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Dec 01 2025

भारत की GDP  प्रवृत्ति

वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में भारत की GDP में 8.2% की वृद्धि हुई, जो पिछले छह तिमाहियों में सबसे अधिक है, जो मजबूत विनिर्माण और सेवाओं की गति से प्रेरित है।

वृद्धि प्रवृत्ति के प्रमुख बिंदु

  • मजबूत समग्र विस्तार: वास्तविक GDP में 8.2% वृद्धि हुई, जो लगभग 7.3% के पूर्वानुमानों से अधिक है। यह लगातार चौथी तिमाही है, जब वृद्धि की गति तीव्र हुई है।
  • विनिर्माण और उद्योग का प्रोत्साहन: विनिर्माण सकल मूल्य वर्द्धन (GVA ) में 9.1% की वृद्धि हुई, जो छह तिमाहियों में सबसे अधिक है। यह सुधार बेहतर क्षमता उपयोग और माँग में वृद्धि से समर्थित रहा।
    • समग्र उद्योग क्षेत्र में 7.7% वृद्धि दर्ज हुई, जबकि विनिर्माण क्षेत्र ने 7% से अधिक विस्तार बनाए रखा।
  • सेवाओं क्षेत्र का प्रभुत्व: सेवाओं में 9% से अधिक की वृद्धि हुई, जिसमें वित्तीय, रियल एस्टेट और व्यावसायिक सेवाएँ (10.2%) और लोक प्रशासन एवं रक्षा (9.7%) सबसे आगे रहीं।
  • उपभोग-आधारित सुधार: निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) में 7.9% वृद्धि हुई। यह वृद्धि निम्न मुद्रास्फीति, GST दरों में कटौती तथा ग्रामीण माँग में सुधार से समर्थित रही।
  • निवेश वृद्धि: सकल स्थायी पूँजी निर्माण (GFCF) में 7.3% की वृद्धि हुई, जो सरकारी पूँजीगत व्यय में 31% की वृद्धि और निजी पूँजीगत व्यय पुनरुद्धार के प्रारंभिक संकेतों से प्रेरित थी।

GDP वृद्धि प्रवृत्ति के निहितार्थ

  • भारतीय रिजर्व बैंक के लिए नीतिगत अवसर: हाल की अत्यंत निम्न मुद्रास्फीति (लगभग 0.25%) मजबूत वृद्धि के बावजूद मौद्रिक दर में कटौती की संभावना बढ़ाती है।
  • राजकोषीय चुनौतियाँ: नॉमिनल GDP वृद्धि 8.7% रहने से राजस्व संग्रहण और राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों पर दबाव बढ़ सकता है।
  • माँग की स्थिरता: उपभोग में सुधार यह दर्शाता है कि घरेलू माँग की गति स्थायी और मजबूत है।
  • वैश्विक प्रतिकूलताएँ: अमेरिका की शुल्क नीतियाँ, वैश्विक व्यापार सख्ती और भू-राजनीतिक जोखिम वित्तीय वर्ष की दूसरी छमाही में वृद्धि को मध्यम कर सकते हैं।

ऑपरेशन सागर बंधु 

चक्रवात दित्वाह  (Ditwah) के कारण व्यापक पैमाने पर हुई मौतों, बाढ़ और विनाश के बाद भारत ने श्रीलंका को तत्काल मानवीय सहायता पहुँचाने के लिए ऑपरेशन सागर बंधु शुरू किया।

‘ऑपरेशन सागर बंधु’ के बारे में

  • परिभाषा: ऑपरेशन सागर बंधु भारत का मानवीय सहायता और आपदा राहत मिशन है, जिसे चक्रवात दित्वाह  (Ditwah)  के दौरान श्रीलंका का समर्थन करने के लिए शुरू किया गया।
  • प्रवर्तन: इसे भारत सरकार द्वारा भारतीय नौसेना के माध्यम से अंजाम दिया जाता है, यह मिशन नेबरहुड फर्स्ट नीति और विजन महासागर के व्यापक ढाँचे के अंतर्गत कार्यान्वित है।
  • योगदान: भारत ने श्रीलंका को आवश्यक राहत सामग्री, चिकित्सा सामग्री, भोजन, आवास और आपातकालीन संसाधन भेजे।
  • नौसैनिक तैनाती: पहली खेप INS विक्रांत, भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत और INS उदयगिरी, स्वदेशी निर्मित स्टील्थ फ्रिगेट द्वारा पहुँचाई गई।
  • रणनीतिक महत्त्व: यह अभियान भारत की क्षेत्रीय एकजुटता, समुद्री सहयोग और पड़ोसी देशों के लिए त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

मिशन महासागर के तहत अन्य समान संचालन और अभ्यास

  • ऑपरेशन सद्भाव (वर्ष 2024): टाइफून यागी के प्रत्युत्तर में, भारत ने लाओस, वियतनाम और म्याँमार को सहायता प्रदान करने के लिए यह अभियान शुरू किया।
  • INS शारदा तैनाती (मई 2025): भारतीय नौसेना ने मालदीव के माफिलााफुशी एटोल में मानवतावादी सहायता और आपदा राहत अभ्यास के लिए INS शारदा तैनात किया, जो विजन महासागर के अनुरूप था।
  • AIKEYME अभ्यास (अप्रैल 2025): दस अफ्रीकी देशों के साथ यह अभ्यास खोज और बचाव अभियानों पर केंद्रित था, जिससे सहयोगात्मक मानवीय प्रतिक्रिया को प्रदर्शित किया गया।
  • INS संधायक तैनाती (जुलाई 2025): सर्वेक्षण पोत ने मलेशियाई बंदरगाह का दौरा किया और इसकी मानवीय संचालन क्षमताओं को उजागर किया गया।

प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम (PMJVK)

केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य  मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री जन विकास कार्यक्रम (PMJVK) पर एक राष्ट्रीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में प्रगति का आकलन करना, पारदर्शिता को मजबूत करना तथा परियोजना कार्यान्वयन में तेजी लाना था।

PMJVK के बारे में

  • PMJVK एक केंद्र-प्रायोजित क्षेत्रीय विकास योजना है, जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यक-सघन क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे और मूलभूत सुविधाओं में सुधार करना है।
  • उद्गम और विकास: PMJVK, वर्ष 2018–19 में शुरू हुई, मल्टी-सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (MSDP) का पुनर्गठित संस्करण है, जिसे वर्ष 2008–09 में आरंभ किया गया था इसका  पुनर्गठन 1 अप्रैल, 2018 से प्रभावी हुआ।
  • कार्यान्वयन तंत्र: योजना को राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेश प्रशासनों के माध्यम से निर्धारित निधि-साझाकरण पैटर्न के अंतर्गत लागू किया जाता है।
    • परियोजना क्रियान्वयन: परियोजनाओं को संबंधित राज्य/केंद्रशासित प्रदेश एजेंसियों द्वारा केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के समन्वय में इसे लागू, निगरानी और रखरखाव किया जाता है।
  • उद्देश्य
    • अल्पसंख्यक-सघन क्षेत्रों में विकास अंतर को कम करना।
    • सामुदायिक संपत्तियों का निर्माण करना, जैसे- स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, कौशल विकास केंद्र और नागरिक सुविधाएँ।
    • समावेशी विकास, सामाजिक समरसता और सार्वजनिक सेवाओं तक बेहतर पहुँच को प्रोत्साहित करना।
  • महत्त्व
    • वंचित  अल्पसंख्यक समुदायों के लिए समान विकास अवसर बढ़ाता है।
    • भारत के समावेशी शासन एजेंडा का समर्थन करता है और विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय दृष्टिकोण में सीधे योगदान देता है।
    • लक्षित विकास निधियों के माध्यम से पिछड़े जिलों और ब्लॉकों में क्षेत्रीय समानता को मजबूत करता है।

सिंटैक्टिक फॉर्म

फ्राँस से सिंटैक्टिक फोम की खरीद में विलंब ने समुद्रयान, भारत के पहले मानवयुक्त पनडुब्बी मिशन, की महत्त्वपूर्ण परीक्षण समय-सारणी को प्रभावित किया है। इस मिशन का उद्देश्य समुद्र तल से 6,000 मीटर नीचे पहुँचना है।

सिंटैक्टिक फोम के बारे में

  • परिभाषा: सिंटैक्टिक फोम एक हल्का, उच्च-संरचनात्मक सामरिक पदार्थ है, जिसमें खोखले माइक्रोस्फीयर (अधिकतर काँच, सिरेमिक या पॉलिमर) को पॉलिमर रेजिन मैट्रिक्स में एम्बेड करके बनाया जाता है।
  • इसे “सिंटैक्टिक” कहा जाता है क्योंकि खोखले गोलक समान रूप से और व्यवस्थित रूप से रेजिन में व्यवस्थित होते हैं।
  • “फोम” शब्द: यह सामग्री की सेलुलर संरचना को दर्शाता है।

विशेषताएँ

  • उच्च प्लाव्यता: अपने कम घनत्व के कारण, सिंटैक्टिक फोम विशेष रूप से समुद्र के नीचे के अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त है तथा जहाँ प्लवनशीलता महत्त्वपूर्ण होती है, वहाँ बेहतर उछाल प्रदान करता है।
  • उच्च शक्ति-से-भार अनुपात: यह महासागर की गहरी सतहों पर उच्च दबाव सहन कर सकता है।
  • कम जल अवशोषण: बंद-सेल संरचना पानी को अवशोषित नहीं होने देती, जिससे कठोर पर्यावरण जैसे समुद्री जल और रासायनिक परिस्थितियों में दीर्घायु सुनिश्चित होती है।
  • थर्मल इन्सुलेशन: यह तापीय चालकता को कम करता है और शोर को कम करता है, जिससे समुद्री तथा अंतरिक्षीय वातावरण में अत्यधिक मूल्यवान है।
  • स्थायित्व एवं जंग प्रतिरोध: कठोर, संक्षारक और गहरी समुद्री परिस्थितियों में भी विश्वसनीय प्रदर्शन करता है।

प्रमुख अनुप्रयोग

  • गहरी समुद्र अन्वेषण: ऑटोनोमस अंडरवाटर व्हीकल (AUVs), मानवयुक्त उपग्रह और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल्स (ROVs) में उपयोग।
  • अंतरिक्ष क्षेत्र: हल्की संरचनाओं में जहाँ तापीय स्थिरता आवश्यक है।
  • रक्षा: नौसैनिक अनुप्रयोग जैसे सोनार डोम और हल्का कवच, जहाँ कम घनत्व तथा उच्च संपीडन शक्ति आवश्यक है।
  • तेल एवं गैस उद्योग: जल के नीचे पाइपलाइनों और ड्रिलिंग उपकरणों के लिए आदर्श।
  • एयरोस्पेस: एयरोस्पेस उद्योग में, सिंटैक्टिक फोम का उपयोग उपग्रह घटकों और संरचनात्मक भागों में किया जाता है।

रामायण थीम पार्क, गोवा

भारतीय प्रधानमंत्री ने गोवा में 77 फुट की भगवान राम की प्रतिमा तथा नए रामायण थीम पार्क का उद्घाटन श्री संस्था गोकार्ण पर्तगली जीवनोत्तम मठ के 550वें वर्ष के उपलक्ष्य में किया।

रामायण थीम पार्क के बारे में

  • श्री संस्था गोकार्ण पर्तगली जीवनोत्तम मठ ने रामायण की घटनाओं को दृश्य रूप में दर्शाने तथा सांस्कृतिक अधिगम को बढ़ावा देने हेतु एक थीम आधारित पार्क विकसित किया है।
  • अवस्थिति: दक्षिण गोवा के कनकोण क्षेत्र में कुशावती नदी के तट के निकट, श्री संस्था गोकार्ण पर्तगली जीवनोत्तम मठ परिसर के भीतर स्थित।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • पार्क में नई अनावृत 77 फ़ुट ऊँची भगवान राम की कांस्य प्रतिमा स्थापित है।
    • इसमें सुसज्जित उद्यान, रामायण कथानक को दर्शाने वाले स्थापत्य, व्याख्यात्मक स्थान तथा वैष्णव कला परंपरा से युक्त पथ शामिल हैं।
  • महत्त्व
    • युवा पीढ़ियों को भारत की महाकाव्य परंपरा से पुन: जोड़ने का प्रयास।
    • रामायण सर्किट जैसी व्यापक पहलों के अंतर्गत आध्यात्मिक पर्यटन को सुदृढ़ करता है।
    • भक्ति, कला और ऐतिहासिक स्मृति को समाहित करने वाला एक सांस्कृतिक केंद्र।

श्री संस्था गोकार्ण पर्तगली जीवनोत्तम मठ

  • यह गोवा का प्रथम गौड़ सारस्वत ब्राह्मण वैष्णव मठ तथा क्षेत्रीय सांस्कृतिक संरक्षण पर गहरा प्रभाव रखने वाला ऐतिहासिक आध्यात्मिक केंद्र है।
  • स्थापना 1475 ईसवी में हुई, जिससे मठ एवं समुदाय-सेवा की 550 वर्ष पुरानी परंपरा का संकेत मिलता है।
  • आचार एवं दार्शनिक परंपरा
    • यह जगद्गुरु माधवाचार्य की दार्शनिक परंपरा का अनुसरण करता है, जो 13वीं शताब्दी के दार्शनिक एवं अद्वैत विरोधी द्वैत वेदांत के प्रवर्तक थे।
    • इनके अनुसार जीवात्मा (आत्मा) और परब्रह्म (भगवान विष्णु) दो भिन्न एवं स्वतंत्र तत्त्व हैं।
    • यह मठ आश्रय-गृह स्थापित करने तथा भक्ति परंपरा को बनाए रखने के लिए प्रसिद्ध रहा है।
  • सांस्कृतिक भूमिका
    • ऐतिहासिक उथल-पुथल के समय गोवा की भाषा, परंपराओं और पहचान की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • आज भी सामुदायिक कल्याण, आध्यात्मिक शिक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता को दिशा प्रदान करता है।

MH-60 रोमियो

भारत और अमेरिका ने भारतीय नौसेना के MH-60R हेलीकॉप्टर्स हेतु ₹7,995 करोड़ का स्थायित्व समर्थन समझौता किया, जिससे दीर्घकालिक उपलब्धता और रखरखाव क्षमता सुदृढ़ होगी।

  • भारत ने वर्ष 2020 में 24 MH-60 रोमियो हेलीकॉप्टर अमेरिका के विदेशी सैन्य बिक्री कार्यक्रम के माध्यम से खरीदे थे, अब तक 15 को शामिल किया जा चुका है।

MH-60 रोमियो नौसैनिक हेलीकॉप्टर के बारे में

  • यह विश्व का सबसे उन्नत समुद्री हेलीकॉप्टर है और एंटी-सबमरीन और एंटी-सरफेस युद्ध के लिए US नेवी का मुख्य प्लेटफॉर्म है।
  • निर्माता: लॉकहीड मार्टिन, अमेरिका।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • उन्नत उपकरण: बेहतर डिटेक्शन और टारगेटिंग के लिए एडवांस्ड एयरबोर्न एक्टिव सोनार, मल्टी-मोड सर्च रडार और FLIR टरेट से लैस।
    • गति व दूरी: दो 1,425 किलोवाट टर्बोशाफ्ट इंजनों द्वारा संचालित, अधिकतम गति 267 किलोमीटर प्रति घंटा तथा लगभग 454 किलोमीटर की दूरी क्षमता।
    • वहन क्षमता: टॉरपीडो, वायु-से-भूमि प्रक्षेपास्त्र, रॉकेट तथा क्रू-नियंत्रित हथियार ले जाने में सक्षम।
    • संचालन स्थिति: सभी मौसमों में संचालन हेतु विकसित, अत्याधुनिक एवियोनिक्स और उच्च जीवंतता प्रणालियाँ।

भूमिका

  • पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW), सतह रोधी युद्ध (ASuW), खोज और बचाव (SAR), लाजिस्टिक निगरानी, ​​संचार रिले, नेवल गनफायर सपोर्ट और VERTREP का संचालन करता है।
  • यह फ्रिगेट, विध्वंसक, क्रूजर, विमानवाहक पोत और उभयचर जहाजों से संचालित होता है और तटीय और खुले समुद्र में मिशनों का समर्थन करता है।

स्थायित्व समर्थन समझौते का महत्त्व

  • उन्नत उपलब्धता: भारत में दीर्घकालिक रखरखाव, मरम्मत, पुर्जों की आपूर्ति और निरीक्षण सुविधाएँ सुनिश्चित कर परिचालन तैयारी बढ़ाता है।
  • आत्मनिर्भरता को बढ़ावा: देश में मरम्मत एवं समर्थन अवसंरचना का विकास आत्मनिर्भर भारत के अनुरूप, अमेरिकी सरकारी समर्थन पर निर्भरता कम करता है।
  • औद्योगिक क्षमता निर्माण: भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के माध्यम से देशी उत्पाद और सेवाएँ विकसित कर रक्षा क्षेत्र की क्षमताओं का विस्तार।

एशिया पॉवर इंडेक्स 2025

भारत ने एशिया पॉवर इंडेक्स 2025 में तीसरा स्थान प्राप्त किया है, जहाँ प्रथम स्थान पर अमेरिका और द्वितीय स्थान पर चीन है।

एशिया पॉवर इंडेक्स के बारे में

  • यह ऑस्ट्रेलिया के लोवी संस्थान द्वारा जारी वार्षिक रैंकिंग है, जो एशिया के देशों की शक्ति और प्रभाव का विभिन्न मानकों के आधार पर मूल्यांकन करती है।
  • एशिया पॉवर इंडेक्स के सातवें संस्करण में एशिया के 27 देशों और क्षेत्रों की शक्ति का मूल्यांकन किया गया है। इसमें 8 थीमेटिक क्षेत्रों के अंतर्गत 131 संकेतकों का उपयोग किया गया है, जिनमें सैन्य, आर्थिक, कूटनीतिक और सांस्कृतिक मानक, साथ ही लचीलापन तथा भविष्य के संसाधन शामिल हैं।
  • उद्देश्य एवं निहितार्थ: यह सूचकांक देशों की सापेक्ष प्रभाव क्षमता का आकलन करता है, यह समझने के लिए कि वे अपने क्षेत्र और उससे बाहर किस प्रकार शक्ति का प्रदर्शन कर परिणामों को प्रभावित करते हैं।

भारत के लिए महत्त्व

  • भारत की यह स्थिति एशिया में उसके बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है तथा अनुमान है कि वर्ष 2025 तक भारत प्रमुख शक्ति का दर्जा प्राप्त कर लेगा।
  • लाभ: वैश्विक प्रतिष्ठा में वृद्धि, कूटनीतिक एवं आर्थिक संबंधों में सुधार।
  • जोखिम: बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा, विशेषकर चीन के साथ।

संदर्भ

गिनी-बिसाउ में हुए एक सैन्य तख्तापलट में अपदस्थ राष्ट्रपति उमरो सिसोको एंबोलो, पश्चिम अफ्रीकी राज्यों के आर्थिक समुदाय (ECWAS) के हस्तक्षेप के बाद सेनेगल में शरण लेने पर मजबूर हुए।

सेनेगल के बारे में

  • सेनेगल पश्चिम अफ्रीका का एक प्रमुख तटीय राष्ट्र है, जिसकी राजधानी डकार है।
  • अवस्थिति एवं सीमाएँ: उत्तर में मॉरिटानिया, पूर्व में माली, दक्षिण में गिनी तथा गिनी-बिसाउ, पश्चिम में अटलांटिक महासागर से घिरा है।
    • गांबिया नदी के किनारे बसा गांबिया शहर इसका एक अंतःक्षेत्रीय भू-भाग बनाता है।

मुख्य भौगोलिक क्षेत्र

  • कैप-वर्ट प्रायद्वीप: अफ्रीका के महाद्वीपीय भू-भाग का सबसे पश्चिमी बिंदु है।
  • साहेल क्षेत्र: अर्द्ध-शुष्क पट्टी, जहाँ कम वर्षा और विरल वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।
    • इसी क्षेत्र में देश का सर्वोच्च बिंदु बाउनज रिज (648 मीटर) स्थित है।
  • सूडानीय क्षेत्र: साहेल के दक्षिण में अवस्थित, अधिक वर्षा, सवाना वुडलैंड्स तथा कृषि के लिए उपयुक्त।
  • कासामांस (Casamance) क्षेत्र: देश का दक्षिणी उष्णकटिबंधीय क्षेत्र, जहाँ वन, आर्द्रभूमि और कासामांस नदी पाई जाती है, जो कृषि एवं मत्स्यपालन का प्रमुख केंद्र है।
  • नदियाँ एवं जलीय तंत्र
    • सेनेगल नदी देश की उत्तरी सीमा बनाती है तथा सिंचाई और मत्स्यपालन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • गांबिया नदी देश के भीतरी भाग को दो भागों में विभाजित करती हुई गांबिया में प्रवेश करती है।
    • सालूम डेल्टा में मैंग्रोव वन एवं ज्वारीय जलमार्ग पाए जाते हैं।

पश्चिम अफ्रीकी राज्यों का आर्थिक समुदाय (ECOWAS) के बारे में

  • ECOWAS पश्चिम अफ्रीका में एक क्षेत्रीय राजनीतिक–आर्थिक संगठन है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय एकीकरण, सामूहिक आत्मनिर्भरता और स्थिरता को प्रोत्साहित करना है।
  • स्थापना: इसकी स्थापना वर्ष 1975 में लागोस संधि के माध्यम से हुई, प्रारंभिक ध्यान आर्थिक सहयोग पर था।
  • वर्ष 1993 की संशोधित संधि ने इसके कार्यक्षेत्र को शासन, शांति-रक्षा और सुरक्षा तक विस्तृत कर दिया।
  • मुख्यालय: अबुजा, नाइजीरिया।
  • उद्देश्य: एकीकृत, आर्थिक रूप से संगठित, स्थिर एवं शांतिपूर्ण पश्चिम अफ्रीकी क्षेत्र का निर्माण करना, जिससे जीवन स्तर में सुधार हो तथा सामूहिक विकास को बढ़ावा मिले।
  • वर्तमान सदस्य (वर्ष 2025 में 12 सदस्य): बेनिन, काबो वर्डे, गांबिया, घाना, गिनी, गिनी-बिसाउ, लाइबेरिया, नाइजीरिया, सिएरा लियोन, सेनेगल और टोगो।

संदर्भ

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट, 2025 के अनुसार दिल्ली का भूजल भारत में सर्वाधिक प्रदूषित है, जिसमें यूरेनियम, सीसा, नाइट्रेट तथा अन्य विषैले धातुओं का उच्च स्तर पाया गया है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • भूजल में विषैली धातुएँ: दिल्ली के भूजल में यूरेनियम, सीसा, नाइट्रेट, फ्लोराइड तथा लवणता-संबंधी सूचकों का स्तर देश में सर्वाधिक पाया गया है। जिसमे से कई प्रदूषक राष्ट्रीय पेयजल मानकों से अधिक हैं।
  • सीसा प्रदूषण: दिल्ली भारत में भूजल के सीसा-प्रदूषित नमूनों का सर्वाधिक अनुपात रखता है। मानसून पूर्व 9.3% नमूने भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की सीमा से अधिक पाए गए।
  • यूरेनियम स्तर: देशभर में लगभग 16% भूजल नमूने अनुमेय फ्लोराइड सीमा से अधिक पाए गए।
    • दिल्ली, यूरेनियम प्रदूषण में राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे स्थान पर है (पंजाब तथा हरियाणा के बाद), जहाँ 13–15% नमूने अनुमेय सीमा से अधिक हैं।
    • उत्तर-पश्चिम भारत—विशेषकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के कुछ भाग यूरेनियम प्रदूषण के हॉटस्पॉट के रूप में उभरे।
  • फ्लोराइड: देशभर में लगभग 18% नमूने अनुमेय फ्लोराइड सीमा से अधिक पाए गए।
    • फ्लोराइड संदूषण मुख्यतः भू-जनित है, अर्थात् यह प्राकृतिक रूप से होता है तथा राजस्थान में संदूषण का स्तर सबसे अधिक है।
  • नाइट्रेट: भारत में नाइट्रेट संदूषण सबसे व्यापक प्रदूषक है, लगभग 25% भूजल नमूनों में नाइट्रेट की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की 45 मि.ग्रा./ली. की सीमा से अधिक है।
    • नाइट्रेट संदूषण के प्राथमिक स्रोत मानवजनित गतिविधियाँ हैं, जैसे- उर्वरकों का उपयोग तथा भूजल में मल और पशु अपशिष्ट का प्रवेश।
  • लवणता: EC, जो कुल घुलित ठोस और लवणता को इंगित करता है, दिल्ली के भूजल में एक प्रमुख चिंता का विषय बना हुआ है, जिसमें वर्ष 2025 में 33.33% नमूने अनुमेय सीमा से अधिक हैं।
  • सोडियम अवशोषण अनुपात (SAR): SAR स्तर, जो सिंचाई की उपयुक्तता निर्धारित करता है, भारत में सबसे खराब है, जहाँ 34.8% नमूने 26 की अनुमेय सीमा से अधिक हैं।
    • दिल्ली 51.11% नमूनों के साथ देश में शीर्ष पर है, जो RSC (2.5 meq/L) सीमा से अधिक हैं, यह मृदा उर्वरता और फसल उपज को प्रभावित करने वाले गंभीर क्षारीयता जोखिम दर्शाता है।

प्रदूषक अनुमेय सीमा से ऊपर होने पर स्वास्थ्य पर प्रभाव
यूरेनियम कैंसर का बढ़ा जोखिम, किडनी विषाक्तता।
सीसा तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याएँ, बच्चों में विकास अवरोध।
लौह संवेदनाहारी प्रभाव, लौह जीवाणुओं की वृद्धि को बढ़ावा देता है।
नाइट्रेट उच्च नाइट्रेट स्तर शिशुओं में ब्लू बेबी सिंड्रोम का कारण बन सकता है।
फ्लोराइड हड्डियों का रोग (दर्द, हड्डियों में कोमलता, बच्चों में दाँतों का धब्बेदार होना।
क्लोरीन आँख या नाक में जलन, पेट में तकलीफ।
जिंक  जठराँत्र संबंधी समस्याएँ।
मैंगनीज तंत्रिका संबंधी समस्याएँ, विशेष रूप से शिशुओं और बच्चों में।
आर्सेनिक त्वचा क्षति, कैंसर का बढ़ा जोखिम।
ताँबा यकृत क्षति।
सोडियम (SAR) हृदय संबंधी समस्याएँ; मांसपेशियों में ऐंठन; खराब नींद।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के बारे में

  • स्थापना: CGWB का गठन वर्ष 1970 में अन्वेषणात्मक नलकूप संगठन का नाम बदलकर किया गया था और बाद में वर्ष 1972 में इसे भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के भूजल विंग के साथ विलय कर दिया गया था।
  • नोडल मंत्रालय: CGWB, केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कार्य करता है, जो भारत में जल संसाधन प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है।
  • उत्तरदायित्व: CGWB देश के भूजल संसाधनों के प्रबंधन, अन्वेषण, निगरानी और विनियमन के लिए उत्तरदायी है।
  • जल भू-वैज्ञानिक रिपोर्ट: CGWB विस्तृत राज्य और जिला जल भू-वैज्ञानिक रिपोर्ट, भूजल वार्षिकी और एटलस जारी करता है, जो भूजल उपलब्धता तथा रुझानों पर मूल्यवान आँकड़े प्रदान करते हैं।

संदर्भ

भारत को वर्ष 2026–27 के द्विवर्षीय कार्यकाल के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन परिषद में सर्वाधिक मतों के साथ पुनः निर्वाचित किया गया है।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के बारे में

  • अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट संस्था है, जिसका कार्य समुद्री सुरक्षा तथा संरक्षण सुनिश्चित करना एवं जलयानों से होने वाले समुद्री प्रदूषण को रोकना है।
  • यह अंतरराष्ट्रीय नौवहन की सुरक्षा, संरक्षण एवं पर्यावरणीय प्रदर्शन के लिए वैश्विक मानक निर्धारित करता है।
  • स्थापना: इसकी स्थापना वर्ष 1948 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के पश्चात् हुई और यह वर्ष 1958 में औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया।
  • मुख्यालय: इसका मुख्यालय लंदन में स्थित है तथा इसके 176 सदस्य राष्ट्र और 3 सहयोगी सदस्य हैं।
  • भारत और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन
    • सदस्यता: भारत, अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के प्रारंभिक सदस्य देशों में से एक है, जिसने इसका अभिसमय वर्ष 1959 में अनुसमर्थित किया।
    • परिषद में सहभागिता: भारत लगातार परिषद में सेवा देता रहा है, केवल वर्ष 1983–1984 के दो वर्षों को छोड़कर।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन की भूमिका

  • नियामक ढाँचा: इसका मुख्य उत्तरदायित्व वैश्विक नौवहन उद्योग के लिए एक न्यायसंगत, प्रभावी, सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य और लागू नियामक ढाँचा तैयार करना है।
  • कानूनी विषय: यह दायित्व एवं प्रतिकर से संबंधित कानूनी मामलों सहित अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात को सुगम बनाने में भी संलग्न रहता है।
  • विश्व समुद्री दिवस: अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन प्रत्येक वर्ष सितंबर के अंतिम गुरुवार को विश्व समुद्री दिवस मनाता है, ताकि नौवहन एवं समुद्री गतिविधियों के महत्त्व के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाई जा सके।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन की संरचना

  • महासभा: महासभा इसकी सर्वोच्च शासी इकाई है, जिसमें सभी सदस्य राष्ट्र शामिल होते हैं। यह प्रत्येक दो वर्ष में बैठक कर कार्यक्रम, बजट को अनुमोदित करती है तथा परिषद के लिए सदस्यों का चुनाव करती है।
  • परिषद: परिषद कार्यकारी निकाय है, जो महासभा के सत्रों के बीच संगठन की गतिविधियों की निगरानी करती है।
  • परिषद का गठन: परिषद में 40 सदस्य राष्ट्र होते हैं, जिनका चुनाव महासभा द्वारा प्रत्येक दो वर्ष में किया जाता है।
  • सदस्य राज्यों को समुद्री महत्त्व के आधार पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
    • श्रेणी (क): 10 राज्य जिनकी अंतरराष्ट्रीय नौवहन सेवाएँ प्रदान करने में सर्वाधिक रुचि है।
    • श्रेणी (ख): 10 राज्य जिनकी अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में सर्वाधिक रुचि है।
    • श्रेणी (ग): 20 राज्य जो (क) या (ख) में नहीं आते, परंतु जिनकी समुद्री परिवहन या नौवहन में विशेष रुचि है तथा जिनका चयन विश्व के सभी प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है।
  • मुख्य समितियाँ: अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन में पाँच प्रमुख समितियाँ हैं, जो नीतिगत विकास एवं विनियमन निर्माण के लिए उत्तरदायी हैं। इनमें विशेष रूप से समुद्री पर्यावरण संरक्षण समिति महत्त्वपूर्ण है।
  • समितियाँ एवं उप-समितियाँ: संगठन पाँच मुख्य समितियों तथा विभिन्न उप-समितियों के माध्यम से कार्य करता है, जो अंतरराष्ट्रीय संधियों, संहिताओं, संकल्पों और दिशा-निर्देशों का निर्माण एवं अंगीकरण करती हैं।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन की प्रमुख संधियाँ

  • SOLAS (सेफ्टी ऑफ लाइफ एट सी) संधि (वर्ष 1974): जलयान निर्माण, उपकरणों और परिचालन प्रक्रियाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक स्थापित करती है, ताकि जलयानों एवं यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
  • मार्पोल संधि (वर्ष 1973/78): तेल रिसाव, सीवेज एवं खतरनाक माल के अवशेष सहित जलयानों से होने वाले प्रदूषण को कम करने का उद्देश्य रखती है।
  • STCW  (स्टैण्डर्ड ऑफ ट्रेनिंग सर्टिफिकेशन एंड वाचकीपिंग फॉर सीफेयरर्स) संधि (वर्ष 1978): व्यापारिक नाविकों के प्रशिक्षण एवं प्रमाणन के न्यूनतम मानक निर्धारित करती है, ताकि जलयानों का सुरक्षित संचालन सुनिश्चित किया जा सके। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कमी हेतु अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन की रणनीति (वर्ष 2023)।
  • वर्ष 2050 तक नेट-जीरो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन प्राप्त करने का लक्ष्य रखती है।

संदर्भ

दिल्ली उच्च न्यायालय ने रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के विरुद्ध लोकपाल द्वारा प्रारंभ की गई कार्यवाही को निरस्त कर दिया, जो राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC) में पदोन्नति संबंधी कथित अनियमितताओं से जुड़ा मामला था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • राजेश कुमार सिंह का तर्क था कि लोकपाल की कार्रवाइयाँ, उसकी वैधानिक शक्तियों से परे थीं, क्योंकि लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के अनुसार, उसका अधिकार-क्षेत्र केवल भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 2013 के अंतर्गत अपराधों तक सीमित है।

राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (NPC) के बारे में

  • परिचय: NPC की स्थापना वर्ष 1958 में हुई थी और यह केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग के अधीन एक स्वायत्त निकाय के रूप में कार्य करती है।
  • संगठन का प्रकार: NPC एक बहुपक्षीय, गैर-लाभकारी संगठन है, जिसमें नियोक्ता और श्रमिक संगठनों, सरकार तथा तकनीकी एवं व्यावसायिक संस्थानों सहित विभिन्न हितधारकों का समान प्रतिनिधित्व है।
  • मुख्यालय: NPC का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
  • NPC एशियाई उत्पादकता संगठन (APO) की सदस्य है, जो टोक्यो स्थित एक अंतर-सरकारी संस्था है और जिसमें भारत संस्थापक सदस्य है।
  • शासन व्यवस्था: राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के नियमों और विनियमों को विनियमित करने की जिम्मेदारी शासी निकाय पर है।
    • शासी निकाय में कुल 12 सदस्य होते हैं—
      • भारत सरकार द्वारा नामित अध्यक्ष
      • महानिदेशक
      • भारत सरकार, नियोक्ताओं तथा वाणिज्य एवं उद्योग मंडलों तथा व्यापार संघों/श्रमिक संगठनों के 2-2 प्रतिनिधि,
      • तकनीकी संगठनों एवं संस्थानों/उभरते क्षेत्रों/उद्योग/कृषि/शिक्षा जगत आदि के 3 प्रतिनिधि, तथा स्थानीय उत्पादकता संगठनों का 1 प्रतिनिधि।
  • नेटवर्क: NPC  के पास देशभर में 13 क्षेत्रीय कार्यालयों और 5 विशिष्ट केंद्रों का नेटवर्क है, जो कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण, औद्योगिक अभियंत्रण, गुणवत्ता प्रबंधन तथा मानव संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित हैं।
  • उद्देश्य
    • उत्पादकता संस्कृति को बढ़ावा देना: NPC का उद्देश्य उत्पादकता के प्रति जागरूकता बढ़ाना है, विशेषतः उन अवधारणाओं और तकनीकों के माध्यम से, जो संगठनात्मक प्रथाओं तथा रणनीतियों द्वारा आर्थिक विकास की सूक्ष्म आर्थिक नींव को सुदृढ़ करती हैं।
    • सरकार का थिंक टैंक: NPC सरकार के लिए एक थिंक टैंक के रूप में कार्य करती है, जो औद्योगिक वृद्धि, तकनीकी उन्नति और संसाधनों के कुशल उपयोग से संबंधित नीति-निर्माण में परामर्श देती है।
    • वित्तीय स्थिरता: NPC का उद्देश्य अपने लिए वित्तीय संसाधन उत्पन्न करना है, ताकि दीर्घकाल तक स्व-निर्भर संचालन सुनिश्चित हो सके।
  • कार्य
    • उत्पादकता अनुसंधान: उत्पादकता से संबंधित विषयों पर अध्ययन करना और उद्योगों व सरकारी निकायों को क्रियात्मक सुझाव प्रदान करना।
    • प्रशिक्षण एवं विकास: उत्पादकता वृद्धि, गुणवत्ता प्रबंधन और विनिर्माण तकनीकों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएँ और संगोष्ठियाँ आयोजित करना।
    • बेंचमार्किंग: विभिन्न उद्योगों में उत्पादकता प्रदर्शन को मापने और तुलना करने हेतु बेंचमार्किंग सेवाएँ प्रदान करना।
    • परामर्श सेवाएँ: प्रबंधन सुधार, गुणवत्ता नियंत्रण और संसाधन-सुदृढ़ीकरण में संगठनों की सहायता करना।
    • राष्ट्रीय उत्पादकता पुरस्कार: उत्पादकता सुधार में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले संगठनों को सम्मानित करने हेतु राष्ट्रीय उत्पादकता पुरस्कार का संचालन करना।

संदर्भ

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बाँझपन (Infertility) की रोकथाम, निदान और उपचार हेतु अपने प्रथम वैश्विक दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनमें विश्वभर में सुरक्षित, न्यायसंगत और सुलभ प्रजनन-देखभाल की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

बाँझपन (Infertility) क्या है?

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बाँझपन वह स्थिति है, जब नियमित, असुरक्षित यौन संबंधों के बावजूद 12 माह या उससे अधिक समय तक गर्भधारण न हो।
  • प्रचलन: प्रजनन आयु के प्रत्येक छह में से एक व्यक्ति अपने जीवन के किसी न किसी चरण में बाँझपन का अनुभव करता है।
  • उच्च आर्थिक बोझ: इन-विट्रो निषेचन (आई.वी.एफ.) जैसे उपचार प्राय: स्वयं वहन करने पड़ते हैं, जिनकी लागत कई बार औसत वार्षिक घरेलू आय से दुगुनी होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन दिशा-निर्देशों की मुख्य विशेषताएँ

  • समग्र रूपरेखा: दिशा-निर्देशों में रोकथाम, निदान और उपचार के सभी चरणों को सुदृढ़ करने हेतु 40 अनुशंसाएँ सम्मिलित हैं।
  • स्वास्थ्य संवर्द्धन: स्वस्थ आहार, शारीरिक गतिविधि और तंबाकू-त्याग जैसे जीवनशैली उपायों को बाँझपन रोकथाम के रूप में प्रोत्साहित किया गया है।
  • प्रजनन शिक्षा: दिशा-निर्देश प्रजनन और बाँझपन संबंधी शिक्षा को प्रारंभिक स्तर से मजबूत करने पर बल देता है, ताकि व्यक्तियों को प्रजनन नियोजन में सहायता मिल सके।
  • पुरुष बाँझपन पर विशेष ध्यान: विश्व स्वास्थ्य संगठन पुरुष बाँझपन की अपर्याप्त जाँच को रेखांकित करता है और समग्र निदान पद्धतियों की आवश्यकता बताता है। प्रारंभिक प्रबंधन में सक्रिय उपचारों से पूर्व परामर्श देना सम्मिलित होना चाहिए।
  • चरणबद्ध उपचार पद्धति: दिशा-निर्देशों में चरणबद्ध नैदानिक प्रबंधन शामिल है—प्रजनन-काल की बुनियादी जानकारी और प्रोत्साहन से लेकर गर्भाशयी गर्भाधान (IUI) और इन-विट्रो निषेचन (IVF) जैसे जटिल उपचारों तक।
  • समग्र देखभाल: दिशा-निर्देश चिकित्सा-उपचार के साथ-साथ मनोसामाजिक सहयोग की भी अनुशंसा करते हैं, क्योंकि बाँझपन अवसाद, चिंता और सामाजिक अलगाव जैसी भावनात्मक चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है।
  • रोकथाम में निवेश बढ़ाना: महत्त्वपूर्ण अनुशंसा यह है, कि यौन संचारित संक्रमणों तथा धूम्रपान जैसे बाँझपन के प्रमुख कारणों को संबोधित करने हेतु रोकथाम पर अधिक निवेश किया जाए।
  • स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में एकीकरण: विश्व स्वास्थ्य संगठन राष्ट्रों से आग्रह करता है कि प्रजनन-देखभाल को राष्ट्रीय स्वास्थ्य रणनीतियों, सेवाओं और वित्तपोषण में शामिल किया जाए, जिससे व्यापक पहुँच सुनिश्चित हो।
  • संदर्भानुकूल क्रियान्वयन: देशों को प्रोत्साहित किया गया है कि वे इन दिशा-निर्देशों को स्थानीय संदर्भ तथा यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य के अधिकार-आधारित दृष्टिकोण के अनुरूप लागू करें।

भारत में प्रजनन प्रवृत्तियाँ

  • प्रजनन दर में गिरावट: भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 1950 के दशक में 6.18 से घटकर वर्ष 2021 में 1.9 हो गई है, जो 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से कम है।
  • भविष्य में संभावित गिरावट: ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीजेज (GBD) 2021 अध्ययन के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर वर्ष 2100 तक घटकर 1.04 हो सकती है।
  • कुल प्रजनन दर (TFR): कुल प्रजनन दर वह औसत संख्या है, जितने बच्चे एक महिला अपने प्रजनन काल (आमतौर पर 15–49 वर्ष) में वर्तमान प्रजनन प्रवृत्तियों के अंतर्गत जन्म दे सकती है, यह मृत्यु दर को शामिल नहीं करती। इसे प्रति महिला बच्चों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है।
  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS–5) (वर्ष 2019–21): NFHS–5 के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 बच्चे प्रति महिला हो गई है, जो NFHS–4 (वर्ष 2015–16) के 2.2 से कम है।
  • प्रतिस्थापन स्तर: प्रजनन स्तर में 2.1 बच्चे प्रति महिला वह प्रतिस्थापन स्तर है, जो स्थिर जनसंख्या के लिए आवश्यक माना जाता है (मृत्यु दर को ध्यान में रखते हुए)। यदि कुल प्रजनन दर 2.1 से नीचे चली जाती है, तो नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि संभव है।

संदर्भ

हाल ही में चीन ने अपनी जियांगमेन भूमिगत न्यूट्रिनो वेधशाला (Jiangmen Underground Neutrino Observatory- JUNO) का निर्माण पूरा कर लिया है और प्रारंभिक शोध निष्कर्ष जारी कर दिए हैं, जबकि भारत की न्यूट्रिनो वेधशाला (INO) वर्षों की देरी के बाद अभी भी कार्यशील नहीं हो पाई है।

न्यूट्रिनो क्या हैं?

  • मूल परिभाषा: न्यूट्रिनो उप-परमाणविक कण होते हैं, जिनमें कोई विद्युत आवेश नहीं होता और जिनका द्रव्यमान नगण्य (बहुत छोटा लेकिन शून्येतर द्रव्यमान) होता है।
  • घोस्ट पार्टिकल: ये कण अत्यंत तीव्र होते हैं, प्रतिवर्ष लगभग 100 ट्रिलियन न्यूट्रिनो हर सेकंड मानव शरीर से गुजरते हैं, बावजूद इसके किसी का ध्यान उन्हें आकर्षित नहीं करता।
  • लेप्टॉन समूह: न्यूट्रिनो, कण भौतिकी के मानक मॉडल के कणों के लेप्टॉन समूह का हिस्सा हैं, जो प्रबल नाभिकीय बल के माध्यम से परस्पर क्रिया नहीं करते हैं।
    • इसके बजाय, वे दुर्बल नाभिकीय बल के माध्यम से परस्पर क्रिया करते हैं, जिससे उनका पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
  • न्यूट्रिनो के प्रकार: न्यूट्रिनो तीन प्रकार (इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो, म्यूऑन न्यूट्रिनो और टाउ न्यूट्रिनो) में पाए जाते हैं।
  • दोलन: जैसे-जैसे न्यूट्रिनो अपनी यात्रा करते हैं, वे एक प्रकार से दूसरे प्रकार में परिवर्तित (ऑस्सिलेट) हो सकते हैं।

न्यूट्रिनो के गुण

  • अत्यंत छोटा द्रव्यमान: यद्यपि इसका सटीक द्रव्यमान अभी भी अनिश्चित है, यह इलेक्ट्रॉन जैसे अन्य उप-परमाणविक कणों की तुलना में बहुत छोटा माना जाता है।
  • विद्युत आवेश रहित: न्यूट्रिनो में कोई आवेश नहीं होता, जिससे वे पदार्थ के साथ बहुत कमजोर रूप से अन्योन्यक्रिया करते हैं।
  • गति: न्यूट्रिनो लगभग प्रकाश की गति से यात्रा करते हैं और मूलतः अपने स्रोत से सीधी रेखा में आगे बढ़ते हैं।
  • कमजोर अन्योन्यक्रिया: वे केवल कमजोर नाभिकीय बल और गुरुत्वाकर्षण बल के माध्यम से अन्योन्यक्रिया करते हैं, जिससे वे अत्यधिक भेदक होते हैं।
  • सूचना के संदेशवाहक: अपने अद्वितीय गुणों के कारण, न्यूट्रिनो उत्कृष्ट संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं, जो उन घटनाओं या वस्तुओं के बारे में जानकारी पहुँचाते हैं, जिनसे वे उत्पन्न होते हैं।

न्यूट्रिनो के स्रोत

  • ब्रह्मांडीय घटनाएँ: उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो सुपरनोवा जैसी घटनाओं के साथ-साथ सक्रिय आकाशगंगा नाभिक और ब्लैक होल जैसी वस्तुओं में भी उत्पन्न होते हैं।
  • अन्य स्रोत: न्यूट्रिनो सूर्य में परमाणु प्रतिक्रियाओं, पृथ्वी पर कण क्षय, बीटा क्षय, कण त्वरक और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के दौरान भी उत्सर्जित होते हैं।

न्यूट्रिनो के अध्ययन का महत्त्व

  • ब्रह्मांड के विकास को समझना:  न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के आरंभिक चरणों की जानकारी प्रदान कर सकते हैं और बिग बैंग के तुरंत पश्चात् की अवधि के रहस्यों का पता लगाने में मार्गदर्शन कर सकते हैं।
  • डार्क मैटर और डार्क एनर्जी: न्यूट्रिनो शोधकर्ताओं को डार्क मैटर (27%) और डार्क एनर्जी (68%) को समझने में मदद करते हैं, जो मिलकर ब्रह्मांड की कुल संरचना का 95% हिस्सा बनाते हैं।
  • अनुप्रयोग: न्यूट्रिनो का उपयोग एक्स-रे मशीनों और MRI स्कैन जैसी तकनीकों की तरह, चिकित्सा इमेजिंग में भी किया जा सकता है।

भारत स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला (INO)

  • प्रस्तावित स्थल 
    • भारत स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला (INO) के लिए प्रस्तावित स्थल तमिलनाडु के थेनी जिले में स्थित है, जहाँ यह वेधशाला एक पहाड़ के नीचे भूमिगत स्थित होगी।
    • यह स्थान बाहरी विक्षोभों से प्राकृतिक सुरक्षा के कारण न्यूट्रिनो के अध्ययन के लिए एक आदर्श वातावरण प्रदान करता है।
  • डिटेक्टर: INO में 50 किलोटन का आयरन कैलोरीमीटर (ICAL) डिटेक्टर होगा, जिसे उच्च परिशुद्धता के साथ वायुमंडलीय न्यूट्रिनो का पता लगाने और मापने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • उद्देश्य: INO का प्राथमिक लक्ष्य वायुमंडलीय न्यूट्रिनो का अध्ययन करना और न्यूट्रिनो द्रव्यमान पदानुक्रम का निर्धारण करना है।
  • लाभ
    • प्रस्तावित स्थल पर स्थित पर्वतीय चट्टान, ब्रह्मांडीय किरणों से एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का कार्य करेगी, जो न्यूट्रिनो का सटीक पता लगाने में सहायक है।
    • यह सुरक्षा ब्रह्मांडीय विकिरण से होने वाले हस्तक्षेप को कम करती है, जिससे स्पष्ट डेटा संग्रह संभव हो पाता है।
  • वित्त पोषण: परमाणु ऊर्जा विभाग और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित।

वैश्विक न्यूट्रिनो वेधशालाएँ अवस्थिति
MINOS एक्सपेरीमेंट, सौडन खदान सौडन भूमिगत खदान, मिनेसोटा, संयुक्त राज्य अमेरिका।
आइसक्यूब (IceCube) न्यूट्रिनो वेधशाला अंटार्कटिका में अमुंडसेन-स्कॉट दक्षिण ध्रुव स्टेशन।
जियांगमेन भूमिगत न्यूट्रिनो वेधशाला (JUNO) काइपिंग, गुआंग्डोंग प्रांत, चीन।
सुपर कामिओकांडे कामिओका, जापान
कैट्रिन (KATRIN) प्रयोग कार्लजूए, जर्मनी।
सुडबरी न्यूट्रिनो वेधशाला सुडबरी क्षेत्र, ओंटारियो, कनाडा।
ग्रैन सासो (Gran Sasso) राष्ट्रीय प्रयोगशालाएँ ग्रान सासो पर्वत, इटली।
दया बे रिएक्टर न्यूट्रिनो एक्सपेरीमेंट हांगकांग।

संदर्भ

राज्यों की आपदा आवश्यकताओं और केंद्र द्वारा किए जाने वाले व्यय के बीच बढ़ता असंतुलन, जैसा कि हाल ही में केरल के वायनाड मामले में स्पष्ट हुआ है, यह दर्शाता है कि भारत का आपदा-जोखिम वित्त, सहकारी संघवाद से हटकर, अधिक केंद्रीकृत, सशर्त मॉडल की ओर बढ़ रहा है।

केरल का वायनाड प्रकरण- संस्थागत तनाव के संकेत

  • नुकसान एवं राहत का अंतर: वायनाड भूस्खलन में लगभग 300 लोगों की जान गई और ₹1,200 करोड़ का नुकसान हुआ, फिर भी केंद्र सरकार ने केवल ₹260 करोड़, यानी केरल के मुआवजे के अनुरोध का लगभग 11%, स्वीकृत किया।
  • पुराने और अपर्याप्त राहत मानदंड: प्रति मृत्यु ₹4 लाख और पूरी तरह क्षतिग्रस्त घर के लिए ₹1.2 लाख की मुआवजे की सीमा एक दशक से अपरिवर्तित बनी हुई है, जिसमें जीवन निर्वाह की आवश्यकताएँ तो शामिल हैं, लेकिन पुनर्निर्माण या आजीविका बहाली शामिल नहीं है।
  • आपदा वर्गीकरण में विवेकाधिकार: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 में गंभीर’ आपदा की स्पष्ट परिभाषा के अभाव के कारण वर्गीकरण में देरी हुई, जिससे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम को त्वरित और बड़ी सहायता मिलने के विपरीत, केरल की राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) तक पहुँच सीमित हो गई।
  • सहायता में कटौती के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया निधि की शेष राशि का उपयोग: केरल के ₹780 करोड़ के अप्रयुक्त राज्य आपदा प्रतिक्रिया निधि (SDRF) शेष और ₹529 करोड़ के ब्याज-मुक्त ऋण को सहायता में कमी के लिए उद्धृत किया गया, जबकि ये शेष राशि राहत के लिए प्रतिबद्ध थी और SDRF नियमों द्वारा सीमित थी।
  •  केंद्र–राज्य असंतुलन का यह आवर्ती पैटर्न: जैसा कि चक्रवात गाजा (तमिलनाडु, वर्ष 2018) और कर्नाटक बाढ़ (वर्ष 2019) के दौरान देखी गई समान कमियों से स्पष्ट होता है—आपदा-जोखिम वित्तपोषण में सहकारी संघवाद से हटकर नौकरशाही-प्रधान वार्ताओं की ओर एक संरचनागत झुकाव को रेखांकित करता है।

भारत के आपदा वित्तीय ढाँचे के बारे में

भारत का आपदा-प्रतिक्रिया वित्तपोषण, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 द्वारा शासित, दो-स्तरीय है:

  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF): पूरी तरह से केंद्र द्वारा वित्तपोषित और गंभीर आपदाओं के लिए अभिप्रेत है।
  • राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF): 75:25 के अनुपात में संयुक्त रूप से वित्तपोषित (और हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90:10)।
  • तत्काल राहत के लिए उपयोग: भोजन, आश्रय, चिकित्सा देखभाल, मुआवजा।
  • केंद्रीय नियंत्रण की ओर बदलाव: कानूनी रूप से संतुलित संरचना व्यवहार में विलंब, विवेकाधीन निर्णय लेने और सीमित राज्य स्वायत्तता के साथ कार्य करती है।

15वें वित्त आयोग द्वारा आवंटन (2021-26)

  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) के लिए ₹2.28 लाख करोड़ (30 बिलियन अमेरिकी डॉलर) आवंटित किए गए, जिसमें सार्वजनिक वित्त को रोकथाम, न्यूनीकरण, तैयारी, क्षमता निर्माण और पुनर्निर्माण से जोड़ा गया।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए वित्तीय ढाँचा
    • बजट आवंटन: तैयारी और क्षमता निर्माण (10%), न्यूनीकरण (20%), प्रतिक्रिया (40%), पुनर्निर्माण (30%)।

भारत में केंद्रीकृत आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली के लाभ

  • आपदाओं के पैमाने और जटिलता का प्रबंधन
    • समस्या की प्रकृति: भारत में आपदाएँ अक्सर बहु-राज्यीय और बहु-संकटपूर्ण घटनाएँ होती हैं, जो स्थानीय प्रशासनिक क्षमताओं पर भारी पड़ती हैं।
    • केंद्रीय समन्वय की आवश्यकता: आपदाएँ अक्सर अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को पार कर जाती हैं, जिससे समन्वित राहत कार्यों के लिए एक एकीकृत कमान आवश्यक हो जाती है।
      • उदाहरण: वर्ष 1999 के ओडिशा सुपर साइक्लोन और वर्ष 2013 की उत्तराखंड बाढ़ के लिए राज्य सरकारों, केंद्रीय बलों और सेना को शामिल करते हुए बहु-एजेंसी समन्वय की आवश्यकता थी। केवल NDMA या राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (NEC) जैसा एक केंद्रीकृत निकाय ही इन प्रयासों को प्रभावी ढंग से संचालित कर सकता है।
    • हिंद महासागर सुनामी (2004): ये अभियान तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह तक फैले हुए थे, जिससे केंद्रीय नेतृत्व की आवश्यकता का पता चलता है।
  • संसाधन विषमता और क्षमता अंतराल को पाटना
    • चिंता: बड़ी आपदाओं के प्रबंधन के लिए राज्यों की वित्तीय, संस्थागत और तकनीकी क्षमता में काफी अंतर होता है।
    • केंद्र की भूमिका: बिहार (बाढ़-प्रवण) या ओडिशा (चक्रवात-प्रवण) जैसे आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों में अक्सर विशेष उपकरण, प्रशिक्षित कार्मिक और रसद संबंधी लचीलेपन का अभाव होता है, जो केंद्र सरकार प्रदान करती है।
    • उदाहरण: NDRF के पास ढही हुई संरचनाओं की खोज और बचाव तथा रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (CBRN) प्रतिक्रिया में प्रशिक्षित 16 विशेष बटालियन हैं।
  • प्रतिक्रिया की गति और मानकीकरण सुनिश्चित करना
    • महत्त्वपूर्ण मुद्दा: आपदाओं में, गोल्डन ऑवर’ के दौरान हताहतों की संख्या को कम करने के लिए प्रतिक्रिया समय और एकरूपता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • केंद्रीकृत लाभ: NDRF को संवेदनशील क्षेत्रों में रणनीतिक रूप से पूर्व-स्थित किया गया है ताकि अंतर-राज्यीय समन्वय में होने वाली देरी को दरकिनार करते हुए, कुछ ही घंटों में त्वरित तैनाती की जा सके।
      • केंद्रीकृत प्रशिक्षण और मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOP) राज्यों में एक सुसंगत, पेशेवर प्रतिक्रिया की गारंटी देती हैं।
    • उदाहरण: कोसी नदी के टूटने के कारण बिहार बाढ़ (वर्ष 2008), जहाँ NDRF ने बड़े पैमाने पर निकासी का कुशलतापूर्वक प्रबंधन किया।
  • बेहतर प्रौद्योगिकी और पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ
    • तकनीकी चुनौती: उन्नत उपकरण और विशेषज्ञता केंद्र स्तर पर केंद्रित हैं।
    • केंद्रीय भूमिका: भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC), और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) जैसी एजेंसियाँ राष्ट्रीय पूर्वानुमान, भेद्यता मानचित्र और सुनामी चेतावनी प्रणाली सहित वास्तविक समय की चेतावनियाँ प्रदान करती हैं।
    • रणनीतिक लाभ: केवल केंद्र सरकार ही इस जानकारी को देश भर में संश्लेषित और प्रसारित कर सकती है, जिससे भारत प्रतिक्रियावादी से सक्रिय आपदा प्रबंधन प्रतिमान की ओर अग्रसर होगा।
  • वित्तीय सहायता और राष्ट्रीय एकजुटता
    • वित्तीय चुनौती: बड़े पैमाने की आपदाएँ अत्यधिक वित्तीय बोझ डालती हैं, जिन्हें अलग-अलग राज्य अकेले वहन नहीं कर सकते हैं।
    • केंद्रीय सहायता: राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) प्रारंभिक राहत प्रदान करते हैं, जबकि केंद्र सरकार राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) को पूरी तरह से वित्तपोषित करती है और गंभीर आपदाओं के लिए पूरक सहायता प्रदान करती है।
    • वित्तपोषण तंत्र: वस्तु एवं सेवा कर (GST) क्षतिपूर्ति उपकर से प्राप्त योगदान यह सुनिश्चित करता है कि राष्ट्रीय स्तर के वित्तीय संसाधन आपदा राहत के लिए जुटाए जाएँ।
    • रणनीतिक लाभ: केंद्रीकृत वित्तपोषण वित्तीय स्थिरता बनाए रखता है, राज्यों को दिवालिया होने से बचाता है और संकट के दौरान राष्ट्रीय एकजुटता को मजबूत करता है।

वर्तमान मॉडल से संबंधित चिंताएँ (आपदा प्रतिक्रिया का केंद्रीकरण और संघीय क्षरण)

  • आपदा वित्तपोषण में संरचनात्मक कमियाँ
    • पुराने राहत मानदंड: मुआवजे की राशि, जैसे कि प्रति व्यक्ति ₹4 लाख और पूरी तरह क्षतिग्रस्त घर के लिए ₹1.2 लाख, एक दशक से अपरिवर्तित बनी हुई है और वास्तविक पुनर्निर्माण लागत को नहीं दर्शाती है।
      • उदाहरण: केरल के वर्ष 2024 के वायनाड भूस्खलन में पुनर्निर्माण प्रयासों के लिए मुआवजे के मानदंडों की अपर्याप्तता देखी गई।
    • गंभीर आपदा’ की परिभाषा में अस्पष्टता: स्पष्ट वैधानिक परिभाषा के अभाव में एनडीआरएफ की पात्रता पर केंद्र सरकार का व्यापक विवेकाधिकार है, जिसके परिणामस्वरूप आपदाओं का वर्गीकरण असंगत होता है और सहायता आवंटन में देरी होती है।
      • उदाहरण: उत्तराखंड की वर्ष 2021 की बाढ़ को शुरू में गंभीर’ आपदा के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया था, जिससे स्पष्ट मानदंडों के अभाव में NDRF से उच्च वित्तीय सहायता प्राप्त करने में देरी हुई।
    • गैर-स्वचालित सहायता जारी करना: अनुमोदन राज्य ज्ञापनों, केंद्रीय आकलनों और उच्च-स्तरीय मंजूरियों पर निर्भर करते हैं, जिससे तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता होने पर धनराशि जारी करने में देरी होती है।
      • उदाहरण: वर्ष 2020 में आए चक्रवात अम्फान के बाद, पश्चिम बंगाल और ओडिशा को समय लेने वाली अनुमोदन प्रक्रिया के कारण NDRF निधि प्राप्त करने में देरी का सामना करना पड़ा, जिससे तत्काल राहत प्रयासों में बाधा उत्पन्न हुई।
    • वित्त आयोग के कमजोर मानदंड: जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र और गरीबी के स्तर पर आधारित आवंटन, वास्तविक जोखिम को दर्शाने में विफल रहते हैं तथा वैज्ञानिक रूप से निर्मित आपदा भेद्यता सूचकांक का अभाव है।
      • उदाहरण:  असम के बाढ़-प्रवण क्षेत्रों को पर्याप्त वित्तीय सहायता न मिल पाना इस तथ्य को उजागर करता है कि वित्त आयोग के आवंटन मानदंड राज्य की बाढ़ तथा नदी-तट कटाव जैसी विशिष्ट संवेदनशीलताओं को समुचित रूप से प्रतिबिंबित नहीं करते।
  • कानूनी और राजनीतिक अतिक्रमण
    • केंद्रीय निर्देश शक्ति: आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 62 केंद्र को राज्यों को बाध्यकारी निर्देश जारी करने की अनुमति देती है, जिसका प्रदर्शन कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान विवादास्पद रूप से हुआ, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे राज्य सूची के विषयों पर केंद्रीय नियंत्रण संभव हो गया।
    • पदानुक्रमिक असंतुलन: NDMA (प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में) संरचनात्मक रूप से राज्य SDMA (मुख्यमंत्रियों की अध्यक्षता में) को कमजोर करता है, जिससे एक आवश्यक लेकिन अक्सर राजनीतिक रूप से शोषित शीर्ष-स्तरीय प्रतिक्रिया तंत्र को बढ़ावा मिलता है।
    • प्रार्थनाकर्ता के रूप में राज्य: इस प्रक्रिया में राज्यों को ज्ञापन प्रस्तुत करने और NDRF निधि के लिए केंद्र की मंजूरी का इंतजार करने की आवश्यकता होती है, जिससे सहायता, पूर्वानुमानित सहायता के बजाय बातचीत के माध्यम से, विवेकाधीन हस्तांतरण में बदल जाती है।
    • सशर्त राहत: केंद्र अक्सर सहायता में कटौती को उचित ठहराने के लिए अप्रयुक्त SDRF शेष या पूर्व ऋणों (जैसे- वायनाड मामला) का हवाला देता है, राहत को अनुदान-आधारित एकजुटता के बजाय सशर्त मानता है और राष्ट्रीय एकजुटता की अवधारणा को कमजोर करता है।
    • चयनात्मक सहायता: NDRF बटालियनों और वित्तीय पैकेजों की विवेकाधीन अनुमोदन से राजनीतिक शोषण की संभावना बढ़ जाती है, जिससे सत्तारूढ़ दल से जुड़े राज्यों को लाभ पहुँचता है और मानवीय सहायता की निष्पक्षता कम होती है।
    • श्रेय का स्थानांतरण: प्रधानमंत्री राहत कोष से संबंधित घोषणाएँ अक्सर राज्य सरकारों के व्यापक प्रतिक्रिया प्रयासों और व्यय पर भारी पड़ जाती हैं, जिससे राजनीतिक आख्यान और श्रेय पूरी तरह से केंद्र सरकार के पक्ष में चला जाता है।
  • परिचालन अंतराल और स्थानीय लचीलेपन का क्षरण
    • अंतिम-स्तर तक संपर्क: आपदाएँ संचार और परिवहन नेटवर्क को गंभीर रूप से बाधित करती हैं। लचीली प्रणालियों (सैटेलाइट फोन, हैम रेडियो) को अपनाने में देरी और मानकीकृत स्थानीय प्रोटोकॉल का अभाव, तत्काल राहत में बाधा डालता है।
    • प्रौद्योगिकी एकीकरण की कमी: हालाँकि केंद्रीय एजेंसियों (IMD, इसरो) के पास उन्नत पूर्व-चेतावनी डेटा मौजूद है, लेकिन जिला/ब्लॉक स्तर पर इस डेटा का धीमा एकीकरण स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की इसकी प्रभावशीलता को कम करता है।
    • स्थानीय विशेषज्ञता की अनदेखी: केंद्रीकृत नियोजन प्रायः स्थानीय कमजोरियों, स्थलाकृति तथा पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के पारंपरिक बचाव तंत्रों के सूक्ष्म ज्ञान को पर्याप्त महत्व नहीं देता, जिसके परिणामस्वरूप नीतिगत हस्तक्षेप अपेक्षाकृत कम प्रभावी सिद्ध होते हैं।
    • राज्य क्षमता का क्षरण: बड़ी आपदा लागतों को वहन करने के लिए केंद्र पर निर्भरता, राज्य को अपनी SDRF क्षमता और दीर्घकालिक शमन अवसंरचना को बढ़ाने में निवेश करने से हतोत्साहित करती है, जिससे वित्तीय तथा परिचालन निर्भरता बनी रहती है।

आगे की राह

  • वित्तीय और निधि प्रवाह संरचना में सुधार
    • राहत मानदंडों का अद्यतन और अनुक्रमण: SDRF और NDRF के अंतर्गत मुआवजे की अधिकतम सीमा को संशोधित करना, ताकि वर्तमान निर्माण, पुनर्वास और आजीविका बहाली लागतों को प्रतिबिंबित किया जा सके।
      • इन अधिकतम सीमाओं को मुद्रास्फीति और आपदा-विशिष्ट आवश्यकताओं से जोड़ें, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे पुनर्प्राप्ति और पुनर्निर्माण की वास्तविक लागतों से मेल खाती हैं, जिससे राज्यों पर राजकोषीय दबाव कम होगा।
    • सहायता आवंटन में डेटा-आधारित ट्रिगर्स का समावेश: जैसे आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 मेंगंभीर आपदा’ की पारदर्शी एवं सुस्पष्ट परिभाषा तथा वर्षा-तीव्रता सीमा, प्रति मिलियन मृत्यु-दर और GDP-हानि अनुपात जैसे वस्तुनिष्ठ संकेतकों को अपनाना—निर्णय प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय और प्रमाण-आधारित बना सकता है।
      • यह वर्तमान IMCT मूल्यांकन प्रक्रिया की जगह, बिना किसी विलम्ब या राजनीतिक विवेकाधिकार के NDRF निधियों के स्वचालित, समय पर जारी होने को सुनिश्चित करता है।
    • निधि प्रवाह तंत्र में सुधार: SDRF किश्तों के बहु-स्तरीय अनुमोदन से समयबद्ध, नियम-आधारित वितरण (जैसे- उन्हें त्रैमासिक रूप से जारी करना) की ओर परिवर्तन।
      • राज्यों को न केवल तत्काल राहत बल्कि पुनर्निर्माण और आजीविका बहाली पर खर्च करने के लिए अधिक लचीलापन प्रदान करना, जिससे तीव्र तथा अधिक प्रभावी पुनर्प्राप्ति प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके।
    • जलवायु-प्रतिरोधी आपदा वित्तपोषण को संस्थागत बनाना: पूर्वानुमानित कार्रवाई के लिए एक राष्ट्रीय जलवायु जोखिम वित्तपोषण तंत्र स्थापित करना।
      • यह राज्यों को भविष्य में जलवायु-जनित आपदाओं के लिए तैयार रहने हेतु जोखिम न्यूनीकरण, पूर्व चेतावनी प्रणालियों और जलवायु-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु सहायता अनुदानों के माध्यम से प्रोत्साहन निधि प्रदान करता है।
  • संघीय शासन और जवाबदेही को मजबूत करना
    • संतुलित राजकोषीय प्राधिकरण के माध्यम से सहकारी संघवाद की बहाली: यह सुनिश्चित करना कि आपदा सहायता अनुदान-आधारित रहे, ऋण-आधारित न हो, और राज्यों को SDRF और NDRF के उपयोग पर परिचालन नियंत्रण प्रदान करें।
      • संघ को पूर्व अनुमोदन के बजाय लेखापरीक्षा-पश्चात् सत्यापन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिससे प्रणाली नौकरशाही वार्ता से विश्वास-आधारित संघीय साझेदारी में परिवर्तित हो सके।
    • वित्त आयोग के मानदंडों को सुदृढ़ बनाना: खतरे के जोखिम, जलवायु जोखिम और भू-वैज्ञानिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए एक व्यापक आपदा-जोखिम और भेद्यता सूचकांक विकसित करके सरलीकृत प्रॉक्सी (जनसंख्या और क्षेत्र) से आगे बढ़ना।
    • आपदा प्रबंधन अधिनियम में संशोधन और घोषणाओं का राजनीतीकरण: केंद्र की निर्देशात्मक शक्ति को समयबद्ध और केवल औपचारिक रूप से घोषित राष्ट्रीय आपदाओं के दौरान ही लागू करना।
      • यह केंद्र के अतिक्रमण को सीमित करता है और सहायता शुरू करने के लिए तटस्थ, तकनीकी आधार सुनिश्चित करता है।
    • संघीय परामर्शदात्री निकायों का संस्थागतकरण: एक संघीय आपदा परिषद (GST परिषद के समान) की स्थापना करना, जिसमें प्रधानमंत्री, चुनिंदा मुख्यमंत्रियों और विशेषज्ञों को शामिल किया जाए।
      • यह मंच सुनिश्चित करता है कि नीति, वित्तपोषण और आवंटन मानदंड सहयोगात्मक रूप से निर्धारित किए जाएँ, जिससे राज्यों की भागीदारी अधिकतम हो।

आपदा वित्तपोषण में परिवर्तन – 16वें वित्त आयोग के लिए प्रमुख सुधार 

  • राहत मानदंडों का आधुनिकीकरण: मौजूदा मुआवजे के मानदंड पुराने हो चुके हैं और केवल निर्वाह व्यय को ही कवर करते हैं, पुनर्निर्माण लागत को नहीं। राज्य वित्त आयोग (SFC) को पुनर्निर्माण और आजीविका बहाली के लिए बाजार दरों को दर्शाने के लिए मुआवजे की अधिकतम सीमा में उल्लेखनीय वृद्धि की सिफारिश करनी चाहिए और इन लागतों को शामिल करने के लिए राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) का विस्तार करना चाहिए, जिससे राज्यों का वित्तीय बोझ कम हो।
  • खतरा-आधारित आवंटन मानदंड अपनाना: जनसंख्या और गरीबी पर आधारित वर्तमान आवंटन वास्तविक आपदा जोखिम को नहीं दर्शाते हैं। राज्य वित्त आयोग (SFC) को बहु-खतरा जोखिम, भौतिक भेद्यता और आर्थिक जोखिम को ध्यान में रखते हुए एक आपदा भेद्यता सूचकांक (DVI) लागू करना चाहिए, ताकि न्यायसंगत और प्रभावी वित्तपोषण सुनिश्चित हो सके।
  • सहायता के लिए उद्देश्यपूर्ण ट्रिगर: अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय दल (IMCT) के आकलन पर निर्भर रहने से सहायता में देरी होती है। राज्य वित्त आयोग (SFC) को NDRF की स्वचालित रिलीज के लिए डेटा-आधारित ट्रिगर स्थापित करने चाहिए, जैसे- क्षति सीमा या मृत्यु दर, ताकि त्वरित और पारदर्शी आपदा प्रतिक्रिया सुनिश्चित हो सके।
  • अनुदान-आधारित सहायता: वर्तमान में, आपदा सहायता अक्सर ऋण-आधारित होती है, जिससे वित्तीय दबाव बढ़ता है। राज्य वित्त आयोग (SFC) को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी आपदा राहत और पुनर्निर्माण निधि अनुदान के रूप में प्रदान की जाएँ, जिससे राष्ट्रीय एकजुटता बनी रहे और संकट के दौरान राज्य ऋण से बचा जा सके।
  • राज्य नियंत्रण को मजबूत करना: संघ की अनुमोदन प्रक्रिया में देरी होती है। राज्य वित्त आयोग (SFC) को लेखापरीक्षा-पश्चात् सत्यापन की प्रक्रिया अपनानी चाहिए, जिससे राज्यों को SDRF और SDMF संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण मिल सके, जिससे जवाबदेही बनाए रखते हुए आपदा प्रबंधन तेज और अधिक कुशल हो।

  • वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं और स्थानीय सशक्तीकरण को अपनाना
    • त्वरित भुगतान के लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का उपयोग: गति और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए वैश्विक प्रणालियों से तंत्रों को एकीकृत करना।
      • फिलीपींस (मानवीय क्षति और वर्षा-आधारित ट्रिगर), मैक्सिको (स्वचालित पवन/वर्षा सीमा) और अफ्रीकी-कैरेबियन जोखिम पूल (उपग्रह-आधारित पैरामीट्रिक बीमा), संघीय आपातकालीन प्रबंधन एजेंसी (Federal Emergency Management Agency- FEMA), अमेरिका (प्रति व्यक्ति क्षति सीमा), और ऑस्ट्रेलिया (राजस्व के सापेक्ष संघीय सहायता को राज्य राहत व्यय से जोड़ना) जैसे मॉडलों से सीखकर, भारत ऐसी प्रणालियाँ अपना सकता है, जो त्वरित, नियम-आधारित भुगतान प्रदान करती हैं।
    • क्षमता निर्माण और कानूनी मान्यता: SDRF क्षमता निर्माण को पर्याप्त रूप से बढ़ावा देना (उदाहरण के लिए, NDRF जैसा 50% प्रशिक्षण) और स्थानीय आपदाओं’ को कानूनी मान्यता प्रदान करना।
      • इससे यह सुनिश्चित होता है कि छोटे पैमाने की घटनाओं का प्रबंधन पूरी तरह से सशक्त जिलों/PRIs द्वारा किया जाए, जबकि मजबूत SDRF केंद्र पर तत्काल निर्भरता को कम करते हुए जमीनी स्तर पर जवाबदेही को मजबूत करते हैं।

निष्कर्ष

आपदा एकजुटता को संघीय स्वायत्तता को कम नहीं करना चाहिए। पारदर्शी, नियम-आधारित निधि हस्तांतरण के माध्यम से केंद्रीय विवेकाधिकार को कम करके और राज्य एवं जिला अधिकारियों को सशक्त बनाकर, अनुमोदन-आधारित राहत की जगह एक पूर्वानुमानित, विश्वास-आधारित प्रणाली स्थापित की जा सकती है, जिससे सहकारी संघवाद को कायम रखते हुए तीव्र प्रतिक्रिया सुनिश्चित होगी।

PWOnlyIAS विशेष

आपदा प्रबंधन (DM) के बारे में 

  • संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (United Nations Office for Disaster Risk Reduction- UNDRR): आपदा प्रबंधन (DM) आपात स्थितियों के सभी मानवीय पहलुओं, विशेष रूप से तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति के लिए संसाधनों तथा जिम्मेदारियों का संगठन तथा प्रबंधन है, ताकि आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सके।
    • UNDRR के मुख्य क्षेत्र (आपदा जोखिम न्यूनीकरण-DRR के साथ संरेखित):
      • आपदा जोखिम को समझना।
      • आपदा जोखिम प्रबंधन को मजबूत करना।
      • लचीलेपन के लिए आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) में निवेश करना।
  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत भारतीय परिभाषा: निम्नलिखित के लिए उपायों की योजना, आयोजन, समन्वय और कार्यान्वयन की एक सतत् और एकीकृत प्रक्रिया:
    • किसी भी आपदा के खतरे या आशंका की रोकथाम
    • आपदा जोखिम और परिणामों का शमन या कमी
    • क्षमता निर्माण
    • आपदाओं से निपटने की तैयारी
    • आपदा की आशंका वाली स्थितियों पर त्वरित प्रतिक्रिया
    • गंभीरता या परिमाण का आकलन
    • निकासी, बचाव और राहत
    • पुनर्वास और पुनर्निर्माण।

आपदा प्रबंधन के लिए संवैधानिक आधार

  • कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रविष्टि नहीं; व्युत्पन्न विधायी आधार: भारत में आपदा प्रबंधन (DM) के लिए संवैधानिक ढाँचे को सातवीं अनुसूची में किसी एकल प्रविष्टि में सीधे रेखांकित नहीं किया गया है, जो केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन करती है।
  • संसद ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को निम्नलिखित का उपयोग करके अधिनियमित किया:
    • समवर्ती सूची प्रविष्टि 23 (सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा)।
    • अनुच्छेद-248 और संघ सूची प्रविष्टि 97 के अंतर्गत अवशिष्ट शक्तियाँ।
    • राज्य सूची के विषयों—सार्वजनिक स्वास्थ्य (प्रविष्टि 6), कृषि (प्रविष्टि 14), जल (प्रविष्टि 17), और भूमि (प्रविष्टि 18)—के साथ अतिव्यापन के कारण राज्यों की भूमिकाएँ महत्त्वपूर्ण बनी हुई हैं।
  • मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत
    • अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार): सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है कि राज्य को नागरिकों के जीवन और सुरक्षा की रक्षा करनी चाहिए और इस दायित्व को आपदा तैयारी तथा राहत तक भी विस्तारित करना चाहिए।
      • स्वराज अभियान बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जीवन के अधिकार में राहत का अधिकार भी शामिल है।
    • अनुच्छेद-14 (विधि के समक्ष समता): यह सुनिश्चित करता है कि आपदा राहत और पुनर्वास प्रयास भेदभाव रहित हों और सभी प्रभावित नागरिकों को समान पहुँच की गारंटी प्रदान करें।
  • संघीय संरचना और सहकारी प्रतिक्रिया
    • अनुच्छेद-1 (राज्यों का संघ): आपदा राहत, राज्यों के संघ के सिद्धांत से उत्पन्न एक संवैधानिक गारंटी है।
    • राज्यों की प्राथमिक जिम्मेदारी: आपदा प्रबंधन मुख्यतः एक स्थानीय मामला है और राज्य सरकारें बचाव, राहत और पुनर्वास के लिए जिम्मेदार हैं।
    • केंद्र की पूरक भूमिका: जब कोई आपदा राज्य की क्षमता से अधिक हो जाती है, तो केंद्र सरकार राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से अतिरिक्त रसद और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

संवैधानिक ढाँचे में अस्पष्टताएँ और अतिव्यापन

संवैधानिक स्थिति की प्रायः स्पष्टता के अभाव के कारण आलोचना की जाती है, जिसके कारण कुछ चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं:-

  • समवर्ती सूची की माँग: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने आपदा प्रबंधन को समवर्ती सूची (सूची III) में स्पष्ट रूप से जोड़ने का सुझाव दिया था।
    • इससे केंद्र और राज्य दोनों को स्पष्ट विधायी अधिकार प्राप्त होंगे, जिससे अधिक समन्वित प्रतिक्रिया को बढ़ावा मिलेगा।
  • अधिकारों के अतिक्रमण के आरोप: कोविड-19 महामारी के दौरान केंद्र द्वारा आपदा प्रबंधन अधिनियम का प्रयोग चिंता का विषय बना।
    • सार्वजनिक स्वास्थ्य’ एक राज्य सूची का विषय है (प्रविष्टि 6), लेकिन केंद्र ने आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत अस्थायी रूप से नियंत्रण में ले लिया, जिससे व्यापक आपदाओं में प्राधिकरण को केंद्रीकृत करने की उसकी शक्ति का प्रदर्शन हुआ।

विधिक ढाँचा- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005

  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 एक संरचित और समन्वित प्रणाली को संस्थागत रूप देता है। यह विभिन्न स्तरों पर स्पष्ट भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ प्रदान करता है:

चरण प्राधिकरण की स्थापना अध्यक्ष उत्तरदायित्त्व
राष्ट्रीय राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) प्रधानमंत्री नीति-निर्माण, दिशा-निर्देश निर्माण और राष्ट्रीय योजना का अनुमोदन
राष्ट्रीय राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (NEC) केंद्रीय गृह सचिव राष्ट्रीय योजना का समन्वय और निगरानी
राज्य राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) मुख्यमंत्री नीतियाँ बनाना और राज्य योजना को मंजूरी देना।
जिला जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) जिला कलेक्टर जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन उपायों की योजना बनाना और उनका क्रियान्वयन करना।

  • यह अधिनियम केंद्र सरकार को गंभीर आपदाओं के दौरान प्राधिकरण को केंद्रीकृत करने का अधिकार देता है, जैसा कि कोविड-19 महामारी के दौरान प्रदर्शित हुआ, जब राष्ट्रव्यापी निर्देश जारी किए गए थे।

भारत के आपदा प्रबंधन ढाँचे का विकास

  • राहत-केंद्रित चरण (वर्ष 2001 से पूर्व) – प्रतिक्रियात्मक और खंडित प्रणाली: आपदा प्रबंधन कृषि मंत्रालय के अधीन संचालित होता था, जिसका मुख्य फोकस आपदा-पश्चात् राहत पर था।
    • औपनिवेशिक अकाल संहिताओं ने प्रतिक्रिया का मार्गदर्शन किया। वित्तपोषण आपदा राहत कोष (Calamity Relief Fund-CRF) और राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता कोष (National Calamity Contingency Fund-NCCF) से होता था, जिसमें राज्यों की प्राथमिक जिम्मेदारी होती थी तथा केंद्र सरकार पूरक सहायता प्रदान करती थी।
  • प्रमुख आपदाओं से प्रेरित परिवर्तन (2001-2005) – तैयारी की ओर कदम: गुजरात भूकंप (2001) ने प्रणालीगत कमियों को उजागर किया। उच्चाधिकार प्राप्त समिति (HPC) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन समिति (NCDM) जैसी समितियों ने सुधारों की शुरुआत की, जिसमें तैयारी, पूर्व चेतावनी और क्षमता निर्माण पर जोर दिया गया।
    • भारत ने योकोहामा रणनीति और उभरते ह्योगो फ्रेमवर्क चर्चाओं जैसे वैश्विक ढाँचों के साथ सामंजस्य स्थापित करना।
  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अंतर्गत संस्थागत स्वरुप: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 ने शमन, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति (MPRR) तक एक समग्र दृष्टिकोण के लिए एक कानूनी अधिदेश बनाया।
    • इसने तीन स्तरीय संरचना (NDMA, SDMA और DDMA) स्थापित की।
    • राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) के रूप में निधियों को औपचारिक रूप दिया गया।
    • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) का गठन एक विशेष प्रतिक्रिया बल के रूप में किया गया।
  • वर्ष 2005 के बाद का समेकन (प्रणालियाँ, बल और वित्त): परिचालन दिशा-निर्देश, संकट प्रबंधन समूह, घटना प्रतिक्रिया प्रणालियाँ और मानक संचालन प्रक्रियाएँ संस्थागत रूप से स्थापित की गईं।
    • NDRF की क्षमताओं का विस्तार किया गया और SDRF/NDRF के वित्तपोषण की संरचना वित्त आयोगों के माध्यम से की गई।
    • खतरे के क्षेत्रीकरण, भेद्यता मानचित्रण और पेशेवर प्रतिक्रिया तंत्रों पर अधिक जोर दिया गया।
  • वर्ष 2015 के बाद का प्रतिमान परिवर्तन – न्यूनीकरण और जलवायु लचीलापन: आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेंडाई फ्रेमवर्क (वर्ष 2015-2030) से प्रभावित होकर, भारत ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) की ओर रुख किया।
    • जलवायु-लचीले बुनियादी ढाँचे (CRI), बहु-खतरा पूर्व चेतावनी प्रणालियों (EWS), प्रकृति-आधारित समाधानों और शहरी लचीलेपन पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिससे दृष्टिकोण, जोखिम-सूचित तथा रोकथाम-उन्मुख हो गया।
  • स्थानीयकरण और समुदाय-केंद्रित शासन: समुदाय-आधारित आपदा जोखिम न्यूनीकरण (CBDRR) पर बढ़ते जोर ने पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों को प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता के रूप में सशक्त बनाया।
    • क्षमता निर्माण, अभ्यास, जन जागरूकता और अंतिम छोर तक संपर्क, आपदा प्रतिरोधी समाज के निर्माण के लिए केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।

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