100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

Dec 02 2025

संदर्भ 

‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ द्वारा प्रकाशित प्रमुख भारतीय शहरों का वायु गुणवत्ता मूल्यांकन (वर्ष 2015–2025) शीर्षक वाली नई विश्लेषण रिपोर्ट में पाया गया है कि पिछले दशक में किसी भी प्रमुख भारतीय शहर में  सुरक्षित वायु गुणवत्ता स्तर नहीं है।

विश्लेषण के प्रमुख निष्कर्ष

  • सबसे प्रदूषित शहर:  दिल्ली ने विश्लेषित 11 प्रमुख शहरों में सबसे खराब वायु गुणवत्ता दर्ज की। इसका वार्षिक औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) वर्ष 2016 में 250 से अधिक रहा तथा वर्ष 2025 में भी 180 पर अस्वस्थ स्तर पर बना हुआ है, यद्यपि वर्ष 2019 के बाद कुछ सुधार दिखाई देता है।
    • लखनऊ एवं वाराणसी जैसे उत्तरी शहरों में AQI प्रारंभ से ही 200 से अधिक रहा, जिसमें सुधार तो हुआ, परंतु यह अब भी सुरक्षित सीमा से अधिक है।
  • क्षेत्रीय असमानता: चेन्नई, चंडीगढ़, विशाखापत्तनम और मुंबई में AQI अपेक्षाकृत कम (80–140) रहा, परंतु यह भी सुरक्षित मानकों से ऊपर है।
    • बंगलूरू में सबसे कम प्रदूषण स्तर (AQI 65–90) दर्ज किया गया, परंतु यह भी सुरक्षित श्रेणी (AQI 0–50) में नहीं आता।

भारत के उत्तरी शहर अधिक प्रदूषित क्यों हैं

  • अवस्थिति संबंधी कारक
    • स्थलरुद्ध बेसिन: उत्तरी शहर स्थलरुद्ध सिंधु-गंगा के मैदान में स्थित हैं, जो उत्तर में हिमालय से घिरा है, जिससे प्रदूषकों का प्रसार रुक जाता है।
    • वायु प्रवाह अवरोध: इसके कारण, प्रदूषक आसानी से प्रसारित नहीं हो पाते और लंबे समय तक शहरों में स्थिर रहते हैं।
  • शीतकालीन तापमान उत्क्रमण
    • शीतकालीन उत्क्रमण परत: दिसंबर–फरवरी के दौरान सतह के निकट स्थित ठंडी, भारी वायु ऊपर स्थित गर्म परत के नीचे बनी रहती है, जिससे एक वायुमंडलीय आवरण का निर्माण हो जाता है।
    • ऊर्ध्वाधर मिश्रण में कमी: प्रदूषक पृथ्वी की पतली सीमा परत के भीतर ही सीमित रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी जैसे शहरों में गंभीर रूप से प्रभाव देखा जा सकता है।
  • मौसमी हवा और वर्षा पैटर्न
    • ग्रीष्म और मानसून में राहत: मानसून के दौरान पश्चिमी पवनें और वर्षा पूरे भारत में प्रदूषकों को प्रसारित करने में मदद करती हैं।
    • शीत ऋतु में ठहराव: वर्षा की कमी, कम पवन की गति और शुष्क वायु मिलकर उत्तरी शहरों में प्रदूषण की घटनाओं को बढ़ा देते हैं।
  • शहरी संरचना एवं पवन प्रतिरोध
    • सतही घर्षण: उत्तरी महानगरों में सघन शहरी निर्माण कार्य धूल उत्पन्न करता है, जिससे वायु की गति धीमी हो जाती है और प्रदूषकों का प्रसार सीमित हो जाता है।
    • उच्च निर्माण घनत्व: ऊँची इमारतों के समूह तथा संकीर्ण शहरी घाटियाँ, कणिका पदार्थों को अवशोषित कर लेती हैं।
  • क्षेत्रीय प्रदूषण का अतिरिक्त भार
    • उत्तरी भारत में फसल अवशेष जलाने (पंजाब-हरियाणा क्षेत्र), NCR में औद्योगिक क्लस्टर, वाहनों की अधिक संख्या, निर्माण और खनन से उत्पन्न धूल के कारण प्रदूषण की अधिक समस्या है।

शीतकालीन तापमान उत्क्रमण

  • शीतकालीन व्युत्क्रमण एक प्रकार का तापमान व्युत्क्रमण है, जो सर्दियों के महीनों के दौरान होता है, जब ठंडी, सघन वायु सतह के पास स्थित रहती है और गर्म वायु इसके ऊपर रहती है, जो वायुमंडल के ऊर्ध्वाधर मिश्रण को रोकती है।
  • विशेषताएँ
    • अत्यंत स्थिर वायुमंडलीय दशाएँ, ऊर्ध्वाधर वायु संचलन लगभग नगण्य।
    • नीचे स्पष्ट ठंडी परत और ऊपर गर्म परत।
    • रात्रि और सुबह के समय सबसे अधिक तीव्रता होती है तथा प्रायः कई दिनों तक बनी रहती है।

  • प्रभाव
    • वायु प्रदूषण ट्रैपिंग: प्रदूषक (PM2.5, NOx, SO₂, ओजोन) सतह के निकट स्थित होते हैं।
      • सूक्ष्म कण पदार्थ लंबे समय तक निलंबित रहते हैं तथा व्युत्क्रमण के दौरान आसानी से प्रग्रहित हो जाते हैं, जिससे सर्दियों में प्रदूषण और अधिक बढ़ जाता है।
    • धूम्र-कोहरा निर्माण: शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में ‘धूम्र-कोहरा’ लगातार निर्मित होता है।
    • कोहरा एवं दृष्टि-क्षीणता: सघन कोहरा और कम दृश्यता।
    • स्वास्थ्य जोखिम: श्वसन एवं हृदय संबंधी रोगों में वृद्धि।

दक्षिणी और पश्चिमी भारतीय शहर बेहतर स्थिति में क्यों हैं?

  • सागरीय प्रभाव: समुद्री पवनें चेन्नई, मुंबई और विशाखापत्तनम जैसे तटीय शहरों में, प्रदूषण के प्रसार में मदद करती हैं।
  • अधिक पवन गति: तेज पवनों के कारण प्रदूषक स्थिर नहीं रह पाते और वायुमंडलीय स्थिरता कम हो जाती है।
  • कोई पर्वत अवरोध नहीं: इन क्षेत्रों में हिमालय जैसे अवरोध उपलब्ध नहीं हैं, जिससे वायु का प्रवाह अधिक मुक्त रहता है और प्रदूषक बाहर निकल जाते हैं।
  • मानसून प्रभाव: दक्षिण-पश्चिम मानसून की तीव्र पवनें और प्रचुर वर्षा वायुमंडल में उपस्थित प्रदूषकों के पुनर्वितरण के माध्यम से वायु को प्रभावी रूप से स्वच्छ करती हैं।

संदर्भ 

इसरो ने घोषणा की है कि नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार (निसार) उपग्रह आधिकारिक तौर पर अपने अंतिम वैज्ञानिक परिचालन चरण में प्रवेश कर गया है।

उपग्रह मिशन का “विज्ञान चरण” क्या है?

  • किसी उपग्रह के प्रक्षेपित होने और कक्षा में पहुँचने के बाद, वह प्रारंभिक जाँच/कमीशनिंग चरण से गुजरता है।
    • इसमें शामिल हैं: संरचनात्मक भागों (जैसे-बूम या एंटेना) की तैनाती, उपकरणों का अंशांकन, संचार परीक्षण, ऑर्बिट और प्रणालीगत जाँच।
  • जब इन उप-प्रणालियों का सत्यापन हो जाता है और उन्हें उचित रूप से कार्यशील पाया जाता है, तब मिशन ‘विज्ञान चरण’ (या परिचालन चरण) में प्रवेश करता है।

निसार उपग्रह के बारे में

  • नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar -NISAR) विश्व का पहला दोहरी आवृत्ति आधारित SAR मिशन है, जो पृथ्वी की उच्च-रिजॉल्यूशन, मौसम, दिन और रात की इमेजिंग प्रदान करने के लिए एल-बैंड और एस-बैंड दोनों रडार का उपयोग करता है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • दोहरी बैंड रडार क्षमता
    • L-बैंड रडार (1-2 गीगाहर्ट्ज): नासा द्वारा विकसित, सघन वनों और वनस्पतियों में प्रवेश करता है।
    • S-बैंड रडार (2-4 गीगाहर्ट्ज): इसरो द्वारा विकसित, विस्तृत सतही चित्र प्रदान करता है।
  • एंटीना: 30-फुट (9 मीटर) बूम पर संलग्न 12-मीटर स्थिर एंटीना रिफ्लेक्टर से सुसज्जित।
  • प्रौद्योगिकी: यह SweepSAR का उपयोग करता है, जिससे बड़े क्षेत्रों में पृथ्वी की सतह का कुशल और विस्तृत मानचित्रण संभव हो पाता है।
    • यह निसार को पहली बार 242 किलोमीटर के क्षेत्र और उच्च स्थानिक विभेदन के साथ पृथ्वी का अवलोकन करने में सक्षम बनाएगा।

मिशन के चरण

  • चार-चरणीय संरचना: इस मिशन में प्रक्षेपण, तैनाती, कमीशनिंग और विज्ञान संचालन शामिल हैं।
  • विज्ञान चरण: यह चरण कमीशनिंग के बाद शुरू होता है और उपग्रह के पाँच वर्ष की मिशन अवधि तक जारी रहता है।
    • उपग्रह को नियमित संचालन के माध्यम से एक समर्पित वैज्ञानिक कक्षा में बनाए रखा जाएगा।
    • इस चरण में रडार डेटा की सटीकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक अंशांकन और सत्यापन कार्य भी शामिल है।

मिशन के प्रमुख विकास

  • एंटीना रिफ्लेक्टर
    • इसरो के S-बैंड और नासा के L-बैंड SAR पेलोड दोनों के लिए आवश्यक 12-मीटर एंटीना रिफ्लेक्टर को सफलतापूर्वक तैनात किया गया।
    • एंटीना को नासा द्वारा विकसित 9-मीटर लंबे बूम पर एक स्थिर विन्यास में प्रक्षेपित किया गया।
    • बूम की तैनाती 9 अगस्त, 2025 को शुरू हुई और 15 अगस्त तक पूर्ण हो गई।
  • इमेजिंग और अंशांकन गतिविधियाँ
    • 19 अगस्त 2025 से, निसार S-बैंड SAR भारतीय भू-भाग के साथ-साथ कई वैश्विक अंशांकन और सत्यापन स्थलों की इमेजिंग कर रहा है।
    • अंशांकन लक्ष्य: छवि अंशांकन के लिए अहमदाबाद और अन्य स्थानों के आस-पास भू-आधारित कॉर्नर रिफ्लेक्टर लगाए गए थे।
    • वैश्विक अंशांकन: अंतरिक्ष यान की दिशा और SAR इमेजिंग सटीकता को बेहतर बनाने के लिए अमेजन वर्षावनों से प्राप्त डेटा का उपयोग किया गया।

विज्ञान और अनुप्रयोग क्षेत्र

प्रारंभिक विश्लेषण से संकेत मिलता है कि S-बैंड SAR डेटा के अनेक अनुप्रयोगों में महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ हैं, जिनमें शामिल हैं::

  • कृषि: फसल निगरानी, ​​सूखे का आकलन।
  • वानिकी: वन आवरण, जैवभार आकलन।
  • भू-विज्ञान: भूमि विरूपण, विवर्तनिकी, भूकंप।
  • जल विज्ञान: बाढ़ मानचित्रण, जल संसाधन आकलन।
  • क्रायोस्फीयर अध्ययन: हिमालयी हिमनद और हिम निगरानी।
  • सागरीय अध्ययन: तटीय अपरदन, समुद्री सतह, चक्रवात।

एशियाई विकास बैंक (ADB) द्वारा  प्रमुख भारतीय परियोजनाओं का वित्तपोषण 

भारत और एशियाई विकास बैंक (ADB) ने चार राज्यों में प्रमुख विकास पहलों का समर्थन करने हेतु $800 मिलियन से अधिक ऋण और एक तकनीकी सहायता अनुदान पर समझौता किया।

ADB द्वारा वित्तपोषित परियोजनाएँ

  • महाराष्ट्र – विद्युत वितरण संवर्द्धन कार्यक्रम ($500 मिलियन)
    • वर्ष 2028 तक यह कार्यक्रम लगभग 9 लाख किसानों को दिन के समय सौर ऊर्जा उपलब्ध कराएगा। जिसमे सबस्टेशनों का आधुनिकीकरण, वितरण लाइनों का विस्तार, और 500 MWh बैटरी स्टोरेज सिस्टम की स्थापना।
  • मध्य प्रदेश – इंदौर मेट्रो रेल परियोजना ( $190.6 मिलियन)
    • 8.62 किमी लंबा भूमिगत मेट्रो मार्ग सात स्टेशनों के साथ, सघन शहरी क्षेत्रों में गतिशीलता सुधारने हेतु।
    • मल्टीमॉडल एकीकरण को बढ़ावा देना, बाजार और शिक्षा केंद्रों तक पहुँच में सुधार करना। जनवरी 2030 तक परिचालन तत्परता का लक्ष्य।

गुजरात – कौशल विकास कार्यक्रम ($109.97 मिलियन)

  • 11 मेगा ITI का आधुनिकीकरण, उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना। उद्योग और अकादमी के बीच ‘हब-एंड-स्पोक’ मॉडल के माध्यम से साझेदारी का विस्तार।
  • असम – SWIFT परियोजना (तकनीकी सहायता अनुदान: $1 मिलियन)।
  • इसका उद्देश्य जैव विविधता को बढ़ाना, मछुआरों की आजीविका को बढ़ावा देना और SWIFT (सतत् आर्द्रभूमि और एकीकृत मत्स्य क्षेत्र परिवर्तन) परियोजना के लिए संस्थागत ढाँचा तैयार करना है।

एशियाई विकास बैंक (ADB) के बारे में

  • ADB एक क्षेत्रीय बहुपक्षीय विकास बैंक है, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में समावेशी, सतत् और सुदृढ़ विकास को बढ़ावा देता है।
  • स्थापना: 19 दिसंबर, 1966; 
  • मुख्यालय: मेट्रो मनीला, फिलीपींस।
  • सदस्य देश: 69 (जिनमें से 50 एशिया-प्रशांत क्षेत्रसे संबंधित हैं)।
  • मताधिकार: पूँजी योगदान पर आधारित।
  • शेयरधारिता: जापान और अमेरिका (~15.6% प्रत्येक) सबसे बड़े शेयरधारक है इसके बाद चीन (~6.5%), भारत (~6.3%), ऑस्ट्रेलिया (~5.8%)।

भारत और ADB का संबंध

  • भारत ADB का स्थापक सदस्य (वर्ष 1966) और बुनियादी ढाँचा एवं ऊर्जा परियोजनाओं के लिए सबसे बड़े उधारकर्ताओं में से एक है।
  • ADB भारत के नवीकरणीय ऊर्जा, परिवहन आधुनिकीकरण, शहरी विकास, कौशल विकास और जलवायु स्थिरता लक्ष्यों का समर्थन करता है।
  • भारत में ADB द्वारा वित्तपोषित कई प्रमुख मेट्रो (मुंबई मेट्रो और चेन्नई मेट्रो), राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम (NICDP) के अंतर्गत औद्योगिक गलियारे और बिजली क्षेत्र में सुधार कार्य संचालित हो रहे हैं।

श्रॉडिंगर अर्थव्यवस्था

भारत का नवीनतम GDP आँकड़ा एक विरोधाभासी स्थिति प्रस्तुत करता है कि वास्तविक (रियल) GDP तो तेजी से बढ़ रही है, जबकि नॉमिनल GDP में तीव्र गिरावट हुई है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि एक साथ तेजी से बढ़ रही है और कमजोर हो रही है,  इसे “श्रॉडिंगर अर्थव्यवस्था” कहा जा सकता है।

वर्तमान GDP  डेटा

  • उच्च वास्तविक GDP  वृद्धि: पहली तिमाही में 7.8% के बाद वास्तविक GDP  में दूसरी तिमाही में 8.2% की वृद्धि हुई।
  • नॉमिनल GDP  में गिरावट: नॉमिनल GDP  मार्च में 10.7% से जून में 8.8% और सितंबर में 8.7% तक धीमी हुई।

श्रॉडिंगर अर्थव्यवस्था क्या है?

  • परिभाषा: यह क्वांटम भौतिकी में ‘श्रॉडिंगर समीकरण’ के समान ही उस अर्थव्यवस्था को दर्शाता है, जो एक साथ दुर्बल और सशक्त प्रतीत होती है।
  • महत्त्व: यह विरोधाभासी या मिश्रित आर्थिक संकेतों को उजागर करता है, जिससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करना कठिन हो जाता है।
  • शब्द की उत्पत्ति: भौतिक विज्ञानी ‘इरविन श्रॉडिंगर’ के विचार से प्रेरित।

बर्टेले फुट (Burtele Foot)

वैज्ञानिकों ने एथियोपिया से प्राप्त 3.4 मिलियन वर्ष पुराने “बर्टेले फुट” जीवाश्मों की पहचान ऑस्ट्रेलोपिथेकस डेयिरेमेडा के रूप में की है, जिससे प्रारंभिक मानव पूर्वजों के सहअस्तित्व की स्पष्टता हुई है।

“बर्टेले फुट” के बारे में

  • “बर्टेले फुट” का तात्पर्य इथियोपिया के अफार क्षेत्र के बर्टेले में वर्ष 2009 में खोजी गई आठ जीवाश्म पैर की हड्डियों से संबंधित है।
  • इन जीवाश्मों को अब ऑस्ट्रेलोपिथेकस डेयिरेमेडा के साथ जोड़ा गया है, जो एक प्रारंभिक होमिनिन है।
    • होमिनिन चिंपैंजी और आधुनिक मानव के बीच की अंतिम साझा कड़ी है, जो प्रजातियों के एक समूह का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें आधुनिक मानव और उस विभाजन के बाद से हमारे सभी विलुप्त पूर्वज शामिल हैं।
    • इस वंश में होमो, ऑस्ट्रेलोपिथेकस और आर्डिपिथेकस जैसी प्रजातियाँ शामिल हैं।
  • इसकी पहचान उसी प्रजाति के 25 दाँतों और एक बच्चे के जबड़े की हड्डी की खोज के बाद संभव हो पाई।

ऑस्ट्रेलोपिथेकस डेयिरेमेडा की मुख्य विशेषताएँ

  • यह प्रजाति द्विपादीय थी।
  • दाँत के इनेमल के रासायनिक विश्लेषण से पता चलता है कि इसका आहार मुख्यतः पेड़ और झाड़ी आधारित था, जबकिए. अफारेन्सिस’ का आहार अधिक विविध था।
  • जीवाश्म 3.5-3.3 मिलियन वर्ष पूर्व दो निकट संबंधी होमिनिन ए. डेयरेमेडा और ‘ए. अफारेन्सिस’ के सह-अस्तित्व को प्रदर्शित करते हैं।

महत्त्व

  • यह खोज स्पष्ट प्रमाण देती है कि प्रारंभिक मानव विकास रैखिक नहीं था, बल्कि कई होमिनिन प्रजातियाँ एक साथ अस्तित्व में थीं।
  • सह-अस्तित्व अलग पारिस्थितिकी अनुकूलन को दर्शाता है, जिसमें विभिन्न गति शैलियाँ और पौधों पर आधारित आहार शामिल हैं, जिससे प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्द्धा कम हुई
  • जीवाश्म मानव द्विपादीयता में विकासात्मक प्रयोगों की समझ को समृद्ध करते हैं और यह दर्शाते हैं कि पैर, पैर की हड्डियों तथा कूल्हे में विभिन्न अनुकूलन समय के साथ कैसे क्रमिक रूप से विकसित हुए।

मन्नार उरुलि (Mannar Uruli)

प्रधानमंत्री द्वारा मन की बात में मन्नार उरुलि का उल्लेख किए जाने पर केरल के कारीगरों से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली।

मन्नार उरुलि के बारे में

  • मन्नार उरुलि केरल के मन्नार में निर्मित एक पारंपरिक कांस्य निर्मित रसोई बर्तन है, जो इस क्षेत्र की प्राचीन धातु-कारीगरी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।
  • मन्नार में लगभग 200 कुशल कारीगर कार्यरत हैं, जहाँ एक शताब्दी-पुरानी संस्थाएँ उच्च गुणवत्ता वाली धातु ढलाई की परंपरा बनाए रखती हैं।

उरुलि की विशेषताएँ

  • मन्नार उरुलि उच्च-गुणवत्ता वाले कांस्य से निर्मित की जाती है, जो मजबूती, ताप-धारण क्षमता और दैनिक पाक-प्रयोग के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
  • यह बर्तन प्राकृतिक ‘केसरोल’ की तरह कार्य करता है, पकाए गए भोजन की ऊष्मा को कई घंटों तक बनाए रखता है, जिससे यह केरल के घरों में अत्यधिक उपयोगी होता है।

उरुलि के उपयोग

  • कांस्य निर्मित उरुलि का उपयोग मुख्यतः पायसम, पारंपरिक व्यंजनों के धीमी आँच पर पकाने में किया जाता है।
  • इसकी धातु संरचना सुरक्षित मानी जाती है और पारंपरिक कांस्य बर्तनों में पकाने से जुड़े स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है।
  • ये बर्तन 10 इंच से 24 इंच तक के आकारों में उपलब्ध हैं, जो इन्हें घरेलू और औपचारिक खाना पकाने की आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त बनाता है।

संदर्भ 

इंडिया इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (IIGF) 2025 नई दिल्ली में संपन्न हुआ, जहाँ विकसित भारत की दिशा को सुदृढ़ करने हेतु समावेशी डिजिटल वृद्धि, सुदृढ़ डिजिटल अवसंरचना और उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर विशेष बल दिया गया।

इंडिया इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (IIGF), 2025

  • IIGF का पाँचवाँ संस्करण इंडिया हैबिटैट सेंटर और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित हुआ।
  • इसमें मंत्रालयों, वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों, नागरिक समाज समूहों, शिक्षाविदों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भाग लिया।
  • थीम:समावेशी और सतत् विकसित भारत हेतु इंटरनेट गवर्नेंस को उन्नत करना।” (Advancing Internet Governance for an Inclusive and Sustainable Viksit Bharat.”)
  • अन्य थीम 
    • समावेशी डिजिटल भविष्य: ग्रामीण संपर्कता का विस्तार, समान पहुँच और डिजिटल साक्षरता।
    • सुदृढ़ एवं सतत् विकास हेतु डिजिटल अवसंरचना: DPI, DNS सुरक्षा और साइबर सुरक्षा तैयारी को सशक्त करना।
    • मानव, पर्यावरण और विकास के लिए AI: नैतिक AI  उपयोग, सुरक्षित नवाचार और क्षमता वृद्धि।

मुख्य निष्कर्ष

  • भारत की इंटरनेट नीति के आधार के रूप में बहु-हितधारक शासन को सुदृढ़ करना।
  • बुनियादी ढाँचे से लेकर उपयोगकर्ता सुरक्षा तक, सभी स्तरों पर इंटरनेट को सुरक्षित करने की आवश्यकता को मान्यता।
  • सार्वभौमिक, सार्थक पहुँच और अंतिम चरण तक संपर्क सुनिश्चित करने की सतत् प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।

इंडिया इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (IIGF) के बारे में

  • परिचय: IIGF संयुक्त राष्ट्र इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (UN-IGF) का राष्ट्रीय प्रयास है।
  • स्थापना: सरकार, उद्योग, नागरिक समाज, तकनीकी समुदाय और शिक्षा जगत को शामिल करते हुए एक बहु-हितधारक प्रारूप को अपनाते हुए वर्ष 2021 में गठित।
  • संस्थागत संरचना: 14-सदस्यीय बहु-क्षेत्रीय समिति द्वारा संचालित, जो एजेंडा निर्माण और परामर्श की निगरानी करती है।
  • उद्देश्य
    • भारत में मुक्त, विश्वसनीय, समावेशी और सुरक्षित इंटरनेट गवर्नेंस को बढ़ावा देना।
    • उभरते डिजिटल मुद्दों पर घरेलू क्षमता विकसित करना और भारत को वैश्विक डिजिटल मानकों के अनुरूप स्थापित करना।
  • महत्त्व
    • सूचित और सहभागी निर्णय-निर्माण को सुदृढ़ करता है।
    • वैश्विक इंटरनेट गवर्नेंस को आकार देने में भारत की भूमिका बढ़ाता है।
    • नवाचार, युवाओं की भागीदारी और नीति-समन्वय के लिए मंच प्रदान करता है।

संयुक्त राष्ट्र इंटरनेट गवर्नेंस फोरम (IGF)

  • IGF सरकारों, निजी क्षेत्र, नागरिक समाज, तकनीकी समुदाय और अकादमिक जगत को समान स्तर पर साथ लाता है।
  • उत्पत्ति: इसकी आधिकारिक घोषणा संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा जुलाई 2006 में की गई थी और इसकी पहली बैठक अक्टूबर-नवंबर 2006 में हुई थी।
    • यह फोरम वर्ष 2005 के विश्व सूचना समाज शिखर सम्मेलन के ट्यूनिस एजेंडा के अनुरूप स्थापित किया गया।
    • संयुक्त राष्ट्र महासभा के वर्ष 2015 के प्रस्ताव ने इसके जनादेश को 10 अतिरिक्त वर्षों के लिए बढ़ाया।
  • वार्षिक बैठकें हितधारकों को सूचना साझा करने, सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान करने और उभरती डिजिटल चुनौतियों पर सहयोग का अवसर देती हैं।
  • इंटरनेट के अधिकतम लाभ उठाने और संबंधित जोखिमों को कम करने हेतु साझा समझ विकसित करने में सहायक है।
  • IGF परक्राम्य या बाध्यकारी परिणाम उत्पन्न नहीं करता पर इसकी विचार-विमर्श प्रक्रियाएँ सरकारों, उद्योगों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के नीति निर्णयों को प्रभावित करती हैं।
  • यह वैश्विक संवाद और राष्ट्रीय/क्षेत्रीय नीति-निर्माण के बीच सेतु का कार्य करता है।

संदर्भ 

INS तारागिरी, जो प्रोजेक्ट 17A नीलगिरी-श्रेणी  का एक फ्रिगेट है और MDL द्वारा निर्मित है, को 28 नवंबर 2025 को भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया।

INS तारागिरी के बारे में

  • INS तारागिरी नीलगिरी-श्रेणी (प्रोजेक्ट 17A) का चौथा पोत है तथा मझगाँव डॉक शिपबिल्डिंग लिमिटेड (MDL) द्वारा निर्मित तीसरा जहाज है।
  • यह पूर्ववर्ती लिअंडर-श्रेणी  के INS तारागिरी का आधुनिक संस्करण है, जिसने वर्ष 1980 से वर्ष 2013 तक सेवा दी।
  • इस पोत को वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो (WDB) ने अभिकल्पित किया है और यह उन्नत स्वदेशी नौसैनिक अभियांत्रिकी का प्रतीक है।

मुख्य विशेषताएँ

  • CODOG (संयुक्त डीजल या गैस) प्रणोदन प्रणाली से सुसज्जित, जो कंट्रोलेबल पिच प्रोपेलरों (CPP) को संचालित करती है।
  • अत्याधुनिक एकीकृत प्लेटफॉर्म प्रबंधन प्रणाली (IPMS) के साथ पूर्णत: एकीकृत, जो प्लेटफॉर्म स्वचालन सुनिश्चित करती है।
  • उन्नत हथियार-सेंसर प्रणाली से युक्त, जिसमें ब्रह्मोस अत्‍याधुनिक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, MF-स्टार (मल्टी-फंक्शन सर्विलांस, ट्रैक एंड गाइडेंस रडार), MRSAM (मध्यम दूरी की सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल)  कॉम्प्लेक्स, 76 मिमी. सुपर रैपिड गन माउंट,  क्लोज-इन वेपन सिस्टम  (CIWS), तथा पनडुब्बी-रोधी रॉकेट और टॉरपीडो शामिल हैं।
  • स्टील्थ विशेषताओं, उन्नत जीवंतता तथा मॉड्यूलर निर्माण तकनीकों का समावेश।

महत्त्व

  • जटिल युद्धपोत के डिजाइनिंग और निर्माण क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता को दर्शाता है, जिसमें लगभग 75% स्वदेशी सामग्री का उपयोग होता है।
  • 200 से अधिक MSME और हजारों श्रमिकों की भागीदारी से व्यापक रोजगार सृजन।
  • उभरती समुद्री चुनौतियों के लिए नौसेना की बहु-मिशन क्षमता को सुदृढ़ करता है।

प्रोजेक्ट 17A के बारे में

  • प्रोजेक्ट 17A भारतीय नौसेना का स्टील्थ गाइडेड-मिसाइल फ्रिगेट निर्माण कार्यक्रम है, जो शिवालिक-श्रेणी  (प्रोजेक्ट 17) का उत्तरवर्ती है।
  • इसका उद्देश्य अग्रिम पंक्ति के युद्धपोतों में स्टील्थ क्षमता, स्वचालन को बढ़ाना है।
  • प्रोजेक्ट 17A के पहले पोत नीलगिरि’ का 28 सितंबर 2019 को जलावतरण किया गया और वर्ष 2024 में समुद्री अभियानों में शामिल किया गया।
  • लक्ष्य: इस परियोजना के अंतर्गत कुल 7 फ्रिगेटों का निर्माण हुआ, जिसमे 4 MDL में और 3 गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) में होंगे।

प्रमुख  उपलब्धियाँ

पोत का नाम निर्माता स्थिति (नवंबर 2025 तक) विशिष्ट विशेषता
INS नीलगिरी MDL कमीशन किया गया प्रोजेक्ट 17A का प्रथम पोत; पूर्णतः मिश्रित सुपरस्ट्रक्चर से उन्नत स्टील्थ।
INS हिमगिरी GRSE कमीशन किया गया GRSE द्वारा निर्मित प्रथम P-17A पोत, उन्नत मॉड्यूलर निर्माण तकनीक।
INS उदयगिरी MDL कमीशन किया गया एकीकृत निर्माण पद्धति से MDL पोतों में सबसे तीव्र एकीकरण चक्र।
INS तारागिरी MDL नौसेना को सौंपा गया (नवंबर 2025) नेक्स्ट-जेन CODOG प्रणोदन (डीज़ल + गैस टरबाइन) से उच्च गतिशीलता।
INS विंध्यगिरी GRSE जलावतरण; परीक्षण जारी है उन्नत शोर-नियंत्रण क्षमता; श्रेष्ठ पनडुब्बी-रोधी स्टील्थ
INS दूनागिरी GRSE जलावतरण; निर्माणाधीन उच्च-स्तरीय स्वचालन प्रणाली; चालक दल का कार्यभार उल्लेखनीय रूप से कम।
INS महेंद्रगिरी MDL जलावतरण; अपेक्षित डिलीवरी वर्ष  2026 तक परियोजना का अंतिम पोत; लगभग 75% सर्वोच्च स्वदेशी सामग्री।

 

संदर्भ

विश्व एड्स दिवस प्रत्येक वर्ष 1 दिसंबर को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य HIV/एड्स के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना तथा HIV के साथ जीवनयापन करने वाले व्यक्तियों (PLHIV) के प्रति समर्थन और सहानुभूति की पुष्टि करना है।

विश्व एड्स दिवस के बारे में

  • उत्पत्ति: यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 1988 में स्थापित पहला वैश्विक स्वास्थ्य दिवस था।
  • तिथि: 1 दिसंबर को प्रतिवर्ष मनाया जाता है।
  • उद्देश्य: HIV की रोकथाम, उपचार तथा उपेक्षा-निवारण के संबंध में जन-जागरूकता बढ़ाना।
  • प्रतीक: लाल रिबन HIV/एड्स के प्रति जागरूकता और समर्थन का सार्वभौमिक प्रतीक है।
  • वर्ष 2025 की थीम: अधिकारों का मार्ग: मेरा स्वास्थ्य, मेरा अधिकार!” (Take the Rights Path: My Health, My Right!)
    • थीम का उद्देश्य: यह थीम महामारी, संघर्ष तथा असमानताओं जैसी बाधाओं के बीच HIV सेवाओं को अधिक अनुकूलित, न्यायसंगत और समुदाय-आधारित बनाने की आवश्यकता पर बल देती है, ताकि सभी को उपचार और देखभाल तक समान अधिकार प्राप्त हो।
    • नोडल मंत्रालय: केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) द्वारा नेतृत्व।

HIV/एड्स क्या है?

  • परिभाषा: HIV (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस) एक वायरस है, जो CD4 कोशिकाओं पर हमला करके प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है, जो संक्रमणों के खिलाफ शरीर की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।
    • समय के साथ, HIV शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर कर देता है, जिससे व्यक्ति अवसरवादी संक्रमणों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है।
  • एड्स की रोकथाम के संबंध में प्रगति
    • एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम) HIV संक्रमण का सबसे उन्नत चरण है।
    • यह तब होता है, जब प्रतिरक्षा तंत्र अत्यधिक क्षतिग्रस्त हो जाए तथा CD4 गणना 200 कोशिका/मिमी³. से कम हो जाए, या गंभीर अवसरवादी रोग विकसित हो जाएँ (जैसे तपेदिक, कैंसर आदि)।
  • HIV का संचरण
    • यौन संचरण: संक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन संबंध से HIV प्रसारित होता है।
    • सुई/सीरिंज के उपयोग से संचरण: संक्रमणयुक्त सुई या सीरिंज का उपयोग करने से HIV का प्रसार होता है।
    • माता से शिशु को संक्रमण: गर्भावस्था, प्रसव अथवा स्तनपान के दौरान संक्रमण हो सकता है।
    • रक्ताधान द्वारा जोखिम: संक्रमित रक्त के आधान से HIV प्रसारित हो सकता है, यद्यपि कठोर जाँच प्रणालियों के कारण यह अत्यंत दुर्लभ हो चुका है।
    • सामान्य संपर्क जैसे छूने, गले लगाने, भोजन साझा करने, मच्छर काटने या वायु संपर्क से HIV नहीं फैलता है।
  • उपचार
    • यद्यपि HIV का पूर्ण उपचार उपलब्ध नहीं है, परंतु प्रतिरोधरोगी उपचार (ART) वायरस को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करता है।
    • ART प्रतिदिन और आजीवन लेना आवश्यक है, जिससे प्रतिरक्षा तंत्र सुरक्षित रहता है।

भारत की HIV/एड्स रोधी प्रतिक्रिया 

  • प्रारम्भिक राष्ट्रीय प्रयास (वर्ष 1985–1991): भारत का प्रारंभिक चरण HIV मामलों की पहचान करने, सुरक्षित रक्त आधान सुनिश्चित करने और लक्षित जन जागरूकता पहल शुरू करने पर केंद्रित था।
  • संस्थागत ढाँचा: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत वर्ष 1992 में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) तथा राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (NACP) की स्थापना ने एक समन्वित बहु-क्षेत्रीय राष्ट्रीय प्रतिक्रिया सुनिश्चित की।
    • समय के साथ केंद्र-आधारित नियंत्रण से जिला स्तरीय सहभागिता, गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग तथा PLHIV नेटवर्क की सशक्त भागीदारी की ओर परिवर्तन हुआ।

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (NACP)

NACP पाँच चरणों से होकर विकसित हुआ है, जहाँ इसका स्वरूप मूल जागरूकता-आधारित मॉडल से व्यापक रोकथाम–जाँच–उपचार मॉडल में परिवर्तित हुआ।

NACP–I (वर्ष 1992–1999)

  • यह चरण भारत की पहली राष्ट्रीय HIV/एड्स रोकथाम रणनीति का प्रतीक था।
  • इसका मुख्य उद्देश्य HIV संचरण को धीमा करना तथा इसके परिणामस्वरूप होने वाली रुग्णता, मृत्यु दर और सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को कम करना था।

NACP–II (वर्ष 1999–2006)

  • कार्यक्रम ने हस्तक्षेपों का विस्तार किया तथा पूर्व प्रयासों को सुदृढ़ किया।
  • दो प्रमुख उद्देश्यों पर केंद्रित
    • भारत में HIV प्रसार को कम करना।
    • HIV/एड्स से निपटने हेतु दीर्घकालीन राष्ट्रीय क्षमता को सुदृढ़ करना।

NACP–III (वर्ष 2007–2012)

  • लक्ष्य: विस्तारित रोकथाम, देखभाल और उपचार रणनीतियों के माध्यम से पाँच वर्ष की अवधि में HIV महामारी को रोकना।
  • महत्त्वपूर्ण पहल: जिला एड्स रोकथाम एवं नियंत्रण इकाइयों (DAPCU) की स्थापना करना, जिससे जिला-स्तरीय निगरानी में वृद्धि हुई।

NACP–IV (वर्ष 2012–2017)

  • लक्ष्य: महामारी को रोकने में तेजी लाना तथा एकीकृत HIV प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना।
  • मुख्य उद्देश्य
    • वर्ष 2007 की तुलना में नए संक्रमणों में 50% की कमी लाना।
    • सभी  PLHIV के लिए देखभाल, सहायता और उपचार की सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करना।

विस्तार (वर्ष 2017–2021): वर्ष 2030 तक एड्स को समाप्त करने के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए विस्तारित।

विस्तार के दौरान प्रमुख पहलें

  • HIV/एड्स अधिनियम 2017: इस अधिनियम ने भेदभाव-निषेध, गोपनीयता सुरक्षा तथा परीक्षण–उपचार हेतु सूचित सहमति को अनिवार्य किया।
  • मिशन ‘संपर्क’: उपचार छोड़ चुके PLHIV को पुनः खोज कर ART से जोड़ने का प्रयास।
  • जाँच और उपचार नीति: सभी निदान प्राप्त व्यक्तियों के लिए CD4 गणना की परवाह किए बिना ART आरंभ।
  • वायरल लोड निगरानी: उपचार पालन और परिणाम सुधार हेतु नियमित सार्वभौमिक वायरल लोड परीक्षण।

NACP–V (2021–2026)

  • प्रकार: एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना के रूप में लागू, कुल वित्तीय प्रावधान ₹15471.94 करोड़।
  • मुख्य फोकस: पूर्व उपलब्धियों को सुदृढ़ करते हुए रोकथाम, जाँच और उपचार से संबंधित उभरते चुनौतियों का समाधान।
  • SDG के साथ सामंजस्य: यह चरण सतत् विकास लक्ष्य 3.3 का समर्थन करता है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक HIV/एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे के रूप में समाप्त करना है तथा समुदाय-नेतृत्व वाले हस्तक्षेपों पर बल देता है।

HIV/एड्स जागरूकता के लिए सरकारी कदम

  • जनसंचार अभियान: NACO व्यापक और युवा आबादी तक पहुँचने के लिए व्यापक मल्टीमीडिया और डिजिटल अभियान संचालित करता है।
  • जागरूकता पहल: होर्डिंग्स, बस पैनल, IEC वैन, कियोस्क और लोक प्रदर्शनों के माध्यम से पहुँच का विस्तार किया जाता है।
  • सामुदायिक लामबंदी: स्वयं सहायता समूहों, आँगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा कार्यकर्ताओं और पंचायती राज प्रतिनिधियों का प्रशिक्षण जमीनी स्तर पर जागरूकता को मजबूत करने में मदद करता है।
  • लक्षित हस्तक्षेप परियोजनाएँ: अक्टूबर 2025 तक, 1,587 लक्षित हस्तक्षेप (TI) परियोजनाएँ हैं, जो मानव संसाधन समूहों के लिए रोकथाम, परीक्षण और उपचार सेवाएँ सुनिश्चित करती हैं।
  • अन्य अभियान: राष्ट्रव्यापी थीमैटिक अभियान उपेक्षा को कम करने और कार्यस्थलों तथा संस्थानों में PLHIV के समावेश को बढ़ावा देने के लिए संचालित किए जाते हैं।
  • कानूनी सुरक्षा तंत्र: भेदभाव की शिकायतों का समाधान करने और PLHIV अधिकारों की रक्षा के लिए HIV और एड्स अधिनियम, 2017 के तहत 34 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में अधिकारी नियुक्त किए गए हैं।

भारत में HIV/एड्स के मामले

  • HIV प्रसार में कमी
    • भारत में HIV का प्रसार वर्ष 2010 के 0.33% से घटकर वर्ष 2024 में 0.20% हो गया है।
    • 0.20% पर, भारत का प्रसार वैश्विक औसत 0.7% से काफी नीचे बना हुआ है, जो दर्शाता है कि देश महामारी को कम स्तर पर बनाए रखने और वैश्विक रुझानों से बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रहा है।
  • नए HIV संक्रमण: नए HIV संक्रमण वर्ष 2010 के 1.25 लाख मामलों से घटकर वर्ष 2024 में 64,500 मामले रह गए हैं, जो NACP के तहत प्रयोग की गई वर्ष 2010 की आधार रेखा की तुलना में 49% की कमी दर्शाता है।
    • यह गिरावट इसी अवधि के दौरान वैश्विक कमी दर 40% से अधिक है।
  • एड्स से संबंधित मौतों में कमी: इसमें 81.40% की गिरावट आई है, जो वर्ष 2010 में 1.73 लाख मौतों से घटकर वर्ष 2024 में 32,200 हो गई है।

संदर्भ 

भारत ने भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने संशोधित भूकंप डिजाइन संहिता, 2025 के तहत अद्यतन भूकंपीय जोन आधारित मानचित्र जारी किया है।

भूकंपीय जोन आधारित मानचित्र क्या है?

  • भूकंपीय जोन आधारित मानचित्र वह वैज्ञानिक मानचित्र है, जो किसी देश या क्षेत्र को भूकंप की संभाव्यता और तीव्रता के आधार पर भिन्न भूकंपीय जोखिम क्षेत्रों में विभाजित करता है।
  • यह भूकंप जोखिम आकलन, भवन-निर्माण मानकों के निर्धारण तथा आपदा तैयारी में सहायक होता है।
  • इसका प्रकाशन भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा किया जाता है।

संशोधित क्षेत्रीकरण मानचित्र की प्रमुख विशेषताएँ

  • जोन 6 का परिचय: नए भूकंपीय मानचित्र में जोन 6 जोड़ा गया है, जो सर्वाधिक जोखिम वाले क्षेत्र का वर्गीकरण है। इसके अंतर्गत पूरा हिमालयी क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक शामिल किया गया है।

  • भौगोलिक कवरेज में वृद्धि: संशोधित मानचित्र अब भारत के 61% भू-भाग को मध्यम से उच्च जोखिम क्षेत्रों में वर्गीकृत करता है, जो पूर्व संस्करणों के 59% से अधिक है।
    • भारत की 75% जनसंख्या अब भूकंप-सक्रिय क्षेत्रों में अवस्थित है।
  • दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्र में केवल अल्प संशोधन किए गए हैं, क्योंकि स्थिर भौगोलिक संरचना वहाँ की जोखिम स्थिति को लगभग अपरिवर्तित रखती है।
  • सीमा संबंधी नियम में संशोधन
    • अद्यतन नियमों के अनुसार, दो भूकंपीय क्षेत्रों की सीमा पर स्थित कोई भी नगर या बस्ती स्वतः उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में वर्गीकृत की जाएगी।
    • यह परिवर्तन प्रशासनिक सीमाओं के स्थान पर वास्तविक भू-गर्भीय जोखिम को प्रतिबिंबित करता है।

  • वैज्ञानिक पद्धति
    • अद्यतन भूकंपीय जोखिम मानचित्र संभाव्य भूकंपीय जोखिम आकलन (PSHA) पर आधारित है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य पद्धति है।
    • इसमें दूरी के साथ भूकंपीय कंपन का क्षीणन, क्षेत्रीय भौगोलिकप्रणाली तथा शैलों की वैज्ञानिक संरचना जैसे घटक सम्मिलित हैं।
  • अनिवार्य सुरक्षा उपाय
    • नई संहिता में छतों, ऊपरी जलाशयों, भवन-संबंधी संरचनाओं, वायु-नियंत्रण प्रणालियों तथा ऐसे अन्य अवयवों के लिए सुरक्षा मानक अनिवार्य किए गए हैं, विशेष रूप से तब, जब उनका उत्पन्न भार भवन के कुल भार के 1% से अधिक हो।
    • सक्रिय भ्रंश-रेखाओं के निकट स्थित भवनों को कंपनों का सामना करने योग्य बनाना आवश्यक है, जो ‘निकट-भ्रंश’ भूकंपों की विशेषता है।
  • दक्षिणमुखी विवर्तन (Rupture) का मॉडलन
    • संशोधित मानचित्र स्वीकार करता है कि हिमालयी अग्र-भ्रंश (Himalayan Frontal Thrust) के साथ होने वाले विवर्तन दक्षिण की ओर विस्तृत हो सकते हैं, जिससे मोहंड के निकट देहरादून जैसी सघन आबादी वाले तराई-क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।
    • यह समावेशन पारंपरिक भ्रंश-रेखा मानचित्रण से आगे की विवर्तन-गतिशीलता की समझ को दर्शाता है।
  • मानचित्रण 
    • यह मानचित्र अब PEMA (जनसंख्या जोखिम मानचित्रण और विश्लेषण) पद्धति के माध्यम से जनसंख्या घनत्व, बुनियादी ढाँचे की सघनता और सामाजिक-आर्थिक सुभेद्यता को एकीकृत करता है।
    • इससे यह सुनिश्चित होता है कि भूकंपीय क्षेत्रीकरण में खतरे और मानवीय जोखिम को ध्यान में रखा जाए, जो तेजी से शहरीकृत हो रहे क्षेत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

हिमालय सर्वाधिक खतरे वाले जोन में क्यों है?

  • सक्रिय प्लेट टकराव: हिमालय विश्व के सबसे सक्रिय टेक्टॉनिक टकराव क्षेत्रों में से एक पर स्थित है, जहाँ भारतीय प्लेट प्रति वर्ष 5 सेमी. की दर से यूरेशियन प्लेट से टकराती है, जिससे लगातार भारी तनाव उत्पन्न होता है।
  • भू-वैज्ञानिक रूप से नवीन और अस्थिर भू-भाग: भू-वैज्ञानिक दृष्टि से नवीन होने के कारण यहाँ सक्रिय मोड़, भ्रंश तथा उत्थान निरंतर उपस्थित है, जिससे यह क्षेत्र स्वभावतः अस्थिर रहता है।
  • अनेक प्रमुख भ्रंश-तंत्र: मुख्य अग्र-भ्रंश, मुख्य सीमा-भ्रंश तथा मुख्य केंद्रीय भ्रंश जैसे संरचनात्मक तंत्र बड़े एवं विनाशकारी भूकंप उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं।
  • भूकंपीय अंतराल और संचित ऊर्जा: दीर्घकालिक भूकंपीय अंतराल, जिनमें शताब्दियों तक बड़े भूकंप नहीं आते, अत्यधिक संचित तनाव का संकेत देते हैं, जिससे भूकंप संभाव्यता बढ़ जाती है।

अवसंरचना और नियोजन पर प्रभाव

  • कठोर भवन मानक: संवेदनशील क्षेत्रों में भवनों, पुलों तथा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना के लिए अधिक कठोर डिजाइन संहिता अपनानी होगी।
  • संरचना-सुदृढ़ीकरण की तात्कालिकता: उच्च जोखिम क्षेत्रों में पुरानी संरचनाओं का सुदृढ़ीकरण आवश्यक है, ताकि वे उच्च तीव्रता के भूकंपों का सामना कर सकें।
  • संवेदनशील क्षेत्रों में प्रतिबंध: दिशा-निर्देश अवसाद, सक्रिय भ्रंश तथा तरलीकरण-प्रवण क्षेत्रों में अवसंरचना विस्तार रोकने की अनुशंसा करते हैं।

BIS भूकंप-डिजाइन संहिताके बारे में

  • भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) भवनों एवं संरचनाओं के भूकंप-रोधी डिजाइन के लिए IS 1893 श्रृंखला के अंतर्गत राष्ट्रीय मानक जारी करता है।
  • यह श्रृंखला वैज्ञानिक दिशा-निर्देश प्रदान करती है, जिससे भवन भूकंपीय बलों का सामना कर सकें तथा भूकंप के दौरान हानि के जोखिम को न्यूनतम किया जा सके।

संदर्भ

हाल ही में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने उपयोगकर्ता द्वारा निर्मित अवांछित डिजिटल ‘कंटेंट’ के लिए एक मजबूत नियामक ढाँचे की माँग की, और कहा कि इसका स्व-नियमन विफल हो गया है। इसने तेजी से प्रसारित हो रहे, अपरिवर्तनीय ऑनलाइन नुकसान को रोकने के लिए एक स्वतंत्र निगरानी निकाय और एन्क्रिप्टेड आधार/स्थायी खाता संख्या (PAN) आधारित आयु सत्यापन की सिफारिश की।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उठाई गई चिंताएँ

  • अवांछित ‘कंटेंट’ का तीव्र प्रसार: अवांछित डिजिटल कंटेंट’ इतनी तीव्रता से प्रसारित होता है कि उसे हटाने की प्रक्रिया से भी तीव्र गति से प्रसारित किया जा सकता है, जिससे मनोवैज्ञानिक क्षति होती है जिसे प्रतिक्रियाशील प्रणालियाँ प्रभावी रूप से ठीक नहीं कर सकतीं।

  • अनियमित ‘कंटेंट’ निर्माताओं का उदय: बड़े ऑनलाइन प्रभावशाली व्यक्तित्व भी प्रायः किसी सार्थक जवाबदेही तंत्र के अभाव में कार्य करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्लेटफॉर्म पर भ्रामक, अपमानजनक अथवा सामाजिक रूप से विघटनकारी सामग्री का व्यापक प्रसार होता है।
  • नाबालिगों के लिए कमजोर सुरक्षा: आवश्यक ‘18+ अस्वीकरण’ बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहते हैं, जिससे नाबालिगों को खराब सत्यापन तंत्र के कारण स्पष्ट, हिंसक या मनोवैज्ञानिक रूप से अवांछित ‘कंटेंट’ तक आसानी से पहुँच प्राप्त हो जाती है।
  • स्व-नियमन की अप्रभावीता: वर्तमान प्लेटफॉर्म-संचालित स्व-नियामक प्रणालियाँ असंगत बनी हुई हैं, उनमें प्रवर्तन शक्ति का अभाव है और वे समय पर अवांछित ‘कंटेंट’ पर अंकुश लगाने में विफल हैं।
  • डीपफेक और AI-चालित दुरुपयोग: AI-जनित डीपफेक और हस्तक्षेप ‘कंटेंट’ का विकास, सत्य और भ्रामक बातों में अंतर न कर पाने के कारण व्यक्तिगत गरिमा, लोकतांत्रिक संवाद और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करता है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी प्रमुख निर्देश

  • स्वायत्त डिजिटल नियामक: डिजिटल कंटेंट की निगरानी और राजनीतिक या व्यावसायिक दबाव के अलावा निष्पक्ष विनियमन सुनिश्चित करने के लिए एक वैधानिक, स्वतंत्र और प्रभाव-मुक्त प्राधिकरण की स्थापना करना।

  • मजबूत आयु-सत्यापन प्रणालियाँ: नाबालिगों की संवेदनशील सामग्री तक पहुँच रोकने के लिए गोपनीयता-संरक्षण आधारित आयु-सत्यापन तंत्र लागू किया जाए, जिसकी व्यवस्था एन्क्रिप्टेड आधार/PAN के उपयोग से की जा सकती है।
  • सक्रिय शमन की ओर परिवर्तन: प्लेटफॉर्म को प्रतिक्रियात्मक शिकायत-निवारण के स्थान पर पूर्व-निर्धारित पहचान प्रणालियाँ अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, विशेषकर उस सामग्री के संदर्भ में जो गंभीर, अपरिवर्तनीय या सम्मान-संबंधी हानि उत्पन्न कर सकती है।
  • गरिमा का संरक्षण: ऑनलाइन दुर्व्यवहार, अपमान और डीपफेक हमलों का समयबद्ध एवं प्रभावी राज्य-समर्थित सुरक्षा उपायों के माध्यम से समाधान सुनिश्चित करके अनुच्छेद-21 के संरक्षण को सुदृढ़ किया जाए।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलित प्रवर्तन: ऐसे नियामक मानक तैयार करना, जो अनुच्छेद-19(1)(a) की स्वतंत्रताओं को संरक्षित रखना और साथ ही नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और मानहानि से संबंधित अनुच्छेद-19(2) के सुरक्षा उपायों को भी कायम रखना।

भारत के ऑनलाइन विनियमन का विकास

  • IT अधिनियम 2000, पहला डिजिटल ढाँचा: IT अधिनियम ने भारत में मध्यस्थ दायित्व के लिए प्रारंभिक मानक स्थापित किए, हालाँकि अब यह डीपफेक और AI हस्तक्षेप जैसी आधुनिक चुनौतियों का समाधान करने में संघर्ष कर रहा है।
  • श्रेया सिंघल (2015) और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का संरक्षण: इस निर्णय ने धारा 66A को निरस्त कर दिया, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा हुई, लेकिन ऑनलाइन दुरुपयोग से निपटने के लिए एक नियामक शून्यता बनी रही।
  • IT नियम 2021 और प्लेटफॉर्म जवाबदेही: नियमों में उचित परिश्रम, पता लगाने की क्षमता और शिकायत निवारण अनिवार्य था, हालाँकि मुकदमेबाजी ने एकसमान कार्यान्वयन को धीमा कर दिया है।
  • 2020 के दशक के डिजिटल बदलाव: सोशल मीडिया, फेक न्यूज, साइबर धमकी और डीपफेक तकनीक के तेजी से विकास ने मौजूदा कानूनी सुरक्षा उपायों में बड़ी खामियों को उजागर किया है।
  • आधुनिक विनियमन के लिए न्यायिक प्रयास: न्यायालय का हस्तक्षेप संरचित, निवारक और आनुपातिक डिजिटल शासन की ओर बदलाव को दर्शाता है।
  • कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) निर्णय: पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि अनुच्छेद-21 में गैर-राज्यीय तत्वों द्वारा ऑनलाइन दुरुपयोग से सुरक्षा शामिल है और कहा कि “किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे को अपमानित करने की स्वतंत्रता नहीं बन सकती।”
  • दूरसंचार अधिनियम, 2023 (धारा 20): यह केंद्र को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए OTT और इंटरनेट सेवाओं को विनियमित/अधिग्रहण करने का अधिकार देता है, लेकिन IT अधिनियम के साथ इसके अतिव्यापन का जोखिम बना रहता है।

संवैधानिक संदर्भ

  • अनुच्छेद-19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: नियमन से नागरिकों, पत्रकारों या कलाकारों को वैध राय व्यक्त करने से हतोत्साहित करने वाला कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
  • अनुच्छेद-19(2) के तहत उचित सीमाएँ: प्रतिबंधों को संकीर्ण तथा सटीक रूप से तैयार किया जाना चाहिए और उन्हें शालीनता, नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था तथा राज्य की सुरक्षा जैसे संवैधानिक आधारों से स्पष्ट रूप से संबद्ध होना चाहिए।
  • अनुच्छेद-21 के तहत गरिमा का अधिकार: ऑनलाइन उत्पीड़न, डीपफेक और साइबरबुलिंग, सम्मानजनक जीवन की संवैधानिक गारंटी को कमजोर करते हैं, जिसके लिए राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
  • नियामक मानक के रूप में आनुपातिकता: किसी भी ढाँचे को उपयुक्तता, आवश्यकता और न्यूनतम प्रतिबंधात्मकता के संवैधानिक मानकों पर खरा उतरना चाहिए।

भारत के डिजिटल शासन को मजबूत करने का महत्त्व

  • बेहतर नागरिक सुरक्षा: कठोर नियमन साइबरबुलिंग, डॉक्सिंग, डीपफेक हमलों और घृणा अभियानों, विशेषतः संवेदनशील समूहों के विरुद्ध, को रोकने में मदद करता है।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाना: गलत सूचना और ऑनलाइन धमकी से निपटना स्वस्थ सार्वजनिक संवाद को बढ़ावा देता है और लोकतांत्रिक विश्वास को मजबूत करता है।
  • डिजिटल कानून के शासन का विस्तार: एक संरचित ढाँचा संवैधानिक मूल्यों (गरिमा, समानता, जवाबदेही) को डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में समाहित करने में मदद करता है।
  • भारत को एक डिजिटल नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करना: अधिकार-आधारित नियमन भारत को लोकतांत्रिक डिजिटल शासन के लिए एक विश्व स्तर पर विश्वसनीय मॉडल प्रस्तुत करने में सक्षम बनाता है।
  • बेहतर बाल सुरक्षा मानक: सशक्त आयु नियंत्रण, कंटेंट विनियमन  और सत्यापन प्रणालियाँ नाबालिगों की सुरक्षा में सुधार करती हैं।

भारत में ऑनलाइन ‘कंटेंट’ को विनियमित करने में प्रमुख चुनौतियाँ

  • अति-विनियमन जोखिम और संवैधानिक चिंताएँ
    • अत्यधिक सेंसरशिप: अस्पष्ट या अतिव्यापक नियम असहमति, व्यंग्य और राजनीतिक आलोचना को दबा सकते हैं, जिससे वैध अभिव्यक्ति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
    • आनुपातिकता उल्लंघन: जो प्रतिबंध उपयुक्तता, आवश्यकता और न्यूनतम प्रतिबंधात्मकता के संवैधानिक परीक्षणों पर खरे नहीं उतरते, वे श्रेया सिंघल मामले में तय मानकों का उल्लंघन करते हैं।
    • लोकतांत्रिक बहस के लिए खतरा: ‘आपत्तिजनक’ सामग्री की अस्पष्ट परिभाषा पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और छात्रों के विरुद्ध विनियमन को दुरुपयोग योग्य बनाकर इसे एक दमनकारी उपकरण में परिवर्तित कर सकती है।
    • BNS 2023: भारतीय न्याय संहिता 2023 ऑनलाइन मानहानि और उत्पीड़न को शामिल करती है, लेकिन डीपफेक पोर्नोग्राफी, ऑनलाइन स्टॉकिंग, डॉक्सिंग और ब्रिगेडिंग के लिए विशिष्ट प्रावधानों का अभाव है; इसमें प्रौद्योगिकी-सुगम दुर्व्यवहार पर एक समर्पित अध्याय की आवश्यकता है।
  • तकनीकी सीमाएँ
    • AI का अनुचित वर्गीकरण: स्वचालित उपकरण प्रायः वैध अभिव्यक्ति को गलत तरीके से चिह्नित कर देते हैं, क्षेत्रीय संदर्भों को समझने में विफल रहते हैं तथा भारत की व्यापक भाषायी विविधता के साथ प्रभावी रूप से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते हैं।
    • एल्गोरिदमिक’ पूर्वाग्रह: कंटेंट मॉडरेशन प्रणालियाँ लैंगिक, जातिगत या धार्मिक पूर्वाग्रहों को उत्पन्न कर सकती हैं और हाशिए पर स्थित समुदायों को अनुचित रूप से लक्षित कर सकती हैं।
    • डीपफेक संबंधी जटिलता: AI द्वारा उत्पन्न डीपफेक की बढ़ती संख्या पहचान संबंधी जटिलता स्थापित करती है, जिससे सम्मान, विश्वास और सार्वजनिक संवाद के लिए जोखिम बढ़ जाता है।
  • संस्थागत, न्यायिक और प्रवर्तन अंतराल
    • राज्य क्षमता की बाधाएँ: साइबर-फोरेंसिक विशेषज्ञों, विशिष्ट नियामकों और उन्नत तकनीकी अवसंरचना की कमी प्रभावी निगरानी में बाधा डालती है।
    • न्यायिक विलंब: विशिष्ट तंत्रों के अभाव के कारण साइबर अपराधों का निर्णय धीमा होता है, जिससे हानि और बढ़ जाती है।
    • विखंडित विनियमन: कई एजेंसियों के बीच अधिकार क्षेत्र के अतिव्यापी होने से असंगत प्रवर्तन और नियामक भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।
  • केंद्र-राज्य संघर्ष और संघीय शासन संबंधी मुद्दे
    • समवर्ती सूची तनाव: ऑनलाइन कंटेंट प्रविष्टि 31 (डाक और तार) के अंतर्गत आती है, फिर भी तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों का तर्क है कि IT नियम 2021 केंद्र सरकार के अतिक्रमण को दर्शाते हैं।
    • असमान राज्य प्रवर्तन: राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएँ और क्षमताएँ नियामक असंगति उत्पन्न करती हैं।
    • कमजोर स्थानीय प्रतिक्रिया प्रणालियाँ: राज्य-स्तरीय डिजिटल सुरक्षा तंत्रों का अभाव क्षेत्र-विशिष्ट नुकसानों के प्रति आधारभूत स्तर पर प्रतिक्रिया को सीमित करता है।
  • पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही संबंधी चिंताएँ
    • अस्पष्ट अवरोधन आदेश: MeitY और CERT-In द्वारा धारा 69A और धारा 70B के तहत जारी किए गए निष्कासन आदेश प्रायः सार्वजनिक प्रकटीकरण से रहित होते हैं, जिससे लोकतांत्रिक निगरानी कम हो जाती है।
    • सार्वजनिक विश्वास में कमी: सामग्री हटाए जाने के कारणों में पारदर्शिता का अभाव गोपनीयता बढ़ाता है और राजनीतिक पूर्वाग्रह की धारणाओं को प्रबल करता है।
    • अपर्याप्त प्लेटफॉर्म प्रकटीकरण: प्लेटफॉर्म’ प्रायः मॉडरेशन कार्रवाइयों पर न्यूनतम या अत्यंत सामान्यीकृत डेटा ही प्रदान करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रणालीगत विफलताएँ छिपी रह जाती हैं।
  • आर्थिक और नवाचार दुविधा
    • स्टार्ट-अप्स पर अनुपालन का बोझ: अति-विनियमन छोटी कंपनियों की लागत बढ़ा सकता है, जिससे क्रिएटर इकोनॉमी और डिजिटल उद्यमिता को नुकसान पहुँच सकता है।
    • पूँजी पलायन के जोखिम: कठोर विनियामक अपेक्षाएँ वैश्विक प्लेटफॉर्म को अपने परिचालन को कम करने पर विचार करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं, जैसा कि ट्विटर के वर्ष 2021 से संबंधित विनियमों में देखा जा सकता है।
    • अनियमित विनियमन विश्वास को नुकसान पहुँचाता है: कमजोर सुरक्षा उपाय उपयोगकर्ताओं और विज्ञापनदाताओं के विश्वास को कम करते हैं, जैसा कि कैंब्रिज एनालिटिका मामले में उजागर हुआ है।
    • असमान अनुपालन प्रभाव: एकसमान मानक छोटी फर्मों पर बोझ डालते हैं, जबकि प्रमुख प्लेटफॉर्म द्वारा उत्पन्न असमान जोखिमों का समाधान करने में विफल रहते हैं।
  • पहचान-आधारित हानियाँ और सामाजिक कमजोरियाँ
    • अनुपातहीन उत्पीड़न: अध्ययनों से पता चलता है कि 59% शहरी महिलाएँ और 38% ग्रामीण महिलाएँ ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करती हैं; दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक कार्यकर्ताओं को जातिवादी दुर्व्यवहार और डॉक्सिंग का सामना करना पड़ता है।
    • अदृश्य संरचनात्मक पैटर्न: पहचान-विशिष्ट रिपोर्टिंग का अभाव प्रणालीगत भेदभाव को छुपाता है और उच्च जोखिम वाले समूहों की पहचान को दबा देता है।
    • बढ़ी हुई सुभेद्यता: हाशिये पर स्थित समुदायों को लक्षित फेक न्यूज, घृणा अभियानों और समन्वित ट्रोलिंग के अधिक जोखिम का सामना करना पड़ता है।
    • WEF वैश्विक जोखिम, 2024: WEF की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2024 में  भारत के संदर्भ में फेक न्यूज और दुष्प्रचार को सर्वाधिक प्रभावशाली अल्पकालिक जोखिम के रूप में मान्यता दी गई है, यह जलवायु, ऋण या युद्ध संबंधी जोखिमों से भी आगे है, जो अवांछित ऑनलाइन सामग्री को विनियमित करने की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
  • चुनावी अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा
    • समन्वित प्रभाव संचालन: डीपफेक, बड़े पैमाने पर फैलाई गई फेक न्यूज और लक्षित प्रचार चुनावी अखंडता के लिए खतरा हैं।
    • हानि: राजनीतिक ‘कंटेंट’ अधिकारियों की प्रतिक्रिया से पहले ही तीव्र गति से प्रसारित हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के प्रति गंभीर जोखिम उत्पन्न होता है।
    • सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान: ‘फेक न्यूज’ नागरिकों तक सुधारात्मक संदेश पहुँचने से पहले ही सांप्रदायिक तनाव या हिंसा भड़का सकती है।

आगे की राह

  • कानूनी, संवैधानिक और संस्थागत सुधार
    • ऑनलाइन दुरुपयोग की स्पष्ट परिभाषा: लक्षित ऑनलाइन दुरुपयोग की एक वैधानिक परिभाषा लागू करना, यह सुनिश्चित करते हुए कि इसका दुरुपयोग व्यंग्य, असहमति या राजनीतिक आलोचना के विरुद्ध न हो।
    • आनुपातिकता-आधारित प्रतिबंध: श्रेया सिंघल (2015) मामले में पुष्टि किए गए आनुपातिकता परीक्षण को सुदृढ़ करते हुए सुनिश्चित करना कि सभी नियामक कार्रवाइयाँ उपयुक्तता, आवश्यकता और न्यूनतम प्रतिबंधात्मकता के संवैधानिक मानकों को पूरा करती हैं।
    • वैधानिक डिजिटल मानक प्राधिकरण: वर्तमान शिकायत अपील समिति (GAC) को कानून, प्रौद्योगिकी, मनोविज्ञान, बाल अधिकार और नागरिक समाज से न्यायिक और तकनीकी विशेषज्ञता वाले एक डिजिटल मानक प्राधिकरण में परिवर्तित करना।
    • जोखिम-आधारित स्तरीय विनियमन: जोखिम-आधारित मॉडल अपनाना, वेरी लार्ज ऑनलाइन प्लेटफॉर्म (VLOP) पर सबसे कठोर दायित्व लागू करना और साथ ही छोटे भारतीय प्लेटफॉर्म और ‘क्रिएटर इकोनॉमी’ के बीच नवाचार की रक्षा करना।
    • अंतर-एजेंसी समन्वय: सुसंगत और एकसमान डिजिटल शासन सुनिश्चित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी ब्यूरो, कानून प्रवर्तन, DPDP प्राधिकरण और बाल संरक्षण निकायों के बीच निर्बाध सहयोग का निर्माण करना।
  • संघवाद, विकेंद्रीकरण और पारदर्शिता
    • समवर्ती सूची का समन्वय: ऑनलाइन कंटेंट प्रशासन को समवर्ती सूची के विषय के रूप में मान्यता देना (प्रविष्टि 31—डाक और तार), साझा केंद्र-राज्य उत्तरदायित्व को अनिवार्य बनाना।
    • केंद्र-राज्य संघर्ष कम करना: तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों द्वारा IT नियम 2021 को दी गई चुनौतियों से उत्पन्न तनावों का समाधान करना, नीतिगत स्पष्टता और सहयोगात्मक निगरानी सुनिश्चित करना।
    • सहकारी संघवाद संरचना: स्थानीय प्रवर्तन, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील कार्यान्वयन और समय पर शिकायत निवारण को सक्षम करने के लिए राज्य इंटरनेट सुरक्षा अधिकारियों द्वारा समर्थित एक राष्ट्रीय नियामक ढाँचा तैयार करना।
    • अनिवार्य पारदर्शिता रिपोर्टिंग: MeitY को यूरोपीय संघ-शैली के लोकतांत्रिक पारदर्शिता मानदंडों का पालन करते हुए, धारा 69A और 70B के सभी अवरोधन आदेशों पर एक वार्षिक सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करने की आवश्यकता है।
  • प्लेटफॉर्म जवाबदेही और देखभाल का कर्तव्य
    • सशर्त सुरक्षित-आश्रय प्रतिरक्षा: यदि प्लेटफॉर्म, न्यायालयों या नियामक के आदेश के 24-36 घंटों के भीतर स्पष्ट रूप से अवैध कंटेंट को हटाने में विफल रहते हैं, तो धारा 79 के तहत सुरक्षा वापस ले ली जाएगी, जो यूरोपीय संघ के डिजिटल सेवा अधिनियम के अनुरूप है।
    • श्रेणीबद्ध उत्तरदायित्व तंत्र: गैर-अनुपालन, प्रणालीगत मॉडरेशन विफलताओं या अवांछित ‘कंटेंट’ को संबोधित करने में अनियमितता दर्शाने वाले प्लेटफॉर्म के लिए बढे हुए दंड लागू करना।
    • पहचान रिपोर्टिंग द्वारा सुरक्षा: समानता सुनिश्चित करने और भेदभावपूर्ण नुकसान को रोकने के लिए वार्षिक पहचान-संवेदनशील मॉडरेशन रिपोर्ट अनिवार्य करना, जिसमें यह विवरण दिया गया हो कि दुरुपयोग विभिन्न समूहों जाति, जनजाति, जातीयता को कैसे प्रभावित करता है।
  • प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और AI शासन
    • अनिवार्य सक्रिय AI उपकरण: पारदर्शिता मानदंडों और स्वतंत्र ऑडिट के समर्थन से AI/ML-आधारित पूर्व-फिल्टरिंग, डीपफेक पहचान प्रणालियों और पूर्व-चेतावनी तंत्रों की तैनाती आवश्यक है।।
    • ह्यूमन-इन-द-लूप निरीक्षण: भारतीय भाषाओं में एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह, वर्गीकरण संबंधी त्रुटियाँ और भाषायी अशुद्धियों को कम करने हेतु AI प्रणालियों को प्रशिक्षित मानव मॉडरेटरों के सहयोग से संयोजित किया जाना चाहिए।।
    • डिजिटल मॉडरेशन: यूरोपीय संघ के कृत्रिम बुद्धिमत्ता अधिनियम, 2024 का पालन करते हुए, मॉडरेशन में उपयोग किए जाने वाले उच्च-जोखिम युक्त AI प्रणालियों के लिए ऊर्जा ऑडिट और हरित कंप्यूटिंग मानकों को लागू करना।
  • गोपनीयता, एन्क्रिप्शन तथा उपयोगकर्ता सुरक्षा
    • एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन का संरक्षण: सुनिश्चित करना कि विनियामक शक्तियाँ E2E एन्क्रिप्शन को कमजोर न करना, जो न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी (2017) मामले में मान्यता प्राप्त निजता के मौलिक अधिकार के अनुरूप है।
    • निजता-सुरक्षात्मक आयु सत्यापन: व्यक्तिगत डेटा संगृहीत किए बिना आयु सत्यापित करने के लिए शून्य-ज्ञान प्रमाण प्रणाली, एन्क्रिप्टेड आयु टोकन, या आधार/पैन कार्ड आधारित ब्लाइंड टोकन का उपयोग करना, जो DPDP अधिनियम, 2023 का पूर्णतः अनुपालन करता है।
    • पता लगाने संबंधी उल्लंघनों का निषेध: ऐसे पहचान या आयु-सत्यापन तंत्रों से बचना, जो पता लगाने संबंधी खामियाँ, निगरानी जोखिम, या न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण समिति द्वारा चिह्नित सामूहिक निगरानी संबंधी चिंताएँ उत्पन्न करते हैं।
  • डिजिटल साक्षरता, न्यायिक सहायता और नैतिक पारिस्थितिकी तंत्र
    • राष्ट्रव्यापी डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम: ऑनलाइन सुरक्षा, सूचना साक्षरता, तथ्य-जाँच और डिजिटल नागरिकता को स्कूली पाठ्यक्रमों और सामुदायिक कार्यक्रमों में एकीकृत करके सूचित उपयोगकर्ता तैयार करना।
    • विशेष साइबर न्यायालय: ऑनलाइन दुर्व्यवहार, उत्पीड़न और डीपफेक से संबंधित अपराधों का समय पर निर्णय सुनिश्चित करने के लिए POCSO न्यायालयों की तर्ज पर फास्ट-ट्रैक’ साइबर न्यायालयों की स्थापना करना।
    • डिजिटल सहानुभूति को बढ़ावा देना: सार्वजनिक अभियानों के माध्यम से नैतिक और सहानुभूतिपूर्ण डिजिटल व्यवहार को बढ़ावा देना, ऑनलाइन विषाक्तता को कम करना और ‘फेक न्यूज’ के विरुद्ध सामाजिक अनुकूलन स्थापित करना।
  • समानता, लोकतंत्र और आर्थिक संतुलन
    • हाशिए पर स्थित समूहों के लिए सुरक्षा: महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और कार्यकर्ताओं के ऑनलाइन दुर्व्यवहार के प्रति अधिक संवेदनशील होने के प्रमाणों को पहचानना तथा सुनिश्चित करना कि नीतियाँ इन पहचान-आधारित नुकसानों को स्पष्ट रूप से संबोधित करें।
    • पहचान-संवेदनशील मानक: जवाबदेही और समानता सुनिश्चित करने के लिए शिकायतों, निष्कासन और जोखिम आकलन पर पहचान-आधारित डेटा प्रकाशित करने के लिए प्लेटफॉर्म की आवश्यकता होती है।
    • चुनाव अखंडता तंत्र: चुनाव अवधि में फेक न्यूज और डीपफेक की वास्तविक समय निगरानी के लिए ECI, MeitY और DSA को शामिल करते हुए एक स्थायी चुनाव कंटेंट निरीक्षण बोर्ड का गठन करना।
    • आर्थिक-नवाचार संतुलन: डिजिटल विनियमन को भारत के 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य के साथ संरेखित करना।
    • भारतीय संदर्भ के साथ वैश्विक संरेखण: भारत के सामाजिक और कानूनी परिवेश के अनुरूप कार्यान्वयन तैयार करते समय EU DSA और UNESCO ढाँचों से सर्वोत्तम प्रथाओं को समाविष्ट किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष 

भारत को एक ‘गोल्डीलॉक्स समाधान’ की आवश्यकता है— न तो अत्यधिक अराजकता, न अत्यधिक सेंसरशिप। नियामक ढाँचा ऐसा होना चाहिए, जो संतुलित, पारदर्शी और मौलिक अधिकारों का सम्मान करने वाला हो। ईमानदार आलोचकों को दबाए बिना दुर्व्यवहार करने वालों को दंडित करने वाली प्रणाली को सावधानीपूर्वक डिजाइन करके, भारत डिजिटल युग में अनुच्छेद-19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनुच्छेद-21 के तहत अनिवार्य गरिमा और सुरक्षा के साथ सफलतापूर्वक जोड़ सकता है।

अभ्यास प्रश्न

स्व-नियमन की असफलता के प्रकाश में, क्या डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर कंटेंट मॉनिटरिंग के लिए एक स्वायत्त, स्वतंत्र नियामक निकाय स्थापित करना आवश्यक है? विवेचना कीजिए।

To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.


Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.