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Dec 03 2025

अटल पेंशन योजना (APY)

अक्टूबर 2025 तक अटल पेंशन योजना (APY) में कुल नामांकन 8.34 करोड़ से अधिक हो गया है।

अटल पेंशन योजना (APY) के बारे में

  • यह एक सरकारी समर्थित पेंशन योजना है, जिसका उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को वृद्धावस्था में आय सुरक्षा प्रदान करना तथा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति संबंधी बचत को प्रोत्साहित करना है।
    • इसने स्वावलंबन योजना (जिसे NPS लाइट भी कहा जाता था) का स्थान लिया।
  • प्रारंभ: 1 जून 2015।
  • प्रशासन: पेंशन निधि विनियामक एवं विकास प्राधिकरण द्वारा संचालित।
  • कार्यान्वयन: बैंकों और डाकघरों के माध्यम से, जिन्हें पॉइंट्स ऑफ प्रेजेन्स–अटल पेंशन योजना (PoP–APY) के रूप में नामित किया गया है।
  • पात्रता
    • भारतीय नागरिक, जिनकी आयु 18–40 वर्ष है और जिनके पास बैंक या डाकघर में बचत खाता है तथा जो आयकर दाता नहीं हैं।
    • न्यूनतम योगदान अवधि: 20 वर्ष (आयु 60 वर्ष होने पर पेंशन प्राप्ति हेतु)।
  • लाभ
    • 60 वर्ष की आयु से ₹1000, ₹2000, ₹3000, ₹4000 या ₹5000 की गारंटीड न्यूनतम मासिक पेंशन।
    • यदि निवेश प्रतिफल पर्याप्त न हो, तो सरकार कमी की पूर्ति करती है ताकि गारंटीड पेंशन सुनिश्चित रहे।
    • अभिदाता की मृत्यु होने पर पेंशन उसके जीवनसाथी को मिलती रहती है, दोनों की मृत्यु होने पर संचित धनराशि नामित व्यक्ति को वापस कर दी जाती है।
    • योगदान पर धारा 80CCD(1) के अंतर्गत कर लाभ तथा धारा 80CCD(1B) के तहत ₹50,000 तक की अतिरिक्त कटौती के लिए पात्र हैं।

APY के अंतर्गत प्रमुख उपलब्धियाँ

  • विस्तृत कवरेज: अक्टूबर 2025 तक 8.34 करोड़ से अधिक सदस्य, जो ग्रामीण एवं असंगठित क्षेत्रों में गहरी पहुँच दर्शाता है।
  • महिला भागीदारी: कुल नामांकनों में 48% महिलाएँ (लगभग 4.04 करोड़, अक्टूबर 2025 तक)।
  • विस्तारित जन-जागरूकता: बहुभाषी अभियान, डिजिटल ऑनबोर्डिंग (ई-APY, मोबाइल ऐप) तथा बैंक मित्र/स्वयं-सहायता समूह आधारित क्षमता-वृद्धि से देशव्यापी स्वीकृति में वृद्धि हुई है।

विश्व दूरसंचार विकास सम्मेलन (WTDC)

भारत ने बाकू, अजरबैजान में आयोजित WTDC-2025 में वैश्विक डिजिटल प्रशासन में अग्रणी नेतृत्व के रूप में अपनी भूमिका निभाई है।

WTDC के बारे में

  • यह अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) के दूरसंचार विकास क्षेत्र से संबंधित प्रमुख चार वर्षीय सम्मेलन है, जो विकासशील देशों के लिए दूरसंचार और सूचना-संचार प्रौद्योगिकी विकास रणनीतियों को निर्धारित करने हेतु वैश्विक हितधारकों को एक मंच पर लाती है।
  • प्रमुख केंद्र बिंदु (WTDC-25): सम्मेलन का ध्यान सार्थक संपर्कता, समावेशी डिजिटल परिवर्तन, स्मार्ट समुदाय, नवाचार पारितंत्र, दुष्प्रभाव-रोधी साइबर सुरक्षा, विनियामक आधुनिकीकरण तथा सूचना-संचार प्रौद्योगिकी आधारित आपदा तैयारी पर केंद्रित रहा।

WTDC-25 में भारत का प्रमुख योगदान

  • नेतृत्वकारी भूमिकाएँ: भारत ने सम्मेलन के उपाध्यक्ष सहित कई उच्च-स्तरीय पद ग्रहण किए, डिजिटल परिवर्तन समूहों की अध्यक्षता की तथा ITU-D अध्ययन समूहों (वर्ष 2026–29) के लिए दो उपाध्यक्ष पद प्राप्त किए।
  • प्रमुख वैश्विक प्रस्तावों को आगे बढ़ाना
    • प्रस्ताव 85 को स्मार्ट सतत् नगरों से स्मार्ट ग्रामों तक विस्तारित करने हेतु प्रोत्साहित किया, नवाचार तथा भविष्य-तत्परता से संबंधित प्रस्ताव 89 और 90 को सुदृढ़ किया।
    • दूरसंचार के दुरुपयोग, अवांछित संदेश नियंत्रण और उपकरण सुरक्षा से संबंधित साइबर सुरक्षा प्रस्ताव 45 और 84 को मजबूत किया।
    • प्रारंभिक चेतावनियों, जलवायु कार्रवाई, ई-कचरा प्रबंधन और डिजिटल समावेशन से जुड़े आपदा-संबंधी प्रस्ताव 34 और 66 को और सुदृढ़ किया।
    • भारत की वैश्विक डिजिटल उपस्थिति को सुदृढ़ करना: भारत की सक्रिय भागीदारी और प्रौद्योगिकी प्रदर्शनों ने उसे वैश्विक दूरसंचार विकास के एक प्रमुख भागीदार के रूप में स्थापित किया।

अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) के बारे मे

  • ITU दूरसंचार और सूचना-संचार प्रौद्योगिकी के लिए संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट संस्था है, जिसकी स्थापना वर्ष 1865 में हुई थी और यह संयुक्त राष्ट्र की सबसे पुरानी संस्था है।
  • प्रमुख कार्य
    • वैश्विक संचार नेटवर्कों और संपर्कता का समन्वय।
    • रेडियो स्पेक्ट्रम तथा उपग्रह कक्षाओं का आवंटन।
    • वैश्विक दूरसंचार मानकों का विकास।
    • विश्वभर में डिजिटल पहुँच और समावेशन को समर्थन देना।
  • सदस्यता: इसमें 194 देश और 1000 से अधिक संस्थाएँ शामिल हैं। इसका मुख्यालय जेनेवा, स्विट्जरलैंड में स्थित है।
    • भारत वर्ष 1869 में सदस्य बना और वर्ष 1952 से ITU परिषद का नियमित सदस्य है।
  • प्रतिवेदन: ITU राष्ट्रीय साइबर तैयारी का आकलन करने वाला वैश्विक साइबर सुरक्षा सूचकांक (GCI) प्रकाशित करता है।

सिम बाइंडिंग 

केंद्र सरकार ने साइबर धोखाधड़ी पर रोक, निगरानी क्षमता सुनिश्चित करने और डिजिटल संचार सेवाओं में दूरसंचार साइबर सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु सभी ऑनलाइन मैसेज प्लेटफॉर्म के लिए सिम बाइंडिंग को अनिवार्य किया है।

सिम बाइंडिंग के बारे में

  • सिम बाइंडिंग एक सुरक्षा तंत्र है, जो पंजीकरण के समय उपयोग किए गए विशिष्ट सिम को उपयोगकर्ता की संदेश या प्रमाणीकरण सेवा से स्थायी रूप से जोड़ देता है।
  • पंजीकृत सिम के अनुपस्थित होने पर अनुप्रयोग संबंधी कार्य करना बंद कर देता है, जिससे हार्डवेयर-आधारित सिम पहचानकर्ताओं जैसे  IMSI और ICCID के माध्यम से पहचान सत्यापन सुनिश्चित होता है।
  • सिम बाइंडिंग के प्रावधान
    • मैसेज प्लेटफॉर्म को पंजीकरण के समय उपयोग किए गए सिम से निरंतर रूप से जुड़ा रहना होगा।
    • पंजीकृत सिम के भौतिक रूप से अनुपस्थित होने पर उपयोगकर्ता की पहुँच अवरुद्ध की जाएगी।
    • वेब इंटरफेस (जैसे WhatsApp Web) को प्रत्येक 6 घंटे में स्वतः लॉगआउट होना होगा।
    • प्लेटफॉर्म को 90 दिनों के भीतर कार्यान्वयन पूरा कर दूरसंचार विभाग को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
  • सिम बाइंडिंग’ को सक्षम करने वाला विधिक प्रावधान: दूरसंचार साइबर सुरक्षा संशोधन नियम, 2025
    • ये नियम दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा अधिसूचित किए गए।
    • उपयोगकर्ता पहचान हेतु मोबाइल संख्या का उपयोग करने वाले OTT-आधारित संचार प्लेटफार्म को विनियमित करने के लिए दूरसंचार पहचानकर्ता उपयोगकर्ता इकाई (TIUE) की अवधारणा प्रस्तुत करता है।
    • सरकार को सिम–उपकरण–खाता के निरंतर संबंध को लागू करने का अधिकार प्रदान करता है, जिससे डिजिटल संचार सुरक्षा मजबूत होती है।

सिम बाइंडिंग’ का महत्त्व

  • साइबर सुरक्षा को सुदृढ़ करता है: यह देश के बाहर से सिम संबंधी दुरुपयोग को रोकता है तथा प्रतिरूपण, स्पूफिंग और OTP बाईपास जैसे हमलों को कम करता है।
  • अनुरेखण क्षमता बढ़ाता है: यह सिम–उपकरण–खाता संबंध सुनिश्चित करता है, जिससे साइबर धोखाधड़ी या गोपनीय संचार में संलिप्त उपयोगकर्ताओं की पहचान संभव होती है।
  • सीमा पार धोखाधड़ी में कमी: निष्क्रिय या अवैध रूप से प्राप्त सिम-लिंक्ड खातों का उपयोग करने वाले स्कैमर, मूल सिम के बिना अब अनुप्रयोगों तक पहुँच नहीं प्राप्त कर सकेंगे।
  • वित्तीय-स्तर की सुरक्षा के अनुरूप: यह मैसेज प्लेटफॉर्म को बैंकिंग और UPI अनुप्रयोगों में पहले से प्रचलित सिम-सक्रिय प्रमाणीकरण के स्तर के निकट लाता है।

यूनेस्को कार्यकारी बोर्ड

 

 

भारत वर्ष 2025–29 के कार्यकाल के लिए यूनेस्को कार्यकारी बोर्ड में पुनः निर्वाचित किया गया है, जिससे बहुपक्षीय संस्थाओं में इसकी मजबूत स्थिति की पुष्टि होती है।

यूनेस्को कार्यकारी बोर्ड के बारे में

  • यूनेस्को कार्यकारी बोर्ड, संगठन के तीन संवैधानिक अंगों में से एक है (अन्य दो हैं: महासम्मेलन और सचिवालय)।
  • स्थापना: यूनेस्को की स्थापना वर्ष 1945 में हुई और वर्ष 1946 में इसका संविधान प्रभावी होने के बाद कार्यकारी बोर्ड इसके प्रमुख शासन अंगों में सम्मिलित हुआ।
  • मुख्यालय: कार्यकारी बोर्ड तथा यूनेस्को का मुख्य सचिवालय पेरिस, फ्राँस से संचालित होता है।
  • सदस्यता: इसमें 58 सदस्य देश शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक का कार्यकाल चार वर्ष का होता है तथा इन्हें यूनेस्को के महाधिवेशन द्वारा चुना जाता है।
  • संतुलित एवं न्यायसंगत वैश्विक प्रतिनिधित्व हेतु सदस्यों का चयन क्षेत्रीय निर्वाचन समूहों के माध्यम से किया जाता है।
    • भारत समूह 4 (एशियाई एवं प्रशांत राज्य) में सम्मिलित है।

कार्यकारी बोर्ड के कार्य

  • महानिदेशक द्वारा प्रस्तुत यूनेस्को के कार्यक्रम एवं संबंधित बजट की समीक्षा करना।
  • महासम्मेलन की कार्यसूची निर्धारित करने हेतु अनुशंसाएँ तैयार कर प्रस्तुत करना।
  • यूनेस्को में नए सदस्य देशों के प्रवेश से संबंधित अनुशंसाएँ करना।
  • महानिदेशक की नियुक्ति संबंधी मार्गदर्शन प्रदान करना।
  • महासम्मेलन द्वारा स्वीकृत कार्यक्रमों के निष्पादन का दायित्व निभाना।
  • महासम्मेलन के विशेष (असाधारण) सत्रों का आह्वान करना।
  • शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति एवं ज्ञान संबंधित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और पहलों को प्रोत्साहित एवं पर्यवेक्षित करना।

संचार साथी ऐप

केंद्रीय संचार मंत्री ने स्पष्ट किया कि मोबाइल हैंडसेट पर ‘संचार साथी’ ऐप को सक्रिय करना अनिवार्य नहीं है, यह पूरी तरह से उपभोक्ताओं पर निर्भर है कि वे इसे किसी अन्य ऐप की तरह उपयोग करें या हटा दें।

  • पहले, दूरसंचार विभाग (DoT) ने सभी मोबाइल फोन निर्माताओं और आयातकों को निर्देश दिया था कि भारत में बेचे जाने वाले प्रत्येक हैंडसेट में संचार साथी साइबर सुरक्षा ऐप को 90 दिनों के भीतर सक्रिय करना होगा।

संचार साथी पहल

  • यह एक समग्र दूरसंचार सुरक्षा कार्यक्रम है, जिसे दूरसंचार संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने, साइबर धोखाधड़ी को नियंत्रित करने और राष्ट्रीय दूरसंचार साइबर सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु बनाया गया है।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य डिवाइस की प्रामाणिकता सत्यापित करना, उपयोगकर्ता की पहचान सुरक्षित रखना, सिम कार्ड के दुरुपयोग का पता लगाना, चोरी हुए डिवाइस को ब्लॉक करना और नागरिक-अनुकूल दूरसंचार सुरक्षा उपकरण प्रदान करना है।
  • शुभारंभ: केंद्रीय संचार मंत्रालय के अंतर्गत दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा शुरू किया गया, यह एक एकीकृत संचार साथी पोर्टल और मोबाइल ऐप के माध्यम से संचालित होता है।

संचार साथी’ ऐप के बारे में

  • परिचय: ‘संचार साथी’ ऐप दूरसंचार विभाग द्वारा विकसित एक नागरिक सुरक्षा उपकरण है, जो हैंडसेट के IMEI नंबरों को सत्यापित करने, धोखाधड़ी वाले संचार की रिपोर्ट करने और मोबाइल पहचान को सुरक्षित रूप से प्रबंधित करने के लिए है।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • IMEI सत्यापन: उपकरण का IMEI वास्तविक, डुप्लीकेट या ब्लैकलिस्टेड है, इसकी पुष्टि करता है।
    • चोरी के उपकरणों का अवरोधन: खोए हुए फोन के IMEI को अवरुद्ध करने और प्राप्त उपकरणों के पता लगाने की सुविधा।
    • सिम एवं पहचान प्रबंधन: उपयोगकर्ता की पहचान से जुड़े सभी मोबाइल कनेक्शन प्रदर्शित करता है, ताकि अनधिकृत उपयोग की  निगरानी की  जा सके।
    • धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग: “चक्षु” उपकरण फिशिंग, इंपरसनेशन घोटाले, नकली KYC अलर्ट तथा संदिग्ध नंबरों को चिह्नित करता है।
    • स्पैम एवं स्कैम की पहचान: मास्क्ड अंतरराष्ट्रीय कॉल, स्पैम मैसेज तथा असुरक्षित लिंक की रिपोर्टिंग की सुविधा देता है।
  • DoT  निर्देश (2025)
    • भारत हेतु निर्मित या आयातित सभी हैंडसेट में संचार साथी’ ऐप पूर्व-स्थापित, दृश्य, कार्यशील तथा प्रथम डिवाइस सेटअप के समय सक्रिय होना चाहिए।
    • निर्माता ऐप की किसी भी विशेषता को निष्क्रिय या सीमित नहीं कर सकते।
    • बिक्री माध्यम में पहले से मौजूद उपकरणों को सॉफ्टवेयर अद्यतन के माध्यम से ऐप प्रदान किया जाएगा।
    • 90 दिनों के भीतर कार्यान्वयन पूर्ण करना होगा तथा 120 दिनों में अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।

पोक्रोव्स्क (Pokrovsk)

रूस ने पूर्वी यूक्रेन के पोक्रोव्स्क पर पूर्ण नियंत्रण का दावा किया है।

पोक्रोव्स्क के बारे में

  • पोक्रोव्स्क को रूस द्वारा क्रास्नोअर्मेस्क (Krasnoarmeysk) के रूप में संदर्भित किया जाता है और यह डोनेट्स्क (Donetsk) क्षेत्र में एक प्रमुख युद्धक्षेत्र रहा है, जहाँ वर्ष 2024 के मध्य से संघर्ष जारी रही है।
  • अवस्थिति: यह शहर पूर्वी यूक्रेन के डोनेट्स्क प्रांत में स्थित है।

सामरिक महत्त्व

  • प्रमुख लाजिस्टिक केंद्र: ऐतिहासिक रूप से यह यूक्रेनी सैन्य आपूर्ति और परिवहन का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है।
  • ऊर्जा क्षेत्र: यह यूक्रेन के एकमात्र ‘कोकिंग-कोयला’ खनिज स्रोत पोक्रोव्स्के खदान के निकट अवस्थित है।
  • प्रमुख शहरों का केंद्र: इसके पतन से क्रामातोर्स्क (Kramatorsk) तथा स्लोवियान्स्क (Sloviansk) की दिशा में अग्रगमन का मार्ग प्रशस्त होता है, जो डोनेट्स्क क्षेत्र में यूक्रेन-नियंत्रित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शहरी केंद्रों के रूप में स्थित हैं।
  • डोनबास कॉरिडोर पर नियंत्रण: यह डोनेट्स्क (Donetsk) और लुहांस्क (Luhansk) पर पूर्ण प्रभुत्व की दिशा में रूसी प्रगति को मजबूत करने में मदद करता है, जो एक साथ मिलकर व्यापक डोनबास क्षेत्र का निर्माण करते हैं।

रूस के दावे और सैन्य स्थिति

  • विजय की घोषणा: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कथित अधिकार को विशेष सैन्य अभियान” के प्रारंभिक सैन्य लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक बताया।
  • जारी सैन्य अभियान: रूसी कमांडरों ने पोक्रोव्स्क (Pokrovsk) और मिर्नोहराद (Myrnohrad) के आस-पाससैन्य अभियान” जारी रहने की जानकारी दी तथा दावा किया कि हजारों यूक्रेनी सैनिक अब भी घिरे हुए हैं।

संदर्भ 

सर्वोच्च न्यायालय ने बढ़ते डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम मामलों की जाँच हेतु केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को पूरे देश में जाँच करने का आदेश दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए प्रमुख निर्देश

  • स्वतंत्र जाँच का अधिकार
    • न्यायालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को व्यापक जाँच शुरू करने की अनुमति दी, जिसमें संदिग्ध खातों के नेटवर्क तथा बैंकिंग-संबंधित भ्रष्टाचार की जाँच शामिल है।
    • विशेष परिस्थिति: न्यायालय ने माना कि राज्य की सहमति के बिना केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को निर्देश देना असाधारण कदम है, जो केवल अत्यंत विरल परिस्थितियों में किया जाता है।
    • चरणबद्ध जाँच: प्राथमिकता—पहले डिजिटल अरेस्ट, फिर निवेश संबंधी स्कैम, उसके बाद रोजगार संबंधी स्कैम।
  • राज्य सरकार की सहमति
    • बिहार, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल सहित 13 राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत सहमति प्रदान करें, ताकि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के तहत डिजिटल अरेस्ट मामलों की जाँच कर सके।
    • बहु-राज्य एवं तकनीकी दल: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो राज्यों के पुलिस अधिकारियों और साइबर विशेषज्ञों की टीम बनाकर जाँच करेगा।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: वैश्विक स्तर पर सक्रिय स्कैमर को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को इंटरपोल के साथ सहयोग कर विदेशी साइबर अपराध केंद्रों की पहचान करने का निर्देश दिया।
  • भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका: भारतीय रिजर्व बैंक को यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता/यांत्रिक शिक्षण तकनीकों का उपयोग किस प्रकार करता है, ताकि बैंक खातों में ठगी की गई धनराशि के प्रवाह को पहचाना जा सके।
  • ऑनलाइन मध्यस्थ: सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 के अनुसार, डिजिटल मंचों को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के साथ सहयोग करना होगा और आवश्यक डेटा उपलब्ध कराना होगा।
  • राष्ट्रीय साइबर ढाँचा सुदृढ़ीकरण: सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को क्षेत्रीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र स्थापित करने होंगे, जिन्हें भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) से जोड़ा जाएगा।
  • दूरसंचार क्षेत्र की जवाबदेही
    • सिम जारी करने में लापरवाही: न्यायालय ने दूरसंचार कंपनियों द्वारा एक ही नाम पर कई सिम जारी करने की चिंताजनक और गैर-जिम्मेदार” प्रक्रिया की आलोचना की।
    • दूरसंचार विभाग की कार्रवाई: दूरसंचार विभाग को कठोर सिम-सत्यापन उपायों का प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा गया है, जिन्हें सभी दूरसंचार सेवा प्रदाताओं द्वारा लागू किया जाएगा।

डिजिटल अरेस्ट स्कैम क्या है?

  • परिभाषा: एक साइबर अपराध, जिसमें ठग स्वयं को कानून प्रवर्तन अधिकारी बताकर नागरिकों पर झूठे आरोप लगाते हैं और धनराशि वसूलते हैं।
  • मानसिक दबाव: ठग, पीड़ितों को यह कहकर डराते हैं कि वे किसी अपराध (वित्तीय धोखाधड़ी, कर चोरी, पार्सल जब्ती आदि) में शामिल हैं और गिरफ्तारी का भय दिखाकर धन की माँग करते हैं।

स्कैम  कैसे संचालित होते है?

  • अधिकारियों का प्रतिरूपण: ठग स्वयं को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, पुलिस, आयकर, सीमा शुल्क या भारतीय रिजर्व बैंक अधिकारी बताकर कॉल या ईमेल से संपर्क करते हैं।
  • वीडियो कॉल पर दबाव: ठग पीड़ितों को व्हाट्सऐप या स्काइप वीडियो कॉल पर लाकर तथा नकली थाना पृष्ठभूमि स्थापित कर स्वयं को प्राधिकारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  • नकली डिजिटल वारंट: ठगडिजिटल अरेस्ट वारंट” जारी कर पीड़ित को घंटों ऑनलाइन रहने को बाध्य करते हैं, जैसे वह हिरासत में हो।
  • कानूनी कार्रवाई की धमकी: धनशोधन, कर उल्लंघन या साइबर अपराध जैसे- आरोप लगाकर तात्कालिकता की स्थिति उत्पन्न की जाती है।
  • धन स्थानांतरण के लिए मजबूरी: पीड़ितों से कहा जाता है किअपना नाम संबंधित अपराध से हटाने” हेतु धनराशि निर्दिष्ट खातों, एस्क्रो वॉलेटों” (Escrow wallets) में भेजें।
  • धन प्राप्ति के बाद संपर्क तोड़ना: भुगतान होते ही ठग संपर्क तोड़ देते हैं, जिससे आर्थिक हानि और पहचान का दुरुपयोग होता है।

कार्रवाई की आवश्यकता

  • स्कैम का विस्तार: सरकारी जानकारी के अनुसार, ठगों ने ₹3000 करोड़ से अधिक की धनराशि की ठगी की है।
  • वरिष्ठ नागरिकों की संवेदनशीलता: वृद्धजन डिजिटल अपराधों की अपरिचित प्रकृति एवं भय के कारण अधिक निशाना बनते हैं।
  • CERT-In की सलाह: CERT-In ने डिजिटल अरेस्ट को उच्च-जोखिम साइबर खतरे के रूप में चिह्नित किया है, जिन्हें डीपफेक स्कैम और निवेश स्कैम के साथ उभरती चुनौतियों में शामिल किया गया है।
  • बढ़ते मामलों ने सर्वोच्च न्यायालय को राष्ट्रीय स्तर की कार्रवाई और उन्नत समन्वय का निर्देश देने को मजबूर किया।

एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) साइबर अपराध का वर्गीकरण

  • डिजिटल अरेस्ट स्कैम : प्रतिरूपण, दबाव, उगाही।
  • निवेश स्कैम : नकली ट्रेडिंग ऐप, अवास्तविक उच्च प्रतिफल योजनाएँ।
  • रोजगार स्कैम: बेरोजगार युवाओं को लक्षित कर नकली अंशकालिक कार्य प्रस्ताव।

तीनों प्रकार के स्कैम  का उद्देश्य नागरिकों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों से ठगी करना है।

डिजिटल अरेस्ट से निपटने के लिए सरकारी पहल

  • भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C)
    • गृह मंत्रालय के अधीन यह राष्ट्रीय स्तर पर साइबर अपराध से निपटने के प्रयासों का नेतृत्व करता है, जिनमें डिजिटल अरेस्ट स्कैम  भी शामिल है।
    • यह त्वरित रिपोर्टिंग और फंड-फ्रीजिंग के लिए 24×7 साइबर अपराध हेल्पलाइन (1930) संचालित करता है।
  • राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in)
    • पीड़ित डिजिटल अरेस्ट स्कैम की ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
    • पोर्टल पुलिस से जोड़ता है, जिससे वास्तविक समय में लेन-देन फ्रीज कर तीव्र जाँच संभव होती है।
  • साइबर स्कैम प्रबंधन प्रणाली
    • एक समन्वित व्यवस्था, जहाँ बैंक, भुगतान एप्लिकेशन और भारतीय रिजर्व बैंक संयुक्त रूप से साइबर स्कैम अलर्ट पर कार्रवाई करते हैं।
    • यह संदिग्ध लेन-देन को तुरंत फ्रीज कर डिजिटल अरेस्ट मामलों में हानि को कम करता है।
  • संचार साथी पोर्टल (दूरसंचार विभाग)
    • यह पोर्टल डिजिटल अरेस्ट स्कैम में प्रयुक्त फर्जी मोबाइल नंबरों, सिम कार्डों और नकली कॉलर आईडी की निगरानी और अवरोधन करता है।
    • इसमें केंद्रीय उपकरण पहचान रजिस्टर भी शामिल है, जो चोरी हुए उपकरणों को अवरुद्ध कर साइबर अपराधों में दुरुपयोग रोकता है।
  • सिम-बाइंडिंग’ की आवश्यकता
    • सरकार ने व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, सिग्नल जैसे ‘मैसेज प्लेटफॉर्म’ को निर्देश दिया है कि वे अपने उपयोग को अनिवार्य रूप से उस सिम कार्ड से जोड़ें, जिसका उपयोग पंजीकरण के समय किया गया था।
    • इन मंचों को सुनिश्चित करना होगा कि उनकी सेवाएँ निरंतर उसी सिम कार्ड से जुड़ी रहें, जो पंजीकरण के समय प्रयुक्त हुआ था।

संदर्भ

असम विधानसभा में प्रस्तुत मंत्रिसमूह (GoM) की रिपोर्ट में छह अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने  की अनुशंसा की गई है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • अनुसूचित जनजाति का दर्जा माँगने वाले समुदाय: ताई अहोम, टी जनजाति/आदिवासी, मोरान, मोटोक, चुटिया, कोच-राजबंशी।
  • वर्तमान स्थिति: इन समुदायों की जनसंख्या असम की कुल जनसंख्या का लगभग 27% है और ये वर्तमान में अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में सूचीबद्ध हैं।

मंत्रिसमूह की पृष्ठभूमि और उसका अधिदेश

  • मंत्रिसमूह का गठन: केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश (वर्ष 2019) पर गठन और दो बार पुनर्गठित।
  • अधिदेश
    • इन छह समुदायों के लिए आरक्षण का परिमाण निर्धारित करना।
    • नई अनुसूचित जनजाति श्रेणी बनाने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण में संशोधन का सुझाव देना।
    • वर्तमान अनुसूचित जनजाति (मैदानी) और अनुसूचित जनजाति (पहाड़ी) समुदायों के लिए सुरक्षा-प्रावधान सुझाना।

मंत्री समूह रिपोर्ट की प्रमुख अनुशंसाएँ

  • त्रि-स्तरीय अनुसूचित जनजाति वर्गीकरण 
    • नई श्रेणी: अनुसूचित जनजाति (घाटी): ताई अहोम, चुटिया, टी जनजाति/आदिवासी तथा कोच-राजबंशी (अविभाजित गोलपाड़ा को छोड़कर) को शामिल करने की अनुशंसा।
    • वर्तमान स्थिति: वर्तमान में अनुसूचित जनजातियाँ दो वर्गों में हैं- अनुसूचित जनजाति (मैदानी): 10% आरक्षण, अनुसूचित जनजाति (पहाड़ी): 5% आरक्षण।
  • अनुसूचित जनजाति (घाटी) के लिए पृथक आरक्षण व्यवस्था
    • अलग रोस्टर एवं रिक्ति अभिलेख: अनुसूचित जनजाति (घाटी) के लिए राज्य सरकार की सभी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में अनुसूचित जनजाति (मैदानी) और अनुसूचित जनजाति (पहाड़ी) से स्वतंत्र आरक्षण प्रणाली लागू की है।
    • केंद्रीय आरक्षण: राष्ट्र-स्तर पर सभी अनुसूचित जनजातियों को एक समान, एकल श्रेणी के अंतर्गत प्रतिस्पर्द्धा करनी होगी।
  • संसदीय प्रतिनिधित्व
    • मुख्य सीटों का स्थायी आरक्षण:  कोकराझार (अनुसूचित जनजाति-मैदानी) और दिफू (अनुसूचित जनजाति-पहाड़ी) को संवैधानिक संशोधन के माध्यम से स्थायी रूप से आरक्षित रखा जाए।
    • अतिरिक्त आरक्षण: नई अनुसूचित जनजाति (घाटी) श्रेणी जुड़ने से असम की अनुसूचित जनजाति जनसंख्या में वृद्धि होगी, इसलिए अनुसूचित जनजाति (घाटी) के लिए अतिरिक्त संसदीय सीटें आरक्षित की जाएँ।
  • अंतरिम उपाय
    • अन्य पिछड़ा वर्ग का उप-वर्गीकरण: ओबीसी आरक्षण (27%) को सात उप-श्रेणियों (प्रत्येक छह समुदायों के लिए एक और शेष ओबीसी के लिए एक) में विभाजित किया जाएगा ।
    • जनसंख्या-आधारित आरक्षण: प्रत्येक समूह को जनसंख्या के आकार के आधार पर आरक्षण दिया जाएगा, जिसके लिए सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण और गणना की आवश्यकता होगी।
    • स्थानीय निकायों में आरक्षण: पंचायतों, नगर पालिकाओं और शहरी स्थानीय निकायों में इन समूहों को आरक्षण उपलब्ध कराया जाएगा।
    • भूमि संरक्षण कानून: राज्य सरकार ऐसा कानून बनाए, जो इन छह समुदायों और अन्य वर्तमान अनुसूचित जनजातियों की भूमि को बाह्य व्यक्तियों को हस्तांतरित करने पर रोक लगाए।

संदर्भ 

IIT गांधीनगर के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक वर्तमान अध्ययन के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता का पतन किसी एक विनाशकारी घटना से नहीं, बल्कि सदियों तक प्रभाव में रहे लगातार सूखे की घटना के कारण हुआ, जिसने क्रमशः नगरों, नदियों, कृषि व्यवस्था और सामाजिक ढाँचों को कमजोर किया।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • मूल निष्कर्ष
    • अध्ययन दर्शाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का पतन किसी एक आकस्मिक आपदा से नहीं हुआ।
    • हडप्पा सहित प्रमुख सिंधु घाटी सभ्यता नगर 3000–1000 ईसा पूर्व के बीच कई दशकों के सूखे से प्रभावित थीं।
  • जलवायु पुनर्निर्माण: शोधकर्ताओं ने जलवायु संबंधी अभिलेखों (स्टैलैक्टाइट, स्टैलैग्माइट, झील स्तर) और जलवायु मॉडल सिमुलेशन का उपयोग कर उस अवधि की वर्षा व तापमान प्रवृत्तियों का पुनर्निर्माण किया।

सभ्यता के पतन के कारण

  • आवर्ती सूखा चक्र: 2425-1400 ईसा पूर्व के बीच चार प्रमुख सूखे की घटनाएँ घटीं, जिनमें से प्रत्येक 85 वर्षों से अधिक समय तक चली।
    • सर्वाधिक भीषण सूखा लगभग 1733 ईसा पूर्व में चरम पर था, जो लगभग 164 वर्ष तक प्रभाव में रहा और पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया।
  • जल–तंत्र का पतन: दीर्घकालिक सूखे के कारण झीलें सूख गई, नदियों का प्रवाह कम हो गया, मृदा सूख गई, नौवहन क्षमता कम हो गई, जिससे व्यापार को नुकसान पहुँचा।
  • प्रशांत महासागर में जलवायु परिवर्तन
    • प्रारंभिक समृद्धि ‘ला नीना’ जैसी दशाओं (3000–2475 ईसा पूर्व) से संबंधित थी, जिससे मानसून आधुनिक काल की तुलना में अधिक आर्द्र था।
    • जैसे-जैसे उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर गर्म हुआ, वार्षिक वर्षा में 10–20 प्रतिशत की कमी आई और तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, जिससे शुष्कता में वृद्धि हुई।

सामाजिक और आर्थिक परिणाम

  • कृषि पर दबाव: सूखे ने कृषि को अत्यंत कठिन बना दिया, विशेषकर उन बस्तियों के लिए जो सतत् वाहिनी नदियों से दूर थीं।
    • अनुकूल कृषि पद्धतियाँ: हड़प्पावासियों ने फसल प्रतिरूप में परिवर्तन कर, उत्पादन में विविधता लाकर और सूखा-प्रतिरोधी कृषि अपनाकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
    • पुरातात्त्विक-वनस्पति साक्ष्य गेहूँ और जौ से सूखा-प्रतिरोधी बाजरा जैसी फसल की ओर परिवर्तन दर्शाते हैं, जो शुष्कता से निपटने के प्रयासों का संकेत देते हैं।
  • प्रवासन और बिखराव: समुदायों को बार-बार स्थानांतरित होना पड़ा, जिससे सिंधु और इसकी सहायक नदियों के किनारे बसावटों का वितरण बदल गया।
    • उन्होंने व्यापार मार्गों का विविधीकरण किया तथा बस्तियों को अधिक जल-सुरक्षित क्षेत्रों में स्थानांतरित किया।
  • शासन संबंधी दबाव: कम होती खाद्य आपूर्ति और कमजोर राजनीतिक संरचनाएँ, जलवायु संबंधी दबावों के साथ मिलकर, समाज को पतन और विखंडन की ओर अग्रसर किया।
  • वि-नगरीकरण: पिछली शताब्दी का सूखा (3531-3418 ईसा पूर्व) पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ संरेखित है, जिसमें बड़े शहरों को छोड़ दिया गया और आबादी छोटे ग्रामीण समूहों में वितरित हो गई।

सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के सिद्धांत

प्राकृतिक आपदा सिद्धांत

बाढ़ के कारण

  • कुछ विद्वानों का तर्क है कि सिंधु घाटी में शहरी केंद्रों के विनाश और पतन में बाढ़ का योगदान हो सकता है।
  • इस दृष्टिकोण का समर्थन करने वाले साक्ष्यों में शामिल हैं:
    • अवसाद से आच्छादित मलबे पर निर्मित नवीन गृह-संरचनाएँ बाढ़-जनित क्षति के उपरांत पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को इंगित करती हैं।
    • घर और सड़कें अवसाद की परत के अधःस्थ लगभग 30 फीट की गहराई में समाविष्ट हो गई हैं।

भूकंप के कारण

  • सिंधु क्षेत्र एक विवर्तनिक रूप से सक्रिय भूकंप क्षेत्र में स्थित है, जिससे यह संभावना बनती है कि भूकंपों ने भू-दृश्य को बदल दिया हो।
  • भूकंपों ने बाढ़ के मैदानों को ऊँचा कर दिया होगा, जिससे नदियों का समुद्र की ओर प्राकृतिक प्रवाह अवरुद्ध हो गया होगा और जल शहरी क्षेत्रों में प्रवेश कर गया होगा।
नदी मार्ग परिवर्तन
  • यह अनुमान है कि सिंधु नदी का मार्ग प्रमुख शहरों से परिवर्तित हो गया होगा, जिससे जल संकट उत्पन्न हुआ होगा और कृषि की स्थिरता कम हुई होगी।
  • इस तरह के परिवर्तनों से शहरों का अस्तित्व में रहना कठिन हो गया होगा।
  • साक्ष्य: हड़प्पा सभ्यता में रेत और अवसाद की मौजूदगी संभवतः इसका संकेत देती है।
जलवायु परिवर्तन सिद्धांत
  • कुछ विद्वान इस पतन का कारण जलवायु परिवर्तन को मानते हैं, जिसमें बढ़ती शुष्कता और घग्गर-हकरा नदी प्रणाली (जिसे प्राचीन सरस्वती नदी के रूप में जाना जाता है) का सूखना शामिल है।
  • बढ़ी हुई शुष्कता ने अर्द्ध-शुष्क हड़प्पा क्षेत्रों में कृषि को गंभीर रूप से प्रभावित किया होगा।
आर्य आक्रमण सिद्धांत
  • कुछ प्रारंभिक विद्वानों का मानना ​​है कि हड़प्पा के शहरों पर इंडो-यूरोपीय आर्यों ने हमला किया और उन्हें नष्ट कर दिया, जिससे सभ्यता का पतन हुआ।
  • प्रमुख साक्ष्य
    • मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुए मानव कंकालों को भयावह संघर्ष के परिणामस्वरूप मृत्यु के संकेत के रूप में व्याख्यायित किया गया है।
    • ऋग्वेद में भगवान पुरंदर द्वारा दस दुर्गों के विनाश का उल्लेख मिलता है।
  • आधुनिक पुरातत्त्वविद इस सिद्धांत को व्यापक रूप से खारिज करते  है।

संदर्भ

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन रणनीति (NSFI), 2025-30 जारी की।

वित्तीय समावेशन को ऐसे वहनीय वित्तीय उत्पादों और सेवाओं की उपलब्धता के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो व्यक्तियों एवं व्यवसायों की आवश्यकताओं को जिम्मेदार, पारदर्शी और स्थायी माध्यमों से पूरा करते हों।

भारत का वित्तीय समावेशन विकास

  • वित्तीय समावेशन सूचकांक वर्ष 2025 में बढ़कर 67 हो गया, जो वर्ष 2021 से 24.3% अधिक है।
  • प्रधानमंत्री जन धन योजना के अंतर्गत 55.98 करोड़ लाभार्थी।
  • वित्तीय समावेशन योजनाओं के संतृप्ति हेतु एक महीने के अभियान के तहत 6.65 लाख खाते खोले गए।
  • विश्व बैंक के ग्लोबल फाइनडेक्स, 2025 के अनुसार, वर्ष 2011 से भारत में खाता स्वामित्व 89% तक पहुँच गया है और सक्रिय खाते रखने वाले वयस्कों की संख्या में भी वृद्धि हुई है।

राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन रणनीति (NSFI) के बारे में 

  • राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन रणनीति (NSFI), RBI द्वारा प्रमुख वित्तीय क्षेत्र नियामकों के सहयोग से तैयार की गई एक रणनीतिक नीतिगत रूपरेखा है।
  • इसका उद्देश्य पूरे भारत में वित्तीय सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करना, वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना और वित्तीय साक्षरता सुनिश्चित करना है।

NSFI का मुख्य विजन वर्ष 2025-30

  • पारिस्थितिकी तंत्र आधारित दृष्टिकोण: यह रणनीति वित्तीय सेवाओं की गुणवत्ता, निरंतरता और अंतिम लक्ष्य तक पहुँच में सुधार के लिए एक सहक्रियात्मक, समग्र पारिस्थितिकी तंत्र मॉडल पर जोर देती है।
  • प्रभावी उपयोग: यह न केवल पहुँच पर, बल्कि परिवारों और सूक्ष्म उद्यमों द्वारा वित्तीय सेवाओं के निरंतर, उत्पादक उपयोग पर भी केंद्रित है।
  • यह रणनीति पाँच प्रमुख लक्ष्यों, जिन्हेंपंच ज्योति’ कहा जाता है, की रूपरेखा प्रस्तुत करती है, जिन्हें वित्तीय समावेशन को मजबूत करने के लिए 47 विशिष्ट कार्य बिंदुओं द्वारा समर्थित किया गया है।

पंच-ज्योति: NSFI वर्ष 2025-30 के पाँच रणनीतिक स्तंभ

  • सस्ती वित्तीय सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुँच
    • यह स्तंभ, परिवारों और सूक्ष्म उद्यमों के लिए अनुकूलित बचत, ऋण, बीमा, पेंशन और भुगतान प्रणालियों तक समान पहुँच पर जोर देता है।
    • गुणवत्ता पर ध्यान: वित्तीय सुरक्षा, जोखिम संरक्षण और दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता।
  • लैंगिक-संवेदनशील और अनुकूलन-केंद्रित समावेशन
    • अनुकूलित उत्पादों, लैंगिक-संवेदनशील पहुँच और लक्षित साक्षरता के माध्यम से महिलाओं के नेतृत्व आधारित समावेशन को प्राथमिकता दी जाती है।
    • यह रणनीति कमजोर समुदायों की वित्तीय सहनशीलता और आघात-सहन क्षमता को बढ़ाकर उनके लचीलेपन को भी मजबूत करती है।
  • आजीविका, कौशल और समावेशन का एकीकरण
    • तीसरा स्तंभ वित्तीय सेवाओं को कौशल विकास और आजीविका कार्यक्रमों से जोड़ता है।
    • इस रणनीति का उद्देश्य उद्यमिता, रोजगार क्षमता और सतत् आय गतिशीलता को बढ़ाना है।
  • व्यवहार परिवर्तन के रूप में वित्तीय शिक्षा
    • यह रणनीति वित्तीय साक्षरता पर केंद्रित है, जो बचत संबंधी अनुशासन, जिम्मेदारी से ऋण का उपयोग, बीमा अपनाने और विवेकपूर्ण वित्तीय नियोजन को बढ़ावा देती है।
    • इसमें पहली बार उपयोगकर्ताओं, युवाओं और सूक्ष्म उद्यमियों के लिए विशेष पहुँच शामिल है।
  • उपभोक्ता संरक्षण और शिकायत निवारण
    • मजबूत शिकायत निवारण तंत्र, डेटा सुरक्षा और पारदर्शी प्रथाओं के माध्यम से ग्राहकों के विश्वास में वृद्धि करना।
    • यह स्तंभ महत्त्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल भुगतान ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में विस्तृत हो रहा है।

वित्तीय समावेशन के लिए सरकारी पहल

  • प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY): यह सुनिश्चित करना कि भारत के प्रत्येक परिवार के पास एक कार्यशील बैंक खाता हो, जिसमें जमा, निकासी, रुपे कार्ड, ओवरड्राफ्ट सुविधाएँ और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी बुनियादी सेवाएँ उपलब्ध हों।
  • JAM ट्रिनिटी (जन धन-आधार-मोबाइल): बैंक खातों, डिजिटल पहचान और मोबाइल तकनीक को एकीकृत करना, जिससे वित्तीय सेवाओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हो और कल्याणकारी योजनाओं में लीकेज कम हो।
  • प्रधान मंत्री मुद्रा योजना (PMMY): यह योजना सूक्ष्म और लघु उद्यमों को बिना किसी जमानत के ऋण प्रदान करती है, जिससे अनौपचारिक क्षेत्र के उद्यमियों को अपने व्यवसाय का विस्तार करने और औपचारिक ऋण प्राप्त करने में मदद मिलती है।
  • प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY): यह योजना सभी बैंक खाताधारकों को कम लागत वाला जीवन बीमा कवरेज प्रदान करती है, जिससे ग्राहक की मृत्यु की स्थिति में परिवारों को वित्तीय सुरक्षा मिलती है।
  • बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट (BC) मॉडल: यह प्रशिक्षित एजेंटों को तैनात करके शाखा रहित बैंकिंग का विस्तार करता है, जो दूरस्थ और बैंकिंग सुविधा से वंचित क्षेत्रों में नकद प्राप्ति, नकद निकासी सेवाएँ, धन प्रेषण और आधार-सक्षम लेन-देन प्रदान करते हैं।

संदर्भ

पिछले एक वर्ष में, भारतीय रुपए (INR) का सभी प्रमुख मुद्राओं की तुलना में अवमूल्यन हुआ है और यह अधिमूल्यांकित से अवमूल्यांकित हो गया है। नवंबर 2024 के अंत से अब तक, रुपये में लगभग 7% की गिरावट आई है, जो ₹83.4 से गिरकर ₹89.2 हो गया है।

  • रिकॉर्ड व्यापार घाटे तथा वैश्विक टैरिफ अवरोध के बीच यह अवमूल्यन निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाता है और सस्ते आयात के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है।

रुपये के अवमूल्यन के बारे में

  • रुपये का अवमूल्यन प्रमुख वैश्विक मुद्राओं, विशेषकर अमेरिकी डॉलर (USD) की तुलना में भारतीय रुपये (INR) के मूल्य में गिरावट को संदर्भित करता है।

प्रमुख आँकड़े

  • व्यापकता-आधारित नाममात्र मूल्यह्रास: पिछले एक वर्ष में, रुपया सभी प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले कमजोर (अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 5.6%, यूरो के मुकाबले 9.4%, पाउंड के मुकाबले 14.3%) हुआ है, जो व्यापक पैमाने पर नाममात्र मूल्यह्रास का संकेत देता है।
  • अधिमूल्यन से अवमूल्यन की ओर परिवर्तन: अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोजोन और जापान की तुलना में भारत में मुद्रास्फीति कम होने के कारण, वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) सूचकांक 108.1 (नवंबर 2024) से गिरकर 97.5 (अक्टूबर 2025) हो गया है, जो कम मूल्यांकन की ओर स्पष्ट कदम है।

REER सूचकांक के बारे में

  • प्रकाशक: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)
  • संदर्भ: REER भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की मुद्राओं के मुकाबले रुपये की विनिमय दर का भारित औसत है, जिसे भारत और उन साझेदार देशों के बीच मुद्रास्फीति के अंतर के लिए समायोजित किया जाता है।
  • उद्देश्य: यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुपये की वास्तविक क्रय शक्ति को मापता है।
  • सूचकांक की व्याख्या: सूचकांक 100 पर आधारित है। 100 से इसका विचलन मुद्रा की रणनीतिक स्थिति को निर्धारित करता है:

REER मूल्य निहितार्थ व्यापार पर प्रभाव
REER > 100 अत्यधिक मूल्यांकित मुद्रा
  • भारतीय सामान वैश्विक स्तर पर अधिक महँगे हैं।
  • निर्यात प्रभावित होता है, आयात बढ़ता है।
REER < 100 कम मूल्यांकित मुद्रा
  • भारतीय सामान विश्व स्तर पर सस्ते हैं।
  • निर्यात बढ़ता है, आयात कम होता है।

  • इसका महत्त्व
    • नीति संकेत: RBI अपनी प्रबंधित लचीली’ नीति को निर्देशित करने के लिए REER का उपयोग करता है। यदि REER बहुत अधिक है, तो RBI संतुलन स्थापित करने के लिए नाममात्र मूल्यह्रास की अनुमति दे सकता है।
    • वर्तमान संदर्भ: रुपये का अधिक-मूल्यांकित REER (लगभग 108) से कम-मूल्यांकित REER (लगभग 97.5) की ओर संक्रमण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि वर्तमान मूल्यह्रास एक रणनीतिक-स्वरूप का समायोजन है, जो वैश्विक बाजारों में भारतीय वस्तुओं एवं सेवाओं को सापेक्ष मूल्य प्रतिस्पर्द्धात्मकता प्रदान करता है।

भारत की प्रबंधित अस्थायी विनिमय दर व्यवस्था 

  • भारत एक प्रबंधित अस्थायी विनिमय दर व्यवस्था (जिसे हस्तक्षेप सहित बाजार-निर्धारित विनिमय दर भी कहा जाता है) का अनुसरण करता है।
    • विनिमय दर सरकार द्वारा तय नहीं की जाती है।
    • यह मुद्रा बाजार में माँग और आपूर्ति के आधार पर तय होती है।
    • हालाँकि, RBI ‘अस्थिरता को नियंत्रित’ करने और रुपये की व्यवस्थित स्थिति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करता है।
    • जब रुपया अत्यधिक तेजी से वृद्धि करता है, तब RBI डॉलर की खरीद के माध्यम से अत्यधिक उतार-चढ़ाव को संतुलित करता है; वहीं जब रुपया तीव्र गिरावट दर्शाता है, तो RBI डॉलर की बिक्री द्वारा विनिमय दर को स्थिरता प्रदान करता है।

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रुपये के अवमूल्यन के कारक

  • बाह्य क्षेत्र का दबाव
    • अमेरिकी डॉलर का सुदृढ़ीकरण: अमेरिकी फेडरल रिजर्व की उच्च ब्याज दरें, मजबूत अमेरिकी श्रम बाजार डेटा तथा सुरक्षित-आश्रय परिसंपत्तियों की ओर रुझान ने अमेरिकी डॉलर की वैश्विक माँग में वृद्धि की है।
      • वर्ष 2018 का उदाहरण – वैश्विक डॉलर की मजबूती, अमेरिकी ब्याज दरों में वृद्धि और व्यापार संघर्ष ने रुपये सहित उभरते बाजार की मुद्राओं को प्रभावित किया।
    • पूँजी बहिर्वाह: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा इक्विटी और ऋण बाजारों से लगातार निकासी के कारण भारतीय रुपये की माँग कमजोर हुई है।
      • नवंबर 2024 और जनवरी 2025 के मध्य, FPI ने भारतीय इक्विटी और ऋण बाजारों से लगभग 38,000 करोड़ रुपये निकाले, क्योंकि वैश्विक निवेशक उच्च फेडरल रिजर्व ब्याज दरों के बीच सुरक्षित अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर स्थानांतरित हो गए।
    • वैश्विक अनिश्चितता: भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति-शृंखला में व्यवधान और जोखिम-विरोधी व्यवहार ने पूँजी के अमेरिकी डॉलर पर आधारित होने  की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया है।
  • घरेलू समष्टि आर्थिक कारक
    • उच्च आयात निर्भरता: कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, रसायनों और सोने पर भारत की निर्भरता ने आयात बिल को बढ़ा दिया है और डॉलर की माँग में वृद्धि की है।
    • चालू खाता घाटा (CAD): लगातार चालू खाता घाटा रुपये पर दबाव डालता है क्योंकि विदेशी मुद्रा की माँग, आपूर्ति से अधिक हो जाती है।
      • अनिश्चित समय में बचाव के लिए अधिक ‘बुलियन’ आयात के कारण चालू खाता घाटा आंशिक रूप से बढ़ रहा है।
    • मुद्रास्फीति अंतर: अमेरिकी मुद्रास्फीति की तुलना में उच्च घरेलू खुदरा मुद्रास्फीति भारतीय रुपये के वास्तविक मूल्य को कम करती है (क्रय शक्ति समता प्रभाव)।
  • व्यापार एवं विकास गतिशीलता
    • कमजोर निर्यात वृद्धि: वस्तु निर्यात में वैश्विक मंदी और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के निर्यात में मंदी के कारण विदेशी मुद्रा आय में कमी आई है।
    • वस्तुओं की बढ़ती कीमतें: कच्चे तेल, धातुओं और खाद्यान्नों की वैश्विक कीमतों में वृद्धि से व्यापार घाटा बढ़ रहा है।
    • बाधित व्यापार वार्ताएँ: प्रमुख मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर चर्चाओं में देरी से निवेशकों की धारणा और निर्यात संभावनाएँ प्रभावित हुई हैं।
    • उच्च अमेरिकी व्यापार शुल्क, भारतीय निर्यातकों पर दबाव डाल रहे हैं, जिससे उन्हें प्रतिस्पर्द्धात्मकता बनाए रखने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
  • नीति एवं बाजार आधारित कारक
    • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) हस्तक्षेप: RBI अस्थिरता को कम करने के लिए हस्तक्षेप करता है, लेकिन वैश्विक डॉलर की मजबूती के दौरान मूल्यह्रास को पूरी तरह से नहीं रोक सकता है।
      • रुपये को स्थिर करने के लिए RBI ने नवंबर 2024 से अब तक लगभग 50 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की है।
      • रुपये में दीर्घकालिक तरलता लाने के लिए RBI ने फरवरी 2025 में 10 अरब डॉलर की डॉलर/रुपया खरीद विनिमय नीलामी आयोजित की।
    • अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) पुनर्वर्गीकरण: IMF द्वारा भारत की विनिमय दर व्यवस्था को क्रॉल’ के समान व्यवस्था में पुनर्वर्गीकृत करने से बाजार में धीरे-धीरे मूल्यह्रास की उम्मीदें प्रबल हुई हैं।
    • उच्च हेजिंग लागत: बढ़ते कमोडिटी बाजार और उच्च मुद्रा-हेजिंग लागत भारतीय रुपये में और कमजोरी की आशंका का संकेत देते हैं।

मूल्यह्रास को नकारात्मक क्यों माना जाता है?

पारंपरिक दृष्टिकोण यह है कि कमजोर रुपया आर्थिक संकट का संकेत देता है, जिसका मुख्य कारण भारत की आयात पर अत्यधिक निर्भरता है।

  • आयात बिल और मुद्रास्फीति में वृद्धि: कमजोर रुपया आयात, विशेष रूप से कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने, को रुपये के संदर्भ में अत्यधिक महँगा बना देता है।
    • इससे सीधे तौर पर चालू खाता घाटा और आयातित मुद्रास्फीति बढ़ती है, जिससे घरेलू बजट पर प्रभाव पड़ता है।
    • रुपये का अवमूल्यन और रूसी कच्चे तेल से महँगे अमेरिकी तेल की ओर रुझान, आयातित मुद्रास्फीति के जोखिम को बढ़ाता है।
  • ऋण चुकौती का भार: जिन भारतीय कंपनियों ने विदेशी मुद्राओं [जैसे- बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECB) या विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉण्ड (FCCB)] में ऋण लिया है, उन पर अधिक बोझ पड़ता है, क्योंकि समान मात्रा में डॉलर ऋण चुकाने के लिए उन्हें अधिक रुपये की आवश्यकता होती है।
  • निवेशकों का विश्वास कम होता है: तीव्र गिरावट विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों में भय उत्पन्न कर सकती है, जिससे पूँजी का बहिर्वाह हो सकता है और एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है, जो आर्थिक कमजोरी और अस्थिरता की धारणा उत्पन्न करता है।
  • अनुपातहीन सामाजिक-आर्थिक बोझ: आवश्यक आयातों (जैसे- कुछ खाद्य तेल, उर्वरक और चिकित्सा उपकरण) की बढ़ी हुई लागत जीवन यापन की लागत को असमान रूप से बढ़ाती है, जिससे निम्न-आय वाले परिवारों पर गंभीर दबाव पड़ता है और असमानता बढ़ती है।
    • इसके अलावा, विदेशी शिक्षा और विशेष चिकित्सा उपचार जैसी विदेशी सेवाओं की लागत में भी अत्यधिक वृद्धि होती है, जिसका प्रभाव मध्यम वर्ग पर पड़ता है।

घरेलू स्तर पर प्रभाव: छात्र, यात्री और मध्यम वर्गीय परिवार; रुपये में गिरावट से सभी को समान रूप से नुकसान नहीं होता है; इसका छात्रों, पर्यटकों और मध्यम आय वाले परिवारों पर असमान रूप से प्रभाव पड़ता है।

  • विदेश में पढ़ने वाले छात्रों पर प्रभाव
    • भारतीय रुपये में उच्च शिक्षण शुल्क: भले ही अमेरिकी डॉलर में फीस अपरिवर्तित रहे, लेकिन कमजोर रुपया छात्रों को प्रत्येक किस्त के लिए भारतीय रुपये में अत्यधिक भुगतान करने के लिए मजबूर करता है।
    • बढ़ते जीवन यापन व्यय: प्रतिकूल विनिमय दरों के कारण किराए, किराने का सामान, परिवहन और उपयोगिताओं की लागत में तेजी से वृद्धि होती है।
    • बजट संबंधी तनाव: मुद्रा में उतार-चढ़ाव परिवारों, विशेष रूप से मध्यम वर्गीय परिवारों, जो दीर्घकालिक बचत पर निर्भर हैं, के लिए वित्तीय नियोजन को बाधित करता है।
    • उधार का अधिक बोझ: शिक्षा ऋण पर निर्भर छात्रों को अधिक धन निकासी का सामना करना पड़ता है, क्योंकि कमजोर भारतीय रुपये के साथ EMI की गणना बढ़ जाती है।
  • यात्रियों पर प्रभाव
    • महँगी अंतरराष्ट्रीय छुट्टियाँ: होटल, भोजन, घरेलू उड़ानें और स्थानीय परिवहन की कीमतों में रुपये के हिसाब से बढोतरी के कारण विदेश यात्राएँ अत्यधिक महँगी हो गई हैं।
    • गंतव्य परिवर्तन: यात्री विनिमय दर के अनुकूल गंतव्यों (जैसे- दक्षिण-पूर्व एशिया) को अधिक पसंद कर रहे हैं, जहाँ रुपये का मूल्य अधिक रहता है।
    • छुट्टियों के बजट पर दबाव: एक यूरोपीय यात्रा, जिसकी लागत कभी प्रति व्यक्ति लगभग ₹2.2 लाख थी, अब ₹2.6 लाख से अधिक हो सकती है, जो दर्शाता है कि मूल्यह्रास यात्रा की सामर्थ्य को कैसे बदल देता है।
  • व्यक्तियों के लिए शमन रणनीतियाँ
    • फॉरेक्स कार्ड का उपयोग करना: जीरो-मार्कअप फॉरेक्स कार्ड के माध्यम से विनिमय दरों को दोहन करने से छात्रों को अप्रत्याशित भारतीय रूपये (INR) मूल्यह्रास से सुरक्षा मिलती है।
    • विदेश में स्थानीय बैंक खाते खोलना: इससे रूपांतरण घाटा कम होता है और छात्रों के लिए दीर्घकालिक बजट नियंत्रण में सुधार करता है।
    • फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स’ के माध्यम से हेजिंग: माता-पिता पहले से ही अनुकूल भारतीय रुपया (INR)-अमेरिकी डॉलर (USD) दर तय करके भविष्य के भुगतानों को ‘हेज’ कर सकते हैं।
    • विवेकाधीन खर्च कम करना: विदेश में छात्र साझा आवास, नियंत्रित खर्च और अंशकालिक कार्य (जहाँ कानूनी रूप से अनुमति हो) के माध्यम से लागत कम कर सकते हैं।
    • स्मार्ट यात्रा योजना: बुकिंग, सामूहिक यात्रा, क्रेडिट कार्ड माइलेज पॉइंट और मौसमी फॉरेक्स समझौते विदेश यात्राओं की लागत को कम करते हैं।
  • ये सूक्ष्म स्तरीय प्रभाव व्यापक आर्थिक लाभों के साथ-साथ मौजूद रहते हैं, जिससे मूल्यह्रास की विधि बहुआयामी हो जाती है और इसके लिए संतुलित नीति संचार की आवश्यकता होती है।

कमजोर रुपया वास्तव में भारत को मजबूत क्यों कर सकता है (मुख्य लाभ)

क्रमिक एवं प्रबंधित मूल्यह्रास एक संरचनात्मक सुधार के रूप में कार्य करता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाता है।

  • निर्यात प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा: मामूली रूप से कम मूल्यांकित रुपया भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को वैश्विक स्तर पर सस्ता बनाता है, जिससे IT-ITES, कपड़ा, फार्मास्यूटिकल्स, पेट्रोलियम उत्पादों में मूल्य प्रतिस्पर्द्धा में सुधार होता है और 41.7 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिलती है।
    • इससे J-वक्र प्रभाव उत्पन्न हो सकता है, जिससे समय के साथ निर्यात मात्रा और रुपया मजबूत हो सकता है।
  • धन प्रेषण मूल्य में वृद्धि: विश्व के सबसे बड़े धन प्रेषण प्राप्तकर्ता (लगभग 125 अरब डॉलर, 2024) के रूप में, कमजोर रुपया अंतर्वाह के भारतीय रुपये के मूल्य को बढ़ाता है, जिससे घरेलू खपत और ग्रामीण आय को बढ़ावा मिलता है तथा विदेशी मुद्रा विनिमय को स्थिर समर्थन मिलता है।
  • पर्यटन और सेवाओं को मजबूती: मूल्यह्रास भारत को विदेशी पर्यटकों और छात्रों के लिए एक अधिक वहनीय गंतव्य बनाता है, जिससे अंतर्देशीय पर्यटन, आतिथ्य, चिकित्सा यात्रा और शिक्षा निर्यात को बढ़ावा मिलता है।
  • पहले के अधिमूल्यन को ठीक करता है: पहले अधिमूल्यित REER के साथ, रुपये में गिरावट मुद्रा को अधिक संतुलन-संरेखित स्तर पर पुनर्स्थापित करती है, जिससे भुगतान संतुलन (BoP) की स्थिरता और दीर्घकालिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार होता है।
  • लागत-प्रभावी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करता है: भारतीय परिसंपत्तियाँ (रियल एस्टेट, विनिर्माण इकाइयाँ) डॉलर के संदर्भ में सस्ती हो जाती हैं, जिससे भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए, विशेष रूप से विनिर्माण और संपत्ति बाजारों में, अधिक आकर्षक हो जाता है।
  • बाहरी व्यापार तनावों को अवशोषित करता है: कमजोर रुपया अमेरिकी राष्ट्रपति के टैरिफ आक्रमण और संभावित चीनी प्रतिक्रिया के विरुद्ध एक आघात अवशोषक के रूप में कार्य करता है, जिससे भारतीय बाजारों में सस्ते, पुनर्निर्देशित चीनी आयातों की बढ़ोतरी आने का खतरा कम हो जाता है।
  • संरक्षणवाद की तुलना में बेहतर: विनिमय दर का लचीलापन, टैरिफ, निर्यात प्रतिबंध या गुणवत्ता नियंत्रण प्रतिबंधों जैसे विकृतकारी उपायों की तुलना में व्यापार असंतुलन को ठीक करने के लिए एक अधिक कुशल, बाजार-अनुकूल उपकरण है।

मूल्यह्रास-आधारित प्रतिस्पर्द्धा का समर्थन करने वाले ऐतिहासिक साक्ष्य

  • वर्ष 1991 का संकट: संकट के बाद हुए तीव्र अवमूल्यन ने 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध में निर्यात में तेजी की नींव रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • वर्ष 2013 का ‘टेपर टैंट्रम’: रुपये में लगभग 20% की गिरावट आई, लेकिन इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2014 और वर्ष 2016 के बीच व्यापारिक निर्यात में 15% से अधिक की वृद्धि हुई।
  • वर्ष 2022-23 का अवमूल्यन: रुपये के कमजोर होने के बावजूद, भारत का समग्र निर्यात मजबूत बना रहा, जिससे भारत को वैश्विक स्तर पर पाँचवाँ सबसे बड़ा निर्यातक (2024) बनने में मदद मिली।

समष्टि आर्थिक समझौते, नीतिगत विकल्प और मूल्यह्रास जोखिम

  • RBI की ‘इंपॉसिबल ट्रिनिटी’ चुनौती: रुपये की स्थिति, ‘इंपॉसिबल ट्रिनिटी’ के रूप में प्रसिद्ध व्यापक आर्थिक बाधा को उजागर करती है, एक देश एक साथ एक निश्चित विनिमय दर, मुक्त पूँजी प्रवाह और एक स्वतंत्र मौद्रिक नीति को बनाए नहीं रख सकता है।
    • जब रुपया दबाव में आता है, तो RBI को इनमें से एक विकल्प चुनना होता है:
      • डॉलर की बिक्री और नकदी की सख्ती के माध्यम से रुपये की रक्षा करना, या
      • विकास को बढ़ावा देने के लिए मौद्रिक नीति की स्वतंत्रता को बनाए रखना।
      • नियत मूल्यह्रास की अनुमति देना एक व्यावहारिक विकल्प है, जो कठोर मुद्रा रक्षा की तुलना में व्यापक आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
  • राजकोषीय अनुशासन क्यों महत्त्वपूर्ण है: कमजोर रुपये का प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ तभी बना रहता है जब सरकार राजकोषीय अनुशासन बनाए रखे।
    • उच्च राजकोषीय घाटा मुद्रास्फीति को बढ़ाता है और वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) को अधिमूल्यन की ओर धकेलता है, जिससे नाममात्र मूल्यह्रास के लाभ समाप्त हो जाते हैं।
  • मूल्यह्रास कब हानिकारक हो जाता है: मूल्यह्रास तभी लाभदायक होता है, जब वह व्यवस्थित हो। यह निम्नलिखित स्थितियों में हानिकारक हो जाता है:
    • अनियंत्रित मुक्त गिरावट: तीव्र, तनाव से प्रेरित गिरावट पूँजी पलायन को बढ़ावा देती है और बाजार के विश्वास को नष्ट कर देती है।
    • कमजोर बुनियादी ढाँचे: कम विदेशी मुद्रा भंडार, उच्च मुद्रास्फीति, या बढ़ता राजकोषीय घाटा, अवमूल्यन को मुद्रा संकट में बदल सकता है।
    • वैश्विक जोखिम-मुक्त संकट: फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में आक्रामक वृद्धि, भू-राजनीतिक तनाव या वैश्विक वित्तीय दबाव, FPI के अचानक बाहर निकलने का कारण बनते हैं।
    • राजनीतिक लोकलुभावनवाद और विकृतियाँ: तीव्र अवमूल्यन सरकारों को अल्पकालिक निर्यात प्रतिबंधों और मूल्य-नियंत्रण उपायों के लिए मजबूर करता है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचता है।
  • RBI का विनिमय दर रुख क्यों बदला है: भारत का दृष्टिकोण लचीलेपन की ओर स्थानांतरित हो गया है, इसका कारण है:
    • RBI का अधिक लचीला दृष्टिकोण: बाजार-संरेखित मूल्यह्रास के प्रति अधिक सहनशीलता, भंडार और विश्वसनीयता को सुरक्षित रखती है।
    • आयातित मुद्रास्फीति का कम जोखिम: वैश्विक कमोडिटी कीमतों और घरेलू मुद्रास्फीति में कमी, कमजोर रुपये के जोखिम को कम करती है।
    • समष्टि आर्थिक वास्तविकता के साथ संरेखण: बढ़ते चालू खाते घाटे (CAD) के लिए ऐसी मुद्रा की आवश्यकता होती है, जो वास्तविक बुनियादी बिंदुओं को प्रतिबिंबित करे।
  • भारत के नए दृष्टिकोण के पीछे संरचनात्मक तर्क: मध्यम रूप से कमजोर रुपये के दीर्घकालिक तर्क में शामिल हैं
    • चालू खाते के घाटे के दबावों का समाधान: प्रतिस्पर्द्धी रुपया भारत के निर्यात-आयात असंतुलन को बेहतर ढंग से दर्शाता है।
    • निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि: थोड़ा कम मूल्यांकित रुपया प्रमुख क्षेत्रों में निरंतर निर्यात वृद्धि को बढ़ावा देता है।
    • विकृत व्यापार उपायों में कमी: एक लचीली विनिमय दर, शुल्कों, आयात प्रतिबंधों और प्रतिबंधात्मक गुणवत्ता-नियंत्रण आदेशों पर अत्यधिक निर्भरता से बचाती है।

PWOnlyIAS विशेष

  • विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) और विदेशी संस्थागत निवेशक (FII): इक्विटी और ऋण बाजारों में अल्पकालिक विदेशी निवेशक; उनके निवेश से रुपया मजबूत होता है और निकासी से रुपया कमजोर होता है।
    • वैश्विक ब्याज दरों, जोखिम धारणा और मुद्रा अपेक्षाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील।
  • चालू खाता घाटा (CAD): यह तब होता है, जब वस्तुओं, सेवाओं और हस्तांतरणों में आयात निर्यात से अधिक हो जाता है।
    • उच्च CAD विदेशी मुद्रा की माँग बढ़ाता है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है।
  • क्रय शक्ति समता (PPP) प्रभाव: इसके अनुसार, विनिमय दरें विभिन्न देशों में समान वस्तुओं की कीमतों को समान करने के लिए समायोजित होती हैं।
    • कम घरेलू मुद्रास्फीति वास्तविक रूप से मुद्रा का कम मूल्यांकन करती है, जिससे प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ती है।
  • IMF की ‘क्रॉल’ के समान व्यवस्था: यह आर्थिक संकटों से बचने और असंतुलन को ठीक करने के लिए छोटे, क्रमिक विनिमय दर समायोजन की अनुमति देने वाली व्यवस्था है। भारत आधिकारिक तौर पर इसका पालन नहीं करता है, लेकिन इसके सुनियोजित रुपया समायोजन माध्यम इसी व्यवहार से मिलते-जुलते हैं।
  • हेजिंग लागत: फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट/फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट के माध्यम से मुद्रा अस्थिरता के विरुद्ध बीमा की लागत।
    • उच्च हेजिंग प्रीमियम, विदेशी निवेश और उधार की लागत बढ़ाते हैं, जिससे विदेशी निवेशकों की भागीदारी कम हो जाती है।
  • J-वक्र प्रभाव: मूल्यह्रास के बाद, व्यापार संतुलन शुरू में बिगड़ता है (आयात महँगा होता है) लेकिन बाद में निर्यात बढ़ने और आयात घटने से इसमें सुधार होता है,  जिससे J-आकार का समायोजन पथ का निर्माण होता  है।
  • बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECB): भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशी ऋणदाताओं से विदेशी मुद्राओं में लिए गए ऋण।
    • ये सस्ते वैश्विक ऋण तक पहुँच प्रदान करते हैं, लेकिन मुद्रा जोखिम बढ़ाते हैं क्योंकि पुनर्भुगतान डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य पर निर्भर करता है।
  • विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बांड (FCCBs): भारतीय कंपनियों द्वारा जारी विदेशी मुद्रा-मूल्य वर्ग वाले बॉण्ड, जिन्हें निवेशक बाद में इक्विटी शेयरों में बदल सकते हैं।
    • ये कम ब्याज दरें प्रदान करते हैं, लेकिन विनिमय दर जोखिम भी उठाते हैं।
  • भुगतान संतुलन (BoP): किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच सभी आर्थिक लेन-देन का एक व्यापक रिकॉर्ड, जिसमें चालू खाता, पूँजी खाता और वित्तीय खाता शामिल हैं।
    • इससे पता चलता है कि देश शुद्ध ऋणदाता है या उधारकर्ता तथा यह समग्र बाह्य क्षेत्र के स्वास्थ्य को दर्शाता है।

आगे की राह

  • RBI द्वारा प्रबंधित लचीली विनिमय दर: उच्च विदेशी मुद्रा भंडार (वर्तमान में 700 अरब डॉलर से अधिक) बनाए रखते हुए, अस्थिरता को कम करने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप की नीति जारी रखना।
  • निर्यात विविधीकरण: उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) जैसी योजनाओं को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाना और वर्ष 2030 तक विश्व निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.8% से बढ़ाकर 3% करने के लक्ष्य के लिए और अधिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) करना।
    • व्यापार नीति सुविचारित होनी चाहिए; जापान, UAE, आसियान के साथ द्विपक्षीय FTA ने व्यापार संतुलन को भारत के विरुद्ध झुका दिया है।
  • आयात पर निर्भरता कम करना: आयात बिल को संरचनात्मक रूप से कम करने के लिए ऊर्जा (नवीकरणीय और हरित हाइड्रोजन) और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिएआत्मनिर्भर भारत’ पर ध्यान केंद्रित करना।
    • भारत की दीर्घकालिक कमजोरी तेल पर उसकी भारी निर्भरता से उत्पन्न हुई है, जिससे परिवहन विद्युतीकरण में तेजी लाना एक तत्काल रणनीतिक प्राथमिकता बन गई है।
  • रुपया व्यापार को बढ़ावा देना: डॉलर की अस्थिरता से व्यापार संतुलन के एक हिस्से को सुरक्षित रखने के लिए रुपया-आधारित व्यापार (जैसे- रूस और संयुक्त अरब अमीरात के साथ) को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना।
  • राजकोषीय-मौद्रिक समन्वय: सरकार द्वारा कठोर राजकोषीय अनुशासन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। राजकोषीय घाटे में वृद्धि से घरेलू स्तर पर अत्यधिक मुद्रास्फीति का खतरा होता है, जो REER को पुनः अधिमूल्यन की ओर बढ़ावा देकर नाममात्र मूल्यह्रास के लाभ को तुरंत विपरीत कर देगा।
  • डिजिटल और वित्तीय सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देना: प्रतिस्पर्द्धी रुपया भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (IT/ITES) क्षेत्र और वैश्विक क्षमता केंद्रों (GCC) की लागत-प्रभावशीलता को बढ़ाता है।
    • यह गिफ्ट सिटी IFSC जैसे वित्तीय केंद्रों की भूमिका को मजबूत करता है, जहाँ डॉलर की कमाई उच्च रुपये के राजस्व में परिवर्तित होती है, जिससे सेवा-आधारित विकास की रणनीति को बल मिलता है।

निष्कर्ष

भारत जैसी विकासशील एवं निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्था के लिए रुपये का क्रमिक और नियंत्रित अवमूल्यन, आघात-प्रेषक के बजाय आघात-अवशोषक की भूमिका निभाता है। वास्तविक चुनौती रुपये के मूल्य में गिरावट नहीं है, बल्कि इस गिरावट से प्राप्त संभावित प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ का उपयोग करने हेतु आवश्यक संरचनात्मक सुधारों की कमी में निहित है। कमजोर रुपया स्वयं में कोई संकट नहीं, बल्कि एक संकेत है; असली संकट भारत के निर्यात क्षेत्र की सीमित प्रतिस्पर्द्धात्मकता है।

अभ्यास प्रश्न 

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए रुपये के दीर्घकालिक अवमूल्यन से जुड़े व्यापक आर्थिक जोखिमों और चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता बनाए रखते हुए इन जोखिमों को कम करने के लिए सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को कौन से नीतिगत उपाय अपनाने चाहिए?

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