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Jan 08 2026

एमपेंबा प्रभाव (Mpemba Effect)

 

भारतीय वैज्ञानिकों ने एमपेंबा प्रभाव (Mpemba Effect) के लंबे समय से संचालित विरोधाभास को समझने के लिए पहली बार सुपरकंप्यूटर आधारित सिमुलेशन विकसित किया है।

एमपेंबा प्रभाव के बारे में

  • एमपेंबा प्रभाव वह प्रतिकूल-बुद्धिगम्य (Counterintuitive) घटना है, जिसमें कुछ परिस्थितियों में गर्म जल, ठंडे जल की तुलना में अधिक तेजी से जम जाता है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इसका नाम तंजानिया के छात्र एरास्टो एमपेंबा के नाम पर रखा गया, जिन्होंने वर्ष 1963 में इस प्रभाव की रिपोर्ट की थी।
    • हालाँकि नाम हालिया घटना से संबंधित है, लेकिन इस घटना का उल्लेख अरस्तू ने किया था, और बाद में फ्राँसिस बेकन तथा रेने डेसकार्टेस ने भी किया।
  • प्रस्तावित वैज्ञानिक व्याख्याएँ: संभावित कारणों में वाष्पीकरण से द्रव्यमान में कमी, संवहन धाराएँ, गैसें, और सुपरकूलिंग में अंतर शामिल हैं, कोई एक व्याख्या सभी मामलों पर लागू नहीं होती।
  • परिस्थितियाँ: यह प्रभाव पात्र (कंटेनर) के आकार, परिवेश, प्रारंभिक तापमान, जल की शुद्धता और फ्रीजर की स्थितियों जैसे कारकों पर निर्भर करता है।

एमपेंबा प्रभाव के अनुप्रयोग

  • खाद्य प्रसंस्करण में फास्ट फ्रीजिंग: ‘फास्ट फ्रीजिंग’ की तकनीकों में सहायक, जिससे बर्फ के क्रिस्टल का आकार कम होता है और भोजन की बनावट, स्वाद और पोषण गुणवत्ता संरक्षित रहती है।
  • क्रायोप्रिजर्वेशन एवं सामग्री विज्ञान: तरल पदार्थों के नियंत्रित ठोसकरण में सहायक, जो जैविक नमूनों के संरक्षण और सामग्रियों में अवस्था परिवर्तन के अध्ययन में उपयोगी है।
  • बेहतर शीतलन एवं प्रशीतन प्रणालियाँ: इस प्रभाव की समझ शीतलन चक्रों के अनुकूलन में मदद कर सकती है, जिससे औद्योगिक प्रशीतन में ऊर्जा दक्षता बढ़ सकती है।
  • जलवायु एवं पर्यावरणीय अध्ययन: प्राकृतिक प्रणालियों में बर्फ निर्माण की प्रक्रियाओं—जैसे बादल संबंधी भौतिकी, झीलों का जमना और ध्रुवीय जलवायु प्रक्रियाएँ—के बारे में संकेत प्रदान करता है।
  • वैज्ञानिक मॉडलिंग एवं शिक्षा: ऊष्मागतिकीय मॉडलों के परीक्षण के लिए एक मानक घटना के रूप में उपयोग किया जाता है और भौतिकी शिक्षा में आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा देता है।

ग्रीनलैंड (Greenland)

हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति ने कहा कि सुरक्षा उद्देश्यों के लिए अमेरिका को ग्रीनलैंड की आवश्यकता है, जिस पर डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने कड़ा विरोध जताया।

ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • रणनीतिक अवस्थिति: उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच ग्रीनलैंड की स्थिति इसे आर्कटिक सुरक्षा संरचना में एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बनाती है, जिसमें अमेरिका की बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के प्रमुख तत्त्व स्थित हैं।
  • संसाधन एवं भू-राजनीतिक महत्त्व: इस द्वीप में दुर्लभ मृदा तत्त्वों और खनिजों के महत्त्वपूर्ण भंडार हैं, जो चीन पर निर्भरता कम करने के अमेरिकी प्रयासों के अनुरूप हैं और बढ़ती आर्कटिक भू-राजनीति तथा महाशक्ति प्रतिस्पर्द्धा के बीच इसके महत्त्व को बढ़ाते हैं।

ग्रीनलैंड

  • यह विश्व का सबसे बड़ा द्वीप है, जो उत्तरी अटलांटिक महासागर में स्थित है।
    • ग्रीनलैंड के लोग अपने देश को कालालित नुनाअत (Kalaallit Nunaat) कहते हैं (ग्रीनलैंडवासियों का देश)।
  • राजधानी: नूक (Nuuk)
  • सर्वोच्च बिंदु: गुनब्योर्न्स फ्येल्ड (Gunnbjorn’s Fjeld)
  • स्थिति: यह कनाडा के उत्तर-पूर्वी तट के पास उत्तरी अटलांटिक महासागर में स्थित है।
  • इसके उत्तर में आर्कटिक महासागर, पश्चिम में स्मिथ साउंड, बैफिन बे और डेविस जलडमरूमध्य, तथा पूर्व में आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक महासागर हैं।
    • यह विश्व का सबसे बड़ा (गैर-महाद्वीपीय) द्वीप है।
    • इसके समुद्री सीमाएँ कनाडा, आइसलैंड और नॉर्वे से मिलती हैं।
    • यह पृथ्वी के उत्तरी और पश्चिमी दोनों गोलार्द्धों में स्थित है।
  • भौतिक विशेषताएँ: यह अपने विशाल टुंड्रा और अत्यंत विशाल हिमनदों के लिए जाना जाता है।
    • सबसे बड़े हिमनदों में से एकपेटरमैन’ है।
    • ग्रीनलैंड की प्रमुख भौतिक विशेषता इसकी विशाल आइस शीट’ है, जो आकार में अंटार्कटिका के बाद दूसरी सबसे बड़ी है और ग्रीनलैंड के कुल भूमि क्षेत्र के हिस्से से अधिक को ढकती है।
    • ग्रीनलैंड में 25 मई से 25 जुलाई तक सूर्य अस्त नहीं होता और जुलाई एकमात्र महीना है, जब तापमान हिमांक से ऊपर पहुँचता है।
  • ग्रीनलैंड सागर: यह आर्कटिक महासागर का एक बाह्य भाग है, जो मुख्य आर्कटिक बेसिन के दक्षिण में स्थित है और ग्रीनलैंड (पश्चिम), स्वालबार्ड (पूर्व), मुख्य आर्कटिक महासागर (उत्तर) तथा नॉर्वेजियन सागर और आइसलैंड (दक्षिण) से घिरा है।
  • राष्ट्रीय उद्यान: नॉर्थईस्ट ग्रीनलैंड नेशनल पार्क विश्व का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है।
  • ग्रीनलैंड का प्रशासन: ग्रीनलैंड डेनमार्क साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वायत्त क्षेत्र है (डेनमार्क और फरो आइलैंड्स के साथ)।
    • इसकी प्रशासनिक संरचना वर्ष 2009 के स्व-शासन अधिनियम द्वारा परिभाषित है, जिसने द्वीप को होम रूल” से अधिक स्वतंत्र “स्व-शासित” स्थिति में परिवर्तित किया।
    • इसका अपना स्व-शासन और अपनी संसद (इनात्सिसार्तुत) है।

डब्ल्यू उर्से मेजोरिस तारे (W Ursae Majoris Stars)

डब्ल्यू उर्से मेजोरिस (W Ursae Majoris Stars) प्रकार के संपर्क द्वितारा प्रणालियों, जिन्हें तारकीय जुड़वाँ” कहा जाता है, पर किया गया एक नया अध्ययन द्वितारा प्रणालियों के विकास को समझने में महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान कर रहा है।

डब्ल्यू उर्से मेजोरिस’ तारों के बारे में

  • अत्यधिक निकटता: ‘डब्ल्यू यूमा’ तारे संपर्क द्वितारे होते हैं, दो तारे इतने पास होते हैं कि वे एक-दूसरे की परिक्रमा करते हुए भौतिक रूप से संपर्क में रहते हैं।
  • आकार और वायुमंडल: वे एक साझा बाहरी वायुमंडल साझा करते हैं, जिससे ‘मूँगफली या डंबल’ जैसा आकार बनता है।
  • तारकीय प्रयोगशालाएँ: इनकी निकट अंतःक्रिया से खगोलविद द्रव्यमान, त्रिज्या और तापमान जैसे मौलिक तारकीय मानकों की अत्यधिक सटीकता से गणना कर सकते हैं।
    • इससे ये तारकीय विकास मॉडलों के परीक्षण और तारों की आयु को समझने के लिए आदर्श स्थिति प्रस्तुत करते हैं।
  • द्रव्यमान स्थानांतरण एवं कक्षीय परिवर्तन: दोनों तारों के  बीच पदार्थ (द्रव्यमान) का प्रवाह होता है, जो उनके विकास को बदल देता है।
    • उनकी कक्षाएँ, अवधि में परिवर्तन और गुरुत्वीय अंतःक्रिया तथा द्रव्यमान विनिमय के कारण हल्के बदलाव दर्शाती हैं।
  • प्रबल चुंबकीय गतिविधि एवं ‘स्टार स्पॉट’: ये तारे तीव्र चुंबकीय गतिविधि प्रदर्शित करते हैं, जिससे गहरे तारा धब्बे (सनस्पॉट्स की तरह) बनते हैं।

द्वितारा प्रणालियों के बारे में

  • परिभाषा: द्वितारा प्रणाली दो तारों से बनी होती है, जो गुरुत्वाकर्षण से बँधे होते हैं और एक साझा द्रव्यमान केंद्र के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।
  • द्वितारा और बहु-तारा प्रणालियाँ अत्यंत सामान्य हैं; ये हमारी आकाशगंगा में प्रमुख विन्यास हैं और हमारे सूर्य जैसे एकल तारों से अधिक संख्या में पाई जाती हैं।

वैश्विक न्यूनतम कर (Global Minimum Tax)

OECD/G20 समावेशी ढाँचे ने आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण’ या बेस इरोजन एंड प्रॉफिट शिफ्टिंग (BEPS) पर वैश्विक न्यूनतम कर नियमों के समन्वित कार्यान्वयन के लिए समीपस्थ या साइड-बाय-साइड अरेंजमेंट/व्यवस्था पर सहमति व्यक्त की।

वैश्विक न्यूनतम कर के बारे में

  • ग्लोबल एंटी-बेस इरोजन (GloBE) मॉडल नियमों पर आधारित वैश्विक न्यूनतम कर यह सुनिश्चित करता है कि बड़े बहुराष्ट्रीय उद्यमों द्वारा अपने संचालन के प्रत्येक क्षेत्राधिकार में न्यूनतम कर का भुगतान किया जाए।
  • प्रमुख बिंदु
    • BEPS, पिलर टू (BEPS Pillar Two) के अंतर्गत 15% न्यूनतम प्रभावी कॉरपोरेट कर दर निर्धारित करता है।
    • इसका उद्देश्य ब्याज, रॉयल्टी तथा समान कटौती योग्य भुगतानों के माध्यम से न्यूनतम-कर या शून्य-कर क्षेत्राधिकारों में लाभ स्थानांतरण को लक्षित करता है।
    • सीमा-पार संचालन (Cross-Border Operations) वाले बड़े बहुराष्ट्रीय उद्यम (MNE) समूहों पर लागू होता है।
    • अनुपालन भार को कम करने के लिए सरलीकरण उपाय और सुरक्षित आश्रय/सेफ हार्बर (Safe Harbours) शामिल करता है।
  • अपवाद: समीपस्थ या साइड-बाय-साइड अरेंजमेंट/व्यवस्था के अंतर्गत अमेरिका-आधारित बहुराष्ट्रीय निगमों को 15% वैश्विक न्यूनतम कर से प्रभावी रूप से छूट प्रदान की गई है।
    • अमेरिका ने अपने घरेलू न्यूनतम कॉरपोरेट कर (15%) और विदेशी लाभों पर 12.6–14% की दर से कर लगाने वाली अपनी अंतरराष्ट्रीय कर व्यवस्था का हवाला देते हुए छूट के लिए तर्क दिया।
    • अन्य देशों को अमेरिकी बहुराष्ट्रीय उद्यमों (MNEs) के न्यूनतम-कर आरोपित किए गए विदेशी लाभों पर टॉप-अप टैक्स/कर लगाने से प्रतिबंधित किया गया है।

वैश्विक न्यूनतम कर का महत्त्व

  • सरलीकृत और पूर्वानुमेय कर व्यवस्था: सरलीकरण उपायों और सुरक्षित आश्रय/सेफ हार्बर (Safe Harbours) की शुरुआत करता है, जिससे बहुराष्ट्रीय उद्यमों के लिए अनुपालन भार और कर प्राधिकरणों के लिए प्रशासनिक जटिलता कम होती है।
  • निष्पक्ष व्यवहार और समान अवसर: साक्ष्य-आधारित स्टॉकटेक तंत्र और समावेशी ढाँचे के सदस्यों के बीच समन्वित कर प्रोत्साहनों के माध्यम से समान अनुप्रयोग सुनिश्चित करता है।
  • राष्ट्रीय कर आधारों का संरक्षण: योग्य घरेलू न्यूनतम टॉप-अप करों को मजबूत करता है, जिससे देशों, विशेषकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं—को आधार क्षरण या बेस इरोजन (Base Erosion) से होने वाले राजस्व क्षति से सुरक्षा मिलती है।
  • हानिकारक कर प्रतिस्पर्द्धा पर अंकुश: कॉरपोरेट कर दरों के लिए वैश्विक न्यूनतम स्तर निर्धारित करता है, लाभ स्थानांतरण को सीमित करता है और कराधान को वास्तविक आर्थिक गतिविधि के अनुरूप करता है।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD)

  • आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) एक अंतर-सरकारी निकाय है, जो आर्थिक सहयोग और वैश्विक नीति मानकों को बढ़ावा देता है।
  • BEPS में नेतृत्व भूमिका: बहुराष्ट्रीय कर अपवंचन को रोकने के लिए OECD/G20 समावेशी ढाँचे का नेतृत्व करता है।
  • OECD की आधिकारिक स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी। यह ‘यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन’ या ‘ऑर्गनाइजेशन फॉर यूरोपियन इकोनॉमिक को-ऑपरेशन’ (OEEC) जिसकी स्थापना वर्ष  1948 में हुई, का उत्तरवर्ती है एवं इसका मुख्यालय पेरिस, फ्राँस में स्थित है।
  • सदस्यता: भारत सहित 147 देश और क्षेत्राधिकार।
  • टू पिलर सॉल्यूशन (Two-Pillar Solution)
    • पिलर वन कराधान अधिकारों का पुनर्वितरण करता है।
    • पिलर टू वैश्विक न्यूनतम कर को लागू करता है।

आधार क्षरण और लाभ स्थानांतरण’ या ‘बेस इरोजन एंड प्रॉफिट शिफ्टिंग’ (BEPS) से तात्पर्य उन कर बचत रणनीतियों से है, जिनका उपयोग  बहुराष्ट्रीय उद्यमों (MNEs) द्वारा किया जाता हैं, ताकि वे लाभ को उच्च-कर वाले देशों से न्यूनतम कर या शून्य-कर वाले क्षेत्राधिकारों में स्थानांतरित कर सकें, इस प्रकार उन देशों के कर आधार का क्षरण करते  हैं, जहाँ वास्तविक आर्थिक गतिविधि होती है।

भारत की पहली अर्बन नाइट सफारी: कुकरैल वन क्षेत्र 

उत्तर प्रदेश, लखनऊ के कुकरैल वन क्षेत्र (Kukrail Forest Area) में भारत की पहली अर्बन नाइट सफारी की घोषणा की गई है, जिसमें शहर की सीमा के अंदर वन्यजीव संरक्षण, इको-टूरिज्म और रात में वन्यजीवों को देखने की सुविधा को एकीकृत किया गया है।

भारत की प्रथम अर्बन नाइट सफारी

  • परिचय: भारत का पहला शहरी नाइट सफारी लखनऊ, उत्तर प्रदेश के कुकरैल वन क्षेत्र में विकसित की जा रही है, जिसका प्रेरणा स्रोत सिंगापुर नाइट सफारी है और इसे भारतीय पारिस्थितिकी स्थितियों के अनुसार अनुकूलित किया गया है।
  • नोडल संस्था: उत्तर प्रदेश इको-टूरिज्म बोर्ड।
  • मुख्य विशेषताएंँ
    • रात्रिकालीन वन्यजीव दर्शन: अंधेरा होने के बाद पशु व्यवहार का अवलोकन करने के लिए निर्धारित मार्गों पर ही संरचित शाम की सफारी।
    • न्यूनतम-प्रभाव वाला बुनियादी ढाँचा: वन्यजीवों को अधिक परेशानी न हो इसके लिए नियंत्रित प्रकाश व्यवस्था, सीमित पहुँच और इको-फ्रेंडली डिजाइन।
    • संरक्षण केंद्रों का उन्नयन: मगरमच्छ, घड़ियाल और कछुआ पुनर्वास सुविधाओं का आधुनिकीकरण।
    • पर्यटक सुविधाएँ: प्रकृति मार्ग, बाँस के झोपड़े, बच्चों के लिए पार्क, ओपन जिम और व्याख्यान केंद्र या इंटरप्रिटेशन सेंटर्स।
  • महत्त्व
    • शहरी संरक्षण मॉडल: वन्यजीव संरक्षण और शहर आधारित मनोरंजन के सह-अस्तित्व को दर्शाता है।
    • पर्यावरण जागरूकता: परिवारों और छात्रों के लिए रात्रिकालीन पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देता है।
    • आर्थिक लाभ: स्थानीय रोजगार के अवसर उत्पन्न करता है तथा लखनऊ को एक नए इको-टूरिज्म हब के रूप में स्थापित करता है।

कुकरेल वन क्षेत्र के बारे में

  • कुकरेल वन क्षेत्र लखनऊ के बाह्य इलाके में एक इकोलॉजिकली महत्त्वपूर्ण ग्रीन बफर जोन के रूप में है, जहाँ वन्यजीव संरक्षण की सुविधाएँ विद्यमान हैं।
  • अवस्थिति: यह लखनऊ के उत्तरी भाग में कुकरैल नदी के किनारे स्थित है, जो शहर को एक प्राकृतिक इकोलॉजिकल सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
  • मुख्य विशेषताएंँ
    • मौजूदा मगरमच्छ, घड़ियाल और कछुआ संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र।
    • नियंत्रित इको-टूरिज्म गतिविधियों के लिए उपयुक्त वनों से आच्छादित  नदी तटीय पारिस्थितिकी तंत्र।
    • मानव गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए निर्धारित प्रकृति मार्ग और संरक्षित क्षेत्र।
  • वनस्पति: नदी तटीय वनस्पति, बाँस की प्रजातियाँ और स्थानीय वृक्षों की प्रचुर संख्या हैं, जो शहरी जैव विविधता को समृद्ध करते हैं।
  • जीवजंतु: मगरमच्छ और घड़ियाल जैसे सरीसृप, मीठे जल  के कछुए, पक्षी तथा अन्य छोटे वन एवं दलदली प्रजातियों का आवास-स्थल।
    • घड़ियाल (Gavialis gangeticus) आईयूसीएन की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में शामिल है, इसका मुख्य कारण आवास क्षति, नदियों का रूपांतरण और मत्स्यपालन संबंधित गतिविधयाँ हैं।
    • मगरमच्छ (मगर/क्रोकोडायलस पैलस्ट्रिस) आईयूसीएन रेड लिस्ट की सुभेद्य  (Vulnerable) श्रेणी में शामिल है, जिसे मुख्यतः रूप से आवास में गिरावट और मानव–मगरमच्छ संघर्ष का खतरा है।

कुकरेल शहरी नाइट सफारी, शहरी वन्यजीव पर्यटन (Urban Wildlife Tourism) का एक नवोन्मेषी, सतत मॉडल प्रस्तुत करती है, जो महानगरीय परिवेश में संरक्षण, शिक्षा और मनोरंजन का संयोजन करती है।

वुल्फ सुपरमून (Wolf Supermoon)

जनवरी 2026 का वुल्फ सुपरमून (Wolf Supermoon) 2 जनवरी को अपने अधिकतम प्रकाशीय बिंदु पर पहुँचा, जिसने पूर्ण चंद्रमाओं के संयुक्त सांस्कृतिक और खगोलीय महत्त्व की ओर ध्यान आकर्षित किया।

वुल्फ सुपरमून (Wolf Supermoon)

  • वुल्फ सुपरमून एक प्रचलित शब्द है, जो जनवरी के पहले पूर्ण चंद्रमा का वर्णन करता है, जब चंद्रमा पृथ्वी के अपने निकटतम बिंदु के पास होता है।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: यह नाम सर्दियों के दौरान भेड़ियों की आवाजें अधिक सुनाई देने से जुड़ी कहानियों से संबंधित है, हालाँकि इसका कोई विशेष खगोलीय प्रभाव नहीं होता।
  • चंद्रमा की कक्षीय स्थिति: चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा में घूमता है, जिससे वह पेरिजी’ के पास औरएपोजी’ से  दूर होता है।
    • जब कोई पूर्ण चंद्रमा ‘पेरिजी’ के समय या उसके पास होता है, तो उसे सुपरमून कहा जाता है, जिससे वह थोड़ा बड़ा और अधिक चमकीला दिखाई देता है।
  • चमक और आकार: वुल्फ सुपरमून के दौरान, चंद्रमा औसत पूर्ण आकार की तुलना में थोड़ा बड़ा और अधिक चमकीला दिखाई देता है, हालाँकि यह अंतर सूक्ष्म होता है।
  • मून इल्यूजन’ (Moon Illusion): क्षितिज के पास चंद्रमा मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण कहीं अधिक बड़ा प्रतीत हो सकता है, जिसे मून इल्यूजन’ कहा जाता है, न कि वास्तविक आकार में परिवर्तन के कारण।

अन्य प्रकार के चंद्रमा

  • ब्लू मून: ‘ब्लू मून’ उस स्थिति को संदर्भित करता है, जब एक ही कैलेंडर महीने में दूसरा पूर्ण चंद्रमा होता है या, कम प्रचलित रूप में, किसी ऋतु में चार पूर्ण चंद्रमा होने पर तीसरा पूर्ण चंद्रमा होता है।
  • ब्लैक मून: ब्लैक मून एक कैलेंडर महीने में दूसरी अमावस्या होती है, जिसके दौरान चंद्रमा का पृथ्वी की ओर वाला भाग पूरी तरह अंधकारमय और अदृश्य रहता है।
  • ब्लड मून: ब्लड मून पूर्ण चंद्रग्रहण के दौरान होता है, जब पृथ्वी का वायुमंडल सूर्य के प्रकाश को प्रकीर्णित करता है, जिससे ग्रहण द्वारा प्रभावित चंद्रमा लाल या लाल-भूरे रंग का दिखाई देता है।

सूर्यास्त्र मल्टी-कैलिबर रॉकेट लॉन्चर प्रणाली

हाल ही में भारतीय सेना ने स्वदेशी सूर्यास्त्र लंबी दूरी की रॉकेट लॉन्चर प्रणाली को शामिल करने के लिए NIBE लिमिटेड के साथ ₹293 करोड़ का आपातकालीन खरीद अनुबंध हस्ताक्षरित किया।

सूर्यास्त्र मल्टी-कैलिबर रॉकेट लॉन्चर प्रणाली

  • सूर्यास्त्र भारत की पहली स्वदेशी सार्वभौमिक मल्टी-कैलिबर लंबी दूरी की रॉकेट लॉन्चर प्रणाली है, जिसे 300 किमी. तक की सटीक सतह-से-सतह मारक क्षमता के लिए डिजाइन किया गया है।
  • निर्माता: नेशनल इंडस्ट्रियल एंड बिजनेस एंटरप्राइजेज (NIBE) लिमिटेड
  • प्रौद्योगिकी भागीदार: एल्बिट सिस्टम्स (इजरायल)।
  • प्रौद्योगिकी आधार: प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते (जुलाई 2025) के तहत इजरायल के PULS से अनुकूलित।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • विस्तारित प्रहार सीमा: 150 किमी. और 300 किमी. तक के लक्ष्यों को भेदने में सक्षम, जिससे सामरिक ‘डीप-स्ट्राइक’ अभियानों को बल मिलता है।
    • सार्वभौमिक लॉन्चर क्षमता: एक ही प्लेटफॉर्म से कई रॉकेट कैलिबर (122 मिमी., 160 मिमी., 306 मिमी.) और संगत सामरिक मिसाइलों को दाग सकता है।
    • उच्च सटीकता: 5 मीटर से कम के सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) का प्रदर्शन, जिससे सटीक और लक्षित प्रहार संभव होता है।
    • संचालनात्मक लचीलापन: विभिन्न दूरी पर बहु-लक्ष्य संलग्नता का समर्थन करता है, और 4×4, 6×6 तथा 8×8 व्हीलर चेसिस पर तैनात किया जा सकता है।
  • महत्त्व
    • वर्धित प्रतिरोधक क्षमता: लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता के माध्यम से प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध भारत की पारंपरिक प्रहार क्षमता को सुदृढ़ करता है।
    • बल गुणक: सीमा और सटीकता दोनों में मौजूदा पिनाका प्रणालियों की तुलना में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है।
    • आत्मनिर्भर भारत: आयातित लंबी दूरी की तोपखाना प्रणालियों पर निर्भरता कम करता है और स्वदेशी रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देता है।

सूर्यास्त्र भारत की रॉकेट तोपखाना क्षमताओं में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, जो सटीकता, सीमा और लचीलापन को एक साथ जोड़ते हुए भारतीय सेना के प्रहार और संयुक्त अग्नि-शक्ति अभियानों को सशक्त बनाता है।

संदर्भ

जर्नल साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन ने आणविक जीवविज्ञान में एक बड़ी सफलता प्राप्त की है, जिसमें कुछ आर्किया (Archaea) में पहले से निहित एक अज्ञात आनुवंशिक कोड की उपस्थिति को प्रदर्शित किया गया है।

आर्किया (Archaea) क्या हैं?

  • परिभाषा: आर्किया एक-कोशिकीय सूक्ष्मजीव होते हैं, जो अपने आकार और आकृति में बैक्टीरिया के समान होते हैं।
  • आर्किया प्रायः चरम पर्यावरणीय परिस्थितियों में पाए जाते हैं, इसी कारण इनमें से कई कोएक्स्ट्रीमोफाइल्स’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
    • कुछ प्रजातियाँ मध्यम वातावरणों में भी निवास करती हैं, जिनमें मानव आँत्र भी शामिल है।
      • उदाहरण के लिए- इनके पर्यावरण में अत्यंत निम्न तापमान वाली अंटार्कटिक झीलें तथा मानव पाचन तंत्र जैसे मानव आँत्र शामिल हैं।
  • महत्त्व: अत्यधिक भौतिक और रासायनिक परिस्थितियों में जीवित रहने की इनकी क्षमता, आर्किया को आणविक स्तर पर विकासात्मक अनुकूलन के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण मॉडल बनाती है।

विशेषताएँ

  • आर्किया (सिंगुलर: आर्किऑन) एक-कोशिकीय सूक्ष्मजीव होते हैं।
  • इनमें न्यूक्लीयस और मेम्ब्रेन युक्त कोशिकांग नहीं होते तथा ये आकार और आकृति में बैक्टीरिया के समान होते हैं।
  • भौतिक समानताओं के बावजूद, ये जैव-रासायनिक और आनुवंशिक रूप से बैक्टीरिया से भिन्न होते हैं।
  • इनकीसेल मेम्ब्रेन’ में विशिष्ट लिपिड होते हैं और अधिकांश प्रजातियों में कोशिका भित्ति पाई जाती है।
  • विकास और संवर्धन: सामान्यतः ये धीमी गति से बढ़ने वाले जीव होते हैं।
    • प्रयोगशालाओं में इनका संवर्द्धन अत्यंत कठिन होता है, क्योंकि इनके प्राकृतिक आवास की पुनर्रचना करना चुनौतीपूर्ण होता है।

आनुवंशिक कोड के बारे में

  • आनुवंशिक कोड उन नियमों के समूह को संदर्भित करता है, जिनके माध्यम से DNA न्यूक्लियोटाइड्स के अनुक्रम को प्रोटीन संश्लेषण के दौरान अमीनो अम्लों के अनुक्रम में परिवर्तित किया जाता है।
    • DNA चार नाइट्रोजन-युक्त बेस द्वारा निर्मित होता है: एडिनीन (A), ग्वानिन (G), साइटोसिन (C) और थाइमिन (T)
    • ट्राई कोडॉन: प्रत्येक अमीनो अम्ल एक ट्राई कोडॉन’ द्वारा कूटबद्ध होता है, जो तीन DNA बेस का अनुक्रम होता है।
      • उदाहरण के लिए, कोडॉन TTT अमीनो अम्ल फिनाइलएलानिन के लिए कूटबद्ध करता है, जबकि TTA ल्यूसीन के लिए।
    • कुल मिलाकर, आनुवंशिक कोड में 64 कोडॉन होते हैं।
  • कोडॉन के प्रकार
    • सेंस कोडॉन: 61 कोडॉन, 20 सामान्य रूप से पाए जाने वाले अमीनो अम्लों को कूटबद्ध करते हैं।
    • स्टॉप कोडॉन: तीन कोडॉन प्रोटीन संश्लेषण की समाप्ति का संकेत देते हैं।

मानक आनुवंशिक कोड के ज्ञात अपवाद

  • यद्यपि आनुवंशिक कोड लगभग सार्वभौमिक है, फिर भी कुछ जीवों में इसके कुछ अपवाद पाए गए हैं।
    • बैक्टीरिया माइकोप्लाज्मा में, कोडॉन TGA, जो सामान्यतः ‘स्टॉप कोडॉन’ के रूप में कार्य करता है, अमीनो अम्ल ट्रिप्टोफैन को कूटबद्ध करता है।
    • मनुष्यों में, TGA एक दुर्लभ अमीनो अम्ल सेलेनोसिस्टीन के लिए कूटबद्ध कर सकता है, जिसका उपयोग सीमित संख्या में विशिष्ट प्रोटीनों में होता है।
    • कुछ आर्किया में, स्टॉप कोडॉन TAG कभी-कभी पायरोलाइसिन (Pyl) के लिए कूटबद्ध करता है।

अध्ययन की प्रमुख खोज

  • अध्ययन में यह पाया गया कि कुछ आर्किया में TAG कोडॉन का पूर्ण रूप से पुनः उपयोग किया गया है।
  • इन जीवों में, TAG कोडॉन को हमेशा बढ़ती प्रोटीन शृंखला में पायरोलाइसिन को जोड़ने के संकेत के रूप में समझा जाता है।
  • मानक आनुवंशिक कोड के विपरीत, इसका उपयोग स्टॉप कोडॉन के रूप में कभी नहीं किया जाता।
  • पाइल कोड’: इन निष्कर्षों के आधार पर, शोधकर्ताओं ने पाइल कोड’ नामक एक नए आनुवंशिक कोड के अस्तित्व का प्रस्ताव रखा।
  • पाइल कोड’ की विशेषताएँ
    • मानक कोड की तुलना में इसमें 61 के स्थान पर 62 सेंस कोडॉन होते हैं।
    • यह 20 के स्थान पर 21 अमीनो अम्लों के लिए कूटबद्ध करता है।
    • केवल दो कोडॉन स्टॉप कोडॉन के रूप में कार्य करते हैं।
  • यह खोज इस लंबे समय से चली आ रही धारणा को चुनौती देती है कि आनुवंशिक कोड सभी जीवों में लगभग सार्वभौमिक होता है।

अध्ययन में पहचाने गए आर्किया

  • संगणनात्मक विधियों का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने नौ प्रकार के आर्किया की पहचान की, जिनमें TAG कोडॉन पूर्ण रूप से पुनः निर्धारित पाया गया।
  • विस्तृत प्रायोगिक विश्लेषण के लिए दो प्रजातियों का चयन किया गया:
    • मेथेनोकोकोइड्स बर्टोनी – जो अत्यंत ठंडी अंटार्कटिक झीलों में निवास करती है।
    • मेथेनोमेथाइलोफिलस एल्वी – जो मानव आँत्र में पाई जाती है।
  • अत्यधिक और अल्प दोनों प्रकार के पर्यावरणों में समान गैर-मानक आनुवंशिक कोड की उपस्थिति यह संकेत देती है कि पाइल कोड स्थिर और क्रियात्मक रूप से महत्त्वपूर्ण है, न कि कोई अस्थायी विसंगति

प्रायोगिक साक्ष्य

  • अपने निष्कर्षों की पुष्टि के लिए, शोधकर्ताओं ने चयनित आर्किया से प्रोटीन निष्कासित किया और उनका विश्लेषण मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक के माध्यम से किया, जो प्रोटीनों की परिशुद्ध अमीनो अम्ल संरचना की पहचान करती है।
    • उन्होंने 54 ऐसे प्रोटीनों की पहचान की, जिनमें पहले पायरोलाइसिन की उपस्थिति ज्ञात नहीं थी।
    • ये प्रोटीन DNA प्रतिकृति और ऊर्जा चयापचय सहित आवश्यक कोशिकीय प्रक्रियाओं में शामिल हैं।
  • संगणनात्मक जीनोमिक्स और प्रायोगिक सत्यापन का संयोजन यह दर्शाता है कि आधुनिक जीव विज्ञान किस प्रकार डेटा विज्ञान को प्रयोगशाला तकनीकों के साथ एकीकृत करता है।

खोज का महत्त्व

  • यह प्रदर्शित करता है कि आनुवंशिक कोड विकासात्मक रूप से पहले की अपेक्षा अधिक लचीला है।
  • यह दर्शाता है कि जीव पर्यावरणीय दबावों के अनुकूल होने के लिए वैकल्पिक आणविक रणनीतियाँ अपना सकता है।
  • यह सभी जीवन को नियंत्रित करने वाले एकल, कठोर जैविक नियम की धारणा को चुनौती देता है।
  • विकासवादी निहितार्थ
    • ये निष्कर्ष संकेत देते हैं कि आनुवंशिक कोड पारिस्थितिक और चयापचयी आवश्यकताओं के प्रत्युत्तर में विकसित हो सकते हैं।
    • यह इस परिकल्पना का समर्थन करता है कि पृथ्वी पर प्रारंभिक जीवन ने अनेक आनुवंशिक प्रणालियों के साथ प्रयोग किया होगा।
    • यह इस विचार को भी सुदृढ़ करता है कि विकास न केवल जीव स्तर पर, बल्कि आणविक और सूचना स्तर पर भी संचालित होता है।
  • खगोल जीवविज्ञान और जैव-प्रौद्योगिकी के लिए निहितार्थ
    • यह अध्ययन पृथ्वी से परे जीवन के पहचान संबंधी मानदंडों का विस्तार करता है, यह दर्शाते हुए कि जीव को किसी ‘सिंगल आनुवंशिक कोड’ का पालन करना आवश्यक नहीं है।
    • यह बर्फीले उपग्रहों और बाह्य ग्रहों जैसे बाह्य-ग्रहीय वातावरणों में जीवन की संभावना को सुदृढ़ करता है।
    • यह सिंथेटिक जीवविज्ञान, प्रोटीन अभियांत्रिकी और जैव-प्रौद्योगिकी में नए मार्ग खोलता है, क्योंकि यह विस्तारित आनुवंशिक कोड वाले जीवों की रूपरेखा तैयार करने की संभावना प्रदान करता है।

संदर्भ

जैसे-जैसे उद्योग सतत् और निम्न-कार्बन उत्पादन प्रक्रियाओं की ओर बढ़ रहे हैं, बायोमैटेरियल्स मैटेरियल इंजीनियरिंग में एक प्रमुख क्षेत्र बनने की दिशा में अग्रसर हैं।

बायोमैटेरियल्स के बारे में

  • बायोमैटेरियल्स वे सामग्री हैं, जो प्राकृतिक, कृत्रिम या हाइब्रिड हो सकती हैं, और जिन्हें मानव शरीर या पर्यावरण जैसी जैविक प्रणालियों के साथ सुरक्षित तथा प्रभावी रूप से अंतःक्रिया करने के लिए इंजीनियर्ड किया जाता है।
  • बायोमैटेरियल्स के उदाहरण:
    • बायोप्लास्टिक्स: मक्का स्टार्च जैसे नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त
    • चिकित्सीय बायोमैटेरियल्स: जैसे- जैव अवक्रमणीय संधियाँ, ऊतक ढाँचे और प्रत्यारोपण।
    • जैव-आधारित रेशे: जैसे- कपास, पटसन, जूट, जिनका उपयोग वस्त्रों के निर्माण में किया जाता है।
  • स्रोत और अभियांत्रिकी: इन्हें जैविक स्रोतों से प्राप्त किया जाता है या पारंपरिक सामग्रियों को प्रतिस्थापित करने या उनके साथ अंतःक्रिया करने के लिए जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग कर इंजीनियर्ड किया जाता है।
  • बायोमैटीरियल्स के प्रकार: बायोमैटीरियल्स को व्यापक रूप से तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है
    • ड्रॉप-इन बायोमैटेरियल्स: पेट्रोलियम-आधारित सामग्रियों के समान होते हैं और मौजूदा प्रणालियों के साथ संगत होते हैं (जैसे, बायो-PET)।
    • ड्रॉप-आउट बायोमैटेरियल्स: रासायनिक रूप से भिन्न होते हैं और नए प्रसंस्करण या निपटान तरीकों की आवश्यकता होती है (जैसे-पॉलीलैक्टिक एसिड या PLA)
    • नवीन बायोमैटेरियल्स: पारंपरिक सामग्रियों में न पाई जाने वाली नई विशेषताएँ प्रदान करते हैं, जैसेस्व-उपचार योग्य सामग्री, जैव-सक्रिय प्रत्यारोपण, और उन्नत मिश्रित सामग्री
  • उपयोग:
    • बायोमैटेरियल्स का उपयोग पैकेजिंग, वस्त्र, निर्माण और स्वास्थ्य सेवा सहित विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है।
    • आधुनिक जैव-चिकित्सा और जैव-अभियांत्रिकी में इनकी केंद्रीय भूमिका है, जहाँ इनका डिजाइन अनुप्रयोग-विशिष्ट आवश्यकताओं और संतुलनों द्वारा निर्देशित होता है।

भारत में बायोमैटेरियल्स की आवश्यकता

  • पर्यावरणीय स्थिरता: जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना और अपशिष्ट में कमी लाने में सहायता।
  • औद्योगिक विकास: भारत को स्वच्छ और चक्रीय उत्पादों में वैश्विक अग्रणी के रूप में स्थापित करना।
  • किसान आजीविका: कृषि फीडस्टॉक और अवशेषों का उपयोग कर नए राजस्व स्रोत सृजित करना।
  • नीतिगत लक्ष्य: सिंगल यूज प्लास्टिक’ पर प्रतिबंध के अनुरूप होना और जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों में योगदान देना।
  • भारत में जैव निर्माण जीवाश्म-आधारित आयात पर निर्भरता कम कर सकता है, कृषि मूल्य शृंखलाओं में सुधार कर सकता है और वैश्विक निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ा सकता है।
  • बाजार में वृद्धि: भारत में बायोप्लास्टिक्स बाजार के वर्ष 2024 तक 500 मिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है और सरकारी प्रोत्साहन के साथ इसके और विस्तार की संभावना है।
  • घरेलू नवाचार: कानपुर स्थित कंपनी Phool.co मंदिरों के फूलों के अपशिष्ट को बायोमैटेरियल्स में परिवर्तित करती है।
  • अपने समृद्ध कृषि आधार के बावजूद, भारत को फीडस्टॉक को अंतिम बायोमैटेरियल्स उत्पादों में बदलने के लिए आवश्यक उन्नत प्रौद्योगिकियों हेतु विदेशी निर्भरता का सामना करना पड़ता है।

अन्य देशों की स्थिति

  • यूरोपीय संघ: पैकेजिंग और पैकेजिंग अपशिष्ट विनियमन (PPWR) (EU 2025/40) को अपनाया, जो कम्पो स्टेबल पैकेजिंग पर केंद्रित है।
  • संयुक्त अरब अमीरात: प्लास्टिक अपशिष्ट कम करने के लिए बड़े पैमाने पर PLA (पॉलीलैक्टिक एसिड) निवेश की योजना।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: बायोमैटेरियल्स नवाचारों में अग्रणी, जहाँ USDA का बायोप्रिफर्ड कार्यक्रम इस क्षेत्र का समर्थन करता है।

संदर्भ

हरियाणा ने जन्म के समय लिंगानुपात में पिछले पाँच वर्षों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है, जो वर्ष 2025 में प्रति 1,000 लड़कों पर 923 लड़कियों तक पहुँच गया है।

मुख्य परिभाषाएँ

  • लिंगानुपात एक जनसांख्यिकीय माप है, जो किसी निश्चित समय पर किसी दी गई जनसंख्या में प्रति 1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को दर्शाता है।
  • बाल लिंगानुपात: बाल लिंगानुपात 0-6 आयु वर्ग में प्रति 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या को मापता है।
  • जन्म के समय लिंगानुपात (SRB): किसी दिए गए वर्ष में प्रति 1,000 लड़कों पर जन्मी लड़कियों की संख्या।

पृष्ठभूमि

  • खराब आधारभूत स्थिति: वर्ष 2011 की जनगणना में, जन्म के समय लिंगानुपात 834 के साथ हरियाणा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में से एक था।
  • हालिया सुधार: यह अनुपात 2024 में 910 से बढ़कर 2025 में 923 हो गया, जो राष्ट्रीय औसत 933 के करीब पहुँच गया है।
  • सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जिले: पंचकुला (971), फतेहाबाद (961) और पानीपत (951) में जन्म के समय लिंगानुपात सबसे अधिक दर्ज किया गया।

हरियाणा द्वारा की गई पहल

  • अल्ट्रासाउंड केंद्रों की निगरानी 
    • कानूनी आधार: गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994।
    • चिकित्सा पर्यवेक्षण: जिला नोडल अधिकारियों और चिकित्सा अधिकारियों ने नियमित निरीक्षण और त्रैमासिक बैठकों के माध्यम से अल्ट्रासाउंड केंद्रों की निगरानी की।
    • लाइसेंस संबंधी कार्रवाई: उल्लंघन पाए जाने पर लाइसेंस रद्द किए गए, उपकरण जब्त किए गए और डॉक्टरों पर मुकदमा चलाया गया।
    • कार्यबल: अवैध चिकित्सा गर्भपात किटों और अपंजीकृत प्रक्रियाओं का पता लगाने के लिए विशेष कार्यबलों को सशक्त बनाया गया।
  • तकनीकी और निगरानी संबंधी नवाचार
    • RCHID प्रणाली: प्रजनन और बाल स्वास्थ्य पहचान (Reproductive and Child Health Identity- RCHID) की शुरुआत, प्रत्येक गर्भवती महिला के लिए एक 12 अंकों की विशिष्ट पहचान।
  • सहेली परियोजना (Saheli Project) (2025)
    • सहेली पहल के तहत, हर गर्भवती महिला को, जो बेटी को जन्म देने वाली है, एक समर्पित देखभालकर्ता सौंपी जाती है, जिसेसहेली’ कहा जाता है।
    • सहेली की भूमिका: ‘सहेली’ या तो महिला एवं बाल विकास विभाग की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता होती है अथवा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत काम करने वाली आशा कार्यकर्ता।
    • लक्षित समूह: उन गर्भवती महिलाओं पर केंद्रित है, जिनकी पहले से कम-से-कम एक बेटी है।
    • प्रभाव: एक वर्ष के भीतर गर्भावस्था की तिमाही अवधि में गर्भपात की दर में 57 प्रतिशत अंकों की गिरावट आई।

भारत में लिंगानुपात

  • ऐतिहासिक रुझान: भारत में लिंगानुपात में गहरी जड़ें जमा चुके लैंगिक भेदभाव के कारण वर्ष 1901 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 972 महिलाओं से घटकर वर्ष 2001 में 933 हो गया।
  • गिरावट के कारण: पुत्र को प्राथमिकता देना, पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंड और स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच ने इस गिरावट में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
  • हालिया सुधार: NFHS-5 (2019-21) में प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएँ दर्ज की गईं, जो क्रमिक सामाजिक परिवर्तन और महिलाओं के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार का संकेत देती हैं।
    • जन्म के समय लिंगानुपात: जन्म के समय लिंगानुपात 929 पर कम बना हुआ है, जो निरंतर लिंग-चयनात्मक प्रथाओं को दर्शाता है।
  • भारत में राज्यवार लिंगानुपात (वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार)
    • उच्च लिंगानुपात वाले राज्य: केरल (1084) और पुडुचेरी (1037) में महिला साक्षरता दर अधिक होने और स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच के कारण सबसे अधिक लिंगानुपात दर्ज किया गया।

निम्न लिंगानुपात वाले राज्य: हरियाणा (879), दिल्ली (868) और चंडीगढ़ (818) में पितृसत्तात्मक सोच के बने रहने के कारण सबसे कम लिंगानुपात दर्ज किया गया।

संदर्भ

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) में पर्यावरण मानदंडों के अनुपालन न करने के संबंध में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है।

प्रमुख आरोप

  • अवैध वृक्ष कटाई: आवेदन में दावा किया गया है कि ताजमहल से 5 किलोमीटर के दायरे में पेड़ों की अवैध कटाई की जा रही है, जो सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की वृक्ष कटाई के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य है।
  • अवैध निर्माण और अतिक्रमण: आगरा विकास प्राधिकरण पर ताजमहल और आगरा किले के बीच स्थित शाहजहाँ पार्क में कियोस्क, पक्के रास्ते और ईंट-सीमेंट संरचनाओं का निर्माण करने का आरोप है।
  • हरियाली को नुकसान: आवेदन में सदियों पुराने पेड़ों की जड़ों के पास गड्ढे खोदकर हरियाली को नष्ट करने का उल्लेख किया गया है, जिससे पक्षियों और तितलियों के आवास प्रभावित हो रहे हैं।

ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) के बारे में

  • ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) 10,400 वर्ग किलोमीटर का एक पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र है, जिसे ताजमहल को पर्यावरण प्रदूषण और पारिस्थितिकी निम्नीकरण से बचाने के लिए बनाया गया है।
  • इस क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण धरोहर स्थल शामिल हैं, जिनमें यूनेस्को की तीन विश्व धरोहर स्थल भी शामिल हैं:
    • ताजमहल,
    • आगरा किला और
    • फतेहपुर सिकरी।
  • सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका: TTZ व्यवस्था की स्थापना सर्वोच्च न्यायालय के M.C. मेहता बनाम भारत संघ (1996) मामले में दिए गए निर्देशों के तहत की गई थी, जिसमें उद्योगों, उत्सर्जन और स्वच्छ ईंधन/प्रौद्योगिकी के उपयोग को विनियमित करने सहित सख्त प्रदूषण नियंत्रण उपायों को अनिवार्य किया गया था।
    • TTZ का कानूनी आधार: ताजमहल और क्षेत्र के अन्य विरासत स्थलों के आस-पास प्रदूषण नियंत्रण उपायों को लागू करने के लिए ताज ट्रेपेजियम जोन प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण की स्थापना की गई थी।
  • वृक्ष कटाई पर प्रतिबंध: वर्ष 2015 के एम. सी. मेहता मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने ताजमहल से 5 किलोमीटर की दूरी के अंतर्गत वृक्ष कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके तहत किसी भी प्रकार की कटाई से पहले न्यायालय से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य था।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के बारे में

  • स्थापना: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) एक वैधानिक निकाय है, जिसे पर्यावरण संरक्षण और संवर्द्धन से संबंधित मामलों का शीघ्र और प्रभावी ढंग से निपटान करने का कार्य सौंपा गया है।
  • पर्यावरण कानून: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत अनुसूची I में सूचीबद्ध पर्यावरण कानूनों से संबंधित मामलों की सुनवाई NGT कर सकता है।
    • इसमें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 आदि शामिल हैं।
  • अधिकार क्षेत्र के अपवाद: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972; भारतीय वन अधिनियम, 1927; और अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 के अंतर्गत आने वाले मामलों की सुनवाई नहीं करता है।

संदर्भ

भारतीय रेलवे नवंबर 2025 तक अपने ब्रॉड-गेज नेटवर्क के लगभग 99.2% हिस्से के विद्युतीकरण के साथ दुनिया का सबसे बड़ा विद्युतीकृत रेल नेटवर्क बन गया है।

भारतीय रेल के बारे में

  • भारतीय रेलवे विश्व के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक का संचालन करता है।
  • विद्युतीकरण उपलब्धि: इसने अपने ब्रॉड-गेज मार्गों का लगभग पूर्ण विद्युतीकरण कर लिया है, जो अन्य प्रमुख वैश्विक रेलवे प्रणालियों से कहीं आगे है।
  • 100% रेलवे विद्युतीकरण मिशन: “100% रेलवे विद्युतीकरण मिशन” के तहत, भारतीय रेलवे पूर्ण विद्युतीकरण का लक्ष्य लेकर चल रहा है।
  • विद्युतीकरण का इतिहास और समयरेखा: विद्युतीकरण की पहल वर्ष 1925 में शुरू हुई थी, लेकिन वर्ष 2014 के बाद इसे मिशन-आधारित दृष्टिकोण के तहत गति दी गई।
    • विद्युतीकरण की गति वर्ष 2004-2014 में 1.42 किमी./दिन से बढ़कर वर्ष 2019-2025 में 15 किमी./दिन से अधिक हो गई है, जो आधुनिकीकरण में एक अभूतपूर्व तेजी का संकेत है।
    • उद्देश्य: मुख्य लक्ष्य डीजल आधारित संचालन को समाप्त करना और स्वच्छ, अधिक सतत विद्युत ऊर्जा की ओर अग्रसर होना है।
  • विद्युतीकरण पहल की प्रमुख विशेषताएँ
    • प्रगति: नवंबर 2025 तक लगभग 70,000 किमी. ब्रॉड गेज नेटवर्क का 99.2% विद्युतीकृत हो चुका है।
    • पूर्ण विद्युतीकरण वाले राज्य: 25 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश पूर्णतः विद्युतीकृत हैं, केवल लगभग 0.8% नेटवर्क का विद्युतीकरण बाकी है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण: सौर ऊर्जा क्षमता वर्ष 2014 में 3.68 मेगावाट से बढ़कर वर्ष 2025 तक 898 मेगावाट हो जाएगी।
    • तकनीकी एकीकरण: स्वचालित वायरिंग ट्रेनों और मशीनीकृत पारंपरिक ओवरहेड विद्युतीकरण (OHE) नींव जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाना।

भारत में रेलवे गेज के बारे में

गेज से तात्पर्य रेलवे ट्रैक की चौड़ाई और स्थिरता से है, जो उस ट्रैक पर संचालित रेल वाहनों के आकार और डिजाइन को प्रभावित करता है।

ब्रॉड गेज [Broad Gauge (1676 mm)]

  • भारत में सबसे अधिक प्रचलित गेज, जो अधिकांश यात्री और माल ढुलाई मार्गों को कवर करता है। यह गेज विश्व स्तर पर नियमित उपयोग में सबसे चौड़ा माना जाता है।
  • इनका उपयोग बंदरगाह सुविधाओं पर क्रेन और संबंधित उपकरणों को रखने के लिए भी किया जाता है।

मीटर गेज [Meter Gauge (1000 mm)]

  • यह रेलवे लाइनें कुछ अलग-थलग या कम व्यस्त शाखाओं में पाई जाती हैं। मीटर गेज को धीरे-धीरे ब्रॉड गेज में बदला जा रहा है। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है: नीलगिरी माउंटेन रेलवे, जो एक विरासत मार्ग है।

नैरो गेज [Narrow Gauge (762 mm and 610 mm)]

  • सँकरी गेज वाली रेलगाड़ियाँ अक्सर पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में उपयोग की जाती हैं क्योंकि ये खड़ी ढलानों के लिए उपयुक्त होती हैं।
  • इसके प्रसिद्ध उदाहरणों में कालका-शिमला रेलवे और दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे शामिल हैं।

मानक गेज (1435 मिमी)

  • भारत में, मेट्रो, मोनोरेल और ट्राम जैसी शहरी रेल प्रणालियों के लिए मानक गेज का उपयोग किया जाता है।
  • कोलकाता ट्राम प्रणाली: भारत में एकमात्र मानक गेज रेलवे लाइन कोलकाता ट्राम प्रणाली थी।
  • मेट्रो लाइनों के लिए महानगरों में मानक गेज को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि इस गेज के लिए रोलिंग स्टॉक की अधिक उपलब्धता और उपकरणों की बेहतर पहुँच होती है।

संदर्भ

हाल ही में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री ने CSIR-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (National Physical Laboratory- NPL) में विश्व की दूसरी राष्ट्रीय पर्यावरण मानक प्रयोगशाला और सौर सेल अंशांकन के लिए पांचवीं राष्ट्रीय प्राथमिक मानक सुविधा का उद्घाटन किया।

  • विश्व की पहली राष्ट्रीय पर्यावरण मानक प्रयोगशाला की स्थापना यूनाइटेड किंगडम में हुई थी।

राष्ट्रीय पर्यावरण मानक प्रयोगशाला (National Environmental Standard Laboratory- NESL)

  • NESL, CSIR-NPL, नई ​​दिल्ली में स्थापित एक राष्ट्रीय स्तर की सर्वोच्च संस्था है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण निगरानी उपकरणों का मानकीकरण और अंशांकन करना है।
  • उद्देश्य: प्रभावी पर्यावरण प्रबंधन के लिए वायु और पर्यावरण प्रदूषण निगरानी प्रणालियों का सटीक, अनुरेखणीय और भारत-विशिष्ट अंशांकन सुनिश्चित करना।
  • सुविधाएँ
    • वायु गुणवत्ता निगरानी उपकरणों का अंशांकन और प्रमाणीकरण
    • भारतीय जलवायु और प्रदूषण परिस्थितियों में परीक्षण
    • राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मापन मानकों के अनुरूप अनुवांशिकता
  • NESL का महत्त्व
    • बेहतर पर्यावरण प्रबंधन: भारत-विशिष्ट अंशांकन मानकों के माध्यम से पर्यावरण नियमों और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (National Clean Air Programme- NCAP) का सटीक कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है।
    • विश्वसनीय प्रदूषण डेटा: देश भर में वायु गुणवत्ता निगरानी की पारदर्शिता, विश्वसनीयता और वैज्ञानिक सटीकता को बढ़ाता है।
    • संस्थागत और आर्थिक सहायता: नियामकों, उद्योगों, स्टार्ट-अप्स और शहरी स्थानीय निकायों को सहायता प्रदान करता है, साथ ही विदेशी अंशांकन सुविधाओं पर निर्भरता को कम करता है।

सौर सेल अंशांकन के लिए राष्ट्रीय प्राथमिक मानक सुविधा (NPSF-SCC)

  • नेशनल प्राइमरी स्टैंडर्ड फैसिलिटी फॉर सोलर सेल कैलिब्रेशन, CSIR–NPL में स्थापित एक उच्च परिशुद्धता वाली सौर मेट्रोलॉजी सुविधा है।
  • उद्देश्य: सौर सेल अंशांकन और फोटोवोल्टिक मापन के लिए भारत के उच्चतम सटीकता वाले संदर्भ मानक उपलब्ध कराना।
  • सहयोग: जर्मनी के फिजिकालिश-टेक्निशे बुंडेसनस्टाल्ट (Physikalisch-Technische Bundesanstalt-PTB) के सहयोग से विकसित।
  • महत्त्व
    • सौर माप विज्ञान में वैश्विक नेतृत्व: इस सुविधा की स्थापना से भारत सौर सेल अंशांकन के लिए उन्नत प्राथमिक मानकों वाले चुनिंदा वैश्विक समूह में शामिल हो गया है।
    • उच्च परिशुद्धता और आत्मनिर्भरता: यह अत्यंत निम्न अंशांकन अनिश्चितता (0.35%) प्राप्त करता है, जिससे विदेशी प्रमाणन एजेंसियों पर निर्भरता कम होती है और विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा: यह निवेशकों का विश्वास बढ़ाता है, सौर क्षेत्र में गुणवत्ता आश्वासन को समर्थन देता है और आत्मनिर्भर भारत के तहत भारत के नवीकरणीय ऊर्जा परिदृश्य को मजबूत करता है।

CSIR-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (CSIR–NPL)

  • वजन एवं माप मानक अधिनियम के तहत CSIR-NPL को भारत के राष्ट्रीय मापन संस्थान (NMI) के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो देश के मापन मानकों को बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है।
  • नोडल मंत्रालय: CSIR भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संगठन है।
  • कानूनी स्थिति: यह सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत एक स्वायत्त निकाय के रूप में कार्य करता है।
  • स्थापना: वर्ष 1947 (स्वतंत्रता-पूर्व काल)।
  • प्रमुख भूमिकाएँ
    • परमाणु घड़ियों के माध्यम से भारतीय मानक समय (IST) का संरक्षक।
    • भौतिकी, पर्यावरण और पदार्थ के क्षेत्र में राष्ट्रीय मापन मानकों का विकास।
    • उद्योग, अनुसंधान और प्रशासन के लिए माप संबंधी अनुरेखण सुनिश्चित करना।
    • गुणवत्तापूर्ण अवसंरचना, लघु एवं मध्यम उद्यमों, स्टार्ट-अप और स्वदेशी विनिर्माण को सहयोग प्रदान करना।
  • महत्त्व: यह विश्वसनीय मापन मानक प्रदान करके, पर्यावरण नियमों को मजबूत करके, नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की दिशा में भारत की यात्रा को आगे बढ़ाकर विज्ञान और शासन के बीच सेतु का काम करता है।

संदर्भ

हाल ही में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने राज्य वित्त पर अपने महत्त्वपूर्ण प्रकाशन का दूसरा संस्करण जारी किया है। इस रिपोर्ट का पहला संस्करण, ‘राज्य वित्त 2022-23′, सितंबर 2025 में जारी किया गया था।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) 

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद-148 के तहत स्थापित CAG, शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

राज्य वित्त पर प्रकाशन के दूसरे संस्करण (2023-24) के बारे में

  • राज्य वित्त और संघीय राजकोषीय स्थिति की अखिल भारतीय लेखापरीक्षा: यह रिपोर्ट भारत के सभी 28 राज्यों के राजकोषीय प्रक्षेप पथ का एक व्यापक लेखापरीक्षा प्रस्तुत करती है।
    • यह व्यक्तिगत राज्य रिपोर्टों से आगे बढ़कर भारत के संघीय वित्तीय स्वास्थ्य का एक एकीकृत, तुलनात्मक विश्लेषण प्रदान करती है।
  • राज्य खातों का संवैधानिक आधार और आधिकारिक प्रकृति: संविधान के अनुच्छेद-150 के तहत, CAG वार्षिक वित्त खाते और विनियोग खाते तैयार करता है।
    • ये दस्तावेज किसी राज्य की वित्तीय स्थिति के आधिकारिक अभिलेख के रूप में कार्य करते हैं, जिसमें राजस्व प्राप्तियों, पूँजीगत व्यय और सार्वजनिक ऋण के प्रत्येक प्रवाह को दर्ज किया जाता है ताकि राज्य विधानमंडल के प्रति पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

प्रमुख शब्दावली

  • राज्यों का स्वयं का कर राजस्व (SOTR): इसका तात्पर्य भारत के संविधान के तहत प्रदत्त कराधान शक्तियों का उपयोग करके राज्य सरकारों द्वारा स्वयं अर्जित कर राजस्व से है।
    • यह किसी राज्य की राजकोषीय स्वायत्तता और राजस्व क्षमता का एक प्रमुख सूचक है।
  • अर्थोपाय अग्रिम (WMA): यह RBI द्वारा केंद्र और राज्यों को अस्थायी नकदी प्रवाह असंतुलन को दूर करने के लिए प्रदान की जाने वाली एक अल्पकालिक ऋण सुविधा है।
    • यह ब्याज सहित, समयबद्ध है और इसका उद्देश्य तरलता प्रबंधन है, न कि राजकोषीय घाटे का वित्तपोषण।
  • ओवरड्राफ्ट (OD): ओवरड्राफ्ट तब उत्पन्न होता है, जब सरकारें RBI के साथ WMA सीमा से अधिक उधार लेती हैं।
  • राज्यों का बकाया सार्वजनिक ऋण: इसका तात्पर्य राज्य सरकारों द्वारा लिए गए कुल उधारों से है, जिसमें ऋण और बॉण्ड शामिल हैं, जो अभी तक चुकाए नहीं गए हैं।
    • यह राज्यों की वित्तीय स्थिति को दर्शाता है, जो राजकोषीय स्थिरता और अत्यधिक उधार लिए बिना विकास के वित्तपोषण की क्षमता को प्रभावित करता है।

राज्य वित्त पर प्रकाशन के दूसरे संस्करण (2023-24) पर महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि

  • राजस्व संरचना: कुल राजस्व प्राप्तियाँ ₹37.93 लाख करोड़ तक पहुँच गईं।
    • राज्यों का अपना कर राजस्व (SOTR) आत्मनिर्भरता का प्राथमिक स्तंभ बनकर उभरा, जो कुल आय का 50% था, इसके बाद केंद्रीय कर हस्तांतरण 30% रहा।
  • व्यय का असमान वितरण: ₹46.81 लाख करोड़ के कुल व्यय में से, अत्यधिक मात्रा में 83.25% राजस्व व्यय (उपभोग) की ओर स्थानांतरित किया गया।
    • यह दर्शाता है कि निधियों का एक बड़ा हिस्सा उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण के बजाय परिचालन लागतों पर खर्च किया जाता है।
      • परिचालन लागतें दैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए किए जाने वाले आवर्ती व्यय (जैसे-वेतन और रखरखाव) हैं, जबकि उत्पादक परिसंपत्तियाँ दीर्घकालिक निवेश (जैसे-बुनियादी ढाँचा या मशीनरी) हैं, जो निरंतर आर्थिक लाभ उत्पन्न करती हैं और भविष्य की उत्पादक क्षमता को बढ़ाती हैं।
  • क्षेत्रीय प्राथमिकताएँ: रिपोर्ट व्यय को तीन कार्यात्मक शीर्षों में वर्गीकृत करती है:
    • सामाजिक क्षेत्र (मानव पूँजी)
    • आर्थिक क्षेत्र (बुनियादी ढाँचा)
    • सामान्य क्षेत्र (प्रशासन)
      • हालाँकि आर्थिक क्षेत्र में सबसे अधिक पूँजीगत व्यय होता है, वहीं सामान्य क्षेत्र काफी हद तक राजस्व-प्रधान बना हुआ है।
  • तरलता प्रबंधन: नकदी प्रवाह और बहिर्वाह के बीच अस्थायी अंतर को पाटने के लिए, 16 राज्यों ने RBI से अर्थोपाय अग्रिम (WMA) और ओवरड्राफ्ट का सहारा लिया।
    • चिंताजनक रूप से, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य लगभग पूरे वर्ष इन अग्रिमों पर निर्भर रहे।
  • राज्यों का बकाया सार्वजनिक ऋण: मार्च 2024 तक यह ₹67.87 लाख करोड़ तक पहुँच गया, जो संयुक्त राज्य सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) का 23.42% है।

मुख्य तुलना: प्रथम संस्करण बनाम द्वितीय संस्करण

विशेषताएँ पहला संस्करण (प्रारंभिक प्रकाशन) द्वितीय संस्करण (2023-24)
समय सीमा मुख्य रूप से तात्कालिक वित्तीय वर्षों पर केंद्रित, सीमित ऐतिहासिक संदर्भ के साथ। यह GST और महामारी के दीर्घकालिक प्रभाव को दर्शाते हुए एक मजबूत 10-वर्षीय प्रवृत्ति विश्लेषण (2014-15 से 2023-24 तक) प्रदान करता है।
डेटा ग्रैन्युलैरिटी व्यापक स्तर के राजकोषीय आँकड़ों (कुल राजस्व, कुल व्यय) पर केंद्रित। यह मद-स्तर का विश्लेषण प्रदान करता है, जिसमें खर्च को वेतन, पेंशन और सब्सिडी जैसी विशिष्ट इकाइयों में विभाजित किया जाता है।
मानकीकरण विभिन्न राज्य-विशिष्ट लेखांकन वर्गीकरणों के आधार पर। बेहतर तुलनीयता के लिए, राज्य के व्यय को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित सामान्य उद्देश्य मदों की संशोधित सूची के साथ संरेखित किया गया है।
विश्लेषणात्मक गहनता मुख्यतः यह पिछले वित्तीय वर्ष के लेखापरीक्षित आँकड़ों का सारांश है। इसमें राजकोषीय क्षमता मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है, जिसमें विभिन्न राज्यों की स्वयं का कर राजस्व (SOTR) जुटाने की क्षमता की तुलना की गई है।
तरलता निगरानी नकद शेष और राजकोषीय स्थिति का सामान्य उल्लेख। अर्थोपाय अग्रिम (WMA) और ओवरड्राफ्ट के उपयोग की विस्तृत जाँच, जिसमें विशिष्ट राज्यों में दीर्घकालिक निर्भरता को उजागर किया गया है।
क्षेत्रीय अंतर्दृष्टि सामान्य, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में बुनियादी वर्गीकरण। सब्सिडी का गहन विश्लेषण, विशेष रूप से बिजली और कृषि क्षेत्रों को राजस्व व्यय के प्राथमिक कारकों के रूप में पहचानना।

रिपोर्ट का महत्त्व

  • राजकोषीय संघवाद के लिए
    • ऊर्ध्वाधर एवं क्षैतिज असंतुलन का समाधान: यह रिपोर्ट वित्त आयोग को लेखापरीक्षित, तुलनीय आँकड़े प्रदान करती है, जिससे ‘ऊर्ध्वाधर असंतुलन’ (केंद्रीकृत राजस्व बनाम विकेंद्रीकृत व्यय) को दूर किया जा सके और राज्यों के वास्तविक राजकोषीय प्रदर्शन के आधार पर ‘क्षैतिज हस्तांतरण’ (राज्यों के बीच बँटवारा) निर्धारित किया जा सके।
    • साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण: उच्च SOTR उछाल वाले राज्यों और केंद्रीय अनुदान पर निर्भर राज्यों की पहचान करके, यह रिपोर्ट केंद्र सरकार को ‘विशेष श्रेणी’ का दर्जा या विशिष्ट केंद्रीय सहायता कार्यक्रम तैयार करने में मदद करती है।
    • अंतर-राज्यीय प्रतिस्पर्द्धात्मक दबाव (मानदंड): रिपोर्ट का समेकित स्वरूप ‘प्रतिस्पर्द्धात्मक’ प्रभाव उत्पन्न करता है, जिससे कमतर प्रदर्शन करने वाले राज्य ओडिशा या महाराष्ट्र जैसे उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्यों की सर्वोत्तम राजकोषीय प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।
  • विधायी निरीक्षण के लिए
    • लोक लेखा समिति (PAC) को सशक्त बनाना: यह रिपोर्ट राज्य विधानसभाओं की PAC के लिए प्राथमिक कार्यकारी पत्र’ का कार्य करती है।
      • यह जटिल खातों को कार्रवाई योग्य लेखा परीक्षा पैराग्राफ’ में बदलती है, जिससे विधायकों को वित्तीय चूक के लिए कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने में मदद मिलती है।
      • लोक लेखा समिति (PAC) के बारे में: यह एक संसदीय वित्तीय समिति है, जो व्यय की वैधता, मितव्ययिता और दक्षता सुनिश्चित करने के लिए सरकारी खातों पर CAG रिपोर्टों की जाँच करती है।
    • कार्यपालिका के अतिचार पर अंकुश: निजी जमा (PD) खातों का विस्तृत विश्लेषण कार्यपालिका को वित्तीय वर्ष के अंत में विधायी जाँच से बचने के लिए समेकित निधि से बाहर धन ‘स्थगित’ करने से रोकता है।
    • निजी जमा (PD) खातों के बारे में: PD खाते विभागीय निधियों के प्रबंधन के लिए नामित अधिकारियों द्वारा संचालित सरकारी खाते हैं।
      • ये खर्च में लचीलापन प्रदान करते हैं, लेकिन इससे धन का दुरुपयोग और विधायी नियंत्रण में कमी आ सकती है।
    • अमूर्त आकस्मिक (AC) बिल: AC बिल अस्थायी निकासी बिल होते हैं, जिनका उपयोग पूर्ण विवरण के बिना तत्काल व्यय के लिए किया जाता है।
      • इनका समायोजन DC बिलों के माध्यम से किया जाना चाहिए, अन्यथा ये अप्रबंधित वित्तीय अनुशासन को दर्शाते हैं।
    • वित्तीय नियंत्रण’ को बनाए रखना: यह सुनिश्चित करता है कि सरकार केवल विनियोग अधिनियम द्वारा अधिकृत तरीके और मात्रा में ही धन खर्च करे, जिससे सार्वजनिक धन पर विधायी नियंत्रण के संवैधानिक सिद्धांत को बल मिलता है।
  • व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए
    • भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति संबंधी जानकारी: भारतीय रिजर्व बैंक इन लेखापरीक्षित आँकड़ों का उपयोग राज्य विकास ऋण (SDL) बाजार के प्रबंधन और समग्र सामान्य सरकारी ऋण (केंद्र एवं राज्य) की निगरानी के लिए करता है, जो मुद्रास्फीति तथा ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
    • ऋण स्थिरता विश्लेषण: यह रिपोर्ट ‘बचाव के स्वर्णिम नियम’ का पालन करती है, यह जाँच करती है कि उधार का उपयोग पूँजीगत व्यय (संपत्ति निर्माण) के लिए किया जा रहा है या केवल राजस्व घाटे (उपभोग) को पूरा करने के लिए।
      • राज्यों को ‘ऋण जाल’ में फँसने से बचाने के लिए यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • राष्ट्रीय आय अनुमान: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) सटीक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) की गणना के लिए इस लेखापरीक्षित आँकड़ों पर निर्भर करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि राष्ट्रीय आर्थिक विकास के आँकड़े सत्यापित वित्तीय वास्तविकता पर आधारित हैं।
      • राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के बारे में: यह सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अधीन भारत का प्रमुख सांख्यिकी निकाय है।
        • यह आँकड़ों पर आधारित नीति निर्माण और राष्ट्रीय नियोजन में सहयोग हेतु आधिकारिक आँँकड़ों के संग्रह, संकलन और प्रसार के लिए उत्तरदायी है।
      • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को मापता है, जबकि सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) राज्य स्तर पर इसी मूल्य को दर्शाता है, जो राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय आर्थिक प्रदर्शन को इंगित करता है।
  • सुशासन और पारदर्शिता के लिए
    • सार्वजनिक वित्त का लोकतांत्रीकरण: CAG ने दूसरे संस्करण को समेकित प्रारूप में उपलब्ध कराकर नागरिक समाज, मीडिया और विचारकों के लिए डेटा का लोकतांत्रीकरण किया है, जिससे लोकप्रियतावाद बनाम विकास’ (मुफ्त सुविधाएँ/सब्सिडी बनाम अवसंरचना) पर सूचित सार्वजनिक बहस संभव हो सकी है।
    • लेखांकन सुधारों के लिए उत्प्रेरक: इस रिपोर्ट में वर्ष 2027 तक मद शीर्षों की एक समान सूची के लिए किया गया प्रयास ‘सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली’ (PFMS) में एक महत्त्वपूर्ण सुधार है, जो भारत को सरकारी लेखांकन के अंतरराष्ट्रीय मानकों की ओर ले जाता है।
      • सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) के बारे में: यह वित्त मंत्रालय के अधीन एक केंद्रीय सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म है।
      • यह वास्तविक समय में निधि प्रवाह, व्यय और भुगतान पर नजर रखता है, जिससे सार्वजनिक वित्त प्रबंधन में पारदर्शिता, दक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
    • वैश्विक वित्तपोषण के लिए प्रमाणीकरण: विश्व बैंक या एशियाई विकास बैंक (ADB) जैसे अंतरराष्ट्रीय निकायों से ‘बाह्य सहायता प्राप्त परियोजनाओं’ के लिए ऋण प्राप्त करने हेतु राज्यों के लिए लेखापरीक्षित खाते एक पूर्व शर्त हैं।

PWOnlyIAS विशेष

CAG रिपोर्ट 16वें वित्त आयोग के लिए ‘अनुभवजन्य आधारशिला’ के रूप में

  • CAG का दूसरा संस्करण (2023-24) केवल एक ऑडिट से कहीं अधिक है; यह 16वें वित्त आयोग (FC) के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2026-31 के लिए आवंटन को अंतिम रूप देने हेतु प्राथमिक उपकरण है।
  • साक्ष्य-आधारित क्षैतिज हस्तांतरण: यह रिपोर्ट आयोग को हस्तांतरण सूत्र को परिष्कृत करने के लिए ऑडिट किए गए, तुलनीय आँकड़े प्रदान करती है।
    • औद्योगिक राज्यों (महाराष्ट्र, गुजरात) की तुलना में उत्तर-पूर्वी/पहाड़ी राज्यों की संरचनात्मक निर्भरता के मामले में उच्च SOTR उछाल की असमान राजकोषीय क्षमता को प्रदर्शित करते हुए, CAG द्वारा प्रदत्त आँकड़े आयोग को दक्षता के साथ समानता को संतुलित करने में सक्षम बनाते हैं।
  • ऋण-स्थिरता अंतर का समाधान: CAG द्वारा यह इंगित किए जाने के बाद कि 13 राज्यों ने 33.1% ऋण-से-GSDP सीमा का उल्लंघन किया है, 16वाँ वित्त आयोग इस डेटा का उपयोग राजकोषीय समेकन के लिए अनुकूल रणनीति तैयार करने हेतु कर सकता है।
    • यह राज्यों द्वारा अधिक वित्तीय हस्तांतरण (50% तक) की माँगों का उनकी वास्तविक वित्तीय अनुशासन के साथ मूल्यांकन करने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • विशेष सहायता दावों का सत्यापन: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य अक्सर “ग्रीन बोनस” या आपदा राहत में लचीलेपन की माँग करते हैं।
    • CAG द्वारा प्रतिबद्ध व्यय की कठोरता और सब्सिडी के बोझ (73% विद्युत/कृषि क्षेत्र में केंद्रित) पर प्राप्त विस्तृत आँकड़ों से आयोग को संरचनात्मक अस्थिरता और राजकोषीय कुप्रबंधन के बीच अंतर करने में सहायता मिलती है।
  • अदृश्य ऋण और पारदर्शिता: रिपोर्ट में बजट से बाहर की देनदारियों और व्यक्तिगत जमा (PD) खातों पर ध्यान केंद्रित करने से आपदा प्रबंधन वित्तपोषण की समीक्षा करने और यह सुनिश्चित करने के आयोग के जनादेश का समर्थन होता है कि केंद्रीय हस्तांतरण को बजटीय चूक से बचने के लिए केवल ‘स्थगित’ न रखा जाए।

मात्रात्मक रुझान (2014-15 से 2023-24) – राजकोषीय स्वायत्तता में एक दशकीय परिवर्तन

  • दूसरे संस्करण में दस-वर्षीय प्रवृत्ति विश्लेषण GST और महामारी के बाद के राजकोषीय परिदृश्य का एक अनूठा “मैक्रो-व्यू” प्रदान करता है।
  • राज्यों के स्वयं के कर राजस्व (SOTR) और केंद्रीय कर हस्तांतरण का उदय: पिछले दशक में, राज्यों के स्वयं के कर राजस्व (SOTR) और केंद्रीय कर हस्तांतरण का संयुक्त हिस्सा क्रमशः लगभग 50% और 30% पर स्थिर हो गया है।
    • यह GST व्यवस्था के परिपक्व होने और विभाज्य पूल के स्थिर होने का संकेत देता है।
  • अनुदानों पर घटती निर्भरता: एक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति वित्त वर्ष 2024 में अनुदान सहायता में धीरे-धीरे गिरावट होकर लगभग 12% हो जाना है।
    • यह दर्शाता है कि राज्य राजस्व आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं, हालाँकि CAG चेतावनी देता है कि यह औसत’ अंतर-राज्यीय असमानता में वृद्धि को छिपाता है।
  • ऊर्ध्वाधर असंतुलन की निरंतरता: राजस्व में वृद्धि के बावजूद, राज्य अभी भी सार्वजनिक व्यय का लगभग दो-तिहाई हिस्सा वहन करते हैं, जबकि प्रत्यक्ष राजस्व का एक-तिहाई से भी कम संग्रह करते हैं।
    • CAG द्वारा प्रलेखित यह विसंगति, राज्यों के हिस्से को बढ़ते केंद्रीय उपकरों और अधिभारों से होने वाले क्षरण से बचाने के लिए 16वें वित्त आयोग के तर्क को बल देती है।
  • कठोरता’ की बाधा: दशक भर के आँकड़ों से प्रतिबद्ध व्यय में मजबूती की पुष्टि होती है।
    • राजस्व (सब्सिडी सहित) का लगभग 60% पूर्व-प्रतिबद्ध होना पूँजीगत व्यय के लिए दीर्घकालिक जोखिम उत्पन्न करता है, जिसे 16वें वित्त आयोग को प्रोत्साहन-आधारित अनुदानों के माध्यम से दूर करना होगा।

राजकोषीय क्षमता की तुलना: उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्य बनाम निम्न प्रदर्शन करने वाले राज्य (वित्तीय वर्ष 2023-24)

श्रेणी शामिल राज्य कुल राजस्व प्राप्तियों के प्रतिशत के रूप में SOTR  प्रमुख विशेषताएँ
शीर्ष 6 राज्य (उच्च वित्तीय क्षमता वाले) हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, गुजरात 60% से ऊपर उच्च औद्योगीकरण, मजबूत सेवा क्षेत्र और उच्च कर प्रोत्साहन।
सबसे निचले 6 राज्य (कम वित्तीय क्षमता वाले) अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा। 20% से कम भौगोलिक और संरचनात्मक बाधाओं के कारण केंद्रीय हस्तांतरण और अनुदान सहायता पर अत्यधिक निर्भरता।

राज्य स्तर पर उभरते राजकोषीय जोखिम

  • राजकोषीय कठोरता संबंधी चिंता: सबसे बड़ी चिंता विवेकाधीन व्यय के लिए उपलब्ध राजकोषीय संभावना का सिकुड़ना है।
    • प्रतिबद्ध व्यय का प्रभुत्व: राजस्व व्यय का लगभग 43.3% वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में खर्च होता है।
      • सब्सिडी को शामिल करने पर यह आँकड़ा लगभग 60% तक पहुँच जाता है।
    • वेतन का प्रच्छन्न भाग: रिपोर्ट में अनुदान सहायता (वेतन) पर प्रकाश डाला गया है, जिसके तहत राज्य स्वायत्त निकायों को अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए धनराशि प्रदान करते हैं।
      • यह अक्सर राज्य के वेतन बिल के वास्तविक पैमाने को छिपा देता है, जिससे वास्तविक प्रतिबद्ध भार आधिकारिक वेतन मदों से भी अधिक हो जाता है।
    • पेंशन का भार: सात राज्य पहले से ही अपने कुल बजट का 15% से अधिक हिस्सा केवल पेंशन पर खर्च कर रहे हैं और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि तथा पेंशन सुधारों पर चल रही बहस के साथ इस आँकड़े में और वृद्धि होने की उम्मीद है।
  • ऋण स्थिरता और निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन: केंद्र सरकार द्वारा राजकोषीय अनुशासन के लक्ष्य निर्धारित किए जाने के बावजूद, कई राज्य उनका पालन करने में संघर्ष कर रहे हैं।
    • GSDP सीमा का उल्लंघन: 15वें वित्त आयोग ने GSDP के 33.1% की ऋण सीमा निर्धारित की थी।
      • हालाँकि, 13 राज्य पहले ही इस सीमा को पार कर चुके हैं, जिनमें अरुणाचल प्रदेश का ऋण घाटा 50.85% तक पहुँच गया है।
    • राजकोषीय घाटे में वृद्धि: GSDP के 3% के सांकेतिक मानक के बावजूद, वित्त वर्ष 2023-24 में 18 राज्यों का राजकोषीय घाटा इस सीमा से अधिक रहा।
    • बजट से बाहर की गारंटी: राज्यों द्वारा दी जाने वाली बकाया गारंटी (जिसमें सरकार किसी राज्य इकाई के ऋण चुकाने में चूक होने पर ऋण चुकाने का वादा करती है) पिछले दशक में लगभग तीन गुना बढ़कर ₹11.5 लाख करोड़ हो गई है।
      • इससे राज्य के खजाने पर एक महत्त्वपूर्ण आकस्मिक देयता जोखिम उत्पन्न होता है।
  • व्यय की निम्न गुणवत्ता: सार्वजनिक व्यय की ‘स्वास्थ्य स्थिति’ उपभोग और निवेश के अनुपात से निर्धारित होती है।
    • राजस्व बनाम पूँजी असंतुलन: राजस्व व्यय (संचालन लागत) 83.25% के साथ प्रभावी बना हुआ है, जिससे पूँजीगत व्यय (परिसंपत्ति निर्माण) के लिए केवल 16.75% ही बचता है।
    • गुणक प्रभाव का नुकसान: चूँकि पूँजीगत व्यय से बुनियादी ढाँचा तैयार होता है, जो भविष्य में राजस्व उत्पन्न करता है, इसलिए इसकी अपेक्षाकृत छोटी हिस्सेदारी सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) की भविष्य की वृद्धि क्षमता को सीमित करती है।
    • सब्सिडी का संकेंद्रण: सब्सिडी ऊर्जा (विद्युत) और कृषि में अत्यधिक केंद्रित है, जो कुल सब्सिडी का 73% है।
      • यह ‘लीकेज’ अक्सर धन को व्यावसायिक प्रशिक्षण या औद्योगिक प्रोत्साहन जैसे अधिक उत्पादक क्षेत्रों में स्थानांतरित होने से रोकता है।
  • दीर्घकालिक नकदी संकट: कुछ राज्यों के लिए अस्थायी नकदी प्रवाह प्रबंधन हेतु RBI पर निर्भरता आपातकालीन उपाय से हटकर एक नियमित आवश्यकता बन गई है।
  • लगातार अर्थोपाय अग्रिम (WMA) का उपयोग: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों ने एक वर्ष में 320 दिनों से अधिक समय तक अर्थोपाय अग्रिम (WMA) और ओवरड्राफ्ट का उपयोग किया।
  • मानकीकृत लेखांकन का अभाव (पारदर्शिता का अंतर)
    • विभिन्न मद: रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि राज्य व्यय के संबंध में अलग-अलग वर्गीकरण कोड (ऑब्जेक्ट हेड्स) का उपयोग करते हैं, जिससे पूरे देश में प्रदर्शन की सटीक तुलना करना मुश्किल हो जाता है।
    • कार्यान्वयन में देरी: हालाँकि CAG ने वित्त वर्ष 2027-28 तक एक समान प्रणाली में परिवर्तन अनिवार्य कर दिया है, लेकिन अंतरिम अवधि में डेटा की कमी और लेखांकन में विसंगतियाँ बनी हुई हैं, जो अखिल भारतीय राजकोषीय विश्लेषण में बाधा डालती हैं।

आगे की राह

  • व्यय की गुणवत्ता में सुधार (पूँजीगत और राजस्व): राज्यों का प्राथमिक उद्देश्य राजस्व व्यय (उपभोग) से पूँजीगत व्यय (निवेश) की ओर ध्यान केंद्रित करना होना चाहिए।
    • गुणक प्रभाव को लक्षित करना: राज्यों को आर्थिक क्षेत्र (बुनियादी ढाँचा, बिजली और परिवहन) पर खर्च को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि यहाँ खर्च किए गए प्रत्येक रुपये का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर राजस्व खर्च की तुलना में कहीं अधिक गुणक प्रभाव होता है।
    • सब्सिडी का युक्तिकरण: व्यापक आधार वाली सब्सिडी से लक्षित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) की ओर बढ़ना अत्यंत आवश्यक है। विशेष रूप से, बिजली और कृषि क्षेत्रों (जो सब्सिडी का 73% उपभोग करते हैं) में होने वाले रिसाव को रोकना होगा ताकि स्कूलों और अस्पतालों जैसे सामाजिक बुनियादी ढाँचे के लिए धन उपलब्ध कराया जा सके।
  • ऋण स्थिरता सुनिश्चित करना: 13 राज्यों द्वारा 33.1% की ऋण-से-GSDP सीमा को पार करने के साथ, राजकोषीय सुदृढ़ीकरण अब कोई विकल्प नहीं रह गया है।
    • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) लक्ष्यों का पालन: राज्यों को अपने राजकोषीय घाटे को 15वें वित्त आयोग द्वारा निर्धारित 3% के मानक के अनुरूप लाना होगा। ऋण की कड़ी निगरानी की जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसका उपयोग प्रतिबद्ध देनदारियों के वित्तपोषण के बजाय परिसंपत्ति निर्माण के लिए किया जाए।
    • आकस्मिक देनदारियों का प्रबंधन: राज्यों को अपने ‘गारंटी रिलीफ फंड’ (GRF) को मजबूत करना होगा। यह चिंता का विषय है कि पाँच राज्यों (बिहार, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, केरल, पंजाब) ने अभी तक यह कोष स्थापित नहीं किया है, जिसे राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा त्रुटि से बचाव के लिए संबोधित किया जाना चाहिए।
      • गारंटी रिलीफ फंड (GRF) के बारे में: ये राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) को दिए गए ऋणों या गारंटियों के पुनर्भुगतान को सुनिश्चित करने के लिए स्थापित आरक्षित निधियाँ हैं।
      • ये चूक के जोखिमों को कवर करने, राजकोषीय अनुशासन और साख बनाए रखने के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती हैं।
  • राजस्व वृद्धि (SOTR को बढ़ावा देना): केंद्रीय हस्तांतरण और अनुदानों पर निर्भरता कम करने के लिए, राज्यों को अपने कर आधारों का विस्तार करना होगा।
    • कर राजस्व में सुधार: राज्यों को GST अनुपालन और लेखापरीक्षा में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना चाहिए। चूँकि वर्तमान में कर राजस्व अनुपात 0.92 है, इसलिए बेहतर प्रशासन के माध्यम से कर वृद्धि को आर्थिक वृद्धि से आगे ले जाने की पर्याप्त संभावना है।
    • राज्यों द्वारा गैर कर राजस्व (SNTR) का प्रयोग: राज्यों को राज्य सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (SPSU) के प्रबंधन का आधुनिकीकरण करना चाहिए, ताकि वे सरकारी खजाने पर बोझ बनने के बजाय नियमित लाभांश और ब्याज प्रदान करें।
  • लेखांकन में संरचनात्मक सुधार (वर्ष 2027 का अधिदेश): पारदर्शिता राजकोषीय अनुशासन की आधारशिला है। CAG का ऑब्जेक्ट हेड्स को मानकीकृत करने का निर्देश एक महत्त्वपूर्ण सुधार है।
    • एकीकृत लेखा प्रणाली: वित्त वर्ष 2027-28 तक सामान्य मद शीर्षों की संशोधित सूची को अपनाकर भारत ‘एक राष्ट्र-एक लेखा प्रणाली’ का मानक प्राप्त कर लेगा। इससे सार्वजनिक धन के व्यय की सबसे सूक्ष्म स्तर पर वास्तविक समय में तुलना करना संभव हो सकेगा।
    • बजट से बाहर के उधारों की निगरानी: सरकारी गारंटी द्वारा समर्थित, लेकिन अक्सर सरकारी संस्थाओं द्वारा लिए गए प्रच्छन्न ऋणों को मुख्य बजट बैलेंस शीट पर लाने के लिए उन्नत प्रकटीकरण मानदंडों की आवश्यकता है।
  • विवेकपूर्ण नकदी प्रबंधन: अर्थोपाय अग्रिम (WMA) पर लगातार निर्भरता खराब वित्तीय नियोजन का संकेत है।
    • ट्रेजरी सिंगल अकाउंट (TSA): एक मजबूत TSA प्रणाली लागू करने से राज्यों को अपने नकदी शेष की वास्तविक समय में निगरानी करने में मदद मिल सकती है, जिससे RBI से महँगे अल्पकालिक ऋण लेने की आवश्यकता कम हो जाएगी।
    • व्यय प्रवाह को सुचारू बनाना: राज्यों को वित्तीय वर्ष के अंत में ‘मार्च रश’ (March Rush) से बचना चाहिए और इसके बजाय राजस्व पैटर्न के अनुरूप पूरे वर्ष व्यय का एक स्थिर प्रवाह सुनिश्चित करना चाहिए।

निष्कर्ष

CAG के दूसरे संस्करण में राज्यों के लिए राजकोषीय स्वायत्तता बढ़ाने, पूँजीगत व्यय को प्राथमिकता देने, सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और ऋण स्थिरता मानदंडों का पालन करने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया गया है। ये सुधार राजकोषीय संघवाद को मजबूत करेंगे, व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करेंगे और पूरे भारत में समान तथा सतत् विकास को बढ़ावा देंगे।

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