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Feb 13 2026

भारत के नए खगोलीय दूरबीन

केंद्रीय बजट 2026 ने लद्दाख में दो नए दूरबीनों (टेलिस्कोप) और एक मौजूदा सुविधा के उन्नयन को स्वीकृति दी है, जिससे भारत की प्रेक्षणीय खगोल विज्ञान क्षमता में वृद्धि होगी।

प्रस्तावित परियोजनाओं के प्रमुख बिंदु

नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप (NLST)

  • NLST एक 2-मीटर के अपर्चर युक्त सौर वेधशाला है, जिसे लद्दाख के पैंगोंग-त्सो के पास मेराक क्षेत्र में स्थापित किया जाएगा।
  • यह विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम की दृश्य और निकट-अवरक्त तरंगदैर्ध्य के रूप  में कार्य करेगा।
  • उद्देश्य: दृश्य और निकट-अवरक्त तरंगदैर्ध्य में सौर गतिशीलता, चुंबकत्व और अंतरिक्ष-मौसम प्रक्रियाओं का अध्ययन करना।

नेशनल लार्ज ऑप्टिकल–नियर इन्फ्रारेड टेलिस्कोप (NLOT)

  • NLOT एक 13.7-मीटर अपर्चर युक्त खंडित-दर्पण (सेगमेंटेड मिरर) टेलिस्कोप है, जिसे लद्दाख के हानले में बनाया जाएगा।
  • संचालन में आने के बाद, यह विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम की ऑप्टिकल–इन्फ्रारेड तरंगदैर्ध्य में कार्य करने वाले विश्व के सबसे बड़े दूरबीनों में से एक होगा।
  • यह ऑप्टिकल और निकट-अवरक्त बैंड का उपयोग करके तारकीय विकास, आकाशगंगाओं और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के अध्ययन हेतु गहन अंतरिक्ष अवलोकन को सक्षम बनाएगा।
  • निर्माण और संचालन के बाद, NLST भारत की तीसरी भू-आधारित सौर वेधशाला के रूप में कार्य करेगा।
    • वर्तमान में, कोडाइकनाल सोलर ऑब्जर्वेटरी (तमिलनाडु, स्थापित वर्ष 1899) और उदयपुर सोलर ऑब्जर्वेटरी (राजस्थान, स्थापित वर्ष 1975) कार्यरत हैं।

हिमालयन चंद्र टेलिस्कोप (HCT) का उन्नयन

  • भारतीय खगोलीय वेधशाला, हानले में स्थित मौजूदा टेलिस्कोप को इमेजिंग संवेदनशीलता और डेटा गुणवत्ता बढ़ाने के लिए उन्नत किया जाएगा।
  • रणनीतिक स्थान: हानले डार्क स्काई रिजर्व
    • हानले भारत का एकमात्र डार्क स्काई रिजर्व है, जहाँ न्यूनतम प्रकाश प्रदूषण और उच्च-तुंगता की वायुमंडलीय स्पष्टता उपलब्ध है, जिससे यह सटीक खगोल विज्ञान के लिए आदर्श बनता है।

वेधशालाओं का महत्त्व

  • सौर और अंतरिक्ष अनुसंधान में प्रगति: NLST, इसरो के आदित्य-L1 मिशन के साथ मिलकर, हेलियोफिजिक्स और अंतरिक्ष-मौसम पूर्वानुमान में भारत की क्षमताओं को मजबूत करेगा।
  • गहन अंतरिक्ष अन्वेषण को बढ़ावा: ऑप्टिकल–इन्फ्रारेड टेलिस्कोप ब्रह्मांडीय उत्पत्ति और एक्सोप्लैनेट्स पर अग्रणी अनुसंधान करने की भारत की क्षमता को बढ़ाएगा।
  • वैश्विक वैज्ञानिक नेतृत्व: ये परियोजनाएँ भारत को ‘ग्लोबल साउथ’ में एक प्रमुख खगोल विज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करती हैं और खगोल भौतिकी में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करती हैं।

विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम के बारे में

  • विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम, विद्युतचुंबकीय विकिरण की पूर्ण श्रेणी है, जिसे तरंगदैर्घ्य या आवृत्ति के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है, जिसमें दीर्घ तरंगदैर्घ्य वाली रेडियो तरंगों से लेकर लघु तरंगदैर्घ्य वाली गामा किरणें तक शामिल हैं।
  • विभिन्न श्रेणियाँ: इसमें रेडियो तरंगें, माइक्रोवेव, अवरक्त, दृश्य प्रकाश, पराबैंगनी, एक्स-रे और गामा किरणें शामिल हैं।
  • दृश्य प्रकाश केवल एक छोटा भाग है, जिसे मानव आँख पहचान सकती है; अवरक्त ऊष्मा का पता लगाता है, जबकि पराबैंगनी और एक्स-रे उच्च-ऊर्जा प्रक्रियाओं को प्रकट करते हैं।
  • दूरबीनों में भूमिका: दूरबीनें स्पेक्ट्रम के विभिन्न बैंड का अवलोकन करके तारों, आकाशगंगाओं, एक्सोप्लैनेट्स और ब्रह्मांडीय विकिरण का अध्ययन करती हैं, जिससे बहु-तरंगदैर्ध्य खगोल विज्ञान और ब्रह्मांड की गहरी समझ संभव होती है।

भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) 2025

भारत ने वैश्विक भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) 2025 में अपनी स्थिति में सुधार किया है और पिछले वर्ष की 96वीं रैंक से बढ़कर 91वीं रैंक प्राप्त की है।

भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) 2025 के बारे में

  • सीपीआई 182 देशों/क्षेत्रों को सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के अनुमानित स्तर के आधार पर रैंक करता है।
  • जारीकर्ता: ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल।
  • पैमाना: 0 (अत्यधिक भ्रष्ट) से 100 (अत्यंत स्वच्छ) तक मापन।
  • कार्य प्रणाली: CPI विशेषज्ञ आकलन और व्यावसायिक सर्वेक्षणों पर आधारित है; यह वास्तविक भ्रष्टाचार घटनाओं के स्थान पर सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की धारणा को मापता है।
  • शीर्ष प्रदर्शनकर्ता (स्कोर)
    1. डेनमार्क (89),
    2. फिनलैंड (88), और
    3. सिंगापुर (84), अब केवल 5 देश ही 80 से अधिक स्कोर प्राप्त कर पाए हैं (एक दशक पहले यह संख्या 12 थी)।
  • निम्न प्रदर्शनकर्ता (सबसे अधिक भ्रष्ट): निचले पायदान पर दक्षिण सूडान और सोमालिया रहे, दोनों को 9 स्कोर प्राप्त हुआ। इनके बाद वेनेजुएला (10 स्कोर) रहा।
  • वैश्विक औसत: वैश्विक औसत गिरकर 42 के नए निम्न स्तर पर पहुँच गया है (एक दशक में पहली बार गिरावट)। दो-तिहाई से अधिक देश (122 देश) ने 50 से कम स्कोर किया।
    • केवल पाँच देशों ने 80 से अधिक अंक प्राप्त किए, जिससे स्पष्ट होता है कि बहुत कम सार्वजनिक क्षेत्रों को अत्यधिक स्वच्छ माना जाता है।
    • कुछ देशों में प्रगति हुई है (31 देशों ने समय के साथ उल्लेखनीय सुधार किया है), लेकिन अधिकांश देशों में ठहराव या गिरावट देखी गई है।
  • केवल पाँच देशों ने 80 से अधिक अंक प्राप्त किए, जिससे स्पष्ट होता है कि बहुत कम सार्वजनिक क्षेत्रों को अत्यधिक स्वच्छ माना जाता है।
  • कुछ देशों में प्रगति हुई है (31 देशों ने समय के साथ उल्लेखनीय सुधार किया है), लेकिन अधिकांश देशों में स्थायित्व या गिरावट देखी गई है।

CPI 2025 में भारत की स्थिति

  • रैंक: 91वीं (वर्ष 2024 में 96वीं से 5 स्थान की वृद्धि)।
  • स्कोर: 39 (पिछले वर्ष की तुलना में 1 अंक की वृद्धि)।
  • रिपोर्ट में भारत को उन देशों में भी शामिल किया गया है, जहाँ भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए खतरा अधिक है और कम अंक प्राप्त करने वाले देशों में पत्रकारों की हत्याओं का अनुपात अधिक पाया गया है।

अभ्यास ‘वायुशक्ति-26’

भारतीय वायुसेना 27 फरवरी, 2026 को पोखरण में अभ्यास ‘वायुशक्ति-26’ का आयोजन करेगी, जिसमें एक सिमुलेटेड युद्धकालीन परिदृश्य में पूर्ण-स्पेक्ट्रम युद्ध क्षमता का प्रदर्शन किया जाएगा।

अभ्यास ‘वायुशक्ति-26’ के बारे में

  • अभ्यास वायुशक्ति भारतीय वायुसेना (IAF) का एक प्रमुख वायु युद्ध अभ्यास है, जो यथार्थवादी युद्धक्षेत्र वातावरण में इसकी आक्रामक, रक्षात्मक और मल्टी-डोमेन परिचालन क्षमताओं का प्रदर्शन करता है।
  • पुनरावृत्ति: इसकी शुरुआत वर्ष 1954 में हुई थी और यह प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार आयोजित होने वाला त्रिवार्षिक अभ्यास है, हालाँकि बीच में कुछ अंतराल भी रहे हैं।
    • पिछला संस्करण अभ्यास वायुशक्ति-24 था, जो फरवरी 2024 में आयोजित हुआ था।
  • वायुशक्ति-26 का आयोजन स्थल: पोखरण ‘एयर-टू-ग्राउंड’ रेंज, जैसलमेर जिला, राजस्थान, भारत की पश्चिमी सीमा के निकट।
  • प्रतिभागी: पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी वायु कमानों से 100 से अधिक विमान भाग लेंगे, जिनमें राफेल, SU-30 MKI, तेजस, मिराज-2000, मिग-29, जैगुआर, हॉक, C-130J, C-17, अपाचे, चिनूक, ALH, LCH और RPA शामिल हैं।
    • आकाश, स्पाइडर, SRLM और काउंटर-यूएएस जैसी उन्नत प्रणालियाँ भी तैनात की जाएँगी।
  • फोकस क्षेत्र: यह अभ्यास एकीकृत वायु कमान एवं नियंत्रण प्रणाली (IACCS) के माध्यम से वास्तविक समय की निगरानी के साथ युद्धकालीन परिस्थितियों का अनुकरण करेगा।
    • यह वायु क्षेत्र प्रभुत्व, सटीक हमले, लूटिंग म्यूनिशन, ड्रोन युद्ध और नेटवर्क-केंद्रित अभियानों को उजागर करेगा।
    • मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) क्षमताओं का भी प्रदर्शन किया जाएगा।

महत्त्व

वायुशक्ति-26 भारत के प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता के रूप में IAF की भूमिका की पुष्टि करता है, पश्चिमी सीमा के निकट प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है और ऑपरेशन सिंदूर से प्राप्त सीखों को दर्शाते हुए आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी रक्षा क्षमताओं का प्रदर्शन करता है।

संदर्भ

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट ‘मॉन्स माउटन’ क्षेत्र में स्थित MM-4 को चंद्रयान-4 के लिए लैंडिंग स्थल के रूप में चुना है।

चयनित लैंडिंग स्थल: मॉन्स माउटन (MM-4) के बारे में

  • मॉन्स माउटन (MM) चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में स्थित है, जो संभावित जल-बर्फ और प्राचीन भू-वैज्ञानिक अभिलेखों के कारण उच्च वैज्ञानिक महत्त्व का क्षेत्र माना जाता है।
  • वैज्ञानिक मूल्यांकन: चार संभावित स्थलों MM-1, MM-3, MM-4 और MM-5 का ऑर्बिटर हाई रेजॉल्यूशन कैमरा (OHRC) के ‘मल्टी-व्यू डेटा सेट’ का उपयोग करके भू-भाग की सुरक्षा और व्यवहार्यता के लिए विश्लेषण किया गया।
  • सुरक्षा मानक: जोखिम मूल्यांकन के आधार पर MM-4 को चयनित किया गया, क्योंकि 1 किमी. × 1 किमी. क्षेत्र में जोखिम न्यूनतम है, औसत ढलान लगभग 5 डिग्री, औसत ऊँचाई 5,334 मीटर है तथा यहाँ सुरक्षित लैंडिंग ग्रिडों की उपलब्धता सबसे अधिक है।

चंद्रयान-4 मिशन के बारे में

  • चंद्रयान-4 भारत का पहला चंद्र नमूना-वापसी मिशन है, जिसका उद्देश्य सॉफ्ट लैंडिंग करना, चंद्र नमूने एकत्र करना और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है।
  • अपेक्षित प्रक्षेपण: यह मिशन अंतिम तैयारी और स्वीकृतियों के अधीन लगभग वर्ष 2028 में प्रक्षेपित किए जाने का लक्ष्य रखता है।
  • मुख्य घटक: यह मिशन पाँच मॉड्यूलों से मिलकर बना है—
    • प्रोपल्शन मॉड्यूल (PM)
    • डिसेंडर मॉड्यूल (DM)
    • असेंडर मॉड्यूल (AM)
    • ट्रांसफर मॉड्यूल (TM) और
    • री-एंट्री मॉड्यूल (RM)।
  • मिशन का मुख्य उद्देश्य: यह मिशन चंद्र सतह पर सुरक्षित सॉफ्ट लैंडिंग और नमूना संग्रह प्राप्त करने का प्रयास करता है।
    • यह चंद्र लिफ्ट-ऑफ, कक्षीय डॉकिंग, नमूना हस्तांतरण और पृथ्वी पर सुरक्षित पुनः प्रवेश का प्रदर्शन करने का भी लक्ष्य रखता है।

चंद्रमा से सफल नमूना-वापसी मिशन

मिशन एजेंसी मुख्य विवरण
अपोलो 11–17 (1969–1972) नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA), अमेरिका मानवयुक्त चंद्र मिशन, जिसके अंतर्गत लगभग 382 किलोग्राम चंद्रमा पर उपस्थित चट्टानों और मृदा के नमूनों को सफलतापूर्वक पृथ्वी पर वापस लाया गया।
लूना 16, 20 और 24 (1970–1976) सोवियत अंतरिक्ष एजेंसी (USSR) पहला रोबोटिक चंद्र नमूना-वापसी मिशन; जिसने चंद्र की मिट्टी को सफलतापूर्वक एकत्र कर पृथ्वी पर लौटाया। लूना 24 अंतिम सोवियत चंद्र नमूना-वापसी मिशन था और इसने चंद्रमा से गहरे कोर नमूने प्राप्त किए।
चांग’ई-5 (2020) चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (CNSA), चीन रोबोटिक मिशन, जो ओशियानस प्रोसेलारम से लगभग 1,731 ग्राम चंद्रमा संबंधी सामग्री एकत्र कर पृथ्वी पर वापस लाई गई।
चांग’ई-6 (2024) चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (CNSA), चीन चंद्रमा के दूरस्थ भाग (फार साइड) से नमूने वापस लाने वाला पहला मिशन, जिसने चंद्र अन्वेषण में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की।

निष्कर्ष 

चंद्रयान-4 की सफलता भारत के लिए जटिल चंद्र नमूना-वापसी मिशनों के क्षेत्र में एक निर्णायक प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करेगी, जिससे उसकी अंतरिक्ष क्षमताएँ सुदृढ़ होंगी और दक्षिणी ध्रुव जैसे कम अन्वेषित क्षेत्रों से नए नमूनों के माध्यम से चंद्र अन्वेषण को बढ़ावा मिलेगा।

संदर्भ

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की स्वीकृति के बाद ‘क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज’ (KFD) के विरुद्ध एक उन्नत स्वदेशी वैक्सीन के चरण-I (Phase I) के नैदानिक परीक्षण प्रारंभ किए हैं।

‘क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज’ (KFD) वैक्सीन के बारे में

  • यह वैक्सीन ICMR–राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (ICMR–NIV) द्वारा इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड (IIL) के सहयोग से विकसित की जा रही है। यह एक पूर्णतः स्वदेशी, दो-खुराक वाली, एडजुवेंटयुक्त निष्क्रिय वैक्सीन है, जिसे 28 दिनों के अंतराल पर दिया जाता है।
  • नैदानिक प्रगति: पशुओं पर चुनौती संबंधी परीक्षण और विषाक्तता अध्ययन पूर्ण हो चुके हैं। गुड लैबोरेटरी प्रैक्टिस (GLP) ग्रेड सामग्री का उत्पादन किया जा चुका है, और CDSCO की स्वीकृति के बाद चरण-I परीक्षण प्रारंभ हो गए हैं।
    • चरण-I नैदानिक परीक्षणों में सामान्यतः दर्जनों प्रतिभागियों को शामिल किया जाता है। इस चरण में वैक्सीन की खुराक का स्तर और उसकी सुरक्षा की जाँच की जाती है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्त्व: यह वैक्सीन पश्चिमी घाट के राज्यों में “वन हेल्थ” दृष्टिकोण के अंतर्गत ‘टिक’ जनित जूनोटिक रोगों के विरुद्ध तैयारी को सुदृढ़ बनाती है।

क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD) के बारे में

  • क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD) एक टिक-जनित विषाणुजनित रक्तस्रावी बुखार है, जो क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज वायरस (KFDV) के कारण होता है। इसकी पहली पहचान वर्ष 1956 में कर्नाटक में हुई थी।
  • स्थानिक क्षेत्र: यह रोग पश्चिमी घाट क्षेत्र में स्थानिक है, विशेष रूप से कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, गोवा और महाराष्ट्र में, और यह वन-आश्रित समुदायों को प्रभावित करता है।

  • संक्रमण: KFD मुख्य रूप से संक्रमित ‘वन टिक’ के काटने से फैलता है, विशेष रूप से हीमाफाइसैलिस स्पिनिजेरा (Haemaphysalis spinigera) प्रजाति के माध्यम से।
    • यह संक्रमित जानवरों, विशेषकर बीमार या मृत बंदरों के संपर्क से भी फैल सकता है।
  • लक्षण और उपचार: यह तेज बुखार, गंभीर मांसपेशीय दर्द, रक्तस्राव संबंधी लक्षण और निम्न रक्तचाप संबंधी समस्या उत्पन्न कर सकता है।
    • इसका कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार नहीं है; उपचार सहायक प्रकृति का होता है, और राज्य सरकारें निःशुल्क चिकित्सा सुविधा प्रदान करती हैं।
  • रोकथाम उपाय: रोकथाम के उपायों में टीकाकरण, DEPA तेल जैसे ‘टिक’ रोधी पदार्थों का उपयोग, वन कर्मियों के लिए सुरक्षात्मक उपकरण तथा बंदरों की मृत्यु की निगरानी शामिल है।

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के बारे में

  • CDSCO, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत भारत की राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण (NRA) है, जो औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत एक वैधानिक निकाय के रूप में कार्य करता है।
  • कार्य
    • भारत में नई दवाओं, वैक्सीनों और नैदानिक परीक्षणों को स्वीकृति प्रदान करना।
    • दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के मानक, गुणवत्ता और सुरक्षा का विनियमन करना।
    • औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के प्रवर्तन के लिए राज्य औषधि नियंत्रण प्राधिकरणों के साथ समन्वय करना।

संदर्भ

मिस्र की ‘वैली ऑफ द किंग्स’ में स्थित शवाधान स्थलों के भीतर लगभग 30 तमिल ब्राह्मी, प्राकृत और संस्कृत शिलालेखों की पहचान की गई है।

खोज के बारे में

  • स्थान: ये शिलालेख मिस्र के नील घाटी क्षेत्र में स्थित थीबन नेक्रोपोलिस के छह शवाधान स्थलों में पाए गए।
  • मुख्य खोज: शोधकर्ताओं ने शवाधान स्थल परिसरों के भीतर लगभग 30 नए प्रलेखित शिलालेखों की पहचान की है।

  • लिपि और भाषा: ये शिलालेख तमिल ब्राह्मी के साथ-साथ प्राकृत और संस्कृत में लिखे गए हैं, जो भारतीय आगंतुकों की विविध उपस्थिति को दर्शाते हैं।
  • कालक्रम: इन शिलालेखों को प्रथम से तृतीय शताब्दी ईसवी के बीच का माना गया है, जो भारत–रोमन समुद्री व्यापार के चरम काल से संबंधित है।
  • शिलालेखों की प्रकृति
    • अधिकांश शिलालेख व्यक्तिगत नामों और लघु ‘ग्रैफिटी’ द्वारा निर्मित हैं, जो शवाधान स्थलों की दीवारों, गलियारों और प्रवेश द्वारों पर उत्खनित हुए हैं।
    • भारतीय आगंतुकों ने स्मारक चिह्न के रूप में शवाधान स्थलों के भीतर नाम लिखने की यूनानी परंपरा का पालन किया।

तमिल-ब्राह्मी लिपि के बारे में:

  • तमिल ब्राह्मी, ब्राह्मी लिपि का एक प्रारंभिक रूपांतर है, जिसका उपयोग प्राचीन तमिल लिखने के लिए किया जाता था।

  • यह लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसवी तक प्रचलन में थी।
  • प्रारंभिक स्थल: मंगुलम (तमिलनाडु)।
  • अन्य प्रमुख स्थल: पुगालूर, जाम्बई, कोडुमनाल और अरिकामेडु।

  • पहचाने गए नाम
    • सिकै कोऱ्ट्टन: सिकै कोऱ्ट्टन नाम पाँच शवाधान स्थलों में आठ बार दोहराया गया है, जो एक प्रमुख तमिल उपस्थिति का संकेत देता है।
      • ‘सिकै’ शब्द संस्कृत के ‘शिखा’ शब्द से जुड़ा है, जिसका अर्थ चोटी या मुकुट होता है।
      • ‘कोऱ्ट्टन’ शब्द तमिल ‘कोऱ्ट्टम’ (विजय या वध) से व्युत्पन्न है और देवी कोऱ्ट्टवई से संबंधित है।
      • ‘कोऱ्ट्टन’ नाम वर्ष 1995 में बेरेनाइक (लाल सागर का बंदरगाह नगर) में मिले एक मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर पाए गए ‘कोऱ्ट्टपुमान’ में भी मिलता है।
      • यह संगम साहित्य में भी मिलता है, जिसमें ‘पुरानानूरु’ में चेर राजा पिट्टांगोऱ्ट्टन के संदर्भ शामिल हैं।
      • इसी प्रकार के प्रमाण पुगालूर, जो प्राचीन चेर राजधानी थी, के शिलालेखों में भी मिलते हैं, जिनकी तिथि दूसरी या तीसरी शताब्दी ईसवी मानी जाती है।
    • कोपान
      • एक अन्य शिलालेख में “कोपान आया और देखा” (Kopāṉ came and saw) वाक्य दर्ज है, जो आगंतुक-शैली की भित्ति-लेखन परंपरा को दर्शाता है।
      • कोपान नाम तमिलनाडु के अम्मनकोविलपट्टी के शिलालेखों में भी पाया गया है, जो निरंतरता को दर्शाता है।
  • अन्य तमिल नाम: चातन और किरन जैसे नाम भी प्रलेखित किए गए हैं।

संगम काल के प्रमुख तमिल बंदरगाह

  • मुजिरिस (मुचिरी)
  • कोरकई
  • अरिकामेडु
  • कावेरीपट्टिनम (पुहार)

लाल सागर के तट पर स्थित मिस्र के महत्त्वपूर्ण बंदरगाह

  • बेरेनाइक
  • मायोस होर्मोस

  • व्यापार और गतिशीलता के संबंध
    • भारत–रोमन व्यापार नेटवर्क: ये शिलालेख लाल सागर और नील मार्गों के माध्यम से प्राचीन तमिलगम और रोमन साम्राज्य के बीच समुद्री व्यापार के प्रमाण को मजबूत करते हैं।
    • व्यापारी गतिशीलता: आगंतुक संभवतः व्यापारी, नाविक या मध्यस्थ थे, जो स्थापित वाणिज्यिक मार्गों पर यात्रा करते थे।
    • संगम संबंध: संगम साहित्य और चेर शिलालेखों से मिलते-जुलते नाम साहित्यिक और पुरातात्त्विक संबंधों को सुदृढ़ करते हैं।
  • ऐतिहासिक महत्त्व
    • सांस्कृतिक संपर्क: ये खोजें व्यापार से आगे बढ़कर सभ्यताओं के बीच संपर्क को दर्शाती हैं, जिनमें तीर्थ-जैसी यात्राएँ और सांस्कृतिक जिज्ञासा भी शामिल है।
    • भौगोलिक विस्तार: शोध का ध्यान लाल सागर पर स्थित बंदरगाहों से बढ़कर नील घाटी तक विस्तृत है, जिससे भारतीय गतिशीलता की स्थानिक समझ व्यापक हुई है।
    • तमिल समुद्री विरासत: ये खोजें मालाबार और कोरोमंडल तटों से जुड़े प्राचीन तमिल व्यापारियों की वैश्विक पहुँच की पुष्टि करती हैं।
    • अभिलेखीय महत्त्व: ये शिलालेख प्राचीन काल में भारतीयों के ‘फिरौनकालीन’ शवाधान स्थलों में भौतिक उपस्थिति का दुर्लभ प्राथमिक प्रमाण प्रदान करते हैं।

‘वैली ऑफ द किंग्स’ के बारे में

  • अवस्थिति: ‘वैली ऑफ द किंग्स’ ऊपरी मिस्र में नील नदी के पश्चिम में (आधुनिक लक्सर के पास) स्थित एक लंबी और सँकरी घाटी है।

  • काल अवधि: यह 18वीं, 19वीं और 20वीं वंशों (1539–1075 ईसा पूर्व) के फिरऔनों का शवाधान स्थल रहा है।
  • यूनेस्को मान्यता: वर्ष 1979 में यूनेस्को ने इसे प्राचीन ‘थीब्स’ परिसर के अंतर्गत विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी।
  • शवाधान स्थल संबंधी स्थापत्य
    • शवाधान स्थल पर्वतीय चट्टानों को काटकर निर्मित किए गए थे और इनमें आमतौर पर ढलान युक्त गलियारे होते थे।
    • इन गलियारों में लुटेरों को भ्रमित और रोकने के लिए गहरे मोड़ बनाए जाते थे।
    • इस स्थापत्य में स्तंभयुक्त सभागार, वेस्टीब्यूल, भंडारण कक्ष और पत्थर के ताबूत वाला शवाधान कक्ष शामिल होता था।
  • प्रमुख शवाधान स्थल
    • राजाओं के अलावा, घाटी में रानियों, उच्च पदस्थ अधिकारियों और रामेसेस द्वितीय के कई पुत्रों के शवाधान स्थल भी हैं।
    • सबसे लंबा शवाधान स्थल (शवाधान स्थल संख्या 20) रानी हत्शेपसुत का है, जो लगभग 700 फीट तक चट्टान में विस्तृत है।
    • सबसे बड़ा और जटिल शवाधान स्थल (शवाधान स्थल संख्या 5) रामेसेस द्वितीय के अनेक पुत्रों के लिए निर्मित किए गए थे, जिसमें दो स्तरों पर दर्जनों कक्ष निर्मित हैं।

संदर्भ

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आधिकारिक कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और औपचारिक अवसरों पर भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन और वादन के लिए प्रोटोकॉल को मानकीकृत करने हेतु नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

संवैधानिक स्थिति

  • न तो राष्ट्रीय गीत और न ही राष्ट्रीय गान का संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख है।
  • इनकी स्थिति 24 जनवरी, 1950 को अपनाए गए संविधान सभा के प्रस्तावों से प्राप्त होती है।

मुख्य दिशा-निर्देश

  • वादन का क्रम: जब किसी कार्यक्रम में दोनों का वादन हो, तो वंदे मातरम् का वादन जन गण मन से पहले होगा।
  • अवधि: सरकार ने वंदे मातरम् के छह पदों वाले आधिकारिक संस्करण को निर्धारित किया है, जिसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड (190 सेकंड) है।
  • अनिवार्य खड़े होना: आधिकारिक परिवेश में जब भी राष्ट्रीय गीत गाया या बजाया जाए, उपस्थित सभी नागरिकों के लिए सावधान की मुद्रा में खड़ा होना आवश्यक है।
  • आधिकारिक वादन के अवसर
    • ध्वजारोहण समारोह।
    • राष्ट्रपति/राज्यपाल के आगमन/प्रस्थान के समय।
    • राष्ट्रपति/राज्यपाल के संबोधन से पहले/बाद।
    • राष्ट्रीय परेड, अलंकरण समारोह (जैसे- पद्म पुरस्कार)।
  • गायन संबंधी दिशा-निर्देश
    • सांस्कृतिक एवं सार्वजनिक कार्यक्रम: परेड समारोहों को छोड़कर, सांस्कृतिक या औपचारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय ध्वज फहराते समय आधिकारिक संस्करण के सामूहिक गायन को प्रोत्साहित किया गया है।
    • औपचारिक राजकीय समारोहों को छोड़कर, सार्वजनिक कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन पर तथा प्रस्थान से ठीक पहले राष्ट्रीय गीत सामूहिक रूप से गाया जाना चाहिए।
    • शैक्षणिक संस्थान
      • विद्यालयों को विद्यार्थियों में देशभक्ति की भावना विकसित करने हेतु दिन की शुरुआत वंदे मातरम् के सामूहिक गायन से करने की सलाह दी गई है।
      • शैक्षणिक संस्थानों को राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान को बढ़ावा देने और जागरूकता फैलाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
  • छूट एवं विशेष प्रावधान
    • सिनेमा हॉल: राष्ट्रीय गान के विपरीत, वंदे मातरम् को सिनेमाघरों में नहीं बजाया जाएगा।
    • डॉक्यूमेंट्री में उपयोग: यदि समाचार-रील या वृत्तचित्रों में इसका उपयोग किया जाता है, तो व्यवधान से बचने के लिए दर्शकों को खड़े होने की आवश्यकता नहीं होगी।

राष्ट्रीय गीत (वंदे मातरम्) के बारे में

  • लेखक: वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था, और यह मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
  • रचना: इसकी रचना 1870 के दशक में हुई थी और बाद में इसे उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में प्रकाशित किया गया।
  • स्वीकृति: संविधान सभा ने 24 जनवरी, 1950 को वंदे मातरम् को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।
  • भाषा: यह गीत मूल रूप से संस्कृत और बंगाली में लिखा गया था।
  • न्यायिक व्याख्या: एम. के. रमेश बनाम भारत संघ (2006) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि वंदे मातरम् का गायन कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है, बल्कि नैतिक रूप से वांछनीय है और यह स्पष्ट किया कि सच्ची देशभक्ति स्वैच्छिक सम्मान से आती है, न कि जबरन पालन से।

राष्ट्रीय गान (जन गण मन) के बारे में

  • लेखक: राष्ट्र गान जन गण मन रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखा गया था और इसे 24 जनवरी, 1950 को अपनाया गया।
  • इसे पहली बार 27 दिसंबर, 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था।
  • भाषा: यह गान अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ बंगाली में लिखा गया है।
  • अवधि: पूर्ण संस्करण की अवधि 52 सेकंड है, जबकि संक्षिप्त संस्करण लगभग 20 सेकंड का होता है।
  • कानूनी संरक्षण: राष्ट्रीय गान को ‘राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ के तहत संरक्षण प्राप्त है और इसका अपमान कानूनन दंडनीय है।
    • उल्लंघन पर तीन वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
  • न्यायिक व्याख्या: बिजोए इमैनुएल मामला (1986) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति सम्मानपूर्वक मौन में खड़ा रहता है, तो उसे राष्ट्रीय गान गाने के लिए बाध्य करना अनुच्छेद-19(1)(a) का उल्लंघन है।

संदर्भ

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में आयुष्मान सहकार योजना पर चर्चा की।

आयुष्मान सहकार योजना के बारे में

  • अवलोकन: यह योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के अनुरूप सहकारी-नेतृत्व वाली स्वास्थ्य अवसंरचना और सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई थी।
  • नोडल एजेंसी: सहकारिता मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC)।
  • प्रारंभ वर्ष: आयुष्मान सहकार योजना वर्ष 2020–21 में शुरू की गई।
  • आयुष्मान सहकार के उद्देश्य
    • सुलभ एवं समग्र स्वास्थ्य सेवा: सहकारी समितियों को अस्पताल, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाएँ स्थापित करने में सहायता।
    • आयुष का प्रोत्साहन: सहकारिताओं के माध्यम से आयुष-आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना।
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लक्ष्य: सहकारी स्वास्थ्य पहलों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के उद्देश्यों के अनुरूप बनाना।
    • डिजिटल स्वास्थ्य मिशन: सहकारिताओं को राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन के साथ एकीकृत करने में सक्षम बनाना।
    • समग्र स्वास्थ्य सेवाएँ: स्वास्थ्य सेवा वितरण, शिक्षा, बीमा तथा संबंधित गतिविधियों सहित सेवाओं को समर्थन।
  • योजना के अंतर्गत शामिल गतिविधियाँ
    • स्वास्थ्य अवसंरचना: अस्पतालों एवं चिकित्सा संस्थानों के सृजन, विस्तार, नवीनीकरण और आधुनिकीकरण हेतु सहायता प्रदान की जाती है।
    • चिकित्सा शिक्षा: नर्सिंग, डेंटल, फार्मेसी, पैरामेडिकल एवं आयुष कॉलेजों (यूजी और पीजी कार्यक्रमों सहित) को वित्तपोषण।
    • विशेषीकृत सेवाएँ: परियोजनाओं में ट्रॉमा सेंटर, मानसिक स्वास्थ्य इकाइयाँ, पैलिएटिव केयर, वृद्ध देखभाल एवं दिव्यांग स्वास्थ्य सेवाएँ शामिल हैं।
    • डिजिटल एवं मोबाइल स्वास्थ्य: टेलीमेडिसिन, मोबाइल क्लिनिक, डायग्नोस्टिक्स, प्रयोगशालाएँ तथा डिजिटल स्वास्थ्य ICT प्रणाली पात्र हैं।
  • वित्तीय सहायता की विशेषताएँ
    • प्रकार: NCDC परियोजना मूल्यांकन के आधार पर टर्म लोन एवं निवेश ऋण प्रदान करता है।
    • ऋण अवधि: पुनर्भुगतान अवधि अधिकतम 8 वर्ष तक, जिसमें मूलधन पर 1–2 वर्ष की छूट शामिल है।
    • ब्याज प्रोत्साहन: महिला-बहुल सहकारिताओं को समय पर भुगतान पर 1% ब्याज की छूट।
    • परियोजना लागत मानक: वित्तीय सहायता वास्तविक परियोजना आवश्यकताओं के आधार पर, बिना किसी निश्चित सीमा के।
  • पात्रता: राज्य या बहु-राज्य सहकारी अधिनियमों के अंतर्गत पंजीकृत कोई भी सहकारी संस्था, जिसके उपनियमों में स्वास्थ्य सेवा शामिल हो, पात्र है।
  • सुरक्षा आवश्यकताएँ: ऋण परिसंपत्ति बंधक, सरकारी गारंटी, बैंक गारंटी अथवा गिरवी रखी गई प्रतिभूतियों के माध्यम से सुरक्षित किए जाते हैं।

योजना का महत्त्व

  • सामुदायिक स्वामित्व: जवाबदेही और सहभागिता सुनिश्चित करते हुए सहकारी-नेतृत्व आधारित स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देता है।
  • आयुष क्षेत्र को समर्थन: पारंपरिक एवं एकीकृत चिकित्सा प्रणालियों को सुदृढ़ करता है।
  • महिला सशक्तीकरण: रियायती ब्याज दरों के माध्यम से महिला-बहुल सहकारिताओं को प्रोत्साहन।
  • समावेशी स्वास्थ्य विस्तार: ग्रामीण एवं वंचित क्षेत्रों में स्वास्थ्य अवसंरचना का विस्तार।
  • सहकारी क्षेत्र का विविधीकरण: कृषि से आगे बढ़कर स्वास्थ्य सेवाओं में सहकारिताओं की भूमिका का विस्तार।

राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) के बारे में

  • यह संसद के एक अधिनियम के अंतर्गत वर्ष 1963 में स्थापित एक वैधानिक निकाय है, जिसका उद्देश्य उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन एवं सेवाओं में सहकारी-आधारित विकास को बढ़ावा देना है।
  • सहायता: प्राथमिक, जिला तथा शीर्ष/बहु-राज्य स्तर की सहकारिताओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
  • वित्तपोषण का माध्यम: वित्तीय सहायता राज्य सरकारों/केंद्रशासित प्रदेशों के माध्यम से या सीधे पात्र सहकारिताओं को प्रदान की जाती है।

संदर्भ

केंद्र सरकार ने केंद्र से राज्यों को निधि हस्तांतरण संबंधी 16वें वित्त आयोग की 2026-31 की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है।

16वें वित्त आयोग के बारे में

  • भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद-280 के तहत 16वें वित्त आयोग का गठन किया गया था।
  • अवधि
    • 16वें वित्त आयोग का गठन 31 दिसंबर, 2023 को हुआ था।
    • अवधि: यह आयोग 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक की पाँच वर्षीय अवधि हेतु वित्तीय संसाधनों के वितरण की सिफारिश करने का दायित्व निभाता है।
  • प्रकृति: वित्त आयोग की सिफारिशें सलाहकारी प्रकृति की होती हैं, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा इन्हें आमतौर पर स्वीकार किया जाता है।
  • अध्यक्ष: डॉ. अरविंद पनगडिया  (अध्यक्ष) – नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री।
  • सदस्य
    • श्रीमती एनी जॉर्ज मैथ्यू – पूर्णकालिक सदस्य।
    • डॉ. मनोज पांडा – पूर्णकालिक सदस्य।
    • श्री अजय नारायण झा – पूर्णकालिक सदस्य।
    • डॉ. सौम्या कांति घोष

विभाज्य पूल (Divisible Pool) से तात्पर्य अनुच्छेद-270 में उल्लिखित करों की शुद्ध आय से है, जिसे राज्यों के साथ साझा किया जा सकता है।

संवैधानिक ढाँचा

  • अनुच्छेद-270: शुद्ध कर राजस्व का विभाज्य कोष (आयकर, निगम कर, CGST, केंद्र का IGST हिस्सा)।
  • अपवाद: उपकर और अधिभार विभाज्य कोष का हिस्सा नहीं हैं (2025-26 में सकल कर राजस्व का लगभग 81%)।
  • अनुच्छेद 275: अनुदान सहायता (राजस्व घाटा, स्थानीय निकाय, आपदा प्रबंधन)।
  • अनुच्छेद 280: वित्त आयोग को सौंपे गए अधिकार।

हस्तांतरण (Devolution) की अवधारणा 

  • ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण से तात्पर्य संघ और राज्यों के बीच विभाज्य निधि के हिस्से के वितरण से है।
  • क्षैतिज हस्तांतरण से तात्पर्य वित्त आयोग द्वारा निर्धारित सूत्र के आधार पर राज्यों के हिस्से का उनके बीच वितरण से है।

ऊर्ध्वाधर विकेंद्रीकरण में पिछले रुझान

  • 14वें वित्त आयोग से पहले: 13वें वित्त आयोग तक, राज्यों को केंद्र प्रायोजित योजनाओं (CSS) के लिए कुछ शर्तों के साथ विशेष हस्तांतरण प्राप्त होते थे और राज्यों का हिस्सा 32% निर्धारित था।
  • 14वें वित्त आयोग के तहत वृद्धि: 14वें वित्त आयोग ने सीएसएस के लिए विशिष्ट हस्तांतरण बंद कर दिए और राज्यों का हिस्सा बढ़ाकर 42% कर दिया।
  • 15वें वित्त आयोग के तहत संशोधन: जम्मू और कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठन के कारण 15वें वित्त आयोग ने इसे थोड़ा घटाकर 41% कर दिया।

16वें वित्त आयोग के समक्ष राज्यों की प्रमुख माँगें

  • उच्चतर ऊर्ध्वाधर हिस्सेदारी: कई राज्यों (18) ने राज्यों की हिस्सेदारी 41% से बढ़ाकर 50% करने की माँग की, जबकि अन्य ने इसे 45-48% तक बढ़ाने का अनुरोध किया।
  • उपकर और अधिभार का समावेश: कई राज्यों ने माँग की कि उपकर और अधिभार को विभाज्य निधि में शामिल किया जाए या उनके उपयोग पर सीमा लगाई जाए।
  • क्षैतिज हस्तांतरण: महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे औद्योगिक राज्यों ने सकल घरेलू उत्पाद में राज्यों के योगदान को एक मानदंड के रूप में शामिल करने की वकालत की।

ऊर्ध्वाधर विकेंद्रीकरण पर 16वें आयोग की सिफारिशें

  • 41% हिस्सेदारी बरकरार रखना: आयोग ने राज्यों की हिस्सेदारी को मौजूदा 41% पर बनाए रखने की सिफारिश की।
  • सेस को शामिल करने की अस्वीकृति: आयोग ने माना कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत, विभाज्य निधि में सेसेस और सरचार्ज को शामिल करना या उन पर सीमा तय करना न तो स्वीकार्य है और न ही वांछनीय।
  • यथास्थिति का औचित्य: आयोग ने तीन कारण बताए:
    • राज्यों को पहले से ही कुल कर राजस्व का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है।
    • यद्यपि व्यय CSS के तहत केंद्रशासित प्रदेशों पर किया जाता है, परंतु उसका वास्तविक वित्तीय लाभ अंततः राज्यों को ही प्राप्त होता है।
    • रक्षा, अवसंरचना और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर केंद्रशासित प्रदेश के उच्च व्यय की आवश्यकताएँ।

क्षैतिज हस्तांतरण

  • मार्गदर्शक सिद्धांत: वित्तीय आयोग ने दो प्रमुख सिद्धांतों का पालन किया
    • राज्यों की हिस्सेदारी में परिवर्तन क्रमिक होना चाहिए।
    • दक्षता और विकास में राज्यों के योगदान को मान्यता मिलनी चाहिए।
  • समानता संबंधी विचार: आय अंतर, जनसंख्या और क्षेत्रफल जैसे पारंपरिक मापदंडों को पर्याप्त महत्त्व दिया जाना जारी है।
  • नया मानदंड: सकल सकल घरेलू उत्पाद में राज्य के योगदान का एक नया मानदंड पेश किया गया है।

राज्यों पर वित्तीय प्रभाव

  • दक्षिण राज्यों में मामूली वृद्धि: दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों के हिस्से में मामूली वृद्धि देखी गई।
  • उत्तरी राज्यों के हिस्से में गिरावट: उत्तरी और मध्य के बड़े राज्यों के हिस्से में मामूली कमी आई।
  • कुल परिणाम: सिफारिशें व्यापक रूप से यथास्थिति को दर्शाती हैं, जबकि कुल राजकोषीय हस्तांतरण 15वें वित्त आयोग के ढांचे के समान ही हैं।

  • राज्यवार: परिवर्तन
    • आंध्र प्रदेश: 4.047% से बढ़कर 4.217% हो गया।
    • कर्नाटक: 3.647% से बढ़कर 4.131% हो गया।
    • केरल: 1.925% से बढ़कर 2.382% हो गया।
    • तमिलनाडु: 4.079% से बढ़कर 4.097% हो गया।
    • तेलंगाना: 2.102% से बढ़कर 2.174% हो गया।
    • उत्तर प्रदेश: 17.939% से घटकर 17.619% हो गया।
    • बिहार: 10.058% से घटकर 9.948% हो गया।

शहरी स्थानीय सरकारों को अनुदान

  • 16वें वित्त आयोग: आयोग ने पाँच वर्षों में शहरी स्थानीय निकायों (ULG) के लिए ₹3.5 लाख करोड़ की सिफारिश की, जो शहरी स्थानीय निकाय आवंटन का अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है।
  • 15वें वित्त आयोग: 15वें वित्त आयोग ने ₹1.5 लाख करोड़ (2021-26) आवंटित किए थे, जिससे 16वें वित्त आयोग की सिफारिश में लगभग 230% की वृद्धि हुई है।
    • ULG को कुल स्थानीय निकाय अनुदान का 45% प्राप्त होगा, जो पहले 36% था, यह शहरी वित्तीय प्राथमिकताओं में वृद्धि को दर्शाता है।
  • अंतर-राज्यीय वितरण रुझान: केरल में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई, जहाँ आवंटन में 400% से अधिक की वृद्धि हुई।
    • हिमाचल प्रदेश में शहरी अनुदान में लगभग 50% की कमी देखी गई।

संदर्भ

वित्त मंत्रालय ने सूचित किया है कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (GNPA) 30 सितंबर, 2025 तक ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर पहुँच गई हैं, जो वर्ष 2010-11 में देखे गए स्तर से भी कम है।

सकल NPAs में रुझान

  • ऐतिहासिक गिरावट: छोटे और मध्यम आकार के बैंकों (SCBs) का सकल राष्ट्रीय परिसंपत्ति (GNPA) अनुपात घटकर 2.15% हो गया है, जो एक दशक से अधिक समय में सबसे कम है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक: PSB ने 2.50% का GNPA अनुपात दर्ज किया, जो मार्च 2018 के बाद से अन्य बैंक समूहों की तुलना में अधिक तेजी से गिरा है।
  • निजी क्षेत्र के बैंक: निजी बैंकों ने 1.73% का कम GNPA अनुपात दर्ज किया, जो बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता को दर्शाता है।
  • विदेशी बैंक: विदेशी बैंकों ने 0.80% का सबसे कम GNPA अनुपात दर्ज किया।
  • नए एनपीए में गिरावट: NPA में नए संचय को मापने वाले स्लिपेज अनुपात में पिछले छह वर्षों में लगातार सुधार हुआ है।

उच्चतम स्तर की तुलना: भारत का GNPA अनुपात वित्त वर्ष 2018 में लगभग 11.2% के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया था, जो आर्थिक सुधार की व्यापकता को दर्शाता है।

  • बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता और बीमाकरण
    • सुदृढ़ ऋण मानक: गैर-निष्पादित ऋणों (NPA) में गिरावट बेहतर ऋण मूल्यांकन और ऋण प्रक्रियाओं को दर्शाती है, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में।
    • मजबूत बैलेंस शीट: लगातार लाभप्रदता ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मजबूत पूँजी स्थिति और लचीलेपन को बढ़ावा दिया है।
  • नीति और नियामक उपाय: सरकार के 4R दृष्टिकोण ने इस गिरावट को समर्थन दिया, जिसमें शामिल हैं:-
    • गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की पारदर्शी पहचान
    • प्रभावी कानूनी तंत्रों के माध्यम से समाधान और वसूली
    • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पुनर्पूंजीकरण
    • बैंकिंग और व्यापक वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार।

बैंक के प्रदर्शन पर प्रभाव

  • प्रावधान भार में कमी: गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) में गिरावट से प्रोविजनिंग आवश्यकताओं में कमी आती है, जिससे उत्पादक ऋण देने के लिए पूँजी उपलब्ध होती है।
  • लाभप्रदता में सुधार: तनाव में कमी से बैंक की लाभप्रदता बढ़ेगी और बैलेंस शीट मजबूत होगी।
  • ऋण वृद्धि में सकारात्मक वृद्धि: संपत्ति की गुणवत्ता में सुधार का व्यावसायिक वृद्धि और ऋण देने की क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) के बारे में

  • परिभाषा: RBI के मानदंडों के अनुसार, गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) वह ऋण या अग्रिम है जिस पर ब्याज और/या मूलधन 90 दिनों से अधिक समय से बकाया है।
  • परिसंपत्ति वर्गीकरण: बैंक ऋणों को परिसंपत्ति मानते हैं क्योंकि ऋण देने से प्राप्त ब्याज आय उनकी प्राथमिक आय का स्रोत है।
    • जब उधारकर्ता, व्यक्ति या निगम, ब्याज अथवा मूलधन का भुगतान करने में विफल रहते हैं, तो ऋण से आय प्राप्त होना बंद हो जाती है।
    • RBI बैंक अग्रिमों को मानक परिसंपत्तियों (निष्पादित ऋण), उपमानक परिसंपत्तियों, संदिग्ध परिसंपत्तियों और हानि परिसंपत्तियों में वर्गीकृत करता है।
  • NPA का वर्गीकरण (RBI दिशा-निर्देश)
    • निम्नमानक परिसंपत्तियाँ: वे परिसंपत्तियाँ, जो 12 महीने तक निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPA) बनी हुई हैं।
    • संदिग्ध परिसंपत्तियाँ: वे परिसंपत्तियाँ, जो 12 महीने से अधिक समय से निम्न मानक श्रेणी में हैं, जिससे वसूली न होने का उच्च जोखिम निहित है।
    • हानिग्रस्त परिसंपत्तियाँ: ऐसी परिसंपत्तियाँ जिन्हें अप्राप्य या नगण्य मूल्य की घोषित किया गया है, जहाँ बैंक योग्य संपत्ति के रूप में उनका निरंतर बने रहना उचित नहीं है, भले ही कुछ वसूली अभी भी संभव हो।

प्रारंभिक पहचान (प्री-NPA चरण)

  • NPA बनने से पहले, ऋणों को विशेष उल्लेख खातों (SMA) के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है:
    • SMA-0: 30 दिनों तक की देरी
    • SMA-1: 31-60 दिनों की देरी
    • SMA-2: 61-90 दिनों की देरी।

सकल और शुद्ध NPAs

सकल NPA

निवल NPA

GNPA किसी निश्चित समय (तिमाही या वित्तीय वर्ष) पर बैंक के बही खातों में मौजूद NPA के कुल मूल्य को दर्शाता है। NNPA की गणना सकल NPA में से बैंक द्वारा किए गए प्रावधानों को घटाकर की जाती है, जो खराब ऋणों के वास्तविक बोझ को दर्शाता है।
GNPA अनुपात कुल अग्रिमों के प्रतिशत के रूप में सकल NPA को मापता है, जो ऋण पोर्टफोलियो में समग्र तनाव को दर्शाता है। NNPA अनुपात कुल अग्रिमों के प्रतिशत के रूप में शुद्ध NPA को मापता है, जो प्रावधान के बाद बैंक के प्रभावी जोखिम को दर्शाता है।

NPA प्रोविजनिंग

  • प्रोविजनिंग से तात्पर्य ऋण मूल्य के उस हिस्से से है, जिसे बैंक संभावित नुकसान की भरपाई के लिए लाभ से अलग रखते हैं।
  • मानक प्रोविजनिंग मानदंड: मानक परिसंपत्तियों के लिए, प्रोविजनिंग आमतौर पर 5% से 20% के बीच होती है, जो क्षेत्र और उधारकर्ता के जोखिम प्रोफाइल पर निर्भर करती है।
  • NPA के मामले में, बैंकों को वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए बेसल III मानदंडों के अनुसार 100% तक प्रोविजनिंग करना अनिवार्य है।

NPAs को कम करने के लिए उठाए गए कदम

  • ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRTs): ऋण वसूली और दिवालियापन अधिनियम, 1993 के तहत स्थापित, ये न्यायाधिकरण बैंक के बकाया की शीघ्र वसूली और निपटारे के लिए एक तंत्र प्रदान करते हैं।
  • सरफेसी (SARFAESI) अधिनियम, 2002: सरफेसी अधिनियम सुरक्षित लेनदारों को ऋण भुगतान में चूक होने की स्थिति में न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना गिरवी रखी गई संपत्तियों को अधिगृहीत करने का अधिकार देता है।
    • SARFAESI अधिनियम में प्रमुख संशोधनों से RBI को प्राप्त अधिकार:
      • परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों (ARC) का लेखापरीक्षा और निरीक्षण करना तथा अनुपालन न करने पर दंड लगाना।
      • भारत के केंद्रीय प्रतिभूतीकरण परिसंपत्ति पुनर्निर्माण एवं सुरक्षा हित रजिस्टर (CERSAI) में सभी सुरक्षा हितों का अनिवार्य पंजीकरण।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए इंद्रधनुष योजना: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पूँजी निवेश, शासन सुधार और परिचालन पुनर्गठन के माध्यम से मजबूत करने के लिए इंद्रधनुष योजना शुरू की गई थी।
  • RBI की परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा (2015): RBI द्वारा शुरू की गई परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा ने बैंक बैलेंस शीट में तनावग्रस्त परिसंपत्तियों को उजागर किया, जिससे गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की पारदर्शी पहचान संभव हुई।
  • दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016: IBC, 2016 कॉरपोरेट संस्थाओं, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों के लिए समयबद्ध दिवालियापन समाधान को सक्षम बनाती है, आमतौर पर 180 दिनों के भीतर, जिसे 90 दिनों तक और बढ़ाया जा सकता है।
    • मार्च 2025 तक, ₹13.78 लाख करोड़ से अधिक के 30,000 से अधिक मामले पूर्व-प्रवेश चरण में निपटाए गए।
  • विवेकपूर्ण समाधान ढाँचा (2019): RBI ने तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के शीघ्र समाधान को प्रोत्साहित करने के लिए एक समयबद्ध ढाँचा पेश किया।
  • नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (NARCL): NARCL की स्थापना बैंकों से संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को समायोजित करने के लिए की गई थी, जिससे वित्तीय प्रणाली की स्थिरता और दक्षता में सुधार हो सके।

लोन राइट-ऑफ (Loan Write-off) के बारे में 

  • लोन राइट-ऑफ एक लेखांकन विधि है, जिसका उपयोग बैंक अपनी बैलेंस शीट से खराब ऋणों को हटाने के लिए करते हैं।
  • यदि भुगतान में लगातार तीन तिमाहियों तक चूक होती है, तो ऋण माफ किया जा सकता है।
  • राइटिंग-ऑफ का अर्थ ऋण क्षमा नहीं है। बैंकों के पास बकाया राशि वसूलने का अधिकार अभी भी बना रहता है।
  • कर लाभ: बैंक माफ किए गए ऋण की राशि पर कर कटौती के पात्र हो जाते हैं।

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