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Dec 16 2025

संदर्भ 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सबका बीमा, सबकी रक्षा (बीमा कानून संशोधन) विधेयक, 2025 को मंजूरी दी है, जिससे इसे संसद में प्रस्तुत किए जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

नए बीमा विधेयक के बारे में

  • यह विधेयक भारत के बीमा क्षेत्र के आधुनिकीकरण हेतु तीन प्रमुख कानूनों में संशोधन करता है:
    • बीमा अधिनियम, 1938
    • भारतीय जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956
    • बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999
  • इस विधेयक का उद्देश्य वर्ष 2047 तक सभी के लिए बीमा’ के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करना है, जिसके लिए पहुँच और सुलभता का विस्तार किया जाएगा।
  • यद्यपि विधेयक में महत्त्वपूर्ण सुधार शामिल हैं, फिर भी उद्योग की कुछ दीर्घकालिक माँगों को इसमें शामिल नहीं किया गया है।

नए बीमा विधेयक में किए गए प्रमुख परिवर्तन

  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 100% करना: भारतीय बीमा कंपनियों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 74% से बढ़ाकर 100% कर दी जाएगी।
  • विदेशी पुनर्बीमाकर्ताओं के लिए आसान प्रवेश: विदेशी पुनर्बीमाकर्ताओं के लिए स्वामित्व निधि की आवश्यकता ₹5,000 करोड़ से घटाकर ₹1,000 करोड़ कर दी जाएगी।
  • बीमा नियामक के अधिकारों में वृद्धि: इस विधेयक द्वारा नियामक ढाँचे को सशक्त किया गया है और प्राधिकरण को अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं:-
    • वसूली की शक्ति: प्राधिकरण बीमाकर्ताओं या मध्यस्थों द्वारा अर्जित अनुचित लाभ की वसूली कर सकेगा।
    • एकमुश्त पंजीकरण: बीमा मध्यस्थों का आजीवन पंजीकरण होगा, बार-बार नवीनीकरण की आवश्यकता नहीं होगी।
    • उच्च अनुमोदन सीमा: शेयर हस्तांतरण पर प्राधिकरण की अनुमति तभी आवश्यक होगी, जब हस्तांतरण भुगतान की गई पूँजी के 5% से अधिक हो।
    • बेहतर प्रशासन: विनियमन निर्माण हेतु औपचारिक मानक संचालन प्रक्रिया और दंड के लिए स्पष्ट मानदंड।
  • भारतीय जीवन बीमा निगम के लिए अधिक स्वायत्तता
    • बिना पूर्व सरकारी अनुमति के नए क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित करने की अनुमति।
    • विदेशों में परिचालन का पुनर्गठन स्थानीय कानूनों के अनुरूप करने की स्वतंत्रता।

विधेयक में संभवतः शामिल नहीं किए गए प्रावधान: छूटे हुए अवसर

  • समेकित लाइसेंस: ऐसा एकल लाइसेंस, जो जीवन और सामान्य दोनों प्रकार के बीमा उत्पादों की बिक्री की अनुमति देता है।
    • वर्तमान स्थिति: जीवन बीमाकर्ता सामान्य बीमा नहीं बेच सकते और सामान्य बीमाकर्ता जीवन बीमा नहीं।
  • नए बीमाकर्ताओं के लिए पूँजी आवश्यकता में कमी: वर्तमान में बीमाकर्ताओं के लिए न्यूनतम ₹100 करोड़ और पुनर्बीमाकर्ताओं के लिए ₹200 करोड़ की आवश्यकता है।
  • कैप्टिव बीमा: बड़ी कंपनियों को अपने आंतरिक जोखिमों का बीमा करने के लिए अपनी स्वयं की कैप्टिव बीमा इकाइयाँ स्थापित करने की अनुमति देना, लागत और जोखिम नियंत्रण के लिए एक सामान्य वैश्विक प्रथा है।
  • अन्य वित्तीय उत्पादों का वितरण: बीमा कंपनियों को म्यूचुअल फंड, ऋण या क्रेडिट कार्ड बेचने की अनुमति देना।

भारत में बीमा क्षेत्र

  • बाजार का आकार: भारत वैश्विक स्तर पर 10वाँ सबसे बड़ा बीमा बाजार है और एशिया में दूसरा सबसे बड़ा बाजार है।
  • बीमा तक पहुँच: बीमा पहुँच (GDP के प्रतिशत के रूप में प्रीमियम) लगभग 4.2% (वर्ष 2023) बनी हुई है, जो वैश्विक औसत (लगभग 7%) से कम है।
  • घनत्व: बीमा घनत्व (प्रति व्यक्ति प्रीमियम) लगभग $91 (2023) था, जो विशाल अप्रयुक्त क्षमता को दर्शाता है।
  • संरचना: इसमें जीवन बीमा, गैर-जीवन/सामान्य बीमा, पुनर्बीमा और स्वास्थ्य बीमा शामिल हैं।

मुख्य नियामक और संस्थान

  • बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण: पॉलिसीधारकों की सुरक्षा, वित्तीय स्थिरता और क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करने वाला सर्वोच्च नियामक निकाय।
    • संसद के एक अधिनियम, अर्थात् बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के तहत गठित एक वैधानिक निकाय।
    • भूमिका: यह एक स्वायत्त निकाय है और भारत में बीमा क्षेत्र के विकास को विनियमित और पर्यवेक्षण करता है।
    • कार्य: पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा करना, पॉलिसी का आवंटन, पॉलिसीधारकों द्वारा नामांकन, बीमा योग्य हित, बीमा दावों का निपटान, ‘पॉलिसी सरेंडर’, मूल्य और बीमा अनुबंधों के अन्य नियम एवं शर्तों से संबंधित मामलों में।
  • भारतीय जीवन बीमा निगम: सबसे बड़ा जीवन बीमाकर्ता, निजी प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद प्रमुख बाजार हिस्सेदारी।
  • सामान्य बीमा निगम: सार्वजनिक क्षेत्र का पुनर्बीमाकर्ता।
  • निजी बीमाकर्ता: भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के बीमाकर्ताओं के साथ-साथ 20 से अधिक जीवन बीमा कंपनियाँ और 30 सामान्य बीमा कंपनियाँ कार्यरत हैं।

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड 

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड ने अपनी पहली बैठक आयोजित की, जिसमें अनुसंधान, मूल्य संवर्द्धन, ब्रांडिंग और निर्यात के माध्यम से मखाना मूल्य शृंखला के आधुनिकीकरण हेतु ₹476 करोड़ की केंद्रीय क्षेत्र योजना को स्वीकृति दी गई।

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड के बारे में

  • राष्ट्रीय मखाना बोर्ड भारत के मखाना क्षेत्र के समग्र विकास तथा किसानों की आय बढ़ाने के लिए स्थापित एक समर्पित संस्थागत तंत्र है।
  • स्थापना: 15 सितंबर, 2025 को बिहार में स्थापित किया गया।
  • बजट: वर्ष 2025–26 से वर्ष 2030–31 की अवधि के लिए ₹476.03 करोड़
  • उद्देश्य
    • अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और प्रौद्योगिकी अपनाने को बढ़ावा देना।
    • प्रसंस्करण, मूल्य संवर्द्धन, ब्रांडिंग और निर्यात संवर्द्धन को सुदृढ़ करना।
    • संस्थागत समर्थन के माध्यम से मखाना उत्पादकों की आजीविका में सुधार करना।
  • भूमिका और कार्य
    • राष्ट्रीय स्तर पर बीज आवश्यकताओं का एकीकरण तथा गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री का समर्थन करना।
    • प्रशिक्षण, उन्नत कटाई एवं फसल कटाई-पश्चात प्रथाओं को प्रोत्साहन।
    • छंटाई, सुखाने और पैकेजिंग के लिए अवसंरचना को मजबूत करना।

मखाना के बारे में

  • मखाना एक जलीय पौधे यूरेल फेरॉक्स का सूखा खाद्य बीज है, जो दक्षिण और पूर्वी एशिया के मीठे जल निकायों में पाया जाता है।
  • यह पोषण से भरपूर, कम वसायुक्त होता है और स्वास्थ्य आहार, पारंपरिक चिकित्सा तथा स्नैक्स में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
  • कृषि की परिस्थितियाँ
    • उष्णकटिबंधीय–उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में 4-6 फीट गहराई वाले स्थिर जल निकायों में कृषि।
    • 20–35 डिग्री सेल्सियस का उपयुक्त तापमान, उच्च आर्द्रता और पर्याप्त वर्षा।
  • उत्पादन और वितरण: भारत के कुल मखाना उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत बिहार में होता है, जिसमें मिथिलांचल प्रमुख क्षेत्र है।
  • मिथिला मखाना को वर्ष 2022 में भौगोलिक संकेतक (GI टैग) का दर्जा प्राप्त हुआ।

 अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD)

भारत ने रोम में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD)–भारत दिवस कार्यक्रम में ग्रामीण विकास, महिला सशक्तीकरण और जलवायु-सहिष्णु कृषि के क्षेत्र में देश की अग्रणी उपलब्धियों का प्रदर्शन किया।

अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) के बारे में

  • अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष, संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है।
  • यह विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और भुखमरी को कम करने के लिए विशेष रूप से समर्पित कोष है।
  • स्थापना: 15 दिसंबर, 1977
  • मुख्यालय: रोम, इटली
  • सदस्य देश: 180
  • फोकस: केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समुदायों के सशक्तीकरण पर केंद्रित।
  • मुख्य कार्य: कृषि और ग्रामीण विकास परियोजनाओं के वित्तपोषण हेतु कम ब्याज वाले ऋण और अनुदान प्रदान करना।

IFAD के साथ भारत की भूमिका

  • भारत IFAD का संस्थापक सदस्य, प्रमुख योगदानकर्ता और एक महत्त्वपूर्ण विकास साझेदार है।
  • गहन सहयोग: 36 प्रमुख ग्रामीण विकास परियोजनाओं पर 48 वर्षों का सहयोग।
  • वैश्विक नेतृत्व: भारत इस साझेदारी के माध्यम से अपने सफल ग्रामीण मॉडलों (जैसे-महिला समूहों) का विस्तार करता है औरदक्षिण–दक्षिण सहयोग’ के तहत ग्लोबल साउथ’ के अन्य देशों के साथ विशेषज्ञता साझा करने में अग्रणी भूमिका निभाता है।

PMGKY बीमा पैकेज के लाभार्थी

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (PMGKY) के अंतर्गत बीमा लाभ उन सभी सार्वजनिक एवं निजी चिकित्सा पेशेवरों तक विस्तारित होंगे, जिन्हें कोविड-19 ड्यूटी के लिए तैनात किया गया था और जिनकी सेवा के दौरान मृत्यु हो गई।

निर्णय के प्रमुख बिंदु

  • न्यायालय ने माना कि महामारी जनित आपात स्थिति के कारण राज्यों ने आदेशों के माध्यम से डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की प्रभावी रूप से सेवाएँ ली थीं, चाहे वे सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत हों या निजी क्षेत्र में।
  • PMGKY बीमा दावों का निपटारा प्रत्येक मामले के आधार पर किया जाएगा।
  • दावेदारों को यह प्रमाणित करना होगा कि मृत्यु कोविड-19 से संबंधित कर्तव्यों के दौरान हुई थी, जिसके लिए विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक होगा।

PMGKY बीमा पैकेज के बारे में

  • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत बीमा पैकेज, कोविड-19 के कारण प्रभावित स्वास्थ्यकर्मियों को व्यापक व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा सुरक्षा प्रदान करता है।
  • प्रारंभ: 26 मार्च, 2020 को ₹1.70 लाख करोड़ के राहत पैकेज के हिस्से के रूप में घोषित।
  • इसका उद्देश्य महामारी के दौरान कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना था।
  • प्रारंभ में यह योजना 90 दिनों के लिए लागू की गई थी, जिसे आवश्यकता के अनुसार बढ़ाया गया।
  • पात्र लाभार्थी
    • स्वास्थ्यकर्मी, जिनमें डॉक्टर, नर्स, आशा कार्यकर्ता, पैरामेडिक्स, तकनीशियन, वार्ड स्टाफ और स्वच्छता कर्मचारी शामिल हैं।
    • केंद्र एवं राज्य सरकार के अस्पतालों, स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों तथा अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं में कार्यरत कर्मी।
    • कोविड-19 ड्यूटी के लिए अधिग्रहित निजी चिकित्सा पेशेवर भी, उपयुक्त प्रमाण प्रस्तुत करने की शर्त पर, पात्र हैं।
  • बीमा कवरेज: कोविड-19 रोगियों के उपचार के दौरान मृत्यु या दुर्घटना की स्थिति में ₹50 लाख का मुआवजा।

प्रोजेक्ट सनकैचर

प्रोजेक्ट सनकैचर’ गूगल की एक दीर्घकालिक पहल है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2027 तक अंतरिक्ष में सौर ऊर्जा से संचालित डेटा केंद्रों का निर्माण करना है।

प्रोजेक्ट सनकैचर’ के बारे में

  • प्रौद्योगिकी: उपग्रहों को जोड़ने और मशीन लर्निंग कार्यभार का विस्तार करने के लिए टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट्स तथा लेजर-आधारित प्रकाशीय संपर्कों का उपयोग।
    • गूगल का दावा है कि उसके चिप्स ने अंतरिक्ष परिस्थितियों के लिए विकिरण सहनशीलता परीक्षण सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिए हैं।
  • तर्क
    • पर्यावरणीय राहत: स्थलीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता डेटा केंद्रों की विद्युत और जल संबंधी आवश्यकताओं को कम करता है।
    • विश्वसनीयता: उपग्रह या कक्षीय स्थानों पर पूर्वानुमेय पर्यावरणीय स्थितियाँ और निरंतर सौर विकिरण उपलब्ध होता है, जिससे विद्युत संबंधी बाधाओं, प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों में कमी आती है।
    • डेटा संप्रभुता: डेटा प्रोसेसिंग एवं स्टोरेज संबंधी नियामकीय प्रतिबंध वैश्विक स्तर पर केंद्रीकृत ग्राहक-होस्टिंग संरचनाओं के कार्यान्वयन में अवरोध उत्पन्न करते हैं।
      • वर्ष 1967 की ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ अंतरिक्ष पर राष्ट्रीय संप्रभुता के दावे को निषिद्ध करती है, जिससेलूनर डेटा सेंटर’ स्थानीय नियामकीय अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन किए बिना बहु-राष्ट्रीय ग्राहकों की होस्टिंग कर सकता है।
    • व्यवहार्यता: रॉकेट प्रौद्योगिकी में प्रगति के कारण प्रक्षेपण लागत में कमी आई है।
  • अंतरिक्ष-आधारित डेटा केंद्रों की चुनौतियाँ
    • उच्च लागत: अंतरिक्ष आधारित डेटा केंद्रों की स्थापना और रखरखाव में प्रारंभिक और परिचालन संबंधी व्यय बहुत अधिक होते हैं।
    • रखरखाव और मरम्मत: मरम्मत प्रक्रियाएँ अत्यधिक जटिल होती हैं तथा अंतरिक्ष में ऑन-साइट’ तकनीकी विशेषज्ञों की आवश्यकता उत्पन्न करती हैं।
    • विलंब संबंधी समस्याएँ: पृथ्वी से दूरी के कारण डेटा संप्रेषण में विलंब, जिससे वास्तविक-समय संगणना प्रभावित होती है।
    • साइबर सुरक्षा चिंताएँ: दूरस्थ और दुर्गम अंतरिक्ष वातावरण में डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
  • महत्त्व: यह पृथ्वी से परे डेटा केंद्र संचालन को स्थानांतरित कर, स्थलीय ऊर्जा माँग को घटाते हुए और अंतरिक्ष-आधारित AI प्रोसेसिंग की नई संभावनाएँ खोलते हुए, क्लाउड कंप्यूटिंग को पुनर्परिभाषित कर सकता है।

अन्य अंतरिक्ष-आधारित डेटा केंद्र परियोजनाएँ

  • परियोजना स्टारगेट (OpenAI): एनविडिया, सॉफ्टबैंक और ओरेकल के साथ साझेदारी में 500 अरब डॉलर की पहल, जिसका उद्देश्य सौरमंडल में ‘डाइसन-रिंग’ जैसी संरचना में कृत्रिम बुद्धिमत्ता डेटा केंद्र स्थापित करना है।
  • स्टारक्लाउड उपग्रह (एनवीडिया): 60 किलोग्राम का उपग्रह, जिसमें तीव्र कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रशिक्षण और अनुमान के लिए H100 ग्राफिक्स प्रोसेसर यूनिट भेजी गई।
  • लोनस्टार डेटा होल्डिंग्स’ परियोजना: इंट्यूटिव मशींस के चंद्र मिशन के तहत एक मिनी डेटा सेंटर को चंद्रमा पर भेजा गया था।
    • इस डेटा केंद्र का वजन एक किलोग्राम है और इसमें 8 टेराबाइट ठोस-अवस्था भंडारण क्षमता है।

राइनकोसॉरस (Rhynchosaurs)

ब्राजील के जीवाश्म वैज्ञानिकों ने ट्राइसिक युगीन जीवाश्म भंडारों से अब तक दर्ज किए गए सबसे छोटे और सबसे कम आयु के राइनकोसॉरस के बच्चे के जीवाश्म की पहचान की है।

खोज के बारे में

  • दक्षिणी ब्राजील में खोजा गया यह जीवाश्म, जिसकी पहचान मैक्रोसेफालोसॉरस मैरिएन्सिस के रूप में हुई है, 2.5 सेंटीमीटर से कम की खोपड़ी का है, जो अब तक दर्ज किया गया सबसे छोटा राइनकोसॉरस शिशु है।
  • माइक्रोटोमोग्राफी से पता चला कि इसके दाँत घिसे हुए नहीं थे, जो जन्म के तुरंत बाद मृत्यु का संकेत देते हैं, जबकि विशिष्ट दंत और खोपड़ी की विशेषताओं ने प्रजाति की पहचान की पुष्टि की।
    • माइक्रोटोमोग्राफी एक उच्च-रिजॉल्यूशन, 3D इमेजिंग तकनीक है, जिसमें एक्स-रे का उपयोग कर छोटे वस्तुओं की आंतरिक संरचना का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।

राइनकोसॉर के बारे में 

  • राइनकोसॉर विलुप्त हो चुके शाकाहारी, सरीसृप जैसे आर्कियोसॉरोमॉर्फ थे जो ट्राइसिक काल के दौरान रहते थे और पैंजिया महाद्वीप में व्यापक रूप से विस्तृत थे।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • मजबूत खोपड़ी और विशेषीकृत दंत संरचना, जो कठोर वनस्पति को पीसने के लिए अनुकूलित थी।
    • वयस्क राइनकोसॉर दो मीटर से अधिक लंबाई तक बढ़ सकते थे। शाकाहारी आहार के कारण इनके दाँतों में अत्यधिक घिसाव देखा जाता था।

ट्राइसिक काल के बारे में

  • ट्राइसिक काल (लगभग 25.2 करोड़ से 20.1 करोड़ वर्ष पूर्व) मेसोजोइक युग का प्रथम काल था। यह काल पृथ्वी के इतिहास की सबसे गंभीर सामूहिक विलुप्तिकरण (पर्मियन–ट्राइसिक विलुप्ति) के बाद का एक निर्णायक चरण था।
  • इस समय पैंजिया विद्यमान था, जलवायु सामान्यतः गर्म थी और जीवन का पुनरुत्थान हो रहा था।
  • इसी काल में पहले डायनासोर, स्तनधारी, मगरमच्छ, कछुए, प्टेरोसॉर तथा समुद्री सरीसृप जैसे इक्थियोसॉर प्रकट हुए। इसने आगे चलकरसरीसृपों के युग’ अर्थात् मेसोजोइक युग की नींव रखी।

मावेन (MAVEN) मिशन

एक दशक से अधिक समय तक मंगल की कक्षा में कार्यरत रहने के बाद ‘मावेन’ अंतरिक्ष यान से संपर्क टूट गया है। संचार विफलता के कारणों की जाँच के लिए नासा के अभियंता तकनीकी परीक्षण और विश्लेषण कर रहे हैं।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • नासा के दो अन्य अंतरिक्ष यान अभी भी मंगल की कक्षा में सक्रिय हैं:-
    • मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर, जिसका प्रक्षेपण वर्ष 2005 में किया गया था।
    • मार्स ओडिसी, जिसका प्रक्षेपण वर्ष 2001 में हुआ था।

मावेन’ मिशन के बारे में

  • मावेन (मार्स वायुमंडल एवं वाष्पशील तत्वों का विकास) नासा का एक मिशन था।
  • इसका उद्देश्य मंगल के ऊपरी वायुमंडल, आयनमंडल तथा सूर्य के साथ उसकी पारस्परिक क्रिया का अध्ययन करना था।
  • प्रक्षेपण: नवंबर 2013 में प्रक्षेपित किया गया और वर्ष 2014 में मंगल की कक्षा में स्थापित हुआ। इसका लक्ष्य ग्रह के वायुमंडलीय विकास की जाँच करना था।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • वायुमंडलीय संरचना, सौर पवन के प्रभाव और वायुमंडलीय क्षरण को मापने वाले उन्नत उपकरणों से सुसज्जित।
    • आवेशित कणों और सौर विकिरण के कारण मंगल के ऊपरी वायुमंडल से गैसों के पलायन की प्रक्रिया का अध्ययन करने में सक्षम।

मावेन’ मिशन की प्रमुख उपलब्धियाँ

  • महत्त्वपूर्ण खोजें: यह स्थापित किया कि अंतरिक्ष में वायुमंडल का क्षय मंगल के गर्म और आर्द्र ग्रह से ठंडे और शुष्क ग्रह में परिवर्तित होने का प्रमुख कारण था।
    • इसने सिद्ध किया कि मंगल का अधिकांश कार्बन डाइऑक्साइड अंतरिक्ष में उत्सर्जित हो चुका है, जिससे वायुमंडलीय ताप के माध्यम से बड़े पैमाने पर मानवीकरण की संभावना समाप्त हो जाती है।
  • वैज्ञानिक अवलोकन: अरबों वर्षों में मंगल ग्रह के वायुमंडल के क्षरण को सौर गतिविधि और सौर पवन से जोड़ने वाले साक्ष्य प्रदान किए गए।
    • इसने वायुमंडल के संकुचन की व्याख्या करके तरल जल के नुकसान संबंधी समझ को बढ़ाया।
  • अतिरिक्त भूमिका: इसने नासा के क्यूरियोसिटी और पर्सिवियरेंस रोवर्स के लिए संचार रिले के रूप में भी कार्य किया।

राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस, 2025

14 दिसंबर, 2025 को राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस, 2025, मनाया गया, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार प्रदान किए।

राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार (NECA) के बारे में 

  • राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार ऊर्जा दक्षता में सुधार करते हुए उत्पादकता बनाए रखने के लिए उद्योगों, संस्थानों और नवप्रवर्तकों के उत्कृष्ट प्रयासों को मान्यता देते हैं।
  • नोडल मंत्रालय: विद्युत मंत्रालय (भारत सरकार)
  • कार्यान्वयन एजेंसी: ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE)
  • चयन के मानदंड
    • ऊर्जा खपत में मापनीय कमी।
    • ऊर्जा-कुशल प्रौद्योगिकियों एवं सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाना।
    • नवाचार, विस्तार-योग्यता एवं क्षेत्रीय प्रभाव।
    • तकनीकी एवं पुरस्कार समितियों द्वारा पारदर्शी मूल्यांकन।
  • राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार, 2025 की मुख्य विशेषताएँ
    • उद्योग एवं भवन: उन्नत ऊर्जा-कुशल प्रक्रियाओं एवं प्रणालियों को अपनाना।
    • परिवहन एवं उपकरण: ईंधन और ऊर्जा दक्षता मानकों में सुधार करना।
    • नवाचार: ऊर्जा बचत के लिए नवीन समाधानों का विकास करना।
    • सामाजिक माध्यम प्रभावक एवं सामग्री निर्माता: ऊर्जा संरक्षण पर डिजिटल जागरूकता एवं व्यवहार परिवर्तन अभियान संचालित करना।
  • राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार ‘ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है’ की अवधारणा को बढ़ावा देता है। इससे ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु कार्रवाई और सतत् आर्थिक विकास को मजबूती मिलती है।

राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस के बारे में

  • राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस, वर्ष 1991 से प्रत्येक वर्ष 14 दिसंबर को मनाया जाता है।
  • इसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में ऊर्जा उपयोग में कमी और ऊर्जा-कुशल प्रथाओं को प्रोत्साहित करने के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के बारे में

  • ऊर्जा दक्षता ब्यूरो भारत में विभिन्न क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता और संरक्षण को बढ़ावा देने वाली शीर्ष संस्था है।
  • इसकी स्थापना 1 मार्च, 2002 को ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के अंतर्गत की गई थी।
  • भूमिका
    • नीतियों और बाजार-आधारित तंत्रों का निर्माण करना।
    • प्रदर्शन, उपलब्धि एवं व्यापार तथा मानक एवं लेबलिंग जैसे कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करना।
    • राज्यों, उद्योगों और संस्थानों के साथ समन्वय कर भारत की ऊर्जा तीव्रता को कम करना।

संदर्भ

हाल के विधायी कदम, विशेष रूप से प्रस्तावित भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) विधेयक, 2025 का मसौदा और इससे पहले का भारतीय प्रबंधन संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2023, स्वायत्त उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) को केंद्रीकृत करने के लिए केंद्र सरकार के समन्वित प्रयास को करते हैं।

संबंधित तथ्य

  • हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विकसित भारत शिक्षा प्राधिकरण विधेयक को मंजूरी दी है, जिसमें भारत में उच्च शिक्षा के लिए एक एकीकृत नियामक निकाय का प्रस्ताव है।
  • यह विधेयक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) जैसे मौजूदा वैधानिक निकायों को प्रतिस्थापित करना चाहता है।
  • पहले इसे उच्च शिक्षा आयोग (HECI) विधेयक के नाम से जाना जाता था, लेकिन अब विकसित भारत की परिकल्पना को प्रतिबिंबित करने के लिए इसका नाम बदलकर विकसित भारत शिक्षा प्राधिकरण विधेयक कर दिया गया है।

उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) के बारे में

  • उच्च शिक्षा संस्थान ‘नॉलेज इकॉनमी’ का आधारस्तंभ  होते हैं, जो मानव पूँजी निर्माण, नवाचार और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देते हैं।
  • भारत में, HEIs जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए बहुत आश्यक है, साथ ही नई शिक्षा नीति (NEP), 2020 द्वारा शुरू किए गए सुधारों के तहत गुणवत्ता, समानता, गवर्नेंस और रोजगार के लगातार सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान भी करते हैं।

उच्च शिक्षा में भारत का परिवर्तन

  • मौजूदा स्थिति: देश में पंजीकृत विश्वविद्यालय/विश्वविद्यालय-स्तरीय संस्थानों की कुल संख्या 1,168 है। इसके अतिरिक्त 45,473 कॉलेज तथा 12,002 स्वतंत्र संस्थान कार्यरत हैं।
  • वैश्विक दृश्यता: पिछले एक दशक में वैश्विक रैंकिंग में भारत की उपस्थिति में 318% की प्रभावशाली वृद्धि हुई है। यह वृद्धि G20 देशों में सर्वाधिक है, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक पहचान को दर्शाती है।
  • समावेशिता: सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEDGs) के लिए नामांकन में वर्ष 2011 से 2022 के दौरान उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो उच्च शिक्षा तक पहुँच और समान अवसरों के विस्तार को दर्शाती है।
    • OBC वर्ग के नामांकन में 80.9% की वृद्धि हुई है।
    • अनुसूचित जाति (SC) के नामांकन में 76.3% की वृद्धि दर्ज की गई है (जो पात्र जनसंख्या के 15% से बढ़कर लगभग 26% हो गई है)।
    • अनुसूचित जनजाति (ST) के नामांकन में 106.8% की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है (जो पात्र जनसंख्या के 11% से बढ़कर 21% तक पहुँच गई है)।
  • लैंगिक समानता: राष्ट्रीय लैंगिक समानता सूचकांक (GPI) वर्ष 2021-22 में 1.01 के स्कोर तक पहुँच गया, जो उच्च शिक्षा संस्थानों में लैंगिक समानता की दिशा में एक सफल प्रगति का संकेत देता है।
    • देश में 17 विश्वविद्यालय (जिनमें से 14 राज्य सार्वजनिक विश्वविद्यालय हैं) तथा 4,470 कॉलेज केवल महिलाओं के लिए संचालित किए जा रहे हैं।

उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) में केंद्रीकरण के बारे में

  • उच्च शिक्षा में केंद्रीकरण से आशय उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) के प्रशासन, वित्तपोषण, प्रवेश प्रक्रिया और पाठ्यक्रम से जुड़े अधिकारों का केंद्र सरकार के पास बढ़ते हुए संकेंद्रण से है। यह प्रक्रिया प्रायः संस्थागत स्वायत्तता और राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए आगे बढ़ती हुई देखी जाती है।

उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) का ऐतिहासिक विकास: समन्वय से नियंत्रण की ओर

  • संवैधानिक आधार (1950 का दशक): विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 ने उच्च शिक्षा में समन्वय और मानकों के अनुरक्षण के लिए प्रारंभिक ढाँचा स्थापित किया।
    • हालाँकि, इसकी विधायी शक्ति संघ सूची की प्रविष्टि 66 के अंतर्गत संघ सरकार को प्राप्त समन्वय एवं मानक निर्धारण के अधिकार से आती है।
  • संवैधानिक परिवर्तन (1976): 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा शिक्षा को समवर्ती सूची (प्रविष्टि 25) में स्थानांतरित किया गया।
    • यद्यपि इससे राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकरण संभव हुआ, परंतु हाल के वर्षों में संघ सरकार के कई कदमों की आलोचना इस आधार पर की जाती रही है कि वे इस भूमिका की सीमाओं से आगे बढ़ते हैं।
  • हालिया प्रवृत्तियाँ (वर्ष 2014 के बाद): इस अवधि में केंद्र के नियंत्रण में तेजी देखी गई है, जिसे प्रायः व्यापक ‘3Cs संकट’ से जोड़ा जाता है:-
    • केंद्रीकरण, वाणिज्यीकरण (जैसे- ऋण-आधारित वित्तपोषण) तथा वैचारिक प्रभाव।
    • इन प्रवृत्तियों ने मिलकर समानता और सहकारी संघवाद की भावना, दोनों को कमजोर किया है।

उच्च शिक्षा में नियामक निकाय

  • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC): UGC अधिनियम, 1956 द्वारा स्थापित, यह विश्वविद्यालय शिक्षा के मानकों का समन्वय और रखरखाव करता है और विश्वविद्यालयों को अनुदान प्रदान करता है।
  • अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AITC): AITC अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित, यह गुणवत्तापूर्ण तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देता है और विनियमित करता है तथा तकनीकी संस्थानों के लिए मानदंड निर्धारित करता है।
  • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC): भारतीय चिकित्सा परिषद संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम से भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI) का स्थान लेने वाला यह आयोग चिकित्सा शिक्षा और मानकों को विनियमित करता है।
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR): कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के अधीन एक स्वायत्त संगठन, जिसकी स्थापना वर्ष 1929 में हुई थी, कृषि शिक्षा और अनुसंधान का प्रबंधन करता है।
  • राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE): राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 द्वारा गठित, यह शिक्षकों की शिक्षा को विनियमित करता है और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों के लिए मानदंड निर्धारित करता है।

भारतीय उच्च शिक्षा – प्राचीन काल से आधुनिक काल तक

  • प्राचीन भारतीय उच्च शिक्षा (10वीं शताब्दी ईस्वी से पहले)
    • दर्शन: शिक्षा समग्र थी, जिसमें केवल अकादमिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों और कौशल विकास पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाता था।
    • गुरुकुल प्रणाली
      • गुरु-शिष्य परंपरा में ज्ञान के मौखिक प्रसारण पर जोर दिया जाता है।
      • प्रसिद्ध गुरुकुल: काशी, उज्जैन और पुष्पगिरि में स्थित हैं।
  • प्रारंभिक विश्वविद्यालय
    • तक्षशिला (छठी शताब्दी ईसा पूर्व-पाँचवीं शताब्दी ईस्वी): विश्व का पहला प्रमाणित विश्वविद्यालय।
      • प्रमुख विद्वान: चाणक्य (अर्थशास्त्र), पाणिनि (संस्कृत व्याकरण), चरक (चिकित्सा)।
    • नालंदा विश्वविद्यालय (पाँचवीं शताब्दी ईस्वी – बारहवीं शताब्दी ईस्वी): 10,000 से अधिक छात्रों और 2,000 शिक्षकों वाला पहला आवासीय विश्वविद्यालय
      • चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, मंगोलिया और फारस के विद्वानों को आकर्षित किया।
      • बख्तियार खिलजी द्वारा नष्ट किया गया (1193 ईस्वी)।
    • विक्रमशिला विश्वविद्यालय (8वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी): बौद्ध अध्ययन और तांत्रिक शिक्षा के लिए प्रसिद्ध।
    • इस काल में वल्लभी, ओदंतपुरी और पुष्पगिरि विश्वविद्यालय भी विद्यमान थे।
    • प्राचीन उच्च शिक्षा की विशेषताएँ
      • व्यावहारिक ज्ञान के साथ बहुविषयक दृष्टिकोण।
      • अंतरराष्ट्रीय छात्रों वाला वैश्विक ज्ञान केंद्र।
      • विशाल पुस्तकालयों से युक्त आवासीय व्यवस्था (उदाहरण के लिए, नालंदा में धर्मगंज नामक पुस्तकालय था)।
  • मध्यकालीन युग (10वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी)
    • आक्रमणों और विनाशों के कारण प्राचीन विश्वविद्यालयों का पतन हुआ।
    • अरबी, फारसी, कानून और धर्मशास्त्र पर केंद्रित मदरसों (इस्लामी शिक्षा केंद्रों) का उदय हुआ।
    • मुगल काल में दिल्ली, आगरा और फतेहपुर सीकरी में शिक्षा केंद्रों की स्थापना हुई।
    • सम्राट अकबर केदीन-ए-इलाही’ धर्म ने विभिन्न धर्मों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया।
    • हिंदू मंदिरों और मठों में अनौपचारिक शिक्षा परंपराएँ जारी रहीं।
  • औपनिवेशिक काल (18वीं-20वीं शताब्दी)
    • स्वदेशी शिक्षण केंद्रों का विनाश और ब्रिटिश शिक्षा नीतियों का थोपना।
    • माउंट स्टुअर्ट एल्फिंस्टन के कार्यवृत्त (1823) और मैकाले के कार्यवृत्त (1835) के कारण पारंपरिक भारतीय ज्ञान पर अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा मिला।
    • आधुनिक विश्वविद्यालयों की स्थापना
      • लंदन विश्वविद्यालय के मॉडल पर आधारित कलकत्ता विश्वविद्यालय, बॉम्बे विश्वविद्यालय और मद्रास विश्वविद्यालय (1857)
      • इन विश्वविद्यालयों का मुख्य ध्यान वैज्ञानिक अनुसंधान के स्थान पर प्रशासनिक और लिपिकीय शिक्षा पर था।
    • राष्ट्रवादी शिक्षा आंदोलनों का उदय
      • रवींद्रनाथ टैगोर का विश्वभारती विश्वविद्यालय (वर्ष 1921 में शांतिनिकेतन में)
      • बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) (वर्ष 1916 में मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित किया गया)।
      • अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) (वर्ष 1875 में सर सैयद अहमद खान द्वारा स्थापित किया गया)।
  • स्वतंत्रताोत्तर युग (1947-2000 का दशक)
    • केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों के माध्यम से उच्च शिक्षा के प्रसार पर ध्यान केंद्रित करना।
    • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIMs) की स्थापना की गई।
      • भारत की स्वतंत्रता के बाद के औद्योगीकरण को गति देने के लिएविश्व स्तरीय इंजीनियरों को तैयार करने वाले संस्थानों के निर्माण हेतु सरकारी समिति’ (1945) की अनुशंसाओं के फलस्वरूप, पहला IIT वर्ष 1951 में खड़गपुर में स्थापित किया गया।
      • 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में, भारत के योजना आयोग ने भारत में गुणवत्तापूर्ण प्रबंधन शिक्षा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रबंधन संस्थानों की स्थापना की अनुशंसा की, जिसके बाद पहला IIM वर्ष 1961 में कलकत्ता में स्थापित किया गया।
    • विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) अधिनियम, 1956 उच्च शिक्षा को विनियमित करने के लिए बनाया गया है।
    • राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों (NEP 1968, 1986, 1992) का उद्देश्य सार्वभौमिक पहुँच और अनुसंधान विकास था।
    • 1990 और 2000 के दशकों में तीव्र निजीकरण हुआ।
  • समकालीन उच्च शिक्षा (2000-वर्तमान)
    • विश्व की दूसरी सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली (1,100 से अधिक विश्वविद्यालय, 50,000 से अधिक कॉलेज)।
    • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020:
      • बहुविषयक विश्वविद्यालय और समग्र शिक्षा।
      • वर्ष 2035 तक सकल नामांकन अनुपात (GER) का लक्ष्य 50%।
      • अकादमिक क्रेडिट बैंक (ABC), प्रवेश और निकास के कई विकल्प।
    • डिजिटल शिक्षा पर बल (स्वयं, NPTEL, ई-पाठशाला)
    • अनुसंधान एवं विकास में निवेश और वैश्विक सहयोग।

उच्च शिक्षा संस्थानों से संबंधित हालिया घटनाक्रम

यद्यपि संवैधानिक रूप से वैध होने के बावजूद, उच्च शिक्षा प्रशासन तेजी से कार्यपालिका-केंद्रित होता जा रहा है, जिसमें नियम और अनुमोदन संस्थानों को आकार दे रहे हैं, जिससे संसदीय निगरानी और लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर हो रही है।

  • भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM): IIM (संशोधन) अधिनियम, 2023 ने IIM को पूर्व में प्राप्त संप्रभुता को प्रभावी रूप से निरस्त कर दिया है।
    • इस अधिनियम के अनुसार, निदेशकों की नियुक्तियों और सभी प्रमुख नीतिगत निर्णयों को अब शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। इसका अंतर्निहित संदेश यह है कि स्वायत्तता निरस्त की जा सकती है।
  • भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) विधेयक, 2025 का मसौदा: इस प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य वैधानिक अधीनता स्थापित करना है।
    • इसका उद्देश्य समकक्षों द्वारा शासित भारतीय सांख्यिकी संस्थान को एक संस्था से वैधानिक निकाय में परिवर्तित करना है, जिसमें धारा 17 (5) विशेष रूप से यह अनिवार्य करती है कि बोर्ड केंद्र सरकार के प्रति उत्तरदायी होगा।
  • सामान्य विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (CUET): CUET की शुरुआत प्रवेश संबंधी एकरूपता और केंद्रीकृत नियंत्रण को दर्शाती है।
    • एक ही परीक्षा लागू करने से एक ‘समरूपता संबंधी जाल’ का निर्माण होता है, जिससे विविध क्षेत्रीय पाठ्यक्रमों के हाशिए पर चले जाने का खतरा होता है और राज्य बोर्डों के उन छात्रों को संभावित रूप से नुकसान हो सकता है जिनके पास केंद्रीकृत कोचिंग संसाधनों तक पहुँच नहीं है।
  • विश्वभारती विश्वविद्यालय: यह संस्थान रूढ़िवादिता के दबाव का सामना कर रहा है।
    • NEP 2020 और राष्ट्रीय कर्मयोगी जैसे कार्यक्रमों की कठोर संरचनाओं का पालन करने का दबाव स्वतंत्र, स्थानीय अनुसंधान के लिए इसके अद्वितीय विजन को कमजोर कर रहा है, जिससे स्थानीय ज्ञान प्रणालियों का क्षरण हो रहा है।
  • परख (PARAKH): समग्र विकास के लिए ज्ञान के प्रदर्शन मूल्यांकन, समीक्षा और विश्लेषण की पहल (परख) का उद्देश्य NCERT के माध्यम से केंद्रीकृत मूल्यांकन मानकों को लागू करना है, जिससे राज्य बोर्डों की उपेक्षा का खतरा है।
  • केंद्रीकरण के एक उपकरण के रूप में वित्तीय संघवाद: केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं, प्रदर्शन-आधारित अनुदानों और HEFA-आधारित ऋणों जैसे वित्तीय साधनों के माध्यम से केंद्रीकरण को तेजी से मजबूत किया जा रहा है, जिससे विश्वविद्यालय वित्तीय रूप से निर्भर संस्थानों में परिवर्तित हो रहे हैं, जहाँ स्वायत्तता केवल कानून के बजाय वित्तपोषण शर्तों द्वारा सीमित है।

केंद्रीकृत उच्च शिक्षा प्रशासन सुधारों का औचित्य

भारत सरकार इस केंद्रीकरण को निम्नलिखित आवश्यकताओं के आधार पर उचित ठहराती है:-

  • संस्थागत विफलताओं का समाधान: केंद्रीय निगरानी के अभाव में शिक्षण संस्थानों’ (निम्न गुणवत्ता वाले निजी/मानित विश्वविद्यालयों) की बढ़ती संख्या और स्वायत्तता के संदर्भ में वित्तीय गबन या शैक्षणिक गड़बड़ी के मामलों को स्वीकार करना।
    • मानकीकृत शासन मॉडल, कुछ सीमा तक, इन कमियों का एक आवश्यक समाधान है।
  • जवाबदेही और कुप्रबंधन निवारण: सार्वजनिक धन का कुशल उपयोग सुनिश्चित करना और वित्तीय या शैक्षणिक कदाचार को रोकना।
    • NEP 2020 सरल लेकिन सख्त’ विनियमन का समर्थन करती है।
  • राष्ट्रीय सामंजस्य और मानकीकरण: वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के लिए प्रमुख संस्थानों का सामंजस्य स्थापित करना और यह सुनिश्चित करना कि अनुसंधान परिणाम राष्ट्रीय रणनीतिक लक्ष्यों (जैसे- आत्मनिर्भर भारत) के अनुरूप हों, जिसका उद्देश्य वैश्विक शैक्षणिक प्रतिष्ठा में सुधार करना है।
    • इसे मानकीकरण के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग (QS/THE) में सुधार के लिए एक आवश्यक कदम के रूप में देखा जाता है।
  • शासन व्यवस्था का आधुनिकीकरण: दशकों पुराने शासन ढाँचे (जैसे- ISI अधिनियम, 1959) को एकीकृत राष्ट्रीय शैक्षिक परिदृश्य के अनुरूप अद्यतन करना।

केंद्रीकरण से उत्पन्न चुनौतियाँ और चिंताएँ

अधीनता की ओर बढ़ती प्रवृत्ति गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करती है, जो प्रमुख शासन संबंधी विषयों से परस्पर संबंधित हैं:-

  • सहकारी संघवाद का क्षरण: केंद्रीय नियंत्रण को समवर्ती सूची में कानूनी और राजनीतिक अतिक्रमण के रूप में देखा जा रहा है, जो केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों को सहकारी संघवाद (मिलकर कार्य करना) से जबरन नियंत्रण (दबावयुक्त संघवाद) में बदल रहा है।
    • यद्यपि शिक्षा समवर्ती सूची में आती है, फिर भी केंद्र सरकार की वर्तमान कार्रवाइयों से अनुच्छेद 254 के तहत उल्लंघन किए बिना वास्तविक रूप से केंद्रीय प्रभुत्व स्थापित होने का खतरा है, जिससे उच्च शिक्षा संबंधी नीति निर्माण में राज्यों की भूमिका लगभग समाप्त हो जाएगी।
    • राजनीतिक प्रतिरोध: तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने केंद्रीय नीतियों (जैसे कि CUET) का सक्रिय रूप से विरोध किया है, उनका तर्क है कि ये नीतियाँ विशिष्ट क्षेत्रीय आवश्यकताओं और राज्य सरकारों की संवैधानिक भूमिका की अनदेखी करती हैं।
    • विरोधाभासी विचार: केंद्रीय निकायों ने भी चेतावनी दी है:-
      • लोकसभा की शिक्षा संबंधी स्थायी समिति (2024-25) ने VBSA विधेयक जैसी नीतियों में निहित ‘अति-केंद्रीकरण’ की स्पष्ट रूप से आलोचना की और राज्यों के साथ व्यापक परामर्श की सिफारिश की।
      • नीति आयोग की वर्ष 2025 की रिपोर्ट में विरोधाभासी रूप से राज्य के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए नई नीति के ‘विकेंद्रीकृत कार्यान्वयन’ का समर्थन किया गया था।
  • सामाजिक-आर्थिक विभाजन और क्षेत्रीय असमानता का गहराना: मानकीकृत परीक्षाओं (CUET/PARAKH) के माध्यम से प्रवेश प्रक्रिया को एकरूप बनाने का प्रयास एक समरूपता संबंधी जाल’ का निर्माण करता है जो मौजूदा असमानताओं को और मजबूत करता है।
    • उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रकारों पर असमान प्रभाव: केंद्रीकरण का बोझ असमान रूप से वितरित है, जिसमें राज्य के सार्वजनिक विश्वविद्यालय, जो नामांकित छात्रों के 80% से अधिक को शिक्षित करते हैं, असमान नीतिगत और वित्तीय बाधाओं का सामना करते हैं, जबकि राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थानों को प्रायः अधिक दृश्यता और संसाधन प्राप्त होते हैं।
    • वंचित समूहों को नुकसान: ग्रामीण क्षेत्रों या वंचित पृष्ठभूमि के छात्र आमतौर पर राष्ट्रीय परीक्षाओं के लिए आवश्यक महंगे, विशेष कोचिंग का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं, जिससे शहरी और धनी छात्रों को लाभ मिलने का खतरा रहता है।
    • पिछड़े राज्यों की उपेक्षा: केंद्रीकृत अधिदेश उन राज्यों की उपेक्षा करते हैं जिनका विकास सूचकांक लगातार कम है (उदाहरण के लिएबिहार का लगभग 14% विकास सूचकांक बनाम तमिलनाडु का लगभग 50%), जिन्हें एकसमान नियमों के बजाय स्थानीय स्तर पर अनुकूलित समाधानों की आवश्यकता है।
  • शैक्षणिक स्वतंत्रता और नवाचार पर हमला: केंद्रीकरण विश्वविद्यालय की आलोचनात्मक मंच’ के रूप में भूमिका को मौलिक रूप से कमजोर करता है, जो स्वतंत्र चिंतन और असहमति के लिए एक आवश्यक केंद्र है।
    • नैतिक जोखिम: केंद्रीकरण अकादमिक नैतिकता को नौकरशाही अनुपालन से प्रतिस्थापित करके नैतिक जोखिम उत्पन्न करता है, जिससे सार्वजनिक संस्थानों की अखंडता एवं निष्पक्षता खतरे में पड़ जाती है।
    • हितधारक स्तर पर प्रभाव: नौकरशाही निगरानी संकाय सदस्यों के बीच संविदाकरण और अनुपालन को बढ़ावा देती है, एकसमान मूल्यांकन लागू करती है जो छात्रों के लिए क्षेत्रीय और सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता को कम करती है, और कुलपतियों को अकादमिक नेतृत्त्वकर्त्ताओं के बजाय प्रशासनिक कार्यवाहक बना देती है।
    • आज्ञाकारिता को प्राथमिकता: यह प्रवृत्तिआलोचना’ (स्वतंत्र मूल्यांकन) की तुलना में अनुरूपता’ (नियमों का पालन) को प्राथमिकता देती है, जो संस्थानों में अविश्वास का संकेत देती है और उन्हें मात्र सरकारी विस्तार में बदलने का जोखिम उत्पन्न करती है।
    • अनुसंधान एवं विकास में बाधा: नौकरशाही नियंत्रण स्वतंत्र, अत्याधुनिक अनुसंधान में बाधा उत्पन्न कर सकता है। भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (GERD) GDP का केवल 0.64% (2023-24) है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।
  • वैश्विक प्रतिष्ठा को खतरा और प्रतिभा पलायन: नौकरशाही हस्तक्षेप और राजनीतिकरण अकादमिक स्वतंत्रता को सीधे तौर पर नुकसान पहुँचाते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए गुणवत्ता का एक प्रमुख मापदंड है।
    • वैश्विक रैंकिंग में ठहराव: QS, 2026 रैंकिंग में भारतीय संस्थानों की संख्या में वृद्धि (46 संस्थान) हुई, लेकिन अकादमिक स्वतंत्रता और अनुसंधान प्रभाव मानकों में लगातार कम अंकों के कारण कोई भी संस्थान वैश्विक शीर्ष 100 में जगह नहीं बना पाया।
    • प्रतिभा का पलायन: यह वातावरण शीर्ष वैश्विक शिक्षकों और शोधकर्ताओं को भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों में शामिल होने से हतोत्साहित करता है, जो सीधे तौर पर प्रतिभा पलायन में योगदान देता है और वैश्विक ज्ञान केंद्र बनने के भारत के लक्ष्य को कमजोर करता है।
  • विश्वविद्यालय, लोकतंत्र और संवैधानिक नैतिकता: विश्वविद्यालय लोकतांत्रिक समाजीकरण के महत्त्वपूर्ण केंद्र हैं, जो संवैधानिक नैतिकता, विवेकपूर्ण असहमति और स्वतंत्र अनुसंधान को बढ़ावा देते हैं; अत्यधिक केंद्रीय नियंत्रण से इनके राज्य के प्रशासनिक विस्तार मात्र बनकर रह जाने का खतरा है, जिससे इनकी लोकतांत्रिक भूमिका कमजोर हो सकती है।
  • कानूनी और न्यायिक चेतावनियाँ: न्यायपालिका और संसदीय समितियों दोनों ने ही केंद्रीकरण की इस प्रवृत्ति के प्रति बार-बार आगाह किया है।
    • सर्वोच्च न्यायालय का पूर्व निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक टी.एम.ए पाई फाउंडेशन मामले (2002) में संस्थागत स्वायत्तता को मौलिक अधिकार [अनुच्छेद 19(1)(g)] घोषित किया और राज्य के अत्यधिक हस्तक्षेप के खिलाफ चेतावनी दी।
    • न्यायिक हस्तक्षेप: हाल ही में NEP से संबंधित याचिकाओं (उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2025 में CUET के भाषा पूर्वाग्रह से संबंधित याचिका) में, सर्वोच्च न्यायालय ने आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करते हुए चेतावनी दी है कि एकसमान नियम लागू करने से अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) के सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है।
    • संसदीय समीक्षा: संसदीय समितियों ने भी चिंता व्यक्त की है और ‘अत्यधिक केंद्रीकरण के बिना’ एक सरल नियामक संरचना की सिफारिश की है।

डेटा संक्षेप: प्रगति और NEP लक्ष्य

मापदंड  नवीनतम आँकड़े लक्ष्य प्रगति एवं चुनौतियों पर टिप्पणी
सकल नामांकन अनुपात (GER): लगभग 29.2% (आयु वर्ग 18–23 वर्ष) वर्ष 2035 तक 50% (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार)। महत्त्वाकाँक्षी NEP लक्ष्य की ओर धीमी लेकिन निरंतर प्रगति दर्ज की जा रही है।
क्षेत्रीय सकल नामांकन अनुपात (GER) में असमानता बिहार: लगभग 14% बनाम 

तमिलनाडु: लगभग 50%

कोई नहीं

यह कथनएक ही नीति सभी पर लागू’ जैसी केंद्रीय नीति की उस विफलता को उजागर करता है, जो गहराई से व्याप्त क्षेत्रीय असमानताओं का प्रभावी समाधान करने में सक्षम नहीं है।

अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश (GERD) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 0.64% (2023-24) वैश्विक औसत: 2.4%

गंभीर अपर्याप्त निवेश यह दर्शाता है कि अनुसंधान का सूक्ष्म प्रबंधन (माइक्रोमैनेजमेंट) किस प्रकार वास्तविक नवाचार को बाधित और कुंठित कर सकता है।

वैश्विक रैंकिंग में वृद्धि QS, 2026 में 46 संस्थान (कोई शीर्ष 100 में नहीं) शीर्ष 100/ विश्व स्तरीय

दृश्यता में 318% की वृद्धि के बावजूद, शैक्षणिक स्वतंत्रता के निम्न स्तर के कारण शीर्ष  स्तर पर प्रगति सीमित बनी हुई है।

स्वायत्तता आधारित उच्च शिक्षा प्रशासन पर वैश्विक सहमति

प्रमुख वैश्विक विश्वविद्यालय उच्च स्वायत्तता और उच्च जवाबदेही को बढ़ावा देने वाले मॉडल के तहत विकसित हो रहे हैं:-

  • OECD/यूरोपीय मॉडल: सरकारें रणनीतिक वित्तपोषक के रूप में कार्य करती हैं, ब्लॉक अनुदान प्रदान करती हैं और व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित करती हैं, लेकिन इनपुट (संकाय नियुक्तियाँ, पाठ्यक्रम) के सूक्ष्म प्रबंधन से दूरी बनाए रखती हैं। कठोर, स्वतंत्र परिणाम-आधारित मूल्यांकन और मान्यता निकायों के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है।
  • विकेंद्रीकृत सफलता (उदाहरण के लिए, फिनलैंड): शिक्षक-नेतृत्व वाली शासन प्रणाली और विकेंद्रीकृत निर्णय लेने की प्रक्रिया विश्व स्तरीय शैक्षिक मानक स्थापित करने में प्रभावी सिद्ध हुई है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहमति: यूनेस्को के वर्ष 2024 के विश्व उच्च शिक्षा सम्मेलन ने बौद्धिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देने और शैक्षणिक निर्णय लेने की प्रक्रिया के राजनीतिकरण को रोकने के लिए ‘जवाबदेही के साथ स्वायत्तता’ के वैश्विक आह्वान को दोहराया।
    • जर्मनी और कनाडा जैसी संघीय प्रणालियाँ उच्च शिक्षा पर प्राथमिक अधिकार उप-राष्ट्रीय सरकारों को सौंपती हैं, जबकि संघीय स्तर समन्वय, वित्त पोषण सहायता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा पर ध्यान केंद्रित करता है, यह दर्शाता है कि मजबूत मानक संस्थागत स्वायत्तता के साथ सह-अस्तित्व में रह सकते हैं।

आगे की राह

  • संवैधानिक संवाद: समवर्ती सूची और सहकारी संघवाद की भावना को पुनर्जीवित करने के लिए केंद्र को राज्यों के साथ सार्थक परामर्श करना चाहिए।
  • परिणाम-आधारित जवाबदेही: यश पाल समिति (2009) द्वारा रेखांकित किए गए अनुसार, नियुक्तियों जैसे इनपुट को नियंत्रित करने के बजाय, NAAC जैसे स्वतंत्र निकायों के माध्यम से परिणामों (जैसे- अनुसंधान का प्रभाव और स्नातक रोजगार क्षमता) की निगरानी और मूल्यांकन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • शैक्षणिक शासन का संरक्षण: शासी निकायों में प्रतिष्ठित शिक्षाविदों और समकक्ष विशेषज्ञों का वर्चस्व होना चाहिए। शासन सुधार से क्षमता निर्माण और संस्थागत विश्वास का निर्माण होना चाहिए, न कि आदेश-और-नियंत्रण संरचनाओं को थोपना।
  • आंतरिक लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाना: साझा शासन को बढ़ावा देना, अकादमिक परिषदों और संकाय निकायों को अकादमिक मामलों पर सर्वोच्च प्राधिकारी बनाना, जो UGC अधिनियम, 1956 के मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप हो।
  • सूक्ष्म प्रबंधन के बिना जवाबदेही को क्रियान्वित करना: प्रभावी जवाबदेही के लिए निश्चित कार्यकाल वाले स्वतंत्र शासी बोर्ड, पारदर्शी परिणाम डैशबोर्ड, सहकर्मी समीक्षा आधारित मान्यता और छात्रों, पूर्व छात्रों और अकादमिक सहयोगियों को शामिल करने वाले सामाजिक जवाबदेही तंत्र की आवश्यकता होती है, न कि इनपुट स्तर के नौकरशाही नियंत्रण की।

निष्कर्ष

उच्च शिक्षा संस्थानों के अत्यधिक केंद्रीकरण से ज्ञान-महाशक्ति बनने हेतु आवश्यक बौद्धिक गतिशीलता के दबने का जोखिम उत्पन्न होता है। वास्तविक सुधारों की दिशा नौकरशाही नियंत्रण से हटकर संस्थागत स्वायत्तता की ओर होनी चाहिए। साथ ही, विद्या (ज्ञान) की मूल भावना का पुनर्जीवन आवश्यक है, ताकि विश्वविद्यालयों को आलोचनात्मक अनुसंधान के वैश्विक केंद्रों (आधुनिक नालंदा) के रूप में सशक्त बनाया जा सके और नई शिक्षा नीति के लक्ष्यों की प्रभावी प्राप्ति हो सके।

अभ्यास प्रश्न

प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थानों की शासन संरचना में विधायी प्रावधानों (जैसे- ISI विधेयक 2025 और IIM संशोधन अधिनियम 2023) के माध्यम से किए गए परिवर्तन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए कि क्या यह परिवर्तन सहकारी संघवाद के सिद्धांतों और भारतीय शिक्षा नीति में संवैधानिक अधिदेशों के अनुरूप है।

संदर्भ 

दक्षिण भारत के प्रसवपूर्व क्लीनिकों में किए गए हालिया स्ट्राइड (STRiDE) अध्ययन से यह सामने आया है कि प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह की व्यापकता देर से होने वाले गर्भकालीन मधुमेह की तुलना में अधिक है तथा इससे माताओं में दीर्घकालिक मधुमेह का जोखिम भी अधिक रहता है।

  • इस अध्ययन का उद्देश्य एशियाई भारतीय महिलाओं में प्रारंभिक की तुलना में देर से होने वाले गर्भकालीन मधुमेह की व्यापकता और जोखिम कारकों का आकलन करना तथा गर्भावस्था के प्रारंभ में ही देर से होने वाले मधुमेह की भविष्यवाणी हेतु जोखिम-अंकन प्रणाली विकसित करना है।

स्ट्राइड (STRiDE) अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • प्रारंभिक और विलंबित गर्भकालीन मधुमेह की व्यापकता: प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह (EGDM) की व्यापकता 21.5% थी और विलंबित गर्भकालीन मधुमेह (LGDM) की व्यापकता 19.5% थी।
  • प्रारंभिक शुरुआत के प्रमाण: शोध से पुष्टि होती है कि गर्भकालीन मधुमेह का विकास मानक 16 सप्ताह की समय-सीमा से पहले ही प्रारंभ हो जाता है।
    • भारत, यूनाइटेड किंगडम और केन्या में किए गए STRiDE अध्ययन में लगभग प्रत्येक पाँच में से एक महिला में प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह पाया गया।
    • दीर्घकालिक मधुमेह का जोखिम: प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह से पीड़ित महिलाओं में आगे चलकर टाइप-2 मधुमेह विकसित होने का जोखिम, देर से होने वाले गर्भकालीन मधुमेह की तुलना में अधिक पाया गया।

संबंधित जोखिम कारक

  • प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह के लिए
    • प्रारंभिक गर्भावस्था मधुमेह (EGDM): EGDM का संबंध गर्भावस्था के शुरुआती दौर में अधिक वजन, बॉडी मास इंडेक्स (BMI), कमर की परिधि, रक्तचाप और ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c) से था।
      • EGDM के मामलों में पहले से गर्भकालीन मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज मेलिटस) का प्रसार अधिक पाया गया।
  • अनुशंसित जाँच पद्धति: 16 सप्ताह से पहले प्रारंभिक जाँच में ‘फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज’ तथा ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन का उपयोग।
    • जिन महिलाओं में प्रारंभिक परिणाम असामान्य पाए गए, उनकी 24–28 सप्ताह के बीच पुनः जाँच की गई।

गर्भकालीन मधुमेह के बारे में

  • परिभाषा: गर्भावस्था के दौरान पहली बार दिखने वाला उच्च रक्त शर्करा स्तर, जो सामान्यतः प्रसव के बाद समाप्त हो जाता है।
  • वर्गीकरण
    • प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह: गर्भावस्था के 20 सप्ताह से पहले निदान।
    • देर से होने वाला गर्भकालीन मधुमेह: गर्भावस्था के 24–28 सप्ताह के बीच निदान।
  • कारण
    • हार्मोनल परिवर्तन तथा इंसुलिन प्रतिरोध में वृद्धि।
    • इससे शरीर की रक्त शर्करा नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित होती है।
  • निदान का समय: सामान्यतः 24 से 28 सप्ताह के बीच पहचाना जाता है।
  • प्रारंभिक जाँच क्यों आवश्यक है?
    • शीघ्र कार्रवाई की आवश्यकता: विशेषज्ञ अब गर्भावस्था के आठवें सप्ताह तक ग्लूकोज जाँच की सिफारिश करते हैं।
    • कारण: गर्भावस्था की पहली तिमाही में उच्च रक्त शर्करा शिशु के चयापचय को प्रभावित कर सकती है तथा भविष्य में रोगों का जोखिम बढ़ा सकती है।

गर्भकालीन मधुमेह: वैश्विक बनाम भारतीय पहल

वर्ग पहल
वैश्विक पहल
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) गर्भकालीन मधुमेह (GDM) को गर्भावस्था के दौरान पहली बार पता चलने वाले उच्च रक्त शर्करा स्तर (हाइपरग्लाइसेमिया) के रूप में परिभाषित करता है और 24-28 सप्ताह में स्क्रीनिंग की सिफारिश करता है, जिसमें उच्च जोखिम वाली महिलाओं के लिए प्रारंभिक स्क्रीनिंग का सुझाव दिया जाता है।
  • इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ डायबिटीज एंड प्रेग्नेंसी स्टडी ग्रुप्स’ (IADPSG) ‘ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट’ (OGTT) का उपयोग करके वैश्विक नैदानिक ​​सीमाएँ निर्धारित करता है।
  • इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन’ (IDF) GDM को भविष्य में टाइप-2 मधुमेह और अंतरपीढ़ीगत चयापचय जोखिम के एक कारक के रूप में उजागर करता है, अधिकांश उच्च आय वाले देश जोखिम-आधारित स्क्रीनिंग का पालन करते हैं।
भारत की पहल
  • केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने सार्वभौमिक गर्भकालीन मधुमेह (GDM) स्क्रीनिंग को अनिवार्य कर दिया है।
  • भारत एकल-चरणीय OGTT पद्धति का पालन करता है।
  • GDM को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल एवं किशोर स्वास्थ्य (RMNCH+A) रणनीति में एकीकृत किया गया है।
  • भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) प्रारंभिक गर्भावस्था में प्रारंभिक मधुमेह (EGDM) की उच्च व्यापकता के कारण प्रारंभिक गर्भावस्था स्क्रीनिंग का समर्थन करती है।
  • आयुष्मान भारत- स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (AB-HWC) सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग और अनुवर्ती सेवाएँ प्रदान करते हैं।

संदर्भ 

हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) बिल, 2025 को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य अत्यधिक प्रतिबंधित परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलना तथा भारत के परमाणु प्रशासन ढाँचे का पुनर्गठन करना है।

सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) बिल के बारे में

  • एकाधिकार की समाप्ति: परमाणु ऊर्जा अधिनियम निजी संस्थाओं और राज्य सरकारों को परमाणु विद्युत संयंत्रों के संचालन से रोकता है।
    • वर्तमान में परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड सभी 24 वाणिज्यिक रिएक्टरों का संचालन करती है।
    • SHANTI विधेयक सरकारी पर्यवेक्षण में निजी संस्थाओं को परमाणु विद्युत संयंत्र संचालित करने की अनुमति देने का प्रस्ताव करता है।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा: विधेयक कुछ परमाणु गतिविधियों में 49 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देता है, जिससे प्रौद्योगिकी और पूँजी का प्रवाह संभव होगा।
  • कानूनी और विनियामक परिवर्तन: इस विधेयक में संयंत्र संचालकों को संरक्षण प्रदान करने और उपकरण आपूर्तिकर्ताओं की देयता को सीमित करने के लिए नागरिक दायित्व कानून में संशोधन का प्रस्ताव है।
  • भारतीय परमाणु बीमा पूल के तहत संचालक बीमा को पुनर्परिभाषित किया गया है: प्रति घटना ₹1,500 करोड़।
  • विवादों के लिए एक विशेष परमाणु न्यायाधिकरण की स्थापना की गई है।
  • हालाँकि मुख्य कार्य (परमाणु सामग्री उत्पादन, भारी जल, अपशिष्ट प्रबंधन) परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के पास ही रहेंगे।

परमाणु ऊर्जा में निजी क्षेत्र की भागीदारी का महत्त्व

  • संसाधन जुटाना: परमाणु परियोजनाएँ पूँजी-प्रधान होती हैं, निजी निवेश से घरेलू और वैश्विक पूँजी तक पहुँच में वृद्धि होती है, जिससे सरकार पर वित्तीय बोझ कम होता है।
  • प्रौद्योगिकी नवाचार: निजी कंपनियाँ उन्नत रिएक्टर डिजाइन, निर्माण तकनीक और परिचालन दक्षता लाती हैं, जिससे औद्योगिक ‘विकार्बनीकरण’ को समर्थन मिलता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: विविधीकृत परमाणु पारितंत्र आपूर्ति शृंखलाओं और विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ करता है, जिससे दीर्घकालिक निम्न-कार्बन ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

SHANTI विधेयक से जुड़ी चुनौतियाँ

  • सुरक्षा और दायित्व: नागरिक परमाणु क्षति अधिनियम, 2010 के अंतर्गत उच्च दायित्व ने अतीत में निजी और विदेशी निवेश को हतोत्साहित किया है।
  • सुरक्षा जोखिम: संवेदनशील परमाणु प्रौद्योगिकी और सामग्री के लिए सख्त सुरक्षा उपाय, निगरानी और अनुरेखण आवश्यक हैं।
  • लंबी परियोजना अवधि: परमाणु परियोजनाओं के निर्माण में सामान्यतः 8-10 वर्ष लगते हैं, जिससे जोखिम-साझेदारी या व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण की आवश्यकता अधिक होती है।
  • शासन और विनियामक चुनौतियाँ: राज्य एकाधिकार से निजी भागीदारी की ओर संक्रमण के लिए मजबूत विनियामक ढाँचे, जवाबदेही तंत्र और नागरिक व सुरक्षा एजेंसियों के मध्य समन्वय आवश्यक है।

परमाणु ऊर्जा के बारे में

  • परिभाषा: परमाणु ऊर्जा वह ऊर्जा है जो परमाणु के नाभिक से मुक्त होती है, जो विखंडन (भारी नाभिक के विखंडन) या संलयन (हल्के नाभिकों का संयोजन) से उत्पन्न होती है।
    • यह स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु लक्ष्यों के लिए उच्च-घनत्व, निम्न-कार्बन विद्युत स्रोत प्रदान करती है।
  • भारत के लिए परमाणु ऊर्जा का महत्त्व: भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य की ओर संक्रमण के लिए परमाणु ऊर्जा महत्त्वपूर्ण है।
    • परमाणु ऊर्जा क्षमता में वृद्धि से सरकार के वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
    • यह भारत की वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने की जलवायु परिवर्तन प्रतिबद्धता में भी योगदान देता है।
  • भारत में वर्तमान परमाणु क्षमता: भारत में वर्तमान में 25 कार्यरत परमाणु रिएक्टर हैं जिनकी कुल स्थापित क्षमता लगभग 8.88 गीगावाट है।
    • 17 रिएक्टर निर्माणाधीन हैं, जिनसे आने वाले वर्षों में देश की परमाणु क्षमता में वृद्धि होगी।
    • वर्तमान में, भारत की परमाणु क्षमता 8 गीगावाट (GWe) से कम है।
  • परमाणु ऊर्जा मिशन और अनुसंधान एवं विकास
    • भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा मिशन प्रारंभ किया है, जिसके अंतर्गत स्माल मॉड्यूलर रिएक्टरों के अनुसंधान एवं विकास हेतु ₹20,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
    • वर्ष 2033 तक पाँच स्वदेशी स्माल मॉड्यूलर रिएक्टर संचालित करने की योजना।
  • वैश्विक परिप्रेक्ष्य में परमाणु क्षमता: विश्व स्तर पर सर्वाधिक परमाणु ऊर्जा क्षमता संयुक्त राज्य अमेरिका के पास है, जो 100 गीगावॉट है।
    • फ्राँस 65 गीगावॉट के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि चीन के पास 58 गीगावॉट की क्षमता है।

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