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Feb 14 2026

‘कौशल रथ’ के बारे में

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने युवाओं में आधारभूत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए ‘सभी के लिए युवा AI’ पहल के अंतर्गत ‘कौशल रथ’ का शुभारंभ किया है।

‘कौशल रथ’ के बारे में

  • यह राष्ट्रीय AI साक्षरता कार्यक्रम ‘सभी के लिए युवा AI’ के तहत एक मोबाइल कृत्रिम बुद्धिमत्ता जागरूकता इकाई है।
  • इसे एक पूर्णतः सुसज्जित कंप्यूटर लैब के रूप में विकसित किया गया है, जिसमें इंटरनेट-सक्षम प्रणालियाँ, ऑडियो-विजुअल उपकरण तथा संरचित प्रशिक्षण मॉड्यूल उपलब्ध हैं।
  • यह विद्यालयों, महाविद्यालयों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) तथा सामुदायिक स्थलों पर जाकर AI और जेनरेटिव AI उपकरणों का व्यावहारिक अनुभव प्रदान करेगा। प्रशिक्षित प्रशिक्षकों तथा भारत-विशिष्ट उपयोग मामलों के माध्यम से व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया जाएगा।
  • उद्देश्य
    • भारत भर में आधारभूत AI शिक्षा तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण करना।
    • अर्द्ध-शहरी एवं वंचित क्षेत्रों के विद्यार्थियों, युवाओं, शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों तक पहुँचना।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं जनरेटिव AI उपकरणों की समझ विकसित कर AI-तैयार युवा कार्यबल का निर्माण करना।
  • यह इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर प्रौद्योगिकी सोसायटी (AISECT) के सहयोग से शुरू की गई एक मोबाइल AI जागरूकता और साक्षरता इकाई है।

“युवा AI फॉर ऑल” के बारे में

  • सभी के लिए युवा AI कोर्स चार घंटे का तथा स्व-गति से सीखने वाला कार्यक्रम है, जिसमें छह मॉड्यूल शामिल हैं।
  • इसके लिए कोडिंग के पूर्व ज्ञान की आवश्यकता नहीं है।
  • मुख्य क्षेत्र: AI के मूल सिद्धांत, नैतिकता, वास्तविक दुनिया में अनुप्रयोग
  • उद्देश्य: भविष्य के लिए तैयार कार्यबल का निर्माण करना।
  • यह कार्यक्रम फ्यूचर स्किल्स प्राइम, iGOT कर्मयोगी, कोर्सेरा और TCS iON जैसे भागीदारों के सहयोग से शुरू किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद 1267 प्रतिबंध समिति 

 

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 1267 निगरानी रिपोर्ट में पाकिस्तान स्थित संगठन जैश-ए-मोहम्मद को दिल्ली लाल किला आतंकी हमले से जोड़ा गया है तथा उसके द्वारा महिलाओं के लिए एक विशेष इकाई गठित करने की योजना का उल्लेख किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद 1267 प्रतिबंध समिति के बारे में

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 समिति की स्थापना वर्ष 1999 में की गई थी।
    • 9/11 आतंकी हमलों के पश्चात् इसे सुदृढ़ किया गया तथा वर्ष 2011 और 2015 में इसमें महत्त्वपूर्ण अद्यतन किए गए।
  • आधिकारिक नाम: इसे औपचारिक रूप से ‘दाएश और अल-कायदा प्रतिबंध समिति’ (Da’esh and Al-Qaida Sanctions Committee) कहा जाता है।
  • संरचना: इसमें सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी एवं अस्थायी सदस्य शामिल होते हैं।
    • UNSC के सभी 15 सदस्य 1267 समिति के सदस्य होते हैं।
  • निर्णय प्रक्रिया: किसी व्यक्ति, संगठन या इकाई को सूचीबद्ध करने अथवा सूची से हटाने संबंधी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं।
  • प्रक्रिया: कोई भी सदस्य देश किसी व्यक्ति, समूह या संस्था को प्रतिबंध सूची में शामिल करने का प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकता है।
  • भूमेिका
    • यह समिति अल-कायदा एवं इस्लामिक स्टेट (IS) से संबद्ध आतंकवादियों और संगठनों की वैश्विक सूची का संधारण करती है।
    • आतंकवाद पर अंकुश लगाने हेतु यह यात्रा प्रतिबंध , संपत्ति जब्ती तथा हथियार प्रतिबंध जैसे उपाय लागू करती है।

नाटो का आर्कटिक सेंट्री मिशन 

नाटो ने ‘आर्कटिक सेंट्री (Arctic Sentry)’ नामक एक नई आर्कटिक सुरक्षा पहल शुरू की है, जो सुदूर उत्तर में सहयोगी सैन्य गतिविधियों को एक ही परिचालन ढाँचे के तहत समन्वित करती है।

आर्कटिक सेंट्री मिशन के बारे में

  • यह एक एकीकृत तथा बहु-क्षेत्रीय (multi-domain) पहल है जिसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा को सुदृढ़ करना, सहयोगी देशों के मध्य समन्वय बढ़ाना तथा सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण आर्कटिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है।
  • उद्देश्य: नाटो की संयुक्त क्षमताओं का उपयोग करके अपने क्षेत्रों की रक्षा करना और आर्कटिक और सुदूर उत्तर क्षेत्र में सुरक्षा तथा स्थिरता सुनिश्चित करना।
    • बाल्टिक सेंट्री और ईस्टर्न सेंट्री जैसे मौजूदा नाटो अभियानों से प्रेरणा लेते हुए, क्षेत्र में निगरानी और रक्षात्मक उपायों को सुदृढ़ करना।
  • सैन्य अभ्यास और अवसंरचना संरक्षण: इस मिशन में आर्कटिक अभियानों के लिए बलों को प्रशिक्षित करने, महत्त्वपूर्ण अवसंरचना की रक्षा करने और नॉर्वे, आइसलैंड तथा डेनिश जलडमरूमध्य में तोड़फोड़ के खतरों का मुकाबला करने के लिए एक्सरसाइज कोल्ड रिस्पांस (Exercise Cold Response) और यू. के. के नेतृत्व वाला लायन प्रोटेक्टर (Lion Protector) जैसे प्रमुख अभ्यास शामिल हैं।

आर्कटिक

  • आर्कटिक उत्तरी ध्रुव के चारों ओर स्थित ध्रुवीय क्षेत्र को संदर्भित करता है, जिसमें आर्कटिक महासागर तथा रूस, कनाडा, नॉर्वे, डेनमार्क (ग्रीनलैंड के माध्यम से) और संयुक्त राज्य अमेरिका (अलास्का) के उत्तरी भाग सम्मिलित हैं। यह क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों, समुद्री मार्गों और सामरिक स्थिति के कारण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

हाई नॉर्थ

  • ‘हाई नॉर्थ’ एक व्यापक सामरिक अवधारणा है, जिसका प्रयोग विशेषकर यूरोपीय सुरक्षा विमर्श में किया जाता है। यह मुख्यतः उत्तरी यूरोप, विशेषकर उत्तरी नॉर्वे एवं उससे सटे समुद्री क्षेत्रों को संदर्भित करता है और उनके भू-राजनीतिक तथा सैन्य महत्त्व को रेखांकित करता है।

सशस्त्र बलों के कर्मियों द्वारा प्रकाशन के लिए प्रस्तावित दिशा-निर्देश

सेवानिवृत्त जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण को लेकर चल रहे विवाद के बीच, रक्षा मंत्रालय (MoD) उन सेवारत और सेवानिवृत्त सशस्त्र बलों के कर्मियों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है, जो भविष्य में पुस्तकें प्रकाशित करना चाहते हैं।

प्रस्तावित दिशा-निर्देश

  • इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य एक स्पष्ट एवं मानकीकृत पूर्व-प्रकाशन स्वीकृति (Pre-publication clearance) प्रक्रिया स्थापित करना है, जो सेवारत तथा सेवानिवृत्त दोनों प्रकार के कर्मियों पर लागू होगी।
  • इनमें वर्तमान सेवा विनियमों तथा शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 (Official Secrets Act, 1923) के प्रमुख प्रावधानों को सम्मिलित किया जाएगा।
  • मुख्य उद्देश्य “प्रक्रियात्मक अंतरालों” को समाप्त करना, वर्गीकृत या संवेदनशील सूचनाओं के अनधिकृत प्रकटीकरण को रोकना तथा ऐसे मामलों में पूर्व रक्षा मंत्रालय की अनुमति को अनिवार्य बनाना है।
  • वर्तमान में ये नियम प्रारूपण/विचाराधीन अवस्था में हैं; अभी तक कोई आधिकारिक अधिसूचना, राजपत्र प्रकाशन या कार्यान्वयन नहीं हुआ है।

वर्तमान लागू नियम

  • वर्तमान में सशस्त्र बल कर्मियों (विशेषकर सेवानिवृत्त अधिकारियों) द्वारा पुस्तक लेखन के लिए कोई एकल समेकित कानून उपलब्ध नहीं है।

सेवारत कर्मियों के लिए

  • किसी भी साहित्यिक, पारिश्रमिक या बाह्य गतिविधि (जिसमें पुस्तक प्रकाशन भी शामिल है) हेतु पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है।
  • यह प्रावधान रक्षा सेवा विनियम, सेना अधिनियम, 1950 (Army Act, 1950) तथा सेना नियम, 1954 (Army Rules, 1954) के अंतर्गत सख्त एवं अनिवार्य है।
  • विषयवस्तु संबंधी प्रतिबंध: गोपनीय जानकारी, परिचालन विवरण, आंतरिक प्रक्रियाएँ, उपकरण क्षमताएँ, खुफिया जानकारी या राष्ट्रीय सुरक्षा/विदेशी संबंधों के लिए हानिकारक किसी भी चीज का खुलासा प्रतिबंधित है।

सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों के लिए प्रावधान

  • सेवानिवृत्ति के बाद प्रकाशन पर कोई विशिष्ट सेवा नियम (जैसे, सेना अधिनियम/नियम) प्रतिबंध नहीं लगाते; उन्हें सामान्यत: नागरिक माना जाता है।
  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 (Official Secrets Act, 1923) स्थायी रूप से (जीवन भर के लिए) लागू होता है: वर्गीकृत जानकारी, संवेदनशील परिचालन विवरण या भारत की संप्रभुता/सुरक्षा के लिए हानिकारक सामग्री का खुलासा/संचार करना आपराधिक अपराध है।
  • लेखकों से अपेक्षा की जाती है कि वे परिचालन/संवेदनशील विवरण वाली पांडुलिपियों को स्वैच्छिक मंजूरी/सत्यापन के लिए रक्षा मंत्रालय को प्रस्तुत करें।

दवा प्रतिरोधी टीबी के लिए संक्षिप्त पूर्णतः मौखिक उपचार

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय क्षय रोग अनुसंधान संस्थान (ICMR–NIRT) के एक हालिया अध्ययन में यह निष्कर्ष निकला है कि बहु-दवा प्रतिरोधी एवं रिफाम्पिसिन-प्रतिरोधी क्षय रोग (MDR/RR-TB) के विरुद्ध छह माह की पूर्णतः मौखिक उपचार पद्धतियाँ अधिक लागत-प्रभावी हैं तथा बेहतर स्वास्थ्य परिणाम प्रदान करती हैं।

बहु-दवा प्रतिरोधी/रिफाम्पिसिन-प्रतिरोधी क्षय रोग (MDR/RR-TB) के बारे में:

  • MDR/RR-TB, क्षय रोग (TB) के सबसे गंभीर रूपों में से एक है और भारत जैसे उच्च-भार (high-burden) वाले देशों के लिए एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है।
  • MDR-TB: माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के कारण होने वाला क्षय रोग, जो कम-से-कम आइसोनियाज़िड और रिफैम्पिसिन (दो सबसे प्रभावी प्राथमिक उपचार दवाएँ) के प्रति प्रतिरोधी होता है।
  • RR-TB: रिफाम्पिसिन के प्रति प्रतिरोध (चाहे अन्य दवाओं के प्रति प्रतिरोध हो या न हो)। इसे प्रायः MDR-TB के साथ समूहित कर MDR/RR-TB कहा जाता है।
  • यह समस्या मुख्यतः मानव-निर्मित (human-made) है, जो अनुचित TB प्रबंधन, अपूर्ण उपचार या दवाओं के गलत उपयोग के कारण उत्पन्न होती है।
  • एमडीआर/आरआर-टीबी का इलाज मुश्किल होता है क्योंकि उपचार की अवधि लंबी होती है (कम अवधि के उपचार के लिए 9-11 महीने या लंबी अवधि के उपचार के लिए 18-20 महीने)।

अध्ययन में उपचार की तुलना

  • अध्ययन में मौजूदा उपचार पद्धतियों की तुलना दो नई बेडाक्विलिन-आधारित (bedaquiline-based), पूर्णतः मौखिक उपचार योजनाओं से की गई:
    • BPaL: बेडाक्विलिन + प्रेटोमैनिड + लाइनज़ोलिड (6 माह)
    • BPaLM: BPaL + मोक्सीफ्लॉक्सासिन (6 माह)
  • ये अल्पावधि उपचार योजनाएँ पूर्णतः मौखिक (बिना इंजेक्शन) होने के कारण उपचार को सरल बनाती हैं तथा अवधि को उल्लेखनीय रूप से कम करती हैं।

ICMR–NIRT अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • छह माह की पूर्णतः मौखिक दवाइयाँ किफायती हैं: BPaL एवं BPaLM (6 माह) उपचार योजनाएँ राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के अंतर्गत प्रचलित 9–11 माह तथा 18–20 माह की योजनाओं की तुलना में अधिक किफायती पाई गईं।
  • बेहतर रोगी परिणाम: उपचार अनुपालन में सुधार, रुग्णता एवं दुष्प्रभावों में कमी, सामान्य जीवन में शीघ्र वापसी की संभावना।
  • क्षय उन्मूलन लक्ष्यों को समर्थन: कम अवधि (6 महीने बनाम 9-20 महीने) राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के उद्देश्यों के अनुरूप है।

महर्षि दयानंद सरस्वती 

 

भारत के राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति ने महर्षि दयानंद सरस्वती की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

महर्षि दयानंद सरस्वती (1824–1883) के बारे में

  • महर्षि दयानंद सरस्वती 19वीं शताब्दी के प्रमुख हिंदू समाज-सुधारक तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उन्होंने वैदिक सिद्धांतों की पुनर्स्थापना और सामाजिक सुधार का आह्वान किया।
  • प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म 12 फरवरी, 1824 को गुजरात के टंकारा में हुआ। उनका बचपन का नाम मूलशंकर था।
    • उन्होंने किशोरावस्था में ही मूर्ति पूजा पर सवाल उठाए, 22 वर्ष की आयु में गृहस्थी त्याग दिया और बाद में स्वामी विरजानंद के अधीन अध्ययन किया, जिससे उनके वैदिक दर्शन को आकार मिला।
  • दर्शन: उन्होंने “वेदों की ओर लौटो” का नारा प्रचारित किया, जिसमें एकेश्वरवाद, शास्त्रों की तर्कसंगत व्याख्या, मूर्ति पूजा का त्याग और स्वराज (स्वशासन) की प्राप्ति पर जोर दिया गया।
  • प्रमुख योगदान
    • धार्मिक सुधार: उन्होंने अंधविश्वास, कर्मकांड और सामाजिक बुराइयों को दूर करके हिंदू धर्म को शुद्ध करने के लिए 1875 में आर्य समाज की स्थापना की।
    • सामाजिक समानता: उन्होंने जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता का विरोध किया और जन्म के बजाय योग्यता और व्यवसाय पर आधारित वर्ण व्यवस्था की वकालत की।
    • महिला सशक्तीकरण: उन्होंने महिलाओं की शिक्षा का समर्थन किया और बाल विवाह और सती प्रथा का विरोध किया।
    • साहित्यिक रचनाएँ: उनकी महत्वपूर्ण रचना सत्यार्थ प्रकाश में वैदिक शिक्षाओं का प्रतिपादन किया गया है और सामाजिक और धार्मिक रूढ़िवादिता की आलोचना की गई है।
  • मृत्यु: उनका निधन 30 अक्टूबर, 1883 को अजमेर (राजस्थान) में हुआ।
  • विरासत: वर्ष 1886 में दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) आंदोलन की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य स्वामी दयानंद सरस्वती की शैक्षिक एवं सामाजिक दृष्टि को साकार करना था।
    • वर्तमान में, DAV कॉलेज मैनेजिंग कमेटी (DAVCMC) भारत एवं विदेशों में 900 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों- सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों, पब्लिक स्कूलों एवं महाविद्यालयों का संचालन कर रही है।

संदर्भ

भारत ने लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (Lysosomal Storage Disorders) के लिए अपना पहला सरकारी सहायता प्राप्त राष्ट्रीय बायोबैंक लॉन्च किया है, जिसमें 15 राज्यों के 530 रोगियों के डेटा और नमूनों को एकीकृत किया गया है।

लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSDs) के लिए राष्ट्रीय बायोबैंक

  • भारत ने लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSDs) के लिए समर्पित एक अग्रणी राष्ट्रीय बायोबैंक की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य दुर्लभ आनुवंशिक रोगों के अनुसंधान, निदान और किफायती उपचार विकास को बढ़ावा देना है।
  • बायोबैंक एक संगठित भंडार है, जो चिकित्सा अनुसंधान में उपयोग के लिए रक्त, DNA, ऊतक और मूत्र जैसे जैविक नमूनों के साथ-साथ संबंधित नैदानिक ​​और जनसांख्यिकीय डेटा का संग्रह, प्रसंस्करण, भंडारण एवं प्रबंधन करता है।
  • नोडल निकाय: बायोबैंक का नेतृत्व फाउंडेशन फॉर रिसर्च इन जेनेटिक्स एंड एंडोक्रिनोलॉजी (FRIGE), अहमदाबाद कर रहा है और इसे भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) द्वारा वित्त पोषित किया जाता है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • एकीकृत रोगी भंडार: बायोबैंक में 17 वर्षों में कई राज्यों के 28 संस्थानों से एकत्रित 530 रोगियों के जैविक नमूने और विस्तृत नैदानिक, जैव रासायनिक और आनुवंशिक डेटा संकलित हैं।
    • विविध रोग कवरेज: यह भंडार गौचर रोग, टे-सैक्स (Tay-Sachs) रोग, म्यूकोलिपिडोसिस II/III और मोरक्वियो ए (Morquio A) सिंड्रोम सहित 8 LSD उपसमूहों के अंतर्गत 27 विकारों को कवर करता है।
    • डिजिटल एक्सेस सिस्टम: एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म जीनोमिक DNA, प्लाज्मा, मूत्र के नमूने, एंजाइम गतिविधि विवरण और आनुवंशिक जानकारी का प्रबंधन करता है ताकि सतत, अनुसंधान-उन्मुख पहुंच सुनिश्चित हो सके।

लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSD) के बारे में

  • लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSD) 70 से अधिक दुर्लभ आनुवंशिक चयापचय संबंधी स्थितियों का एक समूह है, जो एंजाइमों की कमी के कारण होता है और कोशिकाओं में अपशिष्ट पदार्थों के विघटन को बाधित करता है।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: विशिष्ट एंजाइमों की अनुपस्थिति से कोशिकाओं में वसा और शर्करा का विषाक्त संचय होता है, जिससे अंगों को धीरे-धीरे क्षति पहुँचती है, विकलांगता होती है और बच्चों में मृत्यु दर बहुत अधिक होती है।
  • उपचार संबंधी चुनौतियाँ: दुर्लभ बीमारियों में से केवल लगभग 7% के लिए ही स्वीकृत उपचार उपलब्ध हैं, और एलएसडी के लिए उपलब्ध उपचारों की लागत अक्सर प्रति वर्ष ₹1 करोड़ से अधिक होती है, जिससे रोगियों की पहुँच सीमित हो जाती है।

बायोबैंक का महत्त्व

  • उपचार विकास में तेजी लाना: केंद्रीकृत भंडार शोधकर्ताओं को स्टेम सेल-आधारित रोग मॉडल विकसित करने और जीन एवं एंजाइम प्रतिस्थापन उपचारों का पता लगाने में सक्षम बनाता है।
  • प्रारंभिक स्क्रीनिंग में सुधार: इनस्टेम और सीडीएफडी जैसे संस्थान प्रारंभिक पहचान के लिए उन्नत स्पेक्ट्रोमेट्री-आधारित स्क्रीनिंग उपकरण डिजाइन करने के लिए बायोबैंक डेटा का उपयोग कर रहे हैं।
  • उपचार लागत में कमी: भारतीय जीनोमिक विविधता पर आधारित घरेलू अनुसंधान किफायती, स्थानीय स्तर पर विकसित चिकित्सीय समाधानों को बढ़ावा दे सकता है।
  • दुर्लभ रोग नीति ढाँचे को मजबूत करना: बायोबैंक राष्ट्रीय नैदानिक-जीनोमिक रजिस्ट्री की रही कमी को दूर करता है, जिससे भारत में साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और दुर्लभ रोग प्रबंधन को समर्थन मिलता है।

निष्कर्ष

भारत का राष्ट्रीय LSD बायोबैंक, स्वदेशी अनुसंधान को सक्षम बनाकर, निदान में सुधार करके और कमजोर रोगियों के लिए किफायती, जीवन रक्षक उपचारों का मार्ग प्रशस्त करके दुर्लभ बीमारियों के प्रबंधन में एक परिवर्तनकारी कदम है।

संदर्भ

हाल ही में, अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने भारत-विस्तार (Bharat-VISTAAR) की घोषणा की, जो एग्रीस्टैक (AgriStack) और ICAR के कृषि पद्धतियों के डेटा को एकीकृत करने वाला एक बहुभाषी एआई प्लेटफॉर्म है।

एग्रीस्टैक (AgriStack) के बारे में

  • एग्रीस्टैक एक डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) है जिसे 2024 में डिजिटल कृषि मिशन के तहत कृषि क्षेत्र के लिए लॉन्च किया गया था।
  • नोडल मंत्रालय: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (MoA&FW)
  • उद्देश्य: कृषि संबंधी डेटा को एक एकीकृत मंच पर एकत्रित करना।
  • घटक: यह तीन प्रमुख डिजिटल रजिस्टर (किसान रजिस्टर, बोई गई फसल का रजिस्टर और भौगोलिक संदर्भ वाले ग्राम मानचित्र) बनाता है, जिनका रखरखाव राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा किया जाता है।

यह कैसे कार्य करता है

  • किसान पंजीकरण: प्रत्येक किसान को आधार कार्ड के समान एक विशिष्ट डिजिटल पहचान (किसान आईडी) जारी की जाती है, जो भूमि स्वामित्व, फसलों, पशुधन, जनसांख्यिकीय विवरण और योजना लाभों से जुड़ी होती है।
  • प्रगति: लक्ष्य 11 करोड़ किसानों में से 8.62 करोड़ आईडी पहले ही बनाई जा चुकी हैं।
  • लाभ: किसान डिजिटल माध्यम से सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं, जिससे कागजी कार्रवाई और भौतिक यात्राओं में कमी आती है।
  • फसल पंजीकरण: फसल पंजीकरण डिजिटल सर्वेक्षणों के माध्यम से मौसमी फसलों का विवरण एकत्र करता है।
    • सरकार का लक्ष्य खरीफ सीजन 2026 तक देश के 604 जिलों में सभी 30 करोड़ कृषि भूखंडों को कवर करना है।
  • भू-संदर्भित ग्राम मानचित्र: भू-संदर्भित मानचित्र भूमि अभिलेखों को सटीक GPS स्थानों से जोड़ते हैं।
    • अब तक, कुल 6.75 लाख गाँवों में से 5.4 लाख गाँवों के मानचित्र भू-संदर्भित किए जा चुके हैं। लक्ष्य मार्च 2027 तक सभी गाँवों को कवर करना है।

महत्त्व

  • इसका उद्देश्य कृषि सेवाओं को अधिक कुशल और पारदर्शी बनाना है, जिसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जाएँगे:
    • किसानों की डिजिटल प्रोफाइल को सरकारी योजनाओं से जोड़ना।
    • कागजी कार्रवाई कम करना।
    • MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) खरीद, उर्वरक वितरण, बीमा, ऋण और परामर्श सेवाओं जैसे लाभों तक पहुँच बढ़ाना।

भारत विस्तार (कृषि संसाधनों तक पहुँच के लिए आभासी रूप से एकीकृत प्रणाली) के बारे में

  • यह एक बहुभाषी एआई-संचालित प्लेटफॉर्म है, जिसकी घोषणा केंद्रीय बजट 2026 में की गई थी।
  • यह एआई, एग्रीस्टैक पोर्टल और आईसीएआर के ज्ञान को एकीकृत करके फसलों, मौसम, कीट नियंत्रण तथा बाजार मूल्यों पर वास्तविक समय में व्यक्तिगत सलाह सेवाएँ प्रदान करता है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • एग्रीस्टैक किसान डेटाबेस को आईसीएआर के कृषि पद्धतियों के पैकेज के साथ एकीकृत करता है।
    • फसल-विशिष्ट और स्थान-विशिष्ट सलाह के लिए एआई-संचालित विश्लेषण का उपयोग करता है।
    • किसानों को बहुभाषी, अनुकूलित अनुशंसाएँ प्रदान करता है।
    • मौसम, मृदा स्वास्थ्य, फसल प्रबंधन और जोखिम न्यूनीकरण पर वास्तविक समय में जानकारी प्रदान करता है।
    • सूचना विषमता को कम करता है और अंतिम छोर तक डिजिटल पहुँच को बेहतर बनाता है।

संदर्भ

हाल ही में राज्यसभा के एक सांसद ने संसद में राइट टू रिकॉल’ कानून लागू करने का प्रस्ताव रखा है, उनका तर्क है कि मतदाताओं को अपना कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही गैर-कार्यशील प्रतिनिधियों को हटा देना चाहिए।

राइट टू रिकॉल’ के बारे में

  • प्रतिनिधि को पद से हटाने का अधिकार एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो मतदाताओं को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को उनके निश्चित कार्यकाल की समाप्ति से पहले पद से हटाने का अधिकार देती है।
  • इसकी शुरुआत आमतौर पर मतदाताओं के एक निश्चित प्रतिशत द्वारा समर्थित एक याचिका से होती है, जिसके बाद प्रतिनिधि को पद से हटाने के लिए मतदान होता है। यदि बहुमत प्रतिनिधि को पद से हटाने के पक्ष में आता है, तो प्रतिनिधि अपना पद छोड़ देता है।

पुनः नियुक्ति के अधिकार के पीछे का तर्क

  • लोकतांत्रिक जवाबदेही को बढ़ावा देना: यह व्यवस्था निर्वाचित प्रतिनिधियों की अपेक्षाओं के प्रति उनके पूरे कार्यकाल के दौरान जवाबदेह बने रहने को सुनिश्चित करके ऊर्ध्वाधर जवाबदेही को मजबूत करती है।
  • भ्रष्टाचार और कर्तव्यहीनता पर अंकुश लगाना: यह अविश्वास प्रस्ताव जैसे मौजूदा संसदीय तंत्रों के अतिरिक्त एक मध्यावधि सुधारात्मक उपकरण बनाकर भ्रष्टाचार, कदाचार या कर्तव्य की गंभीर उपेक्षा के विरुद्ध निवारक के रूप में कार्य करता है।
  • सहभागी लोकतंत्र को सुदृढ़ करना: ‘राइट टू रिकॉल’ इस व्यापक सिद्धांत के अनुरूप है कि संप्रभुता अंततः जनता में निहित है, जिससे उन्हें अपने जनादेश के उल्लंघन की स्थिति में सीधे हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलता है।

जिन देशों में ‘राइट टू रिकॉल’ है:

  • विश्व स्तर पर, 20 से अधिक देशों में किसी न किसी रूप में पद से हटाने की व्यवस्था है, हालाँकि इसका दायरा और सीमाएँ काफी भिन्न-भिन्न हैं।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका – कई राज्यों में राज्यपालों और स्थानीय अधिकारियों के लिए उपलब्ध है।
    • यूनाइटेड किंगडम – विशिष्ट कानूनी शर्तों के तहत सांसदों को वापस बुलाने की अनुमति है।
    • स्विट्जरलैंड – कुछ कैंटन में पद से हटाने के प्रावधान हैं।
    • वेनेजुएला, पेरू, इक्वाडोर – संवैधानिक प्रावधानों के तहत निर्वाचित अधिकारियों को वापस बुलाया जा सकता है।
    • जापान और ताइवान – विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर पद से हटाने के प्रावधान मौजूद हैं।
    • कनाडा (ब्रिटिश कोलंबिया) – विधान सभा सदस्यों के लिए पद से हटाने की व्यवस्था है।

भारत में वापसी के अधिकार का प्रावधान

  • संविधान में प्रावधान नहीं: भारतीय संविधान में संसद सदस्यों (सांसदों) या विधानसभा सदस्यों (विधायकों) को वापस बुलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
    • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, अयोग्यता या कुछ विशिष्ट अपराधों में दोषसिद्धि होने पर ही प्रतिनिधियों को हटाया जा सकता है, कार्य निष्पादन में लापरवाही के आधार पर नहीं।
  • राज्य स्तरीय प्रावधान (स्थानीय निकाय): मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान और झारखंड सहित कई राज्यों में पंचायत या नगरपालिका स्तर पर ‘राइट टू रिकॉल’ का प्रावधान है।
    • वर्ष 2008 में छत्तीसगढ़ में ‘राइट टू रिकॉल’ का पहला मामला सामने आया, जहाँ तीन स्थानीय निकाय प्रमुखों को विधिवत प्रक्रिया के माध्यम से हटाया गया।
  • प्रतिनिधित्व के अधिकार पर वकालत और दिशा-निर्देश
    • एम.एन. रॉय का प्रस्ताव (1944): उन्होंने स्वतंत्र भारत के संविधान के मसौदे में प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार की सिफारिश की, जिसमें एक विकेंद्रीकृत, दलविहीन लोकतंत्र का प्रावधान था, जो नागरिकों को अपने जनादेश का उल्लंघन करने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों को ‘राइट टू रिकॉल’ देता था।
    • जयप्रकाश नारायण की पैरवी (1974): संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान, उन्होंने प्रतिनिधि लोकतंत्र में राजनीतिक जवाबदेही बढ़ाने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए ‘वापसी के अधिकार’ की माँग की।
    • मोहन लाल त्रिपाठी बनाम जिला मजिस्ट्रेट, रायबरेली (1993): सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय स्तर पर पदच्युति प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि मतदाताओं के प्रतिनिधियों द्वारा पदच्युति लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करती है।
    • श्रीमती राम बेटी बनाम जिला पंचायत राज अधिकारी (1998): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर बल दिया और सुझाव दिया कि पदच्युति निर्णयों में आदर्श रूप से मतदाताओं की प्रत्यक्ष भागीदारी होनी चाहिए।
    • मध्य प्रदेश राज्य बनाम श्री राम सिंह (2000): सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार मुक्त और जवाबदेह शासन व्यवस्था के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को अस्थिर करने वाले तंत्रों के प्रति आगाह किया।

निष्कर्ष

‘राइट टू रिकॉल’ जवाबदेही को मजबूत करता है, लेकिन अस्थिरता, राजनीतिक दुरुपयोग और प्रतिनिधि लोकतंत्र के क्षरण को रोकने के लिए सख्त सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है।

संदर्भ

हाल ही में नीति आयोग ने विकसित भारत 2047 और नेट जीरो 2070 को प्राप्त करने के माध्यमों को रेखांकित करने वाली रिपोर्ट जारी कीं। इस कृषि अध्ययन में यह उल्लेख किया गया है कि जहाँ कृषि अपशिष्ट उत्सर्जन अधिक है, वहीं सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्र भी है, जो मानव-केंद्रित परिवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

रिपोर्ट के बारे में

  • तैयारी एवं दायरा: 10 अंतर-मंत्रालयी कार्य समूहों द्वारा 18 महीनों में तैयार की गई यह रिपोर्ट, दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन मार्गों का भारत का पहला सरकार-प्रेरित, बहु-क्षेत्रीय मूल्यांकन है।
  • कार्यप्रणाली: इसमें विश्लेषणात्मक मॉडलिंग का उपयोग किया गया है, ताकि यह परखा जा सके कि ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ, मौजूदा नीतियाँ और अतिरिक्त उपाय—जैसे तीव्र विद्युतीकरण और चक्रीय अर्थव्यवस्था पद्धतियाँ आर्थिक वृद्धि को पर्यावरणीय स्थिरता के साथ कैसे संतुलित कर सकती हैं।
  • परिणाम: यह विकास-प्रथम” किंतु न्यायसंगत और संतुलित परिवर्तन पर बल देती है तथा यह संकेत करती है कि विभिन्न जलवायु परिदृश्यों में भीविकसित भारत 2047’ प्राप्त किया जा सकता है।

PWOnlyIAS विशेष

कृषि की परिभाषा

  • खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, कृषि “मृदा को जोतने, फसलों का उत्पादन करने और पशुपालन करने का विज्ञान, कला और अभ्यास है।”
  • यह कृषि से संबंधित विशिष्ट गतिविधियों, जैसे-फसल उगाना और पशुपालन करना, पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है।

वित्तीय एवं प्रशासनिक ढाँचा (वित्तीय वर्ष 2025-26)

  • वित्तीय आवंटन: सरकार ने पर्याप्त धनराशि आवंटित की है, जिसमें ग्रामीण विकास मंत्रालय के लिए 1,90,405.53 करोड़ रुपये तथा कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के लिए 1,37,756.55 करोड़ रुपये शामिल हैं। यह कुल राष्ट्रीय बजट का 2.71% है।
  • केंद्र–राज्य समन्वय: हालाँकि कृषि राज्य का विषय है, फिर भी केंद्र सरकार उभरती क्षेत्रीय चुनौतियों के अनुरूप समय-समय पर समीक्षा की जाने वाली प्राथमिकताओं के माध्यम से राज्यों के प्रयासों को सहयोग देती है।
  • आधुनिकीकरण के स्तंभ: वर्तमान नीति जोखिम न्यूनीकरण (फसल बीमा के माध्यम से), डिजिटल कृषि, और ज्ञान सशक्तीकरण (विस्तार सेवाओं के माध्यम से) पर केंद्रित है, ताकि बाजार तक पहुँच सुधरे और खेती की कुल लागत कम हो।

रिपोर्ट की प्रमुख विशेषताएँ

  • मुख्य रणनीतिक दृष्टिकोण
    • अनुकूलन-प्रथम ढाँचा: यह रिपोर्ट अनुकूलन-प्रथम मार्गों को प्राथमिकता देती है, जो सबसे पहले किसानों की आजीविका, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा लचीलापन सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसमें जलवायु शमन को मुख्य कारक के स्थान पर एक महत्त्वपूर्ण सह-लाभ माना गया है।
    • हरित क्रांति से आगे संक्रमण: यह हरित क्रांति मॉडल से हटकर एक नए प्रतिमान का समर्थन करती है, जो केवल अनाज आत्मनिर्भरता पर केंद्रित था और अब उत्पादकता, सतत् प्राकृतिक संसाधन उपयोग तथा जलवायु अनुकूलन के संतुलन पर बल देता है।

  • मॉडलिंग परिदृश्य: रिपोर्ट भविष्य के परिणामों का अनुमान लगाने हेतु दो प्रमुख हितधारक-आधारित परिदृश्यों का विश्लेषण करती है:
    • वर्तमान नीति परिदृश्य (CPS): यह परिदृश्य मौजूदा सरकारी कृषि नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन को उनके वर्तमान लक्षित स्तरों पर मानकर चलता है।
    • नेट जीरो परिदृश्य (NZS): यह एक परिवर्तनकारी मार्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें मौजूदा और नई दोनों नीतियों को तीव्रता से अपनाकर संसाधन दक्षता, कृषि उत्पादकता और जलवायु अनुकूलन में वृद्धि होती है।

  • प्रमुख शमन हस्तक्षेप: NZS के अंतर्गत नौ प्रमुख हस्तक्षेपों का रणनीतिक विस्तार, CPS की तुलना में वर्ष 2070 तक लगभग 26% गैर-ऊर्जा आधारित शमन सह-लाभ प्रदान कर सकता है।

    • फसल विविधीकरण: धान, गेहूँ और गन्ने जैसी अधिक जल-खपत वाली फसलों से क्षेत्रफल को हटाकर (वर्ष 2070 तक 20% तक) दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों की ओर स्थानांतरण को प्रोत्साहित करना।
    • प्राकृतिक एवं रसायन-मुक्त कृषि: वर्ष 2070 तक कुल बोए गए क्षेत्र का 25% कृषि-पारिस्थितिकी पद्धतियों के अंतर्गत लाने का लक्ष्य, जिसमें कृत्रिम रसायनों के स्थान पर जैव-आधारित विकल्पों का प्रयोग किया जाए।

    • निरंतर धान की कृषि: धान की प्रत्यक्ष बुवाई और धान सघनता प्रणाली जैसी पद्धतियों का विस्तार, जिससे धान के खेतों से मेथेन उत्सर्जन में 59% तक कमी लाई जा सके।
    • उर्वरक उपयोग दक्षता: नीम-लेपित यूरिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परिशुद्ध कृषि जैसी तकनीकों के माध्यम से वर्ष 2070 तक पोषक तत्त्व अवशोषण में 50% तक की वृद्धि करना।

    • पशुधन उत्पादकता: दुधारू गोवंश की उत्पादकता को 15 किलोग्राम प्रति पशु प्रतिदिन तक बढ़ाना तथा बेहतर पशु स्वास्थ्य और पोषण के माध्यम से दुधारू पशुओं की हिस्सेदारी को 55% तक बढ़ाना।
  • ऊर्जा संक्रमण की प्रमुख विशेषताएँ
    • दक्षता-प्रथम रणनीति: यह रिपोर्ट संसाधन-कुशल पद्धतियों जैसे सूक्ष्म सिंचाई और सटीक समय-सारिणी को प्राथमिकता देने पर बल देती है, ताकि कुल ऊर्जा माँग में हो रही वृद्धि को नियंत्रित किया जा सके।

    • स्वच्छ ऊर्जा को अपनाना: सिंचाई में उपयोग होने वाले ईंधन मिश्रण में बड़े परिवर्तन का प्रस्ताव किया गया है, जिसमें वर्ष 2070 तक NZS के अंतर्गत 60% सौर पंप हिस्सेदारी का लक्ष्य रखा गया है, तथा भूमि तैयारी को लगभग 99% विद्युत यंत्रीकरण की ओर स्थानांतरित करने का लक्ष्य है।

  • रणनीतिक सिफारिशें
    • कृषि-खाद्य प्रणाली दृष्टिकोण: यह रिपोर्ट आपूर्ति-पक्षीय उपायों से आगे बढ़कर माँग-पक्षीय परिवर्तनों को शामिल करने का सुझाव देती है, जैसे- सार्वजनिक वितरण प्रणाली में मोटे अनाजों को शामिल करना, ताकि बाजार की माँग को प्रोत्साहित किया जा सके और फसल पैटर्न में बदलाव के लिए प्रेरणा मिले।

    • नीतिगत एकीकरण: यह भूमि, ऊर्जा और जल प्रणालियों में समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती है, ताकि समझौतों का प्रबंधन किया जा सके, जैसे- संसाधन क्षय को रोकने के लिए सौर सिंचाई को भूजल शासन से जोड़ना।
    • चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था: बाह्य-स्थल प्रबंधन और विविधीकृत कृषि आय स्रोतों के माध्यम से वर्ष 2070 तक कृषि अपशिष्ट दहन में 60% की कमी लाने के प्रयासों का विस्तार करेगा।

प्रशासन संबंधी समन्वय – सोलराइजेशन और भूजल के बीच संतुलन

नीति आयोग 2026 रिपोर्ट की एक प्रमुख सिफारिशअप्रतिबंधित संसाधन पहुँच” से विनियमित संसाधन प्रबंधन की ओर संक्रमण है।

  • कुसुम विरोधाभास-ऊर्जा बनाम जल: प्रधानमंत्री-कुसुम योजना कृषि क्षेत्र के डीकार्बनाइजेशन के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह एक गंभीर प्रशासनिक चुनौती भी प्रस्तुत करती है।
    • असीमित पंपिंग” का जोखिम: किसानों कोमुफ्त” या अत्यधिक सब्सिडी वाली सौर ऊर्जा उपलब्ध कराने से पानी पंप करने की सीमांत लागत लगभग शून्य हो जाती है।
      • कठोर भूजल प्रशासन के अभाव में, इससे जलभृतों का अत्यधिक दोहन हो सकता है, क्योंकि अब न तो अधिक बिजली बिल आता है और न ही सीमित बिजली आपूर्ति का समय, जो प्राकृतिक बाधा का कार्य करता था।
    • नीतिगत समझौता: नीति आयोग चेतावनी देता है कि सोलराइजेशन अनभिज्ञता से जल-भूवैज्ञानिक क्षरण का कारण नहीं बनना चाहिए।
  • नेट जीरो के लिए रणनीतिक सुरक्षा उपाय: इस जोखिम को कम करने हेतु निम्नलिखित प्रशासनिक हस्तक्षेप प्रस्तावित किए गए हैं:
    • अनिवार्य स्मार्ट मीटरिंग: सभी सौर पंपों पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम स्मार्ट मीटरों को लागू करना, ताकि वास्तविक समय में जल निष्कर्षण की निगरानी की जा सके।
      • इससेऊर्जा लेखांकन” संभव होता है, जहाँ अतिरिक्त बिजली को तभी ग्रिड द्वारा खरीदा जाएगा, जब जल निष्कर्षण सतत् सीमा के भीतर रहेगा।
    • फीडर पृथक्करण: ‘फीडर-स्तरीय सोलराइजेशन’ दृष्टिकोण को लागू करना, जिससे बिजली उपलब्धता की अवधि पर केंद्रीकृत नियंत्रण संभव हो और यह वास्तविक फसल जल आवश्यकताओं के अनुरूप रहे।
    • जल बचत” को प्रोत्साहन: बचाए गए जल को वित्तीय संपत्ति के रूप में मानना। जो किसान सूक्ष्म सिंचाई का उपयोग करके अपनी जल कोटा” सीमा से कम जल का उपयोग करते हैं, उन्हें ग्रिड को बेची गई अतिरिक्त सौर ऊर्जा पर अधिक फीड-इन-टैरिफ’ प्राप्त हो सकता है।

नेट जीरो क्या है?

  • अर्थ: ‘नेट जीरो’ का अर्थ जलवायु तटस्थता की वह स्थिति है, जहाँ मानव गतिविधियों से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा वायुमंडल से हटाई गई मात्रा के बराबर होती है।
    • यह शून्य उत्सर्जन” नहीं है (जिसका अर्थ बिल्कुल भी प्रदूषण न होना है), बल्कि एक नेट-जीरो’ स्थिति है।
    • इसे एक वित्तीय लेखा-बही की तरह समझें, आपका व्यय (कार्बन उत्सर्जन) आपकी आय’ (कार्बन आउटपुट) से अधिक नहीं होना चाहिए।
    • वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए, विश्व को वर्ष 2050 तक यह संतुलन प्राप्त करना होगा।

  • कृषि में, नेट जीरो का अर्थ धान, पशुधन, उर्वरकों और ऊर्जा उपयोग से होने वाले उत्सर्जन को कम करना तथा मृदा और जैव-भार में कार्बन भंडारण को बढ़ाना है।
  • नेट जीरो’ के छह स्तंभ
    • नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण: ‘नेट जीरो’ की आधारशिला विद्युत क्षेत्र का पूर्ण रूपांतरण है।
      • इसके लिए जीवाश्म ईंधन दहन कोजीरो कार्बन स्रोतों’ मुख्यतः सौर, पवन और परमाणु द्वारा प्रतिस्थापित करना आवश्यक है, ताकि उपयोग की जाने वाली बिजली से नया कार्बन वायुमंडल में निष्कासित न हो।
    • अवसंरचना का विद्युतीकरण: जब ग्रिड स्वच्छ हो जाए, तब सभी संभावित मशीनों को उस पर संचालित करना आवश्यक है।
      • इसमें परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल और भवनों के लिए हीट पंप शामिल हैं, जिससे हमारा दैनिक जीवन नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड से जुड़ जाता है।
    • औद्योगिक नवाचार: इस्पात, सीमेंट और रसायन जैसे कुछ क्षेत्र ऐसी प्रक्रियाओं पर निर्भर हैं जिन्हें सीधे विद्युत-आधारित प्रणालियों से संचालित करना सरल नहीं है।
      • इन्हें हरित हाइड्रोजन और वैकल्पिक ईंधनों की आवश्यकता होती है, ताकि उच्च ताप निर्माण के दौरान होने वालेप्रक्रिया उत्सर्जन” को समाप्त किया जा सके।
    • कार्बन हटाने की प्रौद्योगिकियाँ: जिन उत्सर्जनों को समाप्त नहीं किया जा सकता, उन्हें संतुलित करने के लिए नकारात्मक उत्सर्जन तकनीकों का उपयोग आवश्यक है।
      • इसमें प्रत्यक्ष वायु अवशोषण (DAC) और स्रोत पर कार्बन प्रग्रहण एवं भंडारण (CCS) शामिल हैं।
    • प्रकृति-आधारित कार्बन संचयन: यह स्तंभ पृथ्वी की प्राकृतिक कार्बन भंडारण क्षमता का उपयोग करता है।
      • इसमें बड़े पैमाने पर वनीकरण, जैव विविधता संरक्षण तथा आर्द्रभूमि और पीटलैंड की पुनर्स्थापना शामिल है, जो अत्यधिक प्रभावी जैविक कार्बन स्पंज के रूप में कार्य करते हैं।
    • संचालन दक्षता एवं कमी: ‘नेट जीरो’ की सबसे प्रत्यक्ष राह कुल ऊर्जा माँग को कम करना है।
      • इसमें चक्रीय अर्थव्यवस्था पद्धतियाँ तथा भवनों में ऊर्जा दक्षता उन्नयन शामिल हैं, ताकि उत्पादित स्वच्छ ऊर्जा की बर्बादी न हो।

भारत में कृषि परिदृश्य

  • जीविका का आधार: कृषि देश की प्रमुख आर्थिक गतिविधि बनी हुई है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 66% भारतीय जनसंख्या का समर्थन करती है तथा भोजन, रेशा और औद्योगिक कच्चे माल का मूल उत्पादक है।
    • आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26: कृषि और संबद्ध गतिविधियाँ भारत की राष्ट्रीय आय में लगभग पाँचवें हिस्से का योगदान देती हैं तथा लगभग 46.1% कार्यबल को रोजगार प्रदान करती हैं, जो समावेशी और संतुलित आर्थिक विकास में इस क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
    • पिछले पाँच वर्षों में, कृषि और संबद्ध क्षेत्र ने स्थिर मूल्यों पर लगभग 4.4% की औसत वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है, जो पूर्व अवधियों की तुलना में सर्वाधिक दशकीय वृद्धि है।
    • बागवानी का प्रदर्शन
      • बागवानी क्षेत्र एक उल्लेखनीय क्षेत्र के रूप में उभरा है, जो कृषि सकल मूल्य वर्द्धन का लगभग एक-तिहाई योगदान देता है और मात्रा के हिसाब से खाद्यान्न उत्पादन से आगे निकल चुका है।
      • वैश्विक स्थिति 
        • भारत सूखी प्याज का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है।
        • फल, सब्जियों और आलू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जो उच्च-मूल्य फसलों की ओर विविधीकरण को दर्शाता है।
  • कला और विज्ञान का उच्च-तकनीकी संगम: वर्ष 2026 तक, भारतीय कृषि पारंपरिक मृदा आधारित खेती से आगे बढ़कर एक परिष्कृत ‘कला और विज्ञान’ बन चुकी है, जो उच्च-उपज उत्पादकता को आक्रामक पर्यावरणीय पुनर्स्थापन के साथ संतुलित करती है।
  • उद्यमिता की ओर विकास: आत्मनिर्भर कृषि से वाणिज्यिक कृषि की ओर एक स्पष्ट संरचनात्मक परिवर्तन दिखाई देता है, जहाँ चाय (असम), कॉफी (कर्नाटक) और नारियल (केरल) जैसी फसलों को उच्च-मूल्य वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत किया गया है।

वित्तीय वर्ष 2025–26 के कृषि परिदृश्य की प्रमुख विशेषताएँ

  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: एग्रीस्टैक और भारत-विस्तार AI परामर्श के शुभारंभ ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है, जिससे 8.48 करोड़ से अधिक किसानों को ऋण तक सहज पहुँच और स्थानीय फसल परामर्श के लिए विशिष्ट डिजिटल पहचान प्रदान की गई है।
  • यंत्रीकरण और परिशुद्ध कृषि: भारत 47% यंत्रीकरण स्तर तक पहुँच चुका है और विश्व का सबसे बड़ा ट्रैक्टर बाजार है, हालाँकि वर्तमान ध्यान नमो ड्रोन दीदी” पहल के अंतर्गत ड्रोन जैसे उपकरणों की ओर स्थानांतरित हो गया है।
  • जैविक नेतृत्व की ओर संक्रमण: सिक्किम वैश्विक स्तर पर पहले 100% जैविक राज्य के रूप में मान्यता प्राप्त बना हुआ है, जबकि उत्तराखंड जैसे राज्य प्रीमियम जैविक बाजार को प्राप्त करने के लिए समान ढाँचों को तेजी से अपना रहे हैं।
  • ऊर्जा खपत और संक्रमण: कृषि भारत की कुल बिजली का लगभग 18% उपभोग करती है, जिससे कुसुम योजना के माध्यम से कार्बन-प्रधान ऊर्जा को सौर-संचालित सिंचाई पंपों से परिवर्तित करने  का एक बड़ा अवसर उत्पन्न होता है।

उत्सर्जन प्रवृत्ति और “द्वि-दशीय” जलवायु संबंध

  • ग्रीनहाउस गैस योगदान: यह क्षेत्र वर्तमान में भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 13–15% योगदान करता है, जो मुख्य रूप से पशुधन और धान की कृषि से उत्सर्जित मेथेन तथा उर्वरकों के उपयोग से उत्पन्न नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) के कारण है।

  • संवेदनशीलता का एक विशिष्ट विरोधाभास: औद्योगिक क्षेत्रों के विपरीत कृषि, विशिष्ट रूप सेद्वि-दिशीय” है, क्योंकि यह उन उत्सर्जनों से गंभीर रूप से प्रभावित होती है, जिनके उत्पादन में यह स्वयं योगदान देती है और अब भारत के 40% जिलों को “उच्च जलवायु जोखिम” क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • पशुधन और मेथेन की चुनौतियाँ: विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक होने के माध्यम से (वैश्विक उत्पादन में 25% योगदान), भारत को आँत्र किण्वन के प्रबंधन में एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है और यदि शमन रणनीतियों को तीव्र नहीं किया गया, तो पशुधन उत्सर्जन के बढ़ने की संभावना है।

कृषि क्षेत्र का महत्त्व 

यह क्षेत्र केवल कैलोरी का प्रदाता होने से आगे बढ़कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का “आधार स्तंभ” और वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख स्तंभ बन चुका है।

  • आर्थिक और आजीविका स्तंभ: यह भारत के सकल मूल्य वर्द्धन का 18–20% योगदान देता है और 46.1% कार्यबल के लिए प्रमुख नियोक्ता बना हुआ है। यह वैश्विक औद्योगिक अनिश्चितता के दौरान एक महत्त्वपूर्ण “आघात अवशोषक” के रूप में कार्य करता है।

  • उत्पादन नेतृत्व: भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक है (वैश्विक उत्पादन का 25%) तथा दलहन, मसालों और मोटे अनाजों के उत्पादन में अग्रणी है।
  • स्वच्छ ऊर्जा योगदानकर्ता: कृषि अब जैव-ईंधन के लिए एक प्रमुख कच्चा माल प्रदाता बन चुकी है, जो राष्ट्रीय एथेनॉल मिश्रण लक्ष्यों को प्राप्त करने और कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए आवश्यक है।
  • रणनीतिक वैश्विक प्रभाव: घरेलू खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर, भारत समुद्री उत्पादों, चाय और जैविक उत्पादों के एक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहा है, और कृषि कोसॉफ्ट पॉवर’ के एक उपकरण के रूप में उपयोग कर रहा है।
  • शमन क्षमता: रणनीतिक नीतिगत विस्तार से वर्ष 2070 तक लगभग 25% जलवायु शमन सह-लाभ प्राप्त होने का अनुमान है, साथ ही राष्ट्रीय उत्पादन में भी वृद्धि होगी।

कृषि से संबंधित भारत सरकार की महत्त्वपूर्ण पहलें

  • ई-नाम- राष्ट्रीय कृषि बाजार (eNAM): यह एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है, जो मौजूदा APMCs मंडियों को जोड़कर कृषि उत्पादों के लिए एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करता है।
  • राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन (NMSA): इसे विशेष रूप से वर्षा-आधारित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है, जिसमें एकीकृत कृषि, जल उपयोग दक्षता, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन तथा संसाधन संरक्षण के समन्वय पर ध्यान दिया गया है।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): इसेहर खेत को पानी’ के माध्यम से सिंचाई कवरेज बढ़ाने और प्रति बूँद अधिक फसल’ के माध्यम से जल उपयोग दक्षता में सुधार के उद्देश्य से तैयार किया गया है, जिसमें स्रोत निर्माण, वितरण, प्रबंधन, क्षेत्रीय उपयोग और विस्तार गतिविधियों का समग्र समाधान शामिल है।
  • परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): इसे वर्ष 2015 में शुरू किया गया था। यह केंद्र प्रायोजित योजना (CSS) के अंतर्गत राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन (NMSA) की मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (SHM) योजना का एक विस्तारित घटक है।
    • PKVY का उद्देश्य जैविक खेती को समर्थन और बढ़ावा देना है, जिससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होगा।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): यह सरकार द्वारा प्रायोजित एक फसल बीमा योजना है, जो कई हितधारकों को एक ही मंच पर एकीकृत करती है।
  • सूक्ष्म सिंचाई कोष (MIF): सरकार ने कृषि उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से अधिक भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाने के लिए नाबार्ड के अंतर्गत ₹5,000 करोड़ का एक समर्पित कोष स्वीकृत किया है।
  • डिजिटल कृषि: इसका उद्देश्य कृषि में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGPA) को सुदृढ़ करना है, जिसके तहत कृषि के लिए एक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना विकसित की जाएगी, ताकि प्रासंगिक सूचना सेवाओं के माध्यम से समावेशी और किसान-केंद्रित समाधान उपलब्ध कराए जा सकें।
  • नई कृषि निर्यात नीति: इसका उद्देश्य वर्तमान लगभग 30 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक कृषि निर्यात को वर्ष 2022 तक लगभग 60 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक तक दोगुना करना और इसके बाद आने वाले वर्षों में इसे 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाना है, एक स्थिर व्यापार नीति व्यवस्था के साथ।
    • निर्यात बास्केट और गंतव्यों में विविधता लाने तथा उच्च-मूल्य और मूल्यवर्द्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया गया है, विशेषकर शीघ्र नष्ट होने वाले उत्पादों पर।

प्रमुख चुनौतियाँ और प्रणालीगत बाधाएँ

वर्तमान में यह क्षेत्र विखंडित संरचनात्मक समस्याओं का सामना कर रहा है, जहाँ व्यक्तिगत समस्याएँ छोटी होती हैं, लेकिन उनका सामूहिक प्रभाव राष्ट्रीय विकास के लिए बड़े अवरोध उत्पन्न करता है।

  • जलवायु संवेदनशीलता और जल तनाव
    • उच्च-जोखिम जिले: लगभग 40% भारतीय जिले उच्च जलवायु जोखिम का सामना कर रहे हैं, जबकि 65% कृषि भूमि अभी भी वर्षा पर निर्भर है और अनियमित मानसून के प्रति संवेदनशील है।
    • आभासी जल निर्यात: भारत वर्तमान में प्रतिवर्ष 20 मिलियन टन (mt) जल-गहन चावल का निर्यात करता है। यह प्रभावी रूप से जल-संकटग्रस्त देश से अरबों लीटर भूजल का “निर्यात” है, जिससे दीर्घकालिक जल के भू-वैज्ञानिक क्षरण का खतरा बढ़ता है।

  • भूमि विखंडन और कृषि योग्य भूमि में कमी
    • शहरी अतिक्रमण: औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण कुल कृषि योग्य भूमि 180 मिलियन हेक्टेयर (mha) से घटकर 176 मिलियन हेक्टेयर (mha) हो गई है।
    • घटता प्रतिफल: औसत भूमि जोत घटकर 0.6–1.08 हेक्टेयर (ha) रह गई है। यह विखंडन पैमाने की अर्थव्यवस्था को रोकता है, जिससे भारी मशीनरी या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को अपनाना छोटे किसानों के लिए आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो जाता है।
  • उपज और उत्पादकता में अंतर
    • अधोउपयोगित परिसंपत्तियाँ: वैश्विक मानकों की तुलना में लगभग 66% उपज अंतर बना हुआ है। मानसून के बाद लगभग 12 मिलियन हेक्टेयर परती भूमि उपलब्ध होने के बावजूद, भारत दालों और तिलहनों की घरेलू मांग पूरी करने के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर बना हुआ है।
    • विशिष्ट अंतर: तिलहनों (18–40%) और दालों (31–37%) में उपज का अंतर अब भी अनसुलझा है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है और खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) में अल्प-निवेश
    • वित्तीय कमी: कृषि अनुसंधान एवं विकास में केवल ₹11,600 करोड़ (कृषि-GDP का 0.5%) का निवेश किया गया है।
    • इसके विपरीत, विकसित देश आमतौर पर 1.5% से 3% तक व्यय करते हैं, जिससे वे जैव-प्रौद्योगिकी और जलवायु-सहनशील बीजों पर व्यय के मामले में अग्रणी बने रहते हैं।
  • पोस्ट हार्वेस्ट’ हानि और बाजार अक्षमता
    • मूल्य ह्रास: अपर्याप्त कोल्ड चेन और खेत से थाली तक” शृंखला संबंधी लॉजिस्टिक्स के कारण प्रतिवर्ष ₹92,000 करोड़ से अधिक का नुकसान होता है, विशेषकर फलों और सब्जियों में।
    • पोषण परिवर्तन: जबकि उपभोक्ता माँग डेयरी, पोल्ट्री और बागवानी जैसे उच्च-मूल्य उत्पादों की ओर बढ़ रही है, नीतिगत ढाँचे अभी भी मुख्यतः अनाज पर केंद्रित हैं।

वैश्विक कार्रवाई और रणनीतिक पहलें

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोगी ढाँचे: भारत सतत् और लचीली खाद्य प्रणालियों के मानक तय करने हेतु वैश्विक मंचों का उपयोग करता है।
    • G20 कृषि कार्य समूह (AWG): भारत की अध्यक्षता के तहतएक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” विषय पर कार्यवाही, तथा खाद्य सुरक्षा एवं पोषण पर दक्कन उच्च-स्तरीय सिद्धांतों’ को बढ़ावा देना।
      • इसमें वर्ष 2030 तक खाद्य हानि और अपशिष्ट को 50% तक कम करने की वैश्विक प्रतिबद्धता शामिल है।
    • COP30 और बेलेम घोषणा:  कृषि को जलवायु एजेंडा के केंद्र में लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों के साथ रणनीतिक समन्वय।
      • इसमें वहनीय वित्त को मापनीय परिणामों से जोड़ना शामिल है, जैसे बहाल की गई भूमि के हेक्टेयर या संग्रहीत कार्बन की मात्रा।
    • क्वाड की कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ‘एंगेज’ पहल: भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के बीच एक साझेदारी (अगली पीढ़ी की कृषि को सशक्त बनाने हेतु नवाचारों को आगे बढ़ाना), जो इंडो पैसिफिक क्षेत्र में वास्तविक समय में फसल रोग पहचान और कीट प्रबंधन के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करती है।
  • वैश्विक प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान एवं विकास साझेदारियाँ: 11,600 करोड़ रुपये के अनुसंधान एवं विकास अंतराल को पाटने के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोग की आवश्यकता है।
    • अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पर परामर्शदात्री समूह (CGIAR): भारत इस नेटवर्क (जिसमें अंतरराष्ट्रीय अर्द्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान तथा अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान शामिल हैं) के साथ जैव-संवर्द्धित और जलवायु-सहिष्णु बीज विकसित करने के लिए साझेदारी करता है।
      • उदाहरण के लिए, वर्ष 2024 में 109 जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों का शुभारंभ ऐसे वैश्विक–स्थानीय अनुसंधान सहयोग का प्रत्यक्ष परिणाम था।
    • कृषि नवाचार मिशन: एक वैश्विक पहल, जिसका उद्देश्य 10 करोड़ किसानों तक डिजिटल जलवायु परामर्श सेवाएँ पहुँचाना है।
      • भारत अफ्रीका और एशिया के अन्य विकासशील देशों के साथ अपने कृषि-स्टैक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल साझा करके योगदान देता है।
    • एक देश एक प्राथमिक उत्पाद (OCOP): खाद्य और कृषि संगठन द्वारा संचालित एक कार्यक्रम, जो भारत को वैश्विक बाजारों में विशिष्ट भौगोलिक पहचान वाले विशेष कृषि उत्पादों (जैसे सहजन या मोटे अनाज) को बढ़ावा देने में सहायता करता है।
  • स्थिरता एवं संसाधन संरक्षण: अंतरराष्ट्रीय पहलें वैश्विक साझा संसाधनों, मृदा, जल और वायु के पुनर्स्थापन पर केंद्रित हैं।
    • भुखमरी और गरीबी के विरुद्ध वैश्विक गठबंधन: G-20 में प्रारंभ किया गया यह मंच विश्वभर में 10 करोड़ लघु किसानों का समर्थन करता है।
      • भारत अपने लखपति दीदी’ मॉडल के माध्यम से योगदान देता है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं को आत्मनिर्भर उद्यमी बनने के लिए सशक्त बनाता है।
    • विश्व बैंक की जलवायु-स्मार्ट कृषि: भारत जलवायु-स्मार्ट कृषि निवेश योजनाओं का उपयोग उन प्रथाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए करता है, जो एक साथ उत्पादकता बढ़ाती हैं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करती हैं, विशेषकर धान और पशुपालन में।
    • वेस्ट टू वेल्थ” आधारित चक्रीय अर्थव्यवस्था: जैव-उर्वरक उत्पादन में अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ बायोगैस स्लरी’ और फसल अवशेषों (जैसे धान का पुआल) को संसाधनों में बदलने का लक्ष्य रखती हैं, जिससे पराली जलाने जैसे पर्यावरणीय खतरों को नियंत्रित किया जा सके।

आगे की राह 

विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, कृषि क्षेत्र को “उत्पादन-केंद्रित” मॉडल से सतत् आय-केंद्रित” पारिस्थितिकी तंत्र की ओर स्थानांतरित होना होगा। इसके लिए इनपुट सब्सिडी से हटकर दीर्घकालिक निवेश-आधारित अवसंरचना की ओर एक मौलिक परिवर्तन आवश्यक है।

  • विविधीकरण एवं संसाधन संरक्षण
    • पुनर्संरेखण के माध्यम से आत्मनिर्भरता: जल गहन धान–गेहूँ चक्र से हटकर उच्च मूल्य वाली दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों की ओर संक्रमण। तिलहन आत्मनिर्भरता मिशन जैसे कार्यक्रम आयात निर्भरता को कम करेंगे, जबकि स्वदेशी बीज किस्में शुष्क क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाएँगी।
    • जल तटस्थता एवं “प्रति बूँद अधिक फसल” का लक्ष्य: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का विस्तार कर उत्पादन को भूजल दोहन से अलग करना। इसमें स्थायी धान कृषि तकनीकों, जैसे प्रत्यक्ष बीज वुबाई, का विस्तार शामिल है, जिससे मेथेन उत्सर्जन में लगभग 59% की कमी आएगी और अरबों लीटर जल की बचत होगी।
    • SKY मॉडल एवं भूजल शासन: कुसुम योजना का विस्तार कर सौर ऊर्जा को “द्वितीयक फसल” के रूप में विकसित करना।
      • संतुलन की चुनौती: निःशुल्क सौर ऊर्जा से उत्पन्न “असीमित पंपिंग” को रोकने हेतु नीति आयोग स्मार्ट मीटरिंग और ‘फीड-इन टैरिफ’ पर बल देता है, ताकि किसान अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचें और अत्यधिक जल दोहन से बचें।
  • नवाचार एवं प्रौद्योगिकी-आधारित सघनीकरण
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (एग्री-स्टैक): डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परामर्श के माध्यम से मृदा की गुणवत्ता और मौसम की वास्तविक समय जानकारी प्रदान करना, जिससे 8 करोड़ से अधिक किसानों के लिए भौतिक–डिजिटल अंतराल को पाटा जा सके।
    • अनुसंधान एवं विकास निवेश को दोगुना करना: अनुसंधान एवं विकास व्यय को कृषि सकल घरेलू उत्पाद के 0.5% से बढ़ाकर 1.5% करना। उच्च उपज देने वाली और जलवायु-सहिष्णु बीज किस्मों पर ध्यान केंद्रित करना, जो वर्ष 2047 तक अनुमानित ‘हीट स्ट्रेस’ को सहन कर सकें।
    • मृदा की “कार्बन अवशोषण” क्षमता: शुद्ध बोए गए क्षेत्र के 25% तक प्राकृतिक खेती का विस्तार करना। रासायनिक पदार्थों के स्थान पर जैविक पदार्थ अपनाकर कृषि एक विशाल कार्बन अवशोषक बन सकती है, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ा सकती है और कार्बन क्रेडिट के माध्यम से नई आय उत्पन्न कर सकती है।
  • संस्थागत एवं संरचनात्मक सुधार
    • विस्तार सेवा 2.0 एवं ज्ञान समानता: कृषि विज्ञान केंद्रों को पुनर्जीवित कर प्रयोगशाला से खेत तक की दूरी को कम करना। (टिप्पणी: यहाँ निवेश किए गए प्रत्येक 1 रुपये पर कृषि उत्पादकता में 7 रुपये का प्रतिफल मिलता है।)
    • सामूहिक सौदेबाजी (किसान उत्पादक संगठन): 10,000 किसान उत्पादक संगठनों की योजना का विस्तार कर छोटे किसानों को संगठित करना। इससे किसान मूल्य ग्रहणकर्ता” से मूल्य निर्धारक” बनेंगे और वैश्विक मूल्य शृंखला में अधिक हिस्सा प्राप्त करेंगे।
    • सहायक क्षेत्रों का समन्वय: पशुपालन, मत्स्यपालन और कुक्कुट पालन को प्राथमिकता देना। प्रति पशु प्रतिदिन दुग्ध उत्पादन को 15 किलोग्राम तक बढ़ाने से फसल विफलता की स्थिति में वित्तीय सुरक्षा और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
  • निवेश एवं अनुकूलन की वास्तविकता: खाद्य सुरक्षा और कार्बन तटस्थता के इस दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वर्ष 2070 तक लगभग 22.7 ट्रिलियन डॉलर के संचयी निवेश की आवश्यकता होगी। नीति आयोग का अनुकूलन-प्रथम दृष्टिकोण” यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक डॉलर लघु और सीमांत किसानों की आजीविका को प्राथमिकता दे तथा कार्बन न्यूनीकरण को समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण सह-लाभ माने।

निष्कर्ष

नीति आयोग की वर्ष 2026 की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत की नेट जीरो यात्रा विकास के साथ समझौता नहीं, बल्कि उसकी पूर्व शर्त है। कृषि क्षेत्र के लिए लक्ष्य केवलकार्बन न्यूनीकरण” नहीं, बल्कि “हरित विकास” है, जहाँ उत्सर्जन में कमी, बेहतर उत्पादन, अधिक किसान आय और एक सुदृढ़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सह-लाभ के रूप में प्राप्त होती है।

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