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Nov 29 2025

वालियामाला क्रेटर 

अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने केरल के स्थानों के नाम पर वलियामाला क्रेटर (Valiamala Crater) सहित कई मंगल ग्रहीय भू-आकृतियों का नामकरण करने को मंजूरी दे दी है।

वालियामाला क्रेटर के बारे में

  • वलियामाला क्रेटर एक नव-नामित मंगल ग्रहीय भू-आकृति है, जिसे अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ द्वारा मान्यता प्राप्त है।
  • स्थान: यह मंगल ग्रह के जैंथे टेरा (Xanthe Terra) क्षेत्र में स्थित है, जो IIST के नेतृत्व में किए गए अनुसंधान के माध्यम से पहचाने गए प्राचीन हिमनद और नदीय भू-आकृतियों के लिए जाना जाता है।
  • भू-वैज्ञानिक विशेषताएँ
    • इसमें अतीत के हिमनदों और प्रवाहित जल के निशान दिखाई देते हैं, जो एक गतिशील प्राचीन मंगल ग्रहीय वातावरण का संकेत देते हैं।
    • यह कृष्णन क्रेटर, कृष्णन पलस और पेरियार वलिस जैसी अन्य नव-नामित संरचनाओं के निकट स्थित है।

अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) के बारे में

  • IAU एक वैश्विक प्राधिकरण है, जो खगोलीय नामकरण को मानकीकृत करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से खगोल विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है।
  • मुख्यालय: पेरिस, फ्राँस।
  • स्थापना: वर्ष 1919 में स्थापित, यह एक गैर-सरकारी वैज्ञानिक संगठन के रूप में कार्य करता है, जो वैश्विक खगोलीय अनुसंधान का समन्वय करता है।
  • सदस्य: 62 राष्ट्रीय सदस्य, जो दुनिया भर के राष्ट्रीय खगोलीय निकायों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    • भारत वर्ष 1948 में IAU में शामिल हुआ था।
  • IAU की प्रमुख भूमिकाएँ
    • खगोलीय पिंडों का नामकरण: ग्रहों, तारों, क्रेटरों और ग्रहीय विशेषताओं को आधिकारिक नाम देने वाला एकमात्र प्राधिकरण है।
    • मानक-निर्धारण: आँकड़ों, प्रेक्षणों और खगोलीय नामकरण के लिए वैश्विक मानक स्थापित करता है।
    • वैज्ञानिक समन्वय: WGPSN और WGSN जैसी आम सभाओं और विशेषज्ञ कार्य समूहों का आयोजन करता है।
    • शिक्षा एवं आउटरीच: खगोल विज्ञान शिक्षण और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देता है।

चक्रवात दित्वाह 

 

बंगाल की खाड़ी के ऊपर तीव्रता से सक्रिय हुए चक्रवात दित्वाह (Cyclone Ditwah) के दो दिनों के भीतर उत्तरी तमिलनाडु तट की ओर बढ़ने की उम्मीद है।

चक्रवात दित्वाह के बारे में

  • गठन: चक्रवात दित्वाह एक उष्णकटिबंधीय चक्रवाती प्रणाली है, जो दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी के ऊपर बनी है।
  • तीव्र तीव्रता: यह चक्रवात 24 घंटों के भीतर एक निम्न वायुदाब से एक शक्तिशाली चक्रवाती तूफान में बदल गया।
  • वायु की गति: तूफान के मार्ग में वायु की गति 60–80 किमी प्रति घंटा तक पहुँच सकती है, और कुछ क्षेत्रों में यह बढ़कर 90 किमी प्रति घंटा तक हो सकती है।
  • गति मार्ग: IMD का अनुमान है कि यह प्रणाली दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ेगी, उत्तरी तमिलनाडु, पुडुचेरी और उससे सलग्न दक्षिणी आंध्र प्रदेश के तटों के पास पहुँचेगी।
  • रेड अलर्ट जारी: IMD ने 28-29 नवंबर को डेल्टा और उत्तरी तटीय जिलों के लिए अलर्ट को नारंगी से लाल (अत्यधिक भारी बारिश >20 सेमी/24 घंटे) कर दिया है।
  • ‘दित्वाह’ नाम की उत्पत्ति
    • नामकरण:दित्वाह‘ नाम यमन द्वारा सुझाया गया था।
    • महत्व: दित्वाह” का अर्थ है “लैगून”, जो यमन के सोकोत्रा ​​द्वीप पर स्थित डेटवा लैगून को संदर्भित करता है, जो अपने विशिष्ट तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जाना जाता है।

इंटरनेशनल IDEA (International IDEA)

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार दिसंबर 2025 में इंटरनेशनल IDEA (International IDEA) की अध्यक्षता ग्रहण करेंगे।

इंटरनेशनल IDEA के बारे में

  • इंटरनेशनल IDEA या IIDEA (अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र एवं निर्वाचन सहायता संस्थान) की स्थापना वर्ष 1995 में हुई थी और यह एक अंतर-सरकारी संगठन है, जो दुनिया भर में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए समर्पित है।
  • उद्देश्य
    • समावेशी, जवाबदेह और लचीली लोकतांत्रिक संस्थाओं को बढ़ावा देना।
    • चुनावी अखंडता, संवैधानिक संरचना और राजनीतिक भागीदारी का समर्थन करना।
    • वैश्विक लोकतंत्रों को अनुसंधान, डेटा और नीति मार्गदर्शन प्रदान करना।
  • सदस्यता: 35 सदस्य देश, जिनमें भारत एक संस्थापक सदस्य है।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान पर्यवेक्षक राज्यों के रूप में भाग लेते हैं।
  • मुख्यालय: स्टॉकहोम, स्वीडन
  • भूमिका और कार्य
    • चुनाव प्रबंधन निकायों (EMB) के बीच वैश्विक ज्ञान-साझाकरण को सुगम बनाता है।
    • तुलनात्मक चुनावी आँकड़े, नीतिगत सलाह और क्षमता निर्माण सहायता प्रदान करता है।
    • लोकतांत्रिक शासन के लिए प्रशिक्षण, अनुसंधान सहयोग और तकनीकी सहायता प्रदान करता है।
    • वैश्विक साझेदारियों के माध्यम से दुष्प्रचार, चुनावी हिंसा और मतदाता विश्वास को चुनौती देने वाली चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए कार्य करता है।

महत्त्व 

भारत का नेतृत्व इसकी पारदर्शी, बड़े पैमाने पर चुनावी क्षमताओं की वैश्विक मान्यता को दर्शाता है और विश्वव्यापी लोकतांत्रिक सुधारों को आकार देने में इसकी भूमिका को बढ़ाता है।

संदर्भ

नेचर में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चलता है कि ‘ग्रे सील’ मिल्क में ऑलिगोसेकेराइड्स की सर्वाधिक विविधता पाई जाती है, जो स्तनपान करने वाली माताओं के दूध से भी अधिक है।

ग्रे सील मिल्क पर प्रमुख निष्कर्ष

  • शोधकर्ताओं ने स्कॉटलैंड में अटलांटिक ‘ग्रे सील’ मिल्क का विश्लेषण कर पाया कि इस प्रजाति में चरम प्रजनन परिस्थितियों से संबद्ध असाधारण जैवरासायनिक जटिलता विद्यमान है।
  • अद्वितीय गुण
    • ग्रे सील’ मिल्क में 332 ऑलिगोसेकेराइड होते हैं, जो किसी भी स्तनपायी में दर्ज की गई सबसे अधिक संख्या है।
    • ये शर्कराएँ स्तनपान कराने वाली माताओं के दूध की तुलना में 33% अधिक विविध होती हैं।
  • वैज्ञानिक महत्त्व: जटिलता संभवतः कठोर वातावरण और कमजोर नवजातों की सुरक्षा की आवश्यकता के कारण विकसित हुई।
    • नव-पहचानी गई शर्कराएँ फार्मूला को बेहतर बनाने, प्रतिरक्षा बढ़ाने और आँत के विकास में मदद कर सकती हैं।

ओलिगोसेकेराइड क्या हैं?

  • ओलिगोसैकेराइड जटिल कार्बोहाइड्रेट अणु होते हैं, जो शर्करा की छोटी शृंखलाओं से बने होते हैं और कई स्तनधारियों के दूध में प्राकृतिक रूप से मौजूद होते हैं।
  • ओलिगोसैकेराइड की जैविक भूमिका
    • हानिकारक वायरस और बैक्टीरिया को रोककर प्रतिरक्षा रक्षा का समर्थन करना।
    • शिशु की आँत माइक्रोबायोम के निर्माण में सहायता करना।
    • पेट और आंत्र मार्ग के विकास को बढ़ावा देना।
    • प्रीबायोटिक्स के रूप में कार्य करना, प्रारंभिक जीवन के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक लाभकारी सूक्ष्मजीवों को पोषण प्रदान करना।
  • ह्यूमन मिल्क: इन्हें ह्यूमन मिल्क ओलिगोसेकेराइड्स (HMOs) कहा जाता है और ये स्तन के दूध में लिपिड और लैक्टोज के बाद तीसरा सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला ठोस घटक हैं।
    • दूध (स्तनपान कराने वाली माताओं) में 200 से अधिक विभिन्न प्रकार के ओलिगोसेकेराइड्स की पहचान की गई है।

ग्रे सील के बारे में

  • ग्रे सील उत्तरी अटलांटिक की एक प्रजाति है।
  • आवास: ये पश्चिमी और पूर्वी उत्तरी अटलांटिक के समशीतोष्ण और उप-आर्कटिक जल में निवास करती हैं।
  • वितरण
    • पश्चिमी अटलांटिक: लैब्राडोर से नोवा स्कोटिया तक।
    • पूर्वी अटलांटिक: ब्रिटिश द्वीपसमूह, आइसलैंड, नॉर्वे, बाल्टिक सागर।
  • आहार: ये मुख्यतः ‘बेन्थिक’ और तल आधारित मछलियों के साथ-साथ अन्य तटीय जीवों का शिकार भी करते हैं।
  • व्यवहार और प्रजनन: ग्रे सील झुंड में रहने वाली प्रजाति है, जो सर्दियों में प्रजनन करती है।
  • IUCN स्थिति: इन्हें सबसे कम चिंताजनक श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है और शिकार के दबाव में कमी के कारण इनकी कई आबादी में सुधार हो रहा है।

संदर्भ

हाल ही में भारत सरकार ने वस्त्र क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और प्रतिस्पर्द्धा को मजबूत करने के लिए वस्त्र केंद्रित अनुसंधान, मूल्यांकन, निगरानी, ​​योजना और स्टार्ट-अप (Textiles Focused Research, Assessment, Monitoring, Planning and Start-up/Tex-RAMPS) योजना को मंजूरी दी है।

Tex-RAMPS योजना के बारे में

  • यह एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जो पूरी तरह से वस्त्र मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित है।
    • एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना एक सरकारी कार्यक्रम है, जो पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित है और केंद्रीय मंत्रालयों या उनकी एजेंसियों द्वारा सीधे कार्यान्वित की जाती है।
  • परिव्यय और अवधि: वित्त वर्ष 2025-26 से वित्त वर्ष 2030-31 की अवधि के लिए कुल परिव्यय ₹305 करोड़ है।
    • यह आगामी वित्त आयोग चक्र के साथ समाप्त होगा।
  • उद्देश्य: भारत के वस्त्र और परिधान (T&A) पारिस्थितिकी तंत्र को भविष्य के लिए तैयार करना, अनुसंधान, डेटा सिस्टम, नवाचार समर्थन और क्षमता विकास में महत्त्वपूर्ण अंतराल को दूर करना।

घटक फोकस क्षेत्र प्रभाव
अनुसंधान एवं नवप्रवर्तन

स्मार्ट टेक्सटाइल्स, स्थिरता, प्रक्रिया दक्षता और उभरती प्रौद्योगिकियों में उन्नत अनुसंधान को बढ़ावा देना।

भारत की नवाचार क्षमता और उत्पाद गुणवत्ता को बढ़ावा मिलेगा।

डेटा, विश्लेषण और निदान

रोजगार आकलन, आपूर्ति शृंखला मानचित्रण और भारत के आकार पर आधारित अध्ययन सहित मजबूत डेटा प्रणालियों का निर्माण।

विस्तृत, विश्वसनीय डेटा उपलब्ध कराकर साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को सुगम बनाता है।

एकीकृत वस्त्र सांख्यिकी प्रणाली (ITSS)

वास्तविक समय, एकीकृत डेटा और विश्लेषण प्लेटफॉर्म का विकास।

पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में संरचित निगरानी और रणनीतिक निर्णय लेने में सहायता करता है।

क्षमता विकास और ज्ञान पारिस्थितिकी तंत्र

राज्य स्तरीय योजना को सुदृढ़ बनाना, सर्वोत्तम प्रथाओं का प्रसार करना तथा क्षेत्रीय कार्यक्रमों का आयोजन करना।

एक लचीला ज्ञान नेटवर्क बनाता है और कौशल/योजना अंतराल को समाप्त करता है।

स्टार्ट-अप और नवाचार समर्थन

इनक्यूबेटर्स, हैकाथॉन और अकादमिक-उद्योग सहयोग के लिए समर्थन।

उच्च मूल्य वाले वस्त्र स्टार्ट-अप और उद्यमिता को बढ़ावा देना।

महत्त्व और अपेक्षित परिणाम

Tex-RAMPS भारत के लिए एक लचीला, भविष्य के लिए तैयार और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी कपड़ा पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

  • वैश्विक बाजार संवर्द्धन: यह उत्पादकता और प्रौद्योगिकी अपनाने में सुधार करके वैश्विक बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाएगा।
  • प्रणालीगत सुधार: यह अनुसंधान और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करता है और ITSS के माध्यम से डेटा-संचालित नीति-निर्माण में सुधार करने में मदद करता है।
  • सामाजिक-आर्थिक लाभ: यह योजना रोजगार के अवसर उत्पन्न करने और राज्यों, उद्योग, शिक्षा जगत और सरकारी संस्थानों के बीच गहन सहयोग को बढ़ावा देने के लिए डिजाइन की गई है।
  • रणनीतिक स्थिति: यह योजना देश को स्थिरता, प्रौद्योगिकी और प्रतिस्पर्द्धात्मकता में एक वैश्विक नेतृत्त्वकर्त्ता के रूप में स्थापित करती है और अनुसंधान, डेटा तथा नवाचार के अभिसरण के माध्यम से इस क्षेत्र को सशक्त बनाती है।

संबंधित पहल

  • PM मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल (PM मित्र) पार्क: इसके तहत बुनियादी ढाँचे को उन्नत करने और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने के लिए एकीकृत, ‘प्लग-एंड-प्ले’ टेक्सटाइल पार्कों का निर्माण किया जाता है।
  • वस्त्रों के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: मानव निर्मित रेशे और तकनीकी वस्त्र उत्पादन का विस्तार करने के लिए उत्पादन प्रोत्साहन प्रदान करती है।
  • रेशम समग्र (रेशम उद्योग के विकास के लिए एकीकृत योजना): समग्र रेशम क्षेत्र के विकास के लिए अनुसंधान एवं विकास, बीज उत्पादन और गुणवत्ता आश्वासन को समर्थन प्रदान करता है।

संदर्भ

मणिपुर की इंफाल घाटी में चिरांग नदी के गाद वाले जमाव में जीवाश्म पौधों के बचे हुए हिस्सों की जाँच कर रहे शोधकर्ताओं को 37,000 वर्ष पुराना काँटेदार चिमोनोबाम्बुसा मणिपुरेंसिस (Chimonobambusa Manipurensis) बाँस के तने का जीवाश्म मिला है।

बाँस के जीवाश्म के बारे में

  • खोजकर्ता: बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के शोधकर्ताओं ने इंफाल घाटी में चिरांग नदी के गाद वाले जमाव में एक उल्लेखनीय रूप से संरक्षित बाँस का तना पाया।
  • मुख्य विशेषताएँ: सूक्ष्म परीक्षण से अक्षुण्ण गाँठें, कलियाँ और स्पष्ट काँटों के निशान दिखाई दिए, जो एक अत्यंत दुर्लभ संरक्षण है, क्योंकि बाँस की खोखली, रेशेदार संरचना आमतौर पर जल्दी सड़ जाती है।
  • वैज्ञानिक महत्त्व: यह जीवाश्म इस बात की पुष्टि करता है कि काँटेयुक्त विशेषता, जो शाकाहारी जीवों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करती है, हिमयुग के दौरान बाँस में मौजूद थी, जो एशिया से इस तरह का सबसे पहला प्रमाण प्रस्तुत करता है।
  • पुराजलवायु महत्त्व: यह खोज दर्शाती है कि जहाँ हिमयुग की ठंड और शुष्कता के कारण यूरोप जैसे क्षेत्रों में बाँस विलुप्त हो गए, वहीं पूर्वोत्तर भारत में बाँस के अस्तित्व को समर्थन देने वाली अनुकून जलवायु स्थितियाँ मौजूद थी।
    • सबसे हालिया हिमयुग, प्लीस्टोसीन युग के दौरान हुआ, जो लगभग 26 लाख से 11,700 वर्ष पूर्व तक चला।

चिमोनोबाम्बुसा मणिपुरेंसिस के बारे में

  • चिमोनोबाम्बुसा काँटेदार बाँसों का एक समूह है, जो अपनी रक्षात्मक आकृति विज्ञान के लिए जाना जाता है।
  • खेती और विकास की परिस्थितियाँ: आर्द्र, छायादार, मध्यम ठंडा वातावरण, अक्सर नदी के किनारे और पर्वतीय वनों में पाए जाते हैं।
  • अनुप्रयोग: अपने मजबूत तने और काँटेदार गाँठों के कारण हस्तशिल्प, बाड़ लगाने, औजारों और पारंपरिक निर्माण के लिए मूल्यवान।
  • भौगोलिक वितरण: पूर्वोत्तर भारत, म्याँमार, दक्षिण-पश्चिम चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया, जो भारत-बर्मा पारिस्थितिकी परिवेश के अनुकूल होने को दर्शाता है।

महत्त्व 

मणिपुर में मिले बाँस के जीवाश्म इस बात के प्रमाण को पुष्ट करता है कि भारत-बर्मा हॉटस्पॉट दीर्घकालिक जैव विविधता भंडार के रूप में कार्य करता था, जिसने चरम जलवायु परिस्थितियों में भी बाँस की प्रजातियों को संरक्षित रखा।

संदर्भ

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की वार्षिक समीक्षा में भारत के राष्ट्रीय लेखा आँकड़ों को, जिसमें सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और सकल मूल्य वर्द्धन (GVA) जैसे प्रमुख आँकड़े शामिल हैं, ‘C’ ग्रेड की रेटिंग प्रदान की गई है।

  • संपूर्ण डेटा श्रेणियों में, भारत को ‘B’ ग्रेड प्राप्त हुआ है।
  • निम्नलिखित संकेत के साथ चार ग्रेड A, B, C और D हैं:-
    • A: डेटा व्यापक, विश्वसनीय और प्रभावी निगरानी के लिए पूरी तरह से पर्याप्त है।
    • B: डेटा में कुछ सीमाएँ हैं, लेकिन निगरानी के उद्देश्यों के लिए मोटे तौर पर पर्याप्त हैं।
    • C: डेटा में कई कमियाँ हैं, जो निगरानी की गुणवत्ता और सटीकता में मामूली बाधा डालती हैं।
    • D: डेटा में बड़ी कमियाँ हैं, जो प्रभावी निगरानी में महत्त्वपूर्ण रूप से बाधा डालती हैं।

‘C’ ग्रेड का अर्थ

  • नियमित डेटा उपलब्धता के बावजूद कार्यप्रणाली संबंधी कमियों को दर्शाता है।
  • कमजोरियाँ अंतर-देशीय तुलना को कम करती हैं और समष्टि-आर्थिक निगरानी को प्रभावित करती हैं।
  • यह दूसरा सबसे निम्नतम ग्रेड है, जो पिछले वर्ष के मूल्यांकन से अपरिवर्तित है।

IMF द्वारा बताए गए मुख्य मुद्दे

  • पुराना आधार वर्ष (2011-12): GDP और CPI दोनों ही पुराने उत्पादन और उपभोग ढाँचे पर आधारित हैं।
    • वर्तमान बास्केट अब भारत की समकालीन अर्थव्यवस्था, डिजिटल सेवाओं या उपभोग पैटर्न को प्रतिबिंबित नहीं करती है।
  • अपर्याप्त अपस्फीतिकारक: पूर्ण उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) के अभाव के कारण अपस्फीतिकारक के रूप में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर निरंतर निर्भरता।
    • वास्तविक GDP के अनुमान को, विशेष रूप से सेवाओं के लिए, कमजोर करता है।
  • उत्पादन-व्यय विसंगतियाँ: IMF ने उत्पादन और व्यय दृष्टिकोणों के बीच “अत्यधिक विसंगतियाँ” देखी हैं।
    • अनौपचारिक क्षेत्र की गतिविधियों के कम कवरेज और व्यय डेटा संग्रह में अंतराल को दर्शाता है।
  • सीमित मौसमी समायोजन: तिमाही जीडीपी आँकड़ों में मौसमी समायोजन तकनीकों का अभाव है।
    • प्रवृत्ति की व्याख्या को कठिन बनाता है और नीति विश्लेषण को प्रभावित करता है।
  • बेहतर सांख्यिकीय तकनीकों की आवश्यकता: उन्नत मॉडलिंग पद्धतियों, बेहतर विवरण और अधिक विस्तृत क्षेत्रीय विखंडन की आवश्यकता है, विशेष रूप से सकल स्थायी पूँजी निर्माण (GFCF) और तिमाही सकल घरेलू उत्पाद श्रेणियों में।

राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (NAS) के बारे में

  • राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (NAS) भारत की आर्थिक गतिविधि का एक व्यापक मात्रात्मक मूल्यांकन प्रदान करती है।
  • NAS, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अंतर्गत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा तैयार किया जाता है।
  • प्रयुक्त पद्धति: NAS, क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर संयुक्त राष्ट्र की राष्ट्रीय लेखा प्रणाली (SNA 2008) और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप दृष्टिकोणों के संयोजन का उपयोग करता है:
    • आय दृष्टिकोण (प्राथमिक दृष्टिकोण): कारक आय/मजदूरी, परिचालन अधिशेष, मिश्रित आय के आधार पर मूल्य वर्धित का अनुमान लगाने के लिए प्रयुक्त।
    • उत्पादन/क्षेत्रीय GVA पद्धति: कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्रों के लिए प्रयुक्त।
      • GVA का अनुमान सकल उत्पादन से मध्यवर्ती उपभोग को घटाकर लगाया जाता है।
    • व्यय दृष्टिकोण (पूरक): GDP को उपभोग, निवेश, सरकारी व्यय और शुद्ध निर्यात के योग के रूप में मापता है।
  • NAS का कवरेज और घटक: NAS में निम्नलिखित व्यापक आर्थिक संकेतक शामिल हैं:
    • बाजार मूल्यों पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP)
    • आर्थिक गतिविधियों द्वारा सकल मूल्य वर्द्धन (GVA)
    • राष्ट्रीय आय, शुद्ध राष्ट्रीय आय और व्यक्तिगत आय
    • अंतिम उपभोग व्यय (निजी और सरकारी)
    • सकल पूँजी निर्माण (निवेश)
    • बचत और पूँजी स्टॉक
    • प्रति व्यक्ति आय संकेतक
  • डेटा वर्तमान और स्थिर कीमतों पर प्रस्तुत किया जाता है।
  • NAS का महत्त्व 
    • भारत की आर्थिक वृद्धि का आधिकारिक माप प्रदान करता है।
    • नीति-निर्माण, बजट, राजकोषीय नियोजन और निवेश निर्णयों का आधार तैयार करता है।
    • कृषि, उद्योग, सेवाओं जैसे विभिन्न क्षेत्रों में संरचनात्मक परिवर्तनों पर नजर रखने में मदद करता है।
    • SNA-आधारित पद्धति के कारण अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ अंतरराष्ट्रीय तुलना को सक्षम बनाता है।

NAS अनुमान में सुधार के प्रयास

  • आधार वर्ष संशोधन के प्रयास: सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय राष्ट्रीय आँकड़ों की प्रासंगिकता में सुधार के लिए सकल घरेलू उत्पाद और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार वर्षों का व्यापक अद्यतन कर रहा है।
    • सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय 27 फरवरी, 2026 को नए आधार वर्ष 2022-23 के साथ अनुमान जारी करेगा।
  • पद्धतिगत आधुनिकीकरण: वास्तविक-क्षेत्रीय मापन को मजबूत करने के उद्देश्य से आकलन तकनीकों को उन्नत करने, डेटा कवरेज का विस्तार करने और उच्च-आवृत्ति प्रशासनिक डेटासेट को एकीकृत करने का कार्य जारी है।
  • अपेक्षित रिलीज समय सीमा: सरकार ने संकेत दिए हैं कि संशोधित सांख्यिकीय शृंखला संभवतः वर्ष 2026 के प्रारंभ से मध्य तक पेश की जाएगी।
  • IMF का आकलन: IMF भारत की प्रगति और इस तथ्य को स्वीकार करता है कि वास्तविक-क्षेत्रीय सांख्यिकी को बेहतर बनाने के लिए सुधार लगातार आगे बढ़ रहे हैं, जो मजबूत संस्थागत क्षमता को दर्शाता है।

निष्कर्ष

NAS को ‘C’ ग्रेड की रेटिंग सांख्यिकीय आधुनिकीकरण की तात्कालिकता को रेखांकित करती है, लेकिन वर्तमान में संचालित सुधार, अद्यतन आधार वर्ष और बेहतर कार्यप्रणाली, अधिक मजबूत और विश्वसनीय राष्ट्रीय आर्थिक सांख्यिकी की ओर स्पष्ट बदलाव का संकेत देते हैं।

संदर्भ

IMF ने कमजोर होते रुपये और RBI के हस्तक्षेप में कमी के बीच भारत की वास्तविक विनिमय दर व्यवस्था को “स्थिर व्यवस्था” से अधिक लचीली ‘क्रॉल’ के समान व्यवस्था” में पुनर्वर्गीकृत किया है।

IMF का वास्तविक विनिमय दर वर्गीकरण क्या है?

  • IMF देशों को केवल आधिकारिक घोषणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि विनिमय दर प्रबंधन के वास्तविक (वास्तविक) परिचालन व्यवहार के आधार पर वर्गीकृत करता है।
  • IMF विनिमय दर व्यवस्थाओं को उनके लचीलेपन की मात्रा और विनिमय दर माध्यमों के प्रति औपचारिक या अनौपचारिक प्रतिबद्धताओं की मौजूदगी के आधार पर रैंक करता है।
  • यह प्रणाली वर्गीकरण योजना में अधिक पारदर्शिता प्रदान करने तथा विनिमय दर व्यवस्थाओं और विभिन्न मौद्रिक नीति ढाँचों के बीच संबंधों को स्पष्ट करने के लिए सदस्यों की विनिमय दर व्यवस्थाओं और मौद्रिक नीति ढाँचों को प्रस्तुत करती है।

विनिमय दर के बारे में

  • विनिमय दर एक देश की मुद्रा का मूल्य है, जिसे दूसरी मुद्रा के संदर्भ में व्यक्त किया जाता है।
  • यह दो मुद्राओं के सापेक्ष मूल्य को दर्शाती है और यह निर्धारित करती है कि घरेलू मुद्रा की एक इकाई के लिए कितनी विदेशी मुद्रा प्राप्त की जा सकती है।

विनिमय दरों की आवश्यकता

  • व्यापार प्रतिस्पर्द्धात्मकता (निर्यात/आयात) को प्रभावित करना।
  • मुद्रास्फीति को प्रभावित करना, विशेष रूप से आयात-निर्यात आधारित देशों में।
  • विदेशी निवेश प्रवाह और बाह्य क्षेत्र की स्थिरता का निर्धारण करना।
  • मौद्रिक नीति निर्णयों और आर्थिक विकास को आकार देना।

रुपये की वर्तमान स्थिति

  • अमेरिकी टैरिफ के प्रभावों और पोर्टफोलियो बहिर्वाह के बीच, वर्ष 2025 में रुपये का मूल्य लगभग 4% घटकर ₹89.49/$ पर पहुँच गया है; RBI का हस्तक्षेप अस्थिरता-केंद्रित बना हुआ है।

विनिमय दर व्यवस्थाओं के प्रकार

  • कोई पृथक वैध मुद्रा नहीं: विदेशी मुद्रा एकमात्र वैध मुद्रा बन जाती है, जिससे घरेलू मौद्रिक नीति स्वायत्तता समाप्त हो जाती है।
  • मुद्रा बोर्ड व्यवस्था: घरेलू मुद्रा केवल विदेशी मुद्रा के विरुद्ध एक निश्चित दर पर जारी की जाती है, जिससे मौद्रिक विवेकाधिकार अत्यंत सीमित हो जाता है।
  • पारंपरिक स्थिरता: निरंतर हस्तक्षेप के माध्यम से मुद्रा को एक निश्चित सीमा ±1% के भीतर बनाए रखा जाता है।
  • क्षैतिज सीमा: विनिमय दर व्यापक सीमा (>±1%) के अंतर्गत रहती है, जिससे नीतिगत लचीलापन सीमित हो जाता है।
  • ‘क्रॉलिंग’: मुद्रा को मुद्रास्फीति या पूर्व निर्धारित नियमों के आधार पर छोटे आवधिक चरणों में समायोजित किया जाता है।
  • ‘क्रॉलिंग’ सीमा: केंद्रीय दर और बैंड को समय-समय पर समायोजित किया जाता है, जिससे लचीलेपन को प्रबंधित सीमाओं के साथ जोड़ा जाता है।
  • प्रबंधित माध्यम (कोई पूर्व निर्धारित माध्यम नहीं): अस्थिरता को सीमित करने के लिए प्राधिकरण पूर्व निर्धारित लक्ष्यों के बिना हस्तक्षेप करते हैं।
  • स्वतंत्र विनिमय: बाजार की शक्तियाँ दर निर्धारित करती हैं; हस्तक्षेप केवल अव्यवस्थित गतिविधियों को रोकता है।

भारत के पुनर्वर्गीकरण के पीछे तर्क

  • पिछले छह महीनों में RBI के हस्तक्षेपों की आवृत्ति और पैमाने में कमी आई है।
  • द्विपक्षीय वृद्धि में सुधार हो रहा है, हालाँकि लचीलापन सीमित बना हुआ है।

‘क्रॉल’ के समान व्यवस्था क्या है?

  • एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें विनिमय दर कम-से-कम छह महीनों तक धीरे-धीरे बदलती प्रवृत्ति के ±2% के दायरे में रहती है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • हल्का, पूर्वानुमानित मुद्रा अवमूल्यन (“क्रॉल”)।
    • केवल अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए हस्तक्षेप।
    • आंशिक लचीलापन बनाए रखती है।

पुनर्वर्गीकरण के निहितार्थ

  • विनिमय दर में अधिक लचीलेपन और RBI की कठोरता में कमी का संकेत।
  • भारत की विदेशी मुद्रा (FX) नीति में पारदर्शिता के बारे में निवेशकों की धारणा में सुधार हो सकता है।
  • IMF द्वारा चिह्नित LRS-संबंधी करों सहित संरचनात्मक और FX प्रतिबंधों पर प्रकाश डालता है।
  • भारत पर बाजार-संचालित गतिविधियों को और अधिक स्वतंत्रता प्रदान करने का दबाव डालता है।

निष्कर्ष

IMF का ‘क्रॉल’ के समान व्यवस्था की ओर रुख भारत के क्रमिक रूप से अधिक विदेशी मुद्रा लचीलेपन की ओर बढ़ने को दर्शाता है, जबकि वह अभी भी अस्थिरता का प्रबंधन कर रहा है; हालाँकि, दीर्घकालिक लचीलेपन को मजबूत करने के लिए संरचनात्मक सुधार और प्रतिबंधों में कमी आवश्यक है।

सन्दर्भ

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष श्री गणेश वासुदेव मावलंकर को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

जी. वी. मावलंकर के बारे में

  • प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
    • जन्म: उनका जन्म 27 नवंबर, 1888 को बड़ौदा (वर्तमान गुजरात) में, रत्नागिरी जिले के मावलंगे गाँव के एक परिवार में हुआ था।
    • शिक्षा: उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बॉम्बे प्रेसीडेंसी स्कूल में पूर्ण की और वर्ष 1908 में गुजरात कॉलेज, अहमदाबाद से विज्ञान में बी.ए. की उपाधि प्राप्त की।
    • कानूनी प्रशिक्षण: उन्होंने वर्ष 1912 में प्रथम श्रेणी में कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की और शीघ्र ही अहमदाबाद में एक प्रमुख वकील के रूप में उभरे।

  • स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
    • नेतृत्वकारी भूमिकाएँ: उन्होंने गुजरात प्रांतीय कांग्रेस समिति (1921-22) के सचिव के रूप में कार्य किया और बाद में 36वें कांग्रेस अधिवेशन (अहमदाबाद, 1921) में प्रवेश समिति के सचिव के रूप में कार्य किया।
    • जन अभियान: उन्होंने ‘खैरा नो-रेंट’ अभियान में प्रमुख भूमिका निभाई।
  • स्वतंत्रता से पूर्व विधायी कॅरियर
    • विधानमंडल में प्रवेश: मावलंकर ने वर्ष 1937 में अहमदाबाद का प्रतिनिधित्व करते हुए विधानमंडल में प्रवेश किया।
    • बॉम्बे विधानसभा के अध्यक्ष: उन्होंने बॉम्बे विधान सभा के अध्यक्ष (1937-1946) के रूप में कार्य किया और निष्पक्षता तथा दृढ़ता के लिए सभी दलों का सम्मान अर्जित किया।
  • केंद्रीय विधान सभा में भूमिका
    • पीठासीन अधिकारी (1946-47): वे जनवरी 1946 में केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष बने।
    • स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु परिवर्तन: उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के तहत विधानसभा का सञ्चालन किया।
  • संविधान सभा (विधान) अध्यक्ष
    • समिति के अध्यक्ष: अगस्त 1947 में, उन्होंने उस समिति का नेतृत्व किया, जिसने संविधान निर्माण की भूमिका को विधायी भूमिका से अलग करने की सिफारिश की, जिससे विधान सभा के लिए एक समर्पित अध्यक्ष के चयन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
    • अध्यक्ष: नवंबर 1949 में संविधान लागू होने तक उन्होंने संविधान सभा (विधान) के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
  • लोकसभा अध्यक्ष: जवाहरलाल नेहरू ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा और 15 मई, 1952 को वे प्रथम लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए।

संसदीय प्रक्रियाओं में प्रमुख योगदान

  • प्रश्नकाल: उन्होंने प्रश्नकाल को जवाबदेही के एक सार्थक साधन के रूप में संस्थागत रूप दिया।
  • समिति प्रणाली: उन्होंने संसदीय समितियों का पुनर्गठन किया और नियम समिति, विशेषाधिकार समिति, कार्य मंत्रणा समिति, अधीनस्थ विधान समिति आदि जैसी नई संस्थाओं की स्थापना की।
  • नवाचार: उन्होंने अल्प सूचना प्रश्न, आधे घंटे की चर्चा और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर व्यवस्थित बहस को बढ़ावा दिया।
  • निर्णय: उनके निर्णयों ने कार्यविधि और कार्य संचालन के नियमों को आकार दिया, जिसने दशकों तक भारतीय संसदीय कार्यप्रणाली को प्रभावित किया।
  • संसदीय स्वतंत्रता का दृष्टिकोण
    • स्वतंत्र सचिवालय: उन्होंने विधायी सर्वोच्चता की रक्षा के लिए कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त एक स्वतंत्र संसदीय सचिवालय बनाने पर जोर दिया।
    • संसदीय कर्मचारियों की नैतिकता: उन्होंने संसदीय प्रशासन में स्वतंत्रता, निष्पक्षता, विश्वास और तत्परता के मूल्यों पर जोर दिया।

अंतर-संसदीय कूटनीति

  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व: उन्होंने नए ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ (1950) के उद्घाटन समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया और महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के राज्याभिषेक (1953) में भी शामिल हुए।
  • वैश्विक सहयोग: उन्होंने अंतर-संसदीय संघ और राष्ट्रमंडल संसदीय संघ के साथ भारत की भागीदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया।

विरासत और मृत्यु

  • राजनेता: सभी दलों के नेताओं ने उन्हें “लोकसभा का जनक” (पंडित नेहरू द्वारा) और “संसदीय लोकतंत्र का आधार स्तंभ” कहा।
  • मृत्यु: उन्होंने 27 फरवरी 1956 को अहमदाबाद में अपने निधन तक सार्वजनिक सेवा जारी रखी।

संदर्भ

असम मंत्रिमंडल ने छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की सिफारिश करने वाली मंत्रिसमूह (GoM) की रिपोर्ट को मंजूरी दे दी है।

संबंधित तथ्य

  • अनुसूचित जनजाति के दर्जे की माँग करने वाले समुदाय: ताई अहोम, चाय जनजाति/आदिवासी, मोरन, मोटोक, चुटिया, कोच-राजबोंगशी।
  • ये सभी मिलकर असम की आबादी का लगभग 27% हिस्सा हैं और वर्तमान में OBC के रूप में सूचीबद्ध हैं।

अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल करने के मानदंड (लोकुर समिति, 1965)

ORGI, लोकुर समिति द्वारा अनुशंसित मानदंडों के आधार पर समुदायों का आकलन करता है, जिसमें शामिल हैं:-

  • आदिम लक्षण
  • विशिष्ट संस्कृति
  • भौगोलिक अलगाव
  • व्यापक समुदाय से संपर्क में संकोच
  • सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन

किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) के रूप में सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया

  • राज्य सरकार का प्रस्ताव: यह प्रक्रिया तब शुरू होती है, जब राज्य या केंद्रशासित प्रदेश सरकार अनुसूचित जनजाति के दर्जे की माँग करने वाले समुदाय की पहचान करती है।
    • राज्य/संघ राज्य क्षेत्र नृवंशविज्ञान और सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन करता है, सहायक दस्तावेज तैयार करता है और प्रस्ताव केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय को प्रस्तुत करता है।
    • इसके बाद मंत्रालय प्रस्ताव को मूल्यांकन के लिए भारत के महापंजीयक कार्यालय (ORGI) को भेजता है।
  • भारत के महापंजीयक (RGI) द्वारा समीक्षा
    • गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत भारत के महापंजीयक (RGI) ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवशास्त्रीय साक्ष्यों का उपयोग करके प्रस्ताव की जाँच करता है।
    • यदि RGI दावे को मंजूरी दे देता है, तो प्रस्ताव को आगे की जाँच के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) को भेज दिया जाता है।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) द्वारा समीक्षा
    • NCST सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, सांस्कृतिक विशिष्टता और मुख्यधारा के समाज से अलगाव की सीमा जैसे कारकों के आधार पर समुदाय की पात्रता का आकलन करता है।
    • मूल्यांकन के बाद, NCST औपचारिक रूप से केंद्र सरकार को समुदाय को शामिल करने की सिफारिश करता है।
  • अंतिम अनुमोदन और संवैधानिक संशोधन
    • सभी संस्थाओं की सहमति के बाद, प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाता है।
    • इसके बाद मंत्रिमंडल संविधान (अनुसूचित जनजातियाँ) आदेश, 1950 में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करता है।
    • राष्ट्रपति अनुच्छेद-341 और 342 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अंतर्गत समावेशन या बहिष्करण को निर्दिष्ट करते हुए एक अधिसूचना जारी करते हैं।

ST सूची में शामिल होने के लाभ

  • शैक्षिक आरक्षण: अनुच्छेद-15(4) अनुसूचित जनजातियों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान करता है।
  • सेवाओं में आरक्षण: अनुच्छेद-16(4), 16(4A) और 16(4B) सरकारी पदों तथा सेवाओं में आरक्षण सुनिश्चित करते हैं।
  • प्रशासनिक सुरक्षा उपाय: अनुच्छेद-244, पाँचवीं और छठी अनुसूची के साथ, जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष सुरक्षा प्रदान करता है।
  • स्थानीय शासन प्रतिनिधित्व: अनुच्छेद-243D पंचायतों में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करता है।
  • संसदीय प्रतिनिधित्व: अनुच्छेद-330 लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण प्रदान करता है।
  • अनुसूचित जनजाति की विशिष्ट सरकारी योजनाओं तक पहुँच: मान्यता प्राप्त समुदायों को मौजूदा सरकारी योजनाओं के तहत अनुसूचित जनजातियों के लिए निर्धारित लाभ प्राप्त होते हैं।
    • उदाहरण के लिए: प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजनाएँ, विदेशी छात्रवृत्तियाँ, राष्ट्रीय फेलोशिप, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम से रियायती ऋण।

वर्तमान स्थिति

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 705 जनजातियाँ हैं, जो कुल जनसंख्या का 8.6% (लगभग 10.4 मिलियन लोग) हैं।

सन्दर्भ

वैज्ञानिक प्रमाणों से पता चलता है कि 1 माइक्रोन से छोटे कण PM1, PM 2.5 से कहीं अधिक घातक हैं, इसके बावजूद भारत में इसके लिए कोई नियामक मानक या निगरानी नहीं है।

संबंधित तथ्य

  • नए अध्ययनों से संकेत मिलता है कि दिल्ली में PM1 के स्तर को लगभग 20% (अथवा लगभग 50 μg/m³) कम आँका गया है, जिससे वास्तविक स्वास्थ्य जोखिम में वृद्धि की संभावना और अधिक गंभीर हो सकती है।

पार्टिकुलेट मैटर 1.0 (PM1) क्या है?

  • परिभाषा: PM1, 1 माइक्रोन से छोटे व्यास वाले कणिकीय पदार्थ को संदर्भित करता है।
  • अतिसूक्ष्म प्रकृति: PM1 अत्यंत सूक्ष्म कण होते हैं, जो शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को उस प्रकार से भेद सकते हैं, जिस प्रकार बड़े कण सक्षम नहीं होते।
  • स्रोत: आधुनिक वाहनों के इंजनों, औद्योगिक उत्सर्जन, बायोमास दहन, निर्माण गतिविधियों से उत्पन्न धूल और संघनित धातु वाष्पों से उत्सर्जन।
    • अपने सूक्ष्म आकार के कारण, ये कण आसानी से फैल नहीं पाते और जिस हवा में हम साँस लेते हैं, उसमें निलंबित रहते हैं।
  • अन्य कणों से तुलना
    • PM10: अधिकतर नाक के बालों और बलगम से अवरुद्ध।
      • ये ब्रोंकाइटिस, अस्थमा और ऊपरी श्वसन संक्रमण से जुड़े होते हैं। ये अक्सर नई बीमारियाँ पैदा करने के स्थान पर मौजूदा बीमारियों को और बिगाड़ देते हैं।
    • PM2.5: फेफड़ों में गहराई तक पहुँच जाता है।
      • निचले श्वसन तंत्र में गहराई तक प्रवेश करता है, जिससे हृदय संबंधी समस्याएँ पैदा होती हैं।
    • PM1: यह इतना छोटा होता है कि एल्वियोली में प्रवेश कर रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाता है, और कुछ मामलों में, त्वचा से भी होकर गुजर जाता है।
      • PM10, PM2.5 और PM1 का स्तर सामूहिक रूप से कण प्रदूषण का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें PM1, PM2.5 का एक महत्त्वपूर्ण अंश होता है।
  • रासायनिक वितरण: सीसा, कैडमियम, निकल, क्रोमियम और अन्य कैंसरकारी भारी धातुओं को वहन करता है।
  • शरीर तक तीव्र पहुँच: यह ऑक्सीडेटिव तनाव, कोशिकीय क्षति का कारण बनता है, और हृदय रोग, स्ट्रोक, अस्थमा और कैंसर के बढ़ते जोखिम पैदा करता है।
  • PM 2.5 का अनुपात: PM1, PM 2.5 की सांद्रता का लगभग 50% है, जो इसे सूक्ष्म कण प्रदूषण का एक प्रमुख घटक बनाता है।
  • सतही रसायन: इसका उच्च सतह-क्षेत्र-से-आयतन अनुपात PM2.5 की तुलना में अधिक विषाक्त रासायनिक अवशोषण क्षमता को प्रदर्शित करता है।

नियामक ढाँचे का अभाव

  • मानकों का अभाव: न तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और न ही भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने PM1 के लिए मानक या अनुमेय सीमाएँ निर्धारित की हैं।
    • CPCB के राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों में PM1 अनुपस्थित है; ऐसे सीमा मान या कानूनी मानदंड मौजूद नहीं हैं।
  • तकनीकी बाधाएँ: स्वीकृत वास्तविक समय में PM1 नमूना संग्रहकर्ताओं की कमी, सीमित वैज्ञानिक विशेषज्ञता, और मान्य मापन प्रोटोकॉल का अभाव, विनियमन में देरी करता है।
  • वैश्विक वैज्ञानिक चेतावनियाँ: दुनिया भर के शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि PM1 अपने अतिसूक्ष्म आकार और विषाक्तता के कारण PM2.5 और PM10 की तुलना में अत्यधिक नुकसान पहुँचा सकता है।

सिफारिशें

  • PM1 कण संबंधी मानक निर्धारित करना: वैश्विक शोध के आधार पर PM1 के लिए राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) स्थापित करना।
  • निगरानी नेटवर्क को उन्नत करना: CAAQMS में PM1 सेंसरों को एकीकृत करना; वास्तविक समय नियामक-ग्रेड PM1 नमूनों को मान्य करना।
  • स्रोत नियंत्रण को मजबूत करना: वाहनों से होने वाले अतिसूक्ष्म उत्सर्जन, औद्योगिक दहन और धातु वाष्पों को लक्षित करना।
  • शहरी नियोजन उपाय अपनाना: निम्न-उत्सर्जन क्षेत्रों, ग्रीन बफर्स, धूल नियंत्रण और बेहतर यातायात प्रबंधन के माध्यम से हॉटस्पॉट की संख्या को कम करना।
  • आंतरिक वायु मानकों को बढ़ावा देना: सार्वजनिक भवनों, स्कूलों और अस्पतालों में PM1 को प्रोत्साहित करना।

संदर्भ

हाल ही में केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने राष्ट्रीय दुग्ध दिवस (26 नवंबर) के अवसर पर आधारभूत पशुपालन सांख्यिकी (Basic Animal Husbandry Statistics- BAHS) 2025 जारी की।

आधारभूत पशुपालन सांख्यिकी (BAHS) 2025

  • सर्वेक्षण आधार: ग्रीष्म, वर्षा और शीत ऋतुओं को शामिल करते हुए एकीकृत नमूना सर्वेक्षण (मार्च 2024-फरवरी 2025) पर आधारित।
  • क्षेत्रीय कवरेज: इसमें दूध, अंडे, मांस और ऊन उत्पादन संबंधी राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय अनुमान शामिल हैं, साथ ही इसमें योगदान देने वाली पशु आबादी और बुनियादी ढाँचे के आँकड़े भी शामिल हैं।
  • नीतिगत उपयोग: अनुसंधान, योजना, कार्यक्रम मूल्यांकन, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग का समर्थन करता है और आँकड़े-आधारित निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करता है।
  • बुनियादी ढाँचा संबंधी आँकड़े: पशु चिकित्सा संस्थानों, गौशालाओं, फार्मों, कृत्रिम गर्भाधान और वैश्विक पशुधन प्रवृत्तियों का विवरण शामिल है।
  • प्रकाशितकर्ता: केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय।

प्रमुख उत्पादन अनुमान

दुग्ध उत्पादन

  • वैश्विक स्थिति: भारत वैश्विक दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है।
  • कुल उत्पादन: 247.87 मिलियन टन, जो पिछले वर्ष के 239.30 मिलियन टन से बढ़कर 3.58% की वृद्धि दर्शाता है।
  • प्रति व्यक्ति उपलब्धता: 319 ग्राम/दिन (2014-15) से बढ़कर 485 ग्राम/दिन (2024-25) हो गई।
  • शीर्ष उत्पादक राज्य: उत्तर प्रदेश (15.66%), राजस्थान (14.82%), मध्य प्रदेश (9.12%), गुजरात (7.78%), महाराष्ट्र (6.71%)।
    • ये सभी मिलकर देश के कुल दुग्ध उत्पादन में 54.09% का योगदान करते हैं।
  • योगदान: दुग्ध उत्पादन में वृद्धि विदेशी/संकर नस्ल के मवेशियों द्वारा 4.97%, देशी मवेशियों द्वारा 3.51% और भैंसों द्वारा 2.45% दर्ज की गई।

अंडा उत्पादन

  • वैश्विक स्थिति: भारत विश्व स्तर पर दूसरे स्थान पर है।
  • कुल उत्पादन: अंडों का उत्पादन 149.11 बिलियन तक पहुँचा, जो 4.44% की वार्षिक वृद्धि दर दर्शाता है, जबकि वर्ष 2023–24 में इसके 3.18% की दर से बढ़ने का अनुमान है।
  • प्रति व्यक्ति उपलब्धता: 62 अंडे/वर्ष (2014-15) से बढ़कर 106 अंडे/वर्ष (2024-25) हो गया है।
  • शीर्ष उत्पादक राज्य: आंध्र प्रदेश (18.37%), तमिलनाडु (15.63%), तेलंगाना (12.98%), पश्चिम बंगाल (10.72%), कर्नाटक (6.67%)।
    • सामूहिक रूप से, ये राज्य भारत के कुल अंडा उत्पादन में 64.37% का योगदान करते हैं।
  • उत्पादन प्रणालियाँ
    • व्यावसायिक मुर्गीपालन: 125.98 अरब अंडे (84.49%)
    • बैकयार्ड पोल्ट्री  : 23.13 अरब अंडे (15.51%)।

मांस उत्पादन

  • वैश्विक स्थिति: मांस उत्पादन में भारत का चौथा स्थान है।
  • कुल उत्पादन: 10.50 मिलियन टन, जो पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2024-25 में 2.46% अधिक है।
  • प्रजातियों का योगदान: पोल्ट्री मांस का योगदान 5.18 मिलियन टन है, जो लगभग 50% है।
  • शीर्ष उत्पादक राज्य: पश्चिम बंगाल (12.46%), उत्तर प्रदेश (12.20%), महाराष्ट्र (11.57%), आंध्र प्रदेश (10.84%), तेलंगाना (10.49%)।
    • ये सभी देश के कुल मांस उत्पादन में 57.55% का योगदान करते हैं।

ऊन उत्पादन

  • कुल उत्पादन: 34.57 मिलियन किलोग्राम, पिछले वर्ष की तुलना में वर्ष 2024-25 में 2.63% की वृद्धि दर्ज गई।
  • शीर्ष उत्पादक राज्य: राजस्थान (47.85%), जम्मू और कश्मीर (22.88%), गुजरात (6.22%), महाराष्ट्र (4.75%), हिमाचल प्रदेश (4.30%)।
    • ये राज्य मिलकर देश के कुल ऊन उत्पादन का 85.98% हिस्सा उत्पन्न करते हैं।

पशुधन क्षेत्र का विकास

  • तीव्र GVA विस्तार: भारतीय पशुधन क्षेत्र ने पिछले एक दशक में असाधारण वृद्धि दर्ज की है।
    • इसका सकल मूल्य वर्द्धन (GVA) वर्ष 2014-15 और वर्ष 2023-24 के बीच लगभग 195% बढ़ा है, जो फसल क्षेत्र की वृद्धि दर से कहीं अधिक है।
  • कृषि में प्रमुख योगदानकर्ता: इस तीव्र वृद्धि ने पशुधन को कृषि आय का एक प्रमुख स्तंभ बना दिया है, जो वर्ष 2023-24 में कुल कृषि GVA में 31% का योगदान देगा और कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों से कुल मूल्य का लगभग एक-तिहाई उत्पन्न करेगा।
  • राष्ट्रीय GVA में हिस्सेदारी: वर्तमान मूल्यों पर यह राष्ट्रीय GVA का 5.5% रहा है, जो आर्थिक उतार-चढ़ाव के दौरान एक महत्त्वपूर्ण बफर के रूप में कार्य करता है।
  • निर्यात वृद्धि
    • इस क्षेत्र में निर्यात में भी निरंतर वृद्धि देखी गई है, पशुधन उत्पादों का निर्यात वर्ष 2024-25 में ₹66,249 करोड़ तक पहुँच गया है।
    • यह मुख्यतः मांस उद्योग के मजबूत प्रदर्शन, विशेष रूप से गोजातीय मांस और अन्य खाद्य अपशिष्टों के निर्यात में वृद्धि के कारण है।
  • कृषि का समग्र हिस्सा: पशुधन क्षेत्र का महत्त्व कृषि, वानिकी और मत्स्यपालन में इसके योगदान से और भी प्रदर्शित होता है, जिनका वर्ष 2023-24 में राष्ट्रीय सकल मूल्य वर्द्धन में कुल मिलाकर 17.8% योगदान था।

संदर्भ 

संयुक्त राष्ट्र ESCAP, 2025 एशिया-प्रशांत आपदा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि दिल्ली, कराची, ढाका, मनीला, सियोल और शंघाई जैसे एशियाई महानगरों में नगरीय ऊष्मन द्वीप प्रभाव के कारण 2-7 डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त तापमान वृद्धि हो सकती है।

संबंधित तथ्य 

  • इस रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के उन पाँच देशों में शामिल है, जहाँ कृषि को बढ़ते तापमान के कारण लगातार उच्च जोखिम का सामना करना पड़ रहा है, जिससे फसल की पैदावार, श्रम उत्पादकता और ग्रामीण आजीविका को खतरा उत्पन्न हो रहा है।

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • नगरीय ऊष्मण द्वीप प्रभाव 
    • तापमान में वृद्धि: शहरी परिदृश्य, सघन निर्माण और सीमित हरित क्षेत्र वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान वृद्धि के स्तर में 2-7°C की वृद्धि कर सकते हैं, भले ही वैश्विक तापमान 1.5-2°C पर स्थिर हो जाए।
    • उच्च जोखिम वाले शहर: दिल्ली, कराची, ढाका, मनीला, शंघाई, सियोल जैसे शहरों में स्थानीयकृत गर्मी की तीव्रता का सामना करना पड़ रहा है।
  • हीट इंडेक्स एक्सपोजर
    • गर्म दिन: भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में वार्षिक रूप से 300 से अधिक दिन तापमान 35°C से अधिक रह सकता है।
    • तीव्र तनाव सीमा: कई क्षेत्रों में 41°C से अधिक तापमान 200 से अधिक दिन तक रह सकता है, जो अत्यधिक खतरे और संभावित हीटस्ट्रोक से जुड़ा है।
    • उच्चतम जोखिम श्रेणी: दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम एशिया, हीट इंडेक्स की श्रेणी 3 और 4 में आते हैं, इस क्षेत्र में सबसे अधिक तनाव और जोखिम का स्तर।
    • चूँकि हीट इंडेक्स में आर्द्रता भी शामिल होती है, इसलिए यह “महसूस किए गए तापमान” का अधिक सटीक माप प्रदान करता है।
  • चरम गर्मी की घटनाओं में तेजी से वृद्धि
    • क्षेत्रीय आपदा पैटर्न में बदलाव: परंपरागत रूप से चक्रवातों और सूखे से प्रभावित एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अब अत्यधिक गर्मी सबसे तेजी से बढ़ रही है।
    • रिकॉर्ड गर्मी: वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा, जिसमें पूरे एशिया में लंबे समय तक ‘लू’ का प्रभाव रहा।
      • बांग्लादेश (अप्रैल-मई 2024) को सबसे भीषण गर्मी की आपदा का सामना करना पड़ा, जिससे 3.3 करोड़ लोग प्रभावित हुए।
      • भारत में वर्ष 2024 में ‘लू’ की घटनाएँ: दूसरी सबसे घातक घटना, जिसमें लगभग 700 लोगों की जान गई।
  • स्वास्थ्य और आजीविका पर प्रभाव
    • दीर्घकालिक जोखिम: दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम एशिया की 40% से अधिक आबादी मध्यम एवं दीर्घकालिक परिदृश्यों में 35°C तथा 41°C से ऊपर के हीट इंडेक्स स्तरों का सामना करेगी।
    • ताप-संबंधी मृत्यु दर: वर्ष 2050 तक ताप-संबंधी मौतें दोगुनी हो सकती हैं।
    • सबसे असुरक्षित समूह: शहरी गरीब, वृद्ध, बच्चे, बाहरी कामगार, कम हरियाली वाले क्षेत्र।
    • गंभीर स्वास्थ्य जोखिम: चरम गर्मी शरीर की तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता को बाधित करती है, जिससे हृदय संबंधी तनाव, गुर्दे की विफलता, श्वसन संबंधी परेशानी, संज्ञानात्मक प्रभाव और हीटस्ट्रोक हो सकता है।
    • बढ़ती असमानताएँ: शहरी गरीब समुदायों को अपेक्षाकृत अधिक तापीय जोखिम का सामना करना पड़ता है, जबकि संपन्न क्षेत्रों में हरियाली, बेहतर अवसंरचना और शीतल पर्यावरण अपेक्षाकृत सुरक्षित परिस्थितियाँ सुनिश्चित करते हैं।
      • उदाहरण: इंडोनेशिया के बांडुंग में सबसे धनी और सबसे गरीब क्षेत्रों के बीच लगभग 7°C का तापमान अंतराल दर्ज किया गया।
  • ऊष्मा–वायु गुणवत्ता प्रतिपुष्टि चक्र
    • प्रदूषण में वृद्धि: गर्मी से सूखे और वनाग्नि की घटनाएँ बढ़ती हैं, जिससे PM10, PM2.5, CO2, CO, NOx, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs), जिनमें एक्रोलिन और फॉर्मेल्डिहाइड शामिल हैं, उत्सर्जित होते हैं।
    • यौगिक निर्माण: चरम गर्मी और प्रदूषण एक खतरनाक प्रतिक्रिया चक्र का निर्माण करते हैं, जिससे जलवायु और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ जाते हैं।
  • आर्थिक हानि 
    • उत्पादकता हानि: ऊष्मा जनित कारणों से कार्य घंटों की हानि वर्ष 1995 से 2030 के बीच 3.75 मिलियन से बढ़कर लगभग 8.1 मिलियन होने का अनुमान है।
    • उच्च उत्सर्जन परिदृश्यों में जलवायु-जनित वार्षिक आर्थिक हानि लगभग 498 बिलियन डॉलर तक बढ़ सकती है।
    • सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र: कृषि, निर्माण, विनिर्माण, विशेष रूप से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में।
  • कृषि पर चरम गर्मी का प्रभाव
    • फसल की पैदावार में गिरावट: अत्यधिक गर्मी फसलों को गंभीर संकट में डाल रही है;
      • उदाहरणस्वरूप, मार्च 2022 में अत्यधिक ‘लू’ के कारण भारत की गेहूँ की फसल, विकास के एक निर्णायक चरण में ही झुलस गई, जिससे उत्पादन पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
    • पशुधन उत्पादकता में गिरावट: बढ़ते तापमान से पशुधन की प्रजनन क्षमता, चारे का सेवन और दूध एवं मांस की पैदावार कम हो जाती है।
    • श्रम हानि: उच्च तापमान शारीरिक क्षमता को कम करता है, निर्जलीकरण को बढ़ाता है और कृषि श्रमिकों की उत्पादकता को 27% तक कम करता है।
    • ग्रामीण गरीबी में वृद्धि: गर्मी के कारण फसल और श्रम की हानि ग्रामीण समुदायों को गरीबी के जाल में धकेल सकती है, विशेषतः उन क्षेत्रों में जहाँ अनुकूलन क्षमता सीमित है।
  • सीमित ताप चेतावनी प्रणाली
    • सीमा: केवल 54% वैश्विक मौसम विज्ञान सेवाएँ अत्यधिक गर्मी की चेतावनी जारी करती हैं।
    • संभावित जीवन जो बचाए जा सकते हैं: 57 देशों में गर्मी संबंधी स्वास्थ्य चेतावनी प्रणालियों का विस्तार करने से वार्षिक रूप से लगभग 1,00,000 लोगों की जान बच सकती है।

एशिया-प्रशांत आपदा रिपोर्ट (APDR) के बारे में

  • प्रकाशक: APDR संयुक्त राष्ट्र ESCAP के सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्रभाग की एक प्रमुख रिपोर्ट के रूप में प्रत्येक दो वर्ष में प्रकाशित होती है।
  • उद्देश्य और क्षेत्र: इसका प्राथमिक उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आपदा जोखिमों, मौजूदा कमजोरियों और सतत् विकास पर उनके व्यापक प्रभावों की समझ को बढ़ाना है।

संदर्भ 

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया और उनकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

  • यह मामला व्यक्तिगत विवेक, धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद-25) और सशस्त्र बलों की अनुशासन, एकता और सामंजस्य (अनुच्छेद-33 द्वारा अनुमोदित) की आवश्यकता के बीच गहरे संघर्ष को उजागर करता है।

विशेष अनुमति याचिका (SLP) के बारे में 

  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद-136 सर्वोच्च न्यायालय को यह विवेकाधीन अधिकार प्रदान करता है कि वह किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण (सैन्य न्यायालयों को छोड़कर) के निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका के तहत अपील करने की अनुमति दे सके।
  • प्राथमिक उद्देश्य: गंभीर अन्याय के विरुद्ध एक संवैधानिक सुरक्षा उपाय के रूप में कार्य करना, यह सुनिश्चित करता है कि जब किसी नियमित अपील का प्रावधान न हो, तो असाधारण त्रुटियाँ न्यायिक जाँच से बच न सकें।
  • उपाय की प्रकृति: अपील का अधिकार नहीं; विशेष अनुमति याचिका एक असाधारण और अवशिष्ट अधिकार क्षेत्र है, जिसका प्रयोग केवल अन्याय के असाधारण मामलों में ही किया जाता है।
  • स्वीकृति के आधार: केवल न्यायदोष, विकृत निष्कर्ष, प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन या विधि के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के मामलों में ही दायर की जाती है।
  • ‘कौन’ दायर कर सकता है: कोई भी पीड़ित पक्ष दायर कर सकता है।
  • समय सीमा: निर्णय की तारीख से 90 दिनों के भीतर अथवा उच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा याचिका खारिज किए जाने की तारीख से 60 दिनों के भीतर।
  • महत्त्व: देश भर में एक समान न्याय सुनिश्चित करने वाले ‘सुरक्षा वाल्व’ के रूप में कार्य करता है।
    • हालाँकि, अति प्रयोग ने विशेष अनुमति याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की वृद्धि में एक प्रमुख योगदानकर्ता बना दिया है, जिससे इसकी असाधारण विशेषता कमजोर हो गई है।
  • सीमाएँ: वैधानिक अपीलों को दरकिनार करने के लिए नहीं।
    • सर्वोच्च न्यायालय सामान्यतः अंतरिम आदेशों में हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक कि मामले में किसी गंभीर अवैधता या न्याय के स्पष्ट विघटन का संकेत न दिखाई दे।

मामले की पृष्ठभूमि

  • रेजिमेंटल लोकाचार और नेतृत्व अपेक्षाएँ: लेफ्टिनेंट कमलेसन एक सिख-जाट-राजपूत रेजिमेंट में कार्यरत थे, जहाँ अनुष्ठानों में भागीदारी, यूनिट की पहचान, एकजुटता और मनोबल का मुख्य प्रतीक है।
    • अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अधिकारी-जवान के बंधन को मजबूत करने के लिए सैन्य रीति-रिवाजों का पालन करें और व्यक्तिगत आस्था की परवाह किए बिना अनुष्ठानों में भाग लें।
  • कमलेसन द्वारा इनकार करना: लेफ्टिनेंट कमलेसन, एक प्रोटेस्टेंट ईसाई, सभी बाहरी परेड अनुष्ठानों में शामिल हुए, लेकिन आस्था का हवाला देते हुए गर्भगृह में प्रवेश करने या पूजा/आरती करने से इनकार कर दिया।
    • हालाँकि, उन्होंने परेड के अन्य सभी पहलुओं में लगातार भाग लिया। उन्होंने सम्मानपूर्वक बाहर खड़े रहने की पेशकश की।
  • सेना द्वारा इनकार की व्याख्या: सेना ने इस इनकार को रेजिमेंटल रीति-रिवाजों से सार्वजनिक अलगाव, एक वैध आदेश की अवज्ञा और घोर अनुशासनहीनता के रूप में देखा।
    • इस कृत्य की व्याख्या निजी विश्वास के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे आचरण के रूप में की गई, जिसने नेतृत्व की विश्वसनीयता, मनोबल और एकजुटता को कमजोर किया।
  • संस्थागत और अनुशासनात्मक चिंताएँ: ऐसी छूट प्रदान करने से सैन्य अनुशासन कमजोर पड़ सकता है, जैसा कि भारतीय वायु सेना (IAF) की दाढ़ी संबंधी विवादित घटनाओं में पूर्व में देखने को मिला था।
  • मामले का परिणाम: सेना अधिनियम की धारा 19 और नियम 14 के तहत कार्यवाही के बाद, उन्हें मार्च 2021 में बर्खास्त कर दिया गया।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने बर्खास्तगी को बरकरार रखा और कहा कि सैन्य अनुशासन तथा सामूहिक लोकाचार, व्यक्तिगत धार्मिक विवेक पर प्रभावी होते हैं।
    • सेना अधिनियम, 1950 की धारा 19, केंद्र सरकार को किसी अधिकारी को कदाचार या अनुपयुक्तता के आधार पर बर्खास्त करने की अनुमति देती है, जबकि सेना नियम, 1954 का नियम 14, कारण बताओ नोटिस जैसी उचित प्रक्रिया के बाद, कोर्ट मार्शल के बिना बर्खास्तगी की अनुमति देता है।

व्यक्तिगत विवेक पर सैन्य अनुशासन का न्यायिक समर्थन

  • उच्च न्यायालय का तर्क
    • अनुशासन: दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह मुद्दा सैन्य आदेश के पालन का था, धार्मिक स्वतंत्रता का नहीं।
    • उदाहरण: इसने मोहम्मद जुबैर (2017), आर. विश्वान (1983) और एल.डी. बालम सिंह (2002) मामलों का हवाला देते हुए अनुच्छेद-33 के तहत अनुशासन तथा एकरूपता की प्रधानता की पुष्टि की।
    • भूमिका दायित्व: न्यायालय ने माना कि एक अधिकारी के रूप में, उन पर रेजिमेंटल एकता का नेतृत्व करने, उसे प्रेरित करने और उसे बनाए रखने के अतिरिक्त दायित्व भी थे।
    • न्यायिक सम्मान: न्यायालय ने कहा कि सशस्त्र बलों की आवश्यकताओं पर “सामान्य व्यक्ति” का मानक लागू नहीं किया जा सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
    • सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक सम्मान के सिद्धांत को दोहराया और इस बात पर जोर दिया कि अदालतों को अनुशासन, सामंजस्य तथा संचालनात्मक आवश्यकता के मामलों में सैन्य विशेषज्ञता पर संदेह नहीं करना चाहिए।
    • आवश्यक परीक्षण: पीठ ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद-25 के तहत प्रत्येक धार्मिक भावना ‘आवश्यक व्यवहार’ नहीं मानी जा सकती है।
    • नेतृत्व की विफलता: न्यायालय ने उनके आचरण को ‘घोर अनुशासनहीनता’ कहा और उन्हें ‘सेना के लिए अनुपयुक्त’ बताया।
    • विवेक बनाम आदेश: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इनकार करना वैध आदेश की अवज्ञा है, न कि आस्था का प्रयोग करना।
    • अंतिम परिणाम: सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सैन्य संदर्भ में संस्थागत आवश्यकता और बल का सामंजस्य किसी व्यक्ति द्वारा विवेक-आधारित आपत्ति करने पर वरीयता प्राप्त कर सकते हैं।

धार्मिक स्वतंत्रता और सैन्य अनुशासन को नियंत्रित करने वाला संवैधानिक एवं कानूनी संवैधानिक ढाँचा

  • अनुच्छेद-25: धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता और किसी अन्य धर्म के अनुष्ठानों से विरत रहने के अधिकार की गारंटी देता है।
    • न्यायमूर्ति बागची: अनुच्छेद-25 आवश्यक धार्मिक विशेषताओं की रक्षा करता है, न कि प्रत्येक भावना की।”
  • अनुच्छेद-33: संसद को सशस्त्र बलों के कर्मियों के अनुशासन और दक्षता बनाए रखने के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने की अनुमति देता है, जो वर्तमान फैसले का आधार है।
  • वैध आदेश सिद्धांत: वैध आदेश को अस्वीकार करना सैन्य कानून के तहत कदाचार माना जाता है।
  • सहिष्णुता की संवैधानिक नैतिकता: बिजो इमैनुएल जैसे उदाहरण इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि सम्मानजनक रूप से भागीदारी न करना संवैधानिक नैतिकता को दर्शाता है, अवज्ञा को नहीं।
  • संतुलन परीक्षण: न्यायालय ने एक ऐसा ढाँचा लागू किया, जहाँ सैन्य संदर्भ में संस्थागत आवश्यकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अधिक महत्त्वपूर्ण थी।

मुख्य नैतिक दुविधाएँ

  • व्यक्तिगत विवेक बनाम संस्थागत कर्तव्य
    • नैतिक स्वायत्तता: कमलेसन ने अपने विवेक को प्राथमिकता दी और गंभीर परिणामों के बावजूद ईमानदारी और नैतिक साहस का परिचय दिया।
    • कर्तव्य अनिवार्यता: सेना ने आज्ञाकारिता, अनुशासन और कमान की जिम्मेदारी को सर्वोच्च मानते हुए यह तर्क दिया कि नेतृत्वकर्ता को एकरूप व्यवहार का आदर्श प्रस्तुत करना आवश्यक है।।
    • नैतिक पक्ष: यह व्यक्तिगत विश्वास और सार्वजनिक कर्तव्य के बीच एक उत्कृष्ट नैतिक संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है।
  • सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता बनाम नकारात्मक स्वतंत्रता
    • सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता: रेजिमेंटल अनुष्ठान सर्वधर्म समभाव का उदाहरण हैं, जो साझा प्रथाओं के माध्यम से एकता को मजबूत करते हैं।
      • भारतीय सेना जीवंत धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का पालन करती है, जहाँ साझा अनुष्ठान धार्मिक बाध्यता के बजाय भाईचारे के प्रतीक के रूप में कार्य करते हैं और विभिन्न धर्मों में समान पहचान को मजबूत करते हैं।
    • नकारात्मक स्वतंत्रता: अधिकारी ने धार्मिक कृत्यों से दूर रहने के अपने अधिकार पर जोर दिया, यह तर्क देते हुए कि जबरन भागीदारी बल प्रयोग से स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
    • नैतिक प्रश्न: क्या प्रतीकात्मक भागीदारी नैतिक रूप से व्यक्तिगत आस्था की सीमाओं को लाँघ सकती है?
  • नेतृत्व नैतिकता और कमान अखंडता
    • कमान की अपेक्षाएँ: अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे आदर्श प्रस्तुत करते हुए नेतृत्व करें, जिससे सैनिकों में विश्वास और सामूहिक पहचान सुदृढ़ हो। सैन्य नैतिकता में ‘एकजुटता’ का सिद्धांत नेतृत्व की अपेक्षाओं को आकार देता है, जिसके तहत अधिकारी की प्रत्यक्ष भागीदारी, सैनिकों के मनोबल और सामूहिक दृढ़ता का प्रतीकात्मक आधार बन जाती है।
    • अनुमानित अनादर: न्यायालय ने इनकार को सैनिकों का अपमान माना, जिससे उनका विश्वास, मनोबल और आत्मविश्वास कम हुआ।
    • नेतृत्व विफलता: यह मामला अनुकरणीय नेतृत्व की नैतिकता पर प्रकाश डालता है, जहाँ व्यक्तिगत विकल्प, पूरी यूनिट के मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं।
  • उपयोगितावादी बनाम कर्तव्यवादी तर्क
    • उपयोगितावादी तर्क: सेना ने व्यापक कल्याण (एकजुटता, तत्परता और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखना) पर जोर दिया।
    • नैतिक कर्तव्य: अधिकारी ने तर्क दिया कि परिणामों की परवाह किए बिना, विवेक का उल्लंघन करना स्वाभाविक रूप से गलत है।
    • नैतिक विभाजन: यह मामला परिणाम-आधारित नैतिकता और सिद्धांत-आधारित नैतिकता के बीच टकराव पैदा करता है।
  • आनुपातिकता और संस्थागत अनुकूलन
    • दंड की गंभीरता: बर्खास्तगी से असमानुपातिक दंड संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
      • आनुपातिकता के नैतिक परीक्षण के लिए यह आवश्यक है कि दंड अनुशासन पर वास्तविक प्रभाव के अनुरूप हो, विशेषतः जब आपत्ति संकीर्ण, गंभीर और सम्मानपूर्वक व्यक्त की गई हो।
    • समायोजन की संभावना: एक छोटा-सा समायोजन, जैसे कि पवित्र स्थान के बाहर सम्मानजनक उपस्थिति की अनुमति, यूनिट की एकजुटता और अधिकारी की नैतिक स्वायत्तता, दोनों को बनाए रख सकता था, जिससे नैतिक आनुपातिकता प्रदर्शित होती।

आगे की राह

  • स्पष्ट अनुष्ठान दिशा-निर्देश: ऐसे नियम स्थापित करना, जो प्रतीकात्मक उपस्थिति और अनुष्ठान में भागीदारी के बीच अंतर करें, जिससे सामंजस्य बनाए रखते हुए अधिकार का दुरुपयोग रोका जा सके।
  • उचित समायोजन: संस्थागत ढाँचों को औपचारिक रूप से विवेक-आधारित आपत्तियों को मान्यता देनी चाहिए और सीमित, स्पष्ट रूप से परिभाषित समायोजनों की अनुमति देनी चाहिए (जैसे कि अनुष्ठान में शामिल हुए बिना प्रतीकात्मक उपस्थिति) ताकि व्यक्तिगत गरिमा तथा संस्थागत अनुशासन एक साथ सुरक्षित रहें।
  • क्रमिक प्रतिबंध: विवेक-आधारित विवादों में अंतिम दंड से पहले आनुपातिक अनुशासनात्मक कदम उठाना।
  • नैतिकता और विविधता संबंधी प्रशिक्षण: नेतृत्व विकास में नैतिकता, बहुलवाद और विविधता-जागरूकता को शामिल किया जाना चाहिए, जिससे कमांडरों को कठोर प्रवर्तन के बजाय संवाद, सहानुभूति और प्रासंगिक निर्णय के माध्यम से आस्था-आधारित दुविधाओं को हल करने में सक्षम बनाया जा सके।
  • समावेशी नेतृत्व संस्कृति: विश्वास-तटस्थ नेतृत्व के उदाहरण प्रदर्शित करना (जैसे- ब्रिगेडियर डेसमंड हेडे, लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोरे और कर्नल सोफिया कुरैशी) इस बात पर बल देते हैं कि वास्तविक सैन्य नेतृत्व एकजुटता पर आधारित होता है, न कि औपचारिक अनुरूपता पर।
  • संस्थागत शिक्षा: स्व-आधारित आपत्तियों का जवाब देने में अत्यधिक संस्थागत कठोरता, बहुलवादी नेतृत्व और विश्वास की नैतिक नींव को कमजोर करती है।
    • सबसे मजबूत संस्था भी ऐसी परिपाटी में फँस सकती है, जहाँ रीति-रिवाज कठोर बन जाते हैं और कठोरता बहिष्कार बन जाती है। एरिक लिडेल का उदाहरण दर्शाता है कि टीम की एकता को तोड़े बिना, सच्चे विश्वास का सम्मान किया जा सकता है।
  • संवैधानिक संवेदनशीलता: इस नैतिकता को बनाए रखना कि अनुशासन सहिष्णुता के साथ-साथ रहना चाहिए, जो बिजो इमैनुएल मामले की भावना को प्रतिबिंबित करता है।
    • बिजो इमैनुएल मामला (1986): यहोवा के तीन बच्चों को राष्ट्रगान न गाने के कारण निष्कासित कर दिया गया; सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद-25 के तहत उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को बरकरार रखा और सम्मानजनक गैर-भागीदारी पर जोर दिया।
    • संवैधानिक नैतिकता की माँग है कि संस्थाएँ अनुशासन बनाए रखें और साथ ही यह सुनिश्चित करें कि सहिष्णुता, सम्मान और समझौते एक विविध लोकतंत्र में कार्यप्रणाली के लिए केंद्रीय बने रहें।

एरिक लिडेल, स्कॉटिश धावक, जिन्होंने वर्ष 1924 के पेरिस ओलंपिक में 100 मीटर क्वालीफाइंग हीट में दौड़ने से इनकार कर दिया था क्योंकि वह रविवार को निर्धारित थी। सजा मिलने के बजाय, ब्रिटिश ओलंपिक टीम ने उनकी स्पर्द्धा को 400 मीटर में बदल दिया, जिस दौड़ में उन्होंने बाद में स्वर्ण पदक जीता, एक ऐसी उपलब्धि, जिसकी उनसे प्रायः उम्मीद नहीं की जाती थी क्योंकि यह उनकी विशेषज्ञता नहीं थी।

निष्कर्ष

जब कर्तव्य और विवेक के बीच सामंजस्य स्थापित हो जाता है, तब नैतिक आचरण का उद्देश्य किसी एक को दूसरे पर वरीयता देना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलित क्षेत्र निर्मित करना होता है, जहाँ दोनों साथ-साथ विद्यमान रह सकें। कमलेसन मामला यह पुष्टि करता है कि यद्यपि अनुच्छेद-33 के अंतर्गत अनुशासन अनिवार्य है, परंतु एक विविधतापूर्ण लोकतंत्र में दीर्घकालिक विश्वास बनाए रखने हेतु समायोजन तथा आनुपातिकता का सिद्धांत समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।

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