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Dec 12 2025

संदर्भ 

सर्वोच्च न्यायालय ने विनीता श्रीनंदन बनाम बॉम्बे हाई कोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर मामले में नवी मुंबई की एक महिला को आपराधिक अवमानना के लिए दंडित करने वाले बॉम्बे उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

  • अपमानजनक परिपत्र जारी: एक हाउसिंग सोसाइटी की निदेशक ने आवारा कुत्तों को खाना खिलाने से संबंधित मुकदमे के दौरान न्यायाधीशों कोडॉग माफिया’ का हिस्सा बताते हुए एक नोटिस जारी किया।
  • उच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने स्वतः अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करते हुए माना कि उनकी टिप्पणियों ने न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न की है।
    • उच्च न्यायालय ने उसकी माफी को मात्र औपचारिक और असत्यनिष्ठ मानते हुए उसे एक सप्ताह के साधारण कारावास एवं 2,000 रुपये के दंड से दंडित किया।
  • सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप: सर्वोच्च न्यायालय ने यह देखते हुए दोषसिद्धि को रद्द कर दिया कि अवमानना ​​की शक्ति न्यायाधीश का व्यक्तिगत कवच नहीं है।
  • पश्चाताप पर बल: सर्वोच्च न्यायालय ने उनके द्वारा प्रारंभिक रूप से व्यक्त किए गए निःशर्त पश्चाताप को ध्यान में रखा और इस बात पर जोर दिया कि न्यायालय की अवमानना ​​अधिनियम (1971) की धारा 12 सद्भावनापूर्ण माफी माँगने पर सजा में छूट प्रदान करती है।

न्यायालय की अवमानना ​​के बारे में

  • न्यायालय की अवमानना ​​उन कृत्यों को संदर्भित करती है, जो न्यायपालिका की गरिमा, अधिकार या प्रभावी कार्यप्रणाली को कमजोर करते हैं।
  • इसका उद्देश्य न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखना, न्यायिक आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करना और न्याय में बाधा उत्पन्न करने वाली घटनाओं से न्यायालयों की स्वतंत्रता की रक्षा करना है।
  • न्यायालय की अवमानना ​​के उदाहरण
    • न्यायाधीशों के विरुद्ध मानहानि के आरोप लगाना।
    • संचालित मामलों में गवाहों या जनमत को प्रभावित करना।
    • न्यायालय की कार्रवाई में बाधा डालना।

न्यायालय की अवमानना ​​संबंधी वैश्विक उदाहरण

वैश्विक स्तर पर, अवमानना ​​संबंधी कानून न्यायिक प्रतिष्ठा की रक्षा की तुलना में न्याय में वास्तविक बाधा उत्पन्न करने को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।

  • यूनाइटेड किंगडम: वर्ष 2013 मेंन्यायालय की अवमानना करना’ के अपराध को समाप्त कर दिया गया, केवल संचालित कार्रवाई में हस्तक्षेप करने (विचाराधीन) या न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन करने से संबंधित अवमानना ​​को ही बरकरार रखा गया।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: प्रथम संशोधन के तहत मजबूत सुरक्षा प्रदान की गई है, जो अवमानना ​​को केवल न्याय के लिए स्पष्ट और तात्कालिक खतरा’ उत्पन्न करने वाले आचरण तक सीमित करती है (ब्रिज्स बनाम कैलिफोर्निया, 1941)।
    • न्यायाधीशों की आलोचना करना संवैधानिक रूप से संरक्षित है।
  • कनाडा और ऑस्ट्रेलिया: ‘वास्तविक जोखिम’ परीक्षण का पालन करना, जिसमें अवमानना ​​केवल तभी लागू होती है जब किसी व्यक्ति का वक्तव्य न्याय प्रशासन के लिए वास्तविक और पर्याप्त जोखिम उत्पन्न करता है।

न्यायालय की अवमानना ​​के प्रकार

  • सिविल अवमानना: न्यायालय के किसी निर्णय, आदेश, निर्देश या वचन का जानबूझकर उल्लंघन करना या न्यायालय को दिए गए किसी वचन का उल्लंघन करना।
    • अवज्ञा जानबूझकर होनी चाहिए, आकस्मिक या वास्तविक अक्षमता के कारण नहीं।
    • इसका उपयोग न्यायालय के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है (उदाहरण के लिए, सरकारी आदेश, सेवा संबंधी मामले, मुआवजा मामले)
  • आपराधिक अवमानना: इससे तात्पर्य ऐसे प्रकाशन या कार्य से है, जो:-
    • किसी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में बाधा उत्पन्न करता है या बाधा उत्पन्न करने की प्रवृत्ति रखता है।
    • न्यायिक कार्यवाही में पूर्वाग्रह उत्पन्न करता है या हस्तक्षेप करता है।
    • न्याय प्रशासन में बाधा डालता है।

संवैधानिक और कानूनी ढाँचा 

  • संवैधानिक आधार
    • अनुच्छेद 129: सर्वोच्च न्यायालय कोअभिलेख न्यायालय’ घोषित करता है और उसे स्वयं की अवमानना ​​के लिए दंड देने का अधिकार देता है।
    • अनुच्छेद 215: प्रत्येक उच्च न्यायालय को रिकॉर्ड न्यायालय घोषित करता है और उसे अवमानना ​​के लिए दंड देने का अधिकार देता है।
      • ये शक्तियाँ अंतर्निहित हैं, जिसका अर्थ है कि वे किसी कानून के बिना भी मौजूद हैं।
  • वैधानिक ढाँचा 
    • न्यायालय की अवमानना ​​अधिनियम, 1971 को अवमानना ​​के संबंध में न्यायालयों की शक्तियों को परिभाषित और सीमित करने के लिए पारित किया गया था, जिसमें न्यायिक अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित किया गया था।
    • दंड (धारा 12)
      • 6 महीने तक का साधारण कारावास।
      • 2,000 रुपये तक का जुर्माना, या दोनों।
      • न्यायालय अवमानना ​​करने वाले को बरी कर सकती हैं या सजा कम कर सकती हैं यदि वह वास्तविक रूप से माफी माँगे (न कि ‘बचाव के हथियार’ के रूप में)।
  • बचाव और अपवाद: अधिनियम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कुछ सुरक्षा उपायों को मान्यता देता है:-
    • सत्य द्वारा औचित्य: सत्य को बचाव के रूप में प्रयोग किया जा सकता है, यदि:
      • यह जनहित में है।
      • यह वास्तविक है (दुर्भावनापूर्ण नहीं)।
    • यह अधिनियम सुरक्षा उपाय प्रदान करता है, जैसे कि-
      • निष्पक्ष आलोचना: न्यायिक कार्यों या निर्णयों की निष्पक्ष, तर्कसंगत और सम्मानजनक आलोचना अवमानना ​​नहीं है।
      • निर्दोष प्रकाशन: लंबित कार्रवाई की जानकारी के बिना प्रकाशन क्षमायोग्य है।
      • निष्पक्ष और सटीक रिपोर्टिंग: न्यायिक आदेशों या कार्रवाई का सटीक प्रकाशन अवमानना ​​नहीं है।

न्यायालय की अवमानना ​​की प्रक्रिया

  •  संज्ञान लेने के तरीके: न्यायालय तीन तरीकों से आपराधिक अवमानना ​​की कार्रवाई शुरू कर सकते हैं।
    • स्वतः संज्ञान
    • महाधिवक्ता के अनुरोध पर
    • महाधिवक्ता की लिखित सहमति से किसी भी व्यक्ति द्वारा
  • न्यायालय की अवमानना ​​(धारा 14): यदि कदाचार सीधे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष होता है, तो न्यायालय अवमाननाकर्ता को आरोपों की सूचना देने और बचाव का अवसर प्रदान करने के बाद तत्काल संक्षिप्त कार्रवाई करता है।
  • सूचना, सुनवाई और साक्ष्य: अन्य अवमानना ​​के मामलों में, न्यायालय सूचना जारी करता है, अधिवक्ता के माध्यम से प्रतिनिधित्व की अनुमति देता है, हलफनामों/साक्ष्यों की जाँच करता है और प्राकृतिक न्याय का पालन सुनिश्चित करता है।

न्यायिक प्रतिमान

  • आश्विनी कुमार घोष बनाम अरविंद बोस मामला (वर्ष 1952): न्यायपालिका की निष्पक्ष एवं तार्किक आलोचना को वैध माना, परंतु ऐसा कोई भी वक्तव्य, जो न्यायपालिका में जन-विश्वास को कम करे, अवमानना माना जाएगा।
  • ब्रजप्रकाश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामला (वर्ष 1953): यह स्थापित किया कि आपराधिक अवमानना के लिए वास्तविक बाधा सिद्ध करना आवश्यक नहीं है, न्यायालय की प्राधिकरण-हानि की प्रवृत्ति भी पर्याप्त है।
  • बरादनाथ मिश्रा बनाम रजिस्ट्रार, ओडिशा उच्च न्यायालय (वर्ष 1974): न्यायालय ने निर्णय दिया कि न्यायाधीश के विरुद्ध व्यक्तिगत निंदा अवमानना नहीं है, जब तक कि वह न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप न करे; ऐसे मामलों में दीवानी कार्रवाई उपयुक्त उपाय है।
  • प्रीतम लाल बनाम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (वर्ष 1992): न्यायालय ने कहा कि न्याय-प्रशासन की गरिमा और अधिकार की रक्षा हेतु आवश्यक होने पर अवमानना दंडनीय है।
  • एम.वी. जयराजन बनाम केरल उच्च न्यायालय (वर्ष 2015): सार्वजनिक रूप से न्यायाधीशों के प्रति अपमानजनक/गालीपूर्ण भाषा का प्रयोग संस्थागत अधिकार को क्षति पहुँचाता है और आपराधिक अवमानना है।
  • शन्मुगम बनाम मद्रास उच्च न्यायालय (वर्ष 2025): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अवमानना संबंधे शक्तियाँ न्याय-प्रणाली की अखंडता की रक्षा हेतु हैं, न कि न्यायाधीशों को व्यक्तिगत अपमान से बचाने के लिए।

न्यायालय की अवमानना के पीछे तर्क

  • न्यायिक प्राधिकरण की रक्षा: अवमानना संबंधी शक्तियाँ सुनिश्चित करती हैं कि न्यायालय के आदेशों का पालन हो, जिससे न्यायपालिका का नैतिक और संस्थागत अधिकार सुरक्षित रहता है।
    • यदि आदेशों का पालन न हो, तो निर्णय केवल सलाह बन जाएँगे और न्यायपालिका के अधिकार-संरक्षक होने की भूमिका कमजोर होगी।
  • विधि के शासन को सुनिश्चित करना: न्यायालय के आदेशों का अनुपालन संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने और कार्यपालिका की निरंकुशता रोकने के लिए अनिवार्य है।
    • सर्वोच्च न्यायलय बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (वर्ष 1998) में कहा गया कि अवमानना शक्ति, विधि के शासन को बनाए रखने का अभिन्न अंग है।
  • न्यायिक स्वतंत्रता की सुरक्षा: अवमानना संबंधी प्रावधान न्यायाधीशों को निराधार आरोपों, दुरुपयोग और बदनाम करने से बचाते हैं, जिससे वे निष्पक्ष निर्णय ले सकें।
    • इन रे’ अरुंधति रॉय मामले (वर्ष 2002) में न्यायालय ने कहा कि न्यायाधीशों पर अनुचित आरोप जन-विश्वास को कमजोर करते हैं।
  • न्याय प्रशासन सुनिश्चित करना: अवमानना संबंधी शक्तियाँ, न्यायालय के भीतर या बाहर होने वाले ऐसे आचरण को रोकती हैं जो सुनवाई में बाधा उत्पन्न करता है या निर्णय को प्रभावित करता है।
    • साक्ष्यों को प्रभावित करना, कार्रवाई में व्यवधान उत्पन्न करना, या भ्रामक सामग्री प्रकाशित करना न्यायिक निष्पक्षता को क्षति पहुँचाता है।
  • जन-विश्वास बनाए रखना: विश्वसनीय न्याय-प्रणाली हेतु जनता का विश्वास आवश्यक है; अवमानना अधिकार का उपयोग न्यायपालिका की सार्वजनिक छवि की रक्षा हेतु किया जाता है।
    • E.M.S. नमबूदिरिपाद बनाम टी.एन. नम्बियार (वर्ष 1970) मामले में कहा गया कि न्यायाधीशों पर असंयमित हमले न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को कम करते हैं।

अवमानना की आलोचना

  • मुक्त अभिव्यक्ति का हनन: आपराधिक अवमानना की व्यापक व्याख्या, विशेषतः न्यायालय को बदनाम करने’ की संकल्पना, न्यायिक कार्यप्रणाली की वैध आलोचना को भी दबा सकती है।
    • एम.वी. जयराजन (वर्ष 2010) मामला दर्शाता है कि जवाबदेही से संबंधित मुद्दों को भी अवमानना मान लिया जाता है।
    • इससे अनुच्छेद 19(1)(a) एवं अनुच्छेद 19(2) के प्रतिबंधों के बीच असंतुलन उत्पन्न होता है।
  • अस्पष्टता: ‘न्यायालय की अवमानना’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, जिससे असंगत व्याख्या और चयनात्मक उपयोग की संभावना बढ़ती है।
    • विधि आयोगों (200वीं रिपोर्ट और 274वीं रिपोर्ट) ने पाया कि यह अपराध अप्रचलित है और इसका दुरुपयोग होने की संभावना है।
  • हित-संघर्ष: कई अवमानना मामलों में न्यायाधीश स्वयं ही अपने विरुद्ध आरोपों की सुनवाई करते हैं, जिससे निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय पर प्रश्न उठते हैं।
    • न्यायमूर्ति सी.एस. कर्णन के अवमानना ​​​​कार्यवाही (वर्ष 2017) के दौरान, आलोचकों ने तर्क दिया कि जिस संस्था की अधिकारिता पर सवाल उठाया गया था, उसी संस्था ने मुकदमे का संचालन किया, जिससे हितों का अंतर्निहित टकराव उत्पन्न हुआ।
  • जवाबदेही पर दमनकारी प्रभाव: अवमानना का भय पत्रकारों, शोधकर्ताओं और नागरिक समाज को न्यायपालिका की आलोचनात्मक समीक्षा से रोकता है।
    • न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर इस बात पर जोर देते हैं कि आलोचना के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता सार्वजनिक बहस को बाधित करती है, जो लोकतांत्रिक निगरानी के लिए आवश्यक है।
  • प्रक्रियात्मक विलंब: कार्रवाई शुरू करने के लिए अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 20 में निर्धारित एक वर्ष की वैधानिक समय-सीमा के बावजूद, अवमानना के मामले प्रायः वर्षों तक लंबित रहते हैं, जिससे उनकी तात्कालिकता समाप्त हो जाती है और मनमानी की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।।
    • सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध लंबे समय तक संचालित अवमानना ​​​​की कार्रवाइयों सहित कई उदाहरण यह दर्शाते हैं कि विलंबित प्रवर्तन से निवारण कमजोर होता है और उच्च न्यायालयों में मामलों का बोझ बढ़ जाता है।

आगे की राह 

  • स्पष्ट परिभाषाएँ: ‘न्यायालय की अवमानना’ के दायरे को सीमित करना और वस्तुनिष्ठ मानदंडों को संहिताबद्ध करना दुरुपयोग को कम कर सकता है।
  • न्यायाधीश और संस्था में अंतर: किसी न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने वाली आलोचना को न्यायिक कार्यप्रणाली पर हमलों से अलग किया जाना चाहिए, जिससे आनुपातिक प्रतिक्रिया सुनिश्चित हो सके।
  • सत्य और जनहित रक्षा को मजबूत करना: धारा 13 के अंतर्गत मजबूतसत्य-आधारित’ बचाव लागू करना, साक्ष्य-आधारित आलोचना की सुरक्षा करेगा और न्यायिक जवाबदेही को बढ़ाएगा।
  • अवमानना ​​शक्ति का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में करना: न्यायालयों को दंड आरोपित करने से पहले चेतावनी, मार्गदर्शन और सुलह को प्राथमिकता देनी चाहिए।
    • ब्रिटेन नेन्यायालय की अवमानना’ के अपराध को वर्ष 2013 में समाप्त कर दिया, यह कहते हुए कि यह प्रावधान अप्रासंगिक है और आधुनिक मुक्त अभिव्यक्ति मानकों के अनुकूल नहीं है।
  • न्यायिक पारदर्शिता और संचार को बढ़ावा देना: तर्कसंगत प्रतिक्रियाएँ देना और खुलेपन को बढ़ावा देना, बार-बार अवमानना ​​का आह्वान किए बिना स्वाभाविक रूप से सम्मान का निर्माण कर सकता है।

निष्कर्ष 

अवमानना ​​के लिए एक संतुलित ढाँचा तैयार किया जाना चाहिए जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किए बिना न्यायिक अधिकार की रक्षा करे, यह सुनिश्चित करते हुए कि भारत की न्याय प्रणाली के भीतर जवाबदेही, गरिमा और लोकतांत्रिक पारदर्शिता सह-अस्तित्व में रहें।

अभ्यास प्रश्न

‘न्यायपालिका की अवमानना’ ​​संबंधी शक्ति प्रभावी न्याय वितरण के लिए आवश्यक है, लेकिन इसका उपयोग लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के उपकरण के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।’ वर्तमान न्यायिक निर्णयों और भारत में अवमानना ​​कानून की रूपरेखा के संदर्भ में टिप्पणी कीजिए।

UHC: 2025 वैश्विक निगरानी रिपोर्ट

WHO और विश्व बैंक की 2025 की एक नई संयुक्त रिपोर्ट सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में हुई प्रगति को दर्शाती है, लेकिन चेतावनी देती है कि अरबों लोग अभी भी सेवाओं की कमी और वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।

रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ 

  • सेवा कवरेज में प्रगति: संक्रामक रोगों से संबंधित कार्यक्रमों और गैर-संक्रामक रोगों में लगातार हो रही प्रगति के कारण सेवा कवरेज सूचकांक (SCI) वर्ष 2000 में 54 से बढ़कर वर्ष 2023 में 71 हो गया।
  • निरंतर आर्थिक कठिनाई: स्वास्थ्य संबंधी खर्चों के लिए अत्यधिक भुगतान करने वाले लोगों की संख्या 34% से घटकर 26% हो गई है, फिर भी 21 लाख लोग आर्थिक कठिनाई का सामना कर रहे हैं।
  • बढ़ती असमानताएँ: सबसे गरीब परिवारों में से तीन-चौथाई स्वास्थ्य खर्चों के कारण आर्थिक कठिनाई का सामना कर रहे हैं, जबकि सबसे अमीर परिवारों में से 25 में से 1 से भी कम परिवार इस तरह के दबाव का सामना कर रहे हैं।
  • वर्ष 2030 के लक्ष्यों को प्राप्त करने में एक प्रमुख कमी यह है कि वर्तमान गति से वैश्विक सामाजिक सुरक्षा कवरेज (SCI) वर्ष 2030 तक केवल 74/100 के स्तर तक ही पहुँच पाएगा, जबकि तब भी विश्व की लगभग 25% आबादी स्वास्थ्य संबंधी वित्तीय कठिनाइयों का सामना करती रहेगी।

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) के बारे में

  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का अर्थ है कि सभी लोग आर्थिक कठिनाई का सामना किए बिना गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सकें।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का वैश्विक लक्ष्य: वर्ष 2015 में, संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने सतत् विकास लक्ष्यों के तहत वर्ष 2030 तक सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त करने की प्रतिबद्धता जताई, जिसकी निगरानी SDG संकेतक 3.8.1 और 3.8.2 के माध्यम से की जाती है।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) संकेतकों के वर्ष 2025 के संशोधन में अब 14 सेवा कवरेज सूचकांक निर्धारक और OOP व्यय से उत्पन्न होने वाली वित्तीय दुर्गमता के एक अधिक परिष्कृत माप का उपयोग किया गया है।।

महत्त्व

  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) स्वास्थ्य के मानव अधिकार को बढ़ावा देता है और चिकित्सा व्ययों के कारण होने वाली गरीबी से परिवारों की रक्षा करता है।
  • यह आर्थिक स्थिरता को मजबूत करता है, कमजोर समूहों को प्राथमिकता देकर समानता को बढ़ावा देता है और सरकारों को कुशल, जन-केंद्रित स्वास्थ्य प्रणालियों को डिजाइन करने में मार्गदर्शन करता है।

सूर्य किरण-19

भारत और नेपाल ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में अभ्यास सूर्यकिरण के 19वें संस्करण के तहत दो दिवसीय बटालियन स्तरीय अभ्यास का आयोजन किया।

अभ्यास की मुख्य विशेषताएँ 

  • विशिष्ट तकनीकों का एकीकरण: इस अभ्यास में उन्नत उपकरणों का उपयोग किया गया, जैसे कि-
    • खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) प्रणालियाँ
    • सटीक लक्ष्यीकरण आधारित ड्रोन
    • उन्नत दिन और रात के हथियार दृष्टि उपकरण
    • AI-सक्षम निगरानी जानकारी
  • आतंकवाद-विरोधी गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित: इन अभ्यासों में उच्च-तीव्रता वाले आतंकवाद-विरोधी अभियानों का अनुकरण किया गया, जिसमें संयुक्त सामरिक प्रतिक्रियाओं, गोपनीय क्षेत्रों में घुसपैठ, दुर्गम क्षेत्रों में वन और पर्वतीय युद्ध, टोही और समन्वित आक्रमण रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

अभ्यास सूर्यकिरण के बारे में

  • द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास: यह भारत और नेपाल के बीच आयोजित होने वाला एक वार्षिक द्विपक्षीय संयुक्त सैन्य अभ्यास है, जो वर्ष 2011 से नियमित रूप से आयोजित किया जा रहा है।
  • मेजबानी: इस अभ्यास की मेजबानी क्रमश: भारत और नेपाल करते हैं, जिससे दोनों देशों की समान भागीदारी और प्रशिक्षण वातावरण का आदान-प्रदान सुनिश्चित होता है।
  • उद्देश्य 
    • अंतर-संचालनीयता को सुदृढ़ करना: इस अभ्यास का उद्देश्य दोनों सेनाओं के बीच अंतर-संचालनीयता में वृद्धि करना है, विशेष रूप से आतंकवाद-विरोधी अभियानों, वन युद्ध और पर्वतीय युद्ध में।
    • मानवीय और आपदा प्रतिक्रिया (HADR): इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र (UN) ढाँचे के तहत संचालित HADR अभियानों में समन्वय को बेहतर बनाना है।
    • परिचालनात्मक तैयारी: यह अभ्यास विमानन सहायता, चिकित्सा तैयारी और पर्यावरण संरक्षण प्रथाओं सहित परिचालन तत्परता पर भी केंद्रित है।
  • पूर्ववर्ती संस्करण
    • 18वाँ संस्करण: जनवरी 2025 में नेपाल के सालझंडी में आयोजित किया गया।
    • 17वाँ संस्करण: दिसंबर 2023 में भारत के उत्तराखंड में आयोजित किया गया।

ऑपरेशन ‘हिंटरलैंड ब्रू’

राजस्व आसूचना निदेशालय (DRI) ने ‘ऑपरेशन हिंटरलैंड ब्रू’ के तहत महाराष्ट्र में एक बड़े अवैध मादक पदार्थ निर्माण गिरोह को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया है।

ऑपरेशन हिंटरलैंड ब्रू के बारे में

  • स्थान: महाराष्ट्र के वर्धा के पास करंजा (घाडगे) में एक गोपनीय दवा फैक्ट्री पर छापा मारकर इस ऑपरेशन का क्रियान्वयन किया गया।
  • लगभग 192 करोड़ रुपये के अनुमानित बाजार मूल्य का मेफेड्रोन (एक कृत्रिम ड्रग) जब्त किया गया।
  • कानूनी कार्रवाई: NDPS अधिनियम, 1985 (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट) की संबंधित धाराओं के तहत गिरफ्तारियाँ की गईं।
  • यह अभियान सरकार के ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ का समर्थन करता है।

‘मेफेड्रोन’ के बारे में

  • ‘मेफेड्रोन’ कैथिनोन और एम्फेटामाइन वर्ग का एक कृत्रिम उत्तेजक पदार्थ है।
  • इसे एक नया मनोसक्रिय पदार्थ (NPS) माना जाता है।
  • सामान्य रूप से सफेद या हल्के सफेद रंग का पाउडर, क्रिस्टल, कैप्सूल या टैबलेट जैसा होता है।
  • अन्य प्रचलित नाम: म्याऊ म्याऊ, एम-कैट, ड्रोन, बबल्स, व्हाइट मैजिक, प्लांट फूड
  • मुख्य प्रभाव: उत्साह, ऊर्जा में वृद्धि, सामाजिकता और सहानुभूति उत्पन्न करता है, जिसके प्रभाव MDMA, एम्फेटामाइन और कोकीन के समान होते हैं।

राजस्व आसूचना निदेशालय (DRI)

  • राजस्व आसूचना निदेशालय (DRI) भारत में जाँच और संचालन के लिए तस्करी रोधी, खुफिया सर्वोच्च एजेंसी है।
  • स्थापना: वर्ष 1957 में स्थापित।
  • मुख्यालय: नई दिल्ली।
  • शासकीय निकाय: वित्त मंत्रालय के अधीन केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) के तहत कार्य करता है।

भारत 6G मिशन

केंद्रीय संचार मंत्री ने भारत 6G मिशन के अंतर्गत गठित सर्वोच्च परिषद की बैठक की अध्यक्षता की और भारत 6G  गठबंधन की प्रगति की समीक्षा की।

भारत 6G मिशन

  • लॉन्च: भारत सरकार द्वारा मार्च 2023 में लॉन्च किया गया।
  • दृष्टि: वर्ष 2030 तक भारत को 6G प्रौद्योगिकी में वैश्विक रूप से अग्रणी बनाना।
  • उद्देश्य: स्वदेशी 6G प्रौद्योगिकियों, मानकों और बौद्धिक संपदा अधिकारों का विकास करना।
    • अति-तीव्र कनेक्टिविटी सक्षम करना: 1 Tbps की गति, 1 माइक्रोसेकंड का विलंब।
    • उभरते क्षेत्रों का समर्थन करना: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, होलोग्राफिक संचार, मेटावर्स, रोबोटिक्स और दूरस्थ स्वास्थ्य सेवा।
    • शिक्षा जगत और उद्योग के सहयोग के माध्यम से अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना।
  •  6G टेक्नोलॉजी इनोवेशन ग्रुप (TIG): प्रयासों के समन्वय के लिए सर्वोच्च निकाय, 6G विजन डॉक्यूमेंट रोडमैप तैयार करता है।

भारत 6G अलायंस (B6GA) के बारे में

  • भारत 6G अलायंस एक बहु-हितधारक सहयोगात्मक मंच है जो शिक्षा जगत, उद्योग, स्टार्टअप और सार्वजनिक संस्थानों को एक साथ लाता है।
  • इसका उद्देश्य भारत में विश्व स्तरीय, भविष्य के लिए तैयार 6G पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
  • अनुसंधान एवं विकास, नवाचार और मानकीकरण पर ध्यान केंद्रित करते हुए, B6GA अगली पीढ़ी की संचार प्रौद्योगिकियों में वैश्विक नेतृत्व के भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत ने मुंबई में IALA काउंसिल के तीसरे सत्र की मेजबानी की

केंद्रीय बंदरगाह , जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री (MoPSW) ने मुंबई में आयोजित ‘इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ मरीन एड्स टू नेविगेशन एंड लाइटहाउस अथॉरिटीज’ (IALA) काउंसिल के तीसरे सत्र का वर्चुअल रूप से उद्घाटन किया।

IALA परिषद के तीसरे सत्र की मुख्य विशेषताएँ

  • आयोजक: यह शिखर सम्मेलन लाइटहाउस और लाइटशिप महानिदेशालय एवं केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री (MoPSW) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया है।
  • डिजिटल टिकटिंग पोर्टल: 75 लाइटहाउस स्थलों पर डिजिटल पहुँच को सक्षम बनाने और आगंतुकों की सुविधा को बेहतर बनाने के लिए लाइटहाउस पर्यटन हेतु डिजिटल टिकटिंग पोर्टल लॉन्च किया गया है।

‘इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ मरीन एड्स टू नेविगेशन एंड लाइटहाउस अथॉरिटीज’ (IALA) काउंसिल के बारे में

  • यह एक अंतरसरकारी संगठन (IGO) है, जो समुद्री नौवहन सहायक उपकरणों के लिए वैश्विक मानक निर्धारित करता है।
  • मुख्यालय: सेंट-जर्मेन-एन-लाये, फ्राँस।
  • सदस्यता: दिसंबर 2025 तक, IALA के 42 सदस्य देश हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुद्री नौवहन सहायक संगठन सम्मेलन की पुष्टि, स्वीकृति या सदस्यता स्वीकार की है।
  • IALA परिषद: यह संगठन का प्रमुख निर्णय लेने वाला निकाय है।
  • कार्य
    • नौवहन सहायक उपकरणों (AtoN) के लिए वैश्विक मानक विकसित करता है।
    • समुद्री नौवहन प्रणालियों के सामंजस्य को बढ़ावा देता है।
    • तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण प्रदान करता है।
    • स्वायत्त नौवहन, उपग्रह-आधारित प्रणालियों और डिजिटल नौवहन उपकरणों जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने में सहयोग करता है।
    • समुद्र में जहाजों के संचालन में उपयोग होने वाली समुद्री चिह्न प्रणालियों के लिए प्रसिद्ध है।
  • भारत और IALA: भारत वर्ष 1957 में अपनी स्थापना के बाद से IALA का एक दीर्घकालिक सदस्य रहा है और वर्ष 1980 से लाइटहाउस और लाइटशिप महानिदेशालय के माध्यम से परिषद का सदस्य रहा है।

संदर्भ

कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने GlowCas9 नामक एक जैव-प्रकाशित CRISPR प्रोटीन विकसित किया है, जो जीवित कोशिकाओं के अंदर जीनोम एडिटिंग को वास्तविक समय में देखने में सक्षम बनाता है।

जीन थेरेपी और CRISPR-Cas9 के बारे में

  • जीन थेरेपी की क्षमता: जीन थेरेपी कई घटक आनुवंशिक रोगों का स्थायी उपचार हो सकती है, लेकिन प्रभावी, किफायती और सुरक्षित तरीके विकसित करना दशकों से एक चुनौती बना हुआ है।
  • CRISPR-Cas9 कार्यप्रणाली: ‘क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट्स’ (CRISPR) एक गाइड RNA का उपयोग करके Cas9 एंजाइम को एक विशिष्ट DNA अनुक्रम तक निर्देशित करता है, जहाँ यह DNA को सटीक रूप से काटकर आनुवंशिक दोषों को ठीक करता है।
  • अवलोकन में सीमाएँ: वैज्ञानिक जीवंत कोशिकाओं में Cas9 की कार्यप्रणाली को वास्तविक समय में अवलोकित नही कर नहीं पाए हैं, और मौजूदा पहचान विधियों के लिए कोशिकाओं को स्थिर करना या विखंडित करना आवश्यक था, जिससे प्रक्रिया को घटित होते हुए निगरानी करना असंभव हो गया था।
  • वास्तविक समय निगरानी की आवश्यकता: जीन एडिटिंग को घटित होते हुए निगरानी करने से जीवित कोशिकाओं और ऊतकों में बिना उन्हें नष्ट किए CRISPR प्रक्रियाओं की निगरानी करने में मदद मिल सकती है।

GlowCas9 के बारे में

  • GlowCas9 एक CRISPR प्रोटीन है, जो जीवित प्रणालियों के भीतर जीन एडिटिंग करते समय प्रकाशमान होता है।
  • डिजाइन: GlowCas9 को अर्कादीप कर्माकर ने समुद्री झींगे के प्रोटीन से प्राप्त विभाजित नैनो-ल्यूसिफेरेज एंजाइम के साथ Cas9 को मिलाकर डिजाइन किया है।
  • प्रकाश उत्सर्जन प्रक्रिया: Cas9 के सही ढंग से विकृत होने पर निष्क्रिय एंजाइम के टुकड़े फिर से जुड़ जाते हैं, जिससे प्रकाश उत्पन्न होता है।
    • ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब इन टुकड़ों को पास लाया जाता है, तो वे एंजाइम आधारित गतिविधि को सक्रीय करने के लिए पुनः जुड़ सकते हैं और जुगनूओं के हल्के प्रकाश के समान एक दृश्य संकेत उत्पन्न कर सकते हैं।
  • वास्तविक समय आधारित दृश्यीकरण क्षमता: यह प्रकाश उत्सर्जित करने वाली गतिविधि जीवित कोशिकाओं, ऊतकों और पौधों की पत्तियों में CRISPR प्रक्रियाओं की निगरानी को बिना किसी क्षति पहुँचाए संभव बनाती है।

GlowCas9 के लाभ

  • तापमान स्थिरता (Thermostability): GlowCas9 अत्यधिक स्थिर है और पारंपरिक एंजाइम की तुलना में उच्च तापमान पर भी अपनी संरचना और सक्रियता बनाए रखता है।
    • जीन थेरेपी के लिए ऐसी स्थिरता आवश्यक है, जहाँ स्थिर Cas9 वितरण से उपचार की सफलता दर बढ़ती है।
  • DNA मरम्मत की सटीकता में वृद्धि: GlowCas9 समरूपता-निर्देशित मरम्मत (Homology-Directed Repair-HDR) की सटीकता को बढ़ाता है, जो सिकल सेल एनीमिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और अन्य जैसी आनुवंशिक बीमारियों से जुड़े वंशानुगत उत्परिवर्तनों को ठीक करने के लिए महत्त्वपूर्ण DNA मरम्मत प्रक्रिया है।
  • पौधों में ट्रैकिंग: GlowCas9 को पौधों में भी देखा जा सकता है। यह फसल सुधार में संभावित सुरक्षित, नॉन-ट्रांसजेनिक अनुप्रयोगों की ओर संकेत करता है।
  • थेराट्रैकिंग: GlowCas9 थेराट्रैकिंग में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, क्योंकि यह गतिशील आणविक जीन-थेरेपी प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखने की क्षमता प्रदान करती है।।
    • यह हमें ऐसे भविष्य के निकट लाता है, जहाँ वैज्ञानिक न केवल जीन को एडिट करेंगे बल्कि एक फोटॉन के माध्यम से उपचार की प्रक्रिया को भी अवलोकित करेंगे।

संदर्भ

केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि निजी कंपनियों को नीलाम किए गए अपतटीय खनन ब्लॉक समुद्री संरक्षित क्षेत्रों को छोड़कर ही चिन्हित किए गए हैं।

जैव विविधता हॉटस्पॉट: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए, सरकार ने 106 ‘महत्त्वपूर्ण तटीय और समुद्री जैव विविधता क्षेत्रों’ (ICMBAs) की पहचान की है, जिन्हें विशेष संरक्षण प्राप्त होगा।

पृष्ठभूमि

  • नवंबर 2024: केंद्र सरकार ने केरल के तट से दूर निर्माण-योग्य रेत के 13 ब्लॉक, गुजरात के तट से दूर चूना-मिट्टी के 3 ब्लॉक और ग्रेट निकोबार द्वीप समूह के तट से दूर पॉलीमेटैलिक नोड्यूल और क्रस्ट के 7 ब्लॉकों की नीलामी का प्रस्ताव रखा।
  • जन विरोध: केरल के मछुआरों और नागरिक समाज समूहों ने चेतावनी दी कि अपतटीय खनन से समुद्री जीवन नष्ट हो जाएगा, मत्स्य भंडार कम हो जाएगा और आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।
    • केरल विधानसभा ने नीलामी का विरोध करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया।

पर्यावरण सुरक्षा पर सरकार का स्पष्टीकरण

  • समुद्री संरक्षित क्षेत्रों का अपवर्जन: सरकार ने स्पष्ट किया है कि तटीय राज्यों में स्थित 130 समुद्री संरक्षित स्थलों और महत्त्वपूर्ण तटीय एवं समुद्री जैव विविधता क्षेत्रों (ICMBAs) को अपतटीय खनन गतिविधियों के लिए निर्धारित क्षेत्रों से बाहर रखा गया है।
  • अपतटीय क्षेत्र खनिज संरक्षण एवं विकास नियम, 2024: उत्पादन गतिविधियाँ तभी शुरू की जा सकती हैं जब एक उत्पादन योजना को मंजूरी मिल जाए, जो यह सुनिश्चित करे कि खनन से संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों को कोई नुकसान न पहुँचे।
  • संस्थागत तंत्र: सरकार ने एक अपतटीय क्षेत्र खनिज ट्रस्ट की स्थापना की है, जिसमें तटीय राज्य प्रमुख हितधारक हैं।
    • ट्रस्ट को प्राप्त होने वाले संसाधनों का उपयोग अपतटीय क्षेत्रों में अनुसंधान एवं अध्ययन, पर्यावरण प्रशासन और खनन कार्यों से उत्पन्न प्रतिकूल पारिस्थितिक प्रभावों के शमन के लिए किया जाएगा।

अपतटीय खनन के बारे में

  • अपतटीय खनन से तात्पर्य समुद्र तल से खनिजों और बहुमूल्य सामग्रियों के निष्कर्षण से है। इसमें समुद्र के जल के नीचे स्थित संसाधनों की खोज और पुनर्प्राप्ति शामिल है।
  • महत्त्व
    • यह भूगर्भीय भंडारों में कमी के बीच महत्त्वपूर्ण धातुओं की बढ़ती माँग को पूरा करता है।
    • यह खनिज आयात पर भारत की निर्भरता को भी कम करता है, जिससे महत्त्वपूर्ण संसाधनों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलता है।

भारत में अपतटीय खनन की संभावनाएँ

  • भारत का अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) दो मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में विस्तृत है।
  • भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने अपतटीय खनिज भंडारों की महत्त्वपूर्ण पहचान की है।
    • चूना मिट्टी: गुजरात और महाराष्ट्र के तटों पर पाई जाती है।
    • निर्माण-योग्य रेत: केरल तट पर पाई जाती है।
    • भारी खनिज भंडार: ओडिशा, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के तटों पर पाए जाते हैं।
    • बहुधात्विक पिंड: अंडमान सागर और लक्षद्वीप सागर में पाए जाते हैं।

अपतटीय खनन को नियंत्रित करने वाले कानून और नियम

  • अपतटीय क्षेत्र खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 2002: OAMDR अधिनियम, 2002 भारत के प्रादेशिक जल, महाद्वीपीय शेल्फ, अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और अन्य समुद्री क्षेत्रों में खनिज अन्वेषण और विकास को नियंत्रित करता है।
    • वर्ष 2023 में किए गए प्रमुख संशोधन
      • गहरे समुद्र में खनिज अन्वेषण और खनन में निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति देता है।
      • अपतटीय खनन पट्टों के आवंटन के लिए एक प्रतिस्पर्द्धी ई-नीलामी प्रणाली शुरू करता है।
      • खनन ब्लॉकों के लिए 50 वर्ष की पट्टा अवधि निर्धारित करता है।

अपतटीय क्षेत्र (खनिज संसाधन अस्तित्व) नियम, 2024

  • ये नियम खनिज तेलों और हाइड्रोकार्बन को छोड़कर सभी अपतटीय खनिजों पर लागू होते हैं।
  • ये नियम न तो परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं और न ही परमाणु खनिजों से संबंधित MMDR अधिनियम, 1957 के प्रावधानों को।

संदर्भ 

वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) की ‘कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज’ (CoP20) की 20वीं बैठक उज्बेकिस्तान के समरकंद में संपन्न हुई।

CITES के बारे में

  • ‘वाशिंगटन कन्वेंशन’ के नाम से भी जाना जाने वाला CITES, लुप्तप्राय पौधों और जानवरों के संरक्षण के लिए एक बहुपक्षीय संधि है।

  • इसका मसौदा वर्ष 1963 में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के सदस्यों की एक बैठक में पारित प्रस्ताव के परिणामस्वरूप तैयार किया गया था।
  • यह कन्वेंशन वर्ष 1973 में हस्ताक्षर के लिए प्रस्तावित किया गया था और CITES 1 जुलाई, 1975 को लागू हुआ।
  • CITES कन्वेंशन के सदस्य देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी है, और वे सभी देश इसके लक्ष्यों को लागू करने के लिए अपने घरेलू कानून बनाने के लिए बाध्य हैं।
  • परिशिष्ट: CITES के अंतर्गत आने वाली प्रजातियों को उनकी सुरक्षा की आवश्यकता के अनुसार तीन परिशिष्टों में सूचीबद्ध किया गया है।
    • परिशिष्ट I में विलुप्त होने के खतरे से संबंधित प्रजातियाँ शामिल हैं। इन प्रजातियों का व्यापार केवल असाधारण परिस्थितियों में ही अनुमत है।
    • परिशिष्ट II: इसमें वे प्रजातियाँ शामिल हैं जो आवश्यक रूप से विलुप्त होने के खतरे में नहीं हैं, लेकिन जिनके व्यापार को नियंत्रित करना आवश्यक है, ताकि उनके अस्तित्व के लिए प्रतिकूल उपयोग से बचा जा सके।
    • परिशिष्ट III: इसमें वे प्रजातियाँ शामिल हैं, जिन्हें कम-से-कम एक देश में संरक्षित किया गया है जिसने व्यापार को नियंत्रित करने में सहायता के लिए CITES के अन्य सदस्य देशों से अनुरोध किया है।
  • सचिवालय: CITES सचिवालय का संचालन UNEP द्वारा किया जाता है और यह स्विट्जरलैंड के जिनेवा में अवस्थित है।
  • सदस्य देश: वर्तमान में CITES के 185 सदस्य देश हैं।
    • भारत ने वर्ष 1976 में वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) की पुष्टि की, जिससे वह कन्वेंशन का एक सक्रिय पक्षकार बन गया।

CITES  ‘कॉन्फ्रेंस  ऑफ पार्टीज’ 

  • निर्णय लेने वाली संस्था: COP, CITES की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है, जिसकी बैठक प्रत्येक 2-3 वर्ष में होती है।
  • परिशिष्ट संशोधन: COP प्रजातियों की स्थिति की समीक्षा करती है और परिशिष्ट I, II और III में प्रजातियों को सूची में ऊपर, नीचे या सूची से बाहर करने संबंधी निर्णय लेती है।
  • नीतिगत एवं अनुपालन समीक्षा: COP वन्यजीव व्यापार पर आधारित वैश्विक नीतियाँ निर्धारित करती है, प्रस्ताव पारित करती है, सदस्य देशों द्वारा उनके कार्यान्वयन का मूल्यांकन करती है और अवैध वन्यजीव व्यापार के विरुद्ध प्रवर्तन उपायों को मजबूत करती है।

CoP20 के प्रमुख परिणाम

  • समरकंद, उज्बेकिस्तान में आयोजित, यह सम्मलेन मध्य एशिया में आयोजित पहला सम्मेलन था।
  • CoP20 ने CITES की 50वीं वर्षगाँठ को चिह्नित किया।
  • प्रतिनिधियों ने 50 प्रस्तावों की समीक्षा की और 77 प्रजातियों को CITES परिशिष्टों में जोड़ा।
  • प्रमुख संशोधन: कई प्रजातियों को अधिक संरक्षण प्राप्त हुआ (परिशिष्ट I)
    • इनमें ओशनिक व्हाइटटिप शार्क, व्हेल शार्क और मंटा और डेविल रे की सभी प्रजातियाँ शामिल हैं।
    • इक्वाडोर ने गैलापागोस स्थलीय और समुद्री इगुआना को सूचीबद्ध करने के सफल प्रयासों का नेतृत्व किया।
    • कैमरून और इथियोपिया ने भी क्रमशः होम्स हिंज-बैक टर्टल और बाले एंड इथियोपियन माउंटेन एडर्स के लिए परिशिष्ट I में सूचीकरण प्राप्त किया।
  • सफल ‘डाउनलिस्टिंग’: कुछ प्रजातियों को उनके संरक्षण में दर्ज सुधार के आधार पर कम प्रतिबंधात्मक श्रेणियों में स्थानांतरित कर दिया गया।।
    • मेक्सिको ने ग्वाडालूप फर सील और पार्लाटोर के पोडोकार्प को लुप्तप्राय प्रजातियों की सूची से हटा दिया।
    • कजाकिस्तान ने साइगा मृग को परिशिष्ट II से हटाने का सफल प्रयास किया।
    • दक्षिण अफ्रीका ने भी बोन्टेबोक मृग के लिए यही उपलब्धि हासिल की।
  • भारत की भूमिका: भारत ने अधिक आबादी संबंधी आँकड़ों की माँग करते हुए गुग्गुल (Guggul) को सूचीबद्ध करने के यूरोपीय संघ के प्रस्ताव का सफलतापूर्वक विरोध किया।

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN)

  • वैश्विक संरक्षण संस्था: अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN), जिसकी स्थापना वर्ष 1948 में हुई थी, सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और विशेषज्ञों के साथ विश्व का सबसे बड़ा और सबसे पुराना पर्यावरण नेटवर्क है।
  • रेड लिस्ट: यह संकटग्रस्त प्रजातियों की IUCN रेड लिस्ट प्रकाशित करता है।
  • नीतिगत प्रभाव: यह जैव विविधता पर अभिसमय (CBD), CITES और जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) जैसे वैश्विक समझौतों को वैज्ञानिक डेटा एवं सलाह प्रदान करता है, और जैव विविधता संरक्षण योजना में देशों का समर्थन करता है।

संदर्भ 

सर्वोच्च न्यायलय ने पुडुचेरी की एक नाबालिग लड़की को उसकी माँ की पहचान के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र प्राप्त करने की अनुमति दी, जबकि उसके पिता अनुसूचित जाति समुदाय से नहीं थे।

मुख्य न्यायाधीश का प्रश्न

  • न्यायिक टिप्पणी: सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, ‘बदलते समय के साथ, जाति माता के साथ क्यों न चले?’ – यह पहली बार था जब किसी मुख्य न्यायाधीश ने इस मुद्दे को इतने सीधे तौर पर उठाया।
  • महत्त्व: यह आदेश कानून को अंतिम रूप नहीं देता, बल्कि न्यायिक दृष्टांतों में नए आयाम जोड़ता है, जिससे बहस निश्चित वंश-परंपरा के प्रश्न से हटकर उन सामाजिक परिस्थितियों पर केंद्रित हो जाती है जिनमें बच्चे का पालन-पोषण होता है।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का दर्जा निर्धारित करने वाला कानूनी ढाँचा

  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए विशेष उपबंधो की अनुमति देते हैं।
  • राष्ट्रपति आदेश: अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समूहों की पहचान अनुच्छेद 341 और 342 के तहत राष्ट्रपति आदेशों द्वारा निर्धारित की जाती है और यह राज्य-विशिष्ट है।
  • पारंपरिक प्रथा: सरकारें पुराने परिपत्रों और प्रथागत हिंदू कानून के आधार पर इस नियम का पालन करती आई हैं कि बच्चा पिता की जाति ग्रहण करता है।
  • आरक्षण कानून, व्यक्तिगत कानून नहीं: आरक्षण सामाजिक असमानता से संबंधित है। अनुच्छेद 39 और अनुच्छेद 46 इस बात पर जोर देते हैं कि लाभ संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने के लिए हैं, न कि जाति को वंशानुगत संपत्ति के रूप में मान्यता देने के लिए।

बच्चे की जाति निर्धारण में न्यायिक निर्धारकों का विकास

  • पुनीत राय मामले का संदर्भ (वर्ष 2003): सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि वैधानिक कानून के अभाव में जाति आमतौर पर पिता के अनुसार ही होती है।
    • हालाँकि, न्यायालय ने माता की जाति को अस्वीकार नहीं किया।
  • रमेशभाई मामला (वर्ष 2012): न्यायालय ने पुनीत राय मामले की जाँच की और वलसम्मा पॉल मामले (वर्ष 1996) के उस अंश पर पुनर्विचार किया जिसमें एक महिला द्वारा पति की जाति अपनाने की बात कही गई है।
    • न्यायालय ने निर्णय दिया कि उस अंश के आधार पर बच्चे की जाति का निर्धारण करना ‘गलत और अनुचित’ है।
    • जो व्यक्ति उच्च जाति में जन्मा हो, लेकिन गोद लेने, विवाह या धर्मांतरण के कारण बाद में किसी पिछड़ी जाति में स्थानांतरित हो जाए, वह अपने जीवन में प्राप्त प्रारंभिक सामाजिक-आर्थिक लाभ के कारण आरक्षण का दावा नहीं कर सकता है।
    • अंतरजातीय दंपत्ति का बच्चा अनुसूचित जाति वाले माता-पिता की जाति का दावा कर सकता है, बशर्ते यह प्रमाणित हो कि उसका पालन-पोषण उसी अनुसूचित जाति वाले माता-पिता ने किया, वह उसी समुदाय में पला-बढ़ा और उसने उस समुदाय की सामाजिक परिस्थितियों का वास्तविक अनुभव किया।
    • न्यायालय ने कहा कि जातिगत लाभों को विरासत के रूप में नहीं माना जा सकता है।

संदर्भ 

भारत के प्रतिष्ठित प्रकाश पर्व दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची (वर्ष 2025) में शामिल किया गया है। यह घोषणा यूनेस्को के 20वें अंतरसरकारी समिति सत्र के दौरान की गई, जो नई दिल्ली के लाल किले में आयोजित हुआ था।

  • इसे एक ‘जीवंत विरासत’ के रूप में मान्यता प्राप्त है जो उदारता, खुशहाली और सामुदायिक भावना को बढ़ावा देती है।

दीपावली के बारे में

  • दीपावली, जिसे दिवाली के नाम से भी जाना जाता है, पूरे भारत भर में विभिन्न व्यक्तियों और समुदायों द्वारा प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला प्रकाश का त्योहार है।
  • यह वर्ष की अंतिम फसल और नववर्ष तथा नई ऋतु के आगमन का प्रतीक है।
  • यह चंद्र पंचांग के अनुसार, अक्टूबर या नवंबर में अमावस्या के दिन मनाया जाता है।
  • यह एक आनंदमय अवसर है जो अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
  • इस दौरान, लोग अपने घरों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई और सजावट करते हैं, दीपक और मोमबत्तियाँ जलाते हैं, आतिशबाजी करते हैं और समृद्धि एवं नई शुरुआत के लिए प्रार्थना करते हैं।
  • साझा विरासत और पहचान की जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में, दीपावली सामाजिक बंधनों को मजबूत करती है, समावेशिता को बढ़ावा देती है और अच्छे मूल्यों को प्रोत्साहित करती है।

अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) के बारे में

  • अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में वे प्रथाएँ, अभिव्यक्तियाँ, ज्ञान और कौशल शामिल हैं, जिन्हें समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान के हिस्से के रूप में पहचानते हैं और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ

  • अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) को समुदाय द्वारा मान्यता प्राप्त होनी चाहिए, समय के साथ इसका हस्तांतरण होना चाहिए और यह सांस्कृतिक विविधता के लिए पहचान, निरंतरता और सम्मान में योगदान देना चाहिए।
  • भारत की यूनेस्को-सूचीबद्ध ICH: भारत में यूनेस्को की 16 अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) तत्व हैं, जिनमें शामिल हैं:-
    • रामलीला (उत्तर भारत, 2008), रम्माण (2009), कुटियाट्टम (केरल, 2008), वैदिक मंत्रोच्चार (अखिल भारतीय, 2008), मुदियेट्टू (केरल, 2010), छऊ नृत्य (झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, 2010), कालबेलिया (राजस्थान, 2010), लद्दाख बौद्ध मंत्रोच्चार (लद्दाख, 2012), संकीर्तन (मणिपुर, 2013), ठठेरा शिल्प (पंजाब, 2014), योग (भारत, 2016), कुंभ मेला (भारत, 2017), दुर्गा पूजा (कोलकाता, 2021), गरबा (गुजरात, 2023), नवरोज (पारसी, भारत, 2024), दीपावली (2025)।

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