100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

Feb 05 2026

अभ्यास खंजर

भारत और किर्गिस्तान के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास खंजर का 13वाँ संस्करण (KHANJAR-XIII) शुरू हो गया है।

अभ्यास खंजर के बारे में

  • शुरुआत: यह 2011 में शुरू किया एक वार्षिक अभ्यास है, जो बारी-बारी से दोनों देशों में आयोजित किया जाता है।
  • स्थान: अभ्यास खंजर का 13वाँ संस्करण मिसामारी, असम में आयोजित किया जा रहा है।
  • प्रतिभागी बल: इसमें दोनों देशों की विशिष्ट ‘स्पेशल फोर्सेज’ इकाइयाँ – भारत की ओर से पैराशूट रेजिमेंट (स्पेशल फोर्सेज) और किर्गिस्तान की ओर से स्कॉर्पियन ब्रिगेड शामिल हैं।
  • प्राथमिक उद्देश्य: इसका उद्देश्य दोनों देशों के विशेष बलों के बीच अंतःक्रियाशीलता को बढ़ाना है।
    • यह अभ्यास संयुक्त राष्ट्र के जनादेश के तहत शहरी युद्ध और आतंकवाद विरोधी परिदृश्यों में संयुक्त अभियानों पर केंद्रित है।
  • व्यापक उद्देश्य: द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को मजबूत करना, स्थायी सैन्य साझेदारी को गहरा करना और क्षेत्रीय एवं वैश्विक सुरक्षा के लिए भारत और किर्गिस्तान के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों को प्रतिबिंबित करना।
  • पिछला संस्करण: इसका 12वाँ संस्करण मार्च 2025 में तोकमोक (Tokmok), किर्गिस्तान में आयोजित किया गया था।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने स्पष्ट किया कि हाल ही में घोषित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में संवेदनशील कृषि वस्तुओं एवं डेयरी उत्पादों को बाहर रखा जाएगा।

मुख्य बिंदु

  • टैरिफ में कटौती: अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर अपने 25% के पारस्परिक शुल्क (Reciprocal tariffs) को घटाकर 18% करने पर सहमत हो गया है। साथ ही, रूसी तेल आयात करने के कारण भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25% दंडात्मक शुल्क (penalty tariffs) को भी हटा दिया गया है।
  • तुलनात्मक लाभ: संशोधित टैरिफ दर भारत को वियतनाम, बांग्लादेश, पाकिस्तान और कई दक्षिण-पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं (जिन पर 19% टैरिफ है) की तुलना में बढ़त दिलाती है, जबकि यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया पर 10-15% की कम दरें लागू हैं।

भारत-अमेरिका व्यापार संबंध

  • द्विपक्षीय व्यापार (FY25): वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 132.2 बिलियन डॉलर रहा, जो वित्त वर्ष 2023-24 में 119.71 बिलियन डॉलर था।
  • व्यापार संतुलन: वित्त वर्ष 2024-25 में अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष 40.82 बिलियन डॉलर था।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): अमेरिका, भारत में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है, जिसमें अप्रैल 2000 से मार्च 2025 तक कुल 70.65 बिलियन डॉलर का FDI प्रवाह हुआ है।
  • भारत से अमेरिका को होने वाले प्रमुख निर्यात
    • भारत का अमेरिका को निर्यात वित्त वर्ष 2023-24 के 77.51 बिलियन डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 86.51 बिलियन डॉलर हो गया।
    • भारत के निर्यात में मुख्य रूप से विद्युत मशीनरी, कीमती और अर्द्ध-कीमती पत्थर एवं धातु, फार्मास्युटिकल उत्पाद (दवाएँ), मशीनरी एवं यांत्रिक उपकरण, खनिज ईंधन तथा लोहे एवं इस्पात की वस्तुएँ शामिल थीं।
  • भारत द्वारा अमेरिका से होने वाले प्रमुख आयात
    • अमेरिका से भारत का आयात वित्त वर्ष 2023-24 के 42.19 बिलियन डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 45.69 बिलियन डॉलर हो गया।
    • भारत का आयात मुख्य रूप से खनिज ईंधन एवं तेल, कीमती पत्थर एवं धातु, परमाणु रिएक्टर तथा मशीनरी एवं विद्युत उपकरण पर केंद्रित रहे हैं, जो मजबूत ऊर्जा और तकनीकी संबंधों को दर्शाते हैं।
  • शिक्षा और मानव पूँजी संबंध
    • उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका सबसे पसंदीदा गंतव्य बना हुआ है।
    • सितंबर 2023 तक, लगभग 3.2 लाख भारतीय छात्र अमेरिका में अध्ययनरत थे, जिनमें से अधिकांश STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित) से संबंधित स्नातक कार्यक्रमों में थे।
    • अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, भारतीय छात्र अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सालाना लगभग 7.7 बिलियन डॉलर का योगदान देते हैं।

विश्व कैंसर दिवस 2026

विश्व कैंसर दिवस 2026 पर, भारत एक ओर बढ़ते कैंसर के बोझ का सामना कर रहा है, तथा दूसरी ओर रोकथाम, शीघ्र पहचान, किफायती उपचार और स्वदेशी अनुसंधान पहल को तेजी से बढ़ा रहा है।

विश्व कैंसर दिवस के बारे में

  • विश्व कैंसर दिवस प्रतिवर्ष 4 फरवरी को कैंसर की रोकथाम, शीघ्र निदान और उपचार तक समान पहुँच के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है।
  • उत्पत्ति: इसकी शुरुआत वर्ष 2000 में पेरिस, फ्रांस में आयोजित न्यू मिलेनियम के लिए कैंसर के खिलाफ विश्व शिखर सम्मेलन’ के बाद हुई थी, जिसका नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण संघ (UICC) ने किया था।
  • विषय (Theme): यूनाइटेड बाय यूनिक” (2025-2027 अभियान) यह स्वीकार करते हुए कि प्रत्येक कैंसर यात्रा अलग होती है, रोगी-केंद्रित और व्यक्तिगत कैंसर देखभाल पर जोर देता है।
  • महत्त्व: यह दिन कैंसर से होने वाली मृत्यु दर को कम करने, स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देने और सार्वजनिक नीति में कैंसर नियंत्रण को प्राथमिकता देने के लिए विश्व भर की सरकारों, नागरिक समाज और स्वास्थ्य प्रणालियों को एकजुट करता है।

भारत और कैंसर

  • बढ़ता कैंसर बोझ: भारत में सालाना 15 लाख से अधिक नए कैंसर मामले दर्ज किए जाते हैं, जिनके वर्ष 2045 तक बढ़कर 24.5 लाख से अधिक होने का अनुमान है। मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्ग आबादी में इसकी घटनाएँ अधिक देखी जाती हैं।
  • सामान्य कैंसर और कारण: स्तन, मुख और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की संभावना सबसे अधिक है। मुख्य कारणों में तंबाकू और शराब का सेवन, अस्वास्थ्यकर आहार, मोटापा और पर्यावरणीय प्रदूषण शामिल हैं।
  • प्रमुख चुनौतियाँ: 75% से अधिक रोगियों में कैंसर का निदान उन्नत चरणों (Advanced stages) में होता है, जो जागरूकता, स्क्रीनिंग और शुरुआती पहचान में कमी को दर्शाता है।
  • सरकारी पहल राष्ट्रीय: कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम (NCCP) को 1975 में शुरू किया गया था और बाद में इसे कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और स्ट्रोक की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPCDCS) में एकीकृत कर दिया गया, जो 2010 से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत संचालित है।
    • आयुष्मान भारत-PMJAY: राष्ट्रीय कैंसर ग्रिड और किफायती दवा योजनाएँ उपचार तक पहुँच प्रदान करने के लिए कार्यरत हैं।
    • स्वदेशी नवाचार: CAR-T सेल थेरेपी (NexCAR19) जैसे स्वदेशी नवाचारों का उद्देश्य रोकथाम, उपचार और अनुसंधान को मजबूत करना है।

विश्व कैंसर दिवस 2026 प्रारंभिक पहचान, जीवनशैली में बदलाव और स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने की तात्कालिकता पर जोर देता है क्योंकि भारत तेजी से बढ़ते कैंसर के बोझ से निपटने की तैयारी कर रहा है।

WHO स्वास्थ्य आपातकालीन अपील 2026

हाल ही में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने दानदाताओं के घटते समर्थन और बढ़ते वैश्विक स्वास्थ्य जोखिमों के बीच अपनी स्वास्थ्य आपातकालीन अपील को घटाकर 1 बिलियन डॉलर कर दिया है।

  • वर्ष 2026 की स्वास्थ्य आपातकालीन अपील का उद्देश्य संघर्ष, विस्थापन और आपदाओं के बीच जीवनयापन कर रहे लाखों लोगों को आवश्यक और जीवन रक्षक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए धन जुटाना है।

वित्त पोषण में मुख्य परिवर्तन

  • आपातकालीन अपील में कमी: WHO ने अपनी वर्ष 2026 की स्वास्थ्य आपातकालीन अपील में एक-तिहाई की कटौती कर इसे 1 बिलियन डॉलर कर दिया है, जो स्वैच्छिक दान में कमी और राजकोषीय अनिश्चितता को दर्शाता है।
  • बदलता डोनर परिदृश्य: जनवरी 2026 में अमेरिका के विश्व स्वास्थ्य संगठन से पीछे हटने के  कारणों ने वित्तपोषण की चिंताओं को और गहरा कर दिया है, हालाँकि हालिया आपातकालीन वित्तपोषण के लिए यूरोपीय संघ, जर्मनी और सऊदी अरब पर निर्भरता बढ़ी है।
  • स्थायी वित्त पोषण की ओर कदम: 14वें सामान्य कार्य कार्यक्रम (2025-2028) के तहत, WHO चिह्नित दान (earmarked donations) पर निर्भरता कम करने के लिए निर्धारित योगदान और पुनर्भरण-आधारित वित्त पोषण को प्राथमिकता दे रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के विभिन्न कार्यक्रम

  • पोलियो उन्मूलन: वैश्विक पोलियो उन्मूलन पहल (2022-2026) के माध्यम से, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, यमन और सोमालिया में वायरस के अंतिम भंडारों को लक्षित करते हुए टीकाकरण प्रयास जारी हैं।
  • मलेरिया नियंत्रण और टीकाकरण: ‘हाई बर्डन टू हाई इंपैक्ट’ दृष्टिकोण ने घाना, केन्या और मलावी सहित 24 अफ्रीकी देशों में मलेरिया वैक्सीन के रोलआउट को सक्षम बनाया है।
  • उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग (NTDs): प्रगति में “Zero by 30” रेबीज उन्मूलन और गिनी-वॉर्म उन्मूलन शामिल है। मिस्र को मलेरिया मुक्त घोषित किया गया है और सात देशों ने कम-से-कम एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी को समाप्त कर दिया है।
  • टीकाकरण और डिजिटल स्वास्थ्य: टीकाकरण एजेंडा 2030′ खसरा, एचपीवी और टाइफाइड के विरुद्ध कवरेज को मजबूत करता है, जबकि भारत में U-WIN डिजिटल प्लेटफॉर्म वैक्सीन ट्रैकिंग को बेहतर बनाता है।
  • महामारी की तैयारी: महामारी समझौते और संशोधित अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियमों को अपनाने का उद्देश्य टीकों तक समान पहुँच और त्वरित आपातकालीन प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना है।

वित्तपोषण में कमी का प्रभाव

  • स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव: वित्तपोषण में कटौती ने निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों में आवश्यक सेवाओं को बाधित कर दिया है, जबकि अभी भी 4.6 बिलियन लोगों के पास बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है।
  • कार्यबल और क्षमता की कमी: वर्ष 2030 तक दुनिया में 1.1 करोड़ स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कमी होने का अनुमान है, जो अंतरराष्ट्रीय सहायता में कमी के कारण और भी बदतर हो गई है।
  • बढ़ते वैश्विक स्वास्थ्य जोखिम: कम वित्तपोषण के कारण महामारियों, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) और जलवायु-जनित रोगों के विरुद्ध तैयारी खतरे में है, जिससे सामूहिक वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा कमजोर हो रही है।

करिमपुझा वन्यजीव अभयारण्य

हाल ही में किए गए एक जीव-जंतु सर्वेक्षण ने केरल के करिमपुझा वन्यजीव अभयारण्य में दर्ज जैव विविधता का विस्तार किया है।

  • यह सर्वेक्षण राज्य वन विभाग द्वारा ‘उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिकी एवं अनुसंधान सोसायटी’ (STEAR), नीलांबूर औरत्रावणकोर नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी’ (TNHS), तिरुवनंतपुरम् के सहयोग से आयोजित किया गया था।

सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष

  • पक्षी विविधता का विस्तार: सर्वेक्षण में पक्षियों की 171 प्रजातियाँ दर्ज की गईं, जिनमें पहली बार प्रलेखित आठ प्रजातियाँ शामिल हैं। इससे अभयारण्य में पक्षियों की कुल संख्या बढ़कर 247 हो गई है।
  • कीट और ओडोनेट (Odonate) रिकॉर्ड: शोधकर्ताओं ने तितलियों की 177 प्रजातियों और ओडोनेट की 42 प्रजातियों को दर्ज किया। नई शामिल की गई प्रजातियों के साथ, कुल तितली विविधता 223 और ओडोनेट 63 प्रजातियों तक पहुँच गई है।
  • पारिस्थितिकी निरंतरता के प्रमाण: ऊँचाई के अनुसार, तितलियों के प्रवास और हाथियों की बार-बार होने वाली आवाजाही, आवासों के बीच मजबूत जुड़ाव और पारिस्थितिकी अखंडता को उजागर करती है।

करिमपुझा वन्यजीव अभयारण्य के बारे में

  • स्थान: यह केरल के मलप्पुरम जिले में नीलगिरी की पश्चिमी ढलानों पर स्थित है।
    • इसका नाम करिमपुझा नदी के नाम पर रखा गया है, जो चालियार नदी की एक सहायक नदी है।
    • इसे आधिकारिक तौर पर वर्ष 2020 में स्थापित किया गया था।
  • पारिस्थितिकी महत्त्व: 227.21 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत यह अभयारण्य नीलगिरी जैवमंडल निचय के भीतर स्थित है और नीलांबूर हाथी अभ्यारण्य का हिस्सा है।
    • यह शांत घाटी राष्ट्रीय उद्यान और मुकुर्थी राष्ट्रीय उद्यान के साथ अपनी सीमाएँ साझा करता है।
  • अद्वितीय स्थलाकृति: इसकी ऊँचाई 40 मीटर से 2,550 मीटर तक है, जिससे यहाँ केरल में पाए जाने वाले सभी सात प्रकार के वन (सदाबहार वर्षावनों से लेकर पर्वतीय घास के मैदानों तक) मौजूद हैं।
  • वनस्पतियाँ एवं वन्यजीव: अभयारण्य में सागौन, शीशम, बाँस, स्थानिक ऑर्किड तथा लुप्तप्राय जीव जैसे नीलगिरी तहर, लायन-टेल्ड मकाक, बाघ, हाथी और मालाबार महसीर पाए जाते हैं।
  • समुदाय: यह चोलनाइकन (Cholanaikan) जनजाति का भी आवास है, जो एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है।

संदर्भ

हाल ही में भारत और भूटान ने नई दिल्ली, भारत में आयोजित वरिष्ठ-स्तरीय वार्ता के दौरान ऊर्जा क्षेत्र में अपनी दीर्घकालिक साझेदारी की पुनः पुष्टि की, जिसमें जलविद्युत विकास और सीमा-पार पारेषण इंटरकनेक्शन को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया गया, ताकि ऊर्जा सहयोग को गहरा किया जा सके।

मंत्रिस्तरीय बैठक के प्रमुख परिणाम

चर्चाएँ सहयोग के चार प्रमुख स्तंभों पर केंद्रित रहीं।

  • पुनात्सांगछू कॉरिडोर का अनुकूलन
    • पुनात्सांगछू-II (1020 मेगावाट): पुनात्सांगछू नदी पर स्थित, अब इसका ध्यान “व्यावसायिक अनुकूलन” पर है।
      • इसका अर्थ है 1020 मेगावाट बिजली को भारतीय ग्रिड में इस प्रकार प्रवाहित करना कि भूटान को अधिकतम राजस्व मिले और भारत को स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित हो।
    • पुनात्सांगछू-I (1200 मेगावाट): मंत्रियों ने इस परियोजना के “शीघ्र कमीशनिंग” को प्राथमिकता दी।
      • इसे भू-वैज्ञानिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, इसलिए अब तकनीकी समाधान और शेष सिविल कार्यों को तेजी से पूरा करने पर जोर है।
  • संकोश मेगा-प्रोजेक्ट: बैठक में संकोश जलविद्युत परियोजना (2585 मेगावाट) को पुनर्जीवित किया गया।
    • इसे एक विशाल बहुउद्देश्यीय परियोजना के रूप में देखा जा रहा है।
    • बिजली उत्पादन के अलावा, इसका पश्चिम बंगाल और असम जैसे डाउनस्ट्रीम भारतीय राज्यों में सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण पर भी महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।
  • विजन 2040: पारेषण अवसंरचना: वर्ष 2040 तक के लिए एक ट्रांसमिशन मास्टर प्लान पर आधिकारिक परामर्श शुरू हो गया है।
    • इसमें उच्च-वोल्टेज लाइनों (HVDC और 400kV) का निर्माण शामिल है, जो भविष्य की परियोजनाओं से आने वाली विशाल मात्रा में बिजली को सँभाल सकें, ताकि “बिजली” उत्पादन से पहले भौतिक “पाइपलाइन” तैयार हो।
  • ‘लीन मंथ’ प्रबंधन: एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन में बिजली की शेड्यूलिंग के लिए स्वीकृतियों को सरल बनाना शामिल है।
    • भूटान के ‘लीन मंथ’ (सर्दियों) के दौरान, नदी का जलस्तर गिर जाता है और भूटान शुद्ध आयातक बन जाता है। दोनों देशों के मंत्रियों ने इन अवधियों में भारत द्वारा भूटान को बिजली आपूर्ति के लिए अधिक स्वचालित और कम नौकरशाही प्रक्रिया पर सहमति जताई।

भारत–भूटान विद्युत सहयोग का कालक्रम

  • वर्ष 1961 (जलढाका समझौता): सहयोग की शुरुआत जलढाका परियोजना से हुई, जिसने सीमा-पार बिजली साझा करने की पहला उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसमें भारत ने दक्षिणी भूटान को बिजली की आपूर्ति की।
  • वर्ष 1974 (चुखा HEP समझौता): दोनों देशों ने 336 मेगावाट चुखा परियोजना के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे प्रारंभिक संबंधों को परिभाषित करने वाला 60:40 अनुदान–ऋण वित्तपोषण मॉडल स्थापित हुआ।
  • वर्ष 1988 (चुखा परियोजना की कमीशनिंग): चुखा परियोजना के पूर्ण संचालन के साथ, भूटान आधिकारिक रूप से बिजली का शुद्ध निर्यातक बन गया, जिससे उसके राष्ट्रीय GDP में भारी वृद्धि हुई।
  • वर्ष 2001 (कुरीछू परियोजना की कमीशनिंग): 60 मेगावाट कुरीछू परियोजना को चालू किया गया, जिसे विशेष रूप से कम-विकसित पूर्वी भूटान क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए डिजाइन किया गया था।
  • वर्ष 2006 (अंब्रेला समझौता): भारत और भूटान ने एक ऐतिहासिक अंब्रेला समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसने द्विपक्षीय जलविद्युत सहयोग के लिए एक व्यापक और दीर्घकालिक ढाँचा स्थापित किया।
  • वर्ष 2007 (ताला परियोजना की कमीशनिंग): 1020 मेगावाट ताला परियोजना को चालू किया गया; यह उस समय की सबसे बड़ी परियोजना थी, जिसने भूटान की निर्यात आय और राजकोषीय स्थिति को काफी मजबूत किया।
  • वर्ष 2009 (10k मेगावाट प्रोटोकॉल): एक उच्च-स्तरीय प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें वर्ष 2020 तक 10,000 मेगावाट जलविद्युत क्षमता विकसित करने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया।
  • वर्ष 2019 (माँगदेछू परियोजना का उद्घाटन): 720 मेगावाट माँगदेछू परियोजना का उद्घाटन किया गया, जिसे बाद में सिविल इंजीनियरिंग उत्कृष्टता के लिए प्रतिष्ठित ब्रुनेल मेडल (2020) से सम्मानित किया गया।
  • वर्ष 2023 (IEX एकीकरण): बाजार-आधारित दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन के तहत, भूटान ने बासोछू परियोजना से अतिरिक्त बिजली सीधे इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) पर बेचना शुरू किया।
  • वर्ष 2024 (संयुक्त विजन दस्तावेज): दोनों सरकारों ने एक संयुक्त विजन दस्तावेज जारी किया, जो जलविद्युत से आगे बढ़कर सौर और हरित हाइड्रोजन को “स्वच्छ ऊर्जा” पोर्टफोलियो में शामिल करने की रणनीतिक दिशा दर्शाता है।
  • वर्ष 2025 (पुनात्सांगछू-II परियोजना की कमीशनिंग): 1020 मेगावाट पुनात्सांगछू-II परियोजना की सभी छह इकाइयों का पूर्ण कमीशनिंग हुआ, और द्विपक्षीय ध्यान इसके उत्पादन के “व्यावसायिक अनुकूलन” पर केंद्रित हुआ।
  • वर्ष 2026 (विजन 2040 बैठक): फरवरी 2026 में, मंत्रिस्तरीय वार्ता में ट्रांसमिशन विजन 2040, संकोश परियोजना की रूपरेखा, और भूटान में सर्दियों के लिए बिजली शेड्यूलिंग को सरल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया।

संदर्भ

ऑपरेशन सिंदूर के बाद तथा बढ़ते द्वि-सीमांत सुरक्षा जोखिमों के परिप्रेक्ष्य में, केंद्रीय बजट 2026–27 में आधुनिकीकरण एवं स्वदेशीकरण को तीव्र करने हेतु रक्षा पूँजीगत व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है।

रक्षा बजट आवंटन की प्रमुख विशेषताएँ

  • रिकॉर्ड कुल परिव्यय: वित्त वर्ष 2026–27 का रक्षा बजट ₹7.85 लाख करोड़ है, जो अब तक का सर्वाधिक है। इसमें वर्ष-दर-वर्ष 15% की वृद्धि दर्ज की गई है तथा यह कुल केंद्रीय व्यय का 14.7% और आगामी वित्त वर्ष 2026–27 के अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद का 2% है।
  • पूँजीगत व्यय में तीव्र वृद्धि: पूँजीगत परिव्यय बढ़कर ₹2.19 लाख करोड़ हो गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 22% अधिक है। इससे कुल रक्षा बजट में इसकी हिस्सेदारी लगभग 28% हो गई है, जो आधुनिकीकरण की दिशा में स्पष्ट परिवर्तन को दर्शाता है।
  • स्वदेशी खरीद को समर्थन: पूँजी अधिग्रहण बजट का लगभग 75% (₹1.39 लाख करोड़) घरेलू उद्योग के लिए आरक्षित किया गया है, जिससे रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भर भारत अभियान को सुदृढ़ किया गया है।
  • राजस्व घटकों का युक्तिकरण: पेंशन (21.8%) एवं वेतन (22.4%) की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2020 के स्तरों की तुलना में घटी है, जिससे राजस्व व्यय पर लंबे समय द्वारा उत्पन्न दवाब कम हुआ है।

व्यय के लक्षित क्षेत्र

  • सैन्य आधुनिकीकरण: अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान, पनडुब्बियाँ, युद्धपोत, UAVs, ड्रोन, सटीक-निर्देशित हथियार, एवं स्मार्ट हथियारों हेतु निधि आवंटित की गई है, जिससे हालिया अभियानों में उजागर हुई क्षमता संबंधी कमियों को दूर किया जा सके।
  • युद्ध तैयारी एवं भंडारण: उच्च पूँजीगत व्यय से युद्ध-क्षति भंडारों की पुनःपूर्ति को समर्थन मिलता है, विशेष रूप से गोला-बारूद एवं लोटरिंग म्यूनिशन, जो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान क्षीण हो गए थे।
  • स्वदेशी रक्षा उद्योग: रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs), MSMEs तथा निजी कंपनियों को ‘बाय इंडियन-स्वदेशी रूप से अभिकल्पित, विकसित एवं निर्मित’ (Buy Indian–IDDM) एवं अन्य स्वदेशी खरीद मार्गों के माध्यम से लाभ मिलता है, जिससे घरेलू आपूर्ति शृंखलाएँ सुदृढ़ होती हैं।
    • बाय इंडियन-IDDM (Buy Indian–IDDM) रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) के अंतर्गत एक खरीद श्रेणी है, जो भारत में डिजाइन, विकसित एवं निर्मित उच्च स्वदेशी सामग्री वाले रक्षा उपकरणों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है।
  • आपातकालीन एवं ‘फास्ट-ट्रैक’ खरीद: बजट आपातकालीन खरीद तंत्र के संस्थानीकरण को दर्शाता है, जिससे ‘एंटी-ड्रोन’ प्रणालियों एवं लंबी दूरी के प्रहार प्रणालियों जैसी महत्त्वपूर्ण तकनीकों का त्वरित समावेशन संभव होता है।

उच्च रक्षा व्यय की आवश्यकता

  • परिवर्तित भू-राजनीतिक परिवेश: भारत को चीन एवं पाकिस्तान से सतत् द्वि-सीमांत चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, साथ ही क्षेत्रीय अस्थिरता भी बनी हुई है, जिससे प्रतिरोधक क्षमता एवं तत्परता में निरंतर निवेश आवश्यक हो गया है।
  • ऑपरेशन सिंदूर से प्राप्त सीख: इस अभियान ने गोला-बारूद की कमियाँ, वायु रक्षा तथा त्वरित समावेशन क्षमताओं में कमियों को उजागर किया, जिससे अधिक एवं लचीले पूँजी आवंटन की आवश्यकता उत्पन्न हुई।
  • ‘कमिटेड लायबिलिटीज ट्रैप’ से मुक्ति: ऐतिहासिक रूप से, पूँजीगत व्यय का बड़ा भाग पुराने अनुबंधों में संलग्न था, जिससे नई खरीद सीमित हो जाती थी। वर्तमान वृद्धि AMCA एवं परियोजना 75I पनडुब्बियों जैसे नए बड़े अनुबंधों के लिए वित्तीय स्थान उपलब्ध कराती है।
  • मानव बल से प्रौद्योगिकी की ओर स्थानांतरण: आधुनिक युद्ध में प्रौद्योगिकी, सटीकता एवं नेटवर्क आधारित प्लेटफॉर्म पर अधिक निर्भरता बढ़ रही है, जिससे वेतन एवं पेंशन की तुलना में पूँजीगत व्यय अधिक आवश्यक हो गया है।
  • आत्मनिर्भरता एवं आर्थिक प्रसार को बढ़ावा: उच्च रक्षा व्यय स्वदेशीकरण, रोजगार सृजन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं निर्यात को समर्थन प्रदान करता है, जिससे सुरक्षा उद्देश्यों का आर्थिक विकास से समन्वय होता है।

निष्कर्ष

केंद्रीय बजट 2026–27 में रक्षा पूँजीगत व्यय में की गई वृद्धि, एक नियमित विस्तार के बजाय एक रणनीतिक पुनर्संतुलन को दर्शाती है। हालिया परिचालन अनुभव, विकसित होते खतरे एवं भारत के रक्षा औद्योगिक आधार की परिपक्वता से प्रभावित यह बजट आधुनिकीकरण, तत्परता एवं आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देता है।

संदर्भ

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अंतर्गत, ने प्रवासन पर एक समर्पित राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण की घोषणा की है।

भारत में राष्ट्रीय प्रवासन सर्वेक्षण के बारे में

  • यह सर्वेक्षण जुलाई 2026 से जून 2027 तक चलेगा और देश भर में प्रवासन प्रवृत्तियों पर नवीन, विस्तृत और विश्वसनीय डेटा एकत्र करने का लक्ष्य रखता है।
  • यह संरचित सर्वेक्षण भारत में आंतरिक प्रवासन की समझ को अद्यतन करेगा, जो आर्थिक विकास और सामाजिक नियोजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • सर्वेक्षण के उद्देश्य: यह सर्वेक्षण भारत में प्रवासन प्रतिरूपों पर व्यापक और अद्यतन सांख्यिकी तैयार करने का प्रयास करता है। यह निम्नलिखित पर केंद्रित होगा:
    • प्रवासन की सीमा और प्रकृति (ग्रामीण–शहरी तथा अंतर-राज्यीय आवागमन सहित)।
    • प्रवासन के पीछे के कारण।
    • प्रत्यावर्तन प्रवासन और मौसमी प्रवासन।
    • प्रवासियों की रोजगार और सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल।
  • ये अंतर्दृष्टियाँ श्रम गतिशीलता और संबंधित आर्थिक गतिकी को मापने में सहायता करेंगी तथा उपलब्ध आँकड़ों में मौजूद अंतरालों को भी प्रभावी रूप से पाटेंगी।

सर्वेक्षण का महत्त्व और नीतिगत प्रभाव

  • इस सर्वेक्षण से प्राप्त डेटा निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों में साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण का समर्थन करेगा:
    • शहरी नियोजन और आवास।
    • परिवहन अवसंरचना।
    • रोजगार सृजन।
    • सामाजिक सुरक्षा उपाय।
    • कौशल विकास कार्यक्रम।
  • यह सर्वेक्षण नीति-निर्माताओं, योजनाकारों और विकास विशेषज्ञों को प्रवासियों और मेजबान समुदायों के लिए अधिक प्रभावी हस्तक्षेप तैयार करने में सक्षम बनाएगा।

पूर्व प्रवासन डेटा और प्रवृत्तियाँ

  • प्रवासन सर्वेक्षण MoSPI द्वारा समय-समय पर आयोजित किए जाते हैं। हालिया प्रासंगिक डेटा निम्नलिखित से प्राप्त होता है:
    • आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2020–21।
    • बहु-सूचकांक सर्वेक्षण 2020–21।

PLFS 2020–21 के प्रमुख निष्कर्ष

  • भारत में समग्र प्रवासन दर: 28.9%।
  • पुरुष: 10.7% प्रवासन दर।
  • महिलाएँ: 47.9% प्रवासन दर।
  • प्रवासन के लैंगिक रूप से विशिष्ट कारण
    • महिलाओं में: विवाह प्रमुख कारण है, जो लगभग 86.8% महिला प्रवासियों के लिए उत्तरदायी है।
    • पुरुषों में: रोजगार (या बेहतर रोजगार अवसरों की खोज) मुख्य प्रेरक है, जो 22.8% पुरुष प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करता है।

भारत में प्रवासन से निपटने के उपाय

  • ग्रामीण विकास पहल (स्थानीय अवसरों को बढ़ाकर संकटजन्य प्रवासन को कम करने हेतु):
    • दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM): स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास और सतत् आजीविका को बढ़ावा देता है (विशेष रूप से ‘लखपति दीदी’ जैसी पहलों के माध्यम से महिलाओं के लिए)।
    • विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 (VB–G RAM G Act): महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 का स्थानापन्न। प्रमुख संवर्द्धनों में प्रति ग्रामीण परिवार प्रतिवर्ष 125 दिनों के वैधानिक मजदूरी रोजगार की गारंटी तथा बेरोजगारी भत्ता प्रावधान शामिल हैं।
  • शहरी प्रत्यास्थता पहल (प्रवासियों की आमद प्रबंधन और जीवन-स्थितियों में सुधार हेतु):
    • अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (AMRUT): शहरों में जल आपूर्ति, सीवरेज, शहरी परिवहन और हरित क्षेत्रों पर केंद्रित।
    • स्मार्ट सिटी मिशन: कुशल सेवाओं, प्रौद्योगिकी-आधारित शासन और बेहतर शहरी नियोजन के साथ 100+ शहरों का विकास, ताकि गतिशीलता, आवास और आर्थिक अवसरों में सुधार के माध्यम से प्रवासन दबावों का प्रबंधन किया जा सके।
    • ट्रांजिट-उन्मुख विकास (ToD): सार्वजनिक परिवहन केंद्रों के आसपास उच्च-घनत्व, मिश्रित-उपयोग विकास को बढ़ावा देता है।
  • श्रमिक कल्याण और सुरक्षा उपाय (प्रवासियों के लिए लाभ)
    • प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना (PMSYM): असंगठित श्रमिकों (प्रवासियों सहित) के लिए पेंशन सुरक्षा प्रदान करती है, जिसमें सरकार द्वारा अंशदान किया जाता है।
    • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY): संकट के समय निःशुल्क या रियायती खाद्यान्न सुनिश्चित करती है, जिससे संवेदनशील प्रवासी परिवारों को सहायता मिलती है।
    • वन नेशन वन राशन कार्ड (ONORC): अंतर-राज्यीय प्रवासियों को देशभर में किसी भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकान से रियायती खाद्यान्न प्राप्त करने की सुविधा देता है।

संदर्भ

केंद्र सरकार ने नमस्ते योजना के अंतर्गत अपशिष्ट संग्राहकों (Waste Pickers) की संचालित गणना संबंधी राष्ट्रीय-स्तरीय आँकड़े जारी किए हैं।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2016 के अनुसार अपशिष्ट संग्राहक की परिभाषा:

  • “अपशिष्ट संग्राहक” से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह से है, जो अनौपचारिक रूप से सड़कों, कूड़ेदानों, सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं, प्रसंस्करण एवं अपशिष्ट निपटान सुविधाओं से पुनः उपयोग योग्य एवं पुनर्चक्रण योग्य ठोस अपशिष्ट का संग्रह एवं पुनर्प्राप्ति करते हैं तथा प्रत्यक्ष या मध्यस्थों के माध्यम से पुनर्चक्रकों को बेचकर अपनी आजीविका अर्जित करते हैं।

राष्ट्रीय-स्तरीय निष्कर्ष

  • सामाजिक संरचना
    • 84.5%: अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) (हाशिए पर स्थित समुदाय)।
    • 10.7%: सामान्य वर्ग।
  • लैंगिक प्रोफाइल
    • 48.7% महिलाएँ, 51.3% पुरुष, 0.007% ट्रांसजेंडर।
    • लगभग लैंगिक संतुलन, न्यूनतम ट्रांसजेंडर प्रतिनिधित्व।
  • राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश-स्तरीय विविधताएँ
    • दिल्ली एवं गोवा: सामान्य वर्ग के अपशिष्ट संग्राहक SC, ST एवं OBC समुदायों की संयुक्त संख्या से अधिक हैं, जो राष्ट्रीय पैटर्न से स्पष्ट रूप से भिन्न है।
    • पश्चिम बंगाल: कुल अपशिष्ट संग्राहकों में से 42.4% सामान्य वर्ग से संबंधित हैं, जिससे यह एक अन्य उल्लेखनीय अपवाद बनता है।
    • क्षेत्रीय असमानता संकेतक: ये राज्य-स्तरीय विविधताएँ दर्शाती हैं कि अपशिष्ट संग्राहकों की सामाजिक प्रोफाइल क्षेत्रीय श्रम बाजारों, प्रवासन पैटर्न तथा शहरी सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं से प्रभावित होती है।
  • स्वच्छता संबंधी गतिविधियों से मृत्यु: वर्ष 2014 से अब तक सीवर एवं सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के कारण 859 मौतें दर्ज की गई हैं, जिनमें वर्ष 2025 में 43 मौतें शामिल हैं, जो यंत्रीकरण एवं श्रमिक सुरक्षा की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।

अपशिष्ट संग्राहक ठोस अपशिष्ट के संग्रह एवं पृथक्करण में संलग्न होते हैं, जबकि मैनुअल स्कैवेंजर मानव मलमूत्र का निपटान करते हैं; दोनों कानूनी एवं कार्यात्मक रूप से अलग श्रेणियाँ हैं, यद्यपि दोनों ही व्यावसायिक संवेदनशीलता का सामना करते हैं।

नमस्ते योजना (यंत्रीकृत स्वच्छता पारिस्थितिकी तंत्र हेतु राष्ट्रीय कार्य योजना) के बारे में

  • अवलोकन: नमस्ते योजना एक मानव-केंद्रित राष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य पूर्ण यंत्रीकरण को बढ़ावा देकर तथा सुरक्षा, गरिमा और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करके सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई में स्वच्छता कर्मियों की मैनुअल भागीदारी को समाप्त करना है।
  • प्रारंभ और कार्यान्वयन: यह योजना सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से प्रारंभ की गई है तथा इसका कार्यान्वयन राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम द्वारा किया जा रहा है।
  • प्रकार: केंद्रीय क्षेत्रक योजना
  • बजट आवंटन: वित्त वर्ष 2023-24 से वित्त वर्ष 2025-26 तक की तीन वर्षों की अवधि के लिए 349.73 करोड़ रुपये।
  • लक्षित लाभार्थी: यह योजना शहरी भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मियों को लक्षित करती है, जिसमें लगभग 4,800 शहरी स्थानीय निकायों को कवर करते हुए एक लाख से अधिक स्वच्छता कर्मियों की प्रोफाइलिंग का अनुमान है।
  • सतत् विकास लक्ष्यों के साथ संरेखण: यह योजना संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्यों के अंतर्गत वैश्विक प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है, विशेष रूप से—
    • सतत् विकास लक्ष्य-6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता),
    • सतत् विकास लक्ष्य-8 (सम्मानजनक कार्य और आर्थिक वृद्धि), और
    • सतत् विकास लक्ष्य-10 (असमानताओं में कमी)।
  • नमस्ते योजना के उद्देश्य
    • औपचारीकरण और सशक्तीकरण: यह योजना सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मियों तथा अपशिष्ट संग्राहकों को एक सुरक्षित, यंत्रीकृत स्वच्छता पारिस्थितिकी तंत्र में एकीकृत करके उन्हें औपचारिक बनाने, पुनर्वास करने और सशक्त बनाने का लक्ष्य रखती है।
    • सुरक्षा और गरिमा: नमस्ते योजना यंत्रीकृत सफाई और प्रमाणित सुरक्षा प्रथाओं को बढ़ावा देकर यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी स्वच्छता कर्मी मानव अपशिष्ट के सीधे संपर्क में न आए।
    • शून्य मृत्यु लक्ष्य: यह योजना प्रशिक्षित कर्मियों, सुदृढ़ आपातकालीन प्रतिक्रिया स्वच्छता इकाइयों और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल के माध्यम से स्वच्छता कार्यों में शून्य मृत्यु दर प्राप्त करने का प्रयास करती है।
    • सैनिप्रेन्योरशिप को बढ़ावा: स्वच्छता कर्मियों को स्वयं सहायता समूह और स्वच्छता उद्यम बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे उद्यमिता और दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

कानूनी और संवैधानिक ढाँचा

  • मैनुअल स्कैवेंजिंग को मैनुअल स्कैवेंजर्स के नियोजन का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 के अंतर्गत प्रतिबंधित किया गया है।
  • संविधान का अनुच्छेद-17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है, जो जाति-आधारित स्वच्छता श्रम के उन्मूलन का संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

नमस्ते योजना के प्रमुख घटक

  • स्वच्छता कर्मियों की डिजिटल प्रोफाइलिंग: सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मियों की पहचान और प्रोफाइलिंग एक समर्पित डिजिटल अनुप्रयोग के माध्यम से की जाती है, ताकि समावेशन, निगरानी और लक्षित लाभ वितरण सुनिश्चित किया जा सके।
    • अपशिष्ट संग्राहक गणना अनुप्रयोग: सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा जून 2025 में प्रारंभ किया गया।
  • स्वास्थ्य बीमा कवरेज: सभी पहचाने गए स्वच्छता कर्मियों को प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा कवरेज प्रदान किया जाता है।
  • व्यावसायिक सुरक्षा प्रशिक्षण: यंत्रीकृत स्वच्छता संचालन की सुरक्षित प्रक्रिया सुनिश्चित करने हेतु संरचित व्यावसायिक सुरक्षा प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
  • यंत्रीकरण हेतु पूँजी सब्सिडी: स्वच्छता-संबंधी वाहनों और यंत्रीकृत उपकरणों की खरीद हेतु पात्र कर्मियों या समूहों को पाँच लाख रुपये तक की पूँजी सब्सिडी प्रदान की जाती है।
  • व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण: स्वच्छता कार्यों के दौरान व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा हेतु व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण किट वितरित की जाती हैं।
  • आपातकालीन स्वच्छता प्रतिक्रिया इकाइयों के लिए सुरक्षा उपकरण: स्वच्छता-संबंधी आपात स्थितियों के दौरान सुरक्षित और त्वरित प्रतिक्रिया सक्षम करने हेतु सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं।
  • सूचना, शिक्षा और संचार अभियान: स्वच्छता कर्मियों की सुरक्षा, गरिमा तथा मैनुअल स्कैवेंजिंग के उन्मूलन के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु अभियान संचालित किए जाते हैं।
  • अपशिष्ट संग्राहकों के लिए ( वर्ष 2024 में जोड़ा गया): अपशिष्ट संग्राहकों की गणना और प्रोफाइलिंग की जाती है, उन्हें मौसमी और आवश्यकता-आधारित व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण किट प्रदान की जाती हैं, व्यावसायिक सुरक्षा और कौशल विकास संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है, तथा प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत कवर किया जाता है।

योजना अभिसरण: नमस्ते योजना, स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के साथ कर्मचारी सुरक्षा और यंत्रीकरण आयाम को संबोधित करते हुए पूरक रूप से कार्य करती है।

संदर्भ

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (ITR), चाँदीपुर से ‘सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट’ (SFDR) तकनीक का सफल उड़ान प्रदर्शन किया।

संबंधित तथ्य

  • भारत इस उन्नत प्रणोदन तकनीक के साथ विशिष्ट देशों के समूह में शामिल हो गया है।

रैमजेट इंजन के बारे में

  • कार्य सिद्धांत: रैमजेट एक एयर-ब्रीदिंग जेट इंजन है, जो वाहन की आगे की गति का उपयोग करके आने वाली वायु को संपीडित करता है। इसमें ‘एक्सियल’ या ‘सेंट्रीफ्यूगल कंप्रेसर’ का उपयोग नहीं होता है।
  • प्रक्षेपण आवश्यकता: रैमजेट चालित वाहनों को इंजन के सक्रिय होने से पूर्व आवश्यक गति प्राप्त करने के लिए रॉकेट बूस्टर जैसी सहायता की आवश्यकता होती है।

सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक के बारे में

  • ‘सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट’ (SFDR) एक ‘एडवांस एयर-ब्रीदिंग मिसाइल प्रोपल्सन टेक्नोलॉजी’ है, जिसमें मिसाइल प्रारंभिक त्वरण के लिए बूस्टर का उपयोग करती है और फिर वायुमंडलीय ऑक्सीजन से संचालित रैमजेट दहन कक्ष के माध्यम से, डक्ट प्रणाली में ठोस ईंधन का दहन कर उच्च गति वाली उड़ान बनाए रखती है।

  • विकास एजेंसी: यह प्रणाली DRDO द्वारा विकसित की जा रही है, जिसका नेतृत्व हैदराबाद स्थित रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (DRDL) कर रही है।
  • युद्धक भूमिका: यह लड़ाकू विमानों को बियॉन्ड-विजुअल-रेंज (BVR) नौसैनिक युद्ध में निर्णायक बढ़त प्रदान करती है।

वायु युद्ध में SFDR निर्णायक क्यों है?

  • निरंतर सुपरसोनिक उड़ान: पारंपरिक ठोस रॉकेट मोटरों के विपरीत, जो जल्दी कार्यहीन हो जाती हैं, SFDR प्रणोदन मिसाइलों को लंबे समय तक मैक 2 से मैक 3.8 की गति बनाए रखने की अनुमति देता है।
  • विस्तारित आक्रमण सीमा: SFDR से सुसज्जित मिसाइलें 50 किमी. से 340 किमी. की दूरी तक गतिशील हवाई लक्ष्यों पर हमला कर सकती हैं।
  • संचालन लचीलापन: यह प्रणाली समुद्र तल से 20 किमी ऊँचाई तक कार्य कर सकती है, जिसमें 10 किमी. की ऊर्ध्वाधर ‘स्नैप-अप’ या ‘स्नैप-डाउन’ क्षमता होती है।
  • बढ़ी हुई मारक क्षमता: SFDR दुश्मन विमान को चारों तरफ से घेर लेता है और तेजी से पीछा कर सकता है व मुड़ सकता है, इसलिए उसका बचना बहुत मुश्किल हो जाता है।

SFDR प्रणोदन प्रणाली की कार्यप्रणाली

  • बूस्टर चरण: मिसाइल को पहले नोजल-रहित बूस्टर का उपयोग करके सुपरसोनिक गति तक त्वरित किया जाता है, जिससे तीन सेकंड के भीतर रैमजेट संचालन में तेजी से संक्रमण संभव हो पाता है।
    • प्रणोदक ग्रेन को दक्षता के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया है और यह एयर-लॉन्च मिसाइलों के लिए ‘नो-इजेक्ट’ संबंधी सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करता है। प्रणोदक को हाई एनर्जी मटेरियल रिसर्च लेबोरेटरी (HEMRL), पुणे द्वारा विकसित किया गया है।
  • सस्टेनर चरण: सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट सस्टेनर लंबे समय तक संचालित उड़ान का समर्थन करता है।
    • SFDR में बोरॉन-आधारित उच्च-ऊर्जा ठोस ईंधन का उपयोग किया जाता है। प्रारंभ में आंशिक दहन होता है, तथा बाद में वायुमंडलीय ऑक्सीजन का उपयोग करते हुए रैमजेट कक्ष में पूर्ण दहन होता है, जिससे समुद्र तल पर 50 सेकंड और अधिक ऊँचाई पर 200 सेकंड तक संचालित उड़ान संभव होती है।
  • थ्रस्ट नियंत्रण: हॉट गैस वाल्व दहन प्रवाह को नियंत्रित करता है, जिससे गति और ऊँचाई के अनुसार थ्रस्ट समायोजित किया जाता है।
    • यह 1100K से 1400K तापमान के बीच कार्य करता है और इसमें ‘कार्बन-कार्बन कंपोजिट’, टंग्स्टन-कॉपर मिश्रधातु तथा मरेजिंग स्टील जैसे उन्नत पदार्थों का उपयोग किया जाता है।
  • एयर इनटेक संचालन: ‘चीक-माउंटेड टाइटेनियम-अलॉय’ एयर इनटेक उड़ान के दौरान पायरो तकनीकी तंत्र द्वारा खुलते हैं और ‘थ्री-रैंप’ डिजाइन के माध्यम से आने वाली वायु को संपीडित करते हैं।
  • उन्नत ऑनबोर्ड प्रणालियाँ: मिसाइल में ऑनबोर्ड कंप्यूटर, इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम, रेडियो-फ्रीक्वेंसी सीकर, जैम-प्रतिरोधी डेटा लिंक, हाई-टॉर्क इलेक्ट्रो-मैकेनिकल एक्ट्यूएटर और कॉम्पैक्ट लीथियम थर्मल बैटरी एकीकृत होती हैं।
  • वारहेड और फ्यूज: घातकता के लिए, मिसाइल में प्रॉक्सिमिटी फ्यूज और लक्ष्य विनाश को अधिकतम करने के लिए डिजाइन किया गया फ्रैगमेंटेशन वारहेड होता है।

SFDR बनाम पारंपरिक रॉकेट मोटर

  • वायुमंडलीय ऑक्सीजन का उपयोग: SFDR संचालित मिसाइलें क्रूज चरण के दौरान ऑक्सीडाइजर नहीं ले जातीं, क्योंकि रैमजेट वायु से ऑक्सीजन ग्रहण करता है, जबकि पारंपरिक सॉलिड रॉकेट ईंधन और ऑक्सीडाइजर दोनों ले जाती हैं।

परीक्षण का महत्त्व

  • मिसाइल क्षमता में वृद्धि: SFDR तकनीक लंबी दूरी की ‘एयर-टू-एयर’ मिसाइलों के लिए एक महत्त्वपूर्ण क्षमता है, जो युद्ध प्रभावशीलता को बढ़ाती है।
  • सामरिक बढ़त: यह अधिक दूरी, गति और ‘एंड-गेम मैन्युवरबिलिटी’ प्रदान करके विरोधियों के विरुद्ध निर्णायक सामरिक बढ़त देता है।
  • क्षमता में वृद्धि: यह तकनीक भारत की वायु युद्ध क्षमता को मजबूत करती है और रक्षा तैयारी में योगदान देती है।
  • रणनीतिक स्वायत्तता: यह उन्नत मिसाइल प्रणोदन तकनीकों में भारत की आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाती है।
  • रक्षा में आत्मनिर्भर भारत: यह स्वदेशी रक्षा अनुसंधान, विकास और उद्योग भागीदारी को सुदृढ़ करती है।

संदर्भ 

डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में गठित 16वें वित्त आयोग ने वर्ष 2026–27 से 2030–31 की अवधि के लिए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। यह रिपोर्ट 1 फरवरी, 2026 को केंद्रीय बजट के साथ संसद में प्रस्तुत की गई।

  • भारत सरकार ने केंद्रीय करों में राज्यों की 41% हिस्सेदारी बनाए रखने संबंधी इसकी मुख्य अनुशंसाओं को स्वीकार कर लिया है।

वित्त आयोग के बारे में 

  • संवैधानिक निकाय: वित्त आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद-280 के अंतर्गत एक संवैधानिक निकाय है।
  • नियुक्ति प्राधिकारी: भारत के राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष में या आवश्यकता अनुसार वित्त आयोग का गठन करते हैं।
  • संरचना: वित्त आयोग में एक अध्यक्ष तथा चार अन्य सदस्य होते हैं।
  • कार्यकाल: आयोग का कार्यकाल राष्ट्रपति के आदेश में निर्दिष्ट अवधि तक होता है। सामान्यतः आयोग का पुनर्गठन प्रत्येक पाँच वर्ष में किया जाता है और सिफारिशें तैयार करने में आमतौर पर लगभग दो वर्ष लगते हैं।
    • आयोग के सदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र होते हैं।

  • योग्यताएँ: संविधान द्वारा संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह वित्त आयोग के सदस्यों की योग्यताएँ तथा उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित करे।
    • निर्देश: इन शक्तियों के आधार पर संसद ने सदस्यों की नियुक्ति के लिए निम्नलिखित प्रावधान किए हैं।
      • अध्यक्ष को सार्वजनिक मामलों का अनुभव होना अनिवार्य है। शेष चार सदस्यों का चयन निम्नलिखित मापदंडों के अंतर्गत किया जाना चाहिए:-
        • उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या ऐसा व्यक्ति जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए योग्य हो।
        • सरकारी वित्त एवं लेखा के क्षेत्र में विशेषज्ञ ज्ञान रखने वाला व्यक्ति।
        • वित्तीय मामलों एवं प्रशासन में अनुभव रखने वाला व्यक्ति।
        • अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान रखने वाला व्यक्ति।
  • अधिकार: दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 के आधार पर भारत के वित्त आयोग को एक दीवानी न्यायालय के सभी अधिकार प्राप्त हैं।
    • साक्ष्य की माँग: आयोग को गवाहों को बुलाने और किसी भी कार्यालय या न्यायालय से सार्वजनिक दस्तावेज या अभिलेख प्रस्तुत करने का अनुरोध करने का अधिकार है।
  • अधिदेश
    • कर वितरण: कर से प्राप्त शुद्ध आय के हिस्से को संघ और राज्यों के बीच वितरित करना और उसके बाद राज्यों के बीच ऐसी आय के संबंधित हिस्सों का आवंटन करना।
      • हालाँकि, केंद्र सरकार वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं होती है।
    • अनुदान सहायता के नियम: भारत की संचित निधि से केंद्र द्वारा राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान को नियंत्रित करने वाले नियम।
    • राज्य स्तर पर कर हस्तांतरण: राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर पंचायतों और नगरपालिकाओं को संसाधन उपलब्ध कराने हेतु राज्य की संचित निधि को सुदृढ़ करना।
    • विविध विषय: सुदृढ़ वित्तीय हितों में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को संदर्भित किसी भी अन्य विषय पर विचार करना।
    • रिपोर्ट प्रस्तुत करना: आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखने का आग्रह करते हैं। इस रिपोर्ट के साथ उसकी सिफारिशों पर की गई कार्रवाई का व्याख्यात्मक ज्ञापन भी प्रस्तुत किया जाता है।

वित्त आयोग द्वारा निधियों के वितरण के संबंध में

वित्त आयोग यह निर्धारित करता है कि केंद्र की शुद्ध कर आय का कितना हिस्सा, राज्यों को दिया जाएगा (ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण) तथा राज्यों के लिए निर्धारित इस हिस्से का विभिन्न राज्यों के बीच किस प्रकार वितरण होगा (क्षैतिज हस्तांतरण) 

  • क्षैतिज हस्तांतरण: राज्यों के बीच धन का यह हस्तांतरण सामान्यतः वित्त आयोग द्वारा निर्धारित एक सूत्र के आधार पर किया जाता है, जिसमें किसी राज्य की जनसंख्या, प्रजनन दर, आय स्तर, भौगोलिक स्थिति आदि कारकों को शामिल किया जाता है।
  • ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण: इसके विपरीत, केंद्र और राज्यों के बीच धन का यह हस्तांतरण किसी निश्चित या वस्तुनिष्ठ सूत्र पर आधारित नहीं होता है।
    • फिर भी, पिछले कुछ वित्त आयोगों ने कर राजस्व के ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण में वृद्धि, अर्थात् केंद्र से राज्यों को अधिक हिस्सा देने की सिफारिश की है।
  • अतिरिक्त सहायता: केंद्र सरकार कुछ विशेष योजनाओं के लिए राज्यों को अतिरिक्त अनुदान भी प्रदान कर सकती है, जिनका वित्तपोषण केंद्र और राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है।
  • स्थानीय निकायों के लिए: 16वें वित्त आयोग से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह पंचायतों और नगरपालिकाओं जैसे स्थानीय निकायों की आय बढ़ाने के उपायों की सिफारिश करे।
    • वर्ष 2015 तक, भारत में सार्वजनिक व्यय का केवल लगभग 3% ही स्थानीय निकाय स्तर पर होता था, जबकि चीन जैसे अन्य देशों में आधे से अधिक सार्वजनिक व्यय स्थानीय निकायों के स्तर पर होता था।

मुख्य बिंदु 

  • सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP): GSDP किसी राज्य में एक वर्ष के दौरान उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को मापता है। यह राज्य के आर्थिक आकार और राजकोषीय क्षमता को दर्शाता है तथा कर हस्तांतरण  के सूत्रों और राजकोषीय घाटे की सीमाएँ तय करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण मानक है।
  • बजटेतर उधार (Off-Budget Borrowings): बजट से बाहर के उधार वे देनदारियाँ हैं जो सरकारें सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं या विशेष माध्यमों से जुटाती हैं और जो आधिकारिक बजट में शामिल नहीं होतीं हैं, जिससे घोषित राजकोषीय घाटे को बढ़ाए बिना व्यय करना संभव हो जाता है। ये उधार वास्तविक ऋण स्तरों को छिपाते हैं, पारदर्शिता को कमजोर करते हैं और दीर्घकालिक राजकोषीय जोखिम उत्पन्न करते हैं।

16वें वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशें

  • अवलोकन एवं केंद्रीय करों में हिस्सेदारी: आयोग ने सिफारिश की कि केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी 41% ही बनी रहनी चाहिए, जो कि पिछले वित्त आयोग के समान है।
    • विभाज्य पूल की गणना सकल कर राजस्व से कर संग्रह की लागत, उपकर और अधिभार को घटाकर की जाती है।
  • हस्तांतरण के मानदंड: आयोग ने विभिन्न मापदंडों को भारित करके प्रत्येक राज्य के करों के व्यक्तिगत हिस्से को निर्धारित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले सूत्र को अद्यतन किया:
    • आय अंतराल (42.5%): यह किसी राज्य के प्रति व्यक्ति GSDP और शीर्ष तीन बड़े राज्यों के औसत के बीच के अंतर को मापता है।
    • जनसंख्या (17.5%): यह वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, राष्ट्रीय जनसंख्या में राज्य की हिस्सेदारी पर आधारित होता है।
    • GDP में योगदान (10%): यह एक नया मानदंड है, जिसने कर एवं राजकोषीय प्रयास’ को प्रतिस्थापित किया है। इसकी गणना राज्य के GSDP के वर्गमूल के आधार पर की जाती है।
    • जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (10%): इसे वर्ष 1971 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि को ध्यान में रखते हुए पुनः परिभाषित किया गया है।
    • क्षेत्रफल (10%) एवं वन ( 10%): ये भार राज्यों को उनके भौगोलिक आकार तथा कुल वन क्षेत्र में हिस्सेदारी और वन क्षेत्र में वृद्धि के आधार पर प्रोत्साहित करते हैं।
  • अनुदान सहायता: पाँच वर्षीय अवधि के लिए अनुशंसित कुल अनुदान सहायता की राशि ₹9.47 लाख करोड़ है:-
    • स्थानीय सरकार अनुदान: ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के लिए कुल ₹7.91 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं।
    • प्रवेश-स्तरीय शर्तें: निधि प्राप्त करने के लिए स्थानीय निकायों को लेखा-परीक्षित खाते, संवैधानिक गठन, तथा राज्य वित्त आयोगों का समय पर गठन जैसी शर्तें पूरी करनी होंगी।
    • अनुदान संरचना: अनुदानों को मूल अनुदान (80%) और प्रदर्शन-आधारित अनुदान में विभाजित किया गया है।
    • आपदा प्रबंधन: राहत एवं आपदा प्रबंधन कोष के लिए ₹1,55,916 करोड़ (केंद्र का हिस्सा) का कोष अनुशंसित किया गया है।
    • समाप्त किए गए अनुदान: 16वें वित्त आयोग ने राजस्व घाटा अनुदान, क्षेत्र-विशिष्ट अनुदान, तथा राज्य-विशिष्ट अनुदान को समाप्त कर दिया है।
  • राजकोषीय रोडमैप एवं क्षेत्रीय सुधार 
    • राजकोषीय घाटा लक्ष्य: आयोग ने सिफारिश की है कि केंद्र सरकार अपने राजकोषीय घाटे को वर्ष 2030–31 तक GDP के 3.5% पर लाए, जबकि राज्यों को अपना घाटा GSDP के 3% की सीमा में बनाए रखना चाहिए।
    • ऋण पथ: केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त ऋण वर्ष 2026–27 में GDP के 77.3% से घटकर वर्ष 2030–31 तक 73.1% रहने का अनुमान है।
    • बजटेतर उधार (Off-Budget Borrowings): रिपोर्ट में बजटेतर उधार को सख्ती से समाप्त करने की माँग की गई है तथा सभी ऐसे ऋणों को आधिकारिक बजट में शामिल करने की सिफारिश की गई है।
    • सब्सिडी का युक्तिकरण: राज्यों को बिना शर्त नकद अंतरण की समीक्षा करनी चाहिए और स्पष्ट बहिष्करण मानदंड लागू करने चाहिए, ताकि लक्षित लाभार्थियों तक प्रभावी रूप से सहायता पहुँच सके।
    • सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम: आयोग ने 308 निष्क्रिय राज्य सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (SPSEs) को बंद करने तथा एक विनिवेश नीति तैयार करने की सिफारिश की है।
    • विद्युत क्षेत्र: दक्षता में सुधार के लिए राज्यों को विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMs) के निजीकरण के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
      • डिस्कॉम सुधार की सशर्तता: राज्यों को पूँजी निवेश हेतु विशेष सहायता का उपयोग केवल डिस्कॉम के निजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही करने की अनुमति होगी, जिससे राजकोषीय सहायता को सुधारों से सख्ती से जोड़ा गया है।

क्षैतिज हस्तांतरण के मानदंड

मानदंड  15वाँ वित्त आयोग (2021-26) 16वाँ वित्त आयोग (2026-31)
आय अंतराल 45% 42.5%
जनसंख्या (2011) 15% 17.5%
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन 12.5% 10%
क्षेत्रफल  15% 10%
वन क्षेत्र  10% 10%
GDP में योगदान 10%
कर एवं राजकोषीय प्रयास 2.5%

अंतर-राज्यीय प्रभाव विश्लेषण

  • सापेक्ष लाभार्थी राज्य: कर्नाटक (हिस्सेदारी 3.65% से बढ़कर 4.13%), केरल (1.93% से 2.38%) और गुजरात (3.48% से 3.76%) जैसे उच्च-प्रदर्शन वाले राज्यों की कर हिस्सेदारी में सापेक्ष वृद्धि हुई है।
  • प्रदर्शन प्रोत्साहन: यह वृद्धि मुख्यतः GDP में योगदान (10%) के रूप में जोड़े गए नए भारांक के कारण है, जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में राज्यों की हिस्सेदारी के लिए उन्हें पुरस्कृत करता है।
  • सापेक्ष गिरावट: इसके विपरीत, कुछ उत्तरी एवं कम-आय वाले राज्यों की प्रतिशत हिस्सेदारी में कम सापेक्ष गिरावट देखी गई है, जैसे बिहार (10.06% से घटकर 9.95%) और उत्तर प्रदेश (17.94% से घटकर 17.62%)।
  • समानता संतुलन: इन परिवर्तनों के बावजूद, आय अंतराल मानदंड को सबसे अधिक भारांक (42.5%) दिया गया है, ताकि कम-आय वाले राज्यों की राजकोषीय आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से समर्थन मिलता रहे।

अनुशंसाओं का महत्त्व

  • आर्थिक दक्षता को प्रोत्साहन: GDP में योगदान (10%) को शामिल करने और ‘’कर प्रयास” को हटाने के माध्यम से आयोग ने राष्ट्रीय आर्थिक वृद्धि को गति देने वाले राज्यों को पुरस्कृत करने की दिशा में परिवर्तन का संकेत दिया है।
    • इससे विशेष रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्यों को लाभ होता है।
  • शहरी-केंद्रित वृद्धि : शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के लिए अनुदानों में 230% की भारी वृद्धि, जो बढ़कर ₹3.56 लाख करोड़ हो गई है, इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भारत की भविष्य की आर्थिक वृद्धि उसकी शहरों में निहित है।
  • जनसांख्यिकीय न्याय: जनसांख्यिकीय प्रदर्शन के पुनर्परिभाषित मानदंड (वर्ष 1971–2011 की जनसंख्या वृद्धि के आधार पर) से दक्षिणी राज्यों की लंबे समय से चली आ रही शिकायत का समाधान होता है।
    • इससे यह सुनिश्चित होता है कि जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन में सफलता के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा रहा है।
  • पर्यावरणीय संरक्षण: सामान्य वनों को शामिल करने और वन क्षेत्र में वृद्धि को प्रोत्साहित करने से यह रिपोर्ट राज्यों को भारत के नेट-जीरो और जलवायु लक्ष्यों में सक्रिय भागीदारी हेतु प्रेरित करती है।
    • वन-आधारित हस्तांतरण पेरिस समझौते के अंतर्गत भारत की अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को भी सुदृढ़ करता है, क्योंकि यह पारिस्थितिकी लागतों को राज्य स्तर पर समाहित करता है।
  • राजकोषीय पारदर्शिता: बजटेतर उधार (जैसे राज्य-स्वामित्व वाली संस्थाओं के माध्यम से लिए गए ऋण) को आधिकारिक बजट में शामिल करने का निर्देश राजकोषीय विवेक और ऋण स्थिरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • सहकारी संघवाद का पुनर्संतुलन: ये सिफारिशें पुनर्वितरण (समानता) और वृद्धि प्रोत्साहन (दक्षता) के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में परिवर्तन को दर्शाती हैं।
  • शहरीकरण प्रीमियम एवं रणनीतिक विस्तार: ₹10,000 करोड़ का शहरीकरण प्रीमियम योजनाबद्ध शहरी विस्तार को बढ़ावा देने का संकेत देता है, जो ग्रामीण-से-शहरी संक्रमण नीति के माध्यम से शहर–ग्रामीण सीमा क्षेत्रों में प्रशासन तथा अवसंरचना पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का समाधान करने का प्रयास करता है।
  • अनुदानों में कार्यात्मक प्राथमिकता: आयोग ने स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, जल आपूर्ति और अपशिष्ट-जल उपचार को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता दी है तथा स्थानीय निकायों के मूल अनुदानों के 50% को शहरी स्थिरता और SDG लक्ष्यों के अनुरूप संरेखित किया है।

16वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं से उत्पन्न राजकोषीय चुनौतियाँ

  • उपकर और अधिभार का अंतर: एक प्रमुख चुनौती यह बनी हुई है कि वास्तविक विभाज्य कोष संकुचित हो गया है।
    • यद्यपि नाममात्र हिस्सेदारी 41% है, लेकिन उपकर और अधिभार राज्यों के साथ साझा न किए जाने के कारण राज्यों को वास्तविक रूप से प्राप्त हिस्सा लगभग 32% के आस-पास रह जाता है।
  • ऊर्ध्वाधर असंतुलन: कई राज्यों ने केंद्रीय करों में 50 प्रतिशत हिस्सेदारी की माँग की थी, क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के तहत उनकी स्वतंत्र राजस्व जुटाने की शक्तियाँ सीमित हो गई हैं और सामाजिक कल्याण पर व्यय लगातार बढ़ रहा है।
  • बढ़ता राजस्व घाटा: 41 प्रतिशत कर हस्तांतरण के बावजूद अनेक राज्यों की राजस्व स्थिति असंतुलित होती जा रही है, जिससे वे पूँजीगत परिसंपत्तियों के बजाय दैनिक खर्चों के लिए बाजार से उधार लेने पर निर्भर हो गए हैं।
  • लोकलुभावनवाद बनाम विकास: तथाकथित नि:शुल्क सुविधाओं की संस्कृति अथवा अयोग्य सब्सिडी (बिना शर्त नकद अंतरण) दीर्घकालिक राजकोषीय स्वास्थ्य के लिए जोखिम उत्पन्न करती है।
    • आयोग ने राज्यों के बीच इन अंतरणों के लिए मानकीकृत लेखांकन की कमी को रेखांकित किया है।
  • अंतर-राज्यीय असमानताएँ: यद्यपि सूत्र समानता और दक्षता के बीच संतुलन साधने का प्रयास करता है, फिर भी यह जोखिम बना रहता है कि बिहार जैसे कम-आय वाले राज्यों की सापेक्ष हिस्सेदारी, उच्च-वृद्धि वाले राज्यों की तुलना में घट सकती है।
  • वस्तु एवं सेवा कर का संदर्भ: इस कर व्यवस्था के बाद राज्यों की स्वतंत्र राजस्व-संग्रह क्षमता कमजोर हुई है, जिससे पूर्वानुमेय कर हस्तांतरण और 41 प्रतिशत हिस्सेदारी उनकी राजकोषीय स्वायत्तता बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गई है।
  • राजस्व घाटा अनुदानों की समाप्ति: इन अनुदानों को स्पष्ट रूप से समाप्त किया जाना अल्पकालिक घाटा-सहायता के बजाय सुधार-आधारित राजकोषीय अनुशासन की ओर बदलाव को दर्शाता है, जिससे राजकोषीय रूप से कमजोर राज्यों पर व्यय और सब्सिडी सुधार करने का दबाव बढ़ सकता है।
  • सब्सिडी लेखांकन का मानकीकरण: आयोग ने सब्सिडी की एकरूप परिभाषा और लेखांकन मानकों के अभाव को चिह्नित किया है तथा उल्लेख किया है कि कई राज्य इन्हें सहायता या अनुदान के रूप में वर्गीकृत कर देते हैं, जिससे वास्तविक राजकोषीय देयताएँ अस्पष्ट हो जाती हैं।

आगे की राह 

  • विभाज्य कोष में सुधार: उपकर और अधिभार पर सीमा निर्धारित करने अथवा उन्हें विभाज्य कोष में सम्मिलित करने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है, ताकि सहकारी संघवाद की भावना को पुनः सुदृढ़ किया जा सके।
  • संरचनात्मक सब्सिडी सुधार: राज्यों को सब्सिडी योजनाओं में समाप्ति उपबंध लागू करने चाहिए तथा आयोग द्वारा सुझाए गए बहिष्करण मानदंडों को अपनाना चाहिए, ताकि कल्याणकारी लाभ केवल वास्तविक एवं लक्षित लाभार्थियों तक ही पहुँच सके।
    • समाप्ति उपबंध ऐसे प्रावधान होते हैं, जिनके अंतर्गत किसी कानून, योजना, नियम या राजकोषीय प्रोत्साहन के लिए स्वतः समाप्ति की तिथि निर्धारित कर दी जाती है, जब तक कि उसकी स्पष्ट रूप से समीक्षा कर पुनः विस्तार न किया जाए।
      • इनका उपयोग नीतिगत जड़ता को रोकने, जवाबदेही सुनिश्चित करने तथा बदलती आर्थिक और शासन संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप हस्तक्षेपों को समायोजित करने के लिए किया जाता है।
  • तीसरे चरण (स्थानीय निकाय) को सशक्त बनाना: राज्यों को स्थानीय निकायों को केवल योजनाओं का क्रियान्वयन करने वाली संस्थाएँ मानने से आगे बढ़ना चाहिए और पंचायतों तथा नगरपालिकाओं को वास्तविक कराधान अधिकार सौंपने चाहिए, ताकि उनकी केंद्र सरकार के अनुदानों पर निर्भरता कम हो सके।
  • विद्युत क्षेत्र में सुधार: विद्युत वितरण कंपनियों के निजीकरण को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
    • पुराने ऋणों को समाहित करने के लिए विशेष प्रयोजन संस्थाओं का गठन करने से निजी निवेश के लिए मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
  • राजकोषीय समेकन: केंद्र (लक्ष्य 3.5%) और राज्य (लक्ष्य 3.0%),  दोनों को राजकोषीय घाटे के निर्धारित मार्ग का सख्ती से पालन करना होगा, ताकि भारत का संयुक्त ऋण–GDP अनुपात अनुमान के अनुसार घट सके।
  • राज्य वित्त आयोगों को सशक्त बनाना: केंद्रीय अंतरणों के अतिरिक्त, प्रभावी राजकोषीय विकेंद्रीकरण सुनिश्चित करने के लिए राज्य वित्त आयोगों (SFCs) को कठोर समय-सीमाओं और डेटा समर्थन के माध्यम से मजबूत करना आवश्यक है।
  • सब्सिडी एवं सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम सुधार: राज्यों को अंतरणों के लिए एकरूप लेखांकन व्यवस्था अपनानी चाहिए तथा निष्क्रिय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSEs) के लिए विनिवेश नीति लागू करनी चाहिए, ताकि पूँजी सृजन हेतु राजकोषीय स्थान मुक्त किया जा सके।

निष्कर्ष

16वाँ वित्त आयोग आर्थिक दक्षता और समानता के बीच संतुलन स्थापित करता है, एक ओर आर्थिक वृद्धि में योगदान देने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करता है, वहीं दूसरी ओर कमजोर एवं वंचित राज्यों को समर्थन प्रदान करता है। राजकोषीय पारदर्शिता और संरचनात्मक सुधारों को अनिवार्य बनाकर, यह भारत के लिए दीर्घकालिक ऋण स्थिरता तथा सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करने का एक रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत करता है।

To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.


Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.