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Feb 02 2026

ग्रीन स्टील

 

भारत अत्यधिक महत्त्वाकांक्षी ‘नेशनल डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशंस’ (NDCs) की योजना बना रहा है, जिससे स्टील जैसे क्षेत्रों में ‘कार्बन उत्सर्जन को कम करने’ या  डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonisation) जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति और दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने हेतु  केंद्रीय महत्त्व का बन गया है।

भारत में स्टील उत्पादन के बारे में

  • उत्पादन स्तर: भारत वार्षिक लगभग 125 मिलियन टन स्टील का उत्पादन करता है; अवसंरचना और औद्योगिक वृद्धि को समर्थन देने के लिए मध्य-शताब्दी तक माँग 400 मिलियन टन से अधिक होने का अनुमान है।
  • आर्थिक भूमिका: स्टील GDP वृद्धि, रोजगार और अवसंरचना विकास का एक प्रमुख प्रेरक है।
  • कार्बन योगदान: स्टील क्षेत्र भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन में लगभग 12% का योगदान देता है, मुख्यतः कोयला-आधारित ब्लास्ट फर्नेस मार्गों के कारण।
  • जलवायु चुनौती: कोयला-प्रधान प्रौद्योगिकियों में निरंतर निवेश से ‘कार्बन लॉक-इन’, आर्थिक अक्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में कमी का जोखिम है।
  • ग्रीन स्टील की आवश्यकता: ‘लो-कार्बन स्टील’ की ओर संक्रमण भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने, भविष्य की व्यापार बाधाओं (जैसे- ईयू CBAM) से बचने और वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्द्धी बने रहने के लिए आवश्यक है।

ग्रीन स्टील के बारे में

  • ग्रीन स्टील से तात्पर्य ऐसे इस्पात से है, जिसका उत्पादन कम-या लगभग शून्य-कार्बन प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके किया जाता है, जैसे-ग्रीन हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा, बढ़ा हुआ स्क्रैप रीसाइक्लिंग और कार्बन कैप्चर, न कि कोयला-आधारित प्रक्रियाओं से।
  • भारत में ग्रीन स्टील
    • नीतिगत पहलों में ग्रीनिंग स्टील रोडमैप, ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी (2024), राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) के तहत कार्बन तीव्रता लक्ष्य शामिल हैं।
    • टाटा स्टील, JSW स्टील, सेल और JSPL जैसी कंपनियाँ हाइड्रोजन उपयोग, नवीकरणीय ऊर्जा और कम-कार्बन उपायों का पायलट परीक्षण कर रही हैं।
  • ग्रीन स्टील के लाभ
    • ग्रीन स्टील कोयला-आधारित प्रक्रियाओं को नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और स्क्रैप रीसाइक्लिंग से प्रतिस्थापित करके CO₂ उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाने में सक्षम बनाता है।
    • यह EU के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे कार्बन करों और व्यापार बाधाओं के विरुद्ध भारतीय उद्योग को भविष्य-सुरक्षित बनाता है।
    • ग्रीन स्टील को अपनाने से प्रीमियम वैश्विक बाजारों तक पहुँच सुधरती है और औद्योगिक वृद्धि भारत के नेट जीरो 2070 लक्ष्य तथा उन्नत NDCs के साथ संरेखित होती है।

वैश्विक परिदृश्य

  • यूरोपीय संघ दो दशकों से अधिक समय से ‘स्टील डीकार्बनाइजेशन’ का अनुसरण कर रहा है, जिसमें CBAM सक्रिय रूप से ‘लो-कार्बन स्टील’ उत्पादन को प्रोत्साहित कर रहा है।
  • चीन कोयले पर निर्भरता घटाने के लिए स्क्रैप-आधारित स्टील निर्माण कर रहा है और हाइड्रोजन-आधारित प्रौद्योगिकियों में निवेश कर रहा है।
  • वैश्विक स्तर पर, ग्रीन स्टील में शुरुआती कदम उठाने वाले लागत, प्रतिष्ठा और बाजार लाभ प्राप्त करते हैं, जिससे भविष्य के औद्योगिक मानक आकार लेते हैं।

भारत के लिए रणनीतिक महत्त्व

ग्रीन स्टील अब वैकल्पिक नहीं बल्कि भारत के जलवायु नेतृत्व के लिए एक रणनीतिक अनिवार्यता है। यह औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बनाए रखने, ‘कार्बन लॉक-इन’ से बचने और दीर्घकालिक सतत् आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC)

यूरोपीय संघ (EU) ने ईरान द्वारा प्रदर्शनकारियों पर की गई घातक कार्रवाई के जवाब में ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को अपनी आतंकवादी सूची में शामिल किया है।

संबंधित तथ्य

  • आतंकवादी सूचीकरण के साथ-साथ, EU ने मानवाधिकार उल्लंघनों, इंटरनेट सेंसरशिप और दमन में शामिल ईरानी अधिकारियों और संस्थाओं पर नए प्रतिबंध लगाए हैं।
  • इन प्रतिबंधों में लक्षित व्यक्तियों/संस्थाओं की परिसंपत्ति फ्रीज और यात्रा प्रतिबंध जैसे उपाय शामिल हैं।

इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के बारे में

  • इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC), जिसे सेपाह (Sepah) भी कहा जाता है, ईरान का एक शक्तिशाली वैचारिक सैन्य और सामरिक संगठन है।
  • स्थापना: वर्ष 1979 में ईरानी क्रांति के तुरंत बाद अयातुल्ला रुहोल्लाह खामेनेई  द्वारा स्थापित।
  • उद्देश्य: इस्लामिक गणराज्य और उसके क्रांतिकारी आदर्शों की रक्षा करना।
    • यह ईरान में आंतरिक सुरक्षा और राजनीतिक नियंत्रण का एक प्रमुख साधन है, जिसमें विरोध-प्रदर्शनों और असहमति का दमन भी शामिल है।
    • इसकी बसीज (Basij) मिलिशिया देशव्यापी अशांति को दबाने में केंद्रीय भूमिका निभाती रही है।
  • रिपोर्टिंग: यह सीधे ईरान के सर्वोच्च नेता (वर्तमान में अयातुल्ला अली खामेनेई) को रिपोर्ट करता है।
  • संरचना और शाखाएँ: IRGC एक बहु-सेवा बल है, जिसके पास अपनी समानांतर थलसेना, नौसेना और वायुसेना है।
  • अंतरराष्ट्रीय नामांकन और प्रतिबंध
    • वर्ष 2019 में अमेरिका द्वारा इसे विदेशी आतंकवादी संगठन (FTO) घोषित किया गया था।
    • हालिया EU प्रतिबंध IRGC को EU कानून के तहत इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा जैसे समूहों की श्रेणी में रखता है।

मेघालय के ‘लिविंग रूट ब्रिज’ 

भारत ने मेघालय के ‘लिविंग रूट ब्रिज’ (Living Root Bridges) को वर्ष 2026–27 विश्व धरोहर मूल्यांकन चक्र के तहत यूनेस्को में नामांकित किया है।

मेघालय के ‘लिविंग रूट ब्रिज’ के बारे में

  • स्थान: मेघालय में, मुख्यतः खासी और जयंतिया पहाड़ियों में पाए जाते हैं।
  • ये रबर फिग वृक्ष (Ficus elastica) की हवाई जड़ों को नदियों और नालों के पार मार्गदर्शित कर प्राकृतिक रूप से बनाए गए पुल हैं।
  • सांस्कृतिक परिदृश्य: स्थानीय रूप से “जिंगकियेंग ज्री / ल्यु च्राई” के नाम से जाने जाते हैं, जो एक विशिष्ट जीवित सांस्कृतिक परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • जीवित संरचनाएँ: पारंपरिक पुलों के विपरीत, ये जीवित होते हैं, समय के साथ और मजबूत होते जाते हैं, तथा इनकी आयु 100–300 वर्ष तक होती है।
  • स्वदेशी ज्ञान: खासी और जयंतिया जनजातीय समुदायों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित पारंपरिक पारिस्थितिकी ज्ञान से विकसित और संरक्षित।
  • आध्यात्मिक विश्वास: मेई रामेव (मदर अर्थ) के प्रति श्रद्धा में निहित, जो मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य को दर्शाता है।
  • सततता: जलवायु-लचीले, स्वयं-मरम्मत करने वाले और पर्यावरण-अनुकूल; इनमें कंक्रीट, स्टील या बाहरी सामग्री का उपयोग नहीं होता।
  • सामुदायिक शासन: स्थानीय संस्थाओं और प्रथागत कानूनों के माध्यम से प्रबंधित, जो सामूहिक स्वामित्व और देखभाल सुनिश्चित करते हैं।

कालबेलिया समुदाय

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने राजस्थान में कालबेलिया समुदाय द्वारा अपने मृतकों के लिए नामित कब्रिस्तान की माँग को लेकर किए गए विरोध प्रदर्शन पर स्वतः संज्ञान लिया है।

कालबेलिया समुदाय के बारे में 

  • कालबेलिया राजस्थान की एक घुमंतू जनजाति है।
  • पारंपरिक व्यवसाय: कालबेलिया पारंपरिक रूप से सपेरा थे और सार्वजनिक आयोजनों में सर्पों के साथ प्रदर्शन करने तथा विष के व्यापार से आजीविका का वहन करते थे।
  • इस समुदाय को अन्य नामों से भी जाना जाता है; जैसे—सपेरा, जोगीरा, गट्टिवाला और पूगीवारा।
  • धार्मिक और अंतेष्टि प्रथाएँ: यद्यपि कालबेलिया नाथ परंपरा के हिंदू हैं, वे अपने मृतकों का दाह-संस्कार नहीं करते हैं।
    • इसके बजाय, वे मृतकों को दफनाते हैं और सम्मान के प्रतीक के रूप में कब्र पर भगवान शिव के नंदी बैल की प्रतिमा स्थापित करते हैं।
    • राजस्थान में कालबेलिया समुदाय के लिए अंतेष्टि हेतु भूमि का संघर्ष वर्तमान में एक प्रमुख और निरंतर मुद्दा बना हुआ है।
  • सांस्कृतिक पहचान: सर्पों की गतियों से प्रेरित, जीवंत कालबेलिया लोकनृत्य और संगीत के लिए प्रसिद्ध।
  • यूनेस्को मान्यता: कालबेलिया लोकगीत और नृत्य को वर्ष 2010 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया था।
  • नृत्य की विशेषताएँ: मुख्यतः महिलाएँ काले रंग की घूमती हुई घेरदार स्कर्ट पहनकर प्रस्तुति देती हैं, जिन पर जटिल कढ़ाई और चाँदी के आभूषण होते हैं।

विश्व परमाणु प्रदर्शन रिपोर्ट, 2025

विश्व परमाणु प्रदर्शन रिपोर्ट 2025 में वर्ष 2024 में रिकॉर्ड 2667 टेरावाट-घंटा परमाणु विद्युत उत्पादन का उल्लेख किया गया है, जो वर्ष 2050 तक वैश्विक परमाणु क्षमता को तीन गुना करने की माँग को और बल प्रदान करता है।

विश्व परमाणु प्रदर्शन रिपोर्ट, 2025

  • विश्व परमाणु प्रदर्शन रिपोर्ट 2025 वैश्विक परमाणु बिजली उत्पादन, रिएक्टर प्रदर्शन, क्षमता प्रवृत्तियों और निर्माण दृष्टिकोण का व्यापक मूल्यांकन प्रदान करती है।
  • प्रकाशन: यह रिपोर्ट विश्व परमाणु संघ (World Nuclear Association – WNA) द्वारा प्रकाशित की जाती है।
  • उद्देश्य: यह परमाणु ऊर्जा की भूमिका का मूल्यांकन करती है, विशेषकर ऊर्जा सुरक्षा, डीकार्बनाइजेशन और बढ़ती विद्युत माँग के संदर्भ में, जिसमें विद्युतीकरण, डेटा सेंटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से प्रेरित वृद्धि शामिल है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • रिकॉर्ड परमाणु उत्पादन: वैश्विक परमाणु रिएक्टरों ने वर्ष 2024 में 2667 टेरावाट-घंटा (TWh) विद्युत उत्पादन किया, जिससे 2006 का पूर्व रिकॉर्ड टूट गया। यह प्रदर्शन लगभग 83% उच्च औसत क्षमता गुणांक के कारण संभव हुआ।
    • किसी विद्युत संंयंत्र का क्षमता गुणांक किसी विद्युत संयंत्र की उस विशिष्ट अवधि में वास्तविक ऊर्जा उत्पादन और उस संभावित उत्पादन के अनुपात को कहते हैं, जो संयंत्र अपनी पूर्ण ‘नेमप्लेट’ क्षमता (nameplate capacity) पर लगातार 24/7 संचालन के दौरान उत्पन्न कर सकता था।
  • तेजी से विस्तार की आवश्यकता: वर्ष 2050 तक परमाणु उत्पादन को तीन गुना करने के लिए, वार्षिक क्षमता वृद्धि में तीव्र वृद्धि की आवश्यकता है, जो वर्तमान निर्माण दरों से कहीं अधिक होनी चाहिए और यह 1980 के दशक के बराबर या उससे भी अधिक हो सकती है।
  • रिएक्टरों की आयु को 60–80 वर्षों तक बढ़ाना बड़े पैमाने पर निम्न-कार्बन विद्युत सुनिश्चित करने के सबसे लागत-कुशल तरीकों में से एक के रूप में पहचाना गया है, जिससे यह समय से पहले बंद होने से बचा जा सकता है।

वैश्विक परमाणु विकास में भारत की स्थिति

  • वैश्विक अग्रणी देशों में: भारत को चीन, फ्राँस, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ उन पाँच देशों में शामिल किया गया है, जो मिलकर वर्ष 2050 तक लगभग 980 गीगावाट विद्युत (GWe) वैश्विक परमाणु क्षमता में योगदान कर सकते हैं।
  • डीकार्बनाइजेशन में रणनीतिक भूमिका: भारत का समावेश इसके लगातार परमाणु रिएक्टर बेड़े के विस्तार की अपेक्षाओं को दर्शाता है, जिससे परमाणु ऊर्जा को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और निम्न-कार्बन संक्रमण रणनीति के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि वर्ष 2050 तक वैश्विक परमाणु क्षमता को तीन गुना करना संभव है, लेकिन इसके लिए नीतिगत स्पष्टता, तेज निर्माण कार्य, वित्तीय सुधार और अंतरराष्ट्रीय समन्वय की आवश्यकता होगी।

विश्व परमाणु संघ (World Nuclear Association)

  • विश्व परमाणु संघ (WNA) की स्थापना वर्ष 2001 में हुई थी तथा इसका मुख्यालय लंदन में स्थित है।
    • यह एक अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक संगठन है, जो वैश्विक नागरिक परमाणु क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
  • लक्ष्य और उद्देश्य: WNA परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण और सतत् उपयोग को सुगम बनाने, परमाणु ऊर्जा की जानकारीपूर्ण समझ को बढ़ावा देने और जलवायु परिवर्तन शमन एवं ऊर्जा सुरक्षा में इसकी भूमिका की वकालत करने के लिए काम करता है।
  • कार्य: यह संगठन प्रामाणिक डेटा और रिपोर्ट प्रकाशित करता है, उद्योग की सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों को विकसित करता है, प्रमुख वैश्विक मंचों पर परमाणु हितों का प्रतिनिधित्व करता है और सुरक्षा, संरक्षा और अर्थशास्त्र पर सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • सदस्यता: इसके सदस्य संपूर्ण परमाणु ईंधन चक्र में विस्तृत हैं और सामूहिक रूप से वैश्विक परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लगभग 70% हिस्सा हैं, जो दुनिया भर की अग्रणी कंपनियों और हितधारकों को एक साथ लाते हैं।

धन धन श्री गुरु हर राय साहिब जी

केंद्रीय गृह मंत्री ने धन धन श्री गुरु हर राय साहिब जी के प्रकाश पर्व पर शुभकामनाएँ दीं और उनके करुणा, सेवा तथा समानता के आदर्शों को स्मरण किया।

धन धन श्री गुरु हर राय साहिब जी (1630–1661) के बारे में

  • सिखों के सातवें गुरु धन धन श्री गुरु हर राय साहिब जी ने 1644 से 1661 तक सिख पंथ का नेतृत्व किया।
  • उन्हें “कोमल हृदय वाले गुरु” के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है, क्योंकि उन्होंने मीरी-पीरी की परंपरा को निभाते हुए शांति, उपचार और मानवीय सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
    • मीरी-पीरी की परंपरा, छठे सिख गुरु गुरु हरगोबिंद साहिब जी (1606) द्वारा प्रारंभ की गई थी, जो आध्यात्मिक अधिकार (पीरी) और लौकिक या सांसारिक शक्ति (मीरी) के अविभाज्य समन्वय को प्रदर्शित करती है।

मुख्य योगदान

  • करुणा और सामाजिक सेवा: उन्होंने लंगर और संगत की संस्थाओं को सुदृढ़ किया ताकि जाति, वर्ग और समुदाय की परवाह किए बिना सभी को सम्मान तथा देखभाल प्राप्त हो सके। उन्होंने अस्पताल और औषधालय स्थापित किए, जहाँ जड़ी बूटियाँ और औषधियों द्वारा नि:शुल्क उपचार प्रदान किया जाता था।
  • पर्यावरणीय चेतना: पर्यावरणीय संवेदनशीलता के अग्रदूत के रूप में उन्होंने कीरतपुर साहिब में बागों का विकास किया और वन्यजीवों की रक्षा की, जो प्रकृति के साथ सिखों की समरसता के मूल्यों को दर्शाता है।
  • सिख-मुगल संबंध: यद्दपि उन्होंने लगभग 2,200 घुड़सवारों की एक अनुशासित सेना बनाए रखी, परंतु संघर्ष से परहेज किया।
    • दारा शिकोह को उनकी चिकित्सा सहायता राजनीतिक मतभेदों से परे करुणा का प्रतीक थी।
  • सिख धर्म का विस्तार: उन्होंने 360 मिशनरी केंद्रों (मंजी) की स्थापना करके और गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पूरे पंजाब में प्रचार करके सिख धर्म का विस्तार किया।

विरासत: गुरु हर राय साहिब जी का जीवन निस्वार्थ सेवा, समानता, पर्यावरणीय नैतिकता और नैतिक साहस को प्रेरित करता रहता है, और सिख दर्शन तथा भारतीय इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ता है।

भारत-अरब लीग विदेश मंत्रियों की बैठक

हाल ही में भारत ने नई दिल्ली में दूसरे भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी की, जिसमें अरब जगत के साथ रणनीतिक जुड़ाव की पुष्टि की गई।

भारत-अरब लीग विदेश मंत्रियों की बैठक

  • दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक नई दिल्ली में आयोजित की गई, जिसमें अरब देशों के विदेश मंत्रियों, अरब लीग के महासचिव और वरिष्ठ अरब प्रतिनिधिमंडलों ने भाग लिया।
  • उद्देश्य: व्यापार, निवेश, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा में भारत-अरब सहयोग को गहरा करना। इसने क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों पर चर्चा के लिए एक मंच भी प्रदान किया।
  • महत्त्व: इस संवाद ने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में भारत की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया, फिलिस्तीन और गाजा में शांति प्रयासों के लिए समर्थन की पुष्टि की तथा आर्थिक सहयोग एवं साझा सुरक्षा चिंताओं पर सहमति को उजागर किया।

अरब लीग (अरब राज्यों का संघ) के बारे में

  • अरब लीग की स्थापना 22 मार्च, 1945 को मिस्र के काहिरा शहर में अरब देशों के मध्य एकता तथा सहयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
  • सदस्यता: इसमें पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के 22 सदस्य देश शामिल हैं।
    • मिस्र, इराक, जॉर्डन, लेबनान, सऊदी अरब, सीरिया, लीबिया, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, बहरीन, कोमोरोस, जिबूती, कुवैत, मॉरिटानिया, मोरक्को, ओमान, फिलिस्तीन, कतर, सोमालिया, सूडान, संयुक्त अरब अमीरात और यमन।
  • उद्देश्य: लीग की संप्रभुता की रक्षा करना, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देना तथा कूटनीति के माध्यम से क्षेत्रीय विवादों का समाधान करना है।
  • भारत-अरब लीग की सहभागिता: अरब-भारत सहयोग मंच (AICF) की स्थापना वर्ष 2008 में हुई थी, जिसकी पहली मंत्रिस्तरीय बैठक वर्ष 2016 में बहरीन के मनामा में आयोजित की गई थी, जिसने भारत-अरब संवाद को संस्थागत रूप दिया।

राष्ट्रीय कुष्ठ रोग दिवस

राष्ट्रीय कुष्ठ रोग दिवस 2026 के अवसर  पर, केंद्रीय कुष्ठ रोग प्रभाग ने जागरूकता, शीघ्र पहचान और इससे जुड़े कलंक में कमी को प्रोत्साहित करने के लिए दिल्ली हाट में एक सूचना, शिक्षा एवं संचार (Information, Education and Communication – IEC) आउटरीच कार्यक्रम का आयोजन किया।

राष्ट्रीय कुष्ठ रोग दिवस के बारे में

  • राष्ट्रीय कुष्ठ रोग दिवस भारत में प्रतिवर्ष 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि और कुष्ठ रोग से प्रभावित व्यक्तियों के लिए उनके आजीवन प्रयासों की स्मृति में मनाया जाता है।
  • उद्देश्य: इस दिवस का उद्देश्य जन जागरूकता बढ़ाना, शीघ्र निदान और पूर्ण उपचार को बढ़ावा देना तथा कुष्ठ रोग से जुड़े कलंक और भेदभाव को समाप्त करना है।
    • यह राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NLEP) के तहत वर्ष 2027 तक “कुष्ठ रोग मुक्त भारत” प्राप्त करने की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को भी सुदृढ़ करता है।
  •  प्रमुख गतिविधियाँ (2026): व्यवहार परिवर्तन और सामाजिक समावेश को प्रोत्साहित करने के लिए IEC अभियान, नुक्कड़ नाटक, आत्म-परीक्षण पहल, सामुदायिक प्रतिज्ञाएँ और शैक्षिक सामग्री का वितरण किया गया।

कुष्ठ रोग (हैनसेन रोग) के बारे में 

  • कुष्ठ रोग एक दीर्घकालिक संक्रामक रोग है, जो माइकोबैक्टीरियम लेप्री (Mycobacterium leprae) जीवाणु के कारण होता है और मुख्य रूप से त्वचा, परिधीय तंत्रिकाओं, आँखों तथा ऊपरी श्वसन पथ को प्रभावित करता है।
    • शीघ्र पहचान, संपर्क व्यक्तियों की जाँच तथा कुष्ठ रोग निवारण प्रमुख रोकथाम रणनीतियाँ हैं।
  • उपचार: कुष्ठ रोग पूर्णतः उपचार योग्य है और इसका इलाज मल्टी-ड्रग थैरेपी (Multi-Drug Therapy – MDT) से किया जाता है, जिसमें डैप्सोन, रिफैम्पिसिन और क्लोफैजिमिन शामिल हैं, जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निःशुल्क प्रदान किया जाता है।

विश्व कुष्ठ रोग दिवस

  • विश्व कुष्ठ रोग दिवस जनवरी के अंतिम रविवार को विश्व स्तर पर मनाया जाता है ताकि कुष्ठ रोग को एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग (NTD) के रूप में उजागर किया जा सके।
  • थीम (2026): “लेप्रोसी इज क्योरबल, द रियल चैलेंज इज स्टिग्मा”।
  • वैश्विक महत्त्व: कई देशों में राष्ट्रीय स्तर पर उन्मूलन के बावजूद, प्रति वर्ष दो लाख से अधिक नए मामले सतत् वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

संदर्भ

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के व्यापक अद्यतन पर विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट जारी की है।

  • संशोधित CPI शृंखला को CPI 2024 के नाम से जाना जाएगा।

CPI अद्यतन पर विशेषज्ञ समूह रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

  • आधार वर्ष और संदर्भ अवधि का संशोधन
    • CPI का आधार वर्ष हालिया उपभोग पैटर्न को दर्शाने हेतु वर्ष 2024 = 100 किया गया है।
    • वजन संदर्भ अवधि को घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (HCES) 2023–24 निर्धारित किया गया है, ताकि समकालीन प्रासंगिकता सुनिश्चित हो।
    • जहाँ वित्त वर्ष 2023–24 का डेटा उपलब्ध नहीं है, वहाँ HCES 2022–23 के डेटा का उपयोग किया जाएगा।
  • बाजार और मद (आइटम) कवरेज में विस्तार
    • बाजार कवरेज: ग्रामीण बाजारों की संख्या 1181 से बढ़कर 1465 हो गई है, जबकि शहरी बाजारों की संख्या 1114 से बढ़कर 1395 हो गई है, जिससे अब 434 नगरों को कवर किया गया है, जबकि पहले 310 नगर शामिल थे।
    • मद कवरेज: कुल भारित मदों की संख्या 299 से बढ़कर 358 हो गई है, जिसमें वस्तुओं (308) और सेवाओं (50) दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
      •  पूर्व CPI 2012: 299 मदें (वस्तुएँ 259, सेवाएँ 40)।
  • अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण को अपनाना
    • CPI ढाँचा उपभोग उद्देश्य के अनुसार, व्यक्तिगत उपभोग का वर्गीकरण (COICOP) 2018 अपनाएगा, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनुमोदित नवीनतम वर्गीकरण है।
    • इससे भारत के मुद्रास्फीति आँकड़ों की अंतरराष्ट्रीय तुलनीयता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता में वृद्धि होती है।
  • नए सिरे से बाजार सर्वेक्षण का संचालन: निम्नलिखित के लिए नवीन बाजार सर्वेक्षण की सिफारिश की गई है:
    • ग्रामीण और शहरी नमूनों का सत्यापन
    • प्रतिनिधि बाजारों और दुकानों की पहचान
    • मदों और विनिर्देशों का मानचित्रण।
  • ऑनलाइन बाजारों की शुरुआत
    • 25 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में 12 ऑनलाइन बाजारों को शामिल किया गया है।
    • डिजिटल उपभोग प्रवृत्तियों हेतु ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से साप्ताहिक मूल्य संग्रह किया जाएगा।
  • सूचकांक संकलन पद्धति
    • CPI 2024 शृंखला में महत्त्वपूर्ण पद्धतिगत सुधार किए गए हैं।
    • प्राथमिक स्तर पर, जेवन्स का लघु (चेन-बेस) सूचकांक सूत्र लंबी सूचकांक पद्धति की जगह अपनाया गया है, जिससे आधार मूल्यों पर निर्भरता कम होती है और स्थिरता में सुधार होता है।
    • उच्च समेकन स्तरों पर, सूचकांकों का संकलन संशोधित लैस्पेयर्स (यंग) सूचकांक के माध्यम से किया जाएगा, जो स्थिर व्यय भारों को अद्यतन मूल्य डेटा के साथ संयोजित करता है।
  • आवास सूचकांक में सुधार
    • पहली बार आवास सूचकांक को ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तारित किया गया है।
    • विकृति से बचने के लिए नियोक्ता द्वारा प्रदत्त आवास को बाहर रखा जाएगा।
    • आवास प्रकार के भार निर्धारण के लिए जनगणना 2011 का उपयोग किया जाएगा।
  • बिजली कीमतों का मापन: बिजली कीमतों को चार मानक उपभोग स्लैब (100, 200, 300 और 400 इकाइयाँ) का उपयोग करके संकलित किया जाएगा।
  • निःशुल्क सामाजिक अंतरणों का उपचार: PMGKAY और PDS जैसी योजनाओं के तहत वितरित निःशुल्क वस्तुओं को CPI में शामिल नहीं किया जाएगा।
    • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि CPI उन कीमतों को प्रतिबिंबित करे, जो परिवार वास्तव में चुकाते हैं, न कि कल्याणकारी अंतरणों को।
  • डेटा प्रसार में सुधार
    • CPI 2024 शृंखला डेटा प्रसार में उल्लेखनीय सुधार लाती है, जिसमें ग्रामीण, शहरी और संयुक्त क्षेत्रों के लिए मद-स्तरीय सूचकांक तथा सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए आँकड़े जारी किए जाएँगे।
    • डेटा COICOP के सभी स्तरों विभाग, समूह, वर्ग, उप-वर्ग और मद पर आधारित होगा।

संदर्भ

भारत सरकार ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत कोकिंग कोयले को एक महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज के रूप में अधिसूचित किया है।

कोकिंग कोयले के बारे में

  • कोकिंग कोयले पृथ्वी की भूपर्पटी में पाया जाने वाला प्राकृतिक अवसादी शैल है और इसके महत्त्वपूर्ण औद्योगिक उपयोगों के कारण इसे धातुकर्मीय कोयला (Metallurgical Coal) भी कहा जाता है।
  • गुणधर्म
    • कोकिंग कोयले में वायु की अनुपस्थिति में गर्म करने पर कोमल होने, फूलने तथा आपस में चिपकने का विशिष्ट गुण होता है, जिससे हल्का एवं छिद्रयुक्त कोक निर्मित होता है।
    • तापीय कोयले (Thermal Coal) की तुलना में इसमें कार्बन की मात्रा अधिक तथा राख और नमी की मात्रा कम होती है।
  • वर्गीकरण: राख की मात्रा, वाष्पशीलता तथा कोकिंग गुणों के आधार पर कोकिंग कोक को तीन प्रमुख उप-प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है।
    • प्राथमिक कोकिंग कोयला: कम राख, कम वाष्पशील पदार्थ और उच्च कोकिंग शक्ति।
    • मध्यम कोकिंग कोयला: कम राख, मध्यम वाष्पशील पदार्थ और तुलनात्मक रूप से कम कोकिंग सूचकांक।
    • अर्द्ध/कमजोर कोकिंग कोयला: कम राख, उच्च वाष्पशील पदार्थ और अत्यंत कम कोकिंग सूचकांक; सामान्यतः इसे उच्च श्रेणी के कोयले के साथ मिश्रित किया जाता है।
  • कोकिंग कोयले का महत्त्व
    • इस्पात उत्पादन में भूमिका: ब्लास्ट फर्नेस के माध्यम से इस्पात उत्पादन हेतु कोकिंग कोयला एक आवश्यक कच्चा माल है तथा यह अवसंरचना, विनिर्माण, रक्षा और निर्माण क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • रणनीतिक महत्त्व: कोकिंग कोयले की उपलब्धता सीधे इस्पात क्षेत्र की क्षमता, लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता तथा आपूर्ति शृंखला की स्थिरता को प्रभावित करती है।
  • वैश्विक उत्पादन: कोकिंग कोयले के प्रमुख उत्पादक देशों में चीन, ऑस्ट्रेलिया, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा शामिल हैं।
  • घरेलू उपलब्धता
    • भारत में कोकिंग कोयले के अनुमानित 37.37 अरब टन संसाधन हैं, जो मुख्यतः झारखंड में स्थित हैं; इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में भी भंडार पाए जाते हैं।
    • वित्त वर्ष 2020–21 में आयात 51.20 मिलियन टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024–25 में 57.58 मिलियन टन हो गया।
    • वर्तमान में इस्पात क्षेत्र की कोकिंग कोयले की लगभग 95 प्रतिशत आवश्यकता आयात से पूरी की जाती है, जिससे विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव और आपूर्ति संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं।

MMDR अधिनियम, 1957 के बारे में

  • विनियामक ढाँचा: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 केंद्र सरकार को खानों के विनियमन तथा देश में खनिज संसाधनों के विकास की निगरानी का अधिकार देता है।
  • संस्थागत तंत्र: यह अधिनियम निम्नलिखित की स्थापना का प्रावधान करता है –
    • जिला खनिज फाउंडेशन (DMF): खनन से प्रभावित क्षेत्रों के कल्याण को बढ़ावा देने हेतु।
    • राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास (NMET): खनिज अन्वेषण को सुदृढ़ करने और अवैध खनन पर अंकुश लगाने हेतु।
  • महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की सूची: MMDR अधिनियम की प्रथम अनुसूची के भाग–D में निर्दिष्ट है, जिसमें 24 खनिज शामिल हैं, जैसे— बेरिल एवं अन्य बेरिलियम-युक्त खनिज, कैडमियम-युक्त खनिज, पोटाश, फॉस्फेट (यूरेनियम रहित), ग्रेफाइट आदि।

महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं तथा आयात निर्भरता या वैश्विक उत्पादन के संकेंद्रण के कारण उच्च आपूर्ति-शृंखला जोखिम का सामना करते हैं।

संदर्भ

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नैदानिक उपचार के रूप में प्रदान नहीं किया जा सकता।

पृष्ठभूमि

  • यह निर्णय उन याचिकाओं के संदर्भ में आया, जिनमें निजी क्लीनिकों द्वारा ASD के लिए स्टेम सेल थेरेपी के व्यापक प्रचार और उपयोग को उजागर किया गया था।
  • क्लीनिकों द्वारा प्रायोगिक थेरेपी को “उपचार” या “देखभाल” के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, जिससे झूठी आशाएँ उत्पन्न हो रही थीं।
  • वित्तीय शोषण: परिवारों को इन अप्रमाणित हस्तक्षेपों के पीछे भारी आर्थिक व्यय वहन करना पड़ता था।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

  • नैदानिक उपयोग निषिद्ध: न्यायालय ने स्पष्ट रूप से निर्णय दिया कि ASD के लिए स्टेम सेल “थेरेपी” को नियमित नैदानिक उपचार के रूप में प्रदान नहीं किया जा सकता है।
  • वैज्ञानिक साक्ष्य का अभाव
    • न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि ASD के लिए स्टेम सेल थेरेपी की प्रभावशीलता और सुरक्षा, दोनों के संबंध में “स्थापित वैज्ञानिक साक्ष्यों का अभाव” है।
    • अनिश्चित वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर स्टेम सेल थेरेपी का उपयोग, चिकित्सकों द्वारा रोगियों के प्रति देय “उचित देखभाल के मानक” को पूरा नहीं करता।
  • सूचित सहमति मान्य नहीं: न्यायालय ने कहा कि पर्याप्त वैज्ञानिक आँकड़ों के अभाव में वैध सूचित सहमति संभव नहीं है।
    • सूचित सहमति का अर्थ है कि किसी उपचार के लिए दी गई सहमति तब ही वैध मानी जाएगी, जब वह ऐसे व्यक्ति द्वारा दी गई हो जो निर्णय लेने में सक्षम हो, और उसे उपचार से संबंधित सभी आवश्यक जानकारी स्पष्ट रूप से बताई गई हो।
      • इसमें उपचार की प्रकृति, प्रक्रिया, उद्देश्य, संभावित लाभ, जोखिम, उपलब्ध विकल्प तथा उपचार को आगे न बढ़ाने पर होने वाले परिणाम शामिल होते हैं।
  • स्टेम सेल थेरेपी की माँग का कोई अधिकार नहीं
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि माता-पिता, अभिभावक या देखभालकर्ता ASD से पीड़ित बच्चों के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नैदानिक सेवा के रूप में माँग नहीं सकते।
    • रोगी की स्वायत्तता असुरक्षित या अप्रमाणित चिकित्सीय हस्तक्षेपों का अधिकार उत्पन्न नहीं करती।
  • नियामक प्राधिकरण: सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को स्टेम सेल अनुसंधान की देशव्यापी निगरानी के लिए एक समर्पित नियामक प्राधिकरण गठित करने का निर्देश दिया।

स्टेम सेल थेरेपी

  • स्टेम सेल थेरेपी पुनर्योजी चिकित्सा का एक रूप है, जिसका उद्देश्य क्षतिग्रस्त कोशिकाओं और ऊतकों की मरम्मत या प्रतिस्थापन करना है।
  • यह मुख्यतः सूजन को कम करने और प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने के माध्यम से कार्य करती है, जिससे विभिन्न स्थितियों में उपचार में सहायता मिल सकती है।
  • स्टेम सेल थेरेपी के अनुप्रयोग
    • पुनर्योजी चिकित्सा: स्टेम सेल हृदय की मांसपेशियों, उपास्थि या तंत्रिका कोशिकाओं जैसे क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत या प्रतिस्थापन में सहायक हो सकते हैं।
    • दीर्घकालिक रोग: मधुमेह, पार्किंसंस रोग, अल्जाइमर रोग और स्पाइनल कॉर्ड चोट जैसी स्थितियों के लिए स्टेम सेल-आधारित उपचारों पर अनुसंधान किया जा रहा है।
    • प्रतिरक्षा विकार और कैंसर देखभाल: स्टेम सेल का उपयोग प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को संशोधित या सुदृढ़ करने के लिए किया जा सकता है, जिसमें स्वप्रतिरक्षी रोगों और कुछ कैंसरों के लिए चिकित्सीय रणनीतियाँ शामिल हैं।
    • ऑर्थोपेडिक्स: ऑर्थोपेडिक चोटों और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी अपक्षयी स्थितियों के लिए स्टेम सेल थेरेपी का अध्ययन किया जा रहा है।

  • स्टेम सेल आदिम (अविशिष्ट) कोशिकाएँ होती हैं, जो विभाजित होकर शरीर में विभिन्न प्रकार की विशिष्ट कोशिकाओं में विकसित हो सकती हैं।
  • मुख्य विशेषता: उपयुक्त परिस्थितियों में स्टेम सेल निम्नलिखित कार्य कर सकती हैं:
    • स्व-पुनर्नवीकरण (अधिक स्टेम सेल बनाना), तथा
    • रक्त कोशिकाओं, तंत्रिका कोशिकाओं, अस्थि कोशिकाओं, मांसपेशी कोशिकाओं आदि जैसी विशिष्ट कोशिकाओं में विभेदन कर सकती हैं।

भारत में स्टेम सेल थेरेपी की नियामक स्थिति

  • स्टेम सेल अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश, 2017
    • जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए।
    • हेमेटोलॉजिकल विकारों के लिए हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण (HSCT) को के लावा, स्टेम सेल थेरेपी के लिए कोई स्वीकृत संकेत नहीं हैं।
    • अन्य सभी स्टेम सेल थेरेपी को अन्वेषणात्मक (Investigational) के रूप में वर्गीकृत किया गया है और इन्हें केवल आवश्यक नियामक अनुमोदन प्राप्त करने के बाद नैदानिक परीक्षणों के रूप में ही किया जा सकता है।
    • स्वीकृत नैदानिक परीक्षणों के बाहर स्टेम सेल का उपयोग अनैतिक और अवैध माना जाता है।

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) क्या है?

  • स्थिति की प्रकृति: ASD एक न्यूरो-विकासात्मक विकार है, जो व्यक्ति के संप्रेषण, व्यवहार और सामाजिक अंतःक्रिया को प्रभावित करता है।
  • स्पेक्ट्रम स्वरूप: ऑटिज्म एक स्पेक्ट्रम पर विद्यमान होता है, अर्थात् इसके लक्षण और उनकी तीव्रता व्यक्तियों में व्यापक रूप से भिन्न होती है।
    • ASD से ग्रस्त व्यक्तियों में बौद्धिक क्षमता अत्यधिक हानि से लेकर औसत से अधिक या असाधारण क्षमताओं तक हो सकती है।
  • कारण: ASD के सटीक कारण पूर्णतः ज्ञात नहीं हैं, किंतु अनुसंधान से संकेत मिलता है कि आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों का संयोजन इसकी संभावना को बढ़ाता है।
  • प्रारंभिक लक्षण और संकेत
    • आरंभ की आयु: अधिकांश बच्चों में तीन वर्ष की आयु से पूर्व ऑटिज्म के संकेत दिखाई देने लगते हैं।
    • संप्रेषण संकेतक: वाणी या भाषा विकास में विलंब, सीमित नेत्र संपर्क और चेहरे के भावों में कमी।
    • सामाजिक अंतःक्रिया में कठिनाई: सामाजिक संकेतों को समझने और दूसरों की भावनाओं को पहचानने में कठिनाई।
    • व्यवहार पैटर्न: दोहरावपूर्ण व्यवहार और दिनचर्या के प्रति अत्यधिक लगाव सामान्य है।
    • संवेदी संवेदनशीलता: कुछ ध्वनियाँ, प्रकाश या वातावरण तीव्र प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।
    • शैक्षिक चुनौतियाँ: विद्यालयी वातावरण के अनुरूप ढलने में कठिनाई देखी जा सकती है।
  • उपचार और प्रबंधन
    • ऑटिज्म का कोई स्थायी उपचार नहीं है; तथापि, प्रारंभिक और साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेपों के माध्यम से इसके लक्षणों का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है।
    • वाक्-चिकित्सा: संप्रेषण और भाषा कौशल में सुधार पर केंद्रित।
    • व्यावसायिक चिकित्सा: कौशल और दैनिक जीवन की क्षमताओं के विकास में सहायक।
    • व्यवहारिक चिकित्सा: सामाजिक अंतःक्रिया, व्यवहार नियंत्रण और आत्मनिर्भरता में सुधार का लक्ष्य।
  • वैश्विक और राष्ट्रीय पहलें
    • वैश्विक ढाँचा: विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) और सतत् विकास लक्ष्य (SDGs) ऑटिज्म सहित दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों, समावेशन और गरिमा का समर्थन करते हैं।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन (2014): “ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के प्रबंधन के लिए व्यापक और समन्वित प्रयास” शीर्षक से एक प्रस्ताव अपनाया गया, जिसे 60 से अधिक देशों का समर्थन प्राप्त था।
    • संयुक्त राष्ट्र महासभा: जागरूकता, स्वीकृति और समावेशन को बढ़ावा देने के लिए 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस घोषित किया गया।
    • भारत: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की सूची को 7 से बढ़ाकर 21 किया और उसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि मासिक स्वास्थ्य तथा विद्यालयों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) तक पहुँच, संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत जीवन एवं गरिमा के मौलिक अधिकार का अभिन्न भाग है।

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • अनुच्छेद-21 और गरिमा: न्यायालय ने कहा कि “गरिमा को केवल एक अमूर्त आदर्श तक सीमित नहीं किया जा सकता”, बल्कि इसका वास्तविक परिस्थितियों में रूपांतरण आवश्यक है, जिससे व्यक्ति अपमान, बहिष्कार या टाले जा सकने वाले कष्ट के बिना जीवन जी सके।
  • ‘मासिक धर्म स्वास्थ्य’ एक मौलिक अधिकार: मासिक धर्म से गुजरने वाली छात्राओं के लिए, MHM सुविधाओं का अभाव उन्हें उपेक्षा, रूढ़िबद्ध धारणाओं और अपमान का सामना करने के लिए विवश करता है, जिससे जीवन की गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रभावित होता है।
  • विद्यालयों में MHM उपायों की कमी का प्रभाव
    • शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन: सुरक्षित एवं स्वच्छ मासिक धर्म प्रबंधन की अनुपस्थिति में छात्राओं को या तो विद्यालय से अनुपस्थित रहना पड़ता है अथवा असुरक्षित प्रथाएँ अपनानी पड़ती हैं, जो शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।
    • शैक्षिक प्रभाव: मासिक धर्म संबंधी सुविधाओं में कमी छात्राओं को गरिमा के साथ शिक्षा के अधिकार का प्रयोग करने से वंचित करती है, जिससे वे पुरुष छात्रों या स्वच्छता उत्पाद वहन करने में सक्षम छात्रों के समान स्थिति में नहीं रह पातीं हैं।
    • दीर्घकालिक प्रभाव: न्यायालय ने कहा कि प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा में बाधा का व्यक्ति के विकास तथा दीर्घकालिक सामाजिक एवं आर्थिक सहभागिता पर गंभीर व स्थायी प्रभाव पड़ता है।
  • शिक्षा में मूलभूत समानता
    • लैंगिक-विशिष्ट बाधा: सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध न कराना एक लैंगिक-विशिष्ट बाधा उत्पन्न करता है, जो विद्यालय में उपस्थिति और शिक्षा की निरंतरता में अवरोध डालता है।
    • निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा: इस प्रकार का अभाव संविधान के अनुच्छेद-21A तथा निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अंतर्गत प्रदत्त निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की सारभूत गारंटी को निष्फल करता है।
    • समानता का ढाँचा: यह निर्णय अनुच्छेद-14 के अंतर्गत मूलभूत समानता को प्रतिबिंबित करता है तथा अनुच्छेद-15(3) के अनुरूप है, जो महिलाओं और बालिकाओं के लिए विशेष उपबंधों की अनुमति देता है।
  • निजता का अधिकार एवं शारीरिक स्वायत्तता
    • शारीरिक स्वायत्तता: न्यायालय ने माना कि MHM उपायों की कमी छात्रों के निजता के अधिकार और शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।
    • विकल्प बनाम बाध्यता: सुविधाओं के अभाव में बालिकाएँ परिस्थितियों के अनुसार अपने शारीरिक प्रबंधन करने के लिए बाध्य होती हैं, जिससे वास्तविक स्वायत्तता समाप्त हो जाती है।
  • राज्य का दायित्व एवं शैक्षिक समानता
    • गरिमा बनाम शिक्षा: राज्य किसी बच्चे को गरिमा और शिक्षा के बीच चयन करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा विकल्प अन्यायपूर्ण और असमानतापूर्ण है।
    • संवैधानिक कर्तव्य: मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य सुनिश्चित करना राज्य का एक सकारात्मक दायित्व है, जो अनुच्छेद-21 तथा शिक्षा के अधिकार से संबद्ध होता है।
  • मासिक धर्म जागरूकता में पुरुषों की भूमिका
    • संवेदीकरण: न्यायालय ने मासिक धर्म की जैविक वास्तविकता के बारे में शिक्षकों और छात्रों को शिक्षित करने के महत्त्व पर बल दिया।
    • उत्पीड़न की रोकथाम: संवेदीकरण आवश्यक है ताकि विद्यालयों में मासिक धर्म से गुजर रही छात्राओं के साथ उत्पीड़न, उपेक्षा या आक्रामक प्रश्नों को रोका जा सके।

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन से तात्पर्य स्वच्छ मासिक धर्म उत्पादों की उपलब्धता, वस्त्र बदलने के लिए निजता, पर्याप्त जल एवं स्वच्छता सुविधाएँ, सुरक्षित निपटान तंत्र तथा जागरूकता से है, जिससे गरिमा के साथ मासिक धर्म का प्रबंधन संभव हो सके।

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) का दायरा

  • स्वच्छता से परे: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि MHM केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शारीरिक स्वायत्तता और निर्णयात्मक स्वतंत्रता भी सम्मिलित है।
  • आवश्यक सुविधाएँ: सार्थक स्वायत्तता के लिए कार्यशील शौचालय, पर्याप्त मासिक धर्म उत्पाद, जल की उपलब्धता तथा स्वच्छ निपटान तंत्र आवश्यक हैं।

ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक पारंपरिक प्लास्टिक की तुलना में शीघ्र अपघटित होते हैं, परंतु ये कंपोस्टेबल या पूर्णतः जैव-अवक्रमणीय प्लास्टिक से भिन्न होते हैं। उदाहरण: जन औषधि सुविधा।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश:

  • सार्वभौमिक कवरेज: सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में, चाहे विद्यालय सरकारी हों या निजी, सभी विद्यालयों में MHM मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना होगा।
  • स्वच्छता अवसंरचना: विद्यालयों में कार्यशील तथा लैंगिक रूप से पृथक शौचालय उपलब्ध कराए जाने अनिवार्य होंगे।
  • सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता: ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएँगे, अधिमानतः शौचालय परिसरों में, सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों के माध्यम से।
  • MHM कॉर्नर: विद्यालयों में ‘MHM कॉर्नर’ स्थापित किए जाएँगे, जिनमें अतिरिक्त अंतर्वस्त्र, अतिरिक्त यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल बैग तथा मासिक धर्म से संबंधित आकस्मिक आवश्यकताओं के लिए अन्य सामग्री उपलब्ध होगी।
  • RTE अधिनियम के अंतर्गत जवाबदेही
    • सरकारी विद्यालय: यदि सरकारी विद्यालय निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 19 के मानकों (जैसे लड़कों और लड़कियों के लिए पृथक शौचालय) का पालन नहीं करते हैं, तो इसके लिए राज्य उत्तरदायी होंगे।
    • निजी विद्यालय: RTE अधिनियम के अंतर्गत समान मानकों का पालन न करने पर निजी विद्यालयों की मान्यता समाप्त की जा सकती है तथा उनके विरुद्ध विधिक कार्रवाई की जाएगी।

अंतरराष्ट्रीय संदर्भ: यह निर्णय सतत् विकास लक्ष्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है:

  • SDG 3: अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण
  • SDG 4: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
  • SDG 5: लैंगिक समानता
  • SDG 6: स्वच्छ जल और स्वच्छता।

मासिक धर्म स्वच्छता का समर्थन करने वाली सरकारी पहलें

  • मासिक धर्म स्वच्छता योजना (MHS) 
    • यह योजना 10–19 वर्ष की किशोरियों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू की गई है।
    • इसके अंतर्गत निःशुल्क या रियायती दर पर सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता तथा जागरूकता एवं व्यवहार परिवर्तन संचार माध्यम प्रदान किया जाता है।
  • राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK):
    • यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत एक व्यापक किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम है।
    • इसमें मासिक धर्म स्वास्थ्य, पोषण, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य तथा मानसिक स्वास्थ्य सहित छह प्राथमिक क्षेत्रों को सम्मिलित किया गया है।
  • स्वच्छ भारत–स्वच्छ विद्यालय: यह पहल विद्यालयों में शौचालयों के निर्माण और रखरखाव पर केंद्रित है, जिसमें बालिकाओं के लिए पृथक शौचालयों की व्यवस्था भी शामिल है।

संदर्भ

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने बढ़ती डिजिटल लत और स्क्रीन से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को एक प्रमुख उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में चिह्नित किया है, जो विशेष रूप से बच्चों और किशोरों को प्रभावित कर रही है।

डिजिटल लत क्या है?

  • परिभाषा: आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, डिजिटल लत से आशय स्मार्टफोन, गेमिंग प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया जैसे डिजिटल उपकरणों के साथ अनियंत्रित एवं अत्यधिक जुड़ाव से है।
  • व्यवहारात्मक प्रकृति: इसे व्यवहारात्मक लत के रूप में मान्यता दी गई है, जिसमें नियंत्रण की कमी, मानसिक तनाव तथा कार्यात्मक क्षति देखी जाती है, न कि किसी पदार्थ पर निर्भरता।
  • WHO की मान्यता: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ऑनलाइन गेमिंग लत को ICD-11 में ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ के अंतर्गत एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति के रूप में मान्यता दी है। इसे गेमिंग पर नियंत्रण की कमी, अन्य गतिविधियों की तुलना में गेमिंग को प्राथमिकता देना, तथा नकारात्मक परिणामों के बावजूद खेलना जारी रखना के रूप में परिभाषित किया गया है।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ 

  • डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार: भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का योगदान वित्त वर्ष 2023 में राष्ट्रीय आय का 11.74% रहा और इसके वित्त वर्ष 2025 तक 13.42% तक पहुँचने का अनुमान है, जो बड़े पैमाने पर डिजिटल अपनाने को दर्शाता है।
  • कनेक्टिविटी में तीव्र वृद्धि: इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या वर्ष 2014 में 25.15 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2024 में 96.96 करोड़ हो गई है। यह वृद्धि देशव्यापी 5G सेवा का विस्तार और 2.18 लाख ग्राम पंचायतों तक भारतनेट कनेक्टिविटी के विस्तार से प्रेरित है।
  • लगभग सार्वभौमिक पहुँच: वर्ष 2025 में 85.5% भारतीय परिवारों के पास कम-से-कम एक स्मार्टफोन है, जो विभिन्न सामाजिक वर्गों में डिजिटल पहुँच की व्यापकता को दर्शाता है।
  • उच्च तीव्रता वाले उपयोग पैटर्न: वर्ष 2024 में 48% उपयोगकर्ताओं ने ऑनलाइन वीडियोज, 43% ने सोशल मीडिया का उपयोग किया, 40% ने ईमेल और ऑनलाइन संगीत का उपयोग किया तथा 26% ने डिजिटल भुगतान सेवाओं का प्रयोग किया।
  • बड़ा उपयोगकर्ता आधार: ये उपयोग हिस्सेदारी लगभग 40 करोड़ ओटीटी उपयोगकर्ताओं और करीब 35 करोड़ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं में परिवर्तित होती है, जिससे डिजिटल जोखिमों का दायरा और तीव्र होता है।
  • युवा वर्ग का प्रभुत्व: 15–29 वर्ष आयु वर्ग में इंटरनेट और स्मार्टफोन का उपयोग लगभग सार्वभौमिक है, जिससे युवा वर्ग डिजिटल लत से जुड़ी चिंताओं के केंद्र में है।

डिजिटल सहभागिता के विस्तृत पैमाने, उच्च तीव्रता और युवा-केंद्रित स्वरूप ने डिजिटल लत को केवल एक व्यक्तिगत व्यवहारिक समस्या से आगे बढ़ाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा तथा मानव पूँजी से जुड़ी एक प्रणालीगत चुनौती में परिवर्तित कर दिया है।

डिजिटल लत के प्रमुख कारण 

  • आसान उपलब्धता: स्मार्टफोन, सस्ता डेटा और 24×7 इंटरनेट की उपलब्धता के कारण डिजिटल सहभागिता निरंतर और लगभग अपरिहार्य हो गई है, जिससे डिजिटल लत में वृद्धि हो रही है।
  • एल्गोरिदम-आधारित संबद्धता: ऑटो-प्ले फीचर्स, इनफिनिट स्क्रॉलिंग, शॉर्ट-वीडियो लूप और पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम का लाभ उठाकर लोगों को लगातार उपयोग करने के लिए बढ़ावा देते हैं।
  • सामाजिक मान्यता और तुलना: लाइक, शेयर, फॉलोअर संख्या और ऑनलाइन स्वीकृति बार-बार जाँचने की प्रवृत्ति और चिंता को जन्म देती है, विशेष रूप से किशोरों और युवा वयस्कों में।
  • कुछ छूट जाने का भय (FoMO): अपडेट, सामाजिक संपर्क या ट्रेंड छूट जाने की आशंका से उपयोगकर्ताओं में चिंता बढ़ती है, जिससे वे बार-बार डिजिटल प्लेटफॉर्म जाँचने लगते हैं।
  • शैक्षणिक और सामाजिक दबाव: शैक्षणिक प्रतिस्पर्द्धा का सामना कर रहे छात्र डिजिटल प्लेटफॉर्म को तनाव से निपटने के साधन के रूप में अपनाते हैं, जो अक्सर अनियंत्रित उपयोग में बदल जाता है।
  • रियल-मनी गेमिंग और ऑनलाइन जुआ: दाँव आधारित प्लेटफ़ॉर्म और कौशल-आधारित गेमिंग के मुद्रीकरण तक आसान पहुँच से लत, ऋण और मानसिक तनाव का जोखिम बढ़ता है।
  • महामारी-जनित व्यावहारिक परिवर्तन: COVID-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संपर्क पर निर्भरता बढ़ी, जिससे अत्यधिक स्क्रीन-समय की आदतें सुदृढ़ हुईं और स्क्रीन-निर्भरता का सामान्यीकरण हुआ।

डिजिटल लत के प्रभाव

  • संज्ञानात्मक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
    • मनोवैज्ञानिक विकार: डिजिटल लत का गहरा संबंध चिंता, अवसाद, तनाव और आत्मसम्मान में कमी जैसे नकारात्मक लक्षणों से हैं, विशेष रूप से युवा वर्ग में।
    • नींद में व्यवधान: देर रात स्क्रीन के संपर्क में रहने से नींद की कमी तथा संज्ञानात्मक कार्यक्षमता में कमी आती है।
  • शैक्षणिक एवं उत्पादकता में हानि
    • शैक्षणिक गिरावट: अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से ध्यान अवधि, एकाग्रता और अध्ययन समय में कमी आती है, जिससे शैक्षणिक उपलब्धियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
    • कार्यस्थल पर अक्षमता: निरंतर डिजिटल विचलनों के कारण उत्पादकता, एकाग्रता और कार्य पूर्ण करने की क्षमता में कमी आती है, जिससे पेशेवर कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
  • सामाजिक पूँजी में ह्रास
    • ऑफलाइन संबंधों की कमजोरी: अनियंत्रित डिजिटल उपयोग सामना-सामना बातचीत, सामुदायिक भागीदारी और अंतरव्यक्तिगत कौशल को कमजोर करता है।
    • अलगाव विरोधाभास: उच्च कनेक्टिविटी के बावजूद, डिजिटल लत अक्सर अकेलापन और सामाजिक अलगाव का कारण बनती है।
  • आर्थिक और वित्तीय लागत
    • प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान: ऑनलाइन खरीदारी, गेमिंग पर खर्च और साइबर धोखाधड़ी सीधे मौद्रिक नुकसान डालते हैं।
    • दीर्घकालिक आय पर प्रभाव: कम रोजगार क्षमता, उत्पादकता और कौशल विकास से जीवनभर की आय की संभावना प्रभावित होती है।

संवैधानिक और मानव पूँजी आयाम

  • जीवन का अधिकार और मानसिक स्वास्थ्य (अनुच्छेद-21): मानसिक स्वास्थ्य एक सम्मानजनक जीवन के लिए अनिवार्य है; व्यापक डिजिटल लत एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती प्रस्तुत करती है।
  • बाल अधिकार दृष्टिकोण: संवैधानिक नैतिकता और संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन के तहत, राज्य की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को शोषणकारी और व्यसनकारी डिजिटल वातावरण से सुरक्षित रखे।
  • शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद-21A): ध्यान में कमी, अधिगम की हानि और स्क्रीन पर निर्भरता शैक्षणिक परिणामों और संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करती है।
  • जनसांख्यिकीय लाभ पर खतरा: अनियंत्रित डिजिटल लत भारत के जनसांख्यिक लाभ को कम कर सकती है, जिससे यह कम उत्पादकता और श्रम बल भागीदारी के माध्यम से जनसांख्यिक बोझ में बदल सकता है।

भारत-विशिष्ट नीति और शासन संबंधी चुनौतियाँ

  • डेटा की कमी: भारत में डिजिटल लत का प्रचलन और गंभीरता पर राष्ट्रीय स्तर का व्यापक डेटा नहीं है, जिससे लक्षित नीति निर्माण सीमित रह जाता है।
  • युवा जनसांख्यिकीय दबाव: भारत की बड़ी युवा आबादी डिजिटल लत के प्रभाव के पैमाने और जटिलता को बढ़ाती है।
  • शहरी-ग्रामीण पहुँच का अंतर: ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल पहुँच तेजी से बढ़ी है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना और जागरूकता इसका समर्थन नहीं कर पा रही है।
  • नियामक पिछड़ापन: तकनीकी नवाचार और प्लेटफॉर्म मुद्रीकरण मॉडल व्यावहारिक स्वास्थ्य नियमों की तुलना में तेजी से विकसित हो रहे हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य कलंक: सामाजिक कलंक प्रारंभिक सहायता और काउंसलिंग लेने में बाधा डालता है, विशेष रूप से किशोरों में।

वैश्विक पहल 

  • WHO की मान्यता: WHO के ICD-11 में औपचारिक रूप से गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के रूप में मान्यता दी गई है।
  • ऑस्ट्रेलिया: 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया खातों पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लागू किया।
  • चीन: सख्त गेमिंग सीमाएँ लागू कीं, जिसमें सप्ताहांत और छुट्टियों में दिन में केवल एक घंटे ऑनलाइन गेमिंग की अनुमति दी गई, साथ ही रियल-नेम ऑथेंटिकेशन का उपयोग किया गया।
  • दक्षिण कोरिया: ‘सिंडरेला लॉ’ लागू की, जो नाबालिगों के लिए रात में गेमिंग को सीमित करती थी, बाद में इसे अभिभावक नियंत्रण तंत्र द्वारा बदल दिया गया।
  • सिंगापुर: मीडिया साक्षरता परिषद के माध्यम से सामुदायिक दृष्टिकोण अपनाया, साइबर वेलनेस और जिम्मेदार डिजिटल नागरिकता को बढ़ावा दिया।
  • यूनाइटेड किंगडम: डिजिटल रेजिलिएंस फ्रेमवर्क विकसित किया, जिसमें शिक्षा और तकनीक डिजाइन में डिजिटल कल्याण  को एकीकृत किया गया।
  • विद्यालय स्तर पर प्रतिबंध: फ्राँस, स्पेन, फिनलैंड, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कुछ हिस्सों में स्कूलों में स्मार्टफोन उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • काउंसलिंग अवसंरचना: सियोल महानगर सरकार के ‘I Will Centres’ युवा वर्ग के लिए लत निवारण और पुनर्प्राप्ति काउंसलिंग प्रदान करते हैं।

भारत में पहल

  • शैक्षणिक दिशा-निर्देश: CBSE ने स्कूलों और स्कूल बसों में सुरक्षित इंटरनेट उपयोग पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
  • डिजिटल शिक्षा ढाँचा: शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत प्रज्ञातः फ्रेमवर्क (Pragyatah Framework) डिजिटल शिक्षा में स्क्रीन-टाइम पर विचार को शामिल करता है।
  • बाल संरक्षण मानदंड: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने स्क्रीन-टाइम सीमाएँ और ऑनलाइन सुरक्षा दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं।
  • टेली-मानस: वर्ष 2022 में लॉन्च, यह 24×7 टोल-फ्री मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन (14416) प्रदान करता है और अब तक 32 लाख से अधिक कॉल्स का निदान किया जा चुका है; वर्ष 2024 में इसका ऐप भी लॉन्च किया गया।
  • SHUT क्लिनिक, NIMHANS: अत्यधिक तकनीकी उपयोग के लिए विशेष उपचार प्रदान करता है और अभिभावक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करता है।
  • ऑनलाइन गेमिंग (नियमन) अधिनियम, 2025: दाँव आधारित ऑनलाइन मनी गेम्स पर प्रतिबंध, विज्ञापन का नियमन और अनुमति प्राप्त कौशल-आधारित गेम्स के लिए लाइसेंसिंग कर लत और वित्तीय हानि को कम करता है।
  • डिजिटल डिटॉक्स पहल: कर्नाटक का ‘डिजिटल डेटाॅक्स सेंटर–बियाॅण्ड स्क्रीन्स’ गंभीर डिजिटल लत से जूझ रहे व्यक्तियों का समर्थन करता है।

आगे की राह 

  • साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण: दूसरा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) डिजिटल लत के प्रचलन और प्रभावों पर विश्वसनीय डेटा जुटाने के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।
  • परिणाम-आधारित संकेतक: नीतियों को स्क्रीन-टाइम पैटर्न, नींद की गुणवत्ता, चिंता के स्तर, शैक्षणिक प्रदर्शन, उत्पादकता और साइबर सुरक्षा जोखिम पर निगरानी रखनी चाहिए।
  • विद्यालय-केंद्रित हस्तक्षेप: स्कूलों में डिजिटल वेलनेस पाठ्यक्रम लागू करना चाहिए, जिसमें स्क्रीन-टाइम साक्षरता, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता शामिल हो।
    • स्कूलों में स्क्रीन के अधिक उपयोग से होने वाली निष्क्रिय जीवनशैली को रोकने के लिए फिजिकल एक्टिविटी अनिवार्य करनी चाहिए।
  • ऑफलाइन सहभागिता स्थल: सरकारें शहरी झुग्गी-झोपड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में ऑफलाइन युवा हब स्थापित करें ताकि स्वस्थ सामाजिक संपर्क को बढ़ावा मिल सके।
  • परिवार क्षमता निर्माण: माता-पिता को लत के लक्षण पहचानने, डिवाइस-फ्री घंटे लागू करने और पेरेंटल कंट्रोल टूल्स का प्रभावी उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
  • प्लेटफॉर्म जिम्मेदारी: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को आयु सत्यापन, आयु-उपयुक्त डिफॉल्ट सेटिंग्स, और ऑटो-प्ले, जुआ सामग्री और लक्षित विज्ञापन पर प्रतिबंध लागू करना चाहिए।
  • नैतिक तकनीक डिजाइन: “समय का सदुपयोग” सिद्धांत, जटिल डिजाइन, और एल्गोरिदमिक पारदर्शिता को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी-सुरक्षा उपाय: ISP-स्तरीय कंटेंट फिल्टरिंग, विभेदित डेटा योजनाएँ तथा बच्चों के लिए शिक्षा-केवल टैबलेट जैसे सरल उपकरण, हानिकारक डिजिटल सामग्री के संपर्क को कम कर सकते हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य पहुँच का विस्तार: टेली-मानस को डिजिटल लत के लिए विशेषज्ञ काउंसलरों के साथ विस्तारित किया जाना चाहिए और स्कूलों व कॉलेजों में प्रारंभिक हस्तक्षेप के लिए एकीकृत किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष 

डिजिटल लत का समाधान एक संतुलित दृष्टिकोण की माँग करता है, जिसमें जागरूकता, नियमन, नैतिक तकनीक डिजाइन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, सामुदायिक सहभागिता और जिम्मेदार व्यक्तिगत व्यवहार शामिल हों, ताकि भारत की मानव पूँजी और सामाजिक कल्याण सुरक्षित रह सके।

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