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Feb 03 2026

भारत के दो नए रामसर स्थल

विश्व आर्द्र भूमि दिवस के अवसर पर, उत्तर प्रदेश के पटना पक्षी अभयारण्य और गुजरात के छारी-धंद को रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्र भूमि के रूप में आधिकारिक रूप से नामित किया गया।

भारत के रामसर स्थल

  • कुल रामसर स्थल: इन दो साइट्स के शामिल होने से देश में कुल रामसर स्थल 98 हो गई हैं (पूर्व में 96 थी)।
  • हस्ताक्षरित वर्ष: भारत ने वर्ष 1982 में रामसर कन्वेंशन की सदस्यता ली, और वैश्विक महत्त्व के आर्द्र भूमि की सुरक्षा का वचन दिया।
  • शीर्ष राज्य: तमिलनाडु 20 रामसर स्थल के साथ अग्रणी है, इसके बाद उत्तर प्रदेश ( अब 11) है।

पटना पक्षी अभ्यारण्य

  • स्थान: जलेसर, एटा जिला, उत्तर प्रदेश।
  • स्थापना: वर्ष 1991।
  • प्राकृतिक विशेषता: यह एक प्राकृतिक ताजे जल की उथली आर्द्र भूमि है, जो पक्षियों को आकर्षित करती है।
  • प्रकार: गंगी के मैदानों में वर्षा-आश्रित आर्द्र भूमि का उदाहरण।
  • जैव विविधता: झील 106 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियों का रेस्टिंग हब है।
  • वनस्पतियाँ: पूरे झील क्षेत्र में ‘हायसिंथ’ और ‘पोतामोगेटन’ की प्रचुर मात्रा में मैक्रोफाइटिक वनस्पति विस्तृत है।
  • महत्वपूर्ण जलपक्षी: लेसर व्हिस्लिंग-डक, ग्रे लाग गूस, कॉम्ब डक, रुडी शेलडक, गैडवाल, यूरेशियन विगन, इंडियन स्पॉट-बिल्ड डक, नॉर्दर्न शोवेलर, नॉर्दर्न पिंटेल।

छारी-धंद आर्द्र भूमि रिजर्व (गुजरात)

  • स्थान: बन्नी ग्रासलैंड्स के पास, कच्छ जिला, गुजरात।
  • प्रकार: मौसमी खारी आर्द्र भूमि (मानसून-आश्रित), कच्छ की शुष्क-क्षेत्र पारिस्थितिकी से संबंधित है।
  • जैव विविधता हॉटस्पॉट: 250+ पक्षी प्रजातियों का समर्थन; प्रमुख शीतकालीन और प्रजनन स्थल।
  • महत्वपूर्ण पक्षी: ग्रेटर और लेसर फ्लेमिंगो, पेलिकन्स, क्रेन, डक, रैप्टर्स।

विश्व आर्द्र भूमि दिवस

  • प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी को मनाया जाता है।
  • महत्व: 2 फरवरी, 1971 को ईरान के रामसर में आर्द्र भूमि कन्वेंशन को अपनाए जाने की वर्षगाँठ।
  • 2026 थीम: वेटलैंड्स एंड ट्रैडिशनल नॉलेज: सेलिब्रेटिंग कल्चरल हेरिटेज”

जल जीवन मिशन

जल शक्ति मंत्रालय द्वारा ग्रामीण भारत में हर घर जल (जल जीवन मिशन) संबंधी सार्वजनिक संतुष्टि पर किए गए आवधिक सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग सार्वभौमिक नल कनेक्शन कवरेज हासिल होने के बावजूद, वास्तविक उपयोग, नियमितता और जल गुणवत्ता अपेक्षाकृत कम बनी हुई है।

सर्वेक्षण के बारे में

  • सर्वेक्षण का नाम: हाउसहोल्ड टैप कनेक्शन की कार्यक्षमता मूल्यांकन (Functionality Assessment of Household Tap Connections)।
  • कवरेज: लगभग 2.37 लाख घरों का सर्वेक्षण किया गया, जो 19,812 गाँवों तक विस्तृत है; यह उन 19.3 करोड़ ग्रामीण घरों में किया गया, जो योजना के अंतर्गत आते हैं।
  • गाँव का चयन: केवल ‘हर घर जल (HGJ)’ प्रमाणित गाँवों का मूल्यांकन किया गया, जहाँ राज्यों ने 100% टैप कवरेज की सूचना दी थी।
  • HGJ के अंतर्गत कवर किए गए गाँव: भारत में कुल 5.8 लाख गाँवों में से लगभग 2.72 लाख HGJ गाँव हैं।

सर्वेक्षण से प्रमुख निष्कर्ष

  • नल तक पहुँच: लगभग 98% घरों ने बताया कि उनके पास नल कनेक्शन है।
  • वास्तविक जल प्रवाह: केवल 83% घरों ने कहा कि सर्वेक्षण से सात दिन पूर्व कम-से-कम एक बार जल आपूर्ति सुनिश्चित हुई।
  • राज्यवार भिन्नता
    • शीर्ष रैंकिंग: गोवा, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कई केंद्रशासित प्रदेशों में 97% से अधिक उपलब्धता।
    • निम्न रैंकिंग: बिहार (61%), उत्तर प्रदेश (72%), और नागालैंड (74%) ने सबसे कम उपलब्धता दर्ज की।
  • जल आपूर्ति की पर्याप्तता
    • न्यूनतम आपूर्ति मानक: केवल 80% घरों ने प्रतिदिन 55 लीटर प्रति व्यक्ति जल आपूर्ति की सूचना दी।
    • सबसे कम रिपोर्टिंग राज्य: सिक्किम (24%) और गुजरात (58%)।
  • जल गुणवत्ता संबंधी चिंताएँ
    • जाँच किए गए मानदंड: ई. कोलाई, कुल कॉलिफॉर्म और pH स्तर।
    • अनुपालन: केवल 76% घरों को निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार, जल की आपूर्ति सुनिश्चित हुई।

संपूर्ण कार्यक्षमता

  • उपलब्धता, नियमितता और जल गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए, केवल 76% घर योजना के उद्देश्यों के अनुसार लाभान्वित हो रहे हैं।
  • जल गुणवत्ता संतोष: त्रिपुरा (43%) को छोड़कर अधिकांश राज्यों ने जल गुणवत्ता पर 85% से अधिक संतुष्टि दर्ज की गई, जबकि प्रयोगशाला परीक्षणों में अनुपालन कम था।

हर घर जल योजना के बारे में

  • परिचय: हर घर जल, जल जीवन मिशन (JJM) का ग्रामीण पेयजल आपूर्ति घटक है।
  • उद्देश्य: प्रत्येक ग्रामीण घर में 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पेयजल, कार्यात्मक घरेलू टैप कनेक्शन के माध्यम से उपलब्ध कराना।
  • कवरेज: योजना वर्ष 2020 में प्रभावी रूप से शुरू हुई और भारत के 19.3 करोड़ ग्रामीण घरों को शामिल करती है।
  • समय सीमा: मूल लक्ष्य वर्ष 2024 तक 100% कवरेज और कार्यक्षमता था, जिसे अब वर्ष 2028 तक बढ़ा दिया गया है।
  • संस्थागत कवरेज: घरों के अलावा, योजना गाँव के स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों और सामुदायिक/सार्वजनिक संस्थाओं को भी जल कनेक्शन प्रदान करती है।
  • नोडल एजेंसी: जल शक्ति मंत्रालय के तहत पेयजल और स्वच्छता विभाग द्वारा कार्यान्वित।
  • फंडिंग पैटर्न
    • केंद्र और राज्यों के बीच 50:50 लागत साझा।
    • हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90:10।
    • केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 100% केंद्रीय वित्तपोषण।

चक्र – ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (CoE)

भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने सनराइज सेक्टर (Sunrise Sectors) के वित्तपोषण के लिए चक्र – ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (CoE)’ लॉन्च किया।

सनराइज सेक्टर क्या हैं?

  • सनराइज सेक्टर वे नए और तेजी से बढ़ती उद्योग हैं, जिनमें निवेश, नवाचार, रोजगार सृजन, निर्यात और आर्थिक विकास की उच्च भविष्य की संभावनाएँ हैं, मुख्यतः इसलिए कि ये उभरती तकनीकों, नई उपभोक्ता माँगों और बदलते वैश्विक रुझानों से संचालित होते हैं।

चक्र – ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (CoE) के बारे में

  • स्थापना: यह अर्थव्यवस्था के उभरते और रणनीतिक क्षेत्रों के वित्तपोषण के लिए समर्पित संस्थागत प्लेटफॉर्म के रूप में स्थापित किया गया है।
  • मुख्य उद्देश्य: अगली पीढ़ी की तकनीकी-गहन और स्थिरता-उन्मुख उद्योगों के लिए संरचित, ज्ञान-आधारित वित्तपोषण को सुगम बनाना, जो भारत के आर्थिक रूपांतरण को आगे बढ़ाएँगे।
  • भूमिका: ‘चक्र’ एक ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के रूप में कार्य करेगा, SBI की प्रोजेक्ट फाइनेंस और संरचनात्मक टीमों का समर्थन करेगा और व्यापक भारतीय वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए परामर्श केंद्र के रूप में काम करेगा।
  • लक्षित क्षेत्र: ‘चक्र’ आठ रणनीतिक क्षेत्रों पर केंद्रित है – नवीकरणीय ऊर्जा, उन्नत सेल केमिस्ट्री और बैटरी स्टोरेज, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर्स, डीकार्बोनाइजेशन, स्मार्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर इन्फ्रास्ट्रक्चर।
  • निवेश संभावनाएँ: इन 8 क्षेत्रों में वर्ष 2030 तक 100 लाख करोड़ रुपये से अधिक पूँजीगत व्यय की संभावना है।
  • संस्थागत सहयोग: SBI ने लगभग 21 वित्तीय संस्थाओं के साथ MoU हस्ताक्षरित किए हैं।
    • प्रमुख सहयोगी: विकास वित्त संस्थाएँ, बहुपक्षीय एजेंसियाँ, बैंक और NBFCs, उद्योग निकाय, कॉरपोरेट, स्टार्ट-अप और अकादमिक एवं नीति थिंक-टैंक।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: जापानी बैंक ‘MUFG’ और सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉरपोरेशन (SMBC) के साथ विदेशी पूँजी और विशेषज्ञता आकर्षित करने हेतु।

CHAKRA में SBI की भूमिका

  • पूँजी जुटाना: क्षेत्रों के विस्तार के साथ घरेलू और विदेशी ऋण पूँजी को सुगम बनाना।
  • जोखिम मूल्यांकन: क्षेत्र-विशेष मूल्यांकन और जोखिम प्रबंधन ढाँचे को सुदृढ़ करना।
  • नवोन्मेषी वित्त: व्यवसाय मॉडल और नीति प्राथमिकताओं के अनुसार वित्तीय संरचनाओं का विकास।

रणनीतिक महत्त्व

  • वैश्विक मूल्य शृंखला: भारत की वैश्विक तकनीकी और विनिर्माण नेटवर्क में एकीकरण को बढ़ाना।
  • स्थिरता: वित्त को जलवायु और डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों के अनुरूप बनाना।
  • तकनीक और AI सक्षम करना: परियोजना मूल्यांकन और जोखिम आकलन में AI और उन्नत विश्लेषिकी का उपयोग कर तकनीकी-आधारित वित्त मॉडल को बढ़ावा देना।

गुरु रविदास जयंती

1 फरवरी, 2026 को गुरु रविदास जयंती के अवसर पर, राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने संत रविदास के समानता, सामाजिक सद्भाव और मानव गरिमा के संदेश को उजागर करते हुए शुभकामनाएँ दीं।

गुरु रविदास जयंती के बारे में

  • यह संत गुरु रविदास के जन्मदिन की वर्षगाँठ के अवसर पर मनाई जाती है।
  • इसका उद्देश्य उनकी शिक्षाओं – समानता, भक्ति, करुणा और सामाजिक न्याय – का सम्मान करना है, जिन्होंने जातिवाद और धार्मिक रूढ़िवादिता को चुनौती दी।
  • यह दिन भारत की आध्यात्मिक आंदोलनों के माध्यम से सामाजिक सुधार की लंबी परंपरा और समावेशी मूल्यों को याद दिलाता है।

संत रविदास के बारे में

  • 15वीं–16वीं सदी के भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत, जिन्होंने निर्गुण ईश्वर की भक्ति और समानता पर आधारित समाज का समर्थन किया।
  • प्रारंभिक जीवन: सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति में जन्म।
  • गुरु: जगतगुरु रामानंद के शिष्य।
  • समानकालीन: संत कबीर और मीरा बाई के आध्यात्मिक मार्गदर्शक।

मुख्य योगदान

  • आध्यात्मिक दर्शन: निर्गुण भक्ति पर जोर, निर्गुण ईश्वर की पूजा और सहज की अवधारणा।
  • सामाजिक सुधार: जाति भेदभाव और अस्पृश्यता के खिलाफ सशक्त विरोध, लिंग समानता और मानव गरिमा को बढ़ावा।
  • साहित्यिक विरासत: उनके पद गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं, जो धार्मिक परंपराओं में प्रभाव दर्शाते हैं।
  • धार्मिक प्रभाव: रविदासिया धर्म के संस्थापक माने जाते हैं, जो समानता और भक्ति पर केंद्रित है।

महत्त्व

  • संत रविदास की शिक्षाएँ आज भी समानता, करुणा और नैतिक मूल्यों पर आधारित समावेशी, न्यायसंगत और सामंजस्यपूर्ण समाज निर्माण के लिए प्रासंगिक हैं।

पैमाना’ (PAIMANA) पोर्टल

सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय नेपैमाना’ (PAIMANA) पोर्टल को प्रारंभ किया है, जो ₹150 करोड़ और उससे अधिक मूल्य की केंद्रीय क्षेत्र की अवसंरचना परियोजनाओं की निगरानी के लिए एक नया वेब-आधारित पोर्टल है।

पैमाना’ पोर्टल के बारे में

  • पैमाना’ का अर्थ है- परियोजना मूल्यांकन, अवसंरचना निगरानी और राष्ट्र निर्माण के लिए विश्लेषण’
  • प्रकृति: प्रमुख केंद्रीय अवसंरचना परियोजनाओं की अनिवार्य निगरानी के लिए एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म।
  • प्रतिस्थापन: यह पुराने ऑनलाइन कंप्यूटरीकृत निगरानी प्रणाली (OCMS-2006) को विस्थापित करता है।
  • नोडल मंत्रालय: यह सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की प्रमुख डिजिटल पहल है।
  • उद्देश्य: तकनीकी-आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं की निगरानी, मूल्यांकन और विश्लेषण को सशक्त बनाना।
  • वन डेटा, वन एंट्री सिद्धांत: अन्य प्रोजेक्ट निगरानी पोर्टलों के साथ एकीकृत हैं, जिससे डेटा साझा करना आसान होता है और प्रतिलिपि की समस्या नहीं रहती है।
  • अंतर-मंत्रालय समन्वय: 20 से अधिक केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों, आर्थिक मामलों के विभाग और अन्य प्राधिकृत निकायों के समन्वय में पोर्टल संचालित।

पैमाना’ पोर्टल की प्रमुख विशेषताएँ

  • केंद्रीकृत भंडार: मंत्रालयों, विभागों और कार्यान्वयन एजेंसियों के लिए परियोजना-संबंधित जानकारी अपलोड, ट्रैक और समीक्षा करने हेतु एकल प्लेटफॉर्म।
  • उन्नत डेटा विश्लेषण: इंटरएक्टिव डैशबोर्ड, रिपोर्टिंग, क्वेरी मॉड्यूल और समीक्षा के माध्यम से देरी और डेटा अंतराल की पहचान।
  • भूमिका-आधारित पहुँच: विभिन्न हितधारकों के लिए डेटा सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भूमिका-आधारित उपयोगकर्ता पहुँच।
  • रियल टाइम डैशबोर्ड: परियोजना की प्रगति की निगरानी के लिए ‘ड्रिल-डाउन’ क्षमता सहित वास्तविक समय में डैशबोर्ड।
  • स्वचालन: लगभग 60% परियोजना डेटा स्वतः अपडेट होता है, जिससे मैनुअल डेटा एंट्री और रिपोर्टिंग का बोझ कम होता है।

वर्तमान स्थिति और प्रगति

  • परियोजनाएँ शामिल: वर्तमान में पोर्टल पर 1,392 संचालित अवसंरचना परियोजनाएँ शामिल हैं।
  • डेटा संशोधन: डेटाबेस का व्यापक संशोधन हो रहा है।
  • भविष्य का विस्तार: अतिरिक्त हितधारकों और नई स्वीकृत परियोजनाओं को शामिल करने के प्रयास लगातार जारी हैं।

दलाई लामा को ग्रैमी पुरस्कार

वर्ष 2026 में दलाई लामा को उनकी पुस्तकमेडिटेशन्स: द रिफ्लेक्शन्स ऑफ हिज होलीनेस द दलाई लामा” के लिए सर्वश्रेष्ठ ऑडियो पुस्तक, कथन और कहानी वाचन रिकॉर्डिंग” श्रेणी में पहला ग्रैमी पुरस्कार प्रदान किया गया है।

दलाई लामा के बारे में

  • पूरा नाम: 14वें दलाई लामा, तेनजिन ग्यात्सो।
  • भूमिका: तिब्बती बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक नेता और शांति, करुणा तथा अहिंसा के समर्थक।
  • मुख्य योगदान
    • वैश्विक शांति प्रवक्ता: संघर्षों के अहिंसात्मक समाधान के लिए नोबेल शांति पुरस्कार (1989)।
    • अंतरधार्मिक और नैतिक संवाद: धर्मों के बीच सद्भाव, मानसिक जागरूकता और नैतिक जीवन को प्रोत्साहित करना।
    • पर्यावरणीय जागरूकता: प्रकृति के प्रति पारिस्थितिकी उत्तरदायित्व और करुणा।
    • सांस्कृतिक पहुँच: आधुनिक मंचों के माध्यम से बौद्ध दर्शन, मानसिक कल्याण और सार्वभौमिक मानव मूल्यों का प्रचार।
  • वर्तमान निवास: वर्ष 1959 से धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय।

ग्रैमी पुरस्कार के बारे में

  • प्रकृति: वैश्विक संगीत और ऑडियो रिकॉर्डिंग उद्योग में उत्कृष्टता के लिए वार्षिक प्रतिष्ठित पुरस्कार।
  • पुरस्कार प्राधिकरण: अमेरिका की राष्ट्रीय रिकॉर्डिंग कला और विज्ञान अकादमी (NARAS)।
  • लैटिन ग्रैमी पुरस्कार: स्पैनिश और पुर्तगाली रिकॉर्डिंग के लिए लैटिन अकादमी (LARAS)।
  • श्रेणियाँ: संगीत प्रदर्शन, रचना और उत्पादन; वाचिक शब्द, कथन, ऑडियोबुक और वैश्विक संगीत श्रेणियाँ।
  • प्रमुख भारतीय पुरस्कार विजेता
    • पंडित रवि शंकर: ग्रैमी पुरस्कार।
    • ए. आर. रहमान: दो ग्रैमी पुरस्कार (वर्ष 2009)।
    • जाकिर हुसैन: ग्रैमी पुरस्कार।
    • शक्ति (बैंड): वैश्विक संगीत संबंधी सहयोग के लिए ग्रैमी विजेता।

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026 में, केंद्रीय वित्त मंत्री ने भारत को जैव-औषधियों (Biopharmaceuticals) के लिए एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने हेतु बायोफार्मा शक्ति (Biopharma SHAKTI) योजना की घोषणा की।

बायोफार्मा शक्ति के बारे में

  • पूर्ण रूप: बायोफार्मा शक्ति का तात्पर्य ज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से स्वास्थ्य उन्नयन की रणनीति से है।
  • वित्तीय परिव्यय: योजना के लिए पाँच वर्षों में ₹10,000 करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया गया है।
  • मुख्य उद्देश्य: उन्नत जैव-औषधीय उत्पादों के घरेलू उत्पादन हेतु एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना, जिससे स्वास्थ्य सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि हो।
  • नोडल मंत्रालय : रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अंतर्गत औष     धि विभाग। 
  • रोग फोकस: गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे कैंसर, मधुमेह और ऑटोइम्यून विकारों को प्राथमिकता, जैविक औषधियों और बायोसिमिलर्स के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन।
  • शामिल औषधियाँ:
    • जैविक औषधियाँ: जीवों या उनके घटकों जैसे प्रोटीन और जीन से प्राप्त जटिल औषधियों के घरेलू विनिर्माण पर केंद्रित।
    • बायोसिमिलर्स: स्वीकृत जैविक औषधियों के अत्यधिक समान संस्करणों के उत्पादन का विस्तार, जो लागत-प्रभावी उपचार विकल्प प्रदान करते हैं।
  • विनिर्माण संबंधी जटिलता: शुद्धिकरण, प्रसंस्करण और गुणवत्ता नियंत्रण से संबंधित परिष्कृत प्रक्रियाएँ, जो इन्हें रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण बनाती हैं।

अवसंरचना और संस्थागत समर्थन

  • औषधि शिक्षा और अनुसंधान: योजना के अंतर्गत तीन नए राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों की स्थापना का प्रस्ताव है।
  • मौजूदा संस्थानों का उन्नयन: सात मौजूदा राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों को जैव-औषधि-केंद्रित संस्थागत नेटवर्क के रूप में उन्नत किया जाएगा।
  • नैदानिक पारिस्थितिकी तंत्र: अनुसंधान, परीक्षण और विनियामक स्वीकृतियों के समर्थन हेतु 1,000 से अधिक मान्यता-प्राप्त नैदानिक परीक्षण स्थलों का राष्ट्रीय नेटवर्क विकसित किया जाएगा।
  • विनियामक सुदृढ़ीकरण: वैश्विक विनियामक मानकों और स्वीकृति समय सीमा को पूरा करने हेतु केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन को एक समर्पित वैज्ञानिक समीक्षा संवर्ग और विशेषज्ञ कार्यबल के माध्यम से सुदृढ़ किया जाएगा।

योजना के पीछे का तर्क

  • महामारी-विज्ञान संबंधी संक्रमण: भारत में रोग-भार अब तेजी से मधुमेह, कैंसर, हृदय रोग और स्व-प्रतिरक्षित विकारों जैसे गैर-संचारी रोगों के प्रभुत्व में है।
  • मृत्यु संबंधी आँकड़े: भारत में कुल मौतों का 63 प्रतिशत गैर-संचारी रोगों के कारण होता है, जिनमें हृदय रोग प्रमुख कारण हैं।
  • वैश्विक व्यापार अनिश्चितता: संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ब्रांडेड औषधीय आयात पर उच्च शुल्क प्रस्तावों के संदर्भ में यह योजना महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जिससे निर्यात-उन्मुख औषधि बाजारों में जोखिम उत्पन्न होते हैं।
  • रणनीतिक विविधीकरण: जैव-औषधियों और बायो-सिमिलर औषधियों की ओर परिवर्तन केवल जेनेरिक औषधियों पर निर्भरता को कम करता है और औषधि-विशिष्ट व्यापार बाधाओं से भारत की सुरक्षा करता है।

भारत के औषधि क्षेत्र की स्थिति

  • वैश्विक स्थान: भारत वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा औषधि उत्पादक है।
  • निर्यात क्षमता: भारत वैश्विक जेनेरिक औषधियों की लगभग 20 प्रतिशत आपूर्ति करता है और 190 से अधिक देशों को निर्यात करता है।
  • बाज़ार संरचना: भारत के औषधि निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत जेनेरिक औषधियों का है, जिनमें से लगभग आधा संयुक्त राज्य अमेरिका को जाता है।
  • टीका नेतृत्व: भारत डिप्थीरिया, काली खाँसी, टेटनस, बैसिलस कैल्मेट-ग्यूरिन और खसरा टीकों के उत्पादन में वैश्विक रूप से अग्रणी है।
  • आर्थिक योगदान: वित्त वर्ष 2025 में औषधि क्षेत्र का कारोबार ₹4.72 लाख करोड़ रहा, जबकि पिछले दशक में निर्यात की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर 7 प्रतिशत रही।
  • चिकित्सा उपकरण वृद्धि: भारत का चिकित्सा उपकरण क्षेत्र 187 देशों को निर्यात करता है, जिनमें एमआरआई स्कैनर, हृदय स्टेंट और वेंटिलेटर जैसे उन्नत उपकरण शामिल हैं।

बायोफार्मा शक्ति का रणनीतिक महत्त्व

  • स्वास्थ्य सुरक्षा: यह योजना दीर्घकालिक और जीवन के लिए घातक रोगों हेतु उन्नत औषधियों के उत्पादन की भारत की क्षमता को सुदृढ़ करती है।
  • औद्योगिक उन्नयन: यह भारत को केवल जेनेरिक औषधि आपूर्तिकर्ता से जटिल और उच्च-मूल्य जैव-औषधियों के उत्पादक में रूपांतरित करने में सहायक है।
  • निर्यात लचीलापन: जैव-औषधियों और जैव-समान औषधियों में विविधीकरण, वैश्विक व्यापार प्रतिबंधों के प्रभाव से भारत के औषधि क्षेत्र को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र: अनुसंधान, नैदानिक परीक्षण और विनियामक क्षमता में निवेश दीर्घकालिक औषधीय नवाचार को सुदृढ़ करता है।
  • किफायती स्वास्थ्य सेवा: घरेलू जैव-समान औषधि उत्पादन से उच्च-लागत उपचारों तक किफायती पहुँच सुनिश्चित होती है।

संदर्भ

केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री ने भारत को मेडिकल वैल्यू टूरिज्म (MVT) के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने तथा आयुष (AYUSH) पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने हेतु उपायों की घोषणा की।

मेडिकल वैल्यू टूरिज्म (Medical Value Tourism – MVT)  से तात्पर्य अंतरराष्ट्रीय या घरेलू रोगियों द्वारा चिकित्सा उपचार प्राप्त करने के लिए किसी अन्य देश या क्षेत्र की यात्रा से है, जिसे प्रायः पर्यटन तथा वेलनेस सेवाओं के साथ जोड़ा जाता है।

क्षेत्रीय मेडिकल हब के लिए योजना (Scheme for Regional Medical Hubs)

  • मेडिकल टूरिज्म का संवर्द्धन: सरकार ने निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी में राज्यों को पाँच क्षेत्रीय मेडिकल हब स्थापित करने के लिए समर्थन देने की एक योजना का प्रस्ताव किया है, ताकि भारत को मेडिकल टूरिज्म सेवाओं के केंद्र के रूप में बढ़ावा दिया जा सके।
  • एकीकृत स्वास्थ्य सेवा परिसरों: ये हब चिकित्सा, शैक्षणिक और अनुसंधान सुविधाओं को एक साथ जोड़ते हुए एकीकृत स्वास्थ्य सेवा परिसरों के रूप में कार्य करेंगे।
  • मुख्य घटक: इन हबों में आयुष केंद्र, मेडिकल वैल्यू टूरिज्म सुविधा केंद्र तथा निदान, उपचारोत्तर देखभाल और पुनर्वास के लिए अवसंरचना शामिल होगी।
  • रोजगार अवसर: इन हबों से डॉक्टरों और संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवरों (Allied Health Professionals – AHPs) सहित स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए विविध रोजगार अवसर सृजित होने की अपेक्षा है।
  • रोगी संबंधी अनुभव: इन हबों का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों प्रकार के रोगियों के अनुभव को बेहतर बनाना है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मकता सुदृढ़ होगी।

आयुष के लिए प्रमुख बजटीय घोषणाएँ

  • नए संस्थान: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नैदानिक देखभाल और अनुसंधान के विस्तार हेतु तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों की स्थापना।
  • गुणवत्ता आश्वासन: उच्च गुणवत्ता मानकों, प्रमाणन और कुशल मानव संसाधन को सुनिश्चित करने के लिए आयुष फार्मेसियों और औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं का उन्नयन।
  • वैश्विक अनुसंधान और प्रशिक्षण: पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों पर साक्ष्य-आधारित अनुसंधान, प्रशिक्षण और वैश्विक जागरूकता को सुदृढ़ करने के लिए जामनगर स्थित WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र का उन्नयन।

आयुष प्रणालियों के लिए वैश्विक पहलें (Global Momentum for AYUSH Systems)

  • अंतरराष्ट्रीय मान्यता: संयुक्त राष्ट्र में योग को प्रस्तुत किए जाने के बाद उसे वैश्विक मान्यता मिली, जबकि कोविड-19 महामारी के बाद आयुर्वेद को भी पुनः वैश्विक स्वीकृति प्राप्त हुई।
  • आर्थिक जुड़ाव: आयुष उत्पादों की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय माँग से जड़ी बूटियों और औषधीय पादपों की कृषि करने वाले किसानों तथा प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्द्धन से जुड़े युवाओं को लाभ हो रहा है।
  • सॉफ्ट पॉवर आयाम: आयुष का विकास भारत की सांस्कृतिक एवं स्वास्थ्य कूटनीति तथा वैश्विक सॉफ्ट पॉवर को सुदृढ़ करता है।

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026 में वित्त मंत्री ने घोषणा की कि केंद्र सरकार ने 16वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं को स्वीकार कर लिया है।

विभाज्य कर पूल (Divisible Pool of Taxes)

  • विभाज्य पूल से तात्पर्य संविधान के अनुच्छेद-270 के अंतर्गत केंद्र और राज्यों के बीच साझा किए जाने वाले केंद्रीय करों के पूल से है।
  • उपकर (Cesses) और अधिभार (Surcharges) को विभाज्य पूल से बाहर रखा जाता है।

ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण (Vertical Devolution) की अनुशंसाएँ

  • 41% हिस्सेदारी को बनाए रखना: 16वें वित्त आयोग ने करों के विभाज्य पूल में राज्यों की 41% हिस्सेदारी को बनाए रखने की सिफारिश की है, जो 15वें वित्त आयोग से लागू व्यवस्था की निरंतरता है।
  • यह हिस्सेदारी जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद 15वें वित्त आयोग द्वारा पहली बार 41% निर्धारित की गई थी।
  • वित्त आयोग अनुदान: वित्त वर्ष 2026–27 के लिए ₹1.4 लाख करोड़ का आवंटन किया गया है, जिसमें ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय निकाय अनुदान तथा आपदा प्रबंधन अनुदान शामिल हैं।

उपकर और अधिभार का मुद्दा

  • विभाज्य पूल का संकुचन: आयोग ने नोट किया कि सकल कर राजस्व में से विभाज्य पूल में जाने वाला हिस्सा वर्ष 2014–15 में 89.1% से घटकर 2020–24 के दौरान 74–80% रह गया, जिसका प्रमुख कारण उपकर और अधिभार में वृद्धि है।
  • आयोग का मत था कि राज्यों की हिस्सेदारी को और कम करने के लिए कोई अतिरिक्त वित्तीय संभावना नहीं है।
  • ग्रैंड बार्गेन प्रस्ताव: आयोग ने एक दीर्घकालिक “ग्रैंड बार्गेन” का सुझाव दिया, जिसके अंतर्गत:
    • केंद्र उपकर और अधिभार के बड़े हिस्से को नियमित करों में समाहित करेगा।
    • राज्य एक बड़े विभाज्य पूल में से अपेक्षाकृत कम हिस्सेदारी स्वीकार करेंगे, जिससे किसी भी पक्ष को राजस्व हानि न हो।

क्षैतिज हस्तांतरण सूत्र (Horizontal Devolution Formula)

  • क्षैतिज हस्तांतरण से आशय राज्यों की हिस्सेदारी को विभिन्न राज्यों के बीच वितरित करने से है।
  • 16वें वित्त आयोग ने राज्यों के बीच 41% हिस्सेदारी के वितरण हेतु मानदंडों और अधिभारों में संशोधन किया है।

संशोधित मानदंड और अधिभारांक

मानदंड 15वाँ वित्त आयोग (%) 16वाँ वित्त आयोग (%) परिवर्तन / टिप्पणी
जनसंख्या 15.0 17.5 अधिभार बढ़ाया गया
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन 12.5 10.0 घटाया गया
क्षेत्रफल 15.0 10.0 घटाया गया
वन आवरण 10.0 10.0 यथावत
प्रति व्यक्ति GSDP दूरी 45.0 42.5 घटाया गया, फिर भी सबसे बड़ा मानदंड
GDP में योगदान 10.0 नया जोड़ा गया
कर एवं वित्तीय प्रयास 2.5 हटाया गया, GDP योगदान से प्रतिस्थापित
कुल 100 100

नए GDP योगदान मानदंड का औचित्य

  • आर्थिक योगदान की मान्यता: यह नया मानदंड राष्ट्रीय आय में राज्यों के योगदान को स्वीकार करता है और आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों की दीर्घकालिक चिंताओं को संबोधित करता है।
  • समता और दक्षता के बीच संतुलन: जहाँ आय संबंधी मानदंड, गरीब राज्यों का समर्थन करता है, वहीं GDP योगदान दक्षता-उन्मुख तत्त्व को शामिल करता है।

दक्षिणी राज्यों पर प्रभाव

  • समग्र परिणाम: सभी पाँच दक्षिणी राज्यों की कर हस्तांतरण में हिस्सेदारी बढ़ी है।
  • कारण: GDP में योगदान को अधिक अधिभार और जनसंख्या तथा क्षेत्रफल को कम अधिभार दिए जाने से आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों को लाभ हुआ।

राज्य-वार परिवर्तन

  • आंध्र प्रदेश: 4.047% से बढ़कर 4.217%।
  • कर्नाटक: 3.647% से बढ़कर 4.131%।
  • केरल: 1.925% से बढ़कर 2.382%।
  • तमिलनाडु: 4.079% से बढ़कर 4.097%।
  • तेलंगाना: 2.102% से बढ़कर 2.174%।

उत्तरी राज्यों पर प्रभाव

  • उत्तर प्रदेश: हिस्सेदारी 17.939% से घटकर 17.619%।
  • बिहार: हिस्सेदारी 10.058% से घटकर 9.948%।
  • कारण: जनसंख्या को दिया गया अधिक अधिभार अब भी लाभ देता है, किंतु जनसंख्या वृद्धि और आय के अधिभार में कमी से हिस्सेदारी में मामूली गिरावट आई।

16वें वित्त आयोग के बारे में

  • 16वें वित्त आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद-280 के अंतर्गत किया गया।
  • कार्यकाल
    • 16वें वित्त आयोग का गठन 31 दिसंबर, 2023 को किया गया था।
    • अवधि: 1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 तक की पाँच-वर्षीय अवधि के लिए वित्तीय संसाधनों के वितरण की सिफारिश करना।
    • प्रकृति: वित्त आयोग की सिफारिशें परामर्शात्मक होती हैं, किंतु परंपरागत रूप से केंद्र सरकार द्वारा स्वीकार की जाती हैं।

अध्यक्ष

  • डॉ. अरविंद पनगढ़िया — अध्यक्ष; नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एवं प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री।

सदस्य

  • श्रीमती एनी जॉर्ज मैथ्यू — पूर्णकालिक सदस्य
  • डॉ. मनोज पांडा — पूर्णकालिक सदस्य
  • श्री अजय नारायण झा — पूर्णकालिक सदस्य
  • डॉ. सौम्य कांति घोष।

संदर्भ

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में केंद्रीय बजट 2026-27 प्रस्तुत करते हुए इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 के शुभारंभ की घोषणा की।

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के बारे में

  • ISM 2.0, पहले चरण की प्रगति पर आधारित है और भारत में एक आत्मनिर्भर, एंड-टू-एंड सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करने का लक्ष्य रखता है।
  • बजट: वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹1000 करोड़

मुख्य फोकस क्षेत्र

  • चिप निर्माण में प्रयुक्त उपकरणों और सामग्रियों का निर्माण
  • पूर्ण-स्टैक भारतीय सेमीकंडक्टर IP का विकास
  • सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करना
  • कुशल मानव संसाधन के निर्माण हेतु उद्योग-नेतृत्व वाले R&D और प्रशिक्षण केंद्र।

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 1.0

  • शुभारंभ: वर्ष 2021 में, ₹76,000 करोड़ के परिव्यय के साथ।
  • उद्देश्य: सेमीकंडक्टर फैब्स, डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग और चिप डिजाइन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना तथा भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन में एकीकृत करना।
  • नोडल मंत्रालय: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY)।
  • ISM के अंतर्गत प्रमुख योजनाएँ
    • सेमीकंडक्टर फैब्स योजना: वेफर फैब इकाइयों के लिए 50% तक वित्तीय सहायता।
    • डिस्प्ले फैब्स योजना: डिस्प्ले फैब्स के लिए परियोजना लागत का 50% तक समर्थन।
    • डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना: डिजाइन, विकास और परिनियोजन चरणों में वित्तीय सहायता।
    • सेमिकॉन इंडिया: उद्योग, नीति-निर्माताओं, अकादमिक जगत और स्टार्ट-अप्स को सहयोग और निवेश हेतु जोड़ने वाला प्रमुख मंच।
  • प्रमुख उपलब्धियाँ:
    • 10 सेमीकंडक्टर परियोजनाएँ स्वीकृत: छह राज्यों में, जिनमें कुल निवेश ₹1.6 लाख करोड़ से अधिक है।
    • इनमें फैब्रिकेशन प्लांट्स, OSAT/ATMP इकाइयाँ, कंपाउंड सेमीकंडक्टर सुविधाएँ (जैसे- सिलिकॉन कार्बाइड) और उन्नत पैकेजिंग शामिल हैं।

सेमीकंडक्टर के बारे में

  • सेमीकंडक्टर ऐसे पदार्थ होते हैं, जिनकी विद्युत चालकता चालक (जैसे ताँबा) और कुचालक (जैसे काँच या रबर) के मध्य होती है।
  • सेमीकंडक्टर को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का “मस्तिष्क” कहा जाता है। इनके बिना डिजिटल दुनिया (कंप्यूटिंग, AI, इंटरनेट, स्मार्टफोन, स्वच्छ ऊर्जा तकनीक आदि) का अस्तित्व संभव नहीं है।
  • मुख्य विशेषता: इनकी चालकता को सटीक रूप से नियंत्रित और परिवर्तित किया जा सकता है, जैसे:
    • अशुद्धियाँ मिलाकर (डोपिंग)
    • तापमान
    • प्रकाश
    • वोल्टेज या विद्युत क्षेत्र
    • इस कारण ये विद्युत संकेतों को स्विच करने, प्रवर्द्धित करने या संसाधित करने के लिए आदर्श हैं।
  • सबसे सामान्य सामग्री: सिलिकॉन (Si) सेमीकंडक्टर के लिए प्रमुख सामग्री है। यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध, स्थिर और प्रसंस्करण में सरल है।
    • अन्य सामग्रियों में जर्मेनियम (Ge), गैलियम आर्सेनाइड (GaAs), सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) और गैलियम नाइट्राइड (GaN) शामिल हैं।

सेमीकंडक्टर द्वारा निर्मित प्रमुख उपकरण

  • ट्रांजिस्टर: स्विच/एंप्लीफायर के रूप में कार्य करते हैं (आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के मूल घटक)।
  • डायोड: धारा को एक दिशा में प्रवाहित होने देते हैं।
  • इंटीग्रेटेड सर्किट (ICs) / माइक्रोचिप्स: अरबों ट्रांजिस्टर समाहित करते हैं।
  • माइक्रोप्रोसेसर (CPU), मेमोरी चिप्स, सेंसर, LED, सोलर सेल आदि।

सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत के लिए अवसर

  • वैश्विक आपूर्ति शृंखला का पुनर्संरेखण: चीन+1 रणनीति और भू-राजनीतिक जोखिम भारत के लिए एक विश्वसनीय वैकल्पिक सेमीकंडक्टर आधार बनने का अवसर प्रदान करते हैं।
    • चीन+1 रणनीति वह दृष्टिकोण है, जिसमें कंपनियाँ चीन में निर्माण बनाए रखते हुए कम-से-कम एक अन्य देश को सोर्सिंग और उत्पादन के लिए जोड़ती हैं।
  • मजबूत नीति एवं वित्तीय समर्थन: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन फैब्स, ATMP/OSAT इकाइयों और चिप डिजाइन के लिए लगभग 50% वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
  • डिजाइन एवं प्रतिभा लाभ: भारत में वैश्विक सेमीकंडक्टर डिजाइन इंजीनियरों का लगभग 20% मौजूद है, जिससे चिप डिजाइन और IP निर्माण में नेतृत्व की क्षमता बनती है।
  • पैकेजिंग एवं टेस्टिंग के माध्यम से कम बाधा: ATMP तेज स्केलेबिलिटी, कम लागत और प्रारंभिक निर्यात क्षमता प्रदान करता है।
  • घरेलू माँग में वृद्धि: EVs, 5G, AI, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में तीव्र वृद्धि चिप्स के लिए एक स्थिर आंतरिक बाजार सुनिश्चित करती है।
    • भारत में सेमीकंडक्टर बाजार वर्ष 2030 तक $100–110 बिलियन तक पहुँचने की उम्मीद है।

भारत में सेमीकंडक्टर विनिर्माण संबंधी चुनौतियाँ

  • उच्च पूँजी एवं प्रौद्योगिकी अंतर: उन्नत सेमीकंडक्टर फैब संयंत्रों की स्थापना के लिए अरबों डॉलर के निवेश और अत्याधुनिक तकनीक की आवश्यकता होती है, जिसकी भारत में वर्तमान में कमी है।
  • विशेषीकृत कुशल कार्यबल की कमी: बड़े इंजीनियरिंग आधार के बावजूद वेफर फैब्रिकेशन, प्रोसेस टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर विनिर्माण में विशेष कौशल अपर्याप्त हैं।
  • अविकसित आपूर्ति शृंखला एवं कच्चे माल पर निर्भरता: भारत सेमीकंडक्टर उपकरण, विशेष गैसों और कच्चे माल के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे आपूर्ति बाधा और निर्यात-नियंत्रण जोखिम बढ़ते हैं।
  • एकीकृत अवसंरचना की कमी: सेमीकंडक्टर फैब्स को उन्नत अवसंरचना (विश्वसनीय बिजली, जल, लॉजिस्टिक्स, क्लीन रूम, परीक्षण सुविधाएँ) की आवश्यकता होती है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा: भारत को ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे स्थापित हब्स से प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ती है, जिनके पास पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ और परिपक्व इकोसिस्टम हैं।

आगे की राह 

  • फैब कार्यान्वयन में तेजी: स्वीकृत 10 सेमीकंडक्टर फैब परियोजनाओं के निर्माण और कमीशनिंग को शीघ्र पूरा कर वाणिज्यिक चिप उत्पादन प्रारंभ करना।
  • घरेलू आपूर्ति शृंखला का निर्माण: उपकरण, सामग्री, रसायन और टूल्स के स्थानीय निर्माण को सुदृढ़ कर आयात निर्भरता कम करना।
  • डिजाइन एवं IP क्षमताओं का विस्तार: लक्षित प्रोत्साहनों और उद्योग–अकादमिक सहयोग के माध्यम से चिप डिजाइन हाउस, R&D केंद्र और स्वदेशी IP विकास को बढ़ावा देना।
  • कुशल कार्यबल का विकास: फैब्रिकेशन, प्रोसेस टेक्नोलॉजी और उन्नत पैकेजिंग में विशेषीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार।
  • साझेदारी एवं निर्यात को बढ़ावा: प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सह-निवेश और निर्यातोन्मुख विनिर्माण के लिए वैश्विक सेमीकंडक्टर अभिकर्ताओं को आकर्षित कर भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत करना।

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