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Feb 07 2026

क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्ट्रियल (Critical Minerals Ministerial)

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वाशिंगटन डी.सी. में ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्ट्रियल’ के उद्घाटन समारोह में भागीदारी की।

  • यह एक उच्च-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय मंच है, जो वैश्विक रूप से महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित, विविध और स्थिर करने के लिए नीतियों के समन्वय हेतु मंत्रियों तथा वरिष्ठ अधिकारियों को एक साथ लाता है।
  • मेजबान राष्ट्र: संयुक्त राज्य अमेरिका, वाशिंगटन डी.सी.।
  • मुख्य उद्देश्य
    • कुछ देशों पर अत्यधिक निर्भरता कम करके आपूर्ति शृंखलाओं के जोखिम को कम करना।
    • खनन, प्रसंस्करण और शोधन में विविधीकरण को बढ़ावा देना।
    • विश्वसनीय भागीदारों के मध्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना
    • खनिज आपूर्ति की सामर्थ्य, स्थिरता और लचीलापन सुनिश्चित करना।

महत्त्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स) के बारे में

  • अर्थ: आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक खनिज, जिनकी आपूर्ति में प्रयास या सीमित विकल्पों के कारण उच्च जोखिम होता है।
  • उदाहरण: लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट, दुर्लभ मृदा तत्त्व (REEs), ताँबा, गैलियम, जर्मेनियम।
  • रणनीतिक महत्त्व: ऊर्जा संक्रमण (EV, बैटरी, नवीकरणीय ऊर्जा), रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर उद्योगों के लिए आवश्यक।
  • वैश्विक प्रयास: खनन और प्रसंस्करण उद्योगों पर कुछ देशों का प्रभुत्व है, जैसे- लीथियम (चिली, ऑस्ट्रेलिया), कोबाल्ट (कॉन्गो), REEs प्रसंस्करण (चीन)।

ऑपरेशन ‘किया’ (Operation Kiya)

भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा उधमपुर के वनीय बसंतगढ़ क्षेत्र में एक संयुक्त अभियान में दो पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराने के बाद यह चर्चा में आया।

परिभाषा: यह जम्मू-कश्मीर के वन और पर्वतीय क्षेत्रों में घुसपैठिए आतंकवादियों को समाप्त करने के लिए, भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा शुरू किया गया एक संयुक्त, खुफिया-आधारित आतंकवाद विरोधी अभियान है।

उद्देश्य

  • दुर्गम क्षेत्रों में छिपे आतंकवादियों को ट्रैक करना और उन्हें मारना।
  • आतंकवादियों की आवाजाही को रोकना तथा नागरिक बस्तियों की रक्षा करना।
  • घुसपैठ के चरण में ही सक्रिय मॉड्यूल को नष्ट करके सीमा पार आतंकी नेटवर्क को बाधित करना।

लक्षित क्षेत्र और पद्धति

  • मुख्य रूप से बसंतगढ़ (उधमपुर) जैसे दूरदराज के क्षेत्रों में संचालित।
  • विशिष्ट और विश्वसनीय खुफिया जानकारी पर आधारित।
  • घेराबंदी और तलाशी (Cordon-and-search) रणनीति, निकास मार्गों को बंद करना।
  • सेना की व्हाइट नाइट कॉर्प्स, काउंटर इंसर्जेंसी फोर्स (डेल्टा), जम्मू-कश्मीर पुलिस और CRPF का संयुक्त सुरक्षा ग्रिड।

महत्त्व

  • आतंकवादी संगठनों के पुनः एकत्रण को रोककर आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
  • जम्मू और कश्मीर में संवेदनशील घुसपैठ वाले रास्तों पर क्षेत्र प्रभाव बढ़ाता है।
  • लंबी अवधि के और उच्च जोखिम वाले ऑपरेशनों में विभिन्न एजेंसियों के मध्य समन्वय तथा परिचालन संबंधी तैयारी को प्रदर्शित करता है।
  • चुनौतीपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों में सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के आतंकवाद विरोधी प्रयासों को और मजबूत करता है।

टर्टल ट्रेल्स (Turtle Trails)

बजट 2026-27 में प्रस्तावित, ओडिशा, कर्नाटक और केरल में विनियमित इको-टूरिज्म सर्किट स्थापित करना, जिसका उद्देश्य समुद्री संरक्षण को स्थानीय आजीविका के साथ जोड़ना है।

बजट 2026-27 के मुख्य बिंदु

एक ‘टर्टल ट्रेल’ केवल एक मार्ग नहीं, एक प्रबंधित पारिस्थितिकी गलियारा है। ये नेस्टिंग स्थलों (Nesting sites) के पास निर्धारित क्षेत्र हैं, जहाँ समुद्री जीवन के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए आगंतुकों की गतिविधियों की कठोर निगरानी की जाती है।

  • विनियमित इको-टूरिज्म: समुद्री जीवन पर मानवजनित दबाव को कम करने के लिए अव्यवस्थित ‘मास टूरिज्म’ से हटकर प्रजनन स्थलों के पास निर्देशित तथा कम प्रभाव वाले मार्गों की ओर परिवर्तन।
  • रणनीतिक भौगोलिक अवस्थिति: ओडिशा में गहिरमाथा और ऋषिकुल्या रूकरी, और केरल व कर्नाटक में अरब सागर के प्रमुख हिस्सों पर ध्यान केंद्रित करना।
  • “डार्क-स्काई” अवसंरचना: अहस्तक्षेपकारी, अस्थायी अवलोकन क्षेत्रों और ऐसी प्रकाश प्रणालियों के लिए वित्तपोषण, जिन्हें कछुओं को दिशाभ्रमित होने से रोकने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • सामुदायिक प्रबंधन: “टर्टल गार्जियंस” को बढ़ावा देना—स्थानीय मछुआरा समुदायों और युवाओं को पेशेवर प्रकृतिवादियों के रूप में संरक्षण प्रयासों का नेतृत्व करने हेतु प्रोत्साहित करना।
  • तकनीकी-संचालित निगरानी: प्रवासी प्रतिरूप की निगरानी करने और मौसमी “नो-गो” (वर्जित) विंडोज को लागू करने के लिए सैटेलाइट टेलीमेट्री और AI-सक्षम निगरानी में निवेश।

ओलिव रिडले कछुए (Olive Ridley Turtle) के बारे में:

  • वैज्ञानिक नाम: लेपिडोकेलिस ओलिवेसिया (Lepidochelys olivacea), यह विश्व में पाए जाने वाले सभी समुद्री कछुओं में सबसे छोटा तथा सबसे अधिक पाया जाने वाला कछुआ है।
  • अरिबाडा: अपने अद्वितीय सामूहिक नेस्टिंग व्यवहार के लिए प्रसिद्ध, जहाँ हजारों मादाएँ अंडे देने के लिए एक ही समुद्र तट पर एकत्र होती हैं।
  • संरक्षण स्थिति
    • IUCN रेड लिस्ट: सुभेद्य
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (1972): अनुसूची I (भारत में सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है)।
    • CITES: परिशिष्ट I।
  • पारिस्थितिकी भूमिका: ये समुद्री रक्षक के रूप में कार्य करते हैं, समुद्री घास के स्वास्थ्य को बनाए रखते हैं और समुद्र तट के पारिस्थितिकी तंत्र को महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व प्रदान करते हैं।
  • प्रमुख खतरे: ट्रॉलर जाल में फँसना , तटीय कटाव, अंडों का अवैध शिकार और समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण।

स्टार्ट-अप मान्यता फ्रेमवर्क (Startup Recognition Framework)

हाल ही में सरकार ने स्टार्ट-अप इंडिया एक्शन प्लान को मजबूत करने के लिए स्टार्ट-अप मान्यता फ्रेमवर्क में संशोधन किया है, क्योंकि यह पहल अपने दूसरे दशक में प्रवेश कर चुकी है।

स्टार्टअप मान्यता फ्रेमवर्क में परिवर्तन (2026)

  • टर्नओवर सीमा में वृद्धि: इसे ₹100 करोड़ से बढ़ाकर ₹200 करोड़ कर दिया गया है, जिससे बढ़ते स्टार्ट-अप्स के लिए पात्रता का दायरा बढ़ गया है।
  • समर्पित ‘डीप टेक स्टार्ट-अप’ श्रेणी: लंबी अवधि और उच्च अनुसंधान एवं विकास (R&D) तीव्रता को देखते हुए, डीप टेक स्टार्ट-अप्स के लिए आयु सीमा बढ़ाकर 20 वर्ष और टर्नओवर कैप ₹300 करोड़ कर दिया गया है।
    • इससे पहले कोई अलग श्रेणी नहीं थी और सामान्य आयु सीमा 10 वर्ष थी।
  • सहकारी समितियाँ पात्र बनीं: अब बहु-राज्यीय और राज्य-पंजीकृत सहकारी समितियों को भी इसमें शामिल किया गया है, जो कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी नवाचार को बढ़ावा देंगी।
    • इससे पहले केवल निजी संस्थाएँ (कंपनियाँ, LLPs, पार्टनरशिप) ही पात्र थी।
  • नीतिगत उद्देश्य: दीर्घकालिक पूँजी (Patient Capital) की सुविधा देना, नवाचार विस्तार और भारत के उच्च-प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम को मजबूत करना।

मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप (भारत) के बारे में

  • एक मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप वह इकाई है, जिसे अधिसूचित पात्रता मानदंडों के आधार पर उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) द्वारा आधिकारिक मान्यता दी गई है।
  • श्रेणियाँ
    • सामान्य स्टार्ट-अप: निगमन (Incorporation) से 10 वर्ष तक; वार्षिक टर्नओवर ≤ ₹200 करोड़।
    • डीप टेक स्टार्ट-अप: निगमन से 20 वर्ष तक; टर्नओवर कैप ₹300 करोड़। 
    • पात्र संस्थाएँ: प्राइवेट लिमिटेड कंपनियाँ, LLPs, पार्टनरशिप फर्म और सहकारी समितियाँ।
  • मान्यता के लाभ
    • कर प्रोत्साहन: आयकर अधिनियम, 1961 के तहत लगातार तीन वर्षों तक लाभ पर 100% आयकर छूट।
    • नियामक राहत: ‘कैश फ्लो स्टेटमेंट’ तैयार करने से छूट।
    • इकोसिस्टम समर्थन: स्टार्ट-अप इंडिया, AIM (अटल इनोवेशन मिशन), GENESIS (जेन-नेक्स्ट सपोर्ट फॉर इनोवेटिव स्टार्ट-अप्स), और नेशनल इनिशिएटिव फॉर डेवलपिंग एंड हार्नेसिंग इनोवेशन (NIDHI) जैसी योजनाओं तक पहुँच।

स्टार्ट-अप इंडिया

  • यह सभी क्षेत्रों और प्रकार्यों में एक मजबूत और नवाचार-संचालित स्टार्ट-अप इकोसिस्टम बनाने की एक प्रमुख पहल है।
  • लॉन्च: 16 जनवरी, 2016।
  • नोडल निकाय: उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT)।
  • उद्देश्य 
    • प्रौद्योगिकी क्षेत्रों से परे उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा देना: स्टार्ट-अप संस्कृति को केवल IT या टेक तक सीमित न रखकर अन्य विभिन्न क्षेत्रों में प्रोत्साहित करना।
    • टियर-I शहरों से टियर-II, टियर-III, ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों तक स्टार्ट-अप्स का विस्तार: नवाचार के पारिस्थितिकी तंत्र को बड़े महानगरों से बाहर निकाल कर देश के कोने-कोने तक पहुँचाना।
    • रोजगार सृजन, विनिर्माण और उभरती प्रौद्योगिकियों का समर्थन करना: विनिर्माण को गति देना और नई तकनीकों के माध्यम से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित करना।
  • मुख्य स्तंभ 
    • सरलीकरण और हैंडहोल्डिंग: स्व-प्रमाणीकरण, स्टार्ट-अप पोर्टल और आसान निकास की सुविधा।
    • फंडिंग सहायता और प्रोत्साहन: ₹10,000 करोड़ का ‘फंड ऑफ फंड्स’ और विभिन्न कर लाभ
  • उद्योग-अकादमिक भागीदारी: इन्क्यूबेशन सहायता, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देना।

सभागार पहल (SabhaSaar Initiative)

जनवरी 2026 तक, विभिन्न राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की 1.11 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों (GP) ने AI-आधारित ग्राम सभा बैठक सारांश उपकरण, ‘सभासार’ को अपना लिया है।

सभासार पहल 

  • सभासार एक AI-सक्षम वॉइस-टू-टेक्स्ट बैठक सारांश प्लेटफॉर्म है, जिसे 14 अगस्त, 2025 को पंचायती राज मंत्रालय द्वारा ग्राम सभा तथा पंचायत की कार्यवाही को डिजिटल और मानकीकृत करने के लिए लॉन्च किया गया था।
  • नोडल मंत्रालय: पंचायती राज मंत्रालय।
  • AI और क्लाउड अवसंरचना: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के IndiaAI मिशन के तहत IndiaAI कंप्यूट पोर्टल के माध्यम से उपलब्ध कराया गया।
  • डेटा गवर्नेंस: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के ढाँचे के तहत विनियमित; डेटा पूरी तरह से सरकारी प्रणालियों के भीतर संसाधित होता है।
  • उद्देश्य
    • बैठक के कार्यवृत्त (Minutes of Meetings – MoM) की स्वचालित और सटीक तैयारी सक्षम बनाना।
    • स्थानीय शासन में पारदर्शिता, रिकॉर्ड-कीपिंग और जवाबदेही में सुधार।
    • ग्राम सभा की बैठक, भागीदारी और अनुवर्ती कार्रवाइयों की निगरानी में सहायता करना।
  • महत्त्व
    • जमीनी स्तर पर ई-गवर्नेंस को मजबूत करता है।
    • पंचायत दस्तावेजीकरण में मानवीय कार्यभार और त्रुटियों को कम करता है।
    • पंचायत के कार्यों और प्रस्तावों के अनुपालन की साक्ष्य-आधारित निगरानी की सुविधा प्रदान करता है।
  • स्वीकृति वाले शीर्ष राज्य (GP की संख्या): उत्तर प्रदेश (31,477)तमिलनाडु (12,451), आंध्र प्रदेश (9,285), छत्तीसगढ़ (8,834),  ओडिशा (6,720)।

सभासार सहभागी लोकतंत्र का विस्तार करने के लिए, पंचायती राज संस्थाओं के साथ AI को एकीकृत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

प्लास्टइंडिया (PLASTINDIA),  2026

विश्व की सबसे बड़ी प्लास्टिक प्रदर्शनी, PLASTINDIA-2026, 5 फरवरी,  2026 को भारत मंडपम्, नई दिल्ली में शुरू हुई।

प्लास्टइंडिया (PLASTINDIA) के बारे में

  • यह प्लास्टिक उद्योग की एक त्रिवार्षिक वैश्विक प्रदर्शनी है, जो रसायन और उर्वरक मंत्रालय के रसायन एवं पेट्रोकेमिकल विभाग (DCPC) के सहयोग से आयोजित की जाती है। इसका उद्देश्य प्लास्टिक मूल्य शृंखला में नवाचारों का प्रदर्शन करना है।
  • PLASTINDIA-2026 का विषय (थीम): “भारत नेक्स्ट” (Bharat Next)
    • यह आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो उन्नत विनिर्माण और चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रथाओं पर जोर देता है।
  • उद्देश्य
    • व्यापार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और सतत् प्लास्टिक विनिर्माण को बढ़ावा देना।
    • उन्नत मशीनरी, सामग्री और रीसाइक्लिंग समाधानों में भारत की क्षमताओं का प्रदर्शन करना।
    • कौशल विकास और उद्योग-अकादमिक संबंधों को मजबूत करना।
  • यह पाँच स्तंभों पर आधारित है: व्यापार, प्रौद्योगिकी, प्रतिभा, परंपरा, और पर्यटन।
  • प्रतिभागी 
    • 2,000 से अधिक अंतरराष्ट्रीय और घरेलू प्रदर्शक।
    • कौशल विकास, अनुसंधान एवं विकास (R&D) और प्रौद्योगिकी प्रसार में CIPET (केंद्रीय पेट्रोकेमिकल इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी संस्थान) की सक्रिय भागीदारी।
    • उद्योग जगत के नेतृत्त्वकर्त्ताओं, स्टार्ट-अप्स, छात्रों और नीति निर्माताओं की सहभागिता।
  • महत्त्व: इसे ‘जीरो वेस्ट’ (Zero Waste) प्रदर्शनी के रूप में आयोजित किया गया है, जो चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है।
  • प्लास्टिक विनिर्माण और रोजगार सृजन में भारत की वैश्विक स्थिति को मजबूत करता है।

भारत में प्लास्टिक अर्थव्यवस्था की स्थिति

  • भारतीय प्लास्टिक उद्योग का मूल्य ₹3–3.5 लाख करोड़ है, जो बुनियादी ढाँचे, उपभोक्ता वस्तुओं और निर्यात का आधार है।
  • जैसे-जैसे भारत $10 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, यह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

संदर्भ

हाल ही में मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले में अवैध रूप से संचालित एक रैट-होल’ कोयला खदान में हुए विस्फोट में 18 खनिकों की मृत्यु हो गई, जिससे खनन नियमन में लगातार बनी हुई विफलताएँ उजागर हुईं।

दुर्घटना की प्रमुख विशेषताएँ

  • यह विस्फोट प्रतिबंधित रैट-होल’ खदान में हुआ, जो वन क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित की जा रही थी। पीड़ितों को जलने के कारण गंभीर चोटें आईं तथा जहरीली गैस के कारण दम घुटने की स्थिति उत्पन्न हुई।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल, राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल तथा राज्य के बचाव दलों को तैनात किया गया। दोषियों के विरुद्ध खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
  • यह त्रासदी पूर्व में हुई घातक घटनाओं की याद दिलाती है, जबकि वर्ष 2014 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा ‘रैट-होल माइनिंग’ पर प्रतिबंध लगाया गया था और वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंध की पुष्टि भी की थी।

रैट-होल माइनिंग’ क्या है?

  • रैट-होल माइनिंग’ कोयला निष्कर्षण की एक प्राचीन और श्रम-प्रधान पद्धति है, जिसमें अत्यंत संकीर्ण क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर सुरंगें निर्मित की जाती हैं। ये सुरंगें प्रायः केवल 3–4 फीट ऊँची होती हैं, जहाँ श्रमिक अत्यंत सीमित स्थान में रेंगते हुए कोयले का निष्कर्षण करते हैं।
  • रैट-होल माइनिंग’ की प्रक्रिया
    • स्थल की पहचान: छोटे समूह सीमित भू-वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर कोयला-युक्त पर्वतीय ढलानों की पहचान करते हैं, जहाँ प्रायः अस्थिर और अत्यधिक जोखिमपूर्ण स्थान चुने जाते हैं।
    • सुरंग की खुदाई: अत्यंत संकीर्ण ऊर्ध्वाधर या क्षैतिज सुरंगें हाथ से खोदी जाती हैं, जिनकी चौड़ाई लगभग 3–4 फीट होती है। यह कार्य साधारण औजारों के माध्यम से किया जाता है और किसी भी प्रकार का संरचनात्मक सहारा नहीं प्राप्त होता।
    • हाथ से कोयला निष्कर्षण: खनिक संकीर्ण भूमिगत सुरंगों में रेंगते हुए कोयले का उत्खनन करते हैं तथा उसे इन मार्गों से हाथों द्वारा बाहर तक पहुँचाते हैं।
  • पर्यावरणीय प्रभाव
    • वनों की कटाई और मृदा अपरदन: वनस्पतियाँ समाप्त होने से पहाड़ी ढलान अस्थिर हो जाते हैं, जिससे भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ती हैं और नदियों में अपशिष्ट का निक्षेप होता है।
    • जल एवं मृदा प्रदूषण: खदानों से निकलने वाला अम्लीय जल सतही और भूजल को प्रदूषित करता है, मृदा की उर्वरता घटती है तथा कृषि को नुकसान पहुँचाता है।
    • जैव विविधता का ह्रास: पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में खनन से प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होता है।
  • सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ
    • घातक कार्य परिस्थितियाँ: बिना संरचनात्मक सहारे की संकीर्ण सुरंगें धंसने तथा जलभराव के गंभीर जोखिम से युक्त होती हैं। साथ ही, अपर्याप्त वेंटिलेशन के परिणामस्वरूप विषैली गैसों का संचय एवं ऑक्सीजन स्तर में कमी उत्पन्न होती है, जिससे श्वासावरोध के कारण मृत्यु की घटनाएँ बार-बार घटित होती हैं।
      • वर्ष 2018 में पूर्वी जयंतिया हिल्स की एक अवैध खदान में 15 खनिकों की डूबकर मृत्यु हुई। इसी प्रकार वर्ष 2021 और 2025 में भी ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जब पास की नदियों या भूमिगत जलस्रोतों का जल सुरंगों में भर गया।
    • व्यावसायिक रोग: कोयले की धूल के लंबे समय तक संपर्क में रहने से श्वसन संबंधी बीमारियाँ होती हैं, जैसे- न्यूमोकोनियोसिस (ब्लैक लंग रोग)
    • समुदाय के स्वास्थ्य पर प्रभाव: प्रदूषित वायु और जल आस-पास की आबादी को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे रोगों का भार बढ़ता है।
  • सामाजिक प्रभाव
    • श्रम शोषण: इस प्रथा में अत्यंत कम पारिश्रमिक पर कार्य करने वाले श्रमिकों पर निर्भरता होती है और कई मामलों में बाल श्रम का भी उपयोग किया जाता है।
    • आजीविका की असुरक्षा: पर्यावरणीय क्षरण कृषि और पारंपरिक आजीविकाओं को कमजोर करता है, जिससे स्थानीय समुदाय गरीबी के दुष्चक्र में फँस जाते हैं।
  • कानूनी स्थिति: बार-बार होने वाली घातक घटनाओं के कारण रैट-होल माइनिंग’ पर वर्ष 2014 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया।
    • वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंध की पुष्टि की और इसे खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत अवैध घोषित किया।
  • भारत में वर्तमान स्थिति
    • रैट-होल माइनिंग’ की घटनाएँ मुख्यतः मेघालय में देखी जाती हैं, विशेषकर पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले में।
    • प्रतिबंध के बावजूद असम के डिमा हसाओ जिले के कुछ क्षेत्रों में भी इसकी गतिविधियाँ देखी गई हैं।

बार-बार दुर्घटनाएँ होने के कारण

  • कमजोर प्रवर्तन और प्रशासनिक खामियाँ: अस्पष्ट भूमि स्वामित्व और सीमित राज्य निगरानी के कारण अवैध खदानें बिना रोक-टोक के संचालित होती हैं।
  • आर्थिक कठिनाइयाँ और कोयले की माँग: गरीबी, वैकल्पिक आजीविका का अभाव और निरंतर कोयले की माँग असुरक्षित खनन प्रथाओं को जारी रखने में योगदान देती है।
  • सुरक्षा मानकों का अभाव: असुरक्षित सुरंगें, खराब वेंटिलेशन और विस्फोटकों का अनियंत्रित उपयोग सुरंगों के धँसने और दम घुटने की घटनाओं को बार-बार उत्पन्न करता है।

बार-बार होने वाली रैट-होल माइनिंग’ त्रासदियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि जीवन और पर्यावरण की रक्षा के लिए सख्त प्रवर्तन, वैकल्पिक आजीविका के अवसर और पारिस्थितिकी जवाबदेही की त्वरित आवश्यकता है।

संदर्भ 

पूर्वी नागालैंड के लिए फ्रंटियर नागालैंड क्षेत्रीय प्राधिकरण’ (Frontier Nagaland Territorial Authority- FNTA)  के गठन का मार्ग प्रशस्त करने हेतु गृह मंत्रालय, नागालैंड सरकार और ईस्टर्न नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (Eastern Nagaland People’s Organisation- ENPO) के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

समझौते की प्रमुख विशेषताएँ

  • शामिल जिले: FNTA के अंतर्गत छह जिले शामिल होंगे, जिनमें तुएनसांग, मोन, किफिरे, लोंगलेंग, नोकलाक और शेमाटोर सम्मिलित हैं।
  • शक्तियों का हस्तांतरण: इस समझौते के तहत FNTA को 46 विषयों पर शक्तियों का हस्तांतरण प्रदान किया गया है।
  • स्वरूप: FNTA नागालैंड राज्य के भीतर एक क्षेत्रीय प्राधिकरण है और यह छठी अनुसूची के अंतर्गत गठित स्वायत्त जिला परिषदों से भिन्न है।
    •  नागालैंड संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत नहीं आता है।
  • वित्तीय एवं प्रशासनिक प्रावधान
    • मिनी सचिवालय: समझौते के अंतर्गतफ्रंटियर नागालैंड क्षेत्रीय प्राधिकरण’ के लिए एक मिनी सचिवालय की व्यवस्था की गई है, जिसका नेतृत्व अतिरिक्त मुख्य सचिव/प्रधान सचिव स्तर का अधिकारी करेगा।
    • विकास परिव्यय: पूर्वी नागालैंड के लिए विकास निधि का आवंटन जनसंख्या और क्षेत्रफल के अनुपात में साझा किया जाएगा।
    • प्रारंभिक सहायता: प्राधिकरण की स्थापना के लिए प्रारंभिक व्यय गृह मंत्रालय द्वारा वहन किया जाएगा तथा इसके लिए एक निश्चित वार्षिक राशि निर्धारित की जाएगी।
  • संवैधानिक संरक्षण: समझौते में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद-371(A) के प्रावधानों को किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं करता है।

व्यवस्था का महत्त्व

  • विशिष्ट विकास मॉडल: यह व्यवस्था निम्नलिखित माध्यमों से समग्र विकास की परिकल्पना करती है—
    • वित्तीय स्वायत्तता
    • निर्णय-निर्माण में सशक्तता
    • अवसंरचना विकास में तेजी
    • आर्थिक सशक्तीकरण
    • संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग
  • क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान: पूर्वी नागालैंड की जनजातियाँ लंबे समय से क्षेत्र-विशिष्ट शक्तियों को प्रदान करने की माँग कर रही थीं, जिन पर वर्ष 2015 से बातचीत प्रारंभ हुई।
  • रणनीतिक महत्व: पूर्वी नागालैंड की म्याँमार सीमा से निकटता इसे सीमा क्षेत्र के विकास तथा भारत की एक्ट ईस्ट’ नीति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाती है।

अनुच्छेद-371(A)

  • संसदीय कानून: अनुच्छेद-371(A) के अनुसार, कुछ संवेदनशील विषयों पर संसद द्वारा निर्मित कोई भी कानून तब तक नागालैंड पर लागू नहीं होगा, जब तक कि नागालैंड विधान सभा उसे स्वीकृति देने वाला प्रस्ताव पारित न कर दे।
  • अनुच्छेद 371(A) को भारतीय संघ में नागालैंड को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के समय, वर्ष 1962 के तेरहवें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान के भाग XXI में सम्मिलित किया गया था।
  • संरक्षित विषय
    • धार्मिक एवं सामाजिक प्रथाएँ: राज्य विधानसभा की अनुमति के बिना संसद इनमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
    • प्रथागत कानून एवं प्रक्रियाएँ: नागालैंड के प्रथागत कानून और पारंपरिक न्यायिक प्रक्रियाएँ संरक्षित हैं।
    • न्याय का प्रशासन: नागा प्रथागत कानून पर आधारित दीवानी और आपराधिक न्याय से संबंधित निर्णय राज्य के अधिकार क्षेत्र में रहते हैं।
    • भूमि एवं संसाधन अधिकार: भूमि तथा उससे संबंधित प्राकृतिक संसाधनों के स्वामित्व और हस्तांतरण से संबंधित प्रावधान, राज्य की स्वीकृति के बिना केंद्रीय कानूनों द्वारा परिवर्तित नहीं किए जा सकते हैं।
  • नागालैंड विधानसभा की भूमिका: इन विषयों पर बनाया गया कोई भी केंद्रीय कानून, तभी लागू होगा, जब नागालैंड विधानसभा उसके कार्यान्वयन के लिए सहमति संबंधी प्रस्ताव पारित करेगी।
  • राज्यपाल का विशेष उत्तरदायित्त्व: अनुच्छेद-371(A) नागालैंड के राज्यपाल को पूर्व नागा हिल्स–तुएनसांग क्षेत्र में आंतरिक अशांति जारी रहने तक कानून और व्यवस्था बनाए रखने की विशेष जिम्मेदारी प्रदान करता है।
  • वित्तीय संरक्षण: राज्यपाल को यह सुनिश्चित करना होता है कि भारत सरकार द्वारा किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए प्रदान की गई धनराशि केवल उसी सेवा से संबंधित अनुदान मांग में सम्मिलित की जाए।
  • तुएनसांग क्षेत्रीय परिषद की स्थापना
    • अनुच्छेद-371(A) के अंतर्गत तुएनसांग जिले के लिए 35 सदस्यों वाली एक क्षेत्रीय परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है।
    • तुएनसांग जिले का उपायुक्त इस क्षेत्रीय परिषद का पदेन अध्यक्ष होता है।
    • राज्यपाल को परिषद की संरचना, योग्यता, कार्यकाल, कार्यविधि, कर्मचारी व्यवस्था तथा कार्यप्रणाली से संबंधित नियम बनाने का अधिकार प्राप्त है।
  • तुएनसांग में नागालैंड राज्य के कानूनों का सीमित अनुप्रयोग
    • नागालैंड विधानसभा द्वारा पारित कोई भी कानून तुएनसांग जिले में तब तक लागू नहीं होता, जब तक कि क्षेत्रीय परिषद की सिफारिश के आधार पर राज्यपाल उसकी स्वीकृति न दें।
    • राज्यपाल ऐसे कानूनों को आवश्यक संशोधनों के साथ अथवा पूर्व प्रभाव से भी तुएनसांग जिले में लागू कर सकते हैं।
  • राज्यपाल की नियामक शक्तियाँ
    • राज्यपाल तुएनसांग जिले में शांति, प्रगति और सुशासन सुनिश्चित करने के लिए विनियम बना सकते हैं।
    • ऐसे विनियम तुएनसांग जिले पर लागू संसदीय कानूनों में भी संशोधन या उन्हें निरस्त कर सकते हैं।

संदर्भ 

केंद्रीय बजट 2026–27 में चुनौती-आधारित चयन प्रक्रिया के माध्यम से तीन समर्पित रासायनिक पार्कों की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है।

रासायनिक पार्क क्या हैं?

  • परिभाषा: रासायनिक पार्क ऐसे नियोजित औद्योगिक क्लस्टर होते हैं, जिन्हें विशेष रूप से रसायन और पेट्रोकेमिकल विनिर्माण के लिए विकसित किया जाता है, जहाँ अनेक औद्योगिक इकाइयाँ एक साथ संचालित होती हैं।
  • मुख्य विशेषता: इन पार्कों में एक ही स्थान पर विश्वस्तरीय साझा अवसंरचना, सामान्य उपयोगिताएँ, लॉजिस्टिक्स सहायता तथा समन्वित नियामक सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
  • अवसंरचना: रासायनिक पार्कों में सामान्यतः पर्यावरण एवं सुरक्षा से संबंधित साझा सुविधाएँ शामिल होती हैं, जैसे—
    • केंद्रीय अपशिष्ट शोधन संयंत्र
    • खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाएँ
    • रसायनों के सुरक्षित प्रबंधन और भंडारण के लिए साझा उपयोगिताएँ।

भारत में रासायनिक क्षेत्र

  • वैश्विक स्थिति: भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा रासायनिक उत्पादक देश है और एशिया में तीसरे स्थान पर है।
  • आर्थिक योगदान: रासायनिक क्षेत्र का राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 7 प्रतिशत तथा विनिर्माण सकल मूल्य वर्द्धन में 8.1 प्रतिशत योगदान है (वित्त वर्ष 2023–24)।
  • उत्पादन प्रवृत्तियाँ: प्रमुख रसायनों और पेट्रोकेमिकल्स का उत्पादन वित्त वर्ष 2015–16 में 4.56 करोड़ मीट्रिक टन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024–25 में 5.86 करोड़ मीट्रिक टन हो गया है, जिसमें 2.8 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर दर्ज की गई।
  • क्षेत्रीय मजबूती: भारत 80,000 से अधिक प्रकार के रासायनिक उत्पादों का निर्माण करता है, जिनमें थोक रसायन, विशिष्ट रसायन, कृषि रसायन, पेट्रोकेमिकल्स, पॉलिमर और उर्वरक शामिल हैं। इनमें विशिष्ट रसायन एक स्थायी मजबूत क्षेत्र के रूप में उभर रहे हैं।
  • वर्तमान बाजार आकार: भारत का रासायनिक उद्योग वर्ष 2024 में लगभग 21.5 लाख करोड़ रुपये का आँका गया।
  • रणनीतिक बढ़त: कृषि रसायनों के क्षेत्र में भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है तथा रंग एवं डाई उद्योग में एक वैश्विक केंद्र के रूप में इसकी स्थिति उच्च मूल्य वाले रासायनिक विनिर्माण केंद्र के रूप में संभावनाओं को सशक्त करती है।
  • निवेश वृद्धि: वित्त वर्ष 2024–25 तक उर्वरकों को छोड़कर रासायनिक क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 1.42 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा, जबकि वर्ष 2025 तक कुल औद्योगिक निवेश लगभग 8 लाख करोड़ रुपये तक आकलित किया गया है।

केंद्रीय बजट 2026–27 की प्रमुख घोषणाएँ

  • रासायनिक पार्क योजना: राज्यों को तीन रासायनिक पार्क स्थापित करने में सहायता देने के लिए एक नई योजना शुरू की गई है, जिसमें चुनौती-आधारित चयन प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
  • बजटीय समर्थन: वित्त वर्ष 2026–27 के बजट अनुमान में 600 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह रासायनिक पार्क अवसंरचना के लिए पहली बार समर्पित बजटीय सहायता का उदाहरण है।
  • उद्देश्य: घरेलू रासायनिक विनिर्माण को सुदृढ़ करना, आपूर्ति शृंखला के एकीकरण को बढ़ावा देना तथा आयात पर निर्भरता को कम करना।

रासायनिक पार्कों की आवश्यकता

  • क्लस्टर-आधारित विकास: यह भारत के प्लास्टिक पार्क, बल्क ड्रग पार्क तथा पेट्रोलियम, रसायन और पेट्रोकेमिकल निवेश क्षेत्रों से प्राप्त अनुभव पर आधारित है, जिन्होंने साझा अवसंरचना और समन्वित योजना के लाभों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है।
  • मूल्य शृंखला का समग्र कवरेज: इस परिकल्पना के अंतर्गत थोक रसायन, विशिष्ट रसायन तथा ‘डाउनस्ट्रीम’ खंडों को शामिल किया गया है, जिससे रासायनिक मूल्य शृंखला में अधिक एकीकृत दृष्टिकोण संभव होगा।
  • लागत एवं दक्षता में वृद्धि: साझा लॉजिस्टिक्स, उपयोगिताएँ और परीक्षण सुविधाएँ पूँजीगत लागत को कम करने तथा परिचालन दक्षता में सुधार लाने में सहायक होंगी।
  • निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता: एकीकृत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र वैश्विक रासायनिक मूल्य शृंखलाओं में, विशेष रूप से विशिष्ट रसायनों के क्षेत्र में, भारत की स्थिति को मजबूत करेगा।

मौजूदा क्लस्टर-आधारित योजनाएँ

  • प्लास्टिक पार्क योजना: वर्ष 2013–14 में प्रारंभ की गई इस योजना का उद्देश्य प्लास्टिक प्रसंस्करण उद्योग को संगठित और सुदृढ़ करना है। इसके अंतर्गत परियोजना लागत का अधिकतम 50 प्रतिशत तक केंद्रीय अनुदान प्रदान किया जाता है, जिसकी सीमा प्रति पार्क 40 करोड़ रुपये निर्धारित है।
    • असम, ओडिशा, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में कुल दस प्लास्टिक पार्कों को स्वीकृति दी गई है।
  • बल्क ड्रग पार्क योजना: वर्ष 2020 में 3,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ यह योजना शुरू की गई, जिसका उद्देश्य गुजरात, हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश में तीन बल्क ड्रग पार्क स्थापित करना है।
    • इस योजना में साझा अवसंरचना पर विशेष ध्यान दिया गया है, जैसे- केंद्रीय अपशिष्ट शोधन संयंत्र, विलायक पुनर्प्राप्ति प्रणाली, विद्युत एवं जल उपयोगिताएँ तथा उन्नत परीक्षण सुविधाएँ।
  • पेट्रोलियम, रसायन एवं पेट्रोकेमिकल निवेश क्षेत्र: ये बड़े और एकीकृत निवेश क्षेत्र हैं, जो आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम, गुजरात के दाहेज और ओडिशा के पारादीप में स्थित हैं।

रासायनिक क्षेत्र के लिए नीतिगत समर्थन एवं संस्थागत ढाँचा

  • अवसंरचना विस्तार: पारादीप बंदरगाह आधारित रासायनिक अवसंरचना तथा बड़ी तेल और रसायन परियोजनाओं जैसे प्रमुख निवेश औद्योगिक क्षमता को सुदृढ़ कर रहे हैं और रोजगार सृजन को बढ़ावा दे रहे हैं।
  • नीति एवं प्रोत्साहन समर्थन: राष्ट्रीय रासायनिक नीति, हरित रसायन कार्यक्रम, उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाएँ तथा केंद्रीय प्लास्टिक अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के विकास, जैसे प्रयास नवाचार, कौशल विकास और सततता को समर्थन प्रदान करते हैं।
  • नीति आयोग के प्रस्ताव: नीति आयोग ने विश्वस्तरीय रासायनिक हब, बंदरगाह आधारित क्लस्टर, पर्यावरणीय स्वीकृतियों में तेजी, लक्षित मुक्त व्यापार समझौते तथा अनुसंधान एवं विकास के लिए अधिक वित्तपोषण की सिफारिश की है।
  • हरित हाइड्रोजन मिशन: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन रासायनिक क्षेत्र के वि-कार्बनीकरण को समर्थन करता है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन वार्षिक उत्पादन क्षमता प्राप्त करना है। इससे जीवाश्म ईंधन आयात में बचत होगी और उत्सर्जन में कमी आएगी।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उदारीकरण: रासायनिक क्षेत्र में, खतरनाक रसायनों को छोड़कर, स्वचालित मार्ग के अंतर्गत 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति है।
  • गुणवत्ता नियंत्रण एवं आयात विनियमन: सरकार ने घरेलू बाजार में सस्ते, निम्न गुणवत्ता वाले और असुरक्षित रासायनिक उत्पादों की डंपिंग को रोकने के लिए आयातित रसायनों पर अनिवार्य प्रमाणन व्यवस्था लागू की है।

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026–27 आर्थिक विकास के एक मूल स्तंभ के रूप में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business– EoDB) को सुदृढ़ करता है।अनुमति-आधारित” मॉडल से विश्वास-आधारित अनुपालन ढाँचे की ओर संक्रमण करके, सरकार नियामकीय दक्षता का विकसित भारत @2047 के’ व्यापक विजन के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहती है।

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) के बारे में

  • मूल परिभाषा: EoDB किसी देश के नियामकीय और संस्थागत ढाँचे की गुणवत्ता को दर्शाता है, जो यह निर्धारित करता है कि व्यवसाय किसी अर्थव्यवस्था में कितनी सुगमता से शुरू, संचालित, अनुपालित और बंद किए जा सकते हैं।
  • नियामकीय दक्षता: यह व्यावसायिक जीवन चक्र में प्रक्रियागत जटिलता, समय विलंब और अनुपालन लागत को कम करने पर केंद्रित है, विशेष रूप से लाइसेंसिंग, कराधान और अनुबंध प्रवर्तन में बाधाओं को लक्षित करता है।
  • लेन-देन लागत परिप्रेक्ष्य: आर्थिक दृष्टिकोण से, EoDB का उद्देश्य लेन-देन लागत और सूचना असमानताओं को न्यूनतम करना है, जिससे बाजार सहभागिता और समग्र आर्थिक दक्षता में सुधार होता है।
  • संस्थागत प्रकृति: यह केवल विनियमन-शिथिलीकरण तक सीमित नहीं है; बल्कि यह नियमों को लागू करने में राज्य संस्थानों की पूर्वानुमेयता, पारदर्शिता और निरंतरता को दर्शाता है।
  • वैश्विक मापन संदर्भ: इस अवधारणा को विश्व स्तर पर विश्व बैंक के डूइंग बिजनेस’ ढाँचे (2003–2020) के माध्यम से लागू किया गया, जिसमें ऋण प्राप्ति, अल्पसंख्यक निवेशकों की सुरक्षा और दिवालियापन समाधान जैसे संकेतकों का मूल्यांकन किया गया।
  • भारत का सुधार उन्मुखीकरण: भारतीय संदर्भ में, सुधारों ने डिजिटलीकरण (जैसे- NSWS), लाइसेंस-मुक्ति, समयबद्ध स्वीकृतियों और कानूनी सुधारों (जैसे- IBC 2016) को प्राथमिकता दी है, ताकि निवेशक विश्वास बढ़े और आर्थिक औपचारीकरण को गति मिले।
  • प्रतिस्पर्द्धी संघवाद का दृष्टिकोण: उप-राष्ट्रीय स्तर पर, EoDB को बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान (BRAP) के माध्यम से बढ़ावा दिया जाता है, जो राज्य-नेतृत्व आधारित प्रतिस्पर्द्धा का उपयोग कर जमीनी स्तर पर नियामकीय प्रदर्शन में सुधार करता है।
  • बिजनेस रेडी’ (B-READY) संक्रमण: वर्ष 2021 के बाद, ध्यान बिजनेस रेडी’ (B-READY) ढाँचे पर केंद्रित हो गया है, जो डी ज्यूरे” (दस्तावेज पर कानून) से “डी फैक्टो” (वास्तविक व्यवहार) की ओर बढ़ता है और इसमें डिजिटल तथा पर्यावरणीय स्थिरता को शामिल किया गया है।
  • सफलता के मानक
    • उद्यम वृद्धि: इन सुधारों का प्रभाव सक्रिय पंजीकृत कंपनियों की संख्या में 27% वृद्धि (फरवरी 2026 तक बढ़कर 1.98 लाख) में स्पष्ट है।
    • ऐतिहासिक FDI वृद्धि: भारत के दीर्घकालिक नियामकीय रूपांतरण के परिणामस्वरूप कुल FDI प्रवाह 748.38 अरब अमेरिकी डॉलर (2014–25) तक पहुँच गया है, जो पूर्ववर्ती 11 वर्षों की अवधि की तुलना में 143% वृद्धि दर्शाता है।

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ क्यों आवश्यक है? 

  • निवेश जुटाना और वैश्विक एकीकरण: एक स्थिर, पूर्वानुमेय और पारदर्शी नियामकीय वातावरण वैश्विक पूँजी के लिए एक “ग्रीन फ्लैग” के रूप में कार्य करता है।
    • FDI आकर्षण: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की गति बनाए रखने के लिए एक स्थिर नीतिगत वातावरण आवश्यक है।
      • उदाहरण: PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) योजनाओं ने एप्पल के भागीदारों जैसे वैश्विक दिग्गजों को आकर्षित किया, जिससे भारत एक प्रमुख मोबाइल निर्यात केंद्र बन गया।
    • वैश्विक आपूर्ति शृंखला एकीकरण: रणनीतिक सुधार भारत को बदलती अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स और विशिष्ट रसायनों के क्षेत्र में, लाभ उठाने में सक्षम बनाते हैं।
    • आवंटन दक्षता: दिवालियापन और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) जैसे तंत्र यह सुनिश्चित करते हैं कि पूँजीजॉम्बी कंपनियों” (Zombie firms) में फँसी न रहे।
      • उदाहरण: भूषण स्टील जैसे मामलों का सफल समाधान संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को उत्पादक इकाइयों द्वारा अधिग्रहित करने में सहायक हुआ, जिससे बैंकिंग प्रणाली में हजारों करोड़ रुपये वापस आए।
  • MSME सशक्तिकरण और आर्थिक औपचारीकरण: MSME अर्थव्यवस्था के आधार हैं, लेकिन अत्यधिक “नियामकीय भार” के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं।
    • MSME प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि: फाइलिंग को सरल बनाना और तैयार औद्योगिक अवसंरचना उपलब्ध कराना छोटे उद्यमों को प्रशासनिक संघर्ष के बजाय विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनाता है।
    • अर्थव्यवस्था का औपचारीकरण: पंजीकरण की लागत कम करने से अनौपचारिक उद्यमों को औपचारिक क्षेत्र में प्रवेश के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
      • उदाहरण: उद्यम पंजीकरण पोर्टल ने प्रक्रिया को ‘एक-पृष्ठीय’ डिजिटल फॉर्म तक सरल बना दिया, जिससे लाखों छोटे व्यवसाय औपचारिक ढाँचे में आए और ऋण तक पहुँच प्राप्त हुई।
    • कर आधार का विस्तार: औपचारीकरण से GST संग्रह में वृद्धि होती है, जिससे सरकार को सार्वजनिक अवसंरचना के लिए अधिक संसाधन प्राप्त होते हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और रोजगार सृजन: EoDB सामाजिक गतिशीलता और भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को समाहित करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
    • व्यापक रोजगार सृजन: एक सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र कंपनियों को विस्तार में सक्षम बनाता है, जो प्रतिवर्ष लाखों युवाओं को कार्यबल में शामिल करने का मुख्य आधार है।
    • उद्यमिता को बढ़ावा: प्रवेश बाधाओं में कमी से प्रथम-पीढ़ी के उद्यमियों को सशक्त बनाया जाता है औरस्टार्ट-अप इंडिया” को बल मिलता है।
      • उदाहरण: नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS) स्टार्ट-अप्स को सभी आवश्यक राज्य और केंद्रीय स्वीकृतियाँ एक ही स्थान पर उपलब्ध कराता है, जिससेरेड टेप” “रेड कार्पेट” में बदल जाता है।
    • समावेशी विकास: संरचनात्मक बाधाओं को हटाकर, EoDB ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों की व्यापक भागीदारी को सक्षम बनाता है।
  • संस्थागत अखंडता और शासन: सुधार प्रगति में बाधा डालने वाली मानवीय अड़चनों को दूर करने पर केंद्रित हैं।
    • भ्रष्टाचार में कमी: डिजिटलीकरण और ‘फेसलेस’ आकलन व्यवसायों तथा नौकरशाहों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क को समाप्त करते हैं।
      • उदाहरण: आयकर फेसलेस आकलन योजना ने ऑडिट प्रक्रिया को गोपनीय बनाकर रिश्वतखोरी और उत्पीड़न की संभावना को अत्यधिक सीमा तक कम किया है।
    • अनुबंध प्रवर्तन: विवाद समाधान के लिए एक सुदृढ़ कानूनी ढाँचा अनुबंधों की पवित्रता सुनिश्चित करता है, जो दीर्घकालिक सार्वजनिक–निजी भागीदारी (PPP) के लिए आवश्यक है।
    • प्रतिस्पर्द्धी संघवाद: राज्य-स्तरीय रैंकिंग रेस-टू-द टॉप” को बढ़ावा देती है, जिससे अंतिम स्तर तक नियामकीय सेवा वितरण में सुधार होता है।
  • दक्षता और नवाचार: प्रशासनिक बाधा एक प्रछन्न कर” की तरह कार्य करती है, जो रचनात्मकता को बाधित करता है।
    • लेन-देन लागत में कमी: अनुपालन प्रबंधन में कमी एक प्रकार के राजकोषीय प्रोत्साहन की तरह कार्य करती है, जिससे कंपनियाँ अनुसंधान एवं विकास और नवाचार में पुनर्निवेश कर सकती हैं।
    • व्यवसाय की लागत में कमी: कुशल लॉजिस्टिक्स और त्वरित उपयोगिता इनपुट लागत को घटाते हैं।
      • उदाहरण: पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान विभागीय आँकड़ों को एकीकृत कर अवसंरचना स्वीकृतियों को तेज करता है, जिससे भारतीय विनिर्माण को प्रभावित करने वाली उच्च लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आती है।

बजट 2026-27 : भारत के व्यावसायिक परिदृश्य को सुदृढ़ करना

बजट 2026-27 निवेश परिदृश्य को बेहतर बनाने के लिए संरचनात्मक परिवर्तन प्रस्तुत करता है:

  • संरचनात्मक कर सुधार- निश्चितता और सरलीकरण: यह बजट आयकर अधिनियम, 2025 को प्रस्तुत करता है, जो एक आधुनिक, विधिक ढाँचा प्रदान करने के लिए 65 वर्ष पुराने वर्ष 1961 के अधिनियम को प्रभावी ढंग से समाप्त करता है।
    • आयकर अधिनियम, 2025: 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी, यह ऐतिहासिक कानून कर की परिभाषा को सरल बनाता है तथा संबंधित धाराओं की संख्या को कम करता है। नई कर व्यवस्था (वित्त वर्ष 2025-26) के तहत एक नया स्लैब ढाँचा ₹12 लाख तक की आय (या वैतनिक कर्मचारियों के लिए ₹12.75 लाख) को आयकर-मुक्त बनाता है।
    • MAT का युक्तिकरण: न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) को 15% से घटाकर 14% कर दिया गया है। महत्त्वपूर्ण रूप से, इसे अब एक अंतिम कर के रूप में प्रस्तावित किया गया है, जो जटिल “क्रेडिट संचय” (Credit accumulation) प्रणाली को समाप्त करता है।
    • MAT क्रेडिट लचीलापन: वित्तीय बाधाओं को रोकने के लिए, कंपनियाँ अब नई कर व्यवस्था में अपनी कर देनदारी के 1/4 (25%) तक मौजूदा MAT क्रेडिट को ‘सेट-ऑफ’ कर सकती हैं। अनुमानित आधार पर भुगतान करने वाले अनिवासियों को अब MAT से छूट दी गई है।
    • विधिक मामलों से राहत: CIT(A) के समक्ष अपील करने के लिए प्री-पेमेंट की आवश्यकता को मुख्य आयकर माँग के 20% से घटाकर आधा अर्थात् 10% कर दिया गया है, जिसमें अपील अवधि के दौरान दंड पर कोई ब्याज देनदारी नहीं होगी।
  • MSME “चैंपियन” रणनीति: MSMEs को अस्तित्व बचाने की स्थिति से बड़े स्तर पर ले जाने के लिए, बजट ऋण-भारी सहायता से इक्विटी और तरलता (Liquidity) की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
    • SME ग्रोथ फंड: ₹10,000 करोड़ का फंड, जो उच्च-क्षमता वाली फर्मों को विस्तार करने में सहायता के लिए इक्विटी पूँजी प्रदान करता है।
    • TReDS संस्थागतकरण: सभी CPSE खरीद के लिए व्यापार प्राप्य छूट प्रणाली (TReDS) को अनिवार्य करना, तत्काल तरलता सुनिश्चित करता है।
    • पेशेवर सहायता नेटवर्क: ICAI/ICSI के सहयोग से, सरकार टियर-II/III शहरों में MSMEs को मानकीकृत लागत पर अनुपालन में मदद करने के लिए, प्रशिक्षित पैरा-प्रोफेशनल्स/पेशेवरों का एक नेटवर्क बनाएगी।
  • सीमा शुल्क और व्यापार- “फैक्ट्री-टू-शिप” युग: व्यापार सुविधा को स्वचालन और विश्वास-आधारित मान्यता प्रणाली के माध्यम से सुधारा जा रहा है।
    • सीमा शुल्क एकीकृत प्रणाली (CIS): सभी सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के लिए एकल, स्वचालित मंच शुरू करने के लिए दो वर्षों का रोडमैप। अप्रैल 2026 तक भोजन, दवाओं और वन्यजीवों (70% इंटरडिक्टेड कार्गो) के लिए प्रक्रियाएँ CIS पर लाइव हो जाएंगी।
    • AI-सक्षम पोर्ट स्कैनिंग: अहस्तक्षेप युक्त इमेजिंग और AI-जोखिम मूल्यांकन का उपयोग करके प्रमुख बंदरगाहों पर प्रत्येक कंटेनर को स्कैन करने का अधिदेश।
    • विश्वसनीय आयातक योजना: मान्यता प्राप्त फर्में अबफैक्ट्री-टू-शिप” क्लीयरेंस का लाभ उठा सकती हैं, जिससे भौतिक सत्यापन और बंदरगाह पर देरी में अत्यधिक कमी आएगी।
  • फ्रंटियर प्रौद्योगिकी मिशन (ISM 2.0 और SHAKTI): “भविष्य के क्षेत्रों” में रणनीतिक निवेश वैश्विक विनिर्माण नेतृत्व बनाने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
    • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0: एक नए परिव्यय के साथ, ISM 2.0 चिपमेकिंग उपकरण, सामग्री निर्माण और फुल-स्टैक भारतीय सेमीकंडक्टर IP निर्माण पर केंद्रित है।
    • बायोफार्मा शक्ति (SHAKTI) मिशन: जैविक (Biologics) पारितंत्र निर्माण के लिए 5 वर्षों में ₹10,000 करोड़ की पहल, जिसमें 3 नए NIPER और 1,000+ नैदानिक परीक्षण स्थलों का नेटवर्क शामिल है।
    • इलेक्ट्रॉनिक्स घटक योजना: चाइना+1″ गति का लाभ उठाने के लिए वर्ष 2025 में शुरू की गई योजना का परिव्यय लगभग दुगुना कर ₹40,000 करोड़ कर दिया गया है।
  • पूँजी और वैश्विक एकीकरण:
    • पोर्टफोलियो निवेश (PROI) उदारीकरण: भारत के बाहर रहने वाले व्यक्ति (PROI) के लिए व्यक्तिगत निवेश सीमा 5% से दुगुनी कर 10% कर दी गई है, साथ ही कुल सीमा को बढ़ाकर 24% कर दिया गया है।
    • GCC के लिए सेफ हार्बर: IT, KPO और R&D सेवाओं को 15.5% के समान सेफ हार्बर मार्जिन के साथ एक ही श्रेणी में समेकित किया गया है, जिससे भारत वैश्विक क्षमता केंद्रों के लिए वैश्विक केंद्र बन गया है।
    • जन विश्वास 2.0: अपराधमुक्त करने का यह अगला चरण 17 अतिरिक्त कानूनों में मामूली प्रक्रियात्मक खामियों को लक्षित करता है, जो उद्यमशीलता संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आपराधिक मुकदमों को मौद्रिक दंड से बदल देता है।

भारत की पहल और राज्य-स्तरीय नवाचार

  • राष्ट्रीय स्तर के “डिजिटल गेटवे”: प्रमुख पहलों ने नियामक अनुभव को केंद्रीकृत कर दिया है, जिससे खंडित अनुमोदनों से हटकर संपूर्ण सरकार” का दृष्टिकोण अपनाया गया है।
    • राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS): एक डिजिटल गेटवे” के रूप में कार्य करते हुए, यह प्लेटफॉर्म अब 32 से अधिक केंद्रीय विभागों और 32 राज्य सरकारों को एकीकृत करता है।
      • नो योर अप्रूवल (KYA): एक अनूठी विशेषता, जहाँ एक व्यवसाय का मालिक अपना क्षेत्र और स्थान दर्ज करता है, तथा उसे आवश्यक लाइसेंस की एक सूची प्राप्त होती है।
      • सुरक्षित दस्तावेज भंडार:एक बार अपलोड करें, हर जगह उपयोग करें” प्रणाली प्रदान करता है, जिससे कई मंत्रालयों के व्यक्तिगत दौरों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
    • इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक (IILB): 4,000+ पार्कों में 5 लाख हेक्टेयर से अधिक औद्योगिक भूमि के वास्तविक समय डेटा के साथ एक GIS-मैप्ड राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से ऐतिहासिक “भूमि की बाधा” को समाप्त करता है।
      • भौगोलिक स्पष्टता: निवेशक स्थानीय नौकरशाही देरी का सामना किए बिना उपलब्ध भूखंडों की पहचान कर सकते हैं, निकटतम कच्चे माल और कनेक्टिविटी नोडल बिंदुओं को देख सकते हैं।
    • परिवेश (PARIVESH) 3.0: पर्यावरणीय मंजूरी के लिए, यह डिजिटल हब अब AI-सक्षम सहायता और वनीकरण भूमि बैंकों को एकीकृत करता है, जो अनुमोदन के पश्चात अनुपालन निगरानी के लिए एक सकारात्मक चक्र प्रदान करता है।
  • अपराधमुक्ति और श्रम सुधार: “विश्वास-आधारित शासन” की ओर ध्यान स्थानांतरित हो गया है, जो विशेष रूप से व्यापार में सुगमता (EoDB) और जीवन जीने की सुगमता (Ease of Living) को लक्षित करता है।
    • जन विश्वास विधेयक, 2025: इसमें 355 प्रावधान शामिल हैं, जो विशेष रूप से अपराधमुक्ति के लिए 288 प्रावधानों और जीवन जीने की सुगमता बढ़ाने हेतु 67 प्रावधानों को लक्षित करते हैं।
    • जन विश्वास 2.0: विधिक युक्तिकरण में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास, जो 17 अतिरिक्त कानूनों तक विस्तृत है और तकनीकी चूक के लिए दंड (कारावास) को मौद्रिक दंड (दीवानी मामले) में परिवर्तित करता है।
    • 30-दिवसीय श्रम अधिदेश: नए श्रम कोड के तहत, कारखाने के निर्माण या विस्तार की अनुमति देने के लिए 30 दिनों की कठोर समय-सीमा निर्धारित की गई है, जो पिछले 90 दिनों की अवधि से कम है।
    • करदाता संरक्षण: कुछ मामूली कर चूकों (जैसे- TCS चूक) के लिए अभियोजन को हटाता है, जिससे उद्यमियों को प्रशासनिक त्रुटियों के लिए आपराधिक मुकदमों से बचाया जा सके।
  • प्रतिस्पर्द्धी संघवाद और राज्य नवाचार: व्यापार सुधार कार्य योजना (बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान – BRAP) एक 489-पॉइंट आधारित, पूरी तरह से फीडबैक-आधारित ढाँचे(2024-26) के माध्यम से राज्य-स्तरीय परिवर्तन को संचालित करता है, जो वास्तविक उपयोगकर्ता अनुभव का मूल्यांकन करता है।
    • प्रमुख सुधारक और मॉडल:
      • शीर्ष उपलब्धि: हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश को भूमि, श्रम तथा निर्माण परमिट में प्राथमिकता वाले सुधारों के 100% कार्यान्वयन के लिए मान्यता दी गई।
      • उत्तर प्रदेश (स्केल चैंपियन): “ट्रिपल क्राउन” प्राप्त किया—15 मिनट में व्यावसायिक पंजीकरण, श्रम अनुपालन में 40% की कमी, और 50% तेजी से भूमि लेनदेन।
      • भूमि उपयोग के लिए नकारात्मक सूचियाँ : असम, जम्मू और कश्मीर, ओडिशा तथा त्रिपुरा ने मिश्रित भूमि-उपयोग क्षेत्रों के लिए “नकारात्मक सूचियों” का प्रयोग किया, जहाँ सभी व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति तब तक डिफ़ॉल्ट रूप से होती है जब तक कि स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित न हो।
      • तृतीय-पक्ष सुरक्षा: छत्तीसगढ़, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तृतीय-पक्ष भवन योजना अनुमोदन की ओर बढ़े, जबकि तेलंगाना और त्रिपुरा ने अग्नि सुरक्षा मानदंडों के लिए तृतीय-पक्ष पेशेवरों को मान्यता दी।
    • स्थिरता और विशिष्ट लक्षयीकरण:
      • आंध्र प्रदेश (डिजिटल एकीकरण): वास्तविक समय की पर्यावरणीय ट्रैकिंग के लिए ऑनलाइन सहमति प्रबंधन तथा निगरानी प्रणाली की शुरुआत की, और चुनिंदा श्रेणियों के लिए भूमि परिवर्तन की आवश्यकताओं को समाप्त किया।
      • तमिलनाडु (सतत उद्योग): एकल-खिड़की औद्योगिक मंजूरी को डीकार्बोनाइजेशन योजनाओं के साथ एकीकृत किया। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के श्रम पूल का विस्तार करने के लिए विनिर्माण पारियों (manufacturing shifts) पर लिंग-आधारित प्रतिबंधों को हटा दिया।
      • केरल (ग्रीन-टेक फोकस): शून्य कार्बन या कार्बन-न्यूट्रल ग्राम पंचायतें लागू कीं और ग्रीन-टेक स्टार्टअप के लिए पंजीकरण को सरल बनाया।
      • छत्तीसगढ़ (उद्यमी प्रोत्साहन): इसकी स्टार्टअप नीति 2025-30 बीज पूँजी (seed funding), क्रेडिट जोखिम फंड और ब्याज सब्सिडी प्रदान करती है।
  • वित्तीय आधुनिकीकरण और फीडबैक इकोसिस्टम: MSME की दो सबसे बड़ी बाधाओं—तरलता (liquidity) और नियामक प्रतिनिधित्व —से निपटना।
    • TReDS अधिदेश: सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSEs) के लिए अब TReDS प्लेटफॉर्म के माध्यम से भुगतान करना अनिवार्य है, जिससे व्यापार प्राप्य (trade receivables) की छूट देकर MSMEs को तत्काल तरलता प्राप्त होना, सुनिश्चित हो सके।
    • SME ग्रोथ फंड: ₹10,000 करोड़ का फंड, जो उच्च-क्षमता वाली फर्मों को ऋण के बोझ के बिना विस्तार करने के लिए इक्विटी पूंजी प्रदान करता है।
    • CII ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पोर्टल: नीतिगत उद्देश्य और जमीनी स्तर की वास्तविकता के बीच के अंतर को कम करने के लिए “रीयल-टाइम रेजोल्यूशन डैशबोर्ड” के माध्यम से निरंतर उद्योग फीडबैक की सुविधा प्रदान करता है।
  • संरचनात्मक सुधार:
    • RBI नियामक समेकन: 9,400 से अधिक परिपत्रों को निरस्त कर दिया, और ढांचे को केवल 238 कार्य-विशिष्ट मास्टर निर्देशों में समेकित किया।
    • बीमा क्षेत्र का उदारीकरण: सबका बीमा सबकी रक्षा अधिनियम, 2025 100% FDI की अनुमति देता है और विदेशी पुनर्बीमाकर्ताओं के लिए नेट ओन्ड फंड (NOF) को ₹5,000 करोड़ से घटाकर ₹1,000 करोड़ करता है।
    • डिजिटल क्रेडिट असेसमेंट मॉडल (CAM): सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने MSMEs के लिए डेटा-संचालित CAM को अपनाया। 2025 में, डिजिटल फुटप्रिंट का उपयोग करके 3.96 लाख से अधिक आवेदनों (₹52,300 करोड़) को मंजूरी दी गई।
    • GST 2.0: सितंबर 2025 के सुधारों ने एक सरल दो-दर संरचना को अपनाया, जिससे वस्त्र और उर्वरकों में इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (पृथक शुल्क संरचनाओं) को ठीक किया गया।

वैश्विक कार्य और पहलें

  • विश्व बैंक का “B-READY” प्रतिमान (2024-2026): “डूइंग बिजनेस” रैंकिंग की आगामी पहल के रूप में, बिजनेस रेडी (B-READY) राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता को मापने के तरीके में एक मूलभूत परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है।
    • तीन-स्तंभ दृष्टिकोण: केवलकागजी कानूनों” (De Jure) को देखने की बजाय, B-READY नियामक फ्रेमवर्क, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता, और परिचालन दक्षता (कंपनियों का वास्तविक अनुभव – De Facto) का मूल्यांकन करता है।
    • फर्म जीवनचक्र: यह एक फर्म की पूरी यात्रा को कवर करने वाले दस मुख्य विषयों की निगरानी करता है: बिजनेस एंट्री और श्रम से लेकर उपयोगिता सेवाओं तथा व्यावसायिक दिवालियापन तक।
    • क्षैतिज विषय (Horizontal Themes): वर्ष 2026 में, किसी अर्थव्यवस्था के स्कोर को तीन विषयों द्वारा व्यापक महत्त्व दिया जाता है- डिजिटल स्वीकृति, पर्यावरणीय स्थिरता और लैंगिक समानता।
  • WTO और वैश्विक व्यापार सुविधा: अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक निकाय यह सुनिश्चित करने के लिए नियमों में सामंजस्य बनाने पर कार्य कर रहे हैं, कि प्रक्रियात्मक लालफीताशाही” वैश्विक विकास को न रोक सके।
    • विकास के लिए निवेश सुविधा (IFD): 120 से अधिक WTO सदस्यों (संगठन के 70% का प्रतिनिधित्व) द्वारा समर्थित, इस ऐतिहासिक बहुपक्षीय समझौते का उद्देश्य पारदर्शिता के लिए एक वैश्विक बेंचमार्क स्थापित करना है। यह प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और $4 ट्रिलियन के SDG निवेश अंतराल को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित है।
    • विनियमन का अधिकार”: जहाँ IFD प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करता है, वहीं यह स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हित में विनियमित करने के देश के अधिकार की रक्षा करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सुविधा” का अर्थ आवश्यक मानकों का विनियमन हटाना नहीं है।
    • अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर (AEO) कार्यक्रम: WTO के व्यापार सुविधा समझौते के तहत, AEO कार्यक्रम “विश्वसनीय व्यापारियों” (उच्च अनुपालन रिकॉर्ड वाली फर्मों) को पसंदीदा उपचार प्राप्त करने की अनुमति देता है, जैसे कि तीव्र कार्गो क्लीयरेंस और कम भौतिक निरीक्षण।
  • UNCTAD- सतत FDI मॉडल: UNCTAD की वैश्विक निवेश सुविधा पहल किसी भी निवेश” से “गुणवत्तापूर्ण निवेश” की ओर बढ़ने पर बल देती है।
    • SDG-संरेखित विकास: विश्व निवेश मंच के माध्यम से, UNCTAD देशों को अपने व्यावसायिक परिदृश्य को सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ जोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है।
    • क्षेत्रीय फोकस: वित्त वर्ष 2025-2026 में, FDI पूंजी-गहन, प्रौद्योगिकी-संचालित क्षेत्रों में अत्यधिक केंद्रित हो गया है।
      • उदाहरण के लिए, डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर अब वैश्विक ग्रीनफील्ड परियोजना मूल्यों का लगभग 25% आकर्षित करते हैं, जिसके लिए विशेष “फास्ट-ट्रैक” विनियामक विंडो की आवश्यकता होती है।
  • OECD- कठोर विनियामक शासन : AI क्रांति के साथ सामंजस्य सुनिश्चित करने के लिए, OECD ऐसे शासन का समर्थन करता है, जो उस तकनीक की तरह ही अनुकूलन योग्य हो जिसे वह विनियमित करता है।
    • विनियामक सैंडबॉक्स : OECD “सैंडबॉक्स” के उपयोग को बढ़ावा देता है, जहाँ कंपनियाँ पूर्ण अनुपालन के तत्काल बोझ के बिना विनियामक पर्यवेक्षण के तहत AI और डिजिटल नवाचारों का परीक्षण कर सकती हैं।
    • कठोर AI शासन: ध्यान “स्थिर सुरक्षा उपायों” से हटकर निरंतर निगरानी और लाइव, अनुकूलन योग्य नीतियों की ओर स्थानांतरित हो गया है, जो वास्तविक समय में एल्गोरिदम परिवर्तन” या निष्पक्षता विचलन का पता लगा सकते हैं।
    • अंतरराष्ट्रीय विनियामक सहयोग (IRC): यह खंडित नियमों” को वैश्विक तकनीक-आधारित विकास में बाधा डालने से रोकता है, यह सुनिश्चित करता है कि एक देश का स्टार्टअप 190 अलग-अलग डिजिटल नियमों का सामना किए बिना सीमाओं के पार विस्तार कर सके।
  • क्षेत्रीय भागीदारी और ESG एकीकरण: IPEF (इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क) और RCEP जैसे बड़े व्यापारिक समूहों में तेजी से समर्पितईज ऑफ बिजनेस” अध्याय शामिल किए जा रहे हैं।
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): G20 सिद्धांतों द्वारा समर्थित, DPI का उपयोग वैश्विक अवसंरचना हब (GI Hub) जैसे पोर्टलों के माध्यम से परियोजना प्रायोजकों तथा वैश्विक फाइनेंसरों के मध्य सूचना अंतराल को कम करने के लिए किया जा रहा है।
    • ESG अधिदेश: वैश्विक पूंजी बाजार अब पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) रिपोर्टिंग को एक मुख्य व्यावसायिक मीट्रिक के रूप में देखते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्थिरता मानक बोर्ड (ISSB) के मानकीकृत रिपोर्टिंग ढाँचे नेईज ऑफ ग्रीन कम्प्लायंस” को वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए एक नया मोर्चा बना दिया है।
  • भारत का संरेखण: भारत सक्रिय रूप से अपने घरेलू सुधारों को इन वैश्विक बेंचमार्क के साथ एकीकृत कर रहा है। क्षेत्रों के उदारीकरण (जैसे- बीमा क्षेत्र में 100% FDI की अनुमति देना) और अपने सीमा शुल्क एकीकृत प्रणाली के डिजिटलीकरण के माध्यम से, भारत आगामी B-READY-2026 रिपोर्ट में स्वयं को एक “टॉप अचीवर” के रूप में स्थापित कर रहा है।

चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • न्यायिक विरोधाभास और अनुबंध प्रवर्तन: जहाँ भारत ने डिजिटल टैक्स फाइलिंग और बिजनेस रजिस्ट्रेशन में उपलब्धि प्राप्त की है, वहीं कानूनी प्रणाली अभी भी सुधारों का अंतिम लक्ष्य बनी हुई है।
    • लंबित मामलों का संकट: वर्ष 2026 तक, लगभग ₹24.7 लाख करोड़ (भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7.5%) मामले विभिन्न न्यायाधिकरणों में वाणिज्यिक विवादों में लंबित हैं।
    • समाधान का समय: हालाँकि विशेष अदालतों में वाणिज्यिक मामलों के निपटान के समय में सुधार हुआ है (वर्ष 2020 में 1,445 दिनों से घटकर हाल के वर्षों में लगभग 626 दिन), लेकिन न्यायिक प्रणाली अभी भी जिला न्यायालयों में 4.6 करोड़ से अधिक लंबित मामलों से जूझ रही है।
    • प्रभाव: यह देरी अनुबंधों को कमजोर करती है, जिससे दीर्घकालिक निवेशक—विशेष रूप से अवसंरचना निर्माण क्षेत्र में महंगे तृतीय-पक्ष मध्यस्थता खंडों (Arbitration Clauses) के बिना पूंजी लगाने में संकोच करते हैं।
  • MSME का “विनियामक कठोरता”: व्यापार सुगमता (EoDB) के अधिकांश लाभों का असमान रूप से बड़े निगमों को लाभ हुआ है। छोटे उद्यमों को अभी भी अत्यधिक प्रशासनिक बोझ का सामना करना पड़ रहा है।
    • अनुपालन का बोझ : एक ही राज्य में काम करने वाले एक सामान्य विनिर्माण MSME को अभी भी वार्षिक 1,450 से अधिक विनियामक दायित्वों का पालन करना पड़ता है।
    • अनुपालन लागत: ये दायित्व छोटी इकाइयों के लिए प्रति वर्ष ₹13-17 लाख के वित्तीय बोझ में बदल जाते हैं, यह वह पूंजी है, जिसका उपयोग अन्यथा नवाचार या भर्ती के लिए किया जा सकता था।
    • इंस्पेक्टर राज” का बना रहना: डिजिटलीकरण के बावजूद, MSMEs को अभी भी 59 विभिन्न प्रकार के निरीक्षकों से निपटना पड़ता है और मामूली प्रक्रियात्मक खामियों के लिए 480 से अधिक कारावास खंडों का सामना करना पड़ता है।
  • कार्यान्वयन अंतराल और असममित संघवाद: भारत केप्रतिस्पर्द्धी संघवाद” ने “शीर्ष उपलब्धि हासिल करने वाले राज्यों और पिछड़ने वाले क्षेत्रों के बीच एक बड़ा अंतराल उत्पन्न कर दिया है।
    • प्रदर्शन का अंतर: आंध्र प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान (BRAP) को 100% संस्थागत बना दिया है।
      • हालाँकि, कई आंतरिक राज्य अंतिम सीमा तक पहुँच” के साथ संघर्ष कर रहे हैं, जिससे FDI का असमान संकेंद्रण हो रहा है।
    • कागज बनाम व्यवहार” का अंतर: हालाँकि किसी राज्य मेंडिजिटल सिंगल विंडो” (De Jure) हो सकती है, लेकिन जमीनी स्तर पर निष्पादन (De Facto) के लिए प्रायः अनौपचारिक “रेंट-सीकिंग” (रिश्वतखोरी) या स्थानीय अधिकारियों के साथ व्यक्तिगत कार्यों की आवश्यकता होती है।
  • भूमि और श्रम संबंधी ‘सॉफ्ट’ लिंकेज बाधाएँ:
    • भूमि अधिग्रहण: भूमि एक जटिल राज्य सूची का विषय बनी हुई है। औद्योगिक भूमि बैंक (IILB) के बावजूद, कई क्षेत्रों में डिजिटल और स्पष्ट भूमि शीर्षकों (titles) की कमी बड़े पैमाने की परियोजनाओं को रोकती है।
    • कौशल अंतराल: जहाँ पीएम गति शक्ति के माध्यम से भौतिक बुनियादी ढाँचे (सड़कों और बंदरगाहों) का आधुनिकीकरण किया जा रहा है, वहीं सॉफ्ट” बुनियादी ढाँचा—विशेष रूप से औपचारिक कौशल प्रशिक्षण—अभी भी कम है।
      • कार्यबल का केवल एक छोटा हिस्सा औपचारिक रूप से कुशल है, जो पूंजी-गहन क्षेत्रों (जैसे- सेमीकंडक्टर) में “रोजगारहीन विकास” और श्रम-गहन विनिर्माण आवश्यकताओं के मध्य असंतुलन उत्पन्न करता है।
  • विश्व बैंक B-READY-2026 में संक्रमण: मूल “डूइंग बिजनेस” इंडेक्स के बंद होने के साथ, भारत वर्तमान में एक “बेंचमार्क जीरो” की स्थिति से गुजर रहा है।
    • नए मानक: B-READY ढाँचे में परिवर्तन पर्यावरणीय स्थिरता और लैंगिक समानता को शामिल करने के लिए लक्ष्यों को बदल देता है।
    • भारत का पायलट प्रदर्शन: शुरुआती पायलट डेटा से पता चलता है, कि भारत डिजिटल स्वीकृति (स्तंभ 3) में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन उपयोगिता कनेक्शन और व्यावसायिक दिवालियापन से संबंधित सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता (स्तंभ 2) में पीछे है।

आगे की राह 

  • न्यायिक दक्षता और अनुबंध प्रवर्तन: वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की राह में विधिक प्रणाली अंतिम बाधा बनी हुई है। प्राथमिकता विवाद समाधान के समय को वर्षों से घटाकर सप्ताहों में करने की है।
    • विशेषीकृत वाणिज्यिक न्यायालय : ₹3 लाख से अधिक के मामलों को प्रबंधित करने के लिए जिला स्तर पर समर्पित वाणिज्यिक न्यायालयों का तेजी से विस्तार।
      • इसका लक्ष्य भारतीय समाधान समय (1,400 दिन) को 400 दिनों के वैश्विक औसत के निकट लाना है।
    • ADR को मुख्यधारा में लाना: वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR), जैसे- मध्यस्थता और सुलाह को विधिक मामलों से पूर्व अनिवार्य बनाना।
    • AI-सहायता प्राप्त मामलों का प्रबंधन: नियमित मामलों को स्वचालित करने और न्यायिक प्रक्रिया मेंमानवीय संघर्ष” को कम करने के लिए ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट में AI टूल लागू करना।
  • स्थानीयकरण- D-BRAP युग: वास्तविक व्यावसायिक वार्ता स्थानीय स्तर पर पूर्ण होती है। वर्ष 2025 के अंत में शुरू किया गया जिला व्यापार सुधार कार्य योजना (D-BRAP), ध्यान राज्य की राजधानियों से हटाकर नगर पालिकाओं पर केंद्रित करता है।
    • अंतिम-लक्ष्य पहुँच कार्यान्वयन: निर्माण परमिट और उपयोगिता कनेक्शन के लिए शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) और जिला कलेक्ट्रेट को डिजिटल बुनियादी ढाँचे से युक्त करना।
    • U-PIN (विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या): स्पष्ट, विवाद-मुक्त डिजिटल शीर्षक बनाने के लिए “भूमि के लिए आधार” का देशव्यापी रोलआउट, जो औद्योगिक भूमि अधिग्रहण के जोखिमों को अत्यंत कम करेगा।
    • टियर-II/III शहरों में स्टार्टअप सेल: पहली पीढ़ी के उद्यमियों के लिए संपर्क का एक एकल बिंदु प्रदान करने के लिए जिला स्तर पर समर्पित “सुविधा इकाइयाँ” स्थापित करना।
  • MSME-केंद्रित ‘विश्वास-आधारित’ शासन: MSMEs को पुलिसिंग’ की बजाय ‘हैंडहोल्डिंग’ (सहयोग) की आवश्यकता है। ध्यान अनुपालन बोझ को कम करने पर है, जो वर्तमान में उनके वार्षिक टर्नओवर (लाभ) का 6-8% कम करता है।
    • जन विश्वास 3.0: सभी मामूली प्रक्रियात्मक खामियों के सार्वभौमिक अपराधमुक्तीकरण की प्रतिबद्धता, यह सुनिश्चित करते हुए किप्रशासनिक अस्तित्व” के लिए जेल जाने का भर न रहे।
    • स्व-प्रमाणन और जोखिम-आधारित ऑडिट: सूक्ष्म उद्यमों को यादृच्छिक निरीक्षण के साथ सेल्फ-ऑडिट मॉडल’ पर स्थानांतरित करना, जिससे भौतिक “इंस्पेक्टर राज” कम हो सके।
    • कॉरपोरेट मित्र: छोटे शहरों में MSMEs को सस्ती, मानकीकृत लागत पर डिजिटल अनुपालन पोर्टलों को समझने में मदद करने के लिए मान्यता प्राप्त पेशेवरों को प्रशिक्षित करना।
  • वैश्विक “B-READY” और ESG मानकों के साथ संरेखण: विश्व बैंक के नए B-READY इंडेक्स में प्रतिस्पर्द्धी बने रहने के लिए, भारत स्थिरता को अपने व्यावसायिक परिदृश्य में एकीकृत कर रहा है।
    • सभी के लिए ESG रिपोर्टिंग: मानकीकृत पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करना, जिससे हरित अनुपालन” वैश्विक निवेशकों के लिए गुणवत्ता का प्रतीक बन जाए।
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): एंड-टू-एंड’ पेपरलेस अनुपालन यात्रा बनाने के लिएइंडिया स्टैक” (आधार, डिजिलॉकर) का लाभ उठाना, जहाँ डेटा कर, श्रम और उद्योग विभागों के बीच निर्बाध रूप से प्रवाहित हो।
  • नवाचार और R&D प्रोत्साहन: एक सर्विस-हब से डीप-टेक लीडर के रूप में परिवर्तन के लिए R&D हेतु “नियामक व्यवस्था” की आवश्यकता है।
    • अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF): लक्षित कर प्रोत्साहन और नियामक सैंडबॉक्स के माध्यम से R&D में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना।
    • IP सुधार: बौद्धिक संपदा कार्यालय मेंलंबित मामलों” को कम करना, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भारत में पेटेंट फाइलिंग प्रक्रिया उतनी ही तीव्र हो जितनी अमेरिका या सिंगापुर में होती है।

निष्कर्ष

$5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और विकसित भारत@2047 की यात्रा केवल विनियमन हटाने पर नहीं, बल्कि बेहतर विनियमन पर निर्भर करती है। प्रतिस्पर्द्धी संघवाद को डिजिटल गवर्नेंस के साथ जोड़कर, भारत अपनेईज ऑफ डूइंग बिनेस” को अपने उद्यमियों तथा नागरिकों के लिए समान रूप से स्थायी “जीवन जीने की सुगमता” में परिवर्तित कर सकता है।

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