100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

Feb 06 2026

ऑपरेशन त्राशी-I (Operation Trashi-I)

जम्मू और कश्मीर में ऑपरेशन त्राशी-I के दौरान संयुक्त सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में एक आतंकवादी को मार गिराया।

ऑपरेशन त्राशी-I के बारे में

  • ऑपरेशन त्राशी-I जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में शुरू किया गया एक प्रमुख आतंकवाद-रोधी अभियान है।
  • कार्य क्षेत्र: किश्तवाड़ जिला, पहाड़ियों, घने जंगलों, गहरी खाइयों और लगभग 2,000 वर्ग किमी. में फैले ऊँचे मार्गों से युक्त है।
  • यह अनंतनाग (कश्मीर घाटी), डोडा (जम्मू), जांस्कर (लद्दाख) और हिमाचल प्रदेश से सटा हुआ है, जो उग्रवादियों को भागने के मार्ग और प्राकृतिक मार्ग प्रदान करता है।
  • संचालन बल: यह भारतीय सेना के व्हाइट नाइट कॉर्प्स (XV कोर) के नेतृत्व में, जम्मू और कश्मीर पुलिस तथा केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के सहयोग से चलाया जाने वाला संयुक्त अभियान है।
  • उद्देश्य: मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान-आधारित जैश-ए-मोहम्मद समूह से जुड़े आतंकवादियों का पता लगाना, उन्हें बाहर निकालना और निष्क्रिय करना है।

सेशेल्स (Seychelles)

सेशेल्स के राष्ट्रपति डॉ. पैट्रिक हरमिनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर पाँच दिवसीय राजकीय यात्रा पर भारत पहुँचे।

सेशेल्स के बारे में

  • स्थिति: सेशेल्स पश्चिमी हिंद महासागर में, मेडागास्कर के उत्तर-पूर्व में स्थित एक द्वीपसमूह राष्ट्र है।
  • राजधानी: माहे द्वीप पर स्थित विक्टोरिया राजधानी और सबसे बड़ा शहर है।
  • सरकार: यह बहुदलीय प्रणाली वाला एकात्मक राष्ट्रपति गणराज्य है। इसे वर्ष 1976 में यूनाइटेड किंगडम से स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी।
  • जलवायु: यहाँ उष्णकटिबंधीय महासागरीय जलवायु पाई जाती है, जिसमें वर्षभर तापमान में बहुत कम उतार-चढ़ाव होता है।

भारत–सेशेल्स संबंध

  • राजनयिक संबंध 29 जून, 1976 को सेशेल्स की स्वतंत्रता के बाद स्थापित हुए, जिसमें भारतीय नौसेना पोत (INS नीलगिरी) ने समारोह में भाग लिया।
  • भारत और सेशेल्स दोनों हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) और हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) के प्रमुख रणनीतिक सदस्य हैं।
  • अक्टूबर 2025 में राष्ट्रपति पद ग्रहण करने के बाद यह उनकी पहली आधिकारिक भारत यात्रा है।
  • यह यात्रा भारत–सेशेल्स राजनयिक संबंधों की 50वीं वर्षगाँठ (1976) के साथ संरेखित है।
  • यह यात्रा हिंद महासागर क्षेत्र में सेशेल्स की एक प्रमुख समुद्री पड़ोसी के रूप में भूमिका को दर्शाती है।
  • यह भारत के महासागर विजन (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक और समग्र उन्नति) तथा ग्लोबल साउथ के प्रति उसकी प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।

एंथ्रोपिक AI

फरवरी 2026 में एंथ्रोपिक द्वारा ‘AI वर्कप्लेस’ टूल्स लॉन्च किए जाने के बाद वैश्विक तकनीकी शेयरों में तीव्र गिरावट देखी गई, जिसने सासपोकैलिप्स (SaaSpocalypse) की प्रवृत्ति का संकेत दिया।

एंथ्रोपिक AI के बारे में

  • एंथ्रोपिक सैन फ्राँसिस्को स्थित AI कंपनी है, जो क्लॉड (Claude) बिग लैंग्वेज मॉडल के लिए जानी जाती है, जिनका डिजाइन सुरक्षा, विश्वसनीयता और उद्यम उपयोग पर केंद्रित है।
  • कंपनी ने क्लॉड कोवर्क AI एजेंट्स के लिए 11 नए ‘प्लग-इन’ आधारित सूट लॉन्च किया।
  • पहले के AI टूल्स के विपरीत, ये एजेंट केवल सहायता करने के बजाय सीधे कार्य निष्पादित कर सकते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

  • ‘एंड-टू-एंड’ कार्य निष्पादन करने में सक्षम स्वायत्त AI एजेंट।
  • पारंपरिक SaaS इंटरफेस पर निर्भर हुए बिना वर्क फ्लो से सीधा संपर्क।
  • कानूनी और वित्तीय विश्लेषण जैसे तर्क-प्रधान कार्यों में उच्च सटीकता।

अनुप्रयोग

  • कानूनी: अनुबंध समीक्षा, NDA विश्लेषण, अनुपालन निगरानी।
  • व्यवसाय: बिक्री ट्रैकिंग, मार्केटिंग एनालिटिक्स, CRM जैसे कार्य
  • डेटा और वित्त: रिपोर्टिंग, प्रवृत्ति विश्लेषण, निर्णय समर्थन।`

सासपोकैलिप्स’ क्या है?

  • सासपोकैलिप्स उस बढ़ती चिंता को दर्शाता है कि AI एजेंट पूरे सॉफ्टवेयर लेयर को बदलकर SaaS कंपनियों को अप्रासंगिक बना सकते हैं।
  • हालिया प्रवृत्ति
    • वैश्विक तकनीकी शेयरों, विशेषकर सॉफ्टवेयर कंपनियों में तेज गिरावट।
    • सेवा-आधारित आउटसोर्सिंग पर निर्भरता के कारण भारतीय आईटी शेयरों में भारी गिरावट।
    • निवेशकों की धारणा में बदलाव: AI अब सहायक नहीं, बल्कि प्रतिस्थापक के रूप में देखा जा रहा है।
  • भारत के लिए प्रासंगिकता
    • भारत का आईटी क्षेत्र सेवा-आधारित मॉडलों पर निर्भर है, जिन्हें AI एजेंट तेजी से स्वचालित कर सकते हैं, जिससे रोजगार विस्थापन, मूल्य ह्रास और त्वरित अनुकूलन की आवश्यकता पर चिंता बढ़ रही है।

भारत टैक्सी

हाल ही में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने भारत के पहले सहकारी-आधारित राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म भारत टैक्सी का शुभारंभ किया।

भारत टैक्सी के बारे में

  • भारत टैक्सी एक सहकारी-आधारित मोबिलिटी प्लेटफॉर्म है, जिसे ऐप-आधारित कैब एग्रीगेटर्स के विकल्प के रूप में डिजाइन किया गया है, जिसमें ड्राइवरों और यात्रियों को प्राथमिकता दी जाती है।
  • उद्देश्य: ड्राइवरों की आय और कार्य स्थितियों में सुधार करते हुए किफायती, पारदर्शी और न्यायसंगत राइड-हेलिंग सेवाएँ प्रदान करना।
  • नोडल निकाय: यह सेवा सहकारिता मंत्रालय की व्यापक परिकल्पना के अंतर्गत सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड द्वारा संचालित की जाती है।
  • कार्य मॉडल: भारत टैक्सी शून्य-कमीशन, ड्राइवर-स्वामित्व वाले सहकारी मॉडल पर कार्य करती है, जिसमें ड्राइवर सामूहिक रूप से प्लेटफॉर्म के स्वामी, शासक और लाभार्थी होते हैं।
  • ड्राइवर-केंद्रित प्रावधान: ड्राइवरों को किराए का 80 प्रतिशत तक सीधे प्राप्त होता है, जिससे आय की स्थिरता में सुधार होता है।
    • भुगतान मासिक क्रेडिट प्रणाली के माध्यम से प्रबंधित किए जाते हैं, जिससे पारदर्शिता और वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • पारदर्शी और पूर्वानुमेय किराए, जिनका उद्देश्य सर्ज प्राइसिंग और अत्यधिक पीक-आवर शुल्क से बचना है।
    • एकल मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से कार, ऑटो-रिक्शा और दोपहिया वाहनों सहित मल्टी-मोडल विकल्प।
    • डिजिटल पहुँच, जिसमें एंड्रॉइड और iOS पर उपलब्ध बहुभाषी ऐप के माध्यम से आसान बुकिंग और रियल-टाइम वाहन ट्रैकिंग की सुविधा।
    • सुरक्षा-प्रथम सिद्धांत पर आधारित, जिसमें सत्यापित ड्राइवर ऑनबोर्डिंग, दिल्ली पुलिस के साथ एकीकरण और विश्वसनीय संपर्कों के साथ राइड-शेयरिंग विकल्प शामिल हैं।

महत्त्व: भारत टैक्सी सहकारी उद्यमिता को मजबूत करती है, निष्पक्ष मोबिलिटी सेवाएँ सुनिश्चित करती है और समावेशी, जन-केंद्रित शहरी परिवहन समाधानों को बढ़ावा देती है।

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS)

कथित अनुचित उपयोग को लेकर हालिया राजनीतिक बहस ने सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) को पुनः राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के बारे में

  • MPLADS भारत सरकार द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है, जो संसद सदस्यों (MPs) को स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर स्थायी सामुदायिक परिसंपत्तियों के निर्माण हेतु विकास कार्यों की अनुशंसा करने में सक्षम बनाती है।
  • प्रारंभ: दिसंबर 1993
  • प्रशासक: सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI)।
  • निधि सीमा: प्रत्येक सांसद को प्रति वर्ष ₹5 करोड़ का अधिकार है, जो ₹2.5 करोड़ की दो समान किश्तों में जिला प्राधिकरण (आमतौर पर जिला कलेक्टर) को जारी किए जाते हैं।
    • निधियाँ गैर-व्यपगत (Non-lapsable) होती हैं और अप्रयुक्त रहने पर आगे बढ़ा दी जाती हैं। अप्रैल 2023 से, दक्षता बढ़ाने के लिए निधियाँ केंद्रीय नोडल खाता (CNA) के माध्यम से प्रवाहित की जाती हैं।
  • आवंटन मानदंड: SC क्षेत्रों के लिए 15% और ST क्षेत्रों के लिए 7.5% का अनिवार्य आरक्षण।
  • अनुशंसा का क्षेत्र
    • लोकसभा सांसद – अपने निर्वाचन क्षेत्र के भीतर
    • राज्यसभा सांसद – अपने राज्य के भीतर
    • लोकसभा और राज्यसभा के नामित सांसद – भारत में कहीं भी।
  • सीमित लचीलापन: सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र/राज्य से बाहर प्रति वर्ष ₹50 लाख तक तथा गंभीर प्राकृतिक आपदाओं के दौरान ₹1 करोड़ तक के कार्यों की अनुशंसा कर सकते हैं।
  • निगरानी: ऑनलाइन डैशबोर्ड, जियो-टैगिंग और जिला-स्तरीय कार्यान्वयन पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं।
  • MPLADS के अंतर्गत अनुमत कार्य: निधियों का उपयोग केवल स्थायी परिसंपत्तियों के लिए किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं—
    • पेयजल और स्वच्छता सुविधाएँ
    • विद्यालय भवन और शैक्षिक अवसंरचना
    • सार्वजनिक स्वास्थ्य परिसंपत्तियाँ
    • सड़कें, पुल और बुनियादी नागरिक सुविधाएँ।

उपयोग को लेकर आलोचना के बावजूद, ऐतिहासिक आँकड़े पर्याप्त निधि उपयोग दर्शाते हैं, जिससे MPLADS को समाप्त करने के स्थान पर क्षमता और निगरानी सुधारने की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

लेबनान-इजरायल ब्लू लाइन

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों (UNIFIL) ने दक्षिणी लेबनान में ब्लू लाइन के कुछ हिस्सों में गश्त और नियमित गतिविधियों को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया।

  • इजरायली सेना ने ब्लू लाइन’ के पास एक गैर-विषाक्त रासायनिक पदार्थ छोड़ने की घोषणा की।

संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक (UNIFIL) के बारे में

  • संयुक्त राष्ट्र अंतरिम बल, लेबनान (UNIFIL), लेबनान–इजरायल सीमा (ब्लू लाइन) पर एक संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन है।
  • स्थापना: वर्ष 1978।
    • वर्ष 2006 में इजरायल–हिजबुल्लाह युद्ध के बाद UNSC प्रस्ताव 1701 के तहत इसका जनादेश विस्तारित किया गया।
  • प्रमुख उद्देश्य: सीमा क्षेत्र में शत्रुता की समाप्ति की निगरानी करना और उल्लंघनों को रोकना।
  • क्षेत्र नियंत्रण एवं शत्रुता निवारण: UNIFIL को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि उसके संचालन क्षेत्र का उपयोग शत्रुतापूर्ण गतिविधियों, हथियारों या लड़ाकों की उपस्थिति के लिए न हो।
  • बल प्रयोग एवं परिचालन सीमाएँ: यह बल सशस्त्र है, लेकिन मुख्यतः पर्यवेक्षणात्मक है; बल प्रयोग केवल आत्मरक्षा या नागरिकों की सुरक्षा हेतु अनुमत है।

ब्लू लाइन (लेबनान–इजरायल सीमा) के बारे में

  • स्वरूप: संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहचानी गई वापसी रेखा (2000), जिसे दक्षिणी लेबनान से इजरायल की वापसी की पुष्टि हेतु निर्धारित किया गया, यह अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है।
  • कानूनी स्थिति: एक तकनीकी और अस्थायी सीमांकन, जिसका उपयोग केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुपालन की निगरानी के लिए किया जाता है।
  • भौगोलिक विस्तार: लगभग 120 किमी. तक विस्तृत है, जो नाकौरा के पास भूमध्यसागर तट से लेकर शेबा फार्म्स और गोलन हाइट्स के निकट त्रि-जंक्शन क्षेत्र तक जाती है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: UNSC प्रस्ताव 425 और 426 (1978) के तहत वर्ष 2000 में इजरायल की वापसी के बाद सीमांकित।
  • पर्यवेक्षण: लेबनानी सशस्त्र बलों के समन्वय से UNIFIL द्वारा।
  • विवादित क्षेत्र: इसमें शेबा फार्म्स, घाजर गाँव और कफारचौबा पहाड़ियाँ जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं।

रणनीतिक महत्त्व: UNSC प्रस्ताव 1701 के तहत UNIFIL का मुख्य परिचालन क्षेत्र बनाता है, जो क्षेत्रीय स्थिरता और नागरिक सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

एम. अनंतसायनम अय्यंगार

हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संविधान सदन में पूर्व अध्यक्ष एम. अनंतसायनम अय्यंगार की जयंती पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की।

एम. अनंतसायनम अय्यंगार के बारे में

  • मदभूषी अनंतसायनम अय्यंगार (1891–1978) एक वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी, विधिवेत्ता और प्रतिष्ठित सांसद थे, जिन्हें भारत की प्रारंभिक संसदीय परंपराओं के प्रमुख निर्माताओं में से एक के रूप में याद किया जाता है।
  • प्रारंभिक जीवन: 4 फरवरी, 1891 को तिरुचाणूर (तिरुपति के निकट, आंध्र प्रदेश) में जन्म हुआ। उन्होंने मद्रास के पचैयप्पा कॉलेज में अध्ययन किया और वर्ष 1913 में मद्रास लॉ कॉलेज से विधि की डिग्री प्राप्त की।
    • उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की, वे ‘केस लॉ’ पर अपनी गहन और व्यापक पकड़ के कारण एक प्रतिष्ठित एवं प्रख्यात विधिवेत्ता के रूप में उभरे।
  • प्रमुख योगदान
    • स्वतंत्रता संग्राम: असहयोग आंदोलन, व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। लगभग तीन वर्षों तक कारावास की सजा काटी।
    • संविधान निर्माण: संविधान सभा और उसकी संचालन समिति के सदस्य रहे। संसदीय परंपराओं की नींव रखने में योगदान दिया।
    • संसदीय नेतृत्व: लोकसभा के उपाध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष (1956–62) रहे। निष्पक्षता, स्पष्ट निर्णय और संसदीय मर्यादा की रक्षा के लिए प्रसिद्ध थे।
    • संस्थागत सुधार: प्रश्नों, स्थगन प्रस्तावों, गणपूर्ति (क्वोरम) और मंत्रिस्तरीय जवाबदेही पर उनके निर्णय स्थायी मिसाल बने।
  • विरासत: उन्होंने भारत की संसदीय लोकतंत्र की नींव मजबूत की।
    न्यायिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार और धर्मनिरपेक्षता के समर्थक रहे। बाद में बिहार के राज्यपाल के रूप में भी कार्य किया।

    • 19 मार्च, 1978 को निधन तक वे तिरुपति के संस्कृत विद्यापीठ और परोपकारी कार्यों से जुड़े रहे।

ब्रिक्स औद्योगिक दक्षता केंद्र (BCIC)

हाल ही में भारत ने ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं में इंडस्ट्री 4.0 को अपनाने और MSME प्रतिस्पर्द्धात्मकता को मजबूत करने के लिए औपचारिक रूप से ब्रिक्स औद्योगिक दक्षता केंद्र (BCIC) से जुड़ाव स्थापित किया।

ब्रिक्स औद्योगिक दक्षता केंद्र (BCIC) के बारे में

  • BCIC एक बहुपक्षीय सार्वजनिक–निजी मंच है, जो ब्रिक्स और ब्रिक्स प्लस देशों में विनिर्माण उद्यमों और MSMEs को एकीकृत सहायता प्रदान करता है।
    • यह औद्योगिक आधुनिकीकरण, डिजिटल परिवर्तन और सतत् विनिर्माण पर केंद्रित है।
    • यह ब्रिक्स की नई औद्योगिक क्रांति साझेदारी (PartNIR) के अंतर्गत कार्य करता है।
  • मिशन: उन्नत विनिर्माण प्रौद्योगिकियों, नवाचार और सीमा-पार औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा देकर औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता, उत्पादकता और लचीलापन बढ़ाना।
  • उद्गम और संस्थागत समर्थन: BCIC की शुरुआत 2024–25 में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO) के मुख्यालय में की गई।
    • UNIDO तकनीकी विशेषज्ञता और संस्थागत समर्थन प्रदान करता है, जिससे वैश्विक औद्योगिक विकास मानकों के अनुरूपता सुनिश्चित होती है।
  • BCIC के प्रमुख कार्य
    • इंडस्ट्री 4.0 और फैक्टरी डिजिटलाइजेशन को समर्थन।
    • प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और अनुसंधान संस्थानों के साथ साझेदारी को बढ़ावा।
    • बाजार सूचना, परामर्श सेवाएँ और वित्त तक पहुँच प्रदान करना।
    • कौशल, उत्पादकता और सतत् औद्योगिक प्रथाओं को बढ़ावा देना।
  • भारत की भूमिका: भारत की भागीदारी DPIIT और UNIDO के बीच ट्रस्ट फंड समझौते के माध्यम से औपचारिक की गई है।
    • राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC) को भारत का नोडल केंद्र नामित किया गया है, जो सहभागिता, क्षमता निर्माण और उत्पादकता वृद्धि पहलों का नेतृत्व करेगा।

भारत के लिए महत्त्व

भारतीय कंपनियों को ब्रिक्स वैल्यू चेन में एकीकृत करने, नए बाजारों तक पहुँच प्रदान करने और वैश्विक स्तर पर नवाचार को बढ़ाने में सक्षम बनाकर मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को सशक्त करता है।

संदर्भ 

लगभग एक वर्ष के राष्ट्रपति शासन के पश्चात्, युमनाम खेमचंद सिंह ने मणिपुर के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

पृष्ठभूमि

  • पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने 3 मई, 2023 से शुरू हुई लंबी अशांति के बीच 9 फरवरी, 2025 को इस्तीफा दे दिया था।
  • निरसन : 13 फरवरी, 2025 को लागू किए गए राष्ट्रपति शासन को हटा लिया गया, जिससे एक निर्वाचित सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

राष्ट्रपति शासन: एक विस्तृत विवरण

पहलू  विवरण 
राष्ट्रपति शासन का अर्थ
  • राज्य सरकार को निलंबित कर दिया जाता है और राज्य का प्रशासन सीधे केंद्र सरकार सँभालती है।
  • राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख के रूप में कार्य करते हैं, जबकि प्रशासन राष्ट्रपति की ओर से चलाया जाता है।
  • राज्य विधानसभा को भंग किया जा सकता है या ‘निलंबित अवस्था’ में रखा जा सकता है।
संवैधानिक आधार (घोषणा के आधार)
  • अनुच्छेद-356: राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्य सूचना के आधार पर राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थिति में राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद-355: संघ को यह संवैधानिक दायित्व सौंपता है कि वह राज्यों की बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से रक्षा करे तथा संवैधानिक शासन सुनिश्चित करे।
  • अनुच्छेद-365: इसके अनुसार, यदि राज्य केंद्र के निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता माना जा सकता है, जिससे अनुच्छेद-356 के तहत कार्रवाई संभव है।
अन्य आधार
  • जब राष्ट्रपति संतुष्ट हों कि संवैधानिक शासन विफल हो गया है, जैसे
    • कोई भी दल या नेता राज्यपाल द्वारा दिए गए समय के भीतर सरकार बनाने में सक्षम न हो।
    • गठबंधन सरकार गिर जाए और मुख्यमंत्री सदन में बहुमत सिद्ध करने में विफल रहे।
    • अविश्वास प्रस्ताव के बाद बहुमत खो देना।
    • असाधारण स्थितियों (युद्ध, कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति आदि) के कारण चुनाव संभव न हों।
संसदीय अनुमोदन (प्रक्रिया)
  • राष्ट्रपति संतुष्टि होने पर (अक्सर राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर) अनुच्छेद-356 के तहत उद्घोषणा जारी करते हैं।
  • उद्घोषणा को 2 महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदित किया जाना चाहिए।
  • यदि लोकसभा भंग है, तो राज्यसभा की मंजूरी से यह तब तक मान्य होता है, जब तक कि नई लोकसभा की बैठक के 30 दिनों के भीतर इसे मंजूरी न मिल जाए।
अवधि
  • प्रारंभ में 6 महीने के लिए मान्य।
विस्तार 
  • प्रत्येक 6 माह में संसदीय अनुमोदन के साथ अधिकतम 3 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
  • 44वाँ संविधान संशोधन: 1 वर्ष से अधिक विस्तार तभी संभव है यदि:
    • पूरे भारत या उसके किसी हिस्से में राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो, और
    • निर्वाचन आयोग प्रमाणित करे कि राज्य में चुनाव कराना संभव नहीं है।
न्यायिक समीक्षा
  • अनुच्छेद-356 के तहत उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
  • न्यायालय जाँच कर सकते हैं कि क्या राष्ट्रपति की संतुष्टि दुर्भावनापूर्ण थी या अप्रासंगिक आधारों पर आधारित थी।
निरसन (वापसी)
  • राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय राष्ट्रपति शासन वापस लिया जा सकता है।
  • इसकी वापसी के लिए संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती।
प्रमुख वाद 
  • एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
    • अनुच्छेद-356 न्यायिक समीक्षा के अधीन है;
    • बहुमत का परीक्षण सामान्यतः सदन के पटल पर किया जाना चाहिए;
    • अनुच्छेद-356 का राजनीतिक दुरुपयोग असंवैधानिक है।
  • सर्बानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ (2005)
    • आंतरिक अशांति और बाह्य आक्रमण से राज्यों की रक्षा करने के लिए अनुच्छेद-355 के तहत संघ के कर्तव्य की पुष्टि की गई।
  • रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) 
    • फ्लोर टेस्ट का अवसर दिए बिना विधानसभा भंग करने की आलोचना की गई;
    • अनुच्छेद-356 के दुरुपयोग पर सीमाओं को सुदृढ़ किया गया।

राष्ट्रपति शासन के प्रभाव

राज्य की कार्यपालिका
  • मंत्री परिषद की बर्खास्तगी: राष्ट्रपति मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्री परिषद को बर्खास्त कर सकते हैं।
  • राष्ट्रपति की ओर से राज्य का प्रशासन राज्यपाल द्वारा मुख्य सचिव की सहायता से चलाया जाता है।
  • चूँकि राज्य की कार्यपालिका शक्ति संघ द्वारा ग्रहण कर ली जाती है, इसलिए इस स्थिति को सामान्यतः राज्य में ‘राष्ट्रपति शासन’ कहा जाता है।
राज्य की विधायी शक्तियाँ
  • विधानसभा का निलंबन या विघटन: राष्ट्रपति विधानसभा को या तो निलंबित (निलंबित अवस्था) कर सकते हैं अथवा उसे भंग कर सकते हैं।
  • संसद की शक्तियाँ और कार्य
    • अनुच्छेद-357 के तहत संसद राज्य के लिए विधायी शक्ति ग्रहण करती है।
    • संसद राज्य के लिए कानून बनाने की शक्ति राष्ट्रपति या उनके द्वारा निर्दिष्ट किसी अन्य अधिकारी को प्रत्यायोजित कर सकती है।
    • संसद (या प्रत्यायोजित अधिकारी) राज्य के संबंध में संघ सरकार और उसके अधिकारियों को शक्तियाँ और कर्तव्य प्रदान करने वाले कानून बना सकती है।
    • राज्य के विधेयक और बजट संसद द्वारा पारित किए जाते हैं।
    • राष्ट्रपति शासन के दौरान बनाए गए कानून शासन समाप्त होने के बाद भी प्रभावी रहते हैं, जब तक कि राज्य विधायिका उन्हें निरस्त या संशोधित न कर दे।
    • जब लोकसभा सत्र में न हो, तो राष्ट्रपति राज्य की संचित निधि से व्यय को अधिकृत कर सकते हैं (बाद में संसद की मंजूरी के अधीन)।
    • जब संसद सत्र में न हो, तो राष्ट्रपति राज्य के शासन के लिए अध्यादेश जारी कर सकते हैं।
राज्य की न्यायपालिका
  • उच्च न्यायालय की स्थिति: राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य उच्च न्यायालय की संवैधानिक स्थिति, दर्जा, शक्तियाँ और कार्य अपरिवर्तित रहते हैं।
  • राष्ट्रपति शासन न्यायपालिका की स्वतंत्रता या उसके अधिकार क्षेत्र को प्रभावित नहीं करता है।

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026–27 में पूँजीगत वस्तु क्षेत्र को भारत की निवेश-आधारित विकास रणनीति के एक मुख्य स्तंभ के रूप में पुनः विशेष महत्त्व दिया गया है।

पूँजीगत वस्तुएँ (Capital Goods)

  • अर्थ: पूँजीगत वस्तुओं में विनिर्माण, उत्पादन या सेवा-प्रदान के लिए आवश्यक संयंत्र, मशीनरी, उपकरण और सहायक सामग्री शामिल होती हैं, जिनमें प्रतिस्थापन, आधुनिकीकरण, तकनीकी उन्नयन और विस्तार के लिए प्रयुक्त उपकरण भी शामिल हैं।
  • क्षेत्रीय उपयोग: पूँजीगत वस्तुओं का उपयोग विनिर्माण, खनन, कृषि, अवसंरचना, ऊर्जा और सेवा क्षेत्रों में किया जाता है, जिससे यह क्षेत्र पूरी अर्थव्यवस्था के लिए आधारभूत बन जाता है।

औद्योगिक विकास में पूँजीगत वस्तुओं की भूमिका

  • गुणक प्रभाव
    • पूँजीगत वस्तु क्षेत्र में वृद्धि का उच्च अग्र और पश्च संबंध प्रभाव होता है, क्योंकि यह ऑटोमोबाइल, वस्त्र, विद्युत, सीमेंट, इस्पात और अवसंरचना जैसे उद्योगों को मशीनरी तथा उपकरणों की आपूर्ति करता है।
    • जब कंपनियाँ मशीनों और उपकरणों में निवेश करती हैं, तो इससे कच्चे माल (इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स), लॉजिस्टिक्स, रखरखाव सेवाओं तथा कुशल मानव संसाधन की द्वितीयक माँग उत्पन्न होती है।
  • उत्पादकता में वृद्धि
    • उन्नत मशीनरी, रोबोटिक्स और CNC उपकरणों को अपनाने से उत्पादन समय, अपव्यय और दोष दर में कमी आती है।
    • स्वचालन सटीकता, मानकीकरण और पैमाने में सुधार करता है, जिससे कंपनियाँ वैश्विक गुणवत्ता मानकों (ISO, BIS, निर्यात मानक) को पूरा कर पाती हैं।
  • प्रौद्योगिकीय उत्प्रेरक
    • पूँजीगत वस्तु क्षेत्र तकनीकी प्रसार का माध्यम बनता है, जो विभिन्न उद्योगों में नवाचार स्थानांतरित करता है।
    • यह उद्योग 4.0 की ओर संक्रमण को सक्षम बनाता है, जिसमें शामिल हैं: स्मार्ट फैक्ट्रियाँ, IoT सक्षम मशीनें, डेटा-आधारित पूर्वानुमानित रखरखाव।
    • स्वदेशी पूँजीगत वस्तु विकास घरेलू R&D पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करता है और आयातित स्वामित्व तकनीकों पर निर्भरता को कम करता है।
  • रोजगार सृजन
    • पूँजीगत वस्तु उद्योग कौशल-प्रधान हैं, जिससे निम्न के लिए माँग उत्पन्न होती है: अभियंता, टूल डिजाइनर, तकनीशियन, स्वचालन और मेकाट्रॉनिक्स विशेषज्ञ।
    • टूल रूम, मशीन टूल क्लस्टर और उपकरण विनिर्माण, MSME रोजगार, प्रशिक्षुता और कौशल भारत के अनुरूप तकनीकी प्रशिक्षण का समर्थन करते हैं।
  • रणनीतिक स्वतंत्रता
    • एक मजबूत घरेलू पूँजीगत वस्तु आधार उच्च-स्तरीय मशीनरी के आयात पर निर्भरता को कम करता है, विशेष रूप से कुछ आपूर्तिकर्ता देशों से।
    • यह निम्न के लिए आपूर्ति शृंखला लचीलापन बढ़ाता है: अवसंरचना परियोजनाएँ, रक्षा उत्पादन, ऊर्जा संक्रमण (नवीकरणीय ऊर्जा, EVs, बैटरियाँ)।
    • पूँजीगत वस्तुओं में रणनीतिक स्वायत्तता वैश्विक व्यवधानों, निर्यात नियंत्रण और मुद्रा अस्थिरता के प्रति जोखिम को कम करती है तथा दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करती है।

व्यापार और उत्पादन प्रवृत्तियाँ

  • IIP प्रवृत्तियाँ: औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के अंतर्गत पूँजीगत वस्तुओं में दिसंबर 2025 में 8.1% (वर्ष-दर-वर्ष) की वृद्धि हुई।
  • निर्यात: वित्त वर्ष 2024 में ₹31,621 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में ₹33,356 करोड़।
  • उत्पादन: वित्त वर्ष 2024 में ₹1,85,858 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में ₹2,05,194 करोड़।
  • आयात: वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में 6.6% और दूसरी तिमाही में 9.2% वृद्धि, जो मजबूत निवेश माँग और उन्नत मशीनरी पर निर्भरता को दर्शाती है।
  • सरकारी पूँजीगत व्यय में वृद्धि: वित्त वर्ष 2018 से वित्त वर्ष 2026 (BE) तक लगभग 4.2 गुना वृद्धि होकर ₹11.21 लाख करोड़।

केंद्रीय बजट 2026–27 में पूँजीगत वस्तुओं से संबंधित प्रमुख हस्तक्षेप

  • सार्वजनिक पूँजीगत व्यय: वित्त वर्ष 2027 में सार्वजनिक पूँजीगत व्यय लगभग 9% बढ़कर ₹12.2 लाख करोड़ प्रस्तावित।
  • हाई-टेक टूल रूम: CPSE द्वारा दो हाई-टेक टूल रूम की स्थापना का प्रस्ताव, जो डिजिटली सक्षम और स्वचालित सेवा केंद्र के रूप में डिजाइन, परीक्षण तथा सटीक विनिर्माण के लिए कार्य करेंगे।
  • निर्माण और अवसंरचना उपकरण संवर्द्धन (CIE) योजना: निर्माण और अवसंरचना उपकरण संवर्द्धन योजना का उद्देश्य लिफ्ट, अग्निशमन प्रणाली, टनल-बोरिंग मशीन और उच्च-ऊँचाई निर्माण उपकरण जैसे उन्नत उपकरणों के घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना है।
  • कंटेनर विनिर्माण: पाँच वर्षों में ₹10,000 करोड़ के परिव्यय के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी कंटेनर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए नई योजना।
  • कर प्रोत्साहन: बॉन्डेड जोन में कार्यरत टोल निर्माताओं को पूँजीगत वस्तुएँ, उपकरण या टूलिंग की आपूर्ति करने वाली अनिवासी संस्थाओं को पाँच वर्ष की आयकर छूट का प्रस्ताव।
  • शुल्क छूट
    • लीथियम-आयन सेल के निर्माण के लिए पूँजीगत वस्तुओं पर मूल सीमा शुल्क छूट को बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों तक बढ़ाया गया।
    • महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण के लिए आयातित पूँजीगत वस्तुओं को मूल सीमा शुल्क से मुक्त करने का प्रस्ताव।

पूँजीगत वस्तु क्षेत्र के लिए हालिया नीतिगत समर्थन

  • उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ: PLI योजनाएँ पैमाने, तकनीक अपनाने और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देती हैं, जिनसे ₹2 लाख करोड़ से अधिक का निवेश और ₹18.7 लाख करोड़ का अतिरिक्त उत्पादन हुआ है।
  • PLI–उन्नत रसायन सेल (ACC) योजना: 40 GWh क्षमता आवंटित, जिससे भारत के EVs पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती मिली।
  • प्रतिस्पर्द्धात्मकता संवर्द्धन योजना: चरण II के अंतर्गत उत्कृष्टता केंद्र, परीक्षण अवसंरचना और R&D सहयोग को ₹714 करोड़ की सरकारी सहायता।
    • विकसित तकनीकों को फ्राँस, बेल्जियम और कतर में बाजार प्राप्त हुआ, जो बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा को दर्शाता है।

संदर्भ

विमुक्त जनजातियों (DNTs), घुमंतू जनजातियों (NTs) और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों (SNTs) ने प्रस्तावित वर्ष 2027 की जातिगत जनगणना में संवैधानिक मान्यता और एक अलग जनगणना स्तंभ की माँग की है।

विमुक्त जनजातियों (DNTs), घुमंतू जनजातियों और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों की माँगें 

  • अलग जनगणना स्तंभ
    • मुख्य माँग: वर्ष 2027 की जातिगत जनगणना में विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों को एक अलग स्तंभ में विशिष्ट कोड के साथ शामिल करना।
    • तर्क: अलग गणना के बिना, इन समुदायों को आशंका है कि वे फिर से बड़े वर्गों में समाहित हो जाएँगे और उनकी पहचान समाप्त हो जाएगी।
    • जनगणना का महत्त्व: वर्ष 2027 की प्रक्रिया वर्ष 1931 के बाद भारत की पहली जातिगत जनगणना होगी, जिससे ऐतिहासिक त्रुटियों को सुधारने के लिए यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • संवैधानिक मान्यता
    • अलग अनुसूची: वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समान एक अलग संवैधानिक अनुसूची के माध्यम से मान्यता की माँग कर रहे हैं, ताकि लक्षित सुरक्षा उपायों को संस्थागत बनाया जा सके।
    • उद्देश्य: उनके विशिष्ट ऐतिहासिक अन्याय, अत्यधिक हाशियाकरण और निरंतर सामाजिक उपेक्षा को मान्यता देना।

मुख्य मुद्दे और समुदाय की चिंताएँ

  • स्तरीकृत पिछड़ापन: इनके नेता आंतरिक असमानताओं पर जोर देते हैं और स्थायी तथा घुमंतू DNTs समूहों के बीच अंतर करने हेतु उप-वर्गीकरण की माँग करते हैं।
  • निरंतर उपेक्षा: विमुक्ति के बावजूद, कई समुदायों को अब भी “आदतन अपराधी” शीर्षक के अंतर्गत सामाजिक उपेक्षा और पुलिस निगरानी का सामना करना पड़ता है।
  • दस्तावेजों की कमी: राज्यों द्वारा DNTs प्रमाण-पत्र जारी न किए जाने से ‘सीड (SEED) योजना’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच सीमित हुई है।
  • आँकड़ों की कमी: विश्वसनीय जनसंख्या संबंधी आँकड़ों के अभाव ने नीति-निर्माण के प्रयासों को कमजोर किया है, जिससे औपचारिक जनगणना की माँग और मजबूत हुई है।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ कौन हैं?

  • सबसे कमजोर समुदाय
    • जिन्हें “विमुक्त जातियाँ” भी कहा जाता है, ये समूह भारत की सबसे अधिक हाशिए पर स्थित और वंचित आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • औपनिवेशिक काल: विमुक्त जनजातियाँ वे समुदाय थे, जिन्हें वर्ष 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम से शुरू होकर ब्रिटिश कानूनों के तहत “जन्मजात अपराधी” घोषित किया गया था।
    • उन्हें निरंतर निगरानी, कठोर नियंत्रण और स्थायी सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ा।
  • स्वतंत्रता के बाद: इन औपनिवेशिक कानूनों को वर्ष 1952 में निरस्त कर दिया गया और सूचीबद्ध समुदायों को आधिकारिक रूप से “विमुक्त” किया गया।
    • समय के साथ, अधिकांश DNTs को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया, जबकि कई समुदाय अब भी अवर्गीकृत रहे।
  • घुमंतू जनजातियाँ: घुमंतू जनजातियाँ वे समूह हैं, जो पारंपरिक रूप से बिना स्थायी निवास के एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं और नमक के व्यापार, ज्योतिष, लोक कला तथा पशुपालन जैसे कार्यों से जीवनयापन करते हैं।
    • उदाहरण: गुर्जर, गाड़िया लोहार।
  • अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ: अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ वे समुदाय हैं, जो वर्ष के कुछ समय तक घूमते रहते हैं और विशेष अवधि, प्रायः वर्षा ऋतु में, स्थायी आवास में लौट आते हैं, जबकि शेष समय आजीविका की तलाश में प्रवास करते हैं।
    • उदाहरण: धनगर, लांबाडा।
  • सामान्य विशेषताएँ
    • भूमि स्वामित्व की कमी: ऐतिहासिक रूप से इन समुदायों के पास निजी भूमि या घर का स्वामित्व अल्प समय के लिए या बिल्कुल भी नहीं रहा है।
    • पहचान दस्तावेजों का अभाव तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण योजनाओं तक कम पहुँच।
    • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग वर्गीकरण से बाहर रहने के कारण कई समुदाय लक्षित लाभों से वंचित रहे।
  • जनसंख्या: वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 10.74 करोड़ लोग DNTs, NTs और SNTs समुदायों से संबंधित हैं।
  • संविधान कार्यप्रणाली समीक्षा राष्ट्रीय आयोग (2002) के निष्कर्ष: आयोग ने पाया कि DNTs को गलत रूप से अपराध-प्रवृत्ति वाला माना गया और उन्हें नियमित रूप से अधिकारियों तथा समाज द्वारा शोषण का सामना करना पड़ा।
  • मान्यता: विभिन्न समितियों की रिपोर्टें: स्वतंत्रता के बाद कई समितियों ने इनके मुद्दों को उजागर किया, जिनमें शामिल हैं:
    • आपराधिक जनजाति जाँच समिति (1947),
    • अनंतशयनम अय्यंगार समिति (1949) — जिसने आपराधिक जनजाति अधिनियम को निरस्त करने की सिफारिश की,
    • काका कालेलकर आयोग (1953),
    • मंडल आयोग (1980)।
  • रेनके आयोग (2008): इस आयोग ने बताया कि अधिकांश DNTs/NTs/SNTs समुदायों के पास बुनियादी पहचान दस्तावेज, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ और आजीविका सहायता का अभाव है।
  • इदाते आयोग: इदाते आयोग की स्थापना वर्ष 2014 में भिकू रामजी इदाते की अध्यक्षता में की गई। इसका उद्देश्य विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों की व्यापक राज्यव्यापी सूची तैयार करना था।
    • आयोग को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से बाहर रह गए समुदायों की पहचान कर उनके लिए उपयुक्त कल्याणकारी उपाय सुझाने का कार्य सौंपा गया।
    • इसने देशभर में 1200 से अधिक DNTs समुदायों की पहचान की।
    • लगभग 267 समुदायों को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में वर्गीकृत नहीं पाया गया।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए विकासात्मक प्रयास

  • डॉ. अंबेडकर पूर्व-मैट्रिक और उत्तर-मैट्रिक छात्रवृत्ति: यह केंद्रीय प्रायोजित योजना वर्ष 2014–15 में शुरू की गई थी। यह उन DNTs छात्रों को सहायता देती है, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल नहीं हैं।
  • नानाजी देशमुख छात्रावास योजना: वर्ष 2014–15 में शुरू की गई यह योजना DNTs बालक-बालिकाओं को छात्रावास सुविधा प्रदान करती है, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल नहीं हैं।
  • DNTs के आर्थिक सशक्तिकरण की योजना
    • यह पहल प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निःशुल्क कोचिंग, स्वास्थ्य बीमा, आवास सहायता और आजीविका समर्थन प्रदान करती है।
    • वर्ष 2021–22 से पाँच वर्षों में ₹200 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
    • इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी DNTs विकास एवं कल्याण बोर्ड की है।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों के लिए विकास एवं कल्याण बोर्ड

  • कानूनी स्थिति: यह सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत एक संस्था है।
  • स्थापना: इसका गठन 21 फरवरी, 2019 को किया गया। भिकू रामजी इदाते इसके अध्यक्ष थे।
  •  मुख्यालय: नई दिल्ली।
  • नोडल मंत्रालय: सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय।
  • संरचना
    • अध्यक्ष: भारत सरकार द्वारा नियुक्त।
    • सदस्य सचिव / मुख्य कार्यकारी अधिकारी: भारत सरकार में संयुक्त सचिव के स्तर का अधिकारी।
    • 3 पदेन सदस्य और 5 नामित सदस्य: भारत सरकार द्वारा नामित।

संदर्भ

लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक नई सहकर्मी-समीक्षित अध्ययन रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि वैश्विक सहायता में गिरावट से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्वास्थ्य परिणामों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

अध्ययन के बारे में

  • अध्ययनकर्ता: बार्सिलोना वैश्विक स्वास्थ्य संस्थान, रॉकफेलर फाउंडेशन के सहयोग से (RF कैटेलिटिक कैपिटल के माध्यम से)।
  • क्षेत्र: आधिकारिक विकास सहायता में कटौती के स्वास्थ्य परिणामों पर प्रभाव का आकलन।
  • उद्देश्य: वर्तमान और संभावित सहायता कटौती की मानवीय लागत का अनुमान लगाना तथा विकास उपलब्धियों के पलटने के जोखिम को उजागर करना।
  • कवरेज: अफ्रीका, एशिया (भारत सहित), लैटिन अमेरिका और यूरोप के निम्न एवं मध्यम आय वाले देश।
  • मुख्य क्षेत्र: बाल मृत्यु दर, मानव प्रतिरक्षा अपूर्णता विषाणु/एड्स, मलेरिया, पोषण तथा स्वास्थ्य प्रणाली की लचीलापन क्षमता।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष (लैंसेट ग्लोबल हेल्थ)

  • वर्ष 2030 तक वैश्विक सहायता में कटौती के कारण निम्न और मध्यम आय वाले देशों में 2 करोड़ 26 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।
  • 54 लाख पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मौतें होने का अनुमान है, जिससे बाल सुरक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति कम हो सकती है।
  • उप-सहारा अफ्रीका और एशिया सबसे अधिक जोखिम में हैं; एशिया की वृद्धिमान जनसंख्या मानवीय लागत को बढ़ाती है।
  • आधिकारिक विकास सहायता ने वर्ष 2002 से 2021 के दौरान बाल मृत्यु दर में 39 प्रतिशत की कमी की।
  • मानव प्रतिरक्षा अपूर्णता विषाणु/एड्स से होने वाली मौतों में 70 प्रतिशत की गिरावट, जबकि मलेरिया और पोषण की कमी से होने वाली मौतों में 56 प्रतिशत की कमी आई।
  • वर्ष 2018 के बाद पहली बार वर्ष 2024 में वैश्विक सहायता में गिरावट आई, जब प्रमुख दाताओं ने लगभग 30 वर्षों बाद योगदान कम किया।
  • सतत् और बुद्धिमत्तापूर्ण सहायता के बिना, वैश्विक स्वास्थ्य में दशकों की प्रगति पलट सकती है और स्वास्थ्य प्रणालियाँ कमजोर हो सकती हैं।

आधिकारिक विकास सहायता (ODA)

  • आधिकारिक विकास सहायता वह सरकारी सहायता है, जो आधिकारिक एजेंसियों द्वारा विकासशील देशों के आर्थिक विकास और कल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रदान की जाती है।
  • यह विदेशी सहायता को मापने का मानक और “स्वर्ण मानक” मानी जाती है।
  • इसे वर्ष 1969 में आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन की विकास सहायता समिति द्वारा स्थापित किया गया था।

आगे की राह

  • वैश्विक सहायता को बनाए रखना और संरक्षित करना: हालिया कटौतियों को वापस लेना तथा उच्च-प्रभाव वाले स्वास्थ्य हस्तक्षेपों (बाल स्वास्थ्य, मानव प्रतिरक्षा अपूर्णता विषाणु/एड्स, मलेरिया, पोषण) के लिए धन सुरक्षित करना।
  • देश-नेतृत्व वाले वित्तीय मॉडल: निम्न और मध्यम आय वाले देशों को प्राथमिकताएँ तय करने, घरेलू संसाधन जुटाने और दीर्घकालिक सहायता निर्भरता कम करने के लिए सशक्त बनाना।
  • बुनियादी ढाँचे में निवेश: प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, स्वास्थ्य कार्यबल, आपूर्ति शृंखला और रोग निगरानी प्रणालियों में निवेश करना।
  • सबसे कमजोर क्षेत्रों को प्राथमिकता: उप-सहारा अफ्रीका और अधिक जनसंख्या वाले एशियाई देशों पर विशेष ध्यान देना।
  • सहायता संबंधी दक्षता और जवाबदेही में सुधार: डेटा-आधारित आवंटन, परिणाम-आधारित वित्तपोषण और पारदर्शिता को बढ़ावा देना।
  • स्वास्थ्य को सतत् विकास लक्ष्यों से जोड़ना: पोषण, शिक्षा, जल-स्वच्छता एवं स्वच्छता, तथा जलवायु लचीलापन के साथ स्वास्थ्य सहायता का समन्वय करना।

संदर्भ

भारत ने “डिजिटल एक्सेस” की नीति से हटकर “डिजिटल वेलनेस” की नीति अपना ली है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने आधिकारिक तौर पर “डिजिटल लत” को भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश के लिए एक संरचनात्मक खतरे के रूप में वर्गीकृत किया है।

डिजिटल लत से संबंधित हाल की घटनाएँ और नीतिगत संकेत

  • गाजियाबाद की घटना (फरवरी 2026): तीन नाबालिग बहनों की दुखद मौत, जो कथित तौर पर “कोरियाई टास्क बेस्ड इंटरैक्टिव गेमिंग” के व्यसन में फँस गई थीं, डिजिटल अलगाव और मनोवैज्ञानिक जाल में फँसने के गंभीर और अपरिवर्तनीय जोखिमों को उजागर करती है।
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: यह दस्तावेज आधिकारिक तौर पर “डिजिटल व्यसन” को भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश के लिए एक संरचनात्मक खतरे के रूप में पहचानता है, जो राष्ट्रीय नीति में “डिजिटल पहुँच” से “डिजिटल कल्याण” की ओर एक ऐतिहासिक परिवर्तन का संकेत देता है।

डिजिटल लत क्या है?

  • परिभाषा: आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, डिजिटल लत से आशय स्मार्टफोन, गेमिंग प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया जैसे डिजिटल उपकरणों के साथ अनियंत्रित एवं अत्यधिक जुड़ाव से है।
    • बाध्यकारी जुड़ाव से तात्पर्य स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के साथ अत्यधिक जुड़ाव से है, जिसके परिणामस्वरूप नियंत्रण का नुकसान, मनोवैज्ञानिक तनाव तथा कार्यात्मक हानि होती है।
  • व्यवहारात्मक प्रकृति: इसे व्यवहारात्मक लत के रूप में मान्यता दी गई है, जिसमें नियंत्रण की कमी, मानसिक तनाव तथा कार्यात्मक क्षति देखी जाती है, न कि किसी पदार्थ पर निर्भरता।
  • वैश्विक मान्यता: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ऑनलाइन गेमिंग लत को ICD-11 में ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ के अंतर्गत एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति के रूप में मान्यता दी है। इसे गेमिंग पर नियंत्रण की कमी, अन्य गतिविधियों की तुलना में गेमिंग को प्राथमिकता देना तथा नकारात्मक परिणामों के बावजूद खेलना जारी रखना के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • युवा वर्ग: भारत के 85.5% घरों में कम-से-कम एक स्मार्टफोन होने और 15-29 आयु वर्ग के लोगों में इंटरनेट के लगभग सर्वव्यापी उपयोग को देखते हुए, युवा वर्ग इन व्यसनकारी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्रों का प्राथमिक लक्ष्य है।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ 

  • डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार: भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का योगदान वित्त वर्ष 2023 में राष्ट्रीय आय का 11.74% रहा और इसके वित्त वर्ष 2025 तक 13.42% तक पहुँचने का अनुमान है, जो बड़े पैमाने पर डिजिटल अपनाने को दर्शाता है।
  • कनेक्टिविटी में तीव्र वृद्धि: इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या वर्ष 2014 में 25.15 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2024 में 96.96 करोड़ हो गई है। यह वृद्धि देशव्यापी 5G सेवा का विस्तार और 2.18 लाख ग्राम पंचायतों तक भारतनेट कनेक्टिविटी के विस्तार से प्रेरित है।
  • लगभग सार्वभौमिक पहुँच: वर्ष 2025 में 85.5% भारतीय परिवारों के पास कम-से-कम एक स्मार्टफोन है, जो विभिन्न सामाजिक वर्गों में डिजिटल पहुँच की व्यापकता को दर्शाता है।
  • उच्च तीव्रता वाले उपयोग पैटर्न: वर्ष 2024 में 48% उपयोगकर्ताओं ने ऑनलाइन वीडियोज, 43% ने सोशल मीडिया का उपयोग किया, 40% ने ईमेल और ऑनलाइन संगीत का उपयोग किया तथा 26% ने डिजिटल भुगतान सेवाओं का प्रयोग किया।
  • बड़ा उपयोगकर्ता आधार: ये उपयोग हिस्सेदारी लगभग 40 करोड़ ओटीटी उपयोगकर्ताओं और लगभग 35 करोड़ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं में परिवर्तित होती है, जिससे डिजिटल जोखिमों का दायरा और तीव्र होता है।
  • युवा वर्ग का प्रभुत्व: 15–29 वर्ष आयु वर्ग में इंटरनेट और स्मार्टफोन का उपयोग लगभग सार्वभौमिक है, जिससे युवा वर्ग डिजिटल लत से जुड़ी चिंताओं के केंद्र में है।

डिजिटल लत के प्रमुख कारण 

  • आसान उपलब्धता: स्मार्टफोन, सस्ता डेटा और 24×7 इंटरनेट की उपलब्धता के कारण डिजिटल सहभागिता निरंतर और लगभग अपरिहार्य हो गई है, जिससे डिजिटल लत में वृद्धि हो रही है।
    • उदाहरण: TRAI के आँकड़ों (2024-25) के अनुसार, भारत में इंटरनेट ग्राहकों की संख्या 900 करोड़ से अधिक हो गई है। कम लागत वाले डेटा, स्मार्टफोन और डिजिटल इंडिया ने निरंतर ऑनलाइन उपस्थिति को संभव बनाया है, जिससे स्क्रीन पर निर्भरता बढ़ रही है।
  • एल्गोरिदम-आधारित संबद्धता: ऑटो-प्ले फीचर्स, इनफिनिट स्क्रॉलिंग, शॉर्ट-वीडियो लूप और पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन, दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम का लाभ उठाकर लोगों को लगातार उपयोग करने के लिए बढ़ावा देते हैं।
    • उदाहरण: संसदीय सूचना प्रौद्योगिकी स्थायी समिति (2023) ने ऑटो-प्ले, अनंत स्क्रॉलिंग और वैयक्तिकृत फीड वाले लघु वीडियो प्लेटफॉर्मों को विशेष रूप से बच्चों में व्यसनकारी उपभोग को बढ़ावा देने वाला बताया।
  • सामाजिक मान्यता और तुलना: लाइक, शेयर, फॉलोअर्स की संख्या और ऑनलाइन स्वीकृति बार-बार जाँचने की प्रवृत्ति और चिंता को जन्म देती है, विशेष रूप से किशोरों और युवा वयस्कों में।
    • उदाहरण: NCERT और शिक्षा मंत्रालय की सलाह (2024-25) में किशोरों में लाइक, शेयर और फॉलोअर की संख्या से जुड़े बढ़ते तनाव, ध्यान संबंधी विकारों और आत्मसम्मान संबंधी समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है।
  • कुछ छूट जाने का भय (FoMO): अपडेट, सामाजिक संपर्क या ट्रेंड छूट जाने की आशंका से उपयोगकर्ताओं में चिंता बढ़ती है, जिससे वे बार-बार डिजिटल प्लेटफॉर्म जाँचने लगते हैं।
    • उदाहरण: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में यह स्वीकार किया गया कि FoMO से प्रेरित बार-बार जाँच करने की आदत युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य, उत्पादकता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है।
  • शैक्षणिक और सामाजिक दबाव: शैक्षणिक प्रतिस्पर्द्धा का सामना कर रहे छात्र डिजिटल प्लेटफॉर्म को तनाव से निपटने के साधन के रूप में अपनाते हैं, जो अक्सर अनियंत्रित उपयोग में बदल जाता है।
    • उदाहरण: शिक्षा मंत्रालय की (कोविड-19 के बाद की) रिपोर्टों से पता चलता है कि शैक्षणिक प्रतिस्पर्द्धा और रोजगार की अनिश्चितता के बीच छात्र तनाव से निपटने के लिए गेमिंग एवं सोशल मीडिया का तेजी से उपयोग कर रहे हैं।
  • रियल-मनी गेमिंग और ऑनलाइन जुआ: दाँव आधारित प्लेटफॉर्म और कौशल-आधारित गेमिंग के मुद्रीकरण तक आसान पहुँच से लत, ऋण और मानसिक तनाव का जोखिम बढ़ता है।
    • उदाहरण: तमिलनाडु ऑनलाइन गेमिंग विनियमन अधिनियम, 2023 जैसे कानून, वास्तविक धन वाले गेमिंग से जुड़े वित्तीय संकट और आत्महत्याओं के मामलों के बाद आए, जिससे विनियमन और संघवाद पर बहस छिड़ गई।
  • महामारी-जनित व्यावहारिक परिवर्तन: COVID-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संपर्क पर निर्भरता बढ़ी, जिससे अत्यधिक स्क्रीन-समय की आदतें सुदृढ़ हुईं और स्क्रीन-निर्भरता का सामान्यीकरण हुआ।
    • उदाहरण: कोविड-19 महामारी ने ऑनलाइन शिक्षा, ओटीटी प्लेटफॉर्म और डिजिटल सामाजिक संपर्क के माध्यम से अत्यधिक स्क्रीन-टाइम को और भी मजबूत कर दिया, जिसके दीर्घकालिक प्रभावों को टेली-मानस मानसिक स्वास्थ्य ढाँचे के तहत मान्यता दी गई है।

डिजिटल लत के बहुआयामी प्रभाव

  • संज्ञानात्मक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: डिजिटल व्यसन चिंता, अवसाद, ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर), नींद संबंधी विकार और कम आत्मसम्मान से जुड़ा है।
    • उदाहरण: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और शिक्षा मंत्रालय की मानसिक स्वास्थ्य सलाहों में छात्रों में स्क्रीन-प्रेरित चिंता, नींद की कमी और ध्यान संबंधी विकारों में वृद्धि देखी गई।
  • शैक्षिक और उत्पादकता हानि: स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग ध्यान भंग, एकाग्रता में कमी और सीखने में हानि का कारण बनता है, जिससे शैक्षणिक परिणाम और कार्यस्थल की दक्षता प्रभावित होती है।
    • उदाहरण: ASER 2024 ने मूलभूत शिक्षा और ध्यान अवधि में गिरावट की सूचना दी, जिससे डिजिटल युग में अनुच्छेद-21A के तहत शिक्षा के अधिकार के कमजोर होने पर चिंताएँ बढ़ गईं।
  • सामाजिक पूँजी का क्षरण: अनिवार्य डिजिटल जुड़ाव आमने-सामने की बातचीत, सामुदायिक भागीदारी और पारस्परिक कौशल को कमजोर करता है, जिससे उच्च कनेक्टिविटी के बावजूद अकेलेपन की स्थिति उत्पन्न होती है।
    • उदाहरण: ASER 2024 ने इस बात पर प्रकाश डाला कि सोशल मीडिया का उपयोग बढ़ रहा है, लेकिन बच्चों के बीच सार्थक ऑफलाइन सहकर्मी संपर्क अब तक के सबसे निचले स्तर पर है।
  • आर्थिक और वित्तीय लागतें: डिजिटल लत ऑनलाइन खर्च, गेमिंग और साइबर धोखाधड़ी के माध्यम से प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान का कारण बनती है, और रोजगार क्षमता, उत्पादकता और कौशल विकास में कमी के माध्यम से दीर्घकालिक लागतें भी उत्पन्न करती है।
    • उदाहरण: वास्तविक धन वाले गेमिंग नियमों और विकसित भारत लक्ष्य से संबंधित नीतिगत चर्चाओं में डिजिटल लत को मानव पूँजी की गुणवत्ता और दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए एक खतरे के रूप में तेजी से मान्यता दी जा रही है।

भारत में नियामक परिदृश्य

  • इस नियमन का उद्देश्य: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर गलत सूचना, घृणास्पद भाषण और अन्य हानिकारक सामग्री को नियंत्रित करने की आवश्यकता के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) के बीच संतुलन स्थापित करना।
    • हालांकि, संभावित सेंसरशिप और निगरानी को लेकर भी चिंताएँ जताई गई हैं।
  • संवैधानिक आधार और मानव पूँजी
    • संवैधानिक संतुलन और आनुपातिकता का सिद्धांत: यद्यपि अनुच्छेद-19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है, लेकिन यह पूर्ण नहीं है।
      • आनुपातिकता के सिद्धांत के तहत, राज्य नाबालिगों की सुरक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगा सकता है।
      • न्यायपालिका ने लगातार यह माना है कि बच्चे एक संवेदनशील वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो उनकी सुरक्षा के लिए राज्य के हस्तक्षेप को उचित ठहराता है, भले ही ऐसे उपायों से वयस्कों की डिजिटल स्वतंत्रता पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़े।
    • गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार (अनुच्छेद-21): भारतीय न्यायशास्त्र मानसिक स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार के एक मूलभूत घटक के रूप में तेजी से मान्यता दे रहा है।
      • परिणामस्वरूप, व्यापक डिजिटल व्यसन को अब केवल एक व्यक्तिगत आदत के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देखा जाता है, जिसका समाधान करना राज्य का दायित्व है।
    • शैक्षिक अखंडता (अनुच्छेद-21A): ध्यान विखंडन और स्क्रीन पर निर्भरता के कारण शिक्षा के अधिकार को खतरे में माना जा रहा है।
      • डिजिटल माध्यमों का अत्यधिक उपयोग सीखने में होने वाली हानि और संज्ञानात्मक विकास में बाधा का एक प्रमुख कारण माना जाता है, जिसके चलते सरकार को छात्रों तक डिजिटल सामग्री की पहुँच को विनियमित करना आवश्यक हो गया है।
    • जनसांख्यिकीय लाभांश की सुरक्षा: अनियमित डिजिटल वातावरण, व्यसनकारी प्लेटफॉर्म डिजाइनों के माध्यम से उत्पादकता और समग्र श्रम बल भागीदारी को कम करके, इस जनसांख्यिकीय लाभांश को जनसांख्यिकीय दायित्व में परिवर्तित करने का जोखिम उत्पन्न करता है।
  • प्रमुख विधायी और नियामक ढाँचे
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000: यह देश में इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन, डिजिटल हस्ताक्षर और साइबर अपराधों से संबंधित सभी मामलों के लिए मूलभूत प्राथमिक कानून के रूप में कार्य करता है और कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
    • IT (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021: ये नियम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को उचित सावधानी बरतने के लिए बाध्य करते हैं।
    • मुख्य निर्देशों में शामिल हैं
      • उपयोगकर्ता शिकायतों के निवारण के लिए शिकायत अधिकारी नियुक्त करना।
      • अवैध या आपत्तिजनक हानिकारक सामग्री को हटाना।
      • स्रोत का पता लगाना: संदेश के मूल प्रेषक की पहचान करना (गोपनीयता से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा)।
      • पारदर्शिता रिपोर्ट: मॉडरेशन संबंधी कार्रवाइयों के बारे में सरकार को समय-समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
    • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023: यह अधिनियम कम आयु के उपयोगकर्ताओं के लिए कड़े सुरक्षा उपाय लागू करता है।
      • विशेष रूप से, धारा 9 बच्चों के डेटा के प्रसंस्करण के लिए माता-पिता की सत्यापित सहमति को अनिवार्य बनाती है और नाबालिगों को लक्षित करके व्यवहार ट्रैकिंग या विज्ञापन पर सख्ती से रोक लगाती है।
    • ऑनलाइन गेमिंग (विनियमन) अधिनियम, 2025: सोशल मीडिया और गेमिंग के अंतर्संबंध को संबोधित करते हुए, यह ऐतिहासिक कानून वित्तीय बर्बादी को रोकने के लिए सट्टेबाजी पर आधारित ऑनलाइन मनी गेम्स पर प्रतिबंध लगाता है।
      • यह अनुमत कौशल-आधारित खेलों के लिए एक लाइसेंसिंग व्यवस्था स्थापित करता है और साथ ही इन खेलों के विज्ञापन के संबंध में सख्त नियम लागू करता है।
  • संस्थागत निगरानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल
    • संबंधित प्राधिकारी: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) डिजिटल नीति का प्रमुख सूत्रधार है, जबकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) बाल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता सुनिश्चित करता है।
      • तकनीकी प्रवर्तन का कार्य कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In) (घटना प्रतिक्रिया) और साइबर अपराध जाँच प्रकोष्ठ द्वारा किया जाता है, जो डिजिटल अपराधों के अभियोजन का कार्य सँभालता है।
    • मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना: प्रौद्योगिकी के शारीरिक प्रभावों से निपटने के लिए, सरकार ने टेली-मानस नामक 24/7 टोल-फ्री मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन (14416) शुरू की है, जिसने लाखों नागरिकों को परामर्श प्रदान किया है।
      • नैदानिक ​​मामलों के लिए, NIMHANS स्थित SHUT क्लिनिक प्रौद्योगिकी उपयोग विकारों के लिए विशेष चिकित्सा सहायता प्रदान करता है।
    • शिक्षा में डिजिटल स्वच्छता: प्रज्ञाता ढाँचा और विशिष्ट CBSE दिशा-निर्देश लागू किए गए हैं ताकि स्क्रीन-टाइम सीमा और सुरक्षित इंटरनेट उपयोग को सीधे विद्यालय के वातावरण में एकीकृत किया जा सके, यह सुनिश्चित करते हुए कि डिजिटल शिक्षा छात्रों के स्वास्थ्य की कीमत पर न हो।
    • राज्य स्तरीय सहायता: कर्नाटक का ‘डिजिटल डिटॉक्स सेंटर – बियॉन्ड स्क्रीन्स’ जैसी नवोन्मेषी पहलें व्यक्तियों को गंभीर डिजिटल लत से उबरने और अपने ऑफलाइन जीवन को पुनः प्राप्त करने के लिए भौतिक स्थान प्रदान करती हैं।

वैश्विक नियामक रणनीतियाँ

  • कानूनी आयु प्रतिबंध और पहुँच नियंत्रण: ये देश नाबालिगों को संभावित रूप से व्यसनकारी प्लेटफॉर्मों तक पहुँचने से रोकने के लिए कठोर कानूनी सीमाएँ लागू करते हैं।
    • ऑस्ट्रेलिया: ऑनलाइन सुरक्षा संशोधन (2024) के साथ बैन मूवमेंट” का नेतृत्व कर रहा है, जिसके तहत न्यूनतम आयु 16 वर्ष अनिवार्य है।
      • यह प्लेटफॉर्मों पर वैधानिक देखभाल का दायित्व डालता है, जिसका अर्थ है कि यदि कंपनियाँ (माता-पिता नहीं) नाबालिगों को ब्लॉक करने में विफल रहती हैं तो उन पर जुर्माना लगाया जा सकता है।
    • डेनमार्क: वर्ष 2025 में राष्ट्रीय आयु सीमा 15 वर्ष लागू की गई। यह 13-14 वर्ष के बच्चों के लिए माता-पिता की सहमति की अनुमति देता है, लेकिन अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए MitID (नेशनल eID) और एक समर्पित आयु सत्यापन ऐप का उपयोग करता है।
    • चीन: दुनिया का सबसे सख्त “नाबालिग सुरक्षा मोड” लागू करता है। वास्तविक नाम प्रमाणीकरण के माध्यम से पहुँच प्रतिबंधित है, सप्ताहांत/छुट्टियों पर गेमिंग को एक घंटे (रात 8-9 बजे) तक सीमित करता है और इन-गेम खरीदारी पर सख्त खर्च सीमा लागू करता है।
  • सुरक्षा और लचीलापन: ये रणनीतियाँ उपयोगकर्ताओं को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के बजाय प्लेटफॉर्म के कामकाज में परिवर्तन लाने पर केंद्रित हैं।
    • यूनाइटेड किंगडम: आयु-उपयुक्त डिजाइन कोड यह सुनिश्चित करता है कि गोपनीयता और सुरक्षा डिफॉल्ट सेटिंग्स हों। प्लेटफॉर्म को बच्चों को ऑनलाइन बनाए रखने के लिए प्रलोभन तकनीकों (जैसे अनंत स्क्रॉल या भ्रामक सूचनाएँ) का उपयोग करने से प्रतिबंधित किया गया है।
    • सिंगापुर: समुदाय-नेतृत्व वाले मॉडल को प्राथमिकता देता है। मीडिया साक्षरता परिषद के माध्यम से, यह साइबर वेलनेस को स्कूल पाठ्यक्रम में एकीकृत करता है, जिसमें प्रतिबंधात्मक कानून के बजाय जिम्मेदार डिजिटल नागरिकता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • नैदानिक ​​सहायता एवं शारीरिक प्रतिबंध: डिजिटल उपकरणों के उपयोग से उत्पन्न मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणामों और वास्तविक जीवन में होने वाले व्यवधानों का समाधान करना।
    • दक्षिण कोरिया: “सिंड्रेला कानून” (रात के समय प्रतिबंध) से हटकर एक उपचारात्मक मॉडल अपना रहा है। “आई विल सेंटर” प्रौद्योगिकी के उपयोग से संबंधित विकारों से पीड़ित युवाओं के लिए विशेष व्यसन मुक्ति और परामर्श सेवाएँ प्रदान करते हैं।
    • स्मार्टफोन पर प्रतिबंध: फ्राँस, स्पेन, फिनलैंड और जापान ने ध्यान भंग और साइबरबुलिंग को रोकने के लिए स्कूल के समय के दौरान स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाकर राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल स्तर के प्रतिबंध लागू किए हैं।

PWOnlyIAS विशेष

सोशल मीडिया तथा उसका उपयोग 

  • सोशल मीडिया के बारे में: यह एक प्रकार की डिजिटल तकनीक को संदर्भित करता है, जो वर्चुअल नेटवर्क और समुदायों के माध्यम से अपने उपयोगकर्ताओं के बीच पाठ (टेक्स्ट), ऑडियो और दृश्य (विजुअल) स्वरूपों में विचारों तथा सूचनाओं के साझा करने एवं आपसी सहभागिता (एंगेजमेंट) को सुगम बनाती है।
    • उदाहरण : फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व में ट्विटर), यूट्यूब, व्हाट्सऐप और लिंक्डइन कुछ प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म/कंपनियाँ हैं।
  • उपयोगकर्ता: दुनिया भर में सोशल मीडिया के 5 अरब से अधिक सक्रिय उपयोगकर्ता हैं, जो विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 62% हैं।
  • भारतीय उपयोगकर्ता: वर्ष 2022 में LocalCircles द्वारा 9–17 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के दैनिक इंटरनेट उपयोग (सोशल मीडिया, वीडियो/OTT और ऑनलाइन गेमिंग से संबंधित) पर किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार,
    • 61% शहरी भारतीय बच्चे प्रतिदिन औसतन 3 घंटे या उससे अधिक समय इंटरनेट पर बिताते हैं। इनमें से 46% बच्चे 3–6 घंटे और 15% बच्चे 6 घंटे से अधिक समय इंटरनेट का उपयोग करते हैं।
    • 39% बच्चे प्रतिदिन 1–3 घंटे तक डिजिटल उपकरणों का उपयोग करते हैं।
    • वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (ASER) के अनुसार, 90% से अधिक किशोर सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं।

प्रतिबंध” पर बहस — पूर्ण प्रतिबंध बनाम स्मार्ट विनियमन: ऑस्ट्रेलिया के ऑनलाइन सुरक्षा संशोधन (2024) के बाद, भारत में नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध को लेकर एक ध्रुवीकृत बहस देखने को मिल रही है।

  • विधायी पहल: एक निजी सदस्य विधेयक (सोशल मीडिया आयु प्रतिबंध एवं ऑनलाइन सुरक्षा विधेयक, 2026) संसद में प्रस्तावित किया गया है, जिसमें 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया खाते पर पूर्ण प्रतिबंध की माँग की गई है। नियमों का पालन न करने वाले मंचों पर 250 करोड़ रुपये तक के दंड का प्रावधान रखा गया है।
  • राज्य-स्तरीय पहल: आंध्र प्रदेश और गोवा की सरकारें आयु-आधारित राज्यव्यापी प्रतिबंध लागू करने हेतु कानूनी ढाँचे का सक्रिय रूप से अध्ययन कर रही हैं। इसका आधार एल्गोरिदमिक सुरक्षा में भरोसे की कमी बताया गया है।
  • न्यायिक संदेह: इसके विपरीत, सर्वोच्च न्यायालय ने (नवंबर 2025) पहले पूर्ण प्रतिबंधों के प्रति सावधानी बरतते हुए उन्हें अव्यावहारिक और संभावित रूप से असंवैधानिक बताया था। न्यायालय ने पूर्ण बहिष्कार के बजाय आयु-सत्यापन और सुरक्षा-केंद्रित डिज़ाइन को प्राथमिकता देने का समर्थन किया।
  • साइबर बुलिंग: छोटे बच्चे, विशेषकर लड़कियाँ, साइबर बुलिंग का सबसे आसान लक्ष्य बनती हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस समस्या को बढ़ाने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं।
    • उदाहरण: चीनी ऐप टिकटॉक अक्सर खबरों में रहता है, जहाँ कम आयु की लड़कियों को साइबर बुलिंग का सामना करना पड़ता है।
  • अश्लील सामग्री: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर बच्चों का अश्लील सामग्री से सामना हो सकता है, जो उनके संवेदनशील और विकसित हो रहे मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डालता है तथा इसकी लत लगने का जोखिम भी रहता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2022 में भारत में बाल अश्लीलता से जुड़े एक हजार से अधिक मामले दर्ज किए गए, जिनमें कर्नाटक में सबसे अधिक मामले सामने आए।
  • लत और फीडबैक चक्र में फँसने का खतरा: सोशल मीडिया को उपयोगकर्ताओं का ध्यान आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है। यह बच्चों के लिए विशेष रूप से जोखिमपूर्ण है, क्योंकि वे आसानी से डोपामाइन-आधारित फीडबैक चक्रों में फँसकर इसके आदी हो सकते हैं।
  • मानसिक अस्थिरता: ऑनलाइन उपस्थिति में निरंतर वृद्धि बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है। यह उन्हें सामाजिक संपर्क से अलग-थलग करती है, जिससे उनकी सामाजीकरण क्षमता प्रभावित होती है और आगे चलकर उनकी मानसिक शांति और स्थिरता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
    • प्रोफेसर जोनाथन हैड्ट द्वारा लिखित मनोविज्ञान की पुस्तक ‘द एन्क्शस जेनरेशन: कैसे बचपन के व्यापक डिजिटल पुनर्संयोजन से मानसिक रोगों की महामारी उत्पन्न हो रही है’ युवाओं के कमजोर मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण के कारणों को स्मार्टफोन तथा सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग से सीधे तौर पर जोड़ती है।
  • हिंसा: सोशल मीडिया पर यौन शोषण, बदमाशी, अपशब्द, सॉफ्ट पोर्न, घृणास्पद भाषण आदि जैसी हिंसक सामग्री के संपर्क में आने वाले बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति विकसित हो सकती है।
    • उदाहरण: मुंबई स्थित एसोसिएशन ऑफ एडोलसेंट एंड चाइल्ड केयर इन इंडिया (AACCI) ने मुंबई और गुड़गाँव के स्कूलों का सर्वेक्षण किया और पाया कि आक्रामकता बढ़ रही है।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: सोशल मीडिया की लत ADHD (अटेंशन डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर), आक्रामकता, स्मृति संबंधी समस्याएँ, सिरदर्द, आँखों और पीठ में तकलीफ, तनाव, संवाद करने में कठिनाई, सुस्ती और यहाँ तक ​​कि अवसाद के रूप में प्रकट हो सकती है।
    • सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बच्चों के नींद के पैटर्न पर असर पड़ता है।
  • गलत सूचना का शिकार होना: सोशल मीडिया गलत सूचनाओं का प्लेटफार्म है।
    • बच्चों को दुष्प्रचार के माध्यम से आसानी से गुमराह किया जा सकता है।
    • यूनिसेफ के एक अध्ययन के अनुसार, केवल 2% बच्चों और युवाओं में ही समाचार की सच्चाई या झूठ का आकलन करने के लिए आवश्यक महत्त्वपूर्ण साक्षरता कौशल मौजूद हैं।

सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध के विरुद्ध तर्क

  • लागू करने में चुनौतियाँ: डिजिटल वातावरण में प्रतिबंधों को लागू करना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि बच्चे आसानी से इन बाधाओं को पार कर सकते हैं।
    • उदाहरण: दक्षिण कोरिया द्वारा सिंड्रेला कानून पारित करने के बाद, जिसमें आधी रात से सुबह 6 बजे तक गेमिंग पर प्रतिबंध लगाया गया था, गेमिंग प्लेटफॉर्म तक पहुँचने के लिए बच्चों द्वारा पहचान की चोरी में वृद्धि हुई।
  • साझा डिवाइस का उपयोग: भारत में, डिजिटल साक्षरता का स्तर काफी कम होने के कारण, बच्चे अपने माता-पिता को इंटरनेट चलाने में सहायता करते हैं, इसलिए माता-पिता से बच्चों को सुरक्षित ऑनलाइन उपयोग के बारे में मार्गदर्शन करने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।
    • उदाहरण: दिल्ली के टियर-II और टियर-III शहरों और सरकारी स्कूलों में 10,000 बच्चों के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 80% बच्चे अपने माता-पिता को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म चलाने में मदद करते हैं।
  • डिजिटल साक्षरता का निम्न स्तर: पहचान-पत्र आधारित सत्यापन जैसी आयु सत्यापन तकनीकों का उपयोग कम साक्षर लोगों के लिए कठिन होगा।
    • उदाहरण: NSSO (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) के आँकड़ों के अनुसार, केवल 40% भारतीय ही कंप्यूटर पर फाइलें कॉपी या स्थानांतरित करना जानते थे (2021)।
  • जिम्मेदारी से बचना: पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से प्रौद्योगिकी कंपनियाँ जिम्मेदारी लेने से हतोत्साहित होंगी और बाल सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए प्लेटफॉर्म डिजाइन करने की उनकी अनिवार्यता कम हो जाएगी।
  • सकारात्मक डिजिटल सहभागिता का निषेध: सोशल मीडिया अपने व्यापक संसाधनों के साथ बच्चों को आलोचनात्मक रूप से सोचने और समान रुचियों वाले लोगों से जुड़ने में मदद कर सकता है, जिससे भविष्य के लिए महत्त्वपूर्ण सामाजीकरण और संचार कौशल का विकास होता है।
    • उदाहरण: ग्रेटा थुनबर्ग जैसी जलवायु कार्यकर्ताओं ने अपने संदेश का प्रचार करने और समान विचारधारा वाले बच्चों का समुदाय बनाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया।
  • एक शिक्षण उपकरण: डिजिटल युग और सोशल मीडिया ने बच्चों और युवाओं के लिए संवाद करने, सीखने, सामाजिक मेलजोल बढ़ाने और खेलने के अभूतपूर्व अवसर पैदा किए हैं, जिससे वे नए विचारों और सूचना के अधिक विविध स्रोतों से परिचित हो रहे हैं।

शासन और कार्यान्वयन में चुनौतियाँ

  • नियामक विखंडन: अधिकार क्षेत्र MeitY (तकनीकी), MWCD (बाल कल्याण) और स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच बँटा हुआ है।
    • भारत में एक विशिष्ट डिजिटल बाल सुरक्षा नियामक का अभाव है, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर प्रवर्तन में असंगति बनी रहती है।
  • पारदर्शिता की कमी: एक प्रमुख बाधा स्वतंत्र एल्गोरिदम ऑडिट का अभाव है।
    • इनके बिना, नियामक यह सत्यापित नहीं कर सकते कि प्लेटफार्म “डार्क पैटर्न” का उपयोग कर रहे हैं या नहीं, ये ऐसी डिजाइन विशेषताएँ हैं, जो नाबालिगों में डोपामाइन-प्रेरित सहभागिता को अधिकतम करने के लिए बनाई गई हैं।
  • सुबूत और डेटा की कमी: जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में उल्लेख किया गया है, भारत में एक राष्ट्रीय डिजिटल व्यवहार निगरानी ढाँचा नहीं है।
  • प्रवर्तन विरोधाभास: कठोर आयु सीमा लागू करने से अक्सर “प्रवर्तन विरोधाभास” उत्पन्न होता है।
    • अत्यधिक दंडात्मक प्रतिबंध अक्सर नाबालिगों को VPN या पहचान की चोरी की ओर बढ़ावा देते हैं, जिससे वे सुरक्षा निगरानीकर्ताओं की नजरों से बचते हुए सुरक्षा उपायों को दरकिनार कर पाते हैं।

आगे की राह

  • संस्थागत एवं नियामक स्तर
    • सुरक्षा को डिजाइन में ही शामिल करना: कानून को केवल सामग्री हटाने तक सीमित न रहकर, प्लेटफॉर्म के मूल सिद्धांतों में सुरक्षा को अंतर्निहित करना अनिवार्य बनाना होगा।
      • इसमें डिफॉल्ट गोपनीयता और 18 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्ताओं के लिए ऑटो-प्ले और उत्तेजक सूचनाओं को अक्षम करना शामिल है।
    • डिजिटल कोड नियम, 2026 का मसौदा: सभी डिजिटल सामग्री के लिए अनिवार्य आयु-आधारित वर्गीकरण (U, 7+, 13+, 16+, A) लागू करने का प्रस्ताव है, जिससे OTT और सोशल मीडिया पर सुरक्षा मानकीकृत हो सके।
  • नैदानिक ​​एवं सामुदायिक सहायता
    • प्रारंभिक चेतावनी संस्थान: NEP 2020 के तहत, स्कूलों को डिजिटल समस्याओं के शुरुआती लक्षणों, जैसे- नींद की कमी और सामाजिक अलगाव, की पहचान करने के केंद्रों के रूप में पुनर्परिभाषित किया जा रहा है।
    • टेली-मानस का विस्तार: सरकार का लक्ष्य 24/7 टेली-मानस नेटवर्क में विशेष डिजिटल व्यसन परामर्श को एकीकृत करना और राज्य स्तर पर एनआईएमएनएस शट क्लिनिक मॉडल को दोहराना है।
  • परिवार और व्यक्तिगत सशक्तीकरण
    • माता-पिता की क्षमता निर्माण: आंगन-गृहों के माध्यम से माता-पिता को “शेयरेंटिंग” (बच्चे के जीवन की अत्यधिक ऑनलाइन जानकारी साझा करना) से निपटने और अचानक डिवाइस जब्त करने के बजाय सहयोगात्मक नियंत्रण उपकरणों का उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित करना।
    • डिजिटल स्वास्थ्य पाठ्यक्रम: “पहुँच प्रतिबंधित करने” के बजाय “साक्षरता बढ़ाने” पर ध्यान केंद्रित करना, बच्चों को एल्गोरिदम हेर-फेर को पहचानने की शिक्षा देना।

निष्कर्ष

वर्ष 2026 की गाजियाबाद त्रासदी इस बात को रेखांकित करती है कि डिजिटल सुरक्षा एक संवैधानिक आवश्यकता है, न कि नीतिगत विकल्प। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में एल्गोरिथम के दुरुपयोग से युवाओं की सुरक्षा को भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को संरक्षित करने के लिए आवश्यक बताया गया है और प्रतिबंधों से हटकर सुरक्षा-आधारित शासन की ओर बढ़ने का आह्वान किया गया है।

To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.


Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.