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Dec 13 2025

संदर्भ

कर्नाटक हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025, भारत का पहला राज्य स्तरीय कानून है जो विशेष रूप से हेट स्पीच से संबंधित है।

कर्नाटक हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025 के प्रमुख प्रावधान

  • विस्तृत परिभाषा: धर्म, जाति, समुदाय, लिंग, यौन अभिविन्यास, जन्म स्थान, निवास स्थान, भाषा, दिव्यांगता या जनजाति के आधार पर किया गया कोई भी कार्य या अभिव्यक्ति ‘हेट स्पीच’ और ‘हेट क्राइम’ की श्रेणी में आता है।
    • हेट स्पीच: किसी भी समूह के प्रति जानबूझकर आहत करने, शत्रुता, घृणा या दुर्भावना उत्पन्न करने के उद्देश्य से सार्वजनिक रूप से की गई कोई भी अभिव्यक्ति, चाहे वह मौखिक, लिखित, इलेक्ट्रॉनिक अथवा दृश्य रूप में हो।
      • आधार: धर्म, जाति, नस्ल या लिंग जैसे पहचान चिह्नों के आधार पर समूहों को लक्षित करना।
    • हेट क्राइम: हेट स्पीच का संचार, प्रकाशन या प्रसार, या ऐसे भाषण को बढ़ावा देने, प्रचारित करने, उकसाने या प्रयास करने का कोई भी कार्य।
      • उद्देश्य: किसी भी व्यक्ति (जीवित या मृत), समूह या संगठन के प्रति असामंजस्य, शत्रुता, घृणा या दुर्भावना उत्पन्न करना।
  • कठोर दंड: अपराधों को संज्ञेय (बिना वारंट के गिरफ्तारी की अनुमति) और गैर-जमानती घोषित किया गया है।
    • सजा न्यूनतम एक वर्ष से शुरू होती है और बार-बार अपराध करने वालों के लिए 1 लाख रुपये तक के जुर्माने के साथ 10 वर्ष तक की कैद तक बढ़ाई जा सकती है।
  • पीड़ित सहायता: ‘हेट क्राइम’ से हुए नुकसान की गंभीरता के आधार पर पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा प्रदान करने का प्रावधान शामिल किया गया है।
  • डिजिटल सामग्री हटाने की शक्ति: राज्य के अधिकारियों को सोशल मीडिया कंपनियों और सेवा प्रदाताओं को सीधे निर्देश देने का अधिकार दिया गया है कि वे अपने प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रसारित घृणास्पद सामग्री को ब्लॉक या हटा दें।
  • संगठनात्मक जवाबदेही: विधेयक सामूहिक जवाबदेही की अवधारणा को लागू करता है, जिसके तहत किसी संगठन में नियंत्रण या जिम्मेदारी के पदों पर आसीन व्यक्ति अपने समूह की गतिविधियों से जुड़े अपराधों के लिए उत्तरदायी होंगे।
  • छूट: विधेयक के प्रावधान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रकाशित किसी भी पाठ्यपुस्तक, पुस्तिका, लेख, रचना, रेखाचित्र, पेंटिंग, प्रस्तुतिकरण या आकृति पर लागू नहीं होते हैं, न ही ऐसे किसी प्रकाशन पर जिनका प्रकाशन जनहित में किया गया हो।
    • इसमें विज्ञान, साहित्य, कला, शिक्षा से संबंधित सामग्री या वे सामग्री शामिल हैं जिनका उपयोग वास्तविक विरासत या धार्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

PWOnlyIAS विशेष

इस विधेयक के गुण-दोष

  • प्रवर्तन संबंधी कमियों को दूर करना: यह कानून मौजूदा व्यापक भारतीय न्याय संहिता (BNS) धाराओं (जैसे 196 और 299) की सीमाओं से परे जाकर एक विशिष्ट कानून बनाकर मौजूदा विधायी कमी को दूर करने का प्रयास करता है, जिनके कारण ऐतिहासिक रूप से दोषसिद्धि दर कम रही है।
    • मौजूदा कानूनों [जैसे- पूर्व भारतीय दंड संहिता (IPC) 153A/295A, अब BNS] के तहत दोषसिद्धि दर उल्लेखनीय रूप से कम है, जो 21% से नीचे बनी हुई है।
  • पीड़ित-केंद्रित: यह कानून पीड़ित मुआवजे का प्रावधान करता है और पुनर्स्थापनात्मक न्याय पर केंद्रित प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाते हुए समर्पित जाँच तंत्र का प्रस्ताव करता है।
  • वास्तविक घटनाओं पर प्रतिक्रिया: यह कानून कर्नाटक में हिंसा और व्यापक ऑनलाइन घृणा अभियानों से हुए नुकसान सहित वास्तविक खतरों और सामाजिक असामंजस्य के लिए एक प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया है।

विधेयक को लेकर उठ रही चिंताएँ

  • अतिव्यापक परिभाषा: इस विधेयक में ‘दुर्भावना’ और ‘मनोवैज्ञानिक क्षति’ जैसे अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिनका दुरुपयोग आलोचना या व्यंग्य को निशाना बनाने के लिए आसानी से किया जा सकता है।
    • इस प्रकार की अस्पष्टता अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 21 के लिए खतरा है, जो श्रेया सिंघल (2015) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध है।
    • इसकी शिथिल व्याख्या और कठोर दंड राजद्रोह और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम में देखी गई पद्धति को दोहराते हैं, जहाँ असहमति और राजनीतिक विरोध को दबाने के लिए व्यापक शक्तियों का दुरुपयोग किया गया था।
  • छूट के बावजूद भय का प्रभाव: यद्यपि विधेयक में छूट (कला, विज्ञान आदि के लिए) सूचीबद्ध हैं, आपराधिक न्याय प्रणाली की दंडात्मक प्रकृति (संज्ञेय, गैर-जमानती अपराध) का अर्थ है कि प्रक्रिया (गिरफ्तारी और हिरासत) ही दंड बन जाती है।
    • इसलिए ये अपवाद वैध अभिव्यक्ति पर भय के प्रभाव के विरुद्ध व्यावहारिक रूप से कोई विशेष राहत प्रदान नहीं करते हैं।
  • संघवाद और क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण: राज्य के कानून का आपराधिक कानून क्षेत्र (समवर्ती सूची का विषय) में अतिक्रमण, हाल ही में अधिनियमित भारतीय न्याय संहिता (BNS) और केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के साथ केंद्र-राज्य संघर्ष का गंभीर जोखिम उत्पन्न करता है।
  • असंतुलित दंड: गैर-जमानती अपराधों और 10 वर्ष तक के कारावास के प्रावधानों के साथ, मात्र शब्दों के लिए सजा की गंभीरता असंगत है।
    • यह अनुच्छेद 21 के तहत सख्त आनुपातिकता परीक्षण में विफल रहता है, जैसा कि कौशल किशोर (2023) मामले में पुनः स्पष्ट किया गया है।
  • सेंसरशिप में कार्यपालिका की अति: पुलिस उपाधीक्षकों (DSP) और कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को न्यायालय की मंजूरी के बिना सीधे सामग्री हटाने के आदेश जारी करने की अनुमति देना महत्त्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को समाप्त करता है, जो अमीश देवगन मामले (2020) में उल्लिखित सिद्धांतों के विपरीत है।
    • यह शक्ति भारतीय न्याय संहिता (BNS) के साथ संघर्ष का जोखिम भी उत्पन्न करती है और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियम, 2021 का उल्लंघन करती है, जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए अनिवार्य उचित परिश्रम की आवश्यकताएँ शामिल हैं।
  • सामूहिक दायित्व: यह कानून नेताओं को उनके सदस्यों के भाषण के लिए जिम्मेदार ठहराता है, जो अनुच्छेद 19(1)(b) का गंभीर रूप से उल्लंघन करने का जोखिम पैदा करता है, जो राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक समूहों के लिए संघ की स्वतंत्रता है।
  • उत्प्रेरण संबंधी सीमा का अभाव: इस विधेयक में ‘तत्काल हिंसा’ से संबंध की संवैधानिक आवश्यकता का अभाव है, जो अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित करने के लिए खतरनाक रूप से कम सीमा निर्धारित करता है, इस प्रकार प्रवासी कल्याण (2014) में निर्धारित सख्त दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है।

आगे की राह

कानून को प्रभावी और संवैधानिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए, एक सुविचारित रणनीति आवश्यक है:-

  • विधायी जाँच और समीक्षा: इस विधेयक को गहन जन परामर्श के लिए एक चयन समिति या संयुक्त समिति को भेजा जाना चाहिए, जिसमें इसके प्रावधानों को परिष्कृत करने के लिए कानूनी विशेषज्ञों और नागरिक समाज के सदस्यों को शामिल करना सुनिश्चित किया जाए।
  • सटीक, संवैधानिक परिभाषाएँ अपनाना: राज्य को हिंसा के लिए उकसाने पर केंद्रित परिभाषा तैयार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2021 के हेट स्पीच संबंधी दिशा-निर्देशों और विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट की अनुशंसाओं को अपनाना चाहिए, न कि अस्पष्ट व्यक्तिपरक नुकसानों पर।
  • न्यायिक निगरानी अनिवार्य करना: सामग्री हटाने के आदेशों से संबंधित सभी कार्यकारी कार्रवाइयों को न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व स्वीकृति (उदाहरण के लिए, 24 घंटे के भीतर) के अधीन किया जाना चाहिए।
    • यह उचित प्रक्रिया की रक्षा करता है और सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है।
  • छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना: कानून को पहली बार किए गए या छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना चाहिए, और गंभीर उकसावे या संगठित अपराध से जुड़े मामलों के लिए ही उच्च कारावास की सजा का प्रावधान करना चाहिए।
    • छोटे अपराधों के लिए नागरिक दंड और अनिवार्य परामर्श का प्रावधान होना चाहिए।
  • प्रतिवाद को बढ़ावा देना: नागरिकों को आलोचनात्मक सोच कौशल से युक्त करने के लिए राज्य को मीडिया साक्षरता और शिक्षा में निवेश करना चाहिए।
    • लोकतांत्रिक समाधान सेंसरशिप पर निर्भर रहने के बजाय सक्रिय रूप से प्रतिवाद और सकारात्मक विचारों को बढ़ावा देना है।

क्या अन्य राज्यों को कर्नाटक की तर्ज पर ‘हेट स्पीच’ संबंधी विधेयक अपनाना चाहिए?

  • हेट स्पीच’ का मुद्दा पूरे भारत में एक गंभीर चुनौती है। हालाँकि अन्य राज्यों को कार्रवाई करनी चाहिए, उन्हें कर्नाटक के जोखिम भरे मॉडल को दोहराने से बचना चाहिए। इसका ध्यान मौजूदा कानूनों के बेहतर प्रवर्तन पर होना चाहिए, न कि ऐसे नए कानून बनाने पर जिनका आसानी से दुरुपयोग किया जा सके।
  • कर्नाटक मॉडल अन्य राज्यों के लिए जोखिम भरा क्यों है?
    • नीचे दी गई तालिका दर्शाती है कि विधेयक से न्यूनतम लाभ मिलता है, जबकि यह कई महत्त्वपूर्ण कानूनी खतरे उत्पन्न करता है जो इसे अपनाने वाले किसी भी राज्य के लिए समस्या का कारण बनेंगे:-

पहलू मौजूदा राष्ट्रीय कानून (भारतीय न्याय संहिता – और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम) कर्नाटक के विधेयक से क्या लाभ होगा? अन्य राज्यों के लिए जोखिम
परिभाषा इसकी कोई विशेष परिभाषा नहीं है; किंतु संभावित हिंसा के लिए उकसावे के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित मानकों के आधार पर इस पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। ‘गलत उद्देश्य’ और ‘असहजता’ जैसे बड़े शब्द। इससे कानूनी अस्पष्टता और अनुचित राजनीतिक प्रयोग की संभावना बढ़ जाती है।
ऑनलाइन टेकडाउन केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम [(IT अधिनियम) की धारा 69A और वर्ष 2021 के नियमों के तहत प्रक्रियात्मक कदम (सरकारी पहुँच समिति (GAC) की निगरानी] अनिवार्य हैं। न्यायिक अनुमोदन के बिना स्थानीय पुलिस/मजिस्ट्रेट द्वारा सीधे तौर पर तोड़फोड़ के आदेश देना। यह केंद्रीय सुरक्षा उपायों को उपेक्षित करता है, कार्यपालिका की निरंकुशता को बढ़ावा देता है और अत्यधिक सेंसरशिप को प्रोत्साहित करता है।
दंड शत्रुता पूर्ण अपराधों के लिए 3–7 वर्ष तक की सजा। दस वर्ष तक की सजा, गैर-जमानती, और इसमें संगठनों के लिए सामूहिक दायित्व शामिल है। सजा की मात्रा बहुत अधिक है।
दोषसिद्धि दरें यह दर कम है, लगभग 20%, जिसका मुख्य कारण खराब जाँच और गलत FIR रिपोर्ट (FIR) है। वही पुलिस फोर्स, नया लेबल। नए कानून खराब तरीके से लागू करने या पुलिस ट्रेनिंग की कमी को ठीक नहीं करते हैं।
पक्षपातपूर्ण हिंसा भारतीय न्याय संहिता (BNS) धारा 103 (2) घृणा से प्रेरित हत्या के लिए दंड को बढ़ाती है। इसमें ‘हेट क्राइम’ का नया टैग जोड़ा गया है और पीड़ित मुआवजे का प्रावधान भी शामिल है। पीड़ितों को मुआवजा देना उपयोगी है, लेकिन इसे किसी नए, विवादास्पद कानून की आवश्यकता के बिना मौजूदा राज्य योजनाओं के माध्यम से लागू किया जा सकता है।

बेहतर विकल्प- मौजूदा प्रणाली को मजबूत करना

दुरुपयोग की संभावना वाले नए उपकरण बनाने के बजाय, राज्यों को मौजूदा केंद्रीय कानूनों के कार्यान्वयन को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए:-

  • पुलिस सुधार और प्रशिक्षण
    • अनिवार्य स्वतः संज्ञान FIR: सर्वोच्च न्यायालय (SC) के उस निर्देश का सख्ती से पालन करना, जिसमें पुलिस को औपचारिक शिकायतों की प्रतीक्षा किए बिना, हेट स्पीच पाए जाने पर स्वतः संज्ञान के माध्यम से मामले दर्ज करने का निर्देश दिया गया है।
    • विशेष शाखाएँ: प्रशिक्षित जाँच के लिए पुलिस बलों के भीतर सांप्रदायिक अपराध संबंधी विशेष शाखाएँ स्थापित करना।
  • न्यायिक दक्षता
    • फास्ट-ट्रैक कोर्ट: BNS शत्रुता धाराओं के तहत दायर मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए समर्पित विशेष न्यायालयों की स्थापना की जाए (जैसे- कुछ अपराधों के लिए केरल मॉडल)।
  • पीड़ित सहायता
    • मुआवजा बढ़ाना: वैमनस्यतापूर्ण हिंसा से होने वाले नुकसान को दूर करने के लिए, मौजूदा राज्य पीड़ित मुआवजा योजनाओं में तुरंत सुधार करना और उन्हें बढ़ाना।
  • सामाजिक और डिजिटल रोकथाम
    • मीडिया लिटरेसी बढ़ाना: नागरिकों को फेक न्यूज और वैमनस्यता से बचाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान शुरू करना और शिक्षा में डिजिटल साक्षरता को एकीकृत करना।
    • काउंटर-स्पीच को बढ़ावा देना: तर्कसंगत संवाद और रचनात्मक प्रतिवाद को बढ़ावा देने के लिए नागरिक समाज के प्रयासों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित और समर्थन करना।

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हेट स्पीच के बारे में

  • परिभाषा: संयुक्त राष्ट्र की हेट स्पीच संबंधी रणनीति और कार्य योजना हेट स्पीच को इस प्रकार परिभाषित करती है:- ‘भाषण, लेखन या व्यवहार के माध्यम से किसी भी प्रकार का संचार, जो किसी व्यक्ति या समूह पर उनके धर्म, जातीयता, राष्ट्रीयता, नस्ल, रंग, वंश, लिंग या अन्य पहचान कारकों के आधार पर हमला करता है या उनके संदर्भ में अपमानजनक या भेदभावपूर्ण भाषा का प्रयोग करता है।’
    • हालाँकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत आज तक हेट स्पीच की कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं है। यह अवधारणा अभी भी चर्चा का विषय है, विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गैर-भेदभाव और समानता के संदर्भ में।
  • कानूनी एवं संवैधानिक प्रावधान: भारत में किसी भी कानून में हेट स्पीच को परिभाषित नहीं किया गया है।
    • हेट स्पीच पर अंकुश लगाने के प्रयास भारत के संवैधानिक प्रावधानों और आपराधिक कानूनों पर आधारित हैं।
    • इन धाराओं का मुख्य उद्देश्य ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ बनाए रखना है, न कि हेट स्पीच को एक अलग श्रेणी के रूप में दंडित करना।
      • संवैधानिक आधार 
        • अनुच्छेद 19(1)(a): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्त्वपूर्ण अधिकार की गारंटी देता है।
        • अनुच्छेद 19(2): सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और अपराध के लिए उकसाने से रोकने के हित में इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
        • यह अनुच्छेद हेट स्पीच पर सभी प्रतिबंधों का आधार है।
      • भारतीय आपराधिक कानून (BNS/IPC): BNS की धारा 196 (पुरानी IPC धारा 153A) पहचान के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता या वैमनस्यता को बढ़ावा देने को दंडनीय बनाती है।
        • पिछली रिपोर्टों में उद्धृत राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में धारा 153A के तहत दोषसिद्धि दर मात्र 20.2% थी।
        • BNS की धारा 299 (IPC की धारा 295A): यह किसी भी समूह की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से किए गए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों को लक्षित करती है।
        • BNS की धारा 505 (पुराना IPC 505): यह उन बयानों या अफवाहों को संबोधित करती है जो सार्वजनिक उपद्रव का कारण बनती हैं या विभिन्न वर्गों के बीच दुर्भावना/घृणा उत्पन्न करती हैं।
      • अन्य कानून: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 में चुनाव प्रचार में घृणा या शत्रुता के उपयोग को दंडित करने के प्रावधान शामिल हैं।

‘हेट क्राइम’ के बारे में

  • ‘हेट क्राइम’ एक आपराधिक कृत्य (जैसे- हमला, हत्या या तोड़फोड़) है, जो विशेष रूप से अपराधी के पूर्वाग्रह या पीड़ित के किसी विशिष्ट सामाजिक समूह में वास्तविक या कथित सदस्यता के प्रति पक्षपात से प्रेरित होता है।
  • मुख्य तत्व: ‘हेट क्राइम’ के लिए दो घटक आवश्यक हैं:-
    • मूल अपराध: यह कृत्य सामान्य आपराधिक संहिता के अंतर्गत पूर्व-स्थापित अपराध होना चाहिए।
    • पूर्वाग्रही प्रेरणा: प्रेरणा पीड़ित की पहचान (जैसे- धर्म, जाति, नस्ल, यौन अभिविन्यास) पर आधारित होती है। यह पूर्वाग्रह एक गंभीर कारक के रूप में कार्य करता है, जिसके कारण बिना किसी पूर्वाग्रह के किए गए समान अपराध की तुलना में अधिक कठोर दंड दिया जा सकता है।
  • भारत में कानूनी स्थिति: भारत में ‘हेट क्राइम’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित और वर्गीकृत करने वाला कोई समर्पित, व्यापक कानून नहीं है।
    • भारतीय न्याय संहिता (BNS, 2023): BNS एक महत्त्वपूर्ण कदम है, क्योंकि यह हत्या जैसे गंभीर अपराधों के लिए पूर्वाग्रह से प्रेरित उद्देश्य को एक गंभीर कारक के रूप में स्पष्ट रूप से मान्यता देता है [उदाहरण के लिए, धारा 103(2)], जिससे सजा को बढ़ाया जा सकता है।
    • ऐतिहासिक दृष्टिकोण: पहले, घृणा से प्रेरित अपराधों पर आमतौर पर सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के उद्देश्य से बनाई गई धाराओं (उदाहरण के लिए, IPC की धारा 153A/295A) के तहत मुकदमा चलाया जाता था।
    • चुनौती: मुख्य कानूनी बाधा FIR स्तर पर पुलिस द्वारा पूर्वाग्रह से प्रेरित उद्देश्य की आधिकारिक रूप से पहचान और पंजीकरण कराने में आने वाली कठिनाई है।
  • ‘हेट क्राइम’ बनाम ‘हेट स्पीच’: दोनों के बीच अंतर करना आवश्यक है:-
    • हेट क्राइम हिंसा या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का ऐसा कृत्य है जो शारीरिक अपराध की सजा को बढ़ा देता है।
    • हेट स्पीच अभिव्यक्ति का एक ऐसा रूप (शब्द, चित्र) है जो घृणा को भड़काने की प्रवृत्ति रखने पर स्वयं अभिव्यक्ति को ही अपराध बना देता है।

भारत में हेट स्पीच से संबंधित प्रमुख निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए प्रतिबंधों पर कानूनी स्पष्टता प्रदान की है:-

  • रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1957): इस मामले में यह पुष्टि की गई कि जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले भाषणों पर प्रतिबंध वैध हैं, क्योंकि ऐसे कृत्यों का सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने से सीधा और घनिष्ठ संबंध है।
  • प्रवासी कल्याण संगठन बनाम भारत संघ (2014): न्यायालय ने एक केंद्रित कानून की आवश्यकता पर बल दिया और विधि आयोग को हेट स्पीच की स्पष्ट कानूनी परिभाषा सहित उपाय सुझाने का निर्देश दिया।
  • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): इस ऐतिहासिक फैसले ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A को उसकी अस्पष्टता और संरक्षित भाषण के दुरुपयोग की संभावना के कारण निरस्त कर दिया। इसने यह स्थापित किया कि अनुच्छेद 19(2) के तहत केवल प्रत्यक्ष उकसावे वाले भाषणों पर ही प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
  • शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022): हेट स्पीच में तीव्र वृद्धि को स्वीकार करते हुए, न्यायालय ने आदेश दिया कि पुलिस और अधिकारियों को औपचारिक शिकायतों की प्रतीक्षा किए बिना अपराधियों के खिलाफ तत्काल, स्वतः कार्रवाई (स्वयं प्रेरित) करनी चाहिए।
  • कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023): इस मामले में राज्य के संवैधानिक दायित्व की पुष्टि की गई कि वह नागरिकों के अधिकारों को सभी स्रोतों से होने वाले नुकसान से बचाए, यहाँ तक ​​कि गैर-राज्य अभिकर्ताओं से होने वाले नुकसान से भी, साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आनुपातिक प्रतिबंधों की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।

‘हेट स्पीच’ को रोकने के लिए भारत के ऐतिहासिक कानूनी प्रयास

  • विश्वनाथन समिति (2015): धारा 66A को निरस्त किए जाने के बाद उत्पन्न कानूनी रिक्तता को भरने के लिए गठित इस विशेषज्ञ पैनल ने IPC में विशिष्ट धाराएँ जोड़ने का प्रस्ताव रखा।
    • इस समिति ने विभिन्न विशेषताओं (जैसे- धर्म, लिंग पहचान, भाषा, दिव्यांगता) के आधार पर समूहों को लक्षित करके अपराध करने के लिए उकसाने पर दो वर्ष तक के कारावास का प्रावधान करते हुए नई धाराएँ 153C(b) और 505A जोड़ने का सुझाव दिया।
  • बेजबरुआ समिति (2014): पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों पर हुए हमलों के बाद गठित इस समिति ने नस्लीय भेदभाव विरोधी प्रावधानों को और अधिक सशक्त बनाने की सिफारिश की।
    • इस समिति ने IPC में संशोधन करके मानव गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले कृत्यों को बढ़ावा देने (पाँच वर्ष तक के कारावास के साथ) और किसी विशेष नृजातीय समूह का अपमान करने (तीन वर्ष तक के कारावास के साथ) जैसे अपराधों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा।
  • भारत का विधि आयोग: 267वीं रिपोर्ट (2017) ने भारतीय दंड संहिता (IPC) में धारा 153C और 505A जोड़ने की सिफारिश की।
    • 267वीं विधि आयोग की रिपोर्ट (2017) के अनुसार, हेट स्पीच एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो मुख्य रूप से किसी समूह के व्यक्तियों के प्रति घृणा उत्पन्न करने के लिए उकसाती है, जिन्हें उनकी पहचान, जैसे कि धर्म, लिंग या यौन अभिविन्यास के आधार पर परिभाषित किया जाता है।
      • इसका उद्देश्य घृणा उत्पन्न करने और हिंसा भड़काने को विशेष रूप से अपराध घोषित करना था, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित सामान्य प्रावधानों से अलग विशिष्ट कानूनी उपाय उपलब्ध हो सकें।
      • इसका कार्य समूह के सदस्यों को अमान्य और हाशिए पर धकेलना है, जिससे भय, भेदभाव और हिंसा उत्पन्न हो सकती है।
      • भाषण अवैध अपराध है या नहीं, यह निर्धारित करना संदर्भ और गैरकानूनी कार्रवाई को उकसाने के उद्देश्य पर अत्यधिक सीमा तक निर्भर करता है।
  • निजी सदस्य विधेयक (2022): हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2022, राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया था। इसका उद्देश्य हेट स्पीच को किसी भी ऐसी अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित करना था जो भेदभाव, घृणा या हिंसा को भड़काती, बढ़ावा देती या प्रसारित करती हो।
    • हालाँकि, यह संसदीय पहल कानून का रूप नहीं ले पाई।

हेट स्पीच पर अंकुश लगाने की आवश्यकता

  • मानवीय गरिमा की रक्षा: हेट स्पीच मूल रूप से लक्षित समूहों की गरिमा और समानता पर हमला करता है (अनुच्छेद 14 और 21), जिससे उनका आत्मसम्मान और सामाजिक स्वीकृति छिन जाती है।
  • सामाजिक ढाँचे का संरक्षण: यह सांप्रदायिक हिंसा, भेदभाव और गहरे सामाजिक विखंडन का एक खतरनाक उत्प्रेरक है, जो धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को खतरे में डालता है।
  • सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना: अनियंत्रित भड़काऊ भाषण प्रायः वास्तविक दुनिया में संघर्षों और कानून-व्यवस्था के विखंडन का कारण बनता है, जो संवैधानिक आदेशों के अनुसार राज्य के हस्तक्षेप को उचित ठहराता है।

हेट स्पीच संबंधी चुनौतियाँ

  • कानूनी और संवैधानिक बाधाएँ
    • अस्पष्ट कानूनी परिभाषा: भारत में हेट स्पीच की कोई स्पष्ट, वैधानिक परिभाषा नहीं है। कानून का प्रवर्तन व्यापक औपनिवेशिक काल के कानूनों (BNS/IPC) पर निर्भर करता है, जो ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ के लिए बनाए गए थे, जिससे मनमानी व्याख्या और दुरुपयोग को बढ़ावा मिलता  है।
    • रोकथाम में विफलता: मौजूदा BNS प्रावधान (धारा 196, 299) अप्रभावी हैं। बार-बार गिरफ्तारियों के बावजूद, दोषसिद्धि दर अत्यंत कम (लगभग 20%) है, जो अपराधियों को रोकने में प्रणालीगत विफलता को दर्शाता है।
    • डर का माहौल: अस्पष्ट कानूनों (जैसे- UAPA/राजद्रोह) के तहत अभियोजन का खतरा प्रायः राजनीतिक असहमति और आलोचना को दबाने के लिए प्रयोग किया जाता है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(a)) के संबंध में भय का वातावरण निर्मित होता है।
  • डिजिटल और प्रवर्तन संबंधी कमियाँ
    • सोशल मीडिया का प्रसार: डिजिटल प्लेटफॉर्म, प्रसारक के रूप में कार्य करते हैं, जिससे घृणास्पद सामग्री तेजी से और तुरंत प्रसारित हो जाती है। यह तीव्र और व्यापक प्रसार प्रायः ऑफलाइन सांप्रदायिक हिंसा और भीड़ द्वारा की जाने वाली कार्रवाई से सीधे तौर पर जुड़ा होता है।
    • कार्रवाई में पूर्वाग्रह: हेट स्पीच के विरुद्ध स्वतः कार्रवाई करने के लिए राजनीतिक और संस्थागत इच्छाशक्ति का लगातार अभाव है, विशेषकर जब ये भाषण हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों द्वारा दिए जाते हैं।
    • अनामता और क्षेत्राधिकार: अपराधियों द्वारा गोपनीय रूप से और भारत के बाहर के सर्वरों से पोस्ट करने की क्षमता स्थानीय पुलिस के लिए पता लगाने, जाँच करने और क्षेत्राधिकार से संबंधित गंभीर समस्याएँ उत्पन्न करती है।
  • सामाजिक और राजनीतिक जोखिम
    • राजनीतिक सामान्यीकरण: राजनीतिक हस्तियाँ चुनावी ध्रुवीकरण के लिए विभाजनकारी बयानबाजी का प्रयोग तेजी से कर रही हैं, जिससे सार्वजनिक चर्चा में वैमनस्य सामान्य हो जाता है।
    • लक्षित प्रभाव: घृणा हाशिए पर स्थित समुदायों (धार्मिक अल्पसंख्यक, दलित, LGBTQ+) को असमान रूप से निशाना बनाती हैं, जिससे उनका अमानवीकरण, भय और हिंसा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

हेट स्पीच को रोकने के लिए वैश्विक पहल और सर्वोत्तम अभ्यास

  • अंतरराष्ट्रीय रूपरेखाएँ (संयुक्त राष्ट्र मार्गदर्शन)
    • संयुक्त राष्ट्र रणनीति एवं कार्य योजना (2019): संयुक्त राष्ट्र द्वारा व्यापक स्तर पर की गई प्रतिबद्धता, जिसमें मूल कारणों (शिक्षा) पर ध्यान केंद्रित करते हुए हेट स्पीच से निपटने का प्रयास किया गया है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया गया है।
    • रबात कार्य योजना (2012): यह योजना संरक्षित भाषण को निषिद्ध उकसावे से अलग करने के लिए छह-भाग परीक्षण (संदर्भ, आशय, संभावना, विषयवस्तु और स्वरूप, प्रसार की सीमा और हानि की संभावना) को परिभाषित करके प्रमुख नैतिक मानदंड प्रदान करती है।
  • विधायी जवाबदेही (EU मॉडल)
    • यूरोपीय संघ का डिजिटल सेवा अधिनियम (DSA): यह अधिनियम बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों (VLOP) के लिए वार्षिक जोखिम मूल्यांकन करना और अवैध सामग्री और प्रणालीगत नुकसान के विरुद्ध जोखिम कम करने के उपाय लागू करना अनिवार्य बनाता है।
      • यह उच्च पारदर्शिता अनिवार्य करता है और उपयोगकर्ताओं को मॉडरेशन संबंधी निर्णयों को चुनौती देने का अधिकार (उचित प्रक्रिया) प्रदान करता है।
      • अनुपालन न करने पर भारी जुर्माना (वैश्विक कारोबार का 6% तक) लगाया जा सकता है।
  • जर्मनी का NetzDG (नेटवर्क प्रवर्तन अधिनियम): इस अधिनियम ने प्लेटफॉर्म की जवाबदेही की शुरुआत की, जिसके तहत ‘स्पष्ट रूप से अवैध’ सामग्री को 24 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य है, अन्यथा भारी जुर्माना लगाया जाएगा।

आगे की राह 

  • विधायी सटीकता और स्पष्टता
    • एक अनुकूलित परिभाषा लागू करना: राज्य या केंद्र स्तर पर किसी भी नए कानून में हिंसा या शत्रुता भड़काने पर केंद्रित और संकीर्ण परिभाषा अपनाई जानी चाहिए।
      • इससे वैध समर्थन के अभियोजन को रोका जा सकेगा और यह सुनिश्चित होगा कि कानून अनुच्छेद 19(2) के मानकों के अनुरूप है।
    • दंडों में आनुपातिकता लागू करना: अपराध की गंभीरता और प्रभाव के आधार पर सजा की मात्रा निर्धारित की जानी चाहिए।
      • अत्यंत कठोर दंड गंभीर, हिंसक उकसावे के लिए आरक्षित होने चाहिए, जबकि कम गंभीर अपराधों के लिए आनुपातिक दंड लागू किए जाने चाहिए।
  • संस्थागत सुदृढ़ीकरण और न्यायिक जाँच
    • न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करना: यह सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य प्रावधान जोड़े जाने चाहिए कि पुलिस द्वारा कार्रवाई आदेश जारी करने, गिरफ्तारी करने या निवारक कार्रवाई करने की शक्ति न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व स्वीकृति के अधीन हो।
      • कार्यपालिका के अतिचार पर यह एक आवश्यक नियंत्रण है।
    • प्रवर्तन क्षमताओं को बढ़ाना: सरकार को हेट क्राइम विरोधी समर्पित इकाइयाँ बनानी चाहिए और इन मामलों की कुशलतापूर्वक जाँच और अभियोजन के लिए त्वरित कानूनी प्रक्रियाएँ स्थापित करनी चाहिए, जिससे वर्तमान में कम दोषसिद्धि दर में वृद्धि हो सके।
  • सामाजिक और शैक्षिक प्रति-उपाय
    • मीडिया साक्षरता को बढ़ावा देना: सरकार को डिजिटल और मीडिया साक्षरता बढ़ाने के लिए व्यापक जन अभियानों और स्कूली पाठ्यक्रमों में निवेश करना चाहिए।
      • इससे नागरिकों को फेक न्यूज और नफरत फैलाने वाले दुष्प्रचार का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने और उन्हें अस्वीकार करने की शक्ति मिलती है।
    • प्रतिवाद को बढ़ावा देना: केवल सेंसरशिप पर निर्भर रहने के बजाय, सरकार और नागरिक समाज को रचनात्मक प्रतिवाद को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित और बढ़ावा देना चाहिए।
      • दुर्भावनापूर्ण भाषण का सबसे प्रभावी लोकतांत्रिक उत्तर, प्रायः सार्वजनिक क्षेत्र में अधिक तर्कसंगत और सकारात्मक भाषण का उपयोग करना होता है।

निष्कर्ष

कर्नाटक विधेयक का उद्देश्य सराहनीय है, किंतु इसकी अस्पष्ट परिभाषाएँ और कठोर दंड आनुपातिकता के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं तथा असहमति को दबाने का जोखिम उत्पन्न करते हैं। वास्तविक सामाजिक सद्भाव के लिए न्यायिक निगरानी और ऐसे सटीक कानूनों की आवश्यकता है, जो केवल अभिव्यक्ति को दंडित करने के बजाय हिंसा के प्रत्यक्ष उकसावे पर केंद्रित हों। स्थायी समाधान सटीक विधायी प्रावधानों, न्यायिक नियंत्रण और सीमित प्रतिबंधों से ही संभव है, जो संवैधानिक स्वतंत्रताओं का उल्लंघन किए बिना मानवीय गरिमा की रक्षा करें।

अभ्यास प्रश्न

भारत में हेट स्पीच कई कारकों का परिणाम है, हाल ही में चर्चा में रहे कर्नाटक हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025 पर चर्चा करते हुए इस संदर्भ में, हेट स्पीच के प्रभाव पर चर्चा कीजिए और इससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सुझाव दीजिए।

हाइड्रोजन ईंधन सेल-संचालित यात्री पोत

भारत ने वाराणसी में अपना पहला पूर्णतः स्वदेशी हाइड्रोजन ईंधन सेल-संचालित यात्री पोत लॉन्च किया है, जो हरित, शून्य-उत्सर्जन अंतर्देशीय जल परिवहन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

हाइड्रोजन ईंधन सेल-संचालित यात्री पोत की विशेषताएँ

  • यह ‘लो टेम्परेचर प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन’ (LT-PEM) हाइड्रोजन ईंधन सेल प्रणाली द्वारा संचालित है, जो केवल जल उत्सर्जित करता है।
  • एक बार हाइड्रोजन भरने पर आठ घंटे तक संचालन क्षमता से सुसज्जित है।
  • हाइड्रोजन ईंधन सेल, बैटरियों और सौर ऊर्जा को एकीकृत करने वाली हाइब्रिड प्रणाली से सुसज्जित है।
  • लगभग 6.5 नॉट की गति जो भारतीय नौवहन पंजीकरण संस्था द्वारा प्रमाणित है।
  • महत्त्व: यह पोत भारत के हरित गतिशीलता संक्रमण को आगे बढ़ाता है, उत्सर्जन में कमी लाता है, शहरी भीड़ को कम करता है, पर्यटन को प्रोत्साहित करता है तथा स्वदेशी स्वच्छ अंतर्देशीय जल परिवहन में मेक-इन-इंडिया नेतृत्व को प्रदर्शित करता है।

‘लो टेम्परेचर  प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन’ (LT-PEM) हाइड्रोजन ईंधन सेल प्रणाली के बारे में

  • यह प्रणाली एक पॉलिमर मेम्ब्रेन का उपयोग कर प्रोटॉनों का संचलन करती है तथा अपेक्षाकृत कम तापमान (लगभग 80 डिग्री सेल्सियस) पर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से विद्युत उत्पन्न करती है।
  • विद्युत का उत्पादन विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया द्वारा होता है, जिसमें हाइड्रोजन गैस को एनोड में प्रविष्ट कराया जाता है, जहाँ उसका ऑक्सीकरण होकर प्रोटॉन मुक्त होते हैं। ये प्रोटॉन पॉलिमर मेम्ब्रेन के माध्यम से कैथोड तक पहुँचते हैं, जहाँ वे ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया कर विद्युत और जल उत्पन्न करते हैं।
  • इसके लाभों में त्वरित प्रारंभ प्रक्रिया, उच्च शक्ति घनत्व, संक्षिप्त आकार और शांत संचलन शामिल हैं।
  • ये प्रणालियाँ वाहनों और पोर्टेबल विद्युत आपूर्ति के लिए उपयुक्त हैं, यद्यपि जल प्रबंधन एक महत्त्वपूर्ण चुनौती बना रहता है।

भारत-इटली JCEC

भारत और इटली ने आर्थिक सहयोग हेतु संयुक्त आयोग के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और औद्योगिक सहयोग को गहराई देने हेतु एक रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।

भारत–इटली आर्थिक सहयोग हेतु संयुक्त आयोग (JCEC) के बारे में

  • यह संयुक्त आयोग भारत और इटली के बीच व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी और औद्योगिक साझेदारियों पर संरचित संवाद को सुगम बनाकर आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से स्थापित एक द्विपक्षीय तंत्र है।

मुख्य घटक

  • यह विनिर्माण, ऑटो घटक, वस्त्र, रक्षा, कृषि तथा खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने हेतु एक संस्थागत ढाँचा प्रदान करता है।
  • अनुसंधान, नवाचार, शिक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकियों में सहयोग को प्रोत्साहित करता है, जिससे औद्योगिक संपर्कों का विविधीकरण होता है।
    • भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड ने इटली के डेनियली समूह को तीन प्रमुख इस्पात संयंत्र परियोजनाएँ प्रदान की हैं, जिनके अंतर्गत अत्याधुनिक हरित प्रौद्योगिकी की आपूर्ति की जाएगी; इनका अनुबंध मूल्य लगभग 500 मिलियन यूरो है।
  • यह भारत–यूरोपीय संघ के व्यापक जुड़ाव के साथ द्विपक्षीय प्रयासों का समन्वय करता है, जिससे प्रस्तावित भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते सहित नए आर्थिक अवसरों को साकार किया जा सके।

भारत–इटली व्यापार की वर्तमान स्थिति

  • द्विपक्षीय व्यापार मात्रा: वर्ष 2024 में भारत–इटली द्विपक्षीय व्यापार लगभग €14.24 अरब यूरो रहा, जिसमें इटली को भारत का निर्यात €9.02 अरब यूरो और इटली से आयात €5.22 अरब यूरो था; इस प्रकार व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में बना रहा।
  • वस्तु व्यापार का परिदृश्य: वित्त वर्ष 2025 में भारत ने इटली को लगभग 7.7 अरब अमेरिकी डॉलर के वस्तुओं का निर्यात किया तथा लगभग 6 अरब अमेरिकी डॉलर का आयात किया, जो द्विपक्षीय वस्तु प्रवाह को दर्शाता है।
  • व्यापार संतुलन: यह भारत के पक्ष में  3.8 अरब यूरो रहा है।
    • यह संतुलन वर्ष 1988 से लगातार भारत के पक्ष में बना हुआ है।

महाकवि सुब्रमण्यम भारती

प्रधानमंत्री ने महाकवि सुब्रमण्यम भारती की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और भारत की सांस्कृतिक जागृति, सामाजिक सुधार तथा राष्ट्रवादी चेतना के निर्माण में उनकी भूमिका को रेखांकित किया।

महाकवि सुब्रमण्यम भारती के बारे में

  • सुब्रमण्यम भारती, जिन्हें उनकी काव्यात्मक प्रतिभा के कारण महाकवि कहा जाता है, तमिलनाडु के एक क्रांतिकारी कवि, स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक सुधारक थे।
  • उनकी रचनाओं में साहस और राष्ट्रवाद की प्रखर भावना निहित थी, जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को अत्यधिक प्रभावित किया।
  • प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म वर्ष 1882 में तमिलनाडु के एट्टयापुरम में हुआ।
    • बाल्यावस्था से ही उन्होंने असाधारण साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया और आधुनिक तमिल साहित्य की एक सशक्त आवाज के रूप में उभरे।
  • उन्होंने पत्रकार के रूप में कार्य किया; वर्ष 1904 में स्वदेशमित्रन से जुड़े और बाद में तमिल साप्ताहिक इण्डिया तथा अंग्रेजी पत्र बाला भारतम का संपादन किया।
  • स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
    • उनके प्रखर राष्ट्रवादी गीतों ने तमिलनाडु में जनसामान्य को संगठित किया और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की भावना को सुदृढ़ किया।
    • वर्ष 1908 में ब्रिटिश शासन द्वारा उन्हें फ्रांसीसी नियंत्रण वाले पुदुचेरी में निर्वासित किया गया, जहाँ उन्होंने एक दशक तक प्रभावशाली राजनीतिक और सामाजिक लेखन किया।
    • उन्होंने क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों का समर्थन किया, पुदुचेरी में अरबिंदो घोष के साथ सहयोग किया और औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध व्यापक लेखन किया।
  • साहित्यिक योगदान: उनकी प्रमुख कृतियों में पांचाली शपथ, कुयिल पाट्टु (कोयल गीत) और कन्नन पाट्टु (कृष्ण गीत) शामिल हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने काव्य अभिव्यक्ति के नए रूप प्रस्तुत किए।
    • उन्होंने वैदिक स्तुतियों, पतंजलि के योगसूत्र तथा भगवद्गीता का तमिल में अनुवाद भी किया, जिससे तमिल बौद्धिक परंपरा समृद्ध हुई।
  • निधन: पुदुचेरी से लौटने के बाद वर्ष 1921 में मद्रास में उनका निधन हो गया।

वर्ष 2025 चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने वर्ष 2025 के चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार के प्राप्तकर्ताओं की घोषणा की, जिनमें तमिलनाडु की ACS सुप्रिया साहू भी शामिल हैं।

ACS सुप्रिया साहू के बारे में

  • परिचय: सुप्रिया साहू तमिलनाडु सरकार के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं तथा जलवायु शासन में एक अग्रणी नवोन्मेषक के रूप में जानी जाती हैं।
  • योगदान: उन्होंने प्रकृति-आधारित समाधानों, निम्न-प्रौद्योगिकी और उच्च-प्रौद्योगिकी जलवायु हस्तक्षेपों को लागू किया। संवेदनशील समुदायों की सहनशीलता को सुदृढ़ किया और बड़े पैमाने पर हरित आजीविका के सृजन को आगे बढ़ाया।
  • प्रेरणा और कार्रवाई–सुप्रिया साहू: सतत् शीतलन, पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन और ताप-अनुकूलन के माध्यम से एकीकृत जलवायु समाधान प्रदान किए। इन पहलों से लगभग  25 लाख हरित रोजगार सृजित हुए।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार’ के बारे में

  • परिचय: चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार, पर्यावरण संरक्षण और सततता के क्षेत्र में पूरे विश्व में परिवर्तनकारी योगदान को मान्यता देने वाला संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का सर्वोच्च पर्यावरणीय सम्मान है।
  • उद्गम: इस पुरस्कार की स्थापना वर्ष 2005 में की गई थी और इसे प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा प्रदान किया जाता है।
  • श्रेणियाँ: यह पुरस्कार पाँच श्रेणियों के अंतर्गत प्रदान किया जाता है (अर्श 2025 के पुरस्कार विजेता)
    • लाइफटाइम अचीवमेंट: मैनफ्रेडी काल्टाजिरोने
    • नीतिगत नेतृत्व: जलवायु परिवर्तन के प्रति संघर्षरत प्रशांत द्वीपीय छात्र
    • प्रेरणा और कार्रवाई: सुप्रिया साहू
    • विज्ञान और नवाचार: इमाजोन
    • उद्यमशील दृष्टि: मरियम इसूफू

आदिचनल्लूर के पास रेत खनन पर प्रतिबंध

मद्रास उच्च न्यायालय ने आदिचनल्लूर लौह युगीन पुरातात्विक स्थल के निकट अथवा गाँव की सीमा के भीतर रेत खनन पर प्रतिबंध लगा दिया है।

आदिचनल्लूर पुरातात्विक स्थल के बारे में

  • यह एक प्राचीन लौह युगीन कलश शवाधान स्थल है, जो महापाषाण संस्कृति को प्रदर्शित करता है।
  • अवथिति: यह तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले में तामिराबरानी नदी के दाएँ तट पर अवस्थित है।
  • काल निर्धारण: यह स्थल 1600 ईसा पूर्व से पूर्व की सभ्यता से संबंधित माना जाता है।
  • सांस्कृतिक संबंध: यह स्थल कोरकई के निकट स्थित है, जो प्राचीन पांड्य साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था और जिसका उल्लेख संगम साहित्य में व्यापक रूप से मिलता है।
  • प्रथम उत्खनन: इस स्थल का प्रथम व्यापक उत्खनन वर्ष 1903–04 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अलेक्जेंडर रिया द्वारा किया गया था।
  • पुरातात्विक महत्त्व: उत्खननों में कलश शवाधान, कंकाल अवशेष, लौह उपकरण, मृद्भांड तथा तांबे की कलाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं।
  • संरक्षण उपाय: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा स्थल पर उत्खनन कार्य किया जा रहा है तथा अतिक्रमण और खनन से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए इसे घेराबंदी द्वारा सुरक्षित किया गया है।

प्रधानमंत्री की जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान की यात्रा

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम एशिया और अफ्रीका में भारत के संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान की तीन देशों की यात्रा पर जाएँगे।

यात्रा का प्रमुख उद्देश्य 

  • इस यात्रा का उद्देश्य जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान के साथ रणनीतिक, आर्थिक और विकासात्मक साझेदारियों को प्रगाढ़ करना तथा पश्चिम एशिया और अफ्रीका के साथ भारत की भागीदारी को मजबूत करना है।
  • इसमें व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, संस्कृति और क्षेत्रीय स्थिरता में सहयोग को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जाएगा।
  • यह यात्रा जॉर्डन के साथ 75 वर्षों और ओमान के साथ 70 वर्षों के राजनयिक संबंधों की वर्षगाँठ के अवसर को भी चिह्नित करती है, जिससे सहयोग का विस्तार और ग्लोबल साउथ की एकजुटता को सुदृढ़ किया जाएगा।

जॉर्डन के बारे में

  • जॉर्डन एक प्रमुख पश्चिम एशियाई देश है, जो अपनी राजनीतिक स्थिरता और रणनीतिक क्षेत्रीय भूमिका के लिए जाना जाता है; इसकी राजधानी अम्मान है।
  • अवस्थिति: यह पश्चिम एशिया के लेवंत क्षेत्र में स्थित है, जो अफ्रीका और एशिया के बीच स्थित एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है।
  • सीमावर्ती देश: दक्षिण और पूर्व में सऊदी अरब, उत्तर-पूर्व में इराक, उत्तर में सीरिया तथा पश्चिम में इजराइल और फिलिस्तीन।
  • भूगोल: यहाँ जॉर्डन घाटी, मृत सागर का तट (पृथ्वी की सतह का सबसे निचला बिंदु) तथा देश के अधिकांश भाग में शुष्क मरुस्थलीय भू-दृश्य पाए जाते हैं।

इथियोपिया के बारे में

  • इथियोपिया पूर्वी अफ्रीका का एक प्रमुख देश और ग्लोबल साउथ में एक महत्त्वपूर्ण साझेदार है; इसकी राजधानी अदीस अबाबा है।
  • अवस्थिति: यह हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र में स्थित है और पूर्वी अफ्रीका तथा लाल सागर क्षेत्र को जोड़ने वाली रणनीतिक स्थिति रखता है।
  • सीमावर्ती देश: उत्तर में इरिट्रिया, पूर्व में जिबूती और सोमालिया, दक्षिण में केन्या तथा पश्चिम में सूडान और दक्षिण सूडान।
  • भूगोल: यह इथियोपियाई उच्चभूमि, ग्रेट रिफ्ट वैली और विविध पठारी क्षेत्रों से युक्त है।

ओमान के बारे में

  • परिचय: ओमान (राजधानी: मस्कट) एक प्रमुख खाड़ी देश है, जिसके भारत के साथ गहरे ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं।
  • अवस्थिति: यह अरब प्रायद्वीप के दक्षिण-पूर्वी तट पर, अरब सागर और ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित है।
  • सीमावर्ती देश: उत्तर-पश्चिम में संयुक्त अरब अमीरात, पश्चिम में सऊदी अरब और दक्षिण-पश्चिम में यमन
  • भूगोल: यहाँ लंबी तटरेखाएँ, हजर पर्वत शृंखला और आंतरिक मरुस्थलीय क्षेत्र हैं, जो इसकी रणनीतिक समुद्री महत्ता को रेखांकित करते हैं।

संदर्भ

हाल ही में, नीति आयोग ने सुझाव दिया कि भारत को दीर्घकालिक वित्तपोषण आवश्यकताओं को पूरा करने और बैंक-आधारित ऋण पर निर्भरता कम करने के लिए अपने कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार को सात गुना विस्तारित करना चाहिए।

  • वर्तमान में भारत का कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार लगभग 650 बिलियन डॉलर का है, जो ब्रिटेन के 4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के बाजार की तुलना में अत्यंत छोटा है; परिणामस्वरूप, अपेक्षाकृत छोटी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद ब्रिटेन का कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार भारत से लगभग छह गुना बड़ा है।

नीति आयोग की रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें

  • नियामकीय समन्वय: भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, भारतीय रिजर्व बैंक तथा कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के बीच समन्वित निगरानी का सुझाव दिया गया है, जिससे अनुमोदन की समय-सीमा कम हो जाएगी और बाजार दक्षता में सुधार के लिए निर्गम प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित किया जा सकेगा।
  • बाजार विस्तार: निर्गमकर्ताओं की श्रेणियों का विस्तार, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की बेहतर पहुँच, द्वितीयक बाजार में तरलता में वृद्धि तथा बीमा और पेंशन कोषों के लिए व्यापक निवेश अनुमतियाँ।
  • प्रौद्योगिकी-आधारित बाजार अवसंरचना: एकीकृत डाटाबेस, पारदर्शी व्यापार मंच तथा डिजिटल इक्विटी जैसी प्रणालियों की सिफारिश, जिससे खुदरा भागीदारी बढ़े और हरित तथा संक्रमण बॉण्ड जैसे नए साधनों को समर्थन मिले।

भारत में कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार के बारे में

  • कॉरपोरेट बॉण्ड बाजार कंपनियों को बॉण्ड जारी कर ऋण जुटाने में सक्षम बनाता है, जिसमें निवेशकों को मूलधन के साथ आवधिक ब्याज का भुगतान किया जाता है।
  • परिभाषा एवं उद्देश्य: कॉरपोरेट बॉण्ड वे ऋण प्रतिभूतियाँ हैं जो व्यवसाय विस्तार, अवसंरचना विकास, कार्यशील पूँजी तथा पुनर्वित्तपोषण के लिए जारी की जाती हैं। इससे निवेशकों को स्वामित्व में कमी किए बिना निश्चित आय प्राप्त होती है।
  • कॉरपोरेट बॉण्ड के प्रकार
    • निवेश-योग्य बनाम उच्च-जोखिम बॉण्ड: अपेक्षाकृत सुरक्षित प्रतिफल बनाम अधिक जोखिम एवं अधिक प्रतिफल वाले विकल्प।
    • सुरक्षित बनाम असुरक्षित बॉण्ड: सुरक्षित बॉण्ड परिसंपत्तियों द्वारा समर्थित होते हैं, जबकि असुरक्षित बॉण्ड निर्गमकर्ता की साख पर आधारित होते हैं।
    • स्थिर दर बनाम परिवर्तनीय दर बॉण्ड: स्थिर कूपन दर स्थायी रहती है, जबकि परिवर्तनीय दर संदर्भ दरों के साथ परिवर्तित होती रहती है।
    • परिवर्तनीय बॉण्ड: निर्धारित शर्तों के अंतर्गत इक्विटी में परिवर्तित किए जा सकते हैं।
    • जीरो-कूपन बॉण्ड: छूट पर जारी किए जाते हैं और बिना आवधिक ब्याज के अंकित मूल्य पर परिपक्वता पर भुनाए जाते हैं।
  • भूमिका: कॉरपोरेट बॉण्ड दीर्घकालिक पूँजी निर्माण में सहायक होते हैं, बैंक-आधारित वित्तपोषण के विकल्प प्रदान करते हैं, मानक ब्याज दरों को प्रभावित करते हैं तथा अवसंरचना और उद्योग के लिए स्थिर वित्तीय स्रोत उपलब्ध कराते हैं।
  • भारत में विनियमन
    • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड: प्राथमिक नियामक के रूप में प्रकटीकरण, पारदर्शिता, इलेक्ट्रॉनिक बुक-बिल्डिंग तथा निवेशक संरक्षण सुनिश्चित करता है।
    • भारतीय रिजर्व बैंक: तरलता, निपटान प्रणालियों, प्रणालीगत जोखिमों तथा ऋण व्युत्पन्नों की निगरानी करता है।
    • हालिया सुधार: ऑनलाइन बॉण्ड मंच प्रदाता, सरल निर्गम नियम, उन्नत रिपोर्टिंग व्यवस्थाएँ तथा खुदरा एवं संस्थागत भागीदारी को व्यापक बनाने के प्रयास।

संदर्भ 

सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि किसी भी प्रकार का बलपूर्वक या अनैच्छिक नार्को परीक्षण असंवैधानिक एवं अवैध है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • सेल्वी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन: न्यायालय ने अमलेश कुमार बनाम बिहार राज्य (वर्ष 2025) में पटना उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि यह सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (वर्ष 2010) में निर्धारित दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है।
  • BNSS के अंतर्गत स्वैच्छिक नार्को परीक्षण: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति BNSS की धारा 253 के अंतर्गत बचाव साक्ष्य के चरण में स्वेच्छा से नार्को-विश्लेषण परीक्षण करवा सकता है।
    • इस प्रकार के परीक्षण का कोई अपरिहार्य या स्वतःसिद्ध अधिकार नहीं है।
  • अनुमति के बिना परीक्षण की असंवैधानिकता: सेल्वी निर्णय का संदर्भ देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्वतंत्र सहमति के बिना किया गया नार्को परीक्षण असंवैधानिक है।
  • साक्ष्य संबंधी प्रतिबंध: बिना सहमति प्राप्त की गई कोई भी जानकारी साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं होगी।

नार्को-विश्लेषण परीक्षण के बारे में

  • एक फोरेंसिक तकनीक, जिसमें किसी संदिग्ध व्यक्ति को बार्बिट्यूरेट्स (जैसे- सोडियम पेंटोथल) जैसी मनो-सक्रिय औषधि दी जाती हैं ताकि उसके संकोच को कम किया जा सके और उसके द्वारा छुपाई गई जानकारी निकलवाई जा सके।
  • स्वैच्छिक सहयोग के अभाव में जानकारी एकत्र करने हेतु इसका प्रयोग जाँच एजेंसियों द्वारा किया जाता है।

नार्को परीक्षण को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक एवं प्रक्रियात्मक संरक्षण

  • अनुच्छेद 20(3): आत्म-अभिशंसन से संरक्षण किसी भी अभियुक्त को स्वयं के विरुद्ध साक्षी बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 20(1): पूर्वव्यापी दंड से संरक्षण किसी ऐसे कृत्य के लिए दंड नहीं दिया जा सकता, जो उसके किए जाने के समय अपराध न हो।
  • अनुच्छेद 20(2): दोहरे-दंड से सुरक्षा, किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता।
  • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रक्रियात्मक संरक्षण: ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ का अर्थ है कि किसी भी परीक्षण से पूर्व सभी आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन अनिवार्य है।

नार्को परीक्षण के साक्ष्यात्मक मूल्य से संबंधित मामले

  • मनोज कुमार सैनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (वर्ष 2023) तथा विनोभाई बनाम केरल राज्य (वर्ष 2025):
    • नार्को परीक्षण के परिणाम अपराध सिद्ध नहीं करते हैं
    • प्राप्त जानकारी जाँच में सहायक हो सकती है, परंतु उसे अन्य साक्ष्यों से पुष्ट करना अनिवार्य है।
    • सहमति सूचित होनी चाहिए, मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज की जानी चाहिए तथा चिकित्सकीय, विधिक एवं प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन आवश्यक है।

नार्को परीक्षण से जुड़ी चिंताएँ

  • अधिकारों का संतुलन: लोकतंत्र में पीड़ित और अभियुक्त दोनों के अधिकारों का संतुलन आवश्यक है; बलपूर्वक परीक्षण आत्म-अभिशंसन से संरक्षण का उल्लंघन करता है।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता: अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता के अधिकार की रक्षा करता है; अनैच्छिक परीक्षण इन मौलिक अधिकारों का हनन है।
  • अधिकारों के ‘गोल्डन ट्रायंगल’ का उल्लंघन: अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 संयुक्त रूप से अधिकारों का ‘गोल्डन ट्रायंगल’ का निर्माण कराते हैं, जैसा कि मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में प्रतिपादित किया गया।
    • निजता के अधिकार का उल्लंघन, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है और परिणामस्वरूप यह संविधान के ‘गोल्डन ट्रायंगल’ का भी उल्लंघन करता है।।

निष्कर्ष

प्रबोधन युग के विचारक इमैनुएल कांट के अनुसार कोई भी कृत्य तभी नैतिक होता है जब वह सहमति से किया गया हो। इस संदर्भ में, बलपूर्वक या अनैच्छिक परीक्षण न केवल असंवैधानिक हैं, बल्कि नैतिक सिद्धांतों तथा मानव एवं प्राकृतिक मूल्यों का भी उल्लंघन करते हैं।

संदर्भ 

वित्त वर्ष 2024–25 में भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र ने रिकॉर्ड विद्युत उत्पादन के साथ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कीं है।

परमाणु विद्युत उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि

  • भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2024–25 में 56,681 मिलियन यूनिट विद्युत का उत्पादन किया, जो इसके परिचालन इतिहास में सर्वाधिक है।
  • पहली बार निगम ने वार्षिक उत्पादन में 50 अरब यूनिट का आँकड़ा पार किया, जिससे भारत की स्वच्छ ऊर्जा हिस्सेदारी में वृद्धि हुई।
  • कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी: लगभग 49 मिलियन टन उत्सर्जन की कमी।

भारत में परमाणु ऊर्जा

  • विद्युत मिश्रण में हिस्सेदारी: भारत के कुल विद्युत उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 3% है।
  • वर्तमान स्थापित क्षमता: वर्तमान परमाणु विद्युत क्षमता 8.78 गीगावाट है।
  • भविष्य की विस्तार योजना: वर्ष 2031–32 तक 22.38 गीगावाट परमाणु क्षमता का लक्ष्य।
  • दीर्घकालिक लक्ष्य: वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य।
  • परमाणु ऊर्जा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति: वर्तमान नीति के अंतर्गत परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश निषिद्ध है।
  • प्रस्तावित नीतिगत सुधार: सरकार ने निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति देने हेतु परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है।

भारत का त्रि-स्तरीय परमाणु कार्यक्रम

  • चरण 1: दाबित भारी जल रिएक्टर
    • स्वदेशी रूप से उपलब्ध यूरेनियम-238 का ईंधन के रूप में तथा भारी जल का मंदक के रूप में प्रयोग।
    • प्लूटोनियम-239 का उत्पादन, जो दूसरे चरण के लिए आवश्यक है।
    • भारत के अधिकांश परमाणु रिएक्टर इसी श्रेणी के हैं।
  • चरण 2: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर
    • प्लूटोनियम-239 और दुर्बल यूरेनियम का उपयोग कर उपभोग से अधिक ईंधन का निर्माण।
    • प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (500 मेगावाट विद्युत क्षमता) कलपक्कम में शीघ्र ही संचालन के निकट।
  • चरण 3: थोरियम-आधारित रिएक्टर
    • भारत के प्रचुर थोरियम भंडार का उपयोग।
    • लक्ष्य: थोरियम ईंधन चक्र के माध्यम से दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना।

संदर्भ 

हाल ही में जारी की गई विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 में विश्व भर में व्याप्त अत्यधिक और निरंतर आर्थिक असमानताओं पर प्रकाश डाला गया है।

विश्व असमानता रिपोर्ट के बारे में

  • वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में 200 से अधिक वैश्विक शोधकर्त्ताओं का योगदान है।
  • यह वर्ष 2018 और वर्ष 2022 के बाद इस रिपोर्ट का तीसरा संस्करण है।

विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के प्रमुख निष्कर्ष

  • वैश्विक धन का अत्यधिक संकेंद्रण: वैश्विक आबादी के शीर्ष 10% लोगों के पास वैश्विक धन का लगभग 75% हिस्सा है।
    • सबसे गरीब 50% लोगों के पास वैश्विक कुल संपत्ति का केवल 2% हिस्सा है।
    • शीर्ष 0.001% (60,000 से कम व्यक्ति) वैश्विक संपत्ति के 6% से अधिक के स्वामी हैं, जो कि निम्न  50% लोगों की कुल संपत्ति से तीन गुना अधिक है।

  • राष्ट्रीय आय असमानता: कई देशों में, शीर्ष आय वर्ग के पास राष्ट्रीय आय का बहुत बड़ा और असमान भाग होता है।
    • भारत में शीर्ष 10% लोग राष्ट्रीय आय का 58% कमाते हैं, जबकि निचले 50% लोग केवल 15% कमाते हैं।
  • वैश्विक लैंगिक असमानता: अवैतनिक कार्य को छोड़कर, वैश्विक स्तर पर महिलाएँ प्रति घंटे पुरुषों की आय का केवल 61% ही कमाती हैं।
    • घरेलू और देखभाल संबंधी अवैतनिक कार्यों को शामिल करने पर, महिलाओं का कुल वेतन पुरुषों के वेतन का मात्र 32% रह जाता है।
    • वैश्विक श्रम आय में महिलाओं की हिस्सेदारी वर्ष 1990 से 25% से कुछ अधिक पर स्थिर बनी हुई है।
  • जलवायु संबंधी उत्तरदायित्व में अत्यधिक असमानता है: वैश्विक आबादी के सर्वाधिक निर्धन 50% लोग, निजी पूँजी स्वामित्व (निवेश, संपत्ति) से होने वाले कार्बन उत्सर्जन के केवल 3% के लिए जिम्मेदार हैं।
    • सबसे धनी 10% लोग निवेश से संबंधित इन उत्सर्जनों के 77% के लिए जिम्मेदार हैं।
  • वैश्विक आर्थिक भूगोल में परिवर्तन: वर्ष 1980 के बाद से, चीन में एक बड़ा आर्थिक परिवर्तन आया है, और इसकी अधिकांश आबादी वैश्विक मध्यम वर्ग में शामिल हो गई है।
    • इसके विपरीत, भारत की स्थिति अपेक्षाकृत खराब हुई है; इसकी लगभग पूरी आबादी अब वैश्विक आय वितरण के निचले 50% हिस्से में आती है।

  • वैश्विक वित्तीय प्रवाह विकसित देशों के पक्ष में है: वैश्विक GDP का लगभग 1% वार्षिक प्रवाह वित्तीय प्रतिफल और ब्याज भुगतान के माध्यम से गरीब देशों से अमीर देशों की ओर जाता है।
    • यह ‘विपरीत पुनर्वितरण’ कुल वैश्विक विकास सहायता से लगभग तीन गुना अधिक है, जिससे वैश्विक असमानता बढ़ रही है।

भारत में बढ़ती असमानता

  • आय: शीर्ष 10% आय अर्जित करने वाले देश, राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा रखते हैं, जबकि निचले 50% को केवल 15% ही मिलता है।

  • संपत्ति: सबसे धनी 10% लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग 65% हिस्सा है, और अकेले शीर्ष 1% के पास लगभग 40% हिस्सा है।
  • लैंगिक असमानता: महिला श्रम बल भागीदारी 15.7% पर बहुत कम बनी हुई है, जिसमें पिछले दशक में कोई सुधार नहीं हुआ है।

असमानता को कम करने के लिए नीतिगत सिफारिशें

  • प्रगतिशील कराधान और पुनर्वितरण: अत्यधिक धन पर प्रभावी कर आरोपित करना (उदाहरण के लिए, न्यूनतम धन कर) और प्राप्त राजस्व का उपयोग सामाजिक निवेश के लिए करना।
  • सार्वजनिक निवेश: सार्वभौमिक, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और जलवायु अनुकूलन के लिए वित्तपोषण करना।
  • वैश्विक शासन: अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में सुधार करना और साक्ष्य-आधारित नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए असमानता पर एक अंतरराष्ट्रीय पैनल का गठन करना।

निष्कर्ष 

विश्व असमानता रिपोर्ट, 2026 एक चुनौतीपूर्ण राजनीतिक दौर में जारी की गई है, लेकिन यह पहले से कहीं अधिक आवश्यक है। समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदमों को जारी रखकर ही हम आने वाले दशकों की सामाजिक और जलवायु संबंधी चुनौतियों का सामना कर पाएँगे।

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