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Feb 09 2026

वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट प्राधिकरण (VOC पोर्ट) पर उन्नत एंटी-ड्रोन सुरक्षा प्रणाली

तमिलनाडु के थूथुकुडी (तूतीकोरिन) में स्थित वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट प्राधिकरण (VOC पोर्ट) उन्नत एंटी-ड्रोन सुरक्षा प्रणाली के कार्यान्वयन की शुरुआत करने वाला भारत का पहला बंदरगाह बन गया है।

एंटी-ड्रोन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ

  • स्वदेशी रक्षा क्षमता: यह प्रणाली स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-मेजर प्रौद्योगिकी में एक बड़ी प्रगति का प्रतिनिधित्व करती है, जो महत्त्वपूर्ण सुरक्षा अवसंरचना में भारत की आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करती है।
  • एकीकृत प्रौद्योगिकी: यह एक व्यापक, एकीकृत रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) और रडार-आधारित ड्रोन पहचान और जैमिंग प्रणाली है।
  • 360° कवरेज: जटिल बंदरगाह परिवेश के लिए अनुकूलित, यह 360-डिग्री कवरेज और सर्वदिशात्मक बेयरिंग प्रदान करती है।
  • प्रयुक्त घटक: इसमें ड्रोन डिटेक्टर, ड्रोन डिटेक्शन रडार, और मैन-पैक जैमर शामिल हैं।
  • परिचालन सीमा: यह 5 किमी. तक की प्रभावी सीमा के साथ सर्वदिशात्मक कवरेज प्रदान करती है।
  • क्षमताएँ: यह अनधिकृत ड्रोन की वास्तविक समय में पहचान, निगरानी, वर्गीकरण, और निष्क्रियकरण को सक्षम बनाती है।
    • त्वरित तैनाती के लिए डिजाइन की गई है और संवेदनशील परिचालन क्षेत्रों में सुरक्षा को सुदृढ़ करती है।
  • कार्यान्वयन भागीदार: VOC पोर्ट प्राधिकरण और सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (CEL) के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) सहयोग

भारत सरकार ने अपने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI), जिसे इंडिया स्टैक (India Stack) के नाम से भी जाना जाता है, पर सहयोग हेतु 23 देशों के साथ समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए हैं।

DPI सहयोग समझौते

  • उद्देश्य: ये MoUs मुख्य रूप से भारत के डिजिटल शासन प्लेटफॉर्म के साझा करने, प्रतिकृति बनाने और अपनाने पर केंद्रित हैं।
  • फोकस क्षेत्र: सहयोग में डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान, डेटा विनिमय, और नागरिक-केंद्रित सेवा प्लेटफॉर्म शामिल हैं।
    • इंडिया स्टैक के घटकों में डिजिटल पहचान के लिए आधार, भुगतान के लिए UPI, दस्तावेज भंडारण के लिए डिजिलॉकर, CoWIN, API सेतु, डेटा विनिमय, और सेवा वितरण प्लेटफॉर्म शामिल हैं।
  • यह पहल भारत को डिजिटल शासन में एक वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करती है और वित्तीय समावेशन तथा कुशल सार्वजनिक सेवाओं के लिए DPI कूटनीति को बढ़ावा देती है।
  • डिजिलॉकर: क्यूबा, केन्या, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), और लाओ पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक (Lao PDR/LPDR) के साथ विशेष रूप से डिजिलॉकर हेतु MoUs पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
  • व्यापक DPI सहयोग (जिसमें पहचान, भुगतान आदि शामिल हैं) सभी 23 देशों तक विस्तृत है।

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) का अंतरराष्ट्रीय विस्तार

  • भारत का प्रमुख यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) अब संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, फ्राँस, मॉरीशस और कतर सहित आठ से अधिक देशों में परिचालित है।
  • यह विस्तार सीमा-पार प्रेषण को समर्थन देता है, वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देता है, और वैश्विक फिनटेक पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करता है।

‘डीप टेक’ स्टार्ट-अप

केंद्र सरकार ने स्टार्ट-अप इंडिया के अंतर्गत वित्तपोषण, विनियमन, और दीर्घकालीन प्रौद्योगिकी नवाचार का मार्गदर्शन करने हेतु “डीप टेक स्टार्ट-अप्स” को आधिकारिक रूप से परिभाषित किया है।

  • स्टार्ट-अप इंडिया योजना उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) द्वारा संचालित एक प्रमुख पहल है, जिसे वर्ष 2016 में नवाचार को बढ़ावा देने हेतु शुरू किया गया था और यह मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप्स को कर छूट, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) की त्वरित प्रक्रिया, तथा आसान अनुपालन जैसे लाभ प्रदान करती है।

‘डीप टेक’ स्टार्ट-अप के बारे में

  • डीप टेक स्टार्टअप वे कंपनियाँ हैं, जो मुख्यतः नए वैज्ञानिक या इंजीनियरिंग ज्ञान पर आधारित समाधान विकसित करती हैं, जिनमें उच्च अनुसंधान एवं विकास (R&D) तीव्रता, लंबी विकास अवधि, और महत्त्वपूर्ण तकनीकी अनिश्चितता होती है। इनमें प्रायः उल्लेखनीय बौद्धिक संपदा (IP) सृजन तथा उच्च पूँजी, अवसंरचना, और प्रतिभा की आवश्यकता होती है।
  • ऐसे स्टार्ट-अप ₹300 करोड़ की टर्नओवर सीमा के साथ 20 वर्षों तक “स्टार्ट-अप” का दर्जा बनाए रख सकते हैं, जो लंबे व्यावसायीकरण समय-सीमा को दर्शाता है।

डीप टेक क्या है?

  • डीप टेक उन अत्याधुनिक और प्रायः विघटनकारी प्रौद्योगिकियों को संदर्भित करता है, जो गहन वैज्ञानिक खोजों, इंजीनियरिंग नवाचारों, या अनुसंधान क्षेत्रों में प्रगति पर आधारित होती हैं, और जिनमें उद्योगों, अर्थव्यवस्थाओं, तथा जीवन को मूल रूप से परिवर्तित करने की क्षमता होती है।
  • डीप टेक के अनुप्रयोग
    • स्वास्थ्य सेवा: प्रिसीजन मेडिसिन, निदान, चिकित्सा उपकरण
    • कृषि एवं ऊर्जा: जलवायु-सहिष्णु फसलें, नवीकरणीय ऊर्जा समाधान
    • विनिर्माण एवं रक्षा: रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, उन्नत विनिर्माण प्रणालियाँ
    • जलवायु एवं पर्यावरण: कार्बन कैप्चर, जलवायु मॉडलिंग, आपदा पूर्वानुमान, स्मार्ट पर्यावरण निगरानी, और सतत् सामग्री
    • अंतरिक्ष एवं गतिशीलता: उपग्रह प्रौद्योगिकियाँ, पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण प्रणालियाँ, स्वायत्त वाहन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, और उन्नत नेविगेशन प्रणालियाँ
    • डिजिटल एवं कंप्यूटिंग: क्वांटम कंप्यूटिंग, उन्नत AI प्रणालियाँ, साइबर सुरक्षा, उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग, और अगली पीढ़ी के संचार नेटवर्क
    • शहरी अवसंरचना: स्मार्ट सिटी, बुद्धिमान परिवहन प्रणालियाँ, डिजिटल ट्विन्स, और सुदृढ़ अवसंरचना योजना।

महत्व: डीप टेक की एक स्पष्ट परिभाषा लक्षित वित्तपोषण, विनियामक स्पष्टता, और उच्च-प्रभावी प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप्स के लिए दीर्घकालिक समर्थन सक्षम बनाकर भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करती है।

‘न्यू स्टार्ट ट्रीटी’ का विस्तार

‘न्यू स्टार्ट ट्रीटी’ की समाप्ति ने अमेरिका को एक नए, विस्तारित परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते की माँग करने के लिए प्रेरित किया है, जिससे वैश्विक परमाणु प्रतिस्पर्द्धा के पुनः उभरने की आशंकाएँ बढ़ गई हैं।

‘न्यू स्टार्ट ट्रीटी’ के बारे में

  • न्यू स्टार्ट (Strategic Arms Reduction Treaty) संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच अंतिम प्रमुख परमाणु हथियार नियंत्रण समझौता था, जिसका उद्देश्य रणनीतिक स्थिरता बनाए रखना था।
  • समझौता: यह संधि वर्ष 2010 में अमेरिका और रूस द्वारा हस्ताक्षरित की गई थी, जो शीतयुद्ध काल के परमाणु भंडार सीमित करने के प्रयासों को आगे बढ़ाती थी।
  • नवीनीकरण और वैधता: मूल रूप से 10 वर्षों के लिए वैध इस संधि की समय सीमा वर्ष 2021 में एक बार बढ़ाई गई थी और आगे न बढ़ाए जाने के कारण फरवरी 2026 में समाप्त हो गई।
  • मुख्य प्रावधान
    • अमेरिका और रूस दोनों के लिए तैनात परमाणु वारहेड की संख्या 1,550 तक सीमित की गई थी।
    • अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBMs), पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल (SLBMs), और भारी बमवर्षकों जैसे तैनात वितरण प्रणालियों को सीमित किया गया था।
    • आपसी निरीक्षण, डेटा आदान-प्रदान, और पारदर्शिता उपायों का प्रावधान किया गया था ताकि विश्वास का निर्माण हो सके।

हथियार नियंत्रण पर अमेरिका का नया दृष्टिकोण

  • अमेरिका ने न्यू स्टार्ट के स्थान पर एक नई, आधुनिकीकृत परमाणु संधि का प्रस्ताव रखा है।
  • अमेरिका का कहना है कि चीन को इसमें शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि उसका परमाणु भंडार तेजी से बढ़ रहा है।
  • अमेरिका ने चीन पर गोपनीय परमाणु परीक्षण और पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया है। साथ ही न्यू स्टार्ट को त्रुटिपूर्ण बताते हुए उसकी आलोचना की है।

‘न्यू स्टार्ट ट्रीटी’ की समाप्ति के संभावित प्रभाव

  • कानूनी सीमाओं के हटने से प्रमुख शक्तियों के बीच अनियंत्रित परमाणु हथियार दौड़ शुरू हो सकती है।
  • पारदर्शिता और निरीक्षण में कमी से रणनीतिक अनिश्चितता और गलत आकलन का जोखिम बढ़ जाता है।
  • वैश्विक परमाणु स्थिरता कमजोर हो सकती है, जिससे दशकों के हथियार नियंत्रण और निरस्त्रीकरण प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं।

‘न्यू स्टार्ट ट्रीटी’ का पतन परमाणु शासन में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है, जो बहुध्रुवीय विश्व में समावेशी और विश्वसनीय हथियार नियंत्रण तंत्र की तत्काल आवश्यकता को उजागर करता है।

शहरी ऊष्मा तनाव

हाल ही में यूनाइटेड किंगडम स्थित एक शोध ने चेतावनी दी है कि भारतीय शहर जलवायु मॉडल अनुमानों की तुलना में 0.5–2°C अधिक गर्म हो सकते हैं, जिसमें छोटे शहरों को असमान रूप से अधिक ऊष्मा तनाव का सामना करना पड़ सकता है।

भारत में तापमान संबंधी रुझान

  • अध्ययन किए गए 18 भारतीय शहर आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक तीव्रता से गर्म हो रहे हैं।
  • औसतन, भारतीय शहर क्षेत्रीय अर्थ सिस्टम मॉडल (ESM) अनुमानों की तुलना में लगभग 45% अधिक गर्म हो रहे हैं।
  • पटियाला जैसे शहरों में अनुमानित तापवृद्धि दोगुनी हो सकती है, जहाँ 2°C की वृद्धि शहरी प्रभावों के कारण लगभग 4°C तक पहुँच सकती है।
    • छोटे और गैर-महानगरीय शहरों को मेगासिटीज की तुलना में अधिक सापेक्ष जोखिम का सामना करना पड़ता है।

शहरी ऊष्मा तनाव 

  • शहरी ऊष्मा तनाव से तात्पर्य शहरों में अनुभव की जाने वाली अत्यधिक गर्मी से है, जो जलवायु परिवर्तन और स्थानीय शहरी विशेषताओं दोनों के कारण होती है और शहरों को निकटवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक गर्म बनाती है।

उत्तरदायी कारक

  • शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव: निर्मित क्षेत्र वनस्पति भूमि की तुलना में अधिक ऊष्मा अवशोषित और संचित करते हैं।
    • शहरों में आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में तापमान अत्यधिक होता है, जहाँ दिन के समय तापमान 1–7°F और रात के समय 2–5°F अधिक रहता है।
  • कम वनस्पति आवरण: कम वाष्पोत्सर्जन शहरों में प्राकृतिक शीतलन को सीमित करता है।
  • अभेद्य सतहें: कंकरीट और डामर ऊष्मा अवशोषण बढ़ाते हैं और नमी धारण क्षमता को कम करते हैं।
  • मॉडल की सीमाएँ: कम-रिजॉल्यूशन आधारित जलवायु मॉडल शहरों को ग्रामीण क्षेत्रों के साथ संयोजित कर देते हैं, जिससे शहरी-विशिष्ट ऊष्मावृद्धि छिप जाती है।

शहरी ऊष्मा तनाव का प्रभाव

  • गर्मी से संबंधित बीमारियों और मृत्यु जोखिम में वृद्धि।
  • जल और बिजली की माँग में वृद्धि, जिससे शीतलन पर सार्वजनिक व्यय बढ़ता है।
  • शहरी जीवन-योग्यता और उत्पादकता में कमी, विशेषकर कमजोर वर्गों के लिए।
  • शहरों और ग्रामीण पिछड़े क्षेत्रों के बीच तापमान अंतर में वृद्धि, जिससे जलवायु असमानता बढ़ती है।

यह अध्ययन भारत में बढ़ते शहरी ऊष्मा जोखिमों से निपटने के लिए शहरी-विशिष्ट जलवायु योजना, बेहतर मॉडलिंग, और ऊष्मा-प्रतिरोधी शहर डिजाइन की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

‘अग्नि-3’ मिसाइल

हाल ही में भारत ने ओडिशा के चाँदीपुर से अग्नि-3 मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया, जिससे इसकी पूर्ण परिचालन तत्परता की पुष्टि हुई।

‘अग्नि-3’ मिसाइल के बारे में

अग्नि-3 एक मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) है, जो अग्नि मिसाइल शृंखला के अंतर्गत भारत की स्थल-आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का एक महत्त्वपूर्ण घटक है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • मारक क्षमता (Range): लगभग 3,000 किमी., जिससे विस्तृत क्षेत्रीय लक्ष्यों को कवर किया जा सकता है।
  • प्रणोदन (Propulsion): दो-चरणीय ठोस ईंधन मिसाइल, जो त्वरित प्रक्षेपण तत्परता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है।
  • पेलोड क्षमता (Payload Capability): पारंपरिक या परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम।
  • मार्गदर्शन प्रणाली (Guidance System): उच्च सटीकता प्रदान करने वाली उन्नत जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली।
  • प्रक्षेपण प्लेटफॉर्म (Launch Platform): सड़क पर गतिशील प्रक्षेपक, जो इसकी उत्तरजीविता और लचीलापन बढ़ाता है।

महत्त्व

  • रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करता है: विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक सिद्धांत के अंतर्गत दीर्घ-सीमा शत्रुतापूर्ण खतरों को रोकने की भारत की क्षमता को बढ़ाता है।
  • द्वितीय-प्रहार क्षमता सुनिश्चित करता है: परमाणु हमले की स्थिति में उत्तरजीविता और प्रतिक्रिया विकल्पों में सुधार करता है।
  • मिसाइल स्पेक्ट्रम को पूर्ण करता है: अग्नि-1 से अग्नि-5 तक की शृंखला को पूरक बनाता है, जो 700–5,000 किमी. की रणनीतिक दूरी सीमा को शामिल करती है।

अग्नि-3 का सफल परीक्षण, रणनीतिक बल कमान (Strategic Forces Command) के अंतर्गत भारत की परमाणु प्रक्षेपण तत्परता, परिचालन विश्वसनीयता, और दीर्घकालिक रणनीतिक स्थिरता को सुदृढ़ करता है।

संदर्भ

संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत ने पारस्परिक रूप से लाभकारी व्यापार पर एक अंतरिम समझौते के लिए एक ढाँचे पर सहमति व्यक्त की है, जिससे व्यापक अमेरिका–भारत द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) संबंधी वार्ताओं के प्रति प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की गई है।

अंतरिम व्यापार समझौते की प्रमुख विशेषताएँ

  • शुल्क उदारीकरण और बाजार पहुँच
    • अमेरिकी वस्तुओं पर शुल्क में कमी: भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं तथा अमेरिकी कृषि और खाद्य उत्पादों की एक विस्तृत शृंखला पर “शुल्क समाप्त या कम” करेगा।
    • शामिल प्रमुख कृषि उत्पाद: इनमें सूखे डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGs), पशु आहार हेतु लाल ज्वार, नट्स, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स, तथा अतिरिक्त उत्पाद शामिल हैं।
    • 18% की पारस्परिक शुल्क दर: अमेरिका भारतीय मूल के उत्पादों पर 18 प्रतिशत की पारस्परिक शुल्क दर लागू करेगा।
    • प्रभावित क्षेत्र: इनमें वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर, जैविक रसायन, गृह सजावट, हस्तशिल्प उत्पाद, तथा कुछ मशीनरी शामिल हैं।
    • प्रमुख क्षेत्रों पर शुल्क हटाना: अंतरिम समझौते के निष्कर्ष के अधीन, अमेरिका पहचाने गए भारतीय उत्पादों पर शुल्क हटाएगा, जिनमें जेनेरिक फार्मास्यूटिकल्स, रत्न और हीरे, तथा विमान पुर्जे शामिल हैं।
  • क्षेत्रीय रियायतें और व्यापार सुगमता
    • विमान-संबंधी शुल्कों का हटाया जाना: अमेरिका एल्युमिनियम, स्टील और कॉपर आयात से संबंधित धारा 232 के तहत आने वाली घोषणाओं के अंतर्गत भारत पर लगाए गए कुछ विमानों और विमान पुर्जों पर शुल्क हटाएगा।
    • ऑटो पार्ट्स हेतु अधिमान्य शुल्क कोटा: भारत को घोषणा 9888 के अंतर्गत ऑटोमोटिव पार्ट्स के लिए एक अधिमान्य शुल्क दर कोटा प्राप्त होगा।
    • गैर-शुल्क बाधाओं में कमी: भारत ने अमेरिकी चिकित्सा उपकरणों, ICT आयात, और कृषि उत्पादों को प्रभावित करने वाली बाधाओं, जिनमें लाइसेंसिंग प्रतिबंध और मानकों की मान्यता शामिल है, को संबोधित करने की प्रतिबद्धता जताई है।
  • रणनीतिक व्यापार, प्रौद्योगिकी और आपूर्ति शृंखलाएँ
    • अधिमान्य बाजार पहुँच की प्रतिबद्धता: दोनों पक्ष पारस्परिक रूप से पहचाने गए प्राथमिकता क्षेत्रों में निरंतर अधिमान्य बाजार पहुँच प्रदान करेंगे।
    • उत्पत्ति नियमों का ढाँचा: दोनों देश यह सुनिश्चित करने के लिए उत्पत्ति नियम स्थापित करेंगे कि व्यापार लाभ मुख्यतः अमेरिकी और भारतीय उत्पादकों को प्राप्त हों।
    • आपूर्ति शृंखला और आर्थिक सुरक्षा: यह समझौता आपूर्ति शृंखला की लचीलापन, निवेश स्क्रीनिंग, निर्यात नियंत्रण, तथा तीसरे देशों की गैर-बाजार नीतियों के प्रति प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करने हेतु सहयोग पर बल देता है।
    • ऊर्जा और रणनीतिक खरीद: भारत पाँच वर्षों में अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों, विमानों, प्रौद्योगिकी वस्तुओं, बहुमूल्य धातुओं, और कोकिंग कोयले की 500 अरब डॉलर मूल्य की खरीद करने का लक्ष्य रखता है।
    • प्रौद्योगिकी व्यापार का विस्तार: दोनों देश GPU और डेटा-सेंटर से संबंधित वस्तुओं सहित प्रौद्योगिकी उत्पादों में व्यापार को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएँगे, तथा संयुक्त प्रौद्योगिकी सहयोग का विस्तार करेंगे।

समझौते की प्रकृति

  • FTA के विपरीत, यह अंतरिम समझौता सभी क्षेत्रों में व्यापार बाधाओं को पूर्णतः समाप्त करने के बजाय चयनित शुल्क उदारीकरण और बाजार पहुँच प्रतिबद्धताओं पर केंद्रित है।

भारत–अमेरिका व्यापार संबंध

  • द्विपक्षीय व्यापार (वित्त वर्ष 2025): वित्त वर्ष 2025 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार US$ 132.2 अरब के रिकॉर्ड स्तर पर रहा, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह US$ 119.71 अरब था।
  • व्यापार संतुलन: वित्त वर्ष 2025 में भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष US$ 40.82 अरब था।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): अमेरिका अप्रैल 2000 से मार्च 2025 तक US$ 70.65 अरब के संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह के साथ भारत में तीसरा सबसे बड़ा निवेशक है।
  • भारत से अमेरिका को प्रमुख निर्यात
    • भारत का अमेरिका को निर्यात वित्त वर्ष 2024 में US$ 77.51 अरब से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में US$ 86.51 अरब हो गया।
    • अमेरिका को भारत के निर्यात में विद्युत मशीनरी, बहुमूल्य और अर्द्ध-बहुमूल्य पत्थर और धातुएँ, औषधि उत्पाद, मशीनरी और यांत्रिक उपकरण, खनिज ईंधन तथा लौह एवं इस्पात के उत्पाद प्रमुख रहे।
  • अमेरिका से भारत द्वारा प्रमुख आयात
    • अमेरिका से भारत का आयात वित्त वर्ष 2024 में US$ 42.19 अरब से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में US$ 45.69 अरब हो गया।
    • वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका से भारत का आयात मुख्यतः खनिज ईंधन और तेल, बहुमूल्य और अर्द्ध-बहुमूल्य पत्थर और धातुएँ, परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, तथा विद्युत उपकरणों पर केंद्रित रहा, जो मजबूत ऊर्जा और प्रौद्योगिकी संबंध को दर्शाता है।
  • शिक्षा और मानव पूँजी संबंध
    • संयुक्त राज्य अमेरिका उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीय छात्रों के लिए सबसे पसंदीदा गंतव्यों में से एक बना हुआ है।
    • सितंबर 2023 तक, लगभग 3.2 लाख भारतीय छात्र अमेरिका में अध्ययन कर रहे थे, जिनमें मुख्यतः STEM-संबंधित स्नातकोत्तर कार्यक्रम शामिल थे।
    • अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, भारतीय छात्र प्रतिवर्ष अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगभग USD 7.7 अरब का योगदान करते हैं।

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना विधानसभा के अध्यक्ष को बीआरएस विधायकों के विरुद्ध लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए अंतिम अवसर प्रदान किया है, जिन पर सत्तारूढ़ कांग्रेस में शामिल होने के बाद दलबदल का आरोप है।

मामले की पृष्ठभूमि

  • दलबदल याचिकाएँ: तेलंगाना में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के बाद दलबदल के आरोपों का सामना कर रहे 10 भारत राष्ट्र समिति (BRS) विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएँ दायर की गई थीं।
  • अंतिम दो विधायकों के विरुद्ध याचिकाएँ अभी लंबित हैं, जबकि अन्य मामलों में निर्णय लिया जा चुका है।

स्पीकर की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • संवैधानिक प्रतिरक्षा नहीं: न्यायालय ने दोहराया कि दसवीं अनुसूची के अंतर्गत न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करते समय स्पीकर को कोई संवैधानिक प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं होती है।
  • विलंबकारी रणनीति के विरुद्ध: न्यायालय ने बल दिया कि अध्यक्ष अयोग्यता संबंधी याचिकाओं को सदन के कार्यकाल की समाप्ति तक स्वाभाविक रूप से समाप्त होने तक लंबित नहीं रख सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश

  • अंतिम समय-सीमा: न्यायालय ने शेष दो विधायकों के विरुद्ध याचिकाओं पर “निश्चित रूप से निर्णय” लेने हेतु अध्यक्ष को तीन सप्ताह का समय दिया।
  • अवमानना संबंधी चेतावनी: न्यायालय ने चेतावनी दी कि समय-सीमा से आगे की देरी को अवमानना माना जाएगा, क्योंकि अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अर्द्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करते हैं।

दलबदल विरोधी कानून को बार-बार पार्टी बदलने से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए लाया गया था, जिसे वर्ष 1967 की “आया राम गया राम” घटना से लोकप्रियता मिली, जब एक विधायक ने कुछ ही सप्ताहों में तीन बार पार्टी बदली थी।

दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के प्रमुख प्रावधान

  • संवैधानिक आधार: दलबदल विरोधी कानून, वर्ष 1985 के 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया, अनुच्छेद-102(2) और 191(2) के माध्यम से संचालित होता है तथा दलबदल के आधार पर विधायकों की अयोग्यता का प्रावधान करता है।
  • अयोग्यता के आधार: किसी राजनीतिक दल से संबंधित विधायक अयोग्य हो, यदि वह:
    • स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
    • बिना पूर्व अनुमति सदन में पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
    • पार्टी की अनुमति का अपवाद: यदि सदस्य ने पार्टी से पूर्व अनुमति ली हो, या पार्टी 15 दिनों के भीतर उसके मतदान अथवा अनुपस्थिति को स्वीकार कर ले, तो वह अयोग्य नहीं होगा।
    • नामित सदस्य: यदि कोई नामित सदस्य सदन में स्थान ग्रहण करने की तिथि से छह माह के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य होगा।
    • स्वतंत्र सदस्य: यदि कोई स्वतंत्र सदस्य निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य होगा।

विभाजन संबंधी प्रावधान की समाप्ति: विधानमंडल दल के एक-तिहाई सदस्यों द्वारा विभाजन की स्थिति में अयोग्यता से छूट देने वाले प्रावधान को 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा समाप्त कर दिया गया, क्योंकि इसका व्यापक दुरुपयोग हो रहा था।

  • अयोग्यता संबंधी अपवाद 
    • विलय आधारित छूट: जब मूल राजनीतिक दल के कम-से-कम दो-तिहाई विधायक किसी अन्य दल में विलय पर सहमत हों, तो उन्हें अयोग्यता से छूट प्राप्त होगी।
    • पीठासीन अधिकारी: किसी सदस्य को अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा, यदि:
      • वह अध्यक्ष/सभापति चुने जाने के बाद अपनी पार्टी से त्याग-पत्र देता है।
      • पद छोड़ने के बाद वह पुनः अपनी पार्टी में शामिल हो सकता है।
  • निर्णायक प्राधिकारी: दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता से संबंधित सभी मामलों का निर्णय अध्यक्ष या सभापति द्वारा किया जाता है।
    • वे दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत अर्द्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करते हैं।
  • निश्चित समय-सीमा का अभाव: कानून में निर्णय के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है, जिससे अनेक मामलों में विलंब होता है।
  • दलबदल मामलों की प्रक्रिया
    • आरंभ: दलबदल का मामला तभी शुरू किया जा सकता है, जब सदन के किसी सदस्य द्वारा शिकायत की जाए।
    • स्पष्टीकरण का अवसर: आरोपी सदस्य को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना अनिवार्य है।
  • व्हिप की भूमिका
    • व्हिप पार्टी सदस्यों की उपस्थिति और मतदान संबंधी अनुशासन को सुनिश्चित करता है।
    • व्हिप की अवहेलना कर पार्टी के विरुद्ध मतदान करने पर दलबदल कानून के अंतर्गत कार्रवाई हो सकती है।

दलबदल संबंधी मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण

  • किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू (1992): सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा तथा स्पष्ट किया कि इसके अंतर्गत अध्यक्ष के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।
  • रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994): न्यायालय ने कहा कि किसी विधायक के आचरण और व्यवहार के आधार पर, बिना औपचारिक त्याग-पत्र दिए भी, उसे स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता छोड़ने वाला माना जा सकता है।
  • नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016): न्यायालय ने निर्णय दिया कि जब अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव लंबित हो, तब वह दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय नहीं दे सकता।
  • केइशाम मेघाचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि दलबदल संबंधी मामलों का निर्णय उचित समय-सीमा के भीतर किया जाना चाहिए।

दलबदल विरोधी कानून पर समितियों की सिफारिशें

  • दिनेश गोस्वामी समिति (1990)
    • अयोग्यता को केवल स्वैच्छिक दल-त्याग या विश्वास/अविश्वास प्रस्ताव के दौरान व्हिप उल्लंघन तक सीमित किया जाए।
    • दलबदल से संबंधित मामलों का निर्णय अध्यक्ष के बजाय निर्वाचन आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा किया जाए।
  • संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (2002)
    • दलबदलुओं को शेष कार्यकाल के लिए किसी भी सार्वजनिक पद या वेतनभोगी राजनीतिक पद से वंचित किया जाए।
    • यदि किसी दलबदलू के मत से सरकार गिरती है, तो उस मत को अमान्य माना जाए।

PWOnlyIAS विशेष

न्यायालय की अवमानना

  • संविधान न्यायालय की अवमानना” को परिभाषित नहीं करता है; इसे अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 के अंतर्गत परिभाषित किया गया है, जो अवमानना को दीवानी और आपराधिक श्रेणियों में वर्गीकृत करता है।
  • सिविल अवमानना का अर्थ है किसी न्यायालय के निर्णय, आदेश, रिट या निर्देश की जानबूझकर अवहेलना करना या न्यायालय को दी गई किसी प्रतिज्ञा का जानबूझकर उल्लंघन करना।
  • आपराधिक अवमानना में ऐसे कृत्य या प्रकाशन शामिल होते हैं, जो किसी न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं या उसके अधिकार को कम करते हैं, न्यायिक कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करते हैं, अथवा न्याय के प्रशासन में बाधा उत्पन्न करते हैं।

संदर्भ

सोने और चाँदी की कीमतों में हालिया तेजी उस समय अचानक रुक गई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने केविन वार्श को अगला फेडरल रिजर्व अध्यक्ष नामित किया, जिससे डॉलर मजबूत हुआ और कीमती धातुओं की अस्थिरता प्रदर्शित हुई।

संबंधित तथ्य

  • सोने का मूल्य 5,523 डॉलर प्रति औंस (29 जनवरी) के अधिकतम मूल्य से कम हो गया, जबकि चाँदी का मूल्य 116 डॉलर प्रति औंस (30 जनवरी) से कम हो गया।
  • अमेरिकी मौद्रिक नीति के कठोर होने की बाजार अपेक्षाओं ने अमेरिकी डॉलर को मजबूत किया, जिससे कीमती धातुओं के  मूल्य में सुधार हुआ।

विश्व स्तर पर सोने और चाँदी की कीमतों को प्रभावित करने वाले कारक

  • माँग – आपूर्ति की गतिशीलता: जब वैश्विक माँग, उपलब्ध आपूर्ति से तेजी से बढ़ती है तो सोने और चाँदी की कीमतें बढ़ती हैं, और जब आपूर्ति बढ़ती है या माँग कमजोर होती है तो कीमतें गिरती हैं।
  •  खनन उत्पादन और उत्पादन लागत
    • गहन भंडार, ऊर्जा लागत में वृद्धि तथा कठोर पर्यावरणीय मानकों के कारण खनन महँगा होने पर कीमतें बढ़ जाती हैं।
    • सोने और चाँदी की आपूर्ति प्रमुख उत्पादक देशों के उत्पादन रुझानों से प्रभावित होती है, जैसे:
      • चीन, ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा, अमेरिका (सोना)
      • मैक्सिको, चीन, पेरू, चिली, ऑस्ट्रेलिया (चाँदी)।
  • मुद्रास्फीति
    • मुद्रास्फीति के दौरान कीमतें सामान्यतः बढ़ती हैं, क्योंकि निवेशक क्रय-शक्ति की रक्षा के लिए कीमती धातुओं का उपयोग करते हैं।
    • जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो सोने की कीमतें कम होने लगती हैं, क्योंकि बॉण्ड और जमा पर अधिक रिटर्न मिलने से बिना ब्याज वाली संपत्ति के रूप में सोने का आकर्षण कम हो जाता है।
  • अमेरिकी डॉलर की मजबूती
    • सोने और चाँदी की कीमतें अक्सर अमेरिकी डॉलर के विपरीत दिशा में चलती हैं, क्योंकि मजबूत डॉलर इन धातुओं को गैर-डॉलर खरीदारों के लिए महँगा बना देता है, जिससे वैश्विक माँग घटती है।
  • केंद्रीय बैंक की नीतियाँ और खरीद
    • केंद्रीय बैंक सोने की कीमतों को प्रभावित करते हैं, क्योंकि वे भंडार में विविधता लाने और मुद्रा जोखिम कम करने के लिए सोना खरीदते हैं।
    • चाँदी मुख्यतः औद्योगिक और बाजार माँग से प्रभावित होती है, न कि आधिकारिक भंडार से।
  • भू-राजनीतिक तनाव और अनिश्चितता: युद्ध, संघर्ष या वैश्विक संकट के दौरान सोने की कीमतें बढ़ती हैं, क्योंकि सोने को सुरक्षित आश्रय संपत्ति माना जाता है।
  • आर्थिक मंदी या मंदी का दौर: मंदी के समय सोने की कीमतें बढ़ने लगती हैं, क्योंकि निवेशक जोखिमपूर्ण परिसंपत्तियों से हटकर सुरक्षित मूल्य-संचय की ओर जाते हैं।
  • बाजार संबंधी अनुमान: भारत जैसे देशों में, जब आयात शुल्क, कर या प्रतिबंध घरेलू सोने की लागत बढ़ाते हैं, तो सोने की कीमतें बढ़ जाती हैं।
  • औद्योगिक और तकनीकी माँग
    • चाँदी की कीमतें उद्योग से अत्यधिक प्रभावित होती हैं, क्योंकि चाँदी का व्यापक उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, बैटरी, चिकित्सा उपकरण और रोगाणुरोधी अनुप्रयोगों में होता है।
    • सोने की कीमतें भी तकनीक से प्रभावित होती हैं, क्योंकि सोने का उपयोग उच्च-स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस, चिकित्सा उपकरणों और जंग-रोधी घटकों में किया जाता है।
  • आभूषण और सांस्कृतिक माँग
    • आभूषणों की माँग बढ़ने पर सोने की कीमतें बढ़ती हैं, क्योंकि भारत और चीन में शादियों और त्योहारों के दौरान बड़े पैमाने पर इनकी मौसमी खपत होती है।
    • चाँदी की कीमतें भी खुदरा माँग के साथ बढ़ती हैं, क्योंकि कई देशों में चाँदी का उपयोग गहनों, बर्तनों और छोटे निवेश उत्पादों में किया जाता है।

रैंक देश स्वर्ण भंडार (टन में)
1 संयुक्त राज्य अमेरिका 8,133.46
2 जर्मनी 3,350.25
3 इटली 2,451.84
4 फ्राँस 2,437.00
5 रूस 2,329.63

सोना एक प्रमुख आरक्षित संपत्ति क्यों बना रहता है?

  • सुरक्षित आश्रय की भूमिका: कठिन आर्थिक समय में सोने को विश्वसनीय, सुरक्षित और आसानी से व्यापार योग्य माना जाता है, जिससे यह राष्ट्रीय भंडार का केंद्रीय घटक बन जाता है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार का घटक: सोना देशों के विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा होता है, जिसे RBI जैसे केंद्रीय बैंक विविधीकरण के लिए रखते हैं।
  • केंद्रीय बैंक का स्वामित्व: पूरे विश्व में अब तक खनन किए गए कुल सोने का लगभग 20 प्रतिशत केंद्रीय बैंकों के पास है, जो सोने के रणनीतिक महत्त्व को दर्शाता है।

संदर्भ 

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखा, जबकि वित्तीय वर्ष 2026 के लिए वृद्धि और मुद्रास्फीति संबंधी अनुमानों को बढ़ाया।

मौद्रिक नीति निर्णय

  • रेपो दर अपरिवर्तित: मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने एकमत से निर्णय लिया कि तरलता समायोजन सुविधा (LAF) के तहत नीति रेपो दर 5.25% पर ही बनी रहे।
  • अन्य नीति दरें: स्टैंडिंग डिपॉजिट सुविधा (SDF) दर 5.00% पर बनी हुई है, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग सुविधा (MSF) दर और बैंक दर 5.50% पर अपरिवर्तित हैं।
  • नीतिगत दृष्टिकोण: 5:1 के बहुमत से, MPC ने ‘तटस्थ’ दृष्टिकोण बनाए रखा, जो यह संकेत देता है कि भविष्य में परिस्थितियों के अनुसार आवश्यकतानुसार कार्रवाई करने की लचीलापन बना रहगा।
    • जबकि मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने तटस्थता बनाए रखी, प्रो. राम सिंह, MPC सदस्य, ने सलाह देते हुए कहा कि नीतिगत दृष्टिकोण को तटस्थ से सहायक की ओर बदल दिया जाना चाहिए।
  • वृद्धि संबंधी दृष्टिकोण 
    • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि का संशोधन (वित्तीय वर्ष 2026): वास्तविक GDP वृद्धि वित्तीय वर्ष 2026 के लिए 7.4% रहने का अनुमान है, जो मजबूत घरेलू गतिविधियों को दर्शाता है।
    • वित्तीय वर्ष 2027 की पहली और दूसरी तिमाही के लिए GDP वृद्धि को क्रमशः 6.9% और 7.0% तक ऊपर संशोधित किया गया है।
  • मुद्रास्फीति के रुझान और अनुमान
    • मुख्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति: नवंबर में 0.7% और दिसंबर 2025 में 1.3% पर बनी रही।
    • खाद्य और ईंधन का प्रभाव: खाद्य मुद्रास्फीति में गिरावट रही, जबकि ईंधन मुद्रास्फीति मध्यम स्तर पर बनी।
    • कोर मुद्रास्फीति की स्थिरता: सोने को छोड़कर, कोर मुद्रास्फीति लगभग 2.6% के स्तर पर स्थिर रही।
    • मुद्रास्फीति का दृष्टिकोण: वित्तीय वर्ष 2026 के लिए CPI मुद्रास्फीति 2.1% रहने का अनुमान है, जबकि चौथी तिमाही में यह 3.2% रहेगी।
    • वित्तीय वर्ष 2027 के अनुमान: CPI मुद्रास्फीति के अनुमान Q1 में 4.0% और Q2 में 4.2% हैं, जो लक्ष्य के पास बने रहेंगे।
    • कीमती धातुओं का प्रभाव: ऊर्ध्व संशोधन मुख्यतः कीमती धातुओं की कीमतों के कारण है, जो लगभग 60–70 आधार अंक का योगदान करती हैं।
  • मौद्रिक नीति निर्णयों का तर्क
    • बाहरी चुनौतियाँ बनाम व्यापारिक आशावाद: मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने बाहरी चुनौतियों में वृद्धि संबंधी अवलोकन किया, लेकिन सफल व्यापारिक समझौते परिदृश्य को बेहतर बनाती हैं।
    • सहनशीलता सीमा से नीचे मुद्रास्फीति: मुख्य मुद्रास्फीति सहनशीलता सीमा से नीचे बनी हुई है और अनुमान है कि यह सामान्य बनी रहेगी।
    • वृद्धि की मजबूती: आर्थिक गतिविधियाँ घरेलू गति के कारण लगातार मजबूत बनी हुई हैं।
    • नीति दर की उपयुक्तता: MPC ने आकलन किया कि वर्तमान नीति दर वृद्धि और मुद्रास्फीति के संतुलन के लिए उपयुक्त है।

अन्य मौद्रिक नीति उपकरण

नीति दरों के अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक निम्नलिखित का भी उपयोग करता है:

  • कैश रिजर्व रेशियो (CRR): तरलता को नियंत्रित करने के लिए
  • सांविधिक तरलता अनुपात (SLR): बैंकों की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए
  • ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO): तरलता प्रबंधन के लिए सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद या बिक्री करने के लिए।

मौद्रिक नीति समिति (MPC)

  • सांविधिक स्थापना: मौद्रिक नीति समिति (MPC) की स्थापना वर्ष 2016 में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत एक सांविधिक निकाय के रूप में की गई थी।
  • MPC की भूमिका: MPC नीति ब्याज दर तय करने के लिए जिम्मेदार है, ताकि मुद्रास्फीति को निर्धारित लक्ष्य के भीतर रखा जा सके और आर्थिक वृद्धि का समर्थन भी किया जा सके।
  • MPC की संरचना: MPC में छह सदस्य होते हैं, जिनमें रिजर्व बैंक के गवर्नर अध्यक्ष के रूप में, उप-गवर्नर प्रभारी के रूप में, एक RBI-नामित अधिकारी और तीन बाहरी सदस्य, जिन्हें भारत सरकार द्वारा नामित किया जाता है, शामिल हैं।
    • MPC के बाहरी सदस्यों का कार्यकाल चार वर्षों के लिए निश्चित होता है।
  • क्वोरम आवश्यकता: MPC की बैठक के लिए न्यूनतम चार सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक है, जिसमें गवर्नर या उनकी अनुपस्थिति में उप-गवर्नर शामिल होना चाहिए।
  • निर्णय लेने की प्रक्रिया: MPC के निर्णय बहुमत मतदान के माध्यम से लिए जाते हैं और यदि मतदान में बराबरी होती है, तो RBI गवर्नर को निर्णायक मत देने का अधिकार होता है।
  • निर्णयों की प्रकृति: MPC द्वारा लिए गए निर्णय RBI पर बाध्यकारी होते हैं, जिससे मौद्रिक नीति के परिणामों का एकसमान कार्यान्वयन सुनिश्चित होता है।
  • बैठक की आवृत्ति: MPC को वर्ष में कम-से-कम चार बार बैठक करनी होती है, हालाँकि आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार आवश्यकता पड़ने पर अधिक बार भी बैठक की जा सकती है।

मौद्रिक नीति ढाँचा समझौता (MFPA)

  • भारत में मौद्रिक नीति उस मौद्रिक नीति ढाँचा समझौते (MFPA) के तहत संचालित होती है, जो वर्ष 2015 में भारत सरकार और RBI के बीच उर्जित पटेल समिति की सिफारिशों के आधार पर हस्ताक्षरित हुआ था।
  • मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण: इस ढाँचे के तहत मुद्रास्फीति लक्ष्य प्रत्येक पाँच वर्षों में एक बार भारत सरकार द्वारा RBI से परामर्श करके निर्धारित किया जाता है।
  • मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण के लिए CPI का उपयोग: भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) को आधिकारिक उपाय के रूप में उपयोग किया जाता है।
  • लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्य प्रणाली: भारत 4% CPI मुद्रास्फीति के लक्ष्य के साथ लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्य प्रणाली का पालन करता है, जिसमें ±2% की सहनशीलता सीमा की अनुमति होती है।

मौद्रिक नीति के अंतर्गत निर्णय

नीतिगत रुख अर्थ रेपो दर में परिवर्तन अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
सहायक  RBI अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए मुद्रा आपूर्ति बढ़ाने की इच्छा जताता है। रेपो दरों को कम करने की प्रवृत्ति होती है। उधारी को प्रोत्साहित करता है और ईएमआई कम करता है।
तटस्थ RBI बदलती परिस्थितियों के आधार पर दरों को समायोजित करने की लचीलापन बनाए रखता है। कोई स्पष्ट दिशा नहीं होती। नीति विकल्पों को खुला रखता है।
कसाव RBI सतर्क रहते हुए मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने पर ध्यान केंद्रित करता है। नीति दरें अपरिवर्तित रहती हैं या बढ़ाई जाती हैं; दरों में कटौती को खारिज किया गया है। ऋण महंगा बनाता है और माँग को धीमा करता है।

संदर्भ

लीथियम आयात पर निर्भरता और आपूर्ति शृंखला से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंताओं के बीच, भारत अपनी बैटरी रणनीति पर पुनर्विचार कर रहा है और सोडियम-आयन बैटरी एक सुरक्षित, रणनीतिक विकल्प के रूप में उभर रही है।

भारत को सोडियम-आयन बैटरी की आवश्यकता क्यों है?

  • लीथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे आयातित महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भरता कम करता है।
  • भौगोलिक रूप से विविध रूप से उपलब्ध प्रचुर मात्रा में सोडियम के उपयोग से ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाता है।
  • लागत-प्रभावी ग्रिड-स्तरीय भंडारण और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देता है।

सोडियम-आयन बैटरियों के बारे में

  • सोडियम-आयन बैटरी (SiB) रिचार्जेबल बैटरी है, जो लीथियम आयनों के बजाय सोडियम आयनों (Na⁺) को चार्ज वाहक के रूप में उपयोग करती हैं।
  • ये लीथियम-आयन सेल की तरह ही “रॉकिंग-चेयर” बैटरी परिवार से संबंधित हैं, परंतु इनकी निर्भरता अधिक प्रचुर कच्चे संसाधनों पर है।
    • “रॉकिंग-चेयर” बैटरी एक रिचार्जेबल सिस्टम है,जिसमें आयन (Li/Na आयन) चार्जिंग और डिस्चार्जिंग चक्रों के दौरान इलेक्ट्रोलाइट के माध्यम से कैथोड और एनोड के मध्य आगे-पीछे गति करते हैं।
  • सोडियम-आयन बैटरी की कार्यप्रणाली
    • चार्जिंग: सोडियम आयन इलेक्ट्रोलाइट के माध्यम से कैथोड से एनोड की ओर गति करते हैं; इलेक्ट्रॉन बाहरी परिपथ के माध्यम से प्रवाहित होते हैं।
    • डिस्चार्जिंग: सोडियम आयन वापस कैथोड की ओर लौटते हैं, जिससे विद्युत ऊर्जा मुक्त होती है।
    • प्रमुख डिजाइन विशेषता: लीथियम-आयन बैटरियों से भिन्न, जहाँ एनोड पर ताँबे का उपयोग आवश्यक होता है, इन बैटरियों में दोनों इलेक्ट्रोडों पर एल्युमीनियम करंट कलेक्टर के रूप में प्रयुक्त होता है।
  • अनुप्रयोग
    • नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण के लिए ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण।
    • दो और तिपहिया इलेक्ट्रिक वाहन, जहाँ अति-उच्च ऊर्जा घनत्व अनिवार्य नहीं है।
    • घरों, दूरसंचार टॉवरों और औद्योगिक बैकअप के लिए स्थिर भंडारण।
    • लोड संतुलन और पीक शेविंग के लिए ऊर्जा भंडारण प्रणाली (ESS)।
  • सीमाएँ / सीमितताएँ
    • लीथियम-आयन बैटरियों की तुलना में कम ऊर्जा घनत्व, जिससे दीर्घ दूरी वाली ईवी के उपयोग में सीमा आती है।
    •  आयतनिक ऊर्जा घनत्व के स्तर पर ये उन्नत लीथियम रसायनों से पिछड़े हुए हैं।
    • पर्यावरण और वाणिज्यिक कार्यान्वयन अभी प्रारंभिक चरण में हैं।

लीथियम-आयन बनाम सोडियम-आयन बैटरियाँ

पहलू लीथियम-आयन बैटरियाँ सोडियम-आयन बैटरियाँ
चार्ज वाहक लीथियम आयन (Li⁺) सोडियम आयन (Na⁺)
कच्चे माल की उपलब्धता दुर्लभ, भौगोलिक रूप से केंद्रीकृत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध और सस्ता
वर्तमान कलेक्टर ताँबा (एनोड), एल्युमिनियम (कैथोड) दोनों इलेक्ट्रोडों पर एल्युमिनियम
ऊर्जा घनत्व उच्च (दीर्घ दूरी वाली ईवी के लिए उपयुक्त) कम (स्थिर/स्थायी उपयोग के लिए बेहतर)
सुरक्षा और परिवहन चार्ज की स्थिति (SOC) की सीमाओं के कारण उच्च थर्मल रनअवे का जोखिम सुरक्षित; 0% चार्ज स्थिति (SOC) पर भी संगृहीत किया जा सकता है।

निष्कर्ष

सुरक्षा, सामग्रियों की प्रचुरता, निर्माण संगतता और रणनीतिक मजबूती को मिलाकर, सोडियम-आयन बैटरियाँ लीथियम-आयन प्रणालियों की पूरक बन सकती हैं और भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा एवं औद्योगिक सुरक्षा को मजबूत कर सकती हैं।

संदर्भ

जनवरी 2026 में भारत के PSLV-C62 मिशन की विफलता, जिसके परिणामस्वरूप DRDO के EOS-N1 सहित 16 उपग्रहों और अनेक वाणिज्यिक पेलोड के नुकसान ने अंतरिक्ष बीमा की आवश्यकता को पुनः रेखांकित किया है, खासकर ऐसे समय में जब निजी अंतरिक्ष स्टार्ट-अप उद्योग अनुमानों के अनुसार गंभीर आर्थिक जोखिम का सामना कर रहे हैं। ऐसी विफलताओं में संयुक्त प्रक्षेपण और पेलोड नुकसान ₹500-₹800 करोड़ या उससे अधिक तक हो सकता है, जो बिना बीमा वाले अंतरिक्ष उपक्रमों के वित्तीय जोखिमों को रेखांकित करता है।

भारतीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था

  • वर्तमान मूल्य: भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, जिसका वर्तमान अनुमान 13 अरब डॉलर है, वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में लगभग 2% का योगदान देती है।
  • सरकारी व्यय: अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर वार्षिक व्यय लगभग 2 अरब डॉलर है।
  • उपग्रह प्रक्षेपण और राजस्व: वर्ष 1999 से, भारत ने 34 देशों के लिए 381 उपग्रह प्रक्षेपण किए हैं, जिनसे 279 मिलियन डॉलर का राजस्व प्राप्त हुआ है।
  • वैश्विक स्थिति: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) विश्व की छठी सबसे बड़ी राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी है।
  • भविष्य की संभावनाएँ: भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के वर्ष 2030 तक 40 अरब डॉलर तक पहुँचने की आशा है (वर्तमान में यह 13 अरब डॉलर है)।

अंतरिक्ष बीमा

अंतरिक्ष बीमा एक विशेष जोखिम-हस्तांतरण तंत्र है, जो अंतरिक्ष मिशनों से संबंधित प्रक्षेपण यानों, उपग्रहों, पेलोड और तृतीय-पक्ष देनदारियों के लिए कवरेज प्रदान करता है।

भारत में अंतरिक्ष बीमा की आवश्यकता

  • वाणिज्यिक अंतरिक्ष विकास: भारत की बढ़ती अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में निजी भागीदारी को सक्षम बनाने के लिए बीमा तंत्र आवश्यक हैं।
    • भारत के वाणिज्यिक रूप से स्वतंत्र, माँग-आधारित अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की ओर अग्रसर होने के लिए संरचित जोखिम प्रबंधन तंत्रों की आवश्यकता है।
  • निवेशक विश्वास: एक मजबूत बीमा ढाँचा निवेशकों के विश्वास को बढ़ाता है और अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत के 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश उदारीकरण का पूरक है।
  • उच्च जोखिम वाले नुकसानों से सुरक्षा: अंतरिक्ष मिशनों में महँगी संपत्तियाँ और परिचालन संबंधी अनिश्चितता शामिल होती हैं, जिसके लिए संरचित जोखिम कवरेज की आवश्यकता होती है।
  • संधि अनुपालन: तृतीय पक्ष देयता बीमा अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत राज्य के उत्तरदायी के प्रबंधन में सहायक है।
    • बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 (Outer Space Treaty, 1967) के अंतर्गत, भारत अपने भू-भाग से शुरू की गई सभी अंतरिक्ष गतिविधियों, जिनमें निजी मिशन भी शामिल हैं, के लिए उत्तरदायी है।
    • दायित्व सम्मेलन, 1972 (Liability Convention, 1972) के अनुसार, भारत अपने अंतरिक्ष पिंडों के कारण पृथ्वी पर या विमानों को होने वाली क्षति के लिए पूर्णतः उत्तरदायी है।
    • पंजीकरण सम्मेलन, 1976 (Registration Convention, 1976) के तहत, राज्यों को अंतरिक्ष पिंडों का पंजीकरण कराना अनिवार्य है, जिससे जवाबदेही मजबूत होती है और क्षति होने की स्थिति में उत्तरदायित्व निर्धारित होता है।
  • निजी क्षेत्र विनियमन: भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 और IN-SPACe का नियामक ढाँचा निजी भागीदारी को सक्षम बनाता है, जिससे बीमा और दायित्व तंत्र की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
  • सतत् अंतरिक्ष शासन: अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA), मलबे के शमन और बीमा का एकीकरण भारत की दीर्घकालिक अंतरिक्ष सुरक्षा संरचना को मजबूत करता है।

सततता के लिए अंतरिक्ष स्थिति जागरूकता (SSA)

  • एसएसए (अंतरिक्ष स्थिति जागरूकता) अंतरिक्ष पर्यावरण का व्यापक ज्ञान, अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए किसी भी खतरे का मूल्यांकन और अंतरिक्ष संपत्तियों की सुरक्षा के लिए आवश्यक निवारक उपायों को लागू करने से संबंधित है।
  • अंतरिक्ष की सततता के लिए एसएसए के महत्व को पहचानते हुए, इसरो ने निगरानी और सुरक्षा प्रणालियों को मजबूत किया है।
  • IS4OM पहल: सुरक्षित और सतत अंतरिक्ष संचालन प्रबंधन के लिए इसरो प्रणाली (IS4OM) स्थापित की गई है, जिसका उद्देश्य निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करना है:
    • अंतरिक्ष उड़ान सुरक्षा
    • मलबे को कम करना
    • भीड़भाड़ वाले अंतरिक्ष वातावरण में संचालन की चुनौतियाँ

मलबे मुक्त अंतरिक्ष मिशन (DFSM) पहल

  • इसरो के नेतृत्व वाली पहल: मलबे रहित अंतरिक्ष मिशन (DFSM) का नेतृत्व इसरो कर रहा है।
  • लक्ष्य: वर्ष 2030 तक सभी भारतीय अंतरिक्ष संगठनों (सरकारी और गैर-सरकारी दोनों) द्वारा “मलबे रहित अंतरिक्ष मिशन” को पूरा करना।
  • वैश्विक संरेखण: DFSM वैश्विक स्थिरता प्रयासों के अनुरूप है और भारत को अंतरिक्ष में सुरक्षा, संरक्षा और स्थिरता को प्राथमिकता देने वाले राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है।

वैश्विक अंतरिक्ष बीमा बाजार की वृद्धि

  • विश्वव्यापी तीव्र विस्तार: स्पेस इंश्योरेंस मार्केट रिपोर्ट 2026 के अनुसार, वाणिज्यिक प्रक्षेपणों में वृद्धि के कारण बाजार में वृद्धि हो रही है।
  • बाजार का आकार: 2025 में 4.06 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2026 में 4.43 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है, जिसमें लगभग 9.1% की CAGR (कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट) होगी।
  • कारक: यह वृद्धि मुख्य रूप से वाणिज्यिक उपग्रह मिशनों में वृद्धि के कारण है।

अंतरिक्ष बीमा कवरेज के प्रकार

  • प्रक्षेपण-पूर्व कवरेज: परिवहन, भंडारण, ईंधन भरने और अंतिम एकीकरण के दौरान होने वाली क्षति को कवर करता है, लेकिन यह सबसे कम चुना जाने वाला कवरेज है क्योंकि यह सबसे सुरक्षित चरण है।
  • प्रक्षेपण कवरेज: इग्निशन से लेकर लिफ्ट-ऑफ, पृथक्करण और उपग्रह को कक्षा में स्थापित करने तक की अनिश्चितताओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • कक्षा में कवरेज: प्रारंभिक कक्षा विफलताओं, उपग्रह की कार्यक्षमता संबंधी समस्याओं और दीर्घकालिक परिचालन विफलताओं को कवर करता है।
  • तृतीय पक्ष देयता बीमा: अंतरिक्ष वस्तुओं के कारण अन्य देशों, विमानों, व्यक्तियों या संपत्ति को होने वाली क्षति को कवर करता है, जिससे भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय देयता दायित्वों को पूरा करने में मदद मिलती है।

विनियामक ढाँचा

  • बीमा कवरेज को प्रोत्साहन: सरकार द्वारा निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों से जुड़े जोखिमों को कवर करने के लिए पर्याप्त बीमा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
  • देयता नीति का मसौदा: “भारतीय अंतरिक्ष वस्तुओं के कारण उत्पन्न तृतीय पक्ष क्षति के लिए राज्य की देयता को संबोधित करने वाले नीतिगत ढाँचे और दिशा-निर्देश” का मसौदा परामर्श के अधीन है।
  • लॉन्च ऑपरेटर की जिम्मेदारी: ढाँचे में परिक्रमण ऑपरेटरों द्वारा तृतीय पक्ष देयता बीमा बनाए रखने की परिकल्पना की गई है, जो निम्नलिखित को कवर करने के लिए एक उपाय है:
    • तृतीय-पक्ष क्षति का जोखिम
    • अंतरराष्ट्रीय संधियों और सम्मेलनों के अंतर्गत भारत की देयता संबंधी दायित्व

अंतरिक्ष बीमा की प्रमुख चुनौतियाँ

  • उच्च प्रीमियम लागत: लॉन्च बीमा प्रीमियम आमतौर पर मिशन मूल्य के 15-20% के बीच होता है।
  • स्टार्ट-अप पर पूँजी का बोझ: शुरुआती चरण के स्टार्ट-अप को अग्रिम प्रीमियम का भुगतान करने में कठिनाई हो सकती है, जिससे सीमित धनराशि अनुसंधान एवं विकास तथा हार्डवेयर विकास से हटकर अन्य स्रोतों में चली जाती है।
  • बढ़ते कक्षीय जोखिम: अंतरिक्ष मलबे में निरंतर वृद्धि और केसलर सिंड्रोम का जोखिम कक्षीय बीमा को अधिक जटिल बनाते हुए दीर्घकालिक मिशनों के जोखिम को बढ़ा रहा है।
  • विदेशी पुनर्बीमा पर निर्भरता: घरेलू बीमाकर्ताओं के पास बड़े पैमाने के जोखिमों को कवर करने की क्षमता नहीं होती है, जिससे उन्हें विदेशी पुनर्बीमा बाजारों और वैश्विक अस्थिरता पर निर्भर रहना पड़ता है।
  • जोखिम मूल्य निर्धारण के लिए ऐतिहासिक मिशन डेटा का अभाव: सटीक प्रीमियम अनुमान के लिए व्यापक ऐतिहासिक विफलता और प्रदर्शन डेटा की आवश्यकता होती है, जो निजी भारतीय प्रक्षेपणों और उभरते न्यूस्पेस मिशनों के लिए सीमित है।
  • अंतरिक्ष संपत्तियों के लिए साइबर सुरक्षा खतरे: सॉफ्टवेयर-आधारित उपग्रहों और ग्राउंड स्टेशनों पर बढ़ती निर्भरता मिशनों को साइबर हमलों के प्रति संवेदनशील बनाती है, जिससे बीमा संबंधी देनदारियाँ बढ़ रही हैं।

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