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Jan 31 2026

होया नागाएन्सिस
(Hoya nagaensis)

नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने नागालैंड के एक समुदाय द्वारा संरक्षित अत्यधिक ऊँचाई पर अवस्थित वन में एक नई पादप प्रजाति, होया नागाएन्सिस (Hoya nagaensis) की खोज की है।

होया नागाएन्सिस के बारे में

  • होया नागाएन्सिस एक नवीन रूप से पहचानी गई पुष्पीय पादप प्रजाति है, जिसकी खोज नागालैंड के फेक (Phek) जिले में स्थित कावुनहौ समुदाय आरक्षित वन में की गई है, जो इस क्षेत्र की समृद्ध किंतु अब तक अल्प-अन्वेषित जैव विविधता को रेखांकित करती है।
  • विशेषताएँ
    • पत्तियों की विशिष्ट आकृति और पुष्प संरचनाएँ प्रदर्शित करती है, जो इसे ज्ञात होया प्रजातियों से स्पष्ट रूप से भिन्न बनाती हैं।
    • तारे के आकार के, ‘वैक्स फ्लॉवर’ उत्पन्न करती है तथा दूधिया लेटेक्स स्रावित करती है, जो एपोसाइनेसी कुल की विशिष्ट विशेषता है।
    • समशीतोष्ण, उच्च-ऊँचाई वाले वन पारितंत्रों में पाई जाती है, जिनका वैज्ञानिक रूप से विरल दस्तावेजीकरण हुआ है।
  • महत्त्व
    • उत्तर-पूर्व भारत को, विशेषकर पूर्वी हिमालय क्षेत्र में, एक जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में पुनः सुदृढ़ करता है।
    • समुदाय-प्रबंधित वनों के संरक्षणात्मक महत्त्व को प्रदर्शित करता है।
    • केव बुलेटिन (Kew Bulletin) में प्रकाशित, जो वैश्विक पादप वर्गिकी और संरक्षण विज्ञान में योगदान देता है।
  • प्रजाति के लिए खतरे
    • अत्यंत सीमित वितरण, केवल एक ही स्थान से ज्ञात।
    • स्थानांतरण कृषि (झूम) और वन व्यवधान, जिसके कारण इसे अस्थायी रूप से अति संकटग्रस्त के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

‘होया जीनस’ के बारे में

  • होया, जिसे सामान्यतः ‘वैक्स प्लांट्स’ के नाम से जाना जाता है, एक जीनस है, जो अपने सजावटी पुष्पों और पारिस्थितिकी विविधता के लिए मूल्यवान है।
  • मुख्य विशेषताएँ: तारा-आकार के, ‘वैक्स फ्लॉवर’ तथा आरोही या फैलने वाली वृद्धि प्रवृत्ति।
  • मूल क्षेत्र: दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और पोलिनेशिया।
  • वनस्पति: सामान्यतः उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय वन पाए जाते हैं, जो प्रायः एपिफाइट्स के रूप में होते हैं।

न्यायाधीश गीता मित्तल समिति

सर्वोच्च न्यायालय ने मणिपुर में पीड़ित सहायता में निरंतरता सुनिश्चित करने तथा इसके नियमितीकरण के लिए न्यायाधीश गीता मित्तल समिति के कार्यकाल को 31 जुलाई, 2026 तक बढ़ा दिया है।

न्यायमूर्ति गीता मित्तल समिति के बारे में

  • गठित करने वाला प्राधिकरण: अगस्त 2023 में भारत का सर्वोच्च न्यायालय, मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हुए गंभीर जातीय संघर्षों के बाद।
  • संरचना: यह तीन सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की एक पूर्णतः महिला समिति है
    • अध्यक्ष: न्यायाधीश गीता मित्तल
    • सदस्य: न्यायाधीश शालिनी फणसलकर जोशी और न्यायमूर्ति आशा मेनन।
  • कार्यादेश: मई 2023 में मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा के पीड़ितों के लिए राहत, पुनर्वास, मुआवजा और मानवीय उपायों की निगरानी करना।
  • रिपोर्टें: समिति समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करती रही है।
  • कार्यकाल: समिति का प्रारंभिक कार्यकाल औपचारिक रूप से जुलाई 2025 में समाप्त हो गया था, किंतु उसने अपना कार्य जारी रखा।

भारत के प्रमुख डेल्टाओं का अवतलन

नेचर में प्रकाशित एक नए वैश्विक अध्ययन में पाया गया है कि भारत के कई प्रमुख नदी डेल्टा समुद्र-स्तर वृद्धि की तुलना में अधिक तेजी से अवतलित हो रहे हैं, जिससे बाढ़ का जोखिम उल्लेखनीय रूप से बढ़ रहा है।

नदी डेल्टा के बारे में

  • नदी डेल्टा वे निम्न-स्थलीय क्षेत्र होते हैं, जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं।
  • ये विशाल जनसंख्या, कृषि, मत्स्यपालन, बंदरगाहों और व्यापार का समर्थन देते हैं, परंतु भूमि अवतलन, समुद्र-स्तर वृद्धि और अन्य दबावों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं।
  • डेल्टा पृथ्वी की भूमि का केवल 1% भाग घेरते हैं, परंतु 350–500 मिलियन लोगों (वैश्विक जनसंख्या का लगभग 6%) का समर्थन करते हैं, जिनमें 10 मेगासिटी शामिल हैं।

प्रभावित प्रमुख भारतीय डेल्टा

  • गंगा-ब्रह्मपुत्र (बांग्लादेश के साथ साझा): 90% से अधिक क्षेत्र में व्यापक अवतलन; कोलकाता विशेष रूप से अवतलित हो रहा है।
  • ब्रह्मणी: सबसे तेजी से धँसने वाले डेल्टाओं में से एक; 77% क्षेत्र अवतलित हो रहा है, बड़े हिस्सों में >5 मिमी./वर्ष।
  • महानदी: सबसे तेजी से धँसने वाले क्षेत्रों में शामिल; 69% क्षेत्र अवतलित हो रहा है, बड़े हिस्सों में >5 मिमी./वर्ष।
  • गोदावरी: अत्यधिक अवतलन, कुछ हिस्सों में समुद्र-स्तर वृद्धि से भी तेज।
  • कावेरी और काबिनी: उल्लेखनीय भूमि अवतलन का अनुभव।

डेल्टाओं के धँसने के मुख्य कारण

  • अत्यधिक भूजल दोहन: कई डेल्टाओं में प्रमुख कारण, जिनमें गंगा-ब्रह्मपुत्र और कावेरी शामिल हैं।
    • कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग के लिए पंपिंग, पुनर्भरण की तुलना में तेजी से जलभृतों को खाली करती है, जिससे तलछट अपरिवर्तनीय रूप से संकुचित होती है।
  • अवसाद आपूर्ति में कमी: बाँध, तटबंध और नदी विनियमन प्राकृतिक अवसाद निक्षेप को रोकते हैं (जैसे- महानदी और काबिनी में), जिससे डेल्टा ऊँचे नहीं हो पाते।
  • अन्य कारक: शहरीकरण, भूमि-उपयोग परिवर्तन और जनसंख्या का भार बढ़ाकर अवतलन को तीव्र करते हैं।

भारत ने उच्च-वोल्टेज सुपरकैपेसिटर विकसित किया

भारतीय शोधकर्ताओं ने ऊर्जा भंडारण के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है, जिसमें 3.4 वोल्ट पर संचालित होने वाला एक सुपरकैपेसिटर विकसित किया गया है, जो पारंपरिक 2.5–3.0 वोल्ट सीमा से भी अधिक है।

संबंधित तथ्य

  • यह ‘नवाचार पाउडर धातुकर्म और नवीन सामग्री के लिए अंतरराष्ट्रीय उन्नत अनुसंधान केंद्र’ (ARCI) द्वारा विकसित किया गया है।
    • यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है।
  • केमिकल इंजीनियरिंग जर्नल में प्रकाशित यह शोध, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की तकनीकी अनुसंधान केंद्र पहल द्वारा समर्थित था।
  • यह विद्युत वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, ग्रिड भंडारण और पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए बेहतर प्रदर्शन का वादा करता है।

ARCI उच्च-वोल्टेज सुपरकैपेसिटर के बारे में

  • रिकॉर्ड उच्च परिचालन वोल्टेज: 3.4 वोल्ट पर सुरक्षित संचालन, पारंपरिक 2.5–3.0 वोल्ट सीमा को पार करते हुए, प्रति सेल अधिक ऊर्जा भंडारण सक्षम करता है।
  • उत्कृष्ट प्रदर्शन एवं स्थायित्व: 33% अधिक ऊर्जा घनत्व, 17,000 वाट/किलोग्राम तक शक्ति घनत्व, तथा 15,000 चक्रों के बाद 96% क्षमता संरक्षण।
  • उन्नत PGCN इलेक्ट्रोड प्रौद्योगिकी: जल-प्रतिरोधी और इलेक्ट्रोलाइट-अनुकूल गुणों वाले छिद्रयुक्त ग्राफीन कार्बन नैनो इलेक्ट्रोड का उपयोग, जो स्थिर उच्च-वोल्टेज संचालन सुनिश्चित करता है।
  • व्यापक अनुप्रयोग एवं रणनीतिक प्रभाव: विद्युत वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ, ग्रिड भंडारण और पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए उपयुक्त, भारत के स्वच्छ ऊर्जा और आत्मनिर्भरता लक्ष्यों को समर्थन।

सुपरकैपेसिटर क्या हैं?

  • सुपरकैपेसिटर ऊर्जा भंडारण उपकरण हैं, जो बैटरियों की तुलना में विद्युत ऊर्जा को बहुत तीव्रता से संचित और मुक्त करते हैं, साथ ही लंबा चक्र जीवन प्रदान करते हैं।
  • ये तीव्र शक्ति आपूर्ति की आवश्यकता वाले अनुप्रयोगों (विद्युत वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रिड स्थिरीकरण) के लिए आदर्श हैं, किंतु बैटरियों की तुलना में कम ऊर्जा घनत्व की सीमा रखते हैं।
  • बैटरियों के विपरीत (जो रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से ऊर्जा संगृहीत करती हैं), सुपरकैपेसिटर मुख्यतः निम्न माध्यम से ऊर्जा संगृहीत करते हैं:
    • इलेक्ट्रोड-इलेक्ट्रोलाइट इंटरफेस पर विद्युत स्थैतिक आवेश संचय।
    • इससे एक द्विस्तरीय विद्युत परत का निर्माण होता है, जो तीव्र आवेश और निर्वहन को सक्षम बनाती है।

पंचम डिजिटल चैटबॉट

पंचायती राज मंत्रालय ने पूरे भारत में ग्राम पंचायतों का कार्य आसान बनाने के लिए पंचम चैटबॉट लॉन्च किया है।

पंचम डिजिटल चैटबॉट के बारे में

  • पूर्ण रूप: पंचम का अर्थ है पंचायत सहायता और संदेश चैटबॉट।
  • लॉन्चकर्ता: पंचायती राज मंत्रालय और यूनिसेफ के सहयोग से विकसित।
  • प्लेटफॉर्म: व्हाट्सऐप-आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता चैटबॉट।
  • मुख्य उद्देश्य: पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों (जैसे- सरपंच, वार्ड सदस्य), अधिकारियों और जमीनी स्तर पर कार्यरत कर्मियों के लिए एक डिजिटल सहयोगी के रूप में कार्य करता है।
  • उद्देश्य: उत्तरदायी, पारदर्शी और जवाबदेह जमीनी शासन को सशक्त बनाना, ग्रामीण स्थानीय निकायों को सक्षम करना, सेवा वितरण में सुधार करना और गाँव स्तर पर सूचना उपलब्ध कराना।
  • मुख्य विशेषताएँ और लाभ
    • द्वि-दिशात्मक संचार: प्रतिनिधि प्रश्न पूछ सकते हैं और प्रतिक्रिया भेज सकते हैं; मंत्रालय अपडेट प्रसारित कर सकता है।
    • 22 भारतीय भाषाएँ: बहुभाषी समर्थन के लिए भाषिणी मंच के साथ एकीकृत।
    • अभिव्यक्ति और पाठ मार्गदर्शन: योजनाओं और कार्य प्रणालियों पर संदर्भ-आधारित सहायता एवं वास्तविक समय की जानकारी प्रदान करता है।
    • प्रशिक्षण सहायता: शासन से जुड़े कार्यों पर लघु वीडियो और मार्गदर्शन मॉड्यूल भेजता है।
    • प्रत्यक्ष आधिकारिक अपडेट: परिपत्र, परामर्श और नीतिगत संदेश स्पष्ट और शीघ्रता से प्रदान किए जाते हैं।

गुजरात में बाघ

33 वर्षों के बाद, रतनमहल–जाम्बुघोड़ा वन गलियारे में रॉयल बंगाल टाइगर की उपस्थिति के साथ गुजरात ने पुनः अपना ‘टाइगर स्टेट’ का दर्जा प्राप्त किया है।

  • रतनमहल–जाम्बुघोड़ा वन गलियारा मध्य गुजरात में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकिी संपर्क बिंदु है, जो रतनमहल स्लॉथ भालू अभयारण्य (दाहोद) और जाम्बुघोड़ा वन्यजीव अभयारण्य (पंचमहल) को जोड़ता है।
  • यह 30–60 किलोमीटर लंबा गलियारा स्लॉथ बीयर्स, तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों को संरक्षित आवासों के बीच आवागमन की सुविधा देता है, जो विखंडित परिदृश्य में उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

गुजरात में बाघ आबादी को समर्थन देने के प्रयास

  • शिकार संसाधन को सुदृढ़ करना: गुजरात ने जाम्बुघोड़ा के निकट एक शाकाहारी प्रजनन केंद्र स्थापित किया है, जहाँ चीतल और साँभर का प्रजनन कर उन्हें छोड़ा जा रहा है, जिससे पर्याप्त शिकार उपलब्ध हो सके और मानव–बाघ संघर्ष में कमी आए।
  • आवास प्रबंधन एवं निगरानी: सघन वन गलियारे, जलस्रोत, प्राकृतिक गुफाएँ तथा निरंतर कैमरा-ट्रैप निगरानी को बनाए रखा जा रहा है, ताकि बाघों की आवाजाही और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
  • दीर्घकालिक जनसंख्या योजना: राज्य ने एक व्यवहार्य प्रजनन आबादी स्थापित करने के उद्देश्य से मादा बाघ के परिचय हेतु राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण से संपर्क किया है।

जाम्बुघोड़ा वन्यजीव अभयारण्य

  • जाम्बुघोड़ा वन्यजीव अभयारण्य गुजरात के मध्य भाग के पंचमहल जिले में स्थित है और यह पारिस्थितिकी रूप से समृद्ध रतनमहल–कांजेता–केवड़ी वन गलियारे का हिस्सा है।
  • पारिस्थितिकी महत्त्व
    • यह सागौन, बाँस और महुआ के वनों, पहाड़ी भू-भाग तथा कड़ा बाँध जैसे जलाशयों द्वारा विशेषीकृत है।
    • यह तेंदुए, स्लॉथ बीयर, नीलगाय, जंगली सूअर तथा अब बाघ जैसे विविध जीवों को आश्रय प्रदान करता है।
  • संरक्षण पहल
    • जलस्रोतों का विकास, फलदार वृक्षारोपण तथा प्राकृतिक आश्रयों का निर्माण।
    • सड़क पारगमन और आवास विखंडन जैसे खतरों को कम करने हेतु उपाय।

रतनमहल वन्यजीव अभयारण्य के बारे में

  • रतनमहल वन्यजीव अभयारण्य अपने सघन वनों, दुर्गम भू-भाग और स्लॉथ भालुओं की उच्च सघनता के कारण पारिस्थितिकी रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जिससे यह गुजरात का एक प्रमुख वन्यजीव आवास बनता है।
  • अवस्थिति: यह अभयारण्य मध्य गुजरात के दाहोद जिले में, बड़िया और छोटा उदेपुर के समीप, गुजरात–मध्य प्रदेश सीमा के साथ स्थित है।
  • वनस्पतियाँ: इसमें तलहटी क्षेत्रों में शुष्क सागौन वन, मिश्रित पर्णपाती वन, शुष्क बाँस क्षेत्र तथा तिमरू और सदड़ वृक्ष शामिल हैं।
  • वन्यजीव: रतनमहल में गुजरात की सबसे बड़ी स्लॉथ बियर आबादी पाई जाती है और यह तेंदुओं की भी पर्याप्त संख्या को समर्थन प्रदान करता है।
  • केंद्रीय संरक्षण: प्रचुर मात्रा में महुआ और जामुन के वृक्ष महत्त्वपूर्ण खाद्य संसाधन उपलब्ध कराते हैं, जिससे यह अभयारण्य स्लॉथ बीयर के व्यवहार के अध्ययन के लिए आदर्श बनता है।
  • पारिस्थितिकी महत्त्व: ये वन पनम नदी के जलग्रहण क्षेत्र का निर्माण करते हैं, जो मध्य गुजरात में जल संरक्षण और सिंचाई आवश्यकताओं का समर्थन करता है।
    बाघ की निरंतर उपस्थिति गुजरात में आवास गुणवत्ता में सुधार को दर्शाती है और पारंपरिक बाघ अभयारण्यों से परे परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि को चिह्नित करती है।

ग्रीन हाइड्रोजन हब 

भारत स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और समुद्री डी-कार्बोनाइजेशन को समर्थन देने के लिए राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत काँडला पोर्ट पर एक ग्रीन हाइड्रोजन हब विकसित कर रहा है।

‘ग्रीन हाइड्रोजन हब’ के बारे में

  • ग्रीन हाइड्रोजन हब एक स्थानीयकृत, एकीकृत पारितंत्र है, जो लागत कम करने और औद्योगिक डी-कार्बोनाइजेशन को तेज करने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण, वितरण और अंतिम उपयोग को एक साथ जोड़ता है।
    • ग्रीन हाइड्रोजन को वह हाइड्रोजन माना जाता है, जो नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग कर इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से या बायोमास रूपांतरण द्वारा उत्पादित की जाती है, जिसमें ‘वेल-टू-गेट’ उत्सर्जन सीमा 1 किलोग्राम हाइड्रोजन पर 2 किलोग्राम CO₂ समतुल्य से अधिक नहीं होती।
    • इस सीमा में जल उपचार, इलेक्ट्रोलिसिस, गैस शुद्धिकरण, सुखाने और संपीडन शामिल हैं तथा निगरानी के लिए ऊर्जा दक्षता ब्यूरो को नोडल प्राधिकरण बनाया गया है।
  • स्थान: प्रस्तावित हब का विकास दीनदयाल पोर्ट प्राधिकरण, काँडला, गुजरात में किया जाएगा, जहाँ बड़े पैमाने पर उत्पादन, घरेलू उपयोग और ग्रीन हाइड्रोजन व उसके व्युत्पन्नों के निर्यात के लिए बंदरगाह अवसंरचना का उपयोग किया जाएगा।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • इंटीग्रेटेड ग्रीन मॉलिक्यूल्स इकोसिस्टम: नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग कर ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन मेथनॉल और ग्रीन अमोनिया का उत्पादन।
    • बंदरगाह-नेतृत्व आधारित अवसंरचना: परिवहन और हैंडलिंग लागत कम करने के लिए मौजूदा बंदरगाह लॉजिस्टिक्स, गहरे समुद्र में कनेक्टिविटी और भंडारण सुविधाओं का उपयोग।
    • सार्वजनिक–उद्योग सहयोग: पारंपरिक से ग्रीन मेथेनॉल उत्पादन की ओर संक्रमण के लिए दीनदयाल पोर्ट प्राधिकरण और असम पेट्रो-केमिकल्स लिमिटेड के बीच साझेदारी।
  • महत्त्व
    • ऊर्जा संक्रमण और जलवायु लक्ष्य: 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के भारत के लक्ष्य और वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने के लक्ष्य को समर्थन।
    • समुद्री डी-कार्बोनाइजेशन: वैकल्पिक समुद्री ईंधनों को अपनाने में सहायता, हरित सागर–ग्रीन पोर्ट दिशा-निर्देशों के अनुरूप तथा बंदरगाहों और शिपिंग से उत्सर्जन में कमी।
    • आर्थिक और रणनीतिक लाभ: बंदरगाह-आधारित औद्योगिकीकरण को बढ़ावा, जीवाश्म ईंधन आयात में कमी, आत्मनिर्भर भारत को सुदृढ़ करना और भारत को ग्रीन ईंधन व व्यापार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना।

काँडला हाइड्रोजन हब बंदरगाह-केंद्रित स्वच्छ ऊर्जा पारितंत्र की दिशा में एक रणनीतिक परिवर्तन को दर्शाता है, जो भारत की हरित विकास राह में उद्योग, लॉजिस्टिक्स और सततता का एकीकरण करता है।

संदर्भ

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है।

विनियमों की पृष्ठभूमि

  • UGC ने इन नए नियमों को, जिन्हें सामान्यतः वर्ष 2026 के UGC समानता विनियम कहा जाता है, 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया था।
  • इनका उद्देश्य इसी विषय पर वर्ष 2012 के पूर्व UGC विनियमों को प्रतिस्थापित करना था।
  • मुख्य आवश्यकता: सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (कॉलेजों और विश्वविद्यालयों) को परिसर में भेदभाव से संबंधित शिकायतों के निवारण और समानता/समावेशन को बढ़ावा देने के लिए “समानता संबंधी समितियाँ” गठित करनी होंगी।
  • इसका मुख्य फोकस हाशिए पर स्थित समूहों जैसे- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग आदि के विरुद्ध (विशेषकर जाति-आधारित) भेदभाव को संबोधित करना था।

दिशा-निर्देशों पर विवाद और आलोचनाएँ

  • याचिकाकर्ताओं ने उन नियमों को चुनौती दी जिनमें “जाति-आधारित भेदभाव” को संकीर्ण रूप से केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव तक सीमित किया गया है।
  • आलोचकों का तर्क था कि इससे “पीड़ित होने के पदानुक्रम” का निर्धारण होता है, क्योंकि सामान्य श्रेणी के छात्रों को संरक्षण से बाहर कर दिया जाता है, भले ही वे भेदभाव का सामना करें।
  • उठाई गई चिंताएँ: नियमों का दुरुपयोग हो सकता है (उदाहरण के लिए रैगिंग मामलों में, जहाँ सामान्य श्रेणी का नया छात्र आरक्षित श्रेणी के वरिष्ठ का विरोध करता है, जिससे एकतरफा शिकायतें, पुलिस संबंधी मामले की स्थिति बन सकती है)।
  • व्यापक मुद्दे: इस परिभाषा को बहिष्करणकारी, संभावित रूप से विभाजनकारी और भेदभाव के सभी रूपों को शामिल न करने वाला माना गया (जैसे- क्षेत्रीय, सांस्कृतिक भेदभाव, या उत्तर-पूर्व/दक्षिण भारत के छात्रों के प्रति भाषा, भोजन या प्रथाओं के आधार पर पक्षपात)।

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ और आदेश

  • मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने वर्ष 2026 के विनियमों को “अत्यधिक व्यापक” बताते हुए कहा कि इनके “व्यापक परिणाम होंगे, जो समाज को विभाजित करेंगे।”
  • न्यायालय ने प्रथम दृष्टया नियमों को अस्पष्ट, दुरुपयोग की संभावना और गहन परीक्षण/पुनर्संयोजन की आवश्यकता से ग्रस्त पाया।
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि भेदभाव केवल जाति-आधारित नहीं होता (जैसे- विविध क्षेत्रों से आए छात्रों को प्रभावित करने वाले सांस्कृतिक या रैगिंग से जुड़े मुद्दे)।
  • न्यायालय ने परिसरों में भारत की एकता को प्रतिबिंबित करने के महत्त्व को रेखांकित किया।
  • अंतरिम आदेश: वर्ष 2026 के विनियमों को स्थगित रखा गया है।
    • उच्च शिक्षा संस्थानों को वर्तमान में वर्ष 2012 के ढाँचे का पालन करना होगा, जिसे भेदभाव संबंधी शिकायतों के मामले में अधिक तटस्थ और समावेशी माना जाता है।

संदर्भ

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 भारत की विकास रणनीति के केंद्रीय स्तंभ के रूप में अवसंरचना को रेखांकित करता है।

  • यह परिवर्तन सार्वजनिक व्यय में बड़े पैमाने पर वृद्धि, पीएम गति शक्ति के माध्यम से एकीकृत योजना, तथा प्रमुख नीतिगत सुधारों द्वारा संचालित है।

भारत में अवसंरचना वित्तपोषण

  • सार्वजनिक निवेश: सरकारी पूँजीगत व्यय वित्त वर्ष 2018 में ₹2.63 लाख करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 (बजट अनुमान) में ₹11.21 लाख करोड़ हो गया है, अर्थात् 4.2 गुना वृद्धि।
    • यह महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक निवेश उत्प्रेरक के रूप में कार्य करने के लिए डिजाइन किया गया है, क्योंकि अवसंरचना का व्यापक अर्थव्यवस्था पर मजबूत गुणक प्रभाव होता है।
  • विविधीकृत वित्तपोषण: अवसंरचना वित्तपोषण पारंपरिक बैंक ऋणों से आगे बढ़ रहा है।
    • अब वृद्धि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, अवसंरचना निवेश ट्रस्टों और रियल एस्टेट निवेश ट्रस्टों द्वारा संचालित हो रही है, जो दीर्घकालिक संस्थागत पूँजी को एकत्र करते हैं।
  • सार्वजनिक–निजी भागीदारी: विश्व बैंक भारत को अवसंरचना में निजी निवेश के लिए निम्न और मध्यम आय वाले देशों की श्रेणी में शीर्ष पाँच में स्थान देता है।
    • भारत दक्षिण एशिया में निजी अवसंरचना निवेश का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता है, जो क्षेत्र के कुल निवेश का 90 प्रतिशत से अधिक है।

मुख्य भौतिक अवसंरचना

राष्ट्रीय राजमार्ग

  • नेटवर्क विस्तार: राजमार्ग नेटवर्क वित्त वर्ष 2014 में 91,287 किलोमीटर से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 (दिसंबर तक) में 1,46,572 किलोमीटर हो गया है, अर्थात् 60 प्रतिशत वृद्धि।
  • उच्च-गति गलियारे: परिचालन उच्च-गति गलियारों की लंबाई दस गुना बढ़कर वित्त वर्ष 2014 में 550 किलोमीटर से वित्त वर्ष 2026 (दिसंबर तक) में 5,364 किलोमीटर हो गई है।
  • मुख्य फोकस: आर्थिक गलियारों का विकास, प्रमुख नोड्स को जोड़ना तथा रिंग रोड और बाईपास के लिए नई नीतियों के माध्यम से शहरों में भीड़भाड़ कम करना।

रेलवे अवसंरचना

  • रिकॉर्ड निवेश: नए रेल मार्गों, डबल लाइन और सुरक्षा उन्नयन पर अभूतपूर्व पूँजीगत व्यय केंद्रित किया गया है।
  • विद्युतीकरण: ब्रॉड-गेज नेटवर्क का 99.1 प्रतिशत भाग अब विद्युतीकृत हो चुका है (अक्टूबर 2025 तक)।
  • प्रमुख परियोजनाएँ
    • तीन प्रमुख आर्थिक गलियारों का विकास (ऊर्जा/खनिज, बंदरगाह संपर्क, उच्च-घनत्व मार्ग),
    • मुंबई–अहमदाबाद उच्च-गति रेल,
    • पूर्वी और पश्चिमी समर्पित माल गलियारे,
    • अमृत भारत योजना के अंतर्गत 1,337 स्टेशनों का पुनर्विकास।
    • ट्रैक उन्नयन: 78 प्रतिशत से अधिक मार्गों पर 110 किमी. प्रति घंटा या उससे अधिक गति संभव।
    • सुरक्षा: स्वदेशी ‘कवच’ ट्रेन सुरक्षा प्रणाली का राष्ट्रव्यापी क्रियान्वयन।

नागरिक उड्डयन

  • बाजार आकार: भारत अब विश्व का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाजार है।
  • हवाई अड्डा विस्तार: हवाई अड्डों की संख्या वर्ष 2014 में 74 से बढ़कर वर्ष 2025 में 164 हो गई है।
  • यात्री यातायात वृद्धि: वित्त वर्ष 2025 में हवाई अड्डों ने 412 मिलियन यात्रियों का प्रबंधन किया, जो वर्ष 2031 तक 665 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है।
  • मुख्य कारक: क्षेत्रीय संपर्क के लिए उड़ान योजना की सफलता, हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण और नए विधायी ढाँचे।

बंदरगाह और नौवहन

  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता: बेहतर टर्नअराउंड समय के कारण, 7 भारतीय बंदरगाह विश्व बैंक के कंटेनर पोर्ट प्रदर्शन सूचकांक,  2024 में शीर्ष 100 बंदरगाहों में शामिल हैं।
  • विधायी सुधार: मर्चेंट शिपिंग, कोस्टल शिपिंग, भारतीय बंदरगाह आदि जैसे नए अधिनियमों की श्रृंखला ने नियामक ढाँचे का आधुनिकीकरण किया है।
  • आंतरिक जलमार्ग: राष्ट्रीय जलमार्गों पर कार्गो परिवहन 2013–14 में 18 MMT से बढ़कर वर्ष 2024–25 में 146 MMT हो गया है।
  • पोत निर्माण: पोत निर्माण और समुद्री पारितंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए वर्ष 2025 में ₹69,725 करोड़ का व्यापक पैकेज स्वीकृत किया गया।

ऊर्जा क्षेत्र में परिवर्तन

विद्युत क्षेत्र सुधार

  • क्षमता और पहुँच: स्थापित विद्युत क्षमता नवंबर 2025 में 509.74 गीगावाट तक पहुँच गई। सौभाग्य जैसी ऐतिहासिक योजनाओं के माध्यम से 2.86 करोड़ घरों का विद्युतीकरण किया गया।
  • वित्तीय सुधार: पहली बार वितरण कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025 में ₹2,701 करोड़ का शुद्ध लाभ दर्ज किया।
  • दक्षता लाभ: माँग–आपूर्ति अंतर वित्त वर्ष 2014 में 4.2 प्रतिशत से घटकर नवंबर 2025 तक शून्य हो गया। समग्र तकनीकी और वाणिज्यिक हानियाँ 22.62 प्रतिशत से घटकर 15.04 प्रतिशत रह गईं।

नवीकरणीय ऊर्जा

  • कुल नवीकरणीय ऊर्जा और स्थापित सौर क्षमता में भारत वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर तथा पवन उर्जा क्षमता में चौथे स्थान पर है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा अब भारत की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है (नवंबर 2025 तक)।
  • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता एक दशक में तीन गुना से अधिक बढ़कर मार्च 2014 में 76.38 गीगावाट से नवंबर 2025 में 253.96 गीगावाट हो गई है।

संदर्भ

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 भारत के नवाचार प्रदर्शन में निरंतर सुधार को रेखांकित करता है।

वैश्विक नवाचार सूचकांक रैंकिंग में सुधार

  • वैश्विक रैंकिंग: वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की रैंक 66वें स्थान (2019) से सुधरकर 38वें स्थान (2025) पर पहुँच गई है।
  • क्षेत्रीय नेतृत्व: भारत अब निम्न-मध्यम आय वाले देशों में प्रथम स्थान पर तथा मध्य और दक्षिण एशिया क्षेत्र में भी प्रथम स्थान पर है।
  • नवाचार क्लस्टर: बंगलूरू, दिल्ली और मुंबई वैश्विक स्तर पर शीर्ष 50 सर्वाधिक नवाचार-प्रधान क्लस्टरों में शामिल हैं।

नवाचार प्रदर्शन में योगदान देने वाले प्रमुख कारक

  • उत्पादन-संयुक्त प्रोत्साहन योजना (PLI योजना)
    • PLI योजना, जिसे वर्ष 2020 में शुरू किया गया था, आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप है और वर्तमान में 14 प्रमुख क्षेत्रों को शामिल करती है।
    • वित्तीय परिव्यय: इस योजना का कुल परिव्यय ₹1.97 लाख करोड़ है।
    • निवेश और उत्पादन
      • वास्तविक निवेश: ₹2.0 लाख करोड़ से अधिक (सितंबर 2025 तक)।
      • अतिरिक्त उत्पादन/बिक्री: ₹18.70 लाख करोड़ से अधिक।
    • रोजगार प्रभाव: इस योजना से 12.60 लाख से अधिक रोजगार (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष) सृजित हुए हैं।
    • निर्यात प्रदर्शन: PLI-समर्थित क्षेत्रों से निर्यात ₹8.20 लाख करोड़ से अधिक हो चुका है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स तथा टेलीकॉम और नेटवर्किंग उत्पाद अग्रणी हैं।
    • विनिर्माण में परिवर्तन: आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लेख किया गया है कि PLI योजना ने प्रमुख स्मार्टफोन कंपनियों को अपना उत्पादन भारत स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिससे भारत एक प्रमुख मोबाइल फोन विनिर्माण केंद्र बन गया है।
  • राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (NMM)
    • शुरुआत: राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन की घोषणा केंद्रीय बजट 2025–26 में की गई थी।
    • यह अगले दशक में औद्योगिक वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को गति देने के लिए आधारभूत नीति ढाँचा प्रस्तुत करता है।
    • नीतिगत भूमिका: आर्थिक सर्वेक्षण, NMM को भारत की औद्योगिक वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को तीव्र करने हेतु आधारभूत नीतिगत ढाँचे के निर्माण को बताता है।
    • पूरकता: NMM को विनिर्माण क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए PLI योजना के पूरक के रूप में डिजाइन किया गया है।
  • अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) योजना
    • सरकार ने वर्ष 2025 में ₹1 लाख करोड़ के परिव्यय के साथ छह वर्षों के लिए अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष की घोषणा की।
    • उद्देश्य: कम या शून्य ब्याज दरों पर दीर्घकालिक वित्तपोषण के माध्यम से वैज्ञानिक और तकनीकी नवाचार में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित कर भारत के अनुसंधान पारितंत्र को सुदृढ़ करना।
  • संस्थागत सुधार: अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन
    • कानूनी ढाँचा: अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना ANRF अधिनियम, 2023 के अंतर्गत की गई।
    • ANRF का अधिदेश: ANRF का उद्देश्य उद्योग, अकादमिक जगत और सरकार के बीच रणनीतिक दिशा, प्रतिस्पर्द्धी वित्तपोषण और सहयोग के मार्ग प्रदान करना है।
    • उद्देश्य: यह भारत के अनुसंधान एवं विकास पारितंत्र की संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करता है और मिशन-उन्मुख अनुसंधान को बढ़ावा देता है।
    • प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ANRF का शासी बोर्ड RDI योजना को रणनीतिक दिशा प्रदान करता है।
  • स्टार्ट-अप पारितंत्र का विस्तार
    • स्टार्ट-अप इंडिया पहल: वर्ष 2016 में स्टार्ट-अप इंडिया की शुरुआत के बाद से DPIIT-मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप्स की संख्या लगभग 500 से बढ़कर वर्ष 2025 तक 2 लाख से अधिक हो गई है।
    • नवाचार उत्पादन: आर्थिक सर्वेक्षण में भारत के समग्र नवाचार उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
  • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन
    • उद्देश्य: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन का लक्ष्य संरचनात्मक कमजोरियों को दूर करना और एक सुदृढ़ घरेलू सेमीकंडक्टर पारितंत्र का निर्माण करना है।
    • मुख्य कार्यक्रम: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन और सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम इस रणनीति का आधार हैं।
    • प्रोत्साहन ढाँचा: ₹76,000 करोड़ के प्रोत्साहन ढाँचे द्वारा समर्थित।
    • लक्षित योजनाएँ: चार योजनाएँ परियोजना लागत या पूँजीगत व्यय का 50 प्रतिशत वित्तीय समर्थन प्रदान करती हैं:
      • सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले फैब।
      • कंपाउंड सेमीकंडक्टर सुविधाएँ।
      • आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण इकाइयाँ।
      • घरेलू चिप डिजाइन को प्रोत्साहित करने हेतु डिजाइन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना।
  • सेमीकंडक्टर पारितंत्र का विकास
    • अगस्त 2025 तक, 10 सेमीकंडक्टर विनिर्माण और पैकेजिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है।
    • निवेश का स्तर: इन परियोजनाओं में 6 राज्यों में लगभग ₹1.60 लाख करोड़ का संचयी निवेश शामिल है।
    • राज्य-स्तरीय समर्थन: ओडिशा जैसे राज्यों ने पूरक नीतियाँ लागू की हैं, जिनमें सेमीकंडक्टर विनिर्माण और फैबलेस नीति तथा अतिरिक्त प्रोत्साहन शामिल हैं।
  • बौद्धिक संपदा में प्रदर्शन
    • वैश्विक रैंकिंग (2024)
      • ट्रेडमार्क में चौथा स्थान
      • पेटेंट में छठा स्थान
      • औद्योगिक डिजाइन में 7वाँ स्थान।
    • वृद्धि प्रवृत्तियाँ: वित्त वर्ष 2020 से  वित्त वर्ष 2025 के मध्य,
      • पेटेंट आवेदन लगभग दोगुने हुए।
      • ट्रेडमार्क पंजीकरण में 1.5 गुना की वृद्धि।
      • डिजाइन पंजीकरण में  2.5 गुना की वृद्धि।
    • WIPO का आकलन: विश्व बौद्धिक संपदा संगठन, भारत को उद्यमिता नीतियों और उद्यमिता संस्कृति के लिए वैश्विक स्तर पर 12वाँ स्थान प्रदान करता है।

संदर्भ

हाल ही में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने वर्ष 2018-19 के बाद अपनी पहली व्यापक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 80 मंत्रालयों/विभागों के 32.52 लाख कर्मचारियों का विवरण शामिल है।

  • यह पिछले पाँच वर्षों पर आधारित आंशिक रिपोर्टिंग (19-20 लाख कर्मचारी) में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है।

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT)

  • केंद्र सरकार में कार्मिक प्रबंधन के लिए नोडल विभाग।
  • कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
  • भर्ती नियम, सेवा शर्तें और आरक्षण नीतियाँ निर्धारित करता है।
  • सिविल सेवा सुधार और क्षमता निर्माण के लिए जिम्मेदार है।
  • अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के लिए आरक्षण के कार्यान्वयन की निगरानी करता है।
  • आईएएस और केंद्रीय सचिवालय सेवाओं के लिए कैडर-नियंत्रण प्राधिकरण है।
  • सरकारी रोजगार में प्रतिनिधित्व पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करता है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

  • प्रतिनिधित्व बनाम वैधानिक अधिदेश: रिपोर्ट में प्रत्यक्ष भर्ती आरक्षण कोटा (अनुसूचित जाति के लिए 15%, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5%, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% और अल्पसंख्यक वर्ग के लिए 10%) के मुकाबले कर्मचारियों के वास्तविक प्रतिशत की तुलना की गई है।
    • अनुसूचित जाति (SC): आरक्षण कोटा 15% है, जबकि वास्तविक प्रतिनिधित्व 16.84% है।
    • हालाँकि, यह वर्ष 2018-19 की रिपोर्ट में दर्ज 17.49% से गिरावट दर्शाता है।
    • अनुसूचित जनजाति (ST): 7.5% के आरक्षण कोटा के मुकाबले वर्तमान प्रतिनिधित्व 8.70% है, जो पिछले आँकड़े 8.47% से मामूली वृद्धि दर्शाता है।

    • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): इस वर्ग में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई, जिसका प्रतिनिधित्व वर्ष 2018-19 में 21.57% से बढ़कर 2024 में 26.32% हो गया, जिससे यह 27% आरक्षण के अनिवार्य लक्ष्य के बेहद करीब पहुँच गया है।
    • आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS): यद्यपि 10% आरक्षण कोटा मौजूद है, फिर भी वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट में EWS प्रतिनिधित्व पर आँकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, जिससे नवीनतम आँकड़ों में इस नीति के प्रभाव का हिसाब नहीं रखा गया है।
  • व्यावसायिक अलगाव (“सफाई कर्मचारी कारक”): रिपोर्ट का एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि निम्न स्तर के शारीरिक श्रम वाले कार्यों में हाशिए पर रहने वाले समुदायों का प्रतिनिधित्व अत्यधिक है।
    • समूह C (सफाई कर्मचारी): केंद्रीय सरकार में कार्यरत सफाई कर्मचारियों (सफाई कर्मचारियों) में से 76% से अधिक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं।
    • यह एक ऐसी सामाजिक ऊँच-नीच को उजागर करता है,  जहाँ ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समूह सफाई संबंधी भूमिकाओं में ही केंद्रित हैं।
  • समूहवार प्रतिनिधित्व विश्लेषण: आँकड़ों से पता चलता है कि वरिष्ठता बढ़ने के साथ प्रतिनिधित्व में अक्सर कमी आती है।
    • ग्रुप A (उच्चतम स्तर): अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का संयुक्त प्रतिनिधित्व 39.88% है।
      • SC: 14.20%; ST: 6.54% और OBC: 19.14%।
    • ग्रुप B: इसमें SC 16.20%, ST 7.63%, और OBC 21.95% हैं।
    • ग्रुप C (सफाई कर्मचारियों को छोड़कर): SCs 16.75%, STs 8.94%, और OBCs 27.29% हैं (27% के अधिदेश को पूरा करते हुए)।
  • रिपोर्टिंग में कमियाँ और मुद्दे:
    • EWS डेटा का अभाव: वर्ष 2019 से लागू होने के बावजूद, रिपोर्ट में EWS प्रतिनिधित्व पर कोई डेटा नहीं दिया गया है, जिससे 103वें संवैधानिक संशोधन के प्रभाव का पूरा आकलन करने में समस्या हो रही है।
    • डेटा की सटीकता: DoPT ने बताया कि रिपोर्टिंग में पिछली “कमियाँ” (2019-2023) इसलिए हुईं क्योंकि अलग-अलग मंत्रालय समय पर डेटा जमा नहीं कर पाए, जिस पर पहले भी संसदीय समितियों ने आलोचना की थी।

भारत में आरक्षण की कानूनी संरचना

श्रेणी संवैधानिक प्रावधान न्यायिक सिद्धांत और सुप्रीम कोर्ट के बेंचमार्क
अधिकारों को सक्षम करना अनुच्छेद-16(4): राज्य को उन वर्गों के लिए आरक्षण देने का अधिकार देता है, जिनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। इंद्रा साहनी (1992): 27% OBC कोटा को सही ठहराया, लेकिन कुल आरक्षण को 50% तक सीमित कर दिया।
पदोन्नति अनुच्छेद-16(4A): SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण की अनुमति देता है (77वाँ संशोधन)। एम. नागराज (2006): प्रतिनिधित्व और दक्षता पर मात्रात्मक आँकड़े इकट्ठा करना अनिवार्य है।
बैकलॉग पद अनुच्छेद-16(4B): “कैरी फॉरवर्ड” नियम – खाली सीटें 50% की सीमा में नहीं गिनी जाएँगी (81वाँ संशोधन)। जरनैल सिंह (2018): प्रमोशन में SC/STs पर “क्रीमी लेयर” सिद्धांत लागू किया।
आर्थिक आधार अनुच्छेद-16(6): EWS के लिए 10% तक आरक्षण का प्रावधान करता है (103वाँ संशोधन)। जनहित अभियान (2022): फैसला दिया कि 50% की सीमा “कठोर” नहीं है और EWS संवैधानिक है।
सुरक्षा अनुच्छेद-335: आरक्षण को प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। केरल राज्य बनाम एन.एम. थॉमस: आरक्षण समानता का विस्तार है, उसका अपवाद नहीं।
निगरानी अनुच्छेद-338, 338A, 338B: राष्ट्रीय आयोगों (SC, ST, और OBC) को संवैधानिक दर्जा। राम सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया: सामाजिक पिछड़ापन एक गतिशील अवधारणा है; इसकी समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए।

बढ़ती चिंताएँ

  • वरिष्ठ नौकरशाही में “ग्लास सीलिंग”
    • पदानुक्रमिक असमानता: हालाँकि कुल प्रतिनिधित्व सांख्यिकीय रूप से ठीक है, लेकिन यह असंतुलित है। ग्रुप A में कम होती संख्या (जैसे, STs सिर्फ 6.54% बनाम 7.5% का कोटा) यह बताता है कि हाशिए पर पड़े समूह अपनी आबादी के अनुपात में निर्णय लेने वाली भूमिकाओं तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।
    • पदोन्नति में रुकावटें: सीनियर ग्रेड में कमी से पता चलता है कि अनुच्छेद-16(4A) (पदोन्नति में आरक्षण) के लाभ या तो प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रहे हैं अथवा मुकदमेबाजी और प्रशासनिक देरी के कारण बाधित हो रहे हैं।
  • लगातार व्यावसायिक रूढ़िवादिता
    • सफाई कर्मचारियों का नेटवर्क: यह तथ्य कि 66% से अधिक (और कुछ अनौपचारिक आँकड़ों में 76% तक) सफाई कर्मचारी SC/ST/OBC श्रेणी के हैं, यह दिखाता है कि “संख्यात्मक प्रतिनिधित्व” अभी भी पारंपरिक जाति-आधारित व्यवसायों से जुड़ा हुआ है।
    • असर: यह काम की गरिमा के बारे में चिंता पैदा करता है और यह सवाल उठाता है कि क्या सरकारी नौकरी जाति-आधारित श्रम के चक्र को सफलतापूर्वक तोड़ रही है या केवल इसे औपचारिक बना रही है।
  • “EWS” जवाबदेही में कमी
    • पारदर्शिता के मुद्दे: वर्ष 2019 में लागू होने के बाद से EWS डेटा न देकर, DoPT एक पॉलिसी गैप का निर्माण कर रहा है।
      • यह पता लगाना मुश्किल है कि 10% कोटा प्रयोग हो रहा है या नहीं, अथवा यह “जनरल” (अनारक्षित) सीटों के लिए उपलब्ध पूल पर असर डाल रहा है या नहीं।
  • डेटा अखंडता और जवाबदेही:
    • प्रशासनिक उदासीनता: मंत्रालयों द्वारा डेटा जमा न करने के कारण पिछली रिपोर्टों (2019-2023) में “कमी” संस्थागत जवाबदेही की कमी को उजागर करती है। लगातार डेटा के बिना, सरकार राम सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुझाए गए पिछड़ेपन की “समय-समय पर समीक्षा” नहीं कर सकती है।

आगे की राह

  • अनिवार्य डिजिटल रोस्टर: सरकार को मैनुअल रिपोर्टिंग से हटकर एक ‘सेंट्रलाइज्ड ई-रोस्टर सिस्टम’ अपनाना चाहिए।
    • इससे DoPT सभी 80 मंत्रालयों में रिक्त पदों और प्रतिनिधित्व की रियल-टाइम मॉनिटरिंग कर पाएगा, जिससे “डेटा की कमी” नहीं होगी।
  • ग्रुप A की कमी को पूरा करना: पॉलिसी बनाने के स्तर पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए, खास तौर पर ग्रुप A और B की बैकलॉग भर्ती के लिए स्पेशल रिक्रूटमेंट ड्राइव (SRDs) चलाना।
    • ब्रिज ट्रेनिंग: हाशिये पर स्थित ग्रुप B कर्मचारियों के लिए “कैपेसिटी बिल्डिंग” प्रोग्राम लागू करना ताकि उन्हें सीनियर लीडरशिप रोल के लिए तैयार किया जा सके।
  • ग्रुप C के लिए स्किल अपग्रेडेशन: सफाई कर्मचारियों की तरक्की पर ध्यान देना।
    • तकनीकी प्रशिक्षण और शैक्षिक समर्थन प्रदान करने से इन कर्मचारियों को मैनुअल श्रम से क्लर्क या तकनीकी भूमिकाओं में स्थानांतरित करने में मदद मिल सकती है, और व्यावसायिक जाति के संबंध को तोड़ा जा सकता है।
  • OBCs का उप-वर्गीकरण: यह सुनिश्चित करने के लिए कि 26.32% OBC प्रतिनिधित्व पर कुछ प्रभावशाली जातियों का कब्जा न हो, सरकार को लाभों से अधिक समान बँटवारे के लिए रोहिणी कमीशन की सिफारिशों पर विचार करना चाहिए।
  • SC के निर्देशों का पालन: एम. नगराज और जरनैल सिंह के निर्णयों के बाद, सरकार को नीति में आरक्षण में बदलाव से पहले ‘प्रतिनिधित्व की अक्षमता’ का मूल्यांकन करने के लिए वर्ष 2024-25 का यह डेटा स्थायी तंत्र बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

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