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Feb 17 2026

संदर्भ

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की एक समग्र मानसिक स्वास्थ्य नीति का प्रारूप तैयार कर रहा है, जिसका उद्देश्य छात्र सहायता तंत्र को सुदृढ़ करना तथा अन्य IITs के लिए एक आदर्श मॉडल स्थापित करना है।

SAHYOG 1.0

पहला अंतर-IIT परामर्श था, जिसका उद्देश्य IIT परिसरों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों और कल्याण ढाँचों को सुदृढ़ करने हेतु संवाद तथा सहयोग की शुरुआत करना था।

SAHYOG 2.0

एक अंतर-IIT संवाद पहल है, जिसका लक्ष्य विभिन्न IITs में प्रचलित मानसिक स्वास्थ्य प्रशासनिक संरचनाओं से श्रेष्ठ प्रथाओं का आदान-प्रदान और उनसे सीख प्राप्त करना है।

संबंधित तथ्य

  • अंतर-IIT परामर्श – SAHYOG 2.0: इस प्रयास को “SAHYOG 2.0” के माध्यम से और सुदृढ़ किया गया।
  • संस्थान के कल्याण केंद्र द्वारा छात्र कल्याण अधिष्ठाताओं, मनोवैज्ञानिकों, बाहरी विशेषज्ञों तथा संकाय सदस्यों से परामर्श के पश्चात् तैयार प्रथम मसौदा संतुलित एवं पेशेवर दृष्टिकोण पर आधारित है।

मानसिक स्वास्थ्य क्या है?

  • मानसिक स्वास्थ्य मानसिक कुशलता (Mental well-being) की वह अवस्था है, जो व्यक्ति को जीवन के तनावों से निपटने, अपनी क्षमताओं को साकार करने, प्रभावी ढंग से सीखने और कार्य करने तथा समुदाय में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनाती है।
  • यह स्वास्थ्य और कल्याण का अभिन्न घटक है, जो व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से निर्णय लेने, संबंध बनाने और अपने परिवेश को आकार देने की हमारी क्षमताओं का आधार है।
  • मानसिक स्वास्थ्य एक मौलिक मानव अधिकार है।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रमुख आयाम

  • भावनात्मक कल्याण: भावनाओं को समझने, नियंत्रित करने और प्रभावी रूप से व्यक्त करने की क्षमता। इसमें तनाव प्रबंधन, विभिन्न भावनाओं का अनुभव और जीवन की चुनौतियों का सामना करना शामिल है।
  • मनोवैज्ञानिक कल्याण: आत्म-मूल्यबोध, आत्म-समझ और विचारों व भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता से संबंधित है।
  • सामाजिक कल्याण: स्वस्थ संबंध स्थापित करना, दूसरों के साथ प्रभावी संवाद करना और समाज में सकारात्मक योगदान देना।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित प्रमुख आँकड़े

  • मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का प्रसार: राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) 2015-16 के अनुसार, भारत में लगभग 15 करोड़ वयस्क किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रस्त हैं और उन्हें मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है।
    • भारत में 13–17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 7.3% किशोर गंभीर मानसिक रोग से प्रभावित हैं।
  • आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य: वर्ष 2018 से 2022 के बीच मानसिक स्वास्थ्य संबंधी आत्महत्याओं में 44% की वृद्धि दर्ज की गई है।
    • वर्ष 2022 में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कारणों से 10,365 पुरुष (लगभग 72%) और 4,234 महिलाएँ (लगभग 28%) आत्महत्या का शिकार हुईं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य हेतु सरकारी पहलें एवं नीतियाँ

  • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP, 1982)
    • उद्देश्य: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से सुलभ एवं किफायती मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना।
    • मुख्य घटक
      • जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP): 743 जिलों में परामर्श, संकट-हस्तक्षेप (Crisis intervention) तथा सामुदायिक पहुँच सेवाएँ प्रदान करना।
      • मानव संसाधन विकास: सामान्य चिकित्सकों को मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षण प्रदान करना।
  • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति, 2014
    • लक्ष्य: मानसिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करना, मानसिक रोगों की रोकथाम करना तथा उपचार तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करना।
    • प्राथमिकता क्षेत्र: संवेदनशील एवं वंचित समूह, सामुदायिक सहभागिता, उपेक्षा में कमी, मानवाधिकारों का संरक्षण करना।
    • यह नीति विश्व स्वास्थ्य संगठ की व्यापक मानसिक स्वास्थ्य कार्य योजना 2013–2030 के अनुरूप है।
  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 
    • आत्महत्या का अपराधमुक्तीकरण: आत्महत्या का प्रयास अब दंडनीय अपराध नहीं है।
    • अधिकार-आधारित दृष्टिकोण: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को एक मौलिक अधिकार के रूप में सुनिश्चित किया गया है।
    • बीमा समानता (Insurance Parity): मानसिक रोगों के उपचार को शारीरिक रोगों के समकक्ष बीमा कवरेज प्रदान करना अनिवार्य किया गया है।
    • पूर्व-निर्देश (Advance Directives): व्यक्तियों को अपने उपचार संबंधी प्राथमिकताओं को पूर्व-निर्धारित करने का अधिकार प्रदान किया गया है।

  • उपचार में अंतराल: भारत में मानसिक विकारों के उपचार में गंभीर अंतराल विद्यमान है। शराब सेवन विकार (Alcohol use disorders) के मामले में उपचार अंतराल लगभग 86% तक है, जबकि अन्य मानसिक विकारों के लिए यह 60% से अधिक है (मिर्गी को छोड़कर)।
    • केवल 29% मनोविकृति (psychosis) से ग्रस्त व्यक्तियों तथा लगभग एक-तिहाई अवसाद से प्रभावित लोगों को औपचारिक मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त होती हैं।
  • मनोचिकित्सकों की उपलब्धता एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच: भारत में प्रति 1 लाख जनसंख्या पर मात्र 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित मानक (प्रति 1 लाख पर 3 मनोचिकित्सक) से काफी कम है।
    • मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की भारी कमी एक गंभीर चुनौती है। जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अनुमानतः 30,000 मनोचिकित्सक, 37,000 मनोरोग नर्सें तथा 38,000 नैदानिक मनोवैज्ञानिकों की आवश्यकता है।
  • कोविड-19 महामारी का प्रभाव: कोविड-19 महामारी ने मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया। वर्ष 2020 में आत्महत्या से संबंधित मानसिक स्वास्थ्य मृत्यु के मामलों में वर्ष 2019 की तुलना में 25% की वृद्धि दर्ज की गई।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित चुनौतियाँ

  • मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी उपेक्षा: भारत के अनेक क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य अब भी वर्जित विषय माना जाता है। मानसिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है, जिससे वे सहायता लेने से हिचकिचाते हैं।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन की व्यापक मानसिक स्वास्थ्य कार्य योजना (2013-2030) में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में उपेक्षा को वैश्विक स्तर पर एक महत्त्वपूर्ण बाधा के रूप में उजागर किया गया है। भारत में, यह मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की कम रिपोर्टिंग का कारण बनता है और उपचार में देरी में योगदान देता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच: WHO के मेंटल हेल्थ एटलस के अनुसार, निम्न-आय वाले देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, में गंभीर मानसिक समस्याओं से ग्रस्त 85% लोग आवश्यक उपचार प्राप्त नहीं कर पाते।
  • सीमित मानसिक स्वास्थ्य कार्यबल: भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की गंभीर कमी है। प्रति 1 लाख जनसंख्या पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जो WHO के अनुशंसित मानक से बहुत कम है।

आगे की राह

  • मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करना: शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की संख्या बढ़ाएँ और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को एकीकृत करने पर विशेष ध्यान देना।
    • सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की स्थापना करें ताकि पहुँच सुनिश्चित हो सके और बड़े संस्थानों पर निर्भरता कम हो सके।
  • वित्तपोषण और संसाधनों में वृद्धि करना: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वित्त को प्राथमिकता देना और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति के कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त संसाधन सुनिश्चित करना।
    • मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और परामर्शदाताओं जैसे मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के प्रशिक्षण के लिए धन आवंटित करें, विशेष रूप से ग्रामीण और कम सुविधा प्राप्त क्षेत्रों में।
  • रोकथाम और प्रारंभिक हस्तक्षेप पर ध्यान केंद्रित करना: मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े उपेक्षा को कम करने और लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करने के लिए राष्ट्रव्यापी मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान संचालित करना और समस्याओं की शीघ्र पहचान पर विशेष ध्यान देना।
    • व्यक्तियों को समस्याओं से निपटने के कौशल और उपलब्ध संसाधनों के ज्ञान से लैस करने के लिए स्कूलों और कार्यस्थलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम लागू करना।

रेनिसफ्यारा बीच (Reynisfjara Beach)

 

आइसलैंड के रेनिसफ्यारा बीच पर वर्ष 2025–2026 की सर्दियों के दौरान गंभीर तटीय कटाव के कारण तीव्र परिवर्तन हुए हैं।

रेनिसफ्यारा बीच के बारे में

  • अवस्थिति: आइसलैंड के दक्षिणी तट पर, माउंट रेनिसफ्याल की निम्न भूमि पर, उत्तरी अटलांटिक महासागर की ओर स्थित।
  • उत्पत्ति
    • काला ज्वालामुखीय रेत: अपरदित बेसाल्टिक लावा से निर्मित, जो इसे इसका विशिष्ट काला रंग प्रदान करता है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • ‘रेनिसड्रैंगर’ समुद्री स्तंभ: यहाँ प्रसिद्ध अपतटीय बेसाल्ट स्तंभ पाए जाते हैं, जिन्हें रेनिसड्रैंगर के नाम से जाना जाता है।
    • बेसाल्ट स्तंभ और गुफाएँ: ज्वालामुखीय गतिविधियों और तरंग आधारित अपरदन से बनी षट्भुजाकार बेसाल्ट संरचनाएँ और गुफाएँ।
    • पर्यटन: आइसलैंड के सबसे अधिक देखे जाने वाले प्राकृतिक आकर्षणों में से एक; फोटोग्राफी और भू-विज्ञान के लिए लोकप्रिय।
    • कटला यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क का हिस्सा: ज्वालामुखीय गतिविधियों से जुड़ी भू-वैज्ञानिक महत्ता के लिए मान्यता प्राप्त।
  • हालिया गंभीर कटाव (2025–26): पूर्वी पवनों और ऊँची लहरों के कारण तटरेखा में तीव्र संकुचन और भूस्खलन हुआ।
  • सुरक्षा जोखिम: खतरनाक “स्नीकर वेव्स” के लिए जाना जाता है, जो आगंतुकों को अचानक समुद्र में बहा सकती हैं।

माउंट रेनिसफ्याल

  • रेनिसफ्याल आइसलैंड के दक्षिणी तट पर स्थित एक ज्वालामुखीय पर्वत है।
  • ऊँचाई: रेनिसफ्याल समुद्र तल से 340 मीटर (1,115 फीट) ऊँचा है।
  • भू-वैज्ञानिक संरचना: यह पर्वत ज्वालामुखीय चट्टानों और बेसाल्ट द्वारा निर्मित है, जो ज्वालामुखीय विस्फोटों के दौरान निर्मित हुए।

इंडो-पैकोम (INDO-PACOM)

अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड (इंडो-पैकोम) के प्रमुख ने ऑपरेशन सिंदूर की सराहना की और बदलती इंडो-पैसिफिक सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत–अमेरिका रक्षा सहयोग को और गहरा करने का आह्वान किया।

 इंडो-पैकोम के बारे में

  • संयुक्त राज्य अमेरिका का इंडो-पैसिफिक कमांड (इंडो-पैकोम) अमेरिका का एकीकृत कमांड है, जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सैन्य अभियानों के लिए जिम्मेदार है और विशाल समुद्री व रणनीतिक क्षेत्रों को शामिल करता है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका का इंडो-पैसिफिक कमांड (इंडो पैकोम), जिसे मूल रूप से यू.एस. पैसिफिक कमांड (पैकोम) के रूप में स्थापित किया गया था, 1 जनवरी, 1947 को स्थापित हुआ था।
  • प्रतिभागी: इंडो-पैकोम भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों सहित क्षेत्रीय सहयोगियों और भागीदारों के साथ निकटता से कार्य करता है।
    • भारत–अमेरिका रक्षा सहयोग टाइगर ट्रायंफ, मालाबार, कोप इंडिया और रिमपैक जैसे संयुक्त अभ्यासों के माध्यम से विस्तारित हुआ है, साथ ही अपाचे हेलीकॉप्टरों और समुद्री प्लेटफॉर्म जैसे रक्षा अधिग्रहण भी किए गए हैं।
  • फोकस क्षेत्र: यह कमांड प्रतिरोधक क्षमता, समुद्री सुरक्षा और स्वतंत्र एवं मुक्त इंडो-पैसिफिक को बनाए रखने पर बल देता है।
    • मुख्य क्षेत्रों में समुद्री क्षेत्र जागरूकता, पनडुब्बी निगरानी, अंतरिक्ष और प्रतिअंतरिक्ष संचालन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और एकीकृत मार्ग आधारित प्रहार क्षमताएँ शामिल हैं।

महत्त्व

‘इंडो-पैकोम’ विशेष रूप से चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति के मध्य इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा को संतुलित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

AI इंपैक्ट समिट 2026

भारत ने नई दिल्ली में चौथे AI इंपैक्ट समिट 2026 की मेजबानी की, जो ग्लोबल साउथ में आयोजित होने वाला इस प्रकार का पहला वैश्विक AI सम्मेलन है।

AI समिट के बारे में

  • AI इंपैक्ट समिट एक बहुपक्षीय मंच है, जो सरकारों, वैश्विक प्रौद्योगिकी नेताओं, उद्योग और नागरिक समाज को एक साथ लाकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की परिवर्तनकारी क्षमता और उसके शासन से जुड़ी चुनौतियों पर विचार-विमर्श करता है।
  • AI समिट की शुरुआत
    • नवंबर 2023 में यूनाइटेड किंगडम के ब्लेचली पार्क में आयोजित AI सेफ्टी समिट में AI सुरक्षा जोखिमों की पहचान पर केंद्रित ऐतिहासिक ब्लेचली घोषणा को अपनाया गया।
      • भारत 28 मूल हस्ताक्षरकर्ता देशों और यूरोपीय संघ में से एक था।
    • मई 2024 में सियोल समिट ने सुरक्षा के साथ-साथ नवाचार और समावेशन को भी चर्चा में शामिल किया।
    • फरवरी 2025 में पेरिस AI एक्शन समिट ने व्यावहारिक कार्यान्वयन और आर्थिक अवसरों पर बल दिया।
  • AI इंपैक्ट समिट 2026: वर्ष 2026 संस्करण 16–20 फरवरी तक भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है।
    • यह AI समिट शृंखला का चौथा सम्मेलन है।
  • AI इंपैक्ट समिट, 2026 के तीन मुख्य लक्ष्य
    • लोगों को सशक्त बनाने और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए AI का उपयोग।
    • पूरी दुनिया के लिए AI सेवा प्रदाता के रूप में भारत को प्रस्तुत करना, और
    • कंप्यूट, डेटासेट और एल्गोरिदम तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण करना।
  • समिट का उद्देश्य है
    • आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के लिए AI की क्षमता को खोलना।
    • समावेशी और जिम्मेदार AI परिनियोजन को बढ़ावा देना।
    • AI सुरक्षा मानकों और शासन ढाँचों पर वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करना।
    • स्वास्थ्य, शिक्षा और शहरी शासन जैसी सार्वजनिक सेवाओं में AI अनुप्रयोगों को बढ़ावा देना।
  • थीम: सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय (सभी का कल्याण, सभी का सुख)
  • सूत्र: भारत के तीन सूत्र — पीपुल, प्लैनेट एंड प्रोग्रेस — पर केंद्रित।
    • समिट विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए समान पहुँच, सतत् विकास और नवाचार-प्रेरित वृद्धि पर बल देता है।
  • पूर्व समिट: यह समिट AI शासन पर विकसित होती अंतरराष्ट्रीय चर्चा का नवीनतम अध्याय है।
    • पूर्ववर्ती AI समिट यूनाइटेड किंगडम, दक्षिण कोरिया और पेरिस, फ्राँस में आयोजित किए गए थे, जो AI सुरक्षा, नैतिकता और नियामक सहयोग पर केंद्रित थे।

केरल विजन 2031

केरल ने तीन दिवसीय ‘विजन 2031: इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन डेवलपमेंट एंड डेमोक्रेसी’ का उद्घाटन किया।

  • केरल की मानव विकास उपलब्धियाँ आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के एक नए चरण की नींव हैं, न कि अंतिम लक्ष्य।
  • यह विजन वर्ष 2031 में केरल के 75वें वर्ष की तैयारी का उद्देश्य रखता है।

मुख्य विजन

  • ज्ञान-आधारित उत्पादक अर्थव्यवस्था: प्रौद्योगिकी, अनुसंधान और कुशल मानव संसाधन का उपयोग कर उच्च-मूल्य, नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण।
  • समावेशी और न्यायसंगत समाज: विकास को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ना, समानता, कल्याण संरक्षण और सहभागी लोकतंत्र सुनिश्चित करना।
  • जलवायु सहनशीलता और स्थिरता: पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु अनुकूलन पर बल, चरम मौसमी घटनाओं के प्रति केरल की संवेदनशीलता को मान्यता देना।
  • लोकतांत्रिक और परामर्शात्मक शासन: विचार-विमर्श आधारित लोकतंत्र, विकेंद्रीकृत योजना और नीति निर्माण में नागरिक सहभागिता को बढ़ावा देना।

विजन के समक्ष चुनौतियाँ

  • मानव विकास के केरल मॉडल को वैश्विक रूप से संदर्भित ढाँचे के रूप में सुदृढ़ करते हुए राजकोषीय सीमाएँ और उधारी संबंधी प्रतिबंध।

महत्त्व

विजन 2031 आधुनिकीकरण और मानवीय मूल्यों के बीच, तथा प्रौद्योगिकी और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने का एक रोडमैप प्रस्तुत करता है।

माघ मेला 2026

प्रयागराज में महाशिवरात्रि के अवसर पर संगम पर 40 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया, जिससे माघ मेला 2026 का समापन हुआ।

माघ मेले के बारे में

  • परिचय: माघ मेला एक वार्षिक हिंदू धार्मिक समागम है, जो प्रयागराज में पवित्र त्रिवेणी संगम (गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदियों का संगम) पर हिंदू माह माघ (जनवरी–फरवरी) के दौरान आयोजित होता है।
  • आवृत्ति: यह प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाली 45 दिनों की वार्षिक तीर्थयात्रा है।
    • यह प्रत्येक चार वर्ष में कुंभ मेला बन जाता है।
    • यह प्रत्येक बारह वर्ष में महाकुंभ मेला बन जाता है।
  • माघ मेला 2026 समारोह: वर्ष 2026 के मेले में भारी भागीदारी देखी गई, जिसमें पूरे उत्सव के दौरान 22 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया और समापन दिवस पर, जो महाशिवरात्रि के साथ संयोगित था, 40 लाख लोगों ने पवित्र स्नान किया।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: माघ मेला आध्यात्मिक शुद्धि, तपस्या और सनातन परंपराओं में आस्था का प्रतीक है। संगम में स्नान को पापों की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम माना जाता है।

माघ मेला भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत, तीर्थ अर्थव्यवस्था और बड़े पैमाने पर भीड़ प्रबंधन क्षमताओं का प्रतिनिधित्व करता है और प्रायः बड़े कुंभ मेला आयोजनों का पूर्वाभ्यास होता है।

LHS 1903 प्रणाली

वैज्ञानिकों ने ESA के चीओप्स उपग्रह का उपयोग करते हुए LHS 1903 के चारों ओर एक असामान्य ग्रह व्यवस्था की खोज की, जो पारंपरिक ग्रह-निर्माण सिद्धांतों को चुनौती देती है।

LHS 1903 प्रणाली के बारे में

  • LHS 1903 एक दूरस्थ ग्रह प्रणाली है, जो एक ठंडे M-ड्वार्फ (रेड ड्वार्फ) तारे की परिक्रमा करती है। इसका अध्ययन यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के चीओप्स (CHaracterising ExOPlanet Satellite) द्वारा किया गया, जिसे ज्ञात एक्सोप्लैनेट्स का विश्लेषण करने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • असामान्य ग्रह व्यवस्था: पारंपरिक ग्रह मॉडल सुझाव देते हैं कि चट्टानी ग्रह तारों के निकट निर्मित होते हैं, जबकि गैस-समृद्ध ग्रह दूर निर्मित होते हैं।
    • हालाँकि, LHS 1903 में “इनसाइड-आउट” संरचना पाई गई है:
      • चट्टानी – गैसीय – गैसीय – चट्टानी।
    • सबसे बाहरी ग्रह, अपने तारे से दूर होने के बावजूद, चट्टानी प्रतीत होता है, जो स्थापित निर्माण पैटर्न के विपरीत है।
  • संभावित व्याख्या: वैज्ञानिकों ने टकराव के कारण वायुमंडलीय क्षरण और ग्रह के प्रवासन को खारिज कर दिया।
    • इसके बजाय, उन्होंने क्रमिक या “इनसाइड-आउट” निर्माण मॉडल का प्रस्ताव दिया।
    • जब सबसे बाहरी ग्रह बना, तब तक प्रोटोप्लैनेटरी गैस संभवतः समाप्त हो चुकी थी, जिससे केवल ठोस पदार्थ शेष रह गया और चट्टानी पिंड बना।
  • वैज्ञानिक महत्त्व: यह खोज लंबे समय से चले आ रहे ग्रह निर्माण सिद्धांतों को चुनौती देती है और सौर मंडल संरचनाओं में अधिक विविधता का संकेत देती है।
    • यह प्रश्न उठाती है कि क्या हमारे सौर मंडल की संरचना सामान्य है या अनेक संभावित ब्रह्मांडीय विन्यासों में से केवल एक है।

संगतम् समुदाय

नागालैंड के संगतम् समुदाय की शीर्ष संस्था ने अपने क्षेत्राधिकार में दुनिया के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले जंगली स्तनपायी, पैंगोलिन, की रक्षा के लिए एक प्रस्ताव पारित किया है।

संगतम् समुदाय के बारे में

  • संगतम् नागालैंड की 16 प्रमुख मान्यता प्राप्त नागा जनजातियों में से एक हैं।
  • स्थान: वे मुख्यतः पूर्वी नागालैंड के किफिरे और तुएनसांग जिलों में निवास करते हैं।
    • यह क्षेत्र इंडो–म्याँमार जैव-विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है, जिससे यह पारिस्थितिकी रूप से महत्त्वपूर्ण और वन्यजीवों के शोषण के प्रति संवेदनशील है।
  • भाषा: वे संगतम् भाषा बोलते हैं, जो तिब्बतो-बर्मन परिवार की साइनो-तिब्बती भाषा है।
  • समाज: संगतम् समाज समतावादी है, जहाँ गाँव कुलों और अंतर-विवाहित परिवारों के इर्द-गिर्द संगठित हैं, जो रिश्तेदारी और पारस्परिक सहयोग पर बल देते हैं।
    • वे वंश और उत्तराधिकार की पितृसत्तात्मक प्रणाली का भी पालन करते हैं।
  • शासन: शासन ग्राम परिषदों और यूनाइटेड संगतम् लिखुम पुमजी (USLP) जैसी शीर्ष संस्थाओं के माध्यम से होता है, जो विवाद, संरक्षण और सामुदायिक निर्णयों को संभालती हैं।
  • अर्थव्यवस्था: पारंपरिक अर्थव्यवस्था झूम खेती (स्थानांतरण कृषि) पर आधारित थी, जिसमें चावल, बाजरा और सब्जियाँ उगाई जाती थीं। शिकार और संग्रह कृषि के पूरक थे।

पैंगोलिन के बारे में

  • पैंगोलिन, जिन्हें ‘स्केली एंटईटर’ भी कहा जाता है, ‘फोलिडोटा’ गण के विशिष्ट रात्रिचर स्तनधारी हैं।
  • वे विश्व के सबसे अधिक तस्करी किए जाने वाले जंगली स्तनपायी हैं और अवैध व्यापार व आवास हानि से गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं। सभी आठ मान्यता प्राप्त प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में हैं।
  • प्रजातियाँ और वितरण: पैंगोलिन की आठ प्रजातियाँ हैं:
    • एशियन स्पीशीज (4): इंडियन पैंगोलिन (मैनिस क्रैसिकॉडेटा), चाइनीज पैंगोलिन (मैनिस पेंटाडैक्टिला), सुंडा पैंगोलिन (मैनिस जावानिका), फिलिपीन पैंगोलिन (मैनिस क्यूलियोनेंसिस)।
    • अफ्रीकन स्पीशीज (4): जाइंट ग्राउंड पैंगोलिन (स्मट्सिया जिगैन्टिया), टेमिन्क्स ग्राउंड पैंगोलिन (स्मट्सिया टेमिन्किआई), व्हाइट-बेलीड पैंगोलिन (फैटाजिनस ट्राइकस्पिस), ब्लैक-बेलीड पैंगोलिन (फैटाजिनस टेट्राडैक्टिला)।
  • आवास: वन, सवाना, घासभूमियाँ; कुछ वृक्षवासी (पेड़ों पर चढ़ने वाले), जबकि अन्य भूमिगत बिलों में रहने वाले होते हैं।
  • आहार: पूर्णतः कीटभक्षी। मुख्यतः चींटियाँ और दीमक खाते हैं; भोजन खोजने के लिए सूँघने की क्षमता और जीभ का उपयोग करते हैं। वे कीट आबादी को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी भूमिका निभाते हैं।
  • संरक्षण स्थिति: IUCN रेड लिस्ट के अनुसार, सभी आठ प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं।
    • भारतीय पैंगोलिन (Indian pangolin) IUCN रेड लिस्ट में संकटग्रस्त (Endangered) के रूप में सूचीबद्ध है।
    • चीनी पैंगोलिन (Chinese pangolin) को गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
    • दोनों भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत संरक्षित हैं।
    • सभी 8 प्रजातियाँ CITES परिशिष्ट I (Appendix I) में सूचीबद्ध हैं।

ब्रह्मपुत्र रोड-कम-रेल टनल परियोजना

केंद्र सरकार ने असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे भारत की पहली अंडरवाटर ट्विन ट्यूब रोड-कम-रेल टनल; को मंजूरी दी है।

ब्रह्मपुत्र रोड-कम-रेल टनल परियोजना के बारे में

  • रोड-कम-रेल टनल परियोजना में 33.7 किमी. लंबे चार-लेन एक्सेस-नियंत्रित ग्रीनफील्ड कॉरिडोर का निर्माण शामिल है, जिसमें ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे 15.79 किमी. लंबी ट्विन ट्यूब अंडरवाटर टनल शामिल है।
  • स्थान: यह असम में गोहपुर (NH-15) और नुमालीगढ़ (NH-715) को जोड़ेगी।
    • यह दूरी को 240 किमी. से घटाकर 34 किमी. कर देगा और यात्रा समय को छह घंटे से घटाकर 20 मिनट कर देगा।
  • लागत और क्रियान्वयन: इस परियोजना को ₹18,662 करोड़ की लागत से इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) मोड में विकसित किया जाएगा।
  • महत्त्व: यह परियोजना क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देगी, रणनीतिक अवसंरचना को मजबूत करेगी, रोजगार सृजन करेगी और पूर्वोत्तर भारत में सामाजिक-आर्थिक विकास को तीव्र करेगी।
    • यह भारत की पहली अंडरवाटर रोड-कम-रेल टनल होगी और वैश्विक स्तर पर इस प्रकार की दूसरी परियोजना होगी।

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) के बारे में 

  • आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति केंद्र सरकार की एक प्रमुख निर्णय-निर्माण संस्था है, जो आर्थिक नीतियों और प्रमुख आधारभूत संरचना अनुमोदनों की निगरानी करती है।
  • संरचना: इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और इसमें वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं।
    • गृह मामले (अमित शाह), वित्त (निर्मला सीतारमण), रक्षा (राजनाथ सिंह), सड़क परिवहन, कृषि, विदेश मामले, वाणिज्य और शिक्षा।
  • भूमिका और कार्य: यह समिति प्रमुख निवेश प्रस्तावों, आधारभूत संरचना परियोजनाओं, मूल्य निर्धारण नीतियों तथा आर्थिक विकास एवं सार्वजनिक व्यय से संबंधित मामलों को स्वीकृति प्रदान करती है।

संदर्भ 

भारत जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की बायोE3 नीति के अंतर्गत जैव-आधारित रसायनों और एंजाइमों को प्राथमिकता दे रहा है।

संबंधित तथ्य

  • भारत का एंजाइम बाजार समेकित प्रकृति का है, जिसमें शीर्ष कंपनियाँ 75% से अधिक बाजार हिस्सेदारी रखती हैं।
  • नोवोजाइम्स इंडिया, ड्यूपॉन्ट, डीएसएम, एडवांस एंजाइम टेक्नोलॉजीज, बीएएसएफ एसई, और अल्ट्रेज एंजाइम्स प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियाँ भारतीय बाजार की प्रमुख हितधारक हैं।

एंजाइम्स के बारे में

  • एंजाइम जैविक उत्प्रेरक होते हैं, जो रासायनिक अभिक्रियाओं को अत्यंत कुशल और विशिष्ट तरीके से तीव्र करते हैं।
  • अनुप्रयोग: डिटर्जेंट, खाद्य प्रसंस्करण, फार्मास्यूटिकल्स, वस्त्र, पल्प एवं पेपर, जैव-विनिर्माण।

मुख्य विशेषताएँ

  • ऊर्जा दक्ष: हल्के तापमान और दाब में कार्य करते हैं, जिससे ऊर्जा की खपत कम होती है।
  • पर्यावरण-अनुकूल: जैव-अपघटनीय होते हैं और हरित रसायन विज्ञान के सिद्धांतों का समर्थन करते हैं।
  • उन्नत उत्पाद गुणवत्ता: अवांछित उप-उत्पादों को कम करते हैं और सटीकता बढ़ाते हैं।
  • जैव-अर्थव्यवस्था का समर्थन: नवीकरणीय बायोमास को मूल्यवर्द्धित उत्पादों में परिवर्तित करने में सहायता करते हैं।
  • अनुकूलन योग्य: विशिष्ट औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से इन्हें अभिकल्पित किया जा सकता है।

जैव-आधारित रसायनों के बारे में

  • ये औद्योगिक रसायन गन्ना, मक्का, स्टार्च, या बायोमास अवशेष जैसे जैविक कच्चे माल  का उपयोग एवं किण्वन या एंजाइमेटिक प्रक्रियाओं के माध्यम से उत्पादित किए जाते हैं।
  • उदाहरण के लिए
    • कार्बनिक अम्ल (जैसे लैक्टिक अम्ल),
    • जैव-एल्कोहल,
    • विलायक, सर्फेक्टेंट, और
    • प्लास्टिक, सौंदर्य प्रसाधन और फार्मास्यूटिकल्स में उपयोग होने वाले मध्यवर्ती उत्पाद।

भारत को ऐसे रसायनों की आवश्यकता क्यों है?

  • मजबूत कृषि आधार: भारत का विशाल कृषि क्षेत्र प्रचुर मात्रा में बायोमास और फसल अवशेष उपलब्ध कराता है, जो जैव-आधारित रसायनों और एंजाइमों के लिए कच्चे माल के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं।
  • किण्वन प्रौद्योगिकियों में विशेषज्ञता: भारत के पास अपने सुदृढ़ फार्मास्यूटिकल और वैक्सीन उद्योगों के कारण किण्वन प्रक्रियाओं में व्यापक अनुभव है, जो जैव-विनिर्माण में तकनीकी बढ़त प्रदान करता है।
  • विनिर्माण क्षमता में वृद्धि: विस्तारित औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्र जैव-आधारित रसायनों और एंजाइमों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए आवश्यक अवसंरचना प्रदान करता है।
  • आयात निर्भरता में कमी: जैव-आधारित विकल्पों को बढ़ावा देने से आयातित पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भरता कम हो सकती है। उदाहरण के लिए, भारत ने वर्ष 2023 में लगभग 479.8 मिलियन डॉलर मूल्य का एसिटिक एसिड आयात किया, जो घरेलू उत्पादन की संभावनाओं को दर्शाता है।
  • आर्थिक और रणनीतिक लाभ: इस क्षेत्र के विस्तार से कृषि उत्पादों के लिए नए बाजार बन सकते हैं, किसानों की आय बढ़ सकती है, सतत् उद्योग को समर्थन मिल सकता है और भारत को पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक इनपुट का वैश्विक आपूर्तिकर्ता बनाया जा सकता है।

जैव-आधारित रसायन क्षेत्र के विकास में चुनौतियाँ

  • लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता: जैव-आधारित रसायन प्रायः पेट्रोकेमिकल विकल्पों की तुलना में अधिक महँगे होते हैं, विशेष रूप से बड़े पैमाने पर उत्पादन के प्रारंभिक चरणों में।
    • यह अस्थायी लागत हानि एक प्रमुख प्रवेश बाधा उत्पन्न करती है और निजी निवेश को हतोत्साहित करती है।
  • कच्चे माल और अवसंरचना की सीमाएँ: बायोमास कच्चे माल की विश्वसनीय उपलब्धता और पर्याप्त सहायक अवसंरचना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • असंगत आपूर्ति शृंखलाएँ और सीमित प्रसंस्करण सुविधाएँ बड़े पैमाने पर उत्पादन में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।
  • बाजार की चुनौतियाँ: अपनाने की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि जैव-आधारित रसायन विनिर्माण प्रणालियों में मौजूदा पेट्रोकेमिकल इनपुट का आसानी से स्थान ले सकते हैं या नहीं।
    • मूल्य समान होने पर भी, प्रौद्योगिकीय और आपूर्ति-शृंखला समायोजनों के कारण डाउनस्ट्रीम उद्योग परिवर्तन करने में संकोच कर सकते हैं।

जैव-आधारित रसायनों और एंजाइमों के लिए वैश्विक नीतिगत समर्थन

  • यूरोपीय संघ (EU): EU बायोइकोनॉमी रणनीति और कार्य योजना चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था ढाँचे के अंतर्गत जैव-आधारित रसायनों का समर्थन करती है। यह औद्योगिक परिवर्तन को जलवायु लक्ष्यों, अपशिष्ट में कमी और सतत् विकास के साथ संरेखित करती है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका (यू.एस.): यूएसडीए बायोप्रेफर्ड प्रोग्राम प्रमाणित जैव-आधारित उत्पादों, जिनमें रसायन और एंजाइम शामिल हैं, को संघीय खरीद में प्राथमिकता प्रदान करता है, जिससे उत्पादकों के लिए प्रारंभिक और स्थिर बाजार बनाने में सहायता मिलती है।
  • चीन: चीन की जैव-अर्थव्यवस्था विकास योजनाएँ उच्च-मूल्य वाले जैव-आधारित रसायनों और एंजाइम प्रौद्योगिकियों को नवाचार तथा औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने के लिए रणनीतिक क्षेत्रों के रूप में प्राथमिकता देती हैं।
  • जापान: जापान एमईटीआई और एनएआरओ के माध्यम से प्राथमिकता परियोजनाओं को वित्तपोषित करता है, जो जैव-आधारित रासायनिक अनुसंधान को विनिर्माण तत्परता के साथ जोड़ती हैं, जिससे व्यावसायीकरण तथा औद्योगिक स्तर के उत्पादन में तेजी आती है।

आगे की राह

  • साझा जैव-विनिर्माण अवसंरचना: बायोE3 जैसी पहलों के अंतर्गत बायोफाउंड्री, पायलट प्लांट और प्रदर्शन सुविधाओं का विकास पूँजीगत जोखिमों को कम कर सकता है और निजी कंपनियों के लिए विस्तार को समर्थन दे सकता है।
  • मानक और नीतिगत समर्थन: स्पष्ट मानक, प्रमाणन तंत्र और सरकारी खरीद नीतियाँ सुनिश्चित माँग उत्पन्न कर सकती हैं, निवेशकों का विश्वास मजबूत कर सकती हैं और बाजार अपनाने की प्रक्रिया को तेज कर सकती हैं।

बायोE3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव-प्रौद्योगिकी)

बायोE3 नीति के बारे में

  • विषय: जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नीति 6 प्रमुख विषयों पर केंद्रित होगी।
    • जैव-आधारित रसायन और एंजाइम,
    • कार्यात्मक खाद्य पदार्थ और स्मार्ट प्रोटीन,
    • प्रिसीजन बायोथेरेप्यूटिक,
    • जलवायु-सहिष्णु कृषि,
    • कार्बन कैप्चर और उसका उपयोग,
    • भविष्य के समुद्री और अंतरिक्ष अनुसंधान।
  • विशेषताएँ
    • नवाचार को बढ़ावा: यह विषयगत क्षेत्रों में अनुसंधान एवं विकास और उद्यमिता को नवाचार-आधारित समर्थन प्रदान करेगी।
    • यह बायोमैन्युफैक्चरिंग एवं बायो-AI हब और बायोफाउंड्री की स्थापना के माध्यम से प्रौद्योगिकी विकास और व्यावसायीकरण को तीव्र करेगी।
    • पुनर्योजी जैव-अर्थव्यवस्था आधारित विकास मॉडलों को प्राथमिकता देना।
    • रोजगार सृजन: यह नीति भारत के कुशल कार्यबल के विस्तार को सुगम बनाएगी और रोजगार सृजन में वृद्धि प्रदान करेगी।
  • लाभ
    • चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था: यह नीति ‘नेट जीरो’ कार्बन अर्थव्यवस्था और प्रोजेक्ट लाइफ (‘लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’) जैसी पहलों को मजबूत करेगी और भारत को तीव्र हरित विकास के मार्ग पर आगे बढ़ाएगी।
    • विकसित भारत के लक्ष्य को बढ़ावा: यह एक ऐसे भविष्य को साकार करेगी, जो सतत्, नवाचारी और वैश्विक चुनौतियों के प्रति उत्तरदायी हो, तथा विकसित भारत के लिए जैव-दृष्टि प्रस्तुत करेगी।
    • यह नीति एक लचीला जैव-विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करेगी, जो जैव-आधारित उत्पादों के विकास हेतु अत्याधुनिक नवाचारों को गति प्रदान करेगा।

संदर्भ

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘अर्बन चैलेंज फंड’ (UCF) के शुभारंभ को स्वीकृति दी है।

संबंधित तथ्य

  • यह केंद्रीय बजट 2025-26 में घोषित सरकार की उस परिकल्पना को क्रियान्वित करता है, जिसके अंतर्गत ‘शहरों को विकास केंद्र के रूप में स्थापित करने हेतु ‘शहरों के रचनात्मक पुनर्विकास’, और ‘जल एवं स्वच्छता’ से संबंधित प्रस्तावों को लागू किया जाना है।

अर्बन चैलेंज फंड के बारे में

  • यह आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय की एक केंद्रीय प्रायोजित योजना है, जिसमें कुल केंद्रीय सहायता ₹1 लाख करोड़ है।
  • वित्तपोषण संरचना: परियोजना वित्तपोषण का न्यूनतम 50 प्रतिशत भाग बाजार स्रोतों से जुटाना होगा, जिसमें नगर निगम बॉण्ड, बैंक ऋण और सार्वजनिक–निजी भागीदारी शामिल हैं।
    • शेष भाग राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों, शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) या अन्य स्रोतों द्वारा दिया जा सकता है।
  • कवरेज: यह फंड निम्नलिखित को कवर करेगा:
    • वर्ष 2025 के अनुमान के अनुसार, 10 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले सभी शहर;
    •  उपरोक्त में शामिल न किए गए राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की राजधानियाँ; तथा
    • 1 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले प्रमुख औद्योगिक शहर
    • इसके अतिरिक्त, पहाड़ी राज्यों, उत्तर-पूर्वी राज्यों और 1 लाख से कम जनसंख्या वाले सभी ULBs, क्रेडिट रिपेमेंट गारंटी योजना के अंतर्गत सहायता के लिए पात्र होंगे।

मुख्य विशेषताएँ

  • प्रतिस्पर्द्धी चुनौती मोड चयन: परियोजनाओं का चयन पारदर्शी और प्रतिस्पर्द्धी चुनौती मोड के माध्यम से किया जाएगा, जिससे उच्च-प्रभाव और सुधार-उन्मुख प्रस्तावों को समर्थन सुनिश्चित किया जाएगा।
  • सुधार-उन्मुख दृष्टिकोण: शहरी शासन, बाजार एवं वित्तीय प्रणालियों, परिचालन दक्षता और शहरी नियोजन में सुधारों पर विशेष बल दिया जाएगा।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा: संरचित जोखिम-साझाकरण ढाँचों और सेवा वितरण मानकों के बेंचमार्किंग के माध्यम से निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • क्रेडिट संवर्धन तंत्र: ₹5,000 करोड़ का एक समर्पित कोष टियर-II और टियर-III शहरों सहित 4,223 शहरों की साख क्षमता को बढ़ाएगा, विशेष रूप से पहली बार बाजार वित्त तक पहुँच के लिए।
  • ULBs को बैंक योग्य बनाना: इसका उद्देश्य शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को वित्तीय बाजार में एक विश्वसनीय और बैंक योग्य परिसंपत्ति वर्ग के रूप में स्थापित करना है।
  • सुधार-संलग्न वित्तपोषण ढाँचा: अर्बन चैलेंज फंड के अंतर्गत वित्तपोषण एक व्यापक सुधार एजेंडा से जुड़ा होगा, जिसमें शामिल हैं:
    • शासन और डिजिटल सुधार;
    • साख क्षमता को मजबूत करने के लिए बाजार और वित्तीय सुधार;
    • बेहतर सेवा वितरण और उपयोगिता दक्षता के लिए परिचालन सुधार;
    • ट्रांजिट-उन्मुख विकास और हरित अवसंरचना सहित शहरी नियोजन और स्थानिक सुधार; तथा
    • परिभाषित प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों (KPI), तृतीय-पक्ष सत्यापन और सतत् संचालन एवं रखरखाव तंत्र के साथ परियोजना-विशिष्ट सुधार।
  • अर्बन चैलेंज फंड के अंतर्गत परियोजना क्षेत्र
    • शहरों को विकास केंद्र के रूप में: इसका उद्देश्य प्रमुख आर्थिक क्षेत्रों और शहर क्षेत्रों की पहचान करना तथा एकीकृत नियोजन, कॉरिडोर-आधारित विकास, बेहतर शहरी गतिशीलता और प्रतिस्पर्द्धी अवसंरचना में तीव्र बढोतरी करना है।
    • शहरों का रचनात्मक पुनर्विकास: यह व्यावसायिक और विरासत क्षेत्रों के पुनरोद्धार, ब्राउनफील्ड स्थलों की पुनर्स्थापना, संक्रमण-उन्मुख विकास को बढ़ावा देने, जलवायु अनुकूलन बढ़ाने और विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी एवं पर्वतीय राज्यों में व्यस्तता कम करने पर केंद्रित है।
    • जल और स्वच्छता: इसका उद्देश्य जल आपूर्ति, सीवरेज और वर्षा जल प्रणालियों का उन्नयन, रर्बन अवसंरचना और जल ग्रिड का विकास, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को सुदृढ़ करना तथा स्वच्छता पर ध्यान केंद्रित करते हुए विरासत अपशिष्ट का निवारण करना है।

रर्बन (Ruraban) अवसंरचना क्या है?

रर्बन अवसंरचना से आशय ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित उस अवसंरचना से है, जिसमें शहरी जैसी सुविधाएँ होती हैं, ताकि ग्रामीण–शहरी अंतर को पाटा जा सके और संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा दिया जा सके।

इसमें सामान्यतः शामिल हैं

  • सभी मौसमों में उपयोग योग्य सड़कें और परिवहन संपर्क
  • पाइपयुक्त जल आपूर्ति और स्वच्छता प्रणालियाँ
  • विश्वसनीय विद्युत और डिजिटल संपर्क
  • ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन
  • कौशल केंद्र, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सुविधाएँ
  • मंडी यार्ड और कृषि-प्रसंस्करण इकाइयाँ।

यह अवधारणा श्यामा प्रसाद मुखर्जी रर्बन मिशन से जुड़ी है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण चरित्र को बनाए रखते हुए शहरी स्तर की अवसंरचना प्रदान कर गाँवों के समूहों का विकास करना है।

महत्त्व

भविष्य उन्मुख शहरों का निर्माण: यह फंड लचीले, उत्पादक, समावेशी और जलवायु-संवेदनशील शहरों के निर्माण का लक्ष्य रखता है, जिससे वे देश के आर्थिक विकास के अगले चरण के प्रमुख प्रेरक बन सकें।

संदर्भ 

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र में संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करता है, वहीं दूसरी ओर द्वितीय ARC, होता समिति और संसदीय समितियाँ व्यापक सिविल सेवा सुधार के साथ भारतीय वैज्ञानिक सेवा जैसे समर्पित तकनीकी कैडर के माध्यम से वैज्ञानिक विशेषज्ञता को संस्थागत रूप देने के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करती हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (S&T) में भारत का परिदृश्य

भारत के पास एक मजबूत वैज्ञानिक आधार है, फिर भी इसे अपनी नौकरशाही के अंतर्गत एक संरचनात्मक विरोधाभास का सामना करना पड़ता है:-

  • शासन व्यवस्था में असंतुलन: भारत ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जैसी विश्व स्तरीय संस्थाएँ बनाई हैं, फिर भी सरकारी वैज्ञानिक अक्सर केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 के अधीन कार्य करते हैं।
    • ये नियम वैज्ञानिक स्वतंत्रता की तुलना में प्रशासनिक अनुशासन को प्राथमिकता देते हैं।
  • प्रतिक्रियात्मक नीतिगत सुझाव: वर्तमान में, वैज्ञानिक इनपुट अक्सर केवल तात्कालिक जरूरतों के लिए ही ‘उपलब्ध’ कराए जाते हैं, जैसे कि मुकदमेबाजी या नियामक संकट।
    • इससे अनुसंधान समयबद्ध और सीमित हो जाता है, न कि एक सतत् शक्ति जो दीर्घकालिक दूरदर्शिता के माध्यम से नीति का मार्गदर्शन करती है।
  • ‘वैली ऑफ डेथ’: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत मौलिक अनुसंधान में उत्कृष्ट होने के बावजूद, अक्सर उन निष्कर्षों को बाजार के लिए तैयार उत्पादों में परिवर्तित करने में विफल रहता है।
    • प्रयोगशाला नवाचार और औद्योगिक अनुप्रयोग के बीच अंतर्संबंध का अभाव है।

प्रगति के चार स्तंभ (2026)

  • कंप्यूटर चिप और AI क्रांति: भारत वर्तमान में इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 चला रहा है, जिसे वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में नई गति दी गई है।
    • फैक्ट्री तैयार: कंप्यूटर चिप बनाने वाले चार प्रमुख संयंत्रों में इस वर्ष वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।
    • स्थानीय सामग्री: जहाँ पहले चरण में चिप्स को असेंबल किया गया था, वहीं ISM 2.0 का मुख्य उद्देश्य चिप निर्माण के लिए आवश्यक उपकरण और रसायनों का निर्माण भारत में ही करना है।

    • संप्रभु AI: इंडिया AI मिशन के माध्यम से, सरकार राष्ट्रीय GPU क्लस्टर (अति शक्तिशाली कंप्यूटर नेटवर्क) का निर्माण कर रही है। इससे भारतीय स्टार्ट-अप्स को वह ‘कंप्यूटिंग शक्ति’ मिलती है, जिसकी उन्हें आवश्यकता है, ताकि उन्हें विदेश की बड़ी तकनीकी कंपनियों पर निर्भर न रहना पड़े।
  • डीप टेक (जटिल तकनीक) के लिए समर्थन: फरवरी 2026 में, सरकार ने डीप टेक (जैव प्रौद्योगिकी, क्वांटम कंप्यूटिंग और नई सामग्री जैसे क्षेत्रों में नवाचार) को समर्थन देने के लिए नियमों में परिवर्तन किया।
    • 20 वर्ष की समय सीमा: डीप टेक कंपनियों को अब 20 वर्ष (पहले 10 वर्ष) तक ‘स्टार्ट-अप’ कहा जा सकता है। यह इस बात को स्वीकार करता है कि वास्तविक विज्ञान को बाजार तक पहुँचने में लंबा समय लगता है।
    • उच्च सीमा: ये स्टार्ट-अप अब ₹300 करोड़ (पहले ₹200 करोड़) तक का टर्नओवर कर सकते हैं और फिर भी सरकारी लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
    • पेशेंट कैपिटल: एक नया ₹10,000 करोड़ का फंड ‘पेशेंट कैपिटल’ (उच्च-तकनीकी परियोजनाओं के लिए ऋण और निवेश, जिन्हें लाभदायक बनने में वर्षों लग सकते हैं) प्रदान करता है।
  • नई वित्तपोषण संस्था – ANRF: अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) अब पूरी तरह से सक्रिय है। यह अनुसंधान को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए पुरानी प्रणालियों का स्थान ले रहा है।
    • लक्ष्य: इसका उद्देश्य वर्ष 2023 से वर्ष 2028 के बीच ₹50,000 करोड़ का वित्तपोषण प्रदान करना है।
    • निष्पक्ष वित्तपोषण: वर्ष 2026 की शुरुआत में, इसने प्रधानमंत्री प्रारंभिक कॅरियर अनुसंधान अनुदान (PM-ECRG) की शुरुआत की, ताकि राज्य विश्वविद्यालयों के युवा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को धन उपलब्ध कराया जा सके, न कि केवल प्रसिद्ध भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) को।
  • अंतरिक्ष और हरित ऊर्जा
    • अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था: भारत का लक्ष्य वर्ष 2026 के अंत तक 8 अरब डॉलर का अंतरिक्ष उद्योग विकसित करना है। लघु उपग्रह प्रक्षेपण यानों (SSLVs) के लिए दूसरा स्पेस पोर्ट लगभग पूरा हो चुका है, जिससे स्काईरूट और अग्निकुल जैसी निजी कंपनियों को अधिक उपग्रह प्रक्षेपण करने में मदद मिलेगी।
    • नेट जीरो 2070: नीति आयोग की वर्ष 2026 की एक रिपोर्ट में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने में मदद करने के लिए हरित हाइड्रोजन और चक्रीय अर्थव्यवस्था (प्रत्येक चीज का पुनर्चक्रण) पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) की आवश्यकता क्यों उत्पन्न हो रही है?

  • उभरते क्षेत्रों की जटिलता: सामान्य प्रशासकों में अक्सर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम प्रौद्योगिकी या जैव-विनिर्माण जैसे जटिल क्षेत्रों को विनियमित करने के लिए आवश्यक गहन तकनीकी ज्ञान की कमी होती है।
  • वैज्ञानिक अखंडता और स्वतंत्रता: प्रशासनिक नियम तटस्थता की माँग करते हैं, लेकिन वैज्ञानिक प्रगति के लिए मान्यताओं पर सवाल उठाने की स्वतंत्रता आवश्यक है।
    • ISS विशिष्ट सेवा नियम प्रदान करेगा, जो वैज्ञानिकों को औपचारिक रूप से आकलन दर्ज करने की अनुमति देगा, जैसे कि पारिस्थितिकी जोखिम या तकनीकी सीमाएँ, भले ही वे आधिकारिक नीति को चुनौती दें।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा: सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं या कार्बन क्रेडिट के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों पर बातचीत के लिए ऐसे ‘वैज्ञानिक-राजनयिकों’ की आवश्यकता होती है, जो वैश्विक व्यापार और प्रौद्योगिकी की तकनीकी बारीकियों को समझते हों।
  • रणनीतिक लचीलापन: जलवायु कार्रवाई और सार्वजनिक स्वास्थ्य में नेतृत्व करने के लिए, भारत को एक ऐसे कैडर की आवश्यकता है, जो प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने को महत्त्व देता हो।

प्रस्तावित भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) की प्रमुख विशेषताएँ

शासन व्यवस्था के भीतर वैज्ञानिक विशेषज्ञता को संस्थागत रूप देने और प्रौद्योगिकी-आधारित नीति निर्माण की बढ़ती जटिलता को संबोधित करने के लिए, प्रस्तावित भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) में निम्नलिखित संरचनात्मक विशेषताएँ शामिल हो सकती हैं:-

  • प्रत्यक्ष एकीकरण: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और जैव प्रौद्योगिकी विभाग जैसे मंत्रालयों में निर्णय लेने की प्रक्रिया के केंद्र में तकनीकी विशेषज्ञों को रखना।
  • संरचित कॅरियर विकास: वर्तमान प्रणाली के विपरीत, जहाँ वैज्ञानिकों के पास उच्च-स्तरीय अधिकार प्राप्त करने का कोई स्पष्ट मार्ग नहीं है, ISS राष्ट्रीय नीति को प्रभावित करने के लिए एक निश्चित मार्ग प्रदान करेगा।
  • गतिशील और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन: प्रतिभा पलायन की समस्या से निपटने के लिए, ISS शीर्ष स्तर की प्रतिभाओं को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए प्रदर्शन-आधारित वेतन संरचना और अनुसंधान-आधारित प्रोत्साहन अपना सकता है।
  • सलाह का औपचारिक महत्त्व: यह सुनिश्चित करना कि वैज्ञानिक सलाह केवल परामर्श मात्र न रहे, बल्कि नीति निर्माण प्रक्रिया का एक अनिवार्य और दर्ज किया जाने वाला घटक बन जाए, जिससे साक्ष्य-आधारित शासन को मजबूती मिले।

PWOnlyIAS विशेष

संवैधानिक प्रावधान – विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ISS) के लिए कानूनी आधार

भारत का संविधान राज्य को विज्ञान को बढ़ावा देने और संसद को राष्ट्रीय चुनौतियों के प्रबंधन के लिए विशेष सेवाएँ सृजित करने का स्पष्ट जनादेश प्रदान करता है।

  • मूलभूत कर्तव्य – ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ का अनिवार्य दायित्व
    • अनुच्छेद-51A(h): प्रत्येक नागरिक का यह मूलभूत कर्तव्य है कि वह ‘वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद और जिज्ञासा एवं सुधार की भावना’ विकसित करे।
    • महत्त्व: यह संविधान की एक अनूठी विशेषता है। ISS को एक संस्थागत तंत्र के रूप में देखा जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि राज्य की नीति हठधर्मिता के बजाय तर्क और प्रमाणों द्वारा निर्देशित हो, जिससे इस कर्तव्य की पूर्ति हो सके।
  • सातवीं अनुसूची – विधायी क्षमता: अनुच्छेद-246 के तहत, संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण में कई ऐसे प्रावधान शामिल हैं, जिनके लिए एक विशेष वैज्ञानिक कैडर की आवश्यकता होती है:
    • संघ सूची (सूची I)
      • प्रविष्टि 65: व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण तथा विशेष अध्ययन या अनुसंधान को बढ़ावा देने वाली संघ एजेंसियाँ।
      • प्रविष्टि 66: उच्च शिक्षा या अनुसंधान संस्थानों तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों में मानकों का समन्वय एवं निर्धारण।
      • प्रविष्टि 6: परमाणु ऊर्जा और खनिज संसाधन।
      • प्रविष्टि 49: पेटेंट, आविष्कार और डिजाइन।
    • समवर्ती सूची (सूची III)
      • प्रविष्टि 25: शिक्षा, जिसमें तकनीकी शिक्षा और चिकित्सा शिक्षा शामिल है (जहाँ केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, समन्वय के लिए ISS जैसी एकीकृत सेवा की आवश्यकता होती है)।
  • अनुच्छेद-312 – नई अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन: भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) के सृजन का सबसे सीधा संवैधानिक मार्ग अनुच्छेद-312 है।
    • प्रावधान: यदि राज्यसभा एक प्रस्ताव द्वारा (उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से) यह घोषित करे कि यह राष्ट्रीय हित में आवश्यक है, तो संसद कानून द्वारा संघ और राज्यों के लिए एक या एक से अधिक अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन का प्रावधान कर सकती है।
    • अनुप्रयोग: जिस प्रकार वर्ष 1966 में भारतीय वन सेवा का सृजन हुआ था, उसी प्रकार इस अनुच्छेद के अंतर्गत भारत भर में तकनीकी रूप से गहन क्षेत्रों के प्रबंधन के लिए ISS की स्थापना की जा सकती है।
  • अनुच्छेद-309 – भर्ती एवं सेवा शर्तें: यह अनुच्छेद संसद (या संसद द्वारा अधिनियमित किए जाने तक राष्ट्रपति/राज्यपाल) को लोक सेवाओं में नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती एवं सेवा शर्तों को विनियमित करने का अधिकार देता है।

भारत की पहल और कार्यवाहियाँ

भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) की स्थापना के प्रयास को हाल ही में शुरू किए गए कई प्रमुख कार्यक्रमों का समर्थन प्राप्त है, जिनका उद्देश्य ‘रणनीतिक लचीलापन’ पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।

  • अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान (ANRF): ANRF अधिनियम 2023 के तहत स्थापित, यह अनुसंधान को रणनीतिक दिशा प्रदान करने वाला सर्वोच्च निकाय है।
    • हालिया प्रगति: फरवरी 2026 तक, ANRF ने विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच की खाई को पाटने के लिए त्वरित नवाचार और अनुसंधान साझेदारी (PAIR) और MAHA मेडटेक मिशन की शुरुआत की है।
      • यह उच्च-प्रदर्शन अनुसंधान एवं विकास की संस्कृति को बढ़ावा देकर प्रस्तावित ISS के लिए ‘संस्थागत अभिभावक’ के रूप में कार्य करता है।
  • बायोE3 नीति (2024-2026): इसका अर्थ है अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी। यह उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण पर केंद्रित है।
    • हालिया प्रगति: वर्ष 2026 की शुरुआत में, सरकार ने बायो-AI हब के एक नेटवर्क, मूलंकुर बायोएनबलर नेटवर्क की स्थापना की।
      • यह नीति ISS-शैली के शासन के लिए एक ‘परीक्षण स्थल’ के रूप में कार्य करती है, जहाँ वैज्ञानिक वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था में परिवर्तन का नेतृत्व करते हैं।
  • विज्ञान धारा योजना: तीन प्रमुख विज्ञान योजनाओं को एक एकीकृत योजना के अंतर्गत समेकित किया गया है, जिसका परिव्यय ₹10,579 करोड़ (वर्ष 2025-26 तक) है।
    • उद्देश्य: निधि के उपयोग की दक्षता में सुधार करना और स्कूलों से उद्योगों तक नवाचार को प्रोत्साहित करना।
  • अनुसंधान विकास एवं नवाचार (RDI) कोष: क्वांटम कंप्यूटिंग और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे गहन तकनीकी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले अनुसंधान एवं विकास के लिए दीर्घकालिक, कम ब्याज वाले ऋण प्रदान करने हेतु ₹1 लाख करोड़ का ‘पेशेंट कैपिटल’ कोष शुरू किया गया है।

जिन चुनौतियों का सामना करना आवश्यक है

  • कम अनुसंधान व्यय: भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (GERD) अभी भी GDP का मात्र 0.64% है।
    • तुलना के लिए, अमेरिका लगभग 3.5% और चीन 2.4% खर्च करता है।
  • निजी क्षेत्र का अंतर: अन्य देशों में, अधिकांश अनुसंधान का खर्च निजी कंपनियाँ वहन करती हैं। भारत में, सरकार अभी भी अधिकांश खर्च वहन करती है।
    • विशेषज्ञ अनुसंधान एवं विकास में निवेश करने के लिए निजी कंपनियों को प्रोत्साहित करने हेतु सफल विनिर्माण प्रोत्साहन योजनाओं के समान अनुसंधान-लिंक्ड प्रोत्साहन (RLI) योजना की माँग कर रहे हैं।
  • पदानुक्रम संघर्ष – सामान्य विशेषज्ञ बनाम विशेषज्ञ: भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) जैसे विशिष्ट कैडर को एक ऐसी प्रणाली में शामिल करना, जो पारंपरिक रूप से सामान्य विशेषज्ञों के प्रभुत्व वाली है, वरिष्ठता, कॅरियर प्रगति और निर्णय लेने के अधिकार के संबंध में संघर्ष का कारण बन सकता है।
    • वर्तमान ‘स्टील फ्रेम’ में, विशेषज्ञ अक्सर सामान्य विशेषज्ञों को रिपोर्ट करते हैं, जिससे तकनीकी विशेषज्ञों के लिए ‘ग्लास सीलिंग’ बन सकती है।
    • उदाहरण: केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में बार-बार उत्पन्न होने वाला तनाव, जहाँ विशेष चिकित्सा पेशेवर (जैसे केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा के) अक्सर प्रशासनिक अधिकारियों के अधीन कार्य करते हैं।
      • इससे ऐतिहासिक रूप से “समानता” और “स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति” की माँगें उठती रही हैं, जैसा कि कोविड-19 महामारी के प्रबंधन और उसके बाद स्वास्थ्य नीतियों के क्रियान्वयन के दौरान देखा गया।
  • भर्ती प्रक्रिया में कठोरता – योग्यता और कौशल का संतुलन: वैज्ञानिक उत्कृष्टता का मापन वर्षों के सहकर्मी-समीक्षित शोध, प्रयोगशाला में किए गए अभूतपूर्व आविष्कारों और उन्नत शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों (पीएच.डी./पोस्ट-डॉक्टरेट) से किया जाता है, न कि किसी एक उच्च दबाव वाली सामान्य परीक्षा को उत्तीर्ण करने की क्षमता से।
    • संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के माध्यम से ऐसी भर्ती प्रक्रिया तैयार करना, जो मानकीकृत प्रशासनिक परीक्षण और उच्च विशिष्ट वैज्ञानिक योग्यता के बीच संतुलन बनाए रखे, एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है।
      • उदाहरण: वर्ष 2024-25 के लेटरल एंट्री संबंधी विवाद।
  • सरकार ने संयुक्त सचिव स्तर पर विशेषज्ञों को लाने का प्रयास किया, लेकिन इस प्रक्रिया पर सवाल उठे कि क्या एक ही तरह की परीक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय या ग्रीन हाइड्रोजन मिशन जैसे विभागों में विशिष्ट भूमिकाओं के लिए आवश्यक तकनीकी गहराई का सटीक आकलन कर सकती है।
  • प्रतीकात्मक जोखिम-विज्ञान का ‘दिखावा’: संस्थागत सुरक्षा उपायों के अभाव में, वैज्ञानिकों की भूमिका केवल सलाहकारी या प्रतीकात्मक रह जाने का गहरा खतरा है।
    • आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ‘विज्ञान को दिखावे के रूप में’ इस्तेमाल करने के खिलाफ चेतावनी देता है, जहाँ तकनीकी विशेषज्ञों का उपयोग किसी नीति को ‘वैज्ञानिक स्वरूप’ देने के लिए किया जाता है, जबकि उनके पास उसकी मूल दिशा को प्रभावित करने की शक्ति नहीं होती है।
    • उदाहरण: पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) से जुड़ा विवाद।
      • ग्रेट निकोबार विकास योजना जैसी कई हालिया अवसंरचना परियोजनाओं में, आलोचकों और वैज्ञानिकों ने तर्क दिया कि भूकंपीय जोखिमों और जैव विविधता हानि से संबंधित तकनीकी चेतावनियों को प्रशासनिक तात्कालिकता के कारण नजरअंदाज कर दिया गया था।
      • इन ‘तकनीकी असहमति’ को औपचारिक रूप से दर्ज करने के लिए एक ISS के अभाव में, वैज्ञानिक इनपुट एक निर्णायक भूमिका निभाने के बजाय हाशिए पर ही रह जाता है।
  • ‘वैली ऑफ डेथ’ से एकीकरण: ISS को बुनियादी अनुसंधान और बाजार में उपयोग के बीच मौजूद संरचनात्मक बाधा को पार करना होगा।
    • अधिकांश सरकारी वैज्ञानिक वर्तमान में प्रयोगशालाओं (जैसे- CSIR) तक ही सीमित हैं और वाणिज्य मंत्रालय या उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) में व्यावसायीकरण को सुगम बनाने के लिए उनकी कोई औपचारिक भूमिका नहीं है।
    • उदाहरण: गहन प्रौद्योगिकी अनुसंधान में भारत की अग्रणी स्थिति के बावजूद, स्वदेशी 6G प्रौद्योगिकियों या क्वांटम कुंजी वितरण (QKD) के व्यावसायीकरण में देरी हुई है।
      • इसका कारण अक्सर ऐसे ‘वैज्ञानिक-प्रशासकों’ की कमी को माना जाता है, जो प्रयोगशाला की जटिलताओं और नौकरशाही खरीद नियमों, दोनों को समझ सकें और इन प्रौद्योगिकियों को बाजार में बड़े पैमाने पर लागू करने में सक्षम हों।

वैश्विक सर्वोत्तम पद्धतियाँ – भारत के लिए मॉडल

देश प्रमुख पहल/अभ्यास भारत के संदर्भ में प्रासंगिकता
संयुक्त राज्य अमेरिका वैज्ञानिक अखंडता नीतियाँ (उदाहरण के लिए, NIH और HHS में)
  • सरकारी वैज्ञानिकों को राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि शोध निष्कर्षों को “राजनीतिक लाभ” के लिए दबाया या बदलाव नहीं किया जा सकता है।
यू.के. सरकारी विज्ञान एवं अभियांत्रिकी (GSE) पेशा
  • सरकार भर में 10,000 से अधिक सदस्यों का एक दल।
  • प्रत्येक मंत्रालय में एक मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार (CSA) होता है, जिसे विशेषज्ञों की एक सुव्यवस्थित टीम का सहयोग प्राप्त होता है।
फ्राँस वैज्ञानिक क्षमता का राष्ट्रीय संरक्षण
  • विदेशी हस्तक्षेप से खुफिया जानकारी और संवेदनशील प्रौद्योगिकी की रक्षा करने के साथ-साथ नवाचार की अनुमति देने के लिए एक कठोर सार्वजनिक-निजी भागीदारी प्रणाली।
जापान महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी के लिए राष्ट्रीय रणनीति (CET)
  • यह नीति 20 तकनीकी क्षेत्रों (जैसे- AI एवं बायो) को प्राथमिकता देती है और आर्थिक सुरक्षा संबंधी निर्णय लेने की प्रक्रिया में विशेषज्ञों को सीधे तौर पर शामिल करती है।

आगे की राह

  • विधायी समर्थन और संस्थागत सुरक्षा उपाय: सरकार को वैज्ञानिक अखंडता अधिनियम लागू करना चाहिए। यह कानून भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) को औपचारिक रूप से मान्यता देगा और ‘साक्ष्य-आधारित असहमति’ को कानूनी संरक्षण प्रदान करेगा।
    • कानून के अनुसार, पर्यावरण प्रभाव आकलन या वैक्सीन सुरक्षा जैसे मामलों पर वैज्ञानिक आकलन आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने चाहिए।
    • इससे यह सुनिश्चित होगा कि भले ही अंतिम नीतिगत निर्णय निर्वाचित अधिकारियों के पास हो, वैज्ञानिक चेतावनियाँ या अनिश्चितताएँ पारदर्शी हों और सार्वजनिक जवाबदेही के लिए सुरक्षित रखी जाएँ।
  • हाइब्रिड भर्ती और चयन मॉडल का कार्यान्वयन: भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) की भर्ती पारंपरिक ‘सामान्य योग्यता’ मॉडल से हटकर हाइब्रिड चयन प्रणाली को अपनाना।
    • राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा: अखिल भारतीय सेवा की कठोरता सुनिश्चित करने के लिए।
    • सहकर्मी-समीक्षित मूल्यांकन: उम्मीदवार के शोध योगदान, पेटेंट और उच्च शैक्षणिक योग्यता (पीएच.डी./पोस्ट-डॉक्टरेट कार्य) को महत्त्व देना।
    • लेटरल एंट्री: निजी क्षेत्र या वैश्विक अनुसंधान संस्थानों के शीर्ष स्तर के वैज्ञानिकों को मध्य-कॅरियर में शामिल होने की अनुमति देना, ताकि क्वांटम कंप्यूटिंग और अंतरिक्ष-वाणिज्य जैसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक विशेषज्ञता लाई जा सके।
  • एकीकृत सेवा के अंतर्गत विशिष्ट कैडरों का निर्माण: वैज्ञानिक समुदाय के अंतर्गत “सामान्यीकरण के नेटवर्क” से बचने के लिए, भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) को विशिष्ट, डोमेन-विशिष्ट उप-कैडरों में संगठित किया जाना चाहिए। प्रत्येक कैडर का अपना कॅरियर पथ और प्रशिक्षण मॉड्यूल होगा:-
    • भारतीय पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी सेवा (IEES): जलवायु परिवर्तन निवारण और नेट जीरो प्रतिबद्धताओं का नेतृत्व करना।
    • भारतीय नियामक विज्ञान सेवा (IRSS): जैव-अर्थव्यवस्था और डीप-टेक क्षेत्रों के लिए स्पष्ट, वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ नियम बनाकर “वैली ऑफ डेथ” को सुव्यवस्थित करना।
  • भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं जैव चिकित्सा सेवा (IPHBS): महामारी की तैयारी को संस्थागत रूप देना और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना का प्रबंधन करना।
    • प्रयोगशाला से बाजार एकीकरण के माध्यम से “वैली ऑफ डेथ” को पाटना: भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) को अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) और निजी क्षेत्र के बीच प्राथमिक सेतु के रूप में कार्य करना चाहिए।
    • अनुसंधान विकास एवं नवाचार (RDI) कोष की देख-रेख के लिए ISS अधिकारियों को मंत्रालयों के भीतर तकनीकी निदेशक के रूप में तैनात किया जाना चाहिए।
    • उनकी भूमिका यह सुनिश्चित करना होगी कि सरकारी प्रयोगशालाओं में किए गए बुनियादी अनुसंधान व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य हों और वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं और जैव-विनिर्माण के लिए आवश्यक मानकों को पूरा करते हों।
  • सेवा नियमों और प्रदर्शन प्रोत्साहनों में सुधार: भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) के लिए केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 में विशेष रूप से संशोधन किया जाना चाहिए।
    • नए नियमों में प्रशासनिक “तटस्थता” की तुलना में वैज्ञानिक अखंडता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
    • इसके अलावा, प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आकर्षित करने और प्रतिभा पलायन को रोकने के लिए, सरकार को गतिशील वेतनमान लागू करना चाहिए।
    • इसमें प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन और अनुसंधान अनुदान शामिल होंगे, जिससे सरकारी प्रशासन में कॅरियर उतना ही प्रतिष्ठित और आर्थिक रूप से लाभदायक होगा जितना कि वैश्विक शिक्षा जगत या निजी अनुसंधान एवं विकास क्षेत्र में।
  • “वैज्ञानिक-राजनयिकों” की संस्कृति को बढ़ावा देना: तकनीकी-राष्ट्रवाद के युग में, भारत को ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है, जो IPCC (जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल) या विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकें।
    • आगे की राह विज्ञान कूटनीति में ISS अधिकारियों को प्रशिक्षण देना है, जिससे वे वैश्विक तकनीकी मानकों और बौद्धिक संपदा अधिकारों पर बातचीत करने में सक्षम हों, जो भारत के रणनीतिक लचीलेपन के पक्ष में हों।

निष्कर्ष

भारतीय वैज्ञानिक सेवा का प्रस्ताव शासन में वैज्ञानिक विशेषज्ञता को समाहित करने की बढ़ती आवश्यकता को दर्शाता है, क्योंकि नीति निर्माण में प्रौद्योगिकी का महत्त्व लगातार बढ़ता जा रहा है। अनुच्छेद-312 के तहत संवैधानिक समर्थन, वैज्ञानिक अखंडता के लिए सुरक्षा उपायों और मंत्रालयों में व्यवस्थित एकीकरण के साथ, भारतीय वैज्ञानिक सेवा साक्ष्य-आधारित प्रशासन को मजबूत कर सकती है और साथ ही भारत के वर्ष 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण का समर्थन कर सकती है।

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