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Jan 07 2026

व्हाइट-बेलीड हेरॉन

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने गंभीर रूप से लुप्तप्राय ‘व्हाइट-बेलीड हेरॉन’ (White-bellied Heron) पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंताओं के संदर्भ में लोहित नदी पर स्थित कलाई-II जलविद्युत परियोजना को पर्यावरण संबंधी मंजूरी प्रदान की है।

व्हाइट-बेलीड हेरॉन’ के बारे में

  • परिचय: व्हाइट-बेलीड हेरॉन (Ardea Insignis) बगुलों में दूसरा सबसे बड़ा और दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक है।
  • आवास: यह दलदली जंगलों और वन-आच्छादित नदी प्रणालियों में पाया जाता है और खाद्य आवश्यकताओं के लिए स्वतंत्र रूप से बहने वाली नदियों को तथा घोंसला बनाने के लिए ऊँचे पेड़ों को प्राथमिकता देता है।
  • आहार: यह प्रजाति मुख्य रूप से मछली और बड़े झींगे जैसे जलीय जीवों पर निर्भर रहती है तथा प्रायः तेज बहने वाली नदी की धाराओं में खाद्य की तलाश करती है।
  • क्षेत्र: इसका वर्तमान क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश, असम, भूटान और बांग्लादेश तक सीमित है, जिसमें नामदफा राष्ट्रीय उद्यान और कामलांग बाघ अभयारण्य जैसे प्रमुख भारतीय स्थल शामिल हैं।
  • खतरे: प्रमुख खतरों में बांधों के कारण आवास का नुकसान, शिकार, मानवीय हस्तक्षेप और नदी पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण शामिल हैं।
  • संरक्षण स्थिति: IUCN रेड लिस्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त, जिसकी अनुमानित वैश्विक आबादी 250 से कम है।
    • इसे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत भी सूचीबद्ध किया गया है (जो भारत में कानूनी संरक्षण का उच्चतम स्तर है)।

कलाई-II जलविद्युत परियोजना के बारे में

  • कलाई-II, टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड (THDC) द्वारा विकसित की जाने वाली 1,200 मेगावाट की रन-ऑफ-रिवर’ जलविद्युत परियोजना है।
  • इसका उद्देश्य पूर्वी हिमालय में स्वच्छ ऊर्जा और रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देना है।
  • स्थान: अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ जिले में लोहित नदी (ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी) पर अवस्थित है।
  • पर्यावरणीय चिंताएँ: पर्यावरणविदों ने चिंता व्यक्त की है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में व्हाइट-बेलीड हेरॉन का उल्लेख नहीं किया गया है, जबकि लोहित बेसिन इस प्रजाति का ज्ञात निवास स्थान है।

भारत चावल उत्पादन

केंद्रीय कृषि मंत्री के अनुसार, भारत लगभग 150 मिलियन टन उत्पादन के साथ चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक बन गया है।

भारत में चावल उत्पादन की प्रमुख विशेषताएँ

  • वैश्विक स्थिति: भारत चावल उत्पादन में प्रथम स्थान पर है और विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश बना हुआ है, जो वैश्विक बाजार में प्रतिवर्ष 2 करोड़ टन से अधिक चावल की आपूर्ति करता है।
  • प्रमुख उत्पादक राज्य (2024-25): उत्तर प्रदेश चावल उत्पादन में अग्रणी है, उसके बाद तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, पंजाब और छत्तीसगढ़ का स्थान आता है।
    • उच्च उपज वाली किस्मों, मशीनीकरण और सिंचाई के कारण पंजाब धान उत्पादन (प्रति हेक्टेयर उपज) में लगातार भारत में अग्रणी राज्य है।
  • निर्यात गंतव्य: भारतीय चावल का व्यापक रूप से पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण एशिया में निर्यात किया जाता है, जिसमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, बेनिन और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
  • उत्पादकता में वृद्धि: 184 नई उच्च उपज वाली और जलवायु-प्रतिरोधी बीज किस्मों के जारी होने से उत्पादन तथा किसानों की आय में और वृद्धि होने की उम्मीद है।

धान की खेती के बारे में

  • धान विश्व की एक प्रमुख खाद्य फसल है और उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों, विशेष रूप से एशिया का मुख्य आहार है।
  • जलवायु संबंधी आवश्यकताएँ
    • गर्म और आर्द्र जलवायु में पनपता है।
    • इष्टतम तापमान: दिन में लगभग 30°C और रात में 20°C।
  • मिट्टी संबंधी आवश्यकताएँ
    • जलोढ़, दोमट और चिकनी मिट्टी में अच्छी तरह उगता है।
    • 5.5–6.5 के pH सीमा वाली उप मृदा के लिए सबसे उपयुक्त है।
    • हल्की अम्लीय से क्षारीय मिट्टी को सहन कर सकता है।
  • वर्षा की आवश्यकता
    • धान को 100-150 सेंटीमीटर वर्षा की आवश्यकता होती है।
    • धान एक अर्द्ध-जलीय फसल है, जिसे अपनी अधिकांश वृद्धि अवधि के दौरान स्थिर जल (10-15 सेंटीमीटर) की आवश्यकता होती है।
  • खेती के मौसम के आधार पर प्रकार
    • अमन (शीतकालीन चावल): जून-जुलाई में बोया जाता है; नवंबर-दिसंबर में फसल कटाई होती है।
    • औस (शरदकालीन चावल): मई-जून में बोया जाता है; सितंबर-अक्टूबर में फसल कटाई होती है।
    • बोरो (ग्रीष्मकालीन चावल): नवंबर से मई के बीच आर्द्र या सिंचित क्षेत्रों में उगाया जाता है।
  • भारत में GI टैग वाली चावल की किस्मों के उदाहरण: थूयामल्ली चावल (तमिलनाडु), गोबिंदोभोग (पश्चिम बंगाल), कालानमक (यूपी/उत्तराखंड), वायनाड जीरकासला (केरल), और तुलापंजी (पश्चिम बंगाल)।

पिपरहवा अवशेष प्रदर्शनी

प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली में पवित्र  पिपरहवा अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का उद्घाटन किया, जो 125 वर्षों से अधिक समय के बाद बुद्ध से संबंधित अवशेषों की भारत में वापसी का प्रतीक है।

  • पिपरहवा की कलाकृतियों की भारत में वापसी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और गोदरेज इंडस्ट्रीज ग्रुप के बीच सहयोग के माध्यम से संभव हो पाई।

 पिपरहवा के पवित्र अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी

  • परिचय: प्रकाश और कमल: प्रबुद्ध व्यक्ति के अवशेष’ शीर्षक वाली इस प्रदर्शनी में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के साथ-साथ भारतीय संग्रहालयों से प्राप्त संबंधित पुरातात्त्विक सामग्री प्रदर्शित की गई है।
  • स्थान: यह प्रदर्शनी राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर, नई दिल्ली में आयोजित की जा रही है।
  • महत्त्व
    • यह प्रदर्शनी बुद्ध की आध्यात्मिक विरासत के संरक्षक के रूप में भारत की भूमिका को प्रदर्शित करती है और सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूत करती है।
    • साथ ही, यह आकर्षक और डिजिटल प्रदर्शनों के माध्यम से बौद्ध विरासत के बारे में वैश्विक जागरूकता को बढ़ावा देती है।

 पिपरहवा अवशेषों के बारे में

  • पिपरहवा के अवशेष प्राचीन बौद्ध कलाकृतियाँ हैं, जो भगवान बुद्ध के पार्थिव अवशेष हैं और शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु से संबंधित हैं।
  • खोज: वर्ष 1898 में, ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने  पिपरहवा (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत-नेपाल सीमा के निकट) में एक स्तूप का उत्खनन किया, जिसमें ये अवशेष प्राप्त हुए।
  • सामग्री: इनमें अस्थि के टुकड़े, सोपस्टोन और क्रिस्टल के ताबूत, बलुआ पत्थर का एक संदूक और स्वर्ण आभूषण, मोती, माणिक, नीलम और पुखराज जैसे उपहार शामिल हैं, जो मुख्य रूप से मौर्य काल (लगभग 240-200 ईसा पूर्व) की हैं।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: माना जाता है कि ये अवशेष उन आठ मूल स्तूपों का हिस्सा हैं, जिनमें बुद्ध के दाह संस्कार के अवशेषों के अंश रखे गए थे और संभवतः शाक्य वंश द्वारा ही स्थापित किए गए थे।

सावित्रीबाई फुले (1831-1897)

प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री ने सावित्रीबाई फुले की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर शिक्षा और सामाजिक सुधार में उनकी अग्रणी भूमिका को याद किया।

सावित्रीबाई फुले (1831-1897) के बारे में

  • सावित्रीबाई फुले एक समाज सुधारक, शिक्षाविद, कवयित्री और महिला अधिकारों की अग्रणी थीं, जिन्हें व्यापक रूप से भारतीय नारीवाद की जननी माना जाता है।
  • प्रारंभिक जीवन: 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के नाइगाँव में जन्मीं, वे माली समुदाय से थीं।
    • उनकी शादी कम आयु में ज्योतिराव फुले से हुई थी, जिन्होंने उन्हें घर पर ही शिक्षा दी, जिससे वह भारत की पहली महिला शिक्षिका और पुणे में एक बालिका विद्यालय की पहली महिला प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्य कर सकीं।
  • संबद्ध संगठन: ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज (1873) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और सामाजिक समानता के लिए महिलाओं की पहलों का नेतृत्व किया।
    • पुणे में ‘नेटिव फीमेल स्कूल’ और महिला सेवा मंडल की स्थापना की, ताकि महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों को बढ़ावा दिया जा सके।
  • सामाजिक सुधार
    • भारत के पहले बालिका विद्यालय, भीडे वाडा विद्यालय, पुणे (1848) की सह-स्थापना की।
    • बाल विवाह, दहेज और जातिगत भेदभाव का सक्रिय रूप से विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।
    • कन्या भ्रूणहत्या को रोकने और कमजोर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की।
    • दहेज और ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों से मुक्त सत्यशोधक विवाहों को बढ़ावा दिया।
  • साहित्यिक योगदान
    • काव्या फुले (1854), आधुनिक मराठी महिला कवयित्री का पहला काव्य संग्रह।
    • बावन काशी सुबोध रत्नाकर, शिक्षा और सामाजिक न्याय पर बल देते हैं।
  • विरासत: वर्ष 1897 में प्लेग के रोगियों की सेवा करते हुए उनका निधन हो गया।

शिक्षा तक व्यापक पहुँच, सामाजिक न्याय आंदोलनों और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के माध्यम से उनकी विरासत आज भी मौजूद है, जो समावेशी विकास के लिए भारत की दृष्टि को प्रेरित करती है।

समुद्र प्रताप (Samudra Pratap)

रक्षा मंत्री ने गोवा में भारत के पहले स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए प्रदूषण नियंत्रण पोत ICGS समुद्र प्रताप को शामिल किया।

समुद्र प्रताप के बारे में

  • भारतीय तटरक्षक बल का जहाज (Indian Coast Guard Ship- ICGS) समुद्र प्रताप भारतीय तटरक्षक बल के बेड़े का सबसे बड़ा जहाज है और प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनाए गए दो जहाजों में से पहला है।
  • गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) द्वारा 60% से अधिक स्वदेशी सामग्री से निर्मित यह जहाज रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में हुई प्रगति को दर्शाता है।
  • डिजाइन और क्षमताएँ: मुख्य रूप से समुद्री प्रदूषण से निपटने के लिए डिजाइन किया गया यह पोत अग्निशमन, समुद्री सुरक्षा, तटीय गश्ती और लंबी दूरी की निगरानी सहित कई भूमिकाओं में कार्य करने की क्षमता रखता है।
  • सामरिक महत्त्व: यह भारत की समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों, तटीय आजीविका और ब्लू इकोनॉमी की रक्षा करने की क्षमता को बढ़ाता है।
    • यह समझौता भारत को उन्नत समुद्री पर्यावरण प्रतिक्रिया क्षमताओं वाले चुनिंदा देशों के समूह में शामिल करता है।
    • यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करता है।

समुद्री प्रदूषण नियंत्रण में भारतीय तटरक्षक बल (ICG) की भूमिका

  • केंद्रीय समन्वय प्राधिकरण: भारतीय तटरक्षक बल राष्ट्रीय तेल रिसाव-आपदा आकस्मिक योजना [National Oil Spill–Disaster Contingency Plan (NOS-DCP)] के तहत तेल रिसाव प्रतिक्रिया के लिए राष्ट्रीय प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है और समुद्री प्रदूषण की घटनाओं के दौरान मंत्रालयों, राज्यों, बंदरगाहों और एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करता है।
  • निगरानी एवं शीघ्र पता लगाना: भारत के समुद्री क्षेत्रों में तेल रिसाव और प्रदूषण के खतरों का पता लगाने के लिए जहाजों, डॉर्नियर विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोनों का उपयोग करके निरंतर समुद्री निगरानी की जाती है।
  • प्रदूषण निवारण अभियान: समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित करने, और उसे कम करने के लिए बूम, स्किमर और अनुमोदित तेल रिसाव रोधी पदार्थों का उपयोग करता है, जिसमें समुद्री दुर्घटनाओं के दौरान अग्निशमन सहायता भी शामिल है।
  • तैयारी और क्षमता निर्माण: प्रदूषण निवारण केंद्र (PRC) संचालित करता है, राष्ट्रीय स्तर के अभ्यास आयोजित करता है और त्वरित, समन्वित प्रदूषण निवारण सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी विशेषज्ञता तथा प्रशिक्षण प्रदान करता है।

संदर्भ

जैव प्रौद्योगिकी, जेरोसाइंस (Geroscience), कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा निवारक स्वास्थ्य देखभाल में हुई प्रगतियों ने मानव दीर्घायु के प्रति वैश्विक रुचि को पुनर्जीवित कर दिया है।

‘लॉन्जेविटी साइंस’ क्या है?

  • लॉन्जेविटी साइंस (या जेरोसाइंस) वृद्धावस्था की जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है और वृद्धावस्था से संबंधित कमी को विलंबित करने के तरीकों की खोज करता है।
  • यह वृद्धावस्था का अंतःविषयक अध्ययन है और स्वास्थ्य, जैव प्रौद्योगिकी, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक नीति से संबंधित है।

‘लॉन्जेविटी साइंस’ में प्रमुख अवधारणाएँ

स्वास्थ्य अवधि और जीवनकाल

  • जीवनकाल से तात्पर्य ‘जीवन के कुल वर्षों’ से है।
  • स्वास्थ्यकाल से आशय अच्छे स्वास्थ्य की अवस्था में व्यतीत किए गए वर्षों से है, जिनमें दीर्घकालिक रोगों और दिव्यांगता का अभाव होता है।
  • आधुनिक ‘लॉन्जेविटी साइंस’ का लक्ष्य केवल जीवनकाल बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वास्थ्यकाल बढ़ाना है।

बायोहैकिंग (Biohacking)

  • इसे स्वास्थ्य और प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए आहार, जीवनशैली या शरीर विज्ञान में जानबूझकर किए गए बदलावों के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • इसमें पहनने योग्य उपकरणों, सप्लीमेंट्स, उन्नत निदान और क्रायोथेरेपी या हाइपरबेरिक ऑक्सीजन चैंबर जैसी थेरेपी का उपयोग शामिल है।

ब्लू जोन (Blue Zones)

  • ऐसे भौगोलिक क्षेत्र, जहाँ शतायु व्यक्तियों की संख्या अधिक है और दीर्घकालिक रोगों की दर कम है।
  • मूल रूप से ओकिनावा (जापान), सार्डिनिया (इटली), निकोया (कोस्टा रिका), इकारिया (ग्रीस) और लोमा लिंडा (अमेरिका) में इनकी पहचान की गई थी।
  • हाल ही में सिंगापुर को इस सूची में जोड़ा गया है; केरल को कभी-कभी ‘इंडियन ब्लू जोन’ माना जाता है, हालाँकि इसका डेटा सीमित है।

वैश्विक दीर्घायु प्रवृत्ति और नवाचार

  • स्वास्थ्य उद्योग का विकास: वर्ष 2024 में वैश्विक स्तर पर इसका मूल्य 6.8 ट्रिलियन डॉलर था और वर्ष 2029 तक इसके 9.8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
  • प्रौद्योगिकी का एकीकरण: निदान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग, मस्तिष्क-मानचित्रण पहनने योग्य उपकरण (जैसे- ब्रेन एक्स360 हेलमेट), श्वास-विश्लेषण चयापचय परीक्षण।
  • दीर्घायु पर्यटन: रात्रि पर्यटन और विलासितापूर्ण स्वास्थ्य कार्यक्रमों जैसे उभरते रुझान।
  • औषधीय प्रगति: GLP-1 एगोनिस्ट जैसी दवाओं के पुनर्उपयोग पर शोध किया जा रहा है ताकि स्वास्थ्य अवधि को बढ़ाया जा सके।

भारत में ‘लॉन्जेविटी साइंस’

  • जनसांख्यिकीय परिवर्तन: वर्ष 2067 तक भारत में विश्व की सबसे बड़ी वृद्ध आबादी होगी।
  • लॉन्गेविटी इंडिया इनिशिएटिव (IISc): प्रमुख भारत अध्ययन का उद्देश्य पश्चिमी देशों पर केंद्रित चिकित्सा डेटा से आगे बढ़कर भारत-विशिष्ट बायोमार्कर और स्वास्थ्य एल्गोरिदम विकसित करना है।
  • आर्थिक क्षमता: भारत में दीर्घायु संबंधी अर्थव्यवस्था में वृद्धि हो रही है और निवारक स्वास्थ्य देखभाल बाजार का विस्तार हो रहा है।

भारत के सामने महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ

  • स्वास्थ्य संबंधी सोच: रोकथाम की तुलना में उपचारात्मक दृष्टिकोण अधिक; बीमारी से पहले स्वास्थ्य में निवेश करने की कम इच्छा।
  • आँकड़ों की कमी: सटीक आयु और स्वास्थ्य संबंधी आँकड़ों का अभाव, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और लक्षित हस्तक्षेपों में बाधा उत्पन्न करता है।
  • पहुँच और समानता: व्यक्तिगत दीर्घायु परामर्श (₹10,000 – ₹1 लाख) और उन्नत उपचारों की उच्च लागत।
  • बुनियादी ढाँचे की कमी: अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और वृद्धावस्था देखभाल सुविधाएँ।
  • रोगों का शीघ्र आरंभ: जीवनशैली से संबंधित दीर्घकालिक रोग पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीयों में शीघ्र (30-40 वर्ष की आयु में) दिखाई देने लगते हैं।

आगे की राह

  • सामाजिक-आर्थिक नीति का पुनर्गठन: सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाना और आजीवन शिक्षा को प्रोत्साहित करना।
    • स्वतंत्र जीवनयापन के लिए एजटेक (AgeTech) समाधान विकसित करना।
  • जन स्वास्थ्य प्राथमिकता: बुनियादी निवारक देखभाल, टीकाकरण, पोषण और वृद्धावस्था संबंधी सेवाएँ अत्याधुनिक जैव-तकनीकी तकनीकों से पूर्व मूलभूत आवश्यकताएँ हैं।
  • सांस्कृतिक परिवर्तन: आयु-भेदभावपूर्ण दृष्टिकोणों से हटकर वृद्ध वयस्कों (जिन्हें ‘अनुभवी पीढ़ी’ या ‘जेन ई’ कहा जाता है) को महत्त्व देना और उन्हें समाज में एकीकृत करना आवश्यक है।

संदर्भ

एक नए वैश्विक अध्ययन से पता चलता है कि शहरी हरियाली बढ़ाने के प्रयास, हालाँकि प्रायः लाभकारी होते हैं, लेकिन कभी-कभी विशेष रूप से शुष्क जलवायु में विपरीत परिणाम भी दे सकते हैं।

अनुसंधान के बारे में

  • शोधकर्ताओं ने भारत सहित 105 देशों के 761 महानगरों का विश्लेषण किया।
  • तापमान विनियमन क्षमता (Temperature Regulation Capability- TRC): TRC किसी वनस्पति क्षेत्र (जैसे- पार्क) और उसके निकट स्थित निर्मित क्षेत्र (जैसे- कंक्रीट या डामर) के बीच तापमान के अंतर को मापता है।
  • ऋणात्मक TRC यह संकेत देता है कि वनस्पति अपेक्षाकृत शीतल अवस्था में है, जबकि धनात्मक TRC उसके अपेक्षाकृत उष्ण होने को दर्शाता है।

शोध के निष्कर्ष

  • वैश्विक स्तर पर, 98% मामलों में वृक्षारोपण ने शहरी क्षेत्रों को शीतल किया, और घास के मैदानों ने 78% मामलों में ऐसा प्रभाव दर्शाया।
  • हालाँकि, जिन शहरों में वार्षिक वर्षा 1,000 मिमी. से कम होती है, वहाँ पेड़, घास के मैदान और कृषि भूमि वास्तव में शहरी सतहों की तुलना में अधिक गर्म थे, जिससे कुल मिलाकर तापमान में वृद्धि हुई।
  • इससेहरित विरोधाभास’ (Green Paradox) उत्पन्न होता है, जबकि वनस्पति आमतौर पर शीतलता प्रदान करती है, शुष्क स्थानों में यह कभी-कभी तापमान में वृद्धि कर सकता है।

हरित विरोधाभास’ (Green Paradox) के पीछे का तर्क

  • दो मुख्य भौतिक प्रक्रियाएँ इस अप्रत्याशित परिणाम की व्याख्या करती हैं:-
    • शीतलन प्रभाव (वाष्पोत्सर्जन): पौधे मृदा तथा पत्तियों से जल-वाष्प का उत्सर्जन करते हैं, जिसके माध्यम से ऊष्मा का अपसारण होता है; यह प्रक्रिया एक प्राकृतिक वायु-शीतलन तंत्र के समान कार्य करती है।
    • ऊष्मीकरण प्रभाव (एल्बिडो और ऊष्मा भंडारण): कुछ वनस्पतियाँ—विशेषतः शुष्क परिस्थितियों में—कंक्रीट जैसी हल्के रंग की निर्मित सतहों की तुलना में अधिक सौर विकिरण का अवशोषण करती हैं (क्योंकि उनका एल्बिडो कम होता है), जबकि कंक्रीट अपेक्षाकृत अधिक सौर ऊर्जा का परावर्तन करती है; साथ ही, वनस्पतियाँ ऊष्मा के भंडारण एवं उत्सर्जन की प्रक्रियाओं को भी रूपांतरित कर सकती हैं।
  • जल-अभावग्रस्त शुष्क नगरों में वाष्पोत्सर्जन अत्यधिक सीमित हो जाता है, और जब घटित शीतलन की क्षतिपूर्ति सौर विकिरण के बढ़े हुए अवशोषण तथा ऊष्मा भंडारण में वृद्धि के माध्यम से होती है, तब तापन प्रभाव और अधिक प्रबल हो सकता है।

संदर्भ

रिमोट सेंसिंग तकनीक ने वनस्पति आवरण, जल संसाधनों तथा भूमिगत खनिजों की निगरानी और आकलन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है, जिसके परिणामस्वरूप अन्वेषण प्रक्रियाएँ अधिक तीव्र, लागत-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल हो गई हैं।

रिमोट सेंसिंग प्रौद्योगिकी के बारे में

  • रिमोट सेंसिंग पृथ्वी की सतह, वायुमंडल या वस्तुओं के बारे में भौतिक संपर्क के बिना जानकारी प्राप्त करने का विज्ञान है।
  • यह कैसे कार्य करता है: यह मुख्य रूप से उपग्रहों, विमानों, ड्रोनों या स्थलीय प्लेटफॉर्मों से परावर्तित या उत्सर्जित विद्युत चुंबकीय विकिरण को मापकर कार्य करता है।

रिमोट सेंसिंग के प्रकार

  • निष्क्रिय: सेंसर प्राकृतिक ऊर्जा का पता लगाते हैं, आमतौर पर परावर्तित सूर्य का प्रकाश (जैसे- विजिबल लाइट कैमरे) या उत्सर्जित ऊष्मीय विकिरण।
  • सक्रिय: सेंसर अपनी स्वयं की ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं (जैसे- रडार या LiDAR) और वापस आने वाले सिग्नल का विश्लेषण करते हैं, जिससे दिन/रात और बादलों में भी संचालन संभव हो पाता है।

रिमोट सेंसिंग के अनुप्रयोग

  • पर्यावरण निगरानी: वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, हिमनदों और जैव विविधता की निगरानी करना।
  • कृषि: परिशुद्ध कृषि: फसल गुणवत्ता, मृदा की नमी, कीटों की पहचान।
    • किसी विशिष्ट स्थान की वनस्पति में क्लोरोफिल की मात्रा; किसी विशिष्ट स्थान का भूमि सतह तापमान; किसी विशिष्ट स्थान के धान के खेतों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (वर्ष 2019)।
  • आपदा प्रबंधन: बाढ़, वनाग्नि, भूकंप की निगरानी।
  • शहरी नियोजन और रक्षा: भूमि उपयोग मानचित्रण, अवसंरचना, निगरानी।
  • महासागर और वायुमंडल: समुद्र स्तर, मौसम पूर्वानुमान, प्रदूषण।

पौधों और वनों की निगरानी

  • उपग्रह, विशेष रूप से दृश्य और निकट-अवरक्त क्षेत्रों में, वर्णक्रमीय संकेतों का उपयोग करके पौधों के स्वास्थ्य का आकलन करते हैं।
  • स्वस्थ पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए लाल प्रकाश को अवशोषित करते हैं और अधिक गर्मी से बचाव के लिए निकट-अवरक्त प्रकाश (Near-Infrared Light-NIR) को परावर्तित करते हैं।
  • ‘नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स’ (NDVI) वनस्पति की गुणवत्ता का मात्रात्मक मापन करता है; उच्च NDVI प्रभावी वृद्धि का संकेत देता है; ‘लो वैल्यू सिग्नल स्ट्रेस’, सूखा या बीमारी का संकेत देते हैं।
  • भारत में अनुप्रयोग: भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) द्विवार्षिक वन आवरण आकलन और वनों की कटाई की निगरानी के लिए NDVI का उपयोग करता है।

जल निकायों और उनकी गुणवत्ता का मानचित्रण

  • रिमोट सेंसिंग ऑप्टिकल और रडार तकनीकों का उपयोग करके जल का पता लगाती है।
  • ‘नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वॉटर इंडेक्स’ (NDWI) और ‘मॉडिफाइड NDWI’ (MNDWI) जल के प्रबल अवशोषण का लाभ उठाते हैं।
  • सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) रेडियो तरंगों के सुचारू परावर्तन के कारण जल गहन क्षेत्रों का विश्लेषण करता है; यह बादलों या तूफानों के दौरान बाढ़ मानचित्रण के लिए आदर्श है।
  • हालिया प्रगति: नासा और इसरो का NISAR उपग्रह (जुलाई 2025 में लॉन्च किया गया) दोहरी आवृत्ति SAR (L-बैंड और S-बैंड) का उपयोग करता है।
  • उपग्रह स्पेक्ट्रल अंतरों के माध्यम से गंदे जल या शैवाल प्रस्फुटन का पता लगाकर जल की गुणवत्ता का आकलन भी करते हैं।

खनिज अन्वेषण और भूमिगत मानचित्रण

  • रिमोट सेंसिंग भूमिगत संसाधनों के बारे में प्रारंभिक साक्ष्य प्रदान करती है।
  • हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग, प्रकाश को सैकड़ों ‘बैंड’ में विभाजित करती है, जिससे विस्तृत स्पेक्ट्रल संकेतों के माध्यम से ताँबा, सोना और लीथियम जैसे खनिजों की पहचान की जा सकती है।
  • भारत में उपयोग: इसका उपयोग राजस्थान (उदाहरण के लिए- ताँबा खनन के लिए अलवर बेसिन), जहाजपुर और गडग शिस्ट बेल्ट में किया जाता है।

संदर्भ

नासा के OSIRIS-REx मिशन द्वारा वर्ष 2023 में पृथ्वी के निकट स्थित क्षुद्रग्रह बेन्नू से सफलतापूर्वक नमूने वापस लाए गए। इन नमूनों के प्रयोगशाला में किए गए विश्लेषण से जटिल कार्बनिक अणु और प्राचीन तारकीय पदार्थ की खोज हुई, जिससे सौरमंडल के विकास और जीवन की उत्पत्ति की समझ को गहनता से समझने में मदद मिल सकती है।

OSIRIS-REx मिशन के बारे में

  • पूर्ण नाम: ‘ओरिजिन्स, स्पेक्ट्रल इंटरप्रिटेशन, रिसोर्स आइडेंटिफिकेशन, एंड सिक्योरिटी–रेगोलिथ एक्सप्लोरर’ (OSIRIS-REx)
  • सहयोग: इस विश्लेषण में नासा और JAXA (जापान) शामिल हैं, जिसमें इटोकावा (Itokawa) और रयुगु (Ryugu) मिशनों से प्राप्त पूर्व विशेषज्ञता का लाभ उठाया गया है।
  • उद्देश्य: पृथ्वी के निकट स्थित एक क्षुद्रग्रह का अध्ययन करना और विस्तृत विश्लेषण के लिए रेगोलिथ सैंपल’ पृथ्वी पर वापस लाना।
  • मिशन श्रेणी: नासा का तीसरा न्यू फ्रंटियर्स साइंस मिशन, जो उच्च प्राथमिकता आधारित ग्रहीय विज्ञान उद्देश्यों पर केंद्रित है।
  • नमूना संग्रह: अक्टूबर 2020 में ‘टच-एंड-गो’ [Touch-and-Go (TAG)] मिशन के माध्यम से किया गया।
  • नमूना वापस लाना: कैप्सूल सितंबर 2023 में पैराशूट का उपयोग करके पृथ्वी पर नमूने लेकर सुरक्षित रूप से उतरा।

बेन्नू (Bennu) के बारे में

  • प्रकृति: कार्बन से युक्त पृथ्वी के निकट स्थित एक क्षुद्रग्रह, जो प्रारंभिक कार्बनिक रसायन विज्ञान के अध्ययन के लिए आदर्श है।
  • कक्षीय समूह: पृथ्वी के समीप परिक्रमा करने वाले अपोलो समूह के क्षुद्रग्रहों का सदस्य होने के कारण यह वैज्ञानिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
  • स्थानांतरण और प्रारंभिक निर्माण: मूलतः लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व शनि की कक्षा से परे स्थित शीतल क्षेत्रों में निर्मित यह पिंड, बृहस्पति के कक्षीय स्थानांतरण के परिणामस्वरूप आंतरिक क्षुद्रग्रह पेटी में स्थानांतरित हो गया।
  • वैज्ञानिक महत्त्व: इसे प्रारंभिक सौर मंडल का एकटाइम कैप्सूल’ माना जाता है, जो निर्माण के बाद से लगभग अपरिवर्तित पदार्थों को संरक्षित रखता है।

प्रमुख खोजें

  • जैविक निर्माण खंड: DNA और RNA निर्माण के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल और सभी पाँच न्यूक्लियोबेस की उपस्थिति पाई गई है।
  • जीवन के लिए आवश्यक शर्करा: राइबोज (RNA का एक प्रमुख घटक) और ग्लूकोज (चयापचय के लिए मुख्य भूमिका) की खोज, जो किसी क्षुद्रग्रह पर 6-कार्बन शर्करा की पहली पहचान को चिह्नित करती है।
    • इष्टतम निर्माण परिस्थितियाँ: ये छह-कार्बन अणु—जो किसी क्षुद्रग्रह पर अब तक पहचाने गए अपनी प्रकृति के प्रथम अणु हैं—अत्यंत निम्न तापमान पर तरल लवणीय जल की संरक्षित सूक्ष्म कोषिकाओं में निर्मित हुए, जिसने उन्हें विनाशकारी सौर विकिरण के प्रभाव से सुरक्षित रखा।।
  • नाइट्रोजन-समृद्ध पॉलिमर: कार्बोमेट पॉलिमर की पहचान की गई है, जो जीवन के लिए आवश्यक नाइट्रोजन के संभावित बाह्य अंतरिक्ष स्रोत का संकेत देते हैं।
    • कार्बोमेट और पॉलिमर: विशेषतः कार्बोमेट के रूप में पहचाने गए ये नाइट्रोजन-समृद्ध पदार्थ, कठोर होने से पूर्व मुलायम एवं श्यान रूप में विद्यमान थे; ये किसी भी बाह्य अंतरिक्षीय नमूने में अब तक की सबसे लंबी पॉलिमर शृंखलाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • पूर्व-सौर कण (Presolar Grains): प्राचीन तारों और सुपरनोवा से धूल की असाधारण रूप से उच्च सांद्रता, जो सूर्य के निर्माण से भी पहले मौजूद थी।
    • सुपरनोवा संकेंद्रण और निहारिका तापन: पूर्व-सौर कणों का संकेंद्रण अन्य अध्ययन किए गए उल्कापिंडों की तुलना में कम-से-कम छह गुना अधिक पाया गया है।
    • ये कण निहारिका तापन’ के संकेत दर्शाते हैं, जो सूर्य की उत्पत्ति के दौरान उत्सर्जित तीव्र ऊर्जा से विकृत हो गए थे।

प्रभाव

  • जीवन की उत्पत्ति के सिद्धांतों पर: यह शोध RNA-जगत परिकल्पना को सुदृढ़ करता है, यह दर्शाता है कि RNA से संबंधित अणु अंतरिक्ष में निर्मित हुए और क्षुद्रग्रहों द्वारा पृथ्वी पर लाए गए।
    • बेन्नू क्षुद्रग्रह पर नाइट्रोजन-समृद्ध पॉलिमर की खोज से हाइड्रोथर्मल वेंट सिद्धांत’ में मौजूदनाइट्रोजन की कमी’ को दूर करने में मदद मिलती है, जिससे RNA निर्माण के लिए आवश्यक नाइट्रोजन का स्रोत प्राप्त होता है।
  • ग्रहीय विज्ञान पर: छोटे पिंडों पर तरल जल द्वारा संचालित रासायनिक अभिक्रियाओं के प्रमाण प्रकट करता है।
    • क्षुद्रग्रहों के विकास, टकराव के इतिहास और आंतरिक रसायन विज्ञान की समझ को बढ़ाता है।

महत्त्व

  • खगोल जीव वैज्ञानिक महत्त्व: यह दर्शाता है कि कार्बन से युक्त क्षुद्रग्रह जीवन के लिए आवश्यक संपूर्ण आणविक संरचना को धारण कर सकते हैं।
    • यह सौर मंडल में जीवन की उत्पत्ति संबंधी प्रक्रियाओं की संभावना को पुष्ट करता है।
  • ब्रह्मांडीय रासायनिक और खगोलीय महत्त्व: यह सौर मंडल के निर्माण में पूर्व-सौर पदार्थों और सुपरनोवा के योगदान की दुर्लभ जानकारी प्रदान करता है।
    • यह सूर्य की उत्पत्ति से पूर्व और उसके दौरान के रासायनिक वातावरण के पुनर्निर्माण में सहायक है।

निष्कर्ष

OSIRIS-REx मिशन ने बेन्नू को प्रारंभिक सौर मंडल के प्राकृतिक भंडार के रूप में स्थापित किया है, जो इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि कार्बनिक यौगिक अंतरिक्ष में उत्पन्न हुए और बाद में पृथ्वी पर पहुँचे, जिससे ग्रहों तथा जैविक उत्पत्ति के बारे में हमारी समझ में अत्यधिक परिवर्तन आया है।

संदर्भ

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी, जबकि पाँच सह-आरोपियों को जमानत दे दी, जिससे कठोर वैधानिक जमानत मानकों को और अधिक सुदृढ़ता प्राप्त हुई।

  • यह निर्णय सुरक्षा-केंद्रित न्यायशास्त्र की ओर एक प्रतिमान बदलाव को दर्शाता है, जहाँ न्यायालय अनुच्छेद-21 के तहत कार्यकारी आवश्यकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की पवित्रता के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की मुख्य विशेषताएँ

  • आनुपातिकता के सिद्धांत का अनुप्रयोग: ‘बौद्धिक सूत्रधारों‘ और ‘सहायक सूत्रधारों‘ के बीच अंतर करके, न्यायालय ने आनुपातिकता के सिद्धांत को लागू किया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि स्वतंत्रता पर न्यायिक प्रतिबंध की गंभीरता राज्य की अखंडता के लिए कथित खतरे के अनुरूप हो।

  • आरोपियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार: न्यायालय ने माना कि आपराधिक कानून एक ही मामले से संबंधित सभी आरोपियों के लिए समान परिणाम अनिवार्य नहीं करता है; जमानत का निर्णय प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका के आधार पर किया जाना चाहिए।
  • अपराधियों के पदानुक्रम की न्यायिक मान्यता: निर्णय औपचारिक रूप से आरोपियों के बीच दोष के पदानुक्रम को मान्यता देता है, भले ही उन पर समान वैधानिक प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए हों।
    • मुख्य षड्यंत्रकारियों और सहायक सूत्रधारों के बीच अंतर करके, न्यायालय ने पुष्टि की कि समान आरोप समान जमानत परिणामों को अनिवार्य नहीं करते हैं, जिससे कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के तहत भूमिका-आधारित न्यायिक मूल्यांकन को बल मिलता है।
  • गुणात्मक रूप से भिन्न स्थिति: उमर खालिद और शरजील इमाम कथित षड्यंत्र में केंद्रीय और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते पाए गए, जिससे वे अन्य आरोपियों से कानूनी रूप से भिन्न स्थिति में आ जाते हैं।
  • गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम के तहत जमानत की सीमा: केवल लंबी कैद के आधार पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 43D(5) के तहत जमानत नहीं दी जा सकती, जो कड़े वैधानिक प्रतिबंध लगाती है।
  • प्रथम दृष्ट्या मूल्यांकन: जमानत पर विचार करने से पहले न्यायालयों को अपराध की गंभीरता, वैधानिक ढाँचा और अभियोजन पक्ष के मामले के प्रथम दृष्ट्या साक्ष्य मूल्य का आकलन करना होगा।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी विचार: राज्य की संप्रभुता, अखंडता या सुरक्षा को प्रभावित करने वाले अपराधों में, न्यायालयों को जमानत के चरण में अधिक न्यायिक संयम बरतना आवश्यक है।
  • सह-आरोपियों को जमानत: आरोपों की गौण प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, पाँच सह-आरोपियों को कड़ी शर्तों के अधीन जमानत दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

  • वर्ष 2020 के दिल्ली दंगे: फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई, सैकड़ों लोग घायल हुए और सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा।
  • आरोपों का स्वरूप: आरोपियों पर हिंसा भड़काने की एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा होने का आरोप है, जिन पर UAPA और अन्य दंड प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है।
  • मुख्य आरोपी: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र उमर खालिद और कार्यकर्ता शरजील इमाम पर इस साजिश में वैचारिक तथा संगठनात्मक भूमिका निभाने का आरोप है।
  • उच्च न्यायालय की कार्यवाही: दिल्ली उच्च न्यायालय ने सितंबर 2023 में 9 आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी और खालिद और इमाम को हिंसा का ‘बौद्धिक सूत्रधार’ बताया।
  • बचाव पक्ष के तर्क: आरोपियों ने तर्क दिया कि उनके कृत्य भारत के संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत विरोध करने के संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत आते हैं, और लंबे समय तक कारावास बिना मुकदमे के सजा के समान है।

UAPA की धारा 15 के तहत ‘आतंकवादी कृत्य’ की व्याख्या

  • परिभाषा: UAPA की धारा 15 के अनुसार, ‘आतंकवादी कृत्य’ वह कार्य है, जो भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा या संप्रभुता को खतरे में डालने या जनता में आतंक फैलाने के उद्देश्य से किया गया हो।
  • साधनों’ का न्यायिक विस्तार: सर्वोच्च न्यायालय नेकिसी भी प्रकार के अन्य साधनों” वाक्यांश की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि आतंकवाद का निर्धारण केवल इस्तेमाल किए गए साधन से नहीं, बल्कि कृत्य के उद्देश्य और प्रभाव से होता है।
  • गैर-पारंपरिक कृत्य भी आतंकवाद के दायरे में: इस व्याख्या के अनुसार, संगठित व्यवधान या जन लामबंदी जैसे गैर-पारंपरिक तरीके भी आतंकवाद के दायरे में आ सकते हैं, यदि उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पहुँचाने का आरोप हो।

कानूनी ढाँचा और न्यायिक उदाहरण

  • गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA): भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए बनाया गया एक विशेष राष्ट्रीय सुरक्षा कानून।
    • धारा 43D(5) एक सख्त जमानत व्यवस्था निर्धारित करती है, जिसके तहत यदि न्यायालय अभियोजन पक्ष के मामले को प्रथम दृष्टया सत्य पाता है तो जमानत देने से इनकार किया जा सकता है।
  • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC): गिरफ्तारी, जाँच और जमानत के लिए सामान्य प्रक्रियात्मक ढाँचा प्रदान करती है।
    • UAPA जैसे विशेष कानूनों से जुड़े मामलों में, विशेष कानून सामान्य कानून पर हावी होता है।
  • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC): आपराधिक षड्यंत्र, दंगा, गैर-कानूनी सभा और समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने जैसे अपराधों के लिए लागू होती है और अक्सर UAPA के प्रावधानों के साथ पढ़ी जाती है।
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS): भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) का स्थान लेती है। BNS की धारा 113 में अब ‘आतंकवादी कृत्यों’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जो UAPA के अनुरूप संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों को लक्षित करता है।
  • भारत के संविधान के प्रावधान
    • अनुच्छेद-21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार): स्वतंत्रता को केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से ही सीमित किया जा सकता है, जिसमें वैध वैधानिक प्रतिबंध शामिल हैं।
    • अनुच्छेद-19(1)(a) और 19(1)(b): सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
    • न्यायशास्त्र को सुदृढ़ करना: यह निर्णय प्रक्रियात्मक उचित प्रक्रिया से हटकर एक कठोर वैधानिक प्रतिबंध की ओर एक कदम है, जहाँ किसी कृत्य के ‘डिजाइन और इरादे’ की गंभीरता पारंपरिक ‘जमानत ही नियम है’ के मानदंड से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • UAPA के तहत जमानत को नियंत्रित करने वाले न्यायिक उदाहरण
    • राष्ट्रीय जाँच एजेंसी बनाम जहूर अहमद शाह वटाली (2019): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि UAPA के तहत जमानत के चरण में, न्यायालयों को अभियोजन पक्ष के बयान को अक्षरशः स्वीकार करना चाहिए और साक्ष्यों की विस्तृत जाँच नहीं करनी चाहिए।
    • करतार सिंह बनाम पंजाब राज्य (1994): आतंकवाद-विरोधी कठोर कानूनों की वैधता को बरकरार रखते हुए, दुरुपयोग को रोकने के लिए न्यायिक सावधानी की आवश्यकता पर जोर दिया।

    • भारत संघ बनाम के.ए. नजीब (2021): मान्यता दी कि लंबे समय तक कारावास और मुकदमे में देरी असाधारण परिस्थितियों में जमानत को उचित ठहरा सकती है, हालाँकि ऐसी राहत सीमित और मामले-विशिष्ट बनी रहती है।
    • वर्तमान मामले में आवेदन: न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि आपराधिक कानून किसी एक ही लेन-देन से उत्पन्न सभी आरोपियों के लिए समान परिणामों को अनिवार्य नहीं करता; जमानत का निर्धारण प्रत्येक आरोपी की विशिष्ट भूमिका के आधार पर किया जाना चाहिए।

हाल ही में आए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का प्रभाव

  • जमानत संबंधी न्यायशास्त्र पर प्रभाव: गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत कठोर जमानत ढाँचे को सुदृढ़ करता है।
    • स्पष्ट करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में जमानत देने के लिए केवल लंबी कैद ही पर्याप्त नहीं है, जिससे जमानत के चरण में अनुच्छेद-21 के तहत राहत का दायरा सीमित हो जाता है।
  • UAPA मामलों पर पूर्ववर्ती प्रभाव: राष्ट्रीय जाँच एजेंसी बनाम जहूर अहमद शाह वटाली (2019) पर निर्भरता को मजबूत करता है, यह पुनः पुष्टि करता है कि जमानत पर विचार करते समय न्यायालयों को अभियोजन पक्ष के पक्ष को अक्षरशः स्वीकार करना चाहिए।
    • विलंब-आधारित जमानत को अपवाद मानकर, नियम नहीं, भारत संघ बनाम के.ए. नजीब (2021) के व्यापक अनुप्रयोग को सीमित करता है।
  • असहमति और विरोध के अधिकार पर प्रभाव: इस निर्णय से असहमति को अपराधीकरण किए जाने की संभावना को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं, खासकर तब जब भाषण, लामबंदी और वैचारिक अभिव्यक्ति को एक व्यापक साजिश के तत्त्व के रूप में देखा जाता है।
    • UAPA के तहत उच्च जमानत राशि का दायरा छात्र आंदोलनों, नागरिक समाज की सक्रियता और राजनीतिक लामबंदी पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जिससे लोकतांत्रिक विरोध के लिए व्यावहारिक संभावना सीमित हो जाएगी।
    • भयभीत करने वाला प्रभाव’ (Chilling Effect) और वास्तविक उचित प्रक्रिया: जमानत के चरण में अभियोजन पक्ष के बयान को बिना गहन साक्ष्यीय जाँच के सीधे                तौर पर स्वीकार करने का प्रथम दृष्ट्या मानक, वास्तविक उचित प्रक्रिया के लिए गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करता है।
      • दीर्घकालिक रूप से लंबित मुकदमों में ऐसा दृष्टिकोण विचारण-पूर्व हिरासत को वास्तविक दंड में रूपांतरित करने का जोखिम उत्पन्न करता है, जिसके परिणामस्वरूप अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी क्षीण होती है।
  • विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक दायरे का संकुचन: सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि आतंकवाद की परिभाषा में केवल प्रत्यक्ष हिंसक कृत्य ही शामिल होते हैं। न्यायालय ने कहा कि सड़क अवरोधन या “चक्का जाम” जैसे अहिंसक तरीके भी UAPA के प्रावधानों के दायरे में आ सकते हैं, यदि वे किसी कथित व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा हों।
    • यह व्याख्या वैध लोकतांत्रिक विरोध और आपराधिक षड्यंत्र के बीच की रेखा को धुँधला कर देती है, जिससे संवैधानिक रूप से संरक्षित असहमति के भविष्य के स्वरूप को लेकर चिंताएँ बढ़ जाती हैं।
  • मुकदमे और उचित प्रक्रिया पर प्रभाव: इससे मुकदमे से पहले लंबी कैद का खतरा बढ़ जाता है, खासकर जटिल षड्यंत्र के मामलों में जिनमें बड़ी मात्रा में सुबूत और कई गवाह शामिल होते हैं।
    • विशेष सुरक्षा कानूनों के तहत ‘जमानत को नियम’ मानने के बजाय ‘कैद को सामान्य’ मानने पर जोर दिया जाता है।
  • आपराधिक न्याय वितरण में प्रणालीगत विलंब: यह मामला भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यापक प्रणालीगत विलंब का प्रतीक बन गया है, जहाँ मुकदमे से पहले दीर्घावधि कारावास पर न्याय निर्णय का स्थान ले रही है।
    • जटिल UAPA मामलों में, जिनमें कई आरोपी, भारी मात्रा में सुबूत और लंबी जाँच शामिल होती है, प्रक्रिया की अवधि ही दंडात्मक सिद्ध होने का जोखिम रखती है।
  • न्यायिक विवेकाधिकार पर प्रभाव: जमानत के चरण में न्यायिक विवेकाधिकार को सीमित करता है, न्यायसंगत विचारों पर वैधानिक आदेशों को प्राथमिकता देता है।
    • भूमिका-आधारित भेदभाव को प्रोत्साहित करता है, यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्तिगत दोषसिद्धि का मूल्यांकन एक सामान्य दृष्टिकोण अपनाने के बजाय अलग-अलग किया जाए।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा शासन पर प्रभाव: राज्य के आतंकवाद-विरोधी और आंतरिक सुरक्षा ढाँचे के लिए मजबूत न्यायिक समर्थन का संकेत देता है।
    • UAPA के निवारक मूल्य को बढ़ाता है, लेकिन साथ ही दुरुपयोग के खिलाफ संस्थागत सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर भी जोर देता है।

गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के बारे में 

  • अधिनियमन और उद्देश्य: राष्ट्रीय एकता परिषद द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रवाद समिति की सिफारिशों के बाद, 1967 में UAPA पारित किया गया था।
    • इसे भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने वाली गैर-कानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए अधिनियमित किया गया था।
  • संवैधानिक आधार: संविधान (सोलहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1963 ने अनुच्छेद-19(2) में संशोधन किया, जिससे संसद को निम्नलिखित पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति मिली:
    • वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
    • शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार
    • संघ या यूनियन बनाने का अधिकार
  • गैर-कानूनी गतिविधि: इसे भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को भंग करने के उद्देश्य से की गई किसी भी कार्रवाई के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • दायरा: UAPA भारतीय और विदेशी दोनों नागरिकों पर लागू होता है और पूरे भारत में लागू करने योग्य है।
  • आय की जब्ती: धारा 24A के तहत, आतंकवाद से प्राप्त आय को केंद्र या राज्य सरकार द्वारा जब्त किया जा सकता है, चाहे व्यक्ति को दोषी ठहराया गया हो या नहीं।
  • छूट: वे व्यक्ति जो किसी प्रतिबंधित संगठन के आतंकवादी समूह घोषित होने से पहले उसके सदस्य थे और जिन्होंने बाद में उसकी गतिविधियों में भाग नहीं लिया, उन्हें UAPA के प्रावधानों से छूट दी गई है।

UAPA में संशोधन

  • वर्ष 2004 का संशोधन: इस अधिनियम के तहतआतंकवादी कृत्य’ शब्द को शामिल किया गया और आतंकवादी गतिविधियों में शामिल संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति दी गई।
    • इसके परिणामस्वरूप, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद सहित 34 संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
  • वर्ष 2019 का संशोधन: केंद्र सरकार को विशिष्ट मानदंडों के आधार पर व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने का अधिकार दिया गया।
    • राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के महानिदेशक को संचालित जाँचों से संबंधित संपत्ति की जब्ती या कुर्की को मंजूरी देने का अधिकार दिया गया।
    • NIA में इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारियों को आतंकवाद से संबंधित मामलों की जाँच करने की अनुमति दी गई।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का आलोचनात्मक विश्लेषण

निर्णय के समर्थन में तर्क निर्णय के विरोध में तर्क
राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा: निर्णय में भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है।

  • निर्णय में यह स्वीकार किया गया है कि गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत अपराधों के लिए सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में जमानत की उच्च सीमा की आवश्यकता होती है।
बिना मुकदमे के लंबे समय तक कारावास: कई वर्षों तक निरंतर हिरासत में रखना अनुच्छेद-21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की भावना का उल्लंघन करने का जोखिम पैदा करता है।

  • यह प्रभावी रूप से दोष सिद्ध हुए बिना दंड देने के समान है।
विधायी आशय का सम्मान: UAPA की धारा 43D(5) को सख्ती से लागू करते हुए, न्यायालय ने आतंकवाद और षड्यंत्र से संबंधित अपराधों में जमानत पर वैधानिक प्रतिबंध लगाने के संसद के आशय को बरकरार रखा। जमानत को नियम’ मानने के सिद्धांत का क्षरण: यह निर्णय आपराधिक कानून के उस दीर्घकालिक सिद्धांत को और कमजोर करता है, जिसके अनुसार जमानत ही नियम है, न कि कारावास, विशेषकर विचाराधीन कैदियों के मामले में।
भूमिका-आधारित न्यायिक मूल्यांकन: यह निर्णय व्यक्तिगत दोषसिद्धि को सुदृढ़ करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि केंद्रीय और महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आरोपियों के साथ सहायक संलिप्तता वाले आरोपियों से अलग व्यवहार किया जाए।

  • यह षड्यंत्र के अभियोगों की विश्वसनीयता को मजबूत करता है।
जमानत के चरण में साक्ष्य की कम आवश्यकता: UAPA के तहत प्रथम दृष्टया मानक पर निर्भरता साक्ष्यों की गहन जाँच के बिना जमानत से इनकार करने की अनुमति देती है।

  • इससे अभिव्यक्ति और संगठन के अत्यधिक अपराधीकरण की चिंताएँ बढ़ रही हैं।
न्यायिक उदाहरणों के अनुरूपता: यह निर्णय राष्ट्रीय जाँच एजेंसी बनाम जहूर अहमद शाह वटाली (2019) मामले के अनुरूप है।

  • यह UAPA के तहत जमानत संबंधी न्यायशास्त्र में सैद्धांतिक संगति को बनाए रखता है।
असहमति पर भयावह प्रभाव: इस निर्णय से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, छात्र सक्रियता और राजनीतिक अभिव्यक्ति हतोत्साहित हो सकती है।

  • यह संवैधानिक असहमति और आपराधिक साजिश के बीच अंतर को कम कर रहा है।
संगठित हिंसा के विरुद्ध निवारण: सख्त जमानत नीति संगठित और विचारधारा से प्रेरित हिंसा को रोकने में सहायक हो सकती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि योजना बनाने और उकसाने को शारीरिक भागीदारी के समान ही गंभीरता से लिया जाता है। कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने का खतरा: जमानत के चरण में अभियोजन पक्ष को अत्यधिक महत्त्व देने से त्वरित न्याय की बजाय लंबे समय तक हिरासत में रखने के लिए आतंकवाद-विरोधी कानूनों के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से उत्पन्न चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • मुकदमे से पहले दीर्घकालिक कारावास: UAPA के तहत, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपी मुकदमे की समाप्ति से पहले वर्षों तक हिरासत में रह सकते हैं।
    • इससे अनुच्छेद-21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के उल्लंघन और दोष सिद्ध हुए बिना सजा सुनाए जाने पर चिंताएँ बढ़ जाती हैं।
  • विरोध और असहमति पर नकारात्मक प्रभाव: कथित साजिशों के लिए उच्च जमानत राशि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों, सक्रियता और छात्र आंदोलनों को हतोत्साहित कर सकती है।
    • इससे अभिव्यक्ति और सभा के अधिकार का अपराधीकरण होने का जोखिम है, जिससे अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
  • जमानत के चरण में न्यायिक विवेकाधिकार की सीमा
    • UAPA के सख्त वैधानिक प्रावधान न्यायालय के न्यायसंगत विवेकाधिकार को सीमित करते हैं, और व्यक्तिगत परिस्थितियों पर वैधानिक आदेशों को प्राथमिकता देते हैं।
    • इससे न्याय व्यवस्था में कठोरता और लचीलेपन में कमी आ सकती है।
    • आतंकवादी कृत्य’ का निर्धारण: यह निर्णय जमानत के चरण में किसी कृत्य को आतंकवाद की श्रेणी में रखने के निर्धारण में अभियोजन पक्ष और न्यायपालिका की प्रधानता को सुदृढ़ करता है।
      • प्रथम दृष्ट्या साक्ष्य के आधार पर सीमित साक्ष्य जाँच से किसी आचरण को प्रारंभिक चरण में ही आतंकवादी कृत्य के रूप में वर्गीकृत करने पर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं, विशेष रूप से राजनीतिक विरोध या जन लामबंदी से जुड़े मामलों में।
  • आतंकवाद-विरोधी कानूनों के दुरुपयोग का खतरा: प्रारंभिक चरण में अभियोजन पक्ष के पक्ष को अत्यधिक महत्त्व देने से विशेषकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील या विवादास्पद मामलों में लंबी हिरासत हो सकती है।
  • मुकदमे में देरी और न्याय व्यवस्था पर अत्यधिक बोझ: कई आरोपियों, भारी मात्रा में साक्ष्यों और असंख्य गवाहों वाले जटिल मामलों में वर्षों तक मुकदमे चल सकते हैं, जिससे त्वरित न्याय की चुनौतियाँ और बढ़ जाती हैं।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन: संवैधानिक अधिकारों से समझौता किए बिना संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करना एक निरंतर चुनौती बनी हुई है।
    • न्यायालयों को सुरक्षा संबंधी अनिवार्यताओं और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना पड़ता है।

आगे की राह

  • समयबद्ध मुकदमे: UAPA मामलों में अक्सर कई आरोपी, भारी मात्रा में सुबूत और जटिल जाँच शामिल होती हैं।
    • त्वरित या समयबद्ध सुनवाई से मुकदमे से पहले दीर्घकालिक कारावास को रोका जा सकता है और त्वरित न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है, जिससे अनुच्छेद-21 के अधिकारों की रक्षा होती है।
    • विलंब के लिए एक ‘गणितीय सीमा’ निर्धारित करना: ‘प्रक्रिया को ही दंड बनने से रोकने’ के लिए, न्यायपालिका को एक स्पष्ट समयबद्ध सीमा निर्धारित करनी होगी।
    • यदि कोई मुकदमा उचित समय सीमा (उदाहरण के लिए, 2 वर्ष) के भीतर शुरू नहीं होता है, तो त्वरित सुनवाई का संवैधानिक अधिकार अंततः UAPA के वैधानिक प्रतिबंधों से ऊपर होना चाहिए।
  • जमानत के लिए स्पष्ट न्यायिक दिशा-निर्देश: न्यायालय को राष्ट्रीय सुरक्षा और षड्यंत्र के मामलों में जमानत के आकलन के लिए मानकीकृत मानदंड विकसित करने चाहिए, जिसमें वैधानिक संयम और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।
    • भूमिका-आधारित भेदभाव जारी रहना चाहिए, लेकिन जहाँ उपयुक्त हो, वहाँ उचित शर्तों के साथ सशर्त जमानत की सुविधा भी प्रदान की जानी चाहिए।
  • विधायी निगरानी और सुरक्षा उपाय: संसद को राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों को बनाए रखते हुए दुरुपयोग को रोकने के लिए समय-समय पर UAPA प्रावधानों की समीक्षा करनी चाहिए।
    • लंबे समय तक हिरासत में रखे जाने की अंतरिम न्यायिक समीक्षा के लिए तंत्र शुरू करने से नियंत्रण और संतुलन मजबूत हो सकते हैं।
  • लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की रक्षा: यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि शांतिपूर्ण विरोध, असहमति और छात्र सक्रियता को षड्यंत्र या उकसावे की व्यापक व्याख्याओं के तहत असावधानीपूर्वक अपराध माना जाए।।
    • संवैधानिक स्वतंत्रता के संबंध में कानून प्रवर्तन एजेंसियों और न्यायपालिका को संवेदनशील बनाने से अतिचार को रोका जा सकता है।
  • परीक्षण अवसंरचना को मजबूत करना: जटिल जाँचों में तेजी लाने के लिए डिजिटल केस प्रबंधन, गवाह सुरक्षा और फोरेंसिक क्षमताओं में निवेश करना।
    • इससे मुकदमे से पहले की हिरासत को लंबा खींचने वाली देरी कम होती है और न्याय की गुणवत्ता में सुधार होता है।
  • सुरक्षा और स्वतंत्रता के लिए संतुलित दृष्टिकोण: नागरिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और विधि के शासन की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने के लिए एक सूक्ष्म दृष्टिकोण आवश्यक है।
    • यह न्यायिक नवाचार और कानून के आनुपातिक अनुप्रयोग को प्रोत्साहित करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि कानून अपवादिक ही रहें।

निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर देता है, साथ ही लोकतांत्रिक ढाँचे में लंबे समय तक हिरासत, सीमित न्यायिक विवेक और शांतिपूर्ण असहमति के संरक्षण की चुनौतियों को उजागर करते हुए UAPA के तहत जमानत प्रतिबंधों को मजबूत करता है।

  • अंततः एक जीवंत लोकतंत्र का अस्तित्व न्यायपालिका की आलोचक और षड्यंत्रकारी के बीच अंतर करने की क्षमता पर निर्भर करता है। UAPA को गणतंत्र के लिए एक ढाल बने रहना चाहिए, न कि वैध लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के लिए एक बंधन।

अभ्यास प्रश्न  राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया UAPA जमानत संबंधी न्यायशास्त्र के प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।

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