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Feb 04 2026

ऑस्ट्रेलियन ओपन 2026 

ऑस्ट्रेलियन ओपन का 114वाँ संस्करण 18 जनवरी से 1 फरवरी, 2026 तक ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न पार्क में आयोजित हुआ।

ऑस्ट्रेलियन ओपन 2026 के परिणाम

  • पुरुष एकल (Men’s Singles): कार्लोस अल्काराज (स्पेन) ने फाइनल में नोवाक जोकोविच (सर्बिया) को हराया।
    • यह अल्काराज का पहला ऑस्ट्रेलियन ओपन खिताब और कुल मिलाकर सातवाँ ग्रैंड स्लैम खिताब था।
    • 22 वर्ष की आयु में, स्पेन के कार्लोस अल्काराज ऑस्ट्रेलियन ओपन जीतकर कॅरियर ग्रैंड स्लैम (चारों प्रमुख टूर्नामेंट) पूरा करने वाले इतिहास के सबसे युवा पुरुष खिलाड़ी बन गए।
  • महिला एकल (Women’s Singles): एलेना रयबाकिना (कजाखस्तान) ने फाइनल में आर्यना सबालेंका (बेलारूस, विश्व नंबर 1 और गत विजेता) को हराया।
    • यह रयबाकिना का पहला ऑस्ट्रेलियन ओपन खिताब और कुल मिलाकर दूसरा ग्रैंड स्लैम खिताब था (विंबलडन 2022 के बाद)।
  • डबल्स (Doubles)
    • पुरुष डबल्स (Men’s Doubles): क्रिश्चियन हैरिसन और नील स्कप्सकी ने पुरुष डबल्स खिताब जीता।
    • महिला डबल्स (Women’s Doubles): एलिस मर्टेंस और झांग शुआई ने महिला डबल्स चैंपियनशिप जीती।
  • मिक्स्ड डबल्स (Mixed Doubles): ओलिविया गाडेकी और जॉन पीयर्स ने सफलतापूर्वक अपने खिताब बरकरार रखते हुए मिक्स्ड युगल फाइनल जीता।

ऑस्ट्रेलियन ओपन के बारे में 

  • यह चार ग्रैंड स्लैम टेनिस टूर्नामेंटों में से एक है (फ्रेंच ओपन, विंबलडन और यूएस ओपन के साथ)।
  • यह प्रत्येक वर्ष मेलबर्न पार्क, ऑस्ट्रेलिया में आयोजित होने वाला वर्ष का पहला ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट है।
  • यह हार्ड कोर्ट पर खेला जाता है (वर्ष 1988 से; इससे पहले ग्रास कोर्ट पर खेला जाता था)।

सेल्फोस विषाक्तता

हाल ही में डॉक्टरों ने एक प्रमुख नैदानिक सफलता की रिपोर्ट दी है, जिसमें यह दिखाया गया है कि प्रारंभिक अंतःशिरा लिपिड इमल्शन थेरेपी घातक एल्युमिनियम फॉस्फाइड (सेल्फोस) विषाक्तता में मृत्यु दर को उल्लेखनीय रूप से कम करती है।

सेल्फोस (एल्युमिनियम फॉस्फाइड) विषाक्तता

  • एल्युमिनियम फॉस्फाइड (AlP) एक सस्ता ठोस ‘फ्यूमिगेंट’ और अत्यंत विषैला कीटनाशक है, जिसका उपयोग सामान्यतः अनाज संरक्षण के लिए किया जाता है।
  • बाजारों में इसकी आसान उपलब्धता ने आत्महत्या के लिए इसके दुरुपयोग को भी बढ़ा दिया है।
  • सेल्फोस विषाक्तता भारत में एक अत्यधिक घातक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति है, विशेषकर कृषि राज्यों में, क्योंकि इसका अनाज संरक्षक के रूप में व्यापक उपयोग और आसान उपलब्धता है।
  • रासायनिक संरचना: सेल्फोस में एल्युमिनियम फॉस्फाइड (AlP) होता है, जो नमी या जठर अम्ल के संपर्क में आने पर फॉस्फीन गैस (PH₃) उत्सर्जित करता है, जो एक शक्तिशाली कोशिकीय विष है और प्रणालीगत विफलता का कारण बनता है।
    • फॉस्फीन कोशिकाओं में ऑक्सीजन संवहन को बाधित करता है और लिपिड पेरऑक्सिडेशन उत्पन्न कर सकता है।
  • मनुष्यों पर प्रभाव: गंभीर मेटाबोलिक एसिडोसिस, हृदय विषाक्तता, शॉक और बहु-अंग विफलता उत्पन्न करता है।
    • विशिष्ट प्रतिविष (एंटीडोट) के अभाव के कारण मृत्यु दर अत्यंत अधिक बनी रहती है।
      • कुल मृत्यु दर 70–100% के बीच रहती है।
  • उपचार में सफलता
    • अध्ययन से पता चलता है कि अंतःशिरा लिपिड इमल्शन (ILE) एक प्रभावी सहायक उपचार है।
      • ILE थेरेपी में वसायुक्त इमल्शन का अंतःशिरा माध्यम से संचार किया जाता है, जिससे ऊतकों से लिपोफिलिक विषों को अवशोषित करने में मदद मिलती है और यह एनेस्थेटिक या दवा विषाक्तता में एक एंटीडोट के रूप में कार्य करता है।
    • ILE का प्रारंभिक उपयोग हीमोडायनामिक स्थिरता में सुधार करता है, एसिडोसिस को ठीक करता है और मृत्यु दर को कम करता है।
    • यह उपचार कम लागत वाला, व्यापक रूप से उपलब्ध और जिला एवं ग्रामीण अस्पतालों के लिए उपयुक्त है।

भारत-विस्तार

केंद्रीय बजट 2026–27 में कृषि, कौशल और ऑरेंज अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उभरती प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता दी गई है, जिसमें भारत-विस्तार को एक प्रमुख डिजिटल कृषि पहल के रूप में शामिल किया गया है।

भारत-विस्तार के बारे में

  • भारत-वर्चुअली इंटीग्रेटेड सिस्टम टू एक्सेस एग्रीकल्चरल रिसोर्सेज (विस्तार) एक बहुभाषी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसे केंद्रीय बजट 2026–27 में प्रस्तावित किया गया है, ताकि कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सके, किसानों के निर्णय लेने की क्षमता में सुधार किया जा सके और अनुकूलित परामर्श सेवाओं के माध्यम से कृषि जोखिम को कम किया जा सके।
  • नोडल निकाय: यह पहल कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के माध्यम से लागू की जाएगी, जिसमें एग्रीस्टैक और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा विकसित प्लेटफॉर्म का एकीकरण किया जाएगा तथा भारत के राष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन प्राप्त होगा।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • एग्रीस्टैक के किसान डेटाबेस को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की कृषि प्रथाओं के पैकेज के साथ एकीकृत करता है।
    • फसल-विशिष्ट और स्थान-विशिष्ट परामर्श के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित विश्लेषण का उपयोग करता है।
    • किसानों को बहुभाषी, अनुकूलित अनुशंसाएँ प्रदान करता है।
    • मौसम, मृदा स्वास्थ्य, फसल प्रबंधन और जोखिम न्यूनीकरण पर वास्तविक समय इनपुट का समर्थन करता है।
    • सूचना संबंधी असमानता को कम करता है और अंतिम स्थिति तक डिजिटल पहुँच में सुधार करता है।
  • महत्त्व
    • कृषि उत्पादकता और आय स्थिरता में वृद्धि करता है।
    • डेटा-आधारित कृषि और सटीक कृषि को सुदृढ़ करता है।
    • लघु और सीमांत किसानों के लिए जलवायु, बाजार और उत्पादन जोखिम को कम करता है।
    • विकसित भारत विजन के अंतर्गत डिजिटल कृषि को आगे बढ़ाता है।
    • किसानों, युवाओं और ग्रामीण समुदायों को लाभ पहुँचाने वाले समावेशी तकनीकी अपनाने के अनुरूप है।

विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026

विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 “वेटलैंड्स एंड ट्रेडिशनल नॉलेज: सेलिब्रेटिंग कल्चरल हेरिटेज” थीम के अंतर्गत 2 फरवरी को मनाया गया, जिसमें समुदाय-आधारित संरक्षण पर बल दिया गया।

आर्द्रभूमि क्या है?

  • आर्द्रभूमियाँ दलदली क्षेत्र, पीटलैंड या उथले जल क्षेत्र होते हैं, जो मीठे, खारे या लवणीय हो सकते हैं, जहाँ जल स्थिर या प्रवाहित अवस्था में होता है। इसमें निम्न ज्वार के समय 6 मीटर गहराई तक के समुद्री क्षेत्र भी शामिल हैं।
  • पारिस्थितिकी दृष्टि से, आर्द्रभूमियाँ स्थल और जलीय पारितंत्रों के बीच संक्रमण क्षेत्र (इकोटोन) के रूप में कार्य करती हैं।
  • आर्द्रभूमियों की भूमिका
    • जैव विविधता संरक्षण: जलीय पौधों, मछलियों, उभयचरों और प्रवासी पक्षियों के लिए आवास प्रदान करती हैं तथा समृद्ध खाद्य जाल एवं पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखती हैं।
    • जल विज्ञान एवं जलवायु विनियमन: जल शोधन, भूजल पुनर्भरण, पोषक तत्त्वों का पुनर्चक्रण, स्थानीय सूक्ष्म जलवायु का नियमन तथा अपवाह नियंत्रण के माध्यम से बाढ़ जोखिम में कमी।
    • आजीविका एवं पारितंत्र सेवाएँ: मत्स्यपालन, कृषि और सतत् पर्यटन को समर्थन प्रदान करती हैं तथा पारिस्थितिकी स्वास्थ्य को स्थानीय आजीविका और सांस्कृतिक प्रथाओं से जोड़ती हैं।

विश्व आर्द्रभूमि दिवस

  • विश्व आर्द्रभूमि दिवस प्रतिवर्ष 2 फरवरी को मनाया जाता है, ताकि वर्ष 1971 में ईरान के रामसर में आर्द्रभूमि पर रामसर कन्वेंशन को अपनाए जाने की स्मृति को चिह्नित किया जा सके।
  • यह कन्वेंशन अंतर-सरकारी संधि है, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमियों (रामसर स्थल) का संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना है।
  • मोंट्रेक्स रिकॉर्ड (1990) पारिस्थितिकी क्षरण के कारण प्राथमिक संरक्षण की आवश्यकता वाले रामसर स्थलों का एक रजिस्टर है।
    • पुनर्स्थापन के बाद स्थलों को सूची से हटा दिया जाता है।

भारत और रामसर स्थल

  • भारत वर्ष 1982 में रामसर कन्वेंशन का पक्षकार बना और तब से आर्द्रभूमि संरक्षण प्रयासों का विस्तार किया है।
  • कुल स्थल: हाल ही में पटना पक्षी अभयारण्य (उत्तर प्रदेश) और छारी-धंद (गुजरात) को सूची में जोड़ा गया, जिससे भारत के कुल रामसर स्थलों की संख्या 98 हो गई।
  • संरक्षण की आवश्यकता: भारत में पिछले तीन दशकों में लगभग 40% आर्द्रभूमियों का क्षरण हुआ है तथा शेष का लगभग आधा भाग क्षरणग्रस्त है।
  • पहल: आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017

मत्स्यपालन में वृद्धि

केंद्रीय बजट 2026–27 में मत्स्यपालन को रिकॉर्ड वित्तपोषण, शुल्क-मुक्त प्रोत्साहन और जलाशय-आधारित अवसंरचना के माध्यम से प्राथमिकता दी गई है, ताकि मूल्य शृंखलाओं, निर्यात और तटीय आजीविकाओं को बढ़ावा दिया जा सके।

मत्स्यपालन के लिए प्रमुख घोषणाएँ (बजट 2026–27)

  • एकीकृत जलाशय एवं अमृत सरोवर विकास: बजट में तटीय मत्स्य मूल्य शृंखलाओं, बाजार संपर्कों तथा महिला एवं स्टार्ट-अप-नेतृत्व वाले उद्यमों को सुदृढ़ करने हेतु 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास का प्रस्ताव किया गया है।
    • अप्रैल 2022 में प्रारंभ मिशन अमृत सरोवर का उद्देश्य प्रत्येक जिले में 75 जल निकायों का निर्माण या पुनर्जीवन करना है।
  • रिकॉर्ड वित्तीय सहायता: मत्स्य पालन के लिए ₹2,761.8 करोड़ का आवंटन, जिसमें PMMSY को ₹2,500 करोड़ प्रदान किए गए हैं, ताकि मछुआरों, अवसंरचना और मूल्य संवर्द्धन को समर्थन मिल सके।
  • समुद्री मत्स्य निर्यात प्रोत्साहन: EEZ और खुले समुद्र में भारतीय पोतों द्वारा अर्जित मत्स्य संसाधन को शुल्क-मुक्त किया गया है, तथा विदेशी एवं उनका विदेशी बंदरगाहों पर निर्वहन निर्यात माना जाएगा, दुरुपयोग से बचाव हेतु सुरक्षा उपायों के साथ।
  • सीफूड प्रसंस्करण प्रतिस्पर्द्धा में वृद्धि: सीफूड प्रसंस्करण इनपुट के लिए शुल्क-मुक्त आयात सीमा 1% से बढ़ाकर 3% कर दी गई है, जिससे लागत घटेगी और वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुपालन में सुधार होगा।

भारत में मत्स्यपालन की स्थिति

  • शीर्ष उत्पादक: भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन में 8% योगदान देता है; जलीय कृषि उत्पादन में दूसरा स्थान, झींगा उत्पादन और निर्यात में अग्रणी है।
  • तेजी से बढ़ता सनराइज सेक्टर: मत्स्यपालन लगभग 3 करोड़ आजीविकाओं को समर्थन देता है और इसमें वर्ष 2014–15 से 7.87% वार्षिक दर से वृद्धि हुई है, जो कृषि-संबद्ध क्षेत्रों में सबसे अधिक है।
  • बढ़ता उत्पादन एवं अंतर्देशीय मत्स्य विस्तार: मत्स्य उत्पादन बढ़कर 197.75 लाख टन (वित्त वर्ष 2024–25) हो गया है, जिसका मुख्य कारण अंतर्देशीय मत्स्यपालन और जलीय कृषि का विस्तार है।
  • सीफूड निर्यात में विस्तार: सीफूड निर्यात दोगुना होकर ₹62,408 करोड़ (वित्त वर्ष 2024–25) हो गया है, जिससे भारत की अग्रणी वैश्विक निर्यातक स्थिति मजबूत हुई है।
  • ब्लू इकोनॉमी को सुदृढ़ करना: 11,099 किमी. लंबी तटरेखा और विशाल EEZ के साथ, मत्स्यपालन पोषण, रोजगार और ब्लू इकानॉमी के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मत्स्यपालन के लिए समर्थन

  • समर्पित मंत्रालय की स्थापना: जून 2019 में मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की स्थापना।
  • बढ़ता निवेश: वर्ष 2015 से सरकार ने इस क्षेत्र में निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिसमें कुल व्यय ₹39,272 करोड़ है।
  • प्रमुख पहलें: ब्लू रिवॉल्यूशन योजना, मत्स्य एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि (FIDF), प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), प्रधानमंत्री मत्स्य समृद्धि सह योजना (PM-MKSSY) तथा किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के अंतर्गत मत्स्यपालन को शामिल करना।

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026–27 में शिक्षा और कौशल विकास को भारत की दीर्घकालिक विकास रणनीति के केंद्र में रखा गया, जिसमें विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु शिक्षा, रोजगार और उद्यम को जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया गया।

शिक्षा के लिए बजट आवंटन

  • आवंटन में बढोतरी : शिक्षा मंत्रालय के लिए कुल बजट आवंटन ₹1,39,289.48 करोड़ तक पहुँच गया है।
  • वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि: यह बजट वर्ष 2025–26 की तुलना में 8.27% की वृद्धि को दर्शाता है।

शिक्षा में प्रमुख घोषणाएँ

  • उच्च-स्तरीय स्थायी समिति
    • उच्च-स्तरीय समिति: सरकार एक उच्च-स्तरीय ‘शिक्षा से रोजगार और उद्यम’ स्थायी समिति की स्थापना करेगी।
    • सेवा क्षेत्र पर ध्यान: समिति सेवा क्षेत्र को आर्थिक विकास का मुख्य चालक बनाने हेतु उपायों की अनुशंसा करेगी, जिसका उद्देश्य वर्ष 2047 तक वैश्विक सेवाओं में 10% हिस्सेदारी प्राप्त करना है।
    • रोजगार और निर्यात: यह वृद्धि, रोजगार सृजन और निर्यात को अनुकूलित करने वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देगी।
    • उभरती प्रौद्योगिकियाँ: समिति कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य उभरती प्रौद्योगिकियों के रोजगार तथा कौशल आवश्यकताओं पर प्रभाव का आकलन करेगी एवं उपयुक्त नीतिगत उपाय प्रस्तावित करेगी।
  • हर जिले में बालिकाओं के लिए छात्रावास
    • लैंगिक बाधाओं का समाधान: विशेषकर STEM संस्थानों में उच्च शिक्षा से जुड़ी लैंगिक चुनौतियों के समाधान हेतु, सरकार ने प्रत्येक जिले में एक बालिका छात्रावास की स्थापना की घोषणा की है।
    • वित्तीय सहायता: इन छात्रावासों को ‘वायबिलिटी गैप फंडिंग’ या पूँजी सहायता के माध्यम से समर्थन दिया जाएगा।
    • तर्क: यह उपाय लंबे अध्ययन समय, प्रयोगशाला संबंधी कार्य और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण बाधाओं का सामना करने वाली छात्राओं को समर्थन देने तथा अनुच्छेद-15(3) और 15(4) के अंतर्गत लैंगिक समानता लक्ष्यों के अनुरूप पहुँच एवं प्रतिधारण में सुधार करने का लक्ष्य रखता है।
  • विश्वविद्यालय टाउनशिप
    • शैक्षणिक क्षेत्र: बजट प्रमुख औद्योगिक और लॉजिस्टिक कॉरिडोर के निकट पाँच विश्वविद्यालय टाउनशिप की स्थापना का प्रस्ताव करता है।
    • एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र: प्रत्येक टाउनशिप में कई विश्वविद्यालय, कॉलेज, अनुसंधान संस्थान, कौशल केंद्र और आवासीय परिसर होंगे।
    • उद्देश्य: यह पहल शिक्षा–उद्योग संबंध को मजबूत करने और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को समर्थन देने का लक्ष्य रखती है।
  • AI, कौशल विकास और कार्यबल सुधार
    • शिक्षा में AI: समिति विद्यालय स्तर से ही पाठ्यक्रमों में AI को शामिल करने की सिफारिश करेगी।
    • शिक्षक प्रशिक्षण: शिक्षक प्रशिक्षण को सुदृढ़ करने हेतु राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषदों (SCERTs) को उन्नत किया जाएगा।
    • पेशेवरों का उन्नयन: AI और उभरती प्रौद्योगिकियों में इंजीनियरों और तकनीकी पेशेवरों के लिए ‘अपस्किलिंग’ और ‘रीस्किलिंग’ ढाँचे प्रस्तावित किए जाएँगे।
    • श्रम बाजार सुधार: अन्य प्रमुख क्षेत्रों में AI-सक्षम श्रमिक–रोजगार संबंधों, अनौपचारिक कार्यबल को दृश्य और सत्यापन योग्य बनाना, तथा कुशल प्रवासी भारतीयों और विदेशी प्रतिभाओं को आकर्षित करना शामिल है।
  • चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी रोजगार को बढ़ावा
    • क्षेत्रीय मेडिकल हब: बजट में निजी क्षेत्र की भागीदारी से पाँच क्षेत्रीय मेडिकल हब स्थापित करने हेतु राज्यों को समर्थन देने की योजना की घोषणा की गई है।
    • एकीकृत स्वास्थ्य मॉडल: इन हब में चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और नैदानिक सुविधाओं के साथ आयुष केंद्र, निदान सेवाएँ, पुनर्वास अवसंरचना और मेडिकल वैल्यू टूरिज्म सुविधा शामिल होगी।
    • रोजगार सृजन: इस पहल से डॉक्टरों और संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए विविध रोजगार अवसर सृजित होने की अपेक्षा है, साथ ही भारत को वैश्विक मेडिकल पर्यटन गंतव्य के रूप में बढ़ावा मिलेगा।
  • विदेशी शिक्षा और चिकित्सा खर्चों में राहत
    • TCS में कमी: सरकार ने उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS) के तहत स्रोत पर एकत्रित कर (TCS) को 5% से घटाकर 2% करने का प्रस्ताव रखा।
    • दायरा: यह कम दर शिक्षा और चिकित्सा उद्देश्यों के लिए किए गए प्रेषण पर लागू होगी।
    • प्रभाव: इस उपाय का उद्देश्य विदेश में शिक्षा या चिकित्सा उपचार प्राप्त करने वाले छात्रों और परिवारों पर वित्तीय बोझ कम करना है।

शिक्षा, कौशल और रोजगार में भारत की पूर्व पहलें

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP)- 2020: बहुविषयक, लचीली शिक्षा रूपरेखा की शुरुआत, जिसमें आधारभूत अधिगम, व्यावसायिक शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और अनुसंधान एकीकरण पर बल दिया गया।
  • पीएम स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया(PM-SHRI): NEP-2020 के अनुरूप मॉडल संस्थानों के रूप में विद्यालयों का उन्नयन।
  • कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV): वंचित पृष्ठभूमि की बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय।
  • लक्षित छात्रवृत्ति और छात्रावास: उच्च शिक्षा में SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक छात्रों के लिए सहायता।
  • राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (NAPS): उद्योग-संलग्न अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण।
  • ‘फ्यूचर स्किल्स प्राइम’ और ‘स्किल इंडिया डिजिटल’: उभरती प्रौद्योगिकियों और डिजिटल कौशल पर फोकस।
  • AVGC-XR के लिए राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (NCoE): यह AVGC-XR क्षेत्र में स्टार्ट-अप्स को बढ़ावा देने हेतु एक इनक्यूबेशन केंद्र के रूप में कार्य करता है।
    • यह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIMs) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के मॉडल पर आधारित है।

संदर्भ 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच पेन्नैयार नदी के जल बंटवारे से जुड़े लंबे समय से लंबित विवाद के निपटारे हेतु एक अंतर-राज्यीय जल विवाद न्यायाधिकरण गठित करने का निर्देश दिया।

विवाद की पृष्ठभूमि

  • वाद की उत्पत्ति: तमिलनाडु ने वर्ष 2018  में सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया, जिसमें उसने पेन्नैयार नदी पर कर्नाटक द्वारा बाँधों और जल-विभाजन संरचनाओं के निर्माण को चुनौती दी।
  • मुख्य मुद्दा: यह विवाद कर्नाटक द्वारा ऊपरी प्रवाह क्षेत्र में जल उपयोग से संबंधित है, जिससे कथित रूप से तमिलनाडु में निचले प्रवाह पर प्रभाव पड़ता है।
  • प्रभावित क्षेत्र: पेन्नैयार नदी उत्तरी तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में सिंचाई और पेयजल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों पर संवैधानिक प्रावधान

  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद: दो या अधिक राज्यों के बीच राज्य सीमाओं के पार बहने वाली नदियों के जल के उपयोग, वितरण और नियंत्रण से संबंधित विवाद।
  • सातवीं अनुसूची
    • प्रविष्टि 56 – संघ सूची (सूची I): संसद द्वारा सार्वजनिक हित में आवश्यक घोषित किए जाने तक अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन और विकास के लिए केंद्र सरकार को अधिकार प्रदान करती है।
    • प्रविष्टि 17 – राज्य सूची (सूची II): जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, जल निकासी, तटबंध, जल भंडारण और जलविद्युत शक्ति जैसे जल-संबंधी विषयों को सम्मिलित करती है, जो प्रविष्टि 56 के अंतर्गत संघीय शक्तियों के अधीन हैं।
  • अनुच्छेद-262
    • संसद को अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित विवादों अथवा शिकायतों के निपटारे हेतु कानून बनाने का अधिकार देता है।
    • संसद यह भी प्रावधान कर सकती है कि ऐसे विवादों पर सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होगा।

अनुच्छेद-262 के अंतर्गत बनाए गए कानून

  • नदी बोर्ड अधिनियम, 1956: यह अधिनियम राज्य सरकारों से परामर्श के बाद अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन और विकास हेतु नदी बोर्ड स्थापित करने के लिए केंद्र सरकार को अधिकार देता है।
  • अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम (ISRWD), 1956: यह अधिनियम केंद्र सरकार को तब जल विवाद न्यायाधिकरण गठित करने का अधिकार देता है, जब एक या अधिक राज्य औपचारिक रूप से अंतर-राज्यीय जल विवाद के निपटारे का अनुरोध करते हैं।
  • न्यायिक सीमाएँ: अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के लिए गठित न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारित निर्णय या सूत्र पर सर्वोच्च न्यायालय प्रश्न नहीं उठा सकता।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के अंतर्गत न्यायाधिकरण गठन की प्रक्रिया

  • विवाद समाधान की शुरुआत: जब एक या अधिक राज्य जल विवाद के संबंध में केंद्र से संपर्क करते हैं, तो केंद्र सरकार, पहले संबंधित राज्यों के बीच परामर्श के माध्यम से समाधान का प्रयास करती है।
  • न्यायाधिकरण का गठन: यदि परामर्श विफल रहता है, तो केंद्र सरकार मामले के निपटारे हेतु जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन कर सकती है।
  • समयबद्ध ढाँचा (2002 संशोधन)
    • न्यायाधिकरण के गठन के लिए एक वर्ष की समय सीमा निर्धारित की गई है।
    • न्यायाधिकरण को तीन वर्षों के भीतर अपना निर्णय देना होता है, जिससे विवादों का त्वरित समाधान सुनिश्चित होता है।

पेन्नैयार नदी के बारे में

  • नामकरण: पेन्नैयार नदी को कन्नड़ में दक्षिणा पिनाकिनी और तमिल में थेनपेननई, पोन्नैयार या पेन्नैयार कहा जाता है।
  • उद्गम: यह नदी कर्नाटक के चेन्नकेशव पहाड़ियों में नंदी दुर्ग पर्वत की पूर्वी ढलानों से निकलती है।

  • प्रवाह मार्ग: पेन्नैयार नदी, कर्नाटक से पूर्व की ओर बहते हुए तमिलनाडु में प्रवेश करती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
  • लंबाई: लगभग 497 किमी. की कुल लंबाई के साथ, पेन्नैयार नदी कावेरी के बाद तमिलनाडु की दूसरी सबसे लंबी नदी है।
  • सहायक नदियाँ: इसकी प्रमुख सहायक नदियों में मार्कंडेय नदी, कंबैनल्लूर नदी, पांबर नदी, वणियार, कल्लार, वलयार ओडै, पांबनार, अलियार, मुसुकुंदनधी और थुरिंजलार नदियाँ शामिल हैं, जो इसके मौसमी प्रवाह में योगदान देती हैं।
  • घाटी स्थिति: केंद्रीय जल आयोग (CWC) की बेसिन रिपोर्ट के अनुसार, पेन्नैयार बेसिन, पेनार और कावेरी बेसिन के बीच स्थित बारह नदी घाटियों में दूसरी सबसे बड़ी अंतर-राज्यीय पूर्ववाहिनी नदी घाटी है।
  • घाटी वितरण: पेन्नैयार नदी बेसिन का लगभग 77% भाग तमिलनाडु में स्थित है, जिससे जलग्रहण क्षेत्र के संदर्भ में यह मुख्यतः तमिलनाडु की नदी के रूप में संदर्भित है।

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026–27 में, केंद्र सरकार ने ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटीय राज्यों में समर्पित दुर्लभ मृदा गलियारों (Rare Earth Corridors) की स्थापना का प्रस्ताव रखा।

भारत में दुर्लभ मृदा तत्त्व

  • प्राथमिक स्रोत: भारत में समुद्री तट की रेत से प्राप्त खनिज (Beach Sand Minerals – BSM) दुर्लभ मृदा तत्त्वों का प्रमुख स्रोत हैं।
  • मोनाजाइट की उपस्थिति: BSM में मोनाजाइट पाया जाता है, जो एक फॉस्फेट खनिज है और नियोडिमियम तथा प्रसीओडिमियम जैसे दुर्लभ मृदा तत्त्वों के साथ यूरेनियम और थोरियम से समृद्ध होता है, जिससे यह एक रणनीतिक पदार्थ बन जाता है।
  • रणनीतिक महत्त्व: उन्नत प्रौद्योगिकियों और राष्ट्रीय सुरक्षा में आवश्यक भूमिका के कारण दुर्लभ मृदा तत्त्वों को महत्त्वपूर्ण खनिजों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • रेडियोधर्मी तत्वों की उपस्थिति के कारण मोनाजाइट को परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के अंतर्गत विनियमित किया जाता है।

दुर्लभ मृदा चुंबकों के बारे में

  • दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (REPMs) व्यावसायिक रूप से उपलब्ध सबसे शक्तिशाली स्थायी चुंबक होते हैं।
  • इन्हें दुर्लभ मृदा तत्त्वों (आवर्त सारणी में 17 धातुओं का समूह) की मिश्र धातुओं को आयरन और बोरॉन जैसे अन्य तत्त्वों के साथ मिलाकर बनाया जाता है।
  • गुण: अत्यधिक उच्च चुंबकीय शक्ति, उच्च ऊर्जा घनत्व, छोटा आकार, फेराइट/एलनिको से श्रेष्ठ।
  • सीमाएँ: भंगुर, जंग लगने की संभावना तथा सामान्यतः निकल-लेपित या कोटेड होते हैं।
  • दुर्लभ मृदा चुंबकों के प्रकार
    • नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (Nd-Fe-B)
      • सबसे शक्तिशाली स्थायी चुंबक।
      • संरचना: नियोडिमियम, आयरन, बोरॉन।
      • सीमाएँ: ऊष्मा और जंग के प्रति संवेदनशील।
      • इलेक्ट्रिक वाहनों और पवन टरबाइनों में व्यापक उपयोग।
    • सैमरियम-कोबाल्ट (Sm-Co)
      • Nd-Fe-B से थोड़ा दुर्बल लेकिन अधिक स्थिर।
      • संरचना: सैमरियम, कोबाल्ट।
      • लाभ: उच्च ताप (~350°C तक) और जंग के प्रति अधिक प्रतिरोध।
      • सीमा: अधिक कीमती।
      • एयरोस्पेस और रक्षा अनुप्रयोगों में उपयोग।

राज्यवार दुर्लभ मृदा संबंधी स्थान

  • ओडिशा: छत्रपुर (OSCOM) क्षेत्र में वर्तमान में दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण का उच्चतम स्तर है।
  • आंध्र प्रदेश: श्रीकाकुलम, विशाखापत्तनम और नेल्लोर के तटीय क्षेत्रों में उल्लेखनीय भंडार पाए जाते हैं।
  • तमिलनाडु: मणावलाकुरिची और दक्षिणी तटीय जिलों में समृद्ध समुद्री रेत क्षेत्र हैं।
  • केरल: चवारा और विझिंजम बंदरगाह के निकट महत्त्वपूर्ण भंडार स्थित हैं।

योजना की प्रमुख विशेषताएँ

  • एकीकृत गलियारा मॉडल: खनन, पृथक्करण, प्रसंस्करण, अनुसंधान एवं विकास तथा विनिर्माण सुविधाओं को एक स्थान पर स्थापित किया जाएगा, जिससे लॉजिस्टिक लागत घटेगी और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में तेजी आएगी।
  • चुंबक विनिर्माण संबंध: ये गलियारे ₹7,280 करोड़ की ‘सिंटर्ड’ दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (REPM) योजना से संबंधित हैं, जिसका लक्ष्य 6,000 MTPA घरेलू चुंबक क्षमता का निर्माण करना है।
  • नीति संबंध: यह पहल राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन और चुंबक विनिर्माण योजना पर आधारित है।
  • राज्य-नेतृत्व औद्योगीकरण: इसका कार्यान्वयन राज्य सरकारों द्वारा किया जाएगा, जिससे राष्ट्रीय नीति से हटकर राज्य-प्रेरित मूल्य संवर्द्धन और औद्योगिक क्लस्टरिंग पर जोर दिया जाएगा।
  • विनिर्माण क्षमता लक्ष्य: 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) की एकीकृत REPM विनिर्माण क्षमता को समर्थन।
  • लाभार्थी आवंटन: प्रतिस्पर्द्धी बोली के माध्यम से चयनित पाँच लाभार्थी, प्रत्येक को 1,200 MTPA तक की क्षमता प्रदान की जाएगी।
  • वित्तीय प्रोत्साहन
    • बिक्री-आधारित प्रोत्साहन: पाँच वर्षों में ₹6,450 करोड़।
    • पूँजी सब्सिडी: एकीकृत सुविधाओं की स्थापना हेतु ₹750 करोड़।

दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबकों (REPMs) का रणनीतिक महत्त्व

  • मुख्य अनुप्रयोग: इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा प्रौद्योगिकियाँ।
  • वैश्विक आपूर्ति संकेंद्रण: चीन वैश्विक दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण और REPM विनिर्माण का 90% से अधिक नियंत्रित करता है।
  • आपूर्ति शृंखला जोखिम: आयात पर अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा संक्रमण, रक्षा तैयारी और औद्योगिक विकास के लिए जोखिम उत्पन्न करती है।
  • भारत की माँग–आपूर्ति स्थिति
    • बढ़ती माँग: इलेक्ट्रिक वाहनों के अपनाने और नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार के कारण REPMs की माँग बढ़ रही है।
    • आयात निर्भरता: भारत ने वित्त वर्ष 2024–25 में 53,000 मीट्रिक टन से अधिक दुर्लभ मृदा चुंबकों का आयात किया।
    • भविष्य अनुमान: वर्ष 2030 तक REPMs की घरेलू खपत के दोगुना होने की संभावना है, जिसमें वर्तमान में अधिकांश माँग आयात से पूरी होती है।

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026–27 में, भारत सरकार ने पूर्वोत्तर में बौद्ध सर्किट के विकास हेतु योजना की घोषणा की, साथ ही पूर्वोदय और पूर्वोत्तर-केंद्रित विकास रणनीति के अंतर्गत एकीकृत पूर्वी तट औद्योगिक गलियारे को क्षेत्र में विस्तारित करने की योजना बनाई।

बौद्ध सर्किट योजना के बारे में

  • बौद्ध सर्किट एक विरासत-सह-पर्यटन पहल है, जो पूर्वोत्तर राज्यों में बौद्ध मठों और तीर्थ स्थलों के संरक्षण, विकास तथा प्रचार पर केंद्रित है।
  • उद्देश्य: यह योजना पूर्वोत्तर राज्यों में बौद्ध मंदिरों और मठों के संरक्षण, पुनर्स्थापन और प्रचार का लक्ष्य रखती है।
  • नोडल मंत्रालय: पर्यटन मंत्रालय।
  • भौगोलिक क्षेत्र कवरेज: यह योजना अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा को शामिल करेगी।
  • बौद्ध सर्किट के घटक
    • विरासत संरक्षण: पूर्वोत्तर राज्यों में बौद्ध मंदिरों और मठों का संरक्षण और पुनर्स्थापन।
    • तीर्थ व्याख्या केंद्र: बौद्ध स्थलों के आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व को समझाने हेतु तीर्थ व्याख्या केंद्रों का विकास।
    • संपर्क और सुविधाएँ: पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए संपर्क सुविधा और तीर्थयात्रियों के अनुकूल सुविधाओं का प्रावधान।
    • यह योजना पर्यटन मंत्रालय की स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत संचालित है, जिसके तहत बौद्ध सर्किट, हिमालयन सर्किट सहित विषयगत पर्यटन सर्किट विकसित किए जाते हैं।

योजना से जुडी प्रमुख बजट घोषणाएँ

  • पूर्वी तट औद्योगिक गलियारे का विस्तार
    • औद्योगिक विस्तार: बजट में उद्योग और निवेश को आकर्षित करने हेतु एकीकृत पूर्वी तट औद्योगिक गलियारे को पूर्वोत्तर तक विस्तारित करने का प्रस्ताव रखा गया।
  • नोडल कनेक्टिविटी: दुर्गापुर को औद्योगिक और लॉजिस्टिक एकीकरण के लिए एक प्रमुख नोडल बिंदु के रूप में चिह्नित किया गया।

संबद्ध पर्यटन और संपर्क उपाय

  • पर्यटन गंतव्य: पूर्वोदय राज्यों में पाँच पर्यटन स्थलों का विकास।
  • ग्रीन मोबिलिटी: क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने और सतत् परिवहन को बढ़ावा देने के लिए 4,000 इलेक्ट्रिक बसों का प्रावधान।
  • CITY आर्थिक क्षेत्र (CERs)
    • प्रत्येक क्षेत्र के विकास हेतु पाँच वर्षों में ₹5,000 करोड़ का आवंटन किया गया है।
    • CERs का उद्देश्य एकीकृत शहरी–औद्योगिक विकास को बढ़ावा देकर क्षेत्रीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार करना है।

पूर्वोदय पहल भारत के पूर्वी क्षेत्र के समग्र विकास हेतु एक परिवर्तनकारी योजना है, जिसमें बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश शामिल हैं।

पूर्वोत्तर में प्रमुख बौद्ध मठ

  • अरुणाचल प्रदेश: तवांग मठ — भारत के सबसे बड़े बौद्ध मठों में से एक।
  • सिक्किम: रूमटेक मठ, एंचे मठ (गंगटोक)।
  • असम: हयग्रीव माधव मंदिर-बौद्धों और हिंदुओं का पवित्र स्थल।
  • मणिपुर: ऐतिहासिक बौद्ध समुदाय एवं मंदिर।
  • मिजोरम: सांस्कृतिक विविधता को दर्शाने वाले अल्प रूप से प्रसिद्ध बौद्ध विरासत स्थल।

बौद्ध विरासत का महत्त्व

अरुणाचल प्रदेश
  • तिब्बत और भूटान से जुड़े महायान और वज्रयान प्रभावों के साथ बौद्ध धर्म का विकास।
  • तवांग मठ एशिया के सबसे बड़े बौद्ध शिक्षण केंद्रों में से एक है।
  • मोनपा और शेरडुकपेन जैसी जनजातियाँ बौद्ध दर्शन तथा स्थानीय परंपराओं के समन्वय को दर्शाती हैं।
सिक्किम
  • 17वीं शताब्दी से सिक्किम ‘न्यिंगमा’ और ‘काग्यू’ वज्रयान परंपराओं का प्रमुख केंद्र रहा है।
  • रूमटेक और पेमायंग्त्से जैसे मठ वज्रयान बौद्ध धर्म के संस्थापक गुरु पद्मसंभव से जुड़े हैं।
  • यह तिब्बत, भूटान और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने वाली पवित्र भूमि का हिस्सा है।
असम
  • प्राचीन कामरूप से प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्य बौद्ध कला और वास्तुकला की ओर संकेत करते हैं।
  • ह्वेनसांग (ह्वेन त्सांग) के विवरण ब्रह्मपुत्र घाटी में बौद्ध विद्वत्ता की पुष्टि करते हैं।
  • यह म्याँमार और दक्षिण-पूर्व एशिया को प्रभावित करने वाला एक पारगमन क्षेत्र था।
मणिपुर और त्रिपुरा
  • विशेष रूप से म्याँमार सीमा के निकट थेरवाद और महायान प्रभावों के प्रमाण।
  • त्रिपुरा के पुरातात्त्विक अवशेष बंगाल और असम के साथ सांस्कृतिक संपर्क दर्शाते हैं।
  • यह पूर्वी भारत में सीमापार बौद्ध परंपराओं को प्रतिबिंबित करता है।

संदर्भ

केंद्र सरकार का संघीय बजट (2026) डिजिटल कंटेंट, डिजाइन एजुकेशन और हेरिटेज टूरिज्म के लिए लक्षित समर्थन के माध्यम से ऑरेंज इकोनॉमी को प्राथमिकता देता है, जो इसके विशेष क्षेत्र से भारत की अर्थव्यवस्था के मुख्य विकास स्तंभ में संक्रमण का संकेत देता है।

ऑरेंज इकोनॉमी के बारे में

  • उत्पत्ति और प्रतीकात्मकता: ऑरेंज इकोनॉमी शब्द की मूल रूप से खोज इवान दुके मारकेज (कोलंबिया के पूर्व राष्ट्रपति) और फेलिपे बुइत्रागो ने अपने वर्ष 2013 के आर्थिक लेख के प्रकाशन में किया था।
  • संकल्पना और आर्थिक क्षेत्र: यह मॉडल गतिविधियों की एक व्यापक शृंखला को संदर्भित करता है, जहाँ मूल विचारों को सांस्कृतिक वस्तुओं और सेवाओं में परिवर्तित किया जाता है।
    • इस क्षेत्र में मूल्य का मुख्य चालक बौद्धिक संपदा (IP) अधिकार हैं। इस क्षेत्र को दो भागों में विभाजित किया जाता है:-
      • सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था: इसमें विरासत स्थलों, दृश्य कलाओं और पारंपरिक त्योहारों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
      • रचनात्मक उद्योग: इसमें फैशन, वास्तुकला, डिजिटल विज्ञापन और गेमिंग जैसे अधिक वाणिज्यिक क्षेत्र शामिल हैं।
  • वृद्धि आधारित मॉडल और उद्भव: ऑरेंज इकोनॉमी एक विचार-आधारित विकास मॉडल का प्रतिनिधित्व करती है, जो नॉलेज इकोनॉमी और एक्सपीरियंस इकोनॉमी के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है।
    • इन ढाँचों में, अमूर्त संपत्तियों (विशेष रूप से रचनात्मकता, कहानी कहने की कला और बौद्धिक संपदा) का उपयोग आर्थिक मूल्य उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
    • हालाँकि सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था विरासत और कलाओं पर केंद्रित रहती है, व्यापक रचनात्मक अर्थव्यवस्था मूल्य सृजन को डिजाइन, डिजिटल मीडिया और अनुभव-आधारित सेवाओं तक विस्तारित करती है।
  • आधुनिक एकीकरण: इस रचनात्मक उत्पादन का एक महत्त्वपूर्ण और बढ़ता हुआ हिस्सा अब गिग-आधारित और प्लेटफॉर्म की मध्यस्था वाले कार्यों के माध्यम से उत्पादित होता है।
    • यह परिवर्तन ऑरेंज इकोनॉमी को डिजिटल गिग इकोनॉमी से प्रभावी रूप से जोड़ता है, जिससे रचनात्मक सेवाओं का वैश्विक वितरण संभव हो पाता है।

ऑरेंज इकोनॉमी के लिए बजट 2026 के मुख्य बिंदु

केंद्रीय बजट 2026 में इस रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए कई संरचनात्मक और डिजिटल आयाम प्रस्तुत किए गए:

  • AVGC कंटेंट क्रिएटर लैब्स: सरकार मूलभूत स्तर पर प्रतिभाओं को पोषित करने के लिए 15,000 माध्यमिक विद्यालयों और 500 कॉलेजों में एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स (AVGC) के लिए विशेष प्रयोगशालाएँ स्थापित करने के लिए प्रयासरत है।
    • अनुमान है कि वर्ष 2030 तक 20 लाख पेशेवरों की आवश्यकता होगी।
  • राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (NID) का विस्तार: डिजाइन शिक्षा के विकेंद्रीकरण के लिए “चैलेंज रूट” के माध्यम से भारत के पूर्वी क्षेत्र में एक नया राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान स्थापित किया जाएगा।
  • रचनात्मक प्रौद्योगिकियों के लिए समर्थन: उच्च-तकनीकी रचनात्मक निर्यात में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए मुंबई स्थित भारतीय रचनात्मक प्रौद्योगिकी संस्थान (IICT) को वित्तीय और संरचनात्मक सहायता प्रदान की जाएगी।
  • विरासत और सांस्कृतिक पर्यटन: लोथल, धोलावीरा और सारनाथ सहित पंद्रह प्रमुख पुरातात्त्विक स्थलों को जीवंत अनुभवात्मक सांस्कृतिक स्थलों के रूप में विकसित किया जाएगा।
  • रचनात्मक उद्योगों में AI का एकीकरण: बजट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को क्रिएटिव कंटेंट निर्माण के साथ एकीकृत करने पर जोर दिया गया है और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाने के लिए एनीमेशन, गेमिंग, दृश्य प्रभाव और आकर्षक कहानी कहने के लिए AI-आधारित उपकरणों के विकास का समर्थन किया गया है।
  • रचनात्मक अर्थव्यवस्था में युवा एवं नारी शक्ति: ऑरेंज इकोनॉमी ढाँचे के अंतर्गत लक्षित कौशल विकास, इनक्यूबेशन और उद्यमिता सहायता के माध्यम से रचनात्मक व्यवसायों में युवाओं और महिलाओं को सशक्त बनाने पर विशेष ध्यान।
  • WAVES–वैश्विक स्थिति निर्धारण: भारत को क्रिएटिव कंटेंट उत्पादन और निर्यात के प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट (WAVES) को निरंतर बढ़ावा दिया जा रहा है।

आधुनिक अर्थव्यवस्था का स्पेक्ट्रम

रंग  आर्थिक क्षेत्र / मुख्य फोकस-क्षेत्र महत्त्व एवं उद्देश्य
ग्रीन 

🌳

सतत् एवं निम्न-कार्बन ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग और पर्यावरणीय जोखिमों तथा पारिस्थितिकी दुर्लभताओं को कम करने पर केंद्रित।
ब्लू 

🌊

समुद्री एवं महासागरीय संसाधन आर्थिक विकास, आजीविका में सुधार तथा महासागरीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण हेतु समुद्री संसाधनों के सतत् उपयोग पर केंद्रित।
व्हाइट 

🩺

स्वास्थ्य एवं सामाजिक देखभाल इसमें चिकित्सा क्षेत्र, औषधि (फार्मास्युटिकल) अनुसंधान तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए समर्पित कार्यबल सम्मिलित है।
सिल्वर  वृद्ध आबादी 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित उत्पाद एवं सेवाएँ, जिनमें वृद्ध देखभाल, स्वास्थ्य-प्रौद्योगिकी तथा विशेष आवास पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
ऑरेंज  रचनात्मक एवं सांस्कृतिक उद्योग इसमें कला, डिजाइन, विरासत, सॉफ्टवेयर तथा विज्ञापन शामिल हैं; यह बौद्धिक संपदा और मानवीय सृजनात्मकता पर आधारित होता है।
पर्पल  देखभाल अर्थव्यवस्था यह ‘देखभाल के कार्य’ (सवेतन एवं अवैतनिक दोनों) पर केंद्रित है तथा लैंगिक समानता और घरेलू/सामुदायिक श्रम के महत्त्व पर बल देता है।
ब्राउन  संसाधन-गहन विकास यह जीवाश्म ईंधनों पर आधारित आर्थिक विकास को संदर्भित करता है, जिसमें पर्यावरणीय क्षरण के प्रति सीमित चिंता होती है।
येलो (Yellow)  सौर एवं स्वच्छ प्रौद्योगिकी यह प्रायः हरित अर्थव्यवस्था का एक उप-क्षेत्र होता है तथा विशेष रूप से सौर ऊर्जा उत्पादन एवं इस क्षेत्र में होने वाली तकनीकी प्रगति पर केंद्रित रहता है।
ग्रे (Grey)  असंगठित अर्थव्यवस्था ऐसी गतिविधियाँ जो कानूनी तो होती हैं, परंतु सरकार द्वारा विनियमित, कराधान या निगरानी के अंतर्गत नहीं होतीं (जैसे- सड़क किनारे विक्रय)।
ब्लैक   अवैध / छाया अर्थव्यवस्था ऐसी आर्थिक गतिविधियाँ, जिनमें बाजार के अवैध लेन-देन शामिल होते हैं, जैसे- तस्करी, धन शोधन (मनी लॉण्ड्रिंग) आदि।

भारत के रचनात्मक परिदृश्य की वर्तमान स्थिति

  • उद्योग मूल्यांकन: भारत में रचनात्मक अर्थव्यवस्था का वर्तमान मूल्य लगभग 25-35 अरब डॉलर (मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र) है, और वर्ष 2030-32 तक इसके 100 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
    • वैश्विक स्तर पर, रचनात्मक अर्थव्यवस्था से सालाना 2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का राजस्व और लगभग 5 करोड़ रोजगार सृजित होने का अनुमान है।
  • रोजगार: यह क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिसमें रचनात्मक क्षेत्र के रोजगार का एक बड़ा हिस्सा शामिल है; व्यापक मीडिया और मनोरंजन उद्योग लगभग 5 करोड़ रोजगारों (अप्रत्यक्ष रोजगार सहित) का समर्थन करता है, जबकि प्रमुख रचनात्मक उद्योग कई करोड़ पेशेवरों को रोजगार प्रदान करते हैं।
  • क्षेत्र वृद्धि: FICCI-EY मीडिया और मनोरंजन रिपोर्ट, 2025 और आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, ऑनलाइन गेमिंग क्षेत्र ने वर्ष 2024 में 232 अरब रुपये का राजस्व अर्जित किया, जबकि एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स और पोस्ट-प्रोडक्शन उद्योग 103 अरब रुपये तक पहुँच गया।
  • निर्यात क्षमता: रचनात्मक सेवाओं के निर्यात में वर्ष 2023-24 में 20% की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई, जिससे भारत को 11 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई।
  • क्षेत्रीय, अनौपचारिक और पारंपरिक अर्थव्यवस्था आयाम: समावेशी विकास के लिए, ऑरेंज इकोनॉमी को भारत के अनौपचारिक और क्षेत्रीय रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्रों को एकीकृत करना होगा।
    • परंपरागत और लोक कलाकार: आदिवासी कला रूप, लोक कलाकार और शिल्पकार भारत की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं।
    • स्वयं सहायता समूह और लघु एवं मध्यम उद्यम: डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से हस्तशिल्प, हथकरघा और जीआई-टैग वाले उत्पादों के लिए बाजार पहुँच को मजबूत करने से आजीविका को औपचारिक रूप दिया जा सकता है।
    • शहरी संकेंद्रण का जोखिम: लक्षित नीतिगत समर्थन के बिना, रचनात्मक विकास महानगर-केंद्रित रह सकता है, जिससे ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्र उपेक्षित रह सकते हैं।

भारत के लिए ऑरेंज इकोनॉमी का महत्त्व

  • आर्थिक विकास के कारक और गुणक प्रभाव
    • रोजगार की अपार संभावनाएँ: एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स (AVGC) क्षेत्र विकास का प्रमुख इंजन है, जिसके वर्ष 2030 तक दो मिलियन प्रशिक्षित पेशेवरों की आवश्यकता होने का अनुमान है।
    • गुणक प्रभाव: AVGC में प्रत्येक प्रत्यक्ष रोजगार प्रौद्योगिकी, डिजिटल मार्केटिंग और इवेंट मैनेजमेंट जैसे संबंधित क्षेत्रों में 2-3 अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित करता है।
    • कॉन्सर्ट इकोनॉमी और इसके प्रभाव: जयपुर साहित्य महोत्सव (स्थानीय स्तर पर ₹100 करोड़ का योगदान) से लेकर “दिल-लुमिनाती” जैसे टूर तक, बड़े पैमाने के आयोजन विमानन, आतिथ्य और खुदरा क्षेत्रों के लिए राजस्व के बड़े स्रोत के रूप में कार्य करते हैं।
    • निर्यात नेतृत्व: रचनात्मक सेवाएँ भारत के सेवा निर्यात बास्केट में विविधता ला रही हैं, जिससे IT और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग पर पारंपरिक निर्भरता कम हो रही है।
  • रणनीतिक विकास – सेवा से स्वामित्व की ओर
    • मूल्य प्रतिधारण: हॉलीवुड वीएफएक्स के लिए “बैक-ऑफिस” की भूमिका से बाहर निकलकर भारतीय रचनाकारों को दीर्घकालिक रॉयल्टी और वैश्विक ब्रांडिंग अधिकार बनाए रखने का अवसर मिलता है।
    • नवाचार और स्मार्ट पॉवर: यह क्षेत्र व्यापक नवाचार क्षेत्र की नींव के रूप में कार्य करता है, जो “स्मार्ट पॉवर” और सांस्कृतिक कूटनीति के माध्यम से भारत के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाता है।
    • पर्यटन एकीकरण: सांस्कृतिक उत्सवों और विरासत स्थलों को उजागर करने से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के ठहरने की अवधि और खर्च में वृद्धि होती है।
  • लोकतांत्रीकरण और ग्रामीण सशक्तीकरण
    • शहरी-ग्रामीण विभाजन को पाटना: डिजिटल रचनाकार अर्थव्यवस्था, टियर-II और टियर-III शहरों में मौजूद प्रतिभाओं को प्रवास की आवश्यकता के बिना, स्थानीय भाषाओं और परंपराओं को वैश्विक स्तर पर भुनाने का अवसर प्रदान करती है।
    • हस्तनिर्मित वस्तुओं का निर्यात: भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग वाले उत्पादों (जैसे, चन्नापटना के खिलौने या मधुबनी कला) को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत करके, पारंपरिक शिल्पों को उच्च-मूल्य वाले “सांस्कृतिक निर्यात” में परिवर्तित किया जा सकता है।
    • भाषायी लाभ: भारत की मोबाइल-प्रधान आबादी और भाषायी विविधता, बहुभाषी स्थानीय कंटेंट के निर्माण में एक अद्वितीय प्रतिस्पर्द्धी लाभ प्रदान करती है।
  • नीति और संवैधानिक ढाँचा
    • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद-29 और 30 सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करते हैं और रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए राज्य के समर्थन हेतु एक मानक आधार प्रदान करते हैं।
    • भविष्य की शिक्षा: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP)- 2020 रचनात्मक उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल विकसित करने हेतु डिजाइन थिंकिंग और व्यावसायिक अनुभव पर जोर देती है।
    • राष्ट्रीय समन्वय: यह क्षेत्र डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया के एकीकरण पर तेजी से बढ़ रहा है और विकास के लिए एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करता है।

ऑरेंज इकोनॉमी के विकास में चुनौतियाँ

  • वित्तीय और संरचनात्मक बाधाएँ: रचनात्मक क्षेत्र अक्सर पारंपरिक औद्योगिक ढाँचे में स्थापित होने के लिए संघर्ष करता है, जिसके कारण उसे ‘वित्तीय सहायता’ मिलने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
    • प्रोत्साहन असमानता: विनिर्माण या IT क्षेत्र के विपरीत, रचनात्मक क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से कम वित्तीय प्रोत्साहन और कर छूट प्राप्त हुई है।
    • वित्तपोषण में अंतराल: एनिमेशन और गेमिंग परियोजनाओं के विकास चक्र लंबे होते हैं और इनमें भौतिक संपार्श्विक की कमी होती है, जिससे पारंपरिक बैंक ऋण प्राप्त करना लगभग असंभव हो जाता है।
    • उच्च GST बोझ: वास्तविक धन वाली गेमिंग पर 28% GST ने लेन-देन की मात्रा को काफी कम कर दिया है और गेमिंग उप-क्षेत्र में निवेशकों के उत्साह को कम कर दिया है।
    • नियामक जटिलता: आयोजनों और फिल्म निर्माण के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस प्रणाली की अनुपस्थिति नौकरशाही विलंब का कारण बनती है, जो बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय निर्माणों को हतोत्साहित करती है।
  • बाजार की अस्थिरता और “प्लेटफॉर्म का जाल”: डिजिटल प्लेटफॉर्म पहुँच तो प्रदान करते हैं, लेकिन साथ ही रचनाकारों के लिए एक नए प्रकार की असुरक्षा भी उत्पन्न करते हैं।
    • बाजार का केंद्रीकरण और असमान मूल्य वितरण: राजस्व का अधिकांश हिस्सा शीर्ष पर केंद्रित है। कुछ रचनाकार ही लाभ का बड़ा हिस्सा अर्जित कर पाते हैं, जिससे “रचनात्मक मध्यम वर्ग” आर्थिक असुरक्षा की स्थिति में रहता है।
    • प्लेटफॉर्म पर निर्भरता: रचनाकार वैश्विक एल्गोरिदम के भरोसे हैं। एक छोटी-सी नीति में परिवर्तन या “शैडो बैन” भी उनकी आजीविका को पल भर में अस्त-व्यस्त कर सकता है।
    • एल्गोरिदम का दृश्यता पूर्वाग्रह: एल्गोरिदम अक्सर मुख्यधारा के कंटेंट को प्राथमिकता देते हैं, जिससे क्षेत्रीय और स्थानीय रचनाकारों को अक्सर नुकसान होता है।
  • प्रतिभा और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा: भारत अपने कार्यबल में ‘मात्रा’ और ‘गुणवत्ता’ के बीच के अंतर को पाटने के लिए समय के साथ होड़ कर रहा है।
    • प्रतिभा की कमी: वैश्विक स्टूडियो द्वारा अपेक्षित उच्च गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में सक्षम पेशेवर रूप से प्रशिक्षित डिजाइनरों और तकनीकी कलाकारों की लगातार कमी बनी हुई है।
    • क्षेत्रीय और लैंगिक असंतुलन: उच्च गुणवत्ता वाली रचनात्मक शिक्षा महानगरों में केंद्रित है और AVGC क्षेत्र में तकनीकी भूमिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है।
    • वैश्विक आउटसोर्सिंग प्रतिस्पर्द्धा: फिलीपींस, कनाडा और चीन जैसे देश स्थापित स्टूडियो प्रणालियों और आक्रामक लागत लाभों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्द्धा पेश करते हैं।
  • बौद्धिक संपदा संरक्षण और डेटा संबंधी कमियाँ: सुरक्षा और मापन के अभाव में, यह क्षेत्र राष्ट्रीय लेखांकन में “अदृश्य” बना रहता है।
    • कमजोर पायरेसी प्रवर्तन: कॉपीराइट प्रवर्तन की अपर्याप्तता और व्यापक डिजिटल पायरेसी भारतीय स्टूडियो की राजस्व क्षमता को लगातार कम कर रही है।
    • मापन और डेटा की कमी: भारत में ‘क्रिएटिव इकॉनमी सैटलाइट अकाउंट’ नहीं है। समर्पित डेटा के अभाव में, GDP में इस क्षेत्र के योगदान को लगातार कम करके आँका जाता है।
    • खंडित निगरानी: रचनात्मक अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी कई मंत्रालयों में बँटी हुई है, जिससे नीतिगत समन्वय का अभाव है।

भारत द्वारा उठाए गए कदम

  • संस्थागत एवं शैक्षिक परिवर्तन
    • अखिल भारतीय रचनात्मक अर्थव्यवस्था पहल (AIICE): वर्ष 2024 में शुरू की गई यह पहल भारत के 30 अरब डॉलर के रचनात्मक उद्योग को बढ़ावा देने के लिए एक एकीकृत मंच के रूप में कार्य करती है, जिसका मुख्य उद्देश्य कार्यबल को औपचारिक रूप देना और भारत को एक वैश्विक रचनात्मक केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
    • AVGC कंटेंट क्रिएटर लैब्स: बजट 2026 के तहत, सरकार ने 15,000 माध्यमिक विद्यालयों और 500 कॉलेजों में इन प्रयोगशालाओं की स्थापना के लिए 250 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।
      • मुंबई स्थित भारतीय रचनात्मक प्रौद्योगिकी संस्थान (IICT) के नेतृत्व में, यह पहल व्यावहारिक उपकरणों को विद्यालय के पाठ्यक्रम में एकीकृत करती है।
    • राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (NID) का विस्तार: प्रतिभा की कमी को दूर करने के लिए, पूर्वी भारत में एक नया NID स्थापित किया जा रहा है, जो डिजाइन शिक्षा के माध्यम से क्षेत्रीय विकास पर ध्यान केंद्रित करेगा।
  • डिजिटल और वित्तीय अवसंरचना
    • राष्ट्रीय रचनात्मक कोष (NCF): यह एक विशेष कोष है, जिसे “उच्च जोखिम, उच्च रचनात्मकता” वाले स्टार्ट-अप्स को प्रारंभिक पूँजी प्रदान करने के लिए बनाया गया है, जो पारंपरिक वेंचर कैपिटल द्वारा उत्पन्न किए गए अंतराल को पाटता है।
    • इमर्सिव हेरिटेज टूरिज्म: 15 पुरातात्त्विक स्थलों (जैसे- लोथल, राखीगढ़ी और लेह पैलेस) को इमर्सिव स्टोरीटेलिंग टेक्नोलॉजी और विशेष संरक्षण प्रयोगशालाओं का उपयोग करके “अनुभवात्मक स्थलों” में विकसित करना।
    • राष्ट्रीय गंतव्य डिजिटल नॉलेज ग्रिड: सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्थलों का दस्तावेजीकरण करने के लिए बनाया गया एक नया डिजिटल इकोसिस्टम, जो स्थानीय इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स के लिए रोजगार सृजित करता है।

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ

देश रणनीति आर्थिक प्रभाव
दक्षिण कोरिया K-कंटेंट रणनीति: संगीत, गेमिंग और फिल्म के लिए बड़े पैमाने पर सरकारी सहायता। सांस्कृतिक निर्यात अब सॉफ्ट पॉवर मूल्य के मामले में पारंपरिक विनिर्माण के बराबर पहुँच गया है।
यूनाइटेड किंगडम क्रिएटिव क्लस्टर्स: डिजाइन और विज्ञापन के लिए उच्च घनत्व वाले हब। रचनात्मक उद्योग राष्ट्रीय GDP में लगभग 6% का योगदान करते हैं।
कोलंबिया ऑरेंज लॉ’: रचनात्मक स्टार्ट-अप्स को कर छूट प्रदान करने वाला विशिष्ट कानून (कानून 1834)। उन्होंने ‘7 I’ (सूचना, संस्थान, अवसंरचना आदि) ढाँचे का आविष्कार किया।
नाइजीरिया नॉलीवुड इकोसिस्टम: तीव्र, कम लागत वाला डिजिटल वितरण मॉडल। मात्रा के हिसाब से यह दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में से एक है, जो बड़े पैमाने पर स्थानीय रोजगार का सृजन करता है।
बहुपक्षीय समर्थन यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) और यूएनसीटीएडी (संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन) जैसे संगठन रचनात्मक अर्थव्यवस्था को सतत् विकास के एक स्तंभ के रूप में बढ़ावा देते हैं।

आगे की राह

  • संरचनात्मक सुधार और व्यापार में सुगमता: रचनात्मक क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए, भारत उन नौकरशाही बाधाओं को दूर करने का प्रयास कर रहा है, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से लाइव इवेंट्स और डिजिटल प्रस्तुतियों को बाधित कियाहै।
    • सिंगल-विंडो क्लीयरेंस: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय लाइव मनोरंजन अनुमतियों के लिए एक एकीकृत पोर्टल शुरू कर रहा है।
      • इसका उद्देश्य आयोजनों के लिए वर्तमान में आवश्यक 10-15 अलग-अलग अनुमतियों को एक सरल प्रक्रिया में बदलना है।
    • क्रिएटिव SEZ और क्लस्टर: मुंबई, बंगलूरू, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में विशेषीकृत AVGC-XR क्लस्टरों को मजबूत किया जा रहा है।
      • ये केंद्र उच्च-स्तरीय रेंडरिंग हार्डवेयर तक साझा पहुँच प्रदान करते हैं, जिससे छोटे स्टूडियो के लिए पूँजीगत व्यय कम हो जाता है।
    • क्रिएट इन इंडिया’ का संचालन: “मेक इन इंडिया” मॉडल का अनुसरण करते हुए, भारतीय सांस्कृतिक उत्सवों और डिजिटल कंटेंट को प्रीमियम वैश्विक सेवाओं के रूप में स्थापित करने के लिए एक समर्पित निर्यात ब्रांडिंग रणनीति का उपयोग किया जा रहा है।
  • वित्तीय नवाचार और बौद्धिक संपदा अधिकार: अब ध्यान “कार्य के बदले कार्य” (आउटसोर्सिंग) से हटकर बौद्धिक संपदा (IP) के निर्माण और स्वामित्व पर केंद्रित हो रहा है।
    • बौद्धिक संपदा समर्थित वित्तपोषण: सरकार बौद्धिक संपदा समर्थित ऋण को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय संस्थानों के साथ सहयोग कर रही है।
      • इससे रचनात्मक लघु एवं मध्यम उद्यमों को ऋण के लिए अमूर्त संपत्तियों (पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क) को गिरवी रखने की सुविधा मिलती है, जिससे “भौतिक संपत्तियों की कमी” की समस्या का समाधान होता है।
    • राष्ट्रीय रचनात्मक कोष (NCF): यह विशेष कोष उच्च जोखिम वाले रचनात्मक उद्यमों के लिए प्रारंभिक पूँजी प्रदान करता है, जिन्हें पारंपरिक वेंचर कैपिटल अक्सर अनदेखा कर देते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि मौलिक भारतीय कहानियों और गेम्स को प्रारंभिक चरण का समर्थन मिले।
    • बौद्धिक संपदा अधिकार शिक्षा: बौद्धिक संपदा सुविधा केंद्रों (IPFCs) के माध्यम से, रचनाकारों को अपने कार्य को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे एकमुश्त शुल्क से आगे बढ़कर दीर्घकालिक रॉयल्टी मॉडल को अपनाया जा सके।
  • रचनात्मक कार्यबल का औपचारीकरण: रचनात्मक कार्यों की “गिग” प्रकृति को स्थिरता प्रदान करने के लिए औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाया जा रहा है।
    • फ्रीलांसर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा: रचनात्मक कार्य करने वाले गिग वर्कर्स को ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत किया जा रहा है, जिससे उन्हें आयुष्मान भारत (AB-PMJAY) स्वास्थ्य सेवा और दुर्घटना बीमा का लाभ मिल रहा है।
    • प्रतिभा विकास कार्यक्रम (IICT और AVGC Labs): बजट 2026 की घोषणा के अनुसार, भारतीय रचनात्मक प्रौद्योगिकी संस्थान ने (IICT) 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में एवीजीसी कंटेंट क्रिएटर लैब्स स्थापित करने की योजना बनाई है। इससे डिजाइन और एनिमेशन को मुख्यधारा की शिक्षा में एकीकृत किया जा रहा है।
  • रणनीतिक निर्यात और “स्मार्ट पॉवर”: भारत अब अपनी संस्कृति को अपनी IT क्रांति की तरह ही एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में देख रहा है।
    • रचनात्मक निर्यात नीति: संगीत, सिनेमा और गेमिंग को रणनीतिक सेवा निर्यात के रूप में मान्यता देने के लिए एक समर्पित ढाँचा तैयार किया जा रहा है।
    • कॉन्सर्ट अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: भारत को वैश्विक “कॉन्सर्ट डेस्टिनेशन” बनाने के लिए सरकार चुनिंदा ऐतिहासिक स्थलों को लाइव सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए खोल रही है और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के लिए वीजा/विदेशी मुद्रा अनुमतियों में ढील दे रही है।
    • निगरानी एवं परिणाम ढाँचा: जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, सरकार कुल सेवाओं के प्रतिशत के रूप में रचनात्मक निर्यात और वैश्विक AVGC-XR परिदृश्य में भारत की बढ़ती बाजार हिस्सेदारी पर नजर रखने के लिए मानदंड स्थापित कर रही है।

सतत् विकास और संघीय आयाम

  • सतत् विकास लक्ष्यों के अनुरूपता: ऑरेंज इकोनॉमी SDG 4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा), SDG 8 (सभ्य रोजगार और आर्थिक विकास) और SDG 11 (सतत् शहर और सांस्कृतिक विरासत) में योगदान देती है।
  • राज्यों की भूमिका: पर्यटन प्रोत्साहन, आयोजनों की अनुमति, शहरी सांस्कृतिक अवसंरचना और क्षेत्रीय भाषा कंटेंट नीतियों के माध्यम से राज्य सरकारें केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।

निष्कर्ष

केंद्रीय बजट 2026 में ‘ऑरेंज इकोनॉमी’ पर किया गया फोकस भारत की सांस्कृतिक धरोहरों के महत्त्व को समझने के दृष्टिकोण में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है। प्रौद्योगिकी, डिजाइन और विरासत को एकीकृत करके, यह बजट भारत को एक वैश्विक रचनात्मक केंद्र के रूप में स्थापित करता है, जिससे वर्ष 2030 तक विनिर्माण और सेवाओं के समान ही विचार-आधारित मूल्य सृजन GDP वृद्धि के लिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

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