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Dec 11 2025

चराईचुंग रॉयल पक्षी अभयारण्य

चराइचुंग उत्सव असम के माजुली में आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य एशिया के पहले संरक्षित रॉयल पक्षी अभयारण्य को पुनर्स्थापित करना है।

‘चराइचुंग’ उत्सव के बारे में

  • इस उत्सव का दूसरा संस्करण 7 से 10 दिसंबर तक असम के माजुली में आयोजित किया गया।
  • इसका आयोजन माजुली साहित्य सभा और स्थानीय समुदायों द्वारा किया गया था।
  • उद्देश्य: लगभग विलुप्त हो चुके ‘चराइचुंग’ रॉयल पक्षी अभयारण्य का पुनरुद्धार और संरक्षण करना।

‘चराइचुंग’ रॉयल पक्षी अभयारण्य

  • 1633 ईस्वी में अहोम राजा स्वर्गदेव प्रताप सिंह द्वारा स्थापित।
  • यह एशिया का पहला संरक्षित पक्षी अभयारण्य था।
  • यह विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप और भारत के प्रमुख पक्षी आवास माजुली द्वीप पर अवस्थित है।
  • यह अभयारण्य लगभग 150 प्रजातियों के स्थानीय और प्रवासी पक्षियों का आवास है और इसका महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है।

माजुली द्वीप

  • यह असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप है।
  • माजुली को वर्ष 2016 में भारत का पहला द्वीपीय जिला घोषित किया गया था।
  • ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों सुबनसिरी और खेरकुटिया शुती के द्वारा निर्मित यह द्वीप, ब्रह्मपुत्र नदी पर स्थित है।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के बारे में

  • प्रारंभिक जीवन: 10 दिसंबर, 1878 को जन्मे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी एक प्रख्यात भारतीय राजनेता थे।
  • लोकप्रिय रूप से राजाजी के नाम से प्रसिद्ध, उन्हें एक स्वतंत्रता सेनानी, विचारक, लेखक और राजनेता के रूप में याद किया जाता है।
  • स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश: वर्ष 1919 में महात्मा गांधी से मिलने के बाद, उन्होंने वकालत छोड़कर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए और गांधी के करीबी सहयोगी बन गए।
  • राष्ट्रीय आंदोलनों में महत्त्वपूर्ण भूमिका: राजगोपालाचारी प्रमुख भारतीय स्वतंत्रता संग्रामों में सक्रिय भागीदार थे। उनकी भागीदारी में शामिल हैं:
    • रॉलेट एक्ट के विरुद्ध विरोध
    • असहयोग आंदोलन
    • वायकॉम सत्याग्रह
    • सविनय अवज्ञा आंदोलन
    • स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी के कारण वर्ष 1912 से वर्ष 1941 के मध्य वे पाँच बार कारावास में रहे।
    • वर्ष 1922 में गांधीजी के जेल में रहने के दौरान ‘यंग इंडिया’ के संस्करण का संपादन भी किया।
  • राजनीतिक करियर और शासन
    • पूर्व मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रीमियर के रूप में कार्य किया।
    • स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल (वर्ष 1948–1950) बने, और इस पद पर आसीन होने वाले एकमात्र भारतीय थे।
    • बाद में उन्होंने मुक्त बाजार समर्थक तथा कांग्रेस-विरोधी विकल्प के रूप में इंडिपेंडेंस पार्टी की स्थापना की।
  • विरासत और सम्मान: उन्हें वर्ष 1954 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

समाचारों में स्थान: तंजानिया

तंजानिया में संभावित सरकार-विरोधी प्रदर्शनों से पहले प्रमुख शहरों में पुलिस और सैन्य बलों की गश्त के साथ सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है।

तंजानिया में हालिया चुनाव-विरोधी प्रदर्शन

  • विवादित चुनाव से शुरुआत: तंजानिया में 29 अक्टूबर, 2025 को आम चुनाव के दिन से व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।
  • प्रदर्शनकारियों ने इस प्रक्रिया को ‘फर्जी चुनाव’ करार दिया क्योंकि प्रमुख विपक्षी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था।
  • राष्ट्रपति सामिया सुलुहू हसन को विजेता घोषित किया गया।
  • हिंसक सरकारी कार्रवाई: सरकार ने विरोध प्रदर्शनों का जवाब कठोर कार्रवाई से दिया।
  • लगातार जारी राजनीतिक संकट: संकट अभी भी कम नहीं हुआ है। सैकड़ों लोगों पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए हैं, और सरकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने तथा विरोध प्रदर्शनों को गैरकानूनी घोषित करने की अपनी कार्रवाई जारी रखे हुए है।

तंजानिया के बारे में

  • तंजानिया, जिसका आधिकारिक नाम संयुक्त गणराज्य तंजानिया है, पूर्वी अफ्रीका का एक देश है जो भूमध्य रेखा के ठीक दक्षिण में स्थित है।
  • इसका गठन वर्ष 1964 में तंजानिया और जांजीबार के विलय से हुआ था।
  • पड़ोसी देश: उत्तर में केन्या और युगांडा; पश्चिम में बुरुंडी, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और रवांडा; दक्षिण में जाम्बिया, मलावी और मोजाम्बिक।
  • निकट स्थित जल निकाय: उत्तर में विक्टोरिया झील, पूर्व में हिंद महासागर, पश्चिम में तांगानिका झील और दक्षिण-पश्चिम में न्यासा झील।
  • राजधानी: आधिकारिक राजधानी डोडोमा है (वर्ष 1974 से), जबकि दार एस सलाम सबसे बड़ा शहर, बंदरगाह और आर्थिक केंद्र बना हुआ है।
  • अफ्रीका की सबसे ऊँची चोटी माउंट किलिमंजारो (5,895 मीटर) और विश्व की सबसे गहरी झीलों में से एक तांगानिका झील तंजानिया में स्थित हैं। 

सेन्ना स्पेक्टेबिलिस (Senna Spectabilis)

पश्चिमी घाट के प्रमुख वनों में विस्तृत आक्रामक प्रजाति सेन्ना स्पेक्टेबिलिस को समाप्त करने के लिए तमिलनाडु ने एक राज्यव्यापी अभियान प्रारंभ किया है।

‘सेन्ना स्पेक्टाबिलिस’ के बारे में

  • यह एक तीव्र गति से बढ़ने वाला, पीले फूलों वाला वृक्ष है जो ‘लेग्यूम’ फैमिली से संबंधित है और भारत के पश्चिमी घाट में एक प्रमुख आक्रामक विदेशी प्रजाति बन चुका है।
  • मूल आवास: दक्षिण और मध्य अमेरिका, विशेष रूप से ब्राजील, अर्जेंटीना, पराग्वे, बोलीविया, पेरू और वेनेजुएला।

मुख्य विशेषताएँ

  • 7–18 मीटर ऊँचे सघन, ऊँचे झुरमुट का निर्माण करता है, जिनकी सघन कैनोपी नीचे की वनस्पति को दबा देती है।
  • लंबी फलियों में अत्यधिक बीज होते हैं, जिससे यह तेजी से प्रसारित हो जाता है।
  • शुष्क आर्द्र पर्णपाती वनों, सवाना क्षेत्रों तथा सूर्यप्रकाश आधारित खुले आवासों में, यहाँ तक कि निम्नीकृत मृदा में भी सहजता से पनपता है।

पारिस्थितिकीय खतरे

  • जैव विविधता ह्रास: यह अकेले ही पूरे क्षेत्र पर अधिकार कर लेता है, स्थानीय पौधों को समाप्त कर प्राकृतिक वनों की पुनर्प्राप्ति में बाधा डालता है।
  • वन्यजीवों पर प्रभाव: हाथी, हिरण आदि शाकाहारी जीवों के चारे में कमी लाता है, जिससे उनके आवागमन और भोजन व्यवहार प्रभावित होते हैं।
  • अग्नि का जोखिम: जैव-भार की अधिकता से वनाग्नि की संवेदनशीलता बढ़ती है।
  • आवास क्षरण: पारिस्थितिक तंत्र की संरचना परिवर्तित करता है और स्थानीय प्रजातियों की पुनर्प्राप्ति को धीमा करता है।

तमिलनाडु के उन्मूलन अभियान का महत्व

  • भारत के सबसे बड़े आक्रामक प्रजाति-उन्मूलन कार्यक्रमों में से एक, जिसका लक्ष्य वर्ष 2026 तक 2,446 हेक्टेयर क्षेत्र से सेन्ना स्पेक्टाबिलिस का पूर्ण उन्मूलन है।
  • आक्रामक पौधों के उन्मूलन एवं पुनर्स्थापन नीति के राज्य-स्तरीय क्रियान्वयन का उत्कृष्ट उदाहरण।
  • हाथी और बाघ परिदृश्यों में दीर्घकालिक आवास पुनर्प्राप्ति हेतु स्थानीय घासों और झाड़ियों के साथ पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन का समावेश।

ओरंगुटान (Orangutans)

चक्रवात-जनित बाढ़ और भूस्खलन ने उत्तर सुमात्रा के वनों को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है, जिसके कारण तपानुली ओरंगुटान आबादी को अपने प्राकृतिक आवासों से बाहर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

ओरंगुटान के बारे में

  • ओरंगुटान अत्यंत बुद्धिमान वानर प्रजाति हैं, जो उन्नत समस्या-समाधान क्षमता, सांस्कृतिक शिक्षण और जटिल उपकरण-उपयोग के लिए प्रसिद्ध हैं। इनकी संज्ञानात्मक क्षमता मनुष्यों के सबसे निकट मानी जाती है।
  • प्रजातियाँ: WWF के अनुसार, तीन प्रजातियाँ मौजूद हैं:-
    • बोर्नियन, सुमात्रन और तपनुली
  • आवास: ये बोर्नियो (इंडोनेशिया और मलेशिया) तथा सुमात्रा (इंडोनेशिया) के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में पाए जाते हैं। जबकि तपानुली प्रजाति एक लघु, पर्वतीय वन क्षेत्र तक सीमित है।
  • मुख्य विशेषताएँ: सभी प्रजातियों में घने लाल रंग के बाल होते हैं, जबकि सुमात्रा के ओरंगुटानों के चेहरे के बाल लंबे होते हैं।
  • यह मुख्यतः वृक्षवासी (आर्बोरियल) होते हैं और भोजन तथा सुरक्षा के लिए वृक्षों की शाखाओं के बीच प्रसारित होते हैं।
    • सुमात्राई प्रजाति बोर्नियन ओरंगुटानों की अपेक्षा अधिक सामाजिक बंधन स्थापित करतीहै।
  • औजारों का उपयोग करने की क्षमता: ओरंगुटान औजारों के निर्माण में उल्लेखनीय नवाचार प्रदर्शित करते हैं, जैसे कि जाँच के लिए छड़ियों का उपयोग करना, हथौड़ा मारने के लिए पत्थरों का उपयोग करना, कीड़ों को काटने या निकालने के लिए तेज औजार बनाना, और माताओं या साथियों से दूरदर्शिता और सांस्कृतिक शिक्षा का प्रदर्शन करना।
  • आहार: इनका आहार मुख्यतः जंगली फलों पर आधारित होता है, जिसमें अंजीर, लीची और ड्यूरियन शामिल हैं।
  • IUCN स्थिति: गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered)

मुख्य खतरे

  • वनों की तीव्र कटाई, खनन और आवास विखंडन से वृक्ष-छत्र (कैनोपी) विखंडित हो रहे हैं, जिससे बाढ़ के प्रभाव बढ़ जाते हैं और ओरंगुटान का सुरक्षित आवागमन सीमित हो जाता है, यह उनके विलुप्ति संबंधी जोखिम को गंभीर रूप से बढ़ाता है।
    • आवास की हानि उन्हें भूमि पर उतरने के लिए मजबूर करती है, जिससे उनकी संवेदनशीलता और तनाव दोनों बढ़ते हैं।

पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरा WHO वैश्विक शिखर सम्मेलन

भारत, नवाचार और साक्ष्य-आधारित पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देने के लिए दिसंबर 2025 में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले दूसरे WHO वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन की सह-मेजबानी करेगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पारंपरिक चिकित्सा पर वैश्विक शिखर सम्मेलन के बारे में

  • पारंपरिक चिकित्सा पर वैश्विक शिखर सम्मेलन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के नेतृत्व वाला एक प्लेटफार्म है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के भीतर साक्ष्य-आधारित पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा को मजबूत करने के लिए देशों को एक साथ लाता है।
  • उद्देश्य 
    • इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा को वैज्ञानिक मान्यता प्रदान करना, नवाचार को बढ़ावा देना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में इसका सुरक्षित एकीकरण सुनिश्चित करना है।
    • इसका मुख्य लक्ष्य अनुसंधान को बढ़ावा देना, नियामक ढाँचों को सुदृढ़ करना और जैव विविधता एवं स्वदेशी ज्ञान संरक्षण पर वैश्विक सहयोग को बेहतर बनाना है।
    • यह सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज और स्वास्थ्य संबंधी सतत् विकास लक्ष्यों का समर्थन करता  है।
  • प्रतिभागी: इस शिखर सम्मेलन में वैश्विक नेतृत्त्वकर्त्ता, मंत्री, नीति निर्माता, शोधकर्ता, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, चिकित्सक और शैक्षणिक एवं उद्योग क्षेत्रों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं।

पहला शिखर सम्मेलन और उसका परिणाम

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का पहला वैश्विक शिखर सम्मेलन अगस्त 2023 में गुजरात के गांधीनगर में आयोजित किया गया था, जिसकी सह-मेजबानी WHO और भारत सरकार ने की थी।
  • इस शिखर सम्मेलन ने साक्ष्य-आधारित पारंपरिक चिकित्सा को स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करने की वैश्विक पहल की शुरुआत की।
  • शिखर सम्मेलन में गुजरात घोषणापत्र जारी किया गया, जो अनुसंधान, विनियमन, स्थिरता, डिजिटल स्वास्थ्य को अपनाने और पारंपरिक चिकित्सा के जिम्मेदार उपयोग के लिए प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करने वाली एक वैश्विक कार्यसूची है।

पारंपरिक चिकित्सा

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पारंपरिक चिकित्सा (TM) को विभिन्न संस्कृतियों के ज्ञान, कौशल और प्रथाओं के समग्र समूह के रूप में परिभाषित करता है, जो सिद्धांतों, मान्यताओं और अनुभवों पर आधारित है और जिसका उपयोग स्वास्थ्य बनाए रखने और शारीरिक/मानसिक रोगों के उपचार के लिए किया जाता है। यह जैव चिकित्सा से अलग है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से विकसित हो रही है।
    • उदाहरण: आयुर्वेद (भारत), एक्यूपंक्चर/जड़ी-बूटियों सहित पारंपरिक चीनी चिकित्सा (TCM), यूनानी (ग्रीक-अरबी मूल), सिद्ध (दक्षिण भारत) और काम्पो (जापान)।
  • यह समग्र, प्रकृति-आधारित है, तथा संतुलन (मन, शरीर, पर्यावरण) पर जोर देता है तथा इसमें आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ पौधों पर आधारित उपचार (जैसे हर्बल चिकित्सा) और आध्यात्मिक/मैनुअल थेरेपी शामिल हैं।

महत्व: यह शिखर सम्मेलन वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पारंपरिक चिकित्सा में वैश्विक विश्वसनीयत को मजबूत करता है और पारंपरिक उपचार प्रणालियों के भविष्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य एकीकरण को आकार देने में भारत के नेतृत्व को सुदृढ़ करता है।

संदर्भ 

‘न्यूरोटेक्नोलॉजी’ एक नया क्षेत्र है, जो मस्तिष्क के क्रियाकलापों को समझने और उसे आकार देने की मानवीय क्षमता का विस्तार करेगा, यह महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है, पर साथ ही कई नैतिक, कानूनी और सामाजिक चिंताएँ भी उत्पन्न करता है।

‘न्यूरोटेक्नोलॉजी’ के बारे में

  • परिभाषा: ‘न्यूरोटेक्नोलॉजी’ ऐसे यांत्रिक उपकरणों का उपयोग करती है, जो प्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क की गतिविधि के साथ संपर्क करते हैं और उसे प्रभावित करते हैं। इस क्षेत्र का मुख्य आधार ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) है। 
  • ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) के बारे में: यह एक मुख्य तकनीक है जो मस्तिष्क के संकेतों को डिजिटल निर्देशों में परिवर्तित करती है।
  • कार्य: न्यूरल संकेतों को डिकोड कर उन्हें ऐसे निर्देशों में बदलना, जिनसे उपकरणों (जैसे- कंप्यूटर कर्सर, रोबोटिक आर्म) को नियंत्रित किया जा सके।
  • प्रकार: इसमें हाई सेंसर (जैसे- EEG हेडसेट) और प्रत्यारोपित इलेक्ट्रोड (उच्च सटीकता हेतु) शामिल है।
  • अनुप्रयोग
    • चिकित्सकीय: लकवाग्रस्त रोगियों में गतिशीलता और संप्रेषण बहाल करना (न्यूरोप्रोस्थेटिक्स) और अवसाद या पार्किंसन रोग जैसे विकारों के उपचार हेतु लक्षित न्यूरल उत्तेजन में सहायक है।
    • नैदानिक: मस्तिष्क संबंधी विकारों और संज्ञानात्मक क्षमता का अध्ययन करने में सहायक है।
  • वर्तमान केंद्रण: मानव उपयोग मुख्यतः चिकित्सकीय, पुनर्वास और मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित है।

भारत के लिए ‘न्यूरोटेक्नोलॉजी’ का महत्त्व

  • उच्च न्यूरोलॉजिकल रोग भार: भारत में गैर-संक्रामक और चोट से संबंधित तंत्रिका संबंधी विकारों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है, जिनमें ‘स्ट्रोक’ का सबसे बड़ा योगदान है (वर्ष 1990 और 2019 के मध्य)।
  • प्रभावी कार्यक्षमता: न्यूरोप्रोस्थेटिक्स लकवाग्रस्त नागरिकों के लिए गतिशीलता और संचार क्षमता को पुनस्थापित कर सकते हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य: लक्षित न्यूरल उत्तेजन, दीर्घकालिक दवा-निर्भरता का एक प्रभावी विकल्प प्रदान करती है।।
  • आर्थिक अवसर: यह क्षेत्र जैव प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का केंद्र है, जो भारत की तेजी से विकसित हो रही तकनीकी क्षमता के अनुरूप है।

भारत की वर्तमान स्थिति

  • अग्रणी अनुसंधान केंद्र: प्रमुख केंद्रों में राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र (मानेसर), हरियाणा और IIS, बैंगलोर स्थित मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र शामिल हैं।
  • तकनीकी उपलब्धियाँ: IIT कानपुर के शोधकर्ताओं ने ‘स्ट्रोक’ रोगियों के लिए उपयोगी BCI-आधारित रोबोटिक आर्म्स का अनावरण किया है।
  • नवोन्मेषी अनुप्रयोग: डॉगनोसिस (Dognosis) नामक स्टार्टअप कुत्तों के न्यूरल पैटर्न का उपयोग करके गंध पहचान के माध्यम से कैंसर का पता लगाता है, जिससे मानव स्क्रीनिंग के लिए नए मार्ग खुलते हैं।
  • संभावित वैश्विक केंद्र: भारत की जीनोमिक विविधता, विशेषज्ञता और बढ़ती जागरूकता इसे ‘न्यूरोटेक्नोलॉजी’ विकास के लिए संभावित हब का निर्माण करती है।

वैश्विक परिदृश्य

  • अमेरिका का नेतृत्व: NIH की ब्रेन इनिशिएटिव न्यूरोटेक्नोलॉजी विकास को गति देती है।
    • न्यूरालिंक को FDA से मानव-BCI परीक्षण की मंजूरी मिली और इसने ‘मोटर फंक्शन’ पुनर्स्थापन में सफलता प्रदर्शित की है।
  • चीन की महत्त्वाकाँक्षा: चाइना ब्रेन प्रोजेक्ट (वर्ष 2016–2030) संज्ञान, मस्तिष्क-प्रेरित AI विकास और न्यूरोलॉजिकल रोग उपचार पर केंद्रित है।
  • नियामक क्षेत्र में अग्रणी: यूरोपीय संघ और चिली, BCI प्रौद्योगिकी और न्यूरोराइट्स (मस्तिष्क डेटा और स्वायत्तता से संबंधित नैतिक अधिकार) से संबंधित कानूनों को लागू करने के प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।

संदर्भ 

IMF की ग्रोइंग रिटेल डिजिटल पेमेंट्स (2025)’ रिपोर्ट ने यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) को विश्व की सबसे बड़ी त्वरित-भुगतान प्रणाली के रूप में मान्यता दी है, जिससे वास्तविक समय डिजिटल लेन-देन में भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता पुनः स्थापित हुई है।

UPI द्वारा हासिल की गई महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ 

  • सबसे बड़ी ‘रियल-टाइम’ भुगतान प्रणाली: IMF की ग्रोइंग रिटेल डिजिटल पेमेंट्स (2025)’ रिपोर्ट ने लेन-देन की मात्रा के आधार पर UPI को विश्व की सबसे बड़ी रिटेल त्वरित-भुगतान प्रणाली के रूप में पहचाना गया है।
  • वैश्विक रियल-टाइम भुगतान में प्रमुख हिस्सेदारी: ऑटोमेटेड क्लियरिंग हाउस इंटरनेशनल (ACI) वर्ल्डवाइड की प्राइम टाइम फॉर रियल-टाइम 2024’ के अनुसार, UPI विश्व के कुल रियल टाइम डिजिटल भुगतान लेन-देन का 49% हिस्सा कवर करता है।
  • देशव्यापी स्तर पर डिजिटल को बढ़ावा दिया जा रहा है: भारत सरकार, RBI और NPCI की पहल जैसे BHIM–UPI प्रोत्साहन योजना, पेमेंट्स इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (PIDF), तथा सार्वजनिक सेवाओं में व्यापक विस्तार ने व्यापारियों के डिजिटलीकरण को गति दी है। जिससे 5.45 करोड़ डिजिटल टचप्वाइंट और 56.86 करोड़ क्यूआर परिनियोजन सुनिश्चित हुआ है।

अन्य प्रमुख रीयल-टाइम भुगतान प्लेटफार्मों के मुकाबले UPI की स्थिति

देश  लेन-देन की मात्रा (अरबों में) वैश्विक हिस्सेदारी (%)
भारत  129.3 49%
ब्राजील 37.4 14%
थाईलैंड 20.4 8%
चीन 17.2 6%
दक्षिण कोरिया 9.1 3%
अन्य 52.8 20%
कुल  266.2 100%

यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के बारे में

  • परिभाषा: UPI एक प्रणाली है जिसमें उपयोगकर्ता एक ही मोबाइल एप्लिकेशन से अपने कई बैंक खातों को जोड़ सकते हैं। यह विभिन्न बैंकिंग सुविधाओं, सुगम धन-प्रेषण और व्यापारी भुगतान को एकीकृत करता है।
    •  यह मोबाइल फोन के माध्यम से त्वरित वास्तविक समय भुगतान की सुविधा प्रदान करता है।
  • प्रारम्भ: वर्ष 2016 में राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) द्वारा लॉन्च किया गया।
  • NPCI की भूमिका: NPCI एक गैर-लाभकारी संस्था है, जिसे वर्ष 2008 में RBI और भारतीय बैंक संघ द्वारा खुदरा भुगतान प्रबंधन हेतु स्थापित किया गया।
    • यह भौतिक और डिजिटल दोनों प्रकार के लेन-देन के लिए सुरक्षित और कुशल अवसंरचना प्रदान करता है।
  • विस्तार: UPI वर्तमान में 491 मिलियन उपयोगकर्ताओं और 65 मिलियन व्यापारियों को सेवाएँ प्रदान कर रहा है।
    • यह एक ही प्लेटफॉर्म पर 675 से अधिक बैंकों को जोड़ता है।
      • भारत के अलावा 11 देशों (भूटान, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, सिंगापुर, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, साइप्रस, तथा त्रिनिदाद और टोबैगो) में UPI आधारित भुगतान को अपनाया गया है।
  • मुख्य विशेषताएँ: त्वरित धन प्रेषण, बिल भुगतान, व्यापारी भुगतान, व्यक्ति-से-व्यक्ति स्थानांतरण, 24×7 उपलब्धता।

UPI का महत्त्व

  • अंतरसंचालनीयता: UPI एक सामान्य प्रोटोकॉल पर आधारित है, जिससे उपयोगकर्ता विभिन्न बैंकों और ऐप्स के बीच सुगमता से धन भेज सकते हैं। इससे प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ।
  • सहजता एवं सुरक्षा: उपयोगकर्ता केवल एक UPI आईडी के माध्यम से सुरक्षित लेन-देन कर सकते हैं, जिससे बैंक विवरण साझा करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
  • सुविधाजनक विशेषताएँ: QR कोड भुगतान, ऐप-आधारित ग्राहक सहायता, और 24×7 उपलब्धता ने UPI को दैनिक छोटे भुगतानों तक को सरल बना दिया है।
  • व्यवसायों के लिए वहनीयता: विशेषकर छोटे व्यवसायों के लिए UPI एक शून्य-लागत या कम लागत वाला डिजिटल भुगतान विकल्प उपलब्ध कराता है, जो ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी है। इसकी तीव्रता और वहनीयता इसे सभी वर्गों के लिए सुलभ बनाती है।

संदर्भ 

बायोस्टिमुलेंट्स (Biostimulants) भारतीय कृषि के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए रासायनिक उर्वरकों के एक आशाजनक, सतत् विकल्प प्रदान करते हैं।

बायोस्टिमुलेंट्स क्या हैं?

  • बायोस्टिमुलेंट्स पर्यावरण-अनुकूल पदार्थ या सूक्ष्मजीव होते हैं, जो अपने पोषक तत्वों की मात्रा से परे जाकर पौधों की प्राकृतिक प्रक्रियाओं को सक्रिय करते हैं।
  • मुख्य भूमिका: पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ाना, तनाव सहनशीलता को बढ़ाना, फसल की गुणवत्ता में सुधार करना और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन विकसित करना।

बायोस्टिमुलेंट्स के प्रकार

  • वनस्पति अर्क: समुद्री शैवाल, केल्प या ऐसे पौधों से प्राप्त, जो हार्मोन और उनके विकास को बढ़ावा देने वाले तत्वों से भरपूर होते हैं।
  • सूक्ष्मजीवी उत्पाद: लाभकारी बैक्टीरिया (PGPRs) या कवक, जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण, खनिजों का घुलनीकरण या हार्मोन उत्पादन करते हैं।
  • अमीनो अम्ल एवं प्रोटीन हाइड्रोलाइसेट्स: पौधों के प्रोटीन और एंजाइमों के निर्माण खंड प्रदान करते है।
  • ह्यूमिक एवं फुल्विक अम्ल: मृदा संरचना, पोषक तत्व जटिलीकरण और अवशोषण में सुधार करते है।
  • अकार्बनिक यौगिक: सिलिकॉन, कोबाल्ट, सेलेनियम जैसे लाभकारी तत्व।
  • चिटोसन (Chitosan): तनाव प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने वाले बायोपॉलिमर है।

बायोस्टिमुलेंट्स के प्रमुख लाभ (पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ)

  • दक्षता: पोषक तत्व उपयोग दक्षता (NUE) में सुधार करता है।
  • मृदा स्वास्थ्य: मृदा कार्बन संचयन और संरचना में सुधार करता है।
  • लचीलापन: सूखा, लवणता और चरम तापमान से निपटने की क्षमता को बढ़ाता है।
  • जैव विविधता: मृदा सूक्ष्मजीव जीवन और पारिस्थितिकी संतुलन को समर्थन करता है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था: कृषि/खाद्य अपशिष्ट से निर्मित होने के कारण अपशिष्ट को मूल्य में बदलना।
  • इनका संयोजन संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्यों (जीरो हंगर, जलवायु कार्यवाही आदि) के साथ उन्हें हरित कृषि का आधार बनाता है।

रासायनिक उर्वरक संकट

  • भारत की हरित क्रांति और खाद्य सुरक्षा में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की केंद्रीय भूमिका रही है, परंतु इनका अत्यधिक उपयोग अब गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहा है।
  • अतिप्रयोग: राष्ट्रीय औसत खपत 139.81 किग्रा./हेक्टेयर (2023-24), जिसमें पंजाब जैसे राज्य 247.61 किलोग्राम/हेक्टेयर का प्रयोग कर रहे हैं।
  • परिणाम
    • मृदा उर्वरता में गिरावट और पर्यावरण प्रदूषण।
    • इनपुट लागत में वृद्धि होना और इस पर किसानों की निर्भरता बढ़ना।
    • ग्रामीण समुदायों के लिए स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होना।
    • कृषि-संबधित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 19% का योगदान देता है।
    • जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि करता है।

बायोस्टिमुलेंट्स के व्यापक उपयोग में चुनौतियाँ

  • किसानों में संदेह: पारंपरिक इनपुट्स की तुलना में प्रभावशीलता को लेकर सावधानी बरती जाती है।
  • वैज्ञानिक अनिश्चितता: पादप-जीव-क्रियात्मक अभिक्रियाओं की सीमित वैज्ञानिक समझ।
  • परिणामों में विविधता: विभिन्न मृदा और कृषि-जलवायु क्षेत्रों में अलग-अलग प्रदर्शन।
  • बाजार संबंधी समस्याएँ: अविनियमित या निम्न-गुणवत्ता वाले उत्पादों की अधिकता से किसान विश्वास में कमी।

भारत में बायोस्टिमुलेंट्स का विनियमन

  • भारत सरकार ने फरवरी 2021 में बायोस्टिमुलेंट्स को उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO), 1985 के अंतर्गत शामिल किया।
  • वर्तमान में इन्हें 9 श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें वनस्पतिक अर्क, ह्यूमिक एवं फुल्विक अम्ल, प्रोटीन हाइड्रोलाइसेट्स, विटामिन, एँटीऑक्सिडेंट और जीवित सूक्ष्मजीव शामिल हैं।

आगे की राह

  • कृषक सशक्तिकरण: जागरूकता अभियान, खेत प्रदर्शन, डिजिटल विस्तार प्लेटफॉर्म।
  • अनुसंधान एवं विकास: जैवउत्तेजक क्रियाओं, फसल-विशिष्ट फॉर्मूलेशन और जैवउर्वरकों के साथ सामंजस्य के आणविक स्तर के अध्ययनों में निवेश करना।
  • नीति एवं विनियमन: अनुमोदन प्रक्रियाओं को सरल करना, गुणवत्ता निगरानी को सख्त बनाना, R&D/स्टार्टअप प्रोत्साहन।
  • अवसंरचना सहायता: कच्चे माल (सिवार, फसल अवशेष, कृषि-अपशिष्ट) के प्रसंस्करण हेतु सुविधाओं का विकास।
  • वित्तीय पहुँच: किसानों को ऋण, सब्सिडी या कर लाभ उपलब्ध कराना।
  • सहयोगात्मक मॉडल: सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना, स्टार्टअप/सहकारी संस्थाओं का समर्थन, अंतरराष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ सहयोग।

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश दिया है कि राज्य द्वारा बार काउंसिल के चुनावों में महिलाओं के लिए 30% आरक्षण सुनिश्चित किया जाए।

संबंधित तथ्य 

  • वर्ष 2025 के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि 20% सीटें महिला सदस्यों के चुनाव से सुनिश्चित की जाएँ और 10% सीटें सह-चयन (को-ऑप्शन) के माध्यम से।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश

  • महिलाओं के लिए आरक्षण: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि राज्य बार काउंसिल में निर्वाचित पदों और पदाधिकारी भूमिकाओं दोनों में 30% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होनी चाहिए।
  • संवैधानिक भावना: सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि ऐसा प्रतिनिधित्व संवैधानिक भावना के अनुरूप है और लैंगिक समानता से जुड़े प्रावधानों तथा हालिया विधायी पहलों के अनुरूप है।
  • संचालनात्मक नियमों में संशोधन: संवैधानिक पीठ ने स्पष्ट किया कि मौजूदा नियमों को महिलाओं के लिए 30% आरक्षण शामिल मानते हुए संशोधित माना जाएगा, जिससे आगामी चुनावों में अनिवार्य अनुपालन सुनिश्चित हो सके।
  • अनुपालन हेतु कदम: BCI को 8 दिसंबर, 2025 तक एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें न्यायालय के आदेश के अनुपालन हेतु उठाए गए कदमों का विवरण होगा।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ के बारे में

  • बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ एक वैधानिक निकाय है जिसे भारतीय विधिज्ञ के विनियमन और प्रतिनिधित्व हेतु संसद द्वारा स्थापित किया गया है।
  • इसे अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत अखिल भारतीय विधिज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर गठित किया गया।
  • इसका प्रमुख उद्देश्य संपूर्ण भारत के अधिवक्ताओं के अधिकारों, हितों और विशेषाधिकारों की रक्षा करना है।
  • कार्य
    • विनियामक कार्य: BCI व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार के मानक निर्धारित करता है तथा अधिवक्ताओं पर अनुशासनात्मक अधिकार रखता है।
    • विधिक शिक्षा मानक:  BCI कानून की शिक्षा के मानक तय करता है और उन विश्वविद्यालयों को मान्यता देता है जो ऐसे विधि डिग्री प्रदान करते हैं, जिनके आधार पर अधिवक्ता नामांकन संभव हो।
    • अखिल भारतीय विधिज्ञ परीक्षा: BCI अखिल भारतीय विधिज्ञ परीक्षा आयोजित करता है, जिसके बाद अधिवक्ताओं को प्रैक्टिस प्रमाणपत्र प्रदान किया जाता है।
  • संरचना
    • इसमें निर्वाचित तथा पदेन सदस्य दोनों शामिल होते हैं।
    • प्रत्येक ‘स्टेट बार काउंसिल’ अपने सदस्यों में से एक सदस्य का चुनाव BCI के लिए करती है।
    • संरचना में ‘स्टेट बार काउंसिल्स’ से निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं, साथ ही भारत के महाधिवक्ता एवं सॉलिसिटर जनरल पदेन सदस्य होते हैं।
    • स्टेट बार काउंसिल्स के सदस्य पाँच वर्ष के लिए चुने जाते हैं।
    • परिषद अपने सदस्यों में से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करती है, जिनका कार्यकाल दो वर्ष का होता है।

न्यायपालिका में महिलाओं की स्थिति

  • बार काउंसिलों में प्रतिनिधित्व: वर्तमान में, 20 सदस्यीय BCI में कोई महिला सदस्य नहीं है, और विभिन्न स्टेट बार काउंसिलों में 441 सदस्यों में से केवल 9 महिलाएँ प्रतिनिधित्व करती हैं।
  • उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व
    • स्वतंत्रता के बाद से अब तक सर्वोच्च न्यायालय में केवल 11 महिला न्यायाधीश रही हैं, जो कुल न्यायाधीशों का मात्र 3.8% है।
    • स्टेट ऑफ द ज्यूडिशियरी रिपोर्ट, 2023’ के अनुसार, उच्च न्यायालयों में केवल 13.4% न्यायाधीश महिलाएँ हैं।
      • जिला न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 36.3% है।
    • इंडियन जस्टिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, तेलंगाना और सिक्किम को छोड़कर किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय में 30% से अधिक महिला न्यायाधीश नहीं हैं।
    • मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, पटना और उत्तराखंड के उच्च न्यायालयों में कोई महिला न्यायाधीश नहीं है।
    • गुजरात उच्च न्यायालय एकमात्र उच्च न्यायालय है जहाँ एक महिला मुख्य न्यायाधीश हैं।
  • नियुक्तियों में आयु-अंतर: महिलाओं की नियुक्ति आमतौर पर पुरुषों की तुलना में अधिक आयु में होती है; महिलाओं की औसत नियुक्ति आयु 53 वर्ष जबकि पुरुषों की 51.8 वर्ष है।
    • नियुक्ति में विलंब के कारण महिलाएँ प्रायः कॉलेजियम में शामिल होने या भारत की मुख्य न्यायाधीश बनने के अवसर से वंचित रह जाती हैं।
    • न्यायपालिका की प्रमुख बनने वाली पहली महिला मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, वर्ष 2027 में केवल 36 दिनों के लिए ही अपने पद पर रहेंगी, जो न्यायपालिका के शीर्ष पर किसी महिला के लिए सबसे कम कार्यकाल का प्रतीक है।
  • जातिगत विविधता का अभाव: सर्वोच्च न्यायालय में महिला न्यायाधीशों के बीच जातिगत विविधता का पूर्ण अभाव है; अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से कोई भी महिला न्यायाधीश नियुक्त नहीं हुई है।

संदर्भ

भारत के आदित्य-L1 उपग्रह ने संयुक्त राज्य अमेरिका के छह उपग्रहों के सहयोग से यह पता लगाया कि मई 2024 में आए गैन्नन के सौर तूफान ने असामान्य रूप से तीव्र और अप्रत्याशित व्यवहार क्यों दर्शाया?

गैन्नन के सौर तूफान के बारे में

मई 2024 में, पृथ्वी दो दशकों से अधिक समय में आए पहले G5 स्तर के गंभीर भू-चुंबकीय तूफान की चपेट में आ गई, जिसे अब गैन्नन तूफान के नाम से जाना जाता है, जो एक विशाल सौर सक्रिय क्षेत्र से निकलने वाले कई ‘कोरोनल मास इजेक्शन’ के कारण उत्पन्न हुआ था।

गैन्नन के सौर तूफान की प्रमुख विशेषताएँ

  • सौर तूफान का निर्माण: अंतरिक्ष में शक्तिशाली ‘कोरोनल मास इजेक्शन’ की एक शृंखला के विलय से एक असाधारण रूप से बड़े तूफान की शुरुआत हुई, जो 10 मई, 2024 को पृथ्वी तक पहुँचा।
  • विशाल सौर सक्रिय क्षेत्र: नासा ने पाया कि तूफान के लिए जिम्मेदार सक्रिय क्षेत्र पृथ्वी के आकार से लगभग 17 गुना बड़ा था, जिससे अत्यधिक सौर ज्वालाएँ और उच्च-ऊर्जा कणों का प्रवाह उत्पन्न हुआ।
  • दशकों में पहली बार गंभीर भू-चुंबकीय तूफान की चेतावनी: अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन ने लगभग 20 वर्षों में पहली बार G5 तूफान की चेतावनी जारी की।

गैनन के सौर तूफान का प्रभाव

  • जमीनी स्तर पर व्यवधान: उच्च वोल्टेज विद्युत लाइनें टूट गईं, ट्रांसफार्मर अत्यधिक गर्म हो गए और GPS-निर्देशित ट्रैक्टर अनुपयोगी हो गए, जिससे प्रभावित किसानों को आर्थिक नुकसान हुआ।
  • विमानन और संचार पर प्रभाव: विकिरण में वृद्धि और संचार जोखिमों के कारण ट्रांस-अटलांटिक’ उड़ानों को अपने मार्ग बदलने पड़े।
  • वायुमंडलीय और कक्षीय प्रभाव: पृथ्वी का थर्मोस्फीयर 2,100°F से अधिक गर्म हो गया, घर्षण में वृद्धि  ने उपग्रहों को कक्षा से बाहर धकेल दिया और नासा का CIRBE क्यूबसैट समय से पहले ही कक्षा से बाहर निकल गया।
  • चुंबकीय और ऑरोरा में परिवर्तन: तूफान ने दो अस्थायी विकिरण बेल्ट निर्मित किए, पिछले 20 वर्षों में सबसे मजबूत चुंबकीय धाराएँ उत्पन्न कीं और जापान और अन्य क्षेत्रों में दुर्लभ मैजेंटा ‘ऑरोरा’ का निर्माण हुआ।

सौर तूफान संबंधी मुख्य निष्कर्ष

  • चुंबकीय पुनर्संयोजन का पता लगाना: आदित्य-L1 ने अवलोकित किया कि सूर्य की मुड़ी हुई चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ ‘कोरोनल मास इजेक्शन’ (CME) के अंदर टूटकर फिर से जुड़ गईं, जो एक असामान्य आंतरिक पुनर्संयोजन घटना है।
    • CME सूर्य के कोरोना से अंतरिक्ष में उत्सर्जित सौर प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों का एक विशाल विस्फोट है, जो पृथ्वी की प्रणालियों को बाधित कर सकता है।
  • दो ‘कोरोनल मास इजेक्शन’ (CME) का टकराव: डेटा ने पुष्टि की कि अंतरिक्ष में दो कोरोनल मास इजेक्शन (CME) टकराए, जिससे वे एक दूसरे को संकुचित कर गए और बड़े पैमाने पर चुंबकीय पुनर्गठन हुआ।
  • विशाल पुनर्संयोजन क्षेत्र का मानचित्रण: आदित्य-L1 मापों से पता चला कि पुनर्संयोजन क्षेत्र 1.3 मिलियन किमी. में विस्तृत था, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग 100 गुना है, जो किसी CME के भीतर अब तक का सबसे बड़ा क्षेत्र है।
  • बहु-बिंदु अवलोकन संभव: आदित्य-L1 और संयुक्त राज्य अमेरिका के छह उपग्रहों ने अंतरिक्ष में कई स्थानों से एक ही तूफान को अवलोकित किया, जिससे अभूतपूर्व 3D इमेजिंग संबंधी निष्कर्ष प्राप्त हुए।

आदित्य- L1 मिशन के बारे में

  • आदित्य L1 मिशन निरंतर सौर अवलोकन के लिए समर्पित पहला भारतीय मिशन है।
  • लॉन्च तिथि: 2 सितंबर, 2023, ISRO द्वारा PSLV-XL रॉकेट का उपयोग करके लॉन्च किया गया था।
  • उद्देश्य: सूर्य के वायुमंडल, सौर पवन और अंतरिक्ष मौसम की गतिशीलता का अध्ययन करना।
  • कक्षा: 6 जनवरी, 2024 को सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज बिंदु 1 (L1) के चारों ओर एक हेलो कक्षा में स्थापित किया गया।
    • L1 बिंदु सूर्य का अबाधित दृश्य प्रदान करता है।
  • आदित्य L1 मिशन का महत्त्व
    • यह पृथ्वी के वायुमंडल के हस्तक्षेप के बिना दीर्घकालिक सौर अवलोकन को सक्षम बनाता है।
    • यह सौर अनुसंधान में भारत को नासा और ESA जैसी अग्रणी अंतरिक्ष एजेंसियों की श्रेणी में स्थान दिलाता है।

महत्त्व

  • सौर तूफानों के विकास की बेहतर समझ: इस खोज से यह स्पष्ट होता है कि सूर्य से पृथ्वी की ओर यात्रा करते समय सौर तूफान कैसे तीव्र होते जाते हैं।
  • अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान में सुधार: CME के अंतर्गत चुंबकीय पुनर्संयोजन की पहचान से उपग्रहों, विद्युत ग्रिडों और संचार प्रणालियों से संबंधित सुरक्षा मॉडलों को मजबूती प्राप्त होती है।

संदर्भ

स्वास्थ्य अधिकारों पर राष्ट्रीय सम्मेलन 11-12 दिसंबर, 2025 को नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा, जो मानवाधिकार दिवस (10 दिसंबर) और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज दिवस (12 दिसंबर) के साथ  संरेखित है।

स्वास्थ्य अधिकारों पर राष्ट्रीय सम्मेलन के बारे में

  • यह जन स्वास्थ्य अभियान (JSA) और उसके सहयोगी संगठनों द्वारा भारत में आयोजित एक बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य को एक मौलिक मानवाधिकार के रूप में मान्यता दिलाने के आंदोलन को मजबूत करना और सभी नागरिकों के लिए सार्वभौमिक, समान और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवा की माँग करना है।
  • इस वर्ष भारत भर में जनहितैषी स्वास्थ्य नीतियों को आगे बढ़ाने में JSA के कार्यों की 25वीं वर्षगाँठ है।

मानवाधिकार दिवस (दिसंबर 10) के बारे में

  • मानवाधिकार दिवस वर्ष 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) को अपनाने की वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
  • यह गरिमा, समानता और न्याय के सार्वभौमिक मूल्यों पर प्रकाश डालता है और सरकारों को जीवन, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भेदभाव समाप्त करने जैसे मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के उनके कर्तव्य की याद दिलाता है।

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) दिवस (12 दिसंबर) के बारे में

  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज दिवस संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 2012 के उस प्रस्ताव की स्मृति में मनाया जाता है जिसमें सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का आह्वान किया गया था, जिसका उद्देश्य बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा, वित्तीय सुरक्षा और समानता सुनिश्चित करना है।
  • इसमें रेखांकित किया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुलभ, समावेशी और अधिकार-आधारित होनी चाहिए, तथा चिकित्सा व्ययों के कारण किसी भी व्यक्ति को निर्धनता के चक्र में फँसने की स्थिति नहीं होनी चाहिए।

स्वास्थ्य के अधिकार के बारे में

  • अंतरराष्ट्रीय मान्यता: स्वास्थ्य का अधिकार अंतरराष्ट्रीय कानून का एक प्रमुख सिद्धांत है, जिसे मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (अनुच्छेद 25) और आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधि (ICESCR) के अनुच्छेद 12 में मान्यता प्राप्त है।
  • स्वास्थ्य की समग्र परिभाषा: ये अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज स्वास्थ्य को एक समग्र अधिकार के रूप में परिभाषित करते हैं, जो चिकित्सा देखभाल से परे जाकर सुरक्षित भोजन, स्वच्छ जल, स्वच्छता, पर्याप्त आवास और स्वस्थ वातावरण को समग्र कल्याण के लिए आवश्यक मानता है।

स्वास्थ्य के बारे में

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की परिभाषा: WHO का संविधान (1946) स्वास्थ्य की आधुनिक व्याख्या की नींव रखता है।
    • यह स्वास्थ्य को ‘पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति’ के रूप में परिभाषित करता है, न कि केवल रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति के रूप में।
    • यह स्वास्थ्य के अधिकार को स्वास्थ्य के उच्चतम संभव स्तर’ के रूप में स्पष्ट करता है।
    • महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह स्वस्थ होने का अधिकार’ नहीं है, बल्कि उच्चतम संभव स्वास्थ्य के लिए उचित अवसरों का अधिकार है, जिसके लिए राज्य को सुलभ, न्यायसंगत और सहायक स्वास्थ्य प्रणालियों को सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • अच्छे स्वास्थ्य के निर्धारक तत्व
    • सामाजिक-आर्थिक वातावरण
      • आय और सामाजिक स्थिति: उच्च आय और सामाजिक स्थिति का बेहतर स्वास्थ्य से गहरा संबंध है।
      • शिक्षा: कम शिक्षा स्तर खराब स्वास्थ्य, तनाव और कम आत्मविश्वास से जुड़ा है।
      • रोजगार और कार्य परिस्थितियाँ: सुरक्षित रोजगार, विशेषकर ऐसी नौकरी जिसमें कार्य परिस्थितियों पर नियंत्रण हो, बेहतर स्वास्थ्य में योगदान देती है।
      • सामाजिक सहयोग नेटवर्क: परिवार, मित्रों और समुदाय के साथ मजबूत संबंध स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं।
    • भौतिक पर्यावरण
      • स्वच्छ जल और स्वच्छता: स्वच्छ जल, पर्याप्त स्वच्छता और साफ-सफाई की सुविधाओं तक पहुँच अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
      • पर्याप्त आवास और भोजन: सुरक्षित आवास, पौष्टिक भोजन और खाद्य सुरक्षा मूलभूत आवश्यकताएँ हैं।
      • स्वच्छ वायु: प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन सहित पर्यावरणीय कारक श्वसन और समग्र स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
    • विशेषताएँ और व्यवहार
      • आनुवंशिकी: वंशानुक्रम स्वास्थ्य को प्रभावित करता है और कुछ बीमारियों के होने की संभावना को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।।
      • व्यक्तिगत व्यवहार और तनाव से निपटने संबंधी कौशल: आहार, शारीरिक गतिविधि, शराब/तंबाकू का सेवन और तनाव प्रबंधन जैसे कारक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
    • स्वास्थ्य सेवाएँ
      • पहुँच एवं उपयोग: बीमारियों की रोकथाम और उपचार आधारित परिणामों को प्रभावित करती है, हालाँकि यह कई कारकों में से केवल एक है।
  • स्वास्थ्य के अधिकार के मूल घटक
    • उपलब्धता: राज्य को सभी के लिए पर्याप्त मात्रा में कार्यशील सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएँ, आवश्यक दवाएँ और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मी जैसी वस्तुएँ और सेवाएँ सुनिश्चित करनी चाहिए।
    • पहुँच: स्वास्थ्य सुविधाएँ, वस्तुएँ एवं सेवाएँ बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए। इसमें शामिल हैं:-
      • गैर-भेदभाव: सबसे कमजोर या हाशिए पर स्थित समूहों के लिए पहुँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।
      • भौतिक पहुँच: सुविधाएँ सुरक्षित पहुँच के भीतर होनी चाहिए (भौगोलिक पहुँच)।
      • आर्थिक पहुँच (वहनीय): सेवाएँ वहनीय होनी चाहिए, जिसका अर्थ है कि वे वित्तीय बोझ न डालें या गरीबी का कारण न बनें (उदाहरण के लिएआउट ऑफ पॉकेट व्यय’ को समाप्त करना)।
      • सूचना पहुँच: स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्राप्त करने, और साझा करने का अधिकार।
    • स्वीकार्यता: स्वास्थ्य सुविधाएँ और सेवाएँ नैतिक रूप से सही, लैंगिक रूप से संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त होनी चाहिए। उन्हें व्यक्तियों, अल्पसंख्यकों और समुदायों की संस्कृति का सम्मान करना चाहिए, और रोगी की गोपनीयता और सूचित सहमति का सम्मान करना चाहिए।
    • गुणवत्ता: स्वास्थ्य सुविधाएँ, वस्तुएँ और सेवाएँ वैज्ञानिक और चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त और उच्च गुणवत्ता वाली होनी चाहिए। इसके लिए कुशल स्वास्थ्य पेशेवरों, वैज्ञानिक रूप से अनुमोदित उपकरणों, आवश्यक दवाओं और सुविधाओं में सुरक्षित जल/स्वच्छता की आवश्यकता होती है।

भारत में स्वास्थ्य के अधिकार के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रावधान

स्वास्थ्य का अधिकार मुख्य रूप से न्यायिक व्याख्या के माध्यम से सुरक्षित किया जाता है और संविधान के गैर-न्यायसंगत भागों में निहित है:-

  • अनुच्छेद 21 (मौलिक अधिकार): सर्वोच्च न्यायालय ने ‘जीवन के अधिकार’ की व्यापक व्याख्या करते हुए इसमें स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल के अधिकार को भी शामिल किया है।
  • राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP): ये संवैधानिक आदेश राज्य का मार्गदर्शन करते हैं:
    • अनुच्छेद 38 एवं 39(e): श्रमिकों के कल्याण को बढ़ावा देना और उनके स्वास्थ्य एवं शक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
    • अनुच्छेद 42: मातृत्व अवकाश और न्यायसंगत एवं मानवीय कार्य परिस्थितियों का प्रावधान अनिवार्य करता है।
    • अनुच्छेद 47: सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार और पोषण एवं जीवन स्तर को ऊपर उठाना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य घोषित करता है।
    • अनुच्छेद 48A: राज्य से पर्यावरण की रक्षा एवं सुधार करने का आह्वान करता है, और स्वास्थ्य के लिए प्रदूषण मुक्त पारिस्थितिकी तंत्र को आवश्यक मानता है।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ: भारत ICESCR का हस्ताक्षरकर्ता है, जो स्वास्थ्य के अधिकार को मान्यता देता है।

भारत में स्वास्थ्य के अधिकार के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश और ऐतिहासिक निर्णय

न्यायपालिका ने चिकित्सा देखभाल प्रदान करने के राज्य के दायित्व को बरकरार रखा है:-

  • परमानंद कटारा बनाम भारत संघ (1989) मामला: इस मामले में निर्णय दिया गया कि कानूनी औपचारिकताओं की परवाह किए बिना तत्काल चिकित्सा सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
  • पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996) मामला : मान्यता दी गई कि सरकार द्वारा समय पर चिकित्सा उपचार प्रदान करने में विफलता जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है।
  • सुखदेब साहा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2025): मानसिक स्वास्थ्य के अधिकार को अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग माना गया।

भारत में प्रमुख स्वास्थ्य आँकड़े

सूचक नवीनतम स्थिति (स्रोत/वर्ष) तुलना/महत्त्व
जन्म के समय जीवन प्रत्याशा (कुल मिलाकर) लगभग 70.8 वर्ष (2025 का अनुमान/संयुक्त राष्ट्र का 2023 का अनुमान)

पिछले लगभग 69 वर्षों की तुलना में इसमें सुधार दिखता है। हालाँकि, यह अभी भी वैश्विक औसत से लगभग 73 वर्ष पीछे है।

शिशु मृत्यु दर (IMR) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 26 (SRS 2022)

महत्त्वपूर्ण गिरावट: 32 से कम (NFHS-4/SRS 2018)। भारत ने वर्ष 2019 तक NHP 2017 के 28 के लक्ष्य को पार कर लिया है।

मातृ मृत्यु दर (MMR) प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर 103 (SRS वर्ष 2020-2022)

प्रमुख उपलब्धि: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के 100 से कम के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। संयुक्त राष्ट्र-MMEIG 2023 का नवीनतम अनुमान 80 है, जो वर्ष 2030 तक SDG के 70 से कम के लक्ष्य के निकट है।

कुपोषण (बच्चों में बौनापन) 5 वर्ष से कम आयु के 35.5% बच्चे (वैश्विक भूख सूचकांक 2024 / NFHS-5 वर्ष 2019- वर्ष 2021)

धीमी गति से सुधार: बौनापन (दीर्घकालिक कुपोषण) 38.4% (GNR 2020) से कम हो गया है, लेकिन यह अभी भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है।

कुपोषण (बाल दुर्बलता) 5 वर्ष से कम आयु के 18.7% बच्चे (वैश्विक भूख सूचकांक 2024)

चिंताजनक दर: यह विश्व स्तर पर बच्चों में कुपोषण (तीव्र कुपोषण) की सबसे उच्च दरों में से एक है, जो गंभीर खाद्य असुरक्षा और हाल ही में हुई पोषण संबंधी कमियों को इंगित करता है।

गैर-संचारी रोग (NCD) लगभग 63-65% मौतें (GBD 2023/विशेषज्ञ अनुमान)

महामारी विज्ञान संबंधी परिवर्तन: गैर-संक्रामक रोग (हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह आदि) मृत्यु के प्रमुख कारण के रूप में संक्रामक रोगों से आगे निकल गए हैं, जो 61% तक हो गए हैं।

डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:811 (स्वास्थ्य मंत्रालय, दिसंबर 2025)

इस अनुपात में सक्रिय एलोपैथिक (MBBS) डॉक्टर और पंजीकृत आयुष चिकित्सक शामिल हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के 1:1000 के मानक से अधिक है।

  • हालाँकि, यह ग्रामीण-शहरी वितरण में गंभीर असमानताओं को छिपाता है।
स्वास्थ्य बीमा कवरेज सामाजिक सुरक्षा व्यय (SSE) कुल आय का 8.7% है (NHA वर्ष 2021-22)। स्वास्थ्य बीमा कवरेज (PM-JAY जैसी सरकारी योजनाओं सहित) में वृद्धि हुई है, जो OOPE में गिरावट से स्पष्ट है।

  • आयुष्मान भारत PM-JAY के तहत 42 करोड़ से अधिक कार्ड जारी किए जा चुके हैं (अक्टूबर 2025)।

भारत में स्वास्थ्य के अधिकार का महत्त्व

  • मानव गरिमा और निष्पक्षता सुनिश्चित करना
    • मानव जीवन की रक्षा: सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि जीवन के अधिकार का अर्थ है-मानवीय गरिमा के साथ जीना।
      • स्वस्थ रहना गरिमा के लिए सबसे मूलभूत आवश्यकता है, क्योंकि अस्वस्थ व्यक्ति समाज में पूर्ण रूप से भाग नहीं ले सकता है।
    • निष्पक्षता की गारंटी: यह अधिकार सुनिश्चित करता है कि स्वास्थ्य सेवाएँ आवश्यकता के आधार पर दी जाएँ, न कि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर।
      • यह सरकार से गरीबों, कमजोर वर्गों, दलितों और आदिवासियों पर सर्वप्रथम ध्यान केंद्रित करने की माँग करता है, जिससे यह सामाजिक न्याय का एक शक्तिशाली साधन बन जाता है।
    • स्वच्छ जीवन अनिवार्य करना: चूँकि स्वास्थ्य’ का अर्थ केवल चिकित्सा देखभाल से कहीं अधिक है, इसलिए यह अधिकार सरकार को स्वच्छ जल, स्वच्छता, अच्छा भोजन और सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिए बाध्य करता है, ये वे मूलभूत वस्तुएँ हैं जो किसी व्यक्ति के कल्याण को निर्धारित करती हैं।
  • अत्यधिक वित्तीय संकट को रोकना
    • गरीबी से संघर्ष: भारत में अभी भी आउट ऑफ पॉकेट’ व्यय (OOPE) बहुत अधिक है, जिसका अर्थ है कि परिवार इलाज का खर्च अपने पैसों से चुकाते हैं।
      • इससे प्रायः लाखों परिवार, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, गरीबी या गहरे कर्ज में डूब जाते हैं।
    • निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा: स्वास्थ्य को कानूनी अधिकार के रूप में स्थापित करने से सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह सार्वजनिक अस्पतालों में आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं (दवाओं और जाँचों सहित) का एक बुनियादी समूह निःशुल्क प्रदान करे।
    • वहनीयता सुनिश्चित करना: इस अधिकार में आर्थिक सुलभता का विचार शामिल है, जिसका अर्थ है कि स्वास्थ्य देखभाल की लागत से आर्थिक कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
      • इससे महंगे, निजी उपचारों पर निर्भरता को संरचनात्मक रूप से कम करने में मदद मिलती है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को मजबूत बनाना
    • खर्च बढ़ाना: स्वास्थ्य को एक लागू करने योग्य अधिकार बनाने से सरकार को अपने सरकारी स्वास्थ्य व्यय (GHE) में उल्लेखनीय वृद्धि करने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जिससे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5% के लक्ष्य की ओर बढ़ा जा सके।
      • बेहतर बुनियादी ढाँचे, अधिक कर्मचारियों और नई तकनीक के लिए इस अतिरिक्त धन की आवश्यकता है।
    • विश्वास बनाए करना: अधिकार-आधारित प्रणाली विश्वसनीय और उच्च गुणवत्ता वाली होनी चाहिए।
      • इससे जनता का विश्वास बहाल करने में मदद मिलती है, जो महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांश संवेदनशील लोग (8 करोड़ से अधिक लोग) पूरी तरह से सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं।
    • गुणवत्ता मानक निर्धारित करना: इस अधिकार में उपलब्धता और गुणवत्ता के मूल विचार शामिल हैं।
      • यह पर्याप्त अस्पतालों, आवश्यक दवाओं और कुशल कर्मचारियों की उपलब्धता के लिए कानूनी मानक निर्धारित करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि प्रदान की जाने वाली देखभाल सुरक्षित और प्रभावी है।
  • जवाबदेही की माँग
    • कानूनी गारंटी: यह अधिकार स्वास्थ्य कार्यक्रमों को सरकार के विवेकाधीन वादों से संवैधानिक गारंटी में परिवर्तित कर देता है।
    • मुकदमा करने का अधिकार: यह नागरिकों को आवश्यक चिकित्सा देखभाल प्रदान करने में विफल रहने पर राज्य को चुनौती देने का सीधा कानूनी मार्ग (अदालत में) प्रदान करता है।
      • पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति जैसे प्रमुख अदालती फैसलों में इसकी पुष्टि की गई है।
    • निजी अस्पतालों पर नियंत्रण: यह अधिकार, विशाल निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को सख्ती से नियंत्रित और विनियमित करने के लिए एक मजबूत कानूनी आधार प्रदान करता है, जिससे उन्हें नैतिक नियमों का पालन करने, मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता बरतने और मरीजों के अधिकारों का सम्मान करने के लिए बाध्य किया जाता है।

भारत में प्रमुख स्वास्थ्य पहलें

पहल देखभाल का प्रकार/लक्ष्य मुख्य विशेषताएँ एवं प्रभाव
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP), 2017 नीतिगत रूपरेखा/ सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC)
  • मूलभूत नीति: वर्ष 2025 तक सरकारी स्वास्थ्य व्यय (GHE) को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5% तक बढ़ाने का आदेश देती है।
  • व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल (CPHC) पर ध्यान केंद्रित करती है और स्वास्थ्य केंद्रों/आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की स्थापना को अनिवार्य बनाती है।
आयुष्मान भारत- PM-JAY वित्तीय सुरक्षा/ द्वितीयक एवं तृतीयक देखभाल
  • यह योजना प्रति परिवार प्रति वर्ष ₹5 लाख का स्वास्थ्य बीमा प्रदान करती है, जिसमें बिना नकद भुगतान के अस्पताल में भर्ती (सर्जरी, गहन चिकित्सा) शामिल है।
  • इसका उद्देश्य जनसंख्या के सबसे निचले 40% हिस्से के लिए आउट ऑफ पॉकेट’ (OOPE) को समाप्त करना है।
आयुष्मान भारत- स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (HWCs) सार्वभौमिक पहुँच/ प्राथमिक देखभाल
  • 1.6 लाख से अधिक स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों को आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में परिवर्तित किया गया है।
  • घर के पास ही निःशुल्क और व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा (जिसमें गैर-संचारी रोगों की जाँच, मातृ देखभाल और निःशुल्क दवाएँ/जाँच शामिल हैं) प्रदान की जाती है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (मातृ/बाल स्वास्थ्य) राष्ट्रीय रोग नियंत्रण कार्यक्रमों (टीबी, मलेरिया) और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं [(टीकाकरण के लिए मिशन इंद्रधनुष, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK)] के लिए प्राथमिक वाहन।
प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PM-ABHIM) बुनियादी ढाँचे को मजबूत बनाना इसका उद्देश्य भविष्य में आने वाली महामारियों को रोकने और उनका प्रबंधन करने के लिए एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं, गहन देखभाल इकाइयों और अनुसंधान अवसंरचना के निर्माण हेतु बड़े पैमाने पर, दीर्घकालिक निवेश करना है।
टेली मानस मानसिक स्वास्थ्य पहुँच भारत भर में 50 से अधिक केंद्रों वाली एक राष्ट्रीय 24/7 टेली-काउंसलिंग हेल्पलाइन, जो मानसिक स्वास्थ्य सहायता को सुलभ और निःशुल्क बनाती है, जो मानसिक स्वास्थ्य के अधिकार की मान्यता को दर्शाती है।
स्वच्छ भारत अभियान स्वास्थ्य निर्धारकों को संबोधित करना इसका मुख्य उद्देश्य स्वच्छता में सुधार करना और खुले में शौच मुक्त (ODF) स्थिति प्राप्त करना है, जिसका सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है और संक्रामक रोगों का बोझ कम होता है।

प्रमुख वैश्विक स्वास्थ्य पहलें

पहल/दस्तावेज फोकस क्षेत्र अधिदेश/उद्देश्य
आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय वाचा (ICESCR) कानूनी दायित्व
  • अनुच्छेद 12 शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के उच्चतम संभव स्तर के स्पष्ट अधिकार को मान्यता देता है।
  • यह हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्रों (भारत सहित) को उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करके इस अधिकार को क्रमिक रूप से साकार करने के लिए बाध्य करता है।
मानव अधिकारों का सार्वजनिक घोषणापत्र (UDHR) तृतीय सिद्धांत अनुच्छेद 25 स्वास्थ्य और कल्याण के लिए पर्याप्त जीवन स्तर के अधिकार को मान्यता देता है, जिसमें आवश्यक चिकित्सा देखभाल भी शामिल है।
सतत् विकास लक्ष्य (SDG) 3 वैश्विक लक्ष्य/ढाँचा इसका मुख्य लक्ष्य सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) प्राप्त करना है, जिसमें गुणवत्तापूर्ण आवश्यक सेवाओं तक पहुँचच और वित्तीय जोखिम से सुरक्षा शामिल है।
एड्स, टीबी और मलेरिया से लड़ने के लिए वैश्विक कोष रोग-विशिष्ट वित्तपोषण एक बहुपक्षीय वित्तीय साझेदारी, जो विकासशील देशों में स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने के लिए तीन प्रमुख संक्रामक रोगों से निपटने के लिए धन एकत्रित और निवेश करती है।
GAVI, वैक्सीन अलायंस आवश्यक दवाओं तक पहुँच विश्व के सबसे गरीब देशों में बच्चों के लिए नए और कम उपयोग किए जाने वाले टीकों तक पहुँच में सुधार लाने पर केंद्रित एक वैश्विक सार्वजनिक-निजी साझेदारी, जो स्वास्थ्य के अधिकार के उपलब्धता घटक को पूरा करती है।
अल्मा अता घोषणा (1978) नीति मार्गदर्शक सिद्धांत एक ऐतिहासिक घोषणा है जिसमें प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को सभी के लिए स्वास्थ्य’ प्राप्त करने की केंद्रीय रणनीति के रूप में पहचाना गया, और निवारक और समुदाय-आधारित देखभाल पर ध्यान केंद्रित किया गया।

  • OOPE और THE किसी देश की स्वास्थ्य सेवा वित्तपोषण संरचना, समानता और नागरिकों को प्रदान की जाने वाली वित्तीय सुरक्षा का आकलन करने के लिए उपयोग किए जाने वाले मूलभूत संकेतक हैं।
  • THE किसी देश में स्वास्थ्य पर खर्च की गई कुल राशि (सेवाएँ, वस्तुएँ, पूँजी) है, जबकि OOPE देखभाल के समय व्यक्तियों द्वारा किया गया प्रत्यक्ष भुगतान है।

भारत में स्वास्थ्य के अधिकार के लिए चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • संघीय बाध्यता (राज्य सूची): ‘स्वास्थ्य’ राज्य सूची के अंतर्गत शामिल विषय है, जिसके लिए केंद्र सरकार को अनुच्छेद 252 (राज्यों की सहमति से) या अनुच्छेद 253 (अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के लिए) का उपयोग करके एक लागू करने योग्य राष्ट्रीय अधिनियम पारित करना आवश्यक है।
  • कम वित्तीय आवंटन: सरकारी स्वास्थ्य व्यय (GHE) वैश्विक मानकों से नीचे बना हुआ है।
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (NHA), 2021-22 में GHE को GDP का 1.84% बताया गया है, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनंतिम रुझान वित्त वर्ष 2025 में GDP के 2.0-2.1% की ओर क्रमिक वृद्धि का अनुमान लगाते हैं।
    • यह अभी भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के GDP के 2.5% के लक्ष्य से कम है।
  • आउट ऑफ पॉकेट’ व्यय (OOPE): कुल स्वास्थ्य व्यय (THE) के 39.4% तक कम होने के बावजूद (NHA 2021-22), OOPE आर्थिक रूप से हानिकारक बना हुआ है।
    • स्वास्थ्य व्यय के कारण प्रतिवर्ष 5 करोड़ से अधिक भारतीय निर्धनता की स्थिति में पहुँच जाते हैं, जिनमें से अधिकांश व्यय बाह्य रोगी चिकित्सा लागत (OOPE का 70%) में केंद्रित हैं, जो PM-JAY जैसी सार्वजनिक बीमा योजनाओं से अत्यधिक सीमा तक बाहर हैं।
  • निजीकरण और अनियंत्रित निजी क्षेत्र के सामने चुनौतियाँ: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) का विस्तार और अनियंत्रित निजी क्षेत्र एक बड़ी चिंता का विषय बने हुए हैं।
    • क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट (2010) का नाममात्र का कार्यान्वयन अधिक शुल्क वसूलने, अपारदर्शी मूल्य निर्धारण और रोगी अधिकारों के उल्लंघन की अनुमति देता है।
  • परिणामों में असमानताएँ (मातृ मृत्यु दर): भारत ने मातृ मृत्यु दर (MMR) को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है।
    • वर्ष 2018-20 के लिए मातृ मृत्यु दर का अनुमान 97 प्रति लाख जीवित जन्म है, जबकि संयुक्त राष्ट्र-MMEIG 2023 के अनुमान के अनुसार, यह लगभग 70 है (जो वर्ष 1990 से 86% की गिरावट को दर्शाता है)।
    • हालाँकि लक्ष्य सभी राज्यों में मातृ मृत्यु दर को 70 से नीचे लाकर सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करना है, फिर भी हाशिए पर स्थित समूहों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में उल्लेखनीय असमानताएँ बनी हुई हैं।
  • किफायती दवाओं तक पहुँच: 80% से अधिक दवाएँ मूल्य नियंत्रण से बाहर हैं, जो कि आउट ऑफ पॉकेट’ व्यय (OOPE) में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।
    • संसदीय स्थायी समिति ने कई आमतौर पर प्रयोग होने वाली दवाओं के लिए स्टॉक रखने वाले की कीमत और MRP की भी जाँच की और पाया कि अंतर क्रमशः 600%, 1200% और 1800% तक था।
  • भेदभाव का उन्मूलन: स्थापित सामाजिक पदानुक्रम पहुँच को प्रभावित करते रहते हैं, जिसके लिए दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और LGBTQ+ व्यक्तियों के अनुभवों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, जो सम्मेलन के एक सत्र का प्रमुख केंद्र बिंदु है।
  • कार्यान्वयन में विफलता (राजस्थान का अधिनियम): अपनी तरह का पहला राजस्थान स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम (2023) निजी चिकित्सकों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, जिससे इस अधिकार को सुनिश्चित करने में राज्य और निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के बीच कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों और विवादास्पद संबंधों पर प्रकाश डाला गया।
  • बुनियादी ढाँचेगत चुनौती: कार्यात्मक बुनियादी ढाँचे और मानव संसाधनों की कमी ग्रामीण क्षेत्रों में केंद्रित है, जिससे विशेषीकृत और आपातकालीन देखभाल से वंचित होना पड़ता है। यह असमान वितरण स्वास्थ्य सेवाओं की भौतिक पहुँच और उपलब्धता के संवैधानिक जनादेश का उल्लंघन करता है।

आगे की राह

  • विधायी एवं शासन संबंधी अनिवार्यताएँ
    • स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम लागू करना: एक केंद्रीयस्वास्थ्य का अधिकार’ अधिनियम का निर्माण करना, जो न्यायिक प्रतिबद्धता (अनुच्छेद 21 के तहत) को एक लागू करने योग्य वैधानिक अधिकार में परिवर्तित करना और देखभाल प्रदान करने में विफलता के मामले में न्यायिक उपाय सुनिश्चित करना।
    • संघीय संघर्ष का समाधान करना: एक एकीकृत राष्ट्रीय विधायी ढाँचे के लिए स्वास्थ्य को समवर्ती सूची में रखने के लिए कदम उठाना (संभावित रूप से संवैधानिक संशोधन के माध्यम से)।
    • आवश्यक स्वास्थ्य पैकेज (EHP) अनिवार्य करना: सार्वजनिक सुविधाओं में प्रत्येक नागरिक को उपलब्ध मुफ्त सेवाओं, निदान और आवश्यक दवाओं का न्यूनतम, कानूनी रूप से परिभाषित आवश्यक स्वास्थ्य पैकेज (EHP) बनाना।
    • निजी क्षेत्र को विनियमित करना: वित्तीय शोषण को रोकने के लिए नैदानिक ​​प्रतिष्ठान अधिनियम (2010) का सख्ती से कार्यान्वयन सुनिश्चित करना, जिसमें रोगी अधिकारों का चार्टर, दर मानकीकरण और पारदर्शी मूल्य निर्धारण शामिल हो।
  • वित्तीय और प्रणालीगत सुधार
    • सार्वजनिक व्यय में वृद्धि: NHP, 2017 के GDP के 2.5% संबंधी लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकारी स्वास्थ्य व्यय (GHE) में धीरे-धीरे वृद्धि करना, बीमा-आधारित मॉडलों की तुलना में प्राथमिक और माध्यमिक देखभाल को प्राथमिकता देना।
    • सार्वजनिक प्रणालियों (UHC) को मजबूत करना: विकेंद्रीकृत योजना और समुदाय-नेतृत्व वाले मॉडलों पर ध्यान केंद्रित करना। सामाजिक सुरक्षा कवरेज (जैसे- PM-JAY) का विस्तार करना ताकि अत्यधिक खर्च के मुख्य कारण को संबोधित किया जा सके।
  • बाह्य रोगी देखभाल
    • किफायती दवाएँ: आवश्यक दवाओं और निदान उपकरणों पर GST हटाने का प्रस्ताव करना, साथ ही पहुँच में सुधार के लिए जेनेरिक दवाओं के सार्वजनिक क्षेत्र के उत्पादन का विस्तार करना।
    • स्वास्थ्य कर्मियों के लिए न्याय: मानव संसाधन आधार को मजबूत करने के लिए सभी अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं (जैसे- आशा कार्यकर्ता, संविदा कर्मचारी) के लिए बेहतर वेतन, सुरक्षित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • प्रौद्योगिकी और समग्र स्वास्थ्य
    • डिजिटल स्वास्थ्य का उपयोग: ग्रामीण-शहरी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद गंभीर अंतराल को पाटने के लिए निदान और स्वास्थ्य सेवा वितरण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल उपकरणों (जैसे- आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन) के रणनीतिक उपयोग को बढ़ावा देना।
    • मानसिक स्वास्थ्य को एकीकृत करना: राष्ट्रीय टेली मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (टेली मानस) और सार्वजनिक स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों के बीच संबंध को मजबूत करना, इसकी व्यापकता (53 सेल, 29.7 लाख कॉल) का लाभ उठाते हुए मानसिक स्वास्थ्य सहायता को सार्वभौमिक रूप से सुलभ बनाना।
    • कारण कारकों का समाधान: प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों को प्रबंधित करने के लिए जलवायु-स्वास्थ्य शमन रणनीतियों और अंतर-क्षेत्रीय सहयोग (जैसे- पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा मंत्रालयों के साथ) को एकीकृत करना।

निष्कर्ष

अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निहित स्वास्थ्य का अधिकार एक न्यायिक प्रतिबद्धता है, जिसे मूर्त रूप देने के लिए विधायी कार्रवाई की आवश्यकता है। राष्ट्रीय सम्मेलन इस बात पर जोर देता है कि इस संवैधानिक अधिदेश को सुदृढ़ सार्वजनिक प्रणालियों और आवश्यक स्वास्थ्य पैकेज के वैधानिक प्रवर्तन के माध्यम से साकार किया जाना चाहिए ताकि लोगों को स्वास्थ्य सेवाएँ मिलें, न कि लाभ के लिए।

अभ्यास प्रश्न 

बढ़ते निजीकरण और कम सार्वजनिक व्यय के कारण भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में असमानताएँ बढ़ती जा रही हैं। इस संदर्भ में, भारत में स्वास्थ्य के अधिकार को न्यायसंगत अधिकार के रूप में साकार करने में आने वाली चुनौतियों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

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