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Dec 08 2025

संदर्भ

हाल ही में सरकार ने मोबाइल फोन निर्माताओं के लिए वर्ष 2026 से संचार सहयोगी ऐप को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने संबंधी आदेश को वापस ले लिया।

  • भारत सरकार की यह भूमिका तब सामने आई जब अधिकांश हितधारकों ने अस्पष्ट डेटा संग्रहण, सहमति का अभाव, निगरानी और असीमित डेटा भंडारण के बारे में चिंता जताई।

संचार साथी ऐप और हालिया अंक के बारे में

  • यह दूरसंचार विभाग (DoT), संचार मंत्रालय द्वारा विकसित एक नागरिक-केंद्रित दूरसंचार सुरक्षा और उपयोगकर्ता-संरक्षण प्लेटफॉर्म है।
  • मुख्य उद्देश्य: मोबाइल उपभोक्ताओं को अपने उपकरणों और डिजिटल पहचान को सुरक्षित रखने, साइबर-संबंधी धोखाधड़ी से निपटने और चोरी हुए उपकरणों और धोखाधड़ी से प्राप्त सिम जैसे दूरसंचार संसाधनों के दुरुपयोग को कम करने के लिए सशक्त बनाना।
  • मुख्य विशेषता (चक्षु): नागरिकों को संदिग्ध धोखाधड़ी वाले संचार (जैसे- फर्जी कॉल, SMS, या फर्जी नो योर कस्टमर (KYC), वित्तीय धोखाधड़ी, या प्रतिरूपण से संबंधित व्हाट्सएप संदेश) की सक्रिय रूप से रिपोर्ट करने की अनुमति देता है।
  • डिवाइस सुरक्षा: यह डिवाइस को केंद्रीय उपकरण पहचान रजिस्टर (CEIR) के साथ एकीकृत होता है ताकि उपयोगकर्ता डिवाइस के विशिष्ट IMEI नंबर का उपयोग करके सभी दूरसंचार नेटवर्क पर खोए/चोरी हुए मोबाइल फोन को ब्लॉक और ट्रेस किया जा सके।
  • पहचान सत्यापन (TAFCOP): यह ग्राहकों को उनके पहचान प्रमाण के आधार पर उनके नाम पर जारी किए गए मोबाइल कनेक्शनों की सूची की जाँच करने और किसी भी अज्ञात या अनधिकृत नंबर (TAFCOP सेवा के माध्यम से) के डिस्कनेक्शन की रिपोर्ट करने या अनुरोध करने में सक्षम बनाता है।
  • अधिदेश विवाद: दूरसंचार विभाग द्वारा मोबाइल फोन निर्माताओं को सभी नए उपकरणों पर ऐप को अनिवार्य रूप से पहले से इंस्टॉल करने के हालिया आदेश ने एक बड़ी राजनीतिक और कानूनी बहस शुरू कर दी है।
    • आलोचकों ने इसे जासूसी ऐप’ (Snooping App) कहा और तर्क दिया कि यह उपयोगकर्ता की पसंद और सहमति को कम करके निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
  • सरकार द्वारा कदम को वापस लेना: नागरिक समाज, विपक्षी दलों और ऐप्पल जैसी वैश्विक तकनीकी कंपनियों के व्यापक विरोध के बाद, सरकार ने 48 घंटों के भीतर अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन आदेश को रद्द कर दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि ऐप स्वैच्छिक है और उपयोगकर्ताओं को इसे इंस्टॉल करने, हटाने या निष्क्रिय करने की स्वतंत्रता है।

डिजिटल संविधानवाद के बारे में

  • अर्थ और मूल सिद्धांत: डिजिटल संविधानवाद का तात्पर्य मौलिक संवैधानिक मूल्यों  स्वतंत्रता, गरिमा, समानता (गैर-मनमानी सहित), जवाबदेही और विधि के शासन को डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र तक विस्तारित करना है।
    • ऐसे विश्व में, जहाँ प्रौद्योगिकी तेजी से शासन में मध्यस्थता कर रही है, इन सिद्धांतों को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए डिजिटल प्रणालियों के डिजाइन, तैनाती और विनियमन का मार्गदर्शन करना चाहिए।
  • डिजिटल संविधानवाद की मुख्य विशेषताएँ: डिजिटल संविधानवाद की विशेषताएँ नए अभिकर्त्ताओं, शक्ति के नए रूपों और बहु-स्तरीय शासन पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
    • डिजिटल अधिकारों का संरक्षण: यह सुनिश्चित करता है कि निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना तक पहुँच जैसे मौलिक अधिकार डिजिटल स्पेस में सुरक्षित रहें, और नागरिकों को राज्य एवंनिजी दोनों पक्षों द्वारा प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग से सुरक्षित रखें।
    • डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही: डिजिटल कंपनियों को उपयोगकर्ता अधिकारों का सम्मान करने, व्यक्तिगत डेटा एकत्र करने, उपयोग करने और साझा करने के तरीके में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और भेदभाव व सेंसरशिप से बचने के लिए एल्गोरिदम को विनियमित करने के लिए जवाबदेह बनाता है।
    • डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty): यह किसी राष्ट्र के अपने डिजिटल स्पेस पर नियंत्रण पर जोर देता है, जिसमें डेटा निवास कानून, डिजिटल बुनियादी ढाँचे का विनियमन और एक वैश्वीकृत, परस्पर जुड़े डिजिटल वातावरण में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा शामिल है।
    • न्यायिक निगरानी (Judicial Oversight): यह सुनिश्चित करता है कि न्यायालय संवैधानिक सिद्धांतों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल कानूनों और सरकारी कार्यों की समीक्षा करें और यदि राज्य या कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा नागरिकों के डिजिटल अधिकारों का उल्लंघन किया जाता है तो कानूनी उपाय प्रदान करें।
    • डिजिटल समावेशन को बढ़ावा: सभी नागरिकों के लिए डिजिटल संसाधनों तक समान पहुँच सुनिश्चित करता है, डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देता है और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना डिजिटल अर्थव्यवस्था में भागीदारी को सक्षम बनाता है।
    • डिजिटल प्रणालियाँ, जो अब शासन में मध्यस्थता करती हैं: आधुनिक लोक प्रशासन और निजी सेवा वितरण तेजी से इन पर निर्भर हो रहे हैं:-
      • बायोमेट्रिक डेटाबेस (Biometric Databases)
        • आधार (भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण)
        • डिजि यात्रा चेहरा पहचान प्रणाली
          • ये प्रणालियाँ न केवल पहचान प्रमाणित करती हैं बल्कि बड़े पैमाने पर निगरानी करने में सक्षम स्थायी बायोमेट्रिक निशान भी बनाती हैं।
      • स्वचालित और पूर्वानुमानित एल्गोरिदम
        • पूर्वानुमानित पुलिसिंग एल्गोरिदम
        • स्वचालित कल्याण लक्ष्यीकरण प्रणालियाँ
        • वित्तीय संस्थानों द्वारा प्रयुक्त क्रेडिट स्कोरिंग एल्गोरिदम
          • ये उपकरण प्रायः पारदर्शिता या मानवीय अपील तंत्र के बिना कल्याण, पुलिस निर्णयों, वित्तीय अवसरों आदि तक पहुंच का निर्धारण करते हैं ।

डिजिटल संविधानवाद पारंपरिक संविधानवाद से किस प्रकार भिन्न है:

पारंपरिक संविधानवाद राज्य की प्रत्यक्ष कार्रवाइयों जैसे- कानून, कार्यकारी आदेश, पुलिस कार्रवाई  को नियंत्रित करता है तथा सरकारी शक्ति की जांच के लिए न्यायिक समीक्षा पर निर्भर करता है।

  • हालाँकि, डिजिटल संविधानवाद अदृश्य, एल्गोरिथम-संचालित निर्णय लेने से संबंधित है, जहाँ परिणाम मानव अधिकारियों द्वारा नहीं, बल्कि निम्नलिखित द्वारा निर्धारित होते हैं:-
    • पूर्वानुमानित एल्गोरिथम (स्वचालित डेटा संचालित मॉडल, जो व्यवहार या जोखिम का पूर्वानुमान लगाने के लिए पिछले पैटर्न का उपयोग करते हैं, और पुलिसिंग, कल्याण आधारित निर्णयों को प्रभावित करते हैं)।
    • बायोमेट्रिक पहचानकर्ता (अद्वितीय शरीर-आधारित चिह्न-उंगलियों के निशान, आईरिस स्कैन, चेहरे की विशेषताएँ, जिनका उपयोग पहचान प्रमाणीकरण और स्थायी डिजिटल निशान की पहचान के लिए किया जाता है)
    • निरंतर मेटाडेटा संग्रह (व्यवहार संबंधी प्रतीकों जैसे- स्थान लॉग, डिवाइस ID, कॉल रिकॉर्ड, का निरंतर संग्रह जो सामग्री पढ़े बिना उपयोगकर्ता गतिविधि का मानचित्रण करता है)
  • ये प्रणालियाँ पृष्ठभूमि में गोपनीय रूप से कार्य करती हैं, तथा राज्य और निजी शक्ति की एक नई व्यवस्था का निर्माण करती हैं, जिसे विनियमित करने के लिए पारंपरिक संवैधानिक सुरक्षा उपाय निर्मित नहीं किए गए थे।

संविधानवाद के बारे में

  • संदर्भ: यह एक राजनीतिक दर्शन या विचार है कि सरकार का अधिकार मौलिक कानूनों के एक समूह से प्राप्त और सीमित होता है, जिसे आमतौर पर संविधान में संहिताबद्ध किया जाता है।
    • यह एक मूल सिद्धांत है जो सरकारी शक्ति का प्रयोग करने वालों को एक उच्चतर कानून (संविधान) की सीमाओं के अधीन करता है।
    • यह अनिवार्य रूप से व्यक्तियों की सरकार को कानूनों की सरकार में बदल देता है, जिससे राज्य को मनमाने ढंग से कार्य करने से रोका जा सकता है।

संविधानवाद के मूल्य

  • संविधानवाद एक विकासशील विचारधारा है, जिसके सिद्धांत सदियों से निरंकुश शासन के विरुद्ध संघर्षों और आधुनिक लोकतांत्रिक आकांक्षाओं द्वारा आकार लेते रहे हैं।
  • संविधानवाद के मूल मूल्य (19वीं शताब्दी का आधार): संविधानवाद निरंकुश राजतंत्र की प्रतिक्रिया के रूप में उभरा, जिसका उद्देश्य असीमित संप्रभु शक्ति पर लगाम लगाना था। इसके मूलभूत सिद्धांतों में शामिल थे:-
    • लिखित संविधान: एक सर्वोच्च, संहिताबद्ध दस्तावेज जो व्यक्तिगत विवेक के स्थान पर बाध्यकारी नियमों को स्थापित करता है।
    • विधि का शासन: यह विचार कि कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक कि संप्रभुता भी विधि से ऊपर नहीं है।
    • शक्तियों का पृथक्करण: सत्ता के संकेंद्रण को रोकने और निरंकुशतापूर्ण (निरपेक्ष) अधिकार का प्रतिकार करने के लिए विधायी, कार्यपालिका और न्यायिक शाखाओं में प्राधिकार का विभाजन।
    • ये मूल्य राज्य को सीमित करने और पूर्वानुमानित, उत्तरदायी शासन स्थापित करने पर केंद्रित थे।
  • संविधानवाद का समकालीन विकास: जैसे-जैसे लोकतांत्रिक विचार परिपक्व हुआ, संविधानवाद का विस्तार सत्ता को सीमित करने से लेकर व्यक्तियों को सशक्त बनाने तक हुआ:-
    • लोकतंत्र एक आधारभूत सिद्धांत के रूप में: लोकप्रिय संप्रभु और प्रतिनिधि संस्थाएँ इसकी प्रमुख विशेषताएँ बन गईं।
    • नकारात्मक से सकारात्मक संविधानवाद की ओर परिवर्तन: राज्य की कार्रवाई को सीमित करने के अलावा, संविधान अब कल्याण और न्याय को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक कर्तव्य भी निर्धारित करते हैं।
    • मौलिक अधिकारों और मानव गरिमा की केंद्रीयता: आधुनिक संविधानवाद स्वतंत्रता, समानता, निरंकुशता को रोकने और गरिमा को प्राथमिकता देता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि राज्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सक्रिय रूप से रक्षा करे।
    • इस प्रकार, आज संविधानवाद केवल सरकार पर नियंत्रण रखने पर नहीं, बल्कि अधिकारों की सुरक्षा और मानव सशक्तिकरण पर केंद्रित है।
  • राज्य-संबंधी’ मिथक का खंडन
    • वैश्वीकरण और डिजिटल शासन ने संवैधानिक मानदंडों को राज्य से आगे बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, निजी निगमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुँचा दिया है।
    • इसने एक बहुलवादी, समग्र और खंडित संवैधानिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया है, जहाँ जवाबदेही, अधिकारों की सुरक्षा और संवैधानिक नैतिकता जैसे सिद्धांत सीमाओं के पार भी संचालित होते हैं।
    • इसलिए आधुनिक संविधानवाद सुवाह्य है, नए शासन क्षेत्रों के अनुकूल है, और राज्य और गैर-राज्य दोनों प्रकार की शक्तियों को विनियमित करने के लिए आवश्यक है।

भारत में डिजिटल संविधानवाद की आवश्यकता

  • पुट्टस्वामी के बाद का संवैधानिक अधिदेश: न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) एवं अन्य बनाम भारत संघ (2017) मामले में अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद, सभी राज्य डिजिटल प्रणालियों को आवश्यकता, आनुपातिकता और निष्पक्षता की कसौटियों पर खरा उतरना होगा, जिससे अधिकार-आधारित डिजिटल ढाँचा अपरिहार्य हो जाएगा।
  • प्रौद्योगिकी के विकासात्मक लाभों को मान्यता: डिजिटल प्रणालियों ने बड़ी प्रगति को संभव बनाया है, जैसे कि JAM ट्रिनिटी, जिसने 52 करोड़ लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाया और कल्याणकारी योजनाओं के रिसाव को ₹2.7 लाख करोड़ तक कम किया, लेकिन अब इन लाभों को एक ऐसे ढाँचे के भीतर संचालित होना चाहिए निजता संबंधी सुरक्षा को समाहित करता हो।
    • JAM ट्रिनिटी (जन धन-आधार-मोबाइल) भारत के डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे को संदर्भित करता है जो लक्षित, पारदर्शी और वास्तविक समय आधारित सार्वजनिक सेवाएँ प्रदान करने के लिए जन धन बैंक खातों, आधार-आधारित पहचान सत्यापन और मोबाइल कनेक्टिविटी को जोड़ता है।
  • भविष्य के लिए संवैधानिक उपाय: चूँकि शासन में डेटा और एल्गोरिदम का उपयोग बढ़ता जा रहा है, इसलिए भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल अवसंरचनाएँ गरिमा, स्वायत्तता, समानता से युक्त हों, जिससे प्रौद्योगिकी मौलिक अधिकारों का हनन किए बिना विकास को समर्थन दे सके।

डिजिटल शक्ति नियंत्रण के वैश्विक उदाहरण

  • यूरोपीय संघ का सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (General Data Protection Regulation-GDPR) ढाँचा: यूरोपीय संघ का सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन, एल्गोरिथम संबंधी निर्णयों के लिए स्पष्टीकरण का अधिकार और भूल जाने का अधिकार जैसे मजबूत डिजिटल अधिकार स्थापित करता है, जो डेटा प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्वायत्तता को समाहित करता है।
  • यूरोपीय संघ का कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अधिनियम जोखिम-आधारित मॉडल: यूरोपीय संघ का प्रस्तावित कृत्रिम बुद्धिमत्ता अधिनियम, AI प्रणालियों को जोखिम श्रेणियों में वर्गीकृत करता है, जैसे अस्वीकार्य, उच्च और सीमित जोखिम एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए उच्च-जोखिम वाले अनुप्रयोगों के लिए ऑडिट, मानवीय निगरानी और कठोर अनुपालन मानकों को अनिवार्य करता है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका का राज्य-स्तरीय गोपनीयता ढाँचा: संयुक्त राज्य अमेरिका एक विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण अपनाता है, जहाँ कैलफोर्निया उपभोक्ता गोपनीयता अधिनियम (CCPA) जैसे कानून डेटा संग्रह तक पहुँचने, उसे सही करने, हटाने और ऑप्ट-आउट करने के अधिकार प्रदान करते हैं, लेकिन संघीय गोपनीयता कानून के अभाव के कारण सुरक्षा में व्यापक अंतर होता है।
  • वैश्विक दक्षिण का डिजिटल संप्रभुता परिप्रेक्ष्य: भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को गोपनीयता संरक्षण और समावेशन में संतुलन स्थापित करना होगा, क्योंकि पश्चिमी मॉडलों को बिना सोचे-समझे अपनाने से वे नागरिक हाशिए पर चले जाएंगे जो आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के लिए आधार से जुडी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) और अन्य डिजिटल प्रणालियों पर निर्भर हैं।

चुनौतियाँ और चिंताएँ जिनका समाधान आवश्यक है

  • निगरानी का विस्तार और भयावह प्रभाव: डिजिटल निगरानी अब मेटाडेटा, चेहरे की पहचान, डिवाइस ID, लोकेशन लॉग और व्यवहार मॉडलिंग के माध्यम से गोपनी यरूप से कार्य करती है, जिससे भय का माहौल बनता है जो असहमति और लोकतांत्रिक भागीदारी को हतोत्साहित करता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2023 में दिल्ली के विरोध स्थलों पर चेहरे की पहचान की सुविधा लागू करने से बड़े पैमाने पर पहचान संभव हुई।
  • कमजोर गोपनीयता सुरक्षा और व्यापक सरकारी छूट: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 राज्य को व्यापक छूट प्रदान करता है, जिससे सार्थक सहमति, निगरानी या पारदर्शिता के बिना डेटा संग्रह संभव हो जाता है, जिससे सहमति के लिए अनिवार्य क्लिक-थ्रू’ प्रक्रिया अपनाई जाती है।
    • उदाहरण: पहले कल्याणकारी योजनाओं और मोबाइल नंबरों के साथ आधार को अनिवार्य रूप से जोड़ने के परिणामस्वरूप लाखों लोगों के लिए सहमति अनिवार्य हो गई थी।
  • एल्गोरिथम शासन संबंधी जोखिम: चूँकि AI प्रणालियाँ कल्याणकारी लाभों, पुलिस व्यवस्था, क्रेडिट स्कोरिंग और रोजगार के अवसरों के लिए पात्रता तय करती हैं, इसलिए संवैधानिक मूल्यों को पूर्वाग्रह, मनमानी और अस्पष्ट परिणामों को रोकने के लिए डिजिटल निर्णय लेने की प्रक्रिया को आधार प्रदान करना होगा।
    • उदाहरण: डिजी यात्रा फेशियल रिकग्निशन प्रणाली (2024) ने महिलाओं और अल्पसंख्यक समूहों के लिए अपेक्षाकृत अधिक भ्रामक सकारात्मक परिणाम प्रदर्शित किए, जो एल्गोरिथ्मिक पूर्वाग्रह के व्यापक वैश्विक पैटर्न की पुनर्पुष्टि करते हैं।
    • गोपनीय प्रक्रिया के परिणाम AI या एल्गोरिथम प्रणालियों द्वारा लिए गए ऐसे निर्णयों को संदर्भित करते हैं जहाँ निर्णय के पीछे की प्रक्रिया, तर्क या मानदंड छिपे हुए, अस्पष्ट या व्याख्या करने योग्य नहीं होते हैं।
  • साइबर अपराध का बढ़ता दबाव: वर्तमान सरकारी आँकड़ों के अनुसार, साइबर अपराध के मामले वर्ष 2023 में 15.9 लाख से बढ़कर वर्ष 2024 में 20.4 लाख हो गए हैं, जिससे सरकार को संचार सहयोगी जैसे हस्तक्षेप-आधारित ट्रैकिंग उपकरणों के उपयोग को औचित्य प्रदान करना पड़ा, और इस प्रक्रिया में अनुपात, दायरे और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।।
  • राज्य प्रणालियों और बड़ी तकनीकी कंपनियों में सत्ता का संकेंद्रण: सत्ता का संकेंद्रण तकनीकी डिजाइनरों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और निजी कंपनियों के नियंत्रण में होता है। इससे एक असमान स्थिति पैदा होती है जहाँ नागरिक निष्क्रिय डेटा विषय तो होते हैं, लेकिन सक्रिय अधिकार-धारक नहीं होते, जैसा कि उदार लोकतंत्रों में माना जाता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2024 के चुनाव चक्र के दौरान प्रमुख प्लेटफार्मों द्वारा अचानक कंटेंट को हटा दिए जाने से पारदर्शी शिकायत तंत्र के बिना पत्रकार और रचनाकार प्रभावित हुए।
  • निगरानी कानून और निरीक्षण तंत्र का अभाव: भारत में न्यायिक वारंट, आनुपातिकता जाँच, संसदीय जाँच या स्वतंत्र लेखा परीक्षा के लिए वैधानिक ढाँचे का अभाव है, जिससे व्यापक निगरानी प्रणालियाँ संवैधानिक सीमाओं के बिना कार्य कर पाती हैं।
    • उदाहरण: CMS (केंद्रीय निगरानी प्रणाली) और नेटग्रिड, जिनका वर्ष 2024 में विस्तार किया जाएगा, एक समर्पित निगरानी कानून के बिना कार्य करना जारी रखते हैं।
  • तकनीकी विफलता के कारण डिजिटल बहिष्कार और अधिकारों का उल्लंघन: बायोमेट्रिक और ऐप-आधारित प्रमाणीकरण पर निर्भरता बुजुर्गों, दिव्यंगों, उंगलियों के अस्पष्ट निशान वाले शारीरिक श्रम करने वालों और कम कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में रहने वालों को बाहर कर देती है, जिससे कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच संवैधानिक अधिकारों के स्थान पर दोषपूर्ण तकनीक पर निर्भर हो जाती है।
    • उदाहरण: आधार बायोमेट्रिक विफलताओं के कारण झारखंड के कुछ हिस्सों में राशन देने से इनकार कर दिया गया (2024), जिससे भुखमरी को रोकने के लिए आपातकालीन मैन्युअल सत्यापन करना पड़ा।
  • डिजिटल शासन में संघीय दबाव और कार्यपालिका का अतिक्रमण: केंद्रीकृत डिजिटल निगरानी परियोजनाएँ प्रायः राज्य सरकारों को अस्वीकृत कर देती हैं, और कार्यकारी अधिसूचनाएँ प्रायः संसद को दरकिनार कर देती हैं, जिससे सहकारी संघवाद और शक्तियों का पृथक्करण कमजोर होता है।
    • उदाहरण: संचार सहयोगी पूर्व-स्थापना अधिदेश (2025) ने विधायी बहस को दरकिनार कर दिया और इसे वापस लेने से पहले कई राज्यों की आपत्तियों को उत्तेजित किया।

दार्शनिक आधार- डिजिटल संविधानवाद एक विकास के रूप में:

  • डिजिटल संविधानवाद अतीत से कोई विच्छेद नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों का एक नई तकनीकी वास्तविकता में स्वाभाविक विस्तार है। जैसे-जैसे दैनिक जीवन ऑनलाइन होता जा रहा है, पुराने एनालॉग आधारित कानूनी ढाँचे डिजिटल शक्ति के नए रूपों के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
  • डिजिटल युग में नए शक्ति असंतुलन:
    • डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र ने शक्ति की नई विषमताएँ पैदा कर दी हैं जिनका पारंपरिक जाँच प्रक्रिया से समाधान नहीं हो सकता।
    • सरकार अब व्यापक निगरानी प्रणालियों के माध्यम से बिग डेटा का संचयन करती है, जिसे प्रायः बढ़ती साइबर अपराध की घटनाओं के संदर्भ में औचित्य प्रदान किया जाता है।
    • बड़ी तकनीकी कंपनियाँ भी अधिकारों और विकल्पों को आकार देती हैं, संचार साथी प्रकरण में एप्पल का प्रतिरोध दर्शाता है कि कैसे निजी कंपनियाँ सार्वजनिक नीति को प्रभावित कर सकती हैं।
  • संवैधानिक सीमाएँ कई स्तरों पर लागू होनी चाहिए
    • आज संवैधानिक सुरक्षा को प्रभावी रूप से विभिन्न स्तरों पर कार्य करना होगा, जिसमें राष्ट्रीय कानून, GDPR जैसे- अंतरराष्ट्रीय नियामक ढाँचे, कॉर्पोरेट नीतियाँ और नागरिक समाज की सक्रियता एक समग्र प्रणाली के रूप में समन्वित हों।।
    • इसलिए भारत की प्रतिक्रिया बहुस्तरीय और समन्वित होनी चाहिए, न कि केवल अदालतों या संसद तक सीमित।
  • मूल संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा
    • इसका उद्देश्य संविधान को पुनः लिखना नहीं है, बल्कि स्वचालित और डेटा-संचालित शासन के युग में इसके मूल सिद्धांतों लोकतंत्र, विधि का शासन और अधिकारों की सुरक्षा को संरक्षित करना है।
    • डिजिटल संविधानवाद, नागरिकों के अधिकारों को भारत के डिजिटल भविष्य के केंद्र में रखते हुए, राज्य और शक्तिशाली निजी अभिकर्ताओं दोनों पर नियंत्रण रखने का प्रयास करता है।

भारत में डिजिटल संविधानवाद को संस्थागत बनाने की दिशा में आगे की राह

  • व्यापक निगरानी कानून: चेहरे की पहचान, मेटाडेटा और एकीकृत डेटाबेस सहित सभी राज्य निगरानी के लिए आवश्यकता, आनुपातिकता, न्यायिक निगरानी और स्वतंत्र ऑडिट को अनिवार्य बनाने वाला एक आधुनिक कानून लागू करना।
  • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम को सुदृढ़ करना: व्यापक सरकारी छूटों को हटाना, उद्देश्य सीमा, डेटा न्यूनीकरण और प्रमुख डेटा उल्लंघनों के लिए सख्त दायित्व लागू करना ताकि वे न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले के गोपनीयता संबंधी अधिदेश के अनुरूप हों।
  • एल्गोरिथमिक जवाबदेही: पुलिसिंग, कल्याण, क्रेडिट स्कोरिंग और सार्वजनिक क्षेत्र के निर्णय लेने में सभी उच्च-जोखिम प्रणालियों के लिए एल्गोरिथमिक प्रभाव आकलन, स्वतंत्र पूर्वाग्रह ऑडिट और मानवीय निगरानी को अनिवार्य करना।
  • स्वतंत्र डिजिटल अधिकार आयोग: उल्लंघनों की जाँच करने, उच्च-जोखिम प्रणालियों का ऑडिट करने और संवैधानिक अनुपालन सत्यापित होने तक प्रायोगिक शक्तियों वाला एक वैधानिक आयोग स्थापित करना।
  • डिजिटल अधिकारों का न्यायिक विस्तार: भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के भाग के रूप में स्पष्टीकरण के अधिकार, मानवीय समीक्षा के अधिकार और समयबद्ध डेटा विलोपन के अधिकार को मान्यता देना, जिससे स्वचालित निर्णयों में निष्पक्षता और गरिमा सुनिश्चित हो सके।
  • संवैधानिक मूल्यों को समाहित करना: सुनिश्चित करना कि सभी डिजिटल शासन भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 300A का सम्मान करते हैं, और वैध, आनुपातिक और पारदर्शी हस्तक्षेपों के लिए अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर प्रसंविदा (International Covenant on Civil and Political Rights- ICCPR) के अनुच्छेद 17 और अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन करते हैं।
  • डिजिटल साक्षरता और नैतिक जागरूकता: डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में स्वायत्तता, गोपनीयता और सूचित सहमति की सुरक्षा के लिए नागरिक जागरूकता को बढ़ावा देना।
  • तकनीकी मानक और प्रमाणन: प्रयोग से पहले विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए उच्च जोखिम युक्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और बायोमेट्रिक प्रणालियों के लिए राष्ट्रीय [(भारतीय मानक ब्यूरो (BIS)] या अंतरराष्ट्रीय [अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO)] मानकों को अपनाना।
  • सीमा पार डेटा प्रवाह और डिजिटल संप्रभुता: अंतरराष्ट्रीय डेटा प्रवाह को विनियमित करना, संवेदनशील नागरिक डेटा को निगरानी और उपचार के लिए भारत के कानूनी अधिकार क्षेत्र में रखना।

निष्कर्ष

डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ नागरिकता, सेवाओं, सहभागिता और पहचान को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जैसे-जैसे शासन डेटा-आधारित होता जा रहा है, स्वतंत्रता, समानता और गोपनीयता जैसे संवैधानिक मूल्यों को इसका मार्गदर्शन करना चाहिए। डिजिटल संवैधानिकता यह सुनिश्चित करती है कि प्रौद्योगिकी लोगों की सेवा करे, न कि सत्तावादी नियंत्रण की सहायता करे।

अभ्यास प्रश्न

डिजिटल संवैधानिकता से आप क्या समझते हैं? राज्य-नेतृत्व वाले साइबर सुरक्षा उपायों को नागरिक स्वायत्तता, सहमति और डेटा गोपनीयता से समझौता करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। संचार साथी विवाद के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए।

महापरिनिर्वाण दिवस

भारतीय राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा अन्य राष्ट्रीय नेताओं ने संसद परिसर में डॉ. बी.आर. अंबेडकर को 70वें महापरिनिर्वाण दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

महापरिनिर्वाण दिवस के बारे में

  • महापरिनिर्वाण दिवस प्रतिवर्ष 6 दिसंबर को भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है।
  • ऐतिहासिक महत्त्व: यह दिवस सामाजिक न्याय, समानता तथा वंचित समुदायों के उत्थान हेतु अंबेडकर के आजीवन संघर्ष की स्मृति को रेखांकित करता है।
  • विरासत: इस अवसर का उद्देश्य भारत के लोकतांत्रिक मूल्य–सम्मान, बंधुत्व तथा समावेशी राष्ट्रनिर्माण–को सुदृढ़ करने में अंबेडकर के स्थायी प्रभाव को सुदृढ़ करना है।

महापरिनिर्वाण’ के बारे में

  • बौद्ध मूल:  महापरिनिर्वाण शब्द बौद्ध ग्रंथों से उत्पन्न है, जो मृत्यु के उपरांत प्राप्त उस निर्वाण की अवस्था को दर्शाता है, जिसमें जन्म–मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति मिलती है।
  • अंबेडकर का बौद्ध धर्म से संबंध:  डॉ. अंबेडकर ने वर्ष 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार किया। वे इसे जाति–आधारित उत्पीड़न और असमानता से मुक्ति दिलाने वाला व्यक्तिगत एवं सामाजिक मार्ग मानते थे।
  • दार्शनिक प्रभाव:  अंबेडकर बुद्ध के तर्क, करुणा और नैतिक उत्तरदायित्व के उपदेशों से गहराई से प्रभावित थे, जिसने उनके विचारक एवं समाज-सुधारक रूप को आकार दिया।

20वाँ यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत समिति सत्र

भारत, नई दिल्ली में 20वें यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत समिति सत्र की मेजबानी कर रहा है।

यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत समिति सत्र के बारे में

  • अंतर-सरकारी समिति अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण हेतु यूनेस्को के वर्ष 2003 के अभिसमय को लागू करती है तथा जीवित सांस्कृतिक परम्पराओं की वैश्विक सुरक्षा का दायित्व निभाती है।
    • वर्ष 2003 का यह अभिसमय संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन द्वारा वर्ष 2003 में अंगीकृत किया गया तथा वर्ष 2006 में प्रभावी हुआ।
  • स्थल: 20वाँ सत्र 8–13 दिसंबर, 2025 तक नई दिल्ली के लाल किले में आयोजित किया जा रहा है।
    • 19वां सत्र आसुनसियोन, पराग्वे में आयोजित हुआ था।
  • प्रतिभागी: समिति में 24 राज्य पक्षकार प्रतिनिधि होते हैं, जिन्हें समान भौगोलिक प्रतिनिधित्व के साथ चार-वर्षीय अवधि के लिए चुना जाता है।
  • भारत की भूमिका:  भारत, जो वर्ष 2022–2026 चक्र हेतु समिति का सदस्य है, ने 20वें सत्र में प्रतिनिधि सूची हेतु दीपावली का नामांकन प्रस्तुत किया है।
  • कार्य: समिति प्रतिनिधि सूची और त्वरित संरक्षण सूची हेतु नामांकनों की समीक्षा करती है, ICH कोष का प्रबंधन करती है, अंतरराष्ट्रीय सहायता को अनुमोदित करती है, तथा अभिसमय के क्रियान्वयन हेतु प्रचालनात्मक दिशा-निर्देश विकसित करती है।

अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) के बारे में

  • अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में वे प्रथाएँ, अभिव्यक्तियाँ, ज्ञान और कौशल सम्मिलित होते हैं जिन्हें समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान का अंग मानते हैं और पीढ़ियों तक हस्तांतरित करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

  • ICH को समुदाय द्वारा मान्यता दी जानी चाहिए, समय के साथ प्रसारित किया जाना चाहिए, तथा सांस्कृतिक विविधता के लिए पहचान, निरंतरता और सम्मान में योगदान देना चाहिए।
  • भारत की यूनेस्को-सूचित अमूर्त सांस्कृतिक विरासत: भारत के 15 अमूर्त सांस्कृतिक विरासत तत्व यूनेस्को द्वारा सूचीबद्ध हैं, जिनमें सम्मिलित हैं:-
    • रामलीला (उत्तर भारत, 2008), कुटियाट्टम (केरल, 2008), वैदिक मंत्रोच्चार (पूरे भारत में, 2008), मुडियेट्टू (केरल, 2010), छऊ नृत्य (झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, 2010), कालबेलिया (राजस्थान, 2010), लद्दाख बौद्ध मंत्रोच्चार (लद्दाख, 2012), संकीर्तन (मणिपुर, 2013), ठठेरा क्राफ्ट (पंजाब, 2014), योग (भारत, 2016), नवरोज (पारसी, भारत, 2016), कुंभ मेला (भारत, 2017), दुर्गा पूजा (कोलकाता, 2021), और गरबा (गुजरात, 2023)

शिंगल्स वैक्सीन

वेल्स के एक नए दीर्घकालीन अध्ययन में पाया गया है कि शिंगल्स वैक्सीन (जोस्टावैक्स) डिमेन्शिया से होने वाली मृत्यु को उल्लेखनीय रूप से कम करता है।

शिंगल्स के बारे में

  • शिंगल्स एक विषाणुजनित संक्रमण है, जिसमें दर्दयुक्त चकते बनते हैं, जो सामान्यतः शरीर के एक ओर प्रभावित तंत्रिका मार्ग के साथ छालों की एक पट्टी के रूप में दिखाई देते हैं।
  • संक्रमण का कारण
    • यह संक्रमण वेरीसेला-जॉस्टर विषाणु के कारण होता है, यह वही विषाणु है, जो चिकनपॉक्स का कारण बनता है।
    • चिकनपॉक्स से ठीक होने के बाद, वायरस तंत्रिका कोशिकाओं में निष्क्रिय रहता है और बाद में प्रतिरक्षा कमजोर होने पर पुनः सक्रिय हो सकता है।
  • संक्रमण का प्रसार: जिन व्यक्तियों को कभी चिकनपॉक्स नहीं हुआ है, वे शिंगल्स के छालों से निकलने वाले द्रव के सीधे संपर्क में आने या वायु में फैले विषाणु कणों को साँस के माध्यम से ग्रहण करने पर संक्रमित हो सकते हैं।
  • टीका सिफारिश: यह टीका, जो विषाणु के पुनः सक्रिय होने को रोकता है, मुख्यतः 50 वर्ष से ऊपर के वयस्कों तथा प्रतिरक्षा-क्षीण व्यक्तियों (जैसे- HIV से प्रभावित लोग) हेतु अनुशंसित है।
  • टीकों के प्रकार
    • जॉस्टावैक्स (Zostavax): जीवित, दुर्बल विषाणु पर आधारित।
    • शिंग्रिक्स (Shingrix): पुनर्संयोजक तकनीक पर आधारित, जिसमें संक्रमण रहित विषाणु घटक होते हैं।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • जॉस्टावैक्स टीका प्राप्त करने वाले डिमेन्शिया रोगियों में 9 वर्ष की अनुवर्ती अवधि के दौरान मृत्यु का जोखिम 30 प्रतिशत कम पाया गया।
  • पूर्ववर्ती अध्ययन में यह पाया गया था कि जॉस्टावैक्स टीका प्राप्त करने वाले वृद्ध वयस्कों में उन लोगों की तुलना में डिमेन्शिया विकसित होने की संभावना 20 प्रतिशत कम थी, जिन्हें यह टीका नहीं लगा था।

डिमेन्शिया के बारे में

  • डिमेन्शिया संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट का एक व्यापक शब्द है, जिसमें स्मरणशक्ति, सोच, निर्णय क्षमता और तर्क शामिल हैं, और यह व्यक्ति के दैनिक जीवन को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त गंभीर होता है।
  • यह कोई एक विशिष्ट रोग नहीं, बल्कि विभिन्न अन्तर्निहित स्थितियों से जुड़ा एक सम्मिलित लक्षणसमूह है।

डिमेन्शिया के प्रकार

  • अल्जाइमर रोग: सबसे सामान्य प्रकार, जिसमें मस्तिष्क में ‘अमाइलॉइड प्लाक’ और ‘टाऊ टेंगल्स’ का संचय होता है, जिससे धीरे-धीरेस्मृति ह्रास’ और संज्ञानात्मक क्षय’ होता है।
  • वैस्कुलर डिमेन्शिया: मस्तिष्क को रक्त प्रवाह कम होने (प्रायः स्ट्रोक के बाद) से उत्पन्न, जिससे संज्ञानात्मक कमजोरी होती है।
  • लुई बॉडी डिमेन्शिया: मस्तिष्क में लुई बॉडी नामक असामान्य प्रोटीन जमाव के कारण उत्पन्न, इसमें गति संबंधी समस्याएँ, भ्रम तथा संज्ञानात्मक अवनति देखी जाती है।
  • फ्रंटोटेम्पोरल डिमेन्शिया (FTD): मस्तिष्क के फ्रंटल और टेम्पोरल लोब की क्रमिक अधःपतन प्रक्रिया, जिससे व्यक्तित्व, व्यवहार और भाषा पर प्रभाव पड़ता है।

अफ्रीका महाद्वीपीय विखंडन की ओर अग्रसर

शोधकर्ताओं के अनुसार अफ्रीका एक भूवैज्ञानिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, जिससे आगामी 5 से 10 मिलियन वर्ष में महाद्वीप दो भागों में विभाजित होकर एक नए महासागरीय बेसिन का निर्माण कर सकता है।

मुख्य निष्कर्ष

  • महाद्वीपीय विभाजन: अफ्रीका का विभाजन उत्तर-पूर्व से दक्षिण की ओर बढ़ रहा है, जहाँ प्रबल ज्वालामुखीय एवं भूकंपीय गतिविधियाँ हो रही हैं।
  • संभावित प्रभाव: विभाजन पूर्ण होने पर महाद्वीप दो भू-भागों में बँट सकता है:-
    • पश्चिमी भूभाग: मिस्र, अल्जीरिया, नाइजीरिया, घाना, नामीबिया।
    • पूर्वी भूभाग: सोमालिया, केन्या, तंजानिया, मोजाम्बिक तथा इथियोपिया के कुछ भाग।
  • वैज्ञानिक आधार
    • यह विभाजन प्लेट विवर्तनिकी के अनुरूप है, जिसके अंतर्गत पृथ्वी के महाद्वीप स्थिर नहीं होते और करोड़ों वर्षों से निरंतर खिसकते रहे हैं।
    • पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट, जो 4000 मील से अधिक लंबा एक प्रमुख रिफ्ट तंत्र है, विभाजन का मुख्य क्षेत्र है जहाँ पृथ्वी की भूपर्पटी कमजोर होकर अलग हो रही है।
  • अफार क्षेत्र: वैज्ञानिकों ने पूर्वानुमान लगाया है, कि अफ्रीका का अफार क्षेत्र टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण पृथ्वी का अगला महासागर बेसिन बन सकता है।
    • अवस्थिति: यह क्षेत्र इथियोपिया के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित है, जहाँ लाल सागर अदन की खाड़ी से मिलता है।
    • विशेषताएँ: अफार या दनाकिल अवसाद, जो उथली लवणीय झीलों और सक्रिय ज्वालामुखियों की शृंखला वाला रेगिस्तानी क्षेत्र है, इस क्षेत्र के उत्तरी भाग में स्थित है।
    • अवाश नदी घाटी इस क्षेत्र की दक्षिणी सीमा निर्धारित करती है।
    • महत्त्व: अफार क्षेत्र एक अद्वितीय ‘टेक्टोनिक ट्राई-जंक्शन’ है, जहाँ लाल सागर, अदन की खाड़ी और पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट एक साथ मिलते हैं।

EARTH शिखर सम्मेलन 2025

 

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गांधीनगर में अर्थ समिट 2025 का उद्घाटन किया औरसहकार सारथी’ के अंतर्गत कई डिजिटल पहलों की शुरुआत की।

अर्थ समिट 2025

  • अर्थ समिट 2025 का उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना तथा राष्ट्रीय नीति ढाँचा स्थापित करना है, जिसे वर्ष 2026 में दिल्ली में आयोजित होने वाले तीसरे शिखर सम्मेलन में अंतिम रूप दिया जाएगा।
  • आयोजक: इस शिखर सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) और इंटरनेट एवं मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है।
  • पहल: सहकार सारथी प्लेटफॉर्म के तहत 13 नई डिजिटल सेवाएँ शुरू की गईं। इनमें शामिल हैं –
    • डिजी-KCC
    • अभियान सारथी, वेबसाइट सारथी
    • सहकारी शासन सूचकांक
    • ई-पैक्स
    • अनाज भंडारण अनुप्रयोग
    • शिक्षा सारथी
    • सारथी प्रौद्योगिकी मंच
  • प्रौद्योगिकी एकीकरण: नाबार्ड कासहकार सारथी’ प्लेटफॉर्म सभी सहकारी बैंकों को एकीकृत प्रौद्योगिकीय ढाँचे के अंतर्गत लाने का उद्देश्य रखता है।
    • यह वसूली, वितरण, KYC, विधिक प्रलेखन और मूल्यांकन के लिए एक समेकित डिजिटल प्रणाली है।
  • गुजरात मॉडल: सहकारी समितियों के बीच सहयोग’ का मॉडल, जिसने सहकारी बैंकों को सहकारी प्रणाली के भीतर एकीकृत करके महत्त्वपूर्ण कम लागत वाली जमा राशि उत्पन्न की है, को पूरे देश में दोहराया जाना तय है।

हेपेटाइटिस B

हाल ही में अमेरिकी टीका सलाहकारों ने बच्चों के लिए नियमित हेपेटाइटिस-B टीकाकरण समाप्त करने तथा इसे केवल हेपेटाइटिस-B-पॉजिटिव माताओं के शिशुओं तक सीमित करने के प्रस्ताव पर मतदान स्थगित कर दिया, ताकि समीक्षा हेतु अधिक समय मिल सके।

हेपेटाइटिस B के बारे में

  • यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस B विषाणु के कारण होता है।
  • संक्रमण: यह खुले  घावों तथा संक्रमित व्यक्ति के रक्त, लार या स्राव के संपर्क के माध्यम से फैलता है।
    • यह सुई, चोट, टैटू बनवाने की प्रक्रिया के माध्यम से भी संचरित हो सकता है।
  • लक्षण: हेपेटाइटिस B विषाणु संक्रमण से पेट दर्द, थकान और पीलिया हो सकता है, यद्यपि अनेक लोग लक्षण-रहित रहते हैं।
    • अधिकांश वयस्कों में यह स्वाभाविक रूप से ठीक हो जाता है, लेकिन शिशुओं में 90% से अधिक तथा छोटे बच्चों में 50% तक मामलों में यह दीर्घकालिक रूप ले लेता है। दीर्घकालिक अवस्था में यकृत विफलता की संभावना बढ़ जाती है और प्रत्यारोपण की आवश्यकता हो सकती है, क्योंकि इसका कोई उपचार नहीं है।
  • गंभीरता: विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2022 में पूरे विश्व में लगभग 254 मिलियन लोग दीर्घकालिक हेपेटाइटिस B संक्रमण से ग्रसित थे, तथा प्रत्येक वर्ष लगभग 1.2 मिलियन नए संक्रमण सामने आते हैं।
  • उपचार
    • एक्यूट हेपेटाइटिस B: अधिकांश मामले सहायक देखभाल से स्वयं ठीक हो जाते हैं; कोई विषाणुरोधी उपचार आवश्यक नहीं।
    • क्रॉनिक हेपेटाइटिस B: इसे टेनोफोविर और एंटेकाविर जैसे विषाणुरोधी औषधों से नियंत्रित किया जाता है। यकृत क्षति से बचाव हेतु नियमित निगरानी आवश्यक है।
  • रोकथाम
    • टीकाकरण: 3-4 खुराक वाला सुरक्षित और अत्यधिक प्रभावी टीका, जो दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करता है।
    • सार्वभौमिक सावधानियाँ: सुरक्षित चिकित्सा पद्धतियाँ, सुई विनिमय कार्यक्रम और सुरक्षित यौन संबंध संक्रमण को कम करते हैं।
    • जन्म खुराक: संक्रमित माताओं से जन्मे शिशुओं को माँ से बच्चे में संक्रमण को रोकने के लिए 24 घंटे के भीतर टीके की पहली खुराक मिलनी चाहिए।

हरिमाउ शक्ति अभ्यास

हाल ही में, भारत और मलेशिया ने 5वाँ हरिमाउ शक्ति अभ्यास प्रारंभ किया।

हरिमाउ शक्त‍ि अभ्यास के बारे में

  • हरिमाउ शक्त‍ि भारत और मलेशिया के बीच द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है, जिसका उद्देश्य आतंकवाद-निरोध तथा शांतिरक्षा परिवेश में संयुक्त परिचालन क्षमता को सुदृढ़ करना है।
  • यह अभ्यास प्रतिवर्ष भारत और मलेशिया में क्रमिक रूप से आयोजित होता है।
    • इस अभ्यास का प्रथम संस्करण वर्ष 2012 में मलेशिया में आयोजित हुआ था।
  • वर्ष 2025 के प्रतिभागी
    • भारत: भारतीय सेना कीडोगरा रेजिमेंट’ के सैनिक।
    • मलेशिया: शाही मलेशियाई सेना की 25वीं बटालियन के कार्मिक।
  • अवस्थिति: महाजन फील्ड फायरिंग रेंज, राजस्थान।
  • मुख्य केंद्रित क्षेत्र
    • अंतरसंचालनशीलता: संयुक्त राष्ट्र के अध्याय 7 अधिदेश के अंतर्गत उप-पारंपरिक अभियानों में समन्वित संचालन क्षमता विकसित करना।
    • आतंकवाद-रोधी प्रशिक्षण: घेराबंदी और तलाशी, खोज-और-विनाश मिशन, कक्ष हस्तक्षेप अभ्यास।
    • हेलीबोर्न ऑपरेशन: शत्रुतापूर्ण इलाकों में हेलीपैड की सुरक्षा और घायलों को निकालना।
    • युद्ध कौशल: आर्मी मार्शल आर्ट्स रूटीन (AMAR), कॉम्बैट रिफ्लेक्स शूटिंग, और योग सहित संयुक्त शारीरिक कंडीशनिंग।
    • मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) सामंजस्य: संयुक्त प्रतिक्रिया तंत्र को बढ़ाना और परिचालन जोखिमों को कम करना।

InvIT के दर्जे के लिए SEBI की मंजूरी

SEBI ने NHAI के राजमार्ग इंफ्रा इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (RIIT) को सैद्धांतिक मंजूरी प्रदान की है, जिससे InvIT ढाँचे के माध्यम से राजमार्ग प्राधिकरण की परिसंपत्ति-मुद्रीकरण रणनीति को आगे बढ़ाया जा सकेगा।

राजमार्ग इन्फ्रा इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट के बारे में

  • यह एक ‘पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट’ है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय राजमार्गों के मुद्रीकरण में व्यापक जन-भागीदारी सुनिश्चित करना है।

स्वीकृति के बारे में

  • SEBI की प्रारंभिक स्वीकृति: SEBI ने RIIT को SEBI (इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) विनियम, 2014 के अंतर्गत प्रारंभिक पंजीकरण की स्वीकृति दी है। जिससे अंतिम InvIT स्थिति की ओर इसकी प्रगति सक्षम हो गई है।
  • अंतिम पंजीकरण की शर्तें: RIIT को अगले 6 माह  के भीतर निदेशकों की नियुक्ति, वित्तीय विवरण प्रस्तुत करना और सभी विनियामक अनुपालन आवश्यकताओं को पूरा करना जैसी शर्तें पूरी करनी होंगी।

इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) के बारे में

  • InvITs भारत में एक महत्त्वपूर्ण एवं बढ़ता हुआ निवेश साधन है, जिसे प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड द्वारा विनियमित किया जाता है।
  • यह संस्थागत तथा खुदरा निवेशकों को परिचालनीय अवसंरचना परियोजनाओं (जैसे सड़कें, विद्युत संचरण लाइनें, पाइपलाइनें) के पोर्टफोलियो में निवेश कर प्रतिफल अर्जित करने की सुविधा देता है।

सेबी (SEBI) के बारे में

  • सेबी भारत का प्रतिभूति बाजार का स्वायत्त नियामक है, जिसका उद्देश्य निवेशकों का संरक्षण तथा पारदर्शी एवं कुशल बाजार संचालन सुनिश्चित करना है।
  • कानूनी प्रावधान: सेबी को वैधानिक दर्जा सेबी अधिनियम, 1992 के माध्यम से प्राप्त हुआ, जो इसे भारत के प्रतिभूति बाजार का विनियमन, विकास और पर्यवेक्षण करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • संरचना: सेबी बोर्ड में एक अध्यक्ष, वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि, RBI द्वारा नामित व्यक्ति और भारत सरकार द्वारा नामित सदस्य शामिल होते हैं।
  • सेबी के अधिकार
    • विनियम स्थापित करना, जाँच करना तथा दंड आरोपित करना, ताकि बाजार की अखंडता सुनिश्चित हो सके।
    • SEBI को 100 करोड़ से अधिक की धन-संग्रह योजनाओं को विनियमित करने और अनुपालन न होने पर परिसंपत्तियाँ संलग्न करने का अधिकार है।
    • SEBI मध्यस्थों तथा सामूहिक निवेश साधनों (InvITs एवं म्यूचुअल फंड सहित) का पंजीकरण और पर्यवेक्षण कर सकता है।

सेबी के कार्य

  • निवेशक हितों की रक्षा हेतु पारदर्शिता सुनिश्चित करना और बाजार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना।
  • सेबी जारीकर्ताओं और मध्यस्थों के लिए एक विनियमित बाजार उपलब्ध कराकर कुशल पूँजी निर्माण को बढ़ावा देता है।
  • वेंचर कैपिटल फंड, म्यूचुअल फंड तथा स्व-नियामक संगठनों का विनियमन कर बाजार अनुशासन को सुदृढ़ करना।

संदर्भ

RBI ने परिवर्तनशील वित्तीय परिस्थितियों के बीच सतत् तरलता सुनिश्चित करने के लिए ₹1 लाख करोड़ की ‘ओपन मार्केट ऑपरेशन’ (OMO) खरीद और 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर/INR स्वैप की घोषणा की है।

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सरकारी प्रतिभूतियों (G-secs) के बारे में

  • सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-secs) केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक व्यय हेतु धन उधार लेने हेतु जारी किए जाने वाले ऋण उपकरण हैं।
  • G-secs निवेशकों द्वारा सरकार को दिए जाने वाले ऋण के रूप में कार्य करते हैं, जो निश्चित प्रतिफल, संप्रभु समर्थन के कारण नगण्य जोखिम, उच्च तरलता और नियमित ब्याज भुगतान प्रदान करते हैं, जिससे ये पूँजी संरक्षण और स्थिर आय चाहने वाले निवेशकों के लिए सुरक्षित, निश्चित आय विकल्प बन जाते हैं।
  • ये अल्पकालिक (ट्रेजरी बिल) और दीर्घकालिक (दिनांकित प्रतिभूतियाँ/बॉण्ड) रूपों में हो सकते हैं, जो परिपक्वता पर मूलधन और ब्याज का पुनर्भुगतान प्रदान करते हैं।

RBI के हस्तक्षेप की मुख्य विशेषताएँ

  • वृहद पैमाने पर तरलता प्रवाह: RBI ₹1,00,000 करोड़ मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-sec) खरीदेगा, जिसमें से ₹50,000 करोड़ 11 दिसंबर, 2025 को और शेष राशि इसी महीने के अंत में खरीदी जाएगी।
  • अतिरिक्त रुपया-डॉलर स्वैप: विनिमय दर के स्तर को लक्ष्य किए बिना स्थाई तरलता प्रदान करने के लिए 5 बिलियन डॉलर का 3-वर्षीय USD/INR खरीद-बिक्री स्वैप किया जाएगा।
  • RBI द्वारा तरलता आश्वासन: RBI ने मुद्रा परिसंचरण, विदेशी मुद्रा संचालन और आरक्षित निधि रखरखाव आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त तरलता सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की।

ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के बारे में

  • ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) एक प्राथमिक मात्रात्मक मौद्रिक नीति उपकरण है, जिसका उपयोग भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जैसे केंद्रीय बैंक, खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद या बिक्री करके मुद्रा आपूर्ति और तरलता को नियंत्रित करने के लिए करते हैं।
  • उद्देश्य: OMO विशेषतः अस्थिरता या तरलता की कमी के दौर में तरलता को विनियमित करने, मौद्रिक संचरण का समर्थन करने और स्थिर वित्तीय स्थिति बनाए रखने में मदद करते हैं।
  • तंत्र: RBI तरलता बढ़ाने के लिए प्रतिभूतियों की खरीद करता है या अधिशेष निधियों का विक्रय करता है, जिससे मुद्रा आपूर्ति और ब्याज दरें प्रभावित होती हैं।

डॉलर-रुपया’ स्वैप के बारे में

  • डॉलर-रुपया’ स्वैप प्रक्रिया में केंद्रीय बैंक, बैंकों से रुपये के बदले डॉलर खरीदता है (तरलता प्रदान करता है) और साथ ही बाद में उन्हें एक निर्धारित दर और प्रीमियम पर वापस बेचने पर सहमत होता है।
  • उद्देश्य: रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करना, डॉलर के भंडार को कम किए बिना रुपये में तरलता प्रदान करना और डॉलर की उपलब्धता सुनिश्चित करके मुद्रा को स्थिर करना, जो तरलता प्रबंधन और विनिमय दर स्थिरता के लिए एक प्रमुख उपकरण के रूप में कार्य करता है।

अर्थव्यवस्था पर अपेक्षित प्रभाव

  • बैंकिंग प्रणाली में बेहतर तरलता: बड़े पैमाने पर OMOs खरीद और USD/INR  स्वैप से तरलता प्राप्त होगी, ऋण की स्थिति आसान होगी और मौद्रिक संचरण को समर्थन मिलेगा।
  • बिना किसी हस्तक्षेप के विनिमय दर स्थिरता: RBI ने स्पष्ट किया कि यह ‘स्वैप’ प्रक्रिया एक तरलता उपकरण है, न कि मुद्रा रक्षा उपाय, जिससे बाजार-संचालित रुपया मूल्यांकन और मजबूत बाह्य बुनियादी अवधारणाओं में विश्वास की पुष्टि होती है।
  • बाहरी चुनौतियों के बीच विकास को समर्थन: वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में 1.3% का प्रबंधनीय चालू खाता घाटा (CAD), 688.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और अनुकूलित सेवा निर्यात के साथ, बढ़ी हुई तरलता विकास को बनाए रखने में मदद करेगी क्योंकि मुद्रास्फीति का दृष्टिकोण नीतिगत संभावना प्रदान करता है।

RBI के तरलता उपाय और बाह्य स्थिरता में विश्वास एक सक्रिय, विकास-समर्थक दृष्टिकोण का संकेत देते हैं, जो मुद्रा अस्थिरता और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद सुचारू मौद्रिक संचरण और अनुकूलन सुनिश्चित करता है।

संदर्भ

वोरैयूर सूती साड़ी और थूयामल्ली चावल सहित तमिलनाडु के पाँच उत्पादों को हाल ही में GI टैग प्राप्त हुआ है, जिससे राज्य के GI टैग प्राप्त उत्पादों की कुल संख्या 74 हो गई है।

तमिलनाडु के GI –टैग उत्पाद (वर्ष 2025)

GI उत्पाद प्रमुख विशेषताएँ
वोरैयुर सूती साड़ी (तिरुचि)

(Woraiyur Cotton Sari) (Tiruchi)

  • कोयंबटूर और राजपालयम से प्राप्त सूती धागे का उपयोग करके मानामेदु (तमिलनाडु के तिरुचि जिले में) में हाथ से बुनी जाती है।
  • जयमकोंडम से प्राप्त पारंपरिक रंग, रंगों की प्रामाणिकता को बढ़ाते हैं।
कविन्दपडी नट्टू सक्कराई (इरोड) (Kavindapadi Nattu Sakkarai) (Erode)

  • स्थानीय गन्ने के रस के धीमे वाष्पीकरण द्वारा निर्मित किया जाता है।
  • इस गन्ने की खेती में निचली भवानी परियोजना नहर द्वारा सिंचित उपजाऊ खेतों की अहम भूमिका है।
थूयामल्ली चावल (तमिलनाडु) (Thooyamalli Rice) (Tamil Nadu)

  • पारंपरिक 135-140 दिन की सांभा-ऋतु की चावल की किस्म, जिसका अर्थ है ‘शुद्ध चमेली’।
  • GI आवेदन, तमिलनाडु विपणन बोर्ड और नाबार्ड मदुरै फोरम द्वारा समर्थित।
नमक्कल मक्कल पथिरंगल (कलचट्टी) 

(Namakkal Makkal Pathirangal) (Kalchatti)

  • सोपस्टोन कुकवेयर उत्कृष्ट ऊष्मा धारण क्षमता और प्राचीन परंपरा के लिए जाना जाता है।
  • नमक्कल स्टोन प्रोडक्ट्स मैन्युफैक्चरर्स (वर्ष 2022) द्वारा पुनः प्रयोग के बाद GI प्रमाणित है।
अंबासमुद्रम चोप्पु समन (तिरुनेलवेली)

(Ambasamudram Choppu Saman) (Tirunelveli)

  • दो शताब्दियों से भी अधिक समय से हस्तनिर्मित लकड़ी के खिलौने बनाए जा रहे हैं।
  • मंजल कदंब, सागौन और शीशम जैसी स्थानीय लकड़ियों से निर्मित किया जाता है।

GI टैग के बारे में

  • भौगोलिक संकेतक (GI) उन उत्पादों की पहचान करता है, जिनकी गुणवत्ता या प्रतिष्ठा उनके भौगोलिक मूल से जुड़ी होती है, तथा यह प्रामाणिकता और कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • कानूनी ढाँचा: माल का भौगोलिक उपदर्शन (रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999, जो संबंधित नियमों (जैसे वर्ष 2002 के नियम और हाल ही में हुए वर्ष 2025 के संशोधन) द्वारा समर्थित है।
    • यह भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री के माध्यम से लागू उत्पादों को उनके विशिष्ट भौगोलिक मूल से जोड़कर कानूनी संरक्षण प्रदान करता है, दुरुपयोग को रोकता है, उपभोक्ताओं की सुरक्षा करता है, तथा क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देता है।
  • प्रदानकर्ता: केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री द्वारा जारी जिए जाते है।
  • महत्त्व
    • बाजार में पहचान, निर्यात क्षमता और उत्पादों की ब्रांडिंग को बढ़ाता है।
    • पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करता है, स्थानीय कारीगरों को लाभ पहुँचाता है और सतत् क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देता है।

संदर्भ

प्रवर्तन निदेशालय ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को ‘केरल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड’ (KIIFB) द्वारा जारी मसाला बॉण्ड से संबंधित विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के कथित उल्लंघन के लिए ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया है।

बाह्य वाणिज्यिक उधारी (External Commercial Borrowings-ECB) 

  • ECBs का तात्पर्य विदेशी ऋणदाताओं से लिए गए वाणिज्यिक ऋणों से है, जैसे- बैंक ऋण, क्रेता ऋण, आपूर्तिकर्ता ऋण, और प्रतिभूतिकृत लिखत, जिनकी न्यूनतम औसत परिपक्वता अवधि 3 वर्ष है।
  • ECB नियम, विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉण्ड (FCCBs) पर भी लागू होते हैं, जो भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशी मुद्रा में जारी किए जाते हैं और उन्हें FEMA नियमों का पालन करना होता है।

मसाला बॉण्ड के बारे में

  • मसाला बॉण्ड, भारतीय संस्थाओं द्वारा पूँजी जुटाने के लिए विदेशों में जारी किए जाने वाले रुपये-मूल्यवर्ग के बॉण्ड होते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) ने भारत की संस्कृति और व्यंजनों को दर्शाने के लिए मसाला’ नाम दिया।
  • मसाला बॉण्ड’ क्यों शुरू किए गए?
    • इनके लागू होने से पहले, भारतीय कंपनियाँ मुख्यतः बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ECB) के माध्यम से विदेशों से धन एकत्रित करती थीं।
    • इससे एक महत्त्वपूर्ण जोखिम उत्पन्न होता था, क्योंकि पुनर्भुगतान की अवधि में रुपये के अवमूल्यन की स्थिति में उधार लेने की लागत में तीव्र वृद्धि हो सकती थी।।
    • मसाला बॉण्ड’ इस विनिमय दर जोखिम को भारतीय जारीकर्ता से विदेशी निवेशकों पर स्थानांतरित कर देते हैं।
  • मसाला बॉण्ड कैसे कार्य करते हैं?
    • निवेशक लेनदेन की तिथि पर बॉण्ड के रुपये मूल्य के बराबर राशि विदेशी मुद्रा में भुगतान करते हैं।
    • बॉण्ड की कीमत पूरी तरह से रुपये में तय की जाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि जारीकर्ता को विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का सामना न करना पड़े।
  • परिपक्वता अवधि: मसाला बॉण्ड के लिए RBI नियमों के अनुसार (वर्ष 2017)
    • प्रति वित्तीय वर्ष 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक के निर्गमों के लिए न्यूनतम परिपक्वता अवधि 3 वर्ष होनी चाहिए।
    • 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के निर्गमों के लिए न्यूनतम परिपक्वता अवधि 5 वर्ष होनी चाहिए।
  • प्रथम मसाला बॉण्ड
    • प्रथम मसाला बॉण्ड वर्ष 2014 में IFC द्वारा बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए जारी किया गया था।
    • HDFC, जुलाई 2016 में लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर रुपया-मूल्यवर्गीय मसाला बॉण्ड जारी करने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी।
    • वर्ष 2019 में, केरल मसाला बॉण्ड का उपयोग करके धन एकत्रित करने वाला भारत का पहला राज्य बना।
    • KIIFB ने ₹2,678 करोड़ मूल्य के ऐसे बॉण्ड जारी किए, जो लंदन स्टॉक एक्सचेंज और सिंगापुर एक्सचेंज में दोहरी सूची में हैं।

मसाला बॉण्ड के लाभ और उद्देश्य

  • वैश्विक पूँजी तक पहुँच: मसाला बॉण्ड भारतीय कंपनियों, बुनियादी ढाँचा एजेंसियों और वित्तीय संस्थानों को रुपया-मूल्यवर्गित ऋण उपकरण जारी करके अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पूँजी जुटाने का अवसर प्रदान करते हैं, जिससे वैश्विक पूँजी पूल और विदेशी निवेशकों तक उनकी पहुँच बढ़ती है।
  • मुद्रा जोखिम कम करना: भारतीय रुपये में बॉण्ड जारी करके, मसाला बॉण्ड भारतीय जारीकर्ताओं के लिए मुद्रा जोखिम कम करते हैं, क्योंकि पुनर्भुगतान INR में किया जाता है, इस प्रकार उन्हें USD (अमेरिकी डॉलर) या EUR (यूरो) जैसी विदेशी मुद्राओं में विनिमय दर के उतार-चढ़ाव से बचाते हैं।
  • भारतीय रुपये को बढ़ावा देना: मसाला बॉण्ड भारतीय रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण में योगदान करते हैं, जिससे वैश्विक बाजारों में मुद्रा की माँग बढ़ती है।
  • विदेशी निवेश आकर्षित करना: रुपये में रिटर्न अर्जित करते हुए भारतीय परियोजनाओं में निवेश करने का अवसर प्रदान करके, मसाला बॉण्ड विदेशी निवेश को आकर्षित करते हैं, जिससे भारत के चालू खाते को संतुलित करने में मदद मिलती है।

संदर्भ 

केंद्र सरकार ने संसद को सूचित किया है कि विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों (DNT/NT/SNT) को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग वर्गीकरण में पुनर्वर्गीकृत करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।

पृष्ठभूमि

  • समग्र अवलोकन: मानव विज्ञान सर्वेक्षण ने आदिवासी अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से 3 वर्ष का व्यापक नृवंशीय अध्ययन किया, जिसमें 268 विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों की पहचान हुई।
  • यह अध्ययन, देश के सबसे बड़े अध्ययनों में से एक, नीति आयोग की समिति द्वारा अधिदेशित था।
  • अध्ययन की शुरुआत (वर्ष 2019): वर्गीकरण प्रक्रिया वर्ष 2019 में DNT/NT/SNT के लिए विकास कल्याण बोर्ड (DWBDNC) की स्थापना के बाद आरंभ हुई।
  • सिफारिशें: प्रमुख सिफारिशों में 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 179 समुदायों को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग सूचियों में शामिल करना शामिल है।

नृवंशीय सर्वेक्षण 

  • नृवंशीय सर्वेक्षण एक व्यवस्थित, क्षेत्र-आधारित अध्ययन है, जिसमें समुदाय के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन, परंपराओं, रीति-रिवाजों, आजीविका, सामाजिक संरचना और पहचान चिह्नों का दस्तावेजीकरण किया जाता है।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ कौन हैं?

  • सर्वाधिक वंचित समुदाय: जिन्हेंविमुक्त जातियाँ’ भी कहा जाता है, ये भारत के सबसे अधिक हाशिये पर स्थित और वंचित जनसंख्या समूहों में शामिल हैं।
  • विमुक्त जनजातियाँ (DNT)
    • औपनिवेशिक काल: वर्ष 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत इन समुदायों कोजन्मजात अपराधी’ घोषित किया गया।
      • इन समुदायों को निरंतर निगरानी, ​​सख्त नियंत्रण और दीर्घकालिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा।
      • स्वतंत्रता के बाद विकास: वर्ष 1952 में इन औपनिवेशिक कानूनों को समाप्त किया गया और समुदायों को आधिकारिक रूप से विमुक्त’ घोषित किया गया।
    • घुमंतू जनजातियाँ (NT): घुमंतू जनजातियाँ ऐसे समूह हैं, जो पारंपरिक रूप से बिना किसी स्थायी आवास के एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं, तथा नमक व्यापार, कला प्रदर्शन और पशुपालन जैसे व्यवसायों के माध्यम से अपना जीवन निर्वाह करते हैं।
      • उदाहरण: गुज्जर, गाड़िया लोहार।
    • अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ (SNT): अर्द्ध-घुमंतू जनजातियाँ ऐसे समुदाय हैं जो वर्ष के कुछ समय तक गतिशील रहते हैं, लेकिन विशिष्ट अवधियों के दौरान, प्रायः वर्षा ऋतु में, एक निश्चित स्थान पर लौट आते हैं, तथा वर्ष के शेष समय में आजीविका के अवसरों की तलाश में प्रवास करते हैं।
      • उदाहरण: धनगर, लांबाड़ा।
  • सामान्य विशेषताएँ
    • भूमि स्वामित्व का अभाव: ऐतिहासिक रूप से, इन समुदायों के पास निजी भूमि या आवासीय स्वामित्व तक बहुत कम या बिल्कुल पहुँच नहीं रही है।
    • पहचान दस्तावेजों का अभाव और शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और कल्याणकारी योजनाओं तक कम पहुँच है।
    • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग वर्गीकरण से बहिष्कृत होने के कारण कई लोग लक्षित लाभों से वंचित रह गए।
  • जनसंख्या: वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 10.74 करोड़ लोग DNT, NT और SNT समुदायों से संबंधित हैं।
  • NCRWC निष्कर्ष (वर्ष 2002): संविधान समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने पाया कि DNT समुदायों को प्रायः गलत तरीके से अपराध प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के रूप में उपेक्षित किया जाता है और प्राधिकारियों एवं समाज के व्यापक स्तर पर नियमित रूप से उनका शोषण किया जाता है।
  • मान्यता: स्वतंत्रता के बाद से विभिन्न समितियों ने अपनी चुनौतियों पर प्रकाश डाला है, जिनमें शामिल हैं:-
    • अपराधी जनजाति जाँच समिति (वर्ष 1947)
    • अनंथमसयनम अयंगार समिति (वर्ष 1949), जिसने आपराधिक जनजाति अधिनियम के निरसन की सिफारिश की।
    • काका कालेकर आयोग (वर्ष 1953)
    • मंडल आयोग (वर्ष 1980)
  • रेन्के आयोग (वर्ष 2008): रेन्के आयोग ने इस बात पर प्रकाश डाला कि अधिकांश DNT/NT/SNT  समुदायों में बुनियादी पहचान दस्तावेजों, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और आजीविका सहायता का अभाव है।
  • इदाते आयोग (वर्ष 2014): विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों (DNT) की एक व्यापक राज्यव्यापी सूची तैयार करने के लिए भिकू रामजी इदाते की अध्यक्षता में वर्ष 2014 में इदाते आयोग की स्थापना की गई थी।
    • आयोग को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणियों से बाहर रह गए समुदायों की पहचान करने तथा उनके सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए उचित कल्याणकारी उपायों की सिफारिश करने का भी कार्य सौंपा गया था।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए विकासात्मक प्रयास

  • डॉ. अंबेडकर प्री-मैट्रिक एवं पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति: वर्ष 2014-15 में शुरू की गई यह केंद्र प्रायोजित योजना, उन DNT छात्रों को सहायता प्रदान करती है जो SC/ST/OBC श्रेणियों में शामिल नहीं हैं।
  • नानाजी देशमुख छात्रावास योजना: वर्ष 2014-15 में शुरू की गई यह योजना अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणियों के अंतर्गत न आने वाले DNT छात्रों  के लिए छात्रावास की सुविधा प्रदान करती है।
  • DNTs के आर्थिक सशक्तीकरण की योजना
    • यह पहल प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निःशुल्क कोचिंग, स्वास्थ्य बीमा कवरेज, आवास सहायता और आजीविका सहायता प्रदान करती है।
    • यह व्यापक विकास सहायता के लिए वर्ष 2021-22 से शुरू होने वाले पाँच वर्षों में ₹200 करोड़ आवंटित करती है।
    • विमुक्त जनजातियों के लिए विकास एवं कल्याण बोर्ड (DWBDNC) इस योजना के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार है।

विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध-घुमंतू समुदायों के लिए विकास एवं कल्याण बोर्ड

  • कानूनी स्थिति: सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत।
  • स्थापना: इसका गठन 21 फरवरी, 2019 को किया गया था, जिसके अध्यक्ष भीकू रामजी इदाते थे।
  • मुख्यालय: नई दिल्ली
  • नोडल मंत्रालय: केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय।
  • संरचना
    • अध्यक्ष:  भारत सरकार द्वारा नियुक्त
    • सदस्य सचिव/मुख्य कार्यकारी अधिकारी: भारत सरकार में संयुक्त सचिव स्तर
    • भारत सरकार द्वारा नामित 3 पदेन सदस्य और 5 मनोनीत सदस्य।

संदर्भ

भारत ने कार्बन संग्रहण, उपयोग और भंडारण (CCUS) के लिए अपना पहला अनुसंधान एवं विकास रोडमैप लॉन्च किया है।

कार्बन संग्रहण, उपयोग और भंडारण (CCUS) के बारे में 

  • कार्बन संग्रहण, उपयोग और भंडारण (CCUS) उन तकनीकों के समूह को संदर्भित करता है जो औद्योगिक स्रोतों या वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को ग्रहण करते हैं तथा संगृहित की गई CO₂ का परिवहन करते हैं और या तो इसका उपयोग उत्पादक उद्देश्यों के लिए करते हैं या इसे वायुमंडल में उत्सर्जित होने से रोकने के लिए इसे स्थायी रूप से भूमिगत रूप में संगृहित करते हैं।
  • इन तकनीकों का उद्देश्य COको वायुमंडल में प्रवेश करने और जमा होने से रोकना है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग पर इसके प्रभाव को कम किया जा सके।

CCUS प्रौद्योगिकी के तीन चरण

  • कार्बन प्रग्रहण: पहला चरण औद्योगिक गैस धाराओं से CO₂ को ग्रहण करने पर केंद्रित है, और प्रग्रहण तकनीक का चयन धारा में CO₂ की सांद्रता तथा इसके इच्छित उपयोग के आधार पर किया जाता है।
  • कार्बन उपयोग: दूसरे चरण में संग्रहण की गई COको हरित यूरिया, शुष्क बर्फ, कार्बोनेटेड पेय पदार्थ, निर्माण सामग्री और विभिन्न रसायनों जैसे उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है।
  • कार्बन भंडारण: तीसरा चरण CO₂ के दीर्घकालिक भंडारण से संबंधित है। संगृहित की गई CO₂ को स्थायी भंडारण के लिए भू-वैज्ञानिक संरचनाओं जैसे-लवणीय जलभृतों, समाप्त हो चुके तेल और गैस भंडारों, या अन्य स्थिर भूमिगत संरचनाओं में अंतःक्षेपित किया जाता है।

भारत को CCUS की आवश्यकता क्यों है?

  • चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जक है, जो वार्षिक रूप से लगभग 2.6 गीगाटन CO उत्सर्जित करता है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, देश औद्योगिक विकास और आधारभूत विद्युत उत्पादन के लिए कोयले, तेल और प्राकृतिक गैस पर अत्यधिक सीमा तक निर्भर है, जिससे तत्काल चरणबद्ध तरीके से उत्सर्जन को समाप्त करना अवास्तविक है।
  • भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएँ और चुनौतियाँ
    • जलवायु प्रतिबद्धताएँ: भारत सरकार ने वर्ष 2050 तक COउत्सर्जन में 50% की कटौती करने और वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का संकल्प लिया है।
    • केवल नवीकरणीय ऊर्जा ही इस्पात, सीमेंट, उर्वरक और तापीय ऊर्जा जैसे कठिन उद्योगों को कार्बन-मुक्त नहीं कर सकती है।
    • इसलिए, वर्तमान उत्सर्जन को कम करने और दीर्घकालिक, निम्न-कार्बन औद्योगिक विकास के मार्ग प्रशस्त करने के लिए CCUS आवश्यक हो जाता है।

संबंधित रोडमैप 

  • DST द्वारा तैयार: यह रोडमैप विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा CCUS प्रौद्योगिकियों को आगे बढ़ाने के राष्ट्रीय प्रयासों का मार्गदर्शन करने के लिए विकसित किया गया है।
  • इसमें कुशल जनशक्ति, सुदृढ़ नियामक मानकों, सुरक्षा प्रोटोकॉल और साझा CCUS अवसंरचना में शीघ्र निवेश सहित सक्षम ढाँचों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

इस रोडमैप के मुख्य घटक

  • वर्तमान प्रौद्योगिकियों को उन्नत करना: इसका उद्देश्य केंद्रित अनुसंधान और प्रायोगिक परिनियोजन के माध्यम से मौजूदा CCUS प्रौद्योगिकियों को व्यावसायिक तत्परता के उच्च स्तर तक पहुँचाना है।
  • अभूतपूर्व प्रौद्योगिकियाँ: अग्रणी सामग्रियों और उन्नत रासायनिक अभिक्रियाओं सहित अगली पीढ़ी के CCUS नवाचारों को परिवर्तनकारी समाधानों में तेजी लाने के लिए समर्पित समर्थन प्राप्त होगा।
  • विषयगत प्राथमिकताएँ: इनमें CO₂ संग्रहण दक्षता में सुधार, उपयोग के तरीकों में विविधता लाना, दीर्घकालिक भंडारण क्षमताएँ विकसित करना और एकीकृत कार्बन प्रबंधन प्रणालियाँ डिजाइन करना शामिल हैं।
  • सक्षम पारिस्थितिकी तंत्र: नीतिगत समर्थन, नियामक मानकों, सुरक्षा मानदंडों, प्रारंभिक चरण के बुनियादी ढाँचे और क्षमता निर्माण पहलों से युक्त एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र को बड़े पैमाने पर CCUS परिनियोजन के लिए आवश्यक माना जाता है।

रोडमैप में प्रस्तावित मुख्य अनुसंधान एवं विकास ढाँचा

रोडमैप में भारत की CCUS क्षमताओं को विकसित करने के लिए वर्ष 2025 से वर्ष 2045 तक विस्तारित एक संरचित त्रि-चरणीय अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम का प्रस्ताव है।

  • चरण 1 (वर्ष 2025- वर्ष 2030): आधारभूत अनुसंधान और पायलट प्रदर्शन
    • यह चरण बुनियादी और अनुप्रयुक्त अनुसंधान को मजबूत करने, मौजूदा तकनीकों की दक्षता में सुधार लाने और ऐसी नवीन सामग्रियों एवं प्रक्रियाओं को विकसित करने पर केंद्रित है जो CO₂ संग्रहण प्रक्रियाओं की लागत को कम कर सकें।
    • इसका उद्देश्य आशाजनक समाधानों के प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (TRL) को बढ़ाना और प्रमुख उद्योगों में पायलट-स्तरीय प्रदर्शन शुरू करना भी है।
  • चरण 2 (वर्ष 2030- वर्ष 2035): औद्योगिक एकीकरण और नियामक विकास
    • इस चरण में, रिपोर्ट कृष्णा-गोदावरी बेसिन, राजस्थान, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर जैसे क्षेत्रों में CCUS केंद्रों और समूहों की स्थापना की परिकल्पना करती है।
    • इसमें COके संग्रहण, परिवहन और भंडारण को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय नियामक ढाँचे का मसौदा तैयार करने का भी प्रस्ताव है, जिसमें दायित्व, निगरानी, ​​कार्बन मूल्य निर्धारण और सुरक्षा प्रोटोकॉल के लिए दिशा-निर्देश शामिल हैं।
  • चरण 3 (वर्ष 2035- वर्ष 2045): वाणिज्यिक तैनाती एवं विस्तार
    • अंतिम चरण का उद्देश्य प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में CCUS को व्यापक, व्यावसायिक स्तर पर अपनाना है।
    • इसमें CO₂ परिवहन नेटवर्क का निर्माण, करोड़ों टन भंडारण क्षमता संचालन को सक्षम बनाना और कार्बन-मुक्त औद्योगिक अर्थव्यवस्था बनाने के लिए CCUS को उभरती हाइड्रोजन-आधारित प्रौद्योगिकियों के साथ एकीकृत करना शामिल है।

अनुसंधान एवं विकास के लिए प्रौद्योगिकी मार्ग

इस रोडमैप में भारत के औद्योगिक परिदृश्य के अनुरूप CCUS प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए आवश्यक तीन प्रमुख अनुसंधान एवं विकास मार्गों की पहचान की गई है।

  • एंड-ऑफ-पाइप (EOP) प्रौद्योगिकियाँ: रोडमैप में कहा गया है कि EOP प्रौद्योगिकियाँ, फ्लू गैस धाराओं से सीधे CO₂ को प्रग्रहण करने में सक्षम बनाकर मौजूदा उद्योगों को पुनःस्थापित करने में मदद करेंगी।
  • नए औद्योगिक संयंत्रों के लिए CCUS-अनुरूप डिजाइन (CCD): रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि भविष्य के सभी औद्योगिक संयंत्रों को CCUS प्रौद्योगिकियों को प्रभावी ढंग से एकीकृत करने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए।
  • प्रत्यक्ष ‘कन्वर्जन वन-पॉट’ (COP) प्रौद्योगिकियाँ
    • यह रोडमैप उन प्रौद्योगिकियों में दीर्घकालिक निवेश को बढ़ावा देता है जो CO₂ को प्रत्यक्षे रूप से उपयोगी उत्पादों, जैसे- कम कार्बन वाले ईंधन, निर्माण सामग्री, उर्वरक और रसायनों में परिवर्तित कर सकती हैं।
    • इसमें कहा गया है कि हालाँकि इनमें से कई प्रौद्योगिकियाँ अभी भी प्रारंभिक शोध चरण में हैं, फिर भी इनमें भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिए परिवर्तनकारी क्षमता है।

जलवायु परिवर्तन को कम करने में CCUS की भूमिका

  • औद्योगिक उत्सर्जन में कमी: CCUS, स्टील, सीमेंट, उर्वरक और ताप विद्युत संयंत्रों जैसे कठिन-से-कम करने योग्य उद्योगों से CO₂ को अवशोषित करके, उसे वायुमंडल में प्रवेश करने से रोककर, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को उल्लेखनीय रूप से कम करता है।
  • संक्रमणकालीन जीवाश्म ईंधन उपयोग: CCUS, कोयला, तेल और गैस संचालन की कार्बन तीव्रता को कम करके ऊर्जा संक्रमण के दौरान मौजूदा जीवाश्म ईंधन अवसंरचना के निरंतर उपयोग की अनुमति देता है।
  • नकारात्मक उत्सर्जन क्षमता: CCUS, डायरेक्ट एयर संग्रहण और ‘बायोएनर्जी विद कार्बन संग्रहण एंड स्टोरेज’ (Bioenergy with Carbon Capture and Storage- BECCS) जैसी तकनीकों के साथ संयुक्त होने पर, नकारात्मक उत्सर्जन को सक्षम बनाता है, जिससे पहले से उत्सर्जित COको वायुमंडल से पृथक करने में मदद मिलती है।

भारत में CCUS विकास की वर्तमान स्थिति

  • भारत में CCUS परीक्षण केंद्र: मई 2025 में, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने अनुवादात्मक अनुसंधान एवं विकास के लिए पाँच CCUS परीक्षण केंद्रों की स्थापना को मंजूरी दी।
    • ये परीक्षण केंद्र सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत शिक्षा जगत और उद्योग जगत के सहयोग से स्थापित किए जाएँगे, जिसमें शीर्ष अनुसंधान प्रयोगशालाएँ और अग्रणी सीमेंट कंपनियाँ उद्योग भागीदार के रूप में शामिल होंगी।
  • नीति आयोग का नीतिगत ढाँचा: नीति आयोग ने भारत में CCUS परियोजनाओं के लिए एक स्पष्ट नियामक वातावरण स्थापित करने हेतु ‘कार्बन संग्रहण, उपयोग और भंडारण नीति ढाँचा और उसका परिनियोजन तंत्र’ (2022) विकसित किया है।
  • भारत में संचालित CCUS परियोजनाएँ
    • ONGC हजीरा CCUS परियोजना: इस परियोजना में हजीरा गैस प्रसंस्करण संयंत्र से CO₂ को एकत्रित करके उसे दीर्घकालिक भंडारण के लिए समुद्र तल के नीचे एक गहरे लवणीय जलभृत में प्रक्षेपित किया जाएगा।
    • NTPC सीपत CCUS परियोजना: NTPC सीपत परियोजना, सीपत विद्युत संयंत्र की फ्लू गैस से CO₂ को एकत्रित करके उसे यूरिया, जो एक प्रमुख उर्वरक है, में परिवर्तित करेगी।
    • रिलायंस इंडस्ट्रीज जामनगर CCUS परियोजना: रिलायंस की जामनगर परियोजना, रिफाइनरी से CO₂ को एकत्रित करेगी और उसका उपयोग एथिलीन, जो एक महत्त्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक है, के उत्पादन के लिए करेगी।

संदर्भ

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए भारत की दो दिवसीय राजकीय यात्रा पर आए। 

  • इस शिखर सम्मेलन के पश्चात जारी संयुक्त वक्तव्य में विविध क्षेत्रों में स्थायी सहयोग को रेखांकित करते हुए इस संबंध की दृढ़ता और परिपक्वता को प्रदर्शित किया गया।

भारत-रूस सामरिक साझेदारी की उत्पत्ति और विकास

  • ऐतिहासिक उपलब्धि (2000): 3 अक्टूबर, 2000 को, भारत और रूस ने भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए, जो पारंपरिक मैत्री से शीत युद्धोत्तर व्यापक रणनीतिक संबंधों की ओर एक ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक था।
  • रणनीतिक उन्नयन (2010): वर्ष 2010 में, इस साझेदारी को विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी‘ के रूप में उन्नत किया गया, जो दोनों देशों के पारंपरिक क्षेत्रों से परे सहयोग का विस्तार करने के उद्देश्य को दर्शाता है।
  • निरंतरता और अनुकूलन (2025): वर्ष 2025 में इस साझेदारी के 25 वर्ष पूर्ण होने पर, यह रणनीतिक सहनशक्ति और अनुकूलनशीलता का एक आदर्श उदाहरण बन गया है।

संयुक्त वक्तव्य के मुख्य परिणाम

  • रणनीतिक साझेदारी की पुष्टि: दोनों देशों ने अपनी विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी पर जोर दिया और वर्ष 2000 की रणनीतिक साझेदारी घोषणा के 25 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया, वैश्विक स्थिरता के प्रति विश्वास, अभिसरण और प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
  • व्यापार और अर्थव्यवस्था में तेजी: भारत-यूरेशियन आर्थिक संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को प्रोत्साहित करना, राष्ट्रीय मुद्रा-आधारित लेनदेन का विस्तार, रसद तंत्र में सुधार, तथा वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का नया लक्ष्य, ये सभी पहलें साझेदारी को एक संरचित और भविष्य प्रधान दिशा प्रदान करती हैं।।
  • ऊर्जा सहयोग एक केंद्रीय स्तंभ के रूप में: तेल, गैस, पेट्रोकेमिकल्स, अपस्ट्रीम तकनीक, LNG/LPG अवसंरचना, भूमिगत कोयला गैसीकरण और निवेश संबंधी मुद्दों के समाधान में व्यापक सहयोग; दीर्घकालिक उर्वरक आपूर्ति सुनिश्चित की गई है।
  • संपर्क गलियारों का विस्तार: अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा और उत्तरी समुद्री मार्ग (आर्कटिक) पर सहयोग को मजबूत किया गया, साथ ही रेलवे तकनीकी साझेदारी को भी बढ़ाया गया।

अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) के बारे में

  • भारत → ईरान → रूस → यूरोप को जोड़ने वाला 7,200 किलोमीटर का मल्टीमॉडल नेटवर्क (जहाज-रेल-सड़क), जिसे यात्रा समय और लागत में 40% तक की कटौती करने के लिए डिजाइन किया गया है।
  • यह यूरेशियाई बाजारों तक भारत की पहुँच को मजबूत करता है और स्वेज नहर जैसे पारंपरिक मार्गों पर निर्भरता को कम करता है।

चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे के बारे में

  • चेन्नई और व्लादिवोस्तोक के मध्य प्रस्तावित सीधे समुद्री मार्ग का उद्देश्य शिपिंग समय को 40 दिनों से घटाकर लगभग 12-15 दिन करना है।
  • यह रूस के सुदूर पूर्व के साथ व्यापार को बढ़ावा देगा और ऊर्जा, खनिज, शिपिंग एवं जनशक्ति में सहयोग को बढ़ावा देगा।

उत्तरी समुद्री मार्ग (आर्कटिक) के बारे में

  • रूस के आर्कटिक तट के समानांतर स्थित एक शिपिंग लेन, जो पिघलती बर्फ के कारण अधिक सुलभ रूप मे उपलब्ध  है।
  • यह स्वेज मार्ग का एक छोटा विकल्प प्रदान करता है, जिससे यूरोप-एशिया पारगमन समय में 30-40% तक की कमी आती है।
  • भारत आर्कटिक रसद, अनुसंधान और परिवहन अवसरों पर रूस के साथ सहयोग कर रहा है।

वोडो-वोडानोई एनर्जेटिकेस्की रिएक्टर, या जल-जल ऊर्जा रिएक्टर (VVER) 

  • यह रूस का दाबित जल रिएक्टरों (PWR) के लिए प्राथमिक डिजाइन है, जो अपनी द्वि-लूप प्रणाली, क्षैतिज वाष्प उत्सर्जक और षट्कोणीय ईंधन संयोजनों के लिए जाना जाता है।

  • रक्षा एवं सैन्य-तकनीकी सहयोग में वृद्धि: ‘मेक-इन-इंडिया’ कार्यक्रम के अंतर्गत सह-विकास, सह-उत्पादन तथा संयुक्त अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करने की प्रवृत्ति, संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘इंद्र’ की सराहना, तथा रूसी-निर्मित प्रणालियों के लिए पुर्जों एवं घटकों के संयुक्त निर्माण, ये सभी कदम रक्षा सहयोग को अधिक आत्मनिर्भर, प्रौद्योगिकी-साझेदारी आधारित और दीर्घकालिक बनाते हैं।
  • परमाणु एवं अंतरिक्ष सहयोग में वृद्धि: कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (NPP) में हुई प्रगति तथा दूसरे संभावित परमाणु ऊर्जा परियोजना स्थल पर जारी विचार-विमर्श को रेखांकित किया गया।
    • भारत में ‘VVER-1200’ रिएक्टर इकाइयों वाले एक नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए तकनीकी विनिर्देश रूसी पक्ष द्वारा प्रस्तावित किए जा रहे हैं।
    • परमाणु उपकरणों के संयुक्त निर्माण और मानव अंतरिक्ष उड़ान तथा रॉकेट इंजन विकास सहित इसरो-रोस्कोस्मोस सहयोग में भी प्रगति हुई है।
    • प्रमुख परमाणु ऊर्जा विस्तार: रूस भारत के लिए एक व्यापक परमाणु ऊर्जा-विस्तार पैकेज को आगे बढ़ा रहा है, जिसके अंतर्गत वह स्माल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और फ्लोटिंग न्यूक्लियर रिएक्टर्स जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों को प्रस्तुत कर रहा है, जिससे भारतीय ऊर्जा परिदृश्य में उसकी तकनीक भारत के तीव्र, निम्न-कार्बन बेसलोड ऊर्जा विकास प्रयासों का एक केंद्रीय घटक बन सकती है।
  • भारत-रूस गतिशीलता संबंधी समझौते (अर्द्ध-कुशल एवं कुशल श्रमिक): भारत और रूस ने दो समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं जो भारतीय कुशल और अर्द्ध-कुशल श्रमिकों की सुरक्षित, औपचारिक, सरकार-विनियमित गतिशीलता को सक्षम बनाते हैं, जिससे रूस की लगभग 500,000 श्रमिकों की आवश्यकता पूरी होती है।
    • ये समझौते शोषण तथा अनियमित भर्ती को रोकने के उद्देश्य से तैयार किए गए हैं, विशेषकर अतीत में भारतीय नागरिकों को गुमराह कर रूसी सेना में शामिल किए जाने की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में, और भारत को विदेशों में रोजगार संबंधी प्रक्रियाओं की व्यवस्थित निगरानी एवं सुगमीकरण में सहायक सिद्ध होंगे।
  • पर्यटक आदान-प्रदान: भारत शीघ्र ही रूसी नागरिकों के लिए 30-दिवसीय निःशुल्क ई-पर्यटक वीजा और 30-दिवसीय समूह पर्यटक वीजा शुरू करेगा।
  • बहुपक्षीय संरेखण और वैश्विक शासन: रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता हेतु अपने समर्थन की पुनर्पुष्टि की; संयुक्त राष्ट्र, G20, ब्रिक्स और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों में मजबूत सहयोग पर बल दिया; सुधारित बहुपक्षवाद को आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त प्रतिबद्धताओं को रेखांकित किया; तथा वर्ष 2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया।।
    • इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA): दोनों पक्षों ने रूसी पक्ष द्वारा इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (IBCA) में शामिल होने के लिए रूपरेखा समझौते को अपनाने का स्वागत किया।

CCIT के बारे में

  • यह एक प्रस्तावित अंतर-सरकारी सम्मेलन है जो आतंकवादी कृत्यों पर मुकदमा चलाने के लिए कानूनी अधिकार प्रदान करेगा, क्योंकि इसका उद्देश्य सभी प्रकार के अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद को अपराध घोषित करना और आतंकवादियों, उनके वित्तपोषकों और समर्थकों को धन, हथियार एवं सुरक्षित स्थानों तक पहुँच से वंचित करना है।
  • भारत ने पहली बार वर्ष 1996 में संयुक्त राष्ट्र में CCIT के गठन का प्रस्ताव रखा था।

    • भारतीय पक्ष ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) में रूस के शीघ्र शामिल होने की आशा व्यक्त की।
  • आतंकवाद-निरोध एवं क्षेत्रीय सुरक्षा: आतंकवाद के प्रति शून्य-सहिष्णुता का दृष्टिकोण, पहलगाम और क्रोकस सिटी हॉल में हुए हमलों की निंदा, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र के व्यापक सम्मेलन (CCIT) को अपनाने का आह्वान, और अफगानिस्तान, मध्य पूर्व स्थिरता और जलवायु परिवर्तन पहलों पर समन्वित दृष्टिकोण।

भारत-रूस संबंधों का ऐतिहासिक विकास

  • प्रारंभिक राजनयिक आधार: भारत और सोवियत संघ ने वर्ष 1947 में राजनयिक संबंध स्थापित किए, जिससे विश्वास और पारस्परिक सम्मान पर आधारित दीर्घकालिक साझेदारी की नींव रखी गई।
  • औद्योगीकरण के लिए सोवियत समर्थन: 1950-60 के दशक में, सोवियत संघ ने भिलाई इस्पात संयंत्र, बोकारो और रांची के भारी मशीन निर्माण संयंत्र जैसी परियोजनाओं के माध्यम से भारत के औद्योगिक आधार के निर्माण में सहायता की।
  • वर्ष 1971 का रणनीतिक संबंध: भारत-सोवियत शांति, मैत्री और सहयोग संधि (1971) ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भारत को महत्त्वपूर्ण राजनयिक और सैन्य समर्थन प्रदान किया।
  • सोवियत-पश्चात पुनर्परिभाषा: वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद, नई वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप लोकतांत्रिक और बाजार सिद्धांतों के आधार पर संबंधों का पुनर्गठन किया गया।
  • संस्थागत साझेदारी: वर्ष 2000 में इस संबंध को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया गया, तथा वर्ष 2010 में इसे विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी का दर्जा प्रदान किया गया, जो वैश्विक स्तर पर भारत के अत्यंत सीमित और विशिष्ट द्विपक्षीय संबंधों में से एक है।

अंतर-सरकारी आयोग 

  • यह दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग के क्षेत्रों में द्विपक्षीय प्रगति की नियमित निगरानी के लिए एक तंत्र है, जिसे मई 1992 में हस्ताक्षरित व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग पर अंतर-सरकारी आयोग के समझौते द्वारा स्थापित किया गया था।

संस्थागत ढाँचा और रणनीतिक संवाद तंत्र

  • अंतर-सरकारी आयोग: भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग (IRIGC) दोनों देशों के बीच संबंधों के परिचालन आधार स्तंभ के रूप दो प्रमुख कार्यक्षेत्रों के माध्यम से कार्य करता है:-
    • व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग (IRIGC–TEC): भारत के विदेश मंत्री और रूस के प्रथम उप-प्रधानमंत्री की सह-अध्यक्षता में, यह व्यापार, प्रौद्योगिकी और नवाचार-संचालित सहयोग का प्रबंधन करता है।
    • सैन्य एवं सैन्य-तकनीकी सहयोग पर संयुक्त आयोग (IRIGC–M&MTC), जिसकी सह-अध्यक्षता दोनों देशों के रक्षा मंत्री करते हैं, रक्षा उत्पादन, आधुनिकीकरण तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के क्षेत्र में परस्पर सहयोग को आगे बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
  • वार्षिक शिखर सम्मेलन-शीर्ष वार्ता: वार्षिक शिखर सम्मेलन राजनीतिक दिशा और रणनीतिक मार्गदर्शन के लिए सर्वोच्च-स्तरीय तंत्र बना हुआ है।
    • अब तक 22 शिखर सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं, और वर्ष 2024 के मास्को शिखर सम्मेलन मेंभारत-रूस: स्थायी और विस्तारित साझेदारी’ संयुक्त वक्तव्य को अपनाया गया है।
  • 2+2 मंत्रिस्तरीय वार्ता: वर्ष 2021 में शुरू किया गया, 2+2 प्रारूप दोनों पक्षों के विदेश और रक्षा मंत्रियों को रणनीतिक प्राथमिकताओं को समन्वित करने और साझेदारी के राजनयिक और सुरक्षा आयामों को जोड़ने में सक्षम बनाता है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा और संसदीय संबंध: नियमित राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) वार्ता, मंत्रिस्तरीय दौरे और अंतर-संसदीय आयोग कई स्तरों पर समन्वय बनाए रखते हैं।

रसद समझौते का पारस्परिक आदान-प्रदान (RELOS)

  • हाल ही में, रूस ने भारत के साथ RELOS सैन्य रसद समझौते की पुष्टि की, यह भारत-रूस के बीच एक समझौता है जिसके तहत दोनों देश अपने-अपने सैन्य ठिकानों से दूर अभियानों के दौरान सैनिकों, युद्धपोतों और विमानों के लिए एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं को रसद और सहायता प्रदान करते हैं।
  • यह एक-दूसरे के हवाई क्षेत्र, बंदरगाहों, रसद सुविधाओं तक पारस्परिक पहुँच और सैन्य तैनाती के लिए सरलीकृत सहायता को सक्षम बनाता है।

विभिन्न देशों के साथ भारत के रसद समझौते

  • भारत और अमेरिका: लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA), 2016।
  • भारत और ऑस्ट्रेलिया: म्यूचुअल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (MLSA), 2020।
  • भारत और जापान: ऐक्विजिशन एंड क्रॉस-सर्विसिंग एग्रीमेंट (ACSA), 2020।

सहयोग के स्तंभ

  • रक्षा और सामरिक सुरक्षा: रक्षा क्षेत्र, भारत-रूस विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी की आधारशिला बना हुआ है।
    • भारत के रक्षा आयात का सर्वाधिक हिस्सा रूस (36 प्रतिशत) से प्राप्त हुआ, यद्यपि यह अनुपात वर्ष 2015–19 के 55 प्रतिशत तथा वर्ष 2010–14 के 72 प्रतिशत की तुलना में उल्लेखनीय रूप से कम है।
    • प्रमुख पहलों में शामिल हैं:-
      • भारत में S-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली, T-90 टैंक, सुखोई-30MKI विमान और मिग-29 लड़ाकू विमानों के साथ-साथ AK-203 असॉल्ट राइफल का उत्पादन भी शामिल है।
      • कलिनिनग्राद में फ्रिगेट ‘INS तुशील’ और INS तमाल (नवीनतम स्टील्थ मल्टी-रोल फ्रिगेट) का भी जलावतरण किया गया।
      • ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना, भारत-रूस तकनीकी सामंजस्य का प्रतीक है, जिसे मित्र देशों को निर्यात करने की योजना है।
      • इंद्र’ जैसे नियमित संयुक्त सैन्य अभ्यास, और रक्षा आधुनिकीकरण, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष-आधारित सुरक्षा प्रणालियों में सहयोग।
  • ऊर्जा सहयोग – रणनीतिक जीवनरेखा: ऊर्जा सहयोग का दूसरा स्तंभ है, जिसमें रूस कच्चे तेल, कोयला और परमाणु ऊर्जा प्रौद्योगिकी का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है।
    • कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना (तमिलनाडु) – भारत का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा सहयोग संयंत्र है जो असैन्य परमाणु साझेदारी का प्रतीक है।
    • रूसी तेल और गैस क्षेत्रों में भारत के निवेश और रियायती कच्चे तेल के आयात ने इसकी ऊर्जा सुरक्षा और विविधीकरण को बढ़ाया है।
    • दोनों पक्ष भारत के ऊर्जा परिवर्तन लक्ष्यों के अनुरूप, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG), आर्कटिक ऊर्जा अन्वेषण और नवीकरणीय क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार कर रहे हैं।
    • भारत अपनी कुल कच्चे तेल की खपत का 35-40% रूस से आयात करता है।
  • व्यापार और आर्थिक साझेदारी: आर्थिक सहयोग में अत्यधिक वृद्धि हुई है, जिससे रूस भारत के शीर्ष पाँच व्यापारिक साझेदारों में से एक बन गया है।
    • द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ा है और वित्त वर्ष 2024-25 में रिकॉर्ड 68.7 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है,
      • भारतीय निर्यात 4.9 बिलियन डॉलर (मुख्यतः फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, लोहा एवं इस्पात, तथा समुद्री उत्पाद)
      • रूस से आयात 63.8 बिलियन डॉलर (मुख्यतः कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, सूरजमुखी तेल, उर्वरक, कोकिंग कोयला, और कीमती पत्थर/धातुएँ)
    • दोनों देश अपने नेतृत्त्वकर्त्ताओं द्वारा निर्धारित महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों की दिशा में काम कर रहे हैं: वर्ष 2025 तक 50 अरब डॉलर का पारस्परिक निवेश और वर्ष 2030 तक 100 अरब डॉलर का वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार।
    • दोनों देश व्यापार विस्तार को संस्थागत बनाने के लिए भारत और यूरेशियन आर्थिक संघ के बीच एक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर कार्य कर रहे हैं।
  • भारत-रूस सांस्कृतिक संबंध: अफनासी निकितिन की 15वीं शताब्दी में अस्त्राखान स्थित प्रारंभिक रूसी बस्तियों की यात्रा और कोलकाता में गेरासिम लेबेदेव के रंगमंच (थिएटर) से लेकर सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध हैं।
    • भारतीय फिल्मों, नृत्य और योग के प्रति रूसियों का लगाव आज भी प्रबल है; रूसी शहरों में योग का व्यापक रूप से अभ्यास किया जाता है।
      • उदाहरण के लिए: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल ही में भारत और रूस के बीच मित्रता की स्थायी मजबूती पर जोर देने के लिए बॉलीवुड के दिग्गज राज कपूर का उदाहरण दिया।
    • मॉस्को स्थित जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केंद्र भारतीय कलाओं (कथक, तबला, हिंदुस्तानी संगीत, योग) को बढ़ावा देता है तथा रूसी विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी करता है।

  • वर्ष 2019 में, रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने भारत और रूस के बीच विशेष मित्रता को मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, ‘ऑर्डर ऑफ द होली एपोस्टल एंड्रयू द फर्स्ट’ से सम्मानित किया।

    • CEP/ICCR के अंतर्गत नियमित सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भारतीय मंडलियों द्वारा वार्षिक प्रदर्शन शामिल हैं; मानविकी, कला, आयुर्वेद और संगीत में रूसी छात्रों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जाती हैं।
    • हाल की प्रमुख घटनाएँ: मास्को में आयोजित भारत उत्सव 2025, जिसमें लगभग 8.5 लाख आगंतुकों ने भाग लिया तथा पाँच प्रमुख शहरों में सम्पन्न भारतीय फिल्म महोत्सव 2025 तथा 60 से अधिक क्षेत्रों में मनाया गया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भारत-रूस सांस्कृतिक परस्परता के निरंतर विस्तार को रेखांकित करते हैं।
    • वर्ष 2025 मास्को अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में भारत मुख्य अतिथि था; रूस में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों का औपचारिक प्रदर्शन किया गया।
    • उच्च-स्तरीय सांस्कृतिक संबंध बने हुए है, जिसमें फिल्म संबंधी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए WAVES शिखर सम्मेलन के लिए रूसी संस्कृति मंत्री की वर्ष 2025 की भारत यात्रा भी शामिल है।
  • प्रौद्योगिकी और नवाचार संबंध: सहयोग के उभरते क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, जहाज निर्माण और रेलवे आधुनिकीकरण शामिल हैं।
    • अटल नवाचार मिशन और रूस के सीरियस एजुकेशनल फाउंडेशन के अंतर्गत पहल युवाओं के बीच संयुक्त अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देती है।
  • बहुपक्षीय अभिसरण: भारत और रूस संयुक्त राष्ट्र (UN), G20, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स जैसे वैश्विक और क्षेत्रीय मंचों पर घनिष्ठ समन्वय बनाए रखते हैं। रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी का समर्थन करता रहेगा।
    • दोनों देश एक बहुध्रुवीय, नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखते हैं तथा आतंकवाद-निरोध, अफगानिस्तान की स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक दक्षिण की विकास प्राथमिकताओं पर सहयोग पर जोर देते हैं।
    • ब्रिक्स और SCO के अंतर्गत उनका समन्वय सुधारित वैश्विक शासन के लिए सामूहिक समर्थन को और मजबूत करता है।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • प्रतिबंध और भुगतान प्रतिबंध: पश्चिमी प्रतिबंधों ने वित्तीय समझौतों को जटिल बना दिया है, जिससे व्यापार और निवेश का सुचारू प्रवाह सीमित हो गया है।
    • उदाहरण: भारतीय बैंकों को रुपया-रूबल लेनदेन करने में सावधानी बरतनी पड़ रही है, जिससे सरकारी सुविधा उपायों के बावजूद व्यापार धीमा हो रहा है।
    • अमेरिकी टैरिफ वृद्धि: इस वर्ष अगस्त में, ट्रंप ने भारत से आने वाले सामानों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया, जिससे कुल शुल्क बढ़कर 50 प्रतिशत हो गया। यह भारत द्वारा रूसी तेल की निरंतर खरीद के दंड के रूप में लगाया गया।
  • व्यापार असंतुलन: भारत का तेल, कोयला और उर्वरकों का आयात उसके निर्यात से कहीं अधिक है, जिससे व्यापार घाटा और निर्भरता बढ़ रही है।
    • उदाहरण: वित्त वर्ष 2024 में, आयात निर्यात से 50 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया, जिससे फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी और आईटी सेवाओं में निर्यात विविधीकरण की आवश्यकता रेखांकित होती है।
  • रक्षा आपूर्ति में देरी: प्रतिबंधों और आपूर्ति शृंखला संबंधी समस्याओं के कारण प्रमुख रक्षा परियोजनाओं में देरी हुई है, जिससे समय-सीमा प्रभावित हुई है।
    • उदाहरण: S-400 वायु रक्षा प्रणाली की आपूर्ति में देरी हो रही है, और अब अंतिम डिलीवरी वर्ष 2024 के स्थान पर वर्ष 2026-27 तक आने की उम्मीद है।
  • चीन कारक: रूस की चीन के साथ बढ़ती निकटता के लिए भारत को आपसी विश्वास बनाए रखते हुए रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।
    • उदाहरण: जापान सागर में संयुक्त रूस-चीन सैन्य अभ्यास और आर्कटिक सहयोग रूस की समानांतर रणनीतिक प्राथमिकताओं को उजागर करते हैं।
  • प्रौद्योगिकी और दोहरे उपयोग वाले निर्यात की जाँच: रूस को प्रतिबंधित प्रौद्योगिकी के आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की बढ़ती भूमिका पश्चिमी देशों की जाँच का विषय रही है।
    • उदाहरण: कथित तौर पर रूस से जुड़े शिपमेंट के लिए बेंगलुरु स्थित एक प्रौद्योगिकी कंपनी पर जापानी प्रतिबंध बढ़ते अनुपालन दबाव को दर्शाते हैं।
  • लॉजिस्टिक अंतराल: अकुशल परिवहन मार्ग और सीमित वित्तीय अवसंरचना इष्टतम व्यापार विस्तार में बाधा डालते हैं।
    • उदाहरण: अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे (CVMC) का धीमा संचालन कनेक्टिविटी लाभ को प्रभावित करता है।

आगे की राह

  • FTA निष्कर्ष और व्यापार विविधीकरण: भारत-यूरेशियन आर्थिक संघ (EAEU) मुक्त व्यापार समझौते के शीघ्र पूरा होने से, जिसमें रूस सबसे बड़ा सदस्य और प्राथमिक भागीदार है, भारत-रूस व्यापार की मात्रा को बढ़ाने, शुल्क को कम करने और व्यापार असंतुलन को दूर करने में मदद मिलेगी।
    • उदाहरण: एक बार अंतिम रूप दिए जाने के बाद, FTA से वर्ष 2030 तक रूस और अन्य EAEU सदस्यों के साथ द्विपक्षीय व्यापार को 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक बढ़ाने की उम्मीद है, जिससे भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, वस्त्र और इंजीनियरिंग वस्तुओं के लिए बाजार पहुँच बढ़ेगी।
  • संयुक्त अनुसंधान एवं विकास और सह-विनिर्माण विस्तार: AI, हरित हाइड्रोजन, अर्द्धचालक और एयरोस्पेस जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग को मजबूत करने से औद्योगिक संबंधों का आधुनिकीकरण होगा।
    • उदाहरण: स्कोल्कोवो इनोवेशन सेंटर के तहत प्रस्तावित भारत-रूस प्रौद्योगिकी नवाचार कोष और सहयोग का उद्देश्य संयुक्त अनुसंधान और औद्योगिक नवाचार को गति देना है।
  • वित्तीय अवसंरचना और निपटान: रुपया-रूबल व्यापार तंत्र, डिजिटल भुगतान प्रणाली और बैंकिंग संपर्क को बेहतर बनाने से वित्तीय लेनदेन सुगम होंगे।
    • उदाहरण: एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) का विस्तार करने और इसे रूस की MIR प्रणाली के साथ एकीकृत करने की भारत की योजना लेन-देन संबंधी लागत और मुद्रा जोखिम को कम करेगी।
  • संपर्क गलियारे और रसद: प्रमुख गलियारों के संचालन से आपूर्ति शृंखलाएँ मजबूत होंगी और दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और यूरोप के बीच रणनीतिक संपर्क बढ़ेगा।
    • उदाहरण: अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे (CVMC) को तेज करने से माल ढुलाई लागत में लगभग 30% की कमी आ सकती है और वितरण समय में सुधार हो सकता है।
  • सुदूर पूर्व और आर्कटिक में संबंध: रूस के सुदूर पूर्व और आर्कटिक में गहराते सहयोग से संसाधनों तक पहुँच और आर्थिक साझेदारी के नए मार्ग खुलेंगे।
    • उदाहरण: पूर्वी आर्थिक मंच (2024) में भारत की भागीदारी और सुदूर-पूर्व में भारतीय कार्यबल गलियारे की स्थापना बढ़ती भागीदारी को दर्शाती है।
  • जन-केंद्रित और शैक्षिक कूटनीति: छात्र आदान-प्रदान, व्यावसायिक प्रशिक्षण और सांस्कृतिक सहयोग का विस्तार द्विपक्षीय संबंधों के सामाजिक आयाम को बनाए रखेगा।
    • उदाहरण: रूस में एक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) परिसर स्थापित करने और शैक्षणिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों को पुनर्जीवित करने की योजनाएँ, इस जन-प्रथम दृष्टिकोण को रेखांकित करती हैं।
  • संतुलित सामरिक स्वायत्तता: भारत को रूस के साथ मजबूत संबंध बनाए रखते हुए और पश्चिमी तथा हिंद-प्रशांत भागीदारों के साथ संबंधों को संतुलित करते हुए स्वतंत्र विदेश नीति का पालन जारी रखना चाहिए।
    • उदाहरण: यूक्रेन संघर्ष पर भारत का दृष्टिकोण, जहाँ उसने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संवाद और कूटनीति का आह्वान किया, इस संतुलित स्वायत्तता को दर्शाता है।

निष्कर्ष

23वें भारत–रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन ने पिछले 25 वर्षों में विकसित हुई इस साझेदारी की गहराई, लचीलेपन और रणनीतिक निरंतरता की पुष्टि की जो रक्षा, ऊर्जा, संपर्क, परमाणु सहयोग, गतिशीलता तथा बहुपक्षीय मंचों पर जुड़ाव जैसे क्षेत्रों में सतत् विस्तार का अनुभव कर रही है और इस संबंध को भारत की विदेश नीति की आधारशिला तथा उभरते बहुध्रुवीय विश्व में एक स्थायी शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

अभ्यास प्रश्न

भारत प्रायः रूस के साथ अपने संबंधों को ‘सर्वोत्तम मित्र देश’ के रूप में प्रस्तुत करता है, किंतु यह साझेदारी वास्तविक रूप से उतनी सशक्त और गतिशील नहीं बन पाई है। दोनों देशों के बीच यह दीर्घकालिक राजनीतिक सहजता व्यापक, संरचनात्मक साझेदारी में क्यों परिवर्तित नहीं हो सकी? साथ ही, वे कौन-से प्रमुख क्षेत्र हैं जहाँ भारत और रूस भविष्य में अधिक गहन एवं रणनीतिक सहयोग विकसित कर सकते हैं?

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