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Dec 10 2025

मायलोमा के लिए एंटीबॉडी थेरेपी

एक नई द्विविशिष्ट एंटीबॉडी थेरेपी, लिनवोसेल्टामैब, ने सभी 18 परीक्षण रोगियों में पता लगाने योग्य मल्टीपल मायलोमा कोशिकाओं को नष्ट करके उल्लेखनीय प्रारंभिक परिणाम दिखाए।

लिनवोसेल्टामैब की प्रमुख विशेषताएँ

  • रोग अवलोकन: इस थेरेपी से अत्यधिक संवेदनशील परीक्षणों पर ‘कोई पता लगाने योग्य रोग नहीं’ उत्पन्न हुआ, जो अवशिष्ट मायलोमा कोशिकाओं को दबाने की मजबूत क्षमता का संकेत देता है।
  • प्रत्यारोपण-मुक्त दृष्टिकोण: लिनवोसेल्टामैब रोगियों को उच्च-खुराक कीमोथेरेपी और अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण से बचने में मदद कर सकती है, जो वर्तमान में मानक अग्रिम पंक्ति हस्तक्षेप बने हुए हैं।
  • प्रतिरक्षा-लक्षित परिशुद्धता
    • लिनवोसेल्टामैब कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने वाली T कोशिकाओं पर मौजूद प्रोटीन CD3 और मल्टीपल मायलोमा कोशिकाओं पर पाए जाने वाले प्रोटीन ‘बी-सेल मैचुरेशन एंटीजन’ (B-Cell Maturation Antigen- BCMA) से जुड़कर कार्य करता है। इन कोशिकाओं को संपर्क में लाकर, एंटीबॉडी कैंसर के विरुद्ध शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को उत्तेजित करता है।

मल्टीपल मायलोमा के बारे में

  • परिचय: मल्टीपल मायलोमा अस्थि मज्जा में प्लाज्मा कोशिकाओं का कैंसर है, जो असामान्य M-प्रोटीन का उत्पादन करती हैं, जिससे सामान्य रक्त कोशिका निर्माण बाधित होता है।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: रोगियों में आमतौर पर कैल्शियम का स्तर बढ़ना, गुर्दे की खराबी, एनीमिया और हड्डियों में घाव (CRAB) जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, जो फ्रैक्चर, दर्द और अंग क्षति का कारण बन सकते हैं।
  • निदान और चरण निर्धारण: निदान M-प्रोटीन परीक्षण, अस्थि मज्जा बायोप्सी और इमेजिंग पर आधारित होता है; यह बीटा-2 माइक्रोग्लोबुलिन और एल्ब्यूमिन के स्तर पर आधारित अंतरराष्ट्रीय चरण निर्धारण प्रणाली का उपयोग करता है।
  • उपचार: उपचारों में कीमोथेरेपी, इम्यूनोमॉड्यूलेटर, लक्षित थेरेपी (जैसे- पोमालिडोमाइड) और ऑटोलॉगस स्टेम-सेल प्रत्यारोपण शामिल हैं, हालाँकि इसका कोई स्थायी उपचार मौजूद नहीं है।

एंटीबॉडी थेरेपी के बारे में

  • परिचय: एंटीबॉडी थेरेपी, कैंसर कोशिकाओं या प्रतिरक्षा संकेतकों को सटीक रूप से लक्षित करने के लिए एंटीबॉडी का उपयोग करती है, जो आधुनिक ऑन्कोलॉजी की आधारशिला बन गई है।
  • यह कैसे कार्य करता है: मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विशिष्ट एंटीजन से जुड़ते हैं, वृद्धि संकेतों को अवरुद्ध करते हैं, प्रतिरक्षा हानि को उत्प्रेरित करते हैं।
  • अनुप्रयोग: इनका व्यापक रूप से कैंसर, स्व-प्रतिरक्षी रोगों और वायरल संक्रमणों के विरुद्ध उपयोग किया जाता है, जो बेहतर उपचार सहनशीलता के साथ उच्च विशिष्टता प्रदान करते हैं।

भारत के ऊर्जा लक्ष्य

भारत ने वर्ष 2025 में गैर-जीवाश्म स्रोतों से अपनी स्थापित विद्युत क्षमता का 50% हासिल कर लिया है, जिससे उसने वर्ष 2030 की समय-सीमा से पाँच वर्ष पहले ही पंचामृत लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।

ऊर्जा क्षेत्र में प्रमुख उपलब्धि

  • 50% गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य: राष्ट्रीय सौर मिशन और राष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन जैसी योजनाओं के माध्यम से भारत ने कुल 485 गीगावाट में से 243 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता स्थापित की है।
  • भारत के ऊर्जा मिश्रण के घटक
    • 485 गीगावाट, जिसमें से 243 गीगावाट, या लगभग 50 प्रतिशत, गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त हुई है।
    • भारत में 116 गीगावाट सौर क्षमता है, जिसे वर्ष 2030 तक 292 गीगावाट तक पहुँचाने का महत्त्वाकाँक्षी लक्ष्य है।

उपलब्धि में योगदान देने वाले कारक

  • MNRE और विद्युत मंत्रालय (MoP) द्वारा नीतिगत प्रोत्साहन: हरित ऊर्जा गलियारा, नवीकरणीय क्रय दायित्व (RPO) और उच्च दक्षता वाले सौर मॉड्यूल के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना जैसे नीतिगत उपायों ने नवीकरणीय ऊर्जा स्थापना में तेजी लाई।
  • बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा कार्यान्वयन: सौर पार्क विकास कार्यक्रम, अल्ट्रा मेगा नवीकरणीय ऊर्जा पावर पार्क (Ultra Mega Renewable Energy Power Parks- UMREPP) और पीएम कुसुम कार्यक्रम के तहत सौर पंपिंग द्वारा प्रगति संभव हुई।
  • तकनीकी और बाजार विस्तार: ‘हरित ऊर्जा मुक्त पहुँच नियम, 2022’ के माध्यम से बेहतर ग्रिड एकीकरण, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत प्रारंभ की गई प्रतिस्पर्द्धी सौर नीलामियों ने लागत में कमी लाने और स्थापना को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • संस्थागत निगरानी: ऊर्जा संबंधी स्थायी समिति और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority-CEA) ने निगरानी, ​​समय पर समीक्षा और राष्ट्रीय नवीकरणीय लक्ष्यों के साथ संरेखण सुनिश्चित किया।

भारत का पंचामृत लक्ष्य

  • गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता: वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना।
  • नवीकरणीय ऊर्जा: वर्ष 2030 तक नवीकरणीय स्रोतों से ऊर्जा आवश्यकताओं का 50% पूरा करना।
  • उत्सर्जन में कमी: वर्ष 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन को 1 अरब टन कम करना।
  • कार्बन तीव्रता: वर्ष 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता (प्रति इकाई GDP उत्सर्जन) को वर्ष 2005 के स्तर से 45% कम करना।
  • नेट जीरो उत्सर्जन: वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन प्राप्त करना।

जापान में भूकंप

जापान के उत्तर-पूर्वी भाग में 7.5 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया, तथा प्रशांत महासागर के तटीय क्षेत्रों में सुनामी आ गई।

सुनामी के बारे में

  • यह एक जापानी शब्द है जिसका अर्थ है ‘बंदरगाह तरंग’। यह जल के भीतर भूकंप या ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण उत्पन्न होने वाली विशाल समुद्री तरंगों की एक शृंखला है।
    • जल की एक बड़ी मात्रा के अचानक विस्थापन से सुनामी लहरें बनती हैं।
  • सुनामी निर्माण प्रक्रिया
    • भूकंप समुद्र तल के बड़े हिस्से को विस्थापित कर सकते हैं, जिससे जल में शॉकवेव उत्पन्न होती हैं।
    • इसी तरह, जल के नीचे ज्वालामुखी विस्फोट, विस्फोटक बल के साथ जल को विस्थापित कर सकते हैं, जिससे सुनामी आ सकती है।
  • सुनामी लहरों की विशेषताएँ: सुनामी तरंगें सैकड़ों फीट ऊँची हो सकती हैं और गहरे जल में जेट विमानों जितनी तेज गति से यात्रा कर सकती हैं। हालाँकि, उथले जल में पहुँचने पर इनकी गति धीमी हो जाती है।
  • सुनामी निर्माण को प्रभावित करने वाले कारक: सुनामी का निर्माण कई कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें समुद्र तल का आकार, भूकंप या ज्वालामुखी विस्फोट की दूरी और दिशा शामिल हैं।

जापान भूकंप और सुनामी के प्रति संवेदनशील क्यों है?

  • जापान प्रशांत महासागर के सबसे सक्रिय भूकंपीय विवर्तनिक क्षेत्र ‘प्रशांत अग्नि वलय’ पर स्थित है, जिसमें प्रशांत, यूरेशियन और इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेटें शामिल हैं।
  • इन प्लेटों के निरंतर आपस में टकराने और घर्षण के कारण प्रायः भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट और सुनामी आती रहती हैं।

स्थल के बारे में

  • स्थान: भूकंप जापान के उत्तर-पूर्वी प्रशांत तट के पास, आओमोरी में आया।
    • यह क्षेत्र वर्ष 2011 के तोहोकू 9.0 भूकंप-सुनामी स्थल के निकट है, जिसके कारण तैयारियाँ और परमाणु सुरक्षा जाँचें बढ़ा दी गई हैं।
  • अग्नि वलय: जापान ‘प्रशांत अग्नि वलय’ पर स्थित है, जो एक अत्यधिक सक्रिय विवर्तनिक क्षेत्र है जहाँ प्रायः भूकंपों और सुनामी के लिए जिम्मेदार है।

अभयारण्य वन्यजीव सेवा पुरस्कार 2025

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS)की  वैज्ञानिक परवीन शेख को उनकी ‘नेस्ट गार्जियन-Nest Guardian’ पहल के लिए अभयारण्य वन्यजीव सेवा पुरस्कार 2025 प्राप्त हुआ।

  • ‘नेस्ट गार्जियन’ पहल एक समुदाय-नेतृत्व वाला संरक्षण कार्यक्रम है, जो शिकार और मानवीय व्यवधान जैसे खतरों से असुरक्षित ‘इंडियन स्कीमर’ पक्षी और अन्य प्रजातियों की रक्षा पर केंद्रित है।

नेस्ट गार्जियन की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • समुदाय-नेतृत्व आधारित ‘घोंसला संरक्षक’ पक्षियों की सफलता: इस पहल ने घोंसलों की उत्तरजीविता दर को लगभग शून्य से बढ़ाकर 60% कर दिया, जिससे संवेदनशील रेतीली बस्तियों को शिकारियों और व्यवधानों से बचाया जा सका।
  • स्किमर संरक्षण का दीर्घकालिक प्रभाव: उनकी निरंतर निगरानी, ​​आवास मूल्यांकन संबंधी अध्ययनों ने भारत में इंडियन स्कीमर की आबादी को जनवरी 2024 तक 1812 तक बढ़ाने में योगदान दिया, जिसमें चंबल में 544 थे।
  • आजीविका एकीकरण: इस कार्यक्रम ने नदी पर निर्भर तथा हाशिए पर स्थित परिवारों के लिए सार्थक आय स्रोत उत्पन्न किया, जिससे संरक्षण को सामुदायिक कल्याण के साथ जोड़ा गया।

अभयारण्य वन्यजीव सेवा पुरस्कार के बारे में

  • परिचय: अभयारण्य वन्यजीव सेवा पुरस्कार भारत में उत्कृष्ट जमीनी स्तर पर संरक्षण प्रभाव प्रदर्शित करने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करता है।
  • स्थापना: सैंक्चुअरी नेचर फाउंडेशन द्वारा स्थापित है, जो सैंक्चुअरी  एशिया (प्रथम अंक: वर्ष 1981 में) का भी प्रकाशन करता है।
  • यह प्रतिवर्ष अग्रणी संरक्षण नायकों को सम्मानित करता है।
  • उद्देश्य और मानदंड: यह पूरे भारत में पारिस्थितिक, वन्यजीव और जलवायु चुनौतियों का समाधान करने वाले विज्ञान-समर्थित, समुदाय-एकीकृत संरक्षण प्रयासों का सम्मान करता है।
  • महत्त्व: यह पुरस्कार क्षेत्र-आधारित संरक्षण कार्यों की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बढ़ाता है और प्रजाति-पुनर्प्राप्ति कार्यक्रमों के लिए समर्थन को मजबूत करता है।

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के बारे में

  • BNHS भारत का प्रमुख संरक्षण अनुसंधान संस्थान है जो जैव विविधता संरक्षण के लिए समर्पित है।
  • स्थापना: प्रकृतिवादियों द्वारा वर्ष 1883 में मुंबई में स्थापित, BNHS को भारत सरकार द्वारा वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान संगठन (Scientific and Industrial Research Organisation- SIRO) के रूप में मान्यता प्राप्त है।
  • भूमिका एवं गतिविधियाँ: BNHS राष्ट्रव्यापी पारिस्थितिक अनुसंधान करता है, शिक्षा कार्यक्रम संचालित करता है, संरक्षण परियोजनाओं (मैंग्रोव, आर्द्रभूमि, घास के मैदान) का नेतृत्व करता है और नागरिक विज्ञान पहलों का समन्वय करता है।
  • वैश्विक भागीदारी: यह बर्डलाइफ इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करता है, जिससे विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में वैज्ञानिक और संरक्षण संबंधी पहुँच का विस्तार होता है।

ब्रिटेन के वित्त मंत्रालय ने चरमपंथियों पर प्रतिबंध लगाए

भारत विरोधी चरमपंथी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने के ब्रिटेन के निर्णय का भारत ने स्वागत किया है।

प्रतिबंधों के बारे में

  • चरमपंथी नेटवर्कों को निशाना बनाना: प्रतिबंधों के तहत भारत-विरोधी चरमपंथ और हिंसा को बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों और संगठनों को ‘ब्लैक लिस्ट’ में डाला गया है।
  • वित्तीय और परिचालन प्रतिबंध: इसने चरमपंथी गतिविधियों को रोकने के लिए संपत्ति जब्त, वित्तपोषण अवरोध और यात्रा प्रतिबंध लगाए।
  • आतंकवाद-रोधी (प्रतिबंध) EU निकास विनियम, 2019 ब्रिटेन के वित्त मंत्रालय को आतंकवाद में संलिप्तता के संदिग्ध व्यक्तियों और संस्थाओं की संपत्ति जब्त करने और उन पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।

प्रतिबंधों पर भारत का दृष्टिकोण

  • ब्रिटेन की कार्रवाई का समर्थन: भारत ने इस बात की पुष्टि की कि ये संस्थाएँ वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा हैं और ब्रिटेन के इस कदम का आतंकवाद-विरोधी निर्णायक कदम के रूप में स्वागत किया।
  • अवैध धन प्रवाह पर अंकुश लगाने का महत्त्व: भारत ने इस बात पर जोर दिया कि प्रतिबंध वित्तीय चैनलों को अवरुद्ध करने और उग्रवाद का समर्थन करने वाले अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क को नष्ट करने में सहायक हैं।
  • द्विपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करना: इस कार्रवाई को आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद के विरुद्ध भारत-ब्रिटेन के रणनीतिक गठबंधन को और मजबूत करने के रूप में देखा जा रहा है।

संदर्भ

पश्चिम अफ्रीकी गणराज्य बेनिन में सैन्य तख्तापलट के प्रयास को देश के आंतरिक मंत्रालय के अनुसार विफल कर दिया गया है।

बेनिन में हालिया संकट

  • यह तख्तापलट ‘मिलिट्री कमिटी फॉर रिफाउंडेशन’ नामक एक समूह के नेतृत्व में किया गया था।
  • 7 दिसंबर, 2025 को सैनिकों ने बेनिन के सरकारी टीवी पर हमला करके सत्ता पर अधिकार करने की घोषणा कर दी। सरकार के विश्वसनीय सशस्त्र बलों ने कुछ ही घंटों में इस प्रयास को विफल कर दिया।
  • सरकार के अनुरोध पर नाइजीरिया और यूरोपीय संघ के सशस्त्र बलों द्वारा तत्काल सैन्य हस्तक्षेप के कारण ही यह तख्तापलट इतनी जल्दी विफल हो पाया।

बेनिन के बारे में

  • अवस्थिति एवं भौगोलिक विशेषताएँ: बेनिन पश्चिम अफ्रीका में स्थित है, जिसकी सीमा टोगो (पश्चिम), नाइजीरिया (पूर्व), बुर्किना फासो और नाइजर (उत्तर) एवं अटलांटिक महासागर (दक्षिण) से लगती है।
    • इसका उत्तर-दक्षिण में संकीर्ण आकार है और इसकी तटरेखा बेनिन की खाड़ी के साथ संलग्न है।
  • राजधानी: पोर्टो-नोवो (आधिकारिक)
  • सरकार का मुख्यालय और सबसे बड़ा शहर: कोटोनौ (Cotonou)।
  • सरकार का प्रारूप: अध्यक्षीय गणराज्य प्रणाली।
  • बेनिन वर्ष 1990 के बाद पश्चिम अफ्रीका के सबसे स्थिर लोकतंत्रों में से एक माना जाता है।
  • इतिहास और संस्कृति: यह प्राचीन दाहोमी साम्राज्य (जो पूरी तरह से महिला अगोजी योद्धाओं के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें कभी-कभी ‘दाहोमी अमेजन’ भी कहा जाता है) का मूल स्थल है।
    • यह कभी स्लेव कोस्ट (Slave Coast) का हिस्सा था और ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार का प्रमुख स्थल था।
  • बेनिन ‘पश्चिम अफ्रीकी राज्यों के आर्थिक समुदाय’ (Economic Community of West African States- ECOWAS) का हिस्सा है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक एकीकरण के लिए महत्त्वपूर्ण है।

संदर्भ

संयुक्त राष्ट्र (UN) ने लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो (DRC) और रवांडा के बीच हाल ही में हुए शांति समझौते ‘वाशिंगटन समझौते’ का स्वागत किया है।

शांति समझौते (वाशिंगटन समझौते) की मुख्य शर्तें

  • तत्काल युद्धविराम: पूर्वी DRC में शत्रुता को तुरंत समाप्त करने के लिए सभी पक्षों द्वारा एक प्राथमिक प्रतिबद्धता सुनिश्चित की गई।
  • M23 की वापसी और प्रतिस्थापन: सभी अधिकृत क्षेत्रों से M23 विद्रोही समूह की वापसी को अनिवार्य बनाना, और उनकी स्थिति को शीघ्र एक क्षेत्रीय सुरक्षा बल (EACRF/SAMIDRC) द्वारा प्रतिस्थापित करना।
  • पारस्परिक सुरक्षा गारंटी: इस समझौते में पारस्परिक सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए दोनों देशों द्वारा स्पष्ट कार्रवाई की आवश्यकता है:-
    • रवांडा का दायित्व: पूर्वी DRC से अपने सैनिकों (जिन पर M23 के साथ मिलकर कार्य करने का आरोप है) को वापस बुलाना।
    • DRC का दायित्व: रवांडा मुक्ति के लिए लोकतांत्रिक बल (Forces for the Liberation of Rwanda- FDLR) मिलिशिया को औपचारिक रूप से सभी समर्थन समाप्त करना और उन्हें निरस्त्र करना।
  • क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग: अंतर्निहित राजनीतिक मुद्दों के कूटनीतिक समाधान के लिए मार्ग स्थापित करना, जिसमें अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के समर्थन से, विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण खनिजों (कोल्टन, कोबाल्ट, सोना) के विकास और सुरक्षित व्यापार पर केंद्रित क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के लिए एक रूपरेखा की स्थापना करना शामिल है।

भू-राजनीतिक और क्षेत्रीय ढाँचों के बारे में

  • पूर्वी अफ्रीकी समुदाय (East African Community- EAC): EAC शांति प्रक्रिया का प्रमुख मध्यस्थ रहा है, जिसके कारण पूर्वी DRC में युद्धविराम की निगरानी और M23 की वापसी को सुगम बनाने के लिए EAC क्षेत्रीय बल (EACRF) की तैनाती की गई। DRC वर्ष 2022 में EAC में शामिल हो गया।
    • EAC एक क्षेत्रीय अंतर-सरकारी संगठन है, जिसका उद्देश्य पूर्वी अफ्रीका के लोगों के जीवन स्तर में सुधार के लिए अपने सहयोगी देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण को व्यापक और गहन बनाना है।
  • ‘लुआंडा’ प्रक्रिया: यह EAC प्रयासों के समानांतर संचालित एक अलग, अंगोला के नेतृत्व वाला राजनयिक मार्ग है, जिसका उद्देश्य किंशासा और किगाली के बीच मुख्य राजनीतिक तनावों को हल करना है।
  • DRC में संयुक्त राष्ट्र स्थिरीकरण मिशन (MONUSCO): संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1999 से DRC में एक विशाल शांति सेना तैनात की है।
    • MONUSCO की भूमिका में नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्र को स्थिर करने के सरकारी प्रयासों का समर्थन करना शामिल है, हालाँकि इसकी प्रभावशीलता की आलोचना की गई है।
  • खनिज संपदा: पूर्वी DRC खनिजों, विशेष रूप से कोल्टन, कोबाल्ट और सोने से युक्त है। M23 सहित विभिन्न सशस्त्र समूहों का इन संसाधनों पर नियंत्रण, संघर्ष और क्षेत्रीय हस्तक्षेप को बढ़ावा देने वाला एक प्रमुख कारक है।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

  • वर्ष 1994 के रवांडा नरसंहार की उत्पत्ति: इस नरसंहार के दौरान लगभग 8 लाख ‘तुत्सी’ और उदारवादी ‘हुतु’ लोगों को चरमपंथी बलों द्वारा मार डाला गया था।
    • FDLR सहित हुतु मिलिशिया, कांगो (तत्कालीन जायरे) भाग गए, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय अस्थिरता उत्पन्न हुई जो दशकों से जारी है।
  • शरणार्थी संकट और उग्रवादियों की उपस्थिति: कई सशस्त्र ‘हुतु’ शरणार्थी पूर्वी कांगो में बस गए, जहाँ उन्होंने रवांडा की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा उत्पन्न कर दिया।
    • रवांडा ने कांगो सरकार पर इन मिलिशिया को पनाह देने का आरोप लगाया, जिससे दोनों देशों के बीच लगातार तनाव बना हुआ है।
  • प्रथम कांगो युद्ध (1996-1997): रवांडा ने वर्ष 1996 में कांगो में सैन्य हस्तक्षेप किया और ‘मोबुतु सेसे सेको’ को सत्ता से हटाने में ‘लॉरेंट-डेसिरे कबीला’ का समर्थन किया।
    • इस हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप प्रथम कांगो युद्ध हुआ, जो आधिकारिक तौर पर वर्ष 1997 में समाप्त हो गया, लेकिन इसने क्षेत्र में आगे के संघर्षों का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
  • दूसरा कांगो युद्ध (1998-2003): ‘मोबुतु’ के पतन के कारण दूसरा कांगो युद्ध छिड़ गया, जिसमें रवांडा और युगांडा सहित कई अफ्रीकी देश शामिल थे।
    • रवांडा ने पूर्वी कांगो में विद्रोही समूहों का समर्थन किया, यह दावा करते हुए कि वे ‘हुतु’ उग्रवादियों के खिलाफ लड़ रहे थे, जबकि कांगो की सरकार को अंगोला, जिम्बाब्वे और अन्य देशों का समर्थन प्राप्त था।
    • इस युद्ध में लाखों लोग मारे गए और इसके व्यापक प्रभाव के कारण इसे ‘अफ्रीका का विश्व युद्ध’ कहा जाता है।
  • M23 विद्रोह: वर्ष 2012 में, पूर्वी कांगो में M23 विद्रोही समूह का गठन हुआ, जिसमें मुख्य रूप से ‘नेशनल कांग्रेस फॉर द डिफेंस ऑफ द पीपुल्स’ (CNDP) के पूर्व सैनिक शामिल थे, जिसे कभी रवांडा का समर्थन प्राप्त था।
    • M23 ने पूर्वी कांगो के प्रमुख शहरों (जैसे- गोमा) और खनिज संपदा से भरपूर क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया, जिससे भीषण हिंसा और विस्थापन हुआ।

M23 सशस्त्र समूह

  • M23 (23 मार्च आंदोलन) पूर्वी DRC में कांगो सेना से लड़ने वाले 100 से अधिक सशस्त्र समूहों में से एक है।

  • नृजातीय संरचना: नेतृत्व पर पूर्वी DRC के एक अल्पसंख्यक समूह, ‘तुत्सी’ का प्रभुत्व है।
  • मुख्य उद्देश्य: कांगो के तुत्सी और अन्य अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा का दावा, विशेष रूप से हुतु विद्रोही समूहों के विरुद्ध, जो वर्ष 1994 के रवांडा नरसंहार के बाद DRC भाग गए थे।
  • स्थान: रवांडा और युगांडा की सीमाओं पर स्थित उत्तरी किवु प्रांत में सक्रिय, संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार 8,000 से अधिक विद्रोही हैं।
  • नाम की उत्पत्ति: 23 मार्च, 2009 को तुत्सी नेतृत्व वाले विद्रोही समूह, CNDP और कांगो सरकार के बीच तुत्सी नेतृत्व वाले विद्रोह को समाप्त करने के लिए हुए समझौते के नाम पर रखा गया।
  • समर्थन के आरोप: संयुक्त राष्ट्र और DRC ने रवांडा पर M23 को प्रशिक्षण, हथियार और यहाँ तक ​​कि सैनिकों का समर्थन करने का आरोप लगाया है।

रवांडा के बारे में

  • पूर्व-मध्य अफ्रीका में भूमध्य रेखा के दक्षिण में स्थित एक स्थलरुद्ध देश है।
  • अफ्रीका के ‘ग्रेट रिफ्ट वैली’ क्षेत्र का एक भाग, जिसे प्रायः इसके पर्वतीय भूभाग के कारण ‘हजार पहाड़ियों की भूमि’ कहा जाता है।
  • इसकी सीमाएँ बुरुंडी (दक्षिण), तंजानिया (पूर्व), युगांडा (उत्तर) और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) (पश्चिम) से लगती हैं।
  • अफ्रीका के सबसे सघन आबादी वाले देशों में से एक (लगभग 1,000 व्यक्ति प्रति वर्ग मील), यहाँ की अधिकांश आबादी हुतु और तुत्सी नृजातीय समूहों से संबंधित है, जिनमें से अधिकांश ईसाई धर्म से संबंधित हैं।

  • प्रमुख पर्वत शृंखलाएँ: अल्बर्टाइन रिफ्ट और विरुंगा पर्वत।
  • प्रमुख नदियाँ: नील और कांगो
    • अन्य महत्त्वपूर्ण नदियाँ: कागेरा, न्याबारोंगो, रुजिजी, लुहवा, अकन्यारु
  • अपवाह पैटर्न
    • लगभग 80% नदियाँ विक्टोरिया झील के माध्यम से नील बेसिन में गिरती हैं।
    • लगभग 20% नदियाँ रुसिजी नदी के माध्यम से कांगो बेसिन में गिरती हैं।
  • झीलें: किवु झील (DRC की सीमा) और अन्य महत्त्वपूर्ण झीलें: बुरेरा, कोहाना, रुहोंडो, मुहाज़ी, रवेरु, इहेमा

लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो के बारे में

  • मध्य अफ्रीका में स्थित देश, यह अल्जीरिया के बाद अफ्रीका का दूसरा सबसे बड़ा देश है।
  • इसके पश्चिमी सीमाएँ अटलांटिक महासागर से एक छोटी समुद्री पट्टी के माध्यम से जुड़ी हैं।
  • इसकी भूमि सीमाएँ
    • उत्तर: मध्य अफ्रीकी गणराज्य और दक्षिण सूडान।
    • पूर्व: युगांडा, रवांडा, बुरुंडी और तंजानिया।
    • पश्चिम: कांगो गणराज्य और अंगोला।
    • दक्षिण: जाम्बिया।
  • भूमध्य रेखा DRC से होकर गुजरती है, इसलिए यहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है।
  • ब्राजील और इंडोनेशिया के साथ, यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय पीटलैंड क्षेत्र अवस्थित है।
  • कांगो नदी, इस देश की मुख्य नदी है, जो भूमध्य रेखा को दो बार पार करती है और दुनिया की सबसे गहरी और अफ्रीका की दूसरी सबसे लंबी नदियों में से एक है।
  • यह देश कोबाल्ट, तांबा, कोल्टन, सोना, कोयला, लौह अयस्क और लिथियम जैसे खनिजों से समृद्ध है।

संदर्भ

एक नए प्रयोग के अनुसार, अरबों क्षारीय सूक्ष्मजीव भूमिगत परमाणु अपशिष्ट को सुरक्षित रखने का एक नया तरीका प्रस्तुत कर सकते हैं।

भू-वैज्ञानिक निपटान सुविधाएँ (Geological Disposal Facilities- GDF)

  • GDF एक इंजीनियर्ड और प्राकृतिक अवरोधक प्रणाली है जो सैकड़ों मीटर जमीन के नीचे बनाई जाती है ताकि उच्च-स्तरीय और दीर्घकालिक रेडियोधर्मी अपशिष्ट को हजारों से लाखों वर्षों तक अलग रखा जा सके।
  • GDF में अपशिष्ट कंटेनर, सीमेंट या मृदा निर्मित बैकफिल और एक स्थाई चट्टान (ग्रेनाइट, मृदा या लवण निर्मित संरचनाएँ) शामिल होती हैं।
  • इन्हें परमाणु अपशिष्ट के स्थायी निपटान के लिए विश्व स्तर पर सबसे सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से मान्य विधि के रूप में मान्यता प्राप्त है।

GDF के साथ समस्या

  • वर्तमान गहरे भूमिगत परमाणु अपशिष्ट भण्डार (GDF) अपशिष्ट कंटेनरों को सील करने और सहारा देने के लिए सीमेंट का उपयोग करते हैं।
  • सदियों से भू-जल, सीमेंट के साथ प्रतिक्रिया करके सूक्ष्म दरारें और छिद्र का निर्माण करता है।
  • ये दरारें विकिरण के सतह पर वापस जाने का मार्ग बन सकती हैं।

सूक्ष्मजीवों द्वारा प्रेरित कार्बोनेट अवक्षेपण (Microbially Induced Carbonate Precipitation- MICP)

  • अवधारणा: विशेष रूप से चयनित सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके एक प्राकृतिक, स्व-उपचारित अवरोध का निर्माण करना।
  • यह कैसे कार्य करता है?
    • क्षारीयता के साथ अनुकूलन स्थापित करने वाले सूक्ष्मजीवों को सीमेंट के पास डाला जाता है।
    • वे उपलब्ध कार्बनिक पदार्थों का उपभोग करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड (CO) उत्पन्न करते हैं।
    • CO₂ सीमेंट में मौजूद कैल्शियम और मैग्नीशियम के साथ अभिक्रिया करता है।
    • इस अभिक्रिया से ठोस कार्बोनेट खनिज (जैसे- कैल्साइट) का निर्माण होता है जो दरारों और छिद्रों को बंद कर देते हैं।
  • MICP प्रक्रिया परमाणु अपशिष्ट के दीर्घकालिक, स्व-मरम्मत योग्य संरोधन विधि के रूप में आशाजनक संभावनाएँ दर्शाती है।

संदर्भ

प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘हिंदू संवृद्धि दर’ का स्तर भारत को स्वाभाविक रूप से अनुत्पादक के रूप में गलत तरीके से चित्रित करता है, जबकि उदारीकरण से पहले और बाद में मजबूत आर्थिक वृद्धि के प्रमाण मिले हैं।

हिंदू संवृद्धि दर के बारे में

  • ‘हिंदू संवृद्धि दर’ शब्द का प्रयोग अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने वर्ष 1982 में भारत की धीमी GDP वृद्धि दर, जो 1950 के दशक से 1970 के दशक के अंत तक लगभग 3-3.5% थी, के संदर्भ में किया था।
  • इसका प्रयोग धार्मिक पहचान या संस्कृति को नहीं, बल्कि संरचनात्मक आर्थिक कमजोरियों को उजागर करने के लिए किया गया था।
  • हिंदू संवृद्धि दर की प्रमुख विशेषताएँ
    • निम्न एवं स्थिर वृद्धि दर: वर्ष 1956-1975 के बीच भारत की वार्षिक वृद्धि दर लगभग 3.4% रही, जिसमें युद्धों या राजनीतिक परिवर्तनों के दौरान भी न्यूनतम परिवर्तन देखा गया।
    • उच्च जनसंख्या वृद्धि: नेहरू युग में जनसंख्या में लगभग 2% वार्षिक वृद्धि हुई, जिससे प्रति व्यक्ति आय वृद्धि घटकर लगभग 1.9% रह गई, जिससे वास्तविक आर्थिक प्रगति प्रदर्शित नहीं हुई।
    • ‘लाइसेंस-परमिट’ राज: उत्पादन, आयात और निजी निवेश पर कड़े नियंत्रणों ने प्रतिस्पर्द्धा को सीमित कर दिया और उत्पादकता को कम रखा।
    • अर्थव्यवस्था का प्रकार
      • राज्य-नियंत्रित, अंतर्मुखी अर्थव्यवस्था जिसमें इस्पात, विद्युत, परिवहन और मशीनरी में सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी भूमिका थी।
      • उच्च शुल्क और कोटा आधारित आयात प्रतिस्थापन प्रणाली घरेलू उद्योगों की रक्षा करती थी, लेकिन नवाचार और निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को सीमित करती थी।
      • सीमित बाजार प्रोत्साहनों ने औद्योगिक विस्तार और तकनीकी उन्नयन को धीमा कर दिया।

पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता

  • वर्ष 1991 से पहले की उच्च वृद्धि के प्रमाण: बलदेव राज नायर और अरविंद पनगढ़िया द्वारा किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि वर्ष 1981-91 में भारत की वृद्धि दर लगभग 5.8% थी, जिससे यह सिद्ध होता है कि यह तथाकथित ‘हिंदू संवृद्धि दर’ से अधिक थी।
  • अल्प-मान्यता प्राप्त प्रारंभिक सुधार: वर्ष 1991 के उदारीकरण द्वारा लागू नीतिगत उदारीकरण, जैसे-औद्योगिक लाइसेंसिंग प्रक्रिया में आर्थिक शिथिलता, ने निवेश और उत्पादकता को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • आपातकाल के बाद के उपायों का प्रभाव: वर्ष 1975 के बाद विनियमन में आर्थिक शिथिलता और बेहतर क्षमता उपयोग ने उद्योग के प्रदर्शन को मजबूत किया, जिससे निरंतर आर्थिक वृद्धि में योगदान मिला।
  • भ्रामक शब्दावली में सुधार: इस शब्दावली ने आर्थिक परिणामों को क्षेत्र की आस्था और सांस्कृतिक पहचान से गलत तरीके से जोड़ दिया, जो औपनिवेशिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है; इस पक्षपातपूर्ण और गलत ऐतिहासिक ढाँचे को बदलने के लिए पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।

आर्थिक वृद्धि के वर्तमान मॉडल के बारे में

  • आर्थिक नियोजन का विकास: भारत एक बाजार-संचालित, वैश्विक स्तर पर एकीकृत अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, जिससे राज्य नियंत्रण कम हो रहे हैं, निजी निवेश को प्रोत्साहन मिल रहा है और व्यापार करने में सुगमता बढ़ रही है।
    • नियोजन पंचवर्षीय योजनाओं से हटकर नीति आयोग के सहकारी संघवाद और दीर्घकालिक रणनीतियों पर केंद्रित हो गया है।
  • वर्तमान वृद्धि प्रदर्शन: भारत अब सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसकी औसत वृद्धि दर हाल के वर्षों में 7% या उससे अधिक रही है, जो सेवा, विनिर्माण और डिजिटल नवाचार से प्रेरित है।
    • आत्मनिर्भर भारत, PLI योजनाएँ और अवसंरचना मिशन (गति शक्ति) जैसे प्रमुख कार्यक्रम उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा दे रहे हैं।
  • लक्ष्य: राष्ट्रीय लक्ष्यों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना, विनिर्माण हिस्सेदारी बढ़ाना, रोजगार-समृद्ध वृद्धि करना और वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र का दर्जा प्राप्त करना शामिल है।

संदर्भ

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) में संशोधन के लिए एक निजी विधेयक प्रस्तुत किया है।

प्रस्तावित संशोधन की मुख्य विशेषताएँ

  • स्वतंत्र रूप से मतदान करने की स्वतंत्रता: सांसद अधिकांश विधेयकों और प्रस्तावों पर अपनी इच्छानुसार मतदान कर सकते हैं।
  • ‘पार्टी व्हिप’ केवल निम्नलिखित पर लागू होगा:
    • विश्वास प्रस्ताव
    • अविश्वास प्रस्ताव
    • स्थगन प्रस्ताव
    • धन विधेयक
    • वित्तीय मामले
  • अयोग्यता को सीमित करना: सांसदों की सदस्यता केवल तभी समाप्त होगी, जब वे उपरोक्त स्थिरता संबंधी मामलों में पार्टी व्हिप की अवहेलना करेंगे।
    • अन्य सभी विधायी कार्यों के लिए, स्वतंत्र रूप से मतदान करने पर कोई अयोग्यता नहीं होगी।
  • पार्टी निर्देशों की अनिवार्य घोषणा: जब भी कोई पार्टी निर्दिष्ट महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों पर व्हिप जारी करती है, तो अध्यक्ष/सभापति को सदन में इसकी घोषणा करनी होगी।
    • घोषणा में स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए कि अवहेलना करने पर सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाएगी।
  • अपील तंत्र: जिस सांसद की सदस्यता समाप्त हो जाती है, वह 15 दिनों के भीतर अध्यक्ष/सभापति के समक्ष अपील कर सकता है।
    • अपील का निपटारा 60 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए।

दल-बदल विरोधी कानून के बारे में

  • इसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से भारतीय संविधान में दसवीं अनुसूची सम्मिलित करके प्रस्तुत किया गया था।
  • उद्देश्य: निर्वाचित विधायकों को दल बदलने, पार्टी व्हिप की अवज्ञा करने, या स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने से रोकना।
  • निर्णायक प्राधिकारी: दल-बदल के कारण अयोग्यता के प्रश्नों का निर्धारण संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है:-
    • राज्यसभा के सभापति
    • लोकसभा के अध्यक्ष
    • विधानसभा के अध्यक्ष
  • अयोग्यता के आधार
    • यदि कोई विधायक (सांसद/विधायक) स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग देता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
    • बिना पूर्व अनुमति के, पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करने या मतदान से अनुपस्थित रहने पर।
    • निर्दलीय सांसद/विधायक चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाते हैं।
    • मनोनीत सदस्य द्वारा नामांकन के 6 महीने बाद किसी दल में शामिल होने पर उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
  • अपवाद: यदि किसी विधायक दल के दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय कर लेते हैं, तो कोई अयोग्यता नहीं होगी।

दलबदल विरोधी कानून की आलोचनाएँ

  • विधायकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाता है।
  • सांसदों/विधायकों की विचार-विमर्श संबंधी भूमिका को कम करता है, जिसे प्रायः ‘व्हिप से प्रेरित अत्याचार’ कहा जाता है।
  • कभी-कभी वक्ता पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्य करते हैं, जिससे निर्णयों में देरी होती है।

भारत में व्हिप के बारे में

  • ‘व्हिप’ पार्टी सदस्यों को जारी किया गया एक लिखित निर्देश होता है, जिसमें उन्हें विशिष्ट मुद्दों पर मतदान करने का निर्देश दिया जाता है।
  • ‘व्हिप’ शब्द की उत्पत्ति इंग्लैंड के शिकार के मैदानों से हुई है, जहाँ ‘व्हिपर-इन’ कुत्तों को नियंत्रण में रखने के लिए जिम्मेदार होता था।
  • संवैधानिक स्थिति: भारत में व्हिप के पद का कोई प्रत्यक्ष संवैधानिक या वैधानिक आधार नहीं है।
    • इस पद का उल्लेख न तो भारत के संविधान में, न ही सदन के कार्यविधि नियमों में, और न ही किसी संसदीय कानून में किया गया है।
  • मुख्य सचेतक: किसी राजनीतिक दल के मुख्य सचेतक की व्हिप प्रणाली को लागू करने में सबसे महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है।

निजी सदस्य विधेयक (PMBs) के बारे में 

  • एक निजी सदस्य विधेयक, किसी ऐसे सांसद द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो मंत्री नहीं है, चाहे वह किसी भी दल से संबद्ध हो।
    • यह भारतीय संसद द्वारा अपनाई गई वेस्टमिंस्टर संसदीय प्रथा है।
  • उद्देश्य: निजी सदस्य विधेयक, सांसदों को स्वतंत्र विचार व्यक्त करने और ऐसे कानून प्रस्तावित करने की अनुमति देते हैं, जिन्हें सरकार प्राथमिकता नहीं दे सकती है।
  • प्रक्रिया: निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत करने के लिए एक महीने पहले सूचना देना अनिवार्य है।
    • निजी सदस्य विधेयक केवल शुक्रवार को ही प्रस्तुत किए जाते हैं।
    • अध्यक्ष/सभापति निजी सदस्य विधेयकों की स्वीकार्यता पर निर्णय लेते हैं।
    • निजी सदस्य विधेयक धन विधेयकों के अलावा संसद के अधिकार क्षेत्र में आने वाले किसी भी मुद्दे पर विचार कर सकते हैं, जिन्हें केवल मंत्री ही प्रस्तुत कर सकते हैं।
  • पारित करना और मतदान करना: अन्य विधेयकों की तरह ही विधायी प्रक्रिया का पालन करता है।
    • अब तक, केवल 14 निजी सदस्य विधेयक ही कानून बन पाए हैं, जिनमें से पाँच राज्यसभा में प्रस्तुत किए गए हैं।

संदर्भ

हाल ही में गोवा के अरपोरा विलेज में एक नाइट क्लब में लगी आग में 25 लोगों की जान चली गई, जिससे अग्नि सुरक्षा अनुपालन संबंधी गंभीर खामियाँ उजागर हुईं।

संबंधित तथ्य

  • हाल ही में घटित कई अन्य आगजनी की घटनाओं के बाद यह आगजनी, देश भर में अग्नि सुरक्षा नियमों के गैर-अनुपालन संबंधी मुद्दे को रेखांकित करती है।

गोवा नाइट क्लब में अग्नि सुरक्षा में प्रमुख खामियाँ

  • अनिवार्य अनुमतियों का अभाव: ग्राम पंचायत सहित कई चेतावनियों के बावजूद, नाइट क्लब के पास आवश्यक अनुमतियाँ और अग्नि सुरक्षा मंजूरियाँ नहीं थीं।
  • अग्नि सुरक्षा उल्लंघन: उचित निकास द्वार जैसे बुनियादी अग्नि सुरक्षा उपाय मौजूद नहीं थे, जिससे लोग अंदर फँस गए।
  • अपर्याप्त वेंटिलेशन: बेसमेंट की रसोई में वेंटिलेशन की कमी थी, और साज-सज्जा एवं सजावट में बाँस जैसी ज्वलनशील सामग्री का प्रयोग किया गया था। इससे आयोजन स्थल आग की लपटों में घिर गया, जिससे आग और भी भयावह हो गई।

भारत भर में बार-बार होने वाले अग्नि सुरक्षा उल्लंघन

  • NCRB रिपोर्ट: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की वर्ष 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में 7,500 से अधिक आग की दुर्घटनाओं में 7,435 मौतें हुईं।
  • आवर्ती अग्नि की घटनाएँ: गोवा नाइट क्लब में लगी आग भारत में अग्नि सुरक्षा उल्लंघनों के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है, जिसमें जयपुर अस्पताल में आग (अक्टूबर) और दिल्ली तथा राजकोट में कई आग लगने की घटनाएँ (2024) जैसी पिछली घटनाएँ शामिल हैं।
  • कानूनों और प्रवर्तन के बीच अंतर: राष्ट्रीय भवन संहिता, राज्य कानूनों और उनके प्रवर्तन के बीच, विशेष रूप से रेस्तरां, शॉपिंग मॉल और क्लब जैसे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में, एक बढ़ता हुआ अंतर है।
  • जोखिम में वृद्धि: गगनचुंबी इमारतों, होटलों और अन्य सार्वजनिक स्थानों के बढ़ते प्रचलन के साथ, विशेष रूप से दिल्ली और मुंबई जैसे सघन महानगरों में, विकास और विस्तार को प्राथमिकता देने के लिए प्रायः अग्नि सुरक्षा मानकों का उल्लंघन किया जाता है।

भारत में अग्नि सुरक्षा मानक और विनियम

  • संवैधानिक प्रावधान
    • अग्निशमन सेवाएँ भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य का विषय हैं और इन्हें 12वीं अनुसूची (अनुच्छेद 243W के अंतर्गत) में शामिल किया गया है, जो नगरपालिकाओं की शक्तियों, प्राधिकारों और उत्तरदायित्वों को रेखांकित करती है।
    • राज्य सरकारों को राज्य अग्निशमन सेवा अधिनियम या भवन उपनियमों के माध्यम से अग्नि निवारण और सुरक्षा उपायों को लागू करने का कार्य सौंपा गया है।
  • राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC)
    • भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा वर्ष 1970 में प्रकाशित और वर्ष 2016 में अद्यतन राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC) भारत में अग्नि सुरक्षा के लिए केंद्रीय मानक के रूप में कार्य करती है।
    • यह भवनों की सामान्य निर्माण आवश्यकताओं, रखरखाव, निकास मार्गों और अग्नि सुरक्षा पर दिशा-निर्देश प्रदान करती है।
    • राज्य सरकारों को अग्नि सुरक्षा और बचाव उपायों पर NBC की सिफारिशों को अपने स्थानीय उपनियमों में शामिल करने की सिफारिश की जाती है।
  • मॉडल बिल्डिंग उपनियम 2016
    • आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा जारी मॉडल बिल्डिंग उपनियम 2016, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अपने स्वयं के भवन उपनियम तैयार करने हेतु दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं।
    • मॉडल बिल्डिंग उपनियम, भवनों में अग्नि सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अग्नि सुरक्षा और सुरक्षा मानकों का भी प्रावधान करते हैं।
  • NDMA दिशा-निर्देश: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने समग्र सुरक्षा और तैयारियों में सुधार के लिए घरों, स्कूलों और अस्पतालों सहित विभिन्न स्थानों के लिए अग्नि सुरक्षा दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

अग्नि सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम

  • अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाओं के लिए आदर्श विधेयक, 2019: आदर्श विधेयक राज्यों को अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाओं के कुशल प्रबंधन हेतु एक रूपरेखा प्रदान करता है।
  • अग्नि एवं जीवन सुरक्षा दिशा-निर्देश: वर्ष 2020 में, स्वास्थ्य मंत्रालय ने अग्नि सुरक्षा के लिए तृतीय-पक्ष प्रमाणन, अग्नि प्रतिक्रिया योजनाओं (FRP) के निर्माण और अन्य सुरक्षा उपायों पर बल देते हुए दिशा-निर्देश प्रसारित किए।
  • अग्निशमन सेवाओं के विस्तार एवं आधुनिकीकरण हेतु योजना, 2023: केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2023 में शुरू की गई यह योजना 15वें वित्त आयोग द्वारा प्रेरित थी, जिसने वर्ष 2025-26 तक की अवधि के लिए राज्य स्तर पर अग्निशमन सेवाओं को बढ़ाने के लिए ₹5,000 करोड़ के आवंटन की सिफारिश की थी।
  • अग्नि सुरक्षा सप्ताह: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय देश भर में अग्नि निवारण और सुरक्षा प्रथाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 21 से 25 अप्रैल तक पूरे भारत में अग्नि सुरक्षा सप्ताह मनाता है।

अग्नि सुरक्षा मानकों को बनाए रखने में चुनौतियाँ

  • एक समान कानून का अभाव: चूँकि अग्निशमन सेवाओं का विनियमन राज्य स्तर पर होता है, इसलिए देश भर में सुरक्षा मानकों में विसंगतियाँ हैं।
    • अधिकांश राज्यों ने अपने कानूनों को मॉडल अग्नि अधिनियम (2019) के अनुरूप अद्यतन नहीं किया है, और अग्नि एवं जीवन सुरक्षा ऑडिट सहित NBC प्रावधान केवल अनुशंसात्मक हैं, समान रूप से लागू नहीं किए जाते हैं।
  • कमजोर सरकारी निगरानी: स्थानीय अधिकारियों द्वारा अपर्याप्त जाँच, निम्न-गुणवत्ता वाले निरीक्षण, दुर्लभ अनुवर्ती कार्रवाई और भ्रष्टाचार के कारण अग्नि सुरक्षा दिशा-निर्देशों का ठीक से पालन नहीं किया जाता है।
    • राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC) एक प्रमुख दिशा-निर्देश होने के बावजूद, इसके कई प्रावधानों की स्थानीय स्तर पर प्रायः अनदेखी की जाती है। यहाँ तक कि अनिवार्य सुरक्षा प्रमाणपत्रों की भी प्रायः अनदेखी की जाती है।
  • खराब शहरी नियोजन: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) के एक अध्ययन में बताया गया है कि शहरी क्षेत्रों में अपर्याप्त नियोजन और मानदंडों का खराब प्रवर्तन अग्नि संबंधी जोखिमों में प्रमुख योगदानकर्ता हैं।
    • कई मामलों में, अनौपचारिक बस्तियों को भवन उपनियमों और नियोजन नियमों से बाहर रखा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप अग्नि सुरक्षा की परवाह किए बिना विकास होता है।
  • अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन न करना: कई बड़ी आग लगने की घटनाओं के लिए बिल्डरों और निजी संस्थाओं द्वारा अग्नि सुरक्षा मानदंडों के उल्लंघन को जिम्मेदार ठहराया गया है।

आगे की राह

  • एक समान अग्नि सुरक्षा कानून: एक राष्ट्रीय अग्नि सुरक्षा कानून की तत्काल आवश्यकता है जो सभी राज्यों में एक समान अग्नि सुरक्षा नियमों को सुनिश्चित करे और सख्त प्रवर्तन तंत्र सुनिश्चित करना।
  • सरकारी निगरानी को मजबूत करना: यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी स्तरों पर अग्नि सुरक्षा मानदंडों का पालन किया जाए, निगरानी और गैर-अनुपालन के लिए दंड को बढ़ाया जाना चाहिए।
  • सुधारित शहरी नियोजन: शहरी नियोजन नीतियों में नियोजन चरण से ही अग्नि सुरक्षा उपायों को शामिल किया जाना चाहिए, विशेष रूप से उच्च घनत्व वाले शहरी क्षेत्रों और अनौपचारिक बस्तियों में।
  • डेटाबेस: डेटा-संचालित हॉटस्पॉट निरीक्षण तकनीकों का उपयोग करते हुए, अमेरिकी राष्ट्रीय अग्नि घटना रिपोर्टिंग प्रणाली (NFIRS) की तर्ज पर एक राष्ट्रीय अग्नि घटना रिपोर्टिंग प्रणाली (NFIRS-भारत) स्थापित करना।
  • जन जागरूकता अभियान: सामुदायिक भागीदारी के साथ-साथ राष्ट्रव्यापी अग्नि सुरक्षा जागरूकता अभियान, जोखिमों को कम करने और सुरक्षा मानकों के अनुपालन को प्रोत्साहित करने में मदद करेंगे।

निष्कर्ष

गोवा की त्रासदी और इसी तरह की घटनाएँ तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। इसके लिए व्यक्तिगत जाँचों के साथ-साथ अग्नि सुरक्षा नियमों के कार्यान्वयन में व्यवस्थित सुधारों की आवश्यकता है, जिसमें नियमित निरीक्षण, उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई, और भविष्य में जीवन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जन जागरूकता शामिल हो।

अभ्यास प्रश्न

हाल ही में गोवा में हुई अग्निकांड के संदर्भ में, उन प्रणालीगत शासन संबंधी कमियों का विश्लेषण कीजिए जो बार-बार होने वाली अग्निकांडों का कारण बनती हैं। भारत में अग्नि सुरक्षा अनुपालन को मजबूत करने के लिए आवश्यक संरचनात्मक सुधारों का सुझाव दीजिए।

संदर्भ

हाल के वर्षों में भारत में छात्रों की आत्महत्याओं में वृद्धि देखी गई है, जिससे स्कूलों की जवाबदेही, मानसिक-स्वास्थ्य प्रणालियों और दबाव आधारित शिक्षा संस्कृति में गहरी खामियाँ उजागर हुई हैं, जो बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा और गरिमा की अनदेखी करती रहती हैं।

भारत में छात्र आत्महत्याओं से संबंधित चिंताजनक आँकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के नवीनतम आँकड़े इस संकट की गंभीर स्थिति प्रस्तुत करते हैं:-

  • छात्र आत्महत्याओं में रिकॉर्ड वृद्धि: वर्ष 2023 में छात्र आत्महत्याओं की संख्या रिकॉर्ड 13,892 तक पहुँच गई।
    • NCRB के आँकड़ों के अनुसार, पिछले दस वर्षों में (वर्ष 2013 में 8,423 से) यह 65% की वृद्धि है।
  • राष्ट्रीय औसत से अधिक: छात्र आत्महत्याओं में वृद्धि दर राष्ट्रीय समग्र आत्महत्या दर (पिछले दशक में 27%) की वृद्धि से दोगुनी से भी अधिक है।
    • यह दर्शाता है कि युवा लोग अधिक जोखिम में हैं।

  • कम आयु में समस्या: यह समस्या अब 9-17 आयु वर्ग में सामने आ रही है, जो सभी स्तरों पर स्कूलों में तनाव और उपेक्षा को उजागर करता है।
  • क्षेत्रीय हॉटस्पॉट और अंतर: महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे उच्च जनसंख्या वाले राज्यों में यह संख्या सर्वाधिक है।
    • हालाँकि, केरल जैसे कुछ राज्यों में नियमों का 80% पालन हो रहा है, जिससे घटनाओं में 12% की गिरावट आई है। यह स्थिति उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से बहुत अलग है, जहाँ अनुपालन कम है।
  • मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की भारी कमी: भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की अत्यधिक कमी है, प्रति 100,000 लोगों पर केवल लगभग 0.75 मनोचिकित्सक हैं।
    • इससे मानसिक रोगों के उपचार में 70-92% का अत्यधिक अंतराल उत्पन्न हो जाता है।
  • आर्थिक और भविष्य के जोखिम: यह संकट भारत की उत्पादकता के लिए खतरा है, जिससे सकल घरेलू उत्पाद का एक से दो प्रतिशत प्रतिवर्ष का नुकसान हो सकता है। हस्तक्षेप के बिना, वर्ष 2032 तक छात्रों की आत्महत्याएँ वार्षिक रूप से 20 हजार से अधिक हो सकती हैं।
    • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में निहित प्रावधानों, सामाजिक एवं भावनात्मक अधिगम, तथा सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का सम्यक् कार्यान्वयन वर्ष 2035 तक मामलों की संख्या को आठ हजार से नीचे ला सकता है, जिससे वर्तमान प्रवृत्ति में लगभग 40 प्रतिशत का विपरीत संभावित है।

भारत में छात्र आत्महत्या के कारण

यह त्रासदी शैक्षणिक दबाव और प्रणालीगत असमानताओं के विषाक्त अंतर्संबंध से उत्पन्न होती है:-

  • संरचनात्मक और शैक्षणिक दबाव
    • अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धी शैक्षणिक दबाव: NEET और JEE जैसी परीक्षाओं में तीव्र प्रतिस्पर्द्धा, जो आक्रामक कोचिंग संस्कृति से प्रेरित है, एक प्रमुख मनोवैज्ञानिक तनाव है, जो समग्र निपुणता की तुलना में अंकों को प्राथमिकता देता है।
      • यह तनाव परीक्षा के समय में अत्यधिक महसूस किया जाता है, जिसके कारण तेलंगाना और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में परीक्षा के महीनों के दौरान आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।

    • संस्थागत और शिक्षक उत्पीड़न: हालिया मामले दंडात्मक संस्थागत संस्कृति को उजागर करते हैं, जहाँ शिक्षकों द्वारा सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना, धमकाना और कथित उत्पीड़न छात्रों की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं।
    • शोषण का सामान्यीकरण: मौखिक व्यंग्य, बहिष्कार और शारीरिक छेड़छाड़ को कर्मचारी प्रायः ‘सामान्य किशोर व्यवहार’ समझकर दुखद रूप से तुच्छ मान लेते हैं, जबकि वास्तविकता में ये गंभीर प्रतिकूल बचपन के अनुभव (ACE) होते हैं।।
      • UNICEF की बाल एवं किशोर मानसिक स्वास्थ्य सेवा मानचित्रण, भारत 2024 रिपोर्ट के अनुसार, 6.46% सामुदायिक बच्चे (जिनका मूल्यांकन उनके घरों और आस-पड़ोस में किया गया, स्कूलों में नहीं) और 23.33% स्कूली बच्चे और किशोर मानसिक विकारों से ग्रस्त हैं।
      • राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (वर्ष 2015-16) में पाया गया कि लगभग आठ से 1.1 करोड़ किशोरों को किसी भी समय मानसिक स्वास्थ्य उपचार की आवश्यकता होती है।
      • मानसिक स्वास्थ्य विकार (ACE) अठारह वर्ष की आयु से पहले होने वाली तनावपूर्ण या दर्दनाक घटनाओं को संदर्भित करते हैं जो बच्चे के भावनात्मक विकास, मस्तिष्क संरचना और दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों को गंभीर रूप से बाधित कर सकती हैं।
    • डिजिटल अतिउत्तेजना: सोशल मीडिया का डोपामाइन चक्र विकृत आत्म-छवि का निर्माण करता है और आवेगशीलता को बढ़ाता है, जिससे संकट प्रबंधन मुश्किल हो जाता है।
      • महामारी और उसके उपरान्त अनिवार्य रूप से स्क्रीन-समय में वृद्धि ने किशोरों के व्यवहार में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन उत्पन्न किए हैं, जिनमें सामाजिक अलगाव, भावनात्मक लचीलेपन में कमी तथा दीर्घकालिक चिंता जैसी स्थितियाँ प्रमुख रूप से उभरकर सामने आई हैं।
  • अंतर्विभागीय कमजोरियाँ
    • जाति और वर्ग हाशिए पर: SC/ST/OBC छात्रों को भेदभाव, आरक्षण के प्रतिकूल प्रभाव और आर्थिक अनिश्चितता के कारण 20-30% अधिक जोखिम का सामना करना पड़ता है।
    • लैंगिक असमानताएँ: छात्राओं में आत्महत्याओं में 7% (वर्ष 2021-22) की वृद्धि हुई, जो पितृसत्तात्मक दबाव, सामाजिक उपेक्षा, प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी वर्जनाओं और विवाह संबंधी अपेक्षाओं को दर्शाती है, कुल छात्र आत्महत्याओं में 47% छात्राओं से संबंधित थीं।
    • ग्रामीण-शहरी और LGBTQ+ अंतर: ग्रामीण आत्महत्याएँ सीमित परामर्श पहुँच के कारण होती हैं, जबकि समलैंगिक युवाओं को सामाजिक उपेक्षा और पारिवारिक अस्वीकृति के कारण अत्यधिक सुभेद्यता का सामना करना पड़ता है।
    • पारिवारिक स्तर पर भावनात्मक रिक्तता: संयुक्त परिवारों का विखंडन, माता-पिता के कार्य के दबाव, एकलीकरण और डिजिटल विकर्षण के साथ मिलकर एक भावनात्मक रिक्तता उत्पन्न करता है जहाँ बच्चे अपने दुख को आत्मसात कर लेते हैं।

भारत में छात्र संरक्षण के लिए कानूनी और संवैधानिक आधार

भारत में संरक्षण संबंधी संस्थागत ढाँचा यद्यपि निरंतर विकसित हो रहा है, परंतु अब न्यायपालिका द्वारा इसे सशक्त रूप से सुदृढ़ किया गया है:-

  • राष्ट्रीय रणनीति: राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (NSPS, 2022) का लक्ष्य वर्ष 2030 तक आत्महत्या से होने वाली मौतों में 10% की कमी लाना है।
    • हालाँकि, यह लक्ष्य सतत् विकास लक्ष्य 3.4 के तहत समय से पहले मृत्यु दर में 33% की कमी लाने के लक्ष्य से कम है।
  • हेल्पलाइन सेवा: टेली-मानस, निःशुल्क, 24/7 मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान करती है, और इसकी शुरुआत के बाद से अब तक 29.75 लाख से अधिक कॉल प्राप्त हुई हैं।

सुकदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (जुलाई 2025) में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

  • संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 21)
    • मानसिक स्वास्थ्य एक मौलिक अधिकार: न्यायालय ने स्पष्ट रूप से घोषित किया कि मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक कल्याण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और सम्मान के अधिकार का एक अभिन्न अंग हैं।
    • संरचनात्मक जवाबदेही: यह निर्णय मानसिक स्वास्थ्य को एक वैधानिक अधिकार (मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के तहत) से एक संवैधानिक दायित्व में बदल देता है, जिससे राज्य और शैक्षणिक संस्थान उन प्रणालीगत विफलताओं के लिए जवाबदेह बन जाते हैं जिनसे छात्रों को परेशानी होती है।
  • मुख्य बाध्यकारी दिशा-निर्देश (साहा दिशा-निर्देश): न्यायालय ने सभी शैक्षणिक संस्थानों, छात्रावासों और कोचिंग सेंटर्स के लिए बाध्यकारी निर्देश जारी किए, जो संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक अनुच्छेद 141 के तहत कानून के रूप में लागू रहेंगे।
निर्देश श्रेणी मूल अधिदेश
परामर्शदाता पहुँच 100 से अधिक छात्रों वाले संस्थानों को कम-से-कम एक योग्य परामर्शदाता/मनोवैज्ञानिक नियुक्त करना होगा। छोटे संस्थानों को रेफरल लिंकेज स्थापित करने होंगे।
निषिद्ध प्रथाएँ सार्वजनिक रूप से उपेक्षा करने, प्रदर्शन के आधार पर बैच में विभाजन करने तथा असंगत शैक्षणिक लक्ष्य निर्धारित करने पर प्रतिबंध लगाना।
कर्मचारियों का प्रशिक्षण मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा, संकटकालीन संकेतों की पहचान, तथा भेदभाव रहित सहायता (विशेष रूप से SC/ST, OBC, तथा LGBTQ+ छात्रों के लिए) में सभी कर्मचारियों के लिए अनिवार्य द्वि-वार्षिक प्रशिक्षण।
कैम्पस सुरक्षा आवासीय संस्थानों में ‘छेड़छाड़-रोधी छत वाले पंखों’ को लगाना तथा उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों (विशेषकर छतों) तक पहुँच पर कठोर प्रतिबंध आवश्यक है।
जवाबदेही और न्याय भेदभाव और उत्पीड़न के लिए गोपनीय शिकायत निवारण प्रणालियों का निर्माण अनिवार्य किया गया, तथा यदि उपेक्षा के कारण आत्म-क्षति होती है तो प्रशासन को संस्थागत दोष के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा।

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आत्महत्या रोकथाम के लिए प्रमुख वैश्विक पहल

पहल मुख्य फोकस और प्रमुख हस्तक्षेप भारत की प्रासंगिकता/अंतर
WHO का लाइव लाइफ पैकेज
  • राष्ट्रीय रणनीतियों के लिए वैश्विक, साक्ष्य-आधारित रोडमैप।
  • चार मुख्य कार्य (L-I-F-E)
    • साधनों तक पहुँच सीमित करना (छेड़छाड़-रोधी पंखे, आग्नेयास्त्र, कीटनाशक)।
    • मीडिया के साथ वार्ता करना (वेर्थर प्रभाव की तुलना में पापागेनो प्रभाव)।
    • जीवन-कौशल को बढ़ावा देना (स्कूलों में सामाजिक और भावनात्मक शिक्षा (SEL)।
    • प्रारंभिक पहचान (गेटकीपर प्रशिक्षण और अनुवर्ती कार्रवाई)
  • छह आधारभूत स्तंभ
    • स्थिति विश्लेषण (डेटा संग्रह और निगरानी)।
    • बहुक्षेत्रीय सहयोग (स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम, मीडिया और न्याय क्षेत्रों को शामिल करते हुए)।
    • जागरूकता और समर्थन में वृद्धि करना।
    • क्षमता निर्माण (कर्मचारियों और समुदाय को प्रशिक्षण देना)।
    • वित्तपोषण (पर्याप्त बजट आवंटित करना)।
    • निगरानी, ​​अनुवीक्षण और मूल्यांकन।
  • भारत की राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (NSPS) का खाका।
  • यह पाठ्यक्रम, सामुदायिक प्रशिक्षण और मीडिया दिशा-निर्देशों के लिए राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (NSPS) के लक्ष्यों को सीधे प्रभावित करता है।
  • अंतर-मंत्रालयी सहयोग और मानसिक स्वास्थ्य बजट में 0.5% की वृद्धि की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य (SDG) लक्ष्य 3.4: गैर-संचारी रोगों (NCD) (आत्महत्या सहित) से होने वाली असामयिक मृत्यु दर को वर्ष 2030 तक एक तिहाई (33%) तक कम करना। भारत का NSPS लक्ष्य (वर्ष 2030 तक 10% की कमी) वैश्विक SDG लक्ष्य की तुलना में अत्यधिक कम महत्त्वाकांक्षी है, जिसके लिए त्वरित प्रयास और निवेश की आवश्यकता है।
शैक्षणिक एवं संस्थागत (WHO/WMH)
  • विश्व मानसिक स्वास्थ्य-अंतरराष्ट्रीय कॉलेज छात्र (WMH-ICS) पहल: कॉलेज के छात्रों पर वैश्विक शोध, ताकि लागत-प्रभावी, वेब-आधारित हस्तक्षेप विकसित किए जा सकें।
  • अंतरराष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम संघ (IASP): वैश्विक गैर-सरकारी संगठन (NGO) जो अनुसंधान, संकट प्रणालियों और आत्महत्या के गैर-अपराधीकरण का समर्थन करता है।

डिजिटल और टेली-परामर्श सेवाओं (जैसे-टेली मेंटल हेल्थ असिस्टेंस एंड नेटवर्किंग एक्रॉस स्टेट्स [टेली-मानस]) के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है और भारत में आत्महत्या के गैर-अपराधीकरण (मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (MHCA) 2017) को प्रभावित करता है।

WHO-UNICEF संयुक्त कार्यक्रम

किशोरों को आगे बढ़ने में मदद करना: किशोरों (10-19 वर्ष) की मानसिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करने और आत्म-क्षति को रोकने के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा प्रणाली की क्षमता को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

यह विद्यालयी स्तर (9-17 आयु वर्ग) पर रोकथाम शुरू करने की आवश्यकता पर बल देता है, जो भारत के लिए एक प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र है।

छात्र आत्महत्याओं के विरुद्ध भारत के प्रयासों को कमजोर करने वाली प्रणालीगत बाधाएँ

  • नीतिगत कार्यान्वयन और प्रशासन में कमियाँ: सबसे बड़ी बाधा न्यायिक आदेशों और राष्ट्रीय रणनीतियों को प्रभावी कार्रवाई में बदलने में विफलता है, जिसका मुख्य कारण खराब अनुपालन और कम धन है।
    • महत्त्वपूर्ण अनुपालन कमियाँ: अनुमानतः केवल 40-50% विद्यालय ही योग्य परामर्शदाता नियुक्त करने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हैं।
      • निजी कोचिंग सेंटरों में नियमों का पालन सबसे कम होता है। इसी वजह से वहाँ बच्चों को सबके सामने डाँटकर शर्मिंदा करना और ‘अलग-अलग बैचों में बाँटकर भेद-भाव करना’ जैसी गलत परंपराएँ अभी भी बनी रहती हैं।
    • वित्त पोषण में भारी कमी: मानसिक स्वास्थ्य को भारत के स्वास्थ्य बजट का केवल 0.5% ही मिलता है।
      • वित्त पोषण में इस भारी कमी के कारण राष्ट्रीय योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना, बुनियादी ढाँचे का विस्तार करना या आवश्यक पेशेवरों को नियुक्त करना असंभव हो जाता है।
  • प्रभावकारिता बनाम लक्ष्य: राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (NSPS) का वर्ष 2030 तक 10% कमी का लक्ष्य, वर्तमान बढ़ती प्रवृत्ति और कमजोर कार्यान्वयन को देखते हुए, अत्यधिक महत्त्वाकाँक्षी है।
    • इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में टेली-मानस की कम पहुँच, लाखों कॉल्स के प्रबंधन के बावजूद, इसकी प्रभावकारिता को कमजोर करती है।
    • अंतर-मंत्रालयी कमजोर समन्वय: प्रभावी रोकथाम के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक न्याय मंत्रालयों के बीच सुव्यवस्थित सहयोग की आवश्यकता होती है, जो एक सतत् प्रशासनिक चुनौती बनी हुई है।
    • योजनाओं को क्रियान्वित करने में चुनौतियाँ: अधिकांश स्कूलों में गोपनीय प्रकटीकरण के लिए सुरक्षित स्थान, समर्पित मानसिक-स्वास्थ्य बजट और मजबूत साक्ष्य-आधारित भावनात्मक-साक्षरता कार्यक्रमों का अभाव है।
  • संस्थागत एवं सांस्कृतिक बाधाएँ प्रचलित शैक्षणिक संस्कृति तनाव को सामान्य रूप में स्थापित कर और संस्थागत नैतिकता के अभाव में इस संकट में सक्रिय रूप से योगदान देती हैं।
    • विषाक्तता का सामान्यीकरण: दंडात्मक अनुशासन और अत्यधिक शैक्षणिक दबाव, हमारे समाज में बहुत गहराई से जड़ जमा चुका है। इसकी वजह से बच्चे खुद को ही गलत मानने लगते हैं और किसी से मदद माँगने में शर्म या डर महसूस करते हैं।।
    • रटंत सीखने पर ध्यान: अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धी परीक्षा संस्कृति (NEET/JEE) समग्र विकास की तुलना में अंकों को प्राथमिकता देती है, जिससे छात्रों की चिंता और आत्महत्या का जोखिम सीधे तौर पर बढ़ जाता है।
    • संस्थागत जवाबदेही का अभाव: हालिया न्यायिक आदेशों से पहले, संस्थागत प्रशासन को लापरवाही (जैसे- अनिवार्य परामर्शदाता प्रदान करने में विफलता) के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी ठहराने के लिए बहुत कम तंत्र मौजूद थे।
  • डेटा, डिजिटल और संक्रामक जोखिम: आधुनिक खतरे (खराब निगरानी से लेकर डिजिटल जोखिम तक) रोकथाम प्रयासों के लिए नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं।
    • खंडित डेटा और निगरानी: NCRB के बुनियादी आँकड़ों से परे विश्वसनीय डेटा खंडित है, जिससे लक्षित, साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण और उच्च-जोखिम वाले समूहों की सटीक निगरानी में बाधा आती है।
    • डिजिटल अधिभार और संक्रामकता: लगातार डिजिटल दबाव, साथ ही छात्र आत्महत्याओं की अनियमित या सनसनीखेज मीडिया कवरेज, सामूहिक आत्महत्याओं (वर्थर प्रभाव) को जन्म दे सकता है, एक ऐसा जोखिम जिसकी निगरानी और नियंत्रण करना मुश्किल है।
  • अंतर्विभागीय कमजोरियाँ: व्यवस्थागत असमानताएँ यह सुनिश्चित करती हैं कि हाशिए पर स्थित समूहों को संकट का असमान बोझ उठाना पड़े।
    • भेदभाव और बहिष्कार: अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग पृष्ठभूमि के छात्रों को जाति-आधारित भेदभाव और आर्थिक अनिश्चितता के कारण अत्यधिक जोखिम का सामना करना पड़ता है, जिसे प्रायः सामान्य सहायता कार्यक्रमों द्वारा अनदेखा कर दिया जाता है।
    • लैंगिक और पहचान संबंधी उपेक्षा: छात्राओं पर थोपे जाने वाली पितृसत्तात्मक अपेक्षाएँ तथा LGBTQ+ युवाओं को सामना करनी पड़ने वाली गहन सामाजिक उपेक्षाकारी स्थितियाँ, ऐसी संरचनात्मक कमजोरियाँ उत्पन्न करती हैं जिनके लिए विशेष और संवेदनशील हस्तक्षेप आवश्यक हैं, परंतु वर्तमान व्यवस्था में उनका स्पष्ट अभाव है।

आगे की राह

इस संकट से निपटने के लिए भारत के भविष्य को सुरक्षित करने हेतु एक समग्र, संरचनात्मक सुधार के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

  • संरचनात्मक सुधार: छात्र आत्महत्या संकट से निपटने के लिए सभी स्तरों पर व्यापक संरचनात्मक परिवर्तनों की आवश्यकता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि भारत के भावी कार्यबल और कल्याण की सुरक्षा हो।
  • जवाबदेही और स्कूल सुधार: न्यायिक प्रवर्तन त्वरित होना चाहिए, और संस्थागत दोषसिद्धि के तहत स्कूलों को परामर्शदाताओं की नियुक्ति में विफलता सहित उपेक्षा के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।
    • परीक्षा संबंधी तनाव को कम करने के लिए पाठ्यक्रमों में समग्र मूल्यांकन और अनिवार्य सामाजिक एवं भावनात्मक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
    • तमिलनाडु के हैप्पीनेस करिकुलम और केरल के स्टूडेंट पुलिस कैडेट और ऑपरेशन ‘सुकून’ जैसे कार्यक्रम 10 से 15 प्रतिशत कम तनाव दर्शाते हैं, और मापनीय मॉडल प्रस्तुत करते हैं।
    • राज्य सरकारों को कोचिंग सेंटर विनियमन दिशा-निर्देशों (2024) को सख्ती से लागू करना चाहिए, विशेष रूप से अनिवार्य छात्रावास में रहने और 16 वर्ष से कम आयु के छात्रों के प्रवेश जैसी प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाना चाहिए ताकि छोटे छात्रों पर प्रतिस्पर्द्धात्मक दबाव कम हो सके।
    • स्कूलों को किशोर न्याय (JJ) अधिनियम और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) मानदंडों के तहत बाल संरक्षण समितियों का गठन अनिवार्य रूप से करना चाहिए ताकि समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट किया जा सके।
    • उच्च-स्तरीय परीक्षाओं की जगह चरणबद्ध मूल्यांकन और परियोजना-आधारित शिक्षण को अपनाया जाना चाहिए, जिससे रटने की आदत से हटकर समग्र निपुणता पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।
    • परीक्षा-पूर्व तनाव को कम करने के लिए, स्कूलों को होमवर्क सीमित करना चाहिए, कोचिंग के दबाव को नियंत्रित करना चाहिए और परीक्षा कार्यक्रम के निकट अनिवार्य ‘बफर दिन’ सुनिश्चित करने चाहिए।
  • शिक्षक और समुदाय सशक्तीकरण: सभी शिक्षकों के लिए मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए।
    • माता-पिता, मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सामुदायिक संरक्षक के रूप में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जिससे जोखिम कम हो और प्रारंभिक सहायता प्रदान की जा सके।
    • फिनलैंड जैसे अंतरराष्ट्रीय मॉडल, सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से युवाओं की आत्महत्याओं में 25 प्रतिशत की कमी दर्शाते हैं।
  • नवाचार और बहु-क्षेत्रीय शासन: शिक्षा मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बीच सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निधि बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा में सहायक हो सकती है, जबकि AI चैटबॉट और पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण प्रारंभिक चेतावनी संकेतों का पता लगा सकते हैं।
    • जिम्मेदार मीडिया रिपोर्टिंग, पापागेनो प्रभाव की नकल करते हुए, आत्महत्याओं की घटनाओं को रोक सकती है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 10 से 13 प्रतिशत की कमी देखी गई है।
    • शिक्षा मंत्रालय को, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सहयोग से, डिजिटल सुरक्षा दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप देना चाहिए और स्क्रीन समय को नियंत्रित करने और ऑनलाइन शैक्षणिक चिंता को प्रबंधित करने के लिए डिजिटल डिटॉक्स कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए।

निष्कर्ष

जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, ‘एक अच्छे घर के बराबर कोई स्कूल नहीं है और एक अच्छे अभिभावक के बराबर कोई शिक्षक नहीं है।’ राज्य को एक अच्छे अभिभावक की तरह कार्य करना चाहिए और बच्चों को निराशा से बचाना चाहिए। इस समस्या के चलते भारत प्रत्येक दिन 38 प्रतिभाशाली युवाओं को खो देता है।

  • यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह खामोश महामारी भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश की 8-10 वर्ष की अवधि को नष्ट कर देगी और तत्काल, मिशन-मोड सुधारों के बिना वर्ष  2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य असंभव हो जाएगा। जब शिक्षा वास्तव में घुटन उत्पन्न करने के बजाय मुक्ति प्रदान करेगी, तभी टैगोर के स्वतंत्रता के स्वर्ग का वास्तविक उदय होगा।

अभ्यास प्रश्न 

विद्यार्थियों की भावनात्मक कल्याण की रक्षा में विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। विद्यार्थियों की बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनजर, शिक्षा प्रणाली में जवाबदेही और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए किन संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है?

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