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Jan 06 2026

संदर्भ

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका ने ऑपरेशन ‘एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ संचालित किया, जिसके तहत वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को कराकस, वेनेजुएला में गिरफ्तार कर सत्ता से अपदस्थ कर दिया गया।

  • अमेरिका का यह कदम राजनयिक दबाव के बजाय प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप पर आधारित था। अमेरिका ने वेनेजुएला पर अस्थायी नियंत्रण की घोषणा की और उसके तेल को बेचने की योजना बनाई, जिससे क्षेत्रीय भू-राजनीति में नया बदलाव आया।

वेनेजुएला और इसका वैश्विक महत्त्व

  • वेनेजुएला, जिसका आधिकारिक नाम बोलिवेरियन गणराज्य वेनेजुएला है, दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट पर अवस्थित है।
  • प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध और रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण स्थान पर अवस्थित, वेनेजुएला ने ऐतिहासिक रूप से वैश्विक ऊर्जा बाजारों एवं भू-राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • हालिया वर्षों में यह देश क्षेत्रीय अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय राजनयिक वार्ताओं का केंद्र रहा है।

मुख्य विशेषताएँ और वैश्विक महत्त्व

  • ऊर्जा महाशक्ति: यहाँ विश्व का सबसे बड़ा तेल भंडार (लगभग 300 अरब बैरल) और ‘ओरिनोको’ बेल्ट में महत्त्वपूर्ण गैस भंडार मौजूद है; ओपेक का एक प्रमुख सदस्य होने के कारण, वैश्विक तेल कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करता है।
  • भू-राजनीतिक महत्त्व: कैरेबियन क्षेत्र में, अमेरिका के निकट रणनीतिक रूप से स्थित होने के कारण, एक भू-राजनीतिक धुरी के रूप में कार्य करता है; रूस, चीन, तुर्किए और ईरान के साथ गठबंधन, क्षेत्र में अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देते हैं।
  • क्षेत्रीय प्रभाव और स्थिरता: ‘बोलिवेरियन एलायंस फॉर द पीपल्स ऑफ अवर अमेरिका’ (ALBA), ‘यूनियन ऑफ साउथ अमेरिकन नेशंस’ (UNASUR) और ‘कम्युनिटी ऑफ लैटिन अमेरिकन एंड कैरेबियन स्टेट्स’ (CELAC) के माध्यम से लैटिन अमेरिकी राजनीति में सक्रिय घरेलू संकटों के कारण बड़े पैमाने पर पलायन (लगभग 7 मिलियन) होता है, जो पड़ोसी देशों, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित करता है।
  • आर्थिक और मानवीय चुनौतियाँ: अति मुद्रास्फीति, राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय संकट वैश्विक तेल बाजारों, निवेश प्रवाह तथा मानवीय सहायता चैनलों को प्रभावित करते हैं।
  • कूटनीतिक तनाव का केंद्र: वेनेजुएला का राजनीतिक संकट अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता के मानदंडों और बहुपक्षीय कूटनीति के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहा है।
  • वैश्विक प्रभाव: तेल उत्पादन में परिवर्तन, प्रतिबंध या आंतरिक अस्थिरता वैश्विक ऊर्जा कीमतों, मुद्रास्फीति, प्रवासन पैटर्न और भू-राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करते हैं।

अमेरिका ने निकोलस मादुरो को क्यों गिरफ्तार किया?

  • ‘डॉन-रो सिद्धांत’ (Don-roe Doctrine) का क्रियान्वयन: अमेरिकी हस्तक्षेप ने ट्रंप द्वारा नए रूप में प्रस्तुत मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) को क्रियान्वित किया, जिसमें कूटनीति के बजाय प्रत्यक्ष कार्रवाई के माध्यम से पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित किया गया।
  • ‘नारको-स्टेट’ (Narco-State) का औचित्य: अमेरिकी न्याय विभाग ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को एक नार्को-स्टेट का मुखिया बताया और उन्हें ‘ट्रेन डे अरागुआ नेटवर्क’ (Tren de Aragua network) से संबंधित आपराधिक अभियोगों एवं अमेरिका में कोकीन तथा फेंटानिल की तस्करी की कथित साजिशों में संलिप्त होने का हवाला दिया।
    • अमेरिका का तर्क है कि मादुरो के शासनकाल में संगठित मादक पदार्थों की तस्करी राष्ट्र संरचनाओं में समाहित हो गई और अवैध राजस्व से शासन का अस्तित्व बना रहा तथा राष्ट्र की नीतियों पर प्रभाव पड़ा, इस घटना को आमतौर पर नार्को-आतंकवाद के रूप में वर्णित किया जाता है।

  • नार्को-आतंकवाद: यह एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है, जहाँ संगठित मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले नेटवर्क व्यवस्थित रूप से राष्ट्र संस्थाओं को वित्तपोषित करते हैं, उन्हें प्रभावित करते हैं या उनमें हस्तक्षेप कर लेते हैं, जिससे आपराधिक गतिविधि और राजनीतिक सत्ता के बीच की रेखा अस्पष्ट हो जाती है।
  • फेंटानिल: यह एक ‘सिंथेटिक ओपिओइड’ है, जो मॉर्फिन से 50-100 गुना अधिक शक्तिशाली है। इसका कानूनी रूप से दर्द निवारक के रूप में उपयोग किया जाता है, लेकिन इसकी अवैध तस्करी तेजी से बढ़ रही है, जिससे संयुक्त राज्य अमेरिका में गंभीर ओवरडोज का संकट उत्पन्न हो रहा है।
  • अमेरिका में फेंटानिल एक सार्वजनिक चिंता का विषय क्यों है?
    • अमेरिका में फेंटानिल की तस्करी को राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा जा रहा है, न कि केवल एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में, क्योंकि यह बड़े पैमाने पर ओवरडोज से होने वाली मौतों और संगठित अपराध नेटवर्क को वित्तपोषण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

संसाधन अभिशाप सिद्धांत (Resource Curse Theory)

  • संसाधन अभिशाप सिद्धांत यह तर्क देता है कि प्राकृतिक संसाधनों (तेल, गैस और खनिज) से समृद्ध देशों में व्यापक विकास के बजाय प्रायः धीमी आर्थिक वृद्धि, कमजोर संस्थाएँ, तानाशाही, भ्रष्टाचार, संघर्ष, बाहरी हस्तक्षेप, अस्थिरता और शासन परिवर्तन जैसी समस्याएँ देखने को मिलती हैं।
    • ऐतिहासिक उदाहरण: इराक, लीबिया, वेनेजुएला।

  • प्रतिबंधों और कूटनीति की विफलता: वर्षों से चले आ रहे आर्थिक प्रतिबंध, कूटनीतिक अलगाव और विपक्ष के समर्थन के बावजूद मादुरो को सत्ता से हटाना संभव नहीं था, जिसके चलते सत्ता परिवर्तन के लिए जबरन हस्तक्षेप का रास्ता अपनाया गया।
  • ऊर्जा साम्राज्यवाद और तेल नियंत्रण: वेनेजुएला के 300 अरब बैरल से अधिक के तेल भंडार महत्त्वपूर्ण थे। अमेरिका ने खुले तौर पर वेनेजुएला पर अस्थायी रूप से शासन करने, उसके तेल क्षेत्र का पुनर्निर्माण करने और अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों को आपूर्ति सुलभ कराने का इरादा जताया।
    • वेनेजुएला के पास विश्व का सबसे बड़ा कच्चा तेल भंडार है, जो सऊदी अरब से भी अधिक है, जिससे वैश्विक तेल बाजारों और भू-राजनीति के लिए उसके ऊर्जा क्षेत्र पर नियंत्रण रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
  • महाशक्तियों के बीच आपसी प्रतिस्पर्द्धा का मुकाबला: मादुरो को हटाने का उद्देश्य चीन और रूस के रणनीतिक आधार को समाप्त करना था, जिन्होंने कराकास के साथ सैन्य, आर्थिक और तकनीकी संबंध मजबूत कर लिए थे।
  • क्षेत्रीय स्थिरता का दृष्टिकोण: इस कदम को लैटिन अमेरिका में प्रसारित हो रहे सत्ता के पतन, शरणार्थी प्रवाह, संगठित अपराध और अस्थिरता जैसे मुद्दों से निपटने के लिए आवश्यक बताया गया।

मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine)

  • उत्पत्ति और मूल सिद्धांत (1823): राष्ट्रपति जेम्स मुनरो के नाम पर नामित यह सिद्धांत अमेरिका में नए या विस्तारित यूरोपीय उपनिवेशीकरण का विरोध करता था और पश्चिमी गोलार्द्ध को एक अलग राजनीतिक क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करता था।
  • प्रारंभिक रूप से प्रतीकात्मक: शुरुआत में, यह अत्यधिक सीमा तक एक घोषणात्मक नीति थी, जिसकी प्रवर्तन क्षमता सीमित थी और यह अमेरिकी सैन्य शक्ति के बजाय ब्रिटिश नौसेना शक्ति और नैतिक संकेत पर निर्भर थी।
  • गोलार्द्ध प्रभुत्व का विस्तार: समय के साथ, अमेरिका ने इस सिद्धांत की पुनर्व्याख्या करते हुए लैटिन अमेरिका को रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण माना और मध्य एवं दक्षिण अमेरिका पर अनन्य प्रभाव का दावा किया।
  • हस्तक्षेपवाद का संस्थागतकरण: रूजवेल्ट कोरोलरी (1904) और शीतयुद्ध की नीतियों के माध्यम से, इस सिद्धांत ने प्रायः कथित वैचारिक खतरों का मुकाबला करने के लिए प्रत्यक्ष सैन्य और राजनीतिक हस्तक्षेपों को उचित ठहराया।
  • व्यापक ऐतिहासिक उपयोग: वर्ष 1898 और वर्ष 1994 के बीच, प्रायः राष्ट्रीय सुरक्षा और साम्यवाद-विरोधी तर्कों का हवाला देते हुए अमेरिका ने लैटिन अमेरिका में सरकारों को बदलने के लिए कम-से-कम 41 बार हस्तक्षेप किया।
  • शीतयुद्ध के बाद ‘मुनरो सिद्धांत’ का प्रभाव कम होना: हालिया अमेरिकी प्रशासन ने नव-साम्राज्यवाद और क्षेत्रीय अविश्वास से इसके जुड़ाव को स्वीकार करते हुए, मुनरो सिद्धांत पर वार्ता करना कम किया।
  • समकालीन पुनरुद्धार (‘मुनरो सिद्धांत’): ट्रंप के शासनकाल में, इस सिद्धांत को एक दमनकारी रूप में पुनर्स्थापित किया गया है, जिसमें सैन्य कार्रवाई, संसाधनों पर नियंत्रण और प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के बहिष्कार पर जोर दिया गया है, जैसा कि वेनेजुएला में देखा गया है।

‘डॉन-रो सिद्धांत’ की सीमाएँ – घरेलू विरोध

  • MAGA सिद्धांत के साथ विरोधाभास: ट्रंप का ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) स्लोगन ‘फारएवर वार्स’ (Forever Wars) को समाप्त करने और विदेशी मामलों में हस्तक्षेप करने से बचने पर आधारित था।
    • उनका यह बयान कि अमेरिका, सत्ता हस्तांतरण होने तक वेनेजुएला पर राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखेगा, अनिश्चितकालीन हस्तक्षेप का संकेत देता है, जिससे उनके अपने राजनीतिक आधार में अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।
  • उभरता असंतोष: MAGA समर्थक प्रमुख हस्तियों ने सार्वजनिक रूप से इस हस्तक्षेप की आलोचना करते हुए इसे अमेरिकी करदाताओं के पैसे से वित्तपोषित अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक राजनीति की निरंतरता बताया।
  • वैचारिक विभाजन: प्रमुख हस्तियों ने कानूनी तर्क (नशीले पदार्थों से संबंधित आतंकवाद के अभियोग) और ट्रंप के राजनीतिक औचित्य (तेल की पुनर्प्राप्ति और फेंटानिल नियंत्रण) के बीच विसंगतियों को भी उजागर किया, जिससे रणनीतिक असंगति सामने आई।
  • स्थिरता पर प्रभाव: इस प्रकार का घरेलू प्रतिरोध अमेरिकी भागीदारी की अवधि, वित्तपोषण और वैधता को सीमित कर सकता है, जिससे जल्दबाजी या अस्थिर वापसी का जोखिम बढ़ सकता है।

ऐतिहासिक संदर्भ

  • वर्ष 2024 के चुनाव का कारण: वेनेजुएला में वर्ष 2024 के विवादित राष्ट्रपति चुनावों के बाद संकट और बढ़ गया, जिसमें विपक्षी नेताओं ने जीत के सुबूत प्रस्तुत किए।
    • राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के पद छोड़ने से इनकार करने के कारण बारबाडोस समझौता पूरी तरह से विफल हो गया, जिससे वार्ता के माध्यम से लोकतांत्रिक सत्ता हस्तांतरण की सभी संभावनाएँ समाप्त हो गईं।

बारबाडोस समझौता

  • परिचय: यह नॉर्वे की मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय हितधारकों के समर्थन से अक्टूबर 2023 में वेनेजुएला सरकार और विपक्ष के बीच हुए राजनीतिक एवं चुनावी समझौतों के एक समूह को संदर्भित करता है।
  • उद्देश्य: इस समझौते का उद्देश्य स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय राष्ट्रपति चुनाव सुनिश्चित करना था, जिसमें विपक्षी उम्मीदवारों पर लगे प्रतिबंध हटाने, अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों को अनुमति देने और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक परिवर्तन के लिए परिस्थितियाँ बनाने की प्रतिबद्धताएँ शामिल थीं।
  • समझौते का टूटना: हालाँकि, मादुरो सरकार द्वारा विपक्षी नेताओं पर प्रतिबंध और विवादित चुनावी प्रक्रियाओं सहित प्रमुख प्रावधानों को लागू करने में विफल रहने के बाद समझौता टूट गया, जिससे वार्ता के माध्यम से राजनीतिक समाधान की संभावनाएँ समाप्त हो गईं।

  • वर्ष 2025 की सैन्य शक्ति वृद्धि: वर्ष 2025 के मध्य तक, अमेरिका ने कैरेबियाई क्षेत्र में अपनी नौसैनिक उपस्थिति का विस्तार किया और मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले नेटवर्क और अवैध तेल शिपमेंट के खिलाफ पूर्व-निवारक कार्रवाई की।
    • इसका उद्देश्य वेनेजुएला शासन की गुप्त अर्थव्यवस्था को निष्क्रिय करना था और यह प्रतिबंधों पर आधारित दबाव से सैन्य बल प्रयोग की ओर एक परिवर्तन का संकेत था।
  • पीढ़ीगत और वैचारिक प्रतिद्वंद्विता: यह टकराव ह्यूगो चावेज की वर्ष 1999 की बोलिवेरियन क्रांति से शुरू हुआ, जिसने अमेरिका समर्थित उदार लोकतांत्रिक मॉडल को साम्राज्यवाद-विरोधी समाजवादी व्यवस्था से बदल दिया।
    • इस वैचारिक बदलाव के परिणामस्वरूप अमेरिका और वेनेजुएला के बीच दशकों तक प्रतिबंध, राजनयिक अलगाव और रणनीतिक शत्रुता बनी रही।

संयुक्त राज्य अमेरिका-वेनेजुएला संबंध (26 वर्षों का अवलोकन)

  • चावेज युग (1999-2013): ह्यूगो चावेज ने बोलिवेरियन क्रांति शुरू की, तेल क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण किया और अमेरिका-विरोधी वामपंथी विदेश नीति अपनाई, जिसके तहत उन्होंने रूस, चीन और ईरान के साथ संबंध मजबूत किए।
    • तानाशाही के आरोपों, अमेरिका समर्थित गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के निष्कासन और वर्ष 2002 के तख्तापलट के प्रयास के कारण अमेरिका तथा वेनेजुएला के बीच आपसी संबंध बिगड़ गए, जिसके लिए वेनेजुएला ने अमेरिका को दोषी ठहराया।

  • मादुरो का उदय और प्रारंभिक तनाव (2013-2019): निकोलस मादुरो ने आर्थिक गिरावट और भ्रष्टाचार घोटालों के बीच सत्ता सँभाली।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका ने अधिकारियों और प्रमुख क्षेत्रों पर प्रतिबंध लगाए।
    • अत्यधिक मुद्रास्फीति, भोजन और दवाओं की कमी और बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ गया।
    • वर्ष 2018 के विवादित चुनावों ने राजनीतिक संकट को उत्पन्न किया; विपक्षी नेता जुआन गुआइदो को संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगियों से मान्यता प्राप्त हुई।
  • ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान तनाव में वृद्धि (2025)
    • सैन्य तैनाती: संयुक्त राज्य अमेरिका ने कैरेबियन सागर के पास अपनी नौसैनिक क्षमता में वृद्धि की।
    • ‘कार्टेल डे लॉस सोल्स’ का नामकरण: संयुक्त राज्य अमेरिका ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया और मादुरो पर इसका नेतृत्व करने का आरोप लगाया।
    • केंद्रीय खुफिया एजेंसी (CIA) के अभियान और प्रतिबंध: ट्रंप ने CIA के गुप्त अभियानों को अधिकृत किया, तेल प्रतिबंधों को बढ़ाया और फेडरल एविएशन  एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) द्वारा यात्रा संबंधी एडवाइजरी  जारी की।
    • वेनेजुएला की प्रतिक्रिया: मादुरो ने संयुक्त राज्य अमेरिका की कार्रवाइयों की निंदा की और देशव्यापी सैन्य अभ्यास किए, जिससे तनाव और बढ़ गया।

वर्तमान परिस्थितियाँ और प्रमुख संवेदनशील बिंदु (2026)

  • नेतृत्व का गतिरोध: मादुरो को सत्ता से हटाए जाने के बाद, वेनेजुएला के सर्वोच्च न्यायालय ने उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को अंतरिम नेता नियुक्त किया।
  • लोकतांत्रिक आशाएँ बनाम बाहरी नियंत्रण: निर्वासन में रह रही विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो ने नागरिक नेतृत्व वाले लोकतांत्रिक परिवर्तन का आह्वान किया है। इसे बाहरी सैन्य हस्तक्षेप और घरेलू लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के बीच संभावित टकराव के रूप में देखा जा रहा है।
  • उभरता सुरक्षा संकट: सरकार समर्थक मिलिशिया (कोलेक्टिवोस) की सक्रियता और क्यूबा की सुरक्षा एजेंसियों की संभावित संलिप्तता से असममित विद्रोह का डर उत्पन्न होता है, जिससे वेनेजुएला के दीर्घकालिक संघर्ष में फँसने का खतरा है।

वर्ष 2026 के संकट में विभिन्न दृष्टिकोणों की तुलना

मुद्दा संयुक्त राज्य अमेरिका का रुख वेनेजुएला सरकार का रुख
कानूनी आधार मादक पदार्थों से संबंधित आतंकवाद के लिए आपराधिक अभियोगों का प्रवर्तन। सत्ताधारी राष्ट्राध्यक्ष को अवैध रूप से बंधक बनाकर राज्य आतंकवाद फैलाना।
अंतरराष्ट्रीय कानून सुरक्षा की जिम्मेदारी (R2P) का आह्वान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मादक पदार्थों की रोकथाम। संप्रभुता और बल प्रयोग संबंधी संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-2(4) का उल्लंघन।
तेल प्रबंधन बुनियादी ढाँचे को पुनर्जीवित करने के लिए अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों को तैनात करके ‘पुनर्निर्माण’ किया जा रहा है। संप्रभु राष्ट्रीय संपदा की ‘चोरी’ और लूट।

भारतीय परिप्रेक्ष्य

  • संप्रभुता के प्रति सैद्धांतिक प्रतिबद्धता: भारत की प्रतिक्रिया राष्ट्र की संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति उसके दीर्घकालिक समर्थन को दर्शाती है, जो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता और संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित कूटनीति के अनुरूप है।
    • संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-2(7) में निहित गैर-हस्तक्षेप का सिद्धांत संप्रभु राज्यों के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करता है और उत्तर-औपनिवेशिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का एक आधार स्तंभ बना हुआ है।
    • पूर्ववर्ती शासन परिवर्तन और उसके चयनात्मक अनुप्रयोग के जोखिमों को देखते हुए, भारत बाहरी रूप से थोपे गए शासन परिवर्तन के प्रति सतर्क है।
  • संयमित कूटनीतिक संकेत: भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने पूरे घटनाक्रम पर ‘गहरी चिंता’ व्यक्त की और सभी पक्षों से संप्रभुता तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करने का आग्रह किया।
    • यह संतुलित वक्तव्य भारत-अमेरिका रणनीतिक समन्वय और चल रही द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं को बनाए रखने की आवश्यकता को भी दर्शाता है।
  • ऊर्जा एवं आर्थिक हित: वेनेजुएला भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण बना हुआ है।
    • ऐतिहासिक रूप से, भारत प्रतिवर्ष 6-7 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का वेनेजुएला का कच्चा तेल आयात करता था, हालाँकि अमेरिकी प्रतिबंधों ने आयात को कम कर दिया था, जिसके कारण रूस, खाड़ी देशों, संयुक्त राज्य अमेरिका, सऊदी अरब और इराक की ओर विविधीकरण को बढ़ावा मिला।
    • ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) का वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में, जिनमें सैन क्रिस्टोबल परियोजनाएँ भी शामिल हैं, पर्याप्त निवेश है, जो सत्ता परिवर्तन या लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की स्थिति में जोखिम में पड़ सकता है।
    • दक्षिण अमेरिकी भू-राजनीतिक तनाव में लगातार वृद्धि से ब्रेंट क्रूड की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिससे भारत के तेल आयात बिल पर असर पड़ेगा; हालाँकि, जब तक कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास बनी रहती हैं, आयात के विविध स्रोतों के कारण राजकोषीय प्रभाव को नियंत्रित किया जा सकता है।
    • अमेरिकी हस्तक्षेप एक ऐतिहासिक भू-राजनीतिक बदलाव भी दर्शाता है, जिससे लैटिन अमेरिका में अमेरिका का रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र बढ़ रहा है और तेल अवसंरचना की सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला में संभावित व्यवधान तथा वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
  • ‘ग्लोबल साउथ’ का नेतृत्व: ‘ग्लोबल साउथ’ के एक प्रमुख देश के रूप में, भारत इस बात को प्रमुखता से उठाता है कि एकतरफा हस्तक्षेप किस प्रकार दक्षिण-दक्षिण एकजुटता और जबरन सत्ता परिवर्तन के विरुद्ध मानदंडों को प्रभावित करते हैं, विशेषकर संसाधन संपन्न विकासशील देशों में।
  • बहुपक्षीय मध्यस्थता की भूमिका: भारत ब्रिक्स या संयुक्त राष्ट्र के मंचों के माध्यम से नागरिक नेतृत्व वाले, समावेशी राजनीतिक परिवर्तन की वकालत करता है।
  • वाणिज्य दूतावास और मानवीय प्राथमिकताएँ: भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और मानवीय सहायता तक पहुँच को सुगम बनाना हमारी तात्कालिक परिचालन संबंधी चिंताएँ हैं।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ

क्षेत्र/हितधारक प्रतिक्रिया
लैटिन अमेरिका मिश्रित प्रतिक्रियाएँ: कोलंबिया, ब्राजील और पनामा ने सावधानीपूर्वक अमेरिकी प्रभाव को स्वीकार किया; क्यूबा, ​​निकारागुआ, बोलीविया और मैक्सिको ने इस हस्तक्षेप की निंदा करते हुए इसे अवैध हस्तक्षेप बताया।
रूस और चीन दोनों देशों ने इस कार्यवाही को अमेरिकी साम्राज्यवाद करार दिया गया और पश्चिमी गोलार्द्ध में आगे सैन्य अतिक्रमण के खिलाफ चेतावनी दी गई; वेनेजुएला को समर्थन देने का वादा किया गया।
यूरोपीय संघ संयम, संवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन का आह्वान किया गया; ऊर्जा और रणनीतिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका की स्पष्ट निंदा नहीं की।
संयुक्त राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने संप्रभुता के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त की; सुरक्षा परिषद में संभावित बहस की उम्मीद है, जिसमें अमेरिका द्वारा वीटो शक्ति का प्रयोग किए जाने की संभावना है।
ग्लोबल साउथ मुख्य रूप से इसकी आलोचना की गई और इसे गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों के लिए खतरा उत्पन्न करने वाले जबरदस्ती हस्तक्षेप का एक उदाहरण बताया गया।

मादुरो पर अमेरिकी नियंत्रण का वैश्विक प्रभाव

  • हस्तक्षेप के मानदंडों में परिवर्तन: यह अभियान किसी राष्ट्राध्यक्ष के खिलाफ सीधे सैन्य हस्तक्षेप की ओर पारंपरिक राजनयिक और आर्थिक दबाव से एक महत्त्वपूर्ण विचलन को दर्शाता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संप्रभुता मानदंडों के हनन की चिंताएँ बढ़ रही हैं।
  • ऊर्जा बाजार में अस्थिरता: वेनेजुएला के पास विश्व का सबसे बड़ा तेल भंडार (300 अरब बैरल से अधिक) है। इन भंडारों पर अमेरिकी नियंत्रण और नियोजित दोहन वैश्विक तेल कीमतों को नया आकार दे सकता है, ओपेक की गतिशीलता को प्रभावित कर सकता है और विकासशील देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर असर डाल सकता है।
  • महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता में तीव्रता: इस नियंत्रण से लैटिन अमेरिका में रूस और चीन का प्रभाव बाधित होता है, जहाँ दोनों देशों ने आर्थिक, सैन्य और तकनीकी रूप से मजबूत पकड़ बना रखी थी। इससे क्षेत्र में जवाबी कार्रवाई या रणनीतिक सक्रियता में वृद्धि हो सकती है।
  • ‘ग्लोबल साउथ’ और बहुपक्षवाद: ग्लोबल साउथ के कई देश इस हस्तक्षेप को संप्रभुता का उल्लंघन मानते हैं, जिससे संयुक्त राष्ट्र आधारित संघर्ष समाधान तंत्र कमजोर हो सकते हैं और शक्तिशाली देशों द्वारा एकतरफा दृष्टिकोण को बढ़ावा मिल सकता है।
  • सुरक्षा और प्रवासन के परिणाम: राजनीतिक अस्थिरता शरणार्थियों के प्रवाह, मानव तस्करी और मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ा सकती है, जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा संरचनाओं पर प्रभाव पड़ सकता है।
  • ताइवान और रणनीतिक संकेत
    • हस्तक्षेप के मानदंडों में बदलाव: वेनेजुएला में अमेरिकी अभियान एकतरफा कार्रवाई करने की तत्परता को दर्शाता है, जो इस बात का संकेत है कि पारंपरिक प्रतिरोध और राजनयिक दबाव को प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से दरकिनार किया जा सकता है।
    • प्रतिरोध बनाम प्रोत्साहन: विश्लेषकों का मानना है कि चीन, ताइवान के खिलाफ कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए वेनेजुएला के उदाहरण का हवाला दे सकता है।
    • महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता का तीव्र होना: यह अभियान हिंद-प्रशांत जैसे रणनीतिक क्षेत्रों सहित वैश्विक स्तर पर चीनी प्रभाव का मुकाबला करने के अमेरिकी संकल्प को रेखांकित करता है, जिससे ताइवान पर अमेरिकी प्रभाव और भी मजबूत हो जाता है।
    • चीनी महत्त्वाकांक्षाओं पर प्रभाव: चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और विदेशी प्रभाव के विस्तार की सीमाएँ तय हो रही हैं, जो इस बात का संकेत है कि अमेरिकी कार्रवाई चीन की रणनीतिक गणनाओं को बाधित कर सकती है।

वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप से उत्पन्न चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून: किसी विदेशी सेना द्वारा सत्ताधारी राष्ट्राध्यक्ष को बंदी बनाना अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में असामान्य वृद्धि का प्रतीक है, जिससे कानून प्रवर्तन, सत्ता परिवर्तन और सशस्त्र हस्तक्षेप के बीच की सीमाएँ अस्पष्ट हो जाती हैं।
    • संप्रभुता का उल्लंघन: सत्ताधारी राष्ट्राध्यक्ष को बंदी बनाना, संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-2(4) को कमजोर करते हुए, सीमा से बाहर सैन्य हस्तक्षेपों के लिए एक उदाहरण कायम करता है।
    • अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का क्षरण: इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि शक्तिशाली देश कूटनीति या सुरक्षा परिषद की मंजूरी को दरकिनार कर सकते हैं, जिससे बहुपक्षीय संघर्ष-समाधान तंत्र कमजोर हो जाते हैं।
  • क्षेत्रीय स्थिरता के जोखिम: राज्य नियंत्रण में व्यवधान से मादक पदार्थों की तस्करी और संगठित अपराध बढ़ सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
    • असममित संघर्ष: सरकार समर्थक मिलिशिया (कोलेक्टिवोस) का गठजोड़ और क्यूबा की संभावित संलिप्तता से दीर्घकालिक विद्रोह का खतरा बढ़ जाता है।
    • शरणार्थी प्रवाह: राजनीतिक अस्थिरता पड़ोसी देशों में बड़े पैमाने पर पलायन को बढ़ावा दे सकती है, जिससे संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है और मानवीय संकट उत्पन्न हो सकता है।
  • ऊर्जा एवं आर्थिक चिंताएँ: वेनेजुएला के 300 अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल पर अमेरिकी नियंत्रण से कीमतों में विकृति आ सकती है और ओपेक की कार्य प्रणाली प्रभावित हो सकती है।
    • विकासशील देशों के लिए पहुँच: भारत और चीन जैसे देशों को वेनेजुएला के तेल तक सीमित पहुँच का सामना करना पड़ सकता है, जिससे ऊर्जा विविधीकरण रणनीतियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
  • क्षेत्रीय स्थिरता के जोखिम: राज्य नियंत्रण में व्यवधान से मादक पदार्थों की तस्करी और संगठित अपराध बढ़ सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
    • असममित संघर्ष: सरकार समर्थक मिलिशिया (कोलेक्टिवोस) का गठजोड़ और क्यूबा की संभावित संलिप्तता से दीर्घकालिक विद्रोह का खतरा बढ़ जाता है।
    • शरणार्थी प्रवाह: राजनीतिक अस्थिरता पड़ोसी देशों में बड़े पैमाने पर पलायन को बढ़ावा दे सकती है, जिससे संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है और मानवीय संकट उत्पन्न हो सकता है।
  • ऊर्जा और आर्थिक चिंताएँ: वेनेजुएला के 300 अरब बैरल से अधिक कच्चे तेल पर अमेरिकी नियंत्रण से कीमतों में विकृति आ सकती है और ओपेक की कार्य प्रणाली प्रभावित हो सकती है।
    • विकासशील देशों के लिए पहुँच: भारत और चीन जैसे देशों को वेनेजुएला के तेल तक सीमित पहुँच का सामना करना पड़ सकता है, जिससे ऊर्जा विविधीकरण रणनीतियाँ प्रभावित हो सकती हैं।

आगे की राह 

  • बहुपक्षीय निगरानी की ओर संक्रमण: अमेरिका को वेनेजुएला पर प्रत्यक्ष नियंत्रण छोड़ने के बजाय यूनाइटेड नेशंस-आर्गेनाइजेशन ऑफ अमेरिकन स्टेट्स (UN-OAS) द्वारा निगरानी किए जाने वाले ढाँचे को अपनाना होगा, जिससे समावेशी चुनाव सुनिश्चित हो सकें और राजनीतिक प्रक्रिया को वैधता मिल सके।
  • संस्थागत पुनर्निर्माण: औपनिवेशिक शैली के नियंत्रण को रोकने के लिए नेशनल असेंबली के अधिकार की बहाली अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • कानून के शासन और सतत् शासन को सुनिश्चित करने के लिए घरेलू संस्थाओं को मजबूत करना आवश्यक है।
  • समावेशी संवाद और सुलह: यदि ‘चाविस्टा’ समर्थकों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाता है तो स्थिरता प्राप्त नहीं की जा सकती है।
    • चाविस्टा से तात्पर्य चाविस्मो के समर्थक से है, जो वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज से जुड़ी राजनीतिक विचारधारा है।
    • सामाजिक विभाजन को दूर करने, विद्रोह को रोकने और पूर्व शासन के समर्थकों को एक शांतिपूर्ण राजनीतिक ढाँचे में एकीकृत करने के लिए दक्षिण अफ्रीका की शैली का सत्य और सुलह दृष्टिकोण आवश्यक हो सकता है।
  • सुरक्षा एवं मानवीय उपाय: तत्काल उपायों में नागरिकों, शरणार्थियों और विदेशी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, सशस्त्र मिलिशिया (कोलेक्टिवोस) को निरस्त्र करना और उन्हें एकीकृत करना शामिल होना चाहिए।
    • राजनीतीकरण से बचने के लिए मानवीय सहायता बहुपक्षीय चैनलों के माध्यम से दी जानी चाहिए।
  • ऊर्जा एवं आर्थिक स्थिरीकरण: वेनेजुएला के तेल क्षेत्र का प्रबंधन पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए और वैश्विक बाजारों तक समान पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि किसी एक शक्ति का एकाधिकार न हो सके।
    • आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना राजनीतिक परिवर्तन और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

निष्कर्ष

वर्ष 2026 में निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी, एकतरफा हस्तक्षेप का एक चुनौतीपूर्ण उदाहरण कायम करती है। भारत के लिए संप्रभुता, संवाद और बहुपक्षवाद रणनीतिक अनिवार्यताएँ हैं, हालाँकि समावेशी परिवर्तन तथा नागरिक सुरक्षा वेनेजुएला की वैधता एवं स्थिरता को पुनर्स्थापित करने की कुंजी हैं।

अभ्यास प्रश्न  हाल ही में वेनेजुएला में हुए अमेरिकी हस्तक्षेप के संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय निष्क्रियता से एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था को सामान्य बनाने का जोखिम है, जहाँ संप्रभुता अंतरराष्ट्रीय कानून के बजाय अमेरिका के रणनीतिक हितों के अधीन हो जाती है। इस संदर्भ में, ऐसे एकतरफा हस्तक्षेपों के निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए आगे की राह सुझाइए। 

विश्व ब्रेल दिवस

नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड (NFB) ने नई दिल्ली में विश्व ब्रेल दिवस मनाया और दृष्टिबाधित लोगों के लिए समानता तथा सम्मान को बढ़ावा देने के लिए “मोर ब्रेल, मोर एम्पावरमेंट” अभियान की शुरुआत की।

विश्व ब्रेल दिवस

  • परिचय: विश्व ब्रेल दिवस प्रतिवर्ष 4 जनवरी को मनाया जाता है ताकि दृष्टिबाधित और आंशिक रूप से दृष्टिबाधित व्यक्तियों की गरिमा, समानता तथा पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करने में ब्रेल के महत्त्व के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके।
  • उत्पत्ति: यह दिवस संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2018 में लुई ब्रेल (1809) की जयंती के उपलक्ष्य में स्थापित किया गया था, जो एक फ्राँसीसी शिक्षाविद थे, जिन्होंने वर्ष 1824 में ब्रेल प्रणाली का आविष्कार किया था।
  • वर्ष 2025 की थीम: “प्रोमोटिंग डिसएबिलिटी-इन्क्लूसिव सोसायटीज फॉर एडवांसिंग सोशल प्रोग्रेस।”

ब्रेल क्या है?

  • ब्रेल एक स्पर्श-आधारित पठन और लेखन प्रणाली है, जिसमें अक्षरों, संख्याओं और प्रतीकों को दर्शाने के लिए छह उभरे हुए बिंदुओं का उपयोग होता है।
  • यह पाठ्यपुस्तकों को पढ़ने से लेकर सार्वजनिक स्थानों पर आवागमन तक, दैनिक गतिविधियों में आत्मनिर्भरता प्रदान करती है।
  • यह शिक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्याय तक पहुँच और सामाजिक समावेशन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • इसे ‘संयुक्त राष्ट्र दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर अभिसमय’ (UNCRPD) के अनुच्छेद-2 के तहत मान्यता प्राप्त है।
  • यह दिव्यांग व्यक्तियों द्वारा सामना किए जाने वाले प्रणालीगत बहिष्कार को संबोधित करती है, जो गरीबी, हिंसा और हाशिए पर रहने के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड (NFB) के बारे में

  • NFB भारत का सबसे बड़ा स्वयं सहायता, गैर-लाभकारी संगठन है, जो दृष्टिबाधित व्यक्तियों की समानता, गरिमा और पूर्ण सामाजिक एकीकरण के लिए कार्य करता है।
  • स्थापना: NFB की स्थापना वर्ष 1970 में “दृष्टिबाधितों को दृष्टिबाधितों का नेतृत्व करने दो” के सिद्धांत पर आधारित एक स्वैच्छिक संगठन के रूप में हुई थी।
  • मुख्यालय: नई दिल्ली।
  • उद्देश्य: यह शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में समान अवसरों का समर्थन करता है।
  • भूमिका: यह भेदभाव के विरुद्ध कार्य करता है, कौशल विकास और पुनर्वास में सहयोग करता है, रोजगार दिलाने में सहायता करता है और दृष्टिबाधित लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकारी एजेंसियों के साथ सहयोग करता है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व (1026-2026)

हाल ही में, प्रधानमंत्री ने सोमनाथ पर पहले हमले (1026 ईसवी ) की 1000वीं वर्षगाँठ को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के रूप में मनाया।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के बारे में

  • सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण की सहस्राब्दी के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जो भारत की अटूट आस्था, सांस्कृतिक लचीलेपन और सभ्यतागत गौरव का उत्सव है।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: सोमनाथ भारत की उस अटूट भावना का प्रतीक है, जहाँ बार-बार हुए विनाश भी धार्मिक आस्था को मिटा नहीं सके।
    • यह साझा विरासत में निहित प्रतिरोध, सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रतिनिधित्व करता है।

सोमनाथ मंदिर के बारे में

  • सोमनाथ मंदिर हिंदू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है और गुजरात के पश्चिमी तट पर वेरावल के पास प्रभास पाटन में स्थित एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।
  • देवता: भगवान शिव।
    • यहाँ 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग स्थापित है, जिसे शिव का स्वयंभू रूप माना जाता है।
  • पवित्र भौगोलिक स्थिति: कपिल, हिरन और सरस्वती नदियों का त्रिवेणी संगम इसकी प्राचीन आध्यात्मिक महत्ता को और भी बढ़ाता है।
  • उत्पत्ति: सोमनाथ का पहला मंदिर 2000 वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया था।
  • आक्रमण और विनाश: सोमनाथ को महमूद गजनी (1026 ईसवी) से लेकर दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों और औरंगजेब (1706) तक कई बार विनाश का सामना करना पड़ा, जिससे यह मंदिर का प्रतीक बन गया है।
    • उससे पहले, सिंध के अरब गवर्नर अल-जुनेद इब्न अब्द अल-रहमान अल-मुर्री ने लगभग 725 ईसवी में गुजरात में स्थित दूसरे सोमनाथ मंदिर पर हमला कर उसे नष्ट कर दिया था।
  • पुनर्निर्माण: 649 ईसवी में, वल्लभिणी के राजा मैत्रे ने मंदिर के स्थान पर दूसरा मंदिर बनवाया और उसका जीर्णोद्धार किया।
    • 815 ईसवी में, प्रतिष्ठित राजा नाग भट्ट द्वितीय ने लाल पत्थर (बलुआ पत्थर) का उपयोग करके मंदिर का तीसरा निर्माण करवाया।
    • 1026-1042 के दौरान सोलंकी राजा भीमदेव ने भोज और अन्हिलवाड़ पाटन, मालवा के परमार राजा के शासनकाल में चौथा मंदिर बनवाया।
    • वर्ष 1782 में, मराठा रानी अहल्याबाई होल्कर ने उस स्थान पर एक छोटा मंदिर बनवाया।
    • भारत की स्वतंत्रता के बाद, उन खंडहरों को ध्वस्त कर दिया गया और वर्तमान सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण वर्ष 1951 में हिंदू मंदिर वास्तुकला की मारू-गुर्जर शैली में किया गया।
      • मारू-गुर्जर शैली में घुमावदार शिखर, अलंकृत मंडप, ऊँचे चबूतरे और जटिल नक्काशी होती है।

डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना

जनवरी 2026 में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम के तहत भारत के फैबलेस सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने में डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना’ की भूमिका पर प्रकाश डाला।

डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना

  • डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना, भारत में स्वदेशी सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की एक प्रमुख पहल है।
  • उद्देश्य: चिप डिजाइन, तैनाती और व्यवसायीकरण में स्टार्टअप, MSMEs और घरेलू कंपनियों को सहायता प्रदान करके एक आत्मनिर्भर, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी फैबलेस सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण करना।
  • मुख्य विशेषताएं
    • इसमें सेमीकंडक्टर डिजाइन के संपूर्ण जीवनचक्र में एकीकृत सर्किट (IC), चिपसेट, सिस्टम-ऑन-चिप (SoC), संपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और बौद्धिक संपदा (IP) कोर शामिल हैं।
    • इसमें उत्पाद डिजाइन से संबंधित प्रोत्साहन प्रदान किए जाते हैं, जिसके तहत पात्र व्यय के 50% तक की प्रतिपूर्ति की जाती है, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति आवेदन ₹15 करोड़ है।
    • इसमें परिनियोजन से जुड़े प्रोत्साहन भी दिए जाते हैं, जो शुद्ध बिक्री कारोबार के 4-6% तक होते हैं और इनकी अधिकतम सीमा प्रति आवेदन ₹30 करोड़ है।
  • पात्रता मापदंड
    • स्टार्टअप (DPIIT मानदंडों के अनुसार)।
    • MSMEs (MSME अधिसूचना, 2020 के अनुसार)।
    • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मानदंडों के अंतर्गत भारतीय निवासियों के स्वामित्व वाली घरेलू कंपनियाँ।
  • संस्थागत समर्थन
    • सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम और इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के तहत कार्यान्वित।
    • सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) नोडल कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करता है।
    • चिपआईएन सेंटर इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) कोर, मल्टी-प्रोजेक्ट वेफर (MPW) प्रोटोटाइपिंग और पोस्ट-सिलिकॉन वैलिडेशन और टेस्टिंग सपोर्ट प्रदान करता है।

महत्त्व

DLI भारत के सेमीकंडक्टर डिजाइन और बौद्धिक संपदा के स्वामित्व को मजबूत करता है, आयात पर निर्भरता को कम करता है, कुशल मानव संसाधन का निर्माण करता है और भारत को एक विश्वसनीय वैश्विक चिप डिजाइन केंद्र के रूप में स्थापित करता है।

समुद्र प्रताप

हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गोवा में भारतीय तटरक्षक बल के पहले स्वदेशी प्रदूषण नियंत्रण पोत, ‘समुद्र प्रताप’ को शामिल किया।

समुद्र प्रताप के बारे में

  • समुद्र प्रताप एक विशेष प्रदूषण नियंत्रण पोत (PCV) है, जिसे भारतीय तटरक्षक बल के लिए गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) द्वारा निर्मित किया गया है, जो स्वदेशी समुद्री क्षमता में एक बड़ा कदम है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • यह पोत 114.5 मीटर लंबा, 16.5 मीटर चौड़ा है, जिसका विस्थापन लगभग 4,170 टन है और इसमें 14 अधिकारी और 115 नाविक कार्यरत हैं।
    • यहफ्लश-टाइप साइड-स्वीपिंग आर्म्स’, तेल रिसाव का पता लगाने के लिए उन्नत रडार सिस्टम और रिसाव हुए तेल को पुनः प्राप्त करने, उपचारित करने और संगृहीत करने की सुविधाओं से सुसज्जित है।
    • इसमें डायनामिक पोजिशनिंग सिस्टम, रिट्रैक्टेबल स्टर्न थ्रस्टर, प्रदूषण प्रतिक्रिया नौकाएँ और बाह्य अग्निशमन प्रणालियाँ, साथ ही समुद्री सुरक्षा के लिए आधुनिक हथियार मौजूद हैं।
    • स्वदेशी सामग्री: यह पोत 60% से अधिक स्वदेशी सामग्री द्वारा निर्मित है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहलों के अनुरूप है।
  • महत्त्व
    • यह परियोजना भारत के तटीय क्षेत्रों, EEZ और खुले समुद्रों में तेल रिसाव से निपटने तथा प्रदूषण नियंत्रण करने की भारतीय तटरक्षक बल की क्षमता को बढ़ाती है।
    • यह खोज एवं बचाव और समुद्री कानून प्रवर्तन में भूमिका निभाने के साथ-साथ समुद्री पर्यावरण संरक्षण कानूनों के प्रवर्तन को भी मजबूत करती है।
    • यह पर्यावरण सुरक्षा और तटीय लचीलेपन के लिए विशेष जहाज निर्माण में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता को दर्शाती है।

बैटरी पैक आधार नंबर (BPAN)

हाल ही में इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के लिए आधार जैसी पहचान प्रणाली-BPAN, का प्रस्ताव रखा गया था, ताकि पता लगाने की क्षमता और कुशल पुनर्चक्रण सुनिश्चित किया जा सके।

बैटरी पैक आधार नंबर (BPAN) के बारे में

  • BPAN बैटरी पैक, विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के लिए प्रस्तावित 21-अक्षरों का एक विशिष्ट पहचान नंबर है, जिससे संपूर्ण जीवनचक्र ट्रैकिंग संभव हो सकेगी।
  • प्रस्तावितकर्ता: सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा बैटरी पैक आधार प्रणाली के कार्यान्वयन हेतु दिशा-निर्देशों का मसौदा तैयार किया गया है।
    • इसे ऑटोमोटिव उद्योग मानक समिति (AISC) के अंतर्गत ऑटोमोटिव उद्योग मानक (AIS) के माध्यम से संस्थागत रूप दिया जाएगा।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • अनिवार्य विशिष्ट पहचान: प्रत्येक बैटरी निर्माता या आयातक को आंतरिक रूप से बेची या उपयोग की जाने वाली बैटरियों के लिए एक BPAN (बैटरी प्रोटेक्शन नंबर) आवंटित करना होगा, जिस पर स्पष्ट और सतत् चिह्न अंकित हो।
    • जीवनचक्र डेटा संग्रहण: BPAN कच्चे माल की सोर्सिंग और निर्माण से लेकर उपयोग, पुनर्चक्रण, पुन: उपयोग और अंतिम निपटान तक की जानकारी रिकॉर्ड करता है।
    • डिजिटल एकीकरण: बैटरी का विवरण एक आधिकारिक BPAN पोर्टल पर अपलोड और गतिशील रूप से अपडेट किया जाना चाहिए; महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों के लिए एक नया BPAN जारी करना आवश्यक है।
  • महत्त्व
    • कुशल पुनर्चक्रण और पुनर्उपयोग: लीथियम-आयन बैटरियों के व्यवस्थित पुनर्चक्रण, पुन: उपयोग और सुरक्षित निपटान को सक्षम बनाता है।
    • पर्यावरण संरक्षण: बैटरी के अनुचित निपटान से होने वाले जोखिमों को कम करता है और सतत् बैटरी प्रबंधन को बढ़ावा देता है।
    • नियामक अनुपालन: विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के प्रवर्तन को मजबूत करता है और भारत के इलेक्ट्रिक वाहन पारिस्थितिकी तंत्र में पारदर्शिता तथा जवाबदेही को बढ़ाता है।

भारत की लीथियम-आयन बैटरी की 80-90% मांग को पूरा करने वाली इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों को प्रस्तावित ढाँचे के तहत प्राथमिकता दी जाएगी।

माइक्रोलेंसिंग (Microlensing)

माइक्रोलेंसिंग प्रेक्षणों से पता चला है कि शनि के द्रव्यमान के बराबर एक स्वतंत्र रूप से तैरता हुआ ग्रह, आकाशगंगा के केंद्र से लगभग 9,800 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है।

माइक्रोलेंसिंग क्या है?

  • माइक्रोलेंसिंग एक गुरुत्वाकर्षण घटना है, जिसमें सामने स्थित कोई वस्तु, दूर स्थित तारे के प्रकाश को तब विकृत कर देती है, और बढ़ा देती है, जब वह प्रेक्षक की दृष्टि रेखा के पार से गुजरती है।
  • वैज्ञानिक आधार: यह गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग से उत्पन्न होती है, जिसकी भविष्यवाणी आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत द्वारा की गई थी।
    • बीच में मौजूद वस्तु एक प्राकृतिक लेंस की तरह कार्य करती है, जिससे तारे की चमक अस्थायी रूप से बढ़ जाती है।
  • मुख्य विशेषताएँ 
    • सामने वाली वस्तु का प्रकाश उत्सर्जित करना आवश्यक नहीं है, जिससे धुँधली या अस्पष्ट वस्तुओं का पता लगाना संभव हो जाता है।
    • घटनाएँ क्षणिक और अप्रत्याशित होती हैं, जो दिनों से लेकर महीनों या वर्षों तक संचालित हो सकती हैं।
    • चमक में अचानक और तीव्र परिवर्तन से लेंस का द्रव्यमान तथा उसकी दूरी का आकलन किया जा सकता है।
  • अनुप्रयोग
    • यह तकनीक ग्रहों, व्हाइट ड्वार्फ, न्यूट्रॉन तारों और पृथक ब्लैकहोल का पता लगाने में सक्षम बनाती है।
    • यह विशेष रूप से अपने मेजबान तारों से दूर स्थित बृहस्पति जैसे और पृथ्वी के द्रव्यमान वाले बाह्य ग्रहों को खोजने में उपयोगी है।
    • यह अन्य बाह्य ग्रह खोज विधियों का पूरक है, जो निकटवर्ती या बहुत बड़े ग्रहों पर केंद्रित होती हैं।

इस प्रकार माइक्रोलेंसिंग ब्रह्मांड में अन्यथा अदृश्य रहने वाली वस्तुओं के अवलोकन का एक प्रभावी माध्यम प्रदान करता है।

संदर्भ

एशिया की उभरती अर्थव्यवस्थाएँ, जिनमें भारत, चीन और आसियान देश शामिल हैं, बार-बार और अधिक तीव्र प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे का सामना कर रही हैं।

एशिया में प्राकृतिक आपदाएँ

  • अत्यधिक जोखिम वाला क्षेत्र: पिछले कुछ दशकों में, एशिया विश्व स्तर पर सर्वाधिक आपदाग्रस्त क्षेत्र रहा है।
  • वार्षिक आवृत्ति और प्रभाव: हाल के आँकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष 100 से अधिक जलवायु संबंधी आपदाएँ आती हैं, जिनसे करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं।
  • मानवीय प्रभाव: पिछले दशक में बढ़ते जोखिम स्पष्ट हुए हैं, कुछ अनुमानों के अनुसार, आपदाओं से प्रतिवर्ष लगभग 8 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं।

प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार:

क्षेत्र के लिए समग्र खतरा चार प्रमुख श्रेणियों के खतरों का मिश्रण है:

  1. जलविज्ञानीय: बाढ़, भूस्खलन।
  2. मौसम विज्ञान संबंधी: तूफान, अत्यधिक तापमान।
  3. जलवायु विज्ञान संबंधी: सूखा, वनाग्नि।
  4. भू-भौतिकीय: भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट।

जोखिमों में भौगोलिक भिन्नता

  • प्राकृतिक आपदाओं के प्रकार देश और भौगोलिक स्थिति के अनुसार काफी भिन्न होते हैं।
  • भारत: मुख्य रूप से जल संबंधी घटनाओं से प्रेरित बाढ़ (तूफान से संबंधित नहीं) और भूस्खलन के प्रति संवेदनशील है।
  • फिलीपींस और वियतनाम: प्रायः उष्णकटिबंधीय चक्रवातों (टाइफून) और तूफानों की चपेट में आते हैं।
  • चीन और इंडोनेशिया: बाढ़ और तूफानों के साथ-साथ भूकंप तथा ज्वालामुखी विस्फोट सहित उच्च भूकंपीय जोखिमों का सामना करते हैं।

आपदाओं के कारण भारत की अर्थव्यवस्था को हुआ नुकसान

  • ऐतिहासिक आधारभूत आँकड़े: वर्ष 1990-2024 की अवधि के आँकड़ों से पता चलता है कि भारत को आपदाओं से संबंधित औसतन वार्षिक नुकसान उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 0.4% के बराबर हुआ है।
  • उच्च प्रभाव वाले वर्ष: विशेष रूप से खराब वर्षों में, जैसे कि देशव्यापी बाढ़ या चक्रवातों के दौरान, आर्थिक प्रभाव कहीं अधिक हो सकता है।
    • कुछ विश्लेषणों के अनुसार, विशिष्ट उच्च क्षति अवधियों में हानि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2% तक पहुँच सकती है।
  • क्षेत्रीय प्रभाव: भारत की संवेदनशीलता मुख्य रूप से जल संबंधी है (तूफान से संबंधित बाढ़ और भूस्खलन के अलावा अन्य आपदाओं से), जिसका कृषि, आवास और बुनियादी ढाँचे पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।

विश्व जोखिम सूचकांक

  • विश्व जोखिम सूचकांक एक वार्षिक मूल्यांकन उपकरण है, जो विश्व भर के देशों के लिए चरम प्राकृतिक घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से उत्पन्न आपदा जोखिम की गणना करता है।
  • यह विश्व जोखिम रिपोर्ट का हिस्सा है, जिसे बुंड्निस एंटविक्लुंग हिल्फ्ट द्वारा शांति एवं सशस्त्र संघर्ष के अंतरराष्ट्रीय कानून संस्थान (IFHV) के सहयोग से प्रकाशित किया जाता है।
  • गणना पद्धति: जोखिम = जोखिम का दायरा × जोखिम की संभावना।
    • जोखिम: भूकंप, सुनामी, चक्रवात, बाढ़, सूखा और समुद्र स्तर में वृद्धि जैसी आपदाओं से प्रभावित आबादी।
    • कमजोरी: संभाव्यता (गरीबी, असमानता जैसे संरचनात्मक कारक), सामना करने की क्षमता का अभाव (जैसे- चिकित्सा देखभाल, आपदा की तैयारी) और अनुकूलन क्षमता का अभाव (दीर्घकालिक समायोजन, जैसे- शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण)।
  • विश्व जोखिम रिपोर्ट 2025 बाढ़ को एक प्रमुख आपदा के रूप में दर्शाती है।
  • शीर्ष क्रम वाले देश (2025)
    • फिलीपींस में सर्वाधिक जोखिम बना हुआ है।
    • भारत अब दूसरे स्थान पर है।
    • इंडोनेशिया तीसरे स्थान पर है।

संदर्भ

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन मंत्री ने तेलंगाना के हैदराबाद में भारत के पहले वाणिज्यिक स्तर के उष्णकटिबंधीय ‘री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम’ (RAS) पर आधारित ‘रेनबो ट्राउट मत्स्यपालन फार्म और अनुसंधान संस्थान’ का उद्घाटन किया।

‘री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम’ (RAS) के बारे में

  • ‘री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम’ (RAS) एक भू-आधारित, मत्स्यपालन प्रणाली है, जिसमें संवर्द्धन टैंकों से जल का निरंतर उपचार और पुन: उपयोग किया जाता है, जिससे ताजे जल के न्यूनतम उपयोग तथा नियंत्रित पर्यावरणीय परिस्थितियों के साथ गहन मत्स्यपालन संभव हो पाता है।

  • RAS प्रवाह-प्रवेश प्रणालियों से भिन्न है, जहाँ जल का एक बार उपयोग करके उसे छोड़ दिया जाता है। RAS में, जल का कई बार उपचार और पुन: उपयोग किया जाता है।
  • पाली जाने वाली प्रजातियाँ
    • खाद्य मछली: तिलापिया, कैटफिश, सैल्मन, ट्राउट, बर्रामुंडी।
    • अन्य: झींगा, प्रॉन्स, सजावटी मछली।

मुख्य घटक

  • कल्चर टैंक:  जहाँ मछलियों/झींगों का पालन-पोषण किया जाता है।
  • मैकेनिकल फिल्टर: ठोस अपशिष्ट (बचा हुआ चारा, मल) को हटाता है।
  • बायोफिल्टर: नाइट्रिफाइंग बैक्टीरिया को बनाए रखता है, जो विषाक्त अमोनिया को नाइट्राइट और पुनः नाइट्रेट में परिवर्तित करते हैं।
  • ऑक्सीजनेशन/एरेशन यूनिट: घुलित ऑक्सीजन के स्तर को बनाए रखता है।
  • कीटाणुशोधन यूनिट: रोगजनकों को नियंत्रित करने के लिए UV या ओजोन का उपयोग करता है।
  • पंप और पाइप: सिस्टम में जल का संचार करते हैं।
  • तापमान और pH नियंत्रण: प्रजाति-विशिष्ट परिस्थितियाँ सुनिश्चित करता है।

पुनर्चक्रण मत्स्यपालन प्रणालियों की प्रमुख विशेषताएँ

  • बंद-चक्र जल पुनर्चक्रण: यह प्रणाली उपचार के बाद जल का निरंतर पुनर्चक्रण करती है, जिसके परिणामस्वरूप 90-99% जल का पुन: उपयोग होता है और मीठे जल के संसाधनों पर निर्भरता कम हो जाती है।
  • यांत्रिक अपशिष्ट निष्कासन: यांत्रिक निस्पंदन इकाइयाँ मछली के मल और बचे हुए चारे जैसे ठोस अपशिष्टों को हटा देती हैं, जिससे जल की गुणवत्ता में गिरावट नहीं आती।
  • जैविक निस्पंदन प्रक्रिया: नाइट्रिफाइंग बैक्टीरिया युक्त बायोफिल्टर विषैले अमोनिया को नाइट्राइट और फिर अपेक्षाकृत हानिरहित नाइट्रेट में परिवर्तित करते हैं, जिससे जलीय जीवों के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित होता है।
  • उच्च स्टॉक घनत्व: RAS इष्टतम जल गुणवत्ता बनाए रखकर उच्च स्टॉक घनत्व का समर्थन करता है, जिससे प्रति इकाई क्षेत्र में उच्च उत्पादकता प्राप्त होती है।
  • नियंत्रित पर्यावरणीय परिस्थितियाँ: यह प्रणाली तापमान, pH, घुलित ऑक्सीजन और लवणता के सटीक विनियमन की अनुमति देती है, जिससे निरंतर और वर्ष भर मत्स्यपालन संभव होता है।

RAS की सीमाएँ

  • उच्च प्रारंभिक पूँजी निवेश।
  • कुशल जनशक्ति और निर्बाध बिजली आपूर्ति की आवश्यकता होती है।

RAS बनाम पारंपरिक जलकृषि

पहलू RAS पारंपरिक जलकृषि
जल उपयोग बहुत निम्न उच्च
भूमि की आवश्यकता निम्न उच्च
पर्यावरण पर नियंत्रण बहुत उच्च सीमित
प्रदूषण माध्यम प्रायः उच्च
प्रारंभिक लागत उच्च निम्न

‘ट्राउट फार्मिंग’ के बारे में

  • ट्राउट फार्मिंग एक ऐसी मत्स्यपालन प्रथा है, जिसमें नियंत्रित मीठे जल तंत्र में ट्राउट का पालन किया जाता है, ताकि खाद्य उत्पादन, नदियों में मछलियों की संख्या बढ़ाने या स्पोर्ट फिशिंग संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके।
  • यह ठंडे क्षेत्रों में सामान्य है क्योंकि ट्राउट को स्वच्छ, ठंडा और ऑक्सीजन युक्त जल की आवश्यकता होती है।
  • पर्यावरणीय आवश्यकताएँ
    • तापमान: सामान्यतः 10–18°C
    • जल की गुणवत्ता: उच्च घुलित ऑक्सीजन, कम मैलापन।
  • सामान्य ट्राउट प्रजातियाँ
    • रेनबो ट्राउट: सबसे व्यापक रूप से पाली जाने वाली मछली। तेजी से बढ़ती है और अनुकूलनीय होती है।
    • ब्राउन ट्राउट: धीमी वृद्धि, कुछ क्षेत्रों में उच्च बाजार मूल्य।
    • ब्रूक ट्राउट: जल की गुणवत्ता के प्रति संवेदनशील, आमतौर पर लघु स्तर पर पाली जाती है।

‘री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम’ (RAS) का समर्थन करने वाली सरकारी पहलें 

  • प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): यह भारत में सतत् मत्स्यपालन को बढ़ावा देने वाली प्रमुख सरकारी योजना है, जिसके तहत मत्स्यपालन क्षेत्र के आधुनिकीकरण और उत्पादकता बढ़ाने के लिए ‘री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम’ (RAS) प्रौद्योगिकी को सक्रिय रूप से समर्थन दिया जाता है।
  • वित्तीय सहायता: PMMSY के तहत, सरकार RAS इकाइयों की स्थापना के लिए केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिसमें सामान्य वर्ग के लाभार्थियों के लिए इकाई लागत का 40% तक और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला लाभार्थियों के लिए 60% तक सब्सिडी दी जाती है।

भारत में ठंडे जल आधारित मत्स्यपालन संबंधी मुद्दे

  • उभरता हुआ उच्च-संभावित क्षेत्र: उच्च गुणवत्ता वाली प्रजातियों की बढ़ती माँग, निर्यात क्षमता और सतत् प्रौद्योगिकियों को अपनाने के कारण ठंडे जल आधारित मत्स्यपालन का महत्त्व बढ़ रहा है।
  • पारंपरिक भौगोलिक एकाग्रता: ‘ट्राउट’ पालन ऐतिहासिक रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश तथा सिक्किम जैसे हिमालयी एवं पर्वतीय राज्यों में बर्फ से पोषित धाराओं का उपयोग करते हुए केंद्रित रहा है।
  • उत्पादन विस्तार: मत्स्य विभाग ने नई हैचरी की स्थापना के माध्यम से प्रति वर्ष 14 लाख ‘ट्राउट’ प्रजनकों के उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • संस्थागत सहयोग: उत्तराखंड ने जीवंत ग्राम कार्यक्रम के तहत ट्राउट आपूर्ति और आजीविका का समर्थन करने के लिए ITBP के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।

संदर्भ

सेल्युलाइटिस (Cellulitis) पर एक अवलोकन अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लोअर एक्सट्रीमिटी वाउंड्स में प्रकाशित हुआ है।

सेल्युलाइटिस (Cellulitis) के बारे में

  • रोग का स्वरूप: सेल्युलाइटिस त्वचा और उसके नीचे के ऊतकों का एक गैर-संक्रामक जीवाणु संक्रमण है।
    • यह मुख्य रूप से त्वचा के नीचे के ऊतकों को प्रभावित करता है और यदि इसका उपचार न किया जाए, तो यह लसीका प्रणाली और रक्तप्रवाह में फैल सकता है।
  • संबंधित जीव: यह मुख्य रूप से स्ट्रेप्टोकोकस (Streptococcus) और स्टैफिलोकोकस (Staphylococcus) जीवाणुओं के कारण होता है।
  • आमतौर पर प्रभावित क्षेत्र: यह संक्रमण आमतौर पर पैरों, तलवों और पैर की उंगलियों को प्रभावित करता है, लेकिन चेहरे, बाँहों, हाथों और उंगलियों पर भी हो सकता है।
  • प्रवेश का तरीका: जीवाणु क्षतिग्रस्त त्वचा, घावों, कटने से प्रभावित शारीरिक भाग के माध्यम से प्रवेश करते हैं।
  • जोखिम कारक
    • त्वचा की चोट: कट, घाव, अल्सर या आघात की उपस्थिति से जोखिम काफी बढ़ जाता है।
    • कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली: कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, मधुमेह या दीर्घकालिक बीमारी से प्रभावित व्यक्ति अधिक संवेदनशील होते हैं।
    • त्वचा की स्वच्छता पर ध्यान ना देना: अपर्याप्त स्वच्छता से बैक्टीरिया का प्रवेश और संक्रमण आसान हो जाता है।
    • व्यावसायिक जोखिम: शारीरिक श्रम के दौरान छोटी-मोटी चोटें लगने के कारण जोखिम बढ़ जाता है।
    • एथलीट फुट, एक्जिमा या सोरायसिस जैसी दीर्घकालिक (पुरानी) त्वचा की स्थिति।
  • विशेषताएँ
    • स्थानीय लक्षण: संक्रमित त्वचा का रंग बदल जाता है, उसमें सूजन आ जाती है, वह गर्म, कोमल और दर्दनाक हो जाती है।
    • परिवर्तन: संक्रमण फैलने के साथ-साथ त्वचा का रंग गहरा होता जाता है और सूजन बढ़ती जाती है।
    • शारीरिक लक्षण: मरीजों को बुखार, ठंड लगना, थकान और कमजोरी महसूस हो सकती है।
    • गंभीर अवस्था: तरल पदार्थ से भरे छाले, त्वचा में गड्ढे पड़ना, फोड़े बनना और लसीका वाहिकाओं में संक्रमण फैलना जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
  • निदान: नैदानिक प्रयोगशाला परीक्षण, केवल गंभीर या जटिल मामलों में ही किए जाते हैं।
  • उपचार: अधिकांश मामलों में मौखिक एंटीबायोटिक दवाओं का कोर्स दिया जाता है। गंभीर संक्रमणों के लिए अस्पताल में भर्ती और अंतःशिरा एंटीबायोटिक दवाओं की आवश्यकता हो सकती है।
  • रोकथाम
    • त्वचा की स्वच्छता के उपाय: नियमित रूप से हाथ धोना, त्वचा को साफ और सूखा रखना और साफ कपड़े पहनना जोखिम को कम करता है।
    • घावों की देखभाल: छोटे कट और घावों की तुरंत सफाई करना आवश्यक है।
  • भारत में सेल्युलाइटिस
    • मार्च 2023 में किए गए एक अवलोकन अध्ययन में पाया गया कि सेल्युलाइटिस कामकाजी आयु के पुरुषों में अधिक सामान्य है, जिनकी औसत आयु लगभग 36 वर्ष है।
    • व्यावसायिक संबंध: प्रभावित व्यक्तियों में से कई खेतों में कार्य करते थे, जिनमें से लगभग 50% मामलों में चोट लगने के कारण यह समस्या हुई।
    • संबंधित स्थिति: मधुमेह और धूम्रपान को महत्त्वपूर्ण जोखिम कारकों के रूप में पहचाना गया।
    • उच्च जोखिम वाले समूह: मधुमेह रोगी, वृद्ध व्यक्ति, पैरों में सूजन से प्रभावित  व्यक्ति और शारीरिक श्रम करने वाले श्रमिक।

संदर्भ

दिल्ली सरकार, कुत्तों के काटने से होने वाली रेबीज से मानव मृत्यु को शून्य के स्तर तक लाने हेतु अपनी रणनीति के तहत, महामारी रोग अधिनियम, 1897 के अंतर्गत ह्यूमन रेबीज को अधिसूचित बीमारी (नोटिफाइएबल डिजीज) घोषित करने जा रही है।

अधिसूचित बीमारी (नोटिफाइएबल डिजीज) क्या है?

  • कानूनी अनिवार्यता: अधिसूचित बीमारी (नोटिफाइएबल डिजीज) वह बीमारी है, जिसकी सूचना स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को प्रदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्देश्य: रिपोर्टिंग से सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न करने वाले रोगों की निगरानी, ​​प्रकोप की रोकथाम, प्रारंभिक हस्तक्षेप और नियंत्रण संभव हो पाता है।
  • राज्य-विशिष्ट सूचियाँ: नोटिफाइएबल डिजीज की सूची प्रत्येक राज्य में अलग-अलग होती है और इसमें तपेदिक, डेंगू, कोविड-19 जैसे संक्रामक रोग और हाल ही में सर्पदंश को शामिल गया हैं।

कानूनी और संस्थागत ढाँचा

  • महामारी रोग अधिनियम, 1897: यह अधिनियम किसी भी बीमारी (जैसे रेबीज) को अधिसूचित बीमारी (नोटिफाइएबल डिजीज) घोषित करने का कानूनी आधार प्रदान करता है।
  • एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP): यह डेटा संग्रह, निगरानी और प्रतिक्रिया का प्रबंधन करेगा, जिससे शीघ्र हस्तक्षेप और संसाधनों का कुशल आवंटन संभव होगा।
  • राष्ट्रीय दर्जा: राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम के अनुसार, भारत के 20 राज्यों ने मानव रेबीज को अधिसूचित बीमारी  घोषित कर दिया है।

महामारी रोग अधिनियम, 1897 के बारे में

  • उत्पत्ति: महामारी रोग अधिनियम, 1897 को औपनिवेशिक काल के दौरान, 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बॉम्बे प्रेसीडेंसी में फैले ब्यूबॉनिक प्लेग के प्रकोप से निपटने के लिए अधिनियमित किया गया।
  • उद्देश्य: खतरनाक महामारी रोगों के प्रसार की प्रभावी रोकथाम और नियंत्रण को सुनिश्चित करना।
  • प्रमुख प्रावधान
    • धारा 2: यह अधिनियम राज्य सरकारों/केंद्रशासित प्रदेशों को महामारी को नियंत्रित करने के लिए विशेष उपाय करने और अस्थायी नियम बनाने का अधिकार देता है।
    • धारा 2A: केंद्र सरकार महामारी के प्रसार को रोकने के लिए परिवहन निरीक्षण और व्यक्तियों को हिरासत में लेने हेतु उपाय कर सकती है और नियम बना सकती है।
    • धारा 2B: महामारी के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों के विरुद्ध हिंसा करना और संपत्ति को क्षतिग्रस्त करना निषिद्ध है।
    • धारा 3: यह अधिनियम के अंतर्गत जारी आदेशों का पालन न करने पर दंड का प्रावधान करती है।
      • धारा 3(2): स्वास्थ्यकर्मियों के विरुद्ध हिंसा या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने पर कारावास (3 महीने से 5 वर्ष तक) और जुर्माना (₹50,000 से ₹2 लाख तक) हो सकता है।
    • धारा 4: अधिनियम को लागू करते समय सद्भावनापूर्वक की गई कार्रवाई के लिए अधिकारियों और प्राधिकरणों को कानूनी प्रतिरक्षा प्रदान करती है।

रेबीज के बारे में

  • प्रकृति: रेबीज एक टीका-निवारक, पशुओं में फैलने वाला विषाणुजनित रोग है।
  • कारक: रेबीज वायरस (RABV), जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है।
  • होस्ट: यह सभी स्तनधारियों को प्रभावित करता है, जिनमें कुत्ते, बिल्लियाँ, पालतू जानवर और वन्यजीव शामिल हैं।
  • संचरण: यह प्राय: काटने, खरोंच लगने या श्लेष्म झिल्ली (आँखें, मुँह) या खुले घावों के संपर्क में आने से लार के माध्यम से फैलता है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य स्थिति: इसे उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग (NTD) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जो गरीब, हाशिए पर स्थित और सुभेद्य आबादी को असमान रूप से प्रभावित करता है।
  • रेबीज के प्रकार
    • उग्र रेबीज: इसमें अति सक्रियता, बेचैनी और मतिभ्रम जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
    • पक्षाघाती रेबीज: इसमें मांसपेशियों की कमजोरी, पक्षाघात और कोमा की स्थिति जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
  • रोकथाम: समय पर टीकाकरण से 100% रोकथाम संभव है।
  • मृत्यु दर: लक्षण दिखने के बाद रेबीज लगभग 100% घातक होता है, इसलिए रोकथाम और शीघ्र उपचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  • संवेदनशील समूह: स्थानिक क्षेत्रों में रहने वाले बच्चे (5-14 वर्ष)
  • उपचार
    • रेबीज की रोकथाम: पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफीलैक्सिस (PEP) के तहत चार खुराक वाला टीका तथा जिन व्यक्तियों को टीका नहीं लगा है उनके लिए रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन (RIG) प्रभावी है।
    • WHO द्वारा अनुमोदित टीके: रैबिवैक्स-एस, वैक्सीरैब एन, वेरोरैब।

पूर्व-संपर्क निवारक उपचार (प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस-PrEP): यह विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों (पशु चिकित्सकों, पशु संचालकों) को, संभावित जोखिम से पूर्व दिया जाने वाला एक निवारक टीकाकरण है ।

संदर्भ

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR) के 42वें स्थापना दिवस पर केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने ‘डीप-टेक स्टार्ट-अप्स’ के लिए DSIR फंडिंग मानदंडों में ढील देने की घोषणा की।

संबंधित तथ्य

  • औद्योगिक अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने के लिए DSIR औद्योगिक अनुसंधान और विकास संवर्द्धन कार्यक्रम (IRDPP) के तहत वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR) के बारे में 

  • स्थापना
    • भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 के 164वें संशोधन के अंतर्गत, 4 जनवरी, 1985 को राष्ट्रपति की अधिसूचना द्वारा इस विभाग की स्थापना की गई थी।
    • विभाग को स्वदेशी प्रौद्योगिकी के विकास, उपयोग और हस्तांतरण को बढ़ावा देने का दायित्व सौंपा गया है।
  • नोडल मंत्रालय: DSIR, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
  • मुख्य अधिदेश और उद्देश्य
    • सभी क्षेत्रों में औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास (R&D) को बढ़ावा देना।
    • लघु एवं मध्यम औद्योगिक इकाइयों (SMEs/MSMEs) को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी प्रौद्योगिकियों के विकास में सहयोग प्रदान करना।
    • वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं और उद्योग के बीच सेतु के रूप में कार्य करना, जिसके लिए निम्नलिखित कार्यों का क्रियान्वयन किया जाता हैं:
      • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम (NRDC)
      • अनुसंधान एवं विकास निवेश को सुगम बनाने के लिए सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (CEL)।

औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास प्रोत्साहन कार्यक्रम (IRDPP) के बारे में 

  • उद्देश्य
    • आंतरिक अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर अधिक ध्यान केंद्रित करना।
    • उद्योग और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान संगठनों (SIROs) में अनुसंधान एवं विकास अवसंरचना को मजबूत करना।
    • उद्योग और SIRO-नेतृत्व वाली अनुसंधान एवं विकास पहलों को प्रोत्साहित करना।
    • आंतरिक अनुसंधान एवं विकास केंद्रों और SIROs के कार्यों को राष्ट्रीय तकनीकी और औद्योगिक विकास लक्ष्यों के साथ संरेखित करना।
  • कार्यक्रम का प्रकार: अनुसंधान एवं विकास (R&D)।
  • केंद्रित क्षेत्र: इंजीनियरिंग, पर्यावरण, प्राकृतिक एवं अनुप्रयुक्त विज्ञान, कृषि विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, सामाजिक विज्ञान।
  • वित्तपोषण एजेंसी: वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR)
  • पात्रता मानदंड
    • आवेदक कंपनी अधिनियम, 1956 या 2013 के तहत पंजीकृत कंपनी होनी चाहिए।
    • निगमन के बाद न्यूनतम तीन वित्तीय वर्ष पूर्ण हो चुके हों।
    • न्यूनतम विगत दो वर्षों से आय का स्रोत नियमित होना चाहिए।
    • अनुसंधान एवं विकास (R&D) मान्यता प्राप्त करने वाली कंपनियाँ विनिर्माण, उत्पादन या तकनीकी सेवाओं में संलग्न  होनी चाहिए।
    • अनुसंधान एवं विकास इकाइयाँ अधिकृत गैर-आवासीय परिसर में स्थित होनी चाहिए।
    • स्वतंत्र अनुसंधान एवं विकास अवसंरचना तथा योग्य तकनीकी मानव संसाधन की उपलब्धता होनी चाहिए।
    • आवेदन के समय अनुसंधान एवं विकास इकाई कार्यरत होनी चाहिए।
    • नवीन उत्पादों या प्रौद्योगिकियों के विकास संबंधी उद्देश्य से स्पष्ट रूप से परिभाषित, समयबद्ध अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम संचालित होने चाहिए।

नीतिगत परिवर्तनों की घोषणा की गई

  • व्यवहार्यता का प्रावधान हटाया गया: DSIR के अंतर्गत वित्तपोषण हेतु डीप-टेक स्टार्ट-अप्स के लिए तीन वर्ष की न्यूनतम व्यवहार्यता/अस्तित्व की शर्त को समाप्त कर दिया गया है।
  • वित्तपोषण सीमा: वर्तमान में पात्र स्टार्ट-अप्स 1 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
  • सुरक्षा उपाय और मूल्यांकन मानक
    • तकनीकी परिपक्वता मूल्यांकन: स्टार्ट-अप्स को तकनीकी परिपक्वता से संबंधित उपयुक्त मूल्यांकन मानकों को पूर्ण करना होगा।
    • गुणवत्ता नियंत्रण: वित्तपोषण में दी गई छूट से जाँच में कोई कमी नहीं आती, बल्कि इससे आयु-आधारित मानदंडों के स्थान पर तकनीकी तत्परता और नवाचार क्षमता पर ध्यान केंद्रित होता है।

सुधार के पीछे निहित तर्क

  • प्रारंभिक चरण को बढ़ावा: तीन वर्ष की अनिवार्यता को समाप्त करने का उद्देश्य नवोन्मेषी परियोजनाओं और उद्यमियों को शुरुआती गति प्रदान करना है।
  • नवाचार को बढ़ावा देना: यह सुधार स्टार्ट-अप्स को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने से पूर्व तीव्र विस्तार करने हेतु प्रोत्साहित करता है।
  • गहन प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन: गहन प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में प्रायः दीर्घ अनुसंधान एवं विकास चक्र शामिल होते हैं, इसलिए प्रारंभिक वित्तीय सहायता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

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