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Feb 11 2026

विशेषाधिकार हनन नोटिस

हाल ही में विपक्षी सांसद तिरुचि शिवा ने संसद सत्र के दौरान भारत–अमेरिका व्यापार समझौते पर मीडिया को जानकारी देने के लिए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का नोटिस पेश किया।

विशेषाधिकार हनन नोटिस के बारे में

  • एक विशेषाधिकार नोटिस संसद सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया गया एक औपचारिक प्रस्ताव होता है, जिसमें किसी मंत्री, सदस्य या बाहरी व्यक्ति द्वारा संसदीय विशेषाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है।
  • संसदीय विशेषाधिकारों के लिए संवैधानिक प्रावधान
    • अनुच्छेद-105: संसद सदस्यों के संसदीय विशेषाधिकार।
    • अनुच्छेद-194: राज्य विधानसभाओं के विशेषाधिकार।
  • उद्देश्य: संसद और उसके सदस्यों की गरिमा, प्राधिकार और सामूहिक कार्य प्रणाली की रक्षा करना।
  • विशेषाधिकार हनन: विशेषाधिकार हनन तब होता है, जब संसद या उसके सदस्यों के उन अधिकारों और प्रतिरक्षाओं का उल्लंघन किया जाता है, जो स्वतंत्र और प्रभावी कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक हैं या जब सदन की अवमानना की जाती है।
  • हनन के उदाहरण
    • सदस्यों के विरुद्ध झूठे या मानहानिकारक बयान देना।
    • संसद की कार्यवाही के हटाए गए अंशों का प्रकाशन करना।
    • समिति की रिपोर्टों का समय से पूर्व खुलासा करना।
    • कर्तव्यों के निर्वहन में सदस्यों को बाधित करना या डराना।
  • प्रक्रिया: एक सांसद लोकसभा अध्यक्ष (लोकसभा) या सभापति (राज्यसभा) को लिखित नोटिस प्रस्तुत करता है।
    • यह नियम 222 (लोकसभा) और नियम 187 (राज्यसभा) द्वारा प्रशासित होता है।
    •  यदि स्वीकार कर लिया जाए, तो मामले पर चर्चा की जा सकती है या इसे विशेषाधिकार समिति को भेजा जा सकता है।
      • लोकसभा: 15 सदस्य
      • राज्यसभा: 10 सदस्य
  • संभावित कार्यवाही और दंड: संसद हनन की गंभीरता के अनुसार कार्यवाही कर सकती है, चेतावनी दे सकती है, निलंबित कर सकती है, किसी सदस्य को निष्कासित कर सकती है या किसी बाहरी व्यक्ति को कारावास दे सकती है।

विशेषाधिकार नोटिस संसद सत्र के दौरान कार्यपालिका पर संसद की सर्वोच्चता को मजबूत करते हैं तथा जवाबदेही एवं संस्थागत सम्मान सुनिश्चित करते हैं।

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 (NRI 2025)

भारत ने चार स्थानों की सुधार के साथ अपनी स्थिति बेहतर की है और अब नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स 2025 (NRI 2025) रिपोर्ट के अनुसार 45वें स्थान पर है।

नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स (NRI) 2025 के बारे में:

  • प्रकाशक संस्थान: पोर्टुलन्स इंस्टिट्यूट (वॉशिंगटन डीसी आधारित गैर-लाभकारी संस्था)।
  • यह इस बात का मानदंड तय करती है कि 127 अर्थव्यवस्थाएँ नेटवर्क अर्थव्यवस्था के लिए कैसे तैयारी करती हैं और उससे कैसे लाभ उठाती हैं।
  • इसे 4 फरवरी, 2026 को वर्ल्ड गवर्नमेंट्स समिट में लॉन्च किया गया था।
  • थीम: “एआई गवर्नेंस इन अ ग्लोबल कॉन्टेक्स्ट: पॉलिसी एंड रेगुलेटरी अप्रोचेज”।
  • NRI एक संयुक्त सूचकांक है, जो कुल 53 संकेतकों को शामिल करने वाले चार स्तंभों में प्रदर्शन का आकलन करता है:
    • प्रौद्योगिकी: ICT अवसंरचना तक पहुँच और अपनाना, उभरती तकनीक, और नवाचार।
    • लोग: कौशल, शिक्षा, समावेशन, और डिजिटल परिवर्तन के लिए सामाजिक तत्परता।
    • शासन: नियामक ढाँचे, विश्वास, समावेशन नीतियाँ, और स्थिरता।
    • प्रभाव: डिजिटल नेटवर्क से प्राप्त आर्थिक, सामाजिक, और पर्यावरणीय परिणाम।
  • नेटवर्क रेडीनेस इंडेक्स (NRI) 2025 की रैंकिंग
    • संयुक्त राज्य अमेरिका लगातार चौथे वर्ष सूचकांक में शीर्ष पर रहा।
    • फिनलैंड और सिंगापुर ने क्रमशः दूसरा और तीसरा स्थान प्राप्त किया।

NRI 2025 में भारत का प्रदर्शन

  • रैंक: वैश्विक स्तर पर 45वाँ (वर्ष 2024 से 4 स्थान ऊपर)।
  • स्कोर: 54.43 / 100 (2024: 53.63)।
  • आय समूह रैंक: निम्न-मध्यम आय वाले देशों में दूसरा स्थान।
  • भारत अपने आय स्तर के अनुसार अपेक्षित से अधिक नेटवर्क तत्परता दिखाता है।
  • भारत कई संकेतकों में वैश्विक स्तर पर अग्रणी (प्रथम रैंक) है: दूरसंचार सेवाओं में वार्षिक निवेश, एआई वैज्ञानिक प्रकाशन, आईसीटी सेवाओं का निर्यात, और ई-कॉमर्स कानून।
  • FTTH/बिल्डिंग इंटरनेट सदस्यता, मोबाइल ब्रॉडबैंड इंटरनेट ट्रैफिक, और अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट बैंडविड्थ में दूसरा स्थान
  • घरेलू बाजार पैमाना और आय असमानता में तीसरा स्थान।

लीबिया

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के अनुसार, लीबिया के तट के पास 55 लोगों को ले जा रही एक रबर निर्मित नाव के पलटने से 53 प्रवासी मृत या लापता हो गए।

लीबिया के बारे में

  • स्थान: उत्तरी अफ्रीका का देश, जो उत्तर में भूमध्य सागर से घिरा है और इसके पड़ोसी देशों में मिस्र, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, नाइजर, चाड और सूडान शामिल हैं।
  • राजधानी: त्रिपोली; भूमध्यसागरीय व्यापार मार्गों पर रणनीतिक रूप से स्थित।
  • राजनीतिक स्थिति: वर्ष 2011 में मुअम्मर गद्दाफी के पतन के बाद से देश विभाजन की स्थिति में था। वर्तमान स्थिति ने एक मानवीय संकट उत्पन्न कर दिया है।
  • अर्थव्यवस्था: अफ्रीका का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार रखता है, जिसमें तेल निर्यात और सरकारी राजस्व का प्रमुख स्रोत है।
  • रणनीतिक महत्त्व: भूमध्यसागरीय सुरक्षा, ऊर्जा बाजारों और प्रवासन मार्गों में प्रमुख भूमिका।

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन

  • जनादेश: अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध प्रमुख अंतर-सरकारी संगठन है, जो मानवीय और सुव्यवस्थित प्रवासन को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है।
  • स्थापना: वर्ष 1951 में यूरोप से प्रवासियों के आवागमन के लिए अस्थायी अंतर-सरकारी समिति (PICMME) के रूप में स्थापित किया गया था, ताकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोप में विस्थापन की समस्या का समाधान किया जा सके।
  • मुख्यालय: जेनेवा, स्विट्जरलैंड।
  • स्थिति: संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध संगठन (2016 से)।
  • सदस्य: 174 सदस्य देश; पर्यवेक्षकों में देश और गैर-सरकारी संगठन (NGOs) शामिल हैं।
  • कार्य के प्रमुख क्षेत्र
    • आपातकालीन प्रतिक्रिया और विस्थापन
    • स्वैच्छिक वापसी और पुनर्वास सहायता (AVRR)
    • प्रवासन स्वास्थ्य और श्रम प्रवासन
    • मानव तस्करी निरोध और प्रवासी संरक्षण
    • जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय प्रवासन।
  • भारत और IOM: भारत एक सदस्य है; IOM क्षमता निर्माण, प्रवासन डेटा, तथा वापसी और पुनर्वास कार्यक्रमों में सहयोग करता है।

भारत- ग्रीस साझेदारी

 

भारत और ग्रीस ने अपनी रणनीतिक साझेदारी के तहत पाँच-वर्षीय रोडमैप के माध्यम से रक्षा तथा समुद्री सहयोग को गहरा करने पर सहमति व्यक्त की है।

भारत–ग्रीस साझेदारी के बारे में

  • रक्षा एवं रणनीतिक सहयोग: रक्षा औद्योगिक सहयोग का विस्तार करने के लिए संयुक्त आशय घोषणा और द्विपक्षीय सैन्य सहयोग योजना, 2026 पर हस्ताक्षर किए गए।
    • यह साझेदारी भारत के आत्मनिर्भर भारत को ग्रीस के एजेंडा 2030 रक्षा सुधारों के साथ संरेखित करती है।
  • समुद्री एवं क्षेत्रीय सुरक्षा: साझा समुद्री परंपराओं को दर्शाते हुए समुद्री सुरक्षा पर अभिसरण।
    • ग्रीस, सूचना संलयन केंद्र – हिंद महासागर क्षेत्र (IFC–IOR), गुरुग्राम में एक संपर्क अधिकारी (Liaison Officer) तैनात करेगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में सूचना साझाकरण मजबूत होगा।
  • औद्योगिक एवं जन-जन संपर्क: भारतीय रक्षा स्टार्ट-अप्स और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSU) के साथ सहभागिता।
    • यह सहयोग हिंद-प्रशांत और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में स्थिरता को सुदृढ़ करता है।

ग्रीस के बारे में

  • ग्रीस (हेलेनिक गणराज्य) दक्षिण-पूर्वी यूरोप में, बाल्कन प्रायद्वीप के दक्षिणी छोर पर स्थित है, और यूरोप, एशिया तथा अफ्रीका को जोड़ता है।
  • सीमाएँ: अल्बानिया, उत्तर मैसेडोनिया, बुल्गारिया और तुर्की।
  • भूगोल: यूरोप के सबसे पर्वतीय देशों में से एक; यहाँ ‘पिंडस’ पर्वतमाला अवस्थित है
    • माउंट ओलंपस (2,918 मीटर) सबसे ऊँचा शिखर है।
    • लंबा, विखंडित तट (13,676 किमी.) और लगभग 1,500 द्वीप, जिनमें क्रीट और एविया शामिल हैं।
  • नदियाँ, बंदरगाह एवं अर्थव्यवस्था
    • प्रमुख नदियाँ: अचेलूस, एलियाकमोन, एव्रोस, पिनिओस।
    • समुद्र: एजियन, आयोनियन, भूमध्य सागर, क्रीटन और थ्रेसियन सागरों से घिरा हुआ।
      • पिराएस बंदरगाह (एथेंस): यूरोप का सबसे बड़ा यात्री बंदरगाह और एक प्रमुख भूमध्यसागरीय केंद्र।

मधुमेह के लिए HbA1c परीक्षण

लैंसेट रीजनल हेल्थ: दक्षिण-पूर्व एशिया के एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन परीक्षण पर निर्भरता भारत में व्यापक एनीमिया और रक्त विकारों के कारण टाइप 2 मधुमेह के गलत निदान का कारण बन सकती है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • HbA1c मान भ्रामक हो सकते हैं: हीमोग्लोबिन की मात्रा, संरचना या आयु को बदलने वाली स्थितियाँ जैसे- एनीमिया, सिकल सेल रोग, थैलेसीमिया और ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डीहाइड्रोजनेज की कमी HbA1c रीडिंग को विकृत कर सकती हैं।
  • भारत-विशिष्ट निदान चुनौती: भारत में आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया और हीमोग्लोबिनोपैथी की उच्च व्यापकता HbA1c की विश्वसनीयता को सीमित करती है, जिससे मधुमेह के निदान में देरी हो सकती है और दीर्घकालिक जटिलताओं का जोखिम बढ़ सकता है।
  • बहु-पैरामीट्रिक निदान की आवश्यकता: विशेषज्ञ HbA1c को ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट, स्व-निगरानी, ग्लूकोज मॉनिटरिंग और हीमैटोलॉजिकल आकलन के साथ संयोजित करने की सिफारिश करते हैं, विशेषकर प्राथमिक देखभाल और संसाधन-सीमित परिस्थितियों में।

HbA1c रीडिंग मधुमेह का पता कैसे लगाती है?

  • दीर्घकालिक रक्त ग्लूकोज को मापता है: ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c) लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन से जुड़े ग्लूकोज को मापकर पिछले 2–3 महीनों के औसत रक्त ग्लूकोज स्तर को दर्शाता है।
  • दीर्घकालिक हाइपरग्लाइसीमिया को दर्शाता है: उच्च रक्त ग्लूकोज स्तर से हीमोग्लोबिन का ग्लाइकेशन बढ़ जाता है।
    • HbA1c मान 6.5% का उपयोग मधुमेह के निदान के लिए किया जाता है, जो निरंतर हाइपरग्लाइसीमिया को दर्शाता है।
  • निदान और निगरानी के लिए उपयोगी: HbA1c के लिए उपवास की आवश्यकता नहीं होती और यह मधुमेह के निदान तथा रोगियों में दीर्घकालिक ग्लाइसेमिक नियंत्रण के आकलन में सहायक होता है।

मधुमेह के बारे में

  • परिभाषा: डायबिटीज मेलिटस एक दीर्घकालिक, प्रगतिशील गैर-संचारी रोग है, जो अपर्याप्त इंसुलिन उत्पादन या इंसुलिन की क्रिया में बाधा के कारण लगातार हाइपरग्लाइसीमिया से चिह्नित होता है।
  • मधुमेह के प्रकार
    • टाइप 1 मधुमेह: इंसुलिन-उत्पादक अग्न्याशय बीटा कोशिकाओं का स्वप्रतिरक्षित विनाश; आजीवन इंसुलिन उपचार की आवश्यकता; कुल मामलों का 5–10%।
    • टाइप 2 मधुमेह: इंसुलिन प्रतिरोध और सापेक्ष इंसुलिन की कमी द्वारा चिह्नित; वैश्विक स्तर पर और भारत में 90–95% मामलों के लिए उत्तरदायी है।
  • वैश्विक स्थिति: विश्वभर में लगभग 422 मिलियन लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, जिससे प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख मौतें होती हैं, जो निम्न और मध्यम आय वाले देशों को असमान रूप से प्रभावित करता है।

इथियोपिया–इरिट्रिया तनाव

हाल ही में इथियोपिया ने इरिट्रिया से अपने सीमा क्षेत्रों से सेनाएँ वापस बुलाने को कहा है।

भू-राजनीतिक तनाव के केंद्र

  • बादमे (Badme): वर्ष 1998–2000 के सीमा युद्ध का केंद्र; अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता द्वारा इरिट्रिया को दिए जाने के बावजूद, यह अब भी एक स्थायी क्षेत्रीय विवाद बिंदु बना हुआ है।
  • प्रिटोरिया समझौता (2022): इथियोपियाई सरकार और तिग्राय पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (TPLF) के बीच शांति समझौता; इसमें इरिट्रिया को शामिल न किए जाने से वर्तमान कूटनीतिक अविश्वास बढ़ा है।
  • संप्रभुता और विद्रोह: इथियोपिया अब इरिट्रिया की सैन्य उपस्थिति और कथित विद्रोही संबंधों को क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन मानता है, जिससे तिग्राय युद्ध (2020–2022) के दौरान बनी उनकी साझेदारी समाप्त हो गई है।

इरिट्रिया के बारे में 

  • स्थिति: ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ क्षेत्र में स्थित, पूर्व में लाल सागर से लगा हुआ।
  • स्थलीय सीमाएँ: सूडान (पश्चिम), इथियोपिया (दक्षिण), और जिबूती (दक्षिण-पूर्व)।
  • समुद्री महत्त्व: बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य (“आँसुओं का द्वार”) के पश्चिमी तट को नियंत्रित करता है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण चोकपॉइंट है।
  • भौतिक भूगोल: दहलाक द्वीपसमूह, लाल सागर में स्थित एक रणनीतिक द्वीप समूह।
  • डानाकिल डिप्रेशन: पृथ्वी के सबसे निचले और सबसे गर्म क्षेत्रों में से एक, जो इथियोपिया के साथ साझा है।
  • मुख्य नदियाँ: सेटिट (टेकेजे) (एकमात्र बारहमासी नदी), गाश (मारेब), और बार्का।
  • सांस्कृतिक विशेषता: इसकी राजधानी अस्मारा एक यूनेस्को विश्व धरोहर शहर है, जो अपनी आधुनिकतावादी/भविष्यवादी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।

इथियोपिया के बारे में 

  • स्थल-आवृत्त स्थिति: वर्ष 1993 में इरिट्रिया की स्वतंत्रता के बाद विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला स्थल-आवृत्त देश बन गया।
  • रणनीतिक निर्भरता: इथियोपिया अपने बाह्य व्यापार के 90% से अधिक के लिए जिबूती बंदरगाह पर निर्भर है।
  • जल-राजनीति: ‘ब्लू नील’ नदी पर ग्रैंड इथियोपियन रिनेसाँ डैम (GERD) स्थित है, जो मिस्र और सूडान की जल सुरक्षा को प्रभावित करता है।
  • कूटनीतिक केंद्र: अदीस अबाबा अफ्रीकी संघ (AU) और संयुक्त राष्ट्र अफ्रीका आर्थिक आयोग (UNECA) का मुख्यालय है।

‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ और क्षेत्रीय ढाँचे 

  • सदस्य राष्ट्र (SEED): सोमालिया, इथियोपिया, इरिट्रिया, जिबूती।
  • क्षेत्रीय संगठन: इंटर-गवर्नमेंटल अथॉरिटी ऑन डेवलपमेंट (IGAD), मुख्यालय जिबूती में।
  • वैश्विक प्रभाव: यहाँ अस्थिरता लाल सागर के शिपिंग मार्गों को बाधित कर सकती है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और स्वेज नहर मार्ग की सुरक्षा प्रभावित होती है।
  • प्रमुख व्यक्तित्व: प्रधानमंत्री अबी अहमद (इथियोपिया) को इरिट्रिया के साथ 20 वर्षों के गतिरोध को समाप्त करने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार (2019) मिला था।

संदर्भ

केरल में ड्रैगनफ्लाई की एक नई प्रजाति, लिरियोथेमिस केरलेंसिस (Lyriothemis keralensis), की पहचान की गई है, जो पश्चिमी घाट के बागान परिदृश्यों में अदृश्य जैव-विविधता को प्रदर्शित करती है। यह वर्ष 2013 से केरल में उपस्थित थी, लेकिन एक दशक से अधिक समय तक इसे गलती से लिरियोथेमिस एसीगैस्ट्रा (Lyriothemis Acigastra) के रूप में पहचाना जाता रहा, जिसे पहले केवल पूर्वोत्तर भारत तक सीमित माना जाता था।

लिरियोथेमिस केरलेंसिस के बारे में

  • यह केरल की समृद्ध जैव-विविधता के सम्मान में नामित एक नई खोजी गई ड्रैगनफ्लाई प्रजाति है।
    • इसे एक दशक से अधिक समय तक गलती से लिरियोथेमिस एसीगैस्ट्रा के रूप में पहचाना गया।
  • वितरण: केरल के एर्नाकुलम जिले में कोठामंगलम के पास वरापेट्टी से दर्ज की गई।
  • आवास: छायादार रबर और अनानास के बागानों के भीतर वनस्पति युक्त तालाबों और सिंचाई नहरों में निवास करती है।
    • ये दक्षिण-पश्चिम मानसून (मई–अगस्त) के दौरान दिखाई देती हैं और शेष वर्ष लार्वा के रूप में रहती हैं।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • लैंगिक द्विरूपता प्रदर्शित करती है।
      • नर: चमकीले रक्त-लाल रंग के, काले चिह्नों के साथ।
      • मादा: पीले रंग की, काले चिह्नों के साथ, अधिक भारी शरीर वाली।
    • पतले उदर और विशिष्ट गुदा उपांगों/जननांगों द्वारा पहचानी जाती है।
  • संरक्षण संबंधी चिंताएँ
    • अधिकांश जनसंख्या संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थित है।
    • बागान-प्रधान परिदृश्यों में भूमि-उपयोग परिवर्तन के प्रति संवेदनशील है।
    • जैव-विविधता-संवेदनशील कृषि प्रथाओं की आवश्यकता पर बल देती है।

ड्रैगनफ्लाई के बारे में

  • ड्रैगनफ्लाई ‘ओडोनाटा’ गण और ‘एनिसोप्टेरा’ उपगण के परभक्षी कीट हैं, जिनकी विशेषताएँ बड़े संयुक्त नेत्र, चार पारदर्शी पंख, तीन जोड़े पैर और पतला शरीर हैं।
    • लगभग 3,000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो सामान्यतः मीठे जल के आवासों के पास पाई जाती हैं।
  • जीवन चक्र: इनके तीन चरण होते हैं: अंडा लार्वा (निम्फ) वयस्क।
    • लार्वा आंतरिक गलफड़ों से श्वसन में सहायता करते हैं और वयस्क श्वासरंध्रों के माध्यम से श्वसन करते हैं।
  • आवास: वयस्क नदियों, तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों के आस-पास रहते हैं।
    • लार्वा जलीय होते हैं और पौधों तथा चट्टानों के बीच रहते हैं।
  • आहार: ये विशेषीकृत रूप से वायु में शिकार करते हैं, जो मच्छरों, मक्खियों और अन्य कीटों को खाते हैं, तथा इनकी शिकार सफलता दर लगभग 95% होती है।
    • लार्वा जलीय कीटों, कृमियों और छोटे जलीय जीवों को खाते हैं।
  • संकेतक प्रजाति: जल गुणवत्ता के प्रति संवेदनशील होने के कारण ये मीठे जल की स्वास्थ्य संकेतक प्रजाति हैं।
  • पारिस्थितिक भूमिका: ये कीट जनसंख्या को नियंत्रित करने में सहायता करते हैं और जलीय–स्थलीय खाद्य जालों को समर्थन प्रदान करते हैं।

संदर्भ

भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी ने नई दिल्ली में द्विपक्षीय वार्ता की, जो राजनयिक संबंधों के 50 वर्ष और सेशेल्स की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगाँठ के अवसर पर हुई।

संबंधित तथ्य

  • दोनों पक्षों ने सुदृढ़ संपर्कों के माध्यम से सततता, आर्थिक विकास और सुरक्षा के लिए संयुक्त दृष्टि (SESEL) ढाँचे को अपनाया और कई क्षेत्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
  • SESEL ढाँचा सुरक्षा से आगे बढ़कर सतत् विकास और संस्थागत क्षमता निर्माण तक सहयोग का विस्तार करता है।

दौरे के प्रमुख बिंदु

  • राजनीतिक और रणनीतिक साझेदारी:                   
    • समुद्री पड़ोस: दोनों नेताओं ने पुनः पुष्टि की कि भारत और सेशेल्स, निकट समुद्री पड़ोसी होने के नाते, पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा को सुदृढ़ करने वाली एक विशेष साझेदारी साझा करते हैं।
    • विजन महासागर संपर्क: क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के लिए भारत के ‘महासागर’ विजन में सेशेल्स को एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ के रूप में पुनः पुष्टि की गई।
  • विकास साझेदारी और आर्थिक सहयोग
    • भारत के समर्थन की स्वीकृति: सेशेल्स ने क्रेडिट लाइन, अनुदानों, क्षमता निर्माण और उच्च प्रभाव सामुदायिक विकास परियोजनाओं (HICDP) के माध्यम से भारत की सहायता को स्वीकार किया।
    • विशेष आर्थिक पैकेज: भारत ने 175 मिलियन अमेरिकी डॉलर के पैकेज की घोषणा की, जिसमें 125 मिलियन अमेरिकी डॉलर की क्रेडिट लाइन और 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर की अनुदान सहायता शामिल है।
    • फोकस क्षेत्र: सततता, समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग, लचीलापन, समावेशी विकास और क्षमता निर्माण।
  • स्वास्थ्य, क्षमता निर्माण और सामाजिक सहयोग
    • स्वास्थ्य अवसंरचना समर्थन: भारत ने 10 उन्नत एंबुलेंस प्रदान कीं और अस्पताल निर्माण तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सहयोग का समर्थन करने पर सहमति व्यक्त की।
    • सस्ती दवाइयाँ: गुणवत्ता वाली दवाओं की खरीद को सुव्यवस्थित करने और जन औषधि के अंतर्गत सहयोग के लिए सेशेल्स द्वारा भारतीय फार्माकोपिया (IP) की मान्यता।
    • मानव संसाधन विकास: भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (ITEC) के अंतर्गत प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा शासन, साइबर सुरक्षा, पुलिसिंग और जलवायु क्षेत्रों में संस्थागत संपर्कों का विस्तार किया गया।
    • खाद्य और आवश्यक आपूर्ति: भारत द्वारा 1000 मीट्रिक टन अनाज प्रदान करना और भारत से किफायती खाद्य एवं आवश्यक वस्तुओं की खरीद को संस्थागत बनाने पर सहमति।
  • जलवायु, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग
    • नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु कार्रवाई: सौर ऊर्जा (अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के अंतर्गत), ग्रिड प्रबंधन, हरित गतिशीलता और बहु-आपदा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में सहयोग का विस्तार होगा।
    • ब्लू इकोनॉमी और हाइड्रोग्राफी: संयुक्त हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षणों को मजबूत किया जाएगा, जिसमें भारतीय सहायता से सेशेल्स हाइड्रोग्राफिक यूनिट की स्थापना शामिल है।
    • रक्षा और समुद्री सुरक्षा: निगरानी, संयुक्त अभ्यास, समुद्री डकैती विरोधी अभियानों और समुद्री क्षेत्र जागरूकता में सहयोग की पुनः पुष्टि की गई।
    • बहुपक्षीय सहयोग: सेशेल्स आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन में शामिल होगा और भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की बोली का समर्थन किया।
  • क्षेत्रीय और बहुपक्षीय सहयोग
    • क्षेत्रीय तंत्र: कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन (CSC) का पूर्ण सदस्य बनने के सेशेल्स के निर्णय का स्वागत किया गया।
    • बहुपक्षीय समर्थन: सेशेल्स ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत को समर्थन की पुनः पुष्टि की।

भारत–सेशेल्स द्विपक्षीय संबंध

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • प्रारंभिक संपर्क: सेशेल्स में भारतीय उपस्थिति का पहला दर्ज प्रमाण वर्ष 1770 का है, जब पाँच भारतीय, अफ्रीकी दासों के साथ बागान मजदूरों के रूप में वहाँ पहुँचे।
    • औपनिवेशिक कालीन संपर्क:
      • ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, कुछ समय तक सेशेल्स का प्रशासन बॉम्बे प्रेसीडेंसी से किया गया।
      • नियमित जहाज मार्गों ने भारत से वस्तुओं, आवश्यक वस्तुओं और प्रवासियों के प्रवाह को संभव बनाया।
  • राजनयिक संबंध
    • सेशेल्स ने 29 जून, 1976 को स्वतंत्रता प्राप्त की।
    • वर्ष 1976 में औपचारिक रूप से राजनयिक संबंध स्थापित हुए, और भारत ने वर्ष 1979 में विक्टोरिया में अपना मिशन खोला।
    • प्रारंभिक समझौतों में वायु सेवा समझौता (1981), पर्यटन सहयोग समझौता (1996), व्यापार समझौता और संयुक्त व्यापार परिषद (2000) शामिल हैं, जबकि वर्ष 2010 में द्विपक्षीय निवेश प्रोत्साहन और संरक्षण समझौते (BIPPA) ने संबंधों को मजबूत किया।
  • व्यापार और निवेश
    • प्रत्यक्ष जहाज संपर्क के अभाव के कारण द्विपक्षीय व्यापार सीमित बना हुआ है।
    • भारत के प्रमुख निर्यात: चावल, खाद्य उत्पाद, सीमेंट, वस्त्र, वाहन, दवाइयाँ, चिकित्सा उपकरण।
    • व्यापार प्रवृत्तियाँ (2022–23):
      • भारतीय निर्यात: 64.88 मिलियन अमेरिकी डॉलर
      • भारतीय आयात: 8.96 मिलियन अमेरिकी डॉलर
  • रक्षा और सुरक्षा सहयोग
    • हिंद महासागर में समुद्री डकैती और सुरक्षा चुनौतियों के कारण सहयोग का विस्तार हुआ है।
    • भारत ने PS टोपाज (2005), PS कॉन्स्टेंट (2014) सहित विभिन्न गश्ती पोत और वर्ष 2018 में डोर्नियर समुद्री निगरानी विमान उपहार में दिए।
    • दोनों देश लैमिटिये, मिलान 2024, इमेक्स-23 और कटलेस एक्सप्रेस जैसे सैन्य अभ्यासों में भाग लेते हैं।
  • ऊर्जा और पर्यावरण में सहयोग
    • वर्ष 2015 में ब्लू इकोनॉमी प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए, जो साझा समुद्री और सततता प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
    • सेशेल्स अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर भारत का समर्थन करता है।
    • सेशेल्स अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) का संस्थापक सदस्य है (2017 में अनुमोदित)
  • सांस्कृतिक संबंध और भारतीय समुदाय
    • प्रवासी समुदाय: 20वीं शताब्दी में भारतीय प्रवासन में वृद्धि हुई, मुख्यतः तमिलनाडु पुडुचेरी और गुजरात से।
    • सांस्कृतिक सहभागिता: सांस्कृतिक आदान-प्रदान मुख्यतः समुदाय-आधारित हैं और सरकारी समर्थन प्राप्त है।

सेशेल्स का रणनीतिक महत्त्व 

  • भू-रणनीतिक स्थिति: सेशेल्स पश्चिमी हिंद महासागर में प्रमुख समुद्री संचार मार्गों (SLOCs) के निकट स्थित है, जो एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ते हैं, जिससे यह वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • समुद्री क्षेत्र जागरूकता: सेशेल्स के साथ तटीय रडार प्रणालियाँ और निगरानी सहयोग भारत की समुद्री क्षेत्र जागरूकता को विस्तृत महासागरीय क्षेत्र में बढ़ाते हैं।
  • समुद्री डकैती विरोधी अभियान: सेशेल्स विशेष रूप से सोमाली तट से उत्पन्न खतरों के विरुद्ध भारत के समुद्री डकैती विरोधी अभियानों का एक परिचालन केंद्र है।
  • चीन के प्रभाव का संतुलन: सेशेल्स के साथ रणनीतिक जुड़ाव भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में मदद करता है।
  • ‘अजम्पशन’ द्वीप परियोजना: ‘अजम्पशन’ द्वीप पर भारत द्वारा अवसंरचना विकास क्षेत्र में इसकी लॉजिस्टिक पहुँच, निगरानी क्षमता और परिचालन स्थिरता को बढ़ाता है।
  • बहुपक्षीय समन्वय: दोनों देश हिंद महासागर रिम एसोसिएशन जैसे क्षेत्रीय मंचों में समुद्री शासन मानदंडों को आकार देने के लिए सहयोग करते हैं।
  • लॉजिस्टिक्स नोड: ईंधन भरने, पुनः आपूर्ति और भारतीय नौसैनिक परिसंपत्तियों की अग्रिम तैनाती को सक्षम बनाती हैं।
  • सागर सिद्धांत: सेशेल्स के साथ साझेदारी भारत के ‘सागर’ (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) विजन को आगे बढ़ाती है।

सेशेल्स के बारे में

स्थान

  • सेशेल्स पश्चिमी हिंद महासागर में स्थित एक द्वीपीय राष्ट्र है।
  • यह मेडागास्कर के उत्तर-पूर्व और अफ्रीकी मुख्यभूमि के पूर्व में स्थित है।
  • यह क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों के संदर्भ में अफ्रीका का सबसे छोटा देश है।
  • निकटतम देश: दक्षिण में कोमोरोस और मॉरीशस, तथा पूर्व में मालदीव।

भौगोलिक विशेषताएँ

  • जलवायु: उष्णकटिबंधीय महासागरीय जलवायु, जिसमें पूरे वर्ष गर्म तापमान और न्यूनतम मौसमी परिवर्तन रहता है।
  • द्वीप संरचना: द्वीपसमूह को व्यापक रूप से दो प्रमुख समूहों में विभाजित किया गया है:
    • ग्रेनाइट द्वीप (माहे समूह): पर्वतीय और ज्वालामुखीय उत्पत्ति वाले; संकीर्ण तटीय पट्टी और पथरीले, पहाड़ी आंतरिक भाग के साथ।
    • कोरल द्वीप: समतल प्रवाल एटॉल या उन्नत रीफ द्वारा निर्मित; ग्रेनाइट द्वीपों की तुलना में कम ऊबड़-खाबड़।
  • भूविज्ञान: द्वीप समुद्र के नीचे स्थित मस्करीन पठार पर स्थित हैं, जो पश्चिमी हिंद महासागर की एक महत्त्वपूर्ण भू-वैज्ञानिक विशेषता है।
  • सर्वोच्च शिखर: मोर्ने सेशेल्वा
  • समुद्री महत्त्व: सेशेल्स का विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) लगभग 1.35 मिलियन वर्ग किलोमीटर है, जो भूमि क्षेत्र की तुलना में विश्व के सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक है।

संदर्भ

INDIA गठबंधन की विपक्षी पार्टियों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंप दिया। जिसमें बार-बार व्यवधान और सांसदों के निलंबन के बीच पक्षपातपूर्ण आचरण का आरोप लगाया गया है।

प्रस्तावित प्रस्ताव के पीछे कारण

  • पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली: विपक्षी नेताओं ने अध्यक्ष पर “पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्य करने” और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष को बोलने का अवसर न देने का आरोप लगाया।
  • सांसदों का निलंबन: यह कदम लोकसभा से आठ विपक्षी सांसदों के निलंबन के बाद उठाया गया है।
  • महिला सांसदों पर आरोप: विपक्ष ने महिला कांग्रेस सांसदों पर लगाए गए “असत्यापित” आरोपों पर आपत्ति जताई।

धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of Thanks)

  • धन्यवाद प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति द्वारा वर्ष की शुरुआत में तथा आम चुनाव के बाद संयुक्त बैठक में दिए गए विशेष अभिभाषण के लिए धन्यवाद प्रकट करने हेतु प्रस्तुत किया जाने वाला औपचारिक प्रस्ताव है।
  • उत्पत्ति: यह परंपरा वेस्टमिंस्टर संसदीय प्रणाली से ली गई है।

लोकसभा अध्यक्ष के बारे में

  • अध्यक्ष लोकसभा के पीठासीन अधिकारी होते हैं, जो उसके दैनिक कार्य संचालन को नियंत्रित करते हैं।
  • अध्यक्ष एक संवैधानिक पद धारण करते हैं और संविधान तथा कार्य संचालन नियमों के अंतर्गत कार्य करते हैं।
  • अध्यक्ष का वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं और संसद द्वारा मतदान के अधीन नहीं होते।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-93: लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करेगी।
  • अनुच्छेद-95: अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर उपाध्यक्ष उसके कर्तव्यों का निर्वहन करता है।

अध्यक्ष का चुनाव और कार्यकाल

  • पात्रता: कोई विशेष योग्यता नहीं, केवल यह आवश्यक है कि व्यक्ति लोकसभा का सदस्य हो।
  • चुनाव प्रक्रिया: अध्यक्ष का चुनाव उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से होता है।
  • राष्ट्रपति चुनाव की तिथि निर्धारित करते हैं, जो नई लोकसभा की पहली बैठक के तुरंत बाद होती है।
  • परंपरा
    • आमतौर पर सत्तारूढ़ दल से अनौपचारिक रूप से विपक्ष से परामर्श के बाद अध्यक्ष चुना जाता है।
    • यह परंपरा निष्पक्षता और सर्वदलीय स्वीकार्यता सुनिश्चित करने में सहायक होती है।
  • कार्यकाल
    • अवधि: अध्यक्ष सामान्यतः लोकसभा के पूरे कार्यकाल तक पद पर रहते हैं।
    • लोकसभा का विघटन: विघटन के बाद भी अध्यक्ष नई लोकसभा की पहली बैठक तक पद पर बने रहते हैं।

लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया

ऐतिहासिक परंपरा:

  • अब तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को सफल प्रस्ताव द्वारा हटाया नहीं गया है।
  • डॉ. नीलम संजीव रेड्डी एकमात्र अध्यक्ष थे, जिन्होंने त्याग-पत्र दिया और बाद में भारत के राष्ट्रपति बने।

  • हटाने के आधार
    • लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो जाना।
    • उपाध्यक्ष को लिखित रूप में त्याग-पत्र देना।
    • लोकसभा द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से हटाया जाना।
  • प्रक्रिया
    • अध्यक्ष को प्रभावी बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव से हटाया जा सकता है।
    • हटाने के प्रस्ताव के लिए 14 दिन का अग्रिम नोटिस और कम-से कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
    • अनुच्छेद 96: हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान अध्यक्ष पीठासीन नहीं होंगे, लेकिन भाग ले सकते हैं और मतदान कर सकते हैं (समान मत होने की स्थिति को छोड़कर)।

हटाने के प्रस्ताव के ऐतिहासिक उदाहरण

  • पहला उदाहरण: जी.वी. मावलंकर (1954), प्रथम लोकसभा में।
    • प्रस्ताव अस्वीकृत हुआ क्योंकि सत्तारूढ़ दल के पास आवश्यक बहुमत था।
  • दूसरा उदाहरण: बलराम जाखड़ (1987), आठवीं लोकसभा में।
    • यह प्रस्ताव बोफोर्स घोटाले के दौरान लाया गया था।
    • सरकार के एकदलीय बहुमत के कारण प्रस्ताव विफल रहा।

तुलना: भारतीय अध्यक्ष बनाम ब्रिटिश अध्यक्ष

मापदंड भारतीय अध्यक्ष ब्रिटिश अध्यक्ष
चुनाव नई लोकसभा के गठन के बाद सदस्यों में से चुना जाता है हाउस ऑफ कॉमन्स से चुना जाता है और बाद में प्रायः निर्विरोध पुनः चुना जाता है
राजनीतिक पक्षधरता निष्पक्ष रहने की अपेक्षा, परंतु पार्टी सदस्य बने रहते हैं पूर्णतः तटस्थ, चुनाव के बाद पार्टी से त्याग-पत्र
कार्यकाल लोकसभा भंग होने के बाद भी नए अध्यक्ष के चयन तक पद पर त्याग-पत्र या सेवानिवृत्ति तक पद पर
कार्यकालोत्तर स्थिति सक्रिय राजनीति में लौट सकते हैं प्रायः हाउस ऑफ लॉर्ड्स में नियुक्त
निर्वाचन परंपरा कोई विशेष परंपरा नहीं निर्वाचन क्षेत्र प्रायः निर्विरोध छोड़ा जाता है

ऐसे प्रस्तावों का राजनीतिक महत्त्व 

  • प्रतीकात्मक प्रकृति: ये प्रस्ताव मुख्यतः एक राजनीतिक वक्तव्य के रूप में कार्य करते हैं, न कि वास्तव में हटाने के यथार्थ प्रयास के रूप में।
  • विपक्ष की रणनीति: ये विपक्ष को कथित संस्थागत पक्षपात को उजागर करने और संसदीय राजनीति में ‘अपनी संख्या से अधिक प्रभाव’ (Punch above its numbers) दिखाने का अवसर देते हैं।
  • लोकतांत्रिक भूमिका: ऐसे साधन लोकतांत्रिक राजनीति की बहुस्तरीय प्रकृति को रेखांकित करते हैं, जहाँ संख्यात्मक शक्ति न होने पर भी प्रक्रियात्मक उपकरणों के माध्यम से असहमति दर्ज की जाती है।

अध्यक्ष की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय

  • किहोतो होलोहान बनाम जाचिल्हु (1992): 
    • अध्यक्ष के निर्णयों पर न्यायिक समीक्षा: अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के अंतर्गत एक न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करता है और उसके निर्णय दुर्भावना, विकृतता तथा संवैधानिक आदेशों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा के अधीन होते हैं।
  • रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994): 
    • अध्यक्ष की निष्पक्षता और तटस्थता: न्यायालय ने जोर दिया कि अध्यक्ष को दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत अपने कर्तव्यों का निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ रूप से निर्वहन करना चाहिए तथा संस्थागत तटस्थता बनाए रखनी चाहिए।
  • राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007)
    • देरी को संवैधानिक अनुचितता माना गया: अयोग्यता याचिकाओं पर जानबूझकर निष्क्रियता या निर्णय में विफलता दलबदल कानून के उद्देश्य को विफल करती है और इसे दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद-6 के अंतर्गत संरक्षण नहीं मिल सकता।
  • केइशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधान सभा (2020)
    • समयबद्ध निर्णय और संस्थागत पक्षपात: अध्यक्ष को अयोग्यता याचिकाओं पर उचित समय के भीतर (अधिमानतः तीन माह में) निर्णय करना चाहिए और लगातार देरी स्वतंत्र निर्णयकारी तंत्र की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
  • पाड़ी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य (2026)
    • संवैधानिक प्रतिरक्षा का अभाव और सक्रिय न्यायिक निगरानी: पैरा 6 के अंतर्गत निर्णय देते समय अध्यक्ष को अनुच्छेद-122 और 212 के अंतर्गत पूर्ण प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं है और त्वरित निपटारे को सुनिश्चित करने हेतु न्यायालय अंतिम निर्णय से पूर्व भी हस्तक्षेप कर सकते हैं।

संदर्भ

भारत में औद्योगिक विकास और संवैधानिक पर्यावरण संरक्षण के बीच बढ़ता संघर्ष देखा जा रहा है, क्योंकि नीतिगत और न्यायिक परिवर्तन कार्बन सिंक और जल सुरक्षा की तुलना में अल्पकालिक आर्थिक लाभों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे पारिस्थितिकी संवैधानिकवाद की माँग उठ रही है, जो पर्यावरण अधिकारों को पर्यावरण कानून के शासन के मूल में रखता है।

पर्यावरण संबंधी कानून के शासन के बारे में

  • पर्यावरण प्रशासन के लिए केवल कानूनों की आवश्यकता नहीं है; इसके लिए पर्यावरणीय कानून के शासन की आवश्यकता है।
  • इसमें चार स्तंभ शामिल हैं:-
    • निष्पक्ष और स्पष्ट कानून
    • प्रभावी कार्यान्वयन
    • निर्णय लेने में जनभागीदारी
    • पारिस्थितिकी क्षति के लिए जवाबदेही।
  • इनके बिना, पर्यावरणीय अधिकार आर्थिक दबाव के विरुद्ध ‘प्रक्रियात्मक अवरोध’ ही बने रहते हैं।

पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के बारे में

  • परिभाषा: कानूनी दर्शन, सिद्धांतों और न्यायिक मतों का एक ढाँचा, जिसके माध्यम से न्यायालय विकासात्मक आवश्यकताओं और पर्यावरण संरक्षण तथा प्रकृति के अंतर्निहित मूल्य के बीच संतुलन स्थापित करते हैं।

  • मुख्य सिद्धांत
    • निवारक सिद्धांत: पर्यावरण को संभावित नुकसान की स्थिति में, पूर्ण वैज्ञानिक निश्चितता की कमी निवारक कार्रवाई में देरी नहीं कर सकती है; साक्ष्यों का भार विकासकर्ता पर होता है।
    • प्रदूषक भुगतान’ सिद्धांत: प्रदूषण फैलाने वाली संस्था को उपचार और मुआवजे का खर्च वहन करना होगा।
    • सार्वजनिक न्यास सिद्धांत: वायु, जल, वन और तटीय राज्य द्वारा जनता के लिए न्यास के रूप में रखे जाते हैं, न कि निजी उपयोग के लिए।
    • सतत् विकास: आर्थिक विकास पारिस्थितिकी असंतुलन किए बिना होना चाहिए।
    • अंतर-पीढ़ीगत समानता: वर्तमान पीढ़ियों को भावी पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना चाहिए।
  • महत्त्व: कार्यकारी और आर्थिक गतिविधियों पर संवैधानिक नियंत्रण के रूप में कार्य करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि विकास पारिस्थितिकी स्थिरता के अनुरूप हो।

संबंधित न्यायिक निर्णय

  • सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991): अनुच्छेद-21 की व्याख्या करते हुए इसमें जीवन के पूर्ण आनंद के लिए प्रदूषण मुक्त वायु और जल के अधिकार को शामिल किया गया।
  • वेल्लोर नागरिक कल्याण मंच बनाम भारत संघ (1996): सतत् विकास के एक भाग के रूप में निवारक सिद्धांत और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत को औपचारिक रूप से भारतीय कानूनी ढाँचे में एकीकृत किया गया।
  • एम.सी. मेहता (ओलियम गैस रिसाव मामला, 1987): पारंपरिक “कठोर दायित्व” नियम से आगे बढ़ते हुए, खतरनाक उद्योगों के लिए पूर्ण दायित्व का सिद्धांत स्थापित किया गया।
  • टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद मामला (1996-वर्तमान): वन प्रशासन में “सतत् परमादेश” की अवधारणा को प्रस्तुत किया गया, जिसमें स्वामित्व की परवाह किए बिना “वन” की परिभाषा को उसके शब्दकोश अर्थ तक विस्तारित किया गया।
  • आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाम प्रो. एम.वी. नायडू (1999): पर्यावरण संबंधी मामलों में साक्ष्य का भार स्पष्ट किया, और परियोजना को पर्यावरण के अनुकूल सिद्ध करने का दायित्व विकासकर्ता पर डाला।
  • नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2000): इस बात पर जोर दिया कि विकास आवश्यक है, लेकिन इसे विस्थापित समुदायों के अधिकारों और पारिस्थितिकी प्रभाव के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।

भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा

  • अनुच्छेद-21 (मौलिक अधिकार): यद्यपि वर्ष 1950 में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था, सर्वोच्च न्यायालय ने “जीवन के अधिकार” की व्याख्या स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को समाहित करते हुए की, जिससे पारिस्थितिक संरक्षण न्यायिक रूप से लागू करने योग्य मौलिक अधिकार बन गया।
  • अनुच्छेद-48A (निर्देशात्मक सिद्धांत): यह संवैधानिक आदेश राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा देश के वनों तथा वन्यजीवों की सुरक्षा करने के लिए बाध्य करता है।
  • अनुच्छेद-51A(g) (मौलिक कर्तव्य): यह प्रत्येक नागरिक पर जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखने और प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने का नैतिक और कानूनी कर्तव्य डालता है।
  • राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) अधिनियम, 2010: पर्यावरणीय विवादों को शीघ्रता से निपटाने की विशेषज्ञता से संबद्ध एक विशेष निकाय के रूप में स्थापित किया गया, जिससे पारंपरिक न्यायालयों पर भार कम होता है।

पर्यावरण नियमों में छूट के हालिया मामले

हालिया कानूनी और विधायी परिवर्तन ‘नियामक छूट’ की ओर एक प्रवृत्ति का संकेत देते हैं, जहाँ पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को ठोस सुरक्षा के बजाय प्रक्रियात्मक बाधाओं के रूप में माना जा रहा है।

  • प्राकृतिक भूदृश्यों की पुनर्परिभाषा: संरक्षित क्षेत्र की परिभाषा तय करने वाले कानूनी मानदंडों को संकुचित करके, राज्य ने विशाल पारिस्थितिकी क्षेत्रों को कठोर निगरानी से बाहर कर दिया है।
    • अरावली पर्वतमाला की ऊँचाई सीमा (2025): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहाड़ियों के लिए 100 मीटर की ऊँचाई पर आधारित परिभाषा को स्वीकार किया।
      • इस संकुचित रणनीति ने निचली पर्वतमालाओं और तलहटी को कानूनी संरक्षण से वंचित कर दिया, जिससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में भूजल पुनर्भरण और मरुस्थलीकरण को रोकने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका की अनदेखी हुई।
    • वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम (FCAA), 2023: इन संशोधनों ने “वनों” की परिभाषा को पुनर्परिभाषित किया और इसमें केवल सरकारी रजिस्टरों में आधिकारिक रूप से दर्ज भूमि को ही शामिल किया।
      • इससे प्रभावी रूप से “मानित वनों” के बड़े भू-भागों का विनियमन समाप्त हो गया, जिससे बुनियादी ढाँचे और सुरक्षा परियोजनाओं, विशेष रूप से संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में, भूमि का हस्तांतरण आसान हो गया।
  • पश्चात् स्वीकृति (एक्स-पोस्ट फैक्टो क्लीयरेंस) शासन का सामान्यीकरण: “पूर्व अनुमति” से “पूर्वव्यापी क्षमा” की ओर परिवर्तन ने कानून के निवारक प्रभाव को काफी कमजोर कर दिया है।
    • वनशक्ति बनाम भारत संघ पुनर्विचार (2025): न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण न्यायिक उलटफेर करते हुए पूर्वव्यापी पर्यावरण मंजूरी (मंजूरी माँगे बिना निर्माण शुरू करने की प्रथा) पर अपने पूर्व प्रतिबंध को वापस ले लिया।
      • न्यायपालिका ने तर्क दिया कि पूर्ण प्रतिबंध से चल रहे सार्वजनिक निवेशों पर “विनाशकारी आर्थिक परिणाम” होंगे।
    • उल्लंघनों का मुद्रीकरण: इससे परियोजनाओं को अवैध निर्माण शुरू करने और बाद में केवल जुर्माना अदा करके पूर्वव्यापी मंजूरी प्राप्त करने की अनुमति मिल जाती है, जिससे पर्यावरण क्षति को व्यवसाय की एक लेन-देन लागत के रूप में माना जाता है।
  • प्रभाव आकलन की संस्थागत कमजोरी: परियोजनाओं की जाँच-पड़ताल का प्राथमिक साधन, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) प्रक्रिया, नई अधिसूचनाओं के कारण अप्रभावी हो गई है।
    • पर्यावरण प्रभाव आकलन नीति में छूट (18 दिसंबर, 2025): नई नीतियों के तहत अब विशिष्ट स्थान और क्षेत्र विवरण दिए बिना भी आकलन किए जा सकते हैं।
      • इससे पर्यावरण प्रभाव आकलन एक सैद्धांतिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है, जिसमें स्थल-विशिष्ट पारिस्थितिकी संवेदनशीलता का ध्यान नहीं रखा जाता है।
    • अनुपालन में छूट: पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचनाओं में परिवर्तनों से परियोजना छूटों का दायरा बढ़ा है, स्व-प्रमाणीकरण पर निर्भरता बढ़ी है और सार्वजनिक परामर्शों की आवृत्ति कम हुई है।
  • रणनीतिक अवसंरचना बनाम भू-गर्भीय स्थिरता: राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संपर्क का उपयोग संवेदनशील क्षेत्रों में निवारक सिद्धांत को दरकिनार करने के लिए तेजी से किया जा रहा है।
    • चार धाम राजमार्ग परियोजना: जून 2025 में किए गए अध्ययनों में 811 से अधिक भूस्खलन क्षेत्रों की पहचान किए जाने के बावजूद, परियोजना का विस्तार जारी है।
      • हिमालयी भू-गर्भीय संरचना की तुलना में रणनीतिक संपर्क को प्राथमिकता देने के कारण विनाशकारी बाढ़ और मिट्टी की गंभीर अस्थिरता उत्पन्न हुई है।
    • सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून’ बनाम भारत संघ (2021): क्षेत्र के पारिस्थितिकी महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी, न्यायालय ने रणनीतिक रक्षा आवश्यकताओं के आधार पर चौड़ी सड़कों के निर्माण की अनुमति दी।
      • इस “संतुलन” को उत्तराखंड में बाद में हुए पारिस्थितिकी व्यवधान और बाढ़ से जोड़ा गया है।
  • तटीय पारिस्थितिकी और ‘क्षतिपूर्ति’ संबंधी भ्रांति: औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए  अवैध प्रक्रियाएँ अपनाकर तटीय संरक्षण के साथ समझौता किया जा रहा है।
    • मैंग्रोव विनाश: महाराष्ट्र के रायगढ़ में मैंग्रोव के विनाश के लिए न्यायिक स्वीकृति, क्षतिपूर्ति वनीकरण पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाती है।
      • यह पारिस्थितिकी विज्ञान की अनदेखी है, क्योंकि पौधे परिपक्व मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा प्रदान की जाने वाली समुद्री लहरों से सुरक्षा और जैव विविधता का स्थान नहीं ले सकते।
    • तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचना, 2019: हालिया अद्यतनों ने तटीय क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों और पर्यटन अवसंरचना को बढ़ावा दिया है, जिससे बढ़ते समुद्री जल स्तर के कारण इन पारिस्थितिकी तंत्रों की आपदा संवेदनशीलता बढ़ गई है।
    • जैविक विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023: इस अधिनियम ने विशिष्ट उद्योगों के लिए अनुपालन आवश्यकताओं में छूट दी और स्थानीय समुदायों के साथ लाभ-साझाकरण प्रावधानों को कमजोर किया, जिससे जैव विविधता संसाधनों के व्यावसायीकरण पर निगरानी कम हो गई।

नियामक छूट’ का संरचित ढाँचा

श्रेणी

विशिष्ट बदलाव

कानून के शासन पर प्रभाव

परिभाषा का ह्रास ‘वन’ की पुनर्वर्गीकरण (वन संरक्षण एवं संवर्द्धन अधिनियम, 2023) तथा ‘पहाड़ियों’ का पुनर्वर्गीकरण (अरावली 100 मीटर नियम)। ‘मानचित्रण संबंधी खामियाँ’ उत्पन्न करता है, जिससे पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों का कानूनी दोहन संभव हो जाता है।
प्रक्रिया का ह्रास पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना का कमजोर होना; रणनीतिक सीमा सड़कों को दी गई छूट। स्थल-विशिष्ट प्रभावों के कठोर आकलन को दरकिनार कर निवारक सिद्धांत को कमजोर करता है।
अनुपालन का ह्रास पश्चात् स्वीकृतियों (एक्स-पोस्ट फैक्टो क्लीयरेंस) का नियमितीकरण (वनशक्ति रिकॉल, 2026)। ‘प्रदूषण के बदले भुगतान’ की संस्कृति को सामान्य बनाता है; पर्यावरणीय क्षति एक लेन-देन लागत बन जाती है।
संस्थागत ह्रास राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (SPCBs) में 40% से अधिक रिक्त पद तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की विशेषज्ञ पीठों में भी उच्च स्तर की रिक्तियाँ। वास्तविक क्षेत्रीय निगरानी के बजाय ‘चेक-बॉक्स अनुपालन’ को बढ़ावा देता है।

पर्यावरण विनियमन का महत्त्व

कठोर नियमन विकास में बाधा नहीं है; बल्कि यह सतत् समृद्धि का आधारभूत ढाँचा है। यह “साझा संसाधनों के दुरुपयोग” को रोकता है, जहाँ स्वच्छ हवा और जल जैसे साझा संसाधनों का अल्पकालिक व्यक्तिगत लाभ के लिए दोहन हो जाता है, और इसके परिणामस्वरूप राज्य और आने वाली पीढ़ियों को पुनर्स्थापन का बोझ उठाना पड़ता है।

  • जन स्वास्थ्य की रक्षा (राष्ट्रीय स्वास्थ्य लाभांश): पर्यावरण विनियमन का सबसे तात्कालिक लाभ बीमारियों और असमय मृत्यु की रोकथाम है।
    • वायु गुणवत्ता मानक: वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 जैसे नियम पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) को सीमित करते हैं, जिससे अस्थमा, हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर की घटनाओं में प्रत्यक्ष कमी आती है।
    • जल सुरक्षा: सीसा, PFAS (‘फाॅरएवर केमिकल्स’) और औद्योगिक अपवाह के मानक यह सुनिश्चित करते हैं कि पीने का पानी विषाक्त पदार्थों का स्रोत न बने।
    • आर्थिक लाभ: अध्ययनों में अक्सर स्वच्छ वायु मानकों के लिए 30:1 का लाभ-लागत अनुपात बताया गया है; अर्थात विनियमन पर खर्च किया गया प्रत्येक ₹1 स्वास्थ्य देखभाल लागत और उत्पादकता हानि में ₹30 की बचत करता है।
  • निःशुल्क’ पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का संरक्षण: प्रकृति वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों डॉलर की सेवाएँ प्रदान करती है। नियमन यह सुनिश्चित करता है कि ये प्रणालियाँ ध्वस्त न हों।
    • बाढ़ नियंत्रण (जैविक सुरक्षा कवच): मैंग्रोव और आर्द्रभूमि प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करते हैं।
      • उदाहरण के लिए, भितरकनिका मैंग्रोव (ओडिशा) ने चक्रवात दाना (2024) के दौरान अंतर्देशीय गाँवों को बाढ़ से बचाया, जबकि पूर्वी कोलकाता आर्द्रभूमि प्राकृतिक रूप से सीवेज का उपचार करके शहर को सालाना लगभग ₹4,680 मिलियन की बचत कराती है।
    • जल सुरक्षा: जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के माध्यम से जलक्षेत्रों और जलभंडारों की सुरक्षा सिंचाई और पीने के पानी दोनों के लिए दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करती है।
    • कार्बन पृथक्करण: वन संरक्षण पृथ्वी की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की प्राकृतिक क्षमता को बनाए रखता है।
      • मिष्टी (MISHTI) योजना (2023) जैसी पहलों का उद्देश्य 540 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव को पुनर्स्थापित करना है, जिससे एक विशाल कार्बन सिंक का निर्माण होगा।
  • आर्थिक स्थिरता और नवाचार: स्मार्ट नियम औद्योगिक आधुनिकीकरण को बढ़ावा देकर और लागतों को आंतरिक बनाकर विकास को गति प्रदान करते हैं।
    • नवाचार को बढ़ावा देना: जब राज्य उत्सर्जन कम करने का आदेश देता है, तो इससे ऑटोमोटिव और ऊर्जा क्षेत्रों को नवाचार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे नए बाजार विकसित होते हैं।
      • भारत के पर्यावरण प्रौद्योगिकी बाजार का वर्तमान मूल्य लगभग 23 अरब डॉलर है।
    • बाहरी लागतों को रोकना: नियमन के अभाव में, कारखाने अपने अपशिष्ट की लागत करदाताओं पर डाल देते हैं।
      • नियमन कंपनियों को इन लागतों को आंतरिक करने के लिए बाध्य करता है, जिससे अधिक कुशल और चक्रीय व्यापार मॉडल विकसित होते हैं।
  • संसाधनों की दीर्घकालिक सुरक्षा और आपदा जोखिम न्यूनीकरण: नियम संसाधनों के दोहन के उन उतार-चढ़ावों को रोकते हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के पूर्ण पतन का कारण बनते हैं।
    • मृदा संरक्षण: कृषि और खनन नियम ऊपरी मृदा के अपरदन और भूमि क्षरण को रोकते हैं जो खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
    • जलवायु अनुकूलन: एक सुदृढ़ पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) यह सुनिश्चित करता है कि चार धाम राजमार्ग जैसी बुनियादी संरचनाएँ जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित हों।
      • इन सुरक्षा उपायों की अनदेखी करने से विनाशकारी भूस्खलन होते हैं, जिनसे भारी आर्थिक नुकसान और बुनियादी ढाँचे का विनाश होता है।

भारत में पर्यावरण विनियमन के लिए चुनौतियाँ

  • विकास बनाम शासन का विरोधाभास: ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और निवारक सिद्धांत के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है।
    • तेजी से क्रियान्वयन का दबाव: पर्यावरणीय अनुपालन को अक्सर “लालफीताशाही” के रूप में देखा जाता है, जो महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में देरी करती है। 
    • पूर्वव्यापी स्वीकृतियों का सामान्यीकरण: जैसा कि वनशक्ति बनाम भारत संघ (2025) मामले में विचार-विमर्श से देखा गया, बिना परमिट के शुरू हुई परियोजनाओं को “नियमित” करने का भारी दबाव है।
      • जुर्माना अदा करने पर पूर्व तारीख से मंजूरी देने की न्यायिक नीति कानून के निवारक प्रभाव को कमजोर करती है, और पारिस्थितिकी क्षति को केवल एक लेन-देन लागत के रूप में देखती है।
    • मूल्यांकन प्रक्रियाओं का कमजोर होना: हालिया नीतिगत परिवर्तनों ने लघु खनन और रणनीतिक सीमा सड़कों जैसे उद्योगों के लिए छूटों का विस्तार किया है, जिससे अक्सर सार्वजनिक परामर्शों को दरकिनार कर दिया जाता है और स्थानीय समुदायों की अपनी भूमि और जल की रक्षा करने की शक्ति कम हो जाती है।
  • संस्थागत और प्रवर्तनीय कमियाँ: भारत में मजबूत कानून मौजूद होने के बावजूद, ‘कार्यान्वयन की कमी’ एक महत्त्वपूर्ण बाधा बनी हुई है।
    • नौकरशाही का हस्तक्षेप: पर्यावरण मंजूरी समितियों में अक्सर स्वतंत्र पारिस्थितिकी विशेषज्ञों की कमी होती है।
      • इससे हितों का टकराव उत्पन्न होता है, जहाँ परमिट वैज्ञानिक योग्यता के बजाय औद्योगिक प्रभाव के आधार पर दिए जा सकते हैं।
    • निगरानी में संसाधनों की कमी: राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) में हमेशा से ही धन और कर्मचारियों की कमी रहती है।
      • तकनीकी रिक्तियों की दर अक्सर 40% से अधिक होने के कारण, ये बोर्ड कठोर जमीनी निरीक्षण करने के बजाय निगरानी के लिए केवल खानापूर्ति करने पर विवश हैं।
    • प्रदूषक भुगतान करे’ की विडंबना: न्यायालय भारी जुर्माना लगा सकते हैं, लेकिन ये अक्सर वर्षों तक चलने वाले मुकदमों में उलझे रहते हैं। बड़ी कंपनियाँ अक्सर इन जुर्माने को अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव लाने के बजाय “व्यापार करने की लागत” के रूप में देखती हैं।
  • पर्यावरण के प्रति संघर्ष: वर्ष 2026 में उभरने वाली एक आधुनिक चुनौती विभिन्न पर्यावरणीय लक्ष्यों के बीच टकराव है, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन को कम करना (नवीकरणीय ऊर्जा) और जैव विविधता संरक्षण।
    • नवीकरणीय ऊर्जा बनाम पर्यावास: राजस्थान और गुजरात में बड़े पैमाने पर चल रहे सौर और पवन ऊर्जा संयंत्र अक्सर गंभीर रूप से लुप्तप्राय पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के पर्यावास को खंडित कर देते हैं।
    • नियामक दुविधा: नियामकों को “नेट जीरो” कार्बन लक्ष्यों को पूरा करने और एक प्रमुख प्रजाति के विलुप्त होने को रोकने के बीच चुनाव करना पड़ता है, जो दर्शाता है कि ‘हरित’ ऊर्जा परियोजनाएँ हमेशा पारिस्थितिकी रूप से तटस्थ नहीं होती हैं।
  • क्षतिपूर्ति’ संबंधी भ्रांति और आँकड़ों की कमी: औद्योगिक विस्तार को उचित ठहराने के लिए कानूनी व्यवस्था अक्सर त्रुटिपूर्ण पारिस्थितिक तर्क पर निर्भर करती है।
    • एकल कृषि बनाम जैव विविधता: क्षतिपूर्ति वनीकरण के तहत, कानून अक्सर प्राचीन, जैव विविधता से भरपूर जंगलों के ‘प्रतिस्थापन’ के रूप में एकल कृषि के अंतर्गत वृक्षारोपण को स्वीकार करता है।
      • हालाँकि, एक नया वृक्षारोपण 100 वर्ष पुराने पारिस्थितिकी तंत्र के जटिल पोषक तत्त्व चक्रण और कार्बन पृथक्करण की नकल नहीं कर सकता है।
    • निगरानी की कमी: वायु, जल और वन आवरण पर वास्तविक समय, पारदर्शी डेटा की महत्त्वपूर्ण कमी है।
      • उच्च-विश्वसनीयता वाले आधारभूत डेटा के बिना, न्यायपालिका के लिए वैज्ञानिक सटीकता के साथ उल्लंघनकर्ताओं को जवाबदेह ठहराना लगभग असंभव है।
        • उदाहरण: वर्ष 2024 की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार, 62% डेटा कम लागत वाले सेंसर (LCS) और शहरी-केंद्रित भारांक पर निर्भर करता है, जिसमें न्यायिक साक्ष्य के लिए आवश्यक ‘नियामक स्तर’ की सटीकता का अभाव है।
      • इस वैज्ञानिक अभाव के कारण विशिष्ट उल्लंघनकर्ताओं और स्वास्थ्य प्रभावों के बीच एक अनन्य संबंध स्थापित करना असंभव हो जाता है, जिससे प्रभावी रूप से प्रदूषकों को ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ से सुरक्षा मिलती है।

वैश्विक स्तर पर की गई पहल

  • वित्तीय संरचना (ट्रिलियन-डॉलर का परिवर्तन): COP 29 (बाकू) और COP 30 (बेलेम, 2025) के बाद, दुनिया ने जलवायु कार्रवाई के वित्तपोषण के तरीके में आमूलचूल परिवर्तन किया है, और ‘स्वैच्छिक सहायता’ से हटकर ‘प्रणालीगत निवेश’ की ओर अग्रसर हुई है।
    • बाकू से बेलेम रोडमैप (1.3 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य): इस पहल का उद्देश्य वर्ष 2035 तक जलवायु वित्तपोषण को प्रति वर्ष कम-से-कम 1.3 ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ाना है।
      • यह विकासशील देशों को ऊर्जा परिवर्तन का प्रबंधन करने और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन विकसित करने में मदद करने के लिए पिछले 100 बिलियन डॉलर के लक्ष्य से आगे बढ़ता है।
    • नया सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य (NCQG): COP29 में, 1.3 ट्रिलियन डॉलर के बड़े लक्ष्य को गति देने के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण के आधार के रूप में वर्ष 2035 तक प्रति वर्ष 300 बिलियन डॉलर का एक नया आधारभूत लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
    • उष्णकटिबंधीय वन संरक्षण सुविधा (TFFF): COP30 में ब्राजील द्वारा शुरू किया गया, यह 125 बिलियन डॉलर का कोष स्थायी वनों को एक वित्तीय परिसंपत्ति के रूप में मानता है।
      • यह उष्णकटिबंधीय देशों (पर्यवेक्षक के रूप में भारत सहित) को वन आवरण बनाए रखने के लिए भुगतान करता है, जिसमें यह अनिवार्य है कि 20% धनराशि सीधे स्वदेशी लोगों और स्थानीय समुदायों (IPLCs) को दी जाए।
  • जैव विविधता और समुद्री शासन: विश्व वर्तमान में कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा (GBF) के “कार्यान्वयन चरण” में है।
    • 30×30 अधिदेश: विश्व के विभिन्न देश 2030 तक 30% भूमि और महासागरों की रक्षा के लिए अपने घरेलू कानूनों को संरेखित कर रहे हैं। भारत ने वर्ष 2025 के अंत में अपनी अद्यतन राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP) प्रस्तुत की, जिसमें पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन के लिए 23 वैश्विक लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है।
    • उच्च सागर’ (हाई सी) संधि का लागू होना: 17 जनवरी, 2026 को यह ऐतिहासिक संधि कानूनी रूप से बाध्यकारी हो गई। यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र (‘उच्च सागर’) में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (MPA) के निर्माण के लिए पहला ढाँचा प्रदान करती है, जो पृथ्वी की सतह के लगभग आधे हिस्से को कवर करता है।
    • रामसर सम्मेलन (COP15): वर्ष 2025 के विक्टोरिया फॉल्स शिखर सम्मेलन में मीठे जल के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि आर्द्रभूमि शहरी बाढ़ सुरक्षा के लिए आवश्यक “प्राकृतिक बुनियादी ढाँचा” हैं।
  • वैश्विक प्लास्टिक संधि (INC-5.3): यह सबसे महत्त्वाकाँक्षी पर्यावरणीय वार्ताओं में से एक है (फरवरी 2026)।
    • जीवनचक्र विनियमन: पूर्ववर्ती स्वैच्छिक प्रयासों के विपरीत, इस संधि का उद्देश्य कानूनी रूप से बाध्यकारी होना है, जो कच्चे माल के निष्कर्षण से लेकर ‘जीवन-समाप्ति’ प्रबंधन तक प्लास्टिक के संपूर्ण जीवनचक्र को कवर करती है।
    • वर्ष 2026 में गतिरोध का अंत: फरवरी 2026 की शुरुआत में राजदूत जूलियो कोरडानो (चिली) के अध्यक्ष चुने जाने के साथ, समिति एक मसौदा दस्तावेज’ (Chair’s Text) तैयार करने की दिशा में प्रयासरत है, जो वैश्विक स्तर पर विशिष्ट हानिकारक रासायनिक योजकों और एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगाता है।
  • पारदर्शिता और बाजार-आधारित नियम: नए मानकों के चलते कंपनियों को अपने वित्तीय मामलों की तरह ही प्रकृति पर पड़ने वाले प्रभाव (नेचर फुटप्रिंट) के बारे में भी उतनी ही पारदर्शिता प्रदर्शित करनी पड़ रही है।
    • प्रकृति संबंधी वित्तीय खुलासे पर कार्य बल (TNFD): वर्ष 2026 तक, कई वैश्विक कंपनियों ने प्रकृति से संबंधित अपनी निर्भरताओं और जोखिमों की रिपोर्टिंग शुरू कर दी है।
      • इससे जैव विविधता पर पड़ने वाला प्रभाव कॉरपोरेट ऑडिटिंग का एक मानक हिस्सा बन गया है, जिससे विज्ञान-आधारित डेटा की आवश्यकता के द्वारा ग्रीनवॉशिंग’ को रोका जा सकता है।
    • संयुक्त राष्ट्र वैश्विक कार्बन बाजार (अनुच्छेद-6): COP29 में अंतिम रूप दिए गए तकनीकी नियमों ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रबंधित कार्बन व्यापार प्रणाली की शुरुआत की है।
      • यह कार्बन क्रेडिट के उच्च-स्तरीय व्यापार की अनुमति देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि विभिन्न देशों द्वारा उत्सर्जन कटौती की ‘दोहरी गणना’ न हो।
    • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और सतत् विकास लक्ष्य (SDG): विश्व 2030 के सतत् विकास लक्ष्यों (SDG), विशेष रूप से लक्ष्य 13 (जलवायु कार्रवाई) और 15 (स्थल पर जीवन) को गति देते हुए सफलता के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को एक फ्रेमवर्क के रूप में उपयोग करना जारी रखता है।

आगे की राह 

  • न्यायिक एवं संरचनात्मक समर्थन: विधिक ढाँचे को ‘प्रक्रिया-आधारित’ निगरानी से आगे बढ़कर ‘परिणाम-आधारित’ निगरानी की ओर संक्रमण करना। 
    • ग्रीन बेंच का पुनरुद्धार: भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक स्थायी और नियमित रूप से कार्यरत ग्रीन बेंच की स्थापना की तत्काल आवश्यकता है। 
      • इससे जटिल पर्यावरणीय मामलों का निपटारा सामान्य दीवानी या आपराधिक मामलों की तुलना में कम प्राथमिकता दिए बिना, विशेषीकृत न्यायविदों द्वारा किया जा सकेगा।
    • संस्थागत स्वायत्तता: स्वतंत्र पारिस्थितिकी विशेषज्ञों के एक स्वतंत्र पैनल को शामिल कर प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और स्वीकृति समितियों को ‘नौकरशाही अवरोधों’ से सुरक्षित करना।
    • परिदृश्यों की पारिस्थितिकी परिभाषा: ‘वन’ या ‘पहाड़ी’ की कानूनी परिभाषाओं को मनमाने मानकों (जैसे 100 मीटर ऊँचाई सीमा) से हटाकर वैज्ञानिक मापदंडों पर आधारित किया जाना चाहिए।
      • परिभाषाओं में जल विज्ञान, जैव विविधता मूल्य तथा भूजल पुनर्भरण क्षमता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
    • वहन क्षमता की ओर संक्रमण: परियोजना स्वीकृतियों को व्यक्तिगत प्रभाव आकलन से हटाकर क्षेत्रीय वहन क्षमता-आधारित मूल्यांकन की ओर स्थानांतरित करना, विशेष रूप से हिमालय और पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में।
    • संवैधानिक प्रधानता: परियोजना स्वीकृतियों को संविधान के अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद-48A (राज्य का कर्तव्य) के अनुरूप बनाकर पर्यावरणीय कानून के शासन को सुदृढ़ करना।
      • इसमें ‘पूर्वव्यापी’ स्वीकृतियों को असंवैधानिक घोषित करना शामिल है ताकि किसी परियोजना को केवल इसलिए मंजूरी न मिल जाए क्योंकि वह पहले ही बन चुकी है।
      • पर्यावरण कानून का शासन: पूर्व मंजूरी को संवैधानिक शर्त के रूप में प्राथमिकता देना। ‘पूर्वव्यापी’ स्वीकृतियाँ केवल आवश्यक सार्वजनिक उपयोगिताओं तक ही सीमित होनी चाहिए, औद्योगिक विस्तार के लिए नहीं।
  • डिजिटल एवं AI-संवर्द्धित प्रवर्तन: मैनुअल और आवधिक निरीक्षणों का युग अब सतत्, स्वचालित निगरानी द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है।
    • पर्यावरणीय ‘डिजिटल ट्विन्स’: वर्ष 2026 तक डिजिटल ट्विन्स (अर्थात् पारिस्थितिकी तंत्रों की वास्तविक-समय आभासी प्रतिकृतियों) का उपयोग योजनाकारों को किसी बाँध या राजमार्ग के प्रभाव का आकलन से पहले करने में सक्षम बनाता है।
      • इससे विनियमन की प्रकृति प्रतिक्रियात्मक से निवारक की ओर स्थानांतरित हो जाती है।
    • स्वचालित निगरानी: औद्योगिक अपशिष्टों और अवैध खनन की निगरानी हेतु इंटरनेट ऑफ थिंग्स सेंसरों तथा उपग्रह-आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग।
      • स्वचालित चेतावनी प्रणालियाँ अब तत्काल कानूनी नोटिस जारी कर सकती हैं, जिससे ‘ग्रीनवॉशिंग’ या डेटा में बदलाव करना काफी सीमा तक कठिन हो जाता है।
      • डिजिटल शासन: GIS और उपग्रह-आधारित निगरानी का उपयोग करते हुए वास्तविक-समय अनुपालन डैशबोर्ड को एकीकृत करना, ताकि भूमि-उपयोग परिवर्तनों का एक पारदर्शी सार्वजनिक अभिलेख तैयार किया जा सके।
    • एकीकृत डेटा संरचना: ‘खंडित’ शासन व्यवस्था से आगे बढ़ना।
      • सफल मॉडल अब जल, ऊर्जा और अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित डेटा को एकीकृत ढाँचे के अंतर्गत सम्मिलित करते हैं, ताकि किसी एक क्षेत्र (जैसे- सौर ऊर्जा) की समस्या का समाधान करते समय अनजाने में किसी अन्य क्षेत्र (जैसे- आवास विखंडन) को क्षति न पहुँचे।
  • पर्यावरणीय वित्त का मुख्यधारा में समावेशन: संरक्षण अब केवल ‘अनुपालन लागत’ नहीं रहा; बल्कि यह एक महत्त्वपूर्ण वित्तीय जोखिम बन चुका है।
    • अनिवार्य प्रकटीकरण (TNFD एवं ISSB): वर्ष 2026 तक भारत प्रकृति-संबंधी वित्तीय प्रकटीकरण कार्यबल (TNFD) के अंतर्गत अनिवार्य रिपोर्टिंग की ओर अग्रसर है।
      • इससे कंपनियों को प्राकृतिक क्षति को वित्तीय ऋण के समान कानूनी और राजकोषीय महत्त्व के साथ देखने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
    • कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM): यूरोपीय संघ का CBAM अब लागू हो जाने के कारण, इस्पात और सीमेंट के भारतीय निर्यातकों को आधुनिकीकरण न करने की स्थिति में ‘कार्बन कर’ का सामना करना पड़ रहा है।
      • इससे वैश्विक स्तर पर समान प्रतिस्पर्द्धी वातावरण बनता है, जो घरेलू भारी उद्योगों को हरित प्रौद्योगिकी अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
    • ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम (GCP): भारत की बाजार-आधारित व्यवस्था ‘पेड़ों की गिनती’ करने के बजाय पर्यावरण पुनर्स्थापन (झाड़ियाँ, घास और मृदा का स्वास्थ्य) को पुरस्कृत करने के लिए विकसित हो रही है।
      • ये क्रेडिट्स अब व्यापार योग्य वस्तुओं के रूप में विकसित हो रहे हैं, जिससे कंपनियाँ उच्च-विश्वसनीयता वाले पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन में निवेश कर अपने पर्यावरणीय पदचिह्न की भरपाई कर सकती हैं।
      • पुनर्स्थापन-आधारित दंड: पर्यावरणीय मुआवजे को मनमाने एकमुश्त जुर्मानों के बजाय वास्तविक पुनर्स्थापन परिणामों (जैव विविधता सूचकांकों द्वारा मापे गए) से जोड़ना।
  • न्यायसंगत संक्रमण मॉडल: पर्यावरणीय क्षरण से आर्थिक विकास को अलग करने के लिए नीति आयोग (2026) द्वारा उल्लिखित चार-स्तंभ रणनीति की आवश्यकता है:
    • विद्युतीकरण: औद्योगिक और परिवहन क्षेत्रों में ऊर्जा उपयोग को तीव्र गति से विद्युत आधारित बनाना।
    • ग्रिड का हरितीकरण: नवीकरणीय ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन की ओर संक्रमण को तेज करना।
    • दक्षता एवं चक्रीयता: नए संसाधन दोहन की आवश्यकता को कम करने हेतु सामग्रियों के जीवन-चक्र का अधिकतम उपयोग।
    • व्यवहारगत परिवर्तन (मिशन LiFE): संसाधनों की समग्र राष्ट्रीय माँग को घटाने के लिए व्यक्तियों को प्रो-प्लैनेट पीपल (P3) जीवनशैली अपनाने हेतु प्रेरित करना।

निष्कर्ष

वर्ष 2026 में भारत की पर्यावरणीय यात्रा ‘आर्थिक सुविधा’ से आगे बढ़कर पारिस्थितिकी संवैधानिकता की ओर परिवर्तन की माँग करती है। AI-आधारित निगरानी और प्रकृति-आधारित वित्त को एकीकृत करके राज्य विकास को पर्यावरणीय क्षरण से अलग कर सकता है, ताकि विकासात्मक प्रगति कभी भी नागरिकों की अंतर-पीढ़ीगत समानता से समझौता न करे।

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