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Jan 09 2026

अलेप्पो, सीरिया

हाल ही में, नागरिकों की निकासी के बाद सीरियाई सरकारी बलों और कुर्द नेतृत्व वाले सीरियाई डेमोक्रेटिक फोर्सेज (एसडीएफ) के बीच अलेप्पो में झड़प हुईं, जो अवरुद्ध सैन्य एकीकरण प्रयासों और बढ़ती मानवीय चिंताओं को रेखांकित करती हैं।

अलेप्पो शहर के बारे में 

  • अवस्थिति : अलेप्पो उत्तरी सीरिया में तुर्की सीमा के निकट स्थित है।
  • स्थिति: यह सीरिया का सर्वाधिक आबादी वाला शहर और इसका पूर्व वाणिज्यिक और औद्योगिक केंद्र है।
  • सामरिक महत्व: अलेप्पो अनातोलिया, मेसोपोटामिया और भूमध्य सागर को जोड़ने वाले व्यापार मार्गों के केंद्र में स्थित है।
  • संघर्ष का इतिहास: सीरियाई गृहयुद्ध के समय यह शहर एक प्रमुख युद्धक्षेत्र था और इसने सरकारी बलों और गैर-राज्य सशस्त्र समूहों के बीच निरंतर संघर्ष देखा है।
  • हालिया विवाद का केंद्र : शेख मकसूद और अशरफियेह के आसपास के इलाकें जो मुख्य रूप से कुर्द बहुल क्षेत्र है हिंसा का  वर्तमान केंद्र है।

सीरिया के बारे में 

  • अवस्थिति : सीरिया एक पश्चिम एशियाई देश है जो उत्तरी और पूर्वी गोलार्ध में स्थित है।
    • यह भूमध्य सागर के पूर्वी तट पर स्थित है।
  • राजधानी: दमिश्क
  • सीमाएँ:
    • तुर्की – उत्तर
    • इराक – पूर्व और दक्षिणपूर्व
    • जॉर्डन – दक्षिण
    • इजराइल और लेबनान – दक्षिण पश्चिम
  • भौतिक भूगोल:
    • पश्चिमी सीमा पर एंटी लेबनान पर्वतमाला
    • माउंट हर्मन (2,814 मीटर) सबसे ऊँची चोटी है।
    • फरात (Euphrates) नदी और इसकी सहायक खाबुर नदी प्रमुख नदी तंत्र का निर्माण करती हैं।
    • अल-असद झील एक प्रमुख मानव निर्मित जलाशय है।
    • सीरियाई मरुस्थल का विस्तार पूर्वी सीरिया के अधिकांश भू-क्षेत्र में है।
  • जलवायु:
    • पश्चिमी क्षेत्रों में हल्की,
    • शीतकाल  और ऊष्ण, शुष्क ग्रीष्मकाल के साथ भूमध्यसागरीय जलवायु
    • पूर्व में शुष्क रेगिस्तानी जलवायु
  • महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ:
    • समृद्ध लेवंट (Levant) क्षेत्र
      • लेवंट पूर्वी भूमध्यसागरीय पश्चिम एशिया में एक महत्त्वपूर्ण-भौगोलिक क्षेत्र है, जिसमें सीरिया, लेबनान, इजराइल, फिलिस्तीन, जॉर्डन और दक्षिणी तुर्की के कुछ भाग शामिल हैं।
    • शिया-सुन्नी संघर्षों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र और अरब स्प्रिंग आंदोलन से प्रभावित एक मुख्य क्षेत्र।

ओलिव रिडले टर्टल   (लेपिडोचेलिस ओलिवेसिया)

हाल ही में, चेन्नई के समुद्र तटों पर मृत कछुओं की बढ़ती संख्या के बीच ओलिव रिडले टर्टल के घोंसलों को वन विभाग की हैचरी (hatcheries) में स्थानांतरित कर दिया गया और तटीय गश्त को बढाया गया  है।

ओलिव रिडले टर्टल (लेपिडोचेलिस ओलिवेसिया)

  • ऑलिव रिडले टर्टल समुद्री कछुओं की सबसे छोटी और सबसे प्रचुर प्रजाति है, जिसका नाम इसके खोल के जैतून-हरे रंग के नाम पर रखा गया है।
  • पर्यावास: यह गर्म उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय समुद्री जल में निवास करता है, अपने घोंसले बनाने के लिए नदी मुहाने और खाड़ियों के पास तटीय क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है।
  • वितरण: ओलिव रिडले टर्टल हिंद, प्रशांत और अटलांटिक महासागरों में पाए जाते हैं।
    • भारत में, मुख्य रूप से ओडिशा तट, अंडमान द्वीप समूह, तमिलनाडु और कर्नाटक (पश्चिमी तट पर एकमात्र घोंसला स्थल) पर घोंसले बनाते हैं।
  • आहार: ये सर्वाहारी हैं, शैवाल, जेलिफिश, केकड़े, झींगा मछली, मोलस्क और ट्यूनिकेट्स इनके भोजन में शामिल हैं।
  • घोंसला बनाने की प्रथा: इस अनूठी विशेषता को अरिबाडा’ (Arribada) कहा जाता  है, यह सामूहिक रूप से घोंसला बनाने की घटना है जहाँ हजारों मादाएँ एक ही समुद्र तट पर एक साथ अंडे देती हैं।
    • भारत में, प्रमुख अरिबाडा स्थलों में गहिरमाथा, देवी नदी का मुहाना और ओडिशा में रुशिकुल्या शामिल हैं।
    • प्रत्येक मादा जनवरी और अप्रैल के मध्य अधिकांश रात्रि के समय लगभग 100-140 अंडे देती है।
  • संरक्षण स्थिति
    • IUCN रेड लिस्ट: सुभेद्य
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची I
    • CITES: परिशिष्ट-I
  • संकट: प्रमुख खतरों में मछली पकड़ने के जाल को फँसना, तटीय विकास, जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण, अंडों को अवैध रूप से एकत्र करना या हार्वेस्ट आदि शामिल हैं।

भारत में संरक्षण के प्रयास

  • ओडिशा के तट पर घोंसले बनाने वाले कछुओं की सुरक्षा के लिए भारतीय तट रक्षक द्वारा ऑपरेशन ओलिविया का संचालन।
  • प्रजनन  समय में मतस्यन गतिविधियों पर प्रतिबंध और बायकैच से बचने के लिए टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) का उपयोग करना।
  • गहिरमाथा समुद्री अभयारण्य जैसे संरक्षित घोंसले वाले समुद्र तट।
  • चेन्नई और ओडिशा में हैचरी सहित पूर्व-स्थाने संरक्षण
    • स्टूडेंट्स सी टर्टल कंजर्वेशन नेटवर्क (एसएसटीसीएन) जैसे गैर सरकारी संगठन हैचरी के प्रबंधन में वन विभाग के साथ मिलकर कार्य करते हैं।
    • भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा फ्लिपर टैगिंग और रेडियो टेलीमेट्री के माध्यम से वैज्ञानिक निगरानी करना।

बायो-बिटुमेन

वर्ष 2026 में, भारत सड़क निर्माण हेतु व्यावसायिक रूप से बायो-बिटुमेन का उत्पादन करने वाला विश्व का प्रथम देश बन गया, जो हरित बुनियादी अवसंरचना की दिशा में एक प्रमुख कदम है।

भारत में बायो-बिटुमेन की मुख्य विशेषताएँ 

  • विकास: स्वदेशी बायो-बिटुमेन प्रौद्योगिकी सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRIE), नई दिल्ली और सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP), देहरादून द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है।
  • परियोजना संचालन: जोराबाट-शिलांग एक्सप्रेसवे (एनएच-40), मेघालय पर 100 मीटर के परीक्षण खंड के माध्यम से इस परियोजना का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है।
  • लक्ष्य: जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करते हुए और फसल अवशेषों (Crop Residues) का प्रबंधन करते हुए, भारत के सड़क बुनियादी ढाँचे को स्वच्छ, हरित और चक्रीय अर्थव्यवस्था-आधारित राजमार्गों की ओर परिवर्तित करना।
  • आर्थिक लाभ: 20-30% पारंपरिक बिटुमेन को हस्तांतरित करना तथा सालाना 25,000-30,000 करोड़ रुपये के आयात को कम करने की क्षमता, आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को बढ़ावा देना।

बायो-बिटुमेन के बारे में 

  • बायो-बिटुमेन पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन का एक संधारणीय विकल्प है, जिसे बायोमास और कृषि अपशिष्टों का उपयोग करके विकसित किया गया है।
  • पारंपरिक बिटुमेन कच्चे तेल से प्राप्त एक काला, चिपचिपा हाइड्रोकार्बन का मिश्रण है और सड़क निर्माण में एक बंधक पदार्थ (Binding Material) के रूप में उपयोग किया जाता  है।
  • बायो-बिटुमेन आंशिक रूप से या पूर्णत: जीवाश्म-आधारित बिटुमेन को प्रतिस्थापित करता है।

मुख्य विशेषताएँ

  • नवीकरणीय स्रोत-आधारित: फसल अवशेष और बायोमास अपशिष्ट से उत्पादित।
  • न्यूनतम कार्बन फुटप्रिंट: कच्चे तेल पर निर्भरता कम करता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती करता है।
  • प्रदर्शन-संगत: पारंपरिक बिटुमेन की तुलना में बंधक या बाध्यकारी गुणों के साथ सड़क निर्माण के लिए उपयुक्त।
  • अपशिष्ट उपयोग: कृषि अपशिष्ट को मूल्य वर्धित उत्पाद में परिवर्तित करता है।

महत्व

  • पर्यावरणीय लाभ: फसल अपशिष्ट जलाने को हतोत्साहित करता है  और जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन को न्यूनतम कर वायु प्रदूषण को कम करने में मदद करता है।
  • स्वच्छ बुनियादी ढाँचा: हरित और संधारणीय राजमार्गों के विकास का बढ़ावा देता है।
  • आर्थिक लाभ: कच्चे तेल के आयात को कम करता है और संसाधन दक्षता को बढ़ाता है।
  • नीति संरेखण: यह अपशिष्ट से धन, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 जैसे राष्ट्रीय मिशनों की दिशा में आगे बढ़ाने में सहायक है।
  • वैश्विक नेतृत्व: भारत को पर्यावरण-अनुकूल सड़क निर्माण प्रौद्योगिकियों में अग्रणी के रूप में स्थापित करता है।

भारत द्वारा बायो-बिटुमेन को व्यावसायिक रूप से अपनाना निम्न-कार्बन, चक्रीय और आत्मनिर्भर बुनियादी ढाँचे के विकास की दिशा में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाता है।

धूल डिटेक्टर उपकरण (DEX)

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भारत के पहले घरेलू स्तर पर विकसित धूल डिटेक्टर उपकरण DEX द्वारा अंतरग्रहीय धूल कणों (IDP) का सफलतापूर्वक  पता लगाने की सूचना दी है।

धूल प्रयोग (DEX) के बारे में 

  • DEX (धूल प्रयोग) भारत का पहला स्वदेशी उपकरण है जिसे तीव्र गति के अंतरग्रहीय धूल कणों (IDPs) का पता लगाने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • अंतरग्रहीय धूल कण (IDPs): IDPs धूमकेतु और क्षुद्रग्रहों के सूक्ष्म टुकड़े हैं जो लगातार पृथ्वी के वायुमंडल पर अपनी बौछार करते हैं।
    • जब ये कण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, तो वे उल्का परत” का निर्माण करते हैं और जमीन से टूटते तारों के रूप में दिखाई देते हैं।
  • विकास: DEX अहमदाबाद में इसरो की भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला द्वारा विकसित तीन किलोग्राम का उपकरण है।
  • प्रक्षेपण : इसे PSLV-C58/एक्स्पोसैट मिशन के हिस्से के रूप में PSLV ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (POEM-3) के आधार पर जनवरी, 2024 में लॉन्च किया गया था।
  • मुख्य परिणाम: 1 जनवरी से 9 फरवरी, 2024 तक, DEX ने सफलतापूर्वक कई धूल प्रभाव संकेतों को रिकॉर्ड किया, लगभग प्रत्येक  1,000 सेकंड में प्रभावों का पता लगाया।
    • इसने लगभग 6.5 × 10⁻³ कण प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकंड का धूल प्रवाह मापा, जो संचालित ब्रह्मांडीय बमबारी की पुष्टि करता है।
  • भविष्य के अनुप्रयोग: DEX आगामी मिशनों के लिए समान उपकरणों के लिए एक प्रोटोटाइप के रूप में कार्य करता है, जो चंद्रमा के चारों ओर, शुक्र के सघन वातावरण या मंगल के विरल वातावरण में धूल को मापने में सक्षम बनाता है।

PSLV-C62/EOS-N1 मिशन

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 12 जनवरी, 2026 को PSLV-C62/EOS-N1 मिशन प्रक्षेपित करने वाला है।

PSLV-C62/EOS-N1 मिशन के बारे में 

  • प्रक्षेपण विवरण: 12 जनवरी, 2026 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र , श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश से निर्धारित।
  • PSLV-C62/EOS-N1 मिशन वर्ष 2026 में इसरो का पहला प्रक्षेपण है।
  • प्रक्षेपण यान: ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV)।
    • मई 2025 में PSLV-C61 की आंशिक विफलता के बाद यह PSLV की 64वाँ वापसी-उड़ान मिशन है।
  • प्राथमिक पेलोड: EOS-N1 (जिसे अन्वेषा के नाम से भी जाना जाता है)।
  • द्वितीयक पेलोड: लगभग 18 सह-यात्री पेलोड, जिसमें भारतीय स्टार्टअप और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के वाणिज्यिक और प्रायोगिक उपग्रह शामिल हैं।

EOS-N1 (अन्वेषा) उपग्रह

  • EOS-N1, कोडनेम-अन्वेषा (संस्कृत में जिसका अर्थ है “अन्वेषण”), एक उन्नत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है।
  • इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा मुख्य रूप से रणनीतिक और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए विकसित किया गया है।
  • मुख्य विशेषताएँ: हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सेंसर से युक्त जो सैकड़ों संकीर्ण वर्णक्रमीय बैंड (दृश्यमान प्रकाश से परे, अवरक्त और अन्य तरंग दैर्ध्य में) में डेटा एकत्रित करता है।
    • यह कृषि, शहरी मानचित्रण, पर्यावरण निगरानी और संसाधन मूल्यांकन जैसे नागरिक अनुप्रयोगों का भी समर्थन करता है।

अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE)–2026 

जनवरी 2026 में, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण प्रोटोकॉल का पालन करते हुए, तमिलनाडु के अनामलाई बाघ अभयारण्य में अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) -2026 क्षेत्र सर्वेक्षण शुरू हुआ।

अखिल भारतीय बाघ आकलन (AITE) के बारे में

  • अखिल भारतीय बाघ आकलन विश्व का सबसे बड़ा वन्यजीव निगरानी अभ्यास है, जो भारत भर में बाघों की आबादी, शिकार आधार, सह-शिकारियों और आवास की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए प्रत्येक चार वर्ष में आयोजित की जाती है।
  • द्वारा संचालित: यह संयुक्त रूप से राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा राज्य वन विभागों की सक्रिय भागीदारी के साथ संचालित किया जाता है।
  • आवृत्त क्षेत्र: इस अभ्यास में देश भर में सभी बाघ अभयारण्यों, बाघ वाले वन प्रभागों को शामिल किया गया है।
  • आवधिकता: AITE प्रत्येक चार वर्ष में एक बार आयोजित की जाती है।
    • वर्तमान में छठा चक्र (AITE-2026) संचालित है, जिसकी अंतिम रिपोर्ट वर्ष 2027 तक आने की उम्मीद है।
  • बाघ गणना के लिए प्रयुक्त पद्धतियाँ
  • एम-स्ट्रिप्स (M-STrIPES) ऐप: बाघ-गहन सुरक्षा और पारिस्थितिक स्थिति के लिए निगरानी प्रणाली (एम-स्ट्रिप्स) बाघ के संकेतों और गश्ती डेटा की जीपीएस-आधारित डिजिटल निगरानी है।
  • कैमरा ट्रैप:  वैयक्तिक बाघ की पहचान के लिए चित्र खींचना।
  • प्रतीक सर्वे: पगमार्क, मल  और खुरचने के निशान को ट्रैक करना।
  • रेखा ट्रांसेक्ट्स: शिकार प्रजातियों के घनत्व का अनुमान।
  • आनुवंशिक नमूनाकरण: अवशेषों और बालों के नमूनों से DNA का  विश्लेषण।

भारत में बाघों की वर्तमान स्थिति

  • बाघों की कुल संख्या: नवीनतम ALTE (2022) रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जंगली बाघों की औसत आबादी 3,682 (3,167 से 3,925 तक) है, जो दुनिया की कुल बाघ आबादी का लगभग 75% है।
    • सर्वाधिक बाघों वाला राज्य: मध्य प्रदेश (785 बाघ)
    • अधिकतम बाघों वाला बाघ अभयारण्य: जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखंड) (260 बाघ)
  • कुल बाघ अभयारण्य: वर्ष 2025 तक, भारत में 18 राज्यों में विस्तृत 58 अधिसूचित बाघ अभयारण्य हैं।
    • नवीनतम अभयारण्य मध्य प्रदेश का माधव बाघ अभयारण्य है
    • भारत में मध्य प्रदेश में बाघ अभ्यारण्यों की संख्या सबसे अधिक है, नौ बाघ अभयारण्य इसे “टाइगर स्टेट” का दर्जा प्रदान करते हैं।
  • संरक्षण में सफलता: प्रथम AITE (2006) के बाद से बाघों की आबादी में लगभग 6% की उल्लेखनीय वार्षिक वृद्धि दर देखी गई है।
    • यह 1973 में शुरू की गई सरकार की प्रमुख संरक्षण पहल, प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता को दर्शाता है।

अनामलाई बाघ अभयारण्य (ATR)

  • वर्ष 2007 में बाघ अभयारण्य घोषित, अन्नामलाई बाघ अभयारण्य दक्षिणी पश्चिमी घाट में स्थित एक प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट है।
  • अवस्थिति: तमिलनाडु के कोयंबटूर और तिरुप्पुर जिलों की अनामलाई पहाड़ियों में, पलक्कड़ दर्रे के दक्षिण में और परम्बिकुलम बाघ अभयारण्य (केरल) के निकटवर्ती स्थित है।
  • वनस्पति: यह आर्द्र सदाबहार, अर्द्ध-सदाबहार, नम और शुष्क पर्णपाती, शोला वन, पर्वतीय घास के मैदान, सवाना और दलदली घासभूमियों का समर्थन करता है।
  • संरक्षित जीव: प्रमुख प्रजातियों में बाघ, एशियाई हाथी, तेंदुआ, सांभर, चित्तीदार हिरण, बार्किंग डियर, गौर और जंगली बिल्ली शामिल हैं।
    • यह नीलगिरि तहर और नीलगिरि लंगूर जैसी कई स्थानिक प्रजातियों  का भी आवास स्थल है।

इंडसफूड 2026 

इंडसफूड 2026, भारत की प्रमुख वैश्विक खाद्य और पेय (food and beverage) प्रदर्शनी, ग्रेटर नोएडा में (8 से 10 जनवरी 2026 तक) आयोजित की जा रही है।

इंडसफूड के बारे में 

  • आयोजक: भारतीय व्यापार संवर्द्धन परिषद (TPCI)।
  • इंडसफूड को एशिया की प्रमुख खाद्य और पेय व्यापार प्रदर्शनी के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो भारतीय उत्पादकों, वैश्विक खरीदारों, नीति निर्माताओं और संस्थानों को एक साथ लाती है।
  • सरकार का समर्थन: प्रदर्शनी का उद्घाटन केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री द्वारा किया गया।
  • अंतरराष्ट्रीय भागीदारी: 120 से अधिक देश इसमें भाग ले रहे हैं।

प्रमुख पहलें और विशेषताएँ

  • भारत-UAE खाद्य गलियारा: खाद्य सुरक्षा, रसद एकीकरण और द्विपक्षीय व्यापार को मजबूत करने के लिए अबू धाबी फूड हब के सहयोग से शुरू किया गया।
  • एपीडा की भारती पहल: एक मंच जो नवीन कृषि-खाद्य स्टार्ट-अप को प्रदर्शित करता है और उन्हें सीधे वैश्विक खरीदारों से जोड़ता है।
    • इस पहल का उद्देश्य भारत के कृषि-खाद्य क्षेत्र में नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देना है।
  • डीपी वर्ल्ड द्वारा भारत मार्ट: यह भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए निर्यात अवसंरचना, रसद दक्षता और नीति संवाद पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • विश्व पाक विरासत सम्मेलन: यह पाक कला में विरासत संरक्षण और नवाचार पर चर्चा करने के लिए शेफ, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के प्रमुखों को एक मंच पर लाता है।
  • कौशल विकास: इंडिया इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्यूलिनरी लीडरशिप (ICICCL), लेवल-1 ‘भारतीय व्यंजन के राजदूत’ प्रमाणन की पेशकश करने वाले भारतीय व्यंजन कार्यक्रम के राजदूत के तहत 150 शेफ को प्रशिक्षित करेगा।
  • इंडिया ऑन ए प्लैटर’ गाला डिनर: यह मंत्रियों, राजदूतों, वैश्विक खरीदारों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों को एक साथ लाएगा, जो वैश्विक खाद्य और पेय उद्योग में भारत की भूमिका को मजबूत करेगा।
    • इसकी मेजबानी वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा की जाती है।

संदर्भ

संयुक्त राष्ट्र ने चरागाह पारिस्थितिकी प्रणालियों के वैश्विक महत्त्व को उजागर करने के लिए वर्ष 2026 को अंतरराष्ट्रीय चरागाह और पशुपालक वर्ष घोषित किया है।

अंतरराष्ट्रीय चरागाह और पशुपालक वर्ष (2026) के बारे में

  • घोषणाकर्ता: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) और खाद्य और कृषि संगठन (FAO) और अन्य संयुक्त राष्ट्र निकायों द्वारा समर्थित।

वर्ष 2026 के लिए अन्य थीम 

  • अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष (IYWF 2026): यह खाद्य सुरक्षा और आर्थिक लचीलेपन में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका को पहचानते हुए, कृषि-खाद्य प्रणालियों में लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है।
  • सतत् विकास के लिए स्वयंसेवकों का अंतरराष्ट्रीय वर्ष (IVY 2026): लचीले समुदायों के निर्माण और सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने में स्वयंसेवकों के योगदान को  समर्थन और मान्यता देता है।

  • उद्देश्य
    • जलवायु कार्रवाई, जैव विविधता संरक्षण और खाद्य सुरक्षा में चरागाह और घासभूमियों को महत्त्वपूर्ण लेकिन प्रायः उपेक्षित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में मान्यता देना।
    • वैश्विक जलवायु और संरक्षण नीतियों में वन-केंद्रित पूर्वाग्रह में सुधार करना।
  • मुख्य फोकस क्षेत्र:
    • घासभूमियों को जलवायु नीतियों, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs), और भूमि क्षरण रणनीतियों के साथ एकीकृत करना।
    • रियो सम्मेलन के बीच सामंजस्य को मजबूत करना:
      • UNFCCC (जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन)
      • CBD (जैव विविधता पर अभिसमय)
      • UNCCD (मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय)
      • स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों और समुदाय के नेतृत्व वाले भूमि प्रबंधन को बढ़ावा देना।

चरागाह और पशुपालकों के बारे में जानकारी 

  • चरागाहों में घासभूमियाँ, सवाना, झाड़ियाँ और रेगिस्तान शामिल हैं, जो पृथ्वी की भूमिगत सतह के एक-तिहाई से अधिक हिस्से को शामिल करते हैं।
  • पशुपालक ऐसे समुदाय हैं जो पशुधन चारण पर निर्भर रहते हैं, और विविधतापूर्ण जलवायु संवेदनशील क्षेत्रों में निवास करते हैं।

पशुपालक समुदाय   भौगोलिक क्षेत्र (चरागाह) पशु समूह
मसाई पूर्वी अफ्रीका  (सवाना)

(केन्या और तंजानिया)

मवेशी, बकरी, भेड़
मंगोलियाई खानाबदोश मंगोलियाई स्टेपी मैदान 

(मध्य एशिया)

घोड़े, भेड़, बकरी, ऊँट, याक
बद्दू या बदूईन मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका

(शुष्क/अर्द्ध-शुष्क रेगिस्तान)

ऊँट, बकरी, भेड़
सामी उत्तरी यूरोप और रूस

(टुंड्रा)

बारहसिंगा (रेंडियर)
राईका/रबारी राजस्थान और गुजरात (बन्नी घासभूमियाँ) ऊँट, भेड़, बकरी

पारिस्थितिक संतुलन में चरागाह भूमि की भूमिका

  • महत्त्वपूर्ण कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते है, प्रायः वनों की तुलना में भूमि के नीचे अधिक कार्बन जमा होता है।
  • जल विनियमन का समर्थन करते है, मृदा अपरदन को रोकते है, और भूदृश्य अनुकूलन बनाए रखते है।
  • प्रवासी प्रजातियों और स्थानिक वनस्पतियों और जीवों सहित उच्च जैव विविधता को बनाए रखना।
  • वन पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करते है जैसा कि ऑस्ट्रेलिया के रेगिस्तानी घास के मैदानों और ब्राजील के सेराडो सवाना जैसे स्थानों पर देखा गया है।
    • यह दर्शाता है कि “घासभूमियों के बिना, जंगल अस्तित्त्व में नहीं रह सकते”, यह उनकी परस्पर जुड़ी पारिस्थितिक भूमिका को रेखांकित करता है।

भारत और चरागाह 

  • भारत में घासभूमियाँ लगभग 18 मंत्रालयों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, जिससे खंडित शासन और परस्पर विरोधी नीति उद्देश्य पैदा होते हैं।
  • नीतिगत विरोधाभास: जबकि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय घासभूमियों को वनीकरण के स्थलों के रूप में दर्शाता है, भारत का ‘बंजर भूमि एटलस’ प्रायः उन्हें डायवर्जन के लिए वर्गीकृत करता है।
  • एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता: UNFCCC, CBD और UNCCD लक्ष्यों के साथ संरेखित अंतर-मंत्रालयी समन्वय घासभूमियों को भारत की जलवायु, जैव विविधता और भूमि-उपयोग नीतियों में एकीकृत करने में मदद कर सकता है।
  • NDCs लक्ष्यों की कुंजी: घास के मैदानों को कार्बन सिंक के रूप में मान्यता देकर, भारत वर्ष 2030 तक जलवायु शमन और पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित दृष्टिकोण को मजबूत करते हुए, वनों से परे भी अपने NDCs कार्बन-सिंक लक्ष्य का विस्तार कर सकता है।

चरागाह और पशुपालकों का महत्त्व 

  • वैश्विक स्तर पर करोड़ों लोगों को आजीविका और खाद्य सुरक्षा प्रदान करते है।
  • स्थानीय चारण, अग्नि प्रबंधन और वनाग्नि के जोखिम को कम करती हैं और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को सुधारती हैं।
  • चरागाहों का संरक्षण करने से सामाजिक न्याय को भी बढ़ावा मिलता है, इससे स्वदेशी और पारंपरिक समुदायों के भूमि अधिकारों को सुरक्षित किया जा सकता है।

संदर्भ

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025 का मसौदा जारी किया है, जिसमें कीटनाशक अधिनियम, 1968 और कीटनाशक नियम, 1971 को प्रतिस्थापित करने के लिए सार्वजनिक टिप्पणियाँ आमंत्रित की गई हैं।

कीटनाशक ऐसे रासायनिक या जैविक एजेंट होते हैं, जिनका उद्देश्य कीटों को रोकना, नष्ट करना, आकर्षित करना, भगाना, कम करना या नियंत्रित करना होता है, जिनमें कीट, खरपतवार, कवक तथा अन्य जीव शामिल हैं, जो फसलों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।

भारत में कीटनाशकों का उपयोग

  • FAO (2022) के अनुसार, भारत ने वर्ष 2020 में 61,000 टन से अधिक कीटनाशकों का उपयोग किया।
    • यह ब्राजील (377,000), चीन (273,000 टन), अर्जेंटीना (241,000 टन) जैसे देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है।
  • भारत में कीटनाशक उत्पादन: वर्ष 2022–2023 में भारत ने 258,130 टन कीटनाशकों का उत्पादन किया।
    • यह वर्ष 1998 के 102,240 टन के उत्पादन की तुलना में दो गुना वृद्धि को दर्शाता है।
  • निर्मित कीटनाशक: वर्तमान में, भारत में कुल 293 पंजीकृत कीटनाशकों में से 104 कीटनाशकों का निर्माण किया जा रहा है।
  • भारत में प्रतिबंधित कीटनाशक: अप्रैल 2022 तक, भारत ने 46 कीटनाशकों और 4 कीटनाशक फॉर्मुलेशनों पर प्रतिबंध लगाया है।

मसौदा विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • समग्र विनियमन
    • एकीकृत विनियामक प्रणाली: यह विधेयक कीटनाशकों के विनियमन को केंद्रीकृत करता है, जिसमें निर्माण, आयात, बिक्री, परिवहन, उपयोग और निपटान सहित सभी पहलुओं (पूर्ण जीवन-चक्र) का प्रबंधन शामिल है।
    • केंद्र के अंतर्गत नियंत्रण: कीटनाशक विनियमन को संघीय विषय बनाया जाएगा, जिससे समय के साथ विकसित हुई खंडित राज्य-स्तरीय विनियमन प्रणाली का स्थान लिया जाएगा।
  • दो-स्तरीय संस्थागत संरचना
    • केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड: कीटनाशक विनियमन से संबंधित वैज्ञानिक और तकनीकी मामलों पर एक परामर्शदायी निकाय।
    • पंजीकरण समिति: यह कीटनाशक का पंजीकरण करने, समीक्षा करने, निलंबित करने या रद्द करने के लिए उत्तरदायी कार्यकारी प्राधिकरण है।
      • इस निकाय को यह सुनिश्चित करने का कार्य सौंपा जाएगा कि पूर्व पंजीकरण के बिना कोई भी कीटनाशक निर्मित या आयातित न हो।
  • किसान-केंद्रित दृष्टिकोण
    • किसान-केंद्रित: यह मसौदा विधेयक अंधाधुंध कीटनाशक उपयोग के खतरों से किसानों और उपभोक्ताओं संरक्षण प्रदान करता है।
    • पारदर्शिता और अनुरेखणीयता: डिजिटल प्रक्रियाओं के माध्यम से कीटनाशक आपूर्ति शृंखला में बेहतर पारदर्शिता और अनुरेखणीयता।
    • अनिवार्य डिजिटल अभिलेख: पंजीकरण, लाइसेंसिंग, निरीक्षण और अभिलेख-रक्षण को डिजिटल रूप से प्रबंधित किया जाएगा, जिससे किसानों को सेवा प्रदाय में सुधार होगा।
  • कीटनाशक पंजीकरण को सरलीकृत करना
    • समयबद्ध पंजीकरण: पंजीकरण समिति को 12 माह के अंतर्गत कीटनाशक पंजीकरण पर निर्णय लेना होगा, जिसे 18 माह तक बढ़ाया जा सकता है। सामान्य (जेनरिक) कीटनाशकों के लिए, यदि इस अवधि के भीतर कोई निर्णय नहीं लिया जाता है, तो स्वचालित रूप से स्वीकृति प्रदान की जाएगी।
    • सामान्य कीटनाशकों के लिए शीघ्र अनुमोदन: यह विधेयक विलंब को कम करने और अनुमोदन प्रक्रिया को सरलीकृत कर प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित करने का प्रयास करता है।
  • नकली और खराब  कीटनाशकों पर सख्त नियंत्रण:
    • कठोर दंड: यह विधेयक अवैध गतिविधियों को हतोत्साहित करने के लिए नकली और घटिया कीटनाशकों पर अधिक दंडात्मक प्रावधान लागू करता है।
    • परीक्षण प्रयोगशालाओं का प्रत्यायन: यह सुनिश्चित करने के लिए कीटनाशक परीक्षण प्रयोगशालाओं का अनिवार्य प्रत्यायन कि बाजार में केवल क्वालिटी-सर्टिफाइड उत्पाद ही उपलब्ध हों।
  • प्रवर्तन शक्तियाँ:
    • निरीक्षण और जब्ती: निरीक्षकों को परिसरों में प्रवेश करने, भंडार जब्त करने, बिक्री रोकने और परीक्षण हेतु नमूने लेने का अधिकार होगा।
    • पंजीकरण का निलंबन और रद्दीकरण: यदि मानव स्वास्थ्य, पशुओं या पर्यावरण के लिए जोखिम के प्रमाण मिलते हैं, तो कीटनाशक पंजीकरण की समीक्षा कर उन्हें निलंबित किया जा सकता है।
  • राज्य-स्तरीय दंड: राज्य प्राधिकरण विधेयक के अंतर्गत विशिष्ट दंड संरचनाएँ निर्धारित करेंगे, जिससे राष्ट्रीय ढाँचे के अनुरूप अनुपालन सुनिश्चित हो सके, साथ ही क्षेत्रीय लचीलापन भी बना रहे।

मसौदा कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025 बनाम कीटनाशक अधिनियम, 1968

पहलू कीटनाशक अधिनियम, 1968 कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025
विनियमन का दायरा मुख्य रूप से कीटनाशकों (इंसेक्टिसाइड्स) पर केंद्रित। सभी कीटनाशकों (रासायनिक और जैविक) को शामिल करता है, जिनमें पौध वृद्धि नियामक, पोस्ट हार्वेस्टिंग संबंधी कीटनाशक तथा घरेलू उपयोग के कीटनाशक भी शामिल हैं।
संस्थागत ढाँचा भूमिकाओं का स्पष्ट पृथक्करण नहीं था; उत्तरदायित्वों में अतिव्यापन था। केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (परामर्शात्मक भूमिका), पंजीकरण समिति (विनियामक निर्णय) और कीटनाशक निरीक्षकों का गठन।
डिजिटल शासन पंजीकरण और लाइसेंसिंग के लिए मुख्यतः मैनुअल प्रक्रियाएँ। कानूनी समय-सीमा के साथ ऑनलाइन पंजीकरण और लाइसेंसिंग।

निर्धारित समय-सीमा के भीतर प्राधिकरण द्वारा कार्रवाई न करने पर अनुमानित (डीम्ड) पंजीकरण।

प्रवर्तन दृष्टिकोण उल्लंघनों के लिए आपराधिक अभियोजन पर अधिक निर्भरता। छोटे उल्लंघनों के लिए क्रमिक दंड (मौद्रिक जुर्माना, कंपाउंडिंग) तथा गंभीर उल्लंघनों के लिए कड़े दंड (भारी जुर्माना, कारावास, पंजीकरण रद्द करना)।
निगरानी का प्रवर्तन निगरानी पर सीमित ज़ोर। कीटनाशक विषाक्तता को सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में राज्य-स्तरीय रिपोर्टिंग को अनिवार्य करता है।

विधेयक का महत्त्व

  • सुरक्षित कीटनाशक उपयोग सुनिश्चित करता है: यह विधेयक भारत में कीटनाशकों के सुरक्षित और विनियमित उपयोग को सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखता है, जिससे किसान कल्याण और उपभोक्ता स्वास्थ्य को बढ़ावा मिलता है।
  • शासन में सुधार: केंद्रीकृत प्रणाली अपनाकर, यह विधेयक कीटनाशक विनियमन में मौजूद कमियों को दूर करता है, जिससे जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार होता है।
  • पर्यावरण संरक्षण: असुरक्षित कीटनाशकों के निलंबन और रद्दीकरण से संबंधित प्रावधान पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को हानिकारक रसायनों से बचाने का उद्देश्य रखते हैं।
  • जैव-प्रौद्योगिकी को बढ़ावा: जैविक कीटनाशकों और समेकित कीट प्रबंधन को प्रोत्साहन देना वैश्विक सतत् लक्ष्यों के अनुरूप है, जिससे हानिकारक रसायनों पर निर्भरता कम होती है।

संदर्भ

वैज्ञानिकों की एक टीम ने आर्कटिक क्षेत्र मेंवाइल्ड व्हेल’ से श्वास के नमूने एकत्र कर, ड्रोन की सहायता सेसेटेशियन मॉर्बिलिवायरस’ (Cetacean Morbillivirus) का पता लगाया है।

सेटेशियन मॉर्बिलिवायरस’ (Cetacean Morbillivirus)

  • सेटेशियन मॉर्बिलिवायरस एक श्वसन तथा तंत्रिका संबंधी वायरस है, जो डॉल्फिन, व्हेल और पोर्पॉइज को प्रभावित करता है।
    • यह खसरा (Measles) और कैनाइन डिस्टेंपर वायरस से निकट रूप से संबंधित है।
  • संक्रमण: यह प्रत्यक्ष संपर्क और श्वसन बूंदों के माध्यम से फैलता है, जिससे समुद्री स्तनधारियों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
  • प्रजातियों के बीच संक्रमण: यह विभिन्न सेटेशियन प्रजातियों को प्रभावित कर सकता है।
  • क्षेत्र: वर्ष 1987 में इसकी खोज के बाद से, विशेष रूप से उत्तरी अटलांटिक और भूमध्यसागर में, यह बड़े पैमाने पर मृत्यु की घटनाओं का कारण बना है।
    • हाल ही में यह आर्कटिक जलक्षेत्र में, विशेष रूप से हम्पबैक और स्पर्म व्हेल में पाया गया है।
  • निदान: प्रायः मृत्यु के बाद इसका पता चलता है, जिससे प्रारंभिक निगरानी कठिन हो जाती है।

व्हेल के बारे में

  • व्हेल बड़े समुद्री स्तनधारी होते हैं, जो सेटेशिया (Cetacea) गण (Order) से संबंधित हैं।
  • व्हेल को उनकी खाद्य संरचनाओं के आधार पर दो प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया जाता है:-
    • बेलीन व्हेल (Mysticeti) और दंतयुक्त व्हेल (Odontoceti)

बेलीन व्हेल (Mysticeti)

टूथ्ड व्हेल (Odontoceti)

  • बेलीन प्लेट्स: दाँतों के स्थान पर, इन व्हेलों में केराटिन से निर्मित बेलीन प्लेट्स की पंक्तियाँ होती हैं (मानव बाल या नाखूनों के समान)।
    • इन प्लेट्स का उपयोग जल से खाद्य को फिल्टर करने के लिए किया जाता है, विशेष रूप से क्रिल, प्लवक और छोटी मछलियों जैसे छोटे जीवों को।
  • आकार: बेलीन व्हेल सामान्यतः टूथ्ड व्हेल से बड़ी होती हैं; ब्लू व्हेल जैसी कुछ प्रजातियाँ पृथ्वी पर अब तक ज्ञात सबसे बड़े जीव हैं।
  • ब्लोहोल: इनके सिर के ऊपर सामान्यतः दो ब्लोहोल होते हैं।
  • खाद्य: बेलीन व्हेल बड़ी मात्रा में जल निगलती हैं और फिर अपनी बेलीन प्लेट्स की सहायता से खाद्य को फिल्टर कर लेती हैं।
  • उदाहरण: ब्लू व्हेल (सबसे बड़ी व्हेल प्रजाति), हम्पबैक व्हेल, ग्रे व्हेल, फिन व्हेल
  • दाँत: इस व्हेल में दाँत होते हैं, जिनका उपयोग वे बड़ी शिकार प्रजातियों जैसे मछलियाँ, स्क्विड और कभी-कभी अन्य समुद्री स्तनधारियों को पकड़ने और खाने के लिए करती हैं।
  • इकोलोकेशन: टूथ्ड व्हेल, इकोलोकेशन (ध्वनि तरंगों) का उपयोग करने की क्षमता के लिए जानी जाती हैं, जिससे वे मटमैले जल (अपारदर्शी) में शिकार कर पाती हैं।
    • यह उन्हें अत्यंत कुशल शिकारी बनाता है।
  • ब्लोहोल: टूथ्ड व्हेल में सामान्यतः एक ही ब्लोहोल होता है।
  • सामाजिक संरचना: कई टूथ्ड व्हेल जटिल सामाजिक समूहों में रहती हैं और कुछ प्रजातियाँ उन्नत संचार क्षमताएँ प्रदर्शित करती हैं।
  • उदाहरण: स्पर्म व्हेल, ऑर्का (किलर व्हेल), डॉल्फिन (जो दंतयुक्त व्हेल का एक उपसमूह हैं), पायलट व्हेल

संदर्भ

हाल ही में नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) द्वारा आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड 2025 जारी किया गया।

आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड के बारे में

  • आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड (ARC) वर्ष 2006 से प्रतिवर्ष जारी किया जा रहा है और वर्ष 2025 का  संस्करण इसकी 20वीं वर्षगाँठ को चिह्नित करता है।
  • ARC आर्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र की वर्तमान स्थिति पर विश्वसनीय, स्पष्ट और संक्षिप्त पर्यावरणीय आँकड़े प्रदान करता है तथा ऐतिहासिक अभिलेखों से तुलना प्रस्तुत करता है।
  • प्रकाशन: ARC को NOAA तकनीकी रिपोर्ट के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड के प्रमुख निष्कर्ष

वायुमंडल संबंधी

  • सतही वायु तापमान: अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 तक आर्कटिक में वर्ष 1900 के बाद से सर्वाधिक सतही वायु तापमान दर्ज किया गया।
  • तापमान प्रवृत्ति: पिछले 10 वर्ष आर्कटिक में अब तक के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं और वर्ष 2006 से वार्षिक तापमान वृद्धि वैश्विक दर से दोगुने से भी अधिक रही है।
  • वर्षा: रिकॉर्ड स्तर की वर्षा दर्ज की गई, जिसमें शीतकाल, वसंत और शरद ऋतु की कुल वर्षा 1950 के बाद से शीर्ष पाँच वर्षों में शामिल रही।

महासागर संबंधी

  • समुद्री बर्फ का विस्तार: मार्च 2025 में 47-वर्ष के दौरान एकत्रित उपग्रह आँकड़ों के अनुसार  सबसे कम वार्षिक अधिकतम समुद्री बर्फ विस्तार दर्ज किया गया।
  • बर्फ की मोटाई में कमी: सबसे पुरानी और अधिक मोटाई की आर्कटिक समुद्री बर्फ (>4 वर्ष पुरानी) 1980 के दशक से 95% से अधिक घट चुकी है और अब मुख्यतः ग्रीनलैंड तथा कनाडाई द्वीपसमूह के उत्तर में सीमित है।
  • फाइटोप्लैंकटन वृद्धि: वर्ष 2003 से 2025 के बीच यूरेशियन आर्कटिक में फाइटोप्लैंकटन उत्पादकता में 80% की वृद्धि हुई, जबकि बैरेंट्स सागर और हडसन खाड़ी जैसे क्षेत्रों में क्रमशः 34% और 27% की वृद्धि देखी गई।

स्थल संबंधी

  • हिमनद ह्रास: स्कैंडिनेविया, स्वालबर्ड और अलास्का के आर्कटिक हिमनदों में उल्लेखनीय रूप से बर्फ का ह्रास हुआ है, जिससे वैश्विक समुद्र-स्तर में वृद्धि में योगदान हुआ।
  • ग्रीनलैंड ‘आइस शीट’: वर्ष 2025 में अनुमानित 129 अरब टन हिम की हानि हुई, जो दीर्घकालिक बर्फ ह्रास प्रवृत्ति को जारी रखती है।
  • अलास्का के हिमनदों का संकुचन: 20वीं शताब्दी के मध्य से अलास्का के हिमनद औसतन 125 ऊर्ध्व फीट (38 मीटर) बर्फ खो चुके हैं।
  • विकृत नदियाँ: पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से अलास्का के 200 से अधिक आर्कटिक जलग्रहण क्षेत्रों में रस्टिंग रिवर्स’ की स्थिति उत्पन्न हुई है, जिससे जल लोहे, पारे और विषैले धातुओं की वृद्धि के कारण नारंगी रंग का हो गया है, जो जल गुणवत्ता और जलीय आवासों को प्रभावित करता है।
  • आर्कटिक का हरितीकरण: वर्ष 2025 में आर्कटिक टुंड्रा में तीसरे सबसे अधिक हरित स्तर दर्ज किए गए, जो 1990 के दशक के अंत से वनस्पति उत्पादकता में वृद्धि की प्रवृत्ति को दर्शाता है और यह आवासों तथा कार्बन चक्र को प्रभावित करता है।
  • विघटित पारिस्थितिक तंत्र: गर्म होता आर्कटिक अभूतपूर्व गति से पारिस्थितिक तंत्रों को पुनर्रचित कर रहा है। ध्रुवीय भालू, सील और आर्कटिक पक्षियों जैसी प्रजातियाँ आवास की हानि और खाद्य की कमी का सामना कर रही हैं।

आर्कटिक हिम की समाप्ति के भू-राजनीतिक निहितार्थ

  • प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता: आर्कटिक समुद्री बर्फ के पिघलने से तेल, गैस और महत्त्वपूर्ण खनिजों जैसे विशाल प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच मुक्त रही है, जिनका मूल्य लगातार बढ़ रहा है।
  • समुद्री व्यापार मार्ग: नॉर्दर्न सी रूट (NSR), जो पहले बर्फ के कारण दुर्गम था, अब खुल रहा है।
    • यह यूरोप और एशिया के बीच यात्रा समय को 40% तक कम करता है, जिससे यह एक अत्यंत सामरिक एवं आर्थिक मार्ग बन गया है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा: आर्कटिक के खुलने के साथ, भारत और चीन सहित गैर-आर्कटिक देश भी इस क्षेत्र में अधिक सक्रिय हो रहे हैं।
    • भारत ने यूरोप के साथ व्यापार बढ़ाने, शिपिंग समय घटाने और ऊर्जा संसाधन विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए NSR के उपयोग में रुचि दिखाई है।

भारत के आर्कटिक हित और नीति

  • आर्कटिक परिषद: भारत वर्ष 2013 में आर्कटिक परिषद का पर्यवेक्षक बना।
  • आर्कटिक नीति 2022: भारत ने वर्ष 2022 में अपनी आर्कटिक नीति जारी की, जिसमें छह प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं: वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु संरक्षण, आर्थिक विकास, परिवहन, शासन और राष्ट्रीय क्षमता निर्माण
  • वैज्ञानिक अनुसंधान पर ध्यान: भारत की आर्कटिक में दीर्घकालिक उपस्थिति है, जिसमें वर्ष 2008 से स्वालबर्ड द्वीपसमूह में स्थित उसका अनुसंधान केंद्र हिमाद्री शामिल है।
    • भारत का उद्देश्य इस क्षेत्र में वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाना है ताकि आर्कटिक परिवर्तनों का भारत की मानसून प्रणाली पर पड़ने वाले प्रभाव को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
  • रूस के साथ सहयोग: भारत रूस के साथ नॉर्दर्न सी रूट’ के लिए अवसंरचना विकास में सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है, जिसका उद्देश्य चेन्नई और व्लादिवोस्तोक के बीच संपर्क सुधारना और यूरोप के साथ व्यापार को सुदृढ़ करना है।]

आर्कटिक परिषद

  • वर्ष 1996 में स्थापित, इसमें 8 सदस्य देश (कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन, संयुक्त राज्य अमेरिका) शामिल हैं।
  • यह आर्कटिक में सहयोग को बढ़ावा देती है और स्वदेशी समुदायों के संरक्षण पर बल देती है।

आर्कटिक क्षेत्र के बारे में

  • आर्कटिक पृथ्वी का सबसे उत्तरी क्षेत्र है, जो उत्तरी ध्रुव के चारों ओर केंद्रित है और इसमें कनाडा, डेनमार्क (ग्रीनलैंड), फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन और संयुक्त राज्य अमेरिका (अलास्का) के भाग शामिल हैं।

  • महाद्वीपीय शेल्फ: आर्कटिक महासागर में विश्व का सबसे लंबा महाद्वीपीय शेल्फ पाया जाता है।
  • आर्कटिक महासागर: आर्कटिक महासागर पृथ्वी के पाँच प्रमुख महासागरों में सबसे छोटा और सबसे उथला है।
    • यह वर्ष भर आंशिक रूप से समुद्री बर्फ (जमी हुआ समुद्री जल) से ढका रहता है, विशेषकर शीतकाल में।
  • लवणता एवं तापमान: आर्कटिक महासागर की सतही तापमान और लवणता बर्फ के जमने और पिघलने के कारण मौसमी रूप से बदलती रहती है।
    • इसकी लवणता सभी प्रमुख महासागरों में सबसे कम है, जिसका कारण कम वाष्पीकरण, नदियों और धाराओं से ताजे जल का प्रवाह, तथा आसपास के महासागरों से सीमित संपर्क है।

संदर्भ

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि के प्रथम अग्रिम अनुमान (First Advance Estimates [FAE]) जारी किए हैं।

मुख्य विशेषताएँ

  • अनुमानित GDP वृद्धि
    • वास्तविक GDP वृद्धि: वर्ष 2025-26 के लिए 7.4%, जो पिछले वर्ष के 6.5% से अधिक है।
    • नाममात्र GDP वृद्धि: वर्ष 2025-26 के लिए 8% (पिछले 5 वर्षों में सबसे कम)।
      • रुपये में नॉमिनल GDP: 357 लाख करोड़ रुपये (लगभग 3.97 ट्रिलियन डॉलर)।
  • क्षेत्रवार विकास अनुमान:
    • विनिर्माण क्षेत्र: वर्ष 2024-25 में 4.5% की तुलना में 7% की वृद्धि का अनुमान है।
    • कृषि क्षेत्र: पिछले वर्ष के 4.6% की तुलना में 3.1% की वृद्धि का अनुमान है।
    • खनन और उत्खनन: वर्ष 2024-25 में 2.7% की वृद्धि की तुलना में 0.7% की गिरावट का अनुमान है।
    • तृतीयक क्षेत्र (सेवाएं): वित्त वर्ष 2024-25 में 7.2% की तुलना में 9.1% की वृद्धि का अनुमान है।
  • प्रमुख आर्थिक संकेतक:
    • निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE): 7% की वृद्धि का अनुमान है, जो वर्ष 2024-25 के 7.2% की तुलना में थोड़ा कम है।
    • सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ): 7.8% की वृद्धि का अनुमान है, जो वर्ष 2024-25 में देखी गई 7.1% की तुलना में अधिक है।
    • सरकारी उपभोग व्यय: 5.2% की वृद्धि का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 2.3% से अधिक है, जिसका मुख्य कारण राज्य सरकारों द्वारा किए गए खर्च में वृद्धि है।

वैश्विक संदर्भ

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, वैश्विक व्यापार में व्यवधान और समग्र विश्व विकास में मंदी के बावजूद, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत एकमात्र प्रमुख अर्थव्यवस्था होगी जो 6% से अधिक की वृद्धि दर्ज करेगी।

नई GDP श्रृंखला

  • आधार वर्ष में बदलाव: फरवरी 2025 से आगे के GDP आँकड़े वित्त वर्ष 2011-12 के स्थान पर वित्त वर्ष 2022-23 के आधार वर्ष वाली नई श्रृंखला पर आधारित होंगे।
  • प्रभाव: यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है, जिससे अधिक सटीक जानकारी प्राप्त होती है।

GDP के प्रथम अग्रिम अनुमान क्या हैं?

  • प्रथम अग्रिम अनुमान (First Advance Estimates- FAE) किसी वित्तीय वर्ष के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि के प्रारंभिक अनुमान होते हैं, जो आमतौर पर जनवरी के पहले सप्ताह में जारी किए जाते हैं।
  • ये अनुमान वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) तक उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित होते हैं।
  • इनमें तीसरी तिमाही के औपचारिक आँकड़े शामिल नहीं होते हैं, जो बाद में द्वितीय अग्रिम अनुमान (SAE) में प्रकाशित किए जाते हैं।
  • महत्त्व: FAE आर्थिक प्रदर्शन का प्रारंभिक संकेत प्रदान करते हैं, विशेष रूप से बजट नियोजन के लिए। नॉमिनल GDP , जिसमें मुद्रास्फीति का प्रभाव शामिल होता है, वास्तविक प्रेक्षित चर है, और यह सरकार के बजटीय निर्णयों का मार्गदर्शन करता है।
  • गणना विधि: FAE बेंचमार्क-संकेतक विधि का उपयोग करके प्राप्त किए जाते हैं, जहां पिछले वर्ष के आंकड़ों को प्रासंगिक संकेतकों, जैसे कि:
    • अक्टूबर तक का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (Index of Industrial Production- IIP),
    • नवंबर तक के खुदरा और थोक मुद्रास्फीति के आँकड़े,
    • सितंबर तक के वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री आदि।

सकल घरेलू उत्पाद के घटक

  • निजी अंतिम उपभोग व्यय (Private Final Consumption Expenditure- PFCE):
    • PFCE से तात्पर्य परिवारों और परिवारों की सेवा करने वाली गैर-लाभकारी संस्थाओं (NPISH) द्वारा अंतिम उपभोग के लिए वस्तुओं और सेवाओं पर किए गए कुल व्यय से है।
    • इसमें स्थायी वस्तुओं (जैसे, कार, घरेलू उपकरण), अस्थायी वस्तुओं (जैसे, भोजन, वस्त्र) और सेवाओं (जैसे, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा) पर किया गया खर्च शामिल है।
  • सरकारी व्यय (Government Spending- GFCE):
    • GFCE से तात्पर्य सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करने वाली वस्तुओं और सेवाओं पर किए गए कुल व्यय से है।
    • इसमें अवसंरचना (जैसे सड़कें, स्कूल), सार्वजनिक सेवाएँ (जैसे स्वास्थ्य सेवा, रक्षा) और हस्तांतरण (जैसे पेंशन, सब्सिडी) पर किया गया व्यय शामिल है।
  • सकल स्थिर पूंजी निर्माण (Gross Fixed Capital Formation- GFCF):
    • GFCF किसी अर्थव्यवस्था में पूंजी भंडार में हुई वृद्धि के मूल्य को दर्शाता है। इसमें मशीनरी, भवन, सड़कें और उपकरण जैसी भौतिक संपत्तियों में निवेश शामिल है।
    • यह अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढाँचे और उत्पादन क्षमता में किए गए निवेश को दर्शाता है।
  • शुद्ध निर्यात (निर्यात – आयात):
    • शुद्ध निर्यात किसी देश के निर्यात (विदेशों में बेची गई वस्तुएँ और सेवाएँ) और आयात (विदेशों से खरीदी गई वस्तुएँ और सेवाएँ) के मूल्य के बीच का अंतर होता है।
    • सकारात्मक शुद्ध निर्यात मूल्य का अर्थ है कि वह देश शुद्ध निर्यातक है, जबकि नकारात्मक मूल्य का अर्थ है कि वह शुद्ध आयातक है।

संदर्भ

वर्ष 2015 से वर्ष 2025 के बीच प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत 1.4 करोड़ से अधिक उम्मीदवारों को प्रशिक्षण देने के बावजूद, भारत के कौशल विकास तंत्र को गुणवत्ता, उद्योग के विश्वास और कार्यबल एकीकरण के मामले में महत्त्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

कौशल विकास के बारे में

  • कौशल विकास से तात्पर्य रोजगार योग्य दक्षताओं (तकनीकी, व्यावसायिक, डिजिटल और सॉफ्ट स्किल्स) के व्यवस्थित अधिग्रहण से है, जो किसी व्यक्ति की उत्पादकता, रोजगार क्षमता और आय क्षमता को बढ़ाते हैं।
  • भारत में, यह जनसांख्यिकीय लाभांश को आर्थिक विकास में परिवर्तित करने का एक महत्त्वपूर्ण कारक है।

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के बारे में 

  • PMKVY कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) की प्रमुख कौशल विकास योजना है।
  • प्रारंभ और प्रगति: वर्ष 2015 में आरंभ की गई यह योजना वर्तमान में अपने चौथे चरण (PMKVY 4.0) में संचालित है, जो वर्ष 2026 तक जारी रहने वाली है।।
  • उद्देश्य: भारतीय युवाओं को उद्योग-संबंधी कौशल प्रशिक्षण प्राप्त करने में सक्षम बनाना ताकि वे बेहतर आजीविका प्राप्त कर सकें और मौजूदा कार्यबल के पूर्व-निर्धारित कौशल को मान्यता दे सकें।
  • योजना के मुख्य स्तंभ: कार्यक्रम को तीन मुख्य वितरण मॉडलों के आधार पर संरचित किया गया है ताकि कोई भी पीछे न छूटे:
    • अल्पकालिक प्रशिक्षण (STT): विद्यालय/कॉलेज छोड़ने वाले या बेरोजगारों के लिए डिजाइन किया गया। यह राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचे (NSQF) के अनुरूप तकनीकी प्रशिक्षण (आमतौर पर 150-600 घंटे) के साथ-साथ सॉफ्ट स्किल्स, डिजिटल साक्षरता और उद्यमिता प्रदान करता है।
    • पूर्व अनुभव मान्यता (RPL): अनौपचारिक कार्यबल पर केंद्रित है। यह मौजूदा कौशल का आकलन और औपचारिक रूप से प्रमाणन करता है, ज्ञान की कमियों को दूर करने और रोजगार क्षमता में सुधार के लिए ब्रिज कोर्स” प्रदान करता है।
    • विशेष परियोजनाएँ: वंचित समूहों, दुर्गम क्षेत्रों (सीमावर्ती क्षेत्र/उभरते जिले) या विशिष्ट भूमिकाओं (जैसे- जेल के कैदियों या आदिवासी युवाओं को प्रशिक्षण देना) के लिए लक्षित पहल।
  • PMKVY 4.0 (वर्ष 2026 रोडमैप) की प्रमुख विशेषताएँ
  • वर्तमान चरण को आपूर्ति-आधारित के बजाय मांग-आधारित बनाने के लिए पुनर्परिभाषित किया गया है:
    • भविष्य के लिए तैयार कौशल: उद्योग 4.0 की भूमिकाओं की ओर व्यापक प्रोत्साहन, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, ड्रोन प्रौद्योगिकी, मेकाट्रॉनिक्स और 5G शामिल हैं।
    • स्किल इंडिया डिजिटल हब (SIDH): एक एकीकृतआधार-आधारित” मंच जो डिजिटल कौशल पासपोर्ट के रूप में कार्य करता है, शिक्षार्थी की प्रगति पर निगरानी रखता है और उन्हें सीधे नौकरियों और अप्रेंटिसशिप से जोड़ता है।
    • शैक्षणिक एकीकरण: NEP 2020 के अनुरूप, प्रमाणपत्र अब अकादमिक क्रेडिट बैंक (ABC) के माध्यम से क्रेडिट अर्जित करते हैं, जिससे व्यावसायिक कौशल औपचारिक कॉलेज डिग्री में गिने जा सकते हैं।
    • कार्यस्थल पर प्रशिक्षण (OJT): ‘करके सीखने’ और उद्योग से मजबूत जुड़ाव सुनिश्चित करने के लिए कई भूमिकाओं के लिए कार्यस्थल का अनिवार्य अनुभव।
    • माइक्रो-क्रेडेंशियल और मापनीय प्रमाणपत्र: अधिकतम लचीलापन प्रदान करने के लिए, सरकार ने मात्र 7.5 घंटे से शुरू होने वाले मॉड्यूल पेश किए हैं।
      • ये क्रेडिट अकादमिक क्रेडिट बैंक (ABC) में जमा किए जाते हैं, जिससे शिक्षार्थी अल्पकालिक प्रमाणपत्रों को ‘एकत्रित’ करके अंततः पूर्ण डिप्लोमा या डिग्री प्राप्त कर सकते हैं।
  • पात्रता मानदंड
    • सामान्य आयु वर्ग: 15 से 45 वर्ष की आयु के भारतीय नागरिक अधिकांश प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए पात्र हैं।
    • पूर्व अनुभव मान्यता (RPL) के लिए आयु सीमा में विस्तार: पूर्व अनुभव मान्यता (RPL) घटक के लिए, अनौपचारिक कार्यबल को प्रमाणन प्राप्त करने में सहायता प्रदान करने के लिए आयु सीमा 59 वर्ष तक बढ़ा दी गई है।
    • मुख्य लक्ष्य: यह योजना विशेष रूप से विद्यालय/कॉलेज छोड़ने वाले और बेरोजगार युवाओं के लिए बनाई गई है जो रोजगार के लिए तैयार कौशल प्राप्त करना चाहते हैं।
    • दस्तावेज़ीकरण: पंजीकरण और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से प्रोत्साहन प्राप्त करने के लिए एक वैध आधार कार्ड और आधार से जुड़ा बैंक खाता अनिवार्य है।
  • वित्तीय लाभ और प्रोत्साहन
    • निःशुल्क प्रशिक्षण: उम्मीदवारों को कोई शिक्षण या मूल्यांकन शुल्क नहीं देना होता है। पूरा खर्च कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) द्वारा वहन किया जाता है।
    • नकद पुरस्कार: मूल्यांकन उत्तीर्ण करने और प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को प्रोत्साहन के रूप में ₹500 का नकद पुरस्कार दिया जाता है।
    • कौशल बीमा: सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए, प्रत्येक प्रमाणित उम्मीदवार को ₹2 लाख का 3 वर्षीय दुर्घटना बीमा निःशुल्क प्राप्त होता है।
    • यात्रा और आवास: विशिष्ट मामलों में, जैसे कि दुर्गम क्षेत्रों में विशेष परियोजनाएं या वंचित समूहों के लिए, योजना यात्रा और आवास के लिए छात्रवृत्ति प्रदान कर सकती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रशिक्षण वास्तव में सभी के लिए सुलभ हो।
  • सशक्तीकरण और समावेशन
    • महिला शक्ति: महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं, जिसके तहत औपचारिक कार्यबल में अधिक महिलाओं को शामिल करने के लिए समर्पित केंद्र और पाठ्यक्रम तैयार किए गए हैं।
    • वंचित समुदाय: अनुसूचित सामाजिक गतिशीलता सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों और दिव्यांगजनों (PwD) के उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाती है।
    • भौगोलिक स्थिति: भारत के सुदूरतम क्षेत्रों में विकास लाने के लिए आकांक्षी जिलों, सीमावर्ती क्षेत्रों और वामपंथी उग्रवाद (LWE) से प्रभावित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • करियर विकास के लिए प्रत्यक्ष सहायता
    • डिजिटल स्किल पासपोर्ट: स्किल इंडिया डिजिटल हब के माध्यम से, प्रत्येक प्रमाणित उम्मीदवार को क्यूआर कोड युक्त, सत्यापन योग्य डिजिटल प्रमाणपत्र प्राप्त होता है, जो वैश्विक और घरेलू रोजगार बाजारों के लिए ‘पासपोर्ट’ का कार्य करता है।
    • प्लेसमेंट और उद्यमिता: प्रशिक्षण केंद्रों को प्लेसमेंट’ सहायता प्रदान करना अनिवार्य है। इसके अलावा, PMKVY प्रमाणपत्र युवाओं के लिए मुद्रा ऋण (10 लाख रुपये तक) के लिए आवेदन करना आसान बनाता है, जिससे वे अपना छोटा व्यवसाय शुरू कर सकें।

विकसित भारत @2047 को प्राप्त करने में कौशल भारत की आवश्यकता

  • आर्थिक अनिवार्यता
    • कम रोजगार क्षमता स्तर: इंडिया स्किल्स रिपोर्ट (ISR), 2026 के अनुसार, भारत की समग्र रोजगार क्षमता 56.35% (2025 में 54.8% से) तक बढ़ गई है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक श्रम गतिशीलता द्वारा आकारितकौशल-प्रधान” अर्थव्यवस्था की ओर तीव्र बदलाव को दर्शाती है।
      • साथ ही, पिछले पाँच वर्षों में पहली बार, महिलाओं की रोजगार क्षमता (54%) पुरुषों (51.5%) से अधिक हो गई है, जिसका मुख्य कारण द्वितीय और तृतीयक शहरों में हाइब्रिड कार्य मॉडल और लक्षित डिजिटल कौशल विकास का उदय है।
    • उत्पादकता चुनौती: आर्थिक सर्वेक्षण इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत की श्रम उत्पादकता विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अत्यधिक कम है, जिससे सतत् उच्च जीडीपी वृद्धि के लिए कौशल विकास आवश्यक हो जाता है।
    • MSME-आधारित रोजगार सृजन: MSME मंत्रालय के अनुसार, 11 करोड़ से अधिक व्यक्ति MSME में कार्यरत हैं, ऐसे में युवाओं को रोजगार सृजनकर्ताओं में परिवर्तित करने और अर्थव्यवस्था के आधारभूत को मजबूत करने के लिए ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण है।
  • उद्योग 4.0 की तैयारी
    • कौशल की बढ़ती मांग: सरकारी नीति दस्तावेजों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, ड्रोन, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और उन्नत विनिर्माण को भविष्य के विकास के मुख्य कारक के रूप में पहचाना गया है।
    • मेक इन इंडिया’ की बाधाएँ: राष्ट्रीय विनिर्माण नीति और PLI योजनाओं के लिए स्वचालन, IoT और स्मार्ट फैक्ट्री प्रणालियों में कुशल कार्यबल की आवश्यकता है, जिससे स्किल इंडिया’ एक महत्त्वपूर्ण सहायक बन जाता है।
    • डिजिटल विभाजन: ‘स्किल इंडिया’ डिजिटल हब जैसे प्लेटफॉर्म डिजिटल साक्षरता की कमियों को दूर करने में मदद करते हैं, विशेषतः ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्रों में।
  • सामाजिक अनिवार्यता:
    • महिला कार्यबल भागीदारी: आर्थिक सर्वेक्षण में लगातार यह बात सामने आई है कि महिला श्रमबल भागीदारी बढ़ाना सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को बढ़ाने के सबसे तीव्र माध्यमों में से एक है; इस उद्देश्य के लिए लक्षित कौशल विकास अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले लोगों तक पहुँच: जन शिक्षण संस्थान जैसी योजनाएँ जमीनी स्तर पर कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जिससे संकटग्रस्त पलायन और अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य करने की असुरक्षा कम होती है।
    • ऊपर की ओर सामाजिक गतिशीलता: व्यावसायिक प्रशिक्षण औपचारिक, उच्च वेतन वाले क्षेत्रों में प्रवेश के मार्ग प्रदान करता है, जिससे अंतर-पीढ़ीगत असमानता को कम करने में मदद मिलती है।
  • वैश्विक अवसर
    • वैश्विक श्रम गतिशीलता: राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा (NSQF) के माध्यम से योग्यताओं का संरेखण भारतीय कौशल की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति को बढ़ाता है।
    • प्रेषण और सॉफ्ट पावर: कुशल प्रवासन विदेशी प्रेषण प्रवाह को मजबूत करता है और भारत की आर्थिक कूटनीति को बढ़ाता है, जैसा कि आधिकारिक प्रवासन और श्रम नीति दस्तावेजों में मान्यता प्राप्त है।

भारत द्वारा की गई प्रमुख पहल और कार्रवाइयां:

  • संरचनात्मक एवं नीतिगत पहल
    • स्किल इंडिया मिशन (2015): औपचारिक और अनौपचारिक कौशल प्रशिक्षण चैनलों के माध्यम से उद्योग-संबंधी कौशलों में 4 करोड़ से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित करने का एक राष्ट्रीय मिशन।
    • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020: एक ऐतिहासिक परिवर्तन, जो व्यावसायिक शिक्षा को स्कूलों और कॉलेजों में एकीकृत करता है। इसका लक्ष्य वर्ष 2025 तक 50% शिक्षार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा से अवगत कराना है।
    • राष्ट्रीय क्रेडिट ढांचा (NCrF): यह नीति छात्रों को तकनीकी कौशल के लिए अकादमिक क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति देकरशैक्षिक विचलन” को समाप्त करती है, जिससे व्यावसायिक प्रशिक्षण एक मुख्यधारा का करियर विकल्प बन जाता है।
    • राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा (NSQF): ज्ञान और कौशल के आधार पर योग्यताओं को स्तरों में व्यवस्थित करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि भारतीय प्रमाणपत्र वैश्विक गतिशीलता के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करते हैं।
  • बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण कार्यक्रम
    • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY): अल्पकालिक प्रशिक्षण और प्रमाणन आधारित प्रमुख योजना।
      • PMKVY 4.0 अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 3D प्रिंटिंग और ड्रोन जैसे उद्योग 4.0 कौशलों पर केंद्रित है।
    • PM-SETU (अक्टूबर 2025): ‘एडवांस्ड ITI’ के माध्यम से प्रधानमंत्री कौशल और रोजगार क्षमता परिवर्तन एक केंद्र प्रायोजित योजना है जिसमें ₹60,000 करोड़ का निवेश किया गया है।
      • हब-एंड-स्पोक मॉडल: इसका उद्देश्य 1,000 सरकारी ITI को उत्कृष्टता केंद्रों (200 हब और 800 स्पोक) में परिवर्तित करना है।
      • उद्योग स्वामित्व: क्लस्टर का प्रबंधन उद्योग भागीदारों द्वारा समर्थित विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) द्वारा किया जाता है, जिससे यह प्रणाली ‘सरकारी स्वामित्व, उद्योग-प्रबंधित’ मॉडल की ओर अग्रसर होती है।
    • राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (NCE) केंद्रीय बजट 2025-26 के माध्यम से स्थापित, वैश्विक साझेदारियों के साथ पाँच NCE स्थापित किए जा रहे हैं ताकि युवाओं को हरित हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और उन्नत रोबोटिक्स जैसे “अत्याधुनिक कौशल” में प्रशिक्षित किया जा सके।
    • राष्ट्रीय संघबद्ध कौशल एवं कार्यबल रजिस्ट्री: कौशल मंथन 2026 में अंतिम रूप दी गई यह रजिस्ट्री घरेलू और वैश्विक नियोक्ताओं के लिए कुशल श्रमिकों की “खोज क्षमता” में सुधार करने के लिए एक एकीकृत डिजिटल डेटाबेस के रूप में कार्य करती है।
    • पीएम विश्वकर्मा: यह विशेष रूप से पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों (जैसे बढ़ई और सुनार) को लक्षित करता है, उन्हें आधुनिक उपकरण, ऋण सहायता और डिजिटल विपणन कौशल प्रदान करता है।
  • कार्यस्थल और शिक्षुता का एकीकरण
    • राष्ट्रीय शिक्षुता प्रोत्साहन योजना (NAPS): यह योजना उद्योगों को प्रशिक्षुओं को नियुक्त करने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिसके तहत वजीफे की लागत साझा की जाती है।
      • यह सैद्धांतिक ज्ञान और कार्यस्थल की वास्तविकता के बीच के अंतर को पाटती है।
    • संकल्प (SANKALP) और STRIVE: ये विश्व बैंक द्वारा समर्थित परियोजनाएँ हैं जिनका उद्देश्य ITI में प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना और राज्य एवं जिला स्तर पर स्किल इंडिया” के बुनियादी ढाँचे को मजबूत करना है।
  • डिजिटल और तकनीकी सहायक कारक
    • स्किल इंडिया डिजिटल हब (SIDH): एक एकीकृत मंच जो कौशल विकास का आधार” के रूप में कार्य करता है।
      • यह एक डिजिटल स्किल पासपोर्ट प्रदान करता है, शिक्षार्थियों को नौकरी के अवसरों से जोड़ता है, और बाजार की मांग के आधार पर पाठ्यक्रमों का सुझाव देने के लिए AI का उपयोग करता है।
    • स्किल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर: भारतीय युवाओं को वैश्विक रोजगार के लिए तैयार करने हेतु स्थापित किया गया।
      • ये केंद्र जापान, जर्मनी और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में आवश्यक भाषा प्रशिक्षण और तकनीकी प्रमाणपत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
  • सामाजिक और समावेशी कौशल विकास
    • जन शिक्षण संस्थान (JSS): ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरों और स्कूल छोड़ने वाले बच्चों को व्यावसायिक कौशल प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करता है, विशेष रूप से महिलाओं और हाशिए पर स्थित समूहों को लक्षित करके समान विकास सुनिश्चित करता है।
    • राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC): एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी जो निजी प्रशिक्षण प्रदाताओं को देश भर में उच्च गुणवत्ता वाले व्यावसायिक संस्थानों को बढ़ावा देने के लिए वित्त पोषित करती है।

जिन चुनौतियों का समाधान करना आवश्यक है

  • आकांक्षा और आर्थिक अंतर:
    • कम आकांक्षाएँ: औपचारिक शिक्षा में सफल न हो पाने वालों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण को अभी भी द्वितीयक विकल्प के रूप में देखा जाता है।
    • 4% प्रशिक्षण की कमी: भारत के केवल 4.1% कार्यबल के पास औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण है, जबकि OECD देशों में यह 44%–70% है।
      • इससे श्रम बाजार में कौशल की अत्यंत कमी उत्पन्न होती है।
    • मामूली आर्थिक लाभ: आँकड़े बताते हैं कि प्रशिक्षण से वेतन वृद्धि एकसमान नहीं होती है।
      • यदि एक प्रमाणित प्लंबर का वेतन एक अप्रमाणित प्लंबर के बराबर है, तो जीवन की गुणवत्ता में कोई स्पष्ट सुधार नहीं दर्शाता, जिससे कौशल प्राप्त करने की प्रेरणा समाप्त हो जाती है।
    • शैक्षिक अलगाव: उच्च शिक्षा में कौशल विकास को एकीकृत नहीं किया गया है।
      • अधिकांश छात्र नौकरी न मिलने पर मजबूरीवश ही स्नातकोत्तर कौशल विकास को अपनाते हैं, न कि अपनी पढ़ाई के मूल भाग के रूप में।
  • उद्योग और बाजार संरेखण अंतर
    • भर्ती में कम उपयोगिता: अधिकांश नियोक्ता सार्वजनिक कौशल प्रमाणन की उपेक्षा करते हैं।
      • वे अपने स्वयं की आंतरिक प्रशिक्षण प्रणालियों या निजी प्लेटफार्मों को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि उन्हें सरकारी प्रमाणपत्रों की गुणवत्ता पर विश्वासनहीं होता है।
    • सह-निर्माण का अभाव: उद्योग को प्रायः पाठ्यक्रम के सह-निर्माता के स्थान पर मानव संसाधन के “ग्राहक” के रूप में देखा जाता है।
      • उद्योग की प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना, छात्रों के स्नातक होने तक सिखाए गए कौशल प्रायः अप्रचलित हो जाते हैं।
    • अप्रेंटिसशिप का असमान उपयोग: राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (NAPS) का विस्तार हो रहा है, लेकिन इसका उपयोग मुख्य रूप से बड़ी कंपनियों द्वारा किया जाता है।
      • लघु एवं मध्यम उद्यम (SME), जो सर्वाधिक लोगों को रोजगार देते हैं, इस प्रणाली को अपनाने में असमर्थ पाते हैं।
    • ग्रीन” और “AI” क्षेत्र में प्रतिभा की कमी: ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और AI जैसे उभरते क्षेत्रों में प्रतिभा की अत्यधिक कमी है।
      • वर्तमान ITI और केंद्र इन उच्च स्तरीय तकनीकी कौशलों को बड़े पैमाने पर प्रदान करने के लिए सुसज्जित नहीं हैं।
    • CAG ऑडिट अवलोकन (2025): नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2025 की एक रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि उच्च प्रमाणन स्तर के बावजूद, अल्पकालिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे उम्मीदवारों में से केवल 41% को ही रोजगार प्राप्त हुआ।
      • रिपोर्ट में यह सुनिश्चित करने के लिए सूक्ष्म स्तर पर कौशल अंतर का अधिक गहन विश्लेषण करने का आह्वान किया गया कि रोजगार भूमिकाएँ केवल नामांकन लक्ष्यों को पूरा करने के बजाय वास्तविक बाजार मांग के अनुरूप हों।
  • विश्वसनीयता और जवाबदेही में अंतर
    • जिम्मेदारी का विविधीकरण: तकनीकी कॉलेजों के विपरीत, कौशल विकास प्रणाली में प्रशिक्षण, मूल्यांकन और प्रमाणन अलग-अलग होते हैं।
      • जिम्मेदारी के विविधीकरण का अर्थ है कि यदि कोई छात्र बेरोजगार रहता है तो किसी एक एजेंसी को जवाबदेह नहीं ठहराया जाता।
    • कम प्रभाव: नियोक्ताओं को लगता है कि सेक्टर स्किल काउंसिल (SSC) के प्रमाणपत्रों का महत्त्व पारंपरिक डिग्रियों की तुलना में कम है।
      • मूल्यांकन प्रायः ग्रेड के बजाय द्विआधारी (पास/फेल) होते हैं, जिससे उम्मीदवार की विशेषज्ञता के वास्तविक स्तर का कोई अनुमान नहीं लगता।
    • उद्देश्य की विफलता: SSC ने गुणवत्ता (रोजगार नियुक्ति) के बजाय संख्या (नामांकन संख्या) पर ध्यान केंद्रित किया है।
      • निजी प्रमाणनकर्ताओं (जैसे- गूगल) के विपरीत, सरकारी निकायों को अपने छात्रों के नौकरी न मिलने पर ब्रांड वैल्यू” का नुकसान नहीं होता।
    • डिजिटल विभाजन और अवसंरचना: हालाँकि स्किल इंडिया डिजिटल एक अच्छा कदम है, लेकिन कई ग्रामीण प्रशिक्षण केंद्रों में उद्योग 4.0 प्रशिक्षण के लिए आवश्यक हाई-स्पीड इंटरनेट और आधुनिक प्रयोगशालाओं की कमी है, जिससे शहरों और गांवों के बीच डिजिटल कौशल अंतर” उत्पन्न हो रहा है।
  • भौगोलिक और सामाजिक अंतर
    • क्षेत्रीय असंतुलन: प्रशिक्षण केंद्र महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्यों में केंद्रित हैं।
      • ग्रामीण क्षेत्रों और उभरते जिलों” में प्रायः उच्च गुणवत्ता वाले तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए बुनियादी ढाँचे की कमी होती है।
    • लैंगिक-आधारित कौशल विकास: कई कौशल विकास कार्यक्रम अभी भी पुरुष-प्रधान हैं।
      • प्रशिक्षण केंद्रों में बच्चों की देखभाल की कमी या सुरक्षित परिवहन जैसी बाधाएं महिलाओं को उच्च वेतन वाले तकनीकी व्यवसायों में शामिल होने से रोकती हैं, जिससे विकसित भारत के “महिला शक्ति” स्तंभ की प्रगति सीमित हो जाती है।

वैश्विक तुलना

  • जर्मनी (दोहरी शिक्षा प्रणाली): छात्र अपना समय व्यावसायिक विद्यालयों (सैद्धांतिक) और कंपनियों (व्यावहारिक) में विभाजित करते हैं, और पहले दिन से ही उन्हें वजीफा मिलता है। उद्योग निकाय (चैंबर ऑफ कॉमर्स) पाठ्यक्रम और परीक्षाओं का निर्धारण करते हैं, जिससे बाजार के लिए प्रासंगिक कौशल सुनिश्चित होते हैं।
    • भारत के लिए सीख: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को प्रशिक्षण केंद्र बनाकर उद्योग-स्वामित्व वाले प्रशिक्षण को बढ़ावा देना और 60% प्रशिक्षण कार्यस्थल पर ही देना।
  • सिंगापुर (स्किल्सफ्यूचर प्लस) (2026): 25 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिकों को स्किल्सफ्यूचर क्रेडिट प्राप्त होते हैं; मध्य-करियर के कर्मचारी (40+) बिना आय में कमी के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) या हरित ऊर्जा में पुनः कौशल प्राप्त करने के लिए मासिक भत्ता प्राप्त करते हैं।
    • भारत के लिए सीख: कार्यबल की अनुकूलन क्षमता के लिए डिजिटल कौशल वॉलेट के माध्यम से जीवन भर कौशल विकास को सक्षम बनाना।
  • दक्षिण कोरिया (मेइस्टर हाई स्कूल): कुलीन व्यावसायिक विद्यालय छात्रों को उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों (सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स) के लिए प्रशिक्षित करते हैं, जहाँ लगभग 100% रोजगार प्राप्त होता है और शिक्षण एवं आवास के लिए पूर्ण सरकारी सहायता प्रदान की जाती है।
    • भारत के लिए सीख: व्यावसायिक शिक्षा को प्राथमिकता बनाने के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) को आधुनिक प्रयोगशालाओं और उद्योग संबंधों से युक्त “मेइस्टर हब” में परिवर्तित करना।
  • ऑस्ट्रेलिया (शिक्षुता प्राथमिकता सूची): कौशल डेटा-आधारित हैं; उच्च मांग वाले क्षेत्रों में शिक्षुओं और नियोक्ताओं दोनों के लिए उच्च वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाते हैं।
    • भारत के लिए सीख: कौशल की कमी और प्लेसमेंट परिणामों से जुड़े परिणाम-आधारित वित्तपोषण को लागू करना।
  • स्विट्जरलैंड [व्यावसायिक एवं पेशेवर शिक्षा एवं प्रशिक्षण (VPET)]: व्यावसायिक प्रशिक्षण 70% युवाओं को शमिल करता है, फिर भी क्रेडिट मान्यता के माध्यम से विश्वविद्यालय डिग्री में सुगम संक्रमण की अनुमति देता है।
    • भारत के लिए सीख: राष्ट्रीय ऋण ढाँचा (NCrF) मजबूत करना, जिससे व्यावसायिक प्रमाणपत्रों को उच्च शिक्षा के लिए शैक्षणिक गतिशीलता प्रदान की जा सके।

आगे की राह

  • कार्यस्थल एकीकरण को डिफ़ॉल्ट मार्ग के रूप में अपनाना:
    • ITIs का आधुनिकीकरण (PM-SETU): सरकार के स्वामित्व और उद्योग प्रबंधन वाले मॉडल के तहत 1,000 ITIs को उत्कृष्टता केंद्रों में परिवर्तित करना, जिससे उद्योग को बाजार की मांग के अनुरूप पाठ्यक्रम निर्धारित करने की अनुमति मिले।
    • हब-एंड-स्पोक मॉडल: PM-SETU के तहत, उच्च तकनीक वाले हब ITIs को स्पोक ITIs के साथ उन्नत प्रयोगशालाओं और उद्योग विशेषज्ञों को साझा करना चाहिए, जिससे ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी युवाओं को गुणवत्तापूर्ण कार्यस्थल अनुभव प्राप्त हो सके।
    • शिक्षुता का पुनर्मूल्यांकन (NAPS): कौशल संकल्प 2026 के तहत परिकल्पित, शिक्षुता को प्राथमिक विद्यालय से रोजगार तक का मार्ग स्थापित करना चाहिए, जिसमें प्रतिवर्ष 13 लाख से अधिक प्रशिक्षुओं के लिए अनिवार्य ऑन-द-जॉब’ प्रशिक्षण (OJT) हो, ताकि सैद्धांतिक और व्यावहारिक ज्ञान के अंतर को कम किया जा सके।
    • MSME की भागीदारी: छात्रवृत्ति सहायता MSME को प्रशिक्षुओं को नियुक्त करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे दैनिक व्यावसायिक कार्यों में सीखने को शामिल किया जा सके।
  • औपचारिक शिक्षा के भीतर अंतर्निहित अधिगम:
    • क्रेडिट एकीकरण: व्यावसायिक कौशल को उच्च शिक्षा में समाहित किया जाना चाहिए, जिससे छात्र NSQF केअनुरूप व्यावसायिक प्रमाणपत्रों के माध्यम से डिग्री क्रेडिट का 25% तक अर्जित कर सकें।
    • NEP 2020 के अनुरूप: वर्ष 2035 तक 50% सकल नामांकन अनुपात (GER) प्राप्त करने के लिए, कौशल विकास को स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम का अतिरिक्त हिस्सा नहीं माना जा सकता, बल्कि यह डिग्री के साथ-साथ होना चाहिए।
    • पृथक संस्कृति का विघटन: डिग्री के बाद के कौशल विकास को समानांतर कौशल विकास से प्रतिस्थापित करें, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि स्नातक औपचारिक डिग्री और सत्यापन योग्य कौशल पासपोर्ट दोनों के साथ स्नातक हों।
    • व्यावसायिक कौशल प्रयोगशालाएँ: नवोदय और एकलव्य विद्यालयों में कौशल प्रयोगशालाओं की शुरुआत से व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा में लाया जा सकता है और इसे द्वितीयक मार्ग मानने की धारणा का खंडन किया जा सकता है।
  • परिणामों के लिए जवाबदेही, नामांकन के लिए नहीं
    • आर्थिक स्तंभ, कल्याणकारी नहीं: कौशल विकास कार्यक्रमों का मूल्यांकन केवल प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि रोजगार क्षमता और नियुक्ति परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।
      • प्रदर्शनहीन केंद्रों को सरकारी अनुदान से वंचित कर देना चाहिए।
    • मूल्य श्रृंखला का स्वामित्व: क्षेत्र विशिष्ट कौशल परिषदों (SSC) को मानक निर्धारण से आगे बढ़कर परिणामों का स्वामित्व प्राप्त करना चाहिए, और उनकी विश्वसनीयता प्रमाणित उम्मीदवारों के बाजार वेतन और नियुक्ति दरों से जुड़ी होनी चाहिए।
    • परिणाम-आधारित वित्तपोषण: सफलता के आधार पर भुगतान मॉडल के तहत, उम्मीदवारों द्वारा छह महीने का सत्यापित रोजगार पूरा करने तक सरकारी भुगतान का एक हिस्सा रोक दिया जाना चाहिए, जिससे कौशल विकास प्रणाली में जवाबदेही मजबूत हो सके।
    • श्रेणीबद्ध संकेत: पास/फेल प्रमाणन को श्रेणीबद्ध दक्षता से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए, जहाँ उच्च ग्रेड उच्च प्रवेश-स्तर के वेतन में परिवर्तित हो, जिससे गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास के लिए बाजार प्रोत्साहन उत्पन्न हो।
  • अभिसरण और डिजिटल पारदर्शिता
    • एकीकृत कौशल विकास ढाँचा: ‘स्किल इंडिया’ को प्रणाली-व्यापी अभिसरण की ओर बढ़ना चाहिए, जिससे विखंडन कम हो और परिणामों की सुगमता में सुधार हो।
    • एक राष्ट्र, एक छात्र आईडी: स्किल इंडिया डिजिटल हब के माध्यम से, विद्यालय से लेकर सेवानिवृत्ति तक किसी व्यक्ति के कौशल विकास की यात्रा की निगरानी करना, जिससे देश भर के नियोक्ताओं के लिए सुलभ एक विश्वसनीय, सत्यापन योग्य कौशल खाता तैयार हो सके।

भारतीय राज्य स्तरीय सर्वोत्तम पद्धतियाँ

  • तमिलनाडु – उद्योग-संबद्ध औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI): तमिलनाडु ने प्रत्यक्ष उद्योग साझेदारी के माध्यम से चुनिंदा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) का उन्नयन किया है, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्रों में।
  • गुजरात– कौशल विश्वविद्यालय और शिक्षुता पर जोर: गुजरात ने कौशल विश्वविद्यालय की स्थापना की है और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के साथ शिक्षुता को सक्रिय रूप से बढ़ावा देता है।
  • ओडिशा– विश्व कौशल केंद्र: ओडिशा ने विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में उन्नत तकनीकी कौशल प्रदान करने के लिए वैश्विक उद्योग भागीदारों के सहयोग से विश्व कौशल केंद्र स्थापित किए हैं।
  • केरल–आजीवन शिक्षा और डिजिटल कौशल विकास: केरल का अतिरिक्त कौशल अधिग्रहण कार्यक्रम (ASP) स्कूल, उच्च शिक्षा और कार्यबल कौशल को एकीकृत करता है, जिसमें डिजिटल और भविष्य के कौशल पर विशेष जोर दिया गया है।

निष्कर्ष

वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु भारत को कौशल विकास को मात्र एक कल्याणकारी पहल से आगे बढ़ाकर एक उत्तरदायी और सुदृढ़ आर्थिक स्तंभ में रूपांतरित करना होगा। उद्योग-आधारित प्रशिक्षण को अकादमिक क्रेडिट प्रणाली के साथ एकीकृत कर भारत मानव संसाधन और राष्ट्रीय शक्ति के मध्य विद्यमान अंतराल को पाट सकता है तथा अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को वैश्विक महाशक्ति में परिवर्तित कर सकता है।

अभ्यास प्रश्न  प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के तहत बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण के बावजूद, भारतीय कौशल विकास प्रणाली गुणवत्ता और रोजगार क्षमता के अंतर से ग्रस्त है। विश्लेषण कीजिए।

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