरोजोन की मौद्रिक नीति का प्रबंधन करता है।

आगे की राह

  • विवाद निवारण ढाँचा स्थापित करना: व्यापार में गतिरोध पैदा करने वाली बाधाओं को समाप्त करने के लिए, वर्ष 2026 के अंत तक एक त्वरित प्रतिक्रिया मंच सक्रिय किया जाएगा।
    • तकनीकी फिल्टर: तत्काल कानूनी लड़ाइयों के बजाय, यह निकाय विशेषज्ञ स्तर पर तकनीकी विवादों (जैसे-गुणवत्ता नियंत्रण आदेश या खाद्य सुरक्षा ऑडिट) का समाधान करेगा।
    • मान्यता: पारस्परिक मान्यता समझौतों (MRA) को प्राप्त करना एक प्राथमिकता है। इससे भारतीय परीक्षण प्रयोगशालाओं को यूरोपीय अधिकारियों द्वारा प्रमाणित किया जा सकेगा, जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए “एक बार परीक्षित, हर जगह स्वीकृत” प्रणाली सुनिश्चित होगी।
  • हरित व्यापार परिवर्तन में सामंजस्य स्थापित करना: यूरोपीय संघ के पर्यावरणीय बदलावों का विरोध करने के बजाय, भारत हरित आपूर्ति शृंखला का नेतृत्व करने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है।
    • कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CBAM) का एकीकरण: भारत अपनी घरेलू कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को यूरोपीय संघ की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिए काम कर रहा है।
      • भारत में भुगतान किए गए कार्बन टैक्स को कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म के तहत क्रेडिट करके, निर्यातक दोहरे कराधान से बच सकते हैं और मूल्य प्रतिस्पर्द्धा बनाए रख सकते हैं।
    • ट्रेसेबिलिटी एज ए सर्विस: छोटे किसानों को ‘वनों की कटाई विनियमन’ (EUDR) का अनुपालन करने में मदद करने के लिए, भारत डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) का उपयोग कर रहा है।
      • यह कॉफी और रबर जैसी फसलों के लिए कम लागत वाली, सत्यापन योग्य जियोटैगिंग प्रदान करने के लिए सैटेलाइट इमेजरी और ब्लॉकचेन का उपयोग करता है।
  • डिजिटल और तकनीकी तालमेल को मजबूत करना: व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC) समझौते के “भविष्य की तकनीक” वाले हिस्से का संचालन करेगी।
    • सिलिकॉन कॉरिडोर: सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए संयुक्त अनुसंधान एवं विकास एवं विनिर्माण को लागू करना, गुटनिरपेक्ष देशों पर निर्भरता कम करना।
    • डेटा प्रवाह सामंजस्य: भारत के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP) और यूरोपीय संघ के GDPR के बीच की खाई को पाटना।
      • भारत को “डेटा-सुरक्षित” दर्जा प्राप्त होने से भारतीय IT कंपनियों द्वारा वर्तमान में चुकाया जाने वाला “अनुपालन कर” समाप्त हो जाएगा।
  • लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए संस्थागत सहायता: लघु एवं मध्यम उद्यमों के पास प्रायः जटिल यूरोपीय निर्देशों को समझने के लिए आवश्यक कानूनी टीमों का अभाव होता है।
    • यूरोपीय लीगल गेटवे ऑफिस: वर्ष 2026 की शुरुआत में नई दिल्ली में लॉन्च किया गया यह केंद्र, भारतीय कंपनियों को कॉरपोरेट सस्टेनेबिलिटी ड्यू डिलिजेंस (CSDDD) की आवश्यकताओं के बारे में मार्गदर्शन देने के लिए एक “सिंगल विंडो” के रूप में कार्य करता है।
    • वित्तीय उत्प्रेरक: श्रम-प्रधान क्लस्टरों (वस्त्र, चमड़ा) के तकनीकी परिवर्तन को सब्सिडी देने के लिए €500 मिलियन के यूरोपीय संघ के जलवायु कोष का उपयोग करते हुए, यह सुनिश्चित करता है कि वे अपनी अग्रणी स्थिति को खोए बिना वैश्विक स्थिरता मानकों को पूरा करें।

निष्कर्ष

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त समझौता “सभी समझौतों की जननी” है क्योंकि यह एक विकल्प का प्रतिनिधित्व करता है, संरक्षणवाद पर खुलेपन और प्रतिस्पर्द्धा पर सहयोग का विकल्प। वर्ष 2026 में इसके कार्यान्वयन की शुरुआत के साथ, समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष नवनिर्मित परामर्श तंत्रों का उपयोग करके किसी भी तरह के मतभेद को बाधा बनने से पहले ही कितनी प्रभावी ढंग से हल करते हैं।

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