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Dec 06 2025

संदर्भ

अंटार्कटिक ओजोन छिद्र वर्ष 2025 में सामान्य अवधि से पहले भर गया, जिससे लगातार दूसरे वर्ष ओजोन छिद्र के संकुचित होने का अनुभव किया गया। इस परिघटना से ओजोन परत में दीर्घकालिक सुधार की संभावनाएँ बढ़ गई हैं।

संबंधित तथ्य 

  • यूरोपीय पृथ्वी अवलोकन एजेंसी कोपरनिकस के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में ओजोन छिद्र पिछले पाँच वर्षों की तुलना में सबसे छोटा रहा, और ओजोन की सांद्रता अधिक बनी रही, जो ओजोन परत में त्वरित सुधार का स्पष्ट संकेत देती है।

ओजोन छिद्र/ओजोन परत का क्षरण क्या है?

  • ओजोन छिद्र पृथ्वी के समताप मंडल में वह क्षेत्र है, जहाँ ओजोन की परत अत्यधिक क्षीण हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप ओजोन अणुओं की सांद्रता काफी कम हो जाती है।
  • मौसमी घटना: ओजोन परत में क्षय की प्रक्रिया मुख्यतः दक्षिणी गोलार्द्ध के वसंत के महीनों (अगस्त से दिसंबर) के दौरान होती है, हालाँकि वैश्विक वायुमंडलीय कारक भी इस प्रक्रिया की तीव्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • अवस्थिति: ओजोन के क्षय के कारण एक ऐसे क्षेत्र का निर्माण होता है, जहाँ ओजोन का सांद्रता स्तर अत्यंत कम (220 डॉबसन इकाई या उससे कम) होता है, जो आमतौर पर अंटार्कटिका के ऊपर दर्ज किया जाता है।
    • सतह से वायुमंडल के शीर्ष तक वायु के एक स्तंभ में ओजोन की मात्रा को डॉबसन यूनिट (DU) में व्यक्त किया जाता है।

ओजोन की परत

  • ओजोन की परत, पृथ्वी की सतह से 15 से 35 किलोमीटर ऊपर समताप मंडल में उच्च ओजोन सांद्रता वाला क्षेत्र है।
  • भूमिका: ओजोन परत एक अदृश्य सुरक्षात्मक ढाल के रूप में कार्य करती है और हमें सूर्य से आने वाले हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों (UV-B और UV-C) से बचाती है तथा पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।

ओजोन परत क्षरण के कारण

  • ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) का उत्सर्जन
    • ओजोन का विनाश मुख्यतः मानव निर्मित रसायनों जैसे क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड, मिथाइल क्लोरोफॉर्म और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) द्वारा होता है।
    • ये पदार्थ समताप मंडल में क्लोरीन और ब्रोमीन परमाणु का उत्सर्जन करते हैं, जो ओजोन अणुओं को विघटित करते हैं।
  •  दीर्घ वायुमंडलीय अवधि: ओजोन-क्षयकारी पदार्थ (ODS) वायुमंडल में दशकों तक स्थायी रहते हैं, और धीमी परिवहन प्रक्रियाओं के माध्यम से ऊपर की ओर संचरित होकर समताप मंडल तक पहुँचते हैं।
  • ध्रुवीय समताप मंडलीय मेघ (Polar Stratospheric Clouds): अंटार्कटिका के ऊपर अत्यधिक ठंडे तापमान के कारण ध्रुवीय समताप मंडलीय मेघ का निर्माण होता है, जो रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए सतह के रूप में कार्य करते हैं। इससे क्लोरीन का उत्सर्जन होता है।
  • ज्वालामुखी विस्फोट: वृहद ज्वालामुखी विस्फोट समताप मंडल में सूक्ष्म कणों  (समताप मंडलीय एरोसोल) का उत्सर्जन करते हैं, जिससे रासायनिक अभिक्रियाओं में वृद्धि होती है, जो ओजोन के विघटन को तीव्र करती हैं।

ओजोन-क्षयकारी पदार्थ (Ozone-Depleting Substances- ODS)

  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC): शीतलन प्रणालियों में उनकी प्रभावशीलता के कारण, CFC का 1980 के दशक तक व्यापक रूप से प्रशीतक (रेफ्रिजरेंट) के रूप में उपयोग किया जाता था। इनका उपयोग प्लास्टिक फोम एवं एयर कंडीशनर के उत्पादन में किया जाता है।
  • हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFC): ये रसायन ओजोन को नष्ट करते हैं, लेकिन CFC की तुलना में कम हानिकारक होते हैं।
  • हाइड्रोब्रोमोफ्लोरोकार्बन (HBFC): इन पदार्थों में ब्रोमीन होता है और ये ओजोन क्षरण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।
  • हैलोन: अग्नि-शमन क्षमता के कारण हैलोन गैसों का उपयोग मुख्य रूप से अग्निशामक यंत्रों में किया जाता था।
  • मेथिल ब्रोमाइड: इस रसायन का उपयोग धूमक (Fumigant) के रूप में जहरीली गैसों के माध्यम से कीट नियंत्रण के लिए किया जाता था।
  • कार्बन टेट्राक्लोराइड: इस यौगिक का उपयोग आमतौर पर अग्निशामक यंत्रों और प्रशीतन प्रणालियों के अतिरिक्त सफाई अभिकर्मक एवं धूमक (Fumigant) के रूप में भी किया जाता था।
  • मिथाइल क्लोरोफॉर्म: यह पदार्थ कार्बनिक यौगिकों के लिए विलायक के रूप में कार्य करता था और धात्विक पुर्जों और सर्किट बोर्डों की सफाई के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था।

ओजोन क्षरण को रोकने के लिए वैश्विक पहल

  • वियना कन्वेंशन (वर्ष 1985): ओजोन परत के संरक्षण हेतु वियना कन्वेंशन वर्ष 1985 में अपनाया गया था, जहाँ संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने ओजोन परत को होने वाले नुकसान को रोकने की आवश्यकता को स्वीकार किया और वैज्ञानिक एवं नीतिगत उपायों पर सहयोग हेतु प्रतिबद्धता व्यक्त की।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (वर्ष 1987): ओजोन-क्षयकारी पदार्थों (ODS) पर नियंत्रण हेतु वर्ष 1987 में 197 पक्षकारों द्वारा स्वीकार किया गया मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक वैश्विक, बाध्यकारी पर्यावरणीय समझौता है, जिसने मुख्यतः क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) को लक्षित करते हुए ODS के उत्पादन और उपभोग पर कड़े नियंत्रण स्थापित किए। इस प्रोटोकॉल ने आगे चलकर हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFC) और हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) जैसे तुलनात्मक रूप से सुरक्षित विकल्पों के विकास तथा प्रसार को महत्त्वपूर्ण बढ़ावा दिया, जिससे वैश्विक ओजोन परत संरक्षण प्रयासों को संस्थागत मजबूत आधार मिला।
  • किगाली संशोधन (वर्ष 2016): मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में किगाली संशोधन, 2016 का उद्देश्य चुनिंदा HFCs को चरणबद्ध तरीके से कम करना है, जिससे उनकी अनुमानित वृद्धि कम हो और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम किया जा सके।

ओजोन परत क्षरण को नियंत्रित करने के लिए भारत के प्रयास

  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ: भारत ने वर्ष 1991 में वियना कन्वेंशन और वर्ष 1992 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए।
  • ओजोन क्षयकारी पदार्थ (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000: भारत ODS नियम, 2000 के माध्यम से सख्त नियंत्रण लागू करता है, जो देश भर में ओजोन क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन, आयात, निर्यात, बिक्री और उपयोग को नियंत्रित करता है।
  • ODS का चरणबद्ध उन्मूलन: भारत ने वर्ष 2010 में क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC), हैलोन, कार्बन टेट्राक्लोराइड और मिथाइल क्लोरोफॉर्म को चरणबद्ध तरीके से पूर्णतः समाप्त कर दिया और वर्ष 2030 तक HCFCs को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की दिशा में अग्रसर है, जो वैश्विक पर्यावरणीय शासन के प्रति भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता दर्शाता है।
  • हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs) चरणबद्ध उन्मूलन प्रबंधन योजना (HPMP): भारत HCFCs को धीरे-धीरे समाप्त करने के लिए कई चरणों में HCFCs चरणबद्ध उन्मूलन प्रबंधन योजना का क्रियान्वयन करता है।
  • किगाली संशोधन: भारत ने उच्च-वैश्विक तापन वाले हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) से न्यायोचित संक्रमण को समर्थन देने के लिए वर्ष 2021 में किगाली संशोधन के अनुसमर्थन को मंजूरी दी।
  • संस्थागत तंत्र: भारत केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अंतर्गत एक समर्पित ओजोन प्रकोष्ठ संचालित करता है, जो ओजोन संरक्षण उपायों को लागू करने के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के साथ सहयोग करता है।

संदर्भ

नीति आयोग के फ्रंटियर टेक हब ने इंटरनेशनल बिजनेस मशीन (IBM) के साथ साझेदारी में, वर्ष 2047 तक भारत को विश्व की शीर्ष तीन क्वांटम अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनाने के लिए एक राष्ट्रीय रोडमैप जारी किया है।

संबंधित तथ्य 

  • क्वांटम प्रौद्योगिकियाँ वर्तमान समय की सबसे परिवर्तनकारी शक्तियों में से एक बनने के लिए तैयार है।
  • प्रभाव: इनका प्रभाव सभी क्षेत्रों पर पड़ेगा और स्वास्थ्य सेवा, वित्त, रसद, सामग्री, ऊर्जा और राष्ट्रीय सुरक्षा को पुनर्परिभाषित करेगा।
  • महत्त्व: जो राष्ट्र आज निर्णायक रूप से कार्य करेंगे, वे न केवल अगली पीढ़ी की कंप्यूटिंग, संचार और संवेदन क्षमताओं पर नियंत्रण रखेंगे, बल्कि वैश्विक नवाचार और विश्वास की संरचना को भी आकार देंगे।

रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ

  • वर्ष 2035 तक भारत के लिए एक अग्रणी क्वांटम अर्थव्यवस्था बनने का विजन: भारत का लक्ष्य कंप्यूटिंग, संचार, संवेदन और सामग्रियों में मजबूत क्षमताओं के साथ विश्व की अग्रणी क्वांटम-संचालित अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में उभरना है।
  • वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी क्वांटम उद्योग का विकास: इस रोडमैप का लक्ष्य कम-से-कम 10 वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी भारतीय क्वांटम स्टार्ट-अप्स का निर्माण करना है।
  • क्वांटम सॉफ्टवेयर और सेवाओं में नेतृत्व: भारत वैश्विक क्वांटम सॉफ्टवेयर, एल्गोरिथम विकास और क्लाउड-आधारित क्वांटम सेवा बाजार पर अपना दबदबा बनाना चाहता है।
  • क्लियर टू स्टेप माइलस्टोन स्कीम (वर्ष 2025- 2030 और वर्ष 2030- 2035): यह रोडमैप क्षमता निर्माण, परीक्षण-स्थल, PQC पायलट, उद्योग अपनाने, निर्यात की तैयारी और वैश्विक नेतृत्व के लिए क्रमिक लक्ष्य प्रदान करता है।
  • आत्मनिर्भर क्वांटम आपूर्ति शृंखला का निर्माण: यह मिशन क्वांटम हार्डवेयर, प्रोसेसर, सामग्री, क्रायोजेनिक्स, निर्माण और संपूर्ण सॉफ्टवेयर स्टैक को शामिल करते हुए एक मजबूत घरेलू पारिस्थितिकी-तंत्र के निर्माण की रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
  • रणनीतिक और राष्ट्रीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर तैनाती: क्वांटम प्रौद्योगिकियों को वर्ष 2035 तक रक्षा, खुफिया, स्वास्थ्य सेवा, वित्त, रसद, सामग्री, जलवायु और ऊर्जा प्रणालियों में परिचालन में लाने की परिकल्पना की गई है।
  • तेज कार्यबल विस्तार और प्रतिभा विकास: पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को समर्थन देने के लिए क्वांटम-कुशल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और पेशेवरों की संख्या में भारी वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है।
  • मानकों, विनियमन, वैश्विक साझेदारियों और PQC तैनाती पर ध्यान: भारत का लक्ष्य वैश्विक क्वांटम मानकों का नेतृत्व करना, क्वांटम कूटनीति को मजबूत करना और राष्ट्रीय प्रणालियों को क्वांटम-लचीली क्रिप्टोग्राफी में परिवर्तित करना है।

क्वांटम कंप्यूटिंग की वर्तमान स्थिति 

  • NISQ युग: क्वांटम कंप्यूटिंग अभी भी अपने प्रारंभिक चरण में है, जिसे अक्सर NISQ (नॉइजी इंटरमीडिएट-स्केल क्वांटम) युग कहा जाता है।
  • क्वांटम कंप्यूटिंग में प्रगति: वर्तमान क्वांटम कंप्यूटरों में सीमित क्यूबिट (आमतौर पर 50-100) होते हैं और इनमें त्रुटियाँ होने की संभावना अधिक होती है।
  • क्वांटम वर्चस्व: वर्ष 2019 में, गूगल ने क्वांटम सुप्रीमेसी (Quantum Supremacy) प्राप्त करने का दावा किया, जिसमें उसने केवल 200 सेकंड में ऐसी गणना पूरी की, जिसे पारंपरिक सुपरकंप्यूटर को पूरा करने में 10,000 वर्ष लगते है।
  • माइक्रोसॉफ्ट की मेजराना 1 क्वांटम चिप
    • लचीले क्यूबिट: अधिक स्थिरता के लिए एक नए दृष्टिकोण का उपयोग करता है।
    • बेहतर मापनीयता: मौजूदा क्वांटम प्लेटफॉर्म की तुलना में उन्नत।
    • कम त्रुटि दर: त्रुटि सुधार को बढ़ाता है और दोषों को कम करता है।
  • गूगल की विलो चिप: विलो कई भौतिक क्यूबिट्स को एक साथ काम करके क्वांटम सूचना की एक इकाई को संगृहीत करने में सक्षम बनाता है, जिससे एक अंतर्निहित स्व-जाँच तंत्र बनता है, जो वास्तविक समय में त्रुटियों का पता लगाता है और उन्हें ठीक करता है। 

क्वांटम टेक्नोलॉजीज के बारे में

  • ये उन्नत प्रौद्योगिकियाँ हैं, जो सुपरपोजिशन, एन्टेंगलमेंट, टनलिंग और क्वांटाइजेशन जैसे क्वांटम यांत्रिक सिद्धांतों का उपयोग करके ऐसी क्षमताएँ प्राप्त करती हैं, जो शास्त्रीय प्रणालियाँ नहीं कर सकतीं।
    • ये कणों (परमाणु, फोटॉन, इलेक्ट्रॉन) की क्वांटम अवस्थाओं का उपयोग करके कार्य करती हैं, जिससे घातीय कंप्यूटेशनल गति, अति-सुरक्षित संचार और उच्च-परिशुद्धता संवेदन संभव होता है।

क्वांटम यांत्रिकी के प्रमुख सिद्धांत

  • अध्यारोपण: क्वांटम कंप्यूटिंग में, एक क्यूबिट 0 और 1 दोनों के अध्यारोपण में एक साथ मौजूद हो सकता है।
    • इसका अर्थ है कि एक क्यूबिट एक साथ कई अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व कर सकता है, जिससे क्वांटम कंप्यूटर समानांतर रूप से बड़ी मात्रा में सूचना संसाधित कर सकते हैं।

  • उलझाव: उलझाव एक ऐसी घटना है, जहाँ दो या दो से अधिक क्यूबिट आपस में इस प्रकार जुड़ जाते हैं कि एक क्यूबिट की अवस्था दूसरे क्यूबिट की अवस्था से सीधे संबंधित होती है, चाहे वे कितनी भी दूर क्यों न हों।
  • क्वांटम इंटरफेरेंस: क्वांटम कंप्यूटर सही समाधानों को बढ़ावा देने और गलत समाधानों को रद्द करने के लिए इंटरफेरेंस का उपयोग करते हैं। क्यूबिट्स में सूक्ष्म और नियंत्रित हेरफेर के माध्यम से, क्वांटम एल्गोरिदम सिस्टम को सबसे संभावित सही उत्तर की ओर निर्देशित कर सकते हैं।

क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD) के बारे में  

  • QKD एक सुरक्षित संचार पद्धति है, जो क्वांटम यांत्रिकी के घटकों से युक्त एक क्रिप्टोग्राफ़िक प्रोटोकॉल को क्रियान्वित करती है।
    • यह दो पक्षों को एक साझा यादृच्छिक गुप्त कुँजी बनाने में सक्षम बनाती है, जो केवल उन्हें ही ज्ञात होती है, जिसका उपयोग संदेशों को एन्क्रिप्ट और डिक्रिप्ट करने के लिए किया जा सकता है।

क्वांटम प्रौद्योगिकियों के चार वेक्टर

  • क्वांटम कंप्यूटिंग: सिमुलेशन, ऑप्टिमाइजेशन, मशीन लर्निंग और पारंपरिक क्रिप्टोग्राफी को तोड़ने जैसे कुछ कार्यों के लिए गणनाओं को तेजी से करने के लिए क्यूबिट का उपयोग करता है।
    • इस दशक के भीतर डोमेन-विशिष्ट क्वांटम लाभ प्राप्त करने की उम्मीद है।
  • क्वांटम संचार: हैक न किए जा सकने वाले संचार नेटवर्क को सक्षम करने के लिए क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD), एंटेंगलमेंट और क्वांटम पुनरावर्तकों का उपयोग करता है।
  • क्वांटम संवेदन एवं माप विज्ञान: शास्त्रीय सीमाओं से कहीं आगे, अति-संवेदनशील मापन करने के लिए क्वांटम अवस्थाओं का उपयोग करता है।
    • रक्षा, नेविगेशन और अंतरिक्ष के लिए परमाणु घड़ियों, मैग्नेटोमीटर, ग्रेविमीटर, जड़त्वीय सेंसरों को सक्षम बनाता है।
  • क्वांटम पदार्थ: अतिचालकता, टोपोलॉजिकल प्रावस्थाओं और स्पिन प्रणालियों जैसे क्वांटम यांत्रिक गुणों का दोहन करने के लिए अभिकल्पित पदार्थ।
    • क्वांटम प्रोसेसर, फोटोनिक प्रणालियों और उन्नत सेंसरों के लिए आधार।

क्वांटम प्रौद्योगिकियों का रणनीतिक महत्त्व 

  • आर्थिक प्रभाव: वित्त, रसद, ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा और सामग्री क्षेत्र में वर्ष 2035 तक वैश्विक स्तर पर 1-2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश की उम्मीद है।
  • उच्च-मूल्य वाली नौकरियों का सृजन: क्वांटम प्रौद्योगिकियों के लिए विनिर्माण और एल्गोरिथम दोनों क्षेत्रों में अत्यधिक विशिष्ट कौशल की आवश्यकता होती है।
    • इस क्षेत्र में प्रगति अनुसंधान, विनिर्माण और सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में नई भूमिकाएँ उत्पन्न करेगी, जिसके परिणामस्वरूप उच्च-मूल्य वाली, भविष्य-अनुकूल नौकरियों का सृजन होगा, जो भारत के आर्थिक उत्थान के लिए आवश्यक हैं।
  • सेवा निर्यात के अवसर: जैसे-जैसे आने वाले दशक में वैश्विक क्वांटम अर्थव्यवस्था का तेजी से विस्तार होगा, क्वांटम सॉफ्टवेयर और क्वांटम-सक्षम आईटी सेवाओं की माँग बढ़ेगी।
    • भारत, अपनी मजबूत आईटी सेवाओं और सॉफ्टवेयर क्षेत्र के साथ, वैश्विक क्वांटम सेवा बाजार में एक बड़ा हिस्सा हासिल करने के लिए अद्वितीय रूप से योग्य है।
  • विभिन्न उद्योगों में नए अनुप्रयोग
    • स्वास्थ्य सेवा और जीवन विज्ञान: क्वांटम सेंसिंग और कंप्यूटिंग का संयोजन चिकित्सा निदान, औषधि खोज, जीनोमिक्स और व्यक्तिगत चिकित्सा में क्रांति ला सकता है।
      • नवाचार का लोकतंत्रीकरण: क्वांटम क्लाउड और किफायती प्रणालियाँ ग्रामीण क्षेत्रों को भी सटीक चिकित्सा और उन्नत कंप्यूटिंग तक पहुँच प्रदान करेंगी।
    • रसद और आपूर्ति शृंखलाएँ: क्वांटम अनुकूलन जटिल रसद को सुव्यवस्थित कर सकता है, जिससे लागत बचत और दक्षता में सुधार हो सकता है।
    • फिनटेक: बढ़ी हुई सुरक्षा और कंप्यूटेशनल शक्ति वित्तीय मॉडलिंग, धोखाधड़ी का पता लगाने और डेटा एन्क्रिप्शन में नवाचार को बढ़ावा दे सकती है।
    • रसायन, पेट्रोलियम और खनन: क्वांटम समाधान बेहतर संसाधन अन्वेषण, सामग्री खोज और प्रक्रिया अनुकूलन को सक्षम बनाते हैं।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा अनिवार्यताएँ: क्वांटम कंप्यूटर RSA एन्क्रिप्शन को तोड़ सकते हैं; सुरक्षित रक्षा नेटवर्क के लिए क्वांटम संचार आवश्यक हो जाता है।
    • RSA: यह एक असममित एन्क्रिप्शन एल्गोरिथम है, जो एन्क्रिप्शन के लिए एक सार्वजनिक कुंजी और डिक्रिप्शन के लिए एक निजी कुंजी का उपयोग करता है, जिससे यह इंटरनेट पर सुरक्षित डेटा ट्रांसमिशन और डिजिटल हस्ताक्षरों के लिए उपयोगी हो जाता है।
  • वैज्ञानिक एवं औद्योगिक उपलब्धियाँ: अणुओं, पदार्थों, मौसम और जैविक प्रणालियों का अभूतपूर्व परिशुद्धता के साथ अनुकरण संभव बनाता है।
  • प्रौद्योगिकी संप्रभुता और डिजिटल सुरक्षा: शास्त्रीय क्रिप्टोग्राफी के अप्रचलित होने के साथ ही क्वांटम-सुरक्षित अवसंरचना महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
  • जलवायु, कृषि और ऊर्जा नवाचार: क्वांटम मॉडल वर्षा पूर्वानुमान, CO₂ कैप्चर मॉडलिंग और बैटरी सामग्री विकास में सुधार करते हैं।
    • क्वांटम में बेजोड़ परिशुद्धता के साथ प्रकृति का अनुकरण करने की क्षमता है, जिससे पर्यावरणीय सफलताएँ संभव होती हैं।

क्वांटम प्रौद्योगिकियों में भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र की विशेषताएँ

  • मजबूत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): भारत परिपक्व DPI का उपयोग करके राष्ट्रीय स्तर पर क्वांटम समाधानों को तेजी से लागू कर सकता है।
    • DPI ग्रामीण परिवेश में भी क्वांटम-सक्षम सटीक स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की अनुमति देता है।
  • विशाल और स्केलेबल STEM प्रतिभा आधार: भारत का इंजीनियरिंग पारिस्थितिकी तंत्र क्वांटम कौशल विकास के लिए एक व्यापक आधार प्रदान करता है।
  • सॉफ्टवेयर, एल्गोरिदम और क्लाउड इंजीनियरिंग में नेतृत्व: भारत क्वांटम सॉफ्टवेयर में प्रभुत्व स्थापित कर सकता है, जहाँ निकट भविष्य में वैश्विक मूल्य सबसे अधिक है।
    • नीति आयोग की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि सॉफ्टवेयर और सेवाएँ भारत का मुख्य क्वांटम लाभ होंगी।
  • NQM के माध्यम से सरकार की मिशन-मोड प्रतिबद्धता: दीर्घकालिक वित्तपोषण, संस्थागत संरेखण और राष्ट्रीय लक्ष्य विकास को गति प्रदान करते हैं।
    • NQM समन्वित राष्ट्रीय कार्य प्राथमिकताओं के साथ वर्ष 2035 के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण स्थापित करता है।

क्वांटम अर्थव्यवस्था के लिए प्रमुख मील के पत्थर

  • राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM) का शुभारंभ – 2023: भारत ने स्वदेशी क्वांटम कंप्यूटिंग, संचार, संवेदन और सामग्री क्षमताओं के निर्माण के लिए एक मिशन-मोड राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया।
    • NQM ने वर्ष 2030-31 तक ₹6,003.65 करोड़ आवंटित किए, जो क्वांटम अनुसंधान एवं विकास के लिए पहली समन्वित राष्ट्रीय रणनीति का संकेत है।
  • वैश्विक क्वांटम निवेश सालाना 10 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक: क्वांटम, परमाणु, अंतरिक्ष और एआई क्रांतियों की तरह, एक निर्णायक प्रौद्योगिकी दौड़ बन गया है।
    • रोडमैप में राज्य-नेतृत्व वाली और निजी क्वांटम फंडिंग में वैश्विक उछाल का उल्लेख है, जो भारत के लिए रणनीतिक तात्कालिकता को बढ़ाता है।
  • भारत और प्रमुख शक्तियों में QKD प्रदर्शन: भारत ने लंबी दूरी की क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन क्षमता का प्रदर्शन किया, जो तकनीकी तत्परता का एक प्रारंभिक प्रमाण है।
    • भारत में सफल QKD प्रयोग इसे परिचालन प्रोटोटाइप वाले एक छोटे समूह – अमेरिका, चीन में शामिल करते हैं।
  • इस दशक में क्वांटम लाभ की उम्मीद: कुछ अनुकूलन, क्रिप्टोग्राफी और रसायन विज्ञान संबंधी समस्याएँ क्वांटम मशीनों पर पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में तीव्र हो जाएँगी।
    • रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि वर्ष 2030 से पहले डोमेन-विशिष्ट क्वांटम लाभ संभव है।
  • वर्ष 2035 तक 1-2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मूल्य सृजन क्षमता: क्वांटम को सभी उद्योगों में आर्थिक विकास का एक प्रमुख इंजन माना जा रहा है।

क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में भारत की प्रमुख पहल

  • राष्ट्रीय क्वांटम मिशन (NQM): इस मिशन का उद्देश्य क्वांटम-संबंधी विज्ञान और प्रौद्योगिकी में देश की क्षमताओं को बढ़ाना है।
    • यह चार प्रमुख क्षेत्रों, अर्थात् क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम संचार, क्वांटम सेंसिंग एवं मेट्रोलॉजी, और क्वांटम सामग्री एवं उपकरणों पर केंद्रित है।
    • इस मिशन का परिव्यय 6,003 करोड़ रुपये है, जिसका उपयोग आठ वर्षों (वर्ष 2023- वर्ष 2031) के लिए वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाएगा।
    • इसमें चार क्षेत्रों को समर्पित चार विषयगत केंद्रों (टी-हब) की स्थापना शामिल है।
  • QSim: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा भारत का पहला क्वांटम कंप्यूटर सिंयुलेटर (QSim) टूलकिट लॉन्च किया गया।
    • यह स्वदेशी टूलकिट क्वांटम कंप्यूटिंग के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए एक महत्त्वपूर्ण शैक्षिक और शोध उपकरण के रूप में काम करेगा।
  • क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD) प्रदर्शन: स्टार्ट-अप QNu लैब्स ने मौजूदा ऑप्टिकल फाइबर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारत के पहले 500 किलोमीटर क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन (QKD) नेटवर्क का प्रदर्शन किया।
    • यह भारत की क्वांटम क्षमताओं को मजबूत करता है और क्वांटम-सुरक्षित संचार तथा साइबर सुरक्षा को आगे बढ़ाता है।
  • भारत में क्वांटम स्टार्ट-अप: QpiAI, BosonQ Psi और TCS क्वांटम कंप्यूटिंग लैब जैसे भारतीय स्टार्ट-अप क्वांटम नवाचार में अग्रणी हैं तथा अनुसंधान और उद्योग अनुप्रयोगों को आगे बढ़ा रहे हैं।

क्वांटम प्रौद्योगिकियों के जोखिम

  • क्रिप्टोग्राफिक पतन (‘Q-डे’): क्वांटम कंप्यूटर वर्तमान सार्वजनिक-कुँजी एन्क्रिप्शन मानकों जैसे RSA और एलिप्टिक कर्व क्रिप्टोग्राफी (ECC) के गणितीय आधार को विखंडित कर सकेंगे, जिससे वैश्विक साइबर सुरक्षा ध्वस्त हो जाएगी।
    • रोडमैप में चेतावनी दी गई है कि अधिकांश डिजिटल संचार क्वांटम डिक्रिप्शन के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
  • सामरिक सैन्य संतुलन में व्यवधान: क्वांटम सेंसर स्टील्थ विमानों, पनडुब्बियों और एन्क्रिप्टेड संचार का पता लगा सकते हैं, जिससे निवारक मॉडल में बदलाव आ सकता है।
  • महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की भेद्यता: यदि समय रहते क्वांटम-सुरक्षित प्रोटोकॉल में अपग्रेड नहीं किया गया, तो क्वांटम हमले पॉवर ग्रिड, संचार नेटवर्क, उपग्रहों और राष्ट्रीय डिजिटल प्रणालियों को खतरे में डाल सकते हैं।
  • बैंकिंग और वित्तीय प्रणालियों का पतन: क्वांटम हमले वित्तीय रिकॉर्ड को डिक्रिप्ट कर सकते हैं, एन्क्रिप्टेड लेन-देन चुरा सकते हैं, ब्लॉकचेन प्रणालियों में हेर-फेर कर सकते हैं और वैश्विक भुगतान प्रणालियों को खतरे में डाल सकते हैं तथा यदि क्वांटम-सुरक्षित प्रोटोकॉल नहीं अपनाए जाते हैं, तो संभावित रूप से प्रणालीगत बैंकिंग विफलताओं को ट्रिगर कर सकते हैं।
  • साइबर जासूसी और खुफिया खतरों में तेजी: ‘अभी संग्रहित करें, बाद में डिक्रिप्ट करें’ हमले विरोधियों को एन्क्रिप्टेड डेटा को आज ही इंटरसेप्ट करने और क्वांटम क्षमता विकसित होने पर उसे डिक्रिप्ट करने की अनुमति देते हैं।

क्वांटम प्रौद्योगिकियों में भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौतियाँ

  • क्वांटम कंप्यूटिंग क्षमताओं में महत्त्वपूर्ण अंतराल: भारत क्वांटम हार्डवेयर, सिस्टम एकीकरण, नियंत्रण इलेक्ट्रॉनिक्स और संपूर्ण सॉफ्टवेयर स्टैक में बड़ी कमियों का सामना कर रहा है, जिससे संपूर्ण तकनीकी परिपक्वता सीमित हो रही है।
  • महत्त्वपूर्ण घटकों के लिए भारी आयात निर्भरता: क्रायोजेनिक प्रणालियाँ, सटीक प्रकाशिकी, अतिचालक सामग्री और निर्माण-स्तरीय उपकरण जैसे क्वांटम बाह्य उपकरणों का बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है, जिससे रणनीतिक भेद्यता पैदा होती है।
  • मूलभूत विज्ञान में कम निवेश और कमजोर अनुसंधान उत्पादन: सकल घरेलू उत्पाद के केवल 0.65% पर अनुसंधान एवं विकास व्यय के साथ, भारत की मूलभूत विज्ञान क्षमता सीमित बनी हुई है, जो निम्न-गुणवत्ता वाले अनुसंधान उत्पादन और वैश्विक बौद्धिक संपदा हिस्सेदारी में परिलक्षित होती है, जो भारत को शीर्ष 10 योगदानकर्ताओं में शामिल नहीं करती है।
  • कमजोर बौद्धिक संपदा प्रशासन और व्यावसायीकरण मार्ग: खंडित बौद्धिक संपदा स्वामित्व, धीमी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्रक्रियाएँ और कमजोर व्यावसायीकरण प्रथाएँ नवाचार को बाजार में अनुवाद करने में बाधा डालती हैं।
  • आपूर्ति शृंखला निर्भरता और रणनीतिक भेद्यता: क्रायोजेनिक्स, क्यूबिट सामग्री और सटीक निर्माण, जिन पर वर्तमान में कुछ ही देशों का प्रभुत्व है, निर्भरता का जोखिम उठाते हैं।
    • उदाहरण के लिए: क्वांटम में चीन का निवेश और सामग्रियों में प्रभुत्व।
  • क्वांटम-सक्षम विषयों में कौशल का तीव्र अंतर: क्रायोजेनिक्स, फोटोनिक्स, माइक्रोवेव इंजीनियरिंग, क्वांटम नियंत्रण और तकनीकी-व्यावसायिक प्रतिभाओं की कमी बनी हुई है, जो गहन-तकनीकी उद्यमों को बढ़ाने के लिए आवश्यक हैं।
  • प्रयोगशाला से बाजार तक धीमा संक्रमण: कमजोर परीक्षण केंद्र, खरीद में देरी और बौद्धिक संपदा संबंधी अड़चनें व्यावसायीकरण को धीमा कर देती हैं।
    • क्वांटम-तैयार कार्यबल की कमी: हालाँकि स्नातकों की संख्या अधिक है, लेकिन कार्यबल में अंतःविषयक विस्तार अपर्याप्त है और विशेष इंजीनियरिंग कौशल में जनशक्ति की कमी है, जो प्रयोगशाला से उत्पाद तथा बाजार को जोड़ने में मदद कर सकती है।

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिकी क्वांटम पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत सरकारी वित्तपोषण और एक फलते-फूलते निजी क्षेत्र (गूगल, IBM, साइक्वांटम) द्वारा संचालित है।
    • अमेरिका की राष्ट्रीय क्वांटम रणनीति के तीन घटक हैं: विज्ञान को सही दिशा में ले जाना, प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाना और लोगों को सक्षम बनाना।
    • क्वांटम आर्थिक विकास संघ (QED-C): QED-C एक उद्योग-प्रधान संघ है, जिसकी स्थापना संयुक्त राज्य अमेरिका में क्वांटम उद्योग को सक्षम और विकसित करने के लिए की गई थी।
      • वर्ष 2018 के राष्ट्रीय क्वांटम पहल अधिनियम के तहत संघीय रणनीति के एक भाग के रूप में NIST के सहयोग से इसकी स्थापना की गई थी।
  • चीन: चीन क्वांटम अनुसंधान में भारी निवेश के साथ एक राज्य-संचालित मॉडल का अनुसरण करता है।
    • चीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (USTC) और झेजियांग विश्वविद्यालय जैसे अग्रणी संस्थान बड़ी सफलताएँ प्राप्त कर रहे हैं।
    • पेकिंग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक ऑप्टिकल चिप पर बड़े पैमाने पर क्वांटम एंटेंगलमेंट प्राप्त किया है, जिससे वैश्विक क्वांटम दौड़ और तेज हो गई है।
  • यूरोप: यूरोपीय संघ क्वांटम फ्लैगशिप और जर्मनी, फ्राँस, बेल्जियम और स्विट्जरलैंड के राष्ट्रीय कार्यक्रम क्षेत्रीय क्वांटम प्रगति को गति प्रदान करते हैं।
  • अन्य प्रमुख हितधारक: लक्षित निवेश
    • कनाडा: क्वांटम सॉफ्टवेयर में विशेषज्ञता।
    • जापान: विशिष्ट क्वांटम हार्डवेयर पर ध्यान केंद्रित करता है।
    • ऑस्ट्रेलिया: क्वांटम सेंसर में अग्रणी।

रणनीतिक सिफारिशें

  • क्वांटम कार्यबल का विस्तार करना: PhD ट्रैक, क्वांटम इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम, प्रशिक्षुता कार्यक्रम और वैश्विक संकाय साझेदारियाँ विकसित करना।
    • वर्ष 2035 के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कार्यबल को 2-3 वर्षों के भीतर दस गुना बढ़ाना होगा।
  • उद्योग की सहभागिता और निवेश बढ़ाना: कंपनियों को आकर्षित करने के लिए कर क्रेडिट, सार्वजनिक खरीद पाइपलाइन और सह-निवेश निधि प्रदान करना।
  • प्रयोगशाला से बाजार में परिवर्तन में तेजी लाना: राष्ट्रीय क्वांटम परीक्षण केंद्र, सैंडबॉक्स, सत्यापन केंद्र स्थापित करना और खरीद मानदंडों में तेजी लाना।
    • अनुसंधान और सत्यापन की सुगमता में सुधार एक महत्त्वपूर्ण निकट-अवधि की सिफारिश है।
  • मौलिक विज्ञान एवं जोखिम उठाने की क्षमता बढ़ाना: दीर्घकालिक क्वांटम भौतिकी, पदार्थ विज्ञान और प्रायोगिक प्लेटफॉर्म को वित्तपोषित करना।
    • रोडमैप इस बात पर जोर देता है कि भारत को अग्रणी वैज्ञानिक अनुसंधान की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में वृद्धि करनी चाहिए।
  • स्टार्ट-अप डोमिसाइल के लिए भारत को अधिक आकर्षक बनाना: नियमों को आसान बनाना, घरेलू डीप-टेक फंड बनाना, हार्डवेयर और बुनियादी ढाँचे तक पहुँच सुनिश्चित करना।
    • लक्ष्य: 90% से अधिक भारतीय क्वांटम स्टार्ट-अप भारत में स्थित रहें।
  • वैश्विक मानकों और प्रोटोकॉल विकास का नेतृत्व करना: क्वांटम हार्डवेयर, संचार और क्रिप्टोग्राफी मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रूप से आकार देना।
    • यह सुनिश्चित करना कि भारतीय उत्पादों को वैश्विक पहुँच में कोई बाधा न आए।
  • क्वांटम व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना: क्रायोजेनिक्स, सेमीकंडक्टर, वैक्यूम सिस्टम और फोटोनिक्स के लिए वैश्विक साझेदारी सुनिश्चित करना।
    • रोडमैप क्वांटम-संबंधित आयात/निर्यात प्रवाह को सुचारू बनाने की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।

वर्ष 2035 में भारत की क्वांटम अर्थव्यवस्था के लिए विजन

  • कम-से-कम 10 वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी क्वांटम स्टार्ट-अप्स को इनक्यूबेट करना, जिनमें से प्रत्येक का राजस्व 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो।
  • अपनी सॉफ्टवेयर और इंजीनियरिंग क्षमता का उपयोग करके वैश्विक क्वांटम सॉफ्टवेयर और सेवा बाजार में 50% से अधिक मूल्य प्राप्त करना।
  • भारत भर के रणनीतिक क्षेत्रों में क्वांटम प्रौद्योगिकियों (घरेलू और वैश्विक) का सार्थक और व्यापक उपयोग।
  • हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों के लिए वैश्विक क्वांटम आपूर्ति शृंखला में महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन होना, रणनीतिक निर्भरता और मूल्य का सृजन करना।
  • क्वांटम विज्ञान और इंजीनियरिंग में विश्वस्तरीय अनुसंधान और बौद्धिक संपदा सृजन के माध्यम से आधारभूत वैज्ञानिक सफलताओं का प्रमुख स्रोत बनना।

निष्कर्ष

क्वांटम प्रौद्योगिकियाँ भारत को आधारभूत प्रौद्योगिकीय क्रांति का नेतृत्व करने का एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान करती हैं, जहाँ क्रियान्वयन की गति राष्ट्रीय रणनीतिक लाभ का निर्धारण करेगी।

अभ्यास प्रश्न 

एक मजबूत क्वांटम पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने में भारत के सामने आने वाले अवसरों एवं चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। हाल ही में जारी राष्ट्रीय रोडमैप इन चुनौतियों से निपटने में कैसे मदद कर सकता है?

FIDE रेटिंग

भारत के तीन वर्ष सात माह  के सर्वज्ञ सिंह कुशवाहा आधिकारिक FIDE रेटिंग प्राप्त करने वाले अब तक के सबसे कम आयु के शतरंज खिलाड़ी बन गए हैं।

अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) के बारे में

  • अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) प्रतिस्पर्द्धी शतरंज के लिए वैश्विक नियामक प्राधिकरण है और सभी अंतरराष्ट्रीय शतरंज नियमों, टूर्नामेंटों और मानकों का प्रबंधन करता है।
  • मुख्यालय: लॉजेन, स्विट्जरलैंड।
  • भूमिका: FIDE विश्व शतरंज रैंकिंग का प्रबंधन करता है, प्रमुख चैंपियनशिप आयोजित करता है, अंतरराष्ट्रीय खिताब प्रदान करता है, और ओवर-द-बोर्ड, ऑनलाइन और रैपिड शतरंज प्रारूपों को नियंत्रित करने वाले नियम तैयार करता है।

FIDE रेटिंग प्रणाली

  • FIDE रेटिंग किसी खिलाड़ी की प्रतिस्पर्द्धी क्षमता की एक संख्यात्मक माप है, जिसे FIDE-रेटेड टूर्नामेंटों में प्रदर्शन के आधार पर मासिक रूप से अपडेट किया जाता है।
  • रेटिंग प्राप्त करने की प्रक्रिया: खिलाड़ियों को प्रारंभिक रेटिंग पाने के लिए महासंघ द्वारा अनुमोदित FIDE-रेटेड आयोजनों में भाग लेना आवश्यक है और उन्हें कम-से-कम पाँच मैच पूर्व से FIDE-रेटेड विरोधियों के खिलाफ खेलना होंगे।
  • आधार रेटिंग 1400 से शुरू होती है, लेकिन इसे कम या अधिक भी रेट किया जा सकता है।
  • रेटिंग स्तर
    • FIDE मास्टर (FM): आमतौर पर 2300 की रेटिंग प्राप्त करने पर प्रदान किया जाता है, हालाँकि कुछ स्पर्द्धाओं में विशिष्ट श्रेणियों में कम सीमा का उपयोग किया जा सकता है।
    • ग्रैंडमास्टर (GM): इसके लिए खिलाड़ियों को 2500 की रेटिंग प्राप्त करनी होगी और अंतरराष्ट्रीय शतरंज टूर्नामेंटों में खेलकर तीन ग्रैंडमास्टर मानदंड हासिल करने होंगे।

अभ्यास गरुड़ शक्ति

हाल ही में हिमाचल प्रदेश के बकलोह स्थित विशेष बल प्रशिक्षण स्कूल में गरुड़ शक्ति अभ्यास का 10वाँ संस्करण आयोजित किया गया।

अभ्यास गरुड़ शक्ति के बारे में

  • अभ्यास गरुड़ शक्ति भारत और इंडोनेशिया के बीच एक द्विपक्षीय विशेष बल अभ्यास है, जिसका उद्देश्य अंतर-संचालन, समन्वय और पेशेवर सैन्य सहयोग को बढ़ाना है।
  • पहला संस्करण: अभ्यास गरुड़ शक्ति का उद्घाटन संस्करण वर्ष 2012 में भारत में आयोजित किया गया था, जिसने दोनों देशों के बीच संरचित विशेष बल सहयोग की शुरुआत को चिह्नित किया।
  • वर्ष 2025 के प्रतिभागी: पैराशूट रेजिमेंट (SF) के भारतीय विशेष बल और इंडोनेशियाई विशेष बलों के सैन्यकर्मी।
  • फोकस क्षेत्र: प्रशिक्षण में आतंकवाद-रोधी रणनीति, स्नाइपिंग, हेलीबोर्न ऑपरेशन, लड़ाकू शूटिंग, और ड्रोन, काउंटर-मानव रहित विमान प्रणाली (UAS) और पहाड़ी इलाकों में लोइटर-म्यूनिशन हमलों की योजना बनाना शामिल है।

महत्त्व

  • दोनों देशों के विशेष बलों के बीच सामरिक अंतर-संचालन और आपसी विश्वास को मजबूत करता है।
  • उच्च-तीव्रता वाले आतंकवाद-रोधी और विशेष अभियानों के लिए संयुक्त तैयारी को बढ़ाता है।
  • सामरिक रक्षा सहयोग को गहरा करता है और भारत-इंडोनेशिया द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करता है।

खाड़ी सहयोग परिषद: साखिर घोषणा

बहरीन के मनामा में आयोजित 46वें खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) शिखर सम्मेलन में साखिर घोषणा जारी की गई।

GCC शिखर सम्मेलन के बारे में

  • GCC शिखर सम्मेलन, सहयोग की समीक्षा और संयुक्त नीतियों को परिभाषित करने के लिए GCC के सदस्य राष्ट्रों के प्रमुखों की एक वार्षिक बैठक है।
  • बहरीन में 2025 शिखर सम्मेलन: मनामा के साखिर पैलेस में आयोजित खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के 46वें शिखर सम्मेलन में क्षेत्रीय तनाव की बढ़ती परिस्थितियों के बीच नेता उपस्थित हुए।
  • साखिर घोषणा: यह 2025 के खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के  शिखर सम्मेलन के समापन पर अपनाया गया संयुक्त वक्तव्य है।

साखिर घोषणा के मुख्य उद्देश्य

  • आर्थिक एकीकरण: यह घोषणा GCC कॉमन मार्केट को सुदृढ़ करने, सीमा शुल्क संघ को पूर्णता प्रदान करने और संयुक्त जल एवं ऊर्जा संपर्क परियोजनाओं के विस्तार के माध्यम से क्षेत्रीय आर्थिक अभिसरण को मजबूत बनाता है।
  • डिजिटल परिवर्तन और स्थिरता: यह डिजिटल अवसंरचना विस्तार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और साइबर सुरक्षा में सहयोग को बढ़ावा देता है, और जलवायु कार्रवाई, स्वच्छ ऊर्जा विकास और समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है।
  • सुरक्षा और रक्षा सहयोग: यह घोषणा-पत्र आतंकवाद-रोधी प्रयासों को तीव्र करके, संयुक्त नौसैनिक अभियानों को बढ़ाकर और परमाणु-हथियार-मुक्त मध्य पूर्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करके सामूहिक सुरक्षा को बढ़ावा देता है।
  • क्षेत्रीय स्थिरता और शासन: यह फिलिस्तीन, सीरिया और लेबनान का समर्थन करके, वैश्विक साझेदारियों को गहरा करके और युवा सशक्तीकरण तथा खाड़ी पहचान के संरक्षण को प्राथमिकता देकर क्षेत्रीय राजनयिक जुड़ाव को मजबूत करता है।

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के बारे में

  • खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) एक क्षेत्रीय राजनीतिक और आर्थिक गठबंधन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1981 में खाड़ी देशों के बीच सहयोग तथा सामूहिक सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
  • सदस्य देश (6): बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)।
  • मुख्यालय: रियाद, सऊदी अरब।
  • उद्देश्य: GCC आर्थिक एकीकरण को मजबूत करने, रक्षा और सुरक्षा नीतियों में समन्वय स्थापित करने, सांस्कृतिक तथा सामाजिक सहयोग को बढ़ाने एवं क्षेत्रीय चुनौतियों का सामूहिक रूप से सामना करने के लिए कार्य करता है।

RELOS समझौता

रूस ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की वर्ष 2025 की भारत यात्रा से पहले भारत के साथ रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट (RELOS) समझौते की औपचारिक पुष्टि कर दी है।

RELOS समझौते के बारे में

रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट (RELOS) समझौता एक द्विपक्षीय सैन्य लॉजिस्टिक्स समझौता है, जो भारत और रूस को ईंधन भरने, मरम्मत, आपूर्ति, बर्थिंग और रखरखाव के लिए एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं तक पहुंच प्रदान करने में सक्षम बनाता है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • पारस्परिक आधार पहुँच: यह समझौता मिशनों और तैनाती के दौरान सैन्य सहायता के लिए सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों और हवाई अड्डों तक पारस्परिक पहुँच प्रदान करता है।
  • परिचालन सहायता: यह दोनों देशों के विमानों, युद्धपोतों और सैन्य इकाइयों के लिए ईंधन भरने, पुनः पूर्ति, रखरखाव और मरम्मत को सक्षम बनाता है।
  • उन्नत अंतर-संचालनीयता: RELOS, इंद्रा (INDRA) जैसे त्रि-सेवा अभ्यासों सहित संयुक्त सैन्य अभ्यासों के दौरान बेहतर समन्वय की सुविधा प्रदान करता है।
  • HADR सहयोग: यह क्षेत्रीय संकटों में त्वरित तथा समन्वित मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) अभियानों का समर्थन करता है।

भारत-रूस RELOS का महत्त्व

  • सामरिक पहुँच का विस्तार: भारत को 40 से अधिक रूसी नौसैनिक और वायुसैनिक अड्डों तक पहुँच प्राप्त हुई है, जिनमें व्लादिवोस्तोक और मरमन्स्क जैसे प्रमुख आर्कटिक और प्रशांत क्षेत्र के अड्डे शामिल हैं, जिससे भारत की परिचालन क्षमता हिंद महासागर से आगे तक विस्तृत हो गई है।
  • नौसैनिक और वायुसैनिक अभियानों को बढ़ावा: यह समझौता भारत की लंबी दूरी की समुद्री गश्त, आर्कटिक मिशन और उन महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों की निगरानी करने की क्षमता को मजबूत करता है, जो भारत के अधिकांश व्यापार प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।
  • रक्षा आपूर्ति शृंखला को मजबूत करता है: RELOS, Su-30MKI, T-90 टैंक, मिग और सुखोई विमान, और S-400 प्रणालियों जैसे संयुक्त प्लेटफॉर्मों के लिए लाजिस्टिक में सुधार करता है, जिससे विलंब कम होता है और मिशन की तैयारी में सुधार होता है।
  • सामरिक साझेदारी को बढ़ावा: यह समझौता भारत–रूस के मध्य दीर्घकालिक रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करता है, ब्रह्मोस और पनडुब्बी कार्यक्रम जैसी प्रमुख संयुक्त परियोजनाओं को पूर्णता प्रदान करता है और द्विपक्षीय विश्वास और रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाता है।

क्षुद्रग्रह बेन्नू 

नासा के 2023 OSIRIS-REx मिशन द्वारा संगृहीत नमूनों का विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों ने क्षुद्रग्रह बेन्नू में ग्लूकोज और राइबोज का पता लगाया है, जिससे यह पुष्ट होता है कि प्रारंभिक सौर मंडल में जीवन-निर्माण करने वाले अणु मौजूद थे।

  • OSIRIS-REx (वर्ष 2016-2023) मिशन ने प्रारंभिक सौर-प्रणाली रसायन विज्ञान और कार्बनिक अणुओं का अध्ययन करने के लिए बेन्नू के नमूने एकत्र किए तथा उन्हें पृथ्वी पर वापस लाया।

क्षुद्रग्रह बेन्नू के नमूनों से प्रमुख निष्कर्ष

  • जीवन-संबंधी शर्कराओं का पता लगाना: शोधकर्ताओं ने बेन्नू  पाउडर के नमूनों में ग्लूकोज (पृथ्वी पर जीवन के लिए प्राथमिक ऊर्जा स्रोत) और राइबोज (RNA का प्रमुख घटक) की पहचान की।
  • कार्बनिक अणुओं की उपस्थिति: अमीनो अम्ल, न्यूक्लियोबेस और कार्बोक्जिलिक अम्ल भी पाए गए, जो दर्शाता है कि पृथ्वी पर जीवन के उद्भव से पहले ही जीवन के निर्माण खंड अंतरिक्ष में व्यापक रूप से मौजूद थे।
  • DNA शर्करा का पता नहीं चला: वैज्ञानिकों को DNA में प्रयुक्त शर्करा, डीऑक्सीराइबोज, नहीं मिली, जिससे पुष्टि होती है कि ये अणु बेन्नू पर जीवन का नहीं, बल्कि प्रारंभिक रासायनिक जटिलता का संकेत देते हैं।

क्षुद्रग्रह बेन्नू के बारे में

  • बेन्नू एक B-प्रकार का पृथ्वी-निकट क्षुद्रग्रह है, जो पृथ्वी के 30% की तुलना में उच्च कार्बन सामग्री और लगभग 4% कम परावर्तकता के लिए जाना जाता है।
    • B-प्रकार के क्षुद्रग्रह असामान्य, कार्बन-समृद्ध क्षुद्रग्रह हैं, जो अधिकांशतः बाहरी क्षुद्रग्रह बेल्ट में पाए जाते हैं और प्रारंभिक सौरमंडल के प्राचीन पदार्थों से युक्त होते हैं।
    • इन्हें अक्सर कार्बनयुक्त चोंड्राइट उल्कापिंडों से जोड़ा जाता है।
  • प्रभाव संभावना: वर्ष 2175-2199 के बीच पृथ्वी से टकराने की संभावना है, जिससे बेन्नू सबसे अधिक निगरानी वाले क्षुद्रग्रहों में से एक बन गया है।
  • यह निष्कर्ष इस साक्ष्य को मजबूत करते हैं कि जीवन के आवश्यक अणु अंतरिक्ष में बने तथा पृथ्वी के प्रीबायोटिक रसायन विज्ञान तथा सौर मंडल के विकास के बारे में साक्ष्य प्रदान करते हैं।

संदर्भ

नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, मोहाली (INST) द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, एकल-उपयोग वाली पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलों से उत्पन्न नैनोप्लास्टिक मनुष्यों के लिए महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न करते हैं।

  • INST विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का एक स्वायत्त संस्थान है।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

  • आंत के सूक्ष्मजीवों पर प्रभाव: पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET)-व्युत्पन्न नैनोप्लास्टिक्स के लंबे समय तक संपर्क ने लैक्टोबैसिलस रैम्नोसस की वृद्धि और सुरक्षात्मक कार्यों को कम कर दिया, जबकि तनाव प्रतिक्रियाओं और एंटीबायोटिक संवेदनशीलता को बढ़ा दिया।
  • मानव कोशिकाओं पर प्रभाव: नैनोप्लास्टिक्स लाल रक्त कोशिकाओं में झिल्ली विघटन उत्पन्न करते पाए गए, जबकि मानव उपकला कोशिकाओं में उन्होंने DNA क्षति, ऑक्सीडेटिव तनाव, एपोप्टोसिस तथा सूजन जैसी गंभीर कोशिकीय प्रतिक्रियाओं को प्रेरित किया।

नैनोप्लास्टिक्स के बारे में

  • नैनोप्लास्टिक अत्यंत सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार आमतौर पर 1 माइक्रोमीटर से भी कम होता है।
  • स्रोत
    • एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक जैसे पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलें, कैरी बैग और खाद्य पैकेजिंग का विखंडन।
    • सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आने, यांत्रिक घर्षण और औद्योगिक श्रेडिंग जैसी अपघटन प्रक्रियाएँ।
    • प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण, पुनर्चक्रण और अनुचित निपटान के दौरान उत्सर्जन।

नैनो कणों का स्वास्थ्य पर प्रभाव

  • आंतरिक संचय: नैनोप्लास्टिक भोजन, जल, वायु और पैकेजिंग के संपर्क के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और ऊतकों में जमा हो सकते हैं।
  • माइक्रोबायोम व्यवधान: यह लाभकारी आंत बैक्टीरिया के कार्य में हस्तक्षेप करता है, जो प्रतिरक्षा, चयापचय और मानसिक स्वास्थ्य के संतुलन को नियंत्रित करते हैं।
  • कोशिकीय क्षति: साक्ष्य दर्शाते हैं कि ये मानव कोशिकाओं में ऑक्सीडेटिव तनाव, DNA विखंडन, परिवर्तित चयापचय और सूजन संबंधी संकेतन को ट्रिगर करते हैं।
  • रक्त पर प्रभाव: उच्च सांद्रता में ये नैनोप्लास्टिक लाल रक्त कोशिका झिल्लियों को अस्थिर कर सकते हैं, जिससे रक्त-अपघटन होता है और ऑक्सीजन परिवहन बाधित हो सकता है।
  • प्रणालीगत जोखिम: इनका सूक्ष्म आकार और जैवसक्रिय प्रकृति इन्हें जैविक बाधाओं को पार करने की अनुमति देती है, जिससे लंबे समय तक संपर्क में रहने पर कई अंगों पर संभावित रूप से प्रभाव पड़ सकता है।

संदर्भ

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने पारदर्शिता बढ़ाने और भारत के फार्माकोविजिलेंस पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी निर्देश जारी किया ।

PWOnlyIAS विशेष

फार्माकोविजिलेंस (Pharmacovigilance) के बारे में

  • फार्माकोविजिलेंस एक विज्ञान और गतिविधियों का समूह है, जो प्रतिकूल प्रभावों या किसी भी औषधि-संबंधी समस्याओं का पता लगाने, आकलन करने, समझने और रोकथाम पर केंद्रित है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य दवा के संपूर्ण जीवन चक्र में जोखिमों की सतत् निगरानी करते हुए रोगी सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना और समग्र रूप से दवा की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

CDSCO के प्रमुख निर्देश

  • सभी खुदरा और थोक फार्मेसियों को प्रतिकूल दवा प्रतिक्रियाओं की रिपोर्टिंग हेतु एक निर्दिष्ट त्वरित प्रतिक्रिया (QR) कोड तथा टोल-फ्री नंबर 1800-180-3024 अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करना होगा।
  • राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों के औषधि लाइसेंसिंग अधिकारियों को अनुपालन सुनिश्चित करना होगा और सभी लाइसेंस धारकों को निर्देश प्रसारित करने होंगे।
  • यह निर्देश भारतीय फार्माकोविजिलेंस कार्यक्रम की 16वीं कार्य समूह बैठक की सिफारिशों के अनुरूप है।

निर्देशों का महत्त्व

  • जनता और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को प्रतिकूल औषधि प्रतिक्रियाओं (ADR) की आसानी से रिपोर्ट करने में सक्षम बनाता है।
  • औषधि-संबंधी जोखिमों का तेजी से पता लगाने के लिए भारत की भारतीय फार्माकोविजिलेंस कार्यक्रम (PvPI) प्रतिकूल औषधि प्रतिक्रिया निगरानी प्रणाली के साथ एकीकृत।
  • समय पर निगरानी और नियामक प्रतिक्रिया के माध्यम से रोगी सुरक्षा को बढ़ावा देता है।

भारतीय फार्माकोविजिलेंस कार्यक्रम (PvPI) के बारे में

  • परिचय: वर्ष 2010 में प्रारंभ किया गया भारतीय फार्माकोविजिलेंस कार्यक्रम (PvPI), भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) द्वारा समन्वित, औषधि सुरक्षा की व्यवस्थित निगरानी सुनिश्चित करने हेतु केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत एक राष्ट्रीय पहल है।
  • उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य औषधियों के जोखिमों का आकलन करके और यह सुनिश्चित करके जन स्वास्थ्य की रक्षा करना है कि उनके लाभ संभावित नुकसान से अधिक हों।
  • संचालन: भारतीय फार्माकोविजिलेंस कार्यक्रम (PvPI) एक राष्ट्रव्यापी ADR निगरानी केंद्रों के नेटवर्क का संचालन करता है, जो प्रतिकूल औषधि प्रतिक्रियाओं की रिपोर्टों को व्यवस्थित रूप से एकत्रित करते हैं और उनका विश्लेषण कर CDSCO को साक्ष्य-आधारित नियामक सिफारिशें प्रदान करते हैं।

CDSCO के बारे में

  • परिचय: केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) भारत में औषधियों और चिकित्सा उपकरणों के लिए राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरण (NRA) के रूप में कार्य करता है।
  • स्थापना: यह स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
  • मुख्यालय: इसका मुख्यालय नई दिल्ली में अवस्थित है, जिसके पूरे भारत में क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय कार्यालय हैं।
  • प्रमुख जिम्मेदारियाँ
    • पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ औषधि और चिकित्सा उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावकारिता सुनिश्चित करता है।
    • नई औषधियों को मंजूरी देता है और भारत में किए जाने वाले नैदानिक ​​परीक्षणों को नियंत्रित करता है।
    • औषधि के लिए मानक निर्धारित करता है और आयातित दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी करता है।
    • टीकों, रक्त उत्पादों, अंतःशिरा द्रवों और सीरम जैसे महत्त्वपूर्ण उत्पादों के लिए लाइसेंस प्रदान करने हेतु राज्य औषधि नियामकों के साथ सहयोग करता है।
    • देश भर में औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के एकसमान प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्रदान करता है।

संदर्भ

भारत के संवैधानिक चिंतन और मानवाधिकार नैतिकता में महाड़ सत्याग्रह के योगदान पर विद्वान लगातार पुनर्विचार और शोध कर रहे हैं।

महाड़ सत्याग्रह के बारे में

  • यह मार्च 1927 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के नेतृत्व में किया गया एक ऐतिहासिक अहिंसक विरोध था, जिसमें जातिगत भेदभाव को चुनौती देते हुए माँग की गई थी कि अछूतों को महाराष्ट्र के महाड़ में सार्वजनिक जल स्रोत (चावदार तालाब) का उपयोग करने की अनुमति दी जाए, जो उनके लिए निषिद्ध था।
  • स्थान: महाड़, महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित एक शहर है।
  • विरासत: महाड़ गोपालबाबा वलंगकर, एन. एम. जोशी और संभाजी गायकवाड़ जैसे प्रारंभिक समाज सुधारकों का कार्यक्षेत्र था, जिसने इसे जाति-विरोधी सक्रियता का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बना दिया।
  • आंदोलन की पृष्ठभूमि
    • जल तक पहुँच पर जाति-आधारित निषेध: अस्पृश्यता की गहरी जड़ें जमाए बैठी प्रथाओं के कारण दलितों को चावदार तालाब जैसे सार्वजनिक जल स्रोतों तक पहुँच से नियमित रूप से वंचित रखा जाता था।
    • बोले प्रस्ताव, 1923: एस. के. बोले के नाम पर बोले प्रस्ताव ने अछूतों को सार्वजनिक स्थानों, जिनमें साझा कुएँ और तालाब शामिल हैं, तक पहुँच की अनुमति दी।
    • नगरपालिका बोर्ड आदेश, 1926: वर्ष 1926 में, महाड़ नगरपालिका बोर्ड ने आदेश दिया कि चावदार तालाब सभी जातियों के लोगों के लिए खोल दिया जाए, इस निर्णय का उच्च-जाति समूहों ने विरोध किया।
    • आंदोलन का शुभारंभ: अहिंसक महाड़ सत्याग्रह, जिसे चावदार तालाब सत्याग्रह के नाम से भी जाना जाता है, 20 मार्च, 1927 को शुरू हुआ।
    • मुख्य उद्देश्य: इस आंदोलन का उद्देश्य अछूतों के सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के अधिकार पर जोर देना था, जिससे जाति-आधारित भेदभाव को चुनौती दी जा सके।
  • सत्याग्रह की घटनाएँ
    • नेतृत्व और भागीदारी: डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने लगभग 2,500 दलितों का नेतृत्व करते हुए चावदार तालाब तक एक मार्च निकाला, जहाँ दलितों को ऐतिहासिक रूप से प्रवेश से वंचित रखा गया था।
    • समानता का प्रतीकात्मक दावा: अंबेडकर ने तालाब से पानी पिया, जो समानता का एक शक्तिशाली प्रतीकात्मक संदेश था और इसने सवर्ण हिंदुओं की कड़ी प्रतिक्रिया को उकसाया।
      • उच्च जाति समूहों ने शुद्धिकरण अनुष्ठान’ के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिसने अंबेडकर को महाड़ 2.0 के दौरान लामबंदी बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
    • अंबाबाई मंदिर सत्याग्रह (नवंबर, 1927): दलितों पर हिंसक हमलों के बाद, अंबेडकर ने अंबाबाई मंदिर में डॉ. पंजाबराव देशमुख के आंदोलन का समर्थन किया।
    • मनुस्मृति दहन (दिसंबर 1927): दिसंबर 1927 में, अंबेडकर और उनके समर्थकों ने जाति पदानुक्रम के वैचारिक आधार को खारिज करने के लिए मनुस्मृति का दहन किया, जिसे 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस के रूप में मनाया गया।
    • लैंगिक समानता पर जोर: अंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि मानवाधिकारों में लैंगिक समानता भी शामिल होनी चाहिए और अधिकारों के विमर्श में महिलाओं को शामिल करने का समर्थन किया।
    • कानूनी पुष्टि (1937): दिसंबर 1937 में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अछूतों को चावदार तालाब से पानी प्राप्त करने का कानूनी अधिकार है।
  • अहिंसक लोकतांत्रिक विरोध: सत्याग्रह ने फ्राँसीसी क्रांति के आदर्शों से प्रेरणा ली, जबकि यह गरिमा और मैत्री (करुणा) के बौद्ध मूल्यों पर आधारित था।

परिणाम

  • संवैधानिक प्रभाव: सत्याग्रह संविधान के मूल्यों के लिए नैतिक आदर्श बन गया –
    • स्वतंत्रता (जातिगत उत्पीड़न से मुक्ति)
    • समानता (सभी जातियों और लिंगों के लिए नागरिक अधिकार)
    • बंधुत्व (सामाजिक बंधन के रूप में मैत्री)।
  • मानवाधिकार विमर्श: महाड़ ने इस विचार को मूर्त रूप दिया कि नागरिक अधिकारों को राजनीतिक अधिकारों से पहले स्थान दिया जाना चाहिए, जिसका प्रभाव समानता और अस्पृश्यता उन्मूलन (अनुच्छेद-14, 15, 17) पर पड़ा।
  • बाद के आंदोलनों की नींव: सत्याग्रह ने अंबेडकर के बाद के लेखन, जिसमें जाति का उन्मूलन भी शामिल है, को प्रत्यक्ष रूप से आकार दिया और संविधान के नैतिक ढाँचे को प्रभावित किया।
  • स्मरणोत्सव: 25 दिसंबर को भारतीय महिला मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो सामाजिक न्याय के संघर्ष में महिलाओं को केंद्रीय भूमिका में रखने पर अंबेडकर के जोर को स्वीकार करता है।

संदर्भ

संसद द्वारा केंद्रीय उत्पाद शुल्क (संशोधन) विधेयक, 2025 को मंजूरी दे दी गई। यह विधेयक केंद्र को तंबाकू और संबंधित उत्पादों पर उच्च उत्पाद शुल्क लगाने का अधिकार देता है।

विधेयक के बारे में

  • इस विधेयक का उद्देश्य केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 में संशोधन करना है, जो भारत में निर्मित या उत्पादित वस्तुओं पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क के आरोपण और संग्रहण को नियंत्रित करता है।
    • इसका उद्देश्य केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की चौथी अनुसूची की धारा IV में तंबाकू उत्पादों के लिए टैरिफ दरों को अद्यतन करना है।
  • GST के बाद उत्पाद शुल्क ढाँचा: वर्ष 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद, तंबाकू और तंबाकू उत्पादों जैसी कुछ वस्तुओं को छोड़कर अधिकांश वस्तुओं से केंद्रीय उत्पाद शुल्क हटा लिया गया था।
  • संशोधन का उद्देश्य: यह विधेयक क्षतिपूर्ति उपकर वापस लेने के बाद तंबाकू और संबंधित उत्पादों पर उच्च केंद्रीय उत्पाद शुल्क लगाने का प्रयास करता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कर के समग्र भार में कमी न आए और इन उत्पादों के प्रति लोगों की बढ़ती सामर्थ्य को रोका जा सके।

तंबाकू के लिए मौजूदा कर संरचना

  • तंबाकू और तंबाकू उत्पादों पर तीन स्तरीय संरचना के तहत कर लगाया जाता है, जिसमें वस्तु एवं सेवा कर (GST) , वस्तु एवं सेवा कर क्षतिपूर्ति उपकर और केंद्रीय उत्पाद शुल्क शामिल हैं।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • उच्च उत्पाद शुल्क: विधेयक में अनिर्मित तंबाकू, निर्मित तंबाकू, तंबाकू उत्पादों और तंबाकू के विकल्पों पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में पर्याप्त वृद्धि का प्रस्ताव है।
  • वस्तु एवं सेवा कर (GST) वर्गीकरण में निरंतरता: तंबाकू उत्पाद 40% GST डिमेरिट श्रेणी में बने रहेंगे, लेकिन क्षतिपूर्ति उपकर के बिना अकेले GST उच्च कर भार सुनिश्चित नहीं कर सकता।
  • विभाज्य पूल का हिस्सा: चूँकि उत्पाद शुल्क विभाज्य पूल का हिस्सा है, इसलिए राज्यों को उनका हिस्सा स्वतः प्राप्त होगा।
  • प्रस्तावित उत्पाद शुल्क दरों में शामिल हैं:
    • धूप में सुखाए गए तंबाकू के पत्तों सहित अनिर्मित तंबाकू पर उत्पाद शुल्क 64% से बढ़कर 70% हो जाएगा।
    • चबाने वाले तंबाकू पर शुल्क 25% से बढ़कर 100% हो जाएगा।
    • हुक्का या तंबाकू पर उत्पाद शुल्क 25% से बढ़कर 40% हो जाएगा।
    • पाइप और सिगरेट में प्रयोग होने वाले धूम्रपान मिश्रणों पर शुल्क 60% से बढ़कर 325% हो जाएगा।
    • सिगरेट पर शुल्क 1,000 सिगरेट पर ₹2,700-₹11,000 तक बढ़ जाएगा (जो 1,000 सिगरेट पर ₹200 से ₹735 के बीच है)।

उत्पाद शुल्क के बारे में

  • उत्पाद शुल्क, उत्पादन, लाइसेंसिंग या बिक्री के चरणों में वस्तुओं पर लगाया जाने वाला कर है और इसका भुगतान निर्माताओं द्वारा भारत सरकार को किया जाता है।
  • उत्पाद शुल्क केवल भारत में निर्मित वस्तुओं पर लागू होता है, जबकि सीमा शुल्क अन्य देशों से आयातित वस्तुओं पर लगाया जाता है।

भारत में उत्पाद शुल्क के प्रकार

  • मूल उत्पाद शुल्क (CENVAT): इसे केंद्रीय मूल्य वर्द्धित कर (CENVAT) भी कहा जाता है। यह केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की धारा 3(1)(A) के अंतर्गत केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1985 की प्रथम अनुसूची में सूचीबद्ध वस्तुओं पर लगाया जाता था और नमक को छोड़कर सभी वस्तुओं पर लागू होता था।
  • अतिरिक्त उत्पाद शुल्क: यह अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (विशेष महत्त्व की वस्तुएँ) अधिनियम, 1957 के अंतर्गत विशेष महत्त्व की मानी जाने वाली चुनिंदा वस्तुओं पर लगाया जाता था।
  • विशेष उत्पाद शुल्क: यह केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1985 की द्वितीय अनुसूची के अंतर्गत वर्गीकृत विशिष्ट वस्तुओं पर लगाया जाता है।

संदर्भ

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वास्थ्य सुरक्षा से राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर विधेयक, 2025 पेश किया, जिसमें पान मसाला बनाने में प्रयोग होने वाली मशीनों पर उपकर लगाने का प्रस्ताव है।

  • यह विधेयक धन विधेयक के रूप में पेश किया गया है, जिसके लिए केवल लोकसभा की मंजूरी की आवश्यकता है।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • विनिर्माण मशीनों पर उपकर: इस विधेयक में पान मसाला निर्माण में स्थापित सभी मशीनों या प्रक्रियाओं पर उपकर लगाने का प्रस्ताव है, जिसमें पैकेट को भरकर बंद करने वाली मशीनें और पैकिंग मशीनें शामिल हैं।
  • उपकर गणना का आधार: उपकर प्रति मिनट उत्पादित पाउच/टिन/कंटेनरों की संख्या और प्रति पाउच पान मसाला के वजन (2.5 ग्राम से – 10 ग्राम से अधिक) पर निर्भर करेगा।
  • स्व-घोषणा: करदाताओं को उपकर का स्व-मूल्यांकन करना होगा, मासिक रिटर्न दाखिल करना होगा और विलंबित भुगतानों पर ब्याज का भुगतान करना होगा।
  • अपराध और दंड: अपराधों में मशीनों या प्रक्रियाओं की जानकारी छुपाना, उपकर का भुगतान न करना, पंजीकरण न कराना और जब्त किए गए सामान के साथ छेड़छाड़ करने पर दंड का प्रावधान हैं।
  • स्वास्थ्य के लिए राज्य आवंटन: उपकर राजस्व का एक हिस्सा राज्यों के साथ स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों और स्वास्थ्य संबंधी सरकारी योजनाओं के समर्थन के लिए साझा किया जाएगा।
  • लेखा परीक्षण : आयुक्त या उच्च पदस्थ अधिकारी उपकर भुगतानों की पुष्टि के लिए निर्माताओं का लेखा परीक्षण कर सकते हैं। वे अवैतनिक उपकर, ब्याज या दंड की वसूली की कार्यवाही भी शुरू कर सकते हैं।

प्रस्तावित उपकर का दायरा

  • प्रयोज्यता: यह उपकर आवश्यक वस्तुओं पर नहीं लगाया जाएगा, बल्कि यह केवल उन चुनिंदा अवगुणी वस्तुओं पर लागू होगा, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करती हैं, जैसे पान मसाला।
  • दायित्व: यह दायित्व उन सभी पर होगा जो इन वस्तुओं के निर्माण में प्रयुक्त मशीनों या मैनुअल प्रक्रियाओं के स्वामी या नियंत्रक हैं।

उपकर (अनुच्छेद-270)

  • यह किसी विशेष उद्देश्य या कारण से लगाया गया एक विशिष्ट कर है।
  • किसी विशिष्ट उद्देश्य, जैसे शिक्षा या स्वास्थ्य के लिए धन जुटाने हेतु।
  • वस्तु एवं सेवा कर (GST), आयकर आदि जैसे करों पर अतिरिक्त शुल्क के रूप में उपकर लगाया जाता है (उपकर सभी पर लगाया जाता है।)।
  • गणना आधार: इसकी गणना कुल कर राशि और लागू अधिभार के आधार पर की जाती है।
  • लेखांकन: इसे भारत की संचित निधि में जोड़ा जाता है, लेकिन इसका उपयोग केवल विशिष्ट उद्देश्यों के लिए ही किया जा सकता है।
  • कर साझाकरण: केंद्र राज्यों के साथ साझा करने के लिए बाध्य नहीं है।

उपकर के पीछे उद्देश्य

  • राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए धन जुटाना: इस विधेयक का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए समर्पित वित्तीय संसाधन जुटाना है, जिनमें से दोनों के लिए व्यय की बढ़ती आवश्यकताएँ शामिल हैं।
  • राजस्व पूर्वानुमान: उपकर को अवगुणी वस्तुओं से जोड़ने का उद्देश्य इन प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए पूर्वानुमानित और जवाबदेह वित्तीय संसाधन सुनिश्चित करना है।
  • कराधान के माध्यम से निवारण: यह उपकर जीवनशैली से जुड़े हानिकारक उत्पादों पर लक्षित वित्तीय बोझ डालकर उनके उपयोग को हतोत्साहित करने का प्रयास करता है, जैसा कि ‘सिन टैक्स’ के पीछे तर्क दिया जाता है।

भारत में तंबाकू का उपयोग

  • उच्च तंबाकू प्रसार: वैश्विक वयस्क तंबाकू सर्वेक्षण (GATS)-2 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 42% पुरुष और 14% महिलाएँ तंबाकू का सेवन करती हैं।
    • भारत में दुनिया के 70% धूम्ररहित तंबाकू (SLT) उपयोगकर्ता हैं, जहाँ धूम्ररहित तंबाकू को धूम्रयुक्त तंबाकू की अपेक्षा प्राथमिकता दी जाती है।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: धूम्ररहित और धूम्रयुक्त तंबाकू दोनों कैंसर के जोखिम को काफी बढ़ाती हैं; पुरुष कैंसर से होने वाली मौतों में भारत विश्व स्तर पर पहले स्थान पर है।
  • आर्थिक बोझ: स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बोझ के साथ-साथ, तंबाकू के उपयोग के कारण  2017-2018 में ₹1.77 लाख करोड़ (भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 1.04%) का आर्थिक नुकसान हुआ।
  • नियामक ढाँचा
    • उद्योग के प्रभाव और व्यापक उपलब्धता के कारण गुटखा प्रतिबंध काफी सीमा तक अप्रभावी रहा।
    •  विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर 75% कर लगाने की सिफारिश की; किंतु भारत इस लक्ष्य से पीछे रह गया।
    • 87% सिगरेट विक्रेता, एकल सिगरेट बेचते हैं, जो कि 88 देशों में प्रतिबंधित है।

संदर्भ:

संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी (IT) पर स्थायी समिति की एक रिपोर्ट में फेक न्यूज” की स्पष्ट कानूनी परिभाषा की माँग की गई है और सूचना प्रौद्योगिकी (IT)  अधिनियम, 2000 की धारा 79 (कुछ मामलों में मध्यस्थ के दायित्व से छूट)  के तहत सेफ हार्बर’ खंड पर पुनर्विचार करने की सिफारिश की गई है।

फेक न्यूज  क्या है?

  • फेक न्यूज: इसमें लोगों को बौद्धिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए तथ्य के रूप में प्रस्तुत की गई झूठी जानकारी शामिल होती है, जिससे तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ और यहाँ तक कि हिंसा भी भड़क सकती है।
  • दुष्प्रचार: इसे ऐसी झूठी जानकारी के रूप में समझा जाता है, जो जानबूझकर नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से निर्मित या प्रसारित की जाती है।
  • गलत सूचना के मामले में, ‘उद्देश्य’ का तत्त्व अनुपस्थित माना जाता है।

रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ 

वर्तमान तंत्र में चिंताएँ

  • परिभाषा की अस्पष्टता: संसदीय समिति के अनुसार, फेक न्यूज” की स्पष्ट कानूनी परिभाषा का अभाव प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नियामक स्तर पर भ्रम उत्पन्न करता है।
  • सेफ हार्बर’ प्रावधान संबंधी चिंताएँ: इस समिति ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि मध्यस्थ अक्सर IT अधिनियम की धारा 79 (कुछ मामलों में मध्यस्थ के दायित्व से छूट) का दुरुपयोग सेफ हार्बर’ प्रावधान के रूप में करते हैं, भले ही उनके एल्गोरिदम सनसनीखेज और भ्रामक सामग्री को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हों।
  • एल्गोरिथम प्रोत्साहन: समिति ने इस बात पर जोर दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अधिकतम जुड़ाव वाली सामग्री से लाभ अर्जित करते हैं, जिसमें अक्सर भ्रामक या गलत जानकारी शामिल होती है।
  • PIB तथ्य-जाँच डेटा: इस रिपोर्ट के अनुसार, PIB तथ्य-जाँच इकाई को 1.63 लाख प्रश्न प्राप्त हुए, लेकिन केवल 2,279 मामलों का ही खंडन किया गया, जो गलत सूचना की व्यापकता के सापेक्ष सीमित पहुँच को दर्शाता है।
  • सीमा-पार क्षेत्राधिकार: गलत सूचना अक्सर विदेशी रचनाकारों से आती है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय कानूनों के कारण सीमाओं के पार उनकी जवाबदेही लागू करना मुश्किल हो जाता है।
  • AI जोखिम: इंटरनेट की बढ़ती पहुँच और डिजिटल साक्षरता के निम्न स्तर के कारण डीपफेक और AI-जनित वीडियो का तेजी से प्रसार हो रहा है।
  • स्व-नियमन की कमजोरी: समिति के अनुसार, भारत के आधे से अधिक टीवी चैनल किसी भी स्व-नियामक निकाय के दायरे से बाहर हैं, जिससे आंतरिक जवाबदेही प्रणाली कमजोर हो रही है।
  • दंड की सीमाएँ: समिति का कहना है कि ₹25 लाख तक के जुर्माने सहित वर्तमान दंड प्रावधान, फेक न्यूज के बार-बार प्रसार को रोकने के लिए अपर्याप्त हैं।

समिति की सिफारिशें

  • कानूनी परिभाषा: समिति व्यापक हितधारकों से परामर्श के माध्यम से फेक न्यूज” की एक सटीक, कानूनी रूप से ठोस परिभाषा तैयार करने की सिफारिश करती है।
    • संतुलन की आवश्यकता: समिति इस बात पर जोर दिया है कि फेक न्यूज” की किसी भी परिभाषा में गलत सूचना नियंत्रण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के बीच संतुलन होना चाहिए।
  • सेफ हार्बर’ प्रावधान में सुधार: समिति मध्यस्थों की जवाबदेही को बढ़ाने और प्रतिरक्षा संरक्षण के दुरुपयोग को कम करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 79 पर पुनर्विचार करने की सलाह देती है।
    • एल्गोरिदम पारदर्शिता: समिति डिजिटल प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम द्वारा सामग्री को बढ़ावा देने या प्रतिबंधित करने की विधि के बारे में अनिवार्य पारदर्शिता प्रकटीकरण की माँग करती है।
  • कठोर दंड: रिपोर्ट में गलत सूचना को रोकने के लिए बार-बार उल्लंघन करने वालों के लिए अधिक जुर्माने और कठोर दंड का प्रस्ताव है।
  • नोडल अधिकारी की नियुक्ति: इस रिपोर्ट में भारत में बड़ी तकनीकी कंपनियों के साथ समन्वय करने और अनुपालन संबंधी मुद्दों को सँभालने के लिए एक समर्पित नोडल अधिकारी की नियुक्ति की सिफारिश की गई है।
  • अंतर-मंत्रालयी कार्य बल: समिति क्षेत्राधिकार संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए विदेश मंत्रालय और कानूनी विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक समर्पित कार्य बल स्थापित करने की सिफारिश करती है।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता-मानव निरीक्षण: समिति एक सँकर प्रणाली का समर्थन करती है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) गलत सूचना को चिह्नित करती है और मानव विशेषज्ञ द्वितीय-स्तर पर सत्यापन करते हैं।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता विनियमन: समिति ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा जनित सामग्री के निर्माताओं हेतु लाइसेंसिंग आवश्यकताओं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा निर्मित वीडियो तथा डिजिटल सामग्री की अनिवार्य लेबलिंग का प्रस्ताव रखा है।
  • स्व-नियमन को सुदृढ़ बनाना: समिति सभी टीवी चैनलों को स्व-नियामक निकायों के अंतर्गत लाने और सभी मीडिया क्षेत्रों (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल) में तथ्य-जाँच इकाइयों तथा आंतरिक लोकपालों को अनिवार्य बनाने की सिफारिश करती है।
  • मान्यता दंड: समिति ने बार-बार फेक न्यूज बनाने या फैलाने के दोषी पाए जाने वाले पत्रकारों या रचनाकारों की मान्यता रद्द करने का प्रस्ताव रखा है।

फेक न्यूज के प्रसार को रोकने के लिए पहलें 

  • सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000: यह अधिनियम सरकार को गैर-कानूनी और भ्रामक सूचनाओं पर अंकुश लगाने के लिए ऑनलाइन मध्यस्थों और डिजिटल सामग्री को विनियमित करने का अधिकार देता है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021: आईटी नियम डिजिटल समाचार प्रकाशकों, समसामयिक विषयों पर सामग्री बनाने वालों और क्यूरेटेड ऑडियो-विजुअल प्लेटफॉर्म को विनियमित करते हैं।
  • सेफ हार्बर’ प्रावधान: IT नियमों के तहत उचित सावधानी बरतने में विफल रहने वाले मध्यस्थों को सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 79 के तहत सेफ हार्बर’ उपबंध की सुरक्षा खोने का जोखिम होता है, जिससे वे उपयोगकर्ता-जनित सामग्री के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी हो जाते हैं।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS): भारतीय न्याय संहिता की धारा 353, जनता को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से जानबूझकर झूठी सूचना या अफवाहों के प्रसार को अपराध घोषित करती है।
  • PIB तथ्य-जाँच इकाई: प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) सरकारी नीतियों और कार्यों से संबंधित गलत सूचनाओं की पुष्टि तथा उनका प्रतिकार करने के लिए समर्पित एक तथ्य-जाँच इकाई संचालित करता है।
  • सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का परामर्श-पत्र 2024: मंत्रालय ने भारतीय उपयोगकर्ताओं को लक्षित ऑनलाइन सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म और छद्म विज्ञापनों के प्रचार पर रोक लगाने के लिए एक परामर्श-पत्र जारी किया।
  • चुनाव आयोग की पहल: भारत के चुनाव आयोग ने वर्ष 2024 के आम चुनावों के दौरान गलत सूचनाओं की पहचान करने और उन्हें सही करने के लिएमिथक बनाम वास्तविकता रजिस्टर” की शुरुआत की। आयोग फेक न्यूज के विरुद्ध मतदाताओं को शिक्षित करने के लिए अभियान भी चलाता है।
  • राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल: यह पोर्टल नागरिकों को साइबर अपराधों की रिपोर्ट करने में सक्षम बनाता है, जिन्हें फिर कार्रवाई के लिए संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश पुलिस को भेज दिया जाता है।

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