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Dec 15 2025

भारत-ओमान CEPA

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर, 2025 में प्रधानमंत्री की आधिकारिक ओमान यात्रा से पहले भारत–ओमान समग्र आर्थिक साझेदारी समझौते को स्वीकृति प्रदान की।

भारत–ओमान CEPA  के बारे में

  • भारत–ओमान द्वारा प्रस्तावित यह समग्र आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को और मजबूत करने के लिए किया गया है।
  • प्रमुख क्षेत्र
    • व्यापार उदारीकरण: प्रमुख वस्तुओं पर शुल्क में कमी या समाप्ति, बाजार तक बेहतर पहुँच तथा सीमा शुल्क और विनियामक प्रक्रियाओं का सरलीकरण।
    • निवेश और सेवाएँ: सीमा-पार निवेश को प्रोत्साहन, सेवाओं के व्यापार को सुगम बनाना तथा संयुक्त उपक्रमों और आपूर्ति-शृंखला एकीकरण को समर्थन।
  • वर्तमान भारत–ओमान व्यापार संबंध
    • व्यापार मात्रा: द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2023–24 में 8.947 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024–25 में 10.613 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जो मजबूत वाणिज्यिक गति को दर्शाता है।
      • भारत के प्रमुख आयात: पेट्रोलियम उत्पाद और यूरिया, जो कुल आयात का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है।
    • निवेश संबंध: ओमान में 6,000 से अधिक भारत–ओमान संयुक्त उपक्रम संचालित हैं, जिनमें लगभग 7.5 अरब अमेरिकी डॉलर की पूँजी लगी है।
      • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश: भारत में ओमान से संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इक्विटी प्रवाह (2000–2025) लगभग 605.57 मिलियन अमेरिकी डॉलर है।
    • महत्त्व: यह मुक्त व्यापार समझौता भारत–ओमान सामरिक साझेदारी को सुदृढ़ करता है, खाड़ी सहयोग परिषद क्षेत्र में भारत की उपस्थिति को मजबूत करता है तथा भारत की पश्चिम एशिया नीति के अनुरूप व्यापार-आधारित विकास को समर्थन प्रदान करता है।

कोपरा MSP में बढ़ोतरी

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने किसानों की आय बढ़ाने और उत्पादन को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से वर्ष 2026 के लिए कोपरा का उच्च न्यूनतम समर्थन मूल्य स्वीकृत किया।

संबंधित तथ्य 

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि: उचित औसत गुणवत्ता वाले मिलिंग कोपरा का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹12,027 प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया। बॉल कोपरा का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹12,500 प्रति क्विंटल तय किया गया।
    • यह मूल्य उत्पादन लागत के डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति के अनुरूप है।
  • खरीद तंत्र: राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ और राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ मूल्य समर्थन योजना के अंतर्गत केंद्रीय नोडल एजेंसियों के रूप में कार्य करना जारी रखेंगे।

कोपरा के बारे में

  • कोपरा नारियल का सूखा गूदा होता है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों में कच्चे माल के रूप में किया जाता है।
  • उपयोग: इसका उपयोग नारियल तेल, सूखे नारियल, सौंदर्य प्रसाधन, साबुन और कई खाद्य एवं औद्योगिक उत्पादन में किया जाता है।

नारियल (कोकोस न्यूसीफेरा) के बारे में

  • भारत में नारियल को कल्पवृक्ष कहा जाता है, क्योंकि यह भोजन, पेय, तेल, रेशा, ईंधन और लकड़ी प्रदान करता है।
  • उत्पत्ति: भारत–प्रशांत क्षेत्र
  • कृषि की परिस्थितियाँ
    • जलवायु: 20–32 डिग्री सेल्सियस तापमान और 100–300 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले गर्म, आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ वृद्धि।
    • मृदा एवं जल: अच्छी जलनिकास वाली बलुई दोमट या लैटराइट मृदा, पर्याप्त नमी के साथ, परंतु जलभराव नहीं।
  • शीर्ष उत्पादक
    • वैश्विक स्तर पर: इंडोनेशिया, फिलीपींस, भारत, श्रीलंका, ब्राजील।
    • भारत में: नारियल विकास बोर्ड के वर्ष 2022–23 के आँकड़ों के अनुसार कर्नाटक सबसे बड़ा उत्पादक है, इसके बाद केरल और तमिलनाडु का स्थान है।
    • नारियल विकास बोर्ड का मुख्यालय: कोच्चि, केरल।

महत्त्व

न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि किसानों की आय को स्थिर करने, मूल्य जोखिम को कम करने तथा नारियल और कोपरा के प्रमुख वैश्विक उत्पादक के रूप में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करने में सहायक होगी।

कोलसेतु (CoalSETU)

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने कोलसेतु (CoalSETU) विंडो को स्वीकृति दी है, ताकि किसी भी औद्योगिक उपयोग एवं सीमित निर्यात के लिए दीर्घकालिक कोयला लिंकेज उपलब्ध कराए जा सकें। इससे गैर-विनियमित क्षेत्र के ढाँचे का विस्तार किया गया है।

  • गैर-विनियमित क्षेत्र ढाँचा सीमेंट, इस्पात, स्पंज आयरन, एल्यूमिनियम और कैप्टिव पावर प्लांट जैसे उद्योगों को नीलामी-आधारित ईंधन आपूर्ति समझौतों के माध्यम से कोयला आपूर्ति पर केंद्रित है, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु पुराने ईंधन आपूर्ति समझौतों से दूरी बनाई गई है।

कोलसेतु (CoalSETU) के बारे में

  • कोलसेतु (निर्बाध, दक्ष एवं पारदर्शी उपयोग हेतु कोयला लिंकेज) गैर-विनियमित क्षेत्र लिंकेज नीति, 2016 के अंतर्गत शामिल की गई एक नई नीलामी-आधारित व्यवस्था है।
  • उद्देश्य: घरेलू कोयला भंडार के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करना, व्यवसाय सुगमता को बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना तथा बदलती औद्योगिक माँग के अनुरूप कोयला आपूर्ति को समन्वित करना।
  • नोडल मंत्रालय: केंद्रीय कोयला मंत्रालय।

मुख्य विशेषताएँ

  • पात्रता: पूर्व गैर-विनियमित क्षेत्र लिंकेज, जो केवल कुछ विशिष्ट अंतिम उपयोग क्षेत्रों तक सीमित थे, के विपरीत अब कोई भी घरेलू औद्योगिक उपभोक्ता नीलामी में भाग ले सकता है।
  • नीलामी-आधारित दीर्घकालिक लिंकेज: कोयला लिंकेज दीर्घकालिक आपूर्ति हेतु पारदर्शी नीलामी के माध्यम से आवंटित किए जाएँगे।
  • उपयोग हेतु अधिक विकल्प: कोयले का उपयोग स्वयं की खपत, ‘कोल वाशिंग’ अथवा समूह कंपनियों के बीच वितरण के लिए किया जा सकता है, किंतु भारत के भीतर पुनः बिक्री निषिद्ध है।
  • निर्यात प्रावधान: आवंटित लिंकेज मात्रा के 50 प्रतिशत तक कोयला निर्यात की अनुमति है; कोकिंग कोयला इसमें शामिल नहीं है तथा व्यापारियों को बोली लगाने की अनुमति नहीं होगी।

महत्त्व

‘कोलसेतु’ कोयला क्षेत्र सुधारों को सुदृढ़ करता है, पारदर्शी आवंटन को बढ़ावा देता है, ‘कोल वाशिंग यूनिट्स’ को समर्थन प्रदान करता है, आयात को कम करता है तथा घरेलू संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग को सक्षम बनाता है।

जनगणना, 2027

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जनगणना, 2027 के संचालन हेतु ₹11,718 करोड़ को स्वीकृति दी है। यह भारत की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें देशव्यापी जातिगत  जनगणना भी शामिल होगी।

जनगणना के बारे में

  • जनगणना किसी देश में एक निश्चित समय पर सभी व्यक्तियों से संबंधित जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक आँकड़ों के संग्रह, संकलन, विश्लेषण और प्रसार की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या गणना का पहला प्रयास वर्ष 1872 में (लॉर्ड मेयो के अधीन) किया गया। पहली पूर्ण एवं समकालिक जनगणना वर्ष 1881 में (लॉर्ड रिपन के अधीन) हुई, जिससे दशकीय परंपरा स्थापित हुई।
    • स्वतंत्रता के बाद पहली जनगणना वर्ष 1951 में हुई, जिसने वर्ष 1948 के जनगणना अधिनियम के तहत आधुनिक, उत्तर-औपनिवेशिक शृंखला की शुरुआत की।

जनगणना, 2027 के बारे में

  • जनगणना, 2027 भारत की 16वीं जनगणना तथा स्वतंत्रता के बाद की 8वीं जनगणना होगी और यह विश्व का सबसे बड़ा डिजिटल प्रशासनिक एवं सांख्यिकीय अभ्यास होगा।
  • डिजिटल स्वरूप: यह पहली कागज-रहित जनगणना होगी, जिसमें मोबाइल अनुप्रयोग, वेब पोर्टल, भू-टैगिंग और स्व-गणना की सुविधा होगी; साथ ही डेटा संरक्षण के उपाय डिजाइन में अंतर्निहित होंगे।
    • जनगणना प्रबंधन एवं निगरानी प्रणाली पोर्टल के माध्यम से वास्तविक समय में कार्यों की निगरानी होगी।
    • सेवा के रूप में जनगणना व्यवस्था से मंत्रालयों को नीति-निर्माण हेतु स्वच्छ, मशीन द्वारा पठनीय आँकड़े उपलब्ध होंगे।
    • तकनीकी अनुप्रयोग: प्रभार अधिकारियों के लिए वेब-आधारित गृह-सूची खंड निर्माता अनुप्रयोग उपलब्ध होगा तथा आम जनता को स्व-गणना का विकल्प दिया जाएगा।

जनगणना के चरण

  • चरण 1–गृह-सूचीकरण एवं आवास जनगणना (अप्रैल–सितंबर 2026): आवास की स्थिति, सुविधाएँ, परिसंपत्तियाँ तथा भू-स्थानिक मानचित्रण सम्मिलित होंगे; व्यक्तिगत डेटा का संग्रह नहीं होगा।
  • चरण 2-जनगणना (फरवरी 2027 से): आयु, लिंग, शिक्षा, व्यवसाय, धर्म, भाषा, प्रवासन, प्रजनन तथा जाति सहित जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक आँकड़े एकत्र किए जाएँगे।
    • विशेष क्षेत्र: लद्दाख तथा जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के हिमाच्छादित क्षेत्रों में जनगणना सितंबर 2026 में की जाएगी।
  • जाति गणना: वर्ष 1931 के बाद पहली बार विस्तृत जाति एवं उप-जाति से संबंधित आँकड़े, जिनमें अन्य पिछड़ा वर्ग भी शामिल हैं, चरण 2 में एकत्र किए जाएंगे। यह निर्णय राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की स्वीकृति के बाद लिया गया है।
  • संचालन: जनगणना का संचालन भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय द्वारा किया जाएगा। लगभग 30 लाख क्षेत्रीय कार्मिक इसमें संलग्न होंगे।

महत्त्व 

जनगणना 2027 साक्ष्य-आधारित शासन, कल्याणकारी योजनाओं के सटीक लक्ष्यीकरण, आरक्षण नीतियों तथा भारत की सामाजिक-आर्थिक विविधता की सम्यक समझ के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण आँकड़े उपलब्ध कराएगी।

राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन (NFHM)

राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन (NFHM) के अंतर्गत भारत ने आधुनिक अभिलेखीय तकनीकों के माध्यम से अपनी सिनेमाई विरासत के संरक्षण हेतु फिल्म का डिजिटलीकरण किया है।

राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन के बारे में

  • राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन की शुरुआत वर्ष 2015 में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा भारत की समृद्ध फिल्म विरासत के संरक्षण, पुनर्स्थापन और डिजिटलीकरण के उद्देश्य से की गई थी।
  • उद्देश्य
    • संकटग्रस्त फिल्म सामग्री की सुरक्षा करना।
    • उन्नत तकनीक के माध्यम से ऐतिहासिक भारतीय फिल्मों का पुनर्स्थापन करना।
    • दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित करना तथा सार्वजनिक पहुँच उपलब्ध कराना।
  • नोडल एजेंसी: राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार, भारत (पुणे) इस मिशन की कार्यान्वयन एजेंसी है, जो पुनर्स्थापन, डिजिटलीकरण, भंडारण और संरक्षित फिल्मों की उपलब्धता के लिए उत्तरदायी है।
  • मुख्य उपलब्धियाँ
    • व्यापक डिजिटलीकरण: फीचर फिल्मों, वृत्तचित्रों और लघु फिल्मों सहित 1,469 फिल्म शीर्षकों का डिजिटलीकरण किया गया है। कुल कंटेंट लगभग 4.3 लाख मिनट की है।
    • उन्नत पुनर्स्थापन: फिल्मों का पुनर्स्थापन उच्च गुणवत्ता चित्र और ध्वनि तकनीकों के माध्यम से किया गया। अभिलेखीय सुरक्षा के लिए नएइंटर-नेगेटिव’ तैयार किए गए।
    • संरक्षण एवं पहुँच: डिजिटलीकृत फिल्मों को सुरक्षित रूप से राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार में संगृहित किया गया है। इन्हें इसके आधिकारिक डिजिटल मंचों के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता है।
    • महत्त्व: राष्ट्रीय फिल्म विरासत मिशन भारत की सिनेमाई धरोहर की रक्षा करता है, सांस्कृतिक निरंतरता को बढ़ावा देता है तथा ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण भारतीय फिल्मों तक राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहुँच सुनिश्चित करता है।

राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार, भारत (पुणे) के बारे में

  • राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की स्थापना वर्ष 1964 में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत एक मीडिया इकाई के रूप में की गई थी।
  • यह भारत की फिल्म तथा गैर-फिल्म सिनेमाई विरासत के संरक्षण हेतु नोडल भंडार के रूप में कार्य करता है।
  • इसका मुख्यालय पुणे में अवस्थित है तथा क्षेत्रीय केंद्र बेंगलुरु, कोलकाता और तिरुवनंतपुरम में हैं।

विनायक दामोदर सावरकर

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अंडमान और निकोबार में विनायक दामोदर सावरकर को उनकी कविताओं के संग्रह सागर प्राण तलमल्ला’ (Sagara Prana Talamalla) के 115 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

  • इस अवसर पर सेल्युलर जेल में वीर सावरकर की प्रतिमा का भी अनावरण किया गया, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रति उनके बलिदान, संकल्प और अटूट समर्पण का प्रतीक है।

वीर सावरकर के बारे में

  • विनायक दामोदर ‘वीर’ सावरकर (1883–1966) एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिक विचारक, वकील और लेखक थे तथा हिंदू राष्ट्रवाद के प्रमुख प्रवर्तकों में से एक थे।
  • प्रारंभिक जीवन
    • जन्म: 28 मई, 1883, भगूर, नासिक (महाराष्ट्र)। विद्यालय जीवन से ही क्रांतिकारी राजनीति में सक्रिय रहे और बाद में फर्ग्यूसन कॉलेज, पुणे में अध्ययन के दौरान भी क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे।
  • विदेश में क्रांतिकारी गतिविधियाँ: यूनाइटेड किंगडम में विधि की पढ़ाई के दौरान इंडिया हाउस जैसे संगठनों से जुड़े। राष्ट्रीय आंदोलनों से प्रेरित होकर ‘फ्री इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना की।
  • कारावास के वर्ष: वर्ष 1910 में गिरफ्तार किए गए सावरकर को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और वर्ष 1911 में उन्हें सेलुलर जेल (काला पानी) में कैद कर दिया गया, जहाँ उन्होंने भीषण कठिनाइयों का सामना किया।
  • साहित्यिक योगदान: उन्होंने द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस (1857)’ और हिंदुत्व’ सहित अनेक प्रभावशाली कृतियाँ लिखीं। ये रचनाएँ मुख्यतः रत्नागिरि में कैद के दौरान लिखी गईं।
  • संबद्ध संगठन: मित्र मेला, अभिनव भारत सभा, इंडिया हाउस, फ्री इंडिया सोसाइटी से जुड़े रहे। वर्ष 1937 से वर्ष 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे।
  • वर्ष 1924 में रिहा होने के बाद सामाजिक और वैचारिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। 26 फरवरी, 1966 को अनशन द्वारा देह त्याग किया।

यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा प्राप्त

हाल ही में इटालियन भोजन परंपरा को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में आधिकारिक रूप से शामिल किया गया है। इस प्रकार यह दर्जा प्राप्त करने वाली संपूर्ण राष्ट्रीय पाक परंपरा वाली विश्व की पहली रसोई संस्कृति बन गई है।

मुख्य मान्यता के बारे में

  • यह यूनेस्को द्वारा संपूर्ण राष्ट्रीय पाक परंपरा को दी गई एक ऐतिहासिक मान्यता है, जिसमें किसी एक व्यंजन के स्थान पर संपूर्ण खाद्य संस्कृति को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर माना गया है।
  • आधिकारिक शीर्षक: ‘इटैलियन कुकिंग: बिट्वीन सस्टेनेबिलिटी ऐंड बायो-कल्चरल डाइवर्सिटी’ (Italian cooking: Between sustainability and biocultural diversity)
  • प्रदानकर्ता: यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा हेतु अंतरसरकारी समिति
  • अवस्थिति: यह अभिलेखन समिति के 20वें सत्र के दौरान किया गया, जिसकी मेजबानी भारत के नई दिल्ली में हुई।
  • दर्जा प्रदान किए जाने के कारण: यूनेस्को ने इटालियन पाक परंपरा में निहित गहन सांस्कृतिक और सामाजिक समन्वय को मान्यता दी, जो निम्नलिखित प्रमुख विशेषताओं से परिभाषित है:-
    • विनोदशीलता (Conviviality): साझा भोजन के सामाजिक अनुष्ठान पर जोर, जो पारिवारिक और सामुदायिक जुड़ाव, आत्मीयता और संवाद को प्रोत्साहित करता है।
    • पीढ़ीगत ज्ञान का हस्तांतरण: पाक कौशल, व्यंजन विधियाँ और स्मृतियाँ अनौपचारिक रूप से, विशेषकर परिवार में दादा-दादी से पोते-पोती तक, पीढ़ी दर पीढ़ी संप्रेषित होती हैं।
    • स्थायित्त्व: यह परंपरा अपशिष्ट-विरोधी दर्शन पर आधारित है, जिसमें शून्य-अपशिष्ट आधारित व्यंजन, मौसमी और स्थानीय उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है।
    • जैव-सांस्कृतिक विविधता: विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट खाद्य परंपराओं, भोजन और स्थानीय भू-क्षेत्र के गहरे संबंध तथा क्षेत्रीय पहचान की विशिष्टता का उत्सव मनाया जाता है।
  • महत्त्व और प्रभाव
    • वैश्विक रूप से प्रथम: इटली संपूर्ण राष्ट्रीय भोजन परंपरा के लिए यह व्यापक मान्यता प्राप्त करने वाला विश्व का पहला देश बन गया है।
    • सांस्कृतिक पहचान: यह इटली की सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय गौरव को सशक्त रूप से मजबूत करता है।
    • आर्थिक संरक्षण: यह दर्जा वैश्विक स्तर पर इटैलियन जैसे नामों’ वाले नकली खाद्य उत्पादों के विरुद्ध संघर्ष में सहायक है और इटली के कृषि-खाद्य निर्यात के मूल्य की रक्षा करता है।
    • संरक्षण: यह सतत् खाद्य प्रथाओं, पारंपरिक कारीगरी तकनीकों और क्षेत्रीय जैव-सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण को समर्थन प्रदान करता है।
  • विशिष्टता
    • पूर्ववर्ती यूनेस्को अभिलेखनों में सामान्यतः विशिष्ट अनुष्ठानों या तकनीकों को मान्यता दी गई थी (जैसे- फ्राँसीसी पाक भोजन या नेपल्स की पिज्जा-निर्माण परंपरा)
    • इसके विपरीत, इटालियन भोजन परंपरा का यह अभिलेखन दैनिक, विविध और देशव्यापी खाद्य अभ्यास को मान्यता देता है, जो सतत् और स्थानीय पहचान से गहराई से संबंधित है।

संदर्भ 

सर्वोच्च न्यायालय ने POSH अधिनियम के दायरे को विस्तृत करते हुए महिलाओं के लिए कार्यस्थल सुरक्षा उपायों को अत्यधिक मजबूत किया है।

पृष्ठभूमि

  • शिकायत दायर करने का विवरण: वर्ष 2004 बैच की एक भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी ने आरोप लगाया कि उनके कार्यस्थल पर एक भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी ने उनका यौन उत्पीड़न किया।
    • इसके पश्चात, पीड़िता के विभाग में अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत गठित आंतरिक शिकायत समिति के समक्ष कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम के तहत शिकायत प्रस्तुत की गई।
  • क्षेत्राधिकार को लेकर चुनौती: आरोपी अधिकारी ने यह दावा करते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के समक्ष आंतरिक शिकायत समिति के क्षेत्राधिकार को चुनौती दी कि केवल उसके अपने विभाग की समिति ही मामले की जाँच कर सकती है।
    • केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण तथा दिल्ली उच्च न्यायालय दोनों ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
    • इसके बाद, मामले की अपील सर्वोच्च न्यायालय में की गई।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रमुख विशेषताएँ

  • डॉ. सोहेल मलिक बनाम भारत संघ मामला: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि एक विभाग में गठित आंतरिक शिकायत समिति, किसी अन्य विभाग के कर्मचारी के विरुद्ध भी यौन उत्पीड़न की शिकायत की सुनवाई कर सकती है।
  • धारा 11 की व्याख्या: अधिनियम की धारा 11 में प्रयुक्त वाक्यांश जहाँ प्रतिवादी कर्मचारी हो’ को प्रक्रियात्मक माना गया, न कि क्षेत्राधिकार से संबंधित।
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जहाँ’ शब्द का तात्पर्य भौतिक स्थान से नहीं, बल्कि स्थिति या परिस्थिति से है। इसका अर्थ यह है कि समिति को प्रतिवादी पर लागू सेवा नियमों के अनुसार जाँच करनी होगी, अथवा जहाँ ऐसे नियम न हों, वहाँ निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।
  • अधिनियम के उद्देश्य से संबंधित तर्क: यदि क्षेत्राधिकार को केवल आरोपी के विभाग तक सीमित किया जाए, तो इससे पीड़ित महिलाओं के लिए प्रक्रियात्मक और मानसिक बाधाएँ उत्पन्न होंगी।
    • इस तरह की व्याख्या से POSH अधिनियम का सामाजिक कल्याण उद्देश्य विफल हो जाएगा।
  • आंतरिक शिकायत समिति की भूमिका: समिति की भूमिका केवल तथ्यात्मक जाँच करने तक सीमित है।
  • धारा 13 के अंतर्गत नियोक्ता का दायित्व: जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद, प्रतिवादी का नियोक्ता, अधिनियम की धारा 13 के अंतर्गत आवश्यक कार्रवाई करने के लिए बाध्य है।
    • किसी अन्य विभाग में गठित समिति के निष्कर्ष भी बाध्यकारी बने रहते हैं।
  • अपील का अधिकार: यदि नियोक्ता समिति के निष्कर्षों की अनदेखी करता है, तो पीड़ित महिला को कानूनी अपील का अधिकार प्राप्त है।

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 के बारे में

  • पृष्ठभूमि: यह अधिनियम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 1997 में दिए गए विशाखा दिशा-निर्देशों को वैधानिक आधार प्रदान करने के लिए अधिनियमित किया गया।
  • उद्देश्य
    • कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम करना।
    • शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था प्रदान करना।
    • महिलाओं के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और गैर-शत्रुतापूर्ण कार्य वातावरण सुनिश्चित करना।
  • दायरा: यह अधिनियम संगठित या असंगठित क्षेत्रों में कार्य करने वाली सभी महिलाओं पर लागू होता है, चाहे उनकी आयु या रोजगार की स्थिति कुछ भी हो।
  • अधिनियम की प्रमुख धाराएँ
    • धारा 2(O): ‘कार्यस्थल’ की व्यापक परिभाषा प्रदान करती है।
      • इसमें वह प्रत्येक स्थान सम्मिलित है, जहाँ कर्मचारी अपने रोजगार के दौरान या उससे संबंधित किसी कारण से जाता है, जिसमें नियोक्ता द्वारा उपलब्ध कराया गया परिवहन भी शामिल है।
    • धारा 11: यह प्रावधान करती है कि जहाँ प्रतिवादी कर्मचारी हो, वहाँ जाँच प्रतिवादी पर लागू सेवा नियमों के अनुसार की जाएगी, या नियम न होने की स्थिति में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार।
    • धारा 13: आंतरिक या स्थानीय शिकायत समिति की रिपोर्ट पर की जाने वाली कार्रवाई से संबंधित है।
  • संस्थागत व्यवस्था
    • आंतरिक शिकायत समिति: दस या अधिक कर्मचारियों वाले संगठनों में इसका गठन अनिवार्य है। इसकी अध्यक्षता एक महिला द्वारा की जाती है तथा इसमें एक बाहरी सदस्य (गैर-सरकारी संगठन या कानूनी विशेषज्ञ) शामिल होता है।
    • स्थानीय शिकायत समिति: प्रत्येक राज्य पर यह दायित्व है कि वह प्रत्येक जिले में स्थानीय समितियों का गठन करे। यह उन मामलों की शिकायतें सुनती है जहाँ संगठन में दस से कम कर्मचारी हों या शिकायत स्वयं नियोक्ता के विरुद्ध हो।

संदर्भ 

संयुक्त राज्य अमेरिका नेविश्वसनीय सहयोगी देशों’ के एक समूह के साथ पैक्स सिलिका (Pax Silica) नामक एक नई रणनीतिक पहल शुरू की है, जिसका उद्देश्य सुरक्षित, अनुकूलित तथा नवाचार-प्रेरित सिलिकॉन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आपूर्ति शृंखला का निर्माण करना है।

संबंधित तथ्य 

  • महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों से संबंधित सहयोगी ढाँचों में भागीदारी के बावजूद भारत को प्रारंभिक समूह में शामिल नहीं किया गया है।

पैक्स सिलिका’ क्या है?

  • पैक्स सिलिका’ संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में शुरू की गई एक रणनीतिक पहल है, जिसका उद्देश्य सुरक्षित, समृद्ध और नवाचार-आधारित सिलिकॉन आपूर्ति शृंखला का निर्माण करना है, जिसमें महत्त्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा संसाधनों से लेकर उन्नत विनिर्माण, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स तक शामिल हैं।
  • रणनीतिक उद्देश्य
    • यह पहल आपूर्ति शृंखलाओं को सुव्यवस्थित करने और एक विश्वसनीय प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण पर केंद्रित है, इस मान्यता के साथ कि आर्थिक सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है
  • प्रौद्योगिकी पर ध्यानाकर्षण: यह रणनीतिक प्रौद्योगिकीस्टैक’ को सुरक्षित करने का प्रयास करती है, जिसमें हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल और डिजिटल अवसंरचना शामिल हैं।
  • प्रारंभिक सदस्य (9): संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया।

पैक्स सिलिका’ शब्द का अर्थ

  • पैक्स सिलिका’ शब्द लैटिन शब्द पैक्स से लिया गया है, जिसका अर्थ है शांति, स्थिरता और दीर्घकालिक समृद्धि, जोपैक्स रोमाना’ और पैक्स अमेरिकाना’ जैसी ऐतिहासिक अवधारणाओं के समान है।
  • सिलिका शब्द उस यौगिक को दर्शाता है, जिसे परिष्कृत कर सिलिकॉन बनाया जाता है, जो सेमीकंडक्टर चिप्स का एक महत्त्वपूर्ण तत्व है और आधुनिक संगणना तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शक्ति प्रदान करता है।
  • रणनीतिक प्रतीकात्मकता: ‘पैक्स सिलिका’ नाम इस विचार को दर्शाता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में सिलिकॉन और चिप आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण वैश्विक स्थिरता और शक्ति-संतुलन को आकार देगा।

गठबंधन के पीछे का तर्क

  • चीन का प्रतिरोध: यह पहल महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण, दुर्लभ मृदा तत्वों और सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखलाओं में चीन के प्रभुत्व की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित की गई है।
  • रणनीतिक जोखिमों में कमी: इसका उद्देश्य अत्यधिक केंद्रीकृत आपूर्ति शृंखलाओं और निर्यात नियंत्रणों से उत्पन्न जोखिमों को सीमित करना है।
  • सहयोग-आधारित व्यवस्था: यह पहल कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल अर्थव्यवस्था में समान विचारधारा वाले देशों के बीच एक विश्वसनीय आर्थिक व्यवस्था को बढ़ावा देती है।

संचालनात्मक तंत्र

  • क्षेत्रीय दायरा: सहयोग का विस्तार महत्त्वपूर्ण खनिजों, सेमीकंडक्टर अभिकल्पना, निर्माण एवं पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और परिवहन, संगणन अवसंरचना, ऊर्जा ग्रिड तथा विद्युत उत्पादन तक होगा।
  • निवेश ढाँचा: यह नव संयुक्त उद्यमों और रणनीतिक सह-निवेश के अवसरों को सुगम बनाएगा।
  • प्रौद्योगिकी संरक्षण: इसका उद्देश्य संवेदनशील प्रौद्योगिकियों और महत्त्वपूर्ण अवसंरचनाओं को चिंताजनक देशों द्वारा अनुचित पहुँच या नियंत्रण से सुरक्षित रखना है।
  • साझेदार देशों ने सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी प्रणालियों, फाइबर-ऑप्टिक केबलों, डेटा केंद्रों, आधारभूत मॉडल और अनुप्रयोगों सहित विश्वसनीय प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

संदर्भ 

राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (National Council of Applied Economic Research- NCAER) की एक नई रिपोर्ट में पाया गया है कि कार्यबल के कौशल में वृद्धि और लघु उद्यमों की उत्पादकता में सुधार से भारत में रोजगार सृजन की गति उल्लेखनीय रूप से तेज हो सकती है।

रिपोर्ट के बारे में

  • रिपोर्ट का शीर्षक: भारत की रोजगार संभावनाएँ: नौकरियों तक पहुँच के मार्ग’ (India’s Employment Prospects: Pathways to Jobs)
  • जारीकर्ता: राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER)

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • यह रिपोर्ट इस बात पर बल देती है कि भारत का जनसांख्यिकीय लाभ कौशल स्तरों में पर्याप्त सुधार पर निर्भर करता है।
  • वर्तमान रोजगार परिदृश्य: वर्तमान रोजगार वृद्धि मुख्यतः स्व-रोजगार से संचालित रही है।
    • अधिक कुशल कार्यबल की ओर संक्रमण की गति धीमी बनी हुई है।
    • आगामी वर्षों में लगभग 8 प्रतिशत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि बनाए रखने के लिए कार्यबल का कौशल-विकास अत्यंत आवश्यक है।
  • लघु उद्यमों की चुनौती: अधिकांश लघु व्यवसाय कम पूँजी, निम्न उत्पादकता और आधुनिक प्रौद्योगिकी के सीमित उपयोग के कारण जीविकोपार्जन स्तर पर संचालित होते हैं।
  • डिजिटल प्रौद्योगिकी और ऋण का प्रभाव: डिजिटल प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने वाले उद्यम 78 प्रतिशत अधिक श्रमिकों को नियुक्त करते हैं।
    • ऋण तक पहुँच में मात्र 1 प्रतिशत की वृद्धि से नियुक्त श्रमिकों की संख्या में 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है।
  • रोजगार बाजार में वृद्धि: मध्यम-कौशल आधारित नौकरियाँ, विशेषकर सेवा क्षेत्र में, रोजगार वृद्धि को आगे बढ़ा रही हैं, क्योंकि नई प्रौद्योगिकियाँ एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता उद्योगों को पुनर्गठित कर रही हैं।
    • विनिर्माण क्षेत्र अब भी बड़े पैमाने पर निम्न-कौशल आधारित बना हुआ है।
  • अनुमानित लाभ: कुशल श्रमिकों के अनुपात में 12 प्रतिशत अंक की वृद्धि से वर्ष 2030 तक श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार 13 प्रतिशत से अधिक बढ़ सकता है।
    • 9 प्रतिशत अंक की वृद्धि से वर्ष 2030 तक 93 लाख नए रोजगार  सृजित हो सकते हैं।
  • उच्च-वृद्धि क्षेत्र और अनुमान: इस रिपोर्ट ने उन क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें रोजगार की प्रबल संभावना है और मध्यम वृद्धि के साथ उल्लेखनीय रोजगार सृजन का अनुमान लगाया है:-
    • वस्त्र, परिधान एवं संबंधित विनिर्माण: वर्ष 2030 तक रोजगार में 53 प्रतिशत की वृद्धि की संभावना जताई गई है।
    • व्यापार, होटल एवं संबंधित सेवाएँ: वर्ष 2030 तक रोजगार में 79 प्रतिशत तक की वृद्धि की संभावना जताई गई है।

नीतिगत अनुशंसाएँ

  • विनिर्माण के लिए: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं को वस्त्र, परिधान, जूते और खाद्य प्रसंस्करण जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों की ओर पुनः उन्मुख किया जाए।
  • सेवाओं के लिए: पर्यटन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को अधिक नीतिगत समर्थन प्रदान कर व्यापक और समावेशी रोजगार सृजन किया जाए।

राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) के बारे में

  • यह भारत के सबसे पुराने और सबसे बड़े स्वतंत्र आर्थिक नीति अनुसंधान संस्थानों में से एक है।
  • इसकी स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी।
  • इसका मुख्यालय नई दिल्ली में अवस्थित है।
  • यह संस्था नीतिगत संवाद के लिए विश्लेषण और विस्तृत आँकड़ा-संग्रह क्षमताओं को एक साथ उपलब्ध कराती है।

निष्कर्ष

यह रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि कौशल-विकास, प्रौद्योगिकी अपनाने और लघु उद्यमों के लिए ऋण तक पहुँच पर लक्षित नीतिगत समर्थन (विशेषकर श्रम-प्रधान विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रों में) सतत् एवं उच्च आर्थिक वृद्धि तथा देशभर में गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन के लिए केंद्रीय भूमिका निभाएगा।

संदर्भ

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा के सातवें सत्र का समापन 11 प्रमुख पर्यावरणीय प्रस्तावों को अपनाने के साथ हुआ।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा का सातवाँ सत्र

  • यह सत्र संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुख्यालय, नैरोबी (केन्या) में आयोजित किया गया।
    • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा विश्व की पर्यावरण संबंधी सर्वोच्च निर्णय-निर्माण संस्था है।
    • यह प्रत्येक दो वर्ष में केन्या के नैरोबी में पर्यावरण मंत्रियों की बैठक आयोजित करता है।
    • यह सत्र संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा सभी वार्ताओं से हटने के निर्णय के कारण प्रभावित रहा।
    • UNEA, 8 दिसंबर, 2027 में नैरोबी, केन्या में आयोजित होगा, जिसके लिए जमैका के मंत्री मैथ्यू समूडा को अध्यक्ष चुना गया।

  • थीम: एडवांसिंग सस्टेनबल सॉल्यूशंस फॉर ए रेजिलियंट प्लैनेट’ (Advancing sustainable solutions for a resilient planet)
  • उद्देश्य: मानवता और प्रकृति के बीच सामंजस्य को पुनर्स्थापित करना तथा विश्व के सबसे कमजोर लोगों के जीवन में सुधार लाना।
  • सदस्यता: इसमें संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों की सार्वभौमिक सदस्यता है।

UNEA-7 की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • पूर्ण सत्र में अनेक तात्कालिक पर्यावरणीय मुद्दों पर प्रस्ताव अपनाए गए, जिनमें शामिल हैं:
    • प्रवाल भित्तियों का संरक्षण
    • सतत् रसायन और अपशिष्ट प्रबंधन
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता की पर्यावरणीय सततता
    • खनिज और धातु शासन
    • सारगैसो समुद्री शैवाल का प्रबंधन
    • हिमनदों और क्रायोस्फीयर का संरक्षण
    • प्रदूषण से उत्पन्न रोगाणुरोधी प्रतिरोध से निपटना
    • पर्यावरणीय समझौतों के बीच सामंजस्य को बढ़ाना
    • युवाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन
  • भारत द्वारा प्रस्तुत वनाग्नि संबंधी प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से अपनाया गया।

भारत का वनाग्नि प्रबंधन प्रस्ताव

  • एक प्रमुख परिणाम के रूप में भारत के वैश्विक वनाग्नि प्रबंधन को सुदृढ़ करने’ संबंधी प्रस्ताव को व्यापक समर्थन मिला।
  • वनाग्नियाँ, अब मौसमी और स्थानीय घटनाओं से बदलकर स्थायी वैश्विक खतरा बन गई हैं।
  • यह परिवर्तन जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है, जैसे- तापमान वृद्धि, सूखे और भूमि-उपयोग का दबाव।
  • चिंताजनक अनुमान: वनाग्नि घटनाओं में तीव्र वृद्धि की संभावना है:-
    • वर्ष 2030 तक 14 प्रतिशत
    • वर्ष 2050 तक 30 प्रतिशत
    • वर्ष 2100 तक 50 प्रतिशत
  • प्रस्ताव के अंतर्गत प्रमुख कार्रवाइयाँ: प्रतिक्रिया-आधारित अग्निशमन से हटकर निवारक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान करना।
    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और जोखिम मानचित्रण पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
    • उपग्रह-आधारित निगरानी और समुदाय-स्तरीय चेतावनी तंत्र को सशक्त बनाना।
    • पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन के माध्यम से सहनशीलता विकसित करना।
    • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा संचालित वैश्विक अग्नि प्रबंधन केंद्र को सुदृढ़ करना।
    • समेकित अग्नि प्रबंधन रणनीतियाँ विकसित करने वाले देशों के लिए जलवायु वित्त तक बेहतर पहुँच का आह्वान।
  • यह पहल वन-आश्रित समुदायों की सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण कार्बन भंडारों के संरक्षण का लक्ष्य रखती है।

संदर्भ

हाल ही में ‘कार्नेगी इंडिया’ ने नई दिल्ली में ‘ग्लोबल टेक्नोलॉजी समिट इनोवेशन डायलॉग 2025’ की मेजबानी की, जिसमें AI के सामाजिक प्रभाव और ग्लोबल साउथ के सहयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो AI इम्पैक्ट समिट 2026 की प्रस्तावना के रूप में था।

कार्नेगी ग्लोबल टेक्नोलॉजी समिट इनोवेशन डायलॉग 2025’ और इसके प्रमुख परिणाम

  • यह शिखर सम्मेलन एक महत्त्वपूर्ण मंच था, जहाँ अफ्रीका और भारत के प्रतिनिधियों ने साझा चुनौतियों और समावेशी, विस्तार योग्य AI पारिस्थितिकी तंत्र की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया।
  • भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के सहयोग से आयोजित यह डायलॉग, AI के भविष्य को आकार देने वाले मुद्दों  को एक साथ लाता है।
  • महत्त्वपूर्ण शक्ति: भारत जिम्मेदार एवं समावेशी AI विकास को आकार देने में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा है।
  • सहयोग: विशेषज्ञों ने सामूहिक प्रभाव का लाभ उठाने के लिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग के महत्त्व पर बल दिया।

विकासशील देशों में AI को अपनाने की आवश्यकता

  • तेजी से अपनाई जा रही तकनीक: UNDP की एक प्रमुख रिपोर्ट बताती है कि AI अब तक की सबसे तेज अपनाई जाने वाली तकनीकों में से एक है, जिसने महज तीन वर्षों में 1.2 अरब उपयोगकर्ताओं तक पहुँच बनाई है।
  • वैश्विक पहुँच में असमानता: ग्लोबल साउथ, जो विश्व की 80% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन वैश्विक कंप्यूटिंग क्षमता का केवल 15-20% हिस्सा ही रखता है।
    • यद्यपि लगभग 70% उपयोगकर्ता विकासशील देशों से संबंधित हैं, फिर भी समग्र पहुँच और उपयोग की तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों में असमान बनी हुई है।
  • डिजिटल विभाजन का गहन होना: उच्च आय वाले देशों में दो-तिहाई लोग AI उपकरणों का उपयोग करते हैं, जबकि निम्न आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में इसका उपयोग लगभग 5% ही है, जो AI के क्षेत्र में एक स्पष्ट विभाजन को दर्शाता है।
  • ग्लोबल साउथ’ के लिए महत्त्वपूर्ण अवसर: AI पारंपरिक बाधाओं को दूर करके, उत्पादकता और रोजगार बढ़ाकर और स्वास्थ्य सेवा (स्थानीय भाषा में जानकारी), कृषि (डेटा-आधारित सलाह) और शिक्षा (व्यक्तिगत, स्केलिंग लर्निंग) में परिवर्तन लाकर सतत् विकास लक्ष्यों को तेजी से प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।

ग्लोबल साउथ’ के बारे में

  • ‘ग्लोबल साउथ’ से तात्पर्य विश्व के उन विभिन्न देशों से है, जिन्हें कभी-कभी विकासशील’, ‘कम विकसित’ या ‘अविकसित’ कहा जाता है।
  • उत्पत्ति: ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वर्ष 1969 में कार्ल ओगल्सबी द्वारा किया गया था, लेकिन वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद इसे व्यापक लोकप्रियता मिली।
  • भूगोल: ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द भौगोलिक नहीं है। वास्तव में,ग्लोबल साउथ’ के दो सबसे बड़े देश (चीन और भारत) पूरी तरह से उत्तरी गोलार्द्ध में अवस्थित हैं।
  • क्षेत्रीय विस्तार: ‘ग्लोबल साउथ’ के कई देश दक्षिणी गोलार्द्ध में, मुख्यतः अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में अवस्थित हैं।
  • विशेषताएँ: इसका प्रयोग राष्ट्रों के बीच राजनीतिक, भू-राजनीतिक और आर्थिक समानताओं के मिश्रण को दर्शाता है।
    • अरैखिक अवस्थिति: इसमें भारत और चीन जैसे देश शामिल हैं, जो उत्तरी गोलार्द्ध में अवस्थित हैं, जिससे पता चलता है कि ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द भौगोलिक रूप से स्थिर नहीं है।
    • वैश्विक प्रतिनिधित्व की कमी: ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों को संयुक्त राष्ट्र, IMF और विश्व बैंक जैसे वैश्विक निर्णय लेने वाले निकायों में सीमित अभिव्यक्ति और प्रभाव का सामना करना पड़ता है।
    • विकास संबंधी अनिवार्यताएँ: साझा लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु न्याय और निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं का पालन शामिल हैं।
    • मानव विकास अंतराल: गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से चिह्नित, जिनमें आय असमानता, कम जीवन प्रत्याशा और निम्न स्तरीय जीवन स्तर शामिल हैं।
    • संगठनात्मक भागीदारी: G77 (134 देश), गुटनिरपेक्ष आंदोलन (120 देश) और भारत के नेतृत्व वाले वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन’ जैसे मंचों के माध्यम से कार्य करना, एकजुटता और संयुक्त वकालत को बढ़ावा देना।

AI की क्षमता और ‘ग्लोबल साउथ’ का सामूहिक लाभ

ग्लोबल साउथ’ एक ऐसे महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकास के लिए एक परिवर्तनकारी शक्ति और वैश्विक शासन में रणनीतिक प्रभाव के स्रोत दोनों के रूप में कार्य करती है।

  • विकास के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का महत्त्व: कृत्रिम बुद्धिमत्ता मात्र एक तकनीकी प्रगति नहीं है; यह एक ऐसा विकासात्मक उपकरण है जो ग्लोबल साउथ‘ को पारंपरिक बाधाओं को दूर करने और तीव्र प्रगति प्राप्त करने में मदद कर सकता है।
    • परिवर्तनकारी शक्ति: AI में दक्षता, गति और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाकर स्वास्थ्य सेवा, शासन, वित्त, शिक्षा और सुरक्षा सहित प्रमुख क्षेत्रों में क्रांति लाने की क्षमता है।
    • विकास क्षमता: विकासशील देशों के लिए, AI डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) और स्थानीय नवाचार के कार्यान्वयन के माध्यम से पुरानी अवसंरचना और विकास संबंधी चुनौतियों को पार करने के अद्वितीय अवसर प्रदान करता है।
    • भू-राजनीतिक महत्त्व: AI एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में उभरा है, जो वैश्विक शक्ति पदानुक्रम को निर्धारित करता है और तकनीकी-आर्थिक नेतृत्व को निर्धारित करता है।
  • ग्लोबल साउथ’ का सामूहिक प्रभाव और रणनीतिक शक्ति: इस क्षेत्र के पास महत्त्वपूर्ण संसाधन हैं, जिनका प्रायः अपर्याप्त उपयोग किया जाता है। सहयोग और एक एकीकृत अभिव्यक्ति के माध्यम से इन्हें वैश्विक AI चर्चा में शामिल किया जाना चाहिए।
    • रणनीतिक सौदेबाजी की शक्ति: इस क्षेत्र की शक्ति वैश्विक AI अर्थव्यवस्था में इसके विशाल और आवश्यक योगदान से प्राप्त होती है।
      • विशाल डेटा और व्यापकता: जनसंख्या का विशाल आकार विविध डेटा सेट प्रदान करता है, जो AI मॉडल के लिए ‘ईंधन’ का कार्य करते हैं और एक महत्त्वपूर्ण सामरिक समझौते का आधार बनते हैं।
      • महत्त्वपूर्ण संसाधन: इस क्षेत्र में दुर्लभ खनिजों के महत्त्वपूर्ण भंडार हैं, जो AI अर्थव्यवस्था के घटकों और बुनियादी ढाँचे के लिए आवश्यक हैं।
    • साझा शिक्षा के माध्यम से त्वरित प्रगति (दक्षिण-दक्षिण सहयोग): आर्थिक वृद्धि संबंधी चुनौतियों की समानता पारस्परिक विकास और साझा शिक्षा के लिए एक आदर्श आधार का निर्माण करती है।
      • साझा विशेषज्ञता: अफ्रीका के देशों ने डिजिटल तकनीक अपनाने और कानूनों को बेहतर बनाने में जो अनुभव प्राप्त किया है, उससे हमें सीख मिलती है। वहीं भारत जैसे देशों के पास AI के कुशल विशेषज्ञ हैं, जो मिलकर नए और उपयोगी नवाचार विकसित करने में मदद कर सकते हैं।।
    • एक एकीकृत प्रतिनिधित्त्व की आवश्यकता: वैश्विक AI मानदंडों में ग्लोबल साउथ’ के हितों को प्रतिबिंबित करने के लिए एक एकीकृत अभिव्यक्ति और एक साझा एजेंडा स्थापित करने के लिए नीति निर्माताओं, उद्योग और शोधकर्ताओं को एक साथ लाने जैसे प्रयास महत्त्वपूर्ण हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता में ‘दक्षिण-दक्षिण’ सहयोग की सफलता की कहानियाँ

  • कंप्यूट और इंफ्रास्ट्रक्चर का लोकतंत्रीकरण
    • शेयर्ड AI कंप्यूट बैकबोन (भारत): भारत की एक पहल, जिसके तहत शोधकर्ताओं और स्टार्टअप्स के लिए सब्सिडीयुक्त पहुँच प्रदान करते हुए ‘ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स’ (GPUs) के साझा ढाँचा को लागू किया जा रहा है। यह मॉडल अन्य देशों के लिए एक रूपरेखा के रूप में कार्य करता है, जिससे कंप्यूटेशन को लोकतांत्रिक बनाकर तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा सके।
    • रीजनल कंप्यूट हब: अफ्रीका, आसियान और लैटिन अमेरिका में रीजनल कंप्यूट हब को सह-वित्तपोषित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि संसाधनों को एकत्रित कर बड़े पैमाने पर AI अवसंरचना को सस्ती एवं सुलभ बनाया जा सके।
  • भाषा और सांस्कृतिक अंतराल को पाटना
    • डिजिटल इंडिया भाषिणी: एक राष्ट्रीय मिशन, जो भारत की सभी 22 अनुसूचित भाषाओं के लिए ओपन-सोर्स ‘मल्टी लैंग्वेज मॉडल’ तैयार एवं जारी करता है।
      • इसके मॉडल और प्लेटफॉर्म एक डिजिटल सार्वजनिक संसाधन हैं जो अन्य भाषाई रूप से विविध देशों को वॉइस-फर्स्ट इंटरफेस बनाने के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं।
    • अफ्रीकी लैग्वेज AI मूवमेंट: क्षेत्रीय स्तर पर जमीनी सहयोग, जिसका उद्देश्य कम संसाधनों वाली अफ्रीकी भाषाओं तक पहुँच बढ़ाने और स्वदेशी AI नवाचार को बढ़ावा देने के लिए डेटासेट और मशीन अनुवाद उपकरण विकसित करना है।
  • वास्तविक दुनिया पर प्रभाव डालने के लिए AI (स्वास्थ्य एवं कृषि)
    • तपेदिक उन्मूलन के लिए AI (भारत): दूरदराज के गाँवों में बड़े पैमाने पर और तेजी से स्क्रीनिंग के लिए पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों’ के साथ AI-संचालितकंप्यूटर स्वचालित पहचान’ (CAD) सॉफ्टवेयर का एकीकरण किया जा रहा है।
      • यह मॉडल वैश्विक स्तर पर सीमित संसाधनों वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
    • परिशुद्ध कृषि और जल संरक्षण: उपग्रह डेटा का उपयोग करने वाली AI प्रणालियाँ कृषि को अनुकूलित करती हैं, जिससे किसान जल की खपत को काफी कम कर सकते हैं और सिंचाई का सटीक समय निर्धारित कर सकते हैं, जो ‘ग्लोबल साउथ’ की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण समस्या का समाधान है।
    • जीवन रक्षक केस स्टडी: AI-सक्षम उपकरण ‘सखी’ व्हाट्सएप के माध्यम से स्थानीय भाषाओं में चिकित्सकीय रूप से सत्यापित जानकारी प्रदान करता है, जो उच्च मातृ मृत्यु दर में योगदान देने वाले सूचना अंतराल को दूर करने का एक स्पष्ट मार्ग दर्शाता है।
  • बहुपक्षीय शासन और साझा रणनीति
    • BRICS सहयोग: BRICS AI अध्ययन समूह और न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) सदस्य देशों में साझा AI अनुप्रयोगों में निवेश करते हैं ताकि साझा तकनीकी विकास और संसाधन आवंटन को सुगम बनाया जा सके।
    • अफ्रीकी संघ रणनीति: एक एकीकृत महाद्वीपीय AI रणनीति स्थापित करने की दिशा में कार्य करना, जो विकास को दिशा प्रदान करे, सुसंगत क्षेत्रीय नीति सुनिश्चित करे और महाद्वीप की सामूहिक सौदेबाजी शक्ति को बढ़ाए।

ग्लोबल साउथ’ में AI को अपनाने और विकास संबंधी चुनौतियाँ

  • संरचनात्मक और संसाधन असंतुलन: इस श्रेणी में आवश्यक बुनियादी ढाँचे तक असमान पहुँच और इसके पारिस्थितिक परिणामों का विवरण दिया गया है।
    • कंप्यूटिंग असमानता और पहुँच: शक्तिशाली कंप्यूटिंग संसाधनों (कंप्यूट क्षमता) तक पहुँच का अधिकांश हिस्सा ग्लोबल नार्थ’ में केंद्रित है, जिससेग्लोबल साउथ‘ की अत्याधुनिक AI मॉडलों का लाभ उठाने और उनमें नवाचार करने की क्षमता गंभीर रूप से सीमित हो जाती है।
      • यह असमानता सबसे बड़ी बाधा है।
    • मानदंडों की सांस्कृतिक अप्रासंगिकता: वैश्विक AI मानदंड और मॉडल प्रायः विकासशील देशों की विविध सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होते है, जिससे अविश्वसनीय और अप्रासंगिक प्रणालियाँ निर्मित होती हैं।
    • डेटा केंद्रों से पर्यावरण और संसाधन संबंधी आँकड़े प्राप्त करना: AI के व्यापक विस्तार के लिए डेटा केंद्रों की संख्या में भारी वृद्धि की आवश्यकता है, जिनमें भूमि, जल और ऊर्जा की अत्यधिक माँग होती है।
      • संसाधन-दुर्लभ क्षेत्रों को तेजी से केंद्र के रूप में लक्षित किया जा रहा है, जिससे जल असुरक्षा और पारिस्थितिक निम्नीकरण में वृद्धि हो रही है।
    • जन विरोध: व्यापक स्थानीय विरोध प्रदर्शन (उदाहरण के लिए उरुग्वे, चिली, ब्राजील और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर) अस्थिर अवसंरचना विस्तार पर बढ़ती चिंता को दर्शाते हैं।
  • मानवीय और नैतिक लागतें: यह मानव श्रम के शोषण और उपयोगकर्ताओं तथा संवेदनशील आबादी के लिए तत्काल जोखिमों पर केंद्रित है।
    • शोषणकारी श्रम प्रथाएँ (घोस्ट वर्क)
      • आउटसोर्स श्रम: डेटा एनोटेशन और कंटेंट मॉडरेशन जैसे कार्यों को कम आय वाले देशों को न्यूनतम मजदूरी पर आउटसोर्स किया जाता है, जो कंपनियों के लाभ को अधिकतम करने के लिए शोषणकारी श्रम प्रथाओं को दर्शाता है।
      • मनोवैज्ञानिक आघात: मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों के अभाव में श्रमिकों को नियमित रूप से हिंसा और यौन शोषण जैसी सामग्री दर्शाने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे उन्हें गंभीर मानसिक और मनोवैज्ञानिक क्षति होती है।
      • श्रम अधिकारों का उल्लंघन: कार्यक्षेत्र में नौकरी की असुरक्षा, खतरनाक परिस्थितियाँ, पारदर्शिता की कमी और बाल श्रम के मामले सामने आए हैं।
    • वास्तविक दुनिया में सुरक्षा संबंधी उच्च जोखिम: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), विशेष रूप से ‘मल्टी लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (LLM) में प्रगति से विश्वसनीय परिणामों की आवश्यकता बढ़ जाती है।
      • गलत मार्गदर्शन (उदाहरण के लिए कृषि, स्वास्थ्य सेवा) के गंभीर वास्तविक परिणाम हो सकते हैं, जैसे- फसल खराब होना, जिसके लिए मजबूत, संदर्भ-विशिष्ट सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है।
    • पूर्वाग्रह और नुकसान का जोखिम: मजबूत विनियमन की कमी उपयोगकर्ताओं को एल्गोरिथम पूर्वाग्रह, डेटा लीक और हानिकारक अनुशंसाओं जैसे जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • शासन, शक्ति और क्षमता में अंतर: यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास की राजनीतिक संरचना और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न ज्ञान और कौशल की कमी को संबोधित करता है।
    • वैश्विक AI शासन में असमानता: AI विकास पर अभी भी कुछ बड़ी तकनीकी कंपनियों और विकसित अर्थव्यवस्थाओं का ही वर्चस्व है।
      • ग्लोबल साउथ’ के मुद्दों को कम प्राथमिकता दिया जाना: गरीब देशों की विकास प्राथमिकताएँ वैश्विक AI मानदंडों एवं मानकों में अपर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित होती हैं, जिससे डिजिटल उपनिवेशवाद को बढ़ावा मिलता है, जहाँ संसाधनों का दोहन (प्राकृतिक एवं मानवीय) ऐतिहासिक शोषणकारी चक्र को दर्शाता है।
    • AI साक्षरता का अंतर: AI के बारे में बुनियादी ज्ञान और समझ की कमी, विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं में, प्रभावी उपयोग और लोकतांत्रिक पहुँच में बाधा डालती है, जिससे AI साक्षरता कार्यक्रमों के विस्तार की अति आवश्यकता उत्पन्न होती है।

ग्लोबल साउथ’ में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका और रणनीतिक कार्यवाहियाँ

भारत एक उत्तरदायी, नैतिक और समावेशी वैश्विक AI व्यवस्था को आकार देने में ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने के लिए विशिष्ट रूप से उपयुक्त स्थिति में है, और विकासशील दुनिया के लिए एक परीक्षण स्थल और सेतु निर्माता दोनों के रूप में कार्य करने के लिए अपनी अदितीय शक्तियों का लाभ उठा सकता है।

  • भारत की अद्वितीय शक्तियाँ और रणनीतिक भूमिका: भारत की घरेलू विशेषताएँ और नीतिगत पहुँचग्लोबल साउथ’ के लिए एक व्यवहार्यमध्यम मार्ग’ प्रदान करती हैं, जो महत्त्वाकाँक्षा और सामाजिक न्याय के नैतिक दायित्व के बीच संतुलन स्थापित करती है।
    • अद्वितीय क्षमताएँ और वैश्विक परीक्षण मंच: भारत का विशाल आकार, अत्यधिक विविध बहुभाषी वातावरण और सशक्त नीतिगत पहुँच, इसे वैश्विक स्तर पर AI अपनाने के लिए एक अद्वितीय परीक्षण मंच के रूप में स्थापित करती है।
      • स्वास्थ्य, सेवा और कृषि जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर तैनाती से विकासशील देशों के लिए भी त्वरित रूप से लागू होने योग्य समाधान सिद्ध हो सकते हैं।
    • कंप्यूट और लोकतंत्रीकरण के लिए ‘मध्य मार्ग’: भारत अमेरिका के स्वामित्व वाले मॉडलों औरओपन-सोर्स फोकस’ के बीच संतुलन स्थापित कर मध्यम मार्ग’ की भूमिका निभा सकता है।
      • इंडियाAI मिशन (GPU एक्सेस प्रदान करना) और AI4भारत (22 भाषाओं के लिए ओपन मॉडल) जैसी पहलें ‘AI फॉर आल’ के सिद्धांत को मूर्त रूप देती हैं, जिससे पड़ोसी देशों के संदर्भ में संसाधनों का लोकतंत्रीकरण होता है।
    • मानक नेतृत्व और सेतु निर्माता: AI इम्पैक्ट समिट 2026 जैसे प्रमुख मंचों की मेजबानी भारत को नैतिक, समावेशी और स्थायी AI के संबंध में चर्चा को आकार देने में मानक नेतृत्व प्रदान करने की स्थिति में लाती है।
      • भारत एक सेतु निर्माता के रूप में कार्य करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि तकनीकी महत्त्वाकाँक्षा को मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने की अनिवार्यता के साथ संतुलित किया जाए।
  • तकनीकी संप्रभुता के लिए रणनीतिक अनिवार्यताएँ: शक्ति संतुलन में असंतुलन का शिकार होने से बचने के लिए, ग्लोबल साउथ’ को कुशल, खुले विकल्पों के माध्यम से स्वदेशी नवाचार पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और श्रम सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए।
    • स्वदेशी और कुशल मॉडल विकसित करना (SLM रणनीति): ‘ग्लोबल साउथ’ को स्थानीय हितों के अनुरूप स्वदेशी मॉडल और अधिक गणनात्मक रूप से कुशल विकल्पों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
      • इस रणनीति का मूल आधार ‘स्मॉल लैंग्वेज मॉडल्स’ (SLM) हैं, जिन्हें प्रशिक्षित और प्रयोग करना काफी सस्ता है, इनमें कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, और ये ऑन-डिवाइस या स्थानीय, ऑफलाइन कार्यक्षमता के लिए पूरी तरह से उपयुक्त हैं।
      • रणनीतिक लाभ: यह दक्षता महंगी क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्वामित्त्व सेवाओं पर निर्भरता को कम करती है, जिससे कंप्यूटिंग असमानता का सीधा समाधान होता है और कम कनेक्टिविटी युक्त वातावरण में बेहतर डेटा गोपनीयता और तीव्र प्रदर्शन सुनिश्चित होता है।
    • श्रम सुरक्षा और पारदर्शिता को मजबूत करना: वर्तमान मॉडल में निहित शोषण को दूर करने के लिए, ‘ग्लोबल साउथ’ को श्रम कानूनों को मजबूत करना होगा और संपूर्ण AI आपूर्ति शृंखला में पारदर्शिता बढ़ानी होगी, विशेष रूप से डेटा लेबलिंग और सामग्री मॉडरेशन में।
    • वैचारिक और आर्थिक एकजुटता को बढ़ावा देना: AI इम्पैक्ट समिट 2026 जैसे प्रमुख मंचों का उपयोग एक मजबूत नेतृत्व की भूमिका निभाने, समान विचारधारा वाले देशों के बीच वैचारिक और आर्थिक एकजुटता को बढ़ावा देने और सामूहिक रूप से ग्लोबल साउथ’ के हितों को आगे बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए।
  • GPAI (ग्लोबल पार्टनरशिप ऑन AI) का सदस्य: भारत इसका एक संस्थापक सदस्य है और इसने ‘सतत् विकास के लिए AI पर 2024-25 एजेंडा’ का नेतृत्व किया।

AI शासन और जवाबदेही के लिए मूलभूत स्तंभ

संवैधानिक एवं अधिकार आयाम AI नीति के लिए प्रासंगिकता
अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) भेदभाव को उत्पन्न करने वाले एल्गोरिथम पूर्वाग्रह से सीधे तौर पर चुनौती मिलती है।
अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षण) स्वास्थ्य, कल्याण और पुलिसिंग जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में AI के उपयोग से मानवीय गरिमा प्रभावित हो रही है।
अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) ‘कंटेंट मॉडरेशन’ के लिए प्रयोग किए जाने वाले AI टूल्स और डीपफेक के प्रसार से प्रभावित होती है।
राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP) AI को अनुच्छेद 38 (सामाजिक न्याय) और अनुच्छेद 39(b) और (c) (संसाधनों का समान वितरण) के लक्ष्यों के साथ संरेखित होना चाहिए।

न्यायसंगत AI के लिए संस्थागत पारिस्थितिकी तंत्र मुख्य कार्य/जिम्मेदारी
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय भारत में AI मिशन, राष्ट्रीय रणनीति और मुख्य AI शासन संबंधी ढाँचे के लिए नोडल एजेंसी।
नीति आयोग जिम्मेदार AI के व्यापक ढाँचे और अनुप्रयोग संबंधी दिशा-निर्देशों का विकास करना।
डेटा संरक्षण बोर्ड भारत के डेटा गवर्नेंस मानकों को लागू करना और गोपनीयता के उल्लंघनों का समाधान करना (DPDP अधिनियम)
क्षेत्रीय नियामक (RBI, SBI, आदि) विशिष्ट उच्च जोखिम युक्त क्षेत्रों (वित्त, स्वास्थ्य) की निगरानी और AI जोखिम प्रबंधन।
अंतरराष्ट्रीय मंच (G20, UN AI निकाय) ‘ग्लोबल साउथ’ का प्रतिनिधित्व करना, वैश्विक AI सिद्धांतों को प्रभावित करना और बहुपक्षीय सहमति सुनिश्चित करना।

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भारत की AI नेतृत्व की महत्त्वाकांक्षाओं में प्रमुख घरेलू बाधाएँ

  • उच्च स्तरीय कौशल की कमी: AI साक्षरता में विस्तार के बावजूद, भारत उन्नत AI शोधकर्ताओं और डेटा वैज्ञानिकों की कमी का सामना कर रहा है, जिससे स्वदेशी मूलभूत मॉडलों और उच्च स्तरीय वैश्विक समाधानों के विकास में बाधा आ रही है।
  • डेटा गवर्नेंस और विश्वास की कमी: भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) देश की नेतृत्व भूमिका को मजबूत करती है किंतु ग्लोबल साउथ’ के देश तभी इसे अपनाएँगे, जब भारत एक ऐसा विश्वसनीय डेटा गवर्नेंस ढाँचा निर्मित करेगा, जिसमें DPI अधिनियम, 2023 के तहत लोगों की गोपनीयता और डेटा सुरक्षा की पूरी गारंटी हो।

ग्लोबल साउथ’ में भारत का नेतृत्व: एक बहुआयामी भूमिका

  • ऐतिहासिक विरासत और नैतिक अधिकार-गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): स्वतंत्रता के बाद NAM में भारत की संस्थापक भूमिका ने इसे उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों के लिए एक नैतिक अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित किया।
    • उपनिवेशवाद विरोधी एकजुटता: भारत के अपने स्वतंत्रता संग्राम और अफ्रीका और एशिया में उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए मुखर समर्थन ने इसे ग्लोबल साउथ’ में स्थायी सद्भावना और नैतिक वैधता दिलाई है।

  • आर्थिक शक्ति और विकास मॉडल- उभरती आर्थिक शक्ति: चौथी सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में, भारत दक्षिण-दक्षिण व्यापार, निवेश और क्षमता निर्माण में तेजी से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना निर्यात: भारतग्लोबल साउथ’ के साझेदारों को UPI, आधार, टेलीमेडिसिन और कोविन जैसे स्केलेबल डिजिटल गवर्नेंस उपकरण निर्यात कर रहा है।
      • उदाहरण: नामीबिया में UPI का शुभारंभ फिनटेक समावेशन नेतृत्व का प्रदर्शन करता है।
    • जलवायु अनुकूल अवसंरचना: आपदा अनुकूल अवसंरचना गठबंधन (CDRI) के माध्यम से, भारत जलवायु खतरों के संबंध में सतत् और अनुकूलनीय अवसंरचना विकसित करने में देशों की सहायता करता है।
    • विकास सहायता: भारत के सहायता मॉडल में भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (ITEC) कार्यक्रम, ऋण क्रेडिट और स्वास्थ्य सेवा, कृषि, शिक्षा और अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग शामिल हैं।
    • वैक्सीन मैत्री’ पहल: भारत ने 100 से अधिक देशों को कोविड-19 टीके उपलब्ध कराए, जिससे एक विश्वसनीय विकास भागीदार और वैश्विक स्वास्थ्य समानता के समर्थक के रूप में इसकी छवि मजबूत हुई।
  • राजनीतिक प्रभाव और कूटनीतिक मुखरता – बहुपक्षीय मंचों में अभिव्यक्ति: भारत लगातार G20, ब्रिक्स, G77 और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर ‘ग्लोबल साउथ’ की चिंताओं को उठाता है, संस्थागत सुधार, समावेशी बहुपक्षवाद और दक्षिणी प्रतिनिधित्व बढ़ाने का समर्थन करता है।
    • G20 की अध्यक्षता (2023): भारत ने अपनी अध्यक्षता का उपयोग दक्षिणी प्राथमिकताओं को बल देने, G20 में अफ्रीका की स्थायी सदस्यता का समर्थन करने और समावेशी कूटनीति को बढ़ावा देने के लिए किया।
    • ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन (2023 एवं 2024): भारत ने 120 से अधिक विकासशील देशों की भागीदारी वाले दो प्रमुख शिखर सम्मेलनों की मेजबानी की, जिससे दक्षिणी एकजुटता के लिए एक कूटनीतिक संयोजक और गठबंधन निर्माता के रूप में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ी।
    • संतुलित विदेश नीति: भारत ने ब्रिक्स जैसे मंचों के दौरान गाजा और ईरान जैसे विवादास्पद मुद्दों पर रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी, और किसी भी वैश्विक गुट के साथ गठबंधन किए बिना विश्वास हासिल किया।
  • रणनीतिक साझेदारी और क्षेत्रीय सहयोग: भारत साझा विकास प्राथमिकताओं और पारस्परिक लाभ को दर्शाने वाली क्षेत्रीय साझेदारियों को मजबूत कर रहा है:-
    • घाना: दुर्लभ खनिज खनन और समुद्री सुरक्षा पर सहयोग, संसाधन सुरक्षा और ब्लू इकॉनमी सहयोग सुनिश्चित करना।
    • अर्जेंटीना: कैटामार्का में KABIL के माध्यम से लिथियम अन्वेषण समझौता स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
    • नामीबिया: जैव ईंधन, महत्त्वपूर्ण खनिजों और UPI फिनटेक के शुभारंभ पर समझौते हरित ऊर्जा और डिजिटल समावेशन में भारत के नेतृत्व को प्रदर्शित करते हैं।
    • ब्राजील: रक्षा संबंधी गतिविधियाँ, जिनमें भारत की आकाश मिसाइल प्रणाली में ब्राजील की रुचि शामिल है, दक्षिण-दक्षिण रक्षा सहयोग में वृद्धि को दर्शाती हैं।
  • जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक ‘सॉफ्ट पावर’ – जनसंख्या एवं बाजार का आकार: भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश और विशाल उपभोक्ता आधार इसे कई विकासशील देशों के लिए एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक एवं राजनीतिक भागीदार बनाते हैं।
    • सांस्कृतिक कूटनीति: भारत द्वारा योग, बॉलीवुड और संस्कृतनिष्ठ सौम्य शक्ति के वैश्विक प्रचार ने इसके सांस्कृतिक मूल्य को बढ़ाया है।
      • उदाहरण: प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी संसदों में संबोधन, विश्वास और जन-संबंधों को मजबूत करते हैं।
    • प्रवासी सहभागिता: वैश्विक स्तर पर प्रसारित भारतीय प्रवासी दक्षिण के देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों, आर्थिक संबंधों और सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करते हैं।

आगे की राह

न्यायसंगत, समावेशी और जिम्मेदार AI सुनिश्चित करने के लिए एक प्रतिमान परिवर्तन की आवश्यकता है, जिसका नेतृत्वग्लोबल साउथ’ के चार प्रमुख स्तंभों में सामूहिक कार्रवाई द्वारा किया जाना चाहिए।

  • तकनीकी संप्रभुता और स्वदेशी क्षमता: भविष्य में स्वामित्त्व मॉडलों पर निर्भरता कम करने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करने पर निर्भर है।
    • अनुकूलित अनुसंधान एवं विकास एवं मॉडल विकास: स्थानीय भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को समझने वाले मूलभूत AI मॉडल निर्माण में भारी निवेश करना।
      • इसमें स्वदेशी मॉडल (जैसे- Indic LLMs) और स्थानीय हितों के अनुरूप ओपन-सोर्स इकोसिस्टम के विकास को प्राथमिकता देना शामिल है।
    • दक्षता और विकल्पों को प्राथमिकता देना: कम्प्यूटेशनल दक्षता और ओपन वेट (जैसे- डीपसीक) पर बल देने वाले नवाचारों पर ध्यान केंद्रित करना।
      • स्मॉल लैंग्वेज मॉडल (SLM) का विकास महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ये संभावित ऑफलाइन कार्यक्षमता प्रदान करते हैं और विशाल क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता कम करते हैं, जिससे कंप्यूटिंग संबंधी चिंताएँ दूर हो जाती हैं।
    • वॉयस-फर्स्ट इंटरफेस: ऐसे AI को प्राथमिकता देना जो कम डिजिटल साक्षरता वाले नागरिकों को उनकी मातृभाषा में सेवाओं के साथ बातचीत करने में सक्षम बनाए, जिससे प्रौद्योगिकी वास्तव में सुलभ हो।
  • शासन, सुरक्षा उपाय और नियामक सुदृढ़ीकरण: ‘ग्लोबल साउथ’ को अपने नागरिकों और संसाधनों की रक्षा के लिए AI अर्थव्यवस्था के नियमों को सक्रिय रूप से निर्धारित करना होगा।
    • अनुकूलित और मानव-केंद्रित विनियमन: उपयोगकर्ताओं को पूर्वाग्रह, डेटा लीक और हानिकारक अनुशंसाओं से बचाने के लिए मजबूत AI सुरक्षा उपाय (सोशल मीडिया विनियमन के समान) लागू करना।
      • डू नो हार्म’ (Do No Harm) गाइडलाइंस और नैतिक AI मानकों पर ध्यान केंद्रित करते हुए व्यावहारिक और नवाचार-समर्थक दृष्टिकोण अपनाना।
    • डिजिटल श्रम की सुरक्षा: मजबूत श्रम कानूनों को लागू करना और संपूर्ण AI आपूर्ति शृंखला में पारदर्शिता बढ़ाना।
      • नीतिगत प्रयासों को AI मूल्य शृंखला का मानचित्रण करने और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने और डेटा एनोटेशन एवं कंटेंट मॉडरेशन के सुधार करने हेतु डिजिटल श्रम प्लेटफार्मों के लिए विनियमन लागू करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
    • पर्यावरण सुरक्षा उपाय: डेटा केंद्रों के कारण संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए AI आपूर्ति शृंखला में पर्यावरण सुरक्षा उपायों को लागू करना।
    • AI डेवलपर्स का नैतिक दायित्व: ‘ग्लोबल साउथ’ को कानूनी रूप से AI डेवलपर्स से उपयोगकर्ताओं के सर्वोत्तम हित और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की अपेक्षा करनी चाहिए, विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा और वित्त जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में।
    • नैतिकता एवं जवाबदेही: AI प्रणालियों का निर्माण शुरू से ही नैतिक रूप से किया जाना चाहिए, जिसमें स्पष्ट जवाबदेही, पता लगाने की क्षमता और मानवीय निगरानी शामिल हो।
  • बुनियादी ढाँचे और इस तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण: समाधान उच्च स्तरीय बुनियादी ढाँचे और प्रमुख डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं तक पहुँच के लोकतंत्रीकरण पर केंद्रित होना चाहिए।
    • कंप्यूटिंग का लोकतंत्रीकरण: स्थानीय स्टार्टअप और शोधकर्ताओं के लिए वहनीय पहुँच के साथ बड़े पैमाने पर, साझा AI कंप्यूटिंग अवसंरचना (GPU) तैनात करने के लिए पहल (जैसे- इंडियाAI मिशन) लागू करना।
    • क्षेत्रीय केंद्रों का सह-वित्तपोषण: अफ्रीका, आसियान और लैटिन अमेरिका में क्षेत्रीय कंप्यूटर केंद्रों के सह-वित्तपोषण के लिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देना और साझेदारों के साथ डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं (जैसे- इंडिया स्टैक) को सीधे साझा करना।
    • वैश्विक परीक्षण मंच और प्रतिकृति: भारत के अद्वितीय पैमाने और नीति का लाभ उठाकर इसे  ‘AI अपनाने के लिए एक प्रभावी परीक्षण मंच’ बनाना, यह सुनिश्चित करते हुए कि कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में मान्य समाधानों को विश्व स्तर पर आसानी से दोहराया जा सके।
  • नेतृत्व और क्षमता निर्माण: स्थायी परिवर्तन के लिए एकजुट राजनीतिक कार्रवाई और मानव संसाधन विस्तार पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।
    • रणनीतिक नेतृत्व और समन्वय क्षमता: भारत को अपनी समन्वयकारी भूमिका जारी रखनी चाहिए (उदाहरण के लिए- AI इम्पैक्ट समिट 2026 की मेजबानी करना), नीति निर्माताओं, उद्योग और शोधकर्ताओं को एक साथ लाकर एकीकृत ‘ग्लोबल साउथ’ रणनीतियाँ तैयार करनी चाहिए, वैचारिक और आर्थिक सामंजस्य को बढ़ावा देना चाहिए और वैश्विक AI शासन ढाँचों को प्रभावित करना चाहिए।
    • AI साक्षरता: सभी जनसांख्यिकी समूहों, विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं के लिए AI साक्षरता कार्यक्रमों के विस्तार को प्राथमिकता देना।
      • कार्यक्रमों को तकनीकी कौशल से आगे बढ़कर उपयोगकर्ताओं को यह सिखाना चाहिए कि वे आकर्षक डिजाइन को कैसे पहचानें, AI-जनित सामग्री के स्रोत संकेतों (संकेतों) को कैसे पढ़ें और महत्त्वपूर्ण सलाह को कैसे सत्यापित करें?
    • सह-डिजाइन और साझेदारी: अंतरराष्ट्रीय संगठनों से आग्रह किया जाता है कि वे परामर्श से आगे बढ़कर वास्तविक सह-डिजाइन की ओर बढ़ना तथा सलाहकार बोर्डों मेंग्लोबल साउथ‘ के प्रतिनिधित्व को शामिल करना ताकि विकास प्राथमिकताओं को वैश्विक मानदंडों में प्रतिबिंबित किया जा सके।
    • रणनीतिक स्वायत्तता का विस्तार: भारत द्वारा न्यायसंगत AI के लिए किए जा रहे प्रयासों को उसकी रणनीतिक स्वायत्तता के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए, जिससे तकनीकी विकल्प सुनिश्चित हो और अमेरिका-चीन के प्रभुत्व पर आधारित द्विध्रुवीय व्यवस्था को रोका जा सके।
    • डिजिटल उपनिवेशवाद की रोकथाम: भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि AI डिजिटल उपनिवेशवाद को बढ़ावा न दे, जहाँ विकासशील देश डेटा और माइनिंग तो उपलब्ध कराते हैं लेकिन विदेशी स्वामित्व वाली प्रौद्योगिकियों पर निर्भर रहते हैं।

इंडिया-AI इम्पैक्ट समिट 2026

  • स्थान एवं महत्त्व: ‘ग्लोबल साउथ’ में पहला आयोजन
    • यह शिखर सम्मेलन 19-20 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा, जो ग्लोबल साउथ में आयोजित होने वाला पहला वैश्विक AI मंच होगा।
  • रणनीतिक लक्ष्य: प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करना
    • इसका प्राथमिक लक्ष्य ‘सुरक्षा’ और ‘कार्रवाई’ पर केंद्रित पूर्व दृष्टिकोण से हटकर ‘प्रभाव’ पर केंद्रित होना है, ताकि AI समावेशी मानव विकास, पर्यावरणीय स्थिरता और विश्व स्तर पर समान प्रगति के लिए उत्प्रेरक का कार्य करे।
  • मूल सिद्धांत: पीपुल, प्लेनेट, प्रोग्रेस: संपूर्ण एजेंडा तीन सूत्रों (मार्गदर्शक सिद्धांतों) पर आधारित है:
    • पीपुल, प्लेनेट, प्रोग्रेस जिन्हें AI संसाधनों के लोकतंत्रीकरण और समावेशन जैसे क्षेत्रों को शामिल करने वाले सात चक्रों के माध्यम से क्रियान्वित किया जाता है।

पिछले वैश्विक AI शिखर सम्मेलन

शिखर सम्मेलन का नाम वर्ष अवस्थिति प्राथमिक फोकस
AI एक्शन समिट फरवरी 2025 पेरिस, फ्रांस AI सुरक्षा संबंधी चर्चाओं को ठोस, बहु-हितधारक कार्यों और निवेशों में बदलने पर केंद्रित।
AI सियोल शिखर सम्मेलन वर्ष 2024 सियोल, दक्षिण कोरिया सुरक्षा संबंधी संवाद को जारी रखा गया, जिसमें सुरक्षा के साथ-साथ नवाचार और समावेशिता पर जोर दिया गया (सियोल वक्तव्य)
AI सुरक्षा शिखर सम्मेलन वर्ष 2023 ब्लेचली पार्क, यू.के. उद्घाटन वैश्विक शिखर सम्मेलन, जो मुख्य रूप से AI के उभरते जोखिमों पर केंद्रित था और जिसके परिणामस्वरूप सुरक्षा पर ब्लेचली घोषणापत्र’ जारी हुआ।

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निष्कर्ष

कृत्रिम बुद्धिमत्ता अपार संभावनाओं का एक साधन है, लेकिन इसके लाभों का समान रूप से वितरण होना आवश्यक है। अपनी अद्वितीय शक्तियों का लाभ उठाते हुए और एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए, भारत ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए तकनीकी निर्भरता से सशक्त नवाचार की ओर अग्रसर होने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

  • यह सहयोगात्मक और समावेशी दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है कि प्रौद्योगिकी अंततः मानवता की सेवा करे, जिससे वसुधैव कुटुंबकम’ (विश्व एक परिवार है) की भावना का उद्देश्य पूर्ण हो।

अभ्यास प्रश्न

‘ग्लोबल साउथ में डिजिटल विभाजन को पाटने के लिए AI संसाधनों का लोकतंत्रीकरण और तकनीकी संप्रभुता का निर्माण आवश्यक है।’ भारत की उन नीतियों एवं कार्यों के संदर्भ में इस कथन की चर्चा कीजिए जिनका उद्देश्य न्यायसंगत AI को बढ़ावा देना है। इस परिप्रेक्ष्य में कौन सी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं और उनका प्रभावी ढंग से समाधान कैसे किया जा सकता है?

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