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Feb 18 2026

स्वास्थ्य के लिए ‘सही’ और ‘बोध’ AI

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में उत्तरदायी AI अपनाने को सशक्त करने के लिए ‘इंडिया AI समिट 2026’ में ‘सही’ और ‘बोध’ AI का शुभारंभ किया।

‘भारत के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की रणनीति’

 (SAHI) के बारे में

  • ‘सही’  (SAHI) एक राष्ट्रीय मार्गदर्शन ढाँचा है, जिसे भारत के स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सुरक्षित, नैतिक, साक्ष्य-आधारित और समावेशी अपनाने को सक्षम बनाने के लिए तैयार किया गया है।
  • विशेषताएँ
    • AI समाधानों के शासन, डेटा प्रबंधन, सत्यापन, परिनियोजन और सतत् निगरानी पर रणनीतिक दिशा प्रदान करता है।
    • AI अपनाने को राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाता है।
    • नियामक स्पष्टता और संस्थागत समर्थन के माध्यम से उत्तरदायी नवाचार को बढ़ावा देता है।
    • राज्यों और स्वास्थ्य संस्थानों के लिए क्षमता निर्माण को प्रोत्साहित करता है।
  • महत्त्व
    • सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में AI के एकीकरण के लिए एक संरचित रोडमैप स्थापित करता है।
    • डिजिटल स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों में जवाबदेही, रोगी सुरक्षा और नैतिक अनुपालन को सुदृढ़ करता है।
    • वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी हेल्थ AI इकोसिस्टम बनाने की भारत की महत्त्वाकांक्षा का समर्थन करता है।

स्वास्थ्य AI के लिए बेंचमार्किंग ओपन डेटा प्लेटफॉर्म (BODH) के बारे में

  • बोध (BODH) एक गोपनीयता-संरक्षित बेंचमार्किंग प्लेटफॉर्म है, जिसे IIT कानपुर ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के सहयोग से विकसित किया है, ताकि हेल्थ AI मॉडलों का मूल्यांकन किया जा सके।
  • विशेषताएँ
    • रॉ डेटा को साझा किए बिना विविध, वास्तविक दुनिया के डेटासेट का उपयोग कर AI मॉडलों का कठोर परीक्षण सक्षम बनाता है।
    • आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के अंतर्गत एक डिजिटल सार्वजनिक संपदा के रूप में कार्य करता है।
    • सुरक्षित मूल्यांकन संरचना के माध्यम से गोपनीयता संरक्षण सुनिश्चित करता है।
  • महत्त्व
    • AI-आधारित स्वास्थ्य समाधानों में विश्वास, पारदर्शिता और गुणवत्ता आश्वासन को बढ़ाता है।
    • बड़े पैमाने पर परिनियोजन से पूर्व साक्ष्य-आधारित सत्यापन को सुगम बनाता है।
    • भारत के डिजिटल स्वास्थ्य शासन ढाँचे को सुदृढ़ करता है।

पीएम राहत योजना

 

भारत सरकार ने सड़क दुर्घटना पीड़ितों को ₹1.5 लाख तक का कैशलेस उपचार प्रदान करने के लिए पीएम राहत योजना शुरू की है।

प्रधानमंत्री सड़क दुर्घटना पीड़ित अस्पताल में भर्ती और आश्वस्त उपचार (पीएम राहत योजना) के बारे में

  • पीएम राहत एक राष्ट्रीय योजना है, जिसे प्रधानमंत्री द्वारा अनुमोदित किया गया है, ताकि सड़क दुर्घटना पीड़ितों को तत्काल, कैशलेस चिकित्सा उपचार सुनिश्चित किया जा सके।
  • लाभार्थी: किसी भी श्रेणी की सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त प्रत्येक पात्र पीड़ित को प्रति व्यक्ति ₹1.5 लाख तक का कैशलेस उपचार प्राप्त होगा।
    • यह योजना दुर्घटना की तिथि से सात दिनों तक पूरे भारत में लागू है।
  • प्रशासन: यह योजना सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण और राज्य प्राधिकरणों के समन्वय से लागू की जाती है।
  • आपातकालीन पहुँच: यह आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (ERSS) 112 से जुड़ी है, जिससे पीड़ित और शीघ्र एम्बुलेंस और अस्पताल सेवाएँ प्राप्त कर सकें।
  • वित्तपोषण: अस्पतालों को मोटर वाहन दुर्घटना कोष (MVAF) के माध्यम से प्रतिपूर्ति की जाती है।
    • बीमित मामलों में भुगतान सामान्य बीमा कंपनियों के योगदान से किया जाता है।
    • बिना बीमा या हिट-एंड-रन मामलों में भुगतान सरकारी बजटीय सहायता से किया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

  • डिजिटल एकीकरण: यह योजना इलेक्ट्रॉनिक डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट (eDAR) प्लेटफॉर्म को ट्रांजैक्शन मैनेजमेंट सिस्टम (TMS 2.0) के साथ एकीकृत करती है।
  • शिकायत निवारण: जिला कलेक्टर/मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता वाली जिला सड़क सुरक्षा समिति द्वारा नामित शिकायत निवारण अधिकारी द्वारा किया जाएगा।

महत्त्व

  • यह योजना आपातकालीन ट्रॉमा देखभाल को सुदृढ़ करती है, “गोल्डन ऑवर” के दौरान रोकी जा सकने वाली मौतों को कम करती है, अस्पतालों के लिए वित्तीय निश्चितता सुनिश्चित करती है और सड़क सुरक्षा शासन में नागरिक-प्रथम दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है।
    • गोल्डन ऑवर दुर्घटना के बाद पहला एक घंटा होता है, जिसके दौरान त्वरित चिकित्सा उपचार जीवित रहने की संभावना को बढ़ाता है और चोटों की गंभीरता को कम करता है।
    • अध्ययन दर्शाते हैं कि यदि पीड़ितों को पहले घंटे के भीतर अस्पताल में भर्ती कराया जाए, तो लगभग 50% सड़क दुर्घटना मृत्यु को रोका जा सकता है।

विंटर इकॉनोमी

विंटर इकॉनोमी चीन की सेवा-आधारित प्रोत्साहन नीति का प्रमुख उदाहरण बन गई है।

विंटर इकॉनोमी के बारे में

  • विंटर इकॉनोमी से तात्पर्य शीत ऋतु के दौरान उत्पन्न आर्थिक गतिविधियों और उपभोग से है, जो बर्फ तथा हिम संसाधनों पर आधारित होती हैं।
  • चीन में यह अवधारणा एक सीमित बाजार से विकसित होकर एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक चालक बन गई है और अब इसे विकास के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  • इसे आधिकारिक रूप से “आइस एंड स्नो इकोनॉमी” कहा जाता है और वर्ष 2024 के केंद्रीय आर्थिक कार्य सम्मेलन में इसे प्रमुख विकास क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया गया था।
  • मुख्य स्तंभ
    • शीतकालीन खेल एवं पर्यटन: स्की रिसॉर्ट, आइस फेस्टिवल, स्केटिंग।
    • इनडोर सुविधाएँ: वर्षभर उपयोग के लिए कृत्रिम बर्फ पार्क।
    • सहायक सेवाएँ: होटल, भोजन, परिवहन, “नाइट इकोनॉमी” विस्तार।
    • सांस्कृतिक एकीकरण: बर्फ की मूर्तियाँ, आयोजन, जीवनशैली गतिविधियाँ।

पर्यटन से परे: यह विनिर्माण (स्नोमेकिंग मशीन, परिधान, रोबोटिक्स), सेवाओं (आतिथ्य, आयोजन) और ठंडे मौसम में वाहन परीक्षण को भी प्रोत्साहित करता है।

पिटोन दे ला फुर्नेस (Piton de la Fournaise)

वर्ष 2026 में रीयूनियन द्वीप पर स्थित पिटोन दे ला फुर्नेस ज्वालामुखी अत्यधिक सक्रिय रहा, जो शिखर के नीचे विकसित नए भूकंपीय संकट के परिणामस्वरूप, पूर्ववर्ती सापेक्षिक शांत अवधि के बाद इसकी पुनः सक्रियता को दर्शाता है।

पिटोन दे ला फुर्नेस के बारे में

  • पिटोन दे ला फुर्नेस (फ्रेंच में अर्थ: “पीक ऑ द फर्नेस”) विश्व के सबसे सक्रिय ज्वालामुखियों में से एक है।
  • स्थान: यह हिंद महासागर में, मेडागास्कर के पूर्व में स्थित, रीयूनियन द्वीप (फ्राँस का एक विदेशी क्षेत्र) पर स्थित है।
  • ज्वालामुखी का प्रकार: यह एक शील्ड ज्वालामुखी है, जो तरल बेसाल्टिक लावा प्रवाह से निर्मित हुआ है और जिसकी संरचना चौड़ी तथा हल्की ढलान वाली है।
  • टेक्टॉनिक स्थिति: यह अफ्रीकी प्लेट के नीचे स्थित हॉटस्पॉट (मेंटल प्लूम) के कारण निर्मित हुआ है।
  • कैल्डेरा और क्रेटर: मुख्य शिखर क्रेटर डोलोमियू क्रेटर है, जो बड़े एन्क्लोस फूके कैल्डेरा के भीतर स्थित है।
  • यूनेस्को स्थिति: यह “रीयूनियन द्वीप के पिटोन, सर्क और रेम्पार्ट्स” का हिस्सा है, जिसे वर्ष 2010 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।

फ्रंट-ऑफ-पैकेज चेतावनी लेबल (FOPL)

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने FSSAI को चीनी, नमक और संतृप्त वसा की अधिक मात्रा वाले खाद्य पदार्थों पर अनिवार्य फ्रंट-ऑफ-पैकेज चेतावनी लेबल पर विचार करने का निर्देश दिया।

  • न्यायालय ने FSSAI से अनिवार्य फ्रंट-ऑफ-पैकेज चेतावनी लेबल (FOPL) की जाँच करने और नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार पर जोर देते हुए चार सप्ताह के भीतर अपनी प्रतिक्रिया दाखिल करने को कहा।

फ्रंट-ऑफ-पैकेज चेतावनी लेबल (FOPL) के बारे में

  • FOPL पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर प्रदर्शित प्रमुख स्वास्थ्य चेतावनियाँ होती हैं, जो उपभोक्ताओं को चीनी, नमक या संतृप्त वसा की उच्च मात्रा के बारे में सतर्क करती हैं।
    • चिली, मैक्सिको और इजरायल जैसे देशों ने मोटापे और गैर-संचारी रोगों से निपटने के लिए अनिवार्य फ्रंट-ऑफ-पैकेज चेतावनी लेबल प्रणाली अपनाई है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • पैकेजिंग के सामने सरल और स्पष्ट चेतावनी प्रतीक।
    • उच्च चीनी, नमक या संतृप्त वसा की मात्रा का स्पष्ट प्रकटीकरण।
    • तकनीकी व्याख्या के बिना उपभोक्ताओं की आसान समझ के लिए डिजाइन किया गया।
  • FOPL के पीछे तर्क
    • अस्वास्थ्यकर आहार से जुड़े मधुमेह और हृदय रोगों की बढ़ती घटनाएँ।
    • खरीद के समय सूचित उपभोक्ता विकल्प सक्षम करने की आवश्यकता।
    • अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों पर भ्रामक स्वास्थ्य दावों को संबोधित करना।
    • सार्वजनिक स्वास्थ्य विनियमन में वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ भारत को संरेखित करना।
  • महत्त्व: FOPL उपभोक्ता जागरूकता को मजबूत करता है, स्वस्थ आहार विकल्पों को बढ़ावा देता है, और निवारक सार्वजनिक स्वास्थ्य विनियमन के माध्यम से स्वास्थ्य के संवैधानिक अधिकार को सुदृढ़ करता है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के बारे में

  • FSSAI खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
  • भूमिका: FSSAI भारत में खाद्य सुरक्षा मानकों को विनियमित और पर्यवेक्षण करता है, ताकि उपभोक्ताओं को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण भोजन सुनिश्चित किया जा सके।
  • नोडल मंत्रालय: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
  • कार्य
    • यह खाद्य लेबलिंग, एडिटिव्स, पैकेजिंग और गुणवत्ता मानकों पर नियम बनाता है।
    • यह खाद्य व्यवसायों को लाइसेंस प्रदान करता है और निरीक्षण करता है।
    • यह खाद्य सुरक्षा और पोषण के बारे में जन-जागरूकता को बढ़ावा देता है।
    • यह प्रवर्तन के लिए राज्य प्राधिकरणों के साथ समन्वय करता है।
    • यह विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन भी करता है।
  • FSSAI का शासन
    • FSSAI में एक अध्यक्ष और 22 सदस्य होते हैं, जिनमें एक-तिहाई सदस्य महिलाएँ होती हैं।
    • FSSAI के अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
    • मानक निर्धारित करने में इसे वैज्ञानिक समितियों और पैनलों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है तथा प्रवर्तन एजेंसियों के साथ समन्वय के लिए केंद्रीय सलाहकार समिति द्वारा सहायता की जाती है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधारों पर G4 बैठक

वर्ष 2026 के म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में, भारत और G4 देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के व्यापक सुधारों के लिए अपने समन्वित प्रयासों को पुनः तेज किया।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधारों पर G4 बैठक के बारे में

  • विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए जापान, जर्मनी और ब्राजील के अपने समकक्षों से मुलाकात की।
  • G4 ने इस बात पर बल दिया कि एक सुधरी हुई और विस्तारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद वैश्विक अस्थिरता के बीच संयुक्त राष्ट्र की वैधता, प्रतिनिधित्व और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए आवश्यक है।

G4 के बारे में

  • G4 का गठन वर्ष 2005 में भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील द्वारा अपने सदस्यों के लिए एक सुधरी हुई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन करने के लिए किया गया था।
  • इस समूह का कोई स्थायी मुख्यालय नहीं है, क्योंकि यह एक अनौपचारिक कूटनीतिक गठबंधन है।
  • G4 सुधार वार्ताएँ मुख्य रूप से न्यूयॉर्क शहर स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में होती हैं।
  • G4 की प्रमुख माँगें और प्रस्ताव
    • स्थायी सदस्यता: G4 भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील के लिए स्थायी सीटों की माँग करता है, यह तर्क देते हुए कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की सुरक्षा परिषद की संरचना वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती।
    • विस्तार मॉडल: यह परिषद का विस्तार करके 25 से 26 सदस्यों तक करने का प्रस्ताव करता है, जिसमें दो अफ्रीकी देशों सहित छह स्थायी सीटें जोड़ी जाएँ।
    • वीटो में सुधार: G4 ने लचीलापन दिखाते हुए सुझाव दिया है कि नए स्थायी सदस्य सुधार के 15 वर्षों बाद समीक्षा तक वीटो के उपयोग को स्थगित कर सकते हैं।
    • क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व: यह समूह वैधता और समावेशिता बढ़ाने के लिए अफ्रीका, एशिया-प्रशांत और लैटिन अमेरिका के लिए बेहतर प्रतिनिधित्व की वकालत करता है।

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के बारे में

  • इसे प्रायः ‘डावोस ऑफ डिफेंस’ कहा जाता है।
  • म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन एक वार्षिक अंतरराष्ट्रीय मंच है, जो महत्त्वपूर्ण सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा और समाधान के लिए समर्पित है।
  • उद्देश्य: यह राजनीतिक नेतृत्वकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, सैन्य अधिकारियों, विशेषज्ञों और नागरिक समाज प्रतिनिधियों के बीच संवाद और बहस को सुगम बनाता है।
  • सम्मेलन का विकास 
    • इसकी स्थापना शीतयुद्ध के चरम पर एक जर्मन अधिकारी और प्रकाशक, इवाल्ड-हाइनरिख वॉन क्लाइस्ट द्वारा की गई थी।
    • वर्ष 1963 में शुरू हुआ यह सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में एक महत्त्वपूर्ण आयोजन बन गया है।
    • यह सम्मेलन म्यूनिख, जर्मनी में आयोजित किया गया था।

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

  • भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि ऊर्जा क्षेत्र सहित सभी निर्णय किसी भी भू-राजनीतिक गुट के साथ संरेखण के बजाय राष्ट्रीय हित द्वारा निर्देशित होते हैं।
  • उन्होंने कनाडा, फ्राँस, चेक गणराज्य और यूक्रेन के समकक्षों के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी कीं, जिनमें संघर्ष की स्थिति और व्यापार पर ध्यान केंद्रित किया गया।
  • उन्होंने G7 सदस्यों के साथ चर्चाओं में UN@80 सुधार एजेंडा के प्रति समर्थन भी दोहराया।

संदर्भ

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और वेंचर कैपिटल को प्रोत्साहित करने के लिए ₹10,000 करोड़ के स्टार्ट-अप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 को मंजूरी दी है।

स्टार्ट-अप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 के बारे में

  • स्टार्ट-अप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 (FoF 2.0) एक ₹10,000 करोड़ का सरकारी समर्थित कोष है, जिसे वर्ष 2026 में भारतीय स्टार्ट-अप्स में दीर्घकालिक घरेलू वेंचर कैपिटल निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए स्वीकृत किया गया है।
    • यह स्टार्ट-अप इंडिया पहल के अंतर्गत वर्ष 2016 में शुरू किए गए पहले फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्ट-अप्स (FFS 1.0) पर आधारित है।
  • नोडल मंत्रालय: यह योजना वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) द्वारा संचालित की जाती है तथा इसका कार्यान्वयन SIDBI के माध्यम से किया जाता है।
    • SIDBI (स्मॉल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया) एक वैधानिक वित्तीय संस्था है, जो MSMEs और स्टार्ट-अप्स को बढ़ावा देने, वित्तपोषण करने और विकसित करने का कार्य करती है।
  • उद्देश्य
    • भारत के स्टार्ट-अप विकास के अगले चरण को गति देना।
    • घरेलू वेंचर कैपिटल पारिस्थितिकी तंत्र को सशक्त बनाना।
    • प्रारंभिक चरण के वित्तपोषण अंतर और उच्च-जोखिम पूँजी की कमी को कम करना।
    • डीप-टेक और प्रौद्योगिकी-आधारित विनिर्माण नवाचार को बढ़ावा देना।
  • वित्तपोषण तंत्र: FoF 2.0 “फंड ऑफ फंड्स” मॉडल का अनुसरण करता है, जिसके अंतर्गत सरकारी पूँजी को SEBI-पंजीकृत वैकल्पिक निवेश कोष (AIFs) में निवेश किया जाता है, जो आगे पात्र स्टार्ट-अप्स में निवेश करते हैं।
    • यह दृष्टिकोण पेशेवर फंड प्रबंधन और व्यापक पूंजी संग्रह सुनिश्चित करता है।
  • लाभार्थी
    • प्रारंभिक विकास और डीप-टेक स्टार्ट-अप्स।
    • प्रौद्योगिकी-आधारित विनिर्माण उद्यम।
    • प्रमुख महानगरों से बाहर के स्टार्ट-अप्स।
    • छोटे और उभरते AIFs, जिन्हें एंकर कैपिटल समर्थन की आवश्यकता होती है।
  • महत्त्व
    • FFS 1.0 पर आधारित, जिसने 1,370 से अधिक स्टार्ट-अप्स में ₹25,500 करोड़ से अधिक के निवेश को उत्प्रेरित किया।
    • AI, रोबोटिक्स, बायोटेक, क्लीन-टेक और उन्नत विनिर्माण में नवाचार को बढ़ावा देता है।
    • आर्थिक लचीलापन, रोजगार सृजन और विकसित भारत 2047 के तहत भारत को वैश्विक नवाचार केंद्र बनाने के लक्ष्य को सुदृढ़ करता है।

वैकल्पिक निवेश कोष (AIFs) के बारे में

  • AIFs वे निवेश साधन हैं, जिन्हें भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा विनियमित किया जाता है।
    • फरवरी 2026 तक, भारत में 1,768 से अधिक AIFs पंजीकृत थे।
  • भूमिका: ये उच्च-निवल-मूल्य वाले व्यक्तियों (HNIs) और संस्थागत निवेशकों से पूँजी एकत्र करते हैं और मुख्य रूप से श्रेणी I (वेंचर कैपिटल, एंजेल फंड) तथा श्रेणी II (प्राइवेट इक्विटी/डेब्ट) के माध्यम से स्टार्ट-अप्स में निवेश करते हैं।
  • महत्व: AIFs उच्च-जोखिम और गैर-पारंपरिक व्यवसायों को प्रारंभिक, विकास और विस्तार पूँजी प्रदान करते हैं।
    • वे प्रायः वित्तपोषण के साथ-साथ रणनीतिक मार्गदर्शन भी प्रदान करते हैं।

संदर्भ

भारत सरकार ने गुजरात में सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC)-आधारित डिजिटल फूड करेंसी पायलट परियोजना शुरू की है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS)

  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक सरकारी खाद्य सुरक्षा तंत्र है, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 के अंतर्गत पात्र परिवारों को रियायती दरों पर खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुएँ वितरित करता है।
  • नोडल मंत्रालय: उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय (खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग), भारत सरकार।

उचित मूल्य की दुकानें (FPS)

  • ये सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के अंतर्गत खुदरा दुकानें हैं, जो पात्र लाभार्थियों को चावल, गेहूँ और चीनी जैसी आवश्यक वस्तुएँ रियायती दरों पर वितरित करती हैं।

सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC)

  • CBDC किसी देश की संप्रभु मुद्रा का डिजिटल रूप है, जिसे उसके केंद्रीय बैंक द्वारा जारी और विनियमित किया जाता है, और यह भौतिक नकद की तरह ही वैध मुद्रा के रूप में कार्य करती है। भारत में इसे भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किया जाता है और इसे ई-रुपया (डिजिटल रुपया) भी कहा जाता है।

संबंधित तथ्य

  • यह पहल पात्र लाभार्थियों को मिलने वाले अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाएगी, पहुँच को सरल बनाएगी और रियायती खाद्यान्न की आपूर्ति में जवाबदेही को मजबूत करेगी।

CBDC-आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बारे में

  • मुख्य सहयोग: उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक, गुजरात सरकार।
  • डिजिटल कूपन का निर्गमन: CBDC ढाँचे के अंतर्गत, भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से उत्पन्न डिजिटल कूपन, लाभार्थियों के खातों में प्रोग्रामेबल डिजिटल मुद्रा (e₹) के रूप में सीधे जमा किए जाएँगे।
    • लाभार्थियों के डिजिटल वॉलेट में प्रोग्रामेबल डिजिटल रुपया जमा होगा, जिससे क्यूआर कोड-आधारित या कूपन कोड-आधारित लेन-देन संभव होगा।
  • उचित मूल्य की दुकानों की भूमिका: लाभार्थी अपने पात्र खाद्यान्न की मात्रा को उचित मूल्य दुकानों (FPS) पर CBDC कूपन या वाउचर कोड का उपयोग करके प्राप्त कर सकेंगे।

मुख्य पहलें: भारत की खाद्य सुरक्षा प्रणाली का डिजिटल रूपांतरण

  • राशन कार्ड का एंड-टू-एंड डिजिटलीकरण और ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ (ONORC) ढाँचे के अंतर्गत देशव्यापी पोर्टेबिलिटी।
  • आधार-सक्षम प्रमाणीकरण और रियल-टाइम लेन-देन रिकॉर्ड के लिए e-POS उपकरणों की तैनाती।
  • राइटफुल टार्गेटिंग डैशबोर्ड के माध्यम से डेटा-आधारित सत्यापन का कार्यान्वयन।
  • ‘अन्न चक्र’ के माध्यम से डिजिटल आपूर्ति-शृंखला अनुकूलन और ‘अन्न सहायता’ जैसी शिकायत निवारण प्रणालियों को सुदृढ़ करना।

महत्त्व

  • ई-गवर्नेंस: यह प्रणाली बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और e-POS संचालन से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करेगी तथा सुरक्षित, ट्रेसेबल और रियल-टाइम लेन-देन सुनिश्चित करेगी।
  • डिजिटल इंडिया का विस्तार: यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली में डिजिटल इंडिया विजन का एक महत्त्वपूर्ण विस्तार दर्शाती है।
  • सुशासन को बढ़ावा: यह ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ की सरकार की परिकल्पना को और सुदृढ़ करेगा, जिससे लाभार्थियों को अधिक पारदर्शिता और अधिकारों की जागरूकता के साथ उनका हक मिलेगा।
  • FPS डीलरों के लाभ: उचित मूल्य दुकान के डीलरों को भी उनका मार्जिन रियल-टाइम आधार पर प्राप्त होगा, जिससे एक पारस्परिक रूप से लाभकारी पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होगा।

संदर्भ

बढ़ती गर्मी और AC की बढ़ती माँग के साथ, ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग’ भारतीय शहरों को आरामदायक बनाए रखने का एक माध्यम प्रदान करती है, साथ ही विद्युत की खपत और कार्बन उत्सर्जन को कम करती है।

संबंधित तथ्य

  • GIFT सिटी पायलट परिणाम: गुजरात के GIFT सिटी में ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग’ से 6,100 मेगावाट विद्युत माँग में कटौती, वार्षिक 7,850 GWh की बचत, और प्रति वर्ष 6.6 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन की बचत की संभावना का अनुमान है।

शीतलन रणनीति में भारत द्वारा की गई पहलें:

  • इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP, 2019): विश्व की पहली राष्ट्रीय स्तर की शीतलन रणनीति; वर्ष 2037–38 तक शीतलन माँग में 20–25% और रेफ्रिजरेंट उपयोग में 25–30% कटौती का लक्ष्य।
  • ऊर्जा दक्षता बढ़ाने पर राष्ट्रीय मिशन (NMEEE): कुशल औद्योगिक शीतलन और ऊर्जा-बचत तकनीकों को बढ़ावा देता है।
  • इको-निवास संहिता (भवन कोड), 2018: आवासीय भवनों के लिए तापीय संतुलन मानकों और निष्क्रिय डिजाइन को अनिवार्य बनाता है।
  • कूल रूफ प्रोग्राम (तेलंगाना, 2023): उच्च परावर्तन वाले कूल रूफ के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देकर शहरी ऊष्मा और शीतलन ऊर्जा माँग को कम करने हेतु।

डिस्ट्रिक्ट कूलिंग के बारे में

  • डिस्ट्रिक्ट कूलिंग एक केंद्रीकृत प्रणाली है, जो इमारतों के एक समूह को एयर-कंडीशनिंग की सुविधा प्रदान करती है, जैसे पूरे मोहल्ले या परिसर के लिए एक साझा एयर-कंडीशनर।
  • डिस्ट्रिक्ट कूलिंग एक उपयोगिता सेवा (यूटिलिटी) की तरह कार्य करती है, जिसमें एकमुश्त कनेक्शन शुल्क, एक निश्चित माँग शुल्क और एक परिवर्तनीय उपभोग शुल्क से राजस्व प्राप्त होता है।

यह कैसे कार्य करती है?

  • ठंडे जल का उत्पादन: इसमें एक बड़ा केंद्रीय संयंत्र ठंडा जल तैयार करता है और उसे इंसुलेटेड भूमिगत पाइपों के माध्यम से कई इमारतों तक वितरित करता है, जैसे- पाइप्ड प्राकृतिक गैस या विद्युत जैसी सार्वजनिक उपयोगिता सेवा।
  • इनडोर कूलिंग प्रक्रिया: प्रत्येक इमारत के अंदर यह जल हीट एक्सचेंजर से होकर गुजरता है, गर्मी को अवशोषित करके अंदर की हवा को ठंडा करता है, फिर थोड़ा गर्म होकर केंद्रीय संयंत्र में वापस लौटता है, जहाँ इसे फिर से ठंडा कर नेटवर्क में भेज दिया जाता है।
    • ये नेटवर्क से सीधे ‘कूलिंग ऐज ए सर्विस’ प्राप्त करते हैं।
  • डिस्ट्रिक्ट कूलिंग टैरिफ संरचना: डिस्ट्रिक्ट कूलिंग में सामान्यतः एकमुश्त कनेक्शन शुल्क, अधिकतम शीतलन क्षमता के लिए एक निश्चित माँग शुल्क, और वास्तविक ऊर्जा खपत के आधार पर उपयोग शुल्क लिया जाता है।

चुनौतियाँ

  • उच्च पूँजी लागत: संयंत्रों, वितरण नेटवर्क और थर्मल स्टोरेज के लिए बड़े स्तर पर प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता।
  • निश्चित मांग शुल्क: भवनों में कम उपयोग होने पर भी ग्राहकों को आरक्षित क्षमता के लिए भुगतान करना पड़ता है, जिससे बिल अनिश्चित हो सकते हैं।
  • उचित आकार निर्धारण और डिजाइन संबंधी समस्याएँ: शीतलन आवश्यकता का अधिक अनुमान या अक्षम आंतरिक प्रणालियाँ लागत बढ़ा सकती हैं।
  • जल उपयोग संबंधी चिंताएँ: कूलिंग टॉवरों को जल की आवश्यकता होती है, जो यदि प्रभावी ढंग से प्रबंधित न किया जाए तो स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव डाल सकता है।

लाभ

  • उच्च-दक्षता शीतलन: डिस्ट्रिक्ट कूलिंग संयंत्र बड़े, उच्च-दक्षता चिलर और कूलिंग टॉवरों का उपयोग करते हैं, जो व्यक्तिगत भवन प्रणालियों की तुलना में प्रति इकाई विद्युत पर अधिक शीतलन प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण के लिए: कई प्रणालियों में थर्मल स्टोरेज शामिल होता है, जो रात में 20–40% शीतलन का उत्पादन करता है, जब माँग और टैरिफ कम होते हैं।
  • दक्षता और ऊर्जा बचत: अच्छी तरह संचालित डिस्ट्रिक्ट कूलिंग प्रणालियाँ स्वतंत्र भवन की तुलना में दोगुनी दक्षता से कार्य कर सकती हैं।
    • उदाहरण के लिए: ये शीतलन के लिए विद्युत उपयोग को 30–50% तक और उच्चतम ग्रिड माँग को 20–30% तक कम करती हैं।
  • पर्यावरणीय लाभ: कम विद्युत उपयोग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 15–40% की कटौती हो सकती है, केंद्रीकृत उपकरण भवनों में रेफ्रिजरेंट की मात्रा को 80% तक कम करते हैं, और बाहरी एसी इकाइयाँ शहरी गर्मी को घटाने में मदद करती हैं, जहाँ विदेशों में कुछ क्षेत्रों में स्थानीय तापमान में 1–2°C तक की गिरावट देखी गई है।
  • ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग’ में जल दक्षता: ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग’ एक क्लोज्ड-लूप प्रणाली का उपयोग करती है, जिसमें बहुत कम जल की खपत होती है—लगभग 10,000-टन संयंत्र के लिए 1 किलोलीटर जल और केंद्रीकृत बड़े पैमाने के डिजाइन के कारण उपचारित सीवेज या अपशिष्ट जल का भी उपयोग किया जा सकता है।
  • भारत की नेशनल कूलिंग एक्शन प्लान के साथ संरेखण: डिस्ट्रिक्ट कूलिंग विद्युत उपयोग को कम करती है और कुछ माँग को रात के समय स्थानांतरित करती है, जिससे ग्रिड पर दबाव कम होता है, ऊर्जा सुरक्षा में सुधार होता है और हीटवेव के दौरान विद्युत बाधित होने का जोखिम घटता है।
  • जलवायु और शहरी लाभ: केंद्रीकृत डिस्ट्रिक्ट कूलिंग उत्सर्जन को कम करती है, कम-GWP रेफ्रिजरेंट के उपयोग की अनुमति देती है, जिससे भारत की किगाली प्रतिबद्धताओं को समर्थन मिलता है और शहरों में सेवाओं, आईटी, अस्पतालों और डेटा सेंटरों के लिए विश्वसनीय शीतलन प्रदान करती है।
  • डिस्ट्रिक्ट कूलिंग के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र: डिस्ट्रिक्ट कूलिंग उन क्षेत्रों में सबसे प्रभावी होती है, जहाँ शीतलन की माँग अधिक, सघन और पूर्वानुमेय होती है, जैसे वाणिज्यिक जिले, ट्रांजिट कॉरिडोर, हवाई अड्डे, अस्पताल, विश्वविद्यालय तथा आईटी पार्क।

आगे की राह

  • कूलिंग जोन का सीमांकन: शहरी प्राधिकरणों को मास्टर प्लान में डिस्ट्रिक्ट कूलिंग जोन चिह्नित करने चाहिए, संयंत्रों और पाइप कॉरिडोर के लिए भूमि आरक्षित करनी चाहिए और भूमिगत उपयोगिताओं का समन्वय करना चाहिए।
  • नगर निकायों की भूमिका: नगर निकायों को सशक्त और मजबूत बनाने की आवश्यकता है ताकि वे स्पष्ट रियायत नियम, सेवा मानक और दीर्घकालिक ढाँचे लागू कर सकें, जिससे निजी क्षेत्र को निवेश की वसूली का भरोसा मिल सके।
  • नियामक और तकनीकी समर्थन: राज्य नियामक और DISCOMs शीतलन भार को रात में स्थानांतरित कर सकते हैं, इसे टैरिफ से जोड़ सकते हैं और उच्चतम क्षमता का मूल्यांकन कर सकते हैं, जबकि केंद्रीय एजेंसियाँ दिशा-निर्देश प्रदान कर सकती हैं और डेवलपर भवनों को रेडी कनेक्शन पॉइंट्स के साथ डिजाइन कर सकती हैं।

इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) के बारे में

  • वर्ष 2019 में शुरू किया गया इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) भारत के लोगों के जीवन की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार करने तथा सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने से संबंधित है।

इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान का उद्देश्य है:

  • वर्ष 2037–38 तक विभिन्न क्षेत्रों में शीतलन माँग को 20% से 25% तक कम करना।
  • वर्ष 2037–38 तक रेफ्रिजरेंट माँग को 25% से 30% तक घटाना।
  • वर्ष 2037–38 तक शीतलन ऊर्जा आवश्यकताओं को 25% से 40% तक कम करना।
  • “कूलिंग और संबंधित क्षेत्रों” को राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (S&T) कार्यक्रम के अंतर्गत अनुसंधान का प्रमुख क्षेत्र मान्यता देना।
  • स्किल इंडिया मिशन के साथ समन्वय करते हुए वर्ष 2022–23 तक 1,00,000 सर्विसिंग सेक्टर तकनीशियनों का प्रशिक्षण और प्रमाणन करना।

संदर्भ

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की छह सदस्यीय विशेष पीठ ने ग्रेट निकोबार मेगा परियोजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति को बरकरार रखा और हस्तक्षेप के लिए कोई वैध आधार नहीं पाया।

संबंधित तथ्य

  • रणनीतिक महत्त्व: अधिकरण ने स्वीकार किया कि परियोजना के रणनीतिक महत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता।
  • चिंताओं का समाधान: अधिकरण इस बात से संतुष्ट था कि वर्ष 2023 में गठित उच्च-स्तरीय समिति द्वारा पहले उठाई गई चिंताओं का समाधान कर दिया गया है।

NGT का दृष्टिकोण

  • संतुलित दृष्टिकोण: इसने इस बात पर जोर दिया कि द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र की शर्तों का भी सम्मान किया जाना चाहिए और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।
  • बंदरगाह क्षेत्रों के लिए CRZ अनुपालन: अधिकरण ने केंद्र सरकार की प्रस्तुति का उल्लेख किया कि CRZ 1A और 1B क्षेत्रों में आने वाले बंदरगाहों के हिस्सों को संशोधित मास्टर प्लान से बाहर रखा जाएगा।
  • प्रजाति संरक्षण की शर्तें: इसने उल्लेख किया कि लेदरबैक समुद्री टर्टल, निकोबार मेगापोड, खारे पानी का मगरमच्छ, रॉबर क्रेब, निकोबार मकॉक और ग्रेट निकोबार द्वीप की अन्य स्थानिक पक्षी प्रजातियों की रक्षा के लिए विशेष सुरक्षा उपाय अनिवार्य किए गए हैं।
  • पर्यावरणीय स्वीकृति का अनुपालन: पर्यावरणीय स्वीकृति में दी गई शर्तों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाए कि उनका उल्लंघन न हो।
  • तटीय संरक्षण: तटीय कटाव को रोकने और रेतीले समुद्र तटों की रक्षा के लिए, जो द्वीप हेतु महत्त्वपूर्ण प्रजनन स्थल और प्राकृतिक अवरोध हैं।
  • प्रवाल भित्ति संरक्षण: भारतीय प्राणी सर्वेक्षण का हवाला देते हुए अधिकरण ने कहा कि परियोजना क्षेत्र में कोई प्रवाल भित्ति मौजूद नहीं है।
    • बिखरे हुए प्रवालों को स्थानांतरित किया जाएगा और मंत्रालय को तटीय प्रवाल भित्तियों के संरक्षण और वैज्ञानिक पुनर्जीवन को सुनिश्चित करना होगा।

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह एकीकृत विकास निगम लिमिटेड (ANIIDCO) के बारे में 

  • परिचय: अर्द्ध-सरकारी एजेंसी, जिसे वर्ष 1988 में कंपनी अधिनियम के तहत निगमित किया गया।
  • उद्देश्य: क्षेत्र के संतुलित और पर्यावरण-अनुकूल विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का विकास तथा वाणिज्यिक उपयोग करना।
  • परियोजना प्रवर्तक के रूप में नियुक्ति: ग्रेट निकोबार परियोजना के लिए जुलाई 2020 में अंडमान और निकोबार प्रशासन द्वारा नियुक्त किया गया।

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के बारे में

  • विजन: ग्रेट निकोबार को लॉजिस्टिक्स, व्यापार और रक्षा केंद्र में बदलने के लिए एक बहु-घटक मेगा विकास परियोजना, जिससे हिंद महासागर में भारत की उपस्थिति मजबूत होगी।
  • पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और जनजातीय कल्याण अनुपालन के साथ, EIA अधिसूचना 2006 और शोंपेन नीति, 2015 के तहत स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु योजना बनाई गई है।
    • शोंपेन नीति 2015: यह अंडमान और निकोबार प्रशासन द्वारा स्थापित एक नियामक ढाँचा है, जिसका उद्देश्य ग्रेट निकोबार द्वीप पर बड़े पैमाने की विकास परियोजनाओं के दौरान स्वदेशी शोंपेन जनजाति के कल्याण और अधिकारों को प्राथमिकता देना है।
  • कार्यान्वयन प्राधिकरण: अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह एकीकृत विकास निगम लिमिटेड (ANIIDCO)।
  • चरणबद्ध समय-सीमा: वर्ष 2024 से निर्माण कार्य; वर्ष 2028 तक आंशिक संचालन, तथा वर्ष 2050 तक पूर्ण पैमाने पर विकास।
  • उच्च-स्तरीय समिति (HPC) की समीक्षा
    • पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती दिए जाने के बाद, राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने वर्ष 2023 के आदेश के अनुसार, परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति की पुनः समीक्षा के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति (HPC) का गठन किया।

प्रमुख घटक

  • अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): 14.2 मिलियन TEU की क्षमता के साथ, यह कोलंबो/सिंगापुर पर भारत की निर्भरता को कम करेगा और द्वीप को एक वैश्विक शिपिंग हब के रूप में स्थापित करेगा।
    • यह मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 और अमृत काल विजन 2047 का हिस्सा है, जो भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति का समर्थन करता है।
  • ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: हवाई संपर्क में सुधार करेगा, पर्यटन को बढ़ावा देगा और आपात स्थिति में सैनिकों तथा आपूर्ति की त्वरित तैनाती को सक्षम बनाएगा।
  • 450 MVA गैस + सौर ऊर्जा संयंत्र: पारंपरिक और नवीकरणीय स्रोतों के मिश्रण से सतत् विकास के लिए निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।
  • एकीकृत टाउनशिप: 16,610 हेक्टेयर में विस्तृत एक नियोजित टाउनशिप, जो निवासियों और श्रमिकों को आवास, बुनियादी ढाँचा और आधुनिक सुविधाएँ प्रदान करेगी।
  • चरणबद्ध विकास: तीन चरणों (2025–47) में विभाजित, ताकि निवेश को विस्तारित किया जा सके, पारिस्थितिकी दबाव को कम किया जा सके और दो दशकों में अनुकूलनशील योजना बनाई जा सके।

अवस्थिति – ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI)

  • बंगाल की खाड़ी में निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी द्वीप।
  • संरक्षित स्थल
    • ग्रेट निकोबार बायोस्फीयर रिजर्व
    • कैंपबेल बे राष्ट्रीय उद्यान
    • गैलथिया राष्ट्रीय उद्यान।

परियोजना का महत्त्व

  • रणनीतिक स्थान: ग्रेट निकोबार मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जिससे होकर वैश्विक व्यापार का लगभग 30%–40% भाग, जिसमें चीन के तेल और गैस आयात का बड़ा हिस्सा शामिल है, गुजरता है।
  • आर्थिक क्षमता: यह सागरमाला पहल का समर्थन करता है और भारत को सिंगापुर/हांगकांग जैसे क्षेत्रीय ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखता है।
  • अवसंरचना विकास: दूरस्थ क्षेत्र में संपर्क और बुनियादी ढाँचे में सुधार करता है।
  • सामरिक महत्त्व: पूर्वी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नौसैनिक और वायु संचालन क्षमता को बढ़ाता है।
  • क्षेत्रीय कूटनीति: बंगाल की खाड़ी और बिम्सटेक क्षेत्र में भारत को व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करता है। यह ट्रांसशिपमेंट के लिए विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने में मदद करता है।

परियोजना से जुड़ी चिंताएँ

  • पारिस्थितिकी चिंताएँ: ग्रेट निकोबार एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट है (200 पक्षी प्रजातियाँ, स्थानिक वनस्पति, प्रवाल भित्तियाँ)।
    • गैलथिया बे: विशाल लेदरबैक समुद्री टर्टल का महत्त्वपूर्ण प्रजनन स्थल और मैंग्रोव के साथ एक रामसर आर्द्रभूमि।
    • यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल होने की संभावना खतरे में पड़ सकती है।
  • शासन और संस्थागत चिंताएँ: सीमित अनुभव के बावजूद ANIIDCO को परियोजना प्रस्तावक नियुक्त किया गया (पहले शराब, दूध, पर्यटन रिसॉर्ट का प्रबंधन)।
    • वर्ष 2022 तक पर्यावरण नीति और विशेषज्ञता का अभाव → विश्वसनीयता पर सवाल।
    • हितों का टकराव: वही अधिकारी ANIIDCO का नेतृत्व कर रहे हैं और पर्यावरण निगरानी व स्वीकृति के भी प्रभारी हैं।
    • स्वतंत्र निगरानी और पारदर्शिता पर संदेह उत्पन्न होता है।
  • कानूनी और नियामक चिंताएँ: परियोजना क्षेत्र में तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ-1A) शामिल है → सामान्यतः बड़े पैमाने पर निर्माण निषिद्ध होता है।
    • तैयारी की कमी के बावजूद MoEFCC द्वारा दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति को अनियमित बताया गया।
    • NGT और कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित याचिकाएँ वन संबंधी स्वीकृतियों को चुनौती दे रही हैं।

आगे की राह

  • ‘अर्थ जूरिसप्रुडेंस’ (Earth Jurisprudence): बोलीविया, कोलंबिया, इक्वाडोर और न्यूजीलैंड जैसे देश ‘अर्थ जूरिसप्रुडेंस’ का पालन करते हैं, जिसमें प्रकृति को कानूनी अधिकार दिए जाते हैं, भारत को भी पारिस्थितिकी संरक्षण मजबूत करने के लिए यह दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
  • वन अधिकार अधिनियम अनुपालन सुनिश्चित करना: निकोबारी और शोंपेन जनजातियों की वास्तविक भागीदारी के साथ नई ग्राम सभा परामर्श प्रक्रिया आयोजित करना।
    • आगे बढ़ने से पूर्व व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को उचित रूप से मान्यता देकर निपटारा करना।
  • स्वतंत्र पर्यावरण निगरानी: पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के लिए ANIIDCO और अंडमान-निकोबार प्रशासन से बाहर एक स्वतंत्र निगरानी निकाय स्थापित करना।
    • जैव-विविधता और आपदा प्रबंधन में विश्वसनीय बाहरी विशेषज्ञों को शामिल करना।

संदर्भ

भारत भले ही वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रख रहा हो, लेकिन असली कमी गुणवत्तापूर्ण विद्युत आपूर्ति और ग्रामीण क्षेत्रों में लैंगिक समानता में है।  केवल विद्युत कनेक्शन प्रदान करने से आगे बढ़कर महिलाओं के नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRI) की ओर होना चाहिए।

संबंधित तथ्य 

  • महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा ग्रामीण महिलाओं को केवल ऊर्जा उपभोक्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा उद्यमी और निर्णय-निर्माता के रूप में सशक्त बना सकती है।

महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) के बारे में

  • विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) एक परिवर्तनकारी स्वामित्व मॉडल को दर्शाती है, जिसमें छोटे स्तर की ऊर्जा प्रणालियाँ (जैसे- सौर मिनी-ग्रिड, सौर-चालित जल पंप और सौर ड्रायर) महिलाओं के सामूहिक समूहों, विशेषकर स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित तथा स्वामित्व में होती हैं।
  • मॉडल: केंद्रीयकृत बड़े ऊर्जा पार्कों के विपरीत, DRE प्रणालियाँ, ऊर्जा उपयोग के स्थान के निकट स्थापित की जाती हैं।
    • यह मॉडल महिलाओं को प्रमुख डिजाइनर, स्वामी और संचालक के रूप में स्थापित करता है, जिससे ऊर्जा अवसंरचना घरेलू गरिमा और आर्थिक उत्पादकता, दोनों की आवश्यकताओं को पूरा करती है।
  • ढाँचा: यह व्यवस्था समाज–सरकार–बाजार के त्रिस्तरीय ढाँचे पर कार्य करती है, जहाँ सामुदायिक विश्वास (समाज) को सरकारी नीतिगत समर्थन (सरकार) और निजी क्षेत्र की दक्षता (बाजार) का सहारा मिलता है।

विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) के बारे में

  • विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) पारंपरिक बड़े विद्युत संयंत्र आधारित मॉडल का एक वैकल्पिक दृष्टिकोण है। इसमें विशाल केंद्रीय ग्रिड पर निर्भर रहने के बजाय, ऊर्जा का उत्पादन वहीं किया जाता है, जहाँ उसकी वास्तविक आवश्यकता होती है।

DRE मॉडल के छह मुख्य स्तंभ

  • स्थानीयकृत ऊर्जा उत्पादन: पारंपरिक ग्रिड प्रणाली के विपरीत, जिसमें विद्युत सैकड़ों किलोमीटर दूर से प्रसारित की जाती है, विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ स्थल-विशिष्ट होती हैं।
    • ये सूर्य के प्रकाश, पवन या कृषि अपशिष्ट जैसे स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर एक घर, एक स्कूल या कुछ दुकानों के छोटे समूह को ऊर्जा प्रदान करती हैं।
    • इससे लंबी दूरी की विद्युत लाइनों में होने वाली प्रसारण और वितरण हानियाँ समाप्त हो जाती हैं।
  • मॉड्यूलर और विस्तारयोग्य डिजाइन: विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा कोई एक ही समाधान सबके लिए वाली व्यवस्था नहीं है।
    • यह अत्यंत लचीली होती है— कोई गाँव सौर लालटेन या एकल रूफटॉप सोलर पैनल से शुरुआत कर सकता है और धीरे-धीरे उसे ऐसे माइक्रो-ग्रिड में विकसित कर सकता है, जो सिंचाई पंपों या लघु उद्योगों को ऊर्जा प्रदान करे।
    • इससे समुदाय की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुसार क्रमिक निवेश करना संभव हो जाता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा और लचीलापन: क्योंकि विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा राष्ट्रीय ग्रिड से स्वतंत्र रूप से संचालित होती है, इसलिए यह बड़े पैमाने पर होने वाले विद्युत कटौती या लोड शेडिंग के प्रति कम संवेदनशील होती है।
    • आपदा-प्रवण या दूरस्थ क्षेत्रों—जैसे वन क्षेत्र या पहाड़ी इलाकों—में DRE एक भरोसेमंद वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में कार्य करती है, महत्त्वपूर्ण सेवाएँ मुख्य ग्रिड के विफल होने पर भी चालू रहती हैं।
  • उत्पादक उपयोग के लिए उत्प्रेरक: DRE केवल बुनियादी रोशनी तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक महत्त्व नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादक उपयोग में निहित है।
    • आटा चक्की, रेशम कातने की मशीनें या सौर ड्रायर जैसी उपकरणों को ऊर्जा देकर, DRE किसी ग्रामीण परिवार को केवल विद्युत उपभोक्ता से एक उत्पादक आर्थिक इकाई में बदल देती है, जिससे स्थानीय आय में सीधे वृद्धि होती है।
  • लोकतांत्रिक स्वामित्व: पारंपरिक ऊर्जा प्रणालियाँ अक्सर बड़े कॉरपोरेट या राज्य के नियंत्रण में होती हैं। DRE इस शक्ति को सीधे समुदाय के हाथों में सौंप देती है।
    • यह महिला-नेतृत्व वाले मॉडलों को सक्षम बनाती है, जहाँ स्थानीय स्वयं सहायता समूह या सहकारी संस्थाएँ ऊर्जा परिसंपत्तियों का स्वामित्व और प्रबंधन करती हैं। इससे आय स्थानीय अर्थव्यवस्था में ही बनी रहती है, न कि किसी केंद्रीय उपयोगिता तक पहुँचती है।
  • पर्यावरणीय और स्वास्थ्य लाभ: DRE एक स्वच्छ तकनीकी समाधान है, जो डीजल जनरेटर और केरोसिन लैंप का स्थान लेता है। इससे घरों के भीतर होने वाले वायु प्रदूषण में भारी कमी आती है, जो ग्रामीण महिलाओं और बच्चों में श्वसन रोगों का एक प्रमुख कारण है।
    • जीवाश्म ईंधन चरण को छोड़कर, DRE विकासशील क्षेत्रों को सीधे सतत् और कम-कार्बन भविष्य की ओर बढ़ने में मदद करती है।

वर्तमान परिदृश्य- विद्युत ग्रिड से आगे

प्रधानमंत्री सहज विद्युत हर घर योजना (सौभाग्य) ने लगभग हर घर तक भौतिक विद्युत कनेक्शन तो पहुँचा दिया, लेकिन विद्युत आपूर्ति की गुणवत्ता—जैसे नियमितता, पर्याप्त वोल्टेज और विश्वसनीयता—अब भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।

  • विश्वसनीयता की कमी: ग्रामीण क्षेत्रों में अनियमित विद्युत आपूर्ति और वोल्टेज में उतार-चढ़ाव के कारण “कागजी विद्युतीकरण” की स्थिति बन जाती है, जहाँ स्वास्थ्य केंद्र जीवनरक्षक टीकों को सुरक्षित रखने में असमर्थ रहते हैं और स्कूलों के पास भरोसेमंद डिजिटल उपकरण नहीं होते हैं।
  • ऊर्जा असमानता: एक बल्ब जलाने और रसोई को चलाने के बीच गहरी असमानता है। आज भी लाखों महिलाएँ खाना पकाने के लिए खतरनाक जैव-ईंधन पर निर्भर हैं, क्योंकि केंद्रीय ग्रिड अक्सर उनकी ऊष्मीय ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाता है।

तुलनात्मक विश्लेषण — ग्रामीण भारत के लिए ऊर्जा मॉडल

विशेषता केंद्रीयकृत ग्रिड मॉडल महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE)
प्राथमिक लक्ष्य
  • बड़े पैमाने पर उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा: औद्योगिक और शहरी माँग को पूरा करने के लिए विशाल विद्युत संयंत्रों पर केंद्रित।
  • स्थानीय सशक्तीकरण: ग्रामीण आजीविका और घरेलू गरिमा के लिए विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध कराने पर केंद्रित।
प्रबंधन व शासन
  • ऊपर से नीचे की संरचना: राज्य की वितरण कंपनियों या बड़े कॉरपोरेट द्वारा प्रबंधित; निर्णय उपभोक्ता से दूर लिए जाते हैं।
  • नीचे से ऊपर की संरचना: स्वयं सहायता समूहों या ग्राम स्तरीय सामूहिक संस्थाओं द्वारा संचालित; शासन व्यवस्था समुदाय-आधारित और उत्तरदायी।
आपूर्ति की विश्वसनीयता
  • अनियमित आपूर्ति: प्रसारण–वितरण हानियों, वोल्टेज उतार-चढ़ाव और बार-बार विद्युत कटौती के प्रति अत्यधिक संवेदनशील।
  • उच्च विश्वसनीयता: ऊर्जा का उत्पादन उपयोग स्थल पर होने से आवश्यक सेवाओं और उपकरणों के लिए 24×7 स्थिर विद्युत सुनिश्चित।
लैंगिक भूमिका
  • निष्क्रिय उपभोक्ता: महिलाओं को केवल “लाभार्थी” के रूप में देखा जाता है; ऊर्जा अवसंरचना या मूल्य निर्धारण पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता।
  • सक्रिय स्वामित्व: महिलाएँ ऊर्जा परिसंपत्तियों की कानूनी स्वामी, संचालक और निर्णयकर्ता होती हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था का नियंत्रण उनके हाथ में रहता है।
आर्थिक प्रभाव
  • मानकीकरण पर जोर: उत्पादक गतिविधियों (पिसाई, शीतलीकरण, सिलाई) की बजाय केवल रोशनी उपलब्ध कराने पर ध्यान।
  • उत्पादक उपयोग पर केंद्रित: श्रम-साध्य कार्यों के यंत्रीकरण हेतु विशेष रूप से डिजाइन, जिससे घरेलू आय और स्थानीय उद्यमिता में वृद्धि।
तकनीकी रखरखाव
  • शहर-केंद्रित व्यवस्था: शहरी क्षेत्रों के पुरुष तकनीशियनों पर निर्भरता; ग्रामीण प्रणालियों के खराब होने पर लंबे समय तक सेवा बाधित रहती है।
  • स्थानीय कौशल विकास: “ऊर्जा सखी” या “सोलर दीदी” जैसे स्थानीय महिला कैडर का निर्माण, जो तुरंत मरम्मत और रखरखाव सँभाल सके।
पूँजी संरचना
  • सार्वजनिक/कॉरपोरेट ऋण: ट्रांसमिशन लाइनों जैसी बड़ी अवसंरचनाओं के लिए भारी और उच्च ब्याज वाले पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है।
  • सूक्ष्म-वित्त और हरित ऋण: स्वयं सहायता समूहों की बचत और समर्पित हरित ऋण के माध्यम से समुदाय-स्वामित्व वाली परिसंपत्तियाँ तैयार करना।
सामाजिक परिणाम
  • सेवा प्रदाय: सफलता का आकलन केवल पहुँचाए गए कनेक्शनों (तारों) की संख्या से किया जाता है।
  • ऊर्जा संप्रभुता: सफलता का आकलन महिलाओं की एजेंसी, सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता में वृद्धि से किया जाता है।

महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा की आवश्यकता क्यों है?

एनर्जी पाॅवर्टी एक लैंगिक बोझ है और स्थानीयकृत नवीकरणीय समाधान इसके कई महत्त्वपूर्ण आयामों को संबोधित करते हैं:

  • स्वास्थ्य और पोषण: जैव-ईंधन आधारित चूल्हों के स्थान पर स्वच्छ ऊर्जा अपनाने से घर के भीतर वायु प्रदूषण में भारी कमी आती है, जिससे हर वर्ष होने वाली लगभग दो लाख असमय मौतों को रोका जा सकता है।
  • गरीबी में कमी: ग्रामीण भारत में महिलाएँ औसतन प्रतिदिन 3–4 घंटे ईंधन लकड़ी एकत्र करने में लगाती हैं। विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा आधारित स्वचालन इस समय को मुक्त कर शिक्षा, उद्यमिता या विश्राम के लिए अवसर देता है।
  • सुरक्षा और स्वायत्तता: उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भरोसेमंद सौर स्ट्रीट लाइटिंग से शाम के समय सामुदायिक बैठकों और बाजारों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है, जिससे स्थानीय शासन में उनकी भागीदारी और आत्मविश्वास सुदृढ़ हुआ है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादक उपयोग: विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा ग्रामीण महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों को श्रम-साध्य कार्यों जैसे दूध को ठंडा करना या अनाज पिसाई—का यंत्रीकरण करने में सक्षम बनाती है, जो विश्वसनीय विद्युत के बिना पहले संभव नहीं थे।

भारत द्वारा उठाई गई प्रमुख पहलें

  • लखपति दीदी योजना: यह एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य 3 करोड़ “लखपति दीदियों” (ऐसी स्वयं सहायता समूह सदस्य, जिनकी वार्षिक आय ₹1 लाख या उससे अधिक हो) का निर्माण करना है। इसके अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र और अन्य आजीविका गतिविधियों में विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों को जोड़ा जा रहा है।
  • प्रधानमंत्री सूर्य घर (मुफ्त बिजली योजना) : इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक 10,000 “सौर गाँव” स्थापित करना है। यह पहल छतों पर सौर ऊर्जा को बढ़ावा देती है और स्थानीय स्तर पर महिला-नेतृत्व वाले ऊर्जा प्रबंधन को प्रोत्साहित करती है।
  • प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम): यह योजना कृषि क्षेत्र को डीजल पर निर्भरता से मुक्त करने पर केंद्रित है। इसके तहत सौर पंप उपलब्ध कराए जाते हैं और महिला-नेतृत्व वाले जल उपयोगकर्ता समूहों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
  • मिशन शक्ति: यह पहल लैंगिक बजटिंग के माध्यम से महिलाओं की आजीविका को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ती है। वर्ष 2025–26 में रिकॉर्ड आवंटन के साथ, स्वच्छ ऊर्जा आधारित महिला उद्यमों को वित्तीय समर्थन प्रदान किया जा रहा है।

जिन प्रमुख चुनौतियों का समाधान आवश्यक है

संभावनाओं के बावजूद, वर्ष 2025–26 तक कुछ संरचनात्मक ‘अवरोध बिंदु’ बने हुए हैं:

  • उच्च पूँजीगत लागत: प्रारंभिक स्थापना लागत बहुत अधिक होती है। उदाहरण के लिए, सौर-चालित बल्क मिल्क चिलर की कीमत ₹25 लाख तक हो सकती है, जो बिना जमानत के गाँव स्तर के स्वयं सहायता समूहों की पहुँच से अक्सर बाहर होती है।
  • तकनीकी “रखरखाव अंतर”: झारखंड के दूरस्थ जिलों से आई हालिया रिपोर्टों के अनुसार, कई सौर प्रतिष्ठान इसलिए बंद पड़े हैं क्योंकि निकटतम तकनीशियन दूर के शहरों में रहने वाले पुरुष हैं। स्थानीय स्तर पर मरम्मत और रखरखाव के लिए महिला तकनीकी कैडर का अभाव एक बड़ी समस्या बना हुआ है।
  • पितृसत्तात्मक भूमि मानदंड: कृषि जनगणना के अनुसार, भारत में महिलाओं के पास केवल 13.9 प्रतिशत भूमि स्वामित्व है। भूमि अधिकारों की यह कमी सौर सिंचाई पंप जैसी परिसंपत्तियों के लिए औपचारिक बैंक ऋण प्राप्त करने में एक अत्यंत कठिन बाधा बन जाती है।

  • बाजार सूचना में असमानता: हिमाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में छोटे पैमाने के फल प्रसंस्करण उद्यम अब भी महँगे डीजल जनरेटर का उपयोग करते हैं, क्योंकि उन्हें सौर ड्रायर के लिए उपलब्ध सरकारी सब्सिडी और योजनाओं की पर्याप्त जानकारी नहीं होती है।

केस स्टडी

  • छत्तीसगढ़ (अंजोर विजन 2047): यह राज्य स्तरीय रोडमैप नवीकरणीय ऊर्जा को अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाने का लक्ष्य रखता है। इसके तहत 50,000 हरित रोजगार सृजित करने और बिहान मिशन (राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन) के माध्यम से महिलाओं को ऊर्जा उद्यमी के रूप में प्रशिक्षित करने की परिकल्पना की गई है।
  • ओडिशा (सौर रेशम कताई): केओंझार जैसे जिलों में सौर-चालित मशीनों ने हाथ से की जाने वाली कठिन “जाँघ-कताई” की जगह ले ली है। इससे बुनकर महिलाओं की मासिक आय लगभग ₹1,500 से बढ़कर ₹6,000 से अधिक हो गई है।
  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (सोल परियोजना): सौर ऊर्जा लैंप परियोजना के अंतर्गत बिहार में “सोलर दीदी” का एक प्रशिक्षित समूह तैयार किया गया है, जो सौर लैंप का संयोजन, वितरण और रखरखाव करता है। इस पहल ने स्थानीय स्तर पर टिकाऊ सेवा मॉडल और आजीविका के अवसर सृजित किए हैं।

आगे की राह 

  • परिसंपत्ति स्वामित्व अनिवार्यता: नीतियों को उज्ज्वला योजना के आधार पर इस प्रकार बनाया जाना चाहिए कि ऊर्जा परिसंपत्तियों का प्राथमिक या संयुक्त स्वामित्व महिलाओं के नाम हो, ताकि तकनीक पर उनका कानूनी नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।
  • “ऊर्जा सखी” कैडर का निर्माण: अंतिम छोर तक रखरखाव सुनिश्चित करने के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित आधारित व्यावसायिक प्रशिक्षण का विस्तार करते हुए स्थानीय महिला तकनीशियनों का एक सशक्त कार्यबल तैयार किया जाए।
  • वित्तीय नवाचार: महिला-नेतृत्व वाले स्वच्छ-तकनीक स्टार्ट-अप्स के लिए ऋण जोखिम कम करने हेतु प्रथम-हानि डिफॉल्ट गारंटी और समर्पित हरित ऋण सुविधाएँ लागू की जानी चाहिए।
  • पंचायत सशक्तीकरण: पंचायती राज संस्थानों को अपने स्वयं के स्रोत से होने वाले राजस्व का उपयोग करते हुए स्वयं सहायता समूहों के साथ साझेदारी में गाँव स्तर पर “ऊर्जा-एक-सेवा” मॉडल लागू करने में सक्षम बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष 

भारत का नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने का सफर केवल मेगा-पार्कों के आधार पर पूरा नहीं किया जा सकता है। एक न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण के लिए आवश्यक है कि हाशिये पर खड़ी महिलाएँ ऊर्जा मूल्य शृंखला के केंद्र में लाई जाएँ। महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा को व्यापक रूप से अपनाकर, भारत एक साथ एनर्जी पाॅवर्टी, जलवायु परिवर्तन और लैंगिक असमानता—इस त्रि-संकट—का समाधान कर सकता है।

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