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Jan 05 2026

मन्नथु पद्मनाभन

भारतीय प्रधानमंत्री ने मन्नथु पद्मनाभन की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें एक दूरदर्शी व्यक्ति के रूप में याद किया, जिन्होंने अपना जीवन सामाजिक सुधार, गरिमा और समानता के लिए समर्पित कर दिया था।

मन्नथु पद्मनाभन के बारे में

  • मन्नाथु पद्मनाभन, जिन्हें मन्नम के नाम से जाना जाता है, का जन्म 2 जनवरी, 1878 को केरल के चंगनास्सेरी के पास पेरुन्ना में हुआ था।
  • नायर सर्विस सोसायटी (NSS): वर्ष 1912 में, उन्होंने केरलिया नायर समाजम की स्थापना की, जो बाद में नायर सर्विस सोसायटी (वर्ष 1915) में विकसित हुई।
    • जहाँ एक ओर NSS ने नायर समुदाय के सामाजिक और शैक्षिक उत्थान पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं पद्मनाभन की दृष्टि क्षेत्रीय हितों से परे थी और केरल के व्यापक सामाजिक पुनर्जागरण के साथ संरेखित थी।
  • सामाजिक सुधार संबंधी पहल: मंदिर में प्रवेश, साथ में भोजन करने और सामाजिक गतिशीलता का समर्थन किया।
    • हिंदू समाज में अस्पृश्यता और जाति आधारित भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया।
    • रूढ़िवादी ढाँचों के भीतर महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक सुधार को बढ़ावा दिया।
    • वैकोम सत्याग्रह: अस्पृश्यता के विरुद्ध वायकॉम सत्याग्रह (वर्ष 1924-25) में सहायक भूमिका निभाई।
    • गुरुवयूर सत्याग्रह (वर्ष 1931): वर्तमान त्रिशूर जिले में गुरुवयूर मंदिर में अछूतों को प्रवेश की अनुमति देने के लिए गुरुवयूर सत्याग्रह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सक्रिय रूप से जुड़े रहे।
    • भारत छोड़ो आंदोलन (वर्ष 1942) में भाग लिया; राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए कारावास की सजा हुई।
    • त्रावणकोर राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।
    • त्रावणकोर में निरंकुश शासन का विरोध किया और उत्तरदायी सरकार की माँग की।
    • त्रावणकोर विधान सभा के सदस्य रहे।
  • सम्मान: उन्हें भारत केसरी’ की उपाधि से सम्मानित किया गया और बाद में पद्म भूषण से नवाजा गया।

गांबिया

हाल ही में 200 से अधिक लोगों को ले जा रही एक प्रवासी नाव गांबिया के तट के पास पलट गई, जिसमें कम-से-कम 7 लोगों की मृत्यु हो गई। इस घटना ने यूरोप की ओर जाने वाले अटलांटिक प्रवासन मार्ग पर मौजूद गंभीर जोखिमों को उजागर किया।

गांबिया के बारे में

  • परिचय: गांबिया पश्चिमी अफ्रीका का एक छोटा देश है, जो अपने संकीर्ण आकार, अटलांटिक तटरेखा तथा नदी-आधारित भूगोल और व्यापार पर निर्भरता के लिए जाना जाता है।
  • अवस्थिति: यह पश्चिमी अफ्रीका में स्थित है, जिसकी अटलांटिक महासागर के साथ संक्षिप्त तटरेखा है। देश के उत्तर, दक्षिण और पूर्व में लगभग पूरी तरह से सेनेगल स्थित है।
  • भूगोल: देश का केंद्र गांबिया नदी के चारों ओर स्थित है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होते हुए अटलांटिक महासागर में मिलती है। इसके परिणामस्वरूप मुहाने, आर्द्रभूमियाँ तथा रेतीले समुद्र तट का निर्माण करते हैं।
    • तटीय क्षेत्र बंदरगाहों, मत्स्यपालन, पर्यटन तथा प्रवासन मार्गों को समर्थन प्रदान करता है।
  • वनस्पति और जलवायु: यहाँ मैंग्रोव, सवाना घासभूमि, आर्द्रभूमियाँ तथा नदी-तटीय वन पाए जाते हैं। जलवायु उष्णकटिबंधीय है, जिसमें वर्षा एवं शुष्क ऋतुएँ होती हैं।
  • रणनीतिक महत्त्व: बंजुल बंदरगाह, जो गांबिया नदी के मुहाने पर स्थित है, व्यापार और परिवहन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • गांबिया की तटरेखा यूरोप के कैनरी द्वीपों तक पहुँचने का प्रयास करने वाले प्रवासियों का एक प्रमुख प्रस्थान बिंदु भी है।

असम में जनजातीय स्थिति

हाल ही में असम की सर्वोच्च जनजातीय संस्था, असम जनजातीय संगठनों की समन्वय समिति  (CCTOA) ने राज्य सरकार के प्रस्ताव का विरोध किया है, जिसमें छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की बात कही गई है। समिति ने इसके पीछे संवैधानिक और राजनीतिक चिंताओं को आधार बताया है।

असम में जनजातीय दर्जे की माँग

  • विचाराधीन समुदाय: असम सरकार ने चुटिया, कोच-राजबोंगशी, मटक, मोरान, ताई-अहोम तथा चाय जनजातियाँ (आदिवासी) को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की अनुशंसा की है।
  • राज्य की अनुशंसा: मंत्रियों के एक समूह ने इन्हें अनुसूचित जनजाति (मैदानी), अनुसूचित जनजाति (पर्वतीय) तथा अनुसूचित जनजाति (घाटी) श्रेणियों में वर्गीकृत करने का प्रस्ताव रखा।
  • उद्देश्य: यह पहल विशेष रूप से स्थानीय निकायों और राज्य विधानसभा में राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा आरक्षण की माँगों से संबंधित बताई गई है।

असम जनजातीय संगठनों की समन्वय समिति (CCTOA) द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दे

  • संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन: समिति का तर्क है कि अनुसूचित जनजाति की पहचान जनजातीय विशेषताओं पर आधारित होनी चाहिए, न कि राजनीतिक या चुनावी कारणों पर।
  • मौजूदा अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों पर खतरा: छह समुदायों को शामिल करने से वर्तमान अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक और शैक्षणिक आरक्षण में कटौती हो सकती है।
  • विशेषज्ञ निष्कर्षों से विरोधाभास: पूर्व की विशेषज्ञ समितियों ने इनमें से कई समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग या अनुसूचित जाति में वर्गीकृत किया था, न कि अनुसूचित जनजाति में।
  • आरक्षण सीमा की चिंता: असम में पहले से ही 50% आरक्षण सीमा (जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित है) से अधिक आरक्षण लागू है और नई प्रक्रिया से संवैधानिक अनुपालन और कमजोर हो सकता है।

अनुसूचित जनजाति दर्जे के मानदंड

  • पारंपरिक अर्थव्यवस्था: पारंपरिक आजीविका तथा पूर्व-आधुनिक सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं की उपस्थिति।
  • विशिष्ट संस्कृति और अलगाव: अलग भाषा, रीति-रिवाज, संस्कार तथा तुलनात्मक भौगोलिक अलगाव
  • सामाजिक पिछड़ापन: राज्य की अन्य आबादी की तुलना में शैक्षणिक और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन।

अनुसूचित जनजाति दर्जा प्रदान करने की प्रक्रिया

  • राज्य स्तर पर पहल: राज्य या केंद्रशासित प्रदेश सरकार द्वारा प्रदत्त अध्ययन के साथ प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाता है।
  • केंद्र स्तर पर जाँच: प्रस्ताव की जाँच भारत के महापंजीयक तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा की जाती है।
  • अंतिम स्वीकृति: केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद, संसद द्वारा संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में संशोधन किया जाता है तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त होती है।

विश्व का पहला कार्बन सीमा कर

यूरोपीय संघ ने 1 जनवरी से कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) के अंतर्गत विश्व का पहला कार्बन सीमा कर लागू करना प्रारंभ कर दिया है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • यह कर कार्बन-गहन वस्तुओं के आयात पर कार्बन संबंधी शुल्क आरोपित करता है, जिसका भारत के इस्पात और एल्युमिनियम निर्यात पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।

कार्बन कर के बारे में

  • कार्बन कर एक प्रकार का दंडात्मक कर है, जो स्वीकार्य सीमा से अधिक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर व्यवसायों से वसूला जाता है।
  • यह सामान्यतः वायुमंडल में उत्सर्जित प्रत्येक टन उत्सर्जन के आधार पर लगाया जाता है।
  • कार्बन कर का प्राथमिक उद्देश्य उत्सर्जन को आर्थिक रूप से महँगा बनाकर कार्बन-गहन गतिविधियों को हतोत्साहित करना है, जिससे स्वच्छ उत्पादन विधियों और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी को प्रोत्साहन मिल सके।

कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र के प्रकार

  • उत्सर्जन-आधारित कर: किसी इकाई द्वारा उत्पन्न ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा पर सीधे आरोपित किया जाता है।
  • वस्तु-आधारित कर: कोयला, पेट्रोल, डीजल जैसी कार्बन-गहन वस्तुओं या सेवाओं पर उनके उत्पादन और उपभोग से होने वाले अनुमानित उत्सर्जन के आधार पर लगाया जाता है।
  • सीमा और व्यापार प्रणाली: एक बाजार-आधारित तंत्र, जिसमें सरकार कुल उत्सर्जन की सीमा तय करती है तथा कंपनियों को इस सीमा के भीतर उत्सर्जन परमिट खरीदने, बेचने या व्यापार करने की अनुमति होती है।
  • कार्बन शुल्क: आयातित वस्तुओं में निहित कार्बन मात्रा के आधार पर लगाया गया पर्यावरणीय शुल्क, जिसका उद्देश्य कार्बन रिसाव को रोकना है, विशेषकर उन देशों से जहाँ समान कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्था नहीं है।

कार्बन सीमा समायोजन तंत्र

  • कार्बन सीमा समायोजन तंत्र यूरोपीय संघ द्वारा कार्बन-गहन वस्तुओं के आयात पर लगाया गया जलवायु-आधारित शुल्क है।
  • यह वर्ष 2030 तक 55 प्रतिशत उत्सर्जन कटौती पैकेज का हिस्सा है।
    • इसका उद्देश्य वर्ष 1990 के स्तर की तुलना में वर्ष 2030 तक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में 55% की कमी के लक्ष्य को प्राप्त करना है।
  • आयातकों को कार्बन प्रमाण-पत्र खरीदने होते हैं, जिनकी कीमत यूरोपीय उत्सर्जन व्यापार प्रणाली की नीलामी दरों के अनुरूप होती है।
  • प्रत्येक वर्ष जमा किए जाने वाले प्रमाण-पत्रों की संख्या आयातित वस्तुओं की मात्रा और उनसे जुड़े उत्सर्जन स्तर पर निर्भर करती है।
  • क्षेत्रीय कवरेज: यह विद्युत क्षेत्र और ऊर्जा-गहन उद्योगों जैसे सीमेंट, इस्पात, एल्युमीनियम, तेल शोधन, कागज, काँच, रसायन और उर्वरक से संबंधित वस्तुओं पर लागू होता है।

सोशल मीडिया का विनियमन

हाल ही में केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X को अपने AI चैटबॉट ग्रोक की जाँच करने का निर्देश दिया है, क्योंकि यह महिलाओं की विकृत और अश्लील तस्वीरें जेनरेट कर रहा था।

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी हालिया सलाह

  • मंत्रालय ने X को अश्लील या अपमानजनक कंटेंट के निर्माण को रोकने के लिए ग्रोक का व्यापक तकनीकी, प्रक्रियात्मक और शासन-स्तरीय ऑडिट करने का आदेश दिया।
  • प्लेटफॉर्मों को यह निर्देश दिया गया कि वे अवैध सामग्री को बिना किसी विलंब के हटाएँ अथवा उसकी पहुँच को निष्क्रिय करें तथा निर्धारित समय-सीमा के भीतर अनुपालन कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

भारत में सोशल मीडिया के विनियमन के प्रावधान

  • कानूनी ढाँचा: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, साथ ही IT (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया नैतिकता संहिता) नियम, 2021, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और AI-सक्षम मध्यस्थों को नियंत्रित करते हैं।
    • IT अधिनियम की धारा 79 मध्यस्थों को सशर्त सुरक्षित आश्रय प्रदान करती है, बशर्ते वे उचित सावधानी संबंधी दायित्वों का कड़ाई से अनुपालन करें।
  • उचित सावधानी और जवाबदेही: प्लेटफॉर्मों को अश्लील, पोर्नोग्राफिक या हानिकारक कंटेंट, विशेष रूप से महिलाओं से संबंधित कंटेंट की मेजबानी और प्रसार को रोकने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठाने चाहिए।
    • अनुपालन में विफलता पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • नियामक एवं निगरानी निकाय: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) डिजिटल प्लेटफॉर्मों को विनियमित करने वाला नोडल प्राधिकरण है।
    • सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समितियाँ ऑनलाइन कंटेंट के सख्त विनियमन के लिए नीतिगत और विधायी उपायों की सिफारिश करती हैं।
  • प्रवर्तन शक्तियाँ: सरकार अनुपालन न करने पर प्लेटफॉर्मों और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध सामग्री हटाने, पहुँच अवरुद्ध करने, ऑडिट करने और कानूनी कार्रवाई का आदेश दे सकती है।

संदर्भ 

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान द्वारा प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध बल का प्रयोग करने की स्थिति में हस्तक्षेप की धमकी दी, जिससे देशव्यापी आर्थिक विरोध प्रदर्शनों के बीच तनाव में तेजी से वृद्धि हुई।

ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों के बारे में

  • पृष्ठभूमि: ईरानी रियाल में भारी गिरावट, बढ़ती मुद्रास्फीति और प्रतिबंधों व संघर्ष के कारण लंबे समय से चली आ रही आर्थिक कठिनाइयों के चलते दिसंबर 2025 के अंत में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए।
  • माँगें: दुकानदारों और शहरी श्रमिकों सहित प्रदर्शनकारियों ने सत्ता परिवर्तन के स्थान पर आर्थिक राहत, मुद्रा स्थिरीकरण और बेहतर शासन की माँग की।
  • विरोध प्रदर्शन का स्वरूप: प्रारंभ में शांतिपूर्ण प्रदर्शन तेहरान से कई शहरों में विस्तृत हो गए, लेकिन बाद में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों के साथ हिंसक हो गए।
  • सरकारी प्रतिक्रिया: ईरानी अधिकारियों ने आर्थिक शिकायतों को स्वीकार किया, लेकिन हिंसक तत्त्वों कोदंगाई” करार दिया, जिसके चलते सुरक्षा बलों ने कड़ी कार्रवाई की और नागरिकों के हताहत होने की खबरें आईं।

ईरान में हालिया अमेरिकी हस्तक्षेप

  • प्रतिबंध (वर्ष 2018-वर्तमान): अमेरिका ने वर्ष 2018 में संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) परमाणु समझौते से स्वयं को अलग कर लिया और ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध फिर से लगा दिए, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई।
  • कासिम सुलेमानी की हत्या (वर्ष 2020): अमेरिका ने बगदाद में ड्रोन हमले में ईरान के शीर्ष सैन्य कमांडर को मार गिराया, जिससे दोनों देशों के बीच शत्रुता में तीव्र वृद्धि हुई।
  • इजरायल को समर्थन (वर्ष 2025): अमेरिका ने जून 2025 में ईरान के परमाणु ठिकानों पर इजरायली हवाई हमलों का समर्थन किया, जिसके बाद कतर में एक अमेरिकी अड्डे पर अमेरिका ने सीधे हमले किए और ईरान ने जवाबी कार्रवाई की।
  • सूचना युद्ध (वर्ष 2025): अमेरिकी राजनीतिक समर्थन के साथ, इजरायली खुफिया एजेंसियों ने सोशल मीडिया संदेशों के माध्यम से ईरानी विरोध प्रदर्शनों को खुले तौर पर प्रोत्साहित किया।
  • सैन्य संघर्ष (वर्ष 2026): ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि ईरान ने अपनी मिसाइल या परमाणु क्षमता का पुनर्निर्माण किया तो नए हमले किए जाएँगे और उन्होंने आंतरिक विरोध प्रदर्शनों को बाह्य हस्तक्षेप से जोड़ा।

ईरान के बारे में

  • भौगोलिक स्थिति: ईरान पश्चिमी एशिया (मध्य पूर्व) का एक बड़ा देश है, जो ईरानी पठार पर स्थित है।
  • सीमाएँ: इसकी स्थलीय सीमाएँ पश्चिम में तुर्की और इराक से, उत्तर में आर्मेनिया, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान और कैस्पियन सागर से, पूर्व में अफगानिस्तान और पाकिस्तान से, और दक्षिण में फारस की खाड़ी एवं ओमान की खाड़ी से समुद्री सीमाएँ लगती हैं।

  • भू-आकृति: पश्चिम में जाग्रोस पर्वतमाला और उत्तर में अल्बुर्ज पर्वतमाला, जिनमें ईरान की सबसे ऊँची चोटी माउंट दमावंद’ भी शामिल है, का प्रभुत्व है।
  • मरुस्थल: मध्य और पूर्वी क्षेत्रों में ‘दश्त-ए-कवीर’ और ‘दश्त-ए-लुट’ रेगिस्तान विस्तृत हैं।
  • जलवायु: कैस्पियन तट पर उपोष्णकटिबंधीय से लेकर अंतर्देशीय क्षेत्रों में शुष्क और अर्द्ध-शुष्क तक भिन्न-भिन्न है।
  • संसाधन: तेल, प्राकृतिक गैस और तांबा एवं लौह अयस्क जैसे खनिजों से समृद्ध है।

वर्तमान स्थिति के संभावित निहितार्थ

  • क्षेत्रीय अस्थिरता: तनाव बढ़ने से पश्चिम एशिया में व्यापक संघर्ष का खतरा है, जिससे अमेरिकी सैन्य अड्डों, इजरायल और खाड़ी देशों को खतरा हो सकता है।
  • वैश्विक ऊर्जा बाजार: ईरान से संबंधित कोई भी संघर्ष होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल और गैस की आपूर्ति को बाधित कर सकता है, जिससे वैश्विक कीमतों पर प्रभाव पड़ेगा।
  • भारत के हित: भारत को ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और समुद्री व्यापार के लिए जोखिम का सामना करना पड़ रहा है, साथ ही उसे ईरान, अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखने की भी आवश्यकता है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानदंड: आंतरिक विरोध प्रदर्शनों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून के बारे में चिंताएँ उत्पन्न करता है।

निष्कर्ष 

ईरान संकट आंतरिक आर्थिक संकट और बाहरी भू-राजनीतिक दबाव के अंतर्संबंध को दर्शाता है, जिसके क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक रणनीतिक हितों के लिए गंभीर परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।

संदर्भ 

वाणिज्य मंत्रालय ने निर्यात संवर्द्धन मिशन के अंतर्गतप्रेषण-पूर्व एवं प्रेषण-पश्चात् निर्यात ऋण पर ब्याज सहायता’ तथा ‘निर्यात ऋण के लिए संपार्श्विक (कोलेटरल) सहायता’ नामक योजनाओं के शुभारंभ की घोषणा की है, ताकि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को व्यापार वित्त अधिक सुलभ एवं किफायती बनाया जा सके।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • ये दोनों पहल निर्यात संवर्द्धन  मिशन की निर्यात प्रोत्साहन उप-योजना का हिस्सा हैं।
  • यह एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसे नवंबर 2025 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृति दी गई।

प्रेषण-पूर्व एवं प्रेषण-पश्चात् निर्यात ऋण पर ब्याज सहायता’

  • उद्देश्य: निर्यात ऋण की लागत को कम करना तथा MSME निर्यातकों की कार्यशील पूँजी संबंधी बाधाओं को कम करना।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • वित्तीय सहायता: प्रेषण-पूर्व एवं प्रेषण-पश्चात् रुपया निर्यात ऋण पर 2.75% की आधार ब्याज सहायता प्रदान की जाएगी।
    • अतिरिक्त प्रोत्साहन: कम प्रतिनिधित्व वाले या उभरते बाजारों में निर्यात के लिए अतिरिक्त लाभ दिए जा सकते हैं।
    • कवर किए गए उत्पाद: यह लाभ केवल भारत की लगभग 75% टैरिफ लाइनों की “सकारात्मक सूची” के अंतर्गत निर्यात पर लागू होता है, जिनमें MSME की उच्च भागीदारी है।
    • शामिल: श्रम-प्रधान, पूँजी-प्रधान तथा उच्च मूल्यवर्द्धित क्षेत्र; रक्षा एवं रणनीतिक वस्तुएँ भी सम्मिलित।
    • बहिष्कृत: प्रतिबंधित/निषिद्ध वस्तुएँ, अपशिष्ट/स्क्रैप, तथा वे उत्पाद जो पहले से अन्य प्रोत्साहन योजनाओं में शामिल हैं।
    • वार्षिक सीमा: वित्तीय वर्ष 2025–26 में प्रति निर्यातक अधिकतम 50 लाख रुपये का लाभ।
  • समीक्षा: लागू दरों की समीक्षा मार्च एवं सितंबर में प्रत्येक छह माह में की जाएगी।
  • कार्यान्वयन: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएँगे।

निर्यात ऋण के लिए संपार्श्विक (कोलेटरल) सहायता’

  • उद्देश्य: संपार्श्विक (कोलेटरल) संबंधी बाधाओं को दूर कर MSMEs निर्यातकों की बैंक वित्त तक पहुँच को सुदृढ़ करना।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • साझेदारी: सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों हेतु ऋण गारंटी कोष न्यास (CGTMSE) के सहयोग से कार्यान्वयन।
  • गारंटी कवरेज
    • सूक्ष्म एवं लघु निर्यातकों के लिए 85% तक।
    • मध्यम निर्यातकों के लिए 65% तक।
  • सीमा: एक वित्तीय वर्ष में प्रति निर्यातक अधिकतम 10 करोड़ रुपये की गारंटी सहायता।
  • उद्देश्य: यह योजना मौजूदा ऋण गारंटी तंत्र को पूरक बनाते हुए बैंकों को निर्यात-उन्मुख MSMEs को अधिक ऋण प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
  • कार्यान्वयन: सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों हेतु ऋण गारंटी कोष न्यास (CGTMSE) द्वारा विस्तृत दिशा-निर्देश अधिसूचित किए जाएँगे।
    • व्यापक निर्यात संवर्द्धन ढाँचे में एकीकरण से पूर्व पायलट चरण से शुरुआत होगी।

निर्यात संवर्द्धन मिशन

  • स्वीकृति एवं बजट: नवंबर 2025 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 25,060 करोड़ रुपये के बजट के साथ स्वीकृत।
  • अवधि: वित्तीय वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक।
  • नेतृत्वकारी मंत्रालय: वाणिज्य मंत्रालय, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय तथा वित्त मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से कार्यान्वयन।
  • मुख्य उद्देश्य: MSME, प्रथम निर्यातकों तथा श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर विशेष ध्यान के साथ भारत की निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करना।
  • द्वि-स्तंभ संरचना
    • मिशन दो एकीकृत उप-योजनाओं पर आधारित है:
      • निर्यात प्रोत्साहन: वित्तीय सहायक तंत्र (व्यापार वित्त तक पहुँच) पर केंद्रित।
      • निर्यात दिशा: गैर-वित्तीय सहायक तंत्र, जैसे- बाजार पहुँच, ब्रांडिंग, अनुपालन, लॉजिस्टिक्स तथा व्यापार सूचना पर केंद्रित।

संदर्भ 

केंद्र सरकार ने भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) के तहत आठ राज्यों में 22 नई परियोजनाओं को मंजूरी दी है।

ECMS के तहत घोषित परियोजनाओं की मुख्य विशेषताएँ

  • स्वीकृति का दायरा: तीसरे चरण में 22 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिनमें 11 लक्षित इलेक्ट्रॉनिक घटक क्षेत्र शामिल हैं।
  • निवेश और उत्पादन: परियोजनाओं में ₹41,863 करोड़ का निवेश शामिल है, जिससे ₹2.58 लाख करोड़ का उत्पादन होने की संभावना है।
  • रोजगार सृजन: लगभग 34,000 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की संभावना है, जिससे कुशल विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध होंगे।
  • क्षेत्रीय कवरेज: ये घटक मोबाइल फोन, दूरसंचार, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, रणनीतिक इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स और IT हार्डवेयर क्षेत्रों की आवश्यकताओं को पूरा करेंगे।
  • भौगोलिक विस्तार: परियोजनाएँ आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में विस्तृत हैं।

 इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) के बारे में

  • परिचय: यह भारत की पहली विशेष उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना है, जो विशेष रूप से निष्क्रिय इलेक्ट्रॉनिक घटकों पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य एक मजबूत घरेलू घटक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
  • उद्देश्य: वैश्विक और घरेलू निवेश आकर्षित करना, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVCs) के साथ एकीकृत करना और आयात पर निर्भरता कम करना।
  • प्रारंभ: वर्ष 2025
  • नोडल निकाय: केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा कार्यान्वित।
  • शामिल घटक
    • इसमें प्रतिरोधक, संधारित्र, स्पीकर, माइक्रोफोन, रिले, स्विच, कनेक्टर और विशेष सिरेमिक जैसे निष्क्रिय घटकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
    • अर्द्धचालकों सहित सक्रिय घटक, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के अंतर्गत आते हैं।
  • प्रोत्साहन संरचना: इसमें टर्नओवर-आधारित, पूँजीगत व्यय-आधारित और हाइब्रिड प्रोत्साहन मॉडल उपलब्ध हैं, जिनमें प्रोत्साहन राशि 1 से 10% तक है।
  • अवधि: योजना की अवधि छह वर्ष (वित्त वर्ष 2025-26 से वित्त वर्ष 2031-32) है, जिसमें एक वर्ष की प्रारंभिक अवधि शामिल है और आवेदकों के लिए रोजगार सृजन अनिवार्य है।

नई परियोजनाओं का महत्त्व

  • आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ बनाना: इससे आयातित इलेक्ट्रॉनिक घटकों पर भारत की निर्भरता कम होती है और आपूर्ति शृंखलाओं के लचीलेपन में वृद्धि होती है।
  • उच्च मूल्य वाले विनिर्माण को बढ़ावा: आत्मनिर्भर भारत के अनुरूप उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के विकास में सहयोग प्रदान करता है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता: स्थानीय स्तर पर उत्पादों की सोर्सिंग, गुणवत्ता मानकों और डिजाइन क्षमताओं को प्रोत्साहित करता है, जिससे भारत एक वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित होता है।

संदर्भ 

50वींप्रगति’ बैठक के तहत उठाए गए सभी मुद्दों में से लगभग 35% भूमि अधिग्रहण से संबंधित हैं, जो परियोजना में विलंब का सबसे बड़ा कारण है।

प्रगति (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इंप्लीमेंटेशन) के बारे में

  • प्रगति एक सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी आधारित, बहुआयामी प्लेटफॉर्म है, जिसे केंद्र और राज्य सरकारों की भागीदारी के साथ सक्रिय शासन और समयबद्ध कार्यान्वयन को बढ़ावा देने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • विकास: इसे राष्ट्रीय सूचना केंद्र (NIC) के सहयोग से प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की टीम द्वारा आंतरिक रूप से विकसित किया गया है।
  • यह एक सशक्त प्रणाली है, जो ई-पारदर्शिता और ई-जवाबदेही लाती है, जिससे प्रमुख हितधारकों के बीच वास्तविक समय में संवाद तथा सूचना का आदान-प्रदान सुगम होता है।

भूमि अधिग्रहण

  • भूमि अधिग्रहण से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है, जिसके द्वारा सरकार वैधानिक अधिकार के तहत सार्वजनिक उद्देश्य” के लिए निजी स्वामित्व वाली भूमि का अधिग्रहण करती है, जिसमें मुआवजे का भुगतान और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन का प्रावधान शामिल है।
  • LARR अधिनियम, 2013 के अंतर्गत सार्वजनिक उद्देश्य में निम्नलिखित शामिल हैं:
    • अवसंरचना परियोजनाएँ (सड़कें, रेलवे, सिंचाई, बंदरगाह)
    • रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाएँ
    • आवास और सामाजिक अवसंरचना
    • औद्योगिक गलियारे और सरकारी नियंत्रण वाली परियोजनाएँ।

संवैधानिक स्थिति

  • अनुच्छेद-300A: संपत्ति का अधिकार संवैधानिक अधिकार है (मौलिक अधिकार नहीं)।
  • संपत्ति केवल विधिवत ही अधिग्रहित की जा सकती है, अतः विधिवत अनुपालन अनिवार्य है।

भारत में भूमि अधिग्रहण के लिए कानूनी ढाँचा 

  • वर्ष 2013 से पहले – भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894
    • भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 ने राज्य को न्यूनतम मुआवजे के साथ और बिना सहमति के भूमि अधिग्रहण करने का अधिकार दिया, जिसके कारण स्वतंत्रता के बाद के भारत में व्यापक विस्थापन और सामाजिक अशांति उत्पन्न हुई।
  • भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (LARR अधिनियम)
    • इस अधिनियम ने औपनिवेशिक काल के वर्ष 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम का स्थान लिया।
    • इसका उद्देश्य अधिग्रहण प्रक्रिया को अधिक मानवीय, पारदर्शी और सहभागी बनाना था।
    • LARR अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ
      • अनिवार्य सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA)
      • निजी क्षेत्र और PPP परियोजनाओं के लिए सहमति संबंधी आवश्यकताएँ।
      • प्रचलित बाजार मूल्य से जुड़ा मुआवजा।
      • ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च मुआवजा गुणक।
      • पुनर्वास और पुनर्स्थापन (R&R) के लिए वैधानिक प्रावधान।

मुआवजा

पुनर्वास

  • अधिग्रहित भूमि का बाजार मूल्य
  • गुणक (शहरी क्षेत्रों में 2 गुना तक और ग्रामीण क्षेत्रों में 4 गुना तक)
  • अनिवार्य अधिग्रहण के लिए मुआवजा।
  • आवास या आवास भत्ता उपलब्ध कराना
  • रोजगार के अवसर, वार्षिक या एकमुश्त वित्तीय सहायता।
  • बुनियादी नागरिक सुविधाओं का विकास।

बड़ी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में विलंब का सबसे बड़ा कारण भूमि अधिग्रहण क्यों बना हुआ है?

  • विखंडित भूमि स्वामित्व और अस्पष्ट दस्तावेज: भारत में भूमि स्वामित्व अत्यधिक विखंडित है और भूमि अभिलेखों में प्रायः पुरानी प्रविष्टियाँ तथा अस्पष्ट दस्तावेज होते हैं, जिससे वैध मालिकों की पहचान करना समय लेने वाला एवं मुकदमेबाजी से भरा हो जाता है।
  • भूमि पर आजीविका की निर्भरता: भारत में भूमि केवल एक उत्पादक संपत्ति नहीं है, बल्कि किसानों, आदिवासियों और अनौपचारिक श्रमिकों के लिए आजीविका का प्राथमिक स्रोत है, जिसके कारण अधिग्रहण से आर्थिक सुरक्षा को खतरा होने पर कड़ा विरोध होता है।
  • राज्य और स्थानीय समुदायों के बीच विश्वास का अभाव: निजी और कॉरपोरेट हितों के लिए भूमि अधिग्रहण कानूनों के ऐतिहासिक दुरुपयोग ने विश्वास का अभाव उत्पन्न कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप अवसंरचना परियोजनाओं के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन, सामाजिक आंदोलन और राजनीतिक लामबंदी हुई है।
  • भूमि संबंधी प्रशासन का संघीय स्वरूप: सातवीं अनुसूची के तहत भूमि राज्य का विषय है और बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं के लिए केंद्र तथा राज्यों के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है, जिससे प्रायः अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताओं एवं प्रशासनिक क्षमताओं के कारण देरी होती है।
  • न्यायिक जाँच और कानूनी चुनौतियाँ: भारत में न्यायालय प्रक्रियात्मक अनुपालन, सार्वजनिक उद्देश्य और पुनर्वास उपायों की बारीकी से जाँच करते हैं और अधिग्रहण प्रक्रिया में मामूली चूक भी प्रायः स्थगन आदेश का कारण बनती है।
  • अनिवार्य सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA): इस अधिनियम के तहत आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन अनिवार्य है, जिससे पारदर्शिता में सुधार होता है, लेकिन परियोजनाओं की समय-सीमा में काफी वृद्धि हो जाती है।
  • PPP और निजी परियोजनाओं के लिए सहमति की आवश्यकता: PPP परियोजनाओं में 70% और निजी परियोजनाओं में 80% प्रभावित परिवारों से सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता के कारण सामूहिक सौदेबाजी तथा स्थानीय विरोध के चलते अधिग्रहण में अक्सर विलंब होता है।
  • उच्च मुआवजे के कारण बढ़ा हुआ राजकोषीय बोझ: ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार मूल्य के चार गुना तक मुआवजे का प्रावधान राज्य सरकारों पर वित्तीय दबाव बढ़ाता है, जिससे परियोजनाओं की स्वीकृति और कार्यान्वयन में देरी होती है।

संदर्भ

जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन मौसम के पैटर्न को अधिक अप्रत्याशित बनाता है, मृदा की गुणवत्ता को हानि पहुँचाता है और जल संकट को बढ़ाता है, जलवायु-लचीली कृषि (CRA) पर्यावरणीय क्षति को सीमित करते हुए उत्पादकता को बनाए रखने के लिए एक प्रौद्योगिकी-संचालित दृष्टिकोण के रूप में उभर रही है।

जलवायु-लचीली कृषि क्या है?

  • जलवायु-अनुकूल कृषि में जैव प्रौद्योगिकी और पूरक प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके कृषि पद्धतियों का मार्गदर्शन किया जाता है, रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम की जाती है और जलवायु तनाव के बावजूद उत्पादकता को बनाए रखा जाता है या उसमें सुधार किया जाता है।
  • प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ: जलवायु-अनुकूल कृषि में जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक, मृदा-सूक्ष्मजीव विश्लेषण और जीनोम-एडिटिंग फसलें शामिल हैं, जो सूखा, गर्मी, लवणता और कीटों के प्रति सहनशील होती हैं।
  • डिजिटल उपकरण (AI-संचालित विश्लेषण): जलवायु, मृदा और फसल डेटा को एकीकृत करके स्थान-विशिष्ट कृषि रणनीतियाँ विकसित की जाती हैं, जिससे बेहतर निर्णयन तथा संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने में मदद मिलती है।

  • जैविक उर्वरक: ये प्राकृतिक उर्वरक होते हैं, जिनमें जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं, जो नाइट्रोजन, फास्फोरस और अन्य सूक्ष्म तत्त्वों जैसे पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ाकर पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं।
    • ये मृदा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने और रासायनिक कृत्रिम उर्वरकों की आवश्यकता को कम करने में सहायक होते हैं।
  • जैविक कीटनाशक: ये जैविक कारक (जैसे- प्राकृतिक शिकारी, रोगजनक या जैव रसायन) होते हैं, जिनका उपयोग कीटों और रोगों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
    • ये रासायनिक कीटनाशकों का पर्यावरण के अनुकूल विकल्प प्रदान करते हैं और पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में सहायक होते हैं।
  • मृदा-सूक्ष्मजीव विश्लेषण: इसमें मृदा में मौजूद सूक्ष्मजीवों के समुदाय का अध्ययन करके सूक्ष्मजीवों, पौधों और मृदा पर्यावरण के बीच की अंतःक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझा जाता है।
  • जीनोम-एडिटिड फसलें: ये वे फसलें हैं, जिन्हें जीनोम एडिटिंग तकनीकों (जैसे- CRISPR) के माध्यम से संशोधित किया गया है ताकि वे सूखा, गर्मी, लवणता और कीटों जैसे विशिष्ट जलवायु कारकों को सहन कर सकें।

जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी कृषि की प्रमुख रणनीतियाँ

  • जलवायु-अनुकूलित फसलें: जलवायु परिवर्तन से होने वाले उपज के नुकसान को कम करने के लिए, गर्मी, खारेपन, बाढ़ और सूखे के प्रति सहनशील फसलों की किस्मों को बढ़ावा देना (उदाहरण के लिए, जलमग्नता सहिष्णु चावल जैसे स्कूबा राइस)।
  • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन: मृदा के अपरदन को कम करने, मृदा में नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ाने और मृदा में कार्बन की मात्रा बढ़ाने के लिए नो टिलेज’ खेती, आवरण फसलों और जैविक खाद का उपयोग करना।
  • कृषि वानिकी प्रणालियाँ: छाया, पवनरोधक, बेहतर सूक्ष्म जलवायु और विविध कृषि उत्पादन प्रदान करने के लिए फसलों और पशुधन के साथ वृक्षों को एकीकृत करना।
  • फसल विविधीकरण: जलवायु-संबंधी जोखिमों को न्यूनतम करने तथा कृषि आय में स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एकल-फसली खेती से बहु-फसली खेती की ओर संक्रमण करना।
  • जल प्रबंधन: बढ़ते जल संकट के तहत जल उपयोग दक्षता को अधिकतम करने के लिए ड्रिप सिंचाई और सटीक सिंचाई, वर्षा जल संचयन और सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार करना।
  • प्रौद्योगिकी एकीकरण: मौसम पूर्वानुमान, AI-आधारित सलाह और जलवायु चेतावनियों का लाभ उठाकर समय पर बुवाई, कटाई और जोखिम निवारण को सक्षम बनाना।

भारत में CRA की आवश्यकता 

  • कृषि की जलवायु संबंधी संवेदनशीलता: भारत के कुल बोए गए क्षेत्र का लगभग 51% हिस्सा वर्षा आधारित है, जिससे राष्ट्रीय खाद्य उत्पादन का लगभग 40% हिस्सा प्राप्त होता है, जो इसे जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है।
    • भारत की वार्षिक वर्षा का 75% हिस्सा मानसून के महीनों में होता है, जिससे सूखा-बाढ़ चक्र में वृद्धि होती है।
  • फसल पैदावार पर प्रभाव: जलवायु मॉडल बताते हैं कि पारंपरिक पद्धतियों के तहत सदी के अंत तक चावल की पैदावार में 3-22% की गिरावट आ सकती है और सबसे खराब स्थिति में यह गिरावट 30% से अधिक हो सकती है।
  • रणनीतिक और खाद्य सुरक्षा: पर्यावरणीय स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए, कृषि संबंधी अनुकूलन (CAR) भारत की खाद्य आयात पर निर्भरता को कम कर सकता है और खाद्य क्षेत्र में रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत कर सकता है।
  • आय स्थिरता: तनाव-सहनशील फसलों सहित कृषि संबंधी अनुकूलन पद्धतियाँ किसानों को चरम मौसम की घटनाओं और फसल खराब होने से होने वाली आय संबंधी हानि से बचाती हैं।

भारत में जलवायु परिवर्तन हेतु प्रतिरोधी कृषि के लिए उठाए गए कदम

  • जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (NICRA)
    • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वर्ष 2011 में शुरू की गई इस परियोजना में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल 448 गाँवों में स्थान-विशिष्ट पद्धतियों का प्रदर्शन किया गया है।
    • इन पद्धतियों में धान की सघन खेती, वायुजनित धान की खेती, सीधी बुवाई आधारित धान की खेती, गेहूँ की ‘नो टिलेज’ कृषि, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल फसल किस्मों और खेतों में ही अवशेष प्रबंधन जैसी पद्धतियों को शामिल किया गया है।
  • सतत् कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन
    • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना का एक प्रमुख घटक, NMSA कृषि आय को स्थिर करने के लिए वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (RAD), कृषि-वानिकी, मृदा संरक्षण और एकीकृत कृषि प्रणालियों के माध्यम से जलवायु अनुकूलन पर जोर देता है।
  • मृदा स्वास्थ्य और जैविक कृषि संबंधी पहलें
    • परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) और मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का उद्देश्य जैविक इनपुट, संतुलित पोषक तत्त्व उपयोग और रासायनिक निर्भरता को कम करके मृदा की उर्वरता को बहाल करना और उसकी सहनशीलता को बढ़ाना है।
  • कुशल जल प्रबंधन–’पर ड्रॉप,मोर क्रॉप’ (Per Drop More Crop)
    • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तह, ’पर ड्रॉप,मोर क्रॉप’ घटक सूक्ष्म सिंचाई, ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणालियों और सटीक जल उपयोग को बढ़ावा देता है, जिससे सूखे और जल संकट के प्रति संवेदनशीलता कम हो जाती है।
  • BioE3 नीति: BioE3 नीति में जैव प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों के लिए CRA को प्राथमिकता क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है।
  • संस्थागत और उद्योग समर्थन: ICAR, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के माध्यम से देश में सुदृढ़ वैज्ञानिक क्षमता विद्यमान है, जिसके साथ-साथ एक उभरता हुआ निजी जैव-प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित हो रहा है।

BioE3 नीति

  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा वर्ष 2024 में शुरू की गई।
  • BioE3 नीति का उद्देश्य अत्याधुनिक उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाने और जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नवोन्मेषी अनुसंधान को संरेखित करने हेतु एक ढाँचा तैयार करना है।

वैश्विक प्रथाएँ

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की जलवायु-स्मार्ट कृषि और वानिकी पहल के माध्यम से, व्यापक सार्वजनिक निवेश के साथ, जलवायु परिवर्तन प्रतिरोधी क्षमता (CRA) को संघीय नीति में एकीकृत किया गया है।
  • यूरोपीय संघ: यह यूरोपीय संघ कीग्रीन डील’ और ‘फार्म टू फोर्क’ रणनीति में समाहित है, जो स्थिरता और रासायनिक इनपुट में कमी पर केंद्रित है।
  • चीन: यह जलवायु-सहिष्णु फसल, जल-बचत सिंचाई और कृषि डिजिटलीकरण पर जोर देता है।
  • ब्राजील: राज्य के स्वामित्व वाले जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्था EMBRAPA के मजबूत समर्थन के साथ, उष्णकटिबंधीय जलवायु-अनुकूलित फसल विकास में अग्रणी है।

CRA को विस्तार देने में प्रमुख चुनौतियाँ

  • सामर्थ्य और पहुँच संबंधी बाधाएँ: जलवायु-प्रतिरोधी बीजों, परिशुद्ध सिंचाई और डिजिटल उपकरणों की उच्च प्रारंभिक लागत भारत के अधिकांश कृषि क्षेत्र का गठन करने वाले छोटे और सीमांत किसानों के बीच इनके उपयोग को सीमित करती है।
  • जैविक इनपुट की गुणवत्ता संबंधी चिंताएँ: अनियमित और निम्न गुणवत्ता वाले जैव उर्वरकों के प्रसार से उनकी प्रभावशीलता कम हो जाती है, किसानों का विश्वास कम हो जाता है और प्रायः वे रासायनिक आधारित खेती को पुनः अपनाते हैं।
  • ज्ञान और क्षमता की कमी: सीमित जागरूकता, अपर्याप्त विस्तार सेवाएँ और कम डिजिटल साक्षरता किसानों की जलवायु-अनुकूल पद्धतियों को अपनाने, व्याख्या करने और AI-आधारित निर्णय-सहायता प्रणालियों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की क्षमता को बाधित करती हैं।
  • खंडित भूमि जोत: छोटे और खंडित खेतों के आकार से मापदंड आधारित अर्थव्यवस्थाएँ कम हो जाती हैं, जिससे सूक्ष्म सिंचाई, मशीनीकरण और मृदा प्रबंधन प्रौद्योगिकियों में निवेश कम व्यवहार्य हो जाता है।
  • संस्थागत और नीतिगत समन्वय संबंधी मुद्दे: कृषि, जल, जलवायु और ग्रामीण विकास नीतियों में अपर्याप्त सामंजस्य और राज्य एवं स्थानीय स्तर पर असंगत कार्यान्वयन, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन (CRA) के विस्तार में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • बाजार और प्रोत्साहन संबंधी सीमाएँ: जलवायु-लचीली फसलों और पद्धतियों के लिए सुनिश्चित बाजारों, मूल्य प्रोत्साहनों और जोखिम-साझाकरण तंत्रों की कमी किसानों को पारंपरिक, लागत-प्रधान कृषि से जलवायु परिवर्तन की ओर अग्रसर होने से हतोत्साहित करती है।

संदर्भ

हालिया विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली के वार्षिक PM2.5 प्रदूषण का कम-से-कम एक-तिहाई हिस्सा द्वितीयक एरोसोल का है, जो गंभीर स्मॉग की घटनाओं को समझाने में सहायक होता है।

प्राथमिक बनाम द्वितीयक प्रदूषक

  • प्राथमिक प्रदूषक वाहनों से निकलने वाले धूम्र, कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों, बायोमास दहन और औद्योगिक प्रक्रियाओं जैसे स्रोतों से प्रत्यक्ष रूप से उत्सर्जित होते हैं।
    • उदाहरण: कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, अमोनिया, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन।
  • द्वितीयक प्रदूषकों का निर्माण तब होता है, जब ये प्राथमिक उत्सर्जन वायुमंडल में मौजूद अन्य तत्त्वों (जैसे- आर्द्रता, तापमान और सूर्य का प्रकाश) के साथ अभिक्रिया करते हैं। इनमें अमोनियम सल्फेट और अमोनियम नाइट्रेट जैसे हानिकारक यौगिक शामिल हैं।
    • ये प्रदूषक PM2.5 के स्तर में अत्यधिक सीमा तक वृद्धि कर देते हैं, विशेषतः लंबे समय तक रहने वाले स्मॉग के दौरान, भले ही स्थानीय स्रोत नियंत्रण में प्रतीत हों।
    • उदाहरण: पार्टिकुलेट मैटर (PM), क्षोभमंडलीय ओजोन (O₃), सल्फ्यूरिक अम्ल और नाइट्रिक अम्ल, पेरोक्सीएसिटाइल नाइट्रेट (PAN), प्रकाश रासायनिक स्मॉग।

PM (पार्टिकुलेट मैटर) से तात्पर्य कण प्रदूषण से है, जो वायु में मौजूद सूक्ष्म ठोस कणों और तरल बूँदों का मिश्रण होता है। धूल, मृदा, कालिख या धुएँ जैसे कुछ कण इतने बड़े या गहरे रंग के होते हैं कि उन्हें बिना किसी उपकरण के भी देखा जा सकता है।

कण प्रदूषण के प्रकारों में शामिल हैं

  • PM10: 10 माइक्रोमीटर या उससे कम व्यास वाले श्वसन कण।
  • PM2.5: 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम व्यास वाले महीन श्वसन कण।

द्वितीयक प्रदूषकों के स्वास्थ्य पर प्रभाव

  • श्वसन स्वास्थ्य पर प्रभाव: मुख्यतः PM2.5 के रूप में मौजूद ये कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश करते हैं, जिससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और COPD की समस्या बढ़ जाती है, फेफड़ों की कार्यक्षमता कम हो जाती है और श्वसन संक्रमण, विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों में, बढ़ जाते हैं।
  • हृदय संबंधी प्रभाव: सूक्ष्म द्वितीयक एरोसोल रक्तप्रवाह में प्रवेश करते हैं, जिससे प्रणालीगत विकार उत्पन्न होता है और हृदय गति रुकना, स्ट्रोक, उच्च रक्तचाप का खतरा बढ़ जाता है।
  • बच्चों और मातृ स्वास्थ्य पर प्रभाव: इसके संपर्क में आने से बच्चों में फेफड़ों के विकास की प्रक्रिया बाधित होती है तथा यह कम जन्म भार, समयपूर्व प्रसव तथा जन्मकालीन मृत्यु जैसी प्रतिकूल अवस्थाओं से संबद्ध पाया गया है, जिसका प्रमुख कारण यह है कि बच्चे प्रति इकाई शरीर भार आधारित वयस्कों की तुलना में अधिक मात्रा में का श्वसन करते हैं।
  • तंत्रिका और संज्ञानात्मक प्रभाव: अतिसूक्ष्म द्वितीयक कण रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार कर सकते हैं, जिससे तंत्रिका सूजन, संज्ञानात्मक कमी और तंत्रिका अपक्षयी विकारों का खतरा बढ़ जाता है।
  • दीर्घकालिक और प्रणालीगत स्वास्थ्य जोखिम: लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, कैंसर का खतरा बढ़ता है (PM2.5 को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कैंसरकारक के रूप में वर्गीकृत किया गया है), और चयापचय संबंधी विकार उत्पन्न होते हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक बोझ बढ़ता है।

अमोनियम सल्फेट (Ammonium Sulfate)

  • अमोनियम सल्फेट: दिल्ली में अमोनियम सल्फेट सबसे प्रमुख द्वितीयक अकार्बनिक एरोसोल है, जो शहर के वार्षिक PM2.5 भार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है, विशेष रूप से मानसून के बाद के सर्दियों के महीनों में जब प्रदूषण अपने चरम पर होता है।
  • निर्माण प्रक्रिया: अमोनियम सल्फेट का निर्माण तब होता है, जब सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) आर्द्रता और उपयुक्त तापमान की उपस्थिति में अमोनिया के साथ अभिक्रिया करता है।

पूर्ववर्ती प्रदूषकों का स्रोत

  • सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂): SO₂ कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों, तेल रिफाइनरियों, ईंट भट्टों, जहाजरानी और भारी उद्योगों से उत्सर्जित होती है, जो द्वितीयक एरोसोल निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।
  • अमोनिया के स्रोत: अमोनिया कृषि (उर्वरक, पशुधन अपशिष्ट), सीवेज सिस्टम, लैंडफिल, बायोमास दहन और कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं से उत्सर्जित होती है।

प्रदूषण के स्तर में मौसमी परिवर्तन

  • मौसम विज्ञान की भूमिका: शीतकालीन महीनों में आर्द्रता, कम तापमान और स्थिर वायु के कारण गैसों का कणों में परिवर्तन तीव्र हो जाता है, जिससे इन महीनों में प्रदूषण और भी बढ़ जाता है।
  • विभिन्न ऋतुओं में योगदान
    • मानसून के बाद और शीत ऋतु: मानसून के बाद के समय में PM2.5 में अमोनियम सल्फेट का योगदान 49% होता है और शीत ऋतु में 41%
    • ग्रीष्म ऋतु और मानसून: इन ऋतुओं में कम आर्द्रता और वर्षा के कारण इसका योगदान घटकर 21% हो जाता है।
  • राष्ट्रव्यापी प्रभाव: छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और तेलंगाना जैसे राज्यों में कोयला आधारित विद्युत उत्पादन के कारण अमोनियम सल्फेट का स्तर उच्च पाया गया है, जो दिल्ली-NCR जैसे क्षेत्रों में सीमा पार प्रदूषण में योगदान दे रहा है।

वैश्विक तुलना

  • डोनोरा स्मॉग घटना (1948): अमेरिका में डोनोरा स्मॉग आपदा (1948) स्थिर मौसम की स्थिति में सल्फेट एरोसोल निर्माण के खतरों का एक उदाहरण है, जहाँ औद्योगिक संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन ने घातक एरोसोल का निर्माण किया।
  • बीजिंग का प्रदूषण इतिहास: बीजिंग में 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध से सल्फेट एरोसोल वायु प्रदूषण के एक प्रमुख घटक के रूप में उभरकर सामने आए हैं, जिनकी उत्पत्ति मुख्यतः कोयला दहन से उत्सर्जित सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) तथा तीव्र शहरीकरण और  परिणामस्वरूप बढ़े नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) उत्सर्जनों से संबंधित है।

संदर्भ

COP30 (बेलेम, 2025) में आयोजित जलवायु वार्ता के केंद्र में अपशिष्ट और चक्रीयता को रखा गया था, जिसमें ‘नो ऑर्गेनिक वेस्ट (NOW)’ जैसी पहलों के माध्यम से मेथेन उत्सर्जन को कम करने पर जोर दिया गया था।

संबंधित तथ्य  

  • COP30 में शहरों के अपशिष्ट को संसाधन के रूप में मान्यता देते हुए चक्रीय अर्थव्यवस्था संबंधी पहलों को गति देने का आह्वान किया गया।
  • COP26 में घोषित भारत का मिशन LiFE (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) सचेत उपभोग और सतत् जीवनशैली को बढ़ावा देता है और चक्रीय अर्थव्यवस्था के दर्शन पर दृढ़ता से आधारित है।

भारत में शहरी अपशिष्ट चुनौती

  • तीव्र शहरीकरण: भारत के शहरों के समक्ष स्वच्छ एवं रहने योग्य शहरी क्षेत्रों तथा अपशिष्ट से ग्रस्त वातावरण के बीच एक कठिन विकल्प उपस्थित है, और अनेक शहर वैश्विक पर्यावरणीय स्वास्थ्य मानकों पर खरे नहीं उतर पाए हैं।
  • बढ़ता अपशिष्ट: अनुमान है कि वर्ष 2030 तक शहरी भारत में प्रतिवर्ष 165 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होगा, जो वर्ष 2050 तक बढ़कर 436 मिलियन टन हो जाएगा, क्योंकि शहरी आबादी 814 मिलियन तक पहुँच जाएगी।
  • जलवायु और स्वास्थ्य पर प्रभाव: अपशिष्ट से संबंधित उत्सर्जन 41 मिलियन टन से अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर सकता है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, उत्पादकता और जलवायु लक्ष्यों के लिए जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
  • मेथेन का संबंध: लैंडफिल में जैविक अपशिष्ट के अपघटन से मेथेन गैस उत्सर्जित होती है, जो CO₂ की तुलना में अधिक वैश्विक तापन क्षमता वाली ग्रीनहाउस गैस है, इसलिए अपशिष्ट प्रबंधन जलवायु परिवर्तन को कम करने की एक प्रमुख रणनीति है।

रेखीय और चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल क्या हैं?

  • रैखिक अर्थव्यवस्था मॉडल
    • अवधारणा: रैखिक अर्थव्यवस्था मॉडल उपयोग करो, बनाओ और त्याग दो’ के दृष्टिकोण का अनुसरण करता है, जिसमें संसाधनों का दोहन किया जाता है, उन्हें उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है और उपयोग के बाद त्याग दिया जाता है।
    • संसाधन अक्षमता: इस मॉडल के परिणामस्वरूप संसाधनों का अत्यधिक दोहन, भारी मात्रा में अपशिष्ट और पर्यावरण का क्षरण होता है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल
    • अवधारणा: चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल अपशिष्ट को एक संसाधन के रूप में देखता है और इसका उद्देश्य सामग्रियों को यथासंभव लंबे समय तक उपयोग में रखना है।
    • यह अपशिष्ट के उत्पादन को कम करने और पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और ऊर्जा पुनर्प्राप्ति के माध्यम से संसाधनों की अधिकतम पुनर्प्राप्ति पर केंद्रित है।

    • स्थिरता लाभ: चक्रीयता हरित रोजगार सृजित करके, उत्सर्जन को कम करके और शहरी पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार करके समावेशी विकास को बढ़ावा देती है।
      • उदाहरण: पुणे का SWaCH मॉडल घर-घर अपशिष्ट संग्रहण और पुनर्चक्रण हेतु गरीबोन्मुख साझेदारी के अंतर्गत अपशिष्ट बीनने वालों को औपचारिक रूप से एकीकृत करता है।

भारत में शहरी अपशिष्ट की प्रवृत्तियाँ और स्थिति

  • जैविक अपशिष्ट का प्रभुत्व: नगरपालिका अपशिष्ट का 50% से अधिक भाग जैविक होता है, जिसका प्रबंधन खाद बनाने और जैव-मीथेन के माध्यम से किया जा सकता है।
    • हरित ऊर्जा क्षमता: संपीडित बायोगैस (CBG) संयंत्र गीले अपशिष्ट को हरित ईंधन में परिवर्तित करने में सक्षम हैं, जबकि पूर्ण दहन से बिजली भी उत्पन्न की जा सकती है।
    • उदाहरण: इंदौर ने घर-घर जाकर अपशिष्ट के संग्रहण और पृथक्करण की 100% प्रक्रिया अपनाई है और गीले अपशिष्ट के प्रसंस्करण प्रणालियों को लागू किया है, जो दर्शाता है कि कैसे शासन और बुनियादी ढाँचा चक्रीयता को बढ़ावा दे सकते हैं।
  • शुष्क अपशिष्ट चुनौती: शहरी अपशिष्ट का लगभग एक-तिहाई हिस्सा शुष्क अपशिष्ट होता है, जिसमें प्लास्टिक, धातु और कागज शामिल हैं। इसके लिए कुशल पृथक्करण और पुनर्चक्रण प्रणालियों की आवश्यकता है।
  • निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट: निर्माण और विध्वंस गतिविधियों से प्रतिवर्ष लगभग 12 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जो धूल प्रदूषण तथा भूमि क्षरण में योगदान देता है।
    • उदाहरण: ग्रेटर चेन्नई नगर निगम ने अवैध रूप से अपशिष्ट फेंकने वाले वाहनों पर जुर्माना लगाकर और उन्हें जब्त करके सख्त प्रवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाया है, जो रोकथाम की आवश्यकता को दर्शाता है।

भारत में नियामक ढाँचे

  • स्वच्छ भारत मिशन (शहरी): स्वच्छ भारत मिशन शहरी स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और स्वच्छता के लिए एक व्यापक नीतिगत ढाँचा प्रदान करता है।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016: ये नियम नगरपालिका अपशिष्ट के स्रोत पर पृथक्करण, घर-घर जाकर संग्रहण, वैज्ञानिक प्रसंस्करण और सुरक्षित निपटान को अनिवार्य बनाते हैं।
    • उदाहरण: बिधाननगर नगर निगम (कोलकाता) ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों से जुड़े संरचित उपयोगकर्ता शुल्क और जुर्माने लागू किए, जो अनुपालन-आधारित शहरी अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016: ये नियम बड़े पैमाने पर अपशिष्ट उत्पन्न करने वालों हेतु उत्तरदायित्व निर्धारित करते हैं और स्थानीय निकायों को पुनर्चक्रण तथा प्रसंस्करण सुविधाएँ स्थापित करने के लिए बाध्य करते हैं।
  • पर्यावरण (निर्माण एवं विध्वंस) अपशिष्ट नियम, 2025: 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी इन नियमों का उद्देश्य निर्माण अपशिष्ट प्रबंधन में अनुपालन को मजबूत करना और जवाबदेही में सुधार करना है।
  • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व: इसका उद्देश्य उत्पादकों को प्लास्टिक और अन्य शुष्क अपशिष्ट के संग्रहण, पुनर्चक्रण और निपटान के लिए जवाबदेह बनाना है।
  • अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग संबंधी ढाँचा: अमृत और स्वच्छ भारत मिशन जैसे शहरी अभियान शहरी जल सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग को प्रोत्साहित करते हैं।
    • उदाहरण: सूरत नगर निगम ने अपशिष्ट जल को पुन: उपयोग योग्य आर्थिक संसाधन में परिवर्तित करने के लिए तृतीयक उपचार क्षमता स्थापित की है, जो चक्रीय जल प्रबंधन का समर्थन करती है।
    • नागपुर की पुनर्चक्रित जल पुन: उपयोग परियोजना कोराडी थर्मल पॉवर प्लांट में शीतलन के लिए उपचारित नगरपालिका अपशिष्ट जल की आपूर्ति करती है और इसे विश्व बैंक में एक सफल जल संबंधी मामले के रूप में प्रलेखित किया गया है।

चक्रीयता प्राप्त करने में चुनौतियाँ

  • स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण की कमी: सीमित जागरूकता और नागरिकों की अनियमित भागीदारी के कारण स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण संबंधी सेवाएँ अभी भी खराब स्थिति में हैं।
  • नगरपालिका क्षमता संबंधी बाधाएँ: शहरी स्थानीय निकायों को चक्रीय अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को लागू करने में वित्तीय, तकनीकी और मानव संसाधन की कमी का सामना करना पड़ता है।
  • बुनियादी ढाँचे की कमियाँ: अपर्याप्त सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाएँ, पुनर्चक्रण संयंत्र और अपशिष्ट-से-ऊर्जा बुनियादी ढाँचा प्रभावी अपशिष्ट प्रसंस्करण में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • बाजार व्यवहार्यता संबंधी मुद्दे: पुनर्चक्रित उत्पादों को गुणवत्ता संबंधी चिंताओं, सीमित उपभोक्ता विश्वास और कमजोर बाजार संबंधों का सामना करना पड़ता है।
  • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) कार्यान्वयन में कमियाँ: विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व को शुष्क अपशिष्ट की सभी श्रेणियों में समान रूप से लागू नहीं किया गया है।
  • निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट का पता लगाने की क्षमता: निर्माण और विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन कमजोर पहचान, निगरानी तथा भवन विनियमों के साथ एकीकरण से ग्रस्त है।
  • संस्थागत विखंडन: नगर निकायों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और शहरी नियोजन प्राधिकरणों के बीच खराब समन्वय नीति कार्यान्वयन को कमजोर करता है।
  • व्यवहार संबंधी बाधाएँ: बढ़ता उपभोक्तावाद और उत्पादों का तेजी से अप्रचलित होना, सामग्रियों को कम करने और उनका पुन: उपयोग करने के सिद्धांतों को कमजोर करता है।
  • निगरानी संबंधी कमियाँ: मजबूत परीक्षण, निगरानी और डेटा प्रणालियों की कमी, चक्रीय अर्थव्यवस्था की पहलों की विश्वसनीयता और विस्तारशीलता को प्रभावित करती है।

केस स्टडी: छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर शहर में ठोस और तरल संसाधन प्रबंधन

  • अंबिकापुर में घर-घर जाकर अपशिष्ट संग्रहण और वैज्ञानिक निपटान के साथ एक प्रभावी SLRM मॉडल लागू किया गया, जिसका नेतृत्व स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने किया।
  • शहर ने 16 एकड़ के अपशिष्ट स्थल को स्वच्छता जागरूकता पार्क में परिवर्तित कर दिया और अपशिष्ट-मुक्त शहर बन गया।
  • इस पहल से हरित रोजगार सृजित हुए, भूमि अधिग्रहण की लागत में कमी आई ।

अभ्यास प्रश्न 

स्वच्छता मिशन की उपलब्धियों ने भारत के समक्ष अगली महत्त्वपूर्ण चुनौती के रूप में मल-अपशिष्ट प्रबंधन को प्रस्तुत किया है। इस संदर्भ में, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) चरण-II के अंतर्गत मल-अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी प्रमुख संरचनात्मक, संस्थागत एवं व्यवहारगत चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। साथ ही, सतत स्वच्छता परिणामों की प्राप्ति में शहरी-ग्रामीण सहभागिता की प्रभावशीलता तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) की भूमिका पर चर्चा कीजिए। 

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